शाहरुख खान की तारीफों के पुल बांधते आकाश दीप साबिर

मशहूर अभिनेता व निर्देशक आकाश दीप साबिर व अभिनेता शाहरुख खान एक दूसरे को लंबे समय से जानते हैं. आकाशदीप साबिर ने कई स्टेज शो में शाहरुख खान को निर्देशित भी किया है. मगर जब से आकाश दीप साबिर ने आनंद एल राय के निर्देशन में शाहरुख खान की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘‘जीरो’’ में एक पार्टी के दृश्य में अभिनय किया है, तब से वह शाहरुख खान की तारीफों के पुल बांधते हुए नहीं थक रहे हैं.

खुद आकाशदीप साबिर कहते हैं- ‘‘मैने फिल्म ‘जीरो’ में अस्सी के दशक के फिल्म निर्माता का किरदार निभाया है. मैं इस फिल्म के पार्टी के दृश्य में नजर आउंगा, जहां अभय देओल व कटरीना कैफ मिलते हैं. किरदार की लंबाई मेरे लिए मायने नहीं रखती. यदि आनंद एल राय की फिल्म में एक फ्रेम में भी मुझे खड़ा होने के लिए कहा जाता, तो भी मेरे लिए उपलब्धि होती. आनंद एल राय ने फेसबुक एड में देखकर मुझे बुलाया.’’

शाहरुख खान की तारीफों के पुल बांधते हुए आकाशदीप साबिर आगे कहते हैं- ‘‘शाहरुख खान से मेरा काफी पुराना संबंध है. मैंने शाहरुख खान को कई स्टेज शो में निर्देशित किया है. इतने वर्षों से उनका प्यार व लगाव मेरे प्रति एक समान बना हुआ है. मैंने हमेशा कहा कि वह एक अति प्रतिभाशाली कलाकार हैं. आज की तारीख में उनके जैसा प्रतिभाशाली कलाकार कोई नहीं है. मोरानी व सूरमा के विश्व टूर के दौरान तीन बार मैंने शाहरुख खान, जुही चावला, काजोल व करिश्मा कपूर को निर्देशित किया. ‘सहारा’पर प्रसारित ‘ट्ब्यिूट टू किशोर कुमार’ के खास कार्यक्रम में भी मैंने शाहरुख खान को निर्देशित किया था. हर बार शाहरुख खान ने मुझे प्रभावित किया. वह काफी मेहनती, बुद्धिमान व विनम्र सुपर स्टार हैं. मेरे एक अंतरराष्ट्रीय शो में मैडोना ने भी शाहरुख खान की तारीफ की थी. मैडोना ने शो में ‘छैयां छैंयां..’ पर नृत्य भी किया था. इससे आप शाहरुख खान की लोकप्रियता का अंदाजा लगा सकते हैं.’’

शाहरुख खान की फिल्मों की चर्चा करते हुए आकाशदीप साबिर ने कहा- ‘‘मुझे शाहरुख खान की ‘कल हो न हो’, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘माई नेम इज खान’, ‘डर’,  ‘बाजीगर’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कोयला’, ‘करण अर्जुन’तथा ‘राजू बन गया जेंटलमैन’’काफी पसंद हैं.’’

‘दिलबर’ गाने पर इस लड़की ने किया जबरदस्त डांस

जौन अब्राहम की आने वाली फिल्‍म का पहला गाना ‘दिलबर’ रिलीज के साथ ही चार्टबीट पर टौप लिस्‍ट में शामिल हो गया है. सिंगर नेहा कक्‍कड़ की मखमली आवाज में इस रीमिक्‍स गाने का इन दिनों काफी पसंद किया जा रहा है और ऐसे में इस पर बनने वाली डांस वीडियो भी कम नहीं है. इस गाने पर बौलीवुड एक्‍ट्रेस और मौडल नोरा फतेही ने जबरदस्‍त डांस किया है. नोरा एक फेमस बेली डांसर हैं और इस गाने में उन्‍होंने इस हुनर का खूब इस्‍तेमाल किया है.

अब इस गाने पर एक नई डांसर कनिष्‍का का डांस सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. दरअसल कनिष्‍का एक डांसर हैं और अक्‍सर सोशल मीडिया पर अपने डांस वीडियो शेयर करती रहती हैं. ऐसे में इस नए गाने पर कनिष्‍का के इस डांस को यूट्यूब पर खासी तारीफ मिल रही है.

‘दिलबर’ फिल्‍म ‘सत्‍यमेव जयते’ का पहला गाना है, जिसे एक्‍ट्रेस नेहा कक्‍कड़, धवानी भानुशाली और इक्‍का ने गाया है. दरअसल यह गाना पुरानी फिल्‍म ‘सिर्फ तुम’ का फेमस गाना है, जिसपर सुष्मिता सेन थिरकती हुई नजर आई थीं. ‘सिर्फ तुम’ के इस गाने को सिंगर अल्‍का याग्निक ने अपनी आवाज दी थी और इसका संगीत समीर ने दिया था.

आंसू : आखिर कौन था वह अजनबी

”कुमारी सुनीता, आप की पूरी फीस जमा है. आप को फीस जमा करने की आवश्यकता नहीं है,” बुकिंग क्लर्क अपना रेकौर्ड चैक कर के बोला. ”मगर मेरी फीस किस ने जमा कराई है. वह भी पूरे 50 हजार रुपए,” सुनीता हैरानी से पूछ रही थी.

”मैडम, आप की फीस औनलाइन जमा की गई है,” क्लर्क का संक्षिप्त सा उत्तर था. वह हैरानपरेशान कालेज से वापस लौट आई. उस की मां बेटी का परेशान चेहरा देख कर पूछ बैठी, ”क्या बात है बेटी?”

”मां, किसी व्यक्ति ने मेरी पूरी फीस जमा करा दी है,” वह हैरानी से बोली. ”किस ने और क्यों जमा कराई?” सुनीता की मां भी परेशान हो उठी.

”पता नहीं मां, कौन है और बदले में हम से क्या चाहता है?” बेटी की परेशानी इन शब्दों में टपक रही थी. उस की मां सोच में पड़ गई. आजकल मांगने के बाद भी मुश्किल से 5-10 हजार रुपए कोई देता है वह भी लाख एहसान जताने के बाद. इधर ऐसा कौन है जिस ने बिना मांगे 50 हजार रुपए जमा करा दिए. आखिर, बदले में उस की शर्त क्या है?

”खैर, जाने दो जो भी होगा दोचार दिनों में खुद सामने आ जाएगा,” मां ने बात को समाप्त करते कहा. दोनों मांबेटी खाना खा कर लेट गईं. सुनीता की मां एक प्राइवेट हौस्पिटल में 4 हजार रुपए मासिक पर दाई की नौकरी करती है. आज से 15 साल पहले एक रेल ऐक्सिडैंट में वह पति को खो चुकी थीं. तब सुनीता मुश्किल से 5-6 साल की रही होगी. तब से आज तक दोनों एकदूसरे का सहारा बन जी रही हैं. सुनीता को पढ़ाना उस का एक फर्ज है. बेटी बीए कर रही थी.

