पत्रकार की भूमिका में नजर आने वाली हैं अर्चना

फिल्म जगत और टीवी रिपोर्टर में एक समानता यह है कि आज के दौर में दोनों ही फील्ड ग्लैमर वर्ल्ड में आते हैं. कलाकारों के साथ-साथ टीवी एंकर और रिपोर्टर को भी दुनिया भली भांति पहचानती है. ऐसे में नाम और शोहरत के शौकीन लोगों को यह फील्ड हमेशा से आकर्षित करता है. अब खबर यह है कि कई भोजपुरी फिल्मों और धारावाहिकों में काम कर चुकीं अभिनेत्री अर्चना प्रजापति ने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रख दिया है और अपने अचूक सवाल सेलिब्रेटियों और राजनेताओं पर दागने के लिए तैयार हैं.

पत्रकार’ की भूमिका में हैं अर्चना

जी हां, अर्चना के सवाल कैसे होंगे और वो किन-किन लोगों से सवाल करेंगी इसका खुलासा होने में अभी कुछ महीनों का वक्त लगेगा. दरअसल, मौडल एक्ट्रेस अर्चना प्रजापति किसी चैनल से नहीं जुड़ी हैं, बल्कि अपनी आने वाली फिल्म ‘है तुझे सलाम इंडिया’ में एक पत्रकार की भूमिका में हैं. निर्माता अरबाज भट्ट और निर्देशक अविनाश कुमार की इस फिल्म के एसोसिएट डायरेक्टर हैं शादाब सिद्दीकी जबकि अर्चना प्रजापति के साथ मुख्य भूमिका में आर्या बब्बर, मुश्ताक खान, एजाज खान, स्मिता गोंड़कर आदि हैं.

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है तुझे सलाम इंडिया’ की डबिंग पूरी

अर्चना ने हाल ही में ‘है तुझे सलाम इंडिया’ की डबिंग पूरी की है. अर्चना का कहना है कि उनकी भूमिका फिल्म में काफी चैलेंजिंग है और डबिंग के दौरान फिल्म को देखकर महसूस हो गया कि दर्शकों को यह फिल्म अवश्य पसंद आएगी. बहरहाल अर्चना के फैंस को पत्रकार के रूप में उन्हें देखने का इंतजार है. बता दें, अर्चना प्रजापति का नाम भोजपुरी फिल्मों में शुमार है. वैसे अर्चना पहले भी बौलीवुड की कई फिल्मों और म्यूजिक एल्बम में नजर आ चुकी हैं, लेकिन इस बार उन्हें बॉलीवुड के बड़े पर्दे पर सेकेंड लीड एक्ट्रेस के रूप में देखना काफी दिलचस्प होगा.

छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक का सफर

बता दें, छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक का सफर तय करना अर्चना के लिए आसान नहीं रहा. उन्हें बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा. तब जाकर उन्हें यह मुकाम हासिल हुई. अर्चना के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में काम करे. इस कारण उन्हें काफी समस्या होती थी. अर्चना बताती हैं कि वह परिवार वालों से छुपकर औडिशन देने जाती थीं, लेकिन एक दिन ऐसा आया जब फिल्म जगत से जुड़े लोग अर्चना के पिता जी से मुलाकात कर उन्हें समझाया कि अर्चना एक टैलेंटेड लड़की है और आने वाले समय में फिल्मी दुनिया में वह अच्छा नाम कमा सकती है.

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छोटे-छोटे रोल से की करियर की शुरुआत

ये सारी बातों को सुनकर किसी तरह अर्चना के पिता ने हामी भर दी और फिर अर्चना अपने सपनों को सच करने के लिए निकल पड़ीं. उन्होंने अपने करियर के लिए जमकर मेहनत किया और छोटे से रोल से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की. छोटे-छोटे रोल करते करते आज अर्चना उस मुकाम को हासिल कर चुकी हैं, जहां वह अपनी पहचान की मोहताज नहीं हैं.

हाय, ये कातिल नजरें

नजरें जितनी रसीली और नशीली होती हैं, उस से ज्यादा कातिल होती हैं. नाजनीनों की नायाब नजरें खंजर होती हैं, तीर और तलवार होती हैं. नजरें गोली होती हैं, पिस्तौलें और तोप होती हैं. नजर का मारा पानी तक नहीं मांगता है. नजरें कहर ढाती हैं, कयामत लाती हैं. नजरें बेसुध करती हैं, बेहोश करती हैं, मदहोश करती हैं. नजरें चोट करती हैं, नजरें कत्ल करती हैं. नजरें कयामत तक चैन नहीं लेने देती हैं. नजर से जीते हैं, तो नजर से मरते हैं. एक शायर फरमाते हैं :

‘जीना भी आ गया मुझे, मरना भी आ गया, पहचानने लगा हूं, तुम्हारी नजर को मैं.’

नजरों से कैसेकैसे हादसे होते हैं, तभी तो शायर सचेत करते हुए कहता है: ‘देखा न आंख भर के, किसी की तरफ कभी,

तुम को खबर नहीं, जो तुम्हारी नजर में है.’ मिर्जा गालिब को अपनी माशूका की मदभरी नजर का आधा खिंचा तीर ऐसा लगा कि वे तड़प उठे. अब उन्हीं की जबानी सुन लीजिए :

‘कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीरेनीमकश को, ये खलिश कहां से होती, जो जिगर के पार होता.’

उधर दाग साहब का दिल उन की माशूका की नजर के तीर का शिकार हुआ, लेकिन उन का जिगर बच गया. अब जिगर अपनी माशूका से कहते हैं : ‘शिकारे तीरे नजर दिल हुआ, जिगर न हुआ, ये बच रहा है, जरा उस की भी खबर लेना.’ एक शायर फरमाते हैं :

‘तिरछी नजरों से न देखो, आशिक दिलगीर को, कैसे तीरंदाज हो, सीधा तो कर लो तीर को.’

एक और शायर फरमाते हैं : ‘जिस को तीरे नजर लगा हो, एकदम वो मर गया होगा.’ नजरों से ऐसा निशाना लगता है कि किसी तीर, तलवार या खंजर की जरूरत नहीं है. सुनिए ऐसे :

‘जरा नजरों से कह दो जी, निशाना चूक न जाए.’ तिरछी नजर का तीर बड़ी मुश्किल से निकलता है और जब निकलता है, तो दिल के साथ ही निकलता है, देखिए यों:

‘तेरी तिरछी नजर का तीर है, मुश्किल से निकलेगा, दिल उस के साथ निकलेगा, अगर ये दिल से निकलेगा.’

शायर अजीज की महबूबा की नजर ने तो उन के सीने को चीर कर उन के दिल में ही अपना आशियाना बना लिया है. देखिए ऐसे : ‘तोड़ कर सीने को मेरे दिल में अपना घर किया,

कौन कहता है कि वे तीरे नजर नहीं.’ शायर नातिक लखनवी तो जमाने के सैकड़ों तीरों से ज्यादा तेज नजर का तीर बतलाते हैं और जब वह तीरे नजर किसी दिल का निशाना बने, तो सिवाय तड़पन के और कुछ नहीं होता है. वे फरमाते हैं:

‘सौ तीर जमाने के, इक तीरे नजर तेरा, अब क्या कोई समझेगा, दिल किस का निशाना है.’

एक और शायर फरमाते हैं: ‘क्या पूछते हो शोख निगाहों का माजरा, दो तीर थे, जो मेरी नजर में उतर गए.’ एक शायर की प्रेमिका के हुस्न की रंगत तो ऐसी है कि कोई भी दीवाना हो जाए, लेकिन एक तीरे नजर से लाखों दिल चाक हो जाते हैं :

‘तेरे हुस्न की रंगत ऐसी है, हर कोई दीवाना हो जाए, इक तीरे नजर के चलने से, दिल लाखों निशाना हो जाए.’

एक शायर शाद विसवानी की माशूका की तिरछी नजर देखिए, जो बेगुनाहों का भी कत्ल कर देती है. वह भी यों : ‘शायद करोगे कत्ल किसी बेगुनाह का,

जाते हो आज खींच के तेगे नजर कहां.’ एक शायर को अपनी महबूबा की नजर तलवार जैसी पैनी महसूस हुई : ‘उफ, वो नजर कि सब के लिए दिलनवाज थी, मेरी तरफ उठी, तो तलवार हो गई.’

शायर समर की जबानी सुनिए : ‘रहरह के देखता है, तिरछी नजर से हम को,

खंजर लगा रहा है कातिल संभलसंभल के.’ दाग देहलवी फरमाते हैं :

‘शोखी से ठहरती नहीं कातिल की नजर आज, ये वर्के बला देखिए गिरती है किधर आज.’

कमाल लखनवी फरमाते हैं : ‘जरा आंख ऊपर उठा कर तो देखो,

मिला खाक में कौन नीची नजर से.’ नजरें इतनी मारू होती हैं कि वे जिस की तरफ कर के फेर ली जाएं, तो उस आशिक की मरते दम तक परेशानी नहीं जाती है. शायर आनंद नारायण मुल्ला की माशूका इतनी कमाल की है कि उस की मारू नजरों से कयामत आ जाती है. देखिए यों :

‘नजर जिस की तरफ कर के निगाहें फेर लेते हो, कयामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती.’

एक शायर की माशूका की नजर कयामत की है. उस का अंदाज बला का है और जलवा ऐसा कि किसी को भी दीवाना बना दे. देखिए यों : ‘अंदाज बला के हैं, कयामत की नजर है,

जलवे का वह आलम है कि दीवाना बना दे.’ नजरें चोट करती हैं और वह भी सीधे दिल पर. देखिए यों :

‘दिल पे इस तरह लगें, उन की नजर की चोट, आईना चूर हो, आवाज न होने पाए.’

शायर फानी की जबानी सुनिए : ‘हर नजर खराब हो के रही,

दिल की बस्ती खराब हो के रही.’ एक शायर की माशूका तो अपनी नजरों से सीधा कत्ल ही करती है. उस की नजर बड़ी जुल्मी है. धनुष जैसी टेढ़ी हो कर नजर के छोटे से तीर चलाती है और फिर नजर से कत्ल भी करती है :

‘अदा से झुक के मिलते हैं, नजर से कत्ल करते हैं, सितम ईजाद हो, नावक चलाते हो, कमां हो कर.’

शायर मोमिन की माशूका ने तो अपनी एक नजर से पूरे जहां का कत्ल कर दिया. आप उन की माशूका की नजर का कमाल देखिए : ‘किया तुम ने कत्लेजहां इक नजर में,

किसी ने देखा, तमाशा किसी का.’ शायर बिस्मिल तो अपनी माशूका के तीरे नजर को कलेजे में रखे हुए हैं. तीरे नजर की कद्र करना तो शायर से सीखे :

‘करने का नहीं कद्र, कोई इस से ज्यादा, रखता हूं कलेजे में, तेरे तीरे नजर को.’

