एफसीआई परचा लीक : फ्रौड करप्शन अनलिमिटेड

2 अप्रैल, 2018 को दलितों के भारत बंद आह्वान के चलते ग्वालियर शहर में कुछ ज्यादा ही तनाव था, जो जातिगत रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है. मार्च के आखिरी सप्ताह से पुलिस कुछ ज्यादा ही सतर्क थी और मुखबिरों के जरिए लगातार इलाके की टोह ले रही थी. सावधानी बरतते हुए वह रात की गश्त में भी कोई ढील नहीं दे रही थी.

31 मार्च की रात जब एक पुलिस दल पड़ाव इलाके के गांधीनगर स्थित नामी होटल सिद्धार्थ पैलेस पहुंचा तो होटल में अफरातफरी मच गई. आमतौर पर देर रात मारे जाने वाले ऐसे छापों का मकसद देहव्यापार में लिप्त लोगों को पकड़ना होता है, पर इस रात बात कुछ और थी.

सिद्धार्थ होटल ग्वालियर का एक नामी होटल है, जिस की गिनती बजट होटलों में होती है. मोलभाव करने पर इस होटल में डेढ़ हजार रुपए वाला एसी कमरा एक हजार रुपए में मिल जाता है, जिस में वे तमाम सुविधाएं मिल जाती हैं जिन की दरकार ठहरने वालों को होती है.

गरमियों में रात के करीब साढ़े 9 बजे पड़ाव इलाके में चहलपहल शवाब पर होती है. ऐसे में पुलिस की गाडि़यों का काफिला देख राहगीर ठिठक कर देखने लगे कि आखिरकार माजरा क्या है. कोई देहव्यापार का अंदाजा लगा रहा था तो कोई 2 अप्रैल के बंद के मद्देनजर सोच रहा था कि जरूर यहां कोई गुप्त मीटिंग चल रही होगी.

लेकिन दोनों ही अंदाजे गलत थे और जो सच था, वह दूसरे दिन विस्तार से लोगों के सामने आ गया. दरअसल इस होटल में एक और लीक पेपर की स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी. यह पेपर किसी स्कूलकालेज का न हो कर एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) का था. यह जानकारी मिलने के बाद लोगों ने दांतों तले अंगुलियां दबा लीं कि देश में यह हो क्या रहा है. लीक पर लीक… यह तो भ्रष्टाचार की हद है.

छापे की काररवाई देर रात तक चली जिस में पूरे 50 लोगों को पुलिस की एसटीएफ ने गिरफ्तार किया. दरअसल, एसटीफ के एसपी सुनील कुमार शिवहरे को मुखबिर से जो खबर मिली थी, वह एकदम सच निकली.

एफसीआई की यह परीक्षा मध्य प्रदेश में रविवार पहली अप्रैल को होनी थी, जिस में 217 वाचमैन पदों के लिए रिकौर्ड 50 हजार से भी ज्यादा आवेदन आए थे. ग्वालियर के अलावा वाचमैन भरती परीक्षा भोपाल, इंदौर, उज्जैन, सागर, जबलपुर और सतना शहरों में होनी थी. इन शहरों में अनेक परीक्षा केंद्र बनाए गए थे. वाचमैन के पद के लिए शैक्षणिक योग्यता 8वीं पास होना रहती है, इसलिए भी आवेदन उम्मीद से ज्यादा आए थे.

अब तमाम छोटे पदों की भरती के लिए भी लिखित परीक्षाएं होने लगी हैं, जिन का मकसद योग्य उम्मीदवारों का चयन करना होता है. वाचमैन भरती परीक्षा में भी मौखिक परीक्षा यानी इंटरव्यू के पहले लिखित परीक्षा ली जाने लगी है. इस की वजह यह है कि नाकाबिल उम्मीदवारों की छंटनी हो जाती है और तयशुदा पैमाने और पदों की संख्या के अनुपात में वे उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए बुलाए जाते हैं जो लिखित परीक्षा पास कर चुके होते हैं.

वाचमैन भरती परीक्षा में ज्यादा कठिन सवाल नहीं पूछे जाते, क्योंकि इस का मकसद केवल उम्मीदवार का सामान्य ज्ञान, गणित और तर्कशक्ति को आंकना होता है.

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सिद्धार्थ होटल में मौजूद 48 उम्मीदवारों को 2 दलाल अगले दिन होने वाला परचा हल कर के दे रहे थे और उम्मीदवारों को परीक्षा का अभ्यास करा रहे थे कि किस सवाल का सही जवाब क्या है. एसटीएफ की टीम ने जब होटल के एकएक कमरे में जा कर उम्मीदवारों को पकड़ा तो सब के सब बड़ी शांति से प्रश्नपत्र हल करने की प्रैक्टिस कर रहे थे.

अचानक पुलिस को आया देख सभी हड़बड़ा उठे. दरअसल, उन्हें आश्वस्त किया गया था कि परीक्षा देने में उन्हें कोई झंझट नहीं होगा, फिर भी झंझट हो ही गया. वह भी कुछ इस तरह कि ये लोग शायद जिंदगी भर चौकीदारी के नाम से भी कांपते रहेंगे.

थोड़ी देर पहले तक वातानुकूलित कमरों में बैठ कर परीक्षा की तैयारी करना तो ज्यादती होगी, घोटाला करने जा रहे ये लड़के पुलिस को देख कर होटल के हौल में खड़े थरथर कांप रहे थे. इन का रहनसहन देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि इन में से शायद पहले कभी कोई इतने बड़े होटल में गया होगा. और जेल तो शायद ही कभी कोई गया होगा.

एफसीआई में वाचमैन पदों के लिए परीक्षा देश भर में होनी थी. अलगअलग राज्यों में इस की तारीखें अलगअलग रखी गई थीं. मध्य प्रदेश की परीक्षा की जानकारी सिर्फ उन्हीं युवाओं को लगी थी, जो जागरूक हैं और 8वीं या इस से आगे तक पढ़ेलिखे हो कर सरकारी नौकरी की तलाश में रहते हैं.

ऐसे राज्यों में बिहार का नाम सब से ऊपर आता है, जहां के युवा सरकारी नौकरी वाला विज्ञापन देखते ही फौर्म भर देते हैं और परीक्षा की तैयारियां भी शुरू कर देते हैं.