सुनीता ने अपने पिता को इतनी कम उम्र में देखा था कि उसे उन का चेहरा तक ठीक से याद नहीं है. कोई नातेरिश्तेदार इन से मिलने नहीं आता था. ऐसे में यह कौन है जो उस की फीस भर गया? दोनों मांबेटी की आंखों में यह प्रश्न तैर रहा था. पिता के नाम के स्थान पर दिवंगत रामनारायण मिश्रा लिखा था मगर वे कौन थे और कैसे थे, इस की चर्चा घर में कभी नहीं होती थी. मगर आज.

सुनीता के चाचा, मामा, मौसा या किसी दूसरे रिश्तेदार ने आज तक कभी एक रुपए की मदद नहीं की, ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी रकम की मदद किस ने की. बहरहाल, सुनीता उत्साह के साथ पढ़ाई में जुट गई. दोचार वर्षों में वह बैंक, रेलवे या कहीं भी नौकरी कर के घर की गरीबी दूर कर देगी. वह मां को इस तरह खटने नहीं देगी. मां ने विधवा की जिंदगी में काफी कष्ट झेला है.

सुनीता उस दिन अचकचा गई जब उस के प्राचार्य ने उसे एक खत दिया. और कहा, ”बेटी, आप के नाम यह पत्र एक सज्जन छोड़ गए हैं, आप चाहें तो इस पते पर उन से संपर्क कर सकती हैं या फोन पर बात कर सकती हैं.” ”जी, धन्यवाद सर,” कह कर वह उन के कैबिन से बाहर आ गई और सीधा घर जा कर खत पढ़ा. उस में लिखा था, ”बेटी, आप की फीस मैं ने भरी है, बदले में मुझे तुम से कुछ भी नहीं चाहिए, न ही तुम्हें यह पैसा लौटाना है.” नीचे उन के हस्ताक्षर और मोबाइल नंबर था.

सुनीता की मां ने जब वह नंबर डायल किया तो तुरंत जवाब मिला, ”जी, आप सुनीता या उस की मां?” ”मैं उस की मां बोल रही हूं. आप ने मेरी बेटी की फीस क्यों भरी?”

”जी, इसलिए कि मुझे इन के पिता का कर्ज चुकाना था.” वह संक्षिप्त उत्तर दे कर चुप हो गया. ”ऐसा कीजिए आप मेरे घर आ जाइए.”

”ठीक है, रविवार को दोपहर 1 बजे मैं आप के घर आऊंगा,” कह कर उस व्यक्ति ने फोन काट दिया. रविवार को वह समय पर हाजिर हो गया. करीब 28-30 वर्ष का वह नौजवान आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था. वह बाइक से आया और सुनीता की मां को मिठाई का डब्बा दे कर नमस्कार किया.

सुनीता ने भी उसे नमस्कार किया और पास में बैठते हुए अपना प्रश्न दोहराया. ”मैं ने फोन पर बताया तो था कि आप का ऋण चुकता किया है,” वह सरल स्वर में बोला था.

”कैसा ऋण? दोनों मांबेटी चौंकी थीं. ”ऐसा है कि रामनारायणजी ने मेरे पिताजी की 3 हजार रुपए की मदद की थी. उस के बाद मेरे पिताजी जब तक वह पैसा लौटाते तब तक रामनारायणजी गुजर चुके थे. परिवार का कोई ठिकाना नहीं था. मेरे पिताजी ने आप लोगों को बहुत ढूंढ़ा पर खोज नहीं पाए,” वह स्पष्ट स्वर में जवाब दे रहा था, मैं पढ़लिख कर नौकरी में आ गया और स्टेट बैंक की उसी शाखा में आ गया जहां आप लोगों का खाता है. साथ ही, वहीं सुनीता के कालेज का भी खाता है. मुझे यहीं आप का परिचय और आप की माली हालत का पता चला. मैं ने आप की मदद का निश्चय किया और फीस भर दी.”

”मगर आप अपनेआप को छिपा कर क्यों रखना चाहते थे,” यह सुनीता का प्रश्न था. ”वह इसलिए कि मुझे बदले में कुछ भी नहीं चाहिए था और जमाने को देखते हुए मुझे चलना था.”

”फिर सामने क्यों आए?” यह सुनीता की मां का प्रश्न था. ”जब आप लोगों को परेशान देखा, खास कर आप का यह डर की पता नहीं इस आदमी की छिपी शर्त क्या है? मैं ने आप का ऋण चुकाया था, डराना मेरा पेशा नहीं है. सो, सामने आ गया.”

अब उस के इस जवाब से वे दोनों मांबेटी, आश्चर्य से भर उठीं. ”मैं अब निकलना चाहूंगा. आप लोग चिंता न करें. मैं ने अपने पिताजी का ऋण चुकाया है,” वह उठते ही बोला.

”ऐसे कैसे? वह भी 3 हजार के 50 हजार रुपए?” अभी भी सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी. ”3 हजार रुपए नहीं, उन 3 हजार रुपए से मेरे पिता ने मेरी जान बचाई, मेरा इलाज कराया. मैं जीवित हूं, तभी आज बैंक में काम कर रहा हूं. गरीबी की हालत में मेरे पिताजी की रामनारायणजी ने मदद की थी. आज मेरे पास सबकुछ है, बस, पिताजी नहीं हैं,” वह भावुक हो कर बोल रहा था.

”फिर तुम यह पैसा वापस क्यों नहीं लेना चाहते?” यह सुनीता की मां का प्रश्न था. ”उपकार के बदले प्रत्युपकार हो गया. सो कैसा पैसा?” वह स्पष्ट बोला.

”फिर भी.” सुनीता की मां समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे? ”कुछ नहीं आंटीजी, आप ज्यादा न सोचें. अब मुझे इजाजत दें,” इतना कह कर वह चल दिया.

दोनों मांबेटी उसे जाता देख रही थीं. इन की आंखों से खुशी के आंसू झर रहे थे. ”मां, आज भी ऐसे लोग हैं,” सुनीता बोली.

”हां, तभी तो वह हमारी मदद कर गया.” ”मैं नौकरी कर के उन का पैसा वापस कर दूंगी,” वह भावुक हो कर बोली.

”बेटी, ऐसे लोग बस देना जानते हैं, लेना नहीं. सो, फीस की बात भूल जाओ. हां, बैंक में मेरा परिचय हो गया है, काम जल्दी हो जाएगा,” मां के बोल दुनियादारी भरे थे. दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू थे जो एक ही वक्त में 2 अलग सोच पैदा कर रहे थे. मां जहां पति को याद कर रो रही थी जिन के दम पर आज 50 हजार रुपए की मदद मिली, वहीं बेटी को यह व्यक्ति फरिश्ता नजर आ रहा था. काश, वह भी किसी की मदद कर पाती. 50 हजार रुपए कम नहीं होते.