शायर अर्शी भोपाली की माशूका की नीची नजर का तो यह आलम है, मानो किसी ने दिल में चुभो कर तीर या नश्तर को तोड़ डाला हो. वे फरमाते हैं : ‘तेरी नजर की याद का आलम, अरे तोबा,

चुभो कर दिल में जैसे तोड़ डाले, कोई पैकां को.’ शफक इलाहाबादी फरमाते हैं कि माशूका की सीधी नजर ही जानलेवा होती है और फिर वह तिरछी हो, तो फिर उस का असर तो और भी खतरनाक हो सकता है. देखिए :

‘तिरछी हो तो कुछ और भी बढ़ जाए असर में, तासीर ये है जब तेरी सीधी सी नजर में.’

शायर फिराक गोरखपुरी अपनी माशूका की नजरों से खराब हो उठे. वे फरमाते हैं : ‘खराब हो उठा हूं तेरी निगाह से, मैं सोचता हूं कि दुनिया संवर गई होगी.’ शायर हफीज की माशूका तो ऐसी कातिल और शरारत भरी नजरों से देखती है कि ईमान संभालने के लिए उपदेशक को बुलाना पड़ता है. कहते हैं :

‘नासेह को बुलाओ, मेरा ईमान संभाले, फिर देख लिया उस ने शरारत की नजर से.’

एक शायर की माशूका प्यार भरी नजरोें से भी देखे, तो उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उन की जान पे बन आई. देखिए ऐसे : ‘तुम ने देखा मुझे प्यार भरी नजरों से मैं यह समझा कि मेरी जान पे बन आई है.’ एक शायर की माशूका जिस को देख लेती है, वह बेहोश हो जाता है. उस की जालिम नजर का कोई जवाब ही नहीं है. वफा मेरठी फरमाते हैं :

‘जिसे भी देख ले तू, वो ही होश खो बैठे, तेरी नजर का भी जालिम कोई जवाब नहीं.’

मूंछों का बंटवारा , उत्तर बनाम दक्षिण

एक जमाना था जब मूंछें मर्दों की आन, बान और शान समझी जाती थीं. मूंछ की सब से पहली तसवीर एक प्राचीन ईरानी की बताई जाती है जो घोड़े पर सवार था, हालांकि उस की दाढ़ी नहीं थी. यह तसवीर ईसापूर्व 300 बीसी की है. इस के बाद अनेक देशों और संस्कृतियों में कई प्रकार की मूंछें देखी गई हैं.

पहले तो मूंछों के साथसाथ पुरुष दाढ़ी भी रखते थे, पर 19वीं सदी के अंत तक दाढ़ी का सफाया होने लगा. इस की खास वजह नई पीढ़ी की सोच थी कि दाढ़ी के लंबे बालों में बैक्टीरिया व जर्म्स होते हैं. कुछ समय तो उत्तरी अमेरिका और यूरोप में दाढ़ी रखने वालों पर होटलों में भोजन बनाने व परोसने पर प्रतिबंध था. अस्पतालों में दाढ़ी वाले रोगियों की दाढ़ी भी जबरन कटवाई जाती थी. धीरेधीरे दाढ़ी के साथ मूंछ भी गायब होने लगी.

अधिकतर भारतीय पुरुष पहले मूंछें रखते थे. कहा जाता है कि ब्रिटिश सेना को भी भारतीय सैनिकों की देखादेखी मूंछ रखनी पड़ी थी. धीरेधीरे युवा पीढ़ी में मूंछ रखने का प्रचलन समाप्त होने लगा, उन्हें क्लीनशेव्ड, चिकना चेहरा सुंदर लगता था और शायद आधुनिक लड़कियों की भी यही पसंद है.

मूंछ बनाम क्लीनशेव्ड

आजकल अधिकतर भारतीय युवाओं ने मूंछ को अलविदा कह दिया है. कुछ हद तक अब यह सैनिकों व पुलिसकर्मियों के बीच सिकुड़ कर रह गई है. भारत में आधुनिकता और फैशन के प्रतीक माने वाले ज्यादातर बौलीवुड स्टार्स भी क्लीनशेव्ड हैं. पर यहां एक अंतर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच देखने को मिलता है. उत्तर भारत और बौलीवुड में भले ही मूंछ रखना आउट औफ फैशन हो गया हो, पर दक्षिण में और दक्षिण की फिल्म इंडस्ट्री टौलीवुड व कालीवुड में अभी भी मूंछें रखने का चलन है.

दक्षिण भारत में अभी भी ज्यादातर पुरुषों और ऐक्टर्स में मूंछ अपनी जड़ें जमाए हुए है. दशकों पहले  ऐक्टर्स अशोक कुमार, देव आनंद, दिलीप कुमार से ले कर अमिताभ बच्चन और खान ब्रदर्स सभी की मूंछें गायब थीं. ‘मूछें हों तो नत्थूलाल जैसी…’ फेमस डायलौग वाले बच्चन साहब ने भी युवावस्था में खुद मूंछें नहीं रखीं. कुछ अभिनेता इस के अपवाद हैं जैसे राज कपूर, अनिल कपूर, राजकिरण, रणधीर कपूर, जैकी श्रौफ, किशोर कुमार, प्रदीप कुमार आदि. बौलीवुड में परदे पर खलनायकों को भले मूंछोें के साथ देखा गया है पर हीरोज को बहुत कम.

बौलीवुड के ठीक उलट दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री में अधिकतर अभिनेता पहले भी मूंछें रखते थे और आज भी रखते हैं. उन्हें मूंछ रखने का शौक है. तमिल के जानेमाने शिवाजी गणेशन या फिर कन्नड़ के सुपरस्टार राजकुमार ने अपनी मूंछें नहीं कटवाईं. दक्षिण की फिल्मों में हीरो, हीरो के पिता या अन्य मुख्य पात्र अभी भी मूंछों में दिखते हैं.

भारत जैसे सिनेमाप्रेमी देश में चंद ऐक्टर्स के मूंछ रखने या न रखने का प्रभाव लोगों पर अच्छाखासा देखा जा सकता है यानी जहां बौलीवुड के प्रभाव से उत्तर की मूंछें गायब हुईं वहीं दक्षिण फिल्म इंडस्ट्री से वहां मूंछें फैशन बनीं, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम फिल्मों के ज्यादातर अभिनेता मूंछें रखते हैं. नागार्जुन, चिरंजीवी, कमल हासन, प्रभास, धनुष, रजनीकांत, विजय, सूर्या, रामचरण, पवन कल्याण, एनटीआर जूनियर, करथी, सुदीप आदि अभिनेता मूंछें रखना पसंद करते हैं.

इसी तरह का विरोधाभास हिंदी टीवी सीरियल्स और दक्षिण के सीरियल्स में भी देखा जा सकता है. उत्तर भारत या बौलीवुड से ज्यादातर मशहूर पुरुष मौडल्स बिना मूंछों वाले ही हैं.

उत्तर और दक्षिण के बीच मूंछों के फासले की कोई ठोस एक वजह नहीं हो सकती है. पर हमारा बौलीवुड पश्चिम के हौलीवुड और अन्य अंगरेजी फिल्म इंडस्ट्री से जल्दी और ज्यादा प्रभावित दिखता है. अमेरिका और यूरोप में मूंछों का जमाना लद गया है तो उस का असर उत्तर पर ज्यादा पड़ा है. दक्षिण के लोग इतनी जल्दी इस बदलाव से प्रभावित नहीं हुए हैं. उन की संस्कृति पर विदेशी प्रभाव उतना ज्यादा नहीं पड़ा है. दूसरी वजह हो सकती है दक्षिण का अधिकतर भाग समुद्रीतट पर है. इस कारण इस पर विदेशी आक्रमण बहुत कम हुए हैं, शायद इसलिए उत्तर में मूंछों पर विदेशियों का असर ज्यादा पड़ा है.

बलात्कारी पुरुष आखिर सोचता क्या है?

16 दिसंबर, 2012 की रात को दिल्ली में 23 साल की पैरामैडिकल की छात्रा निर्भया के साथ गैंगरेप हुआ, उसे सफदरजंग अस्पताल में नाजुक स्थिति में भरती करवाया गया. 29 दिसंबर को सिंगापुर के एक अस्पताल में उस छात्रा की मौत हो गई. इस जघन्य घटना ने पूरे संसार को हिला कर रख दिया था, जैसे पूरा भारत, पूरा विश्व एक आवाज में बोल रहा था कि क्यों हुआ ऐसा निर्भया के साथ. इस कांड को निर्भयाकांड के नाम से जाना जाता है.

बलात्कार की बढ़ती घटनाएं

निर्भयाकांड के आरोपियों को सुप्रीमकोर्ट द्वारा फांसी की सजा दिए जाने से उम्मीद जगी थी कि अब कानून की सख्ती से दरिंदे डरेंगे, लेकिन क्या ऐसा हुआ? क्या बलात्कार की घटनाएं होनी बंद हो गईं? एक निर्भया के मरने के बाद हर दिन, हर साल कितनी ही निर्भयाएं बलात्कार की शिकार हो रही हैं.

इस कांड के बाद आंकड़े गवाह हैं कि भारत में प्रतिदिन 92 महिलाएं बलात्कार की शिकार होती है, जिन में 4 सिर्फ दिल्ली की होती हैं. देश में लगभग 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है. ये तो वे आंकडे़ हैं जो पीडि़त द्वारा पुलिस में दर्ज कराए जाते हैं. सोचिए, ये मामले इस से कहीं ज्यादा होंगे, क्योंकि अभी भी 80 प्रतिशत स्त्रियां लोकलाज, गरीबी, असहाय या अशिक्षित होेने के कारण थाने तक नहीं पहुंच पातीं.

आखिर वे क्या कारण हैं जो पुरुषों को बलात्कार के लिए उकसाते हैं? आइए जानें कुछ मनोवैज्ञानिकों के विचार –

कमला नेहरू कालेज, दिल्ली में असिस्टैंट प्रोफैसर और ‘सैक्सुअल क्राइम औफ वुमेन इन देहली’ जैसे विषय पर पीएचडी कर चुके डा. तारा शंकर कहते हैं, ‘‘यह मैंटैलिटी ही ऐसी होती है. हमारा दिमाग पुरानी परंपराओं और आदतों से घुलामिला है. कुछ जनजातियों को छोड़ दें तो हर जगह महिलाओं को उपभोग करने का सामान समझा जाता है. दिमाग में औरत के प्रति यह जो नजरिया है, वह ही गलत है. जहां तक रेप की बात है, तो अगर मौका मिल जाए तो समाज का हर दूसरा या तीसरा पुरुष रेपिस्ट निकलेगा.

‘‘पोर्न, कपड़े या दूसरी वजहें तो सिर्फ माध्यम हैं. मौका मिलने के बाद अगर पकड़े जाने का डर न हो तो लोग रेप करने से संकोच ही न करें. पोर्न में दिखने वाला हिंसक सैक्स भी लोगों के अंदर उसी श्रेष्ठता को सिद्ध करता है जो हमारा समाज सिखाता है कि पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ व ताकतवर होते हैं. वे कुछ भी कर सकते हैं. श्रेष्ठ होने का यह मिथक लोगों के भीतर स्थापित है और वे ऐसा कर के संतुष्ट होते हैं.’’

मुंबई की क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक सोनाली गुप्ता कहती हैं, ‘‘पुरुषों द्वारा रेप करने की पहली वजह तो यह है कि हमारी सोसाइटी कितने ही लोगों के लिए अपनी पावर दिखाने का माध्यम बन जाती है. ऐसे लोग अपना हक जमा कर अपनी एक आइडैंटिटी क्रिएट करना चाहते हैं. दूसरा कारण है कि अगर कोई लड़की उन्हें पसंद आ जाती है, तो उन्हें लगता है कि वह हर हाल में मिलनी चाहिए, चाहे वह हां कहे या ना. तीसरी अहम वजह है कि वे अपनी कामोत्तेजना को कंट्रोल नहीं कर पाते, न ही वे इसे कंट्रोल करना चाहते हैं.

‘‘ऐसे लोगों के लिए रेप बदला लेने का माध्यम भी बन जाता है. कुछ ऐसे मनोरोगी होते हैं जिन्हें दूसरों को नुकसान पहुंचा कर अच्छा लगता है. इन के लिए दूसरे को चोट पहुंचाना मानसिक संतुष्टि जैसा होता है. इन्हें इलाज की जरूरत होती है क्योंकि इन का मानसिक संतुलन ठीक नहीं होता.’’

वे आगे कहती हैं, ‘‘उन्हें सिखाया ही नहीं गया कि लड़कियां भी लड़कों जैसी ही होती हैं, उन की मरजी के खिलाफ सैक्स नहीं करना चाहिए. इस के अलावा समाज में मैसेज देने वाला जो मास मीडिया है, उस पर अगर सैक्सुअल वौयलैंस दिखाया जाएगा, उन का कोई पसंदीदा हीरो लड़की के साथ जोरजबरदस्ती करेगा, तो लोग उसे रोलमौडल की तरह ही लेंगे. हम अभी भी मीडिया के तौर पर ज्यादा सैंसिटिव नहीं हुए. म्यूजिक वीडियोज, गीतों या फिल्मों में औरत को उपभोग की वस्तु की तरह पेश किया जाता है. जब तक पुरुष खुद को पावर पोजीशन में देखेंगे, रेप होते रहेंगे. हमें औरत के  प्रति मानसिकता बदलनी ही होगी.’’

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पुरुषों में एक श्रेष्ठता की भावना भरी होती है कि वे कुछ भी कर सकते हैं, जैसे सड़कों पर घूमना, कहीं भी आनाजाना आदि. लेकिन जब ये चीजें कोई लड़की करती है तो उन्हें लगता है कि एक लड़की ऐसा भला कैसे कर सकती है. यह भावना उन्हें उस लड़की के साथ जबरदस्ती करने को उकसाती है. मर्दों को रेप करना अपनी ताकत को दिखाने का जरिया नजर आता है.

जिन लोगों की पेरैंटिंग अच्छी होती है, वे इस तरह की चीजों को समझते हैं. लेकिन हमारे देश में लोग शिक्षा और सही समय पर मिलने वाली सैक्स एजुकेशन, दोनों के न मिलने के कारण ज्यादा हिंसक हो जाते हैं. वे सैक्स से संबंधित जरूरी बातें हिंसक तरीके से सीखते हैं, जैसे सड़कों पर झगड़ों के द्वारा. इसलिए उन्हें लगता है कि  ये ही सही तरीका है.

जो बच्चे सड़कों पर पलेबढ़े हों या मजदूरी करते हों, वे अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होते. वे अपने बचपन में इस तरह की हिंसक घटनाओं की चपेट में आ सकते हैं. इसलिए उन के दिमाग में वे चीजें बनी रहती हैं और मौका मिलने पर वे उन चीजों को हिंसक तरीके से ही करते हैं.

स्त्रियों के प्रति मानसिकता

  • लोगों की महिलाओं के प्रति ओछी मानसिकता भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू है. निर्भया गैंगरेप के आरोपी के वकील ए पी सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा कि अगर मेरी बेटी भी बगैर अनुमति के किसी मर्द के साथ बाहर जाए और किसी से संबंध बनाए तो मैं उसे जान से मार दूंगा, आग लगा कर जला दूंगा.
  • आरोपी पवन गुप्ता की बहन का कहना है कि इंसान से गलती हो जाती है, उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए. उस का कहना था, हमेशा लड़के की ही गलती हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
  • आरोपी ड्राइवर मुकेश सिंह ने बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘यदि निर्भया रेप के समय चुप रहती तो उस की हत्या नहीं होती.’’
  • निर्भया कांड पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बहुत से लोग यह बोलने से नहीं चूक रहे थे,  ‘महिलाओं को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि पुरुष उत्तेजित हो कर ऐसा कुकृत्य करने के लिए मजबूर हो जाएं.’

पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने ठीक ही कहा कि बस ड्राइवर के बयान ने एक बार फिर उस पुरुष मानसिकता को उजागर कर दिया है जिस के तहत वह नारी को अपनी जैविक संपत्ति समझता है. उन की दलील है कि किसी अपराध का पता लगाने और दोषियों को सजा देने से पहले बचाव जरूरी है. लेकिन जब तक अपराध की मूल वजह का पता नहीं चलता, तब तक उस से बचाव कैसे किया जा सकता है.

लगभग मिलतेजुलते बयान देने वाले इन लोगों की सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि नदी के 2 छोरों की तरह भिन्न है. बावजूद इस के अगर इन की जबान से मिलतेजुलते शब्द निकल रहे हैं तो इस के लिए देश की वह पुरुष मानसिकता ही जिम्मेदार है जिस में आज भी महिला को भोग्या समझा जाता है.

स्त्रियां दोषी

दिसंबर 31, 2011, हैदराबाद : आंध्र प्रदेश के डीजीपी वी दिनेश रेड्डी ने कहा था कि बढ़ते रेप के मामलों के लिए फैशनेबल कपड़े जिम्मेदार हैं. डीजीपी ने यह भी कहा कि अपने पारदर्शी कपड़ों की वजह से  महिलाएं लोगों को उकसाती हैं और नतीजतन, रेप जैसी घटनाएं होती हैं.

आंध्र प्रदेश के डीजीपी अपने इस बयान से विवादों में घिर गए. इस बयान पर तब के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा था कि हर किसी को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का अधिकार है.

आरटीआई ऐक्टिविस्ट लोकेश खुराना ने 2014 में उत्तर प्रदेश के तमाम थानों से बलात्कार के मामलों पर कई बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी थी. करीब 40 थानों ने बलात्कार की घटनाओं में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया था. इस में महिलाओं के कपड़ोें, मोबाइल फोन, इंटरनैट, टीवी और सिनेमा के साथ ही कुछ ने तो यहां तक कहा था कि महिलाओं के अर्धनग्न कपड़ों से नजर आती अश्लीलता इस के लिए जिम्मेदार है.

हाल ही में चंडीगढ़ के एक रेप केस में सांसद किरण खेर ने नसीहत देते हुए कहा कि जब लड़की को पता था कि आटो में पहले से ही आदमी बैठे हुए हैं तो उस आटो में नहीं बैठना चाहिए था. इसे राजनीतिक मोहरा बनाते हुए विपक्ष के नेता पवन कुमार बंसल ने किरण के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि किरण के बयान पर मुझे हैरानी हो रही है. किरण को ऐसे बयान देने की जगह यह बताना चाहिए कि चंडीगढ़ को महिलाओं के लिए और सुरक्षित कैसे बनाया जा सकता है. अमूमन ऐसी घटनाओं के बाद सरकारें व सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी इन पर परदा डालने में जुट जाती हैं और विपक्ष व दूसरे सामाजिक संगठन धरनेप्रदर्शनों में, लेकिन घटना के मूल कारणों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता.

मैं मायके चली जाऊंगी

दफ्तर में ज्यादा काम की मार से हमारा कामकाजी दिमाग चरचराया हुआ था. शाम को हम घर को चले तो सोचा कि आज श्रीमतीजी के हाथों की गरमागरम चाय पी कर उन के साथ अपने गमों को साझा करेंगे.

उधर डोरबैल बजाने के बाद भी जब श्रीमतीजी ने दरवाजा नहीं खोला, तो हम ने गुस्से में आ कर दरवाजे को जोर से धकेल दिया. देखा तो वह खुला पड़ा था. सोचा कि श्रीमतीजी अंदर से बंद करना भूल गई होंगी. घर में घुसते ही हम ने इधरउधर नजर दौड़ाई. हमारी श्रीमतीजी हमें कहीं नजर नहीं आईं.

हम घबराए हुए सीधे बैडरूम में जा पहुंचे. वहां श्रीमतीजी अंधेरा किए बैड पर ऐसे फैली पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन के कीमती जेवरों पर हाथ साफ कर दिए हों और अब उसी का गम मना रही हों.

हम ने जैसे ही कमरे की बत्ती जलाई, तो श्रीमतीजी ने गुस्से में मोटीमोटी लाललाल आंखें हमें दिखाईं, तो हम तुरंत समझ गए कि आज हमारी शामत आई है.

हम ने धीरे से श्रीमती से पूछा, ‘‘क्या तबीयत खराब है या मायके में कोई बीमार है?’’

वे गुस्से में फट पड़ीं, ‘‘खबरदार, जो मेरी या मेरे मायके वालों की तबीयत खराब होने की बात मुंह से निकाली.’’

श्रीमतीजी बालों को बांधते हुए बैडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर पसर गईं. हम भी अपने कपड़े बदल कर उन के पास आ कर बैठ गए. फिर उन के शब्दों के बाणों की बौछारें शुरू हो गईं, ‘‘शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ है और तुम ने मुझे इस फ्लैट की चारदीवारी में कैद कर दिया है. तुम न तो मुझे कभी फिल्म दिखाने ले जाते हो, न कहीं घुमाते हो और न ही किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खिलाते हो.

‘‘आज तो तुम को मुझे कहीं न कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा और मेरे नाजनखरों को उठाना पड़ेगा, वरना मैं मायके चली जाऊंगी और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी.’’

श्रीमतीजी के मायके जाने की धमकी ने हमारी आंखों को उन के पहलवान पिताजी कल्लू के साक्षात दर्शन करा दिए थे, जिन्होंने अपनी बेटी को विदा करते समय हमें चेतावनी दी थी कि अगर कभी हमारी बेटी यहां रोतीबिलखती आई, तो हम से बुरा कोई न होगा. बेटी राधिका को परेशान करने के एवज में तुम्हें हमारे बेटे भूरा से गांव के वार्षिक दंगल में लड़ना होगा.

भूरा की कदकाठी कुछ ऐसी ही थी कि हाथी भी सामने आ जाए, तो उस सांड़ को देख कर अपना रास्ता बदल ले.

हम ने तुरंत श्रीमतीजी के पैर पकड़ लिए और उन के नाजनखरों को उठाने को तैयार हो गए.

अगले दिन दफ्तर में श्रीमतीजी का फोन आया. वे बोलीं, ‘‘आज हमारा सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ देखने का मन कर रहा है. उस के बाद डिनर भी हम बाहर ही करेंगे.’’

सो, इंटरनैट के जरीए हम ने ‘बजरंगी भाईजान’ के 2 टिकट बुक करा दिए. शाम को जब हम घर पहुंचे, तो श्रीमतीजी दरवाजे पर तैयार खड़ी गुस्से से कलाई घड़ी की तरफ देख रही थीं. उधर गरमी के मारे हमारी हालत बुरी थी.

सकपकाते हुए हम धीरे से घर के अंदर घुसे. फिर फ्रिज से हम ने ठंडा पानी निकाला और 2-4 घूंट पानी गले में डाला, जल्दी से कपड़े बदले और श्रीमतीजी के साथ स्कूटर पर निकल पड़े.

मगर रास्ते में ही स्कूटर ने धोखा दे दिया. उधर श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. स्कूटर का पिछला पहिया पंक्चर हो गया.

हम ने श्रीमतीजी के तमतमाए चेहरे की तरफ देखा और फिर घड़ी में समय देखा, तो शाम के 7 बज चुके थे. एक घंटे का शो पहले ही निकल चुका था. जब तक हम पंक्चर लगवा कर सिनेमाघर तक पहुंचे, तब तक रात के 9 बज चुके थे. लोग सिनेमाघर से बाहर निकल रहे थे.

अब हमारा दिल डर के मारे बुरी तरह धड़क रहा था.

हम ने श्रीमतीजी को समझाया, ‘‘कल हम तुम्हें मौर्निंग शो में फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ दिखा लाएंगे. इस के एवज में हम कल ड्यूटी पर भी नहीं जाएंगे.’’

यह सुन कर श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से की लकीरें थोड़ी कम होने लगी थीं. फिर वहीं पास ही के एक अच्छे से रैस्टोरैंट में श्रीमतीजी को ले गए. वहां हम दोनों ने लजीज खाने का लुत्फ उठाया. जब पैसे देने का समय आया, तो हमारी जेब से पर्स गायब था.

हम ने रैस्टोरैंट के मालिक को बहुत समझाया. आखिरकार हमें अपना स्कूटर उन के पास बतौर गिरवी छोड़ना पड़ा और पैदल ही घर जाना पड़ा.

अभी हमारी मुसीबत कम नहीं हुई थी, क्योंकि सुनसान सड़क पर चलती हुई हमारी श्रीमतीजी सोने के जेवरों से दमक रही थीं. जब हम ने उन्हें समझाया कि पल्लू से अपने गहनों को ढक लो, तो वे अकड़ते हुए बोलीं, ‘‘मैं कल्लू पहलवान की बेटी हूं. चोरउचक्कों से डर तुम जैसे शहरियों को लगता होगा. मैं एक धोबीपछाड़ दांव में अच्छेअच्छों को पटक दूंगी और अपनी हिफाजत मैं खुद कर लूंगी.’’

श्रीमतीजी की बहादुरी से हमारे हौसले भी बढ़ चुके थे कि तभी वही हो गया, जिस का हमें डर था. 2 लुटेरों ने हमें धरदबोचा. चाकूपिस्तौल देख हमारी हालत पतली हुई जा रही थी, तभी एक लुटेरा हमारी श्रीमतीजी के गहनों पर झपट पड़ा.

इस के बाद श्रीमतीजी ने उन दोनों की जो हालत बनाई, वह नजारा हम अपनी जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते हैं.

कुछ ही देर में पुलिस की एक गाड़ी वहां आ पहुंची. उन दोनों इनामी बदमाशों को पकड़वाने के एवज में श्रीमतीजी को 50 हजार रुपए का चैक बतौर इनाम मिला.

हम ने उन रुपयों से एक सैकंडहैंड कार ले ली है. अब तो हम हर शाम श्रीमतीजी के साथ कार में घूमने जाते हैं. इस बात की उम्मीद करते हैं कि दोबारा किसी लुटेरे गैंग से हमारी श्रीमतीजी की भिड़ंत हो जाए और उसे पकड़वाने के एवज में इनाम के तौर पर फिर कोई चैक मिल जाए.

यूट्यूब पर छाई हिना खान, कुछ यूं दिखाया अपना हौट अवतार

स्टार प्लस पर आने वाले सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में अक्षरा का किरदार निभाकर लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली हिना अब वीडियो सौन्ग से जबरदस्त तरीके से वापसी की है. हिना खान का हाल ही में रिलीज किया गया म्यूजिक वीडियो सौन्ग ‘भसूड़ी’ काफी सुर्खियों में है. यूट्यूब पर यह गाना पहले नंबर पर ट्रेंड कर रहा है.

हिना खान के इस वीडियो में मशहूर पंजाबी सिंगर सोनू ठुकराल नजर आ रहे हैं. इस गाने में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बिग बौस सीजन 11 में हिना के साथ कंटेस्टेंट के रूप में साथ रहे स्वामी ओम का भी जिक्र किया गया है. यह गाना यूट्यूब चैनल गीत MP3 के औफिशियल चैनल से रिलीज किया गया. इस गाने को अब तक 80 लाख से भी ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं.

गाने में हिना की हौट अदाओं की तो तारीफ हो ही रही है. इसके साथ-साथ इसके लिरिक्स भी सबका ध्यान खींच रहे हैं. इस म्यूजिक वीडियो में सोनू अपने फोन से हिना खान को फोन करते हैं और उनके दोस्त भाभी बोलते हुए कहते हैं, ‘क्या हुआ भाई, भाभी फोन नहीं उठा रहीं?’ इसके बाद सोनू काफी परेशान हो जाते हैं. पूरा गाना ही काफी शानदार तरीके से कहानी के रूप में नरेट किया गया है.

स्वप्नधारी बाबा की जय

मैं मरता क्या न करता. न चाहते हुए भी स्वप्नधारी बाबा के पास घुटनों के बल सपरिवार गया.

हम सब उन के चरणों में नतमस्तक हुए तो उन्होंने पूछा, ‘‘कहो, क्या चाहते हो सरकार?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं सरकार नहीं बाबा, वोटर हूं. और वोटर भी वह जिस के वोट का बटन कोई और ही दबाता है. मेरे तो बस उंगली में स्याही ही लगती है. हमें रोटी चाहिए बाबा… रोटी.’’

‘‘क्या बोले बेटा… जरा ऊंचा बोलो. दिल्ली के कानों की तरह मेरे कान भी ऊंचा सुनते हैं,’’ बाबा ने कहा तो मैं ने सपरिवार उन के कान में एकसाथ कहा, ‘रोटी, बाबा रोटी…’

बाबा हाथ नचाते हुए बोले, ‘‘वह तो खाद्य सुरक्षा बिल ने दे दी है.

‘‘और बोलो क्या चाहिए? एक सपना लूंगा और पलक झपकते ही समस्या का समाधान कर दूंगा. अपनी खुद की समस्या को छोड़ वोटर की हर समस्या का समाधान है मेरे पास. तुम मेरे पास आ गए, गलती की. मोबाइल फोन पर ही अपनी समस्या बता दी होती. मैं जनता की हर समस्या का समाधान डीटीएच से ही कर देता हूं.’’

‘‘डीटीएच बोले तो…?’’ मैं ने दांतों तले उंगली दबाते हुए पूछा.

कमबख्त उंगली भी दांत से कट गई. दांतों ने कई दिनों से रोटी जो नहीं काटी थी.

‘‘डीटीएच बोले तो डायरैक्ट टू होम. कबूतरों के गले में संदेश बांध कर भेजने का समय गया. डाकिए भी अब गए ही समझो. अब तो हाईटैक जमाना है, हाईटैक. घर में टैलीविजन के पास बैठेबैठे औनलाइन समस्या का समाधान.

‘‘धर्मपत्नी से धोखा मिलना, सौतन के लिए घरवाली को शर्तिया मनाना, अपने निर्वाचन क्षेत्र के नेता पर वशीकरण, दोस्तों से छुटकारा, पैसे दे कर नौकरी पक्की करवाना, भाग कर मैरिज करवाना… गड़े पैसे को निकलवाने में तो मेरी मास्टरी है बेटा.

‘‘बस, मेरे बैंक खाते में समस्या के हिसाब से पैसे जमा कराओ और अपनी समस्या का हल मेरे खाते में पैसे जमा हो जाने के मैसेज से पहले पाओ.’’

मैं ने घिघियाते हुए पूछा, ‘‘सरकार को भी आप ने ही कंगाली से निकालने के लिए गड़े पैसों के बारे तो नहीं बताया है स्वप्नधारी बाबा?’’

‘‘नहीं, वह तो मेरे चेले ने बताया है. देखो न, मैं गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया. चेला दिन में सपने ले कर सरकार को मालामाल बनाता है तो गुरु दिन में सपने ले कर वोटर को चराता है, सौरी लखपति बनाता है.

‘‘मैं साफसाफ देख रहा हूं कि तुम्हारे घर की दक्षिण दिशा की ओर दीवार के पास जहां तुम लोग टिन का सड़ा पतरा लगा कर नहाते हो वहीं तुम्हारे बुजुर्गों ने सोना दबा कर रखा है.

‘‘अब तुम्हारी कंगाली गई बेटा. अब तो नंगे नहाओ, फलोफूलो. जाओ, बाजार से गैंती, फावड़ा घर ले जाओ और अपनी गरीबी भगाओ,’’ कह कर बाबा ने अपनी तो आंखें बंद कीं पर मेरी यह सुन कर आंखें ही नहीं जबान भी बंद हो गई.

मैं ने बड़ी मुश्किल से अपने हाथ से अपनी जबान खींच कर पूछा, ‘‘पर बाबा, मेरे पास तो गैंती, फावड़े के लिए भी पैसे नहीं हैं…’’

‘‘तो उधार ले जाओ. लाला से कह देना कि जब गड़ा खजाना निकलेगा तो सूद समेत लौटा देंगे. अब तुम्हारे दिन फिरने वाले हैं भक्त. मैं अपने को भी न देख पाने वाली अपनी आंखों से बिलकुल साफ देख रहा हूं कि अब तुम्हारे परिवार के नोटों के बिस्तर पर सोने के दिन आ गए हैं बच्चा.

‘‘जाते ही सब से पहले अपने घर के फटेपुराने बिस्तर जलाओ. टैलीविजन वालों को बताओ. अखबार वालों को बताओ. अपनी तंगदिमागी को देशदुनिया की खबर बनाओ. पूरे इलाके में अपनी सरकार की तरह जयजयकार कराओ. 21वीं सदी में रहने के बाद भी 15वीं सदी में चले जाओ. कंगाली है ही बुरी चीज. गधे पर भी विश्वास करना पड़ता है, इसलिए सोचो मत बस विश्वास करो. इस के सिवा और चारा भी क्या बचता है…

‘‘पर हां, अभी जो मेरी फीस नहीं दी तो कल तक किसी से उधार ले कर मेरे बैंक खाते में जमा करवा देना, नहीं तो बुजुर्गों के खजाने पर तुम्हारा नहीं नागों का ही राज रहेगा.’’

‘‘पर बाबा, मेरे पास अभी तो आप की फीस चुकाने के पैसे भी नहीं हैं.’’

‘‘तो कोई बात नहीं. त्योहार का सीजन है. एक ग्राहक फ्री में ही सही. बाकियों को भी मेरे पास भेजो, सोच लूंगा फीस मिल गई.’’

मैं अपने गांव आया. मैं ने उधार में गैंती, फावड़े ले कर अपने लैवल पर घर में बाबा की बताई दिशा में खुदाई की शुरुआत बाबा का नाम ले कर करने की घोषणा की तो बिन न्योते ही गांव में मीडिया वाले यों मंडराने लगे, जैसे…

मेरे गांव में दर्शकों का तांता लगा है. गांव वालों की चाय, बीड़ी की दुकानें चल निकली हैं. बाबा की बताई गई दिशा में खुदाई जोरों पर है. घर की बताई खुदाई वाली दीवार ही नहीं उस के साथ वाली दीवार भी गिरने को तैयार है, पर मेरा भी सरकार की तरह हौसला बुलंद है.

जनता और जिन से मैं ने उधार लिया है उन का ध्यान तो बंट गया है. हमारे लिए यही क्या कम है? जय हो स्वप्नधारी बाबा की, जय हो हमारे जैसों की.

जब महंगी पड़ी दो नावों की सवारी

कोई बड़ा अपराध हो जाता है तो आम लोगों में तो दहशत फैल ही जाती है. पुलिस विभाग में भी हड़कंप के हालात बन जाते हैं. 7 जनवरी, 2017 की सुबह उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी एक ऐसी ही वारदात हो गई थी कि पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी. मामला 2 कत्लों का था. हत्यारों ने शहर के थाना करेली के नयापुरवा के रहने वाले समाचारपत्र विक्रेता माधवप्रसाद और उन की बेटी अर्चना की बेरहमी से हत्या कर दी थी.

पुलिस अधिकारी, फोरैंसिक एक्सपर्ट और डौग स्क्वायड टीम मौके पर आ पहुंची थी. घटनास्थल का मंजर दिल दहला देने वाला था. 55 साल के माधवप्रसाद की लाश कमरे में पड़ी थी, जबकि 29 साल की अर्चना की लाश आंगन में थी. दोनों के सिर, चेहरे और माथे पर चोटों के निशान थे. उन की हत्या किसी धारदार हथियार से गला काट कर की गई थी.

पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया. घर का सामान अपनीअपनी जगह था. कमरे में रखी अलमारी को छेड़ा तक नहीं गया था. मृतका का मोबाइल भी वहां मौजूद था. घटनास्थल को देख कर 3 बातें साफ हो रही थीं. पहली यह कि मामला लूटपाट का कतई नहीं था. दूसरी हत्यारे मृतकों के परिचित थे और तीसरी हत्याकांड को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया था.

डौग स्क्वायड आंगन में ही घूम कर रह गया था. फोरैंसिक टीम ने जांच के लिए खून आदि के नमूने एकत्र कर लिए. मौके पर लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो चुकी थी. पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि माधवप्रसाद की पत्नी की कई साल पहले मौत हो गई थी. उन की माली हालत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी. उन की 3 बेटियां थीं अर्चना, सुलोचना और वंदना.

अर्चना का विवाह 4 साल पहले कौशांबी के राजू के साथ हुआ था लेकिन पति से अनबन के चलते वह उसे हमेशा के लिए छोड़ कर मायके चली आई थी. एक साल पहले उस ने बेनीगंज के रहने वाले विश्वजीत सिंह से प्रेम विवाह कर लिया था. हालांकि पिता की देखरेख के लिए वह ज्यादातर पिता के साथ ही रहती थी.

उस से छोटी सुलोचना ने भी एक साल पहले सुलेम सराय निवासी साहिल उर्फ वीरू से प्रेमविवाह कर लिया था. वह पति के साथ मुंडेरा में किराए के मकान में रहती थी. सब से छोटी वंदना अपने पति अजय के साथ ससुराल में सुख से रह रही थी.

माधवप्रसाद की बेटी वंदना और दामाद तथा कुछ रिश्तेदार उन की मौत की खबर पा कर आ गए थे. हैरानी की बात यह थी कि आसपड़ोस में किसी को वारदात का पता नहीं चला था. वारदात का पता 7 जनवरी, 2017 की सुबह तब चला, जब अर्चना का पति विश्वजीत वहां पहुंचा.

दरअसल, 5 जनवरी की शाम वह अर्चना से मिल कर गया था. अगले दिन शाम को वह पुन: उस से मिलने आया तो दरवाजे पर ताला लगा था. उस ने अर्चना को मोबाइल पर कई बार फोन किया, लेकिन घंटी बजने के बावजूद कोई जवाब नहीं आया. इस तरह अचानक ताला लगा कर माधवप्रसाद या अर्चना पहले कभी नहीं गए थे. फिर उन का कहीं जाने का प्रोग्राम भी नहीं था. विश्वजीत को पूरा विश्वास था कि बिना बताए वे कहीं नहीं जा सकते थे.

सब से बड़ी चिंता की बात यह थी कि अर्चना फोन का कोई जवाब नहीं दे रही थी. विश्वजीत के मन में तरहतरह की आशंकाओं ने जन्म लिया. 7 जनवरी की सुबह चिंताग्रस्त विश्वजीत पड़ोस की दीवार कूद कर घर में दाखिल हुआ तो वहां का मंजर देख कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उस ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. जिस के बाद एसपी (सिटी) विपिन टाडा, सीओ रूपेश सिंह और स्थानीय थाना करेली के प्रभारी जितेंद्र कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए.

पुलिस ने मृतकों के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. साथ ही विश्वजीत की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कर लिया था. मामला गंभीर था, इसलिए एसएसपी शलभ माथुर ने अधीनस्थों को घटना का शीघ्र खुलासा करने के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) के निर्देशन में एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में थानाप्रभारी के अलावा क्राइम ब्रांच के एसआई नागेश सिंह, ओमशंकर शुक्ला, कांस्टेबल पवन सिंह, संजय सिंह, बालगोविंद पांडेय और अवनीश कुमार आदि को शामिल किया गया.

पुलिस हत्या की वजह तलाशने में जुट गई. पुलिस ने मृतकों के रिश्तेदारों और आसपास के लोगों से पूछताछ की. इस पूछताछ में पता चला कि हत्याकांड को 5 जनवरी की रात को अंजाम दिया गया था, क्योंकि उसी दिन शाम ही अर्चना का पति उस से मिल कर गया था. तब तक सब ठीकठाक था. पुलिस को एक खास बात यह पता चली कि माधवप्रसाद का नयापुरवा स्थित खंडहर हो चुके पुश्तैनी मकान को ले कर अपने भाई से विवाद चल रहा था.

दरअसल, माधवप्रसाद 3 भाई थे, जिन में माधवप्रसाद और रामअवतार एक साथ रहते थे, जबकि तीसरा भाई रामस्वरूप अलग रहता था. रामअवतार के कोई संतान नहीं थी. कई सालों पहले रामअवतार और उस की पत्नी की मौत हो चुकी थी, जिस के बाद उस का हिस्सा भी माधवप्रसाद का हो गया था.

यह बात अलग थी कि माधवप्रसाद और उस का भाई रामस्वरूप अलगअलग मकान बना कर रह रहे थे. रामस्वरूप और उस के बेटे तीसरे भाई के हिस्से में हिस्सा चाहते थे. इस बात पर उन का कई बार विवाद भी हुआ था. रिश्तों में इतनी खटास आ गई थी कि उन की बोलचाल तक बंद थी.

रामस्वरूप चाहते थे कि पुश्तैनी मकान को बेच कर आधाआधा पैसा बांट लिया जाए जबकि माधवप्रसाद और उन की बेटियां ऐसा नहीं चाहती थीं. हालांकि उस के हिस्से में कई बार प्लौट बिकाऊ संबंधी बोर्ड लगाया गया था. कई बार उस पर कब्जे की भी कोशिश की गई थी. माधवप्रसाद ने हर बार इस का विरोध किया था. प्रौपर्टी डीलिंग से जुड़े कई लोगों की भी इस पर नजर थी.

आए दिन के झगड़ों से परेशान हो कर माधवप्रसाद ने दिसंबर, 2016 के अंतिम सप्ताह में एक प्रौपर्टी डीलर से अपने और मृतक भाई के हिस्से को 25 लाख रुपए में बेचने की बात की थी, लेकिन बाद में इनकार कर दिया था. पुलिस का शक माधवप्रसाद के भाई पर ठहर गया, इसलिए रामस्वरूप और उस के बेटों से पूछताछ की गई लेकिन हत्या में उन का हाथ होने का कोई सबूत नहीं मिल सका.

इस से हत्या की गुत्थी और उलझ गई. जांच में एक बात यह भी पता चली कि माधवप्रसाद की बेटी सुलोचना भी 3 जनवरी से लापता थी. उसे ले कर न सिर्फ माधवप्रसाद और उन की बेटियां, बल्कि उस का पति साहिल भी परेशान था. पुलिस ने इस दिशा में जांच शुरू की तो इस नतीजे पर पहुंची कि माधवप्रसाद की मौत के बाद उस के भाई के अलावा और किसी को कोई फायदा नहीं हो सकता था. अब पुलिस को उस के तीनों दामादों पर शक हुआ. इन में सब से ज्यादा शक सुलोचना के पति साहिल पर गया.

दरअसल, शक की वजह भी थी. मृतक की बेटी वंदना से पुलिस को पता चला कि सुलोचना से उस का पति साहिल आए दिन झगड़ा करता था. दोनों के बीच अनबन रहती थी. सोचने वाली बात यह भी थी कि सुलोचना के लापता होने के बाद भी उस ने उस की गुमशुदगी नहीं दर्ज कराई थी. पुलिस ने माधवप्रसाद के दामाद विश्वजीत और अजय से पूछताछ की, लेकिन उन्होंने पुलिस के हर सवाल का सही जवाब दिया. उन के चेहरे पर भी सच झलक रहा था.

हत्याकांड के इर्दगिर्द मकान का विवाद और रिश्तों का जाल था. तीसरे दामाद साहिल की भूमिका संदिग्ध नजर आई तो पुलिस ने उस से पूछताछ की. पुलिस के सवालों के जवाब देने के बजाय वह पुलिस को ही उलटा तेवर दिखाने लगा, ‘‘आप लोग हत्यारों को पकड़ने के बजाए हम से ही पूछताछ कर रहे हैं.’’

‘‘कौन हैं असल हत्यारे, तुम जानते हो ’’

‘‘यह मुझे नहीं पता. यह पता लगाना तो आप लोगों का काम है. मेरी समझ में यह नहीं आता कि मुझे बेवजह क्यों परेशान कर रहे हैं. मेरी बीवी गायब है. मैं पहले से परेशान हूं.’’

‘‘तुम ने उस के गायब होने की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी ’’

‘‘सर, मैं खुद ही उसे दिनरात खोज रहा था.’’

इस पूछताछ में पुलिस इतना समझ गई कि साहिल काफी चालाक किस्म का आदमी है. अगले दिन यानी 8 जनवरी को पुलिस ने साहिल समेत माधवप्रसाद के नजदीकियों की काल डिटेल्स हासिल कर ली. चूंकि साहिल ही मुख्य संदिग्ध था, इसलिए पुलिस ने उस की काल डिटेल्स और लोकेशन को बारीकी से जांचा तो जो जानकारी मिली, उस से पुलिस हैरान थी. घटना वाली रात साहिल की लोकेशन नयापुरवा में ही थी.

उस की कालडिटेल्स में एक नंबर और था, जिस पर उस की लगातार बातें होती थीं. उस नंबर की लोकेशन भी उस रात उस के साथ थी. पुलिस ने बिना देर किए साहिल को हिरासत में ले कर सख्ती से पूछताछ की. पुलिस के सामने उस के हौसले पस्त हो गए. फिर तो उस ने पुलिस को जो बताया, उसे सुन कर पुलिसकर्मी सन्न रह गए. माधवप्रसाद और उन की बेटी का कातिल कोई और नहीं, साहिल ही था.

अपने बहनोई योगेश के साथ मिल कर उसी ने खून से हाथ रंगे थे. यही नहीं, उस ने अपनी पत्नी सुलोचना की भी हत्या कर दी थी. पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की तो 2 बीवियों के फेर में उलझे एक रसिकमिजाज और सनकी इंसान की चौंकाने वाली करतूत सामने आई. इस के बाद पुलिस ने योगेश को भी गिरफ्तार कर लिया.

साहिल ठेके पर हलवाई का काम करता था. वह रसिकमिजाज इंसान था. सुलोचना से शादी के कुछ महीने बाद ही उस ने सुमन से प्रेम की पींगे बढ़ाईं और उस से भी शादी कर ली. सुमन को उस ने अपने पैतृक घर में रख रखा था. वह 2 नावों की सवारी कर रहा था. दिन में वह सुमन से मिलता था और रात में सुलोचना से. 2 पत्नियों को धोखे में रख कर वह खुद को चालाक समझ रहा था, लेकिन उस की चालाकी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी.

सुलोचना के सामने यह भेद खुला तो उस ने हंगामा खड़ा कर दिया. इस के बाद दोनों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा. साहिल ने सोचा था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. सुलोचना कुछ दिन लड़झगड़ कर चुप बैठ जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. एक दिन सुलोचना फैसले पर उतर आई, ‘‘तुम ने प्यार के नाम पर धोखा दिया है साहिल, लेकिन अब तुम्हें फैसला करना होगा.’’

‘‘कैसा फैसला ’’

‘‘तुम्हें सुमन को छोड़ना होगा या मुझे.’’

साहिल ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘सुलोचना, बात समझने की कोशिश करो. यह ठीक है कि मुझ से गलती हो गई है लेकिन मैं तुम्हें कोई परेशानी नहीं होने दूंगा.’’

‘‘लेकिन मैं सौतन को बरदाश्त नहीं कर सकती.’’ सुलोचना ने साफ कह दिया.

इस के बाद उस ने साहिल की दूसरी शादी की बात अपनी अन्य बहनों को बता दी. उन लोगों ने भी कहा कि वह साहिल पर दबाव बनाए ताकि वह सुमन का साथ छोड़ दे. सुलोचना आए दिन उस पर सुमन को छोड़ने का दबाव बनाने लगी. साहिल उसे बारबार समझाने की कोशिश करता रहा और बहाने बना कर बात को टालता रहा.

सुलोचना बीए तक पढ़ी थी, इसलिए वह उस के झांसे में नहीं आई. एक दिन उस ने साहिल को चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘साहिल, मैं तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूं. तुम गुलछर्रे उड़ाओ और मैं देखती रहूं, ऐसा नहीं हो सकता. अगर तुम ने सुमन से रिश्ता नहीं तोड़ा तो मैं तुम्हारे खिलाफ पुलिस में शिकायत कर के तुम्हें जेल भिजवा दूंगी.’’

उस की इस धमकी से साहिल डर गया. वह फितरती सोच का आदमी था. आए दिन होने वाले झगड़े से वह परेशान था. उसे लगा कि अगर सुलोचना इसी तरह करती रही तो एक दिन वह उसे जेल भी भिजवा देगी. 1 जनवरी को भी दोनों के बीच जम कर झगड़ा हुआ. बस इसी के बाद साहिल ने मन ही मन सुलोचना को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली.

2 जनवरी की रात वह सुलोचना के पास ही रुका. आधी रात का वक्त था, जब सुलोचना गहरी नींद सो रही थी, उसी समय उस ने दुपट्टे का फंदा उस के गले में डाल कर कस दिया. गले पर दबाव पड़ते ही सुलोचना की आंख खुल गई. साहिल के रूप में उसे मौत नजर आई. उस ने बचाव के लिए काफी हाथपैर चलाए, लेकिन साहिल ने उसे काबू कर लिया. परिणामस्वरूप कुछ ही देर में छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या करने के बाद वह लाश के पास ही सो गया.

साहिल ने हत्या तो कर दी, अब उसे लाश को ठिकाने लगाने की चिंता सताने लगी. शाम को उस ने रोशनबाग में रहने वाले अपने बहनोई योगेश को फोन कर के बुलाया और दोनों लाशों को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगे. योजना बना कर रात के अंधेरे में दोनों सुलोचना की लाश को मोटरसाइकिल पर रख कर करीब 8 किलोमीटर दूर कानपुर हाईवे पर कस्बा मुंडेरा ले गए.

पहचान मिटाने के लिए साहिल ने सुलोचना के चेहरे को पत्थर से कुचल दिया. लाश पानी से ऊपर न आ जाए, इस के लिए उन्होंने लाश के साथ एक बड़ा सा पत्थर बांध कर वहीं तालाब में फेंक दी और आश्वस्त हो कर अपनेअपने घर चले गए.

अगले दिन साहिल ने माधवप्रसाद और उस के दोनों दामादों को सुलोचना के गायब होने की सूचना दे दी. उन लोगों को उस ने बताया कि सुलोचना उस से नाराज हो कर बिना बताए कहीं चली गई है. इस के बाद वह ससुराल पहुंचा. साली अर्चना को भी उस ने सुलोचना के गायब होने की बात बताई. वह परेशान हो उठी. उस ने साहिल को धमकी दी कि अगर सुलोचना नहीं मिली तो वह उसे कहीं का नहीं छोड़ेगी. इस से वह घबरा गया.

साहिल की रातों की नींद उड़ गई थी. अर्चना पिता के साथ मिल कर उसे नुकसान पहुंचा सकती थी. हैवानियत भरी सोच जागी तो उस ने उन दोनों को भी रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. साहिल जानता था कि माधवप्रसाद का प्रौपर्टी को ले कर विवाद चल रहा है, इसलिए पूरा शक उस के भाई पर ही जाएगा.

5 जनवरी की रात वह बहनोई योगेश के साथ चाकू ले कर ससुराल पहुंचा. अर्चना कुछ देर में आने की बात कह कर घर से बाहर चली गई थी. उसी बीच घर में रखे एक छोटे मूसल से दोनों ने माधवप्रसाद की हत्या कर दी. इस के बाद दोनों अर्चना के आने का इंतजार करने लगे. अर्चना जैसे ही अंदर आई तो खूनखराबा देख कर शोर मचाने के लिए बाहर की ओर भागी. लेकिन उन दोनों ने उसे पकड़ कर आंगन में गिरा दिया और साथ लाए चाकू से उस की गला काट कर हत्या कर दी. दोनों की हत्या कर के उन्होंने घर में बाहर से ताला लगाया और भाग गए.

साहिल ताला अपने साथ ले कर आया था. घर में बाहर से ताला लगाने की बात उस ने पहले से तय कर रखी थी. पूछताछ के बाद पुलिस ने साहिल की निशानदेही पर सुलोचना की लाश को भी बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

साहिल ने सोचा था कि वह कभी पकड़ा नहीं जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. वह इतना खतरनाक निकलेगा, यह भी किसी ने नहीं सोचा था.

एसएसपी शलभ माथुर ने प्रैसवार्ता कर के इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा किया. दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी. सुलोचना इंसान की परख किए बिना साहिल जैसे रसिकमिजाज की मोहब्बत के जाल में उलझ गई थी. साहिल की भी 2 नावों की सवारी करने की फितरत नहीं रही होती तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती.

परनारी के प्यार में गणेश ने किया कत्ल

दोपहर का वक्त था. वंदना नहा कर बाथरूम से निकली तभी ‘भाभीभाभी’ कहता हुआ गणेश उस के घर आ पहुंचा. उस समय वंदना के शरीर पर मात्र पेटीकोटब्लाउज था. उस के जुल्फों से पानी की बूंदें टपक रही थीं. गणेश की निगाहें वंदना के मखमली बदन पर जैसे पानी की बूंदों की तरह चिपक कर रह गई थीं. गणेश की इस हरकत को वंदना समझ रही थी. वह न तो शरमाई और न ही वहां से भाग कर दूसरे कमरे में गई. बल्कि वह नजाकत से चलते हुए उस के और करीब आ गई. गणेश रिश्ते से उस का देवर लगता था. उन के बीच अकसर मजाक भी होता रहता था. वंदना उस के एकदम करीब आ कर बोली, ‘‘गणेश, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ न.’’

वंदना के कहने के बावजूद गणेश चारपाई पर नहीं बैठा, बल्कि खड़ेखड़े उसे अपलक निहारता रहा. उस के मन में कोई तूफान मचल रहा था. वंदना मादक मुसकान बिखेरती हुई मुड़ी और अंदर वाले कमरे में चली गई. गणेश तब भी अपनी जगह जमा रहा. वंदना कुछ देर बाद बाहर आई तो गणेश की आंखें फिर उस के चेहरे पर टिक गईं. आखिर वंदना से रहा नहीं गया तो उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है गणेश, तुम आज मुझे इस तरह से क्यों देख रहे हो?’’

‘‘बता दूं?’’ गणेश ने वंदना की आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘भाभी, तुम मुझे बहुत खूबसूरत लगती हो. तुम्हारी अदाएं मेरे अंदर बेचैनी पैदा कर रही हैं.’’

गणेश की बात सुन कर वंदना के मन में भी हलचल सी मच गई. वह आगे बढ़ी और गणेश का हाथ थाम कर बोली, ‘‘सच कहूं गणेश, तुम भी मुझे बहुत अच्छे लगते हो. मैं तो तुम्हारे लिए ही सजतीसंवरती हूं. राजू को तो मेरी कद्र ही नहीं है.’’

वंदना के इतना कहते ही गणेश का खुद पर काबू नहीं रहा. उस ने वंदना को अपनी आगोश में भींच लिया. जब 2 जवान बदन मिले तो आग लगनी लाजिमी थी. दोनों हाथ एकदूसरे के बदन पर रेंगने लगे और उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. वंदना से अवैध संबंध कायम होने के बाद तो गणेश ने उस के पति राजू से दोस्ती और बढ़ा ली ताकि दोस्ती की आड़ में उस का खेल चलता रहे. रविवार को राजू की छुट्टी रहती थी. गणेश सुबह ही राजू के घर पहुंच जाता. वह खुद अपने साथ मीट और शराब की बोतल ले जाता. फिर दोपहर को दारू का दौर शुरू हो जाता. राजू को फ्री में पार्टी मिल जाती. वह गणेश के मकसद को काफी दिनों तक नहीं समझ पाया. गणेश और वंदना राजू की इस बेवकूफी पर खुश होते थे.

13 दिसंबर, 2016 की सुबह उत्तर प्रदेश के औरैया जिले से करीब 40 किलोमीटर दूर तिर्वा-बेला रोड पर स्थित रसूखपुर गांव के कुछ लोग फार्महाउस की तरफ जा रहे थे, तभी उन्हें एक लाश दिखाई दी. यह गांव थाना झींझक के अंतर्गत आता था. किसी ने लाश मिलने की सूचना फोन द्वारा थाना झींझक पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव पुलिस बल के साथ गांव रसूखपुर पहुंचे. लाश युवक की थी, जिस की उम्र यही कोई 30-32 साल थी. उस के गले में एक अंगौछा बंधा था, इसलिए लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी. मृतक काले रंग की पैंट, चैकदार कमीज और ग्रे कलर का स्वेटर पहने था. उस के एक पैर का जूता वहीं उतरा पड़ा था. श्रीप्रकाश यादव घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि एक महिला एक बूढ़े व्यक्ति के साथ भीड़ को हटा कर लाश के पास आई. लाश देख कर दोनों फूटफूट कर रोने लगे. पुलिस समझ गई कि मृतक जरूर इन्हीं का संबंधी है. थानाप्रभारी ने महिला को धैर्य बंधा कर पूछताछ की तो पता चला कि लाश उस के पति राजू की थी.

महिला का नाम वंदना था और उस के साथ जो बूढ़ा था, उस का नाम हरीराम था. वह मृतक का बाप था. शव की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने पंचनामा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए औरैया के जिला अस्पताल भिजवा दिया.

पुलिस ने हरीराम की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी. पुलिस ने सब से पहले मृतक की पत्नी वंदना से पूछताछ की. उस ने बताया कि उस का पति सीधासादा आदमी था. उन का न किसी से झगड़ा था और न ही कोई लेनदेन.

वह सुबह काम पर जाते थे तो रात 8 बजे तक घर लौटते थे. लेकिन कल रात वह नहीं लौटे. रात भर वह उन का इंतजार करती रही. सुबह उसे पड़ोसियों से पता चला कि फार्महाउस के पास किसी की लाश पड़ी है तो वह ससुर के साथ वहां पहुंची तो लाश देख कर पता चला कि लाश उस के पति की है. पूछताछ में हरीराम ने बताया था कि राजू एकदम सीधासादा था, जबकि उस की बहू वंदना चंचल स्वभाव की थी. दोनों में ज्यादा पटती नहीं थी. अकसर दोनों में झगड़ा होता रहता था. इस की वजह थी पड़ोसी गणेश का उस के घर आनाजाना था. उसी को ले कर दोनों में झगड़ा होता रहता था. उस ने गणेश पर ही हत्या का शक जाहिर किया.

हरीराम के शक के आधार पर पुलिस ने गणेश के घर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. इस के बाद पुलिस ने वंदना से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि गणेश से उस के नाजायज संबंध थे. लेकिन पति की हत्या किस ने की, यह उसे पता नहीं है. इस के बाद पुलिस ने उसे छोड़ दिया.

18 दिसंबर, 2016 को पुलिस ने मुखबिर से मिली सूचना पर गणेश को झींझक के रूरा रोड स्थित मधुबन होटल से हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से राजू की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने गुनाह कबूल कर के राजू की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

वंदना रसूखपुर गांव के ही रहने वाले दीपचंद की बेटी थी. वंदना के अलावा उन के 2 बेटे और थे. वह खेतीकिसानी कर के अपने परिवार का पालनपोषण करता था. वंदना सयानी हुई तो दीपचंद ने औरैया के ही कस्बा झींझक के रहने वाले हरीराम के बेटे राजू से उस का विवाह कर दिया. राजू के अलावा हरीराम की 2 और बेटियां थीं. राजू कानपुर के दादानगर में स्थित एक प्लास्टिक की फैक्ट्री में नौकरी करता था.

राजू सीधासादा युवक था, जबकि वंदना आकर्षक रूपरंग की तेजतर्रार व चंचल स्वभाव की युवती थी. वह न तो ससुर से परदा करती थी और न ही बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से. उस के इस व्यवहार से उस के सासससुर नाराज रहते थे. उन्हें उस की यह आदत पसंद नहीं थी. आखिर दोनों अलग कमरा ले कर रहने लगे.

सासससुर से निजात मिलने के बाद वंदना और भी स्वच्छंद हो गई. उस का जहां मन होता, घूमने लगी. राजू तो सीधासादा था, उसे उस ने एक तरह से मुट्ठी में कर रखा था. वह जो कमा कर लाता, पत्नी को दे देता था. वंदना 2 बच्चों की मां बन गई.

2 बच्चों की मां बनने के बाद भी वंदना खूब बनसंवर कर रहती थी. जबकि राजू की पत्नी के प्रति रुचि कम हो गई. वह सुबह 8 बजे नौकरी के लिए निकलता तो रात 8 बजे तक घर लौटता था. इस तरह पूरे दिन वंदना अकेली रहती थी.

वंदना के घर के पास ही गणेश रहता था. 24 साल का गणेश काफी स्मार्ट था. 3 भाईबहनों में वह सब से छोटा था. कस्बे की ही एक जनरल स्टोर की दुकान पर वह काम करता था. वह वंदना को भाभी कहता था. देवरभाभी के नाते दोनों में हंसीमजाक भी होती रहती थी. गणेश अकसर वंदना के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में वंदना का झुकाव गणेश की तरफ हो गया. वंदना की हंसीमजाक व छेड़छाड़ से गणेश समझ गया कि वंदना उस से क्या चाहती है. इस के बाद उस के मन में भी वंदना को पाने  की ललक जाग उठी.

आखिर एक दोपहर वह वंदना के घर पहुंचा और अपने दिल की बात उस से कह दी. इस के बाद उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए. फिर तो किसी न किसी बहाने गणेश राजू के घर पहुंच जाता और इच्छा पूरी कर निकल जाता. राजू की गैरमौजूदगी में गणेश का उस के घर आनाजाना लोगों के मन में शक पैदा करने लगा. फिर किसी ने यह बात राजू के कानों में भी डाल दी. पत्नी के बदले व्यवहार से राजू को वैसे ही शक था, पड़ोसी की बात सुन कर वह शक और ज्यादा मजबूत हो गया. वह वंदना और गणेश पर नजर रखने लगा. आखिर एक दिन राजू ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. पत्नी को गणेश के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख कर उस का खून खौल उठा. पति को देख कर वंदना का चेहरा पीला पड़ गया. वहीं रंगेहाथ पकड़े जाने पर गणेश भाग गया.

राजू ने सारा गुस्सा पत्नी पर उतारा. पत्नी को जम कर पीटने के बाद उस ने उसे समझाया, ‘‘मुझे अच्छी तरह पता है कि गणेश मनचला है. दोस्ती का उस ने नाजायज फायदा उठाया. जरूर उस ने ही तुम्हारे साथ ज्यादती की होगी, वरना तुम बहकने वाली नहीं थी. मैं तुम्हें सुधरने का एक मौका देता हूं.’  पति की बातें सुन कर वंदना की जान में जान आई. उस ने पति की हां में हां मिलाई और अपने किए की माफी मांग ली. कुछ दिनों तो सब ठीक रहा. वंदना ने गणेश से दूरी बनाए रखी. पर मौका मिलते ही वह प्रेमी गणेश से फिर मिलने लगी. अब वे पूरी सावधानी बरतते थे. इस के बावजूद एक दिन दोनों को रंगरलियां मनाते राजू ने फिर पकड़ लिया.

इस बार राजू ने वंदना के साथसाथ गणेश की भी जम कर पिटाई की और उसे हिदायत दी, ‘‘तू मेरा दोस्त नहीं दुश्मन है. दोस्त बन कर तूने मेरी इज्जत पर डाका डाला. आस्तीन के सांप तू कान खोल कर सुन ले, आज के बाद अगर तू मेरे घर में दिखाई दे गया तो तेरा काम तमाम कर दूंगा.’’ उस समय तो गणेश और वंदना ने उस से माफी मांग ली थी, पर बाद में वे फिर अपने ढर्रे पर चलने लगे. राजू की धमकी से वंदना और गणेश डर तो गए थे, लेकिन मन ही मन दोनों राजू से खुन्नस रखने लगे थे. राजू पत्नी की इस बेवफाई से इतना टूट गया था कि वह शराब में डूबा रहने लगा. वह गुस्से में अकसर वंदना की पिटाई करता रहता था.

राजू से दोनों ही परेशान थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वे क्या करें? गणेश का एक हमदर्द था. गणेश ने उसे अपनी समस्या बताई तो उस ने समस्या से निजात पाने के लिए राजू को ठिकाने लगाने का सुझाव दिया. गणेश को उस का यह सुझाव पसंद आ गया. योजना के तहत गणेश ने राजू से फिर से दोस्ती गांठ ली. गणेश ने बारबार माफी मांगी तो राजू का गुस्सा ठंडा पड़ गया और उस ने उसे माफ कर दिया. सारे गिलेशिकवे भूल कर दोनों फिर से साथसाथ खानेपीने लगे.

12 दिसंबर, 2016 की रात 8 बजे जब राजू घर लौट रहा था तो झींझक बसस्टैंड के पास उसे गणेश मिल गया. दोनों में बातचीत होने लगी. राजू को शराब की तलब लगी थी, लेकिन उस के पास पैसे नहीं थे. गणेश को ऐसे ही मौके की तलाश थी. बसस्टैंड के पास स्थित शराब की दुकान से गणेश ने शराब की एक बोतल खरीदी. दोनों ने वहीं बैठ कर शराब पी. गणेश ने जानबूझ कर राजू को अधिक शराब पिलाई. शराब पीने के बाद राजू घर की ओर चला तो गणेश उसे बातों में उलझा कर घर के बजाय फार्महाउस की ओर ले गया. फार्महाउस कस्बे के पूर्वी छोर पर स्थित है. कभी यहां अनाज मंडी लगती थी, लेकिन अब यह खंडहर में तब्दील हो चुकी है. शाम ढलते ही यहां सन्नाटा पसर जाता है.

कुछ देर बाद राजू और गणेश फार्महाउस पहुंच गए. उस समय वहां अंधेरा था. उचित मौका देख कर गणेश ने अचानक राजू को धक्का दे कर गिरा दिया. अधिक नशा होने की वजह से राजू उठ नहीं सका. उसी बीच गणेश ने अंगौछे से उस का गला घोंट दिया. राजू की हत्या कर के गणेश घर लौट आया. पुलिस से बचने के लिए वह इधरउधर घूमता रहा. आखिर 5 दिनों बाद मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने गणेश को औरैया की जिला अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. जिस वंदना के लिए उस ने अपने हाथ दोस्त के खून से रंगे, क्या अब वह उस की हो पाएगी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धड़क: इंसानी संवेदनाआं व अहसासों का अभाव..

2016 की मराठी भाषा की सुपरहिट फिल्म ‘‘सैराट’’ का शशांक खेतान ने हिंदी रीमेक ‘‘धड़क’’ बनाया है, जिसे देखकर अहसास होता है कि फिल्मकार ने ‘सैराट’ की ही औनर कीलिंग कर डाली है.  ‘धड़क’ से ‘सैराट’ की रूह गायब है.

कहा जाता है कि ‘समरथ को नहीं दोष गोसांई’..इसीलिए ‘धड़क’ के फिल्मसर्जक ने अपने धन बल का भरपूर उपयोग करते हुए क्षेत्रीय भाषा की अति संवेदनशील व औनर कीलिंग के साथ राजनीतिक व सामाजिक परिवेश पर कुठाराघात करने वाली फिल्म ‘‘सैराट’’ को ‘धड़क’ में तहस नहस कर दिया. फिल्मकार नागराज मंजुले ने जिस कौशल व गहराई के साथ ‘सैराट’ में जातिगत व क्लास के चलते भेदभाव व औनर कीलिंग को पेशकर लोगों को सोचने पर मजबूर किया था,उसमें शशांक खेतान बुरी तरह से पस्त नजर आते हैं. ‘सैराट’ की तरह ‘धड़क’ में प्रेमी जोड़े में डर व निराशा का अहसास उभरता ही नही है.

hindi film review dhadak

फिल्म की कहानी झीलों की नगरी उदयपुर में रहने वाले मधुकर बागला (इशान खट्टर) और राजशाही परिवार के तथा राजनेता रतन सिंह (आशुतोष राणा) की बेटी पार्थवी (जान्हवी कपूर) के इर्दगिर्द घूमती है. मधुकर के पिता का रेस्टोरेंट है.

मधुकर अच्छा कुक और टूर गाइड है. फिल्म की शुरुआत मधुकर के घर से होती है, वह सुबह सुबह सपना देख रहा है कि एक लड़की ने उसके पास आकर कहा कि इसबगोल पी लो, आज जीत उसी की होगी और उसे पुरस्कार वही देगी. खैर, प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचने में देर होने के बावजूद जीत मधुकर बागला की होती है. पुरस्कार देने के लिए रतन सिंह अपने पूरे परिवार के साथ आए हैं. रतन सिंह अपनी बेटी पार्थवी से कहते हैं कि वह मधुकर को पुरस्कार दे. यहीं पर दोनों एक नजर में ही एक दूसरे को अपना दिल दे बैठते हैं. बाद में रतन सिंह अपने भाषण में अपनी प्रतिद्वंदी सुलेखा पर तीखे हमले करते हैं. इधर मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें बढ़ती हैं. पता चलता है कालेज में दोनों को एक ही कक्षा में प्रवेश मिला है.

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जब मधुकर के पिता को इस प्रेम संबंध के बारे में पता चलता है, तो वह मधुकर से कहते हैं कि पार्थवी का परिवार उंची जाति का है, इसलिए उससे दूर रहो. यहां तक कि मधुकर के पिता मधुकर से अपने सिर की कसम ले लेते हैं कि वह अब पार्थवी से बात नहीं करेगा.

उधर पार्थवी को मधुकर का साथ चाहिए. उसे अपनी बात मनवानी आती है. अंततः मधुकर और पार्थवी की मुलाकातें, प्यार की तीखी नोकझोक चलती रहती है. इसकी भनक पार्थवी के भाई व रतन सिंह के बेटे रूप (आदित्य कुमार) को चलती है, तो वह मधुकर को सबक सिखाना चाहता है. पर चुनाव नजदीक होने के कारण मामला ठंडा हो जाता है. इधर रूप की जन्मदिन पर कोठी में आयोजित पार्टी में मधुकर के आने पर मधुकर को ‘किस’ देने की शर्त पार्थवी रखती है. अपने दोस्तों के साथ पहुंचकर मधुकर गाना भी गाता है. अब पार्थवी अपना वादा पूरा करने के लिए मधुकर को लेकर कोठी के एक कोने में जाती है. वह ‘किस’ दे इससे पहले ही रतन सिंह व रूप सिंह पहुंचकर पार्थवी को पकड़कर ले जाते हैं और कमरे में बंद कर देते हैं.

इधर मधुकर व उसके दोस्त भागकर अपने घर पहुंच जाते हैं. चुनाव जीतने के बाद रतन सिंह पुलिस पर दबाव डालकर मधुकर और उसके दोनों दोस्तों को पुलिस थाने मे खुब पिटवाते हैं. इसकी खबर जब पार्थवी को मिलती है, तो वह विद्रोही हो जाती है. पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपनी कनपटी पर बंदूक रखकर अपने पिता रतन सिंह, भाई रूप सिंह व पुलिस वालों को दूर रहने के लिए कह कर मधुकर के साथ भागती है.

मधुकर व पार्थवी पहले मुंबई, फिर नागपुर होते हुए कोलकता पहुंचते है. वहां पर दोनों एक होस्टल में किराए पर कमरा लेकर रहना शुरू करते हैं. मधुकर को एक होटल में तथा पार्थवी को भी एक कंपनी में नौकरी मिल जाती है. उसके बाद दोनो शादी कर लेते हैं. उनका बेटा आदित्य दो साल का हो गया है. उधर पांच साल बाद हुए चुनाव में रतन सिंह चुनाव हार चुके हैं. बीच बीच में पार्थवी अपनी मां से बातें करती रहती है. इधर पार्थिव व मधुकर ने नया मकान खरीदा है और गृहप्रवेश की पूजा है. पार्थवी मां से फोन पर बात करती है, अचानक रतन सिंह फोन छीनकर पार्थवी की बातें सुनते हैं और फिर पार्थवी को जीती रहने का आशीर्वाद दे देते हैं. पर कुछ देर में पार्थवी का भाई रूप सिंह चार पांच लोगों के साथ पार्थवी के घर उपहार लेकर पहुंचते हैं. पार्थवी व मधुकर उनकी आवभगत करते हैं. फिर पूजा के लिए पार्थवी मिठाई लेने जाती है और जब वापस आती है, तो उसके सामने इमारत के नीचे उसके मकान से उसके पति मधुकर व बेटे आदित्य की लाश नीचे गिरती है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ के प्रमोशन के दौरान निर्देशक शशांक खेतान सीना ठोककर दावा कर रहे थे कि यह फिल्म उनकी अपनी आवाज वाली फिल्म है. अपनी इसी बात को साबित करने तथा वर्तमान सरकार की ‘बेटी बचाओ’ मुहीम की वकालत करते हुए शशांक खेतान ने ‘धड़क’ में हीरो व उसके बेटे को मारकर हीरोईन को जिंदा रखा? पर क्या एक इमानदार फिल्मकार के तौर पर उन्हें यह जायज लगा? ज्ञातव्य है कि फिल्म ‘सैराट’ में हीरो व हीरोईन दोनों को हीरोइन का भाई मार देता है और उनका बेटा अनाथ हो जाता है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ न तो संवेदनशील फिल्म बन सकी और न ही इसमें इंसानी भावनाएं ही उभर सकी. कम से कम ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ जैसी फिल्मों के निर्देशक से इस तरह की उम्मीद नहीं थी. ‘धड़क’ देखकर अहसास होता है कि शशांक खेतान के अंदर की रचनात्मकता खत्म हो चुकी है. परिणामतः दो किरदारों के बीच का प्रेम भी दर्शकों के दिलों तक नही पहुंचता. हां फिल्म के परदे पर सिर्फ जोधपुर की सुंदर व खूबसूरत लोकेशन की चमक जरुर है, जिसके लिए शशांक खेतान की बजाय फिल्म के कैमरामैन विष्णु राव बधाई के पात्र हैं. पटकथा के स्तर पर भी कुछ किरदारों को सही ढंग से तवज्जो नहीं दी गयी. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी तो फिल्म का अंत ही है.

फिल्म ‘‘धड़क’’ की शुरुआत बहुत ही धीमी व बोझिल गति से होती है. शायद ‘सैराट’ से अलग ‘धड़क’ लगे इस प्रयास में शशांक खेतान फिल्म व विषयवस्तु के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाए. इंटरवल तक यह फिल्म ‘सैराट’ की तुलना में शून्य साबित होती है. दर्शकों पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं डालती. इंटरवल के बाद फिल्म काफी नाटकीय हो जाती है. फिर भी मानवीय संवेदनाएं व भावनाएं अपना आकार लेती नजर नहीं आती हैं. रोमांस व औनर कीलिंग के साथ क्लास का अंतर, जातिगत भेदभाव, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते लिए जाने वाले निर्णय जैसे मुद्दे भी ठीक से उभर नहीं पाए. फिल्मकार ने जाति के अंतर को महज एक संवाद में कह कर अपना दायित्व निभा लिया है. समसामायिक भारत के सामाजिक परिवेश में जाति का मुद्दा किस तरह गर्म है, इसे दृष्यों के माध्यम से चित्रित करना भी निर्देशक ने उचित नहीं समझा.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो बेहतर काम करते हुए जान्हवी कपूर काफी खूबसूरत लगी हैं. मगर कई दृश्यों में उन्हें काफी मेहनत करने की जरुरत थी.

मधुकर बागला के किरदार में ईशान खट्टर का अभिनय उनकी पिछली फिल्म ‘बियांड द क्लाउड्स’ के मुकाबले कमजोर ही नजर आता है. मधुकर के दोस्तों के किरदार में दोनों कलाकारों ने बेहतर काम किया है.

जहां तक फिल्म के संगीत का सवाल है, तो फिल्म का पार्श्व संगीत ठीक है. मगर फिल्म के गाने प्रभावित नहीं करते. यहां तक ‘सैराट’ के मूल गाने ‘झिंगाट’ का भी ‘धड़क’ में बंटाधार हो गया.

कुल मिलाकर ‘‘सैराट’’ संग तुलना किए जाने पर ‘धड़क’ कहीं नहीं ठहरती. ‘सैराट’ देख चुके दर्शकों की उम्मीदों पर ‘धड़क’ खरी नहीं उतरती है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘धड़क’’ का निर्माण ‘धर्मा प्रोडक्शन’ और जी स्टूडियो ने किया है. फिल्म के निर्देशक शशांक खेतान, कहानीकार नागराज मंजुले, फिल्म ‘सैराट’ पर आधारित, पटकथा लेखक शशांक खेतान, संगीतकार अजय अतुल, कैमरामैन विष्णु राव तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- ईशान खट्टर, जान्हवी कपूर, आशुतोष राणा, अंकित बिस्ट, श्रीधर वाटसर, आदित्य कुमार, ऐश्वर्या नारकर, खरज मुखर्जी व अन्य.

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