रिश्तों को कलंकित करने वाला प्यार

कानपुर का एक कस्बा है सिकंदरा. उसी से सटा एक गांव है सहजपुर. जिस में श्याम सिंह का परिवार रहता था. उन के परिवार में पत्नी बेगवती के अलावा 2 बेटियां कमला, विमला और एक बेटा निर्मल था. श्याम सिंह खेती करते थे. उसी की आय से ही परिवार का भरणपोषण होता था. श्याम सिंह खुद पढ़ेलिखे इंसान थे, इसलिए बच्चों को भी पढ़ायालिखाया था. कमला की शादी उन्होंने औरेया जिले के फरीदपुर गांव में नाथू सिंह के साथ की थी तो विमला की शादी कानपुर (देहात) के थाना सिकंदरा के जाटियापुर गांव के शिवनाथ सिंह के साथ, बेटा पढ़लिख कर फौज में भरती हो गया था.

श्याम सिंह की मौत हो गई तो घरपरिवार की जिम्मेदारी बेगवती ने संभाल ली थी. विमला के 3 बच्चों में अनुपम सब से छोटी थी. दसवीं पास कर के उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. उस की मौसी का बेटा गौरव इंटरमीडिएट पास कर चुका था. वह अध्यापक बनना चाहता था. इसलिए सीमित आय के बावजूद पिता उसे किसी चीज की कमी नहीं होने दे रहे थे.

गौरव अकसर मौसी के घर आता रहता था. 17 साल की अनुपम से गौरव की खूब पटती थी. लेकिन गौरव को अनुपम की खूबसूरती कुछ अलग ही नजरिए से सुहाती थी. वह उसे चाहत भरी ललचाई नजरों से देखता था. लेकिन रिश्ते की याद आते ही वह अनुपम पर से नजरें हटा लेता था. जबकि उस का दिल ऐसा करने की इजाजत नहीं देता था. गौरव ने बहुत कोशिश की कि वह रिश्ते की मर्यादा बनाए रखे, लेकिन दिल के मामले में उस का वश नहीं चला.

गौरव को लगा कि वह अनुपम को चाहने लगा है. उस के दीदार से उस के दिल को सुकून मिलता था. अनुपम जब उस के पास नहीं होती तो उसे कुछ अच्छा नहीं लगता था. उस के बिना जीने की कल्पना करना भी बेईमानी लगती थी. लेकिन अनुपम का साथ पाने के लिए इच्छा तभी पूरी हो सकती थी, जब वह भी उसे प्यार करती.

उन्हीं दिनों ननिहाल में पारिवारिक शादी समारोह में दोनों का मिलना हुआ. शादी समारोह में सजीधजी अनुपम बेहद खूबसूरत लग रही थी. वह जीवन के 17 बसंत पार कर चुकी थी.

मजबूत कदकाठी का 18 साल का गौरव भी बहुत हैंडसम लग रहा था. अनुपम की गौरव के प्रति दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. चूंकि वे मौसेरे भाईबहन थे, इसलिए दोनों के साथसाथ रहने पर किसी को कोई शक नहीं होता था.

शादी के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. घर जाने के बाद अनुपम के मन में उथलपुथल मची थी. शादी में गौरव के साथ की गई मस्ती के पल उस के दिमाग मे घूमते रहते थे. मोसेरा भाई होने के बावजूद अनुपम का झुकाव उस की तरफ हो गया था. दोनों के पास एकदूसरे के फोन नंबर थे. समय मिलने पर वे दोनों फोन पर बातें करते और एसएमएस भी करते.

गौरव और अनुपम एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे थे. लेकिन भाईबहन का रिश्ता होने की वजह से वे प्यार का इजहार नहीं कर पा रहे थे. काफी सोचविचार कर आखिर गौरव ने फैसला किया कि वह अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. इस के लिए भले ही अनुपम नाराज हो जाए या फिर उस का प्यार ठुकरा दे.

एक दिन अनुपम अपने कमरे में बैठी गौरव को बारबार फोन कर रही थी, लेकिन उस का फोन लग ही नहीं रहा था. झुंझला कर उस ने मोबाइल फोन स्विच औफ कर दिया तभी गौरव आ गया. वह मन ही मन ठान कर आया था कि आज अनुपम से अपने दिल की बात जरूर कहेगा. आते ही उस ने कहा, ‘‘अनु आज मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हो बोलो?’’ अनुपम ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘मुझे डर लगता है कि तुम मेरी बात सुन कर नाराज तो नहीं हो जाओगी?’’

‘‘पता तो चले, ऐसी कौन सी बात है, जिसे कहने से तुम इतना डर रहे हो?’’

‘‘अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. क्या तुम मेरे प्यार को स्वीकार करोगी?’’ गौरव ने अनुपम का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.

‘‘क्या…?’’ अनुपम चौंकी. एकाएक अपने कानों पर उसे भरोसा नहीं हुआ.

‘‘हां अनु, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और तुम मेरे दिल में रचबस गई हो.’’ ‘‘यह कैसी बात कह रहे हो तुम? तुम अच्छी तरह जानते हो कि हम भाईबहन हैं.’’

‘‘अनु मैं ने कभी भी तुम्हें बहन की नजर से नहीं देखा. मुझे अपने प्यार की भीख दे दो. मैं तुम्हारे लिए सारे जहां से लड़ जाऊंगा.’’

‘‘हम दोनों रिश्ते में भाईबहन हैं. यह बेरहम समाज हमारे प्यार के रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा. जब लोगों को पता चलेगा तो वे हमें कभी एक नहीं होने देंगे. तुम किसकिस से लड़ोगे?’’

‘‘मुझे किसी की फिक्र नहीं है. बस तुम एक बार हां कर दो.’’

‘‘ठीक है, तुम इतना कह रहे हो तो मैं सोच कर जवाब दूंगी.’’ अनुपम ने कहा.

‘‘आज तो मैं घर जा रहा हूं. एक सप्ताह बाद लौट कर आऊंगा. तब तक तुम खूब सोच लेना.’’ कह कर गौरव चला गया.

रात का खाना खा कर अनुपम सोने के लिए बिस्तर पर लेटी तो नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उस के कानों में गौरव के शब्द गूंज रहे थे. उस ने अपने दिल में झांकने की कोशिश की तो उसे लगा कि वह भी गौरव से प्यार करती थी, लेकिन रिश्ते की वजह से इजहार नहीं कर पा रही थी.

अब गौरव प्यार की बात कर रहा है तो उसे पीछे नहीं हटना चाहिए. जिंदगी में सच्चा प्यार हर किसी को नहीं मिलता. ऐसे में उसे गौरव के प्यार को टुकराना नहीं चाहिए. काफी सोचविचार कर उस ने फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है.

अगले दिन की सुबह अनुपम के लिए कुछ अलग ही थी, गौरव के प्यार में डूबी हुई वह खोईखोई सी थी, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी कि उस के मन में क्या चल रहा है. अनुपम को अब बेसब्री से गौरव का इंतजार था. लगभग एक सप्ताह बाद गौरव मौसी के घर आया. घर के लोगों से मिल कर वह अनुपम के कमरे में चला गया. उस ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु जल्दी बताओ, तुम ने क्या फैसला लिया?’’

‘‘गौरव, मैं ने सोचविचार कर तुम्हारे हक में फैसला लिया है.’’

गौरव ने खुशी से अनुपम को बांहों में भर लिया. खुद को छुड़ाते हुए अनुपम बोली, ‘‘अपने ऊपर काबू रखो. अगर किसी ने इस तरह देख लिया तो कयामत आ जाएगी. हमारा प्यार शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘क्या करूं अनु, तुम्हारा फैसला सुन कर मैं जो पागल हो गया था.’’

‘‘ठीक है, लेकिन लोगों की नजरों में हमें भाईबहन ही रहना है. वैसे यह एक तरह से अच्छा है, इस से हम पर कोई जल्दी शक नहीं करेगा.’’

उस दिन से दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के बीच फोन पर भी प्यार भरी बातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों के बीच दूरियां भी मिट गईं.

कहते हैं, प्यार को चाहे कितना छिपा कर किया जाए, वह छिप नहीं पाता. लेकिन अनुपम और गौरव के संबंधों पर घर वालों को जल्दी इसलिए शक नहीं हुआ, क्योंकि वे भाईबहन थे. लेकिन एक दिन विमला ने अनुपम और गौरव को एकदूसरे से अश्लील हरकत करते देख लिया.

पहले तो वह सन्न रह गई, उस के बाद दोनों को लताड़ा भी और समझाया भी. उस ने यह बात बड़ी बहन कमला को बताई तो वह भी सन्न रह गई. उस ने भी गौरव को समझाया कि वे दोनों भाईबहन हैं. इसलिए उन का प्यार किसी भी तरह उचित नहीं है.

घर वालों ने भले ही दोनों को समझाया, रिश्ते की दुहाई दी, लेकिन उन पर कोई असर नहीं पड़ा. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे. इस की जानकारी घर वालों को हुई तो उन्होंने दोनों पर सख्ती करनी शुरू कर दी. इस के बाद दोनों का मिलना बंद हो गया. अब दोनों की बातें फोन पर ही हो पाती थीं. विमला जब कभी अनुपम को फोन पर बातें करते देख लेती तो उसे डांटती और फोन छीन कर अपने पास रख लेती थी.

गौरव और अनुपम के मिलन में बाधा पड़ने लगी तो दोनों बेचैन रहने लगे. आखिर जब उन से नहीं रहा गया तो अनुपम ने मिलने का एक नया तरीका निकाल लिया. उस की नानी बेगवती का घर उस के घर से एक किलोमीटर दूर था. अनुपम किसी न किसी बहाने नानी के घर जाती और रात में वहां रुक जाती. घर से निकलते ही वह गौरव को फोन कर के नानी के घर जाने की जानकारी दे देती थी. गौरव भी नानी के घर पहुंच जाता. वहां आराम से दोनों का मिलन हो जाता.