अब बस, दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे.

हार्टअटैक में गोल्डन आवर, कार्डिएक अरैस्ट में गोल्डन सैकंड्स

जब जीवन और मृत्यु का सवाल होता है तो हर एक सैकंड माने रखता है. यही वह समय होता है जिस में व्यक्ति को तय करना होता है कि उसे क्या कदम उठाना है. जब हमारे पास किसी मरीज के लिए बेहतरीन विकल्प चुनने के लिए एक घंटे का समय होता है तब हम बहुतकुछ कर सकते हैं, लेकिन जब किसी का जीवन बचाने के लिए सिर्फ कुछ सैकंड्स का समय बचा हो तब मामला अलग होता है. इन दोनों ही स्थितियों में हमारे द्वारा उठाया गया कदम बेहद महत्त्वपूर्ण होता है.

जीवन बचाने के लिए उपलब्ध गोल्डन आवर और गोल्डन सैकंड्स के बीच का अंतर हार्टअटैक होने और किसी को अचानक कार्डिएक अरैस्ट होने के मामले में भी होता है.

इमरजैंसी में गोल्डन आवर

गोल्डन आवर का कौन्सैप्ट उन मामलों में लागू होता है जिन में मरीज को गंभीर चोट आई हो या कोई अन्य मैडिकल इमरजैंसी हुई हो. इस के बाद का पहला एक घंटा बेहद महत्त्वपूर्ण होता है, जिस में सही इलाज और प्रबंधन से मरीज की जान या उस के शरीर के अंगों को खराब होने से बचाया जा सकता है. हालांकि कोई भी कदम पत्थर की लकीर ही साबित हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता है लेकिन ट्रौमेटिक इवैंट के बाद पहले एक घंटे के भीतर मरीज को सही मैडिकल देखभाल मिल जाए तो उस की जान बचने के अवसर कई गुना बढ़ जाते हैं.

हार्टअटैक के मामले में अकसर यह सलाह दी जाती है कि ऐसा होने के बाद पहले एक घंटे के भीतर मरीज को इमरजैंसी केयर मिलनी चाहिए. लेकिन कार्डिएक अरैस्ट के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता है.

हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट के बीच भ्रम

हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट में अंतर है. अधिकतर लोग हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट को एक ही बात समझते हैं जबकि दोनों के फर्क को बखूबी समझना बेहद जरूरी है. हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट दिल से जुड़ी 2 अलग समस्याएं हैं.

हार्टअटैक : किसी व्यक्ति को हार्टअटैक तब होता है जब उस के हृदय तक जाने वाले औक्सिजन युक्त रक्त का प्रवाह सही ढंग से नहीं होता है, जहां से रक्त पंप हो कर शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंचता है. हार्टअटैक के दौरान दिल की रक्त को पंप करने की क्षमता आंशिकरूप से कम हो जाती है. हार्टअटैक होने पर भी दिल रक्त को पंप करता रहता है, लेकिन इस की गति धीमी हो जाती है. हार्टअटैक होने पर व्यक्ति कुछ मिनटों अथवा कुछ घंटों के लिए जी सकता है और जीवित भी बच सकता है, लेकिन इस के लिए जरूरी है कि मरीज को जितनी जल्दी हो सके, इमरजैंसी केयर में ले जाया जाए क्योंकि शरीर के अंगों और दिमाग में भरपूर मात्रा में रक्त संचार न होने से उन अंगों में गंभीर डैमेजेज हो सकते हैं. ऐसे में स्ट्रोक हो सकता है, यहां तक कि अचानक कार्डिएक अरैस्ट भी हो सकता है.

कार्डिएक अरैस्ट :  सवाल उठता है कि आखिर कार्डिएक अरैस्ट है क्या? कार्डिएक अरैस्ट अचानक हो सकता है बिना किसी अलर्ट अथवा वार्निंग साइन के. कार्डिएक अरैस्ट होने पर मरीज का दिल काम करना बंद कर देता है, क्योंकि ऐसे में हार्ट के इलैक्ट्रिकल सिस्टम में समस्या हो जाती है और पंपिंग की प्रक्रिया बाधित हो जाती है. इस के परिणामस्वरूप ब्रेन व शरीर के अन्य हिस्सों में रक्तप्रवाह पूरी तरह से रुक जाता है. कुछ ही सैकंड के भीतर मरीज अचेत हो जाता है और उस के पल्स गायब हो जाते हैं और अगले कुछ ही मिनटों में मरीज की मौत भी हो सकती है.

हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट में अंतर

हार्टअटैक उन तमाम कारणों में से एक है जो कार्डिएक अरैस्ट के लिए जिम्मेदार होते हैं. खराब कार्डियोवैस्कुलर हैल्थ, हार्ट डिजीज, एरिथमिया (अनियमित दिल की धड़कन) अथवा अनियमित हार्टबीट उन तमाम अन्य कारणों में शामिल हैं जिन के चलते हार्ट का इलैक्ट्रिक सिस्टम प्रभावित होता है और कार्डिएक अरैस्ट की स्थिति उत्पन्न होती है.

कार्डिएक अरैस्ट में सिर्फ गोल्डन सैकंड्स

हार्टअटैक के मामले में जहां मरीज के अटैंडैंट अथवा रैस्क्यूअर के पास मरीज को हौस्पिटल ले जाने के लिए गोल्डन आवर होता है वहीं कार्डिएक अरैस्ट के मामले में व्यक्ति के पास कुछ महत्त्वपूर्ण सैकंड्स ही होते हैं. ऐसे में कार्डिएक अरैस्ट के लक्षणों को पहचान कर तुरंत ऐक्शन लेना बेहद जरूरी होता है.

जब व्यक्ति को कार्डिएक अरैस्ट होता है तब तुरंत ऐंबुलैंस बुलानी चाहिए और साथ ही कार्डियोपल्मोनरी रीससिटेशन (सीपीआर) भी करना चाहिए. सीपीआर में मरीज की छाती पर हथेलियों से तेज दबाव बनाया जाता है. इस दौरान प्रति मिनट 120 कम्प्रैशन की स्पीड होनी चाहिए. ऐसा तब तक करना चाहिए जब तक कि मरीज को मैडिकल सहायता न मिल जाए.

हार्टअटैक और कार्डिएक अरैस्ट एक चीज नहीं हैं और इन का एकसमान प्रबंधन नहीं हो सकता है. ऐसे में हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि इन दोनों के बारे में संपूर्ण जानकारी रखें, न कि इन दोनों स्थितियों को इनोसैंस और इग्नोरैंस का दर्जा दे कर लापरवाही बरतें, खासतौर से कार्डिएक अरैस्ट की स्थिति में, जहां हमें जीवन बचाने के लिए कुछ गोल्डन सैकंड्स ही मिलते हैं.