जो 48 लोग परचा हल करते पकड़े गए, उन में 35 बिहार के थे और 13 अन्य राज्यों के थे, मध्य प्रदेश का उन में कोई नहीं था. मध्य प्रदेश का इसलिए नहीं था कि परचा बेचने वाला गिरोह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था. इस गिरोह को डर था कि अगर मध्य प्रदेश के उम्मीदवारों को पेपर बेचा गया तो जरूर पकड़े जाएंगे.

क्योंकि होता यह है कि जिसे पेपर बेचो, वह या तो उस का ढिंढोरा साथियों से पीट देता है या फिर अपने पैसे वसूलने के लिए किसी और को भी बेच देता है, जिस से पेपर लीक होने की संभावनाएं ज्यादा हो जाती हैं.

गिरफ्तार 48 उम्मीदवारों से एसटीएफ ने पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी लागलपेट के सच उगल दिया. यह सच था कि उन्होंने इस पेपर के बाबत गिरोह से 5-5 लाख रुपए में सौदा किया था, लेकिन अभी पूरा भुगतान नहीं किया था. अपनी हैसियत के मुताबिक उम्मीदवारों ने 10 हजार से ले कर एक लाख रुपए तक एडवांस दिए थे. बाकी की राशि चयन हो जाने के बाद देनी तय हुई थी.

बाहरी राज्यों के ये उम्मीदवार कैसे इस गिरोह के संपर्क या चंगुल में आए, यह बात भी कम दिलचस्प नहीं, जिस का खुलासा अगर हो पाया तो उस से न केवल असली मुलजिमों के चेहरे बेनकाब होंगे, बल्कि यह भी साबित होगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें पाताल से भी नीचे पांव पसार चुकी हैं.

48 उम्मीदवारों को पेपर हल कराते जो 2 दलाल पकड़े गए, उन के नाम हरीश कुमार और आशुतोष कुमार हैं. ये दोनों ही दिल्ली के रहने वाले हैं. पूछताछ में इन दोनों ने भी माना कि उन्होंने हल किया पेपर इन लोगों को दिया था और वे कल होने वाली परीक्षा की तैयारी करा रहे थे.

इन दोनों ने बताया कि वे तो सिर्फ निचली कड़ी हैं, जिन का काम उम्मीदवारों को इकट्ठा कर उन्हें पेपर हल कराना था. इस बाबत गिरोह से उन्हें 30-30 हजार रुपए मिले थे. इन दोनों की एक जिम्मेदारी उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र तक रवाना करने की भी थी. सभी उम्मीदवारों के मोबाइल फोन इन्होंने अपने पास रख लिए थे.

केवल मोबाइल फोन ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार कहीं परीक्षा के बाद बाकी के पैसे देने से मुकर न जाए, इसलिए उन्होंने उन के आधार कार्ड और मार्कशीट जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों की मूल प्रतियां भी अपने पास रख ली थीं. तय यह हुआ था कि परीक्षा पास कर लेने के बाद उन्हें इन दस्तावेजों की मूल प्रतियां वापस कर दी जाएंगी.

हल की गई आंसरशीट तो एसटीएफ को मिल गई लेकिन उम्मीदवारों के दस्तावेजों की मूल प्रतियां नहीं मिलीं. आशुतोष और हरीश के मुताबिक, वे दस्तावेज और इकट्ठा किए गए पैसे तो गिरोह का मास्टरमाइंड किशोर कुमार अपने साथ दिल्ली ले गया था.

बीकौम सेकेंड ईयर के छात्र आशुतोष और अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी चलाने वाले हरीश कुमार पुलिस को झूठ बोलते नहीं लगे. लेकिन असली अपराधी या वह कड़ी जिस से असली अपराधी तक पहुंचा जा सकता था, वह किशोर कुमार छापे के कुछ घंटों पहले ही ग्वालियर से निकल चुका था.

यह साफ जरूर हो गया था कि पेपर मध्य प्रदेश से नहीं बल्कि दिल्ली से लीक हुआ था और यह सिर्फ किशोर कुमार के पास था. शुरुआती पूछताछ से इतना ही पता चल पाया कि किशोर दिल्ली में कोचिंग क्लासेज चलाता है.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किशोर कुमार की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, लेकिन यह जरूर उस के बारे में पता चला कि श्योपुर में उस का एक बीएड कालेज भी है और उस के औफिसों में कई नामी नेताओं के साथ फोटो लगे हुए हैं. केंद्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में भी उस की खासी घुसपैठ है.

किशोर कुमार को अंदेशा था कि छापा पड़ सकता है, इसलिए उस ने खिसक लेने में ही भलाई और सलामती समझी. दरअसल, एसटीएफ को काफी पहले से खबरें मिल रही थीं कि यह पेपर लीक होने वाला है.

इस की जिम्मेदारी सुनील कुमार शिवहरे को सौंपी गई तो उन्होंने अपनी टीम में इंसपेक्टर एजाज अहमद, चेतन सिंह बैंस और जहीर खान सहित 2 दरजन पुलिसकर्मियों को शामिल किया. इस टीम के कुछ सदस्यों ने भनक लगने पर इस गिरोह के सदस्यों से उम्मीदवार बन कर संपर्क भी किया था.

गिरोह की तरफ से टीम के सदस्यों को यह जवाब दिया गया था कि अभी उन का काम भोपाल और मध्य प्रदेश में नहीं चल रहा है.

इस जवाब के मायने बेहद साफ हैं कि यह गिरोह कंस्ट्रक्शन कंपनियों और ठेकेदारों की भाषा बोल रहा था, जिस से लगता है कि इस का काम देश भर में कहीं न कहीं चल रहा होता है और अब इस तरह के पेपर भी सोचसमझ कर सावधानी से बेचे जाते हैं. ग्वालियर में पकड़े गए इस का मतलब यह नहीं कि दूसरे शहरों या राज्यों में इन का काम नहीं चलता होगा.

इस फूलप्रूफ तैयारी में अगर पुलिस सेंधमार पाई तो उसे अपने मुखबिरों के साथसाथ खुद की मुस्तैदी पर भी फख्र होना स्वाभाविक बात है. सिद्धार्थ होटल में पहले आरोपियों ने 10 कमरे बुक कराए थे, लेकिन जब उन्हें लगा कि होटल के दूसरे कमरों में ठहरे लोग अड़ंगा बन सकते हैं तो उन्होंने पूरा होटल ही बुक करा लिया था. होटल बुक कराने की वजह उम्मीदवारों द्वारा बीएड की परीक्षा का प्रैक्टिकल देना बताई गई थी.