एक दिन ऐसे ही गौरव ने अनुपम से पूछा, ‘‘अनु, कब तक हम इस तरह छिपछिप कर मिलते रहेंगे. अब तुम्हारी दूरी मुझ से बरदाश्त नहीं होती. मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं.’’

‘‘यह संभव नहीं है, गौरव. हमारे रिश्ते को न तो घर वाले मंजूरी देंगे और न ही समाज.’’ अनु मायूस हो कर बोली.

‘‘कोई तो रास्ता होगा अनु.’’

‘‘हां एक रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ गौरव ने पूछा.

‘‘हम इस जनम में तो मिल नहीं पाएंगे, इसलिए जान दे कर दूसरे जनम में मिल सकते हैं.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहती हो.’’ गौरव ने सहमति जताई.

22 जनवरी, 2016 की दोपहर अनुपम ने गौरव से फोन कर के कहा कि वह नानी के घर जा रही है. वह भी आ जाए. शायद यह उन की आखिरी मुलाकात होगी. गौरव शाम 5 बजे नानी के घर पहुंच गया. देर शाम अनुपम ने खाना बनाया और दोनों ने नानी के साथ खाना खाया.

खाना खाने के बाद अनुपम नानी के साथ चारपाई पर लेट गई तो गौरव दूसरे कमरे में पड़ी चारपाई पर लेट गया. नानी के सो जाने के बद अनुपम गौरव के कमरे में पहुंच गई. दोनों ने प्यार की अकल्पनीय बातें करते हुए साथसाथ मरने का निश्चय किया.

गौरव और अनुपम ने बरामदे में छत के कुंडे में रस्सी के 2 अलगअलग फंदे बना कर कंधे और एकएक हाथ आपस में कलावा से बांधा और अपने गले में फंदा डाल कर फांसी पर झूल गए.

सुबह बेगवती की आंखें खुलीं तो अनुपम चारपाई पर नहीं थी. उन्होंने आवाज लगाई. जब जवाब नहीं मिला तो कमरे से बरामदे में आई. बरामदे का दृश्य देख कर वह अवाक रह गई. बरामदे में नाती और नातिन फंदे से झूल रहे थे.

वह चीखतीचिल्लाती घर के बाहर आईं और पड़ोसियों को घटना की जानकारी दी. इस के बाद तो गांव में कोहराम मच गया. जिस ने सुना, वही बेगवती के घर की ओर दौड़ पड़ा. देखते ही देखते वहां भीड़ लग गई.

बेगवती ने पड़ोसियों की मदद से घटना की जानकारी अपनी बेटियों कमला और विमला तथा बेटे निर्मल को मोबाइल फोन से दी थी. सूचना पाते ही विमला पति शिवनाथ सिंह तथा गौरव की मां कमला व पिता नाथू सिंह आ गए. शव देख कर सभी फफक कर रो पड़े. इसी बीच शिवनाथ सिंह ने घटना की जानकारी थाना सिकंदरा पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी विकास राय पुलिस फोर्स के साथ आ गए थे.

थानाप्रभारी विकास राय ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और दोनों शवों को उतरवा कर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को घटना की जानकारी दे दी. जानकारी पा कर एसपी प्रभाकर चौधरी, एएसपी मनोज सोनकर तथा सीओ आलोक कुमार जायसवल घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतकों के घर वालों से पूछताछ की. पूछताछ में पता चला कि मृतक आपस में मौसेरे भाईबहन थे. दोनों के बीच अमर्यादित प्रेम था, जिस की वजह से दोनों ने आत्महत्या कर ली थी.

चूंकि मृतकों के परिजनों ने पुलिस को लिख कर दे दिया था कि वे कोई काररवाई नहीं चाहते हैं. इसलिए पुलिस ने दोनों शवों को पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए माती भिजवा दिया गया. फिर पोस्टमार्टम के बाद लाशें घर वालों को सौंप दी गईं. उस के बाद घर वालों ने एक ही चिता पर दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने इस केस की फाइल बंद कर दी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

धर्म के नाम पर सिंकती हैं रोटियां

पाखंडी सब ऐश कर रहे जनता लुटे बेचारी,

भोले भक्तों की कमाई भरे दानपेटियां सारी.

इसी के बल पर दाढ़ीचोटी वाले मौज मनाते,

आंखें खोल कर रहने की अब आई बारी.

चढ़ावे के नाम पर मची लूट व अंधेरगर्दी पर ये लाइनें बड़ी सटीक लगती हैं. धार्मिक जगहों पर लगी दानपेटियों में भक्त सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात, नकदी, जेवर वगैरह चढ़ाते रहते हैं इसलिए मंदिरों, गुरुद्वारों वगैरह में इतनी ज्यादा दौलत बरसती है कि नोट गिनने के लिए मशीनें लगानी पड़ती हैं.

ऐसी इमारतों की दीवारों, दरवाजों, गुंबदों वगैरह पर सोनेचांदी के पतरे चढ़ाए जाते हैं. मूर्तियां व सिंहासन सोनेचांदी के बन जाते हैं. उसी दौलत की बदौलत पंडेपुजारी, संतमहंत, मैनेजर वगैरह सब मौज करते हैं.

धर्म व मजहब के नाम पर दानपुण्य, चढ़ावे, खैरात वगैरह की महिमा का बखान सदियों से किया जाता रहा है. धर्म की किताबों में ऐसे किस्से भरे पड़े हैं. चढ़ावे के चलन को बढ़ाने के लिए धर्म प्रचारक खूब बढ़चढ़ कर झूठी कहानियां सुनाते हैं, अफवाहें फैलाते हैं, ऊलजुलूल बातों से लोगों को तरहतरह से भरमाते व बहकाते हैं.

पंडेपुजारी यह बात जानते हैं कि ज्यादातर लोग खुद पर यकीन रखने की जगह भाग्य व भगवान पर भरोसा करते हैं, इसलिए वे अपने मसलों से घबरा कर मठमंदिरों की शरण में चले जाते हैं और वहां लगी दानपेटियों में यह सोच कर पैसे डालते हैं कि इस से भगवान खुश होंगे और उन का काम जल्दी बन जाएगा, लेकिन अगर चढ़ावे से ही मन्नतें पूरी होतीं तो दुनिया में कभी किसी की कोई इच्छा अधूरी ही नहीं रहती.

गोरखधंधा है यह

सिर्फ अपना घर भरने की गरज से पंडेपुरोहित जीने से मरने तक में लोगों को दान करने व चढ़ावा चढ़ाने की घुट्टी पिलाते रहते हैं. मसलन चढ़ावा चढ़ाने से सारे पाप कट जाएंगे, दुखतकलीफें खत्म हो जाएंगी, खराब ग्रह ठीक हो जाएंगे, बीमारी व गरीबी चली जाएगी, कई गुना पैसा लौट कर आएगा, पुण्य व मोक्ष मिलेगा, इसलिए अपनी कमाई का कम से कम 10वां हिस्सा तो मंदिर या तीर्थ में ब्राह्मण को जरूर दान कर देना चाहिए. कभीकभार वे ज्यादा दान भी मांगते हैं. आजकल भगवा दुपट्टा डाले रंगदार गलीगली में पैदा हो गए हैं.

भोले भक्त, अंधविश्वासी लोग खासकर औरतें उन की उलझाऊ बातों में आ जाती हैं और जहांतहां लगी दानपेटियों में अरबोंखरबों रुपए की बरसात होती रहती है.

पंडेपुजारी, मठाधीश, ट्रस्ट व सरकार ऐसी धार्मिक जगहों के मालिक बन जाते हैं, वहीं सांईं बाबा, बालाजी, काशी विश्वनाथ, अक्षरधाम, वैष्णो देवी वगैरह बहुत से मंदिरों में रोज खूब चढ़ावा चढ़ता है, इसलिए गरीबों से भरे देश में भगवान की अमीरी खूब दिखाई देती है. वह भगवान जिस के बारे में दावा किया जाता है कि वह न तो कुछ खाता है, न पहनता है. जिसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं है, तो आखिर उसे रुपएपैसे, जेवर, कपड़े, हलवापूरी व छप्पन भोग लगाने की जरूरत क्या है? लेकिन इस के एजेंट हैं कि हरदम भक्त और भगवान के बीच अपना घर भरने की जुगत में लगे रहते हैं.

धर्म के नाम पर कारोबार करने वाले कई तरह से लोगों को डराते हैं. वे धार्मिक अंधविश्वास फैला कर लोगों को उकसाते हैं, फिर रखरखाव की आड़ में अपनी कमाई के लिए धार्मिक जगहों पर बड़ीबड़ी दानपेटियां लगाते हैं, जबकि भगवान के घर में चोरीचकारी इतनी है कि किसी को किसी पर भरोसा नहीं है.

शुद्ध होने का स्वांग करने वाले कितने बेईमान हैं, यह पंडों की बेईमानियों से साफ है. मंदिरों में लगी दानपेटियों को जंजीरों से बांध कर उन में 5-5 ताले लगा दिए जाते हैं. हर पंडे के पास अलग चाबी होती है ताकि सब मिल कर ही तिजोरी खोलें.

सभी तीर्थों में ऐसे मंदिर हैं जहां दर्शन करने वालों को मोटा चढ़ावा चढ़ाने के लिए तकरीबन मजबूर किया जाता है. चढ़ावा न चढ़ाने पर उन के साथ बदसलूकी की जाती है. इस से तंग आ कर बहुत से लोग तोबा कर चुके हैं और उन मंदिरों में आगे से कभी न जाने की कसम खा चुके हैं. पर धर्म का नशा ऐसा है कि एक मंदिर से दुत्कारे जाने पर लोग दूसरे मंदिर की ओर चल देते हैं.