– डा. वनिता अरोड़ा, कार्डिएक इलैक्ट्रोफिजियोलौजिस्ट, मैक्स  सुपर स्पैशियलिटी हौस्पिटल, साकेत, दिल्ली.

जादुई चश्मा : लालच बुरी भला

लालच बुरी बला होती है. यह समझते हुए भी गुजरात के कुछ कारोबारी बदमाशों के चंगुल  में फंस कर ‘जादुई चश्मा’ और नेपाल की महारानी के ‘हीरों का हार’ लेने के लिए बदमाशों के चंगुल में फंस जाते थे. बदमाशों ने अपना जाल गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे 3 प्रदेशों में फैला रखा था.

गुजरात से शिकार को फंसा कर लखनऊ बुलाया जाता था, फिर उन्हें लखनऊ में रखा जाता था. लाखों की फिरौती देने के बाद भी कारोबारी बदमाशों की पकड़ से आजाद नहीं हो पाता था. बदमाश फिरौती लेने के लिए अमानवीय व्यवहार करते थे. लखनऊ पुलिस ने इन लोगों को पकड़ कर 3 राज्यों में फैले इस ठगी के कारोबार का परदाफाश कर दिया.

‘‘मोटा भाई, यह बात केवल खास लोगों को ही बताता हूं. आप मेरे लिए बहुत खास हो और यह जादुई चश्मा आप के लिए बहुत खास है. आप जैसे लोगों के लिए ही इसे बनाया गया है.’’ भानु ने गुजरात के जूनागढ़ में रहने वाले कारोबारी सुरेशभाई से कहा.

‘‘तुम्हारी बात सही है भाया, पर यह तो बताओ कि तुम्हारे इस खास जादुई चश्मे का राज क्या है? क्याक्या दिखता है इस से?’’ सुरेश ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मोटा भाई, यह पूछो क्या नहीं दिखता. समुद्र के अंदर कहां तेल और यूरेनियम हो सकता है, किसी पुरानी हवेली में कहां खजाना हो सकता है, हीरे की खदानें कहां हैं, यह सब इस जादुई चश्मे से दिख जाता है.’’ भानु ने जादुई चश्मे की खासियत बताते हुए कहा.

‘‘बहुत करामाती चश्मा है यह तो.’’ जादुई चश्मे के गुण सुन कर सुरेश चकित रह गया.

‘‘और नहीं तो क्या मोटा भाई. सालों की मेहनत का नतीजा है. सरकार इसे बाजार में बेचना थोड़े ही चाहती है. इसलिए नजर बचा कर बेचना पड़ रहा है.’’ जादुई चश्मा के बारे में भानु ने ज्यादा जानकारी देते हुए कहा.

‘‘कितनी गहराई तक देख लेता है?’’ सुरेशभाई की उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही थी.

‘‘मोटा भाई, 7 फीट गहराई में तो यह साफ देख लेता है. अगर उस से गहरा कुछ है तो यह सिगनल भेज देता है.’’ भानु ने उस की दूसरी खासियत भी बताई.

‘‘तब तो यह कपड़ों के आरपार भी देख लेता होगा?’’ सुरेशभाई का लालच बढ़ गया था.

‘‘मोटा भाई, एक रुपए में 6 चवन्नी करना चाहते हो तो जादुई चश्मा ले लो फिर देखना क्याक्या दिखता है.’’ सुरेश की उत्सुकता को देख कर भानु ने कहा.

‘‘इस की कीमत तो बताई नहीं?’’

‘‘इस की कीमत तो माटी के भाव जैसी है. केवल एक करोड़ रुपए.’’

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‘‘यह तो बहुत ज्यादा है.’’

‘‘ज्यादा नहीं है. एक बार भी इसे लगा कर वह दिख गया जो सब को नहीं दिखता तो कीमत से कई गुना मिल जाएगा.’’

‘‘कुछ भी हो पर एक करोड़ होता तो ज्यादा ही है. कैसे देखने को मिलेगा?’’

‘‘मोटा भाई, ज्यादा लग रहा है तो 2 लोग मिल कर ले लो. आप दोनों को लखनऊ आने का हवाई टिकट करा देता हूं. यहां होटल में रुको, चश्मा देखो और फिर पैसे दे कर ले जाओ.’’ भानु ने मछली फंसती देखी और उसे यकीन हो गया कि अब सौदा हो जाएगा.

‘‘ठीक है भाया, हम और साथी केतनभाई लखनऊ आएंगे, तुम जादुई चश्मा तैयार रखना.’’

भानुप्रताप सिंह बहराइच के केवलपुर का रहने वाला था. सूरत से कपड़े ले जा कर वह नेपाल में बेचने का धंधा करता था. गुजरात में 3 साल पहले काम शुरू करने वाले भानुप्रताप ने सोचा था कि कपड़े बेच कर वह बड़ा कारोबारी बन जाएगा. पर उस की यह धारणा जल्द ही गलत साबित हुई थी.

गुजरात में कारोबार करने गए भानुप्रताप सिंह को खुद ठगी का शिकार होना पड़ा था. ठगी करने वाले बदमाशों ने उसे बंधक बना कर 21 लाख रुपए ऐंठ लिए. इतना पैसा देने से उस का पूरा कारोबार डूब गया. यह पैसा उसे कई लोगों से कर्ज ले कर देना पड़ा था.

इस घटना से भानुप्रताप को पता चल गया कि ईमानदारी से कारोबार करना बहुत मुश्किल है. ऐसे में उस ने अब पैसा कमाने के लिए ठगी का धंधा शुरू कर दिया. जिस तरह से वह फंसा था, वैसे ही उस ने भी दूसरों को फंसाना शुरू किया.

भानुप्रताप ने बहराइच के रहने वाले जितेंद्र सोनी को अपने साथ लिया और वापस गुजरात पहुंच गया. यहां उस ने कई बेरोजगारों को अपने साथ मिलाया. ये युवक बिना किसी मेहनत के लाखों रुपया कमाना चाहते थे. इन का काम गुजरात में रहने वालों से संपर्क कर उन्हें जादुई चश्मा बेचने का था.

गांधीनगर के रहने वाले कैमिकल कारोबारी भूपेंद्र पटेल को भी इन लोगों ने संपर्क कर जादुई चश्मा खरीदने के लिए कहा. इस के लिए 6 जनवरी को उन्हें लखनऊ बुलाया और बंधक बना कर रख लिया. इस के बाद फिरौती के 15 लाख रुपए वसूल किए. बंधक बना कर भूपेंद्र को कई तरह से यातनाएं दी गईं. बेल्ट से पिटाई और नाखून उखाड़ने तक की यातना दी गई. वह जान बख्श देने की दुहाई देते रहे.

भूपेंद्र घर वालों के संपर्क में थे. किसी तरह से 14 जनवरी को बंधकों के चंगुल से आजाद हो कर अपने घर पहुंचे. लगातार मिली प्रताड़ना से उन का जिस्म बुखार से तप रहा था. अगले ही दिन उन की मौत हो गई. घर वालों को पहले लगा कि बुखार की वजह से मौत हुई है. जब उन का अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही था तो घर वालों ने देखा कि उन के नाखून गायब थे. शरीर पर डंडे की पिटाई के निशान दिख रहे थे.