होटल बुक कराते वक्त इन्होंने मैनेजर शैलेंद्र सिंह को 10 हजार रुपए एडवांस दिए थे और जब पूरा होटल बुक कराया तो 5 हजार रुपए और दिए थे. उम्मीदवारों के आने का सिलसिला 30 मार्च की रात से ही शुरू हो गया था जो 31 मार्च की शाम 6 बजे तक चला.

एसटीएफ की 31 मार्च की कामयाबी मिट्टी में मिलती दिख रही है, क्योंकि दिल्ली के इंद्रपुरी इलाके में स्कूल और कोचिंग सेंटर चलाने वाला किशोर कुमार गिरफ्तार नहीं हो पाया था. छापे के बाद जो हुआ, वह सीबीएसई के 10वीं और 12वीं के पेपर लीक होने जैसा था, जिस से लगता है इस फ्रौड और करप्शन में एफसीआई का रोल भी कमतर शक वाला नहीं है.

किशोर कुमार को पेपर कहां से मिला होगा, फौरी तौर पर तो हर किसी का जवाब यही होगा कि जाहिर है एफसीआई से. क्योंकि परीक्षा तो उस की ही थी. लेकिन ऐसा है नहीं, जिस में कई नए पेच सामने आए. एसटीएफ ने छापेमारी के बाद जब इस अहम मामले से एफसीआई के अधिकारियों को अवगत कराया तो उन की प्रतिक्रिया बेहद निराशा भरी लेकिन चौंकाने वाली निकली.

एफसीआई के मध्य प्रदेश के महाप्रबंधक अभिषेक यादव को यह जानकारी मिल चुकी थी कि विभाग में वाचमैन की परीक्षा के लिए जो 50 हजार से ज्यादा अभ्यर्थी शामिल होने वाले हैं, उस का प्रश्नपत्र लीक हो चुका है.

इस के बावजूद भी उन्होंने परीक्षा रद्द करने की कोई बात नहीं की. बल्कि उन्होंने कहा कि एसटीएफ की काररवाई की रिपोर्ट मिल जाने के बाद अगर जरूरी हुआ तो परीक्षा रद्द कर देंगे. यानी अभिषेक यादव यह मानने से इनकार कर रहे हैं कि पेपर किसी दूसरे शहर में लीक नहीं हुआ होगा. यह उतनी ही बेहूदा बात थी जितनी यह कि पहली बार एफसीआई ने खुद परीक्षा आयोजित कराने के बजाए किसी एजेंसी को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी.

परीक्षा के बाद जब सिद्धार्थ होटल में हल कराए गए पेपरों का मिलान कराया गया तो साबित हो गया कि 80 फीसदी प्रश्न मेल खा रहे थे. यह बात गिरफ्तारी के बाद अभिषेक और हरीश बता चुके थे कि प्रश्नपत्र में बीचबीच में दूसरे सवाल डाल दिए गए थे. जाहिर है ऐसा बाद के बचाव के लिए किया गया था जो खरीदफरोख्त की बात के चलते बेमानी ही है.

एफसीआई के भोपाल कार्यालय के पर्सनल डिपार्टमेंट के डीजीएम जी.पी. यादव भी यह कहते पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहे कि परीक्षा की जिम्मेदारी एक निजी एजेंसी को दी थी, इसलिए गड़बड़ी की वही जिम्मेदार है.

बात बेहद चिंताजदक है कि तमाम कायदेकानूनों को ताक में रखते हुए भोपाल एफसीआई के अधिकारियों ने कोलकाता की एक एजेंसी को परीक्षा का ठेका दे दिया था. जबकि यह परीक्षा अब तक एसएससी कराती रही है. क्या सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए किसी प्राइवेट एजेंसी की सेवाएं लेनी चाहिए, इस सवाल का साफसाफ जवाब कोई नहीं दे पा रहा.

यह ठेका देने का ही नतीजा था कि परीक्षा के लिए जिन लोगों ने आवेदन किए थे, उन में से कोई 2 हजार के डाटा लीक हो गए और मय नामपते व मोबाइल नंबरों के जादुई तरीके से इस गुमनाम गिरोह तक पहुंच गए. गिरोह ने आवेदकों से मिल कर सौदेबाजी की, जिस में 135 आवेदक 5-5 लाख रुपए दे कर 15 हजार रुपए महीने वाली यह नौकरी हासिल करने को तैयार हो गए.

सीधेसीधे गिरोह ने 7 करोड़ रुपए का सौदा कर डाला, जिस से एफसीआई को कोई मतलब नहीं था. शायद ही एफसीआई के ये होनहार अफसर यह बता पाएं कि क्या एजेंसी को यह ठेका भी दिया गया था कि वह आवेदकों का डाटा लीक कर पैसे बनाए?

इस से तो बेहतर होता कि एफसीआई इन पदों की खुलेआम नीलामी ही कर डालता, जिस से उसे करोड़ों की आमदनी होती. लेकिन इस काम को ही अंजाम देने के लिए उस ने एक एजेंसी की सेवाएं लीं. गौर करने वाली बात यह है कि इस एजेंसी को सरकारी नौकरियों में भरती का कोई तजुरबा भी नहीं था.

केंद्र सरकार के इस अहम सार्वजनिक उपक्रम की साख पर आए दिन बट्टा लगता रहा है पर परीक्षा के मामले में पहली बार बट्टा लगा है. इस पर भी नीचे से ले कर ऊपर तक सब खामोश हैं तो लगता है कि लीक अब बड़ा धंधा बन चुका है, जिसे मोहरों के जरिए खेला जाता है. केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने भी बेरोजगार युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करते इस घोटाले से कोई वास्ता नहीं रखा, मानो यह कोई छोटामोटा मामला हो.

अब होगा यह कि आशुतोष और हरीश कुमार जैसे प्यादे कानून की बलि चढ़ जाएंगे और असली गुनहगार कहीं और अगले लीक की तैयारी में जुटे होंगे.

एसटीएफ के मुताबिक लीक पेपरों का सौदा ग्वालियर के अलावा इंदौर, भोपाल और उज्जैन में भी हुआ था, लेकिन गिरफ्तार सिर्फ 48 हुए. 135 में से 87 का पैसा गिरोह डकार गया और अपराधी मौज कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक एफसीआई दोबारा परीक्षा कराने का फैसला नहीं ले पाया था.