मची है छीनाझपटी

धर्म के कारोबारी चढ़ावे के नाम पर बेहिसाब धनदौलत इकट्ठा करते हैं. वे बेखौफ हो कर मजे से अपनी दुकानें चलाते हैं. दानपेटियों के गोरखधंधे से फायदा धर्म के ठेकेदारों व नुकसान भक्तों का होता है. जेब गरीबों की हलकी होती है.

ऐसा कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर की अकूत दौलत को लूटने के लिए उस पर 16 बार हमले हुए. आज भी मंदिरों में अकसर दानपेटियों के ताले तोड़ कर चोरियां होती रहती हैं, जबकि गजनी से कोई नहीं आता.

ज्यादातर मठमंदिर बहुत मोटी कमाई का जरीया हैं. इन पर कब्जा करने के लिए अकसर बेतहाशा खींचतान व छीनाझपटी मचती है. लड़ाईझगड़ा, मुकदमेबाजी, हत्याएं व खूनखराबा होता है. कई बार बिल्लियों की लड़ाई में

बंदर बाजी मार जाता है. पुरोहितों को हटा कर आला सरकारी अफसर बैठा दिए जाते हैं और धार्मिक कमाई पर सरकारें काबिज हो जाती हैं, लेकिन भक्त अपनी आंखें मूंदे रहते हैं. कुछ निजी मंदिर भी बनने लगे हैं. यह दूसरे कारोबारों से ज्यादा मुनाफे का धंधा जो है.

धर्म के नाम पर आंखें मूंद कर चढ़ावा चढ़ाने व अपनी जेबें हलकी करते रहने का ही नतीजा है कि इस देश में मंदिरों की भरमार है. हर गलीमहल्ले, सड़क व चौराहे पर बहुत से पुलिस थानों व ज्यादातर सरकारी इमारतों में न सिर्फ देवीदेवताओं की मूर्तियां लगी होती हैं, बल्कि बाकायदा पूजापाठ, आरती वगैरह करने का पक्का इंतजाम भी रहता है.

पिछड़ापन यों बरकरार

बहुत हैरत व अफसोस की बात तो यह है कि अपने देश में इतने स्कूल व अस्पताल नहीं हैं, जितने मठमंदिरों, मजारों वगैरह की भरमार है.

दूरदराज के बहुत से पिछड़े इलाकों में बसी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान की बुनियादी सहूलियतों से दूर है. आज भी पीने के लिए साफ पानी, सड़क, संचार, सेहत वगैरह के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं.

आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी देश के बहुत से इलाकों में पिछड़ापन बरकरार है. बहुत सी सरकारी स्कीमों में पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद आज भी करोड़ों लोग बेघर हैं.

गंवई इलाकों व गंदी बस्तियों में करोड़ों लोग गरीबी की रेखा के नीचे रह कर कीड़ेमकोड़ों की तरह अपनी बदहाल जिंदगी बसर करते हैं. इस में सुधार व बदलाव होना बहुत जरूरी है.

उपाय भी हैं

दानपेटियों को तो मंदिरों की जगह स्कूलकालेजों व अस्पतालों में लगाया जाना चाहिए, लेकिन अपनीअपनी दुकानें चलाने वाले धर्म के धंधेबाज ऐसा कभी न होने देंगे.

यह कोई नई बात नहीं है. धर्म व राजनीति के नाम पर रोटियां सेंकने वाले हमेशा जनता को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं.

अमीर वही हुए हैं, जिन्होंने पैसे की कीमत समझी, उसे बचाया, महफूज रखा व सही जगह लगा कर कई गुना बढ़ाया.

एकएक बूंद मिल कर सागर बन जाता है. इसी तरह अगर जीने से मरने तक धर्म के नाम पर किए गए खर्च को जोड़ा या बचाया जाए तो अच्छीखासी रकम जमा हो जाती है जो अपने जरूरी खर्चों में काम आ सकती है. तंगहाली में तो बचत की अहमियत और भी बढ़ जाती है, इसलिए उस की अनदेखी करना कतई वाजिब नहीं है.

जनता को खुद चालबाज मक्कारों के फैलाए हुए जंजाल से निकलना होगा. लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझनी होगी कि दानचढ़ावे से कुछ हासिल नहीं होता. यह सिर्फ मन का वहम है, इसलिए दानपेटियों में अपनी मेहनत की कमाई बहाने से कुछ न मिलेगा.

याद रखें कि दानपेटियों में धन डालने से सिर्फ उन्हें मिलता है जो बिना कुछ करेधरे ही हलवापूरी खाना चाहते हैं, इसलिए अपने पैसों का इस्तेमाल सुखी जिंदगी जीने के लिए करें, दानपेटियों में डाल कर उसे बरबाद न करें.

पढ़ाई के लिए जब जाना हो विदेश

बढ़ते वैश्वीकरण ने बाजार के लगभग हर उत्पाद व सेवा को ग्लोबल कर दिया है. शिक्षाजगत भी इस से अछूता नहीं है. लिहाजा, आज स्टूडैंट्स अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं. विदेश जा कर पढ़ाई करने का चलन पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब 43 लाख स्टूडैंट्स अपना देश छोड़ कर किसी दूसरे देश पढ़ने जा रहे हैं. वैसे तो भारत में 400 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं जहां वे पढ़ सकते हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में हमारे यहां आईआईटी और आईआईएम जैसे चंद शिक्षण संस्थान ही हैं जो विश्वस्तरीय सूची में शामिल हैं, बाकी शिक्षा के व्यावसायीकरण में मोटी कमाई करने में जुटे हैं.

यही वजह है कि आज भारतीय छात्र अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के नामचीन शिक्षा संस्थानों में पढ़ने के लिए न सिर्फ अच्छाखासा रुपया खर्च करने को तैयार दिखते हैं, बल्कि घर से दूर रहने से भी नहीं हिचकते. अमेरिका के इंस्टिट्यूट औफ इंटरनैशनल एजुकेशन से जुड़े डैनियल ओब्स्ट के मुताबिक, वैश्वीकरण के इस दौर में कामयाबी के लिए हर छात्र को विदेश में पढ़ाई करनी चाहिए. इस से वह अलग भाषा और संस्कृति वाले लोगों से तालमेल बिठाना सीखेगा और मल्टीनैशनल कंपनियों में काम करना उस के लिए आसान होगा. हालांकि यह आसान काम नहीं है.

विदेश में रहना, वहां के विश्वविद्यालयों की फीस भरना, किताबों की कीमत, वीजापासपोर्ट और ट्रैवल का खर्च आदि कई बातें हैं जिन पर सोचे बिना विदेशों में पढ़ाई का सपना पूरा नहीं होता. इसलिए यदि आप भी विदेश में पढ़ाई करने की सोच रहे हैं तो कुछ बातों और तैयारियों से दोचार हो लें :

क्या पढ़ना चाहते हैं?

आप किस सब्जैक्ट या बीट या कोर्स के लिए विदेशी कालेज में दाखिला लेना चाहते हैं, यह सब से पहले तय कर लें. संबंधित कोर्स के बारे में पूरी रिसर्च करें. हो सके तो जो प्रोफैसर या जानकार विदेश से पढ़ कर या काम कर के आए हैं, उन से गाइडैंस ले लें. विदेश में पढ़ने के तमाम तरह के प्रोग्राम होते हैं. कई बार अलगअलग देशों में सेमेस्टर या कोर्स की अवधि भी अलग होती है और कुछ कोर्स अंगरेजी में होते हैं. कई संस्थान एकसाथ 2-2 डिगरियों की पढ़ाई की इजाजत भी देते हैं. आप जो भी कोर्स करना चाहते हैं, उन कोर्सेस की भविष्य में कहांकहां व किस स्तर की मान्यता है, शौर्टटर्म है या फुलटाइम आदि जरूरी बातों का पता कर के देश और संबंधित संस्थानों के बारे में सर्च करें. संबंधित संस्थान की प्लेसमैंट रिपोर्ट, उस की रैपुटेशन कैसी है आदि जानकारियां आजकल इंटरनैट के जरिए मालूम की जा सकती हैं.

बजट, स्कौलरशिप और लोन

अब बात आती है खर्च की. किसी भी कोर्स को चुनने से पहले अनुमान लगा लें कि आप विदेश में पढ़ाई पर कितना खर्च वहन कर सकते हैं. विदेशों में पढ़ाई के लिए सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों के विकल्प होते हैं. हर कालेज या यूनिवर्सिटी की ट्यूशन फीस भी अलगअलग होती है. इस के अलावा हर देश में रहने और खानेपीने का खर्च अलगअलग होता है. इसलिए देश तथा संस्थान चुनते वक्त आप को अपने बजट का भी ध्यान रखना होगा. वैसे तो विदेश में पढ़ाई महंगी पड़ती है, लेकिन स्कौलरशिप इस के लिए सब से बेहतर विकल्प है. कई निजी और सरकारी और्गनाइजेशंस की ओर से भी आप को विदेश में पढ़ने का मौका मिल सकता है, लेकिन यह सिर्फ योग्य छात्रों को ही मिलता है. ऐसे बहुत से देश (जरमनी, फिनलैंड, नौर्वे, ब्राजील, स्लोवेनिया और स्वीडन) हैं, जिन के कुछ विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों की डिगरी, उन की स्कौलरशिप व काबिलीयत को देख कर उन का खर्च उठाने के लिए तैयार रहते हैं.