भूपेंद्र का मोबाइल खंगालने के बाद पता चला कि वह एक सप्ताह लखनऊ में थे. उन के बैंक खातों से लाखों रुपए निकाले गए थे. पुलिस की छानबीन से पता चला कि जादुई चश्मा लेने के लिए भूपेंद्र ने कई लोगों से ले कर पैसे दिए थे. भानु का गैंग जादुई चश्मा बेचने में लगा हुआ था.

भानु ने खुद को कारोबारी बता कर जानकीपुरम कालोनी में रहने वाले आफाक अहमद से उन के साढ़ू नियाज अहमद का मकान किराए पर लिया, जो सऊदी में रहते हैं. इस के बाद बदमाशों ने जूनागढ़ के दवा कारोबारी सुरेश भाई और सूरत के मयंक भाई और केतन जरीवाला को जादुई चश्मे का झांसा दे कर बुलाया.

ये लोग 21 फरवरी को हवाईजहाज से लखनऊ आ गए. पहले उन्हें रेलवे स्टेशन के पास चारबाग इलाके में होटल में ठहराया गया. यहां पर होटल सस्ते मिल जाते हैं.

यहां से इन्हें बंधक बना कर अड्डे पर ले गए. वहां इन लोगों को प्रताडि़त कर के पैसे वसूल करने शुरू किए. बदमाशों ने तीनों से 20 लाख रुपए वसूले. 28 फरवरी को जब इन्हें दूसरे ठिकाने पर ले जाया जा रहा था तो तीनों व्यापारी औटो से कूद कर भाग निकले. सुरेश ने पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया. केतनभाई की लखनऊ के मैडिकल कालेज में 9 मार्च को मौत हो गई.

जादुई चश्मा लेने के झांसे में फंसने के बाद व्यापारी को बंधक बना लिया जाता था. इस के बाद रिहाई के लिए उस के रिश्तेदारों से फिरौती मांगी जाती थी. पैसे देने के बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया जाता था. जब मुंहमांगी रकम नहीं मिलती थी तो बदमाश कहते थे कि अगर पैसा नहीं मिला तो 20 से 50 लाख रुपए में उन के गुर्दे का सौदा हो रहा है.

इस से घबरा कर कारोबारी खुद पैसे का इंतजाम करने लगता था. फिरौती की रकम हवाला के जरिए वसूल होती थी. ये लोग खुद को व्यापारी बता कर किराए पर पूरा मकान लेते थे. लोगों को वहीं पर बंधक बना कर रखा जाता था. एक माह में 4 से 6 कारोबारियों से वसूली करने के बाद ये लोग मकान छोड़ देते थे.

लखनऊ के जानकीपुरम में गुजरात के 6-7 कारोबारियों को लूटने के बाद इन लोगों ने राजस्थान के राजसमंद जिले में अपना ठिकाना बनाया था. वहां भी 3 लोगों से 15 लाख रुपए वसूल चुके थे. धमकी और यातना से परेशान कारोबारी पैसा दे देते थे.

लखनऊ पुलिस ने इन बदमाशों की तलाश शुरू कर दी थी. एसपी (ट्रांसगोमती) हरेंद्र कुमार की अगुवाई में यह टीम काम कर रही थी.

इस टीम को बदमाशों तक पहुंचना आसान काम नहीं था. सब से अहम भूमिका सर्विलांस सेल की थी. कई नंबरों को सामने रख कर छानबीन शुरू हुई. सर्विलांस और स्वाट टीम के एसआई अजय प्रकाश त्रिपाठी, कांस्टेबल विद्यासागर, रामनरेश कनौजिया, मोहम्मद आजम खां और सुधीर सिंह ने लोकेशन ट्रेस करने का काम शुरू किया.

जानकीपुरम थाने के एसआई दयाशंकर सिंह, कांस्टेबल जितेंद्र प्रताप सिंह को राजसमंद के काकरौली थाने की पुलिस को साथ ले कर उदयपुर जाना पड़ा. वहां इन के ठिकाने पर दबिश दी गई. राजस्थान पुलिस को अपनी नाक के नीचे हो रहे अपराध का पता तक नहीं था. जैसे ही लखनऊ पुलिस ने इन्हें पकड़ा, वहां पुलिस ने खुद के गुडवर्क की खबर फैला दी.

वहां दबिश देने पर पुलिस को गुजरात के भावनगर के रहने वाले रामजीभाई, आरिफ, राजकोट के भावेश, दिलीपभाई और बहराइच के भानुप्रताप सिंह को पकड़ा गया. इन लोगों ने गुजरात के कच्छ निवासी इरफान, विनोद, सरफराज को पकड़ रखा था.

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ये लोग कमरे में रस्सी से जकड़े पड़े थे. इन तीनों को बेरहमी से पीटा गया था. ये लोग बंधकों से 16 लाख रुपए वसूल कर चुके थे. पिटाई से तीनों की चमड़ी उधेड़ी गई थी. इन तीनों ने राजस्थान के राजसमंद जिले के काकरौली थाने में मुकदमा लिखाया.

बदमाशों ने सरफराज को गैराज का मालिक समझ कर उठा लिया था. लेकिन वह मैकेनिक निकला. सरफराज को बताया कि उन के पास नेपाल की महारानी का चुराया हुआ हीरों का हार है, जबकि इरफान और विनोद को जादुई चश्मे के झांसे में बुलाया गया था.

इस गिरोह की सफलता पर बात करते हुए पुलिस ने बताया कि पकड़े गए 5 बदमाशों को काकरौली थाने की पुलिस ने मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

जानकीपुरम थाने में दर्ज एफआईआर की विवेचना कर रहे एसएसआई दयाशंकर सिंह ने पांचों बदमाशों को अपनी कस्टडी में लेने के लिए रिमांड की अरजी दी, लेकिन उन्हें लखनऊ लाने की अनुमति नहीं दी गई. अब बदमाशों को वारंट बी बना कर लखनऊ लाया जाएगा, जिस से आगे की पूछताछ की जा सके.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पिया बिन नहीं जीना मुझे

राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल सीमा अपनी 4 वर्षीय बेटी वंशिका के साथ बीछवाल थाना प्रांगण में बने स्टाफ क्वार्टर में रहती थी. उस के साथ उस का भाई सुमित भी रहता था. सुमित भी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल था. सीमा की ड्यूटी बीकानेर पुलिस लाइन में थी. करीब डेढ़ महीना पहले ही वह पाली जिले से ट्रांसफर करा कर बीकानेर आई थी. पहले उस की पोस्टिंग पाली के औद्यौगिक थाने में थी.