एसटीएफ ने हालांकि एफसीआई से जवाब मांगा है, जो जाहिर है गोलमोल ही होगा. परीक्षा कराने वाली एजेंसी के एक कोऔर्डिनेटर संदीप मोगा के मुताबिक, हम डिटेल नहीं दे सकते क्योंकि हम गोपनीयता की शपथ से बंधे हुए हैं. यह गोपनीयता वही थी, जिस के चिथड़े 31 मार्च के छापे में उड़ चुके हैं.

जेल में गैंगवार के मायने

जेलों में मारपीट, मोबाइल से लेकर तमाम अवैध चीजों की बरामदगी आम बात है और हर घटना के बाद प्रशासन का मौन साध लेना भी उतना ही आम है. लेकिन एक अतिसुरक्षित मानी जाने वाली जेल की बैरक के अंदर एक कुख्यात अपराधी को गोलियों से भून देना आम नहीं माना जा सकता, इसलिए बुरी तरह चौंकाता भी है.

उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में पूर्वांचल के कुख्यात माफिया डौन प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी की जिस तरह हत्या हुई, उसने सूबे की कानून-व्यवस्था के साथ ही जेलों में अव्यवस्था की पोल भी खोल दी है. तमाम आशंकाओं और आरोपों के बीच मुन्ना बजरंगी रविवार को ही झांसी जेल से बागपत जेल लाया गया था.

उसे पूर्व बसपा विधायक लोकेश दीक्षित से रंगदारी मांगने के आरोप में सोमवार को कोर्ट में पेश होना था. जेल से पेशी पर जाते या लौटते वक्त बंदियों पर हमले नई बात नहीं, लेकिन पेशी से पहले और एक ही दिन पूर्व दूसरी जेल से लाए गए माफिया की बैरक में ही इस तरह हत्या कई सवाल छोड़ती है.

सब कुछ इतना फिल्मी है कि किसी को इल्म भी न हुआ और एक गहरी पटकथा लिखकर उसे अंजाम भी दे दिया गया! इस हत्याकांड ने लखनऊ के सीएमओ हत्याकांड के अभियुक्त डिप्टी सीएमओ योगेंद्र सचान की लखनऊ सेंट्रल जेल में ‘आत्महत्या’ की याद दिला दी, जिसके बारे में माना गया कि तमाम राज उनके साथ खत्म हो गए थे.

उत्तर प्रदेश पुलिस का बड़ा सिरदर्द मुन्ना नवंबर 2005 में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद सुर्खियों में आया. इस हत्याकांड में राय के अलावा 6 और लोग मारे गए थे. यह इतना क्रूर हत्याकांड था कि हर मृतक के शरीर पर 60 से सौ गोलियों के निशान पाए गए थे.

सच है कि अपने मुंह से 20 साल के आपराधिक जीवन में 40 हत्याओं की बात करने वाले मुन्ना की फरारी से लेकर उसके एनकाउंटर में बचने और फिर गिरफ्तारी की कहानी जितनी फिल्मी है, उसका अंत भी उतना ही फिल्मी हुआ.

यह हत्याकांड जेल व्यवस्था पर ऐसा तीखा सवाल है, जिसके जवाब जल्द तलाशने होंगे. जब जेल की बैरक में कोई गोलियों से भूना जा सकता है, तो मान लेना चाहिए कि अपराधियों की ही पौ बारह नहीं है, प्रशासन-पुलिस की नाक भी इस गर्त में गहरे डूबी है.

यह इसलिए और भी संगीन हो जाता है कि दस दिन पहले ही मुन्ना की पत्नी ने उसकी हत्या की साजिश रचने का आरोप एसटीएफ पर लगाया था और उसे पेशी के लिए जेल से बाहर न ले जाकर वीडियो कान्फ्रेंसिंग से ही सुनावाई की गुहार लगाई थी.

यह वक्त किसी बड़ी घटना के बाद जेल की सुरक्षा व्यवस्था और चौकसी खंगालने की बार-बार की जाने वाली कवायद के तौर पर सक्रिय होने का नहीं, इस खतरे के प्रति भी सचेत होने का है कि अगर हथियार हमारी जेलों में इस तरह पहुंच सकते हैं, तो वह दिन दूर नहीं, जब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी शायद जेलों के भीतर निपटाए जाने लगें और एक नए तरह का संकट सामने आए.

इस हत्याकांड के और भी निहितार्थ हैं. राजनीति में पैठ रखने वाले इस माफिया सरगना की हत्या के बाद पूर्वांचल के आपराधिक गैंगवार और माफिया वल्र्ड में तो नए समीकरण बनेंगे ही, जातीय गुणागणित वाला पूर्वांचल का राजनीतिक परिदृश्य भी इससे कहीं गहरे प्रभावित होने जा रहा है, इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता.

मैया मोरी गांव सहा न जाए

लो जी, फिर मुझ दुखियारी के फोन पर बेटे की काल आ गई. सच कहूं, जबजब मेरे बेटे का गांव से फोन आता है, तबतब मेरा तो यह फटा कलेजा सुनने से पहले ही मुंह को आ जाता है.

मेरा बेटा दिल्ली छोड़ कर जब से गांव गोद लेने गया है न, अपनी तो भूखप्यास सब खत्म हो गई है. दिनभर में चारचार बार फोन रीचार्ज कराना पड़ रहा है.

वाह रे बेटा, जवानी में ऐसे दिन भी तुझे देखने थे. अभी तो चुनाव होने में 5 साल हैं. पता नहीं, तब तक और क्याक्या दिन देखने पड़ेंगे.

बुरा हो इस सरकार का, जो मन में आए किए जा रही है. हम विपक्ष वालों तक के हाथों में कभी झाड़ू पकड़वा देती है, तो कभी फावड़ा. कल को न जाने क्या हाथ में पकड़वा दे.

अब देखो न, मेरे फूल से बेटे को गांव गोद लेना पड़ा. मैं ने उसे यह करते हुए बहुत समझाया कि बेटा, उन्हें लेने दे 4-4 गांव गोद. तेरे दिन तो अभी मां की गोद में बैठने के हैं. मैं तेरी जगह एक के बदले 2 गांव गोद ले लेती हूं, पर बेटा नहीं माना तो नहीं माना.

लाड़ला है, सो जिद्दी है. बड़ा भी हो गया है. पर मां के लिए तो बेटा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, जब तक उस की शादी नहीं हो जाती, तब तक वह बच्चा ही रहता है.

अब सरकार को कोई कैसे समझाए कि उस के भी तो अभी गोद में बैठनेखेलने के दिन हैं. आज तक वह किसी न किसी की गोद में ही लोटता रहा. उसे आज तक हम ने गोद से उतारा ही कब? उस ने उतरना भी चाहा, तो हम ने उतरने न दिया.

उसे क्या पता कि किसी को गोद में कैसे बैठाते हैं? वह तो पड़ोसियों तक के बच्चों को गोद में लेने से मना करता है. डरता है कि कहीं उस पर किसी बच्चे ने शूशू कर दिया तो…

बेचारा, पता नहीं गोद में गांव ले कर कैसे रह रहा होगा? हाय रे यह जनसेवा, उसे तो ठीक से अभी गोद में बैठना भी नहीं आता और बेचारा वह.

अब जा कर कोई उन से पूछे कि कल तक जो मेरी गोद में रहा, उसे क्या आता है किसी को अपनी गोद में लेना? पर नहीं. वे सुनने वाले कहां. उन के तो आजकल कहने के दिन हैं और सुनने के अपने.

‘अरे, क्या हाल है बेटा? गांव में सब ठीक तो है?’

‘मांमां, फिर दिक्कत आ गई है.’

‘अब क्या दिक्कत आ गई मेरे फूल से लाल को?’

‘मां, गांव में बिजली नहीं है. यहां तो सरकारी मुलाजिम तो दिखते ही नहीं, पर सूरज भी अपनी मरजी का है. बिजली वालों ने बस बिजली की तारें ही पेड़ों से बांध रखी हैं और उन पर गांव वाले अपने कपड़े सूखने के लिए डालते हैं.

‘गांव में पानी के लिए पाइप तो है, पर उन में पानी नहीं आता. गांव वाले उन में गागरों से पानी डाल कर फिर नल से भरते हैं.’

‘यह गागर कैसी होती है बेटा?’

‘मां, मेरे पास उसे समझाने के लिए शब्द नहीं हैं. मैं मोबाइल पर फोटो भेज दूंगा, तो किसी से पूछ लेना. पर इस अंधेरे का क्या करूं मां?

‘यहां तो रात को तो अंधेरा रहता ही है, पर दिन में भी अंधेरा ही रहता है. आप के बिना बहुत डर लग रहा है. मन कर रहा है कि गांव किसी और की गोद में बैठा कर दिल्ली आ जाऊं.

‘बस, मुझे नहीं बनना अब कुछ… ऐसा नहीं हो सकता मां कि हम मोदी अंकल की दिल्ली वाली गली ही गोद ले लें? यहां तो कोई मेरी गोद में आ कर शूशू कर देता है, तो कोई…’

‘चिंता मत कर मेरे लाल. कुरिअर से अभी हगीज भिजवा रही हूं. हर पैकेट के साथ 10 रुपए का मोबाइल रीचार्ज फ्री.’

‘पर मां, क्या करना फ्री रीचार्ज का. यहां तो मोबाइल सिगनल पेड़ की चोटी पर चढ़ कर ही आता है. वहीं से चढ़ कर आप को फोन किया है मां. अब हम से यह गांव और नहीं. सहा जाता. हम बस अभी बैलगाड़ी से…’

स्टूडैंट्स चमके मगर जौब नहीं

इस बार 10वीं व 12वीं परीक्षाओं के अलगअलग परीक्षा बोर्डों के परिणाम लगभग एकसाथ आए और 99.3 से 99.6 फीसदी तक अंक पाने वाले ही फर्स्ट रैंक पा सके. अधिक आश्चर्य की बात यह रही कि ज्यादातर बोर्डों की परीक्षाओं में लड़कियों को ही पहला रैंक मिला. एक और बात जो सामने आई, वह यह कि अब गरीब घरों के बच्चे बहुत अच्छे नंबर ला रहे हैं. अंगरेजी मीडियम स्कूलों के बोर्डों में भी जो मैरिट लिस्ट में आए हैं उन में लड़कियां और साधारण पैसे वाले परिवारों के बच्चे हैं जबकि बेहद अमीर घरानों के बच्चे लाख कोचिंग के बावजूद रैंकों में नहीं दिखे.

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों वाले परीक्षा बोर्ड ने अपने परिणाम इस बार जाति के आधार पर बांट कर घोषित किए. पर इस से यह साफ हुआ कि अब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग के बच्चों के भी जम कर नंबर आए और उन की संख्या सामान्य वर्ग के छात्रों के फर्स्ट डिविजन पाने वालों से कहीं ज्यादा है.

रैंक, लड़कियां और गरीब घरों के बच्चों की शिक्षा के प्रति दिलचस्पी देखते हुए साफ है कि अगले 5-7 वर्षों में लाखों नहीं, करोड़ों फर्स्ट डिविजन लाने वाले विद्यार्थी नौकरियों के लिए कतार में खड़े होंगे. वे आरक्षण के हकदार हों या न हों, उन की ऐबिलिटी व कैपेबिलिटी बराबर की सी होगी. सरकार के लिए यह चैलेंज होगा कि वह उन्हें जौब्स दे. उन की मेहनत का फल उन्हें मिलना चाहिए. पर सरकार की जो नीतियां हैं, उन के मद्देनजर उन युवाओं को न तो नौकरियां मिल पाएंगी और न उन्हें अपने काम शुरू करने के मौके. बस, वे ईकौमर्स कंपनियों का माल पीठ पर लादे घरघर पहुंचाते नजर आएंगे.

सरकार की लचर नीतियां पढ़ाई का ऐसा नुकसान करने वाली हैं कि देश किसी केऔस में डूब जाए तो सरप्राइज न होगा. आगे की गुफा में अंधेरा है और अंधेरे के आगे रोशनी नहीं, यह साफ लग रहा है.

इस गाने पर उर्वशी रौतेला ने किया जबरदस्त डांस

उर्वशी रौतेला अपने फिटनेस वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. हाल ही में उनके एक डांस वीडियो ने धूम मचा दी है. उर्वशी के इंस्टा अकाउंट पर शेयर किए गए इस वीडियो में एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के हिट नंबर पर डांस करती नजर आ रही हैं. ये गाना रामलीला फिल्म का ढोल बाजे है.

उर्वशी ने वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, संजय लीला भंसाली के गानों पर परफौर्म करने से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता है. मुझे अपने स्कूल का वो दिन आज भी याद है जब मैंने ‘निम्बूड़ा’ गाने पर डांस किया था और पहला प्राइज जीता था. अभी पता चला है कि हम दोनों के जन्मदिन भी एक दिन के अंतर पर आते हैं.”

उर्वशी का डांस दीपिका की टक्कर का है. इस वीडियो को फैंस ने भी खूब पसंद किया है. उर्वशी के डांस वीडियो के साथ देवदास फिल्म में माधुरी के लुक में तैयार कई तस्वीरें भी पोस्ट की हैं. ये तस्वीरें हरा रंग डाला गाने से प्रेरित हैं. हरे रंग का लहंगा पहने उर्वशी ने पोस्ट की गई तस्वीरों में लिखा, ना चांद हथेली पर सजाया…

उर्वशी रौतेला के डांस स्टेप्स वाकई कमाल हैं और उर्वशी पूरी एनर्जी के साथ डांस कर रही हैं. वीडियो में ये खुलासा नहीं किया गया है कि उर्वशी किसलिए इस डांस की तैयारी कर रही हैं.

इंटरनेट पर धमाल मचा रहा है यह भोजपुरी गाना

एक्टर और सिंगर रितेश पांडेय भोजपुरी फिल्म जगत का एक मशहूर नाम है. रितेश बहुत ही जल्द अपनी अवाज और अभिनय से लोगों के दिल में जगह बनाने में कामयाब रहे और यही वजह है कि यूट्यूब पर उनके गाने का वीडियो काफी पसंद किया जाता है. इसी क्रम में रितेश पांडेय का एक गाना ‘पियवा से पहिले 2’ यूट्यूब पर काफी तेजी से देखा जा रहा है. Wave Music द्वारा इस साल अप्रैल में अपलोड किए गए इस वीडियो को अब तक 41,595,771 बार देखा जा चुका है. बता दें, रिलीज से लेकर अब तक इस गाने की लोकप्रियता बरकरार है.

बता दें, रितेश पांडेय इन दिनों अपनी फिल्म ‘गिरफ्तार’ को लेकर काफी व्यस्त चल रहे हैं. इस फिल्‍म में रितेश पांडेय के अलावा राकेश मिश्रा, अंजना सिंह, पूनम दुबे, संजय पांडेय, मनोज टाइगर, योगेश सिंह भी मुख्‍य भूमिकाओं में नजर आएंगे. इस फिल्म के निर्माता राहुल शाहिनी हैं और सह निर्माता अमित सिंह है. इस फिल्म के निर्देशक रवि सिन्हा हैं. बात करें गीत-संगीत की तो इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर छोटे बाबा हैं और गानों को मनोज मतलबी व सुमित कुमार चंद्रवंसी ने लिखा है.

फिल्‍म की स्‍टार कास्‍ट से ही पता चलता है कि फिल्‍म काफी अच्‍छी होने वाली है. फिल्म के निर्माता राहुल सहनी के अनुसार फिल्‍म के गाने भी काफी सुरीले होंगे, जो लोगों को काफी पसंद आने वाले हैं. वहीं, निर्देशक रवि सिन्‍हा की मानें तो फिल्‍म की कहानी काफी मजबूत और एंटरटेनिंग है. यह अपने आप में ही भोजपुरी के अन्‍य फिल्‍मों से अलग है. इसमें एक्‍शन, इमोशन, लव, रोमांस को अलग ही तरह से प्रजेंट किया जाएगा, जो अब तक दर्शकों ने नहीं देखा होगा.

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इंटरनेट पर आग लगा रहा सपना चौधरी का यह भोजपुरी गाना

भोजपुरी फिल्‍म ‘बैरी कंगना-2’ में रवि किशन तंत्र शक्ति से लोहा लेते नजर आएंगे. फिल्‍म की कहानी तंत्र विद्या और पुरानी मान्‍यताओं पर आधारित है, जिसमें अशोक अत्री ने मौर्डन टच दिया है. अब इस फिल्म का एक नया गाना ‘मेरे सामने आके’ रिलीज कर दिया गया है, जिसमें हरियाणा की मशहूर डांसर सपना चौधरी डांस करते हुए नजर आ रही हैं. एक दिन पहले रिलीज किए गए इस गाने को यूट्यूब पर अब तक एक लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

प्रोड्यूसर विनोद पांडे और अशोक श्रीवास्तव ने इस फिल्‍म को भव्‍य बनाने के लिए कई नए प्रयोग किए हैं, जिनमें से एक हरियाणवी डांसर सपना चौधरी का स्‍पेशल डांस प्रमुख है. उनका दावा है कि ‘बैरी कंगना- 2’ साल 2018 की सबसे बड़ी भोजपुरी फिल्‍म है. बता दें, ‘बैरी कंगना- 2’ में रवि किशन काफी फ्रेश और स्‍टाइलिस नजर आने वाले हैं. वहीं, फिल्‍म की अभिनेत्री शुभी शर्मा की भूमिका पर सस्‍पेंस बरकरार है. इसके अलावा रवि किशन ‘बैरी कंगना- 2’ में काजल राघवनी के साथ इश्‍क फरमाते नजर आएंगे.

गौरतलब है कि फिल्‍म ‘बैरी कंगना -2’ के लेखक–निर्देशक अशोक अत्री और प्रोड्यूसर विनोद पांडेय और अशोक श्रीवास्तव हैं. स्क्रिप्‍ट लिखा है मोहन वर्मा ने और फिल्‍म के प्रचारक संजय भूषण पटियाला हैं. फिल्‍म में मेगा स्‍टार रवि किशन के अलावा कुणाल सिंह, सपना चौधरी, काजल राघवानी, शुभी शर्मा, आशिश सिंह बंटी, अवधेश मिश्रा, तृषा खान, मनोज द्विवेदी, उमेश सिंह आदि कई कलाकार नजर आएंगे.

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अध्यात्म से अकड़ तक : जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं

कौर्पोरेट गुरु डबल श्री ने फरमाया है कि हिंसक नक्सली इलाकों के सरकारी स्कूल बंद कर वहां निजी स्कूल खोले जाएं क्योंकि इन इलाकों के सरकारी स्कूलों से आतंकी पैदा होते हैं. हवाई सफर करने वाले, एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर दुखी जनता को जीने की राह दिखाने वाले फाइवस्टार संत ने यह कह कर गरीबों की देशभक्ति पर वार किया है. यदि उन की बात पर विश्वास किया जाए तो इन इलाकों के सरकारी स्कूल हर साल आतंकी ही उगल रहे हैं और यदि डबल श्री की राय नहीं मानी गई तो देश का आधा हिस्सा आतंकियों के हाथों में जाने वाला है. डबल श्री का स्तर रामदेव और आसाराम जैसे बाबाओं से भी ऊंचा है. जहां रामदेव और आसाराम के भक्त कमजोर वर्ग और कमजोर दिमाग के हैं वहीं डबल श्री के भक्त मोटी जेब वाले हैं. दिमाग के बारे में कहा नहीं जा सकता क्योंकि अकसर ये आईआईटी या आईआईएमशुदा होते हैं, जिन्हें जमीन से ऊपर माना जाता है. इन की सनक को देश के शिक्षा जगत का बंटाधार करने को कमर कस कर तैयारी में लगी सरकारें इज्जत देती हैं. आखिरकार इन के अध्यात्म गुरु ने ही बिचौलिया बन कर कई बार उन की नाक कटने से बचाई है.

डबल श्री का सरकारी स्कूल बंद करवाने की सनक के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जताना चाहते हों कि सरकारी स्कूलों से सरकार को मिलता क्या है? उलट, अपनी जेब से मास्टरों को वेतन देना पड़ता है. उधर, निजी स्कूल कमाई का सब से फायदेमंद धंधा है. पाठ्यक्रम के बाहर ढेर सारी गैरजरूरी किताबें रखवाने और हर सप्ताह तीसरी कक्षा के बच्चों से प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार करवाने से किताब माफिया और स्टेशनरी माफिया की रोटीरोजी चल रही है. इस बहाने शिक्षाविदों और अफसरों की भी कमाई हो जाती है.

सरकारी स्कूलों के अध्यापक महज मास्टर होते हैं, गुरु नहीं. सालभर वे या तो जानवर गिनते हैं या फिर गटरें और शौचालय. 10 साल में एक बार वे इंसान भी गिन लेते हैं. मतदाता सूची बनाने के काम में भी ये ही जोत दिए जाते हैं. बारबार होने वाले चुनावों में वे ड्यूटी भी दे आते हैं. बचाखुचा समय शिक्षा में जरा भी दिलचस्पी न लेने वालों को पढ़ाने में लगाते हैं. और पढ़ाना भी ऐसा कि सभी ढक्कन छात्रोंछात्राओं का उत्तीर्ण होना जरूरी है वरना इंक्रीमैंट को लाल झंडी. अब तो अंगरेज आकाओं की देखादेखी सरकारें भी अध्यापकों को ठेके पर रखने लगी हैं. यानी, सूखा वेतन. भविष्य निधि या ग्रैच्युटी भूल जाओ. पक्की नौकरी की कोई गारंटी नहीं. बेइज्जती न हो, इसलिए इन्हें संविदा शिक्षक कहा जाता है. यानी, सम्मानित हम्माल. ऐसे में बेचारे मास्टर से ही देश का भविष्य संवारने की उम्मीद की जाती है, जो सरासर अनुचित है.

सरकारी स्कूलों के भवनों की हालत तो ऐसी है कि पुरातत्त्व विभाग वाले इन्हें आसानी से धरोहर की श्रेणी में रख लें. पुताई की बात तो जाने ही दीजिए, कई स्कूलों में दरवाजेखिड़कियां तक नहीं हैं. रात को शराबखोरी होती है. नशीली दवाओं और शरीर का व्यापार होता है. फर्श उखड़ा होता है. लड़कियों के लिए पेशाबघर नहीं होते. नेताओं के जन्मदिन और विवाह की पार्टियां होती हैं. बरातें ठहराई जाती हैं. ऐसा नहीं कि हमारे शिक्षा शिकारी इस सब से अनजान हैं. अखबारों के पृष्ठ कई बार रंगे जा चुके हैं. लेकिन अध्यापकों को गधाहम्माली में जोते रखने वाले ये फाइवस्टार विद्वान इसे कोई मुद्दा नहीं मानते. डबल श्री ने शिक्षा के अधिकार को शायद शिक्षा की दुक?ान का अधिकार समझ लिया हो. उन जैसे लोगों को स्कूलों में पढ़ाने के लिए अच्छा वेतन मिलता है. क्यों न मिले? फीस जो जबरदस्त होती है.

घोषणा करते समय अध्यात्म गुरु भूल गए कि आतंकी इलाकों के मातापिता के पास क्या इतनी फीस देने की हैसियत है? क्या प्राणायाम से उन की गरीबी दूर हो जाएगी? क्या सुदर्शन क्रिया उन्हें अच्छा जीवन देगी? क्या ओउम उच्चारने से उन की सेहत ठीक हो जाएगी? डबल श्री का कहना है कि सदैव मुसकराते रहना चाहिए. फिर ये गिनती कर बताते हैं कि बचपन में हम इतनी बार मुसकराते हैं, जवानी में उस से कम और बुढ़ापे में उस से भी कम. लगता है उन्होंने मुसकराहट गिनने में पीएचडी की है.

यदि कोई इन का कहना मान कर किसी की मैयत में मुसकराता रहे तो उस के साथ क्या होगा, यह डबल श्री के अलावा सभी को मालूम है. अध्यात्म की दुकानें लगाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि ये फाइवस्टार स्कूल खोलने के अलावा कितना सामाजिक काम करते हैं. उस में भी बच्चे भिश्तियों की तरह पीने का पानी अपने घर से ले जाते हैं. सिर्फ गरमी के दिनों में रेलवेस्टेशनों पर प्याऊ चालू कर देने से ही समाजसेवा नहीं होती. भजन में तालियां पीटने से किसी की हालत नहीं सुधरती. उस के लिए कर्म करना होता है. जो भारत में भाग्य के सामने ओछा माना जाता है. देश को पुराने काल में बांधे रखने वालों को देख कर ही स्टीव जौब घबरा कर स्वदेश चला गया था. उस ने सूचना क्षेत्र में जो क्रांति की, क्या वह धार्मिक कर्मकांड के कीचड़ में रह कर हो पाती? उस का भाग जाना दुनिया के लिए फायदेमंद रहा. यहां रहता तो वह क्या कर पाता, सिवा भभूत रमा कर, बाबा बन कर उपदेश पिलाने के.

आज महंगी शिक्षा ही बेहतर शिक्षा का पैमाना मानी जाती है. यदि ऐसा है तो इन फाइवस्टार स्कूलों में पढ़ने वाले अब तक तो भारत की तसवीर बदल चुके होते. इन का हर विद्यार्थी आईटी के ख्वाब देखता है. हर साल कितने ही आईआईटियंस निकलते रहते हैं. डिगरी मिली नहीं, कि वीजा के लिए भटकते रहते हैं. पासपोर्ट पर ठप्पा लगवाने के लिए बेताब हो उठते हैं. इस से तो सरकारी स्कूलों से निकले विद्यार्थी ही अच्छे जो देश के लिए कुछ करने को तैयार रहते हैं. फौज में देखिए, पुलिस में देखिए, ज्यादातर जवान सरकारी स्कूल वाले ही मिलेंगे. फाइवस्टार स्कूलों के विद्यार्थियों को देश से कोई मतलब नहीं होता. वास्तविकता का सामना करने की उन में हिम्मत नहीं होती. देश में शिक्षा के अड्डे दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं और सरकारी स्कूल बंद होते जा रहे हैं. सरकार भी तो यही चाहती है कि गरीबों के बच्चे पढ़ें नहीं. यदि वे पढ़लिख कर आगे आ गए तो उन के कभी पूरे न किए जाने वाले वादों का क्या होगा?

निजी स्कूलों में विशेष अतिथि बन कर भाषण पिलाने वाले हमारे नेतामंत्री कभी सरकारी स्कूलों के बारे में चिंता नहीं करते. हां, मास्टरजी का स्थानांतर करवाने या रुकवाने में जरूर दिलचस्पी लेते हैं. छोटे शहरों में दो सौ से भी ज्यादा बड़ी निजी शिक्षण संस्थाएं… माफ कीजिए इंस्टिट्यूट हैं. उन्हें सस्ती जमीन मिल जाती है. नैपोलियन के शब्दकोष में असंभव शब्द नहीं है तो इन के पाठ्यक्रम में अनुत्तीर्ण शब्द नहीं है. सब के सब पास होते हैं. क्यों न हों जब लक्ष्मी ने सरस्वती को खरीद लिया है तो फिर किस में हिम्मत है कि रोक ले?

अब राष्ट्रीय संत की बात करें. वैसे तो हर तिलकधारी खुद को राष्ट्रीय संत कहलवाने की इच्छा रखता है. ये लोग अमीरों को बताते हैं कि जिंदगी कैसे जिएं. ज्ञान देने की बाकायदा तगड़ी फीस लेते हैं, देने वाले की जेब जो भरी हुई है. हमारे यहां विद्यादान को महादान कहा जाता है. लेकिन अब यह महाव्यापार बन गया है. बाप की अथाह कमाई वाले अमीरजादों के पास फुरसत ही फुरसत है.

मनोरंजन और जनसंपर्क बढ़ाने के लिए सत्संग से बढ़ कर और क्या विकल्प हो सकता है. सभी संत कहे जाने वाले महाव्यापारी हैं. इन का सारा कामकाज इंग्लिश में चलता है. यानी, देश से वे वैसे ही कटे हुए हैं. वे कभी गंदी बस्तियों में नहीं जाते. न ही उन के शिष्य जाते हैं. ध्यान का कैंप लगाते हैं लेकिन मलिन बस्तियों में सफाई कैंप नहीं लगाते. जगहजगह शिक्षा के अड्डे तो खोलते हैं लेकिन गरीब बच्चों की फीस का इंतजाम नहीं करते. जो कभी पैदल नहीं चलते, हमेशा एसी गाडि़यों या हवाई जहाज में उड़ते फिरते हैं, उन्हें जमीनी हकीकत कैसे मालूम हो सकती है?

जहां भी जाना हो तो दस दिन पहले ही शहर की दीवारें इन के शुभागमन के पोस्टरों से रंग दी जाती हैं. फिर ये महाराजा की तरह अपने लावलशकर के साथ पधारते हैं. हवाई अड्डे पर इन का शानदार स्वागत होता है. इन के प्रवचनों से फायदा होता किस को है? शिक्षा के नएनए अड्डे खोलने के लिए ये शहर से दूर सस्ते में जमीन लेते हैं. कुछ साल चलाया, फिर ऊंचे दाम पर बेच देते हैं. झाडि़यां और पेड़ शिक्षा के नाम पर बलिदान कर दिए जाते हैं. गांवों में शौचालय नहीं हैं. पहले बेचारी महिलाएं झाडि़यों की आड़ में निबट लेती थीं लेकिन शिक्षा माफिया उन का लाज का यह परदा भी छीन लेते हैं.

कितने संतों ने अपने अड्डे बनाने की जगह महिला शौचालय बनाने की समझ दिखाई है? इन्हें जगहजगह आश्रम बनाने की क्या जरूरत है. यह साफ जाहिर है कि ये सस्ते में जमीन खरीदना चाहते हैं ताकि वे अपना धंधा आगे बढ़ा सकें. ये धर्म के व्यापारी अपनी पत्रिका भी निकालते हैं और विज्ञापन बटोरते हैं. पत्रिका की सामग्री एकदूसरे से ली हुई होती है. नया लाएंगे कहां से? लगे हाथों दवाएं भी बनाने लगते हैं. आयुर्वेद और हर्बल के नाम पर पता नहीं क्याक्या बनातेबेचते हैं.

ये अध्यात्म गुरु अपनी मार्केटिंग के लिए महंगी मार्केटिंग एजेंसी हायर करते हैं. जिस शिविर में इन के त्याग, ईमानदारी, अपरिग्रह के डोज दिए जाते हैं, वहां इन के चित्र, प्रवचनों की सीडी, मालाएं, अंगूठियां, झोले, बटुए, किताबें, दवाएं वगैरा भी बेची जाती हैं. इन पर न तो बिक्रीकर लगाया जाता है और न ही सेवाकर. कमाई का तो हिसाब ही नहीं. निर्मल बाबा ने तो अपने बटुए का नाम तक बरकत का बटुआ रख दिया था. बटुआ खरीदने वाले की बरकत हो या न हो, पर बाबा की जेब जरूर भर जाती है. टीवी चैनलों पर खरीदे हुए भक्त प्रायोजित सवाल पूछते हैं और बाबा उन के जवाब देते हैं. सालभर में ऐसे कई हंगामे होते हैं और जनता अपनी गाढ़ी कमाई इन ठगों के हवाले कर देती है. झबरैले साईं बाबा की पोल उस की मौत के बाद खुल गई कि उसे तरहतरह के विदेशी परफ्यूम लगाने का शौक था, वह सोने के पलंग पर सोता था, उस

के शयनकक्ष से करोड़ों का बेहिसाब धन मिला. नित्यानंद के पुरुषनापुरुष होने के किस्से कई दिनों तक जबान पर चढ़े रहे. कई संत शराबकबाब और शबाब के आशिक हैं. धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक धाक जमाने के लिए संत बनने से अच्छा और सस्ता कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सही है, जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं.

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