कुछ स्कौलरशिप्स में ट्यूशन फीस का कुछ हिस्सा कवर होता है, जबकि कई में पूरी फीस शामिल होती है. जितना हिस्सा स्कौलरशिप से मिल जाए, उस के बाद बची रकम अभिभावक या बैंक लोन से पूरी की जा सकती है. अगर आप अपनी लोकल यूनिवर्सिटी के किसी प्रोग्राम के तहत जा रहे हैं, तो आप को लोकल यूनिवर्सिटी की फीस देनी होगी. साथ ही, विदेश में पढ़ने का खर्च भी उठाना होगा.

हर देश में पढ़ाई का खर्च अलगअलग होता है. आमतौर पर अमेरिका के मुकाबले यूरोप में पढ़ाई सस्ती है. अगर आप लंदन में रह कर पढ़ते हैं, तो आप का रहनेखाने का खर्च ज्यादा आएगा. इस के मुकाबले मैनचेस्टर में पढ़ाई सस्ती होगी. अमूमन अमेरिका में पढ़ाई का खर्च सालाना 25 से 50 लाख रुपए आ सकता है. हालांकि, दूसरे कई देशों में यह सस्ता है.

इंटरनैशनल स्टडीज के मामले में काउंसलिंग सैशन का खर्च प्रति सैशन 5,000 रुपए आ सकता है और औल इनक्लूसिव पैकेज की बात करें तो यह 75,000 से 10 लाख रुपए के बीच आता है. इस के अलावा एजुकेशन लोन भी एक विकल्प है. हालांकि शिक्षा के लिए लोन पर ब्याजदर अपेक्षाकृत कम होती है फिर भी इस से बचना चाहिए. यदि पेरैंट्स ने पहले से आप के लिए कोई एजुकेशन पौलिसी या बचत कर रखी है तो यह सब से अच्छा है.

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वीजा की तैयारी

विदेश जाने के लिए सब से जरूरी है वीजा. कई स्टूडैंट्स अधूरी तैयारी की वजह से विदेश नहीं  जा पाते हैं. गौरतलब है कि विदेश जाने के लिए छात्र को 1-20 वीजा की जरूरत होती है. इस के लिए आप के पास संबंधित संस्थान से प्राप्त एफ -1 फौर्म होना जरूरी है. इस के बाद वीजा फौर्म को बिना किसी गलती के सावधानी से भरें. हर बात स्पष्ट हो. नोट में पूरे विश्वास के साथ बताएं कि आप वहां पढ़ाई करने जा रहे हैं. इस के साथ जीआरई, जीमैट और टौफेल जैसे टैस्ट की मूल प्रतियां तैयार रखें.

क्या करें और क्या नहीं

विदेश पहुंच गए तो यह न सोचें कि अब सब काम अपनेआप हो जाएंगे. कुछ बातें हैं जिन को वहां पहुंचते ही समझ लेना चाहिए, मसलन आप के देश का दूतावास कहां है, वहां का फोन नंबर आदि. वहां की भाषा की बेसिक समझ के लिए डिक्शनरी रखें.

वहां पहुंचते ही घूमने के चक्कर में अपना पढ़ाई का समय न गंवाएं. जाते ही लोकल बैंक में अपना खाता खुलवा लें. वहीं इमरजैंसी नंबर्स जैसे पुलिस, फायर ब्रिगेड व अन्य सेवाओं के संपर्क नंबर पता कर लें. आत्मविश्वास से लबरेज रहें.

अलग देश और अलग भाषा वाले लोगों से तालमेल बिठाना, अपनी दिक्कतों का हल खोजना आदि सीखें. वहां की भाषा, संस्कृति, खानपान के बारे में जानें. इस से ग्लोबल सिटिजन बनने में आसानी होगी. बहुत से बच्चे तो विदेश पढ़ने ऐसे जाते हैं जैसे छुट्टियों में घूमने जा रहे हों. ऐसा सोचना पैसे और वक्त दोनों की बरबादी होगी. यह गलती न करें. विदेशों में किसी कोर्स से जुड़ने के बाद पर्सनल से ले कर प्रोफैशनल स्तर तक आप का पूरा मेकओवर हो जाता है. बाहर जा कर आप अपनी जिम्मेदारियों से पहले से ज्यादा वाकिफ होते हैं.

कुल मिला कर विदेश में पढ़ाई को हौआ न मानें. हर जगह अच्छे और बुरे संस्थान होते हैं. इसलिए किसी के कहने या देखादेखी विदेश जाना ठीक नहीं है. यदि आप को लगता है कि संबंधित कोर्स विदेश जा कर अच्छे से पढ़ा जा सकता है और उस से रोजगारपरक संभावना बढ़ती है तो ही जाएं. वरना विदेश से पढ़ कर आने से अच्छी नौकरी मिल जाएगी, इस की गारंटी नहीं है. अपना बजट, घरेलू स्थितियां और संबंधित देश के मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हाल देख कर ही वहां पढ़ाई करने के लिए जाने की सोचें.

खिचड़ी सरकार की दरकार

खिचड़ी सरकार का भय दिखा कर भारतीय जनता पार्टी 2019 के आम चुनावों में जीत हासिल करना चाहती है. कर्नाटक विधानसभा और 10 राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों से यह तो साफ है कि 1977 के बाद कांग्रेस के पर्याय के रूप में खिचड़ी सरकारों का जैसा दौर रहा वैसा ही 2019 के बाद भी संभव है जिस में दालचावल का शोरवा नहीं रहेगा, दाल अलग दिखेगी, चावल अलग. सवाल है कि इस में बुराई क्या है.

कांग्रेस के बाद देश कोई अराजकता में तो नहीं डूबा. कइयों की सहमति से फैसले होते थे. कुछ फैसले ढंग के होते थे, कुछ बेढंगे. इस के विपरीत कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की जबजब अकेली सरकारें बनी हैं तब दाल तो अकेली थी लेकिन चावलों का पता ही नहीं था. यही नहीं, दाल में कंकर ज्यादा थे, दाल कम. दोनों सरकारों ने जनता के हितों से जम कर खेला. अगर अदालतें न होतीं तो देश का लोकतंत्र इंदिरा गांधी के युग में भी और नरेंद्र मोदी के युग में भी हवा हो चुका होता.

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की मिलीजुली सरकारों को मंत्रिमंडल की बैठकों में आम सहमति से फैसले लेने पड़े और वे सही थे. यह देश अपनेआप में एक खिचड़ी है. यह न जरमनी है, न चीन जहां लगभग पूरी जनता एक परंपरा, एक इतिहास, एक बोली और एकतरह के विचारों वाली हो. पर इसी एकतरह में हिटलर और माओ पैदा हुए हैं, जिन्होंने लाखों अपनों को  मरवाया और परायों को भी जम कर मारा.

भारत को विभिन्नता चाहिए. भारत को ऐसा एकाधिकार नहीं चाहिए.

खिचड़ी सरकारों में 10-15 सांसदों वाली पार्टी भी अपनी बात कह सकती है. आज नरेंद्र मोदी को उन की पार्टी के 50 सांसद भी कुछ कहना चाहें तो कह नहीं सकते. नरेंद्र मोदी ने तो अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के भी पर कुतर रखे हैं और सारे असंवैधानिक, अनैतिक व अतार्किक फैसले पीएमओ यानी प्राइम मिनिस्टर औफिस कर रहा है.

मोदी के नेतृत्व की यह सरकार न संविधान को मानती है न मानव अधिकारों को. इस ने तो भरी अदालत में यहां तक कह दिया कि हर नागरिक के शरीर पर सरकार का हक है, उस का खुद का नहीं.

आज जनता अगर कुछ खुली सांस ले पा रही है तो इसलिए कि देश की राजनीति में कई दालें, सब्जियां, कई तरह के चावल और तरहतरह के मसाले हैं. बढि़या खिचड़ी बनती है. यह स्वादिष्ठ भी होती है और हाजमा भी ठीक रखती है.

बिहार : फिर निकला विशेष राज्य दर्जा का जिन्न

लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही नीतीश कुमार को फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की याद आई है और इस के लिए उन्होंने केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है. 29 मई, 2018 को उन्होंने 15वें वित्त आयोग को इस मसले को ले कर चिट्ठी भेजी थी.

जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के दर्जे की मांग करना कोरा राजनीतिक स्टंट है. बिहार विशेष राज्य का दर्जा पाने के नियमों पर खरा ही नहीं उतरता है तो किस मुंह से इस की मांग कर के जनता को बरगलाया जा रहा है?

केंद्र सरकार कई दफा इस मांग को खारिज करती रही है. नीतीश कुमार ही नहीं, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति जैसी पार्टियां भी अपनी सहूलियत और सियासी मतलब के हिसाब से यह मांग उठाती रही हैं.

बिहार कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल कहते हैं कि उन की पार्टी बिहार को स्पैशल स्टेटस दिलाने का समर्थन करती रही है. इस के लिए पार्टी मुहिम चलाने की तैयारी भी कर चुकी है.

लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान कहते हैं कि बिहार पिछड़ा राज्य है और इसे विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए.

गौरतलब है कि बिहार के अलावा झारखंड, ओडिशा और राजस्थान में भी विशेष राज्य का दर्जा की मांग उठती रही है. केंद्र सरकार इस मसले को छेड़ने से परहेज करती रही है. बिहार को स्पैशल स्टेटस मिलने के बाद बाकी तीनों राज्य भी उस के पीछे हाथ धो कर पड़ सकते हैं.

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा ने 4 अप्रैल, 2006 को ही राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग का प्रस्ताव पास कर दिया था और इस बारे में मुख्यमंत्री ने 3 जून, 2006 को प्रधानमंत्री को जानकारी दी थी.

31 मई, 2010 को बिहार विधानपरिषद ने भी इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी थी और 10 जून, 2010  को मुख्यमंत्री ने फिर प्रधानमंत्री को चिट्ठी के जरीए यह जानकारी दी थी.

23 मार्च, 2011 को राज्य के सभी सियासी दलों और सांसदों से इस मुहिम को समर्थन देने की अपील की गई थी और एक हस्ताक्षर मुहिम की शुरुआत की गई थी.

जब 13 साल पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने को ले कर बिहार में नए सियासी ड्रामे ने जोर पकड़ा था तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को इस के अलावा कुछ और नहीं सूझ रहा था. उस समय राज्य के बाकी दल इसे नीतीश कुमार की सियासी नौटंकी करार दे कर उन की मांग की हवा निकालने पर तुले हुए थे.

नीतीश कुमार ने साल 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई थी और इस मामले को ले कर यह हवा बनाई गई थी कि अगर केंद्र ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया तो उस के सारे दुखदर्द दूर हो जाएंगे.

बिहार की वाजिब तरक्की नहीं हो पाने का ठीकरा केंद्र के माथे फोड़ कर नीतीश कुमार खुद की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं. 5-6 साल पहले इस मसले पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए जद (यू) ने राज्यभर में हस्ताक्षर मुहिम शुरू की थी और एक करोड़ बिहारियों के हस्ताक्षर जुटा कर केंद्र सरकार को सौंपे थे.

नीतीश कुमार बारबार यह रट लगा रहे हैं कि बिहार के सामाजिक और माली पिछड़ेपन को दूर करने के लिए राज्य को विशेष राज्य का दर्जा मिलना जरूरी है.

आजादी के बाद से ही केंद्र सरकारों ने बिहार की अनदेखी की है. पढ़ाईलिखाई और सेहत के लिए जरूरत से काफी कम पैसे मिले. रोजगार के लिए बड़ी तादाद में लोग राज्य से भाग रहे हैं. खनिज से भरा होने के बाद भी यहां उद्योग नहीं लग सके हैं.

जिन उद्योगों को बिहार आना चाहिए था वे छिटक कर दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में चले गए. साल 2000 में बिहार के बंटवारे ने तो राज्य को पूरी तरह से चौपट कर के रख दिया. खदान वाला हिस्सा झारखंड में चला गया. विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद राज्य में पूंजी निवेश बढ़ेगा, कारखाने लगेंगे, रोजगार के मौके बढ़ेंगे और लोगों का यहां से जाना भी रुकेगा.

राजद नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि नीतीश कुमार इस मामले पर केवल हवाबाजी करते रहे हैं. बिहार के साथ कभी इंसाफ हुआ ही नहीं है. सरकार के पास केंद्र सरकार से विशेष राज्य के दर्जे की भीख मांगने के अलावा और कोई काम नहीं रह गया है.

सरकार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि केंद्र की वजह से ही राज्य की तरक्की नहीं हो पा रही है, तो राजद सरकार पर वह किस मुंह से बिहार के पिछड़ेपन का आरोप मढ़ती रही है.

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करने वालों का कहना है कि बिहार को एक स्पैशल इकोनौमी पैकेज की जरूरत है और इस के लिए संविधान में दिए गए मापदंडों की समीक्षा की जानी चाहिए.

पिछड़े राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दे कर माली मदद और टैक्सों में छूट दी जाती है. जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, सिक्किम और मेघालय को पिछड़े राज्यों का दर्जा दे कर केंद्र सरकार स्पैशल मदद दे रही है.

बिहार प्रदेश विशेष राज्य दर्जा संघर्ष समिति के मुख्य प्रवक्ता संजय वर्मा कहते हैं कि बिहार का एक बड़ा इलाका नक्सलवाद, बाढ़, सूखा, पलायन, भौगोलिक अलगाव, बेरोजगारी, बिजली की कमी, कारखानों की कमी और कमजोर माली हालात से जूझ रहा है, ऐसे में विशेष राज्य का दर्जा पाए राज्यों से बिहार की हालत बेहतर नहीं है.

आमतौर पर राज्य को केंद्र सरकार तरक्की की योजनाओं के लिए 30 फीसदी अनुदान और 70 फीसदी कर्ज के रूप में देती है. स्पैशल राज्य का दर्जा मिलने पर 90 फीसदी अनुदान और 10 फीसदी कर्ज मिलता है.

बिहार चैंबर औफ कौमर्स के अध्यक्ष ओपी साह कहते हैं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद इस का औद्योगिक और माली रंगरूप पूरी तरह से बदल जाएगा और बिहार तरक्की की दिशा में ऊंची छलांग लगा सकेगा.

औद्योगीकरण और रोजगार पैदा न होने से राज्य में ठहराव के हालात बन गए हैं.

वैसे, इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता है कि देश के बाकी राज्यों की तुलना में बिहार की काफी अनदेखी हुई है, इसलिए यह समय की मांग है कि बिहार को स्पैशल राज्य का दर्जा मिले.

क्या मिलेगा विशेष राज्य का दर्जा

*   केंद्रीय अनुदान का फार्मूला 70:30 के बजाय 90:10 हो जाएगा.

*   कर्ज मुहैया होने की वजह से संसाधन जुटाना आसान होगा.

*   कर्ज के बोझ में कमी आएगी. इस से बाजार को लुभाना आसान होगा और निवेश बढ़ेगा.

*   सामाजिक और माली क्षेत्र के बीच की खाई को पाटा जा सकेगा.

*   टैक्सों और ऐक्साइज ड्यूटी में काफी छूट मिलेगी. इस से प्राइवेट निवेश में तेजी आएगी.

*   गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार पैदा होने के कामों में तेजी आएगी, जिस से विकास दर बढ़ेगी.

देखिये भोजपुरी गाने पर ऋतिक का यह जबरदस्त डांस

बौलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन एक शानदार डांसर भी हैं. उनके जबरदस्त डांस के फैंस दुनिया भर में हैं. ऐसे में सोशल मीडिया पर उनका एक डांस वीडियो काफी वायरल हो रहा है. सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा ऋतिक का ये वीडियो वाकई बेहद दिलचस्प है. इसे एक बार देखने के बाद हर किसी का बार-बार देखने को जी चाहेगा.

वीडियो की बात करें तो ये ऋतिक की फिल्म ‘बैंग बैंग’ के गाने ‘मैं तेरा होने लगा’ का है लेकिन ऋतिक के इस वीडियो को मनोज तिवारी के मशहूर गाने ‘चट देनी मार देले खींच के तमाचा’ के साथ सिंक किया गया है.

इस वीडियो को इतनी जबरदस्त तरीके से सिंक किया गया है कि ये मानना मुश्किल सा हो रहा है कि ऋतिक किसी और गाने पर डांस कर रहे हैं. बता दें कि सोशल मीडिया पर आए इस वीडियो को अब तक करोड़ों लोग देख चुके हैं.

यहां देखिए ऋतिक रोशन का ये मजेदार वीडियो:

ये पहली बार नहीं है जब ऋतिक रोशन का ऐसा कोई वीडियो वायरल हो रहा है. बल्कि इससे पहले ऋतिक का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया गया था. जिसमें उनके गाने को पवन सिंह के मशहूर गाने ‘लौलीपौप लागेलू’ के साथ एडिट किया गया था.

जिंदगी बरबाद करते दगाबाज आशिक

कहने वाले गलत नहीं कहते हैं कि प्यार अंधा होता है और इस में ठगी अकसर वे लड़कियां जाती हैं, जो अपने आशिक पर आंखें मूंद कर जरूरत से ज्यादा भरोसा करती हैं. बदलते दौर में बहुत जल्द ही वे अपना सबकुछ उन को सौंप देती हैं.

आएदिन ऐसे मामले उजागर होने लगे हैं, जिन से यह साबित होता है कि इश्क में माशूका और आशिक ने कुछ दिन एकसाथ काटे, इस के बाद आशिक शादी के अपने वादे से मुकर गया या फिर कन्नी काटने लगा.

2-4 फीसदी मामलों में ही लड़कियां खुद ही सच उजागर करते हुए बवाल मचाती हैं, पर तब तक उन के पास रोने के अलावा कुछ और नहीं रह जाता, क्योंकि उन की जिंदगी बरबाद हो चुकी होती है.

प्यार में अंधी हो कर अपने आशिक की असलियत और मंशा को न समझ पाने का खमियाजा 28 साला पार्वती (बदला नाम) रोतेसुबकते भुगत रही है.

यों दी दगा

पार्वती को अपने ही शहर सीहोर, मध्य प्रदेश के एक नौजवान रवि सिसोदिया से प्यार हो गया था. दरअसल, रवि के पहले वह उस के भाई अजय को चाहती थी, जिस की बेवक्त मौत हुई, तो वह टूट सी गई थी. ऐसे वक्त में उसे रवि ने सहारा दिया और बड़ेबड़े वादे किए, जिन में से एक शादी कर लेने का वादा भी था.

अजय की मौत का गम रवि के प्यार ने भुला दिया, तो जल्द ही पार्वती ने उसे अपना जिस्म भी सौंप दिया. यही रवि चाहता था. आशिक की नीयत का खोट पार्वती वक्त रहते समझ नहीं पाई और कठपुतली की तरह उस के इशारों पर नाचने लगी.

सीहोर छोटा और घना शहर है. लिहाजा, वहां हमेशा मिलनेजुलने और हमबिस्तर होने का मौका सहूलियत से नहीं मिलता था, फिर भी दोनों के बीच कोई परदेदारी नहीं रही थी.

बात जब शादी की आई, तो रवि ने पार्वती को समझाया कि यहां शादी करेंगे, तो घर और समाज वाले हल्ला मचाएंगे, इसलिए इंदौर चल कर रहते हैं. कुछ दिनों बाद जब सबकुछ ठीक हो जाएगा, तो वापस आ जाएंगे और सभी थोड़ीबहुत नानुकर व नाराजगी के बाद हमें एक होने की मंजूरी देने पर मजबूर हो जाएंगे.

पार्वती उन दिनों पेट से हो गई थी. लिहाजा, वह समझ नहीं पाई कि रवि की असल मंशा यह है कि इंदौर जा कर बच्चा गिरवा दे और न गिरवा पाए तो भी कोई बात नहीं, कम से कम कोई शादी के बाबत दबाव तो नहीं बनाएगा.

अपने आशिक से यह सुन कर पार्वती का भरोसा और बढ़ा कि उस ने इंदौर में रहनेखाने का इंतजाम कर रखा है. फिर एक दिन वह चुपचाप रवि के साथ बस में बैठी और इंदौर जा पहुंची यानी घर से भाग गई.

इंदौर में सचमुच रहने के लिए रवि ने सिलिकौन सिटी अपार्टमेंट्स में फ्लैट ले रखा था. लिहाजा, किसी तरह का शक पार्वती को नहीं हुआ.

वक्त कटता गया. रवि चूंकि खातेपीते घर का था, इसलिए पैसों की उस के पास कमी नहीं थी. दिन पूरे हुए, तो पार्वती ने अस्पताल में एक बेटी को जन्म दिया. प्यार की यह निशानी अभी घुटनों के बल चलना सीख ही रही थी कि रवि एकाएक गायब हो गया.

2-3 दिन तो जैसेतैसे पार्वती ने उस के इंतजार में काटे, लेकिन जब रवि लौट कर नहीं आया तो उसे घबराहट होने लगी. जल्द ही उस ने पड़ोसियों और जानपहचान वालों को सच बता दिया, तो सभी ने उसे इस दगाबाज आशिक के खिलाफ थाने में जा कर रिपोर्ट लिखवाने का मशवरा दिया.

अब तक पार्वती को भी समझ आ गया था कि रवि ने उसे खूबसूरती से धोखा दिया है और गोद में नन्ही बच्ची थमा कर भाग गया है. लिहाजा, वह 10 अप्रैल, 2016 को इंदौर के राजेंद्र नगर थाने पहुंची और रवि के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

लेकिन बरबाद तो हुई

इस मामले में अहम बात यह है कि अब पार्वती का क्या होगा, जो एक बिनब्याही मां है? उसे कौन अपनाएगा? जाहिर है, कोई उसे सहारा नहीं देगा. अब पार्वती अकेली है और उसे अपने दम पर जिंदगी काटनी है और मासूम बेटी की परवरिश भी करनी है.

आशिक तरहतरह से अपनी माशूकाओं को ठगा करते हैं और धोखा दिया करते हैं या ऐसी दगाबाजियां करते हैं, जिन के बाद माशूका के पास सिवा पछताने के कुछ नहीं रह जाता. इस लिहाज से यह चिंता की बात जरूर है.

वजह, जिस्मानी ताल्लुकात बनाना बेहद आसान काम है, लेकिन बाद के अंजाम की चिंता या परवाह न करना बेवकूफी है, जिस में परेशानियां सिर्फ लड़की के हिस्से में आती हैं.

क्यों नहीं पार्वती जैसी लड़कियां अपना पेट गिरवा लेतीं? यह सवाल भी अहम है. आशिक के प्यार की निशानी को नाजायज तरीके से पेट में रखे रह कर पैदा करने की कोई तुक नहीं है. अपने दम पर बच्चे की परवरिश कर पाना कोई हंसीखेल नहीं है, वह भी उस सूरत में जब गांठ में पैसा या रोजगार न हो.

लड़कियां ज्यादा जज्बाती होती हैं और प्यार के दौरान ख्वाबोंखयालों में जीती रहती हैं, जिन्हें उन का आशिक चिकनीचुपड़ी बातें करते हुए और हवा देता रहता है, जिस से वे उस की बदनीयती न समझ पाएं.

क्या ऐसे आशिक वाकई प्यार करते हैं? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई हां में दे. जिस की मंशा ही महज जिस्म हो, वह क्या खा कर साथ निभाएगा.

लड़कियों को प्यार करने से पहले अच्छी तरह सोच लेना चाहिए कि आज भी मर्दों का कुछ खास नहीं बिगड़ता, न ही उन के चालचलन या गलती पर कोई उन्हें कोसता या कुसूरवार ठहराता है. उलटे लड़की को ही कुलटा कहने वालों की फौज खड़ी हो जाती है.

पहचानें दगाबाजों को

फिर इस समस्या का हल क्या है, जिस से आशिक की नीयत का पता चल सके? हालांकि इस बात का कोई तयशुदा पैमाना नहीं है, फिर भी वक्त रहते कुछ एहतियात बरते जाएं, तो लड़कियां धोखा खाने से खुद को बचा सकती हैं:

* दगाबाज आशिक आमतौर पर बेरोजगार, निकम्मे और दिखावा करने वाले होते हैं. इन की एक खूबी चाशनी में डूबी प्यार भरी बातें करने की होती हैं. ये माशूका को सैक्स करने के लिए धीरेधीरे उकसाते रहते हैं.

* ये कभी किसी बात के लिए सीधे मना नहीं करते, इसलिए महबूबा इन से खुश रहती है और इस तरफ उस का ध्यान ही नहीं जा पाता कि जो हर बात में ‘हांहां’ कर रहा है, वह उन से ही अपनी बात बड़ी चालाकी से मनवा भी भी रहा है.

* दगाबाजी की पहली पहचान आशिक का यह कहना होता है कि सैक्स तो प्यार का हिस्सा है. इसे करने में कुछ गलत नहीं. आजकल तो सभी ऐसा करते हैं. फिर कुछ हुआ, तो मैं हूं न. क्या मुझ पर तुम्हें इतना भी भरोसा नहीं?

पर हकीकत में जब ऐसा कुछ हो जाता है, तो ये कहीं नहीं होते, बल्कि मुंह छिपा कर माशूका से भाग रहे होते हैं. थोड़ाबहुत डरें तो माशूका के पेट से हो जाने के बाद बच्चा गिराने का राग अलापने लगते हैं, पर यह आसान काम नहीं है.

डाक्टर और नर्सिंग होम वाले तमाम तरह के सवाल पूछते हैं और जरूरी खानापूरी करवाते हैं, इसलिए ये माशूका को उस के हाल पर छोड़ देते हैं. कई बार जब बात खुलती है, तो ये अपनी कारगुजारी से साफ मुकर भी जाते हैं.

जवानी में हमबिस्तरी की इच्छा आम है, पर इसे करने से पहले लड़कियों को आगेपीछे सोच लेना चाहिए कि अगर कंडोम या दूसरी सावधानियां नहीं बरतीं, तो लेने के देने पड़ सकते हैं. कई दफा जल्दबाजी में संबंध बन जाते हैं और नतीजा निकलता है पेट से होना, जिस का अंदाजा और तजरबा लड़कियों को नहीं रहता और जब पता चलता है, तो 2-3 महीने निकल चुके होते हैं. इस के बाद इतना ही वक्त क्या करें और कैसे करें, यह सोचने में कट जाता है. इस पर भी समाज का डर उन के मन में समाया रहता है.

अगर आशिक की मंशा दगा देने की नहीं है, तो वह घरपरिवार तो दूर की बात है, वाकई पहले अपने कहे मुताबिक जमाने से टकरा जाएगा. पर ऐसा अकसर होता नहीं है. होता यह है कि आशिक हाथ खड़े कर देता है कि अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने.

रवि जैसे आशिक तो महादगाबाज होते हैं, जो घर वालों के डर से चोरीछिपे माशूका को कहीं और ले जा कर पेट गिरवा देते हैं. चूंकि ऐसे आशिकों को माशूका और बच्चा बोझ लगने लगते हैं, इसलिए ये भाग जाते हैं. यह इन्हें समझ आ जाता है कि अब बच्चों से बंधी माशूका सिर्फ फड़फड़ा कर रह जाएगी और उस का कुछ खास नहीं बिगड़ेगा.

बात सच भी है, क्योंकि कानून ऐसी लड़कियों की ज्यादा मदद नहीं कर पाता और कोई उन्हें पनाह नहीं देता. लिहाजा, बच्चा गोद में लादे अपनी नामसमझी को कोसती और रोती माशूका सोचती रह जाती है कि कैसे एक नादानी के चलते अच्छीखासी जिंदगी बरबाद हो गई.

चुपड़ी और 2-2 : फातिका को मिल पाया सुख

रोशन अली जब 45 साल का था, तब उस की पहली बीवी की मौत हो गई थी. इस के बाद उस ने 23 साला फातिमा के साथ दूसरा निकाह कर लिया था. फातिमा का रंग गोरा था. उस का कमसिन बदन हर किसी की निगाह में चढ़ गया था, पर वह किसी को भी घास नहीं डालती थी.

रोशन अली की ढलती उम्र व कड़ी मेहनतमजदूरी करने के चलते उस का शरीर भी ठंडा पड़ गया था. वह फातिमा को खुश नहीं कर पा रहा था, जिस के चलते वह हमबिस्तर होने से कतराती थी. इसी तनाव के चलते वह टीबी के मरीज की तरह खांसती रहती थी.

उस का मन घर के कामों में भी नहीं लगता था. रोशन अली ने फातिमा का खूब इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि फातिमा की बीमारी तो जिस्मानी तौर पर असंतुष्टि थी.

एक दिन रोशन अली ने गांव के तालाब के पास एक हकीम साहब का कैंप लगा देखा. उन की उम्र तकरीबन 30 साल थी. उन का दावा था कि वे हर तरह की बीमारी का शर्तिया इलाज करते थे. हिमालय की जड़ीबूटियों से तैयार की गई दवाएं लेने से 7 दिन में बीमारी से छुटकारा मिल जाता था, ऐसा हकीम साहब का कहना था. रोशन अली फातिमा को ले कर उन के कैंप में गया और बीमारी का हाल सुनाया.

हकीम असलम एकबारगी फातिमा को देख कर दंग रह गए. उस की जवानी, गोरे बलखाते बदन को देख कर उन की लार टपक गई. फातिमा भी हकीम साहब की जवानी देख कर मुसकरा उठी और वह ललचाई नजरों के साथ जमीन कुरेदने लगी.

हकीम ने उस की नब्ज देखने के बहाने हाथ से हाथ मिला कर कहा, ‘‘रोशन साहब, आप रात को 8 बजे इन्हें दोबारा यहां लाएं, ताकि फुरसत में पूरी तसल्ली से इन के शरीर की जांच की जा सके.’’

रोशन अली फातिमा को रात 8 बजे हकीम के कैंप में दोबारा ले गया. उसे बाहर इंतजार करने को कहा गया. हकीम साहब ने रोशन अली से दवाओं और सलाह के 5 सौ रुपए एडवांस में ले लिए.

रोशन अली ने देखा कि फातिमा के इलाज में ज्यादा समय लगेगा, इसलिए वह खाना खाने घर चला गया. इधर हकीम साहब ने फातिमा का हाथ पकड़ कर एक टेबल पर लिटा दिया और उसे नशे की गोलियां दे दीं, जिस से वह नशे की हालत में अंगड़ाइयां लेने लगी.

हकीम साहब ने अपना स्टैस्थोस्कोप निकाल कर कान में लगाया और फातिमा के ब्लाउज के बटन खोल कर उस के उभारों को सहलाना शुरू कर दिया. फातिमा नशे में चूर मुसकरा रही थी और मजा ले रही थी. इस तरह कुछ देर में दोनों में जोश जाग गया और टेबल पर ही वे एक हो गए. जब वे दोनों संतुष्ट हो गए, तो अलग हो गए.

हकीम साहब ने कहा, ‘‘7 दिन तक आती रहना. तुझे पूरी तरह संतुष्ट कर दूंगा और औलाद भी दे दूंगा.’’ फातिमा तो यही चाहती थी.

थोड़ी देर में रोशन अली भी आ गया. हकीम साहब ने दवा की पुडि़या पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इन्हें 7 दिनों तक मेरे कैंप में ले कर आते रहना, जिस से इन की बीमारी का पूरा इलाज हो जाए.’’ इस तरह हकीम साहब ने 7 दिनों तक फातिमा को भोगा.

इस बीच हकीम साहब की करतूतों की कहानी कई गांवों में भी फैल चुकी थी, इसलिए कुछ गांव वाले एक सिपाही को ले कर उन के कैंप पर आ धमके. छानबीन में जाली दस्तावेज, लाइसैंस, फोटो, गर्भ निरोधक वगैरह मिले. पूछताछ में हकीम ने सब सच उगल दिया और उन्हें जेल भेज कर मुकदमा दायर कर दिया गया. उन की चुपड़ी और 2-2 की पोल खुल गई.

लेकिन रोशन अली अब खुश है, क्योंकि फातिमा उस का बिस्तर पर बढ़चढ़ कर साथ देती है. जब उस ने बताया कि वह पेट से है, तो रोशन अली ने पूरे महल्ले में मिठाई बांटी. सब ने मिठाई तो खाई, पर ज्यादातर लोग जानते थे कि असलियत क्या है, क्योंकि गांवों के कई घरों में बुजुर्ग होते मर्दों की बीवियों को अचानक उलटियां होने लगी थीं.

करिश्मा तन्ना ने मस्ती करते हुए शेयर किया वीडियो

एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना का किस्मत आजकल बुलंदियों पर है. एक तरफ उनकी हालिया रिलीज फिल्म ‘संजू’ बौक्स-औफिस धमाल मचाते हुए 300 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ छोटे परदे पर करिश्मा का टीवी शो ‘नागिन’ टीआरपी की रेस में झंडे गाड़ रही है.

टीवी शो ‘नागिन’ के साथ-साथ करिश्मा आजकल एक और टीवी शो ‘कयामत की रात’ की शूटिंग में बिजी हैं. करिश्मा ने ‘कयामत की रात’ के सेट का एक वीडियो अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट किया है, जो खूब वायरल हो रहा है. इस वीडियो को 3 घंटे के भीतर 4 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं.

वीडियो में करिश्मा ‘कयामत की रात’ के सेट पर आईने में देखकर अपना मेकअप करवा रही होती हैं, तभी पीछे से एक तांत्रिक आता है और करिश्मा के बालों को सहलाने लगता है. करिश्मा जब मुड़ कर उस तांत्रिक को देखती है तो काफी जोर से चिल्लाती हैं. करिश्मा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन दिया हैं, ‘शूटिंग से पहले अपने तांत्रिक के साथ पागलपंती.’

आपको बता दें कि टीवी जगत के सबसे फेमस शो ‘बिग बौस 8’ में हिस्सा लिया था. शो में उपेन पटेल के साथ करिश्मा की नजदीकियों ने उस समय काफी सुर्खियां बटोरी थी. इस शो के बाद करिश्मा की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी. इसके अलावा करिश्मा ‘नच बलिये 7’, ‘लव स्कूल 1’ और ‘झलक दिखला जा 9’ जैसे फेमस टीवी शो में नजर आ चुकी हैं.

बुराई : जब बहकने लगें इन के कदम

पुलिस की 25 साल से भी ज्यादा नौकरी कर चुके 59 साला सबइंस्पैक्टर मोहन सक्सेना को मध्य प्रदेश के मालवा इलाके के शहर शाजापुर में हर कोई जानता था. इस की एकलौती वजह यह नहीं थी कि वे पुलिस महकमे में थे और वरदी पहन कर शहर में निकलते थे, तो लोग इज्जत से सिर झुका कर उन्हें सलाम ठोंकते थे. दूसरी वजह थी उन का एक इज्जतदार कायस्थ घराने से होना. तीसरी अहम वजह जो बीते 2 साल में पैदा हुई थी, वह उन की बहू मालती (बदला नाम) थी, जिस के बारे में हर कोई जानता था कि वह ड्राइवर अंकित चौरसिया से अकसर चोरीछिपे मिला करती थी.

दुनियाभर के लोगों को सही रास्ते पर आने की नसीहत देने वाले दारोगाजी खुद अपनी बहू के बहकते कदम नहीं संभाल पा रहे थे. खून तो खूब खौलता था, लेकिन क्या करें यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

यों बहकी बहू

24 साला अंकित चौरसिया पेशे से ड्राइवर था, जो फिलहाल शाजापुर की ही एक मालदार व इज्जतदार औरत निर्मला गौर की कार चला रहा था. गोराचिट्टा खूबसूरत बांका अंकित खुशमिजाज और बातूनी था. जल्दी ही वह घर के सभी लोगों से घुलमिल गया था. इस के पहले वह मोहन सक्सेना की कार चलाता था.

लेकिन 25 साला बहू मालती ड्राइवर अंकित चौरसिया से जरूरत से ज्यादा घुलमिल गई थी. शुरू में तो किसी ने इस बात पर गौर नहीं किया, लेकिन जल्दी ही वे दोनों चोरीछिपे मिलनेजुलने लगे और उन के प्यार की सुगबुगाहट दारोगाजी के कानों में पड़ी, तो उन्होंने तुरंत अंकित को नौकरी से निकाल दिया और आइंदा मालती से दूर रहने की धमकी दे डाली.

यह नसीहत और धौंस बेकार साबित हुई. अंकित की नौकरी छूटी थी, महबूबा नहीं. लिहाजा, वह मोहन सक्सेना और नितिन की परवाह किए बिना मालती से मिलता रहा.

और एक दिन…

बदनामी का पानी तो काफी पहले ही सिर से गुजर चुका था, पर अब इतना लबालब भर गया था कि मोहन सक्सेना को सांस लेना भी मुहाल हो चला था. लिहाजा, उन्होंने नए साल की शुरुआत में कसम खा ली थी कि अगर अंकित सीधे बात नहीं मानता है, तो उसे सबक सिखाने के लिए जो भी रास्ता अख्तियार करना पड़े वे करेंगे.

जब किसी भी तरह मानमनोव्वल और धौंस के अलावा तंत्रमंत्र से भी बात नहीं बनी, तो मोहन सक्सेना का अक्ल और सब्र से नाता टूट गया. लेकिन इस बाबत उन्होंने जो रास्ता चुना, वह बेहद खतरनाक था.

झमेला तंत्रमंत्र का

संजय व्यास जैसे तांत्रिकों की छोटे शहरों में बड़ी धाक और पूछपरख रहती है, जिन के बारे में यह मशहूर रहा है कि उन के नीबू काटने की देर भर है,  अच्छेअच्छे रास्ते पर आ जाते हैं.

इस मामले में एक बात बड़ी दिलचस्प रही कि मोहन सक्सेना और नितिन तो इस तांत्रिक के चक्कर काट ही रहे थे, लेकिन इस बात से अनजान अंकित भी उस के फेर में आ गया था, जिस की परेशानी यह थी कि मालती उस के वश में पूरी तरह नहीं आ रही थी. वह उसे पसंद तो करती थी, पर शादी करने के लिए राजी नहीं हो रही थी.

कुछ दिन तो मजे ले कर संजय व्यास ने उन दोनों से पैसा झटका, पर अंकित गरीब था, इसलिए अनुष्ठानों के नाम पर ज्यादा चढ़ावा नहीं दे पा रहा था. इसी बीच काम हो जाने के लिए लगातार दबाव बना रहे मोहन सक्सेना को वह यह समझा पाने में कामयाब हो गया कि बहू के ऊपर कोई बड़ी बला है, इसलिए अंकित को रास्ते से हटाने का एकलौता उपाय उसे इस दुनिया से ही उठा देना है.

योजना के मुताबिक, संजय व्यास ने अंकित को यह झांसा दिया कि मालती हमेशा के लिए उस के वश में हो सकती है, लेकिन इस के लिए एक खास किस्म का अनुष्ठान करना पड़ेगा.

उम्मीद के मुताबिक, मालती के लिए पगलाया अंकित पूजा कराने को तुरंत तैयार हो गया. संजय ने उसे बताया था कि यह खास किस्म की तांत्रिक क्रिया दूर किसी सुनसान सिद्ध जगह पर करनी पड़ेगी. इस पर अंकित ने एतराज नहीं जताया, न ही कोई सवाल किया.

17 जनवरी, 2016 की सुबह अंकित अपनी मालकिन निर्मला गौर के पास गया और उज्जैन जाने के लिए उन की कार मांगी. उस ने बहाना यह बनाया कि वह कुछ दोस्तों के साथ महाकाल मंदिर के दर्शन करने जाना चाहता है. उस की बात पर निर्मला गौर को कोई शक नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपनी कार उसे दे दी.

दोस्त तो नहीं, पर अपने कातिलों में से एक संजय व्यास को उस ने कार में बैठाया और बजाय उज्जैन जाने के तांत्रिक के बताए रास्ते पर गाड़ी दौड़ा दी.

बैरसिया तहसील के पास भोजपुरा के घने जंगलों में संजय व्यास ने कार रुकवाई और कहा कि यहीं पूजा होगी. उधर पहले से ही बनाई योजना के मुताबिक, मोहन सक्सेना और नितिन बैरसिया होते हुए भोजपुरा पहुंच गए थे.

एक सुनसान जगह को तांत्रिक क्रियाओं के लिए मशहूर बताते हुए संजय व्यास ने अंकित को पूजापाठ के लिए बैठाया. कुछ देर ऊलजलूल क्रियाएं करने के बाद तांत्रिक ने उसे आंखें बंद करने को कहा, तो अंकित ने तुरंत उस के हुक्म की तामील की.

अंकित ने जैसे ही अपनी आंखें बंद कीं, तभी पीछे से मोहन सक्सेना और नितिन आ गए. अंकित ने आहट पा कर जैसे ही आंखें खोलीं, तो उन दोनों ने उस की आंखों में पिसी लाल मिर्च झोंक दी.

तिलमिलाया अंकित समझ तो गया कि उस के साथ धोखा हुआ है, लेकिन कुछ कर पाता इस के पहले ही उन तीनों ने लोहे की छड़ उस के सिर पर दे मारी.

कहीं वह जिंदा न बच जाए, इसलिए वहशी हो गए मोहन सक्सेना, नितिन और संजय ने उस पर पत्थरों से भी हमले किए. जब उस के मरने की तसल्ली हो गई, तो वे तीनों वहां से फरार हो गए.

यों पकड़े गए

17 जनवरी, 2016 की ही दोपहर को बैरसिया पुलिस को एक नौजवान की लाश जंगल में पड़ी होने की खबर मिली, तो लाश बरामद कर कातिलों को ढूंढ़ने का काम शुरू हो गया.

हत्या की जगह से कुछ दूर ही खड़ी कार की पड़ताल से पता चला कि यह कार तो शाजापुर की निर्मला गौर नाम की औरत की है. जब उन से पुलिस ने पूछताछ की, तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि उन का ड्राइवर अंकित उन से उज्जैन जाने की कह कर कार ले गया था. बैरसिया कैसे पहुंच गया, यह उन्हें नहीं मालूम.

इधर मोहन सक्सेना इंदौर होते हुए शाजापुर लौट आए और थाने में शिकायत दर्ज करा दी. उन तीनों ने होशियारी दिखाते हुए मोबाइल फोन साथ नहीं रखे थे, क्योंकि इस से तुरंत लोकेशन पता चल जाती. लेकिन बैरसिया के पैट्रोल पंप पर अंकित ने कार में पैट्रोल डलवाया था. वहां के मुलाजिमों ने कार में संजय व्यास के होने की शिनाख्त की, तो पुलिस वालों के पास अब कहने और करने को ज्यादा कुछ नहीं रह गया था.

हत्या के जुर्म में गिरफ्तार होते ही संजय व्यास तमाम तंत्रमंत्र भूल गया और सारी बात सच उगल दी. जल्दी ही मोहन सक्सेना और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ में मोहन सक्सेना ने अपने ही महकमे के मुलाजिमों को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन कहानी में दम नहीं रह गया था, इसलिए उन्होंने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया.

क्या करें घर वाले

जैसे ही बहू, बेटी या घर की दूसरी किसी औरत के बाहरी मर्द से संबंध पकड़े जाते हैं या बदनामी की वजह बनने लगते हैं, तो घर वालों को समझ नहीं आता कि ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

बहकी औरत अगर बहू है, तो ज्यादा रोकने या मारपीट करने पर दहेज का मुकदमा दर्ज कराने की धौंस देती है यानी ससुराल वालों की बेबसी का पूरा फायदा उठाती है और वहीं रह कर उन के सामने ही गलत रास्ते पर चलते रहना चाहती है, क्योंकि यह महफूज रहता है.

अगर वह औरत बेटी है, तो डर उस के भागने या पेट से होने का बना रहता है. तीसरा बड़ा डर खुदकुशी कर लेने का होता है, जिस की धौंस पराए मर्द की मुहब्बत में पड़ चुकी औरत अकसर देती भी रहती है.

जिस्मानी और जज्बाती तौर पर दूसरे की गिरफ्त में आ चुकी औरत किसी का कहना नहीं मानती और न ही उसे घर की इज्जत और समाज के कायदेकानूनों के अलावा नातेरिश्तों से कोई वास्ता रहता. बात उस समय और बिगड़ती है, जब उस का आशिक भी हौसले दिखाने लगता है. दोनों ही अपने मांबाप और दुनियाजहान के बारे में नहीं सोचते, तो साफ है कि उन्हें समझाने या रोकनेटोकने से कोई फायदा नहीं होता.

इसलिए बेहतर यही है कि जब औरत के कदम बहकने लगे और तमाम नसीहतों के बाद भी वह न माने तो बजाय जुर्म का रास्ता चुनने के उसे अपनी मरजी से जीने दिया जाना चाहिए. इज्जत और समाज की बात इसलिए माने नहीं रखती कि कोई इश्क कभी छिपता नहीं, बल्कि जितना छिपाया जाए उलटे ज्यादा ही विस्फोटक तरीके से दुनिया के सामने आता है.

समझाने पर न माने जैसा कि ऐसे मामलों में अकसर होता है, तो कानूनी लिखापढ़ी कर औरत को उस के आशिक के साथ जाने दे कर अपना पिंड छुड़ा लेना एक बेहतर रास्ता है.

हालांकि इस में जगहंसाई भी होगी, पर वैसी और उतनी खतरनाक नुकसानदेह नहीं होगी, जैसी मोहन सक्सेना के मामले में हुई.

औरतें भी समझें हकीकत

पराए मर्द के प्यार में जिन औरतों के पैर संभाले नहीं संभलते हों, उन्हें इस मामले से सबक लेना चाहिए कि जो मर्द उन्हें ब्याह कर लाया है, उस में कोई कमी या कमजोरी हो सकती है, पर उस का यह मतलब कतई नहीं कि उस से इस तरह बदला लिया जाए.

दूसरा, यह भी सोचसमझ लेना चाहिए कि ऐसे रिश्तों की उम्र ज्यादा नहीं होती और न ही अंजाम हमेशा अच्छा होता है. इस के अलावा दूसरा मर्द यानी आशिक वफादार ही होगा, इस की कोई गारंटी नहीं होती.

कई मामलों से साफ हो चुका है कि वह जिस्म से खेलता है, पैसे ऐंठता है और जोर डालने पर बीच भंवर में छोड़ कर भाग भी जाता है. ऐसी औरत कहीं की नहीं रह पाती.

ऐसे ताल्लुकों से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, सिवाय तांत्रिकों के, जो दोनों पार्टियों से पैसा ऐंठते हैं और फिर बात न बनने पर कत्ल जैसे संगीन जुर्म के लिए उकसाते हैं और ज्यादा पैसों के लालच में उस में साथ भी देते हैं. अगर वे नहीं पकड़े जाते तो तय है कि तांत्रिक संजय व्यास जिंदगीभर सक्सेना परिवार को ब्लैकमेल कर उन से रकम ऐंठता रहता.

सब से बड़ा तनाव झेलने वाले घर वालों को चाहिए कि वे चार लोगों को बैठा कर सारा सच खुद उगलें और औरत को भी साथ बैठा लें, जिस से वह कोई झूठ न बोल सके और न ही गलत इलजाम लगा सके. इस से बदनामी जो आज नहीं तो कल होती जरूर होगी, लेकिन जिंदगी बची रहेगी और औरत की गलती भी सामने आ जाएगी.

क्यों बहकती हैं औरतें

* पति से जिस्मानी सुख न मिल पाना और शर्म के मारे इस की बात किसी से न कर पाना.

* ससुराल वालों खासतौर से पति से जज्बाती लगाव का पैदा न हो पाना.

* कम उम्र में ही पराए मर्दों से घुलनेमिलने या सैक्स की आदत पड़ जाना.

* घर या ससुराल में बंदिशों का ज्यादा होना और रोजरोज कलह होना.

* दिलफेंक, खूबसूरत जवां मर्दों पर दिल आ जाना, उन की लच्छेदार बातों में फंस जाना, फिर छुटकारा पाने की कोशिश में और उस के जाल में और फंसते जाना.

* पति से समय न मिलना.

* पति का उम्मीद के मुताबिक रोमांटिक न हो पाना.

* इस बात का फायदा उठाना कि ससुराल या घर वाले तो इज्जत के लिए खामोश रहेंगे.

* घर में मन न लगना और हमेशा रोमांटिक और सैक्सी खयालों में डूबे रहना.

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