इस टीवी शो में डायन का किरदार निभाएंगी मोनालिसा

टीवी पर इन दिनों हौरर सीरियल्‍स की जैसे बाड़ सी आ गई है. लगभग हर चैनल पर भूतियां कहानियां दर्शकों को डराने के लिए तैयार हैं. इसी सब के बीच टीवी पर नया टीवी शो ‘नजर’ जल्‍द ही शुरू होने जा रहा है. इस सीरियल में भोजपुरी की सुपरहिट स्‍टार एक्‍ट्रेस मोनालिसा भी नजर आने वाली हैं. ‘बिग बौस’ के सीजन 10 में नजर आईं एक्‍ट्रेस मोनालिसा पिछले दिनों अपनी बंगाली वेब सीरीज ‘दुपुर ठाकुरपुर’ में भी काफी छायी रही थीं. लेकिन फिल्‍मों के बाद वेब सीरीज और टीवी पर एंट्री मारने वाली मोनालिसा टीवी के किसी फिक्‍शन शो का हिस्‍सा ही नहीं बनना चाहती थीं.

नजर मोनालिसा का पहला टीवी फिक्‍शन शो होने वाला है. वह इस सीरियल में मोहना (एक डायन) के किरदार में नजर आएंगी. बिग बौस में अपने बौयफ्रेंड और भोजपुरी एक्‍टर विक्रांत से शादी करने के बाद मोनालिसा काफी सुर्खियों में आ गई थीं. इस शो के बाद मोनालिसा को कई सारे प्रोजेक्‍ट्स की पेशकश हुई, लेकिन उन्‍होंने किसी को नहीं चुना.

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ऐसे में अब हिंदी सीरियल में काम करने को लेकर मोनालिसा ने अपने एक बयान में कहा, ‘भोजपुरी सिनेमा की एक प्रसिद्ध एक्‍ट्रेस होने के चलते मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कभी छोटे पर्दे पर काम करुंगी. यहां तक की मैं टीवी पर किसी फिक्‍शन शो का हिस्‍सा ही नहीं बनना चाहती थी. लेकिन फिर मुझे ‘नजर’ का औफर आया. इस शो की स्क्रिप्‍ट ने मुझे काफी इंप्रैस किया और यह काफी अलग भी है. इस डायन की कई सारी शक्तियों और इस शो की मजेदार कहानी ने मुझे इस शो की तरफ खींचा.’

शादी का पहाड़ा जो कोई बांचे

वे काफी देर तक ऐसे बैठे रहे, जैसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए हों. उन्हें झकझोरा गया, तब बड़े अफसोस के साथ उन्होंने आहिस्ता से अपना सिर हिलाया.

गहरे कुएं से आती हुई आवाज में वे बोले, ‘‘अच्छे दिनों के हल्ले में कैसे बुरे दिन आ गए हैं कि अभी एक दुलहन ने विवाह मंडप में शादी करने से इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि दूल्हा 15 का पहाड़ा नहीं बोल पाया. लाख मिन्नतों के बावजूद दूल्हे को बैरंग लौटना पड़ा.’’

‘‘यह कहो न कि सेर को सवा सेर मिलने की टीस है. इसे ही अच्छे दिन कहते हैं कि आज की लड़कियां होने वाले पति के हिसाबकिताब करने की ताकत को चैक कर रही हैं, वरना अभी तक तो मर्द ही औरत के हुनर का इम्तिहान लेता आया है,’’ मैं ने इतना कहा, तो उन्होंने मुझे यों घूरा, जैसे वह ठुकराया हुआ दूल्हा मैं ही होऊं.

वे मुझे नीचे से ऊपर तक घूरते हुए बोले, ‘‘चलो, एकबारगी बोल भी देता तो क्या, सारे पहाड़े तो वैसे भी शादी के बाद भूल जाने थे.’’

‘‘लगता है कि एक दुलहन द्वारा ठुकराए जाने पर तुम्हारे जैसे मर्दों की मर्दानगी को ठेस पहुंची है.’’

‘‘देखो, तुम मुझे गलत समझ रहे हो. दरअसल, बात यह है कि…’’

बात को बीच में ही काटते हुए मैं ने टोका, ‘‘तो तुम क्या समझाना चाहते हो? हम जब कोई सामान खरीदते हैं, तो पहले अच्छी तरह ठोंकबजा कर देखते हैं कि नहीं? वैसे भी यह तो होना ही था. बैरंग लौटने वालों की फेहरिस्त अब बढ़ती ही जा रही है.

‘‘अभी पिछले दिनों एक दूल्हे ने वरमाला डालते समय गरदन नहीं झुकाई, तो दुलहन ने उसे चलता कर दिया. एक दूल्हे के मुंह से शराब की गंद आई, तो फेरे उलटे पड़ गए.

‘‘इस से भी आगे बढ़ते हुए एक दूल्हे ने दुलहन की सहेलियों पर थोड़ा बेहूदा कमैंट कर दिया, बस फिर क्या था. दूल्हे को कमैंट करना ही भुला दिया गया, इसलिए यह वक्त चोट खाए जख्मों को सहलाने का नहीं, बल्कि सोचनेविचारने का है.’’ वे रोंआसे हो गए और अफसोस में सिर हिलाते हुए बोले, ‘‘काश, किसी ने मुझ से भी शादी के वक्त पहाड़ा बुलवाया होता.’’

‘‘अगर बुलवाया होता, तो आप तो फर्राटे से पहाड़ों के पहाड़ पर चढ़ जाते. शादी का लड्डू जो खाने को बेताब थे,’’ मैं ने मजाकिया लहजे में कहा.