25 मार्च, 2018 की शाम को सीमा बेटी के साथ थी. उस का भाई सुमित किसी काम से बाजार गया हुआ था. जब वह बाजार से घर लौटा तो घर में कमरे का दरवाजा अंदर से बंद मिला. सुमित ने दरवाजा खटखटा कर बहन को आवाज दी पर दरवाजा नहीं खुला.

कई बार आवाज देने के बावजूद भी जब अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो सुमित ने खिड़की से अंदर झांक कर देखा तो उसे बहन सीमा व वंशिका फंदे पर झूलती दिखाई दीं. यह देख कर सुमित की चीख निकल गई.

उस के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए. सुमित ने लोगों की सहायता से खिड़की तोड़ी. उस ने सब से पहले अपनी बहन और भांजी को फंदे से उतारा. तब तक बीछवाल के थानाप्रभारी धीरेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच चुके थे. दोनों को तुरंत पीबीएम अस्पताल ले जाया गया. जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

मृतका सीमा के कमरे से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ. उस में कांस्टेबल सीमा ने सासससुर से माफी मांगते हुए लिखा कि सभी ने उस का और बेटी वंशिका का खयाल रखा, लेकिन पति हरकेश की मौत के बाद से मैं बहुत तनाव में हूं. इसलिए बेटी के साथ फांसी लगा कर आत्महत्या कर रही हूं. सीमा ने पत्र में इच्छा जताई कि मेरा अंतिम संस्कार भी वहीं हो, जहां पति का किया गया था और उस की और बेटी की आंखें दान कर दी जाएं. ताकि किसी को रोशनी मिल सके.

चूंकि मामला एक पुलिसकर्मी से संबंधित था, इसलिए थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी दीपक भार्गव भी वहां पहुंच गए. उन्होंने भी मौका मुआयना किया. थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए पीबीएम अस्पताल भेज दिया.

सीमा सरकारी मुलाजिम थी, उसे कोई आर्थिक परेशानी नहीं थी. ससुराल में सभी लोग उस का बहुत खयाल रखते थे. इन सब बातों के बावजूद आखिर ऐसी क्या वजह रही जो उस ने अपने साथ बेटी को भी फंदे पर लटका दिया. जांच करने के बाद पुलिस को इस के पीछे की जो बात पता चली, वह हृदयविदारक थी.

सीमा सन 2006 में राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हुई थी. उसी के बैच में हरकेश मान नाम का युवक भी भरती हुआ था. हरकेश झुंझनू जिले के भीरी गांव का मूल निवासी था. पर बाद में उस का परिवार चिढ़ावा कस्बे में रहने लगा था.

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साथसाथ पुलिस ट्रेनिंग करने के दौरान सीमा और हरकेश की अच्छी जानपहचान हो गई थी. बाद में घर वालों की मरजी से दोनों की शादी हो गई. सीमा का भाई सुमित भी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हो गया था.

सीमा पति के साथ बहुत खुश थी. हरकेश भी उस का बहुत ध्यान रखता था. दोनों की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी. इस दौरान सीमा एक बेटी की मां भी बन गई थी जिस का नाम वंशिका रखा गया.

सीमा का पति हरकेश एक जांबाज व होशियार सिपाही था. अपनी मेहनत के बूते पर उस ने अनेक बडे़ केसों को खोलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस की तैनाती पाली की कोतवाली में थी. अपने प्रयासों के बल पर उस ने दीपक हत्याकांड को खोलने में विशेष भूमिका निभाई थी.

इस के अलावा उस ने कंजर गैंग, नायडू शेट्टी गैंग तथा गत दिनों पाली में मोबाइल शोरूम से लाखों रुपए के मोबाइल चुराने वाले गैंग का पता लगा कर उन्हें गिरफ्तार कराने में विशेष भूमिका निभाई थी. इन केसों में मिली सफलता के बाद हरकेश को एसपी के अलावा डीआईजी और आईजी ने भी सम्मानित किया था.

पति की इस उपलब्धि पर सीमा का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया था. चूंकि वह भी पति के साथ उसी थाने में तैनात थी, इसलिए पति से उसे काफी प्रेरणा मिली थी. अपने छोटे से परिवार में सीमा बहुत खुश थी. लेकिन 31 अक्तूबर, 2017 को इन के परिवार में अचानक एक ऐसी घटना घटी जिस से उन की हंसतीखेलती गृहस्थी उजड़ गई.

दरअसल हरकेश मान के साले की शादी थी. 31 अक्तूबर, 2017 को हरकेश ड्यूटी से चिड़ावा में स्थित अपने क्वार्टर पर पहुंच कर शादी में जाने की तैयारी करने लगा. सीमा भी भाई की शादी में जाने की तैयारी में जुटी थी. हरकेश ने अपने बालों में मेंहदी लगाई हुई थी. वह बालों की मेंहदी को धो रहा था तभी अचानक आगे की तरफ गिर गया. सामने कोई एक पाइप था जो सीधे हरकेश के सिर में घुस गया.

हरकेश के चीखने पर सीमा बाथरूम में गई तो वहां खून देख कर वह भी घबरा गई. उस ने पड़ोसियों को बुलाया, जिन की मदद से हरकेश को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. लेकिन डाक्टर उसे बचा नहीं सके. उस की मौत हो गई.

पति की मौत पर सीमा का तो घरसंसार ही उजड़ गया था. शादी में जाने की खुशी रंज में बदल गई थी. एक तेजतर्रार सिपाही की मौत की खबर पा कर जिले के पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए. सभी इस आकस्मित मौत पर आश्चर्यचकित थे.

घर वालों का तो रोरो कर बुरा हाल था. घर वालों के अलावा विभाग के लोगों ने भी सीमा को बहुत समझाया. पर वह अपने प्रियतम को भला कैसे भुला सकती थी. लोगों के समझाने पर सीमा ने खुद को संभालने की कोशिश की. वह अपने काम में व्यस्त रह कर दुख को भुलाने की कोशिश करती रही लेकिन रहरह कर उसे पति की यादें बेचैन किए रहती थीं.

पहले सीमा की पोस्टिंग पाली थाने में थी जबकि उस का भाई सुमित बीकानेर के महिला थाने में था. अरजी दे कर उस ने करीब डेढ़ महीने पहले ही अपना ट्रांसफर बीकानेर करा लिया था. ताकि भाई के साथ रहने पर वह खुद अकेला महसूस न समझे.

वह भाई के साथ ही बीछवाल थानापरिसर में बने आईएसी क्वार्टरों में रहती थी. हालांकि ससुराल पक्ष के लोगों की तरफ से भी सीमा का हर तरह से खयाल रखा जा रहा था. इस के बावजूद भी सीमा को रहरह कर पति की यादें आ रही थी. पति के बिना वह खुद को अकेला महसूस कर रही थी. उसे लगने लगा था कि अब पति के बिना उस का जीना ही बेकार है. वह खोईखोई सी रहने लगी.

फिर एक दिन सीमा ने फैसला कर लिया कि जब उस का पति ही न रहा हो तो अब उस का जीना ही बेकार है. उस ने तय कर लिया था कि वह भी अपनी जीवनलीला खत्म कर पति के पास जाएगी. तभी उसे अपनी बेटी वंशिका का ध्यान आया कि उस के जीवित न रहने पर बिन मांबाप के पता नहीं उस की जिंदगी कैसे कटेगी. लिहाजा उस ने अपने साथ बेटी वंशिका की भी जीवनलीला खत्म करने का निर्णय ले लिया.

25 मार्च की शाम को उसे यह मौका मिल ही गया. उस दिन सीमा का भाई सुमित भी अपनी ड्यूटी से आ गया था. वह शाम के समय बाजार गया. तभी सीमा ने सब से पहले अपनी बेटी को फंदे पर लटकाया इस के बाद वह खुद भी लटक गई. इस से पहले उस ने एक सुसाइड नोट लिख दिया था, जिस में किसी को भी दोषी न ठहराते हुए अपनी और बेटी की आंखें दान करने की बात लिख दी थी.

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सीमा ने भले ही अपनी समझ से अपनी और बेटी की सांसें रोक दीं पर ऐसा कर के उस ने कोई समझदारी का काम नहीं किया. बेटी के सहारे वह जिंदगी काट सकती थी. उसे उस समय काउंसलिंग की जरूरत थी. यदि उस की उस समय काउंसलिंग हो जाती तो शायद वह यह कदम नहीं उठाती.

वैवाहिक विज्ञापन वर चाहिए

मेरी 25 वर्षीय बेटी कौन्वैंट एजुकेटेड डिगरीधारी है. एक एमएनसी यानी मल्टीनैशनल कंपनी के मैनेजिंग डायरैक्टर की पर्सनल सैक्रेटरी है. उस का सालाना पैकेज 15 लाख रुपए है. रंग गोरा, सुडौल, कदकाठी आकर्षक नयननक्श, कद 5 फुट 5 इंच के लिए गृहकार्य में दक्ष, सरकारी नौकरी करने वाला (प्राइवेट नौकरी वाले कृपया क्षमा करें), पढ़ालिखा, आधुनिक विचारों वाला, सहनशील, गौरवर्ण और कम से कम 5 फुट 9 इंच कद वाला आज्ञाकारी वर चाहिए. जो निम्न शर्तें पूरी करता हो वही संपर्क करें :

–    मेरी बेटी को देररात तक अपने पसंदीदा सीरियल देखने की आदत है. उसे ऐसा करने से रोका न जाए. रविवार या छुट्टी के दिन उसे जीभर कर सोने दिया जाए और उसे डिस्टर्ब न किया जाए.

–    पति स्वयं सुबह की गरमागरम चाय बनाने के बाद ही उसे जगाए.

–    जब वह निवृत्त हो कर बाथरूम से डैसिंगरूम में जाए तो डायनिंग टेबल पर  नाश्ता सर्व करना शुरू कर दिया जाए.

–    नाश्ता करने के बाद औफिस जाते समय उसे लंचबौक्स तैयार मिलना चाहिए.

–    औफिस में बहुत काम होते हैं, इसलिए वापसी में देर होने पर पूछताछ न की जाए.

–    उस का वेतन उस का अपना है, उस पर किसी तरह का अधिकार न जमाया जाए. साथ ही, पति अपना पूरा वेतन उस के हाथ में ला कर देगा क्योंकि पति के वेतन पर पत्नी का ही अधिकार होता है, अन्य किसी का नहीं.

–    हमारी लाड़ली बेटी को खाना बनाना नहीं आता है, इसलिए वह खाना नहीं बनाएगी. उसे खाना बनाने की कला सिखाने के लिए भी बाध्य न किया जाए. वहीं, यह ध्यान रखें कि घर में खाना उसी की पसंद का बनाया जाए.

–    साफसफाई का घर में पूरा ध्यान रखा जाए क्योंकि उसे गंदगी से सख्त नफरत है.

–    उस का बाथरूम कोई अन्य इस्तेमाल न करे. यदि प्रयोग किया है तो उसे पूरी तरह वायपर से रगड़ कर और पोंछा लगा कर साफ किया जाए.

–    हमारी बेटी व्हाट्सऐप और फेसबुक की फैन है. फोन पर व्यस्त रहते समय उसे बिलकुल भी डिस्टर्ब न किया जाए. उस की स्किल के कारण ही सैकड़ों लोग फ्रैंडरिक्वैस्ट भेज रहे हैं और उस की मित्रता पाने को तरस रहे हैं.

–    भूल कर भी उस के मोबाइल फोन को कोई हाथ न लगाए वरना दुष्परिणाम भुगतने के लिए परिवार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा.

–    वह जो भी सूट या साड़ी पसंद करे उसे पति ही खरीद कर देगा. कोई नानुकुर सहन नहीं होगी.

–    जब भी कभी वह बच्चे को जन्म देगी तो बच्चे के लालनपालन की जिम्मेदारी बच्चे के पिता की ही होगी, मसलन नहलाना, डायपर्स बदलना, कपड़े पहनाना, दूध पिलाना, झूले पर झुलाना आदि. रात के समय बच्चे के रोने के कारण यदि उस की नींद डिस्टर्ब होगी तो इस के लिए सीधेसीधे बच्चे का पिता जिम्मेदार होगा और उसे ही कोपभाजन का शिकार होना पड़ेगा.

–    सास या ननद को उस की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा.

–    परिवार के किसी भी सदस्य को उस से जिरह करने और किसी तरह का ताना देने का हक नहीं होगा.

शेष शर्तें लड़का पसंद आने पर बता दी जाएंगी.

नोट : हम ने अपनी बेटी को राजकुमारी की तरह पाला है और साथ ही, आधुनिक संस्कार भी दिए हैं. हम दावा तो नहीं करते लेकिन वादा जरूर करते हैं कि यह जिस घर में भी जाएगी वह परिवार ऐसी संस्कारवान वधू पा कर धन्य हो जाएगा.

कोचिंग का गोरखधंधा

5 जून के समाचारपत्र बड़ेबड़े विज्ञापनों से भरे थे जिन में युवा चेहरे झांक रहे थे. ये विज्ञापन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स के थे जिन के छात्रों ने नीट की परीक्षा में अच्छे रैंक्स पाए हैं. जाहिर है इन विज्ञापनों का पैसा उसी फीस से आया जो इन छात्रों ने इन कोचिंग इंस्टिट्यूट्स को दी थी.

12 लाख से ज्यादा छात्रछात्राएं नीट की परीक्षा में शामिल हुए. उन्होंने निजी तौर पर लाखों नहीं, हजारों तो कोचिंग क्लासों पर खर्च किए ही होंगे. फिर उन्होंने हजारों रुपए एक्जामिनेशन सैंटर में जाने या वहां रहने पर खर्च किए होंगे. मातापिता ने उन पर जीभर कर पैसा लुटाया होगा ताकि वे 66 हजार सीटों में से कोई एक पा सकें और डाक्टरी की पढ़ाई शुरू कर सकें.

12वीं की परीक्षा के बाद मैडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए एक नीट की परीक्षा थोप दी गई है. इंजीनियरिंग में भी इसी तरह की एक अतिरिक्त परीक्षा है. कई जगह दाखिलों में इस तरह की प्रवेश परीक्षाएं हैं ताकि अलगअलग बोर्डों के मार्क्स का संतुलन बैठाया जा सके और सभी विद्यार्थियों को एक पैमाने पर तोला जा सके.

यह असल में, शिक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की साजिश है. इन परीक्षाओं के लिए कोई अतिरिक्त पढ़ाई नहीं होती. जो होती है वह कोचिंग इंस्टिट्यूट्स में होती है. प्रश्नपत्र इतने कठिन बनाए जा रहे हैं कि स्टूडैंट्स को कोचिंग क्लासों में जबरन जाना पड़े. 12वीं तक की कक्षाओं में जो सीखा, उस का इस तरह की परीक्षाओं से लेनादेना नहीं होता. योग्यता या मैरिट परखने के नाम पर कोचिंग उद्योग को पनपा दिया गया है और देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह कोचिंग सैंटर उग आए हैं. ये लौबी बना कर सरकार पर दबाव डालते हैं कि ऐसे टेढ़ेसीधे नियम बनें कि कोचिंग क्लासें जरूरी हो जाएं. ये कोचिंग संस्थान लाखों रुपए रिश्वत दे कर पेपर भी खरीदते हैं जो कई बार लीक होने पर हंगामा मचवा देता है.

अच्छी पढ़ाई आज इतनी महंगी कर दी गई है कि इस से मातापिता का पैसा और युवाओं के कीमती साल बरबाद हो रहे हैं. यह धंधा नहीं, गोरखधंधा है.

नवाज के सामने जोश भरने की चुनौती

नवाज शरीफ अगर लंदन में ही बैठकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की  सोच रहे हैं, तो इससे उन्हें कुछ खास हासिल होने वाला नहीं. इतिहास गवाह है कि संकट के दौर में मुखिया सामने न हो, तो न कार्यकर्ता जोश में आते हैं, और न पार्टी. सजा सुनाए जाने के तत्काल बाद लाहौर सहित देश के तमाम इलाकों में स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन जरूर हुए, लेकिन लाहौर जैसे गढ़ की स्थिति बता रही थी कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है.

दरअसल, ऐसे वक्त में नवाज को देश में होना चाहिए, भले ही वह जेल में रहें या बाहर. एक लोकप्रिय राजनेता होने के कारण कानून का पालन करते दिखना भी उनकी जिम्मेदारी है, भले ही इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े. उन्हें तो इस दर्द के लिए भी तैयार रहना होगा कि बेगम कुलसुम नवाज की बिगड़ी सेहत के बावजूद उन्हें छोड़कर आना पडे़, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के लिए भी उनका अदालत द्वारा तय समय सीमा में देश लौटना जरूरी है.

इस वक्ती हकीकत का उन्हें चाहे-अनचाहे हर सूरत में सामना करना ही होगा. पार्टी उम्मीदवार भी चुनाव अभियान के लिए उनका इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि उनके अलावा कोई और है भी नहीं, जो कुछ करिश्मा दिखा सके, हालांकि वे उनके सत्ता विरोधी स्वर में कुछ नरमी भी देखना चाहते हैं. वे इस वक्त अपनी उम्मीदवारी या चुनावी संभावनाओं को खतरा पैदा करने वाला कोई काम नहीं करना चाहेंगे.

इस वक्त कोई भी न्यायपालिका या सेना से टकराव के मूड में नहीं है. न ही कोई चुनाव टालने का बहाना देना चाहता है. सब जानते हैं कि नवाज के लिए 25 जुलाई के चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं और हस्तक्षेपकारी स्थिति के लिए पार्टी का चुनावों में बेहतर प्रदर्शन जरूरी है. यह नवाज के लिए आत्मपरीक्षण का भी वक्त है कि आखिर वह इस कीचड़ में फंसे कैसे?

उन्हें इस बात पर भी फिर से सोचने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट से अयोग्य ठहराए जाने के बाद उनके द्वारा अपनाई गई रणनीति कितनी उचित थी? सच तो यह है कि आज के हालात में उन्हें न सिर्फ तत्काल घर लौटना चाहिए, वरन अतीत को लेकर आत्मालोचन भी करना चाहिए.

‘सनी लियोनी ब्रांड है और करनजीत असलियत’

हाल ही में सनी लियोनी की बायोपिक ‘करनजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी औफ सनी लियोनी’ का ट्रेलर रिलीज किया गया था. ट्रेलर में एक साधारण सी लड़की करनजीत कौर से सनी लियोनी बनने के सफर को दिखाया गया है. ट्रेलर में कई ऐसी बातें हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं सुनी होगी. सनी लियोनी अपनी बायोपिक की रिलीज को करीब आते देख थोड़ी घबराई हुई हैं.

‘करनजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी औफ सनी लियोनी’ को लेकर हाल ही में सनी लियोनी ने मीडिया से बातचीत की. इस बातचीत में सनी ने कई और खुलासे भी किए. सनी का कहना है कि इस बायोपिक की शूटिंग करना आसान नहीं था क्योंकि हर दिन वह रोती थी. इस बायोपिक में सब करनजीत कौर वोहरा को देखेंगे. करनजीत मेरा असली नाम है. सनी तो केवल एक ब्रांड है जिसे मैंने खुद बनाया है. जिसे लोग किसी गाने, फिल्म या फोटोशूट में देखते हैं. यह केवल एक पर्सनैलिटी है.

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सनी ने आगे बताया, उन्होंने इस वेब सीरीज में सब कुछ ईमानदारी से दिखाया है. इसमें लोगों को मेरी जिंदगी का अच्छा, बुरा, बदसूरत हर पहलू देखने को मिलेगा. इसलिए मुझे डर लग रहा है कि न जाने लोग इसे देखकर किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे.

सनी के कहा- पिछली जिंदगी के पन्ने जब पलटते थे तो कई सारी बातें और गम हरे हो जाते थे जो उन्हें दुःख पहुंचाते थे जैसे कि उनके पेरेंट्स की मौत- सनी ने बताया कि कई सारी ऐसी बातें थीं जो वो बताना नहीं चाहती थीं और काफी सोच-विचारकर ही उन्होंने वो चीजें बताएं जो दुनिया के सामने जाने लायक हैं.

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बता दें कि सनी के अलावा इस बायोपिक में राज अर्जुन, रायसा सौजानी, करमवीर लांबा, बिजय जसजीत आनंद, गृषा कपूर, वंश प्रधान और मार्क बक्नर अहम रोल में हैं. इस वेब सीरीज के दो सीजन होंगे. हर सीजन में 10 एपिसोड दिखाए जाएंगे. पहले सीजन की शुरुआत 16 जुलाई से होने वाली है.

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