
बौलीवुड सितारे अक्सर सोशल मीडिया पर अपने नए फोटोशूट शेयर करते रहते हैं, जिसे देखने के बाद उनके फैन्स काफी खुश होते है. बात अगर कैटरीना की करें तो वो इंस्टाग्राम पर काफी एक्टिव हैं और फैन्स को अक्सर अपने नए-नए अवतार दिखाती रहती हैं. कुछ समय पहले ही कैटरीना कैफ ने अपने नए फोटोशूट के दौरान की एक फोटो को इंस्टाग्राम पर शेयर की है, जिसे देखने के बाद सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया है.
इस फोटोशूट को फोटोग्राफर तरुण विश्व ने क्लिक किया है. जिसे मलंग नाम देकर कैटरीना ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट की है. फोटो में कैटरीना बेहद खूबसूरत और आकर्षित लग रही है. कैटरीना और आमिर खान की फिल्म धूम 3 के मलंग गाने से मिलता जुलता पोज इस फोटोशूट में दिया है.
कैटरीना अपने फीटनेस को लेकर काफी एक्टिव रहती है. उनकी फिटनेस को आप इस फोटो के द्वारा आसानी से देख सकते है. कैटरीना जीम करते के समय की भी फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर करती रहती है.
कुछ समय पहले कैटरीना ने सलमान खान के साथ फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ में काम किया थी और अब ‘द-बैंग’ वर्ल्डटूर कर रही हैं. साथ ही कैटरीना, आमिर खान और अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘ठग्स औफ हिन्दुस्तान’ में मुख्य भूमिका निभाते हुए नजर आएगी. आमिर खान और अमिताभ बच्चन के साथ कैटरीना की यह दूसरी फिल्म है, और इसी के साथ शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘जीरो’ में भी काम कर रही है.
बता दें कि फिल्म ‘ठग्स औफ हिन्दुस्तान’ दिवाली के समय 17 नवंबर को रिलीज होगी. और शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ क्रिसमस के पहले 21 दिसबंर को रिलीज होने वाली है.
अभी हाल ही में कैटरीना कैफ ने आलिया तथा रणबीर कपूर के रिश्ते को लेकर टिपण्णी की थी, जिसमें उन्होंने कहा थी कि उन्हें पता है की आलिया तथा रणबीर का ब्रेकअप कैसे होगा. आपको बताते चले की एक वक्त आलिया और कैटरीन बेस्ट फ्रेंड हुआ करती थीं लेकिन आलिया की जिंदगी में रणबीर कपूर की एंट्री के बाद से ही दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता खत्म हो चुका है.
आजकल देशभर में दलितों पर हिंसा की खबरें सुर्खियों में हैं. आएदिन कहीं न कहीं दलित तबके के लोगों के साथ मारपीट, भेदभाव और हिंसा की वारदातें हो रही हैं.
हाल ही में गुजरात के राजकोट में कचरा बीन रहे एक नौजवान मुकेश सावजी वनिया को पीटपीट कर मार डाला गया. वह रादडिया इंडस्ट्री के पास अपनी पत्नी जया के साथ कचरा इकट्ठा कर रहा था. फैक्टरी के मुलाजिमों ने चोरी के शक में उसे बांध कर बुरी तरह से पीटा था.
घायल मुकेश को अस्पताल ले जाया गया जहां उस की मौत हो गई. मुकेश की पत्नी का आरोप है कि पिटाई करने वालों ने पहले उस की जाति पूछी और फिर मारने लगे थे.
इस से पहले गुजरात के ही गांधीनगर के लिंबोदरा गांव में मूंछ रखने के मामले में एक दलित नौजवान की पिटाई कर दी गई थी. कहा गया था कि उसे मूंछ रखने का हक नहीं है.
आणंद जिले के भादरणीया गांव में, जो गुजरात में ही है, गरबा देखने गए प्रकाश सोलंकी नाम के एक दलित नौजवान पर हमला कर दिया गया. उसे धमकाया गया कि हमारी बहनबेटियां यहां गरबा खेलती हैं, नीची जाति के लड़के यहां न आया करें.
पिटाई से प्रकाश की मौत हो गई. उस का भाईर् जयेश सोलंकी उसे बचाने आया तो उसे भी मारापीटा गया.
गुजरात के बनासकांठा जिले के अमीरगढ़ के कर्जा गांव में एक दलित नौजवान और उस के परिवार पर इसलिए हमला बोल दिया गया क्योंकि गांव के एक परिवार ने उस दलित नौजवान को मरा हुआ पशु उठाने को कहा था. नौजवान ने मना कर दिया तो कुछ लोगों ने मिल कर उन लोगों को पीटपीट कर जख्मी कर दिया.
भावनगर, गुजरात में एक नौजवान की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वह घोड़ा रखता था. उस से कहा गया कि घोड़ा रखने का हक दलित जाति के लोगों को नहीं है.
उत्तर प्रदेश में हाथरस में संजय कुमार नामक एक नौजवान ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा कि वह गांव निजामाबाद में बरात ले कर अपनी दुलहन को लाना चाहता था, पर ठाकुर बहुल गांव के लोगों का कहना था कि उन के इलाके से कभी दलितों की बरात आई ही नहीं है. दलितों की बरात दूसरे रास्तों से आती है इसलिए दलित संजय कुमार द्वारा यह मांग क्यों रखी गई?
ऊना, गुजरात में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे 4 दलित नौजवानों को तथाकथित गौरक्षक गुंडों ने कार से बांधा और कपड़े उतार कर उन की पीठ की चमड़ी उधेड़ दी थी.
मध्य प्रदेश में शाजापुर के काजा गांव में एक दलित नौजवान के अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने से नाराज गांव के कुछ लोगों ने उस पर लाठीडंडों से हमला कर दिया था.
हाल ही मध्य प्रदेश के धार में सिपाही भरती में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नौजवानों के सीने पर एससीएसटी लिख दिया था.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक दलित नौजवान सचिन वालिया की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. इस से पहले पिछले साल दलितों के घर तोड़ दिए गए थे और भीम आर्मी के चंद्रशेखर को जेल में बंद कर दिया गया था.
इसी साल महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा में दलितों के साथ ऊंची जातियों की भीड़ ने मारपिटाई की थी.
मार्च में सुप्रीम कोर्ट के आए एक फैसले के बाद देशभर में दलित संगठनों ने भारत बंद का ऐलान किया था. इस दौरान एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौतें हो गई थीं.
सुप्रीम कोर्ट ने एससीएसटी अत्याचार निवारण ऐक्ट के तहत फैसला देते हुए कहा था कि दलितों पर अत्याचार की शिकायत की जांच एसपी लैवल का अफसर करेगा और निचली अदालतें आरोपी को जमानत दे सकेंगी. अब तक शिकायत के बाद सीधे आरोपी की गिरफ्तारी की जाती थी और जमानत नहीं होती थी.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से दलितों को इस कानून का डर कम होने और दलितों के प्रति भेदभाव व जोरजुल्म के मामले बढ़ने का डर सताने लगा था.
मई, 2014 के बाद से दलितों पर हिंसा की वारदातों में बढ़ोतरी हुई है. भेदभाव और हिंसा की बीमारी हद पर पहुंच गई है. इन बढ़ती हुई घटनाओं को ले कर दलित नौजवान आंदोलित हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में ऐसे कुल 40,801 मामले दर्र्ज हुए. साल 2015 में 38,370, मामले दर्ज हुए थे. अकेले उत्तर प्रदेश में 10,420 मामले दर्ज किए गए थे.
आंकड़े बयान कर रहे हैं कि दलित जातियों के खिलाफ जिन प्रदेशों में सब से ज्यादा अपराध दर्ज हुए हैं उन में भाजपा और उस के सहयोगी दलों के शासन वाली सरकारें हैं. इस मामले में उत्तर प्रदेश एक नंबर पर है, फिर गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड, गोवा आते हैं.
आंकड़े बताते हैं कि दलितों को सताने के मामले में गुजरात देश में दूसरे नंबर पर है. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि साल 2008 से साल 2016 के बीच दलितों पर जुल्म की रफ्तार 23.6 फीसदी बढ़ी है.
एक सामाजिक स्टडी के मुताबिक, दलितों को सताने के रोजाना 125 मामले दर्र्ज होते हैं. गुजरात में 100 में से 95 मामलों में आरोपी छूट जाते हैं. कमोबेश यही हालात दूसरे प्रदेशों में भी हैं.
एक सामाजिक स्टडी में कहा गया है कि गांवों में दलितों को 48 तरह के बहिष्कारों का सामना करना पड़ता है. इन में सार्वजनिक जगह से पानी न भरने से ले कर मंदिरों में न जाने तक शामिल है.
आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला को भेदभाव की वजह से खुदकुशी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उस की स्कौलरशिप बंद करा दी गई थी और होस्टल खाली करने का हुक्म दे दिया गया था.
दिल्ली के जेएनयू में कन्हैया कुमार, गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और उत्तर प्रदेश में भीम सेना के दलित नेता चंद्रशेखर आजाद के साथ जैसा बरताव किया गया वह वर्णभेदी सोच को उजागर करता है.
दरअसल, हमारे समाज का तानाबाना वर्ण व्यवस्था पर चला आ रहा है. जाति को देख कर यहां इज्जतआदर का बरताव किया जाता है. दलितों को सब से नीचा समझा जाता है और ऊपरी जातियों द्वारा यह तबका सदियों से दुत्कारा जाता रहा है.
आजादी के बाद दलित तबके को संविधान में बराबरी का हक मिला तो धीरेधीरे वह पढ़नेलिखने लगा, सरकारी नौकरियों में जाने लगा. उस के पास थोड़ाबहुत पैसा भी आने लगा.
पिछले कुछ समय से दलितों की पढ़ाईलिखाईर् और माली हालत में काफी हद तक सुधार आया है. उन में लगातार जागरूकता आ रही है.
हर राजनीतिक दल दलित तबके को अपने साथ मिलाने की जुगत में दिखाईर् देता है. भाजपा की वर्णवादी सोच की वजह से यह तबका खुद को उस से दूर रखना चाहता है, इसी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा को दलित समुदाय के बीच अपना राजनीतिक दबदबा बनाने और बढ़ाने में मदद नहीं मिल पा रही है.
संघ की ब्राह्मणवादी सोच दलितों को अब भी दोयम दर्जे का ही मान रही है, इसलिए पढ़लिख गए दलित नौजवानों ने अब ऊंची जाति वालों को अपना माईबाप मानने से इनकार कर दिया है. अब वे अपनी दशा के लिए नियति, पापपुण्य या पिछले कर्मों को नहीं, लालची लोगों की चालाकियों को मानने लगे हैं और अपने साथ होने वाली ज्यादतियों की खिलाफत करने लगे हैं. यह अच्छा संकेत है.
रमेश मिडिल क्लास परिवार का था. उस की बेटी की शादी थी. उस ने शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. बड़ा शामियाना, तरहतरह के भोजन और भी कई तरह के तामझाम.
इतना सब करने के बावजूद वहां आने वाले मेहमानों ने कई कमियां निकाल दीं. जैसे शामियाने में इस्तेमाल किया गया रंगीन कपड़ा धुला हुआ नहीं था. उस पर मैल की परतें जमा थीं. खाने में इस्तेमाल की गई क्रौकरी भी ढंग से धुली हुई नहीं थी. यह देख कर बहुत से लोगों ने खाना खाने में नाकभौं सिकोड़ी. रमेश के किएकराए पर पानी फिर गया.
यह बात सच है कि जब भी हम कभी बतौर मेहमान किसी के घर जाते?हैं तो घर के भीतर घुसते ही वहां का माहौल बता देता?है कि वहां रहने वाले कितने साफसफाई पसंद हैं. कोई कैसे कपड़े पहनता है, उस के बिस्तर पर कैसी चादर बिछी?है और वह खाने के लिए किस तरह के बरतनों का इस्तेमाल करता है, यह सब भी इसी दायरे में आता है.
घर के बरतन और कपड़े व चादरों को साफसुथरा रखना कोई रौकेट साइंस नहीं है, बल्कि अब तो साइंस ने ऐसे सस्ते व बढि़या पाउडर, लिक्विड सोप वगैरह ईजाद कर दिए हैं कि आप को यह बहाना नहीं मिल सकता है कि घर और रसोई गंदी क्यों है.
आजकल ज्यादातर सभी घरों में स्टील के बरतन इस्तेमाल किए जाते?हैं, जो मजबूत होने के साथसाथ धोने में भी आसान रहते?हैं. इन पर कभीकभी सख्त दाग लग जाते हैं पर उन्हें हटाने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती.
मान लीजिए, स्टील के पतीले में सख्त दाग लगे हुए?हैं तो उसे कुछ घंटे के लिए साबुन के गरम पानी में भिगोएं, फिर पानी निकाल कर मांजने के पैड से रगड़ दें. ऐसी चीज न इस्तेमाल करें जिस से उस बरतन पर खरोंच लग जाए.
इसी तरह किसी बरतन पर जले के निशान हटाने के लिए बेकिंग सोडा डाल कर सूखे कपड़े से अच्छी तरह रगड़ें. बेकिंग सोडा का पेस्ट बना कर?भी गीले कपड़े या स्क्रब से साफ कर बरतन को चमकाया जा सकता है.
जिस इलाके में पानी अच्छी क्वालिटी का नहीं होता?है वहां पानी के दाग भी स्टील के बरतनों पर रह जाते हैं. इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए बरतन के चारों ओर थोड़ा सा क्लब सोडा डालें और साफ कपड़े से पोंछ कर सुखाएं.
चादर या दूसरे कपड़े धोते समय सफेद व रंगीन कपड़ों को अलगअलग कर लेना चाहिए ताकि रंगीन कपड़ों का रंग सफेद कपड़ों पर लगने का डर न रहे.
कपड़े धोने के लिए अच्छे डिटर्जैंट पाउडर या साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से उन की क्वालिटी बरकरार रहती?है. अब तो वाशिंग पाउडर या डिटर्जैंट में खुशबू भी डाली जाती है जिस से कपड़े उजले होने के साथसाथ महकते भी हैं.
कपड़े धोते समय लोगों में यह भरम भी रहता है कि ज्यादा वाशिंग पाउडर इस्तेमाल करने से उन के कपड़े ज्यादा साफ होते हैं, पर ऐसा नहीं है. साबुन या डिटर्जैंट का इस्तेमाल कपड़े के अनुपात में करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा मात्रा होने से कपड़े खराब होने का डर भी रहता है.
मैले कपड़ों पर कभीकभी ऐसे दाग भी लग जाते?हैं जो धोते समय परेशानी का सबब बन जाते?हैं. ऐसे में साबुन या डिटर्जैंट पर लिखे दिशानिर्देशों को ध्यान से पढ़ लेना चाहिए. सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ों के लिए उन्हीं के मुताबिक डिटर्जैंट वगैरह का इस्तेमाल करना चाहिए.
हाथ से या वाशिंग मशीन में कपड़े धोने के लिए भी आजकल अलगअलग तरह के डिटर्जैंट बाजार में हैं. लिक्विड डिटर्जैंट नया प्रोडक्ट है जो नाजुक कपड़ों में?ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. यह कपड़ों के साथसाथ धोने वाले के हाथों के लिए भी सुरक्षित रहता है.
सारा घर कीटाणुओं से बचाएं
घर की मालकिन के लिए अपने आशियाने की साफसफाई रखना सब से बड़ी चुनौती होती है. शीला की भी यह समस्या है. अपने घर को चमचमाता बनाए रखने के लिए उन्होंने कामवाली बाई भी रखी हुई है जो ईमानदारी से अपना काम करती है पर ऊपरी तौर पर क्योंकि शीला के घर में पनप रहे गंदे कीटाणुओं से कोई न कोई बीमार ही रहता है.

अब इन कीटाणुओं से कैसे निबटा जाए और ये घर के किस कोने में अपनी बस्ती बसा कर रहते हैं, यह जानना भी जरूरी?है.
आमतौर पर रसोईघर में इस्तेमाल की जाने वाली चीजों जैसे चाकू, तौलिया, सिंक, कूड़ेदान, दरवाजे के हैंडल, नल, बरतनों के स्टैंड वगैरह में कीटाणुओं के बसने का सब से?ज्यादा डर रहता है.
इस के अलावा जब घर के सदस्य बाहर से आते हैं, खासकर जब बच्चे खेलकूद कर गंदे हो कर घर में दाखिल होते हैं, तब वे भी कीटाणु रूपी अनचाहे मेहमान साथ ले आते?हैं. उन्हें तो नहलाधुला कर कीटाणुओं से?छुटकारा दिला दिया जाता?है, लेकिन घर में पल रहे बीमारी के वाहक कीटाणुओं की अनदेखी कर दी जाती है.
घर का फर्श, बाथरूम और?टौयलैट भी कीटाणुओं का बसेरा होते?हैं. तो इन का इलाज क्या?है? इलाज है और बहुत आसान है. कीटाणुओं से छुटकारा पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:
* गंदे कपड़ों को?ज्यादा लंबे समय तक यहांवहां न फैला रहने दें. रोजाना नहीं तो कम से कम एक दिन छोड़ कर उन्हें धो देना चाहिए. जो वाशिंग मशीन आप के कपड़े धोती?है, उसे भी समयसमय पर साफ करते रहना चाहिए. इस के लिए उस में थोड़ा ब्लीचिंग पाउडर डाल कर यों ही चलता छोड़ दें. इस से मशीन के कीटाणु मर जाएंगे.
* गंदे तौलिए को तो अच्छे से डिटर्जैंट से गरम पानी में?धोना चाहिए.
* बिस्तर की चादरें ज्यादा दिनों तक न बिछाएं रखें.
* बिस्तर पर बैठ कर खाने की आदत से बचें.
* फर्श पर पोंछा लगाते समय अच्छी क्वालिटी का फर्श क्लीनर या तेजाब वगैरह मिला दें.
* बाथरूम और टौयलैट को भी अच्छी तरह चमकाएं. इस के लिए बाजार से मिलने वाले खुशबूदार फर्श क्लीनर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इन्हें गीला न रखें क्योंकि नमी वाली जगह पर काई, फफूंदी के अलावा कीटाणु पनपने का खतरा बना रहता?है. अगर टाइलें लगी?हैं तो उन्हें भी क्लीनर से साफ करें.
* रसोई की सफाई करना न भूलें. जूठे बरतन ज्यादा देर तक न रहने दें.
* कूड़ेदान को गंदा न रहने दें. सिंक और नाली के आसपास कीटनाशक घोल का छिड़काव करें.
* बैडरूम और ड्राइंगरूम में भी तमाम तरह के बैक्टीरिया होते हैं. समयसमय पर सोफासैट, परदों, टैलीविजन के रिमोट वगैरह की अच्छी तरह से साफसफाई करनी चाहिए.
अर्जुन लाल मीणा ने दीवार घड़ी पर नजर डाली, सुबह के 5 बजे थे. मोबाइल की रिंगटोन सुन कर गहरी नींद से जागे अर्जुन लाल मीणा ने दीवार घड़ी की ओर देखने के बाद करवट बदल कर तकिए में मुंह गड़ा लिया. रविवार 22 अप्रैल को सार्वजनिक अवकाश की वजह से मीणा लंबी तान कर सोए हुए थे. नींद में खलल डालने वाली मोबाइल रिंगटोन के प्रति मीणा ने भले ही लापरवाही बरती, लेकिन जब रुकरुक कर बजने वाली रिंगटोन का सिलसिला थमता नजर नहीं आया तो उन का माथा ठनके बिना नहीं रहा.
तमाम अंदेशों से घिरे मीणा ने कौर्नर स्टैंड पर रखा मोबाइल उठा लिया. स्क्रीन पर उन के अधीनस्थ इंसपेक्टर रामजीलाल बैरवा का नंबर था. हैरानी और परेशानी में डूबते उतराते मीणा ने फोन कानों से सटा लिया, ‘‘हैलो.’’
दूसरी ओर की आवाज सुन कर उन का अलसाया चेहरा तन गया. हाथ से छूटते मोबाइल सैट को बमुश्किल थामते हुए उन के मुंह से अनायास निकल गया, ‘‘क्या कह रहे हो?’’ एकाएक उन की भौंहें सिकुड़ गईं. उन्होंने अटकते हुए कहा, ‘‘तुम होश में तो हो?’’
जवाब में मीणा ने दूसरी तरफ से जो कुछ सुना, वह उन के कानों में पिघला शीशा उडे़लने जैसा था. रामजीलाल कह रहे थे, ‘‘सर, आप के चैंबर के लौकर में रखे ढाई करोड़ के जेवर गायब हैं. वारदात बीती रात को हुई.’’
मीणा में कुछ और सुनने की ताकत नहीं बची थी. उन का चेहरा बर्फ की तरह सफेद हो चुका था. वह बोले, ‘‘मैं फौरन पहुंच रहा हूं.’’
अर्जुन लाल मीणा कोटा स्थित आयकर महकमे के डिप्टी डायरेक्टर (इनवैस्टीगेशन) पद पर थे. बीते 3 दिन के दौरान महकमे के खोजी दल ने कोटा के 3 सर्राफा व्यवसायियों के ठिकानों पर छापे डाल कर सर्वे की काररवाई की थी और 2 करोड़ 94 लाख रुपए के जेवर और 90 लाख की नकदी जब्त की थी.
शनिवार 21 अप्रैल को सरकारी छुट्टी होने के कारण नकदी तो बैंक में जमा करा दी गई थी, लेकिन जेवरात सरकारी खजाने में जमा नहीं कराए जा सके थे. ये जेवरात मीणा के चैंबर की अलमारी में ही रखे हुए थे.
मीणा लगभग 5 मिनट में ही सीएडी सर्किल स्थित आयकर भवन पहुंच गए. उन का चैंबर इमारत की दूसरी मंजिल पर था. उन के मातहत पहले ही वहां पहुंचे हुए थे. मीणा को फोन से खबर करने वाले इंसपेक्टर रामजीलाल बैरवा के अलावा चौकीदार बनवारीलाल, कर्मचारी नीरज कुमार, प्रवीण सिन्हा, राजेश भाटी और सिक्योरिटी गार्ड दुर्गेश मीणा ऊपरी तल के टूटे हुए मेन गेट पर ही खड़े थे.
इंसपेक्टर रामजीलाल ने चौकीदार बनवारीलाल सुमन की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे वारदात की खबर सुमन ने ही दी थी.’’

मीणा अपने चैंबर की तरफ बढ़े तो एंट्री डोर टूटा हुआ नजर आया. इस से पहले कि वे भीतर दाखिल होते, उन की नजर दूसरी मंजिल पर लगे सीसीटीवी कैमरों की तरफ गई, जो लगभग उखड़े हुए थे. कमरे में रखी गोदरेज की अलमारी का गेट खुला हुआ था और लौकर खाली था.
निस्संदेह अलमारी से चाबी बरामद करने के बाद लौकर को खोला गया था. उस में रखे जेवरात के दोनों डिब्बे गायब थे. अलमारी में रखी फाइलें फर्श पर बिखरी पड़ी थीं और उन के पास ही फैले हुए थे बीते दिनों किए गए सर्वे के दस्तावेज. सभी दस्तावेज फटे हुए थे.
मीणा अनुभवी अधिकारी थे, जेवरात के वही डिब्बे गायब थे, जिन्हें पिछले 3 दिनों में जब्त किया गया था. जबकि दूसरे लौकर में रखा बौक्स यथावत मौजूद था. इस बौक्स में 69 लाख के जेवरात सुरक्षित थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बिना घर के भेदी के यह वारदात हो ही नहीं सकती.
उन्होंने तत्काल मोबाइल पर जोधपुर स्थित मुख्यालय पर अपने उच्चाधिकारियों को वारदात की जानकारी दे दी तो उन्हें कहा गया कि फौरन पुलिस को इत्तला करें और अपने स्तर पर अधिकारियों को साथ ले कर पूरी छानबीन करें. मीणा ने एक पल चौकीदार बनवारीलाल सुमन की तरफ देखा तो वो बुरी तरह सकपका गया.
‘‘साब…साब…’’ कह कर उस ने हांफते हुए सफाई देने की कोशिश की, ‘‘मैं ने तो पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी पूरी की, लेकिन पता नहीं कैसे और कब चोरों को वारदात करने का मौका मिल गया.’’ एक पल रुकते हुए उस ने कहा, ‘‘मुझे तो सिक्योरिटी गार्ड दुर्गेश मीणा के बताने पर पता चला. इमारत के भीतर की जिम्मेदारी तो सिक्योरिटी गार्ड की ही है.’’
मीणा ने असहाय भाव से सुमन की तरफ देखा. फिर निरीक्षक बैरवा को जरूरी निर्देश दे कर मोबाइल पर आईजी विशाल बंसल से संपर्क किया.
पिछले कुछ दिनों से कोटा में आपराधिक वारदातों का ग्राफ बढ़ने से पुलिस की मुस्तैदी में तेजी आई तो आईजी विशाल बंसल ने भी अपना रूटीन बदल दिया था. वह सुबह को जल्दी औफिस में बैठने लगे थे.
रविवार 22 अप्रैल छुट्टी का दिन था तो भी उन की दिनचर्या में कोई खास फर्क नहीं आया था. जब आयकर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर अर्जुनलाल मीणा ने उन्हें फोन किया, उस समय बंसल औफिस में ही मौजूद थे.
मीणा ने अपना परिचय देने के साथ सारा माजरा बताया तो बंसल हैरान रह गए. उन्होंने पलट कर सवाल किया, ‘‘कब हुई वारदात? और आप कहां से बोल रहे हैं?’’
मीणा ने घटना का संक्षिप्त सा ब्यौरा देते हुए कहा, ‘‘सर, संभावना है कि वारदात रात को एक और 3 बजे के बीच हुई होगी. सर्वे की काररवाई के कुछ दस्तावेजी काम निपटा कर हम रात करीब 12 बजे फारिग हुए थे. दिन भर की थकान के बाद रात को करीब एक बजे मैं घर जा कर सो गया था. अगले दिन रविवार के अवकाश की वजह से मैं निश्चिंत हो कर सो गया था.’’
एक पल रुकने के बाद मीणा ने कहना शुरू किया, ‘‘मुझे मेरे अधीनस्थ इंसपेक्टर बनवारी लाल बैरवा ने तड़के 5 बजे फोन कर के वारदात की इत्तला दी. उन्हें भी वारदात की बाबत चौकीदार के बताने पर पता चला. उस के बाद से ही मैं औफिस में हूं.’’
‘‘लेकिन मीणा साहब, इस वक्त तो सवा 6 बजने वाले हैं,’’ बंसल ने उलाहना देते हुए कहा, ‘‘आप वारदात की खबर सवा घंटे बाद दे रहे हैं.’’
थोड़ा हिचकते हुए मीणा ने सफाई देने की कोशिश की, ‘‘सर, मुझे इस के लिए हायर अथौरिटीज की इजाजत और निर्देश लेने थे. मुझे अपने स्तर पर भी छानबीन करनी थी कि आखिर क्या कुछ हुआ था और कैसे हुआ था?’’
बंसल की पेशानी पर मीणा की इस लेटलतीफी पर सलवटें पड़े बिना नहीं रहीं. लेकिन उन्होंने मौके की नजाकत को तवज्जो देना ज्यादा जरूरी समझा. अगले ही पल उन्होंने एडीशनल एसपी समीर कुमार को तलब कर पुलिस टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए निर्देश दिए. आईजी विशाल बंसल के सक्रिय होते ही कोटा पुलिस हरकत में आ गई.
वारदात का क्षेत्र जवाहर नगर था, इसलिए थानाप्रभारी नीरज गुप्ता जब अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे उस वक्त सुबह के 7 बज कर 20 मिनट हो चुके थे. नीरज गुप्ता ने घटनास्थल का जायजा लेना शुरू किया. तब तक फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और डौग स्क्वायड टीम भी वहां पहुंच चुकी थी.
कोटा में जहां आयकर औफिस की इमारत है, उसे सीएडी रोड कहा जाता है. दरअसल, नए कोटा की सरहद यहीं से शुरू होती है. इस मार्ग पर कमांड एरिया डवलपमेंट का परियोजना भवन होने के कारण इस का नाम सीएडी रोड पड़ गया है. आयकर भवन की इमारत इसी लाइन में तीसरी है. इस से पहले कोटा नगर विकास न्यास का कार्यालय भवन है.

आयकर भवन के पिछवाड़े निचली बस्ती है, जिसे दुर्गा बस्ती के नाम से जाना जाता है. आयकर कार्यालय पुलिस कंट्रोल रूम और अभय कमांड सेंटर से महज चंद कदमों की दूरी पर है. आयकर भवन वाली कतार में चंद कदमों के फासले पर ही अभय कमांड सेंटर आमनेसामने हैं.
आयकर महकमे की टोली ने डिप्टी डायरेक्टर (इनवैस्टीगेशन) अर्जुनलाल मीणा के निर्देशन में पिछले 3 दिनों में क्रमश: 18, 19 और 20 अप्रैल को सर्राफा व्यवसाइयों के 3 ठिकानों पर सर्वे के दौरान रेड डाल कर 2 करोड़ 94 लाख के जेवरात और 90 लाख की नकदी जब्त की थी.
शीर्ष अधिकारियों के निर्देशानुसार पुलिस के पहुंचने तक अर्जुनलाल मीणा ने अपने सहयोगियों के साथ घटनास्थल की छानबीन करनी शुरू की. उन्होंने आयकर भवन के दूसरे तल के समूचे ब्लौक की जांच की. इस ब्लौक में 14 कमरे थे, लेकिन वारदात उसी कमरे में हुई, जिस में मीणा बैठते थे.
मीणा ने एक बार पीछे लौट कर दूसरे तल में दाखिल होने वाले गेट का मुआयना किया. उन्होंने ध्यान से देखा. जिस तरह दरवाजे की कुंडी टूटी नजर आई, उस से उन के लिए समझना मुश्किल नहीं था कि कुंडी को तोड़ने के लिए किसी नुकीले औजार का इस्तेमाल किया गया था.
इस के बाद ही चोर ब्लौक में दाखिल हुए थे. मीणा को अचानक कुछ याद आया तो वह अपने चैंबर में दाखिल हो कर नए सिरे से अलमारी की जांच करने लगे. उन्होंने अलमारी को ध्यान से देखा तो पता चला कि अलमारी को चाबी से खोला गया था.
उन की समझ में नहीं आ रहा था कि जब अलमारी चाबी से खुल गई थी तो उसे डैमेज क्यों किया गया? काफी सोचविचार के बावजूद मीणा समझ नहीं पाए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
ब्लौक में टूट कर लटके हुए सीसीटीवी कैमरों को देख कर निराश हो चुके मीणा ने बेनतीजा कोशिश के बावजूद एक बार उन की फुटेज पर सरसरी निगाह डाल लेना जरूरी समझा. अपनी टीम के साथ जैसे ही मीणा ने सीसीटीवी फुटेज खंगालने शुरू किए. उन की आंखें चमकने लगीं. उस में नकाब पहने 3 बदमाश नजर आए. अब तक लगभग निढाल से मीणा एकाएक जोश में आ गए.
उन्होंने अपने सहयोगियों को झिंझोड़ दिया, ‘‘देखो, यह शख्स क्या तुम्हें हमारे संविदा कर्मचारी रविंद्र सिंह की तरह नहीं लगता?’’ मीणा ने उस शख्स की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘जरा इस की चालढाल पर गौर करो, मुझे तो यह रविंद्र ही लग रहा है?’’
सहयोगियों के सिर सहमति में हिले, इस से पहले मीणा ने अपनी बात की तस्दीक में सवाल उछाला, ‘‘सर्वे में जब्त किए गए जेवरातों के बारे में जिन 5-7 लोगों को पता था, उस में रविंद्र सिंह भी एक था?’’
‘‘सर, चोर तो घर का भेदी निकला.’’ इंसपेक्टर बनवारीलाल ने मीणा के तर्क पर सहमति जताते हुए हैरानी जताई, ‘‘लेकिन अब क्या किया जाए?’’
मीणा का चेहरा खुशी से दमक रहा था. उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण सबूत हासिल कर लिया था. लेकिन जटिल प्रश्न यह था कि अब क्या किया जाए.
‘‘ऐसा करो…’’ एकाएक जैसे मीणा को उपाय सूझ गया. उन्होंने बैरवा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘रविंद्र समेत स्टाफ के सभी लोगों को फोन कर के यहां आने को कहो?’’
‘‘लेकिन सर,’’ झिझकते हुए बैरवा की बात काटते हुए मीणा ने समझाया, ‘‘सब को सिर्फ इतना कहना कि साब को अर्जेंट काम से अभी जोधपुर जाना है, इसलिए फौरन औफिस पहुंचो.’’
अब मीणा को बेताबी से इंतजार था, तो कारस्तानी करने वाले का और पुलिस का भी. अब उन के लिए जयपुर स्थित प्रादेशिक मुख्यालय को भी इत्तला देनी जरूरी थी. वे तुरंत इस काम में जुट गए.
रविवार 22 अप्रैल की सुबह 10 बजे तक आईजी विशाल बंसल समेत उच्च अधिकारी भी मौके पर पहुंच चुके थे. एडीशनल एसपी समीर कुमार पहले ही अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे हुए थे.
आईजी बंसल की अनुमति से उन्होंने डीएसपी बने सिंह, राजेश मेश्राम, सर्किल इंसपेक्टर नीरज गुप्ता, लोकेंद्र पालीवाल आदि को अपनी टीम में शामिल किया था.
अर्जुनलाल मीणा ने अपनी अब तक की पड़ताल और शकशुबहा को ले कर रविंद्र सिंह की बाबत बताया, ‘‘मुझे इस आदमी पर संदेह हो रहा है. यह हमारे यहां संविदा पर तैनात कंप्यूटर औपरेटर है.’’
पुलिस अधिकारियों ने सीसीटीवी कैमरे खंगाले तो मीणा की शंका की तस्दीक होती नजर आई. मीणा के शक पर मुहर लगाई सीसीटीवी कैमरे के उस दृश्य ने जिस में पिछले शनिवार 21 अप्रैल की रात के 8 बजे रविंद्र दफ्तर में पहुंचा तो जरूर, लेकिन भीतर दाखिल होने के बजाए ताकझांक कर के वापस लौट गया.
समीर कुमार ने जब मीणा से पूछा कि क्या इसे आप ने बुलाया था, मीणा के इनकार पर समीर कुमार ने उन पर पैनी निगाहें गड़ाते हुए कहा, ‘‘मीणा साहब, मैं दावे से कह सकता हूं कि यही हमारा शिकार है, कल यह रैकी करने आया था, और आप लोगों की मौजूदगी देख कर उलटे पांव वापस लौट गया. आखिर बिना बुलाए रात 8 बजे औफिस आने का क्या मतलब?’’
समीर कुमार सारा माजरा समझ चुके थे. उन्होंने रविंद्र सिंह की तसवीर की तरफ इशारा करते हुए सर्किल इंसपेक्टर नीरज गुप्ता से कहा, ‘‘इसे उठा कर लाओ, यही है मुलजिम?’’ नीरज गुप्ता ने एक पल की भी देर नहीं लगाई.
समीर गुप्ता ने मीणा के आगे सवालों की झड़ी लगाते हुए पूछा, ‘‘आप के यहां कितने संविदा कर्मचारी हैं? और क्या उन का पुलिस वेरिफिकेशन हो चुका है.’’
मीणा ने बताया कि औफिस में रविंद्र सिंह ही एकलौता संविदा कर्मचारी था और पिछले 2 सालों से कंप्यूटर औपरेटर का काम कर रहा था. उन्होंने यह भी बताया सुकेत का रहने वाला रविंद्र सिंह दुर्गा बस्ती में रहता है.
‘‘मीणा साहब.’’ समीर कुमार ने उन की तरफ गहरी नजर से देखते हुए कहा, ‘‘सीसीटीवी कैमरे खंगालते समय आप ने एक बात नोट नहीं की, वरना उसी वक्त समझ जाते कि करतूत तो घर के भेदी की ही है.’’
‘‘जी, मैं समझा नहीं?’’ अर्जुन लाल मीणा ने हैरानी जताते हुए कहा.
समीर मुसकराते हुए बोले, ‘‘फुटेज में बदमाश सीधा आप के कमरे में ही पहुंच रहा था, जाहिर है, उसे पता था कि उस का टारगेट क्या है? वारदात करने वाला यहीं का आदमी था, तभी तो उसे मालूम था कि उसे कहां पहुंचना है. फाइलें फाड़ने का काम तो उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए किया?’’
लगभग एक घंटे बाद ही रविंद्र सिंह एडीशनल एसपी के सामने खड़ा था. एडीशनल एसपी समीर कुमार कुछ क्षण अपने सामने खड़े रविंद्र सिंह को पैनी निगाह से देखते रहे. समीर कुमार उस के बदन पर टीशर्ट और पैरों के जूतों पर सरसरी निगाह दौड़ाते हुए चौंके. लेकिन संयम बरतते हुए उन्होंने उस के कंधों पर हाथ रखा, ‘‘देखो, जो कुछ हुआ सो हुआ, लेकिन सच बोलने से तुम्हारी सजा कम हो सकती है.’’
रविंद्र लगभग 23-24 वर्षीय युवक था. उस ने हाथ झटकते हुए कहा, ‘‘साब, मैं ने कुछ किया हो तो बताऊं? मैं तो पिछले 2 सालों से यहां कंप्यूटर औपरेटर हूं. मैं अपनी नौकरी खतरे में क्यों डालूंगा?’’
‘‘हां, तुम्हारी बात तो ठीक है. कोई अपनी नौकरी कैसे खतरे में डाल सकता है. चलो, तुम इतना तो बता सकते हो कि कल शाम को 8 बजे तुम दफ्तर क्यों आए थे? और आए थे तो बिना किसी से मिले बाहर से ही क्यों लौट गए?’’
‘‘साब, जिस दफ्तर में नौकरी करता हूं, वहां आना कोई गुनाह तो नहीं. मुझे तो यहां अपनी स्कूटी खड़ी करनी थी. ऐसे में किसी से मिलने ना मिलने का कोई औचित्य नहीं था.’’
समीर कुमार ने तुरंत कहा, ‘‘बिलकुल ठीक कहते हो तुम, खैर यह बताओ कि कल रात को तुम कहां थे?’’
‘‘साब, कल रात को मैं कहां था, इस से क्या फर्क पड़ता है? अपने यारदोस्तों के साथ था और कहां था?’’
‘‘यारदोस्त कौन थे और क्या कर रहे थे? यह सब बताए बिना तुम्हारा पीछा छूटने वाला नहीं है?’’ एडीशनल एसपी ने डपटते हुए कहा.
अब तक हौसला दिखाने की कोशिश कर रहे रविंद्र की पेशानी पर पसीना छलक आया था. थोड़ा अटकते हुए उस ने कहा, ‘‘साब, विकास के घर पर हम 3-4 दोस्त उस की बर्थडे पार्टी मना रहे थे.’’
‘‘लगे हाथ उन दोस्तों के नाम और ठौरठिकाने भी बता दो?’’
‘‘लेकिन साब, मेरे दोस्तों से क्या मतलब?’’ अब रविंद्र पर घबराहट तारी होने लगी. वह एडीशनल एसपी की घूरती निगाहों का ज्यादा देर सामना नहीं कर पाया और जल्दी ही बोल पड़ा, ‘‘विकास नर्सिंग का कोर्स कर रहा है और मेरे गांव का ही रहने वाला है. कोटा में महावीर नगर विस्तार योजना में रहता है.’’
‘‘और…और…’’ समीर कुमार की आवाज में सख्ती का पुट था. ‘‘और कौन था?’’
‘‘और आशीष था, वह फ्लिपकार्ट कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी करता है, वो भी सुकेत का ही रहने वाला है. मेरा हमउम्र ही है.’’ उस ने हड़बड़ाते हुए बात पूरी की, ‘‘2-3 लड़के और थे, उन्हें मैं नहीं जानता… वे आशीष और विकास के मिलने वाले थे. उन्हें ही पता होगा?’’
‘‘रविंद्र, तुम शायद अपनी मुक्ति नहीं चाहते. लेकिन याद रखो पुलिस तो गूंगे को भी बुलवा लेती है. खैर, तुम्हारी मरजी?’’ समीर कुमार ने रविंद्र सिंह को काफी कुरेदा, पर वह इस बात से बराबर इनकार करता रहा कि उस का इस वारदात में कोई हाथ है.
अचानक समीर कुमार के दिमाग में युक्ति आई उन्होंने रविंद्र से कहा, ‘‘ठीक है, तुम आराम से बैठो और ठीक से सोच लो. आधे घंटे बाद तुम से फिर पूछताछ होगी.’’

रविंद्र के जातेजाते समीर कुमार ने पूछा, ‘‘तुम कौन से शूज पहनते हो?’’
रविंद्र इत्मीनान से बोला, ‘‘स्पोर्ट्स शूज साब, लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं?’’
‘‘तुम्हारी पसंद पूछ रहा हूं?’’ रविंद्र का जवाब सुनते ही एडीशनल एसपी के चेहरे पर मुस्कराहट दौड़ गई.
अब तक दोपहर के 2 बज चुके थे. रविंद्र को सिपाहियों के हवाले करते ही एडीशनल एसपी समीर कुमार ने सर्किल इंसपेक्टर लोकेंद्र पालीवाल की तरफ मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘रविंद्र के जूतों के निशान ले कर बस्ती की दीवार के पीछे बने जूतों के निशान से उन का मिलान करो?’’
रविंद्र जिस तरह भटकाने की कोशिश कर रहा था, समीर कुमार का गुस्सा खौलने लगा था. लेकिन संयम बरतते हुए वह सीओ राजेश मेश्राम और बने सिंह की तरफ मुखातिब हुए, ‘‘विकास और आशीष बोलेंगे तो यह भी बोलने लगेगा. क्रौस इंटेरोगेशन में तीनों बोलेंगे.’’
इस बीच सर्किल इंसपेक्टर मुनींद्र सिंह, महावीर यादव, आनंद यादव, घनश्याम मीणा और रामकिशन की अगुवाई में अलगअलग हिस्सों में तहकीकात के लिए बंटी पुलिस टीमों ने आयकर महकमे की सर्च टीम में पहले शामिल रहे अधिकारियों, कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मचारियों तथा इमारत के आसपास रहने वालों से भी पूछताछ कर ली.
पुलिस ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए चालानशुदा अपराधियों को भी टटोला, 50 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों को भी खंगाला गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इस बीच पुलिस रविंद्र के दोस्तों विकास और आशीष को उठा लाई थी.
जूतों के निशान के मामले में एडीशनल एसपी समीर कुमार का अंदेशा सही निकला, सर्किल इंसपेक्टर पालीवाल ने लौट कर जो बताया उसे सुन कर समीर कुमार की बांछें खिल गईं. दुर्गा बस्ती की दीवार के पीछे की नमी वाली जमीन पर बने स्पोर्ट्स शूज के निशान रविंद्र के जूतों से मिल रहे थे.
पूछताछ में रविंद्र ने शनिवार की रात अपनी मौजूदगी बर्थडे पार्टी में बताई थी, लेकिन पुलिस ने जब उस के घर वालों से उस के कथन की तसदीक की तो उन का कहना था कि वह घर से खाना खा कर गया था.
एडीशनल एसपी ने जब उसे उस के घर वालों के कथन का हवाला दे कर दोबारा बर्थडे पार्टी पर सवाल किया तो वह हड़बड़ा गया. उस के चेहरे का रंग उड़ गया और टांगें कांपने लगीं. वह समझ गया था कि उस के शूज का नाप क्यों लिया गया था और उस से शूज के ब्रांड के बारे में क्यों पूछा गया था.
इस बार रविंद्र एडीशनल एसपी समीर कुमार की आंखों में झलकते क्रोध को सहने की हिम्मत नहीं जुटा सका और नजरें चुराने लगा.
रविंद्र फिर भी खामोश रहा तो समीर कुमार ने उस के चेहरे पर नजरें जमाते हुए कहा, ‘‘अभी वक्त है, तुम चाहो तो सच्चाई उगल सकते हो, तुम चालू दोस्तों के बहकावे में आ गए? हम तुम्हें बचाने की पूरी कोशिश करेंगे.’’
आखिर रविंद्र टूट गया. उस ने जो कुछ बताया वो मौजमस्ती और हालात से निजात पाने की गुनहगार कोशिश थी…’’
गुनाह में पिरोई गई सारी योजना रविंद्र सिंह ने तैयार की थी, लेकन इस के पीछे थे उन के अपने छोटेमोटे स्वार्थ. रविंद्र सिंह आयकर महकमे में ठेकेदार के जरिए 2 साल के लिए लगा हुआ संविदाकर्मी था.
यह अवधि पूरी होने जा रही थी और ठेकेदार अब अपना कोई नया आदमी लगने का मंसूबा पाले हुए था. नौकरी जाने के डर से रविंद्र वारदात कर के बड़ी रकम जुटाने की कोशिश में था.
विकास और आशीष भी उसी के गांव सुकेत के रहने वाले थे, तीनों में गहरा दोस्ताना था. विकास नर्सिंग कोर्स की पढ़ाई कर रहा था. लेकिन 2 वजह से उसे बड़ी रकम की जरूरत थी. उस की एक जरूरत तो कालेज की फीस भरने की थी और दूसरे गर्लफ्रैंड के तकाजे उस पर ज्यादा भारी पड़ रहे थे.
प्यार और फीस में उलझा विकास हालात से उबरने के लिए रविंद्र की योजना में शामिल हो गया. आशीष उर्फ आशु हालांकि फ्लिपकार्ट कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी करता था, लेकिन महंगे शौक मामूली नौकरी से पूरे नहीं हो पा रहे थे. इसलिए वारदात में शामिल हुआ. पुलिस ने विकास और आशीष से क्रौस इंट्रोगेशन की तो दोनों टूट गए. उस के बाद तो वारदात की कडि़यां जुड़ती चली गईं.
एसपी (सिटी) अंशुमान भोमिया के सामने एडीशनल एसपी समीर कुमार द्वारा की गई पूछताछ में रविंद्र कुमार ने बताया कि एक दिन पहले भी उन्होंने वारदात करने की योजना बनाई थी. लेकिन गार्ड दुर्गेश के चौकन्ना रहने के कारण अंजाम नहीं दे सके. सीसीटीवी कैमरों की जानकारी लेने के लिए उस ने शनिवार की दोपहर को कार्यालय के चारों तरफ चक्कर लगाया.
इमारत के पीछे सब से कम कैमरे थे, इसलिए दुर्गा बस्ती के पीछे से दीवार लांघ कर वे आयकर महकमे की बिल्डिंग में घुसे थे. रविंद्र ने बताया कि ऐहतियात बरतने के लिए वे नकाब पहन कर औफिस में दाखिल हुए थे.
ज्वैलर के यहां से जब्त की गई फाइलें फाड़ने की वजह क्या थी, पूछने पर रविंद्र का कहना था, ‘‘हम पुलिस को भटकाना चाहते थे ताकि शक सर्राफा फर्मों की तरफ जाए.’’
तीनों को इस बात पर हैरानी थी कि जब उन्होंने कैमरों की जद में आने से बचने के लिए दूसरे तल पर लगे सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया था तो सीसीटीवी की फुटेज में उन की तसवीर कैसे आ गई? असल में वापस लौटते समय उन्होंने ऐहतियात नहीं बरती और कैमरों में कैद हो गए. पुलिस ने 12 घंटों में ही वारदात का खुलासा करते हुए चोरों को गिरफ्तार कर के सारा सोना बरामद कर लिया.
वारदात के बाद सोना तीनों ने आपस में बांट लिया था. पुलिस ने विकास के घर की पानी की टंकी में से सोना बरामद किया. जबकि रविंद्र ने अपने दुर्गा बस्ती स्थित घर में सोना छिपा कर रखा था, पुलिस ने उसे भी जब्त कर लिया. आशीष से उस के वीर सावरकर नगर स्थित घर से जेवर बरामद किए गए. कथा लिखे जाने तक आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में थे.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
बौलीवुड के बादशाह शाहरुख खान इन दिनों अपनी फैमली के साथ इटली में छुट्टियां मना रहे हैं. कभी शाहरुख तो कभी उनकी पत्नी गौरी खान सोशल मीडिया पर अपने वेकेशंस की फोटो शेयर कर रही हैं. इन फोटो में यह फैमली काफी मस्ती करती दिख रही है. हाल ही में गौरी खान ने एक फोटो शेयर की जिसमें उनकी बेटी सुहाना खान, छोटा बेटा अबराम अपने कजिन आलिया और अर्जुन छिब्बा (गौरी खान के भाई विक्रांत छिब्बा के बच्चे) के साथ नजर आ रही हैं. लेकिन इस मजेदार फैमली वेकेशन के बीच लोगों ने एक बार फिर शाहरुख की बेटी सुहाना खान को ट्रोल कर दिया है.
दरअसल सुहाना के एक फैन पेज ने एक नया फोटो शेयर किया है, जिसमें सुहाना, अबराम, आलिया और अर्जुन नजर आ रहे हैं. इस फोटो में सुहाना ब्राउन बिकिनी में नजर आ रही हैं. इंटरनेट पर सुहाना का यह स्टालिश लुक जहां कई फैन्स द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है, तो वहीं कई यूजर्स सुहाना को फिर से बिकिनी के लिए ट्रोल कर रहे हैं. कुछ लोगों ने सुहाना को इस तरह के कपड़े पहनने पर नसीहत दी है.
एक यूजर ने कमेंट बौक्स में लिखा, तुम ये मत भूलो की तुम मुस्लिम हो. वहीं एक अन्य इंस्टा हैंडल ने लिखा, अगली. वहीं एक फैन ने लिखा, हम तुम पर शर्मिंदा हैं सुहाना, जो करना है करो लेकिन इंडियन कल्चर के हिसाब से ही अपनी तस्वीर को पोस्ट किया करो. ये सब प्राइवेट रखो. इतना सम्मान करता हूं आपके पापा का, लेकिन मैं आपका सम्मान नहीं करता. कई यूजर्स ने सुहाना के बचाव में लिखा है, ‘अगर आप स्विमिंग के लिए जाते हैं तो क्या सलवार कमीज में जाते हैं?’
हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब सुहाना खान सोशल मीडिया पर ट्रोर्ल्स के निशाने पर आई हैं. इसके पहले मार्च में मम्मी गौरी खान ने इंस्टाग्राम अकाउंट से सुहाना और अपनी मां की एक तस्वीर को साझा किया था जिसमें सुहाना शॉर्ट ड्रेस में नजर आ रही थीं. जिसके बाद ट्रोर्ल्स ने तस्वीर में सेमफुल और भद्दे-भद्दे कमेंट्स लिखे थे.
बता दें कि शाहरुख खान की बेटी सुहाना को भी एक्टिंग का काफी शौक है और वह बौलीवुड में अपना करियर बनाना चाहती हैं. शाहरुख खान ने अपने एक इंटरव्यू में यह बात कही थी कि उनकी बेटी एक्टिंग में करियर बनाना चाहती हैं लेकिन मैं चाहता हूं कि वह इसके लिए पूरी तरह तैयार होकर ही इस फील्ड में उतरे.
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जिन्होंने जिंदगी का अधिकांश हिस्सा कांग्रेस के साथ गुजारा है, अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गोद में जा बैठने की तैयारी करते लगते हैं. उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के निमंत्रण पर नागपुर जा कर स्वयंसेवकों को पाठ पढ़ाया. यह पाठ कांग्रेसी नहीं था. गनीमत यह रही कि उन्होंने न निकर पहनी, न ही काली टोपी लगाई. यह बात दूसरी है कि उन की इस तरह की फोटो संघभक्तों ने जारी कर दी. प्रणब मुखर्जी की बेटी ने पिता को इस तरह की चेतावनी पहले ही दे दी थी.
निकर पहनने के अलावा प्रणब मुखर्जी ने वह सबकुछ कर डाला जो नरेंद्र मोदी या लालकृष्ण आडवाणी नागपुर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय में करते हैं. संघ संस्थापक केशव बालीराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि दे डाली, संघ की सभा में खड़े हो कर ओमवादन कर डाला, मोहन भागवत का भाषण सुन डाला, स्वयंसेवकों की परेड देखी.
प्रणब मुखर्जी ब्राह्मण होने के नाते अगर यह कर रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं है. हमारे देश का लगभग हर सवर्ण इस बात से सहमत है कि वर्णव्यवस्था उचित है, मुसलिमों का तुष्टीकरण नहीं होना चाहिए, भारत विश्वगुरु है, भारत के साथ भेदभाव हुआ है वरना वह अमेरिका की भांति अमीर और समृद्ध होता, हमारा ज्ञानविज्ञान सदियों पुराना है, हमारे देवीदेवता नैतिकता, सहृदयता, समभाव के प्रवर्तक रहे हैं, हमारा प्राचीन स्वर्णिम रहा है और आज यदि हम ग्रंथों को आंख मूंद कर मानें तो अवश्य फिर से विश्व के अग्रणी देश बन जाएंगे.
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारत में राष्ट्र, राष्ट्रीयता व देशभक्ति का भाव यूरोप से सदियों पुराना है और उसे ही वसुधैव कुटुंबकम कहते हैं. वे यह भूल गए, जैसे सारे हिंदुत्ववादी भूल जाते हैं कि रामायण और महाभारतकाल से पहले भी दस्युओं को अलग, नीचा और संहार के योग्य माना जाता रहा है. आज उन दस्युओं की संतानें कौन हैं, पता नहीं, पर देवताओं की संतानों का हक जमाने वाला समाज का एक हिस्सा अपना पुश्तैनी अधिकार समझता है और रखता है.
संघ के कार्यक्रम में बहुवाद और विभिन्नताओं को स्वीकार करने की कोई जगह नहीं है और प्रणब मुखर्जी इस का उपदेश दे कर अगर यह समझें कि उन्होंने स्वयंसेवकों का विचारपरिवर्तन कर दिया, तो यह नितांत गलतफहमी है.
सहिष्णुता हमारी संस्कृति का हिस्सा है, यह कहना भी निरर्थक है क्योंकि हमारी संस्कृति ऊंचनीच को थोपने वाली वर्णव्यवस्था पर टिकी है जिस में हम किसी निम्नवर्ग वाले को अगर ऊंचे स्थान पर बैठाते हैं तो केवल स्वार्थवश या जब उस से हार जाते हैं.
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि हमारे देश में किसी पर कोई मत लादने की कोशिश की गई तो वह निरर्थक होगी. यह थोथी बात है जो मोहन भागवत को कतई मंजूर नहीं है. वे देश में पौराणिक राज ही चाहते हैं और जो उस के अंतर्गत नहीं आते या उसे नहीं मानते वे संघ की नजर में दूसरे दर्जे के नागरिक हैं या धर्मद्रोही हैं.
प्रणब मुखर्जी ने संघ के कार्यक्रम में क्यों हिस्सा लिया, यह रहस्य रहेगा.
राजनीतिक दलों को मिलने वाला विदेशी चंदा एक बार फिर विवाद में आ गया है. मामला 2016 में बने विदेशी चंदा नियमन कानून और 2018 में उसमें किए गए संशोधन का है. वैसे और पीछे जाएं, तो यह मामला 1976 में शुरू हुआ था, जब विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी. यह रोक उन कंपनियों से चंदा लेने पर भी थी, जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी विदेशी हो.
1976 वह समय था, जब देश में आपातकाल लगा हुआ था. तब यह तर्क बार-बार दिया जाता था कि सरकार विरोधी या इंदिरा गांधी विरोधी विदेशी शह पर काम कर रहे हैं. सरकार के लिए ऐसे में कुछ करते हुए दिखना जरूरी था, इसलिए यह कानून पास कर दिया गया. यह कहना मुश्किल है कि राजनीतिक दलों को विदेश से मिलने वाली मदद इस कानून के बाद कितनी रुकी.
साल 2010 में इस कानून में संशोधन करके इस रोक को खत्म कर दिया गया. जब ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया चल रही हो और अनिवासी भारतीय देश की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा रहे हों, तो इस नियम का कोई अर्थ भी नहीं था.
बाद में इसमें 2016 व 2018 में दो और संशोधन हुए. दूसरे संशोधन में न सिर्फ दलों को विदेशी चंदा लेने की पूरी छूट मिल गई, बल्कि यह छूट 1976 के बाद के सभी विदेशी चंदों पर लागू कर दी गई.
इस संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी, इसे समझने के लिए हमें राजनीतिक दलों को मिलने वाले घरेलू चंदे के किस्से को समझना पड़ेगा. पहले नियम यह था कि राजनीतिक दल अगर किसी से 20,000 रुपये तक का चंदा लेते हैं, तो उन्हें उसके नाम का खुलासा नहीं करना पड़ेगा, लेकिन इससे ज्यादा चंदा लेने पर उन्हें चंदा देने वाले का नाम आयकर विभाग को बताना पडे़गा. हालांकि उन्हें इससे ज्यादा चंदे की रकम भी मिलती थी, लेकिन उद्योगपति अपना नाम किसी दल विशेष के साथ जोड़े जाने से बचाते रहे हैं, इसलिए ऐसे कई ट्रस्ट बनाए गए थे, जो राजनीतिक दलों को चंदा देते थे.
इन्हीं में एक ट्रस्ट में एक ऐसी कंपनी भी थी, जिसका स्वामित्व विदेशी था और इस ट्रस्ट ने लगभग सभी बडे़ राजनीतिक दलों को चंदा दिया था. इस उलझे मामले को संशोधन करके और उसे पिछली तारीख से लागू करके ही सुलझाया जा सकता था. अब सुप्रीम कोर्ट ने इसी की वैधता जांचने का आदेश दिया है.
इस बीच केंद्र सरकार राजनीतिक चंदे के कई नियम बदल चुकी है. अब तो 2,000 रुपये से भी ज्यादा चंदा लेने पर चंदा देने वाले का नाम बताना जरूरी कर दिया गया है. इसके अलावा चंदे के बांड की व्यवस्था भी बनाई है, लेकिन यह सुधार कितना कारगर हुआ है, अभी नहीं कहा जा सकता.
वैसे इस तरह का चंदा समस्या है भी नहीं. उस चंदे को लेकर ज्यादा दिक्कत नहीं है, जिसकी बाकायदा रसीद कटती हो, चाहे वह घरेलू हो या विदेशी. समस्या तो उस धन को लेकर है, जो चुपचाप, बिना किसी लिखा-पढ़ी के दलों, नेताओं और उम्मीदवारों को पहुंचाया जाता है, यानी वह काला धन, जिससे देश के बड़े आयोजन चलते हैं.
राजनीति में आ रहे धन का नियमन बहुत जरूरी है, पर उससे कहीं ज्यादा जरूरी है राजनीति से काले धन को कम और फिर पूरी तरह खत्म करना. इसके कई तरीके हो सकते हैं, जिनमें एक तरीका यह है कि उस चंदे के नियमों को लगातार उदार बनाया जाए, जिसकी बाकायदा रसीद कटती है.