मेरे दोस्त खिसियानी हंसी हंसते हुए कहने लगे, ‘‘बात तो तुम्हारी सच है, लेकिन क्या है कि हम गणित में बचपन से ही कमजोर थे. किसी तरह बोर्ड का वाघा बौर्डर पार कर पाए थे. हमारी किस्मत ही खराब थी, जो किसी ने मंडप में हम से पहाड़ा नहीं बुलवाया, वरना हम तो वहीं फेल हो जाते. फिर ताउम्र जिम्मेदारियों के पहाड़े रटने से छुटकारा पा जाते और इस तरह अच्छीखासी जिंदगी पहाड़ा नहीं होती.’’

उन के दर्द का समंदर जैसे बह निकला था. वे कहते गए, ‘‘सारी उम्र रिश्तों के फौर्मूले सुलझाने में गुजार दी, मगर जोड़ हमेशा गलत ही बैठा. किसी ने सही कहा है कि शादी चार दिन की चांदनी है, फिर अंधेरी रात है. चमकता जुगनू है, जिस की कुछ पलों की चमक अच्छी लगती है.’’

‘‘दोस्त, नर हो न निराश करो मन को… धीरज धरो. वैसे, तुम क्या समझ कर शादी के झाड़ पर चढ़े थे?’’

‘‘काहे के नर, बस वानर समझो, जिन के हिस्से में उछलकूद है. किसी शायर ने सही कहा है, ‘शादी आग का दरिया है और डूब के जाना है’. कई लोग यह कह कर उकसाते पाए जाते हैं कि ‘जो डूबा सो पार गया’, लेकिन यहां जो डूबा, फिर क्या खाक उबरा.

‘‘शादीशुदा जिंदगी नदी के दो किनारों की तरह है, जो जिंदगीभर मिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी मिल नहीं पाते हैं. शादी धरती व आसमान का वह किनारा है, जिस में सिर्फ मिलने का भरम है. पास जाओ, तो सबकुछ साफ है.’’

‘‘दुखी आत्मा, जिसे तुम आग का दरिया कह रहे हो, वह शादी नहीं इश्क है. दो किनारों की खूबसूरती इसी में है कि वे तमाम उम्र चाहत, जुनून और जोश के साथ मिलने की कोशिश में लगे रहें. इस से उन का आपसी खिंचाव बना रहता है.’’

‘‘यह शादी का दार्शनिक पक्ष है जनाब, हकीकत इस के उलट है. यह ऐसा लड्डू है, जिसे देशी घी के भरम में बड़े चाव से मुंह में डालते हैं और वैजीटेबल घी से ठग लिए जाते हैं. वैसे, इश्क हो तो आग का दरिया क्या, तलवार की धार पर भी दौड़ जाएं. मेरा तो इतना कहना है कि शादी सुख का विलोम है,’’ वे बोले.

‘‘यदि यह विलोम है, तो अनुलोम का अभ्यास कर के इसे एक लय देनी चाहिए. वैसे, अनुलोमविलोम से एक लयकारी, संतुलनकारी रिद्म बनती है. शादी एक अनुशासन पर्व है, सुव्यवस्थित जीवनशैली का नाम है. लेकिन मर्दों के लंपट मन को अनुशासन में बांधना शेरों को ब्रश कराने से कम नहीं है. कोई कोशिश कर ले, तो तिलमिला जाते हैं. सबकुछ छूट रहा है, मगर हेकड़ी नहीं जाती. यही तो मर्दवादी नजरिया है.’’

वे हमारी बातें चुपचाप सुनते रहे, अफसोस में घोड़े की तरह हिनहिनाते रहे, लेकिन मानने को तैयार नहीं दिखे. जिन्हें मनाता समय है, उन्हें तो यही कह सकते हैं कि अबे, मान भी जाओ मर्द, वरना बहुत पछताओगे.

संत महात्माओं की काली दास्तान

हमारे देश में लोग संतों और महात्माओं को इतनी ज्यादा अहमियत देते हैं कि गरीब लोग भी दिनरात मेहनत कर के खुद रूखासूखा खा कर अपनी जिंदगी गुजारते हैं, मगर इन की सेवा में वे अपना सबकुछ गंवा देते हैं. उन की इसी सेवाभक्ति को देख कर जब किसी को कोई रोजगार नहीं मिलता है, तो वह साधुमहात्मा बन कर ऐशोआराम की जिंदगी बिताता है.

एक 40 साला तथाकथित महात्मा ने बताया कि पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के कई साल बाद भी जब उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली, तो वे परेशान हो कर एक महात्माजी के पास चले गए और आश्रम में रह कर उन की सेवा करने लगे.

उस आश्रम में बड़ेबडे़ नेता, अफसर व सेठसाहूकार उन महात्मा की शरण में आते थे और उन्हें भारीभरकम दक्षिणा देते थे. उन की खूबसूरत बीवीबहन, बेटियां भी उन महात्मा की खूब सेवा किया करती थीं. कई लोग तो महात्मा की सेवा के लिए अपने घर की औरतों को आश्रम में भी छोड़ जाते थे.

एक रात वे 40 साला महात्मा आश्रम में ही बने अपने कमरे में सो रहे थे, तभी एक 30 साला खूबसूरत औरत उन के कमरे में आ कर उन्हें जगाते हुए बोली कि उसे बड़े महात्माजी ने सेवा के लिए भेजा है.

उस औरत की समस्या यह थी कि शादी के 2 साल बाद भी उसे कोई औलाद नहीं हुई थी.

उस औरत ने उन से यह भी कहा कि आप के आशीर्वाद से वह जल्द ही मां बन सकती है. इतना कह कर वह उन के पैर दबाने लगी.

पैर दबाने के बाद उस औरत ने महात्मा के शरीर की मालिश करने के लिए उन के कपड़े उतार दिए थे. काफी देर मालिश कर के वह बगल में ही लेट कर उन के बदन पर अपने नाजुक हाथों को फेरते हुए अपने मुंह को कानों पर ला कर कोयल जैसी मीठी आवाज में पूछ रही थी कि वह इस सेवा से मां तो बन जाएगी न?

यह कहते हुए वह महात्मा से लिपट कर गुदगुदी करने लगी थी. उस की इन हरकतों के जवाब में महात्मा भी उस के साथ वैसी ही हरकतें करने लगे. जब उस औरत को मां बनने का पूरा यकीन हो गया, तो वह अपने घर चली गई.

2 महीने बाद जब वह औरत अपने परिवार के साथ वापस आई, तो पेट से थी. उस के घर वाले और वे महात्मा बहुत खुश थे.

देश का एक 60 साला नामी संत अपनी दास्तान सुनाते हुए कहने लगा कि वह बचपन में बहुत शैतान था. उस का पढ़ाईलिखाई में बिलकुल मन नहीं लगता था. वह अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से भी लड़ताझगड़ता रहता था.

एक बार एक छात्र ने उस की शिकायत मास्टर से की, तो उस मास्टर ने उसे खूब मारा.

मास्टर की पिटाई से नाराज हो कर उस ने पत्थर से उस छात्र का सिर फोड़ दिया.  जब मास्टर ने उस के घर वालों से इस हरकत की शिकायत की, तो उन्होंने उसे डांटा. उस ने घर से भागने में ही अपनी भलाई समझी और हमेशा के लिए  घर छोड़ दिया था.

घर से भाग कर वह लड़का संतमहात्माओं के पास रहने लगा था. वहां पर उस ने उन संतमहात्माओं से जंगल की जड़ीबूटियों से ऐसीऐसी दवाएं बनाने के नुसखे सीखे कि धीरेधीरे उस की उन दवाओं से लोगों को फायदा होने लगा था.

आज वह देश का एक नामी संत है. देश में उस के बड़ेबड़े कारोबार चल रहे हैं. देशविदेश में उस के बनाए सामान बिक रहे हैं.

इसी तरह एक 55 साला साधु ने अपनी दास्तान सुनाते हुए बताया कि वे पढ़ाई में कमजोर थे. उन के घर वाले भी पड़ोस में रहने वाले एक लड़के की तारीफ करते नहीं थकते थे.

वे उस लड़के के बारे में कहा करते थे कि वह पढ़लिख कर एक दिन बहुत बड़ा सरकारी अफसर बनेगा. उन की बातों को सुन कर उन साधु ने अपने दिल में ठान लिया था कि वे भी अपने तेज दिमाग से बड़ेबड़े अफसरों और नेताओं से अपनी खुशामद कराएंगे.

यह सोच कर वे एक बड़े संत के आश्रम में जा कर उन की सेवा करने लगे. धीरेधीरे अपने इलाके में उन का नाम होने लगा था. उन में इतना दिमाग था कि कुछ बेरोजगार नौजवानों की सेवा लेना भी उन्होंने शुरू कर दिया था.

वे नौजवान अपने इलाके के लोगों से मिल कर उन की समस्याएं इकट्ठा करने लगे थे. उन्होंने उन की समस्याओं को उन साधु को बताना शुरू कर दिया था.

पीडि़त लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उन के पास आने लगे थे. वे संत उन के कहने से पहले ही जब समस्या बताने लगते, तो वे लोग उन्हें सुन कर हैरान हो जाते.

ज्यादातर लोग उन्हें बहुत पहुंचा हुआ संत मानने लगे थे. वे खुश हो कर उन की खूब सेवा किया करते और भारीभरकम भेंट देने लगे थे. बड़ेबड़े नेता, अफसर और सेठसाहूकार उन्हें अपने यहां बुला कर खूब दक्षिणा देने लगे थे. उन्होंने उन के कई जगह बड़ेबड़े आश्रम भी बनवा दिए थे.

अपने गांव का पढ़ाई में होशियार वह दूसरा लड़का भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर हो गया था. जब एक मामले में वह फंसा, तो वह उन साधु की शरण में आ कर मामले से बचाने के लिए उन के हाथपैर जोड़ने लगा. तब बाबा ने ही नेताओं और अफसरों से कह कर उसे बचाया था.

इन तथाकथित संतमहात्माओं की दास्तान से यही नतीजा निकलता है कि देश के लोग 21वीं सदी में भी अंधविश्वासों में ऐसे जकड़े हैं कि वे उन की सेवा में अपना सबकुछ हंसीखुशी लुटाने को तैयार रहते हैं.

बिहारी स्वैगर स्वाति ने गाया ‘तेरा घाटा’ का फीमेल वर्जन

यू-ट्यूब पर गजेंद्र वर्मा का लिखा गीत ‘तेरा घाटा’ बेहद पौपुलर हो चुका है. अब इस गाने को फीमेल वौइस में ‘बिहारी स्वैग’ यानी स्वाति शर्मा ने गाया है. इस गाने को लोग खूब पसंद भी कर रहे हैं. इस गाने को स्वाति ने अपने ही यू-ट्यूब चैनल से रिलीज किया है. स्वाति शर्मा ने अपनी आवाज से इस गाने को और भी खूबसूरत बना दिया है.

लोगों द्वारा गाने को पसंद करने से उत्साहित स्वाति ने कहा कि ‘तेरा घाटा’ सौंग यूथ के बीच काफी फेमस है और मुझे भी इसके लिरिक्स पसंद हैं. मुझे भी इस गाने को करने में मजा आया. यह एक रोमांटिक सौंग है. उम्मीद है कि श्रोताओं को भी पसंद आएगा.

बता दें कि स्वाति इससे पहले ‘बन्नो तेरा स्वैगर’ (तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स) से चर्चा में आई थीं, जिसे पूरे देश ने पसंद किया था. उस गाने ने स्वाति को फिल्म जगत में एक पहचान दिलाई.

इसके बाद उन्होंने अपने कई गानों से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. पिछले साल भी सनी लियोनी और अरबाज खान की फिल्म ‘तेरा इंतजार’ में ‘सेक्सी बार्बी गर्ल’ गाकर वह सुर्खियों में आ गई थीं.

ऐसे करें रेलवे परीक्षा की तैयारी

भारत का प्रथम रेल मंत्री कौन था और 400 का 36 प्रतिशत कितना होगा? अगर ऐसे आसान से सवालों के जवाब आप को नहीं मालूम हैं और आप रेलवे की गु्रप डी परीक्षा का फौर्म भरने यानी लगभग 2 करोड़ उम्मीदवारों में से एक हैं तो तय है आप के चुने जाने की उम्मीद न के बराबर है. लेकिन अभी भी अगस्तसितंबर तक का वक्त है कि आप इस कठिन परीक्षा को पास कर रेलवे में नौकरी करने का अपना ख्वाब पूरा कर सकते हैं.

इस साल रेलवे ने ग्रुप सी और डी की बंपर करीब 1 लाख रिक्तियां निकाली हैं जिन के लिए 2 करोड़ से भी ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया है यानी अगर आप को रेलवे की नौकरी चाहिए तो औसतन 200 उम्मीदवारों को पछाड़ना पड़ेगा. इस के लिए जरूरी है कि इस परीक्षा की सारी जानकारी आप को हो और लिखित परीक्षा, जिसे सीबीटी यानी कंप्यूटर बेस्ड टैस्ट कहा जाता है, की तैयारी और विषयों की भी जानकारी हो.

समझें परीक्षा का तरीका

सीबीटी परीक्षा की पहली सीढ़ी है जिस में डेढ़ घंटे के पेपर में उम्मीदवारों को 100 सवालों के जवाब देने हैं. हरेक सवाल के 4 उत्तर दिए जाएंगे, जिन में से उम्मीदवार को सही जवाब पर निशान लगाना है.

इस औनलाइन परीक्षा में गणित के 25 सवाल, तर्कशक्ति यानी जनरल इंटैलीजैंस के 25, जनरल साइंस के 30, सामान्य जागरूकता यानी जनरल अवेयरनैस के 20 सवाल होंगे. हर सवाल 1 नंबर का होगा. गलत उत्तर देने पर नकारात्मक मूल्यांकन होगा यानी नंबर कम हो जाएंगे. 1 गलत जवाब पर उम्मीदवार के 1/3 नंबर कटेंगे.

परीक्षा की दूसरी सीढ़ी शारीरिक क्षमता यानी फिजिकल टैस्ट होगी. इस में उम्मीदवारों को बुलाया जाएगा जो सीबीटी की मैरिट में जगह हासिल कर पाएंगे. सीबीटी में पास होने के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को कम से कम 40 प्रतिशत नंबर लाने जरूरी हैं, जबकि ओबीसी, एससी और एसटी कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 30 नंबर लाना जरूरी होगा.

इतने नंबर लाने का मतलब यह नहीं है कि उम्मीदवार ने पहली सीढ़ी पार कर ली है. ये न्यूनतम नंबर हैं जिन से आप पास हुए कहलाएंगे लेकिन अगली सीढ़ी चढ़नी जरूरी है कि आप मैरिट में हों, इस के लिए अहम है कि सीबीटी में ज्यादा से ज्यादा नंबर हासिल किए जाएं. अगर 1 लाख पदों के लिए परीक्षा हो रही है तो मैरिटलिस्ट में उन 2 लाख लोगों को जगह मिलेगी जिन के नंबर सब से ज्यादा होंगे.

बेरोजगार युवाओं में इस परीक्षा को ले कर खासा जोश है और सभी तैयारियों में जुटे हुए हैं. उम्मीदवारों की भारी तादाद के चलते परीक्षा आसान नहीं होगी. साफ है, पास वही होगा जो बेहतर पढ़ाई करेगा.

सीबीटी पर ध्यान दें

सीबीटी को पास करने और अच्छे नंबर ला कर मैरिट लिस्ट में जगह बनाने के लिए जरूरी है कि उम्मीदवार अभी से खुद को तैयारी में झोंक दें.

सब से पहले गणित पर ध्यान दें जिस में लाभहानि, प्रतिशत, गुणाभाग और दूसरे सवाल पूछे जाते हैं. ये सवाल आमतौर पर आसान होते हैं, लेकिन गणित में कमजोर उम्मीदवारों को काफी कठिन लगते हैं. गणित में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने जरूरी हैं. उम्मीदवार पहली से ले कर 8वीं क्लास तक की गणित की किताबें खंगालें और ज्यादातर तैयारी उन से ही करें. अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, ज्यामिति और त्रिकोणमिति के सवालों की प्रैक्टिस ही नैया पार लगा सकती है.

गणित के बाद जनरल साइंस पर ध्यान दें जिस में विज्ञान के आसान सवाल पूछे जाते हैं, मसलन शरीर में कितनी हड्डियां होती हैं, मनुष्य एक मिनट में कितनी बार सांस लेता है और विटामिन ‘ए’ का रासायनिक नाम क्या है. ऐसे हजारों सवालों में से कोई भी 30 पूछे जा सकते हैं.

गणित की तरह विज्ञान भी बहुत बड़ा विषय है, जिस में 30 नंबरों के लिए हजारोंलाखों सवालों के जवाब आने चाहिए. अगर पढ़ा जाए तो जनरल साइंस बेहद दिलचस्प विषय है जिस के बारे में यह सोच कर हथियार नहीं डालने चाहिए कि इतने सवालों के जवाब कैसे याद रखें.

यही हाल जनरल नौलेज का है, जिस के समंदर में कितने ही गोते लगाओ, मोती नहीं मिलते. धर्म, खेल, राजनीति, कृषि, साहित्य, मनोरंजन जगत, भूगोल, इतिहास जैसे दर्जनों विषयों की पढ़ाई जनरल नौलेज के लिए करनी पड़ती है. तब कहीं जा कर उम्मीदवार को लगता है कि वह कुछ जानने लगा है.

तर्कशक्ति से उम्मीदवार की सामान्य बुद्धि परखी जाती है, मसलन आम, केला, गोभी और अमरूद में से कौन सा आइटम अलग है. जाहिर है इस सवाल का जवाब गोभी होगा क्योंकि बाकी आइटम फलों में आते हैं.

ये आसान उदाहरण महज समझाने की गरज से दिए गए हैं ताकि आप को समझ आए कि तैयारी कैसे करनी है.

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पहली सीढ़ी

गणित छोड़ कर सभी विषयों के पेपर्स में अधिकांश सवाल करंट विषयों पर पूछे जाते हैं. इसलिए पिछले एक साल की जनरल नौलेज यानी घटनाओं की जानकारी होनी बहुत जरूरी है. इस के लिए बेहतर होगा कि उम्मीदवार समाचारपत्र और पत्रिकाएं पढ़ें तथा पिछले दिनों की घटनाओं को इकट्ठा करें. रामनाथ कोविंद से पहले भारत का राष्ट्रपति कौन था, जैसे सवालों के जवाब आने जरूरी हैं. मौजूदा मंत्रिमंडल की जानकारी के अलावा सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के नाम मालूम होने भी जरूरी हैं.

केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि खेलों में क्याक्या हो रहा है, इस की जानकारी भी जरूरी है, मसलन, साल 2007 में विंबलडन का खिताब किस ने जीता था या फिर हालिया कौमनवैल्थ गेम्स में भारत ने कितने पदक जीते थे.

ये सब पढ़ना अगर आसान नहीं है तो कठिन भी नहीं है. वजह, अधिकतर उम्मीदवारों की हालत और जानकारी लगभग एकजैसी होती है. इसलिए अभी से जो पढ़ाई में जुट जाएगा वही फायदे में रहेगा. इसलिए इन बातों पर गौर करते हुए पढ़ाई करें :

  • अगर वाकई आप नौकरी हासिल करना चाहते हैं तो रोजाना कम से कम 8 घंटे पढ़ाई करें.
  • बाजार में तरहतरह की किताबें मौजूद हैं, उन सभी को बारबार पढ़ें.
  • समाचारपत्र पढ़ना तो बेहद जरूरी है जिस से नईर्पुरानी सभी जानकारियां मिलती हैं. समाचारपत्रों में छपे लेख व रिपोर्ट भी गौर से पढ़ें.
  • पत्रिकाएं पढ़ने से भी तरहतरह की उपयोगी जानकारियां मिलती है, इसलिए अच्छी पत्रिकाएं इकट्ठा करें. पुरानी मिल जाएं तो उन्हें भी पढ़ें.
  • लगातार पढ़ाई करने के बजाय टुकड़ों में पढ़ें, इस के लिए टाइमटेबल बना कर पढ़ना बेहतर होता है कि कितने घंटे कौन सा विषय पढ़ना है.
  • जिस विषय में कमजोर हैं उस पर ज्यादा ध्यान व समय दें.
  • पढ़ाई को तनाव के बजाय चुनौतीभरा मनोरंजन समझें.
  • मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टैलीविजन, गपशप, मौजमस्ती एकदम छोड़ दें.
  • पिछले 5 वर्षों के पेपर हल करें या फिर हल किए हुए पेपर पढ़ें.
  • प्रतियोगी परीक्षा में रटने से कोई खास फायदा नहीं होता, बल्कि एक नजर जितने ज्यादा सवालों और उन के जवाबों पर डालेंगे उतना ज्यादा फायदा होता है.
  • अपनेआप को कमजोर न समझें और आत्मविश्वास बनाए रखें.
  • परीक्षा में शांत दिमाग से सवालों के जवाब दें.
  • तुक्का मारने की कोशिश न करें क्योंकि गलत जवाब पर नंबर कटेंगे.
  • वक्त का खास खयाल रखें क्योंकि आप के पास एक सवाल का जवाब देने के लिए एक मिनट से भी कम समय होता है. जिस सवाल का जवाब बिलकुल समझ नहीं आ रहा हो उसे छोड़ दें, उस पर अड़ें नहीं.
  • प्रश्नपत्र को बीच में से हल करने की गलती न करें, बल्कि पहले सवाल से शुरू करें और आखिर तक एक के बाद एक जवाब दें.

पढ़ाई के अलावा आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत ही आप को कामयाबी दिला सकती है. यह न सोचें कि मैं कुछ नहीं जानता. अधिकतर उम्मीदवार प्रतियोगी परीक्षाओं की लड़ाई निराशा के चलते लड़ने से पहले ही हार जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि एक फीसदी उम्मीदवारों को छोड़ कर बाकी 97 फीसदी की हालत एकसी होती है.

रेलवे से संबंध रखते हुए कुछ सवाल जरूर पूछे जाते हैं, मसलन देश में पहली रेल कब और कहां चली थी, मैट्रो की शुरुआत कब हुई थी और सब से छोटी व बड़ी रेललाइन कहां हैं. आमतौर पर एक बार ध्यान से पढ़ने पर इन सवालों के जवाब याद हो जाते है. इसलिए उन्हें सिरदर्द या कठिन नहीं समझना चाहिए. हां, बारबार पढ़ने से जरूर फायदा होता है.

दूसरी सीढ़ी

सीबीटी के बाद रेलवे बोर्ड चुने हुए उम्मीदवारों का फिजिकल टैस्ट लेता है. इसलिए पढ़ाई के साथसाथ इस की भी तैयारी जरूरी है. आमतौर पर 1 हजार मीटर की दौड़ रेलवे करवाता है जिस से यह पता चले कि उम्मीदवार में कितना दमखम है. इस बार की परीक्षा में उम्मीदवारों को वजन दे कर दौड़ाया जाएगा. लड़कों को 35 किलो वजन उठा कर 2 मिनट में 100 मीटर की दूरी तय करनी होगी और 1 हजार मीटर की दूरी 4 मिनट 15 सैकंड में तय करनी पड़ेगी.

लड़कियों को 20 किलो वजन उठा कर 100 मीटर की दूरी 2 मिनट में पूरी करनी होगी और 1 हजार मीटर की दूरी 5 मिनट 40 सैकंड में पूरी करनी होगी.

इस फिजिकल टैस्ट की अभी से प्रैक्टिस शुरू करें तो परीक्षा के दौरान आसानी रहेगी. कोशिश यह होनी चाहिए कि तयशुदा से कम वक्त में दौड़ पूरी कर ली जाए, जिस से चुनाव करने वालों पर अच्छा असर पड़े.

इस के अलावा यह भी ध्यान रखें कि आप की नजर ठीक हो, रंगों की पहचान भी रेलवे में जरूरी होती है. इस की भी प्रैक्टिस करें. अगर कोई दिक्कत पेश आए तो तुरंत आंखों के डाक्टर से मिल कर सलाह व इलाज कराएं.

तीसरी सीढ़ी

जो उम्मीदवार पहली दोनों सीढि़यां पार कर लेंगे, उन की नौकरी एक तरह से पक्की है लेकिन तीसरे दौर में आप के द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों की जांच होती है. गलत या झूठे दस्तावेज आप की मेहनत पर पानी फेर सकते हैं. इसलिए ऐसे दस्तावेज न लगाएं और हरेक दस्तावेज की मूल प्रति एक फाइल में जमा कर के ले जाएं जिस से जांच में आसानी हो.

ग्रुप सी और डी की नौकरी की पगार 18 हजार रुपए से शुरू होती है जिस में भत्ते जुड़ कर यह तकरीबन 25 हजार रुपए मासिक तक हो जाती है और जिंदगीभर की बेफिक्री भी हो जाती है.

यह बेफिक्री सिर्फ मेहनत और लगन से ही मिलनी मुमकिन है, इसलिए वक्त न गंवाते हुए अभी से जुट जाएंगे तो कामयाबी मिलनी कोई मुश्किल नहीं.

दुविधा में पारसी युवा

पुराने मित्रों का एक गुट दक्षिण मुंबई की लबूरनूम रोड पर स्थित एक घर में जमा है. इन्हीं में से एक 61 वर्षीय रफात मेहर ने कहा, ‘‘हम न तो विद्रोही हैं और न ही समाजसुधारक हैं.’’ इस बात का समर्थन वहां उपस्थित अन्य 4 महिलाओं ने भी किया. ये वे 5 महिलाएं हैं जिन्होंने अपना प्रेम पाने के लिए अपने समुदाय को छोड़ कर गैर समुदाय में शादी की है.

25 वर्ष पूर्व रफात मेहर, अमरसेय, स्मिता गोदरेज, वेरा महाजन और खुरशीद नारंग ने अपना संगठन बनाया था. इस संगठन में इन का साथ आने का मुख्य कारण था एक जवान

औरत रोक्सन दर्शन की एक दुर्घटना में मृत्यु, जो  पारसी घराने की बेटी थी लेकिन उस ने अपने समुदाय से अलग गुजराती पुरुष से विशेष कानून 1954 के तहत शादी की थी, उस का पार्थिव शरीर शांति स्तंभ से वापस लौटा दिया गया था.

गैरसरकारी संगठन चलाने वाली रफात का कहना है कि पारसी समुदाय के अधिनियम के अनुसार जो पारसी गैरपारसी से विवाह करता है उसे व्यभिचार का दोषी माना जाता है. विरोधियों ने बौंबे पारसियों की एक पंचायत बुलाई, जिस का नेतृत्व न्यायाधीशों और विद्वानों ने किया. पंचायत में यह निर्णय लिया गया कि यदि उस के मातापिता या पति द्वारा यह शपथपत्र प्रस्तुत किया जाए कि उक्त महिला ने ताउम्र पारसी धर्म का पालन किया है, तभी उस के पार्थिव शरीर को शांति स्तंभ में रखा जा सकता है.

रफात का कहना है कि इस पंचायत के विरोध में ही हम 5 महिलाओं ने मिल कर एक संगठन बनाया. रफात का आगे कहना है कि आज भी गैरपारसी समुदाय में विवाह करने वाली महिलाओं के साथ भेदभाव बरता जाता है, लेकिन अब महिला संगठन उन महिलाओं की पारसी धर्म के रीतिरिवाजों के पालन कराने में मदद करता है. कुछ विद्रोही पादरी इस प्रकार की अवधारणा की निंदा करते हैं. हालांकि पारसी धर्म पुरुष व महिला की समानता की पैरवी करता है.

रफात, जिन्होंने 1989 में बहाई व्यक्ति से शादी की थी, मानती हैं कि धर्म में कट्टरवाद पनप रहा है. मुंबई पारसियों का गढ़ है. यहां के एक ट्रस्टी नोशिर दादरावाला का कहना है कि मुंबई में पारसी पंचायत एक छोटा सा संगठन है जो धर्म का सरपरस्त और पारसी संपत्ति व फंड पर नियंत्रण रखता है. इस पंचायत में कोई लिंग भेदभाव नहीं होता.

रफात और उन के दोस्तों का कहना है कि समुदाय की घटती संख्या ने बाहरी लोगों के बारे में एक जनून पैदा किया है. सामाजिक कार्यकर्ता 66 वर्षीय क्रिशना कहती हैं, ‘‘2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 57,264 पारसी हैं. 2001 की तुलना में इन में 18 प्रतिशत की कमी आई है. वहीं अन्य देशों जैसे स्वीडन और दक्षिण अमेरिका में बड़ी संख्या में लोग पारसी धर्म अपना रहे हैं.’’

विस्तृत दृष्टिकोण

2006 में एसोसिएशन फौर रिवाइवल औफ जोरास्ट्रियवाद का गठन करने वाले विस्पी वाडिया का कहना है, ‘‘हमारे समुदाय के सभी लोगों का दृष्टिकोण रहा है कि हमारा धर्म सार्वभौमिक है. केवल भारत में ही यह विशेष विचारधारा पनपी है जहां गैर समुदाय में विवाह करने वालों के प्रति भेदभाव बरता जाता है, जबकि समुदाय के सदस्यों की संख्या निरंतर घटती जा रही है. यदि गैर समुदाय के लोगों से विवाह करने वालों के बच्चों को निष्कासित करते हैं तो हालात और भी बिगड़ जाएंगे.’’

मुंबई निवासी 52 वर्षीय गूलरुख गुप्ता ने 2013 में सर्वोच्च न्यायालय में अपना वाद दाखिल करते हुए पूछा था, ‘क्या एक पारसी महिला, जो अपने समुदाय से बाहर शादी करती है, पारसी रहती है? क्या समुदाय के संरक्षक उस से आग्रह कर सकते हैं कि वह अपने अधिकारों को छोड़ दे? क्या उसे अग्नि मंदिर (एजियारी) या शांति स्तंभ से विमुख किया जा सकता है? क्या वह अपनी मरजी से धर्म का पालन नहीं कर सकती? क्या वह अपने मातापिता के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकती है? गूलरुख ने 1991 में पंजाबी हिंदू व्यक्ति से विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया था.

अपनी पारसी मित्र की घटना याद करते हुए गूलरुख बताती हैं कि उन की मित्र को उन की माताजी ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोक दिया था. इसी घटना से उन्हें प्रेरणा मिली कि उस के मातापिता के गुजर जाने पर क्या होगा? मेरी मित्र अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सकी जो मुझे बहुत ही अमानवीय लगा.

गूलरुख का कहना है कि जब हम मुंबई के पौश इलाके महालक्ष्मी के सुपर लग्जरी हाउसिंग सोसाइटी के अपने घर पर मिले तो उन्होंने कहा कि मेरे पास अपने परिवार को सहयोग करने के लिए एकमात्र रास्ता अदालत है. उन की बहन शिराज पटोदिया जानीमानी वकील हैं तथा एक कानूनी फर्म में वरिष्ठ भागीदार हैं. उन्होंने इस मामले में मेरी सहायता की.

गूलरुख ने जब गुजरात हाईकोर्ट में 2008 में केस डाला तो कोर्ट ने कहा था कि महिपाल गुप्ता से शादी करने के बाद उन की पारसी पहचान खत्म हो जाती है. गूलरुख 17 वर्ष की उम्र में पढ़ाई के लिए गुजरात से मुंबई गई थीं जहां कालेज में वे अपने पति से मिली थीं. 7-8 वर्षों बाद उन्होंने शादी की. उन के परिजनों को उन के विवाह से कोई आपत्ति नहीं है. उन के बच्चों को पूजास्थलों में प्रवेश से रोका नहीं जाता. इस प्रकार का समान अधिकार महिला को क्यों नहीं मिलता?

वर्ष 1997 में विवाह के कुछ दिनों पश्चात दिलशाद एक शादी समारोह में बेंगलुरु अपने मायके गईं. उन के परिजनों को तो दिल्ली के गैरजातीय व्यक्ति से शादी करने पर कोई एतराज नहीं था, लेकिन समुदाय को था. समुदाय के लोगों ने उन से बहुत ही रूखा व्यवहार किया. कुछ ने तो उन के पति से हाथ भी नहीं मिलाया, जो बहुत ही अजीब था. 50 वर्षीया दिलशाद कहती हैं, ‘‘जब तक मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था, मुझे नहीं पता था कि समुदाय से बाहर शादी करना विवादों को निमंत्रण देना है. दिल्ली पारसी समुदाय में ऐसा भेदभाव नहीं है. हमें प्रगतिशील समुदाय माना जाता है, लेकिन गैरसमुदाय विवाह पर हम अचानक कट्टरपंथी हो जाते हैं.’’

society

दिल्ली के पारसी ‘अंजुमन’ के ट्रस्टी डा. निलोफर श्रौफ कहते हैं, ‘‘गैरसमुदाय में विवाह पर प्रतिबंध के नियम राज्यों व शहरों में अलगअलग हैं. दिल्ली पारसी अंजुमन में हम पारसी महिलाओं और उन के जीवनसाथी को समुदाय का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. उन के पति को मतदान और पारसी कमेटी में भाग लेने का हक देते हैं, लेकिन मंदिर में ज्योति जलाने, श्मशानघाट जाने और अंजुमन का ट्रस्टी बनने का अधिकार नहीं देते. हम ऐसे युगल के बच्चों को नवज्योत समारोह करने व संगठन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.’’

रोकटोक का कारण धनसंपत्ति

निलोफर महसूस करते हैं कि अन्य शहरों में महिलाओं पर रोकटोक का कारण धनसंपत्ति है. उन्हें डर रहता है कि बाहर का व्यक्ति उन की पैतृक संपत्ति हड़प लेगा, लेकिन दिल्ली में ऐसा कोई डर नहीं है क्योंकि तमाम संपत्ति दिल्ली सरकार ने लीज पर दे रखी है.

पारसी पंचायत, अहमदाबाद के अध्यक्ष (सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर) जहांगीलर अंकलेसर कहते हैं, ‘‘गुजरात में अगर कोई पारसी युवती मुसलिम लड़के से विवाह करती है तो वह अधिक समय तक पारसी नहीं रह पाती और यदि वह हिंदू लड़के से विवाह करती है और पारसी धर्म का पालन करती है तो उस पर कोई प्रतिबंध नहीं होता.’’

43 वर्षीय पत्रकार कमल कपिल गांधी पारसी धर्म को एक उदार धर्र्म मानती हैं. उन का कहना है, ‘‘यह धर्म समानता सिखाता है. गहमबर (पारसी त्योहार) के समय गरीबअमीर बिना किसी भेदभाव के एकसाथ खाना खाते हैं.’’ लेकिन 7 व 14 वर्षीय 2 बच्चों की मां दिलशाद का कहना है कि यह सब पाखंड व दिखावा है, क्योंकि इस सामूहिक भोज में उन महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता जिन्होंने गैरसमुदाय के युवकों से शादी की है.

कमल कहती हैं, ‘‘मैं ने 1999 में एक पंजाबी हिंदू व्यक्ति से विवाह किया था, जो दिल्ली पारसी समुदाय के लिए कोई आपत्तिजनक मामला नहीं था. लेकिन मुंबई और पुणे में क्या होता है, मुझे पता नहीं. मेरा जन्म गुजरात में हुआ और दंत विशेषज्ञ की पढ़ाई के लिए मैं मंगलौर आई जहां मैं अपने पति से मिली. अब हम दिल्ली के वसंत विहार में रहते हैं.

‘‘शुरुआत में हम दिल्ली में किसी को नहीं जानते थे. एक दिन हमारी गाड़ी पर पारसी प्रतीक चिह्न देख कर एक सज्जन ने दिल्ली अंजुमन कार्यक्रम के लिए निमंत्रित किया. दिल्ली पारसी पंचायत ने मेरे पति को स्वीकार किया लेकिन वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, जो मुझे सही नहीं लगा. घर पर हम सभी तीजत्योहार मनाते हैं, दीवाली व नवरोज मनाते हैं तथा सभी धर्मों के अच्छे गुण अपनाते हैं. हाल ही में मेरी बड़ी बेटी ने नवजोत समारोह में भाग लिया था जिस पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की.’’

हूफ्रीश कृष्णामूर्ति ने 2001 में चेतन कृष्णामूर्ति से विवाह किया था. इन के विवाह पर किसी ने कोई रोकटोक नहीं लगाई थी. कमल की तरह ही इन की 9 वर्षीय पुत्री ने नवजोत समारोह में भाग लिया था. ये भी अपनी बेटी को फरोहर में भेजती हैं, जहां पारसी रीतिरिवाज और परंपरा सिखाई जाती है. ऐसे कई युगल हैं जो अपने बच्चों को फरोहर में भेजते हैं.

अधिकार का मामला

गैरपारसी व्यक्ति से विवाहित पारसी महिला के बच्चों के अधिकार का मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है. कोलकाता निवासी पारसी महिला प्रोची मेहता ने यह मामला दर्ज कराया है. उस की पुत्री ने हिंदू व्यक्ति से विवाह किया था. उस के 10 वर्षीय बेटे तथा 7 वर्षीय बेटी को अग्नि मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था.

मुंबई निवासी 35 वर्षीया पूर्व पत्रकार सानया दलाल ने भी गैरपारसी व्यक्ति से विवाह किया था. इन का कहना है, ‘‘अपने बच्चों को पारसी समुदाय से न जोड़ पाने तथा न्याय दिलाने में देरी के कारण मैं खुद को द्वितीय श्रेणी के व्यक्ति जैसा महसूस करती हूं.’’

जहांगीर पटेल, जो पारसी समुदाय पर आधारित मुंबई से प्रकाशित पत्रिका ‘पारसीआना’ के संपादक हैं, का कहना है, ‘‘अन्य सभी समुदायों में स्वीकारोक्ति मिलती है, केवल हमारे धर्म में भेदभाव किया जाता है. कई महत्त्वपूर्ण बदलाव न्यायालय द्वारा लाए गए हैं, न कि हमारी आपसी सहमति से.’’

31 वर्षीय जरीन मिर्जा अहमदाबाद स्थित एक रैस्तरां की मुख्य शैफ हैं. उन्होंने तेलुगुभाषी प्रसाद से विवाह किया है. वे मुसकराते हुए बताती हैं, ‘‘मैं पारसी पुजारी परिवार से हूं जहां पारसी नियमों के खिलाफ नहीं जा सकते. लेकिन जब मैं 2013 में रैस्टोरैंट में काम करते हुए अपने पति से मिली और विवाह करने का निर्णय लिया तो मां आसानी से मान गई थीं लेकिन पिताजी को मनाना मुश्किल था.’’

2016 में विवाह करने के बाद से जरीन मंदिर में प्रवेश नहीं करतीं. यों तो मंदिर में प्रवेश न करने का कोई लिखित नियम नहीं है लेकिन पिता के सम्मान के लिए वे ऐसा नहीं करतीं. जरीन धार्मिक महिला नहीं हैं किंतु पारसी धर्म के पवित्र चिह्न धारण करती हैं. कई पारसी कार्यक्रमों में न जाने का उन्हें मलाल है.

जरीन का आगे कहना था, ‘‘पारसी समुदाय उन्नतशील विचारधारा रखता है. सभी महिलाएं उच्चशिक्षित व मृदुभाषी हैं. किंतु गैरपारसी विवाह पर अधिकांश चुप्पी साध लेते हैं. समय के साथ पिताजी ने प्रसाद को स्वीकारना शुरू कर दिया है. मेरी चचेरी बहन ने भी गैरपारसी से विवाह किया है.’’

समय के साथ काफी कुछ बदला

इस्मत खम्बाटा, जोकि आर्किटैक्ट व टीडीडब्लू की निदेशक हैं तथा फर्नीचर और कलात्मक वस्तु बेचती है, ने 1988 में सीईपीटी विश्वविद्यालय के निदेशक से पढ़ाई के दौरान विवाह किया था.

इन का कहना है, ‘‘मेरे विवाह पर मेरे परिवार को कोई एतराज नहीं था और न ही हमें समाज की कोई परवा थी. लोग अकसर असमंजस में रहते हैं कि किस धर्म को मानें. समय के साथ बहुतकुछ बदला है. पहले जिस महिला को माहवारी होती थी उसे रसोई और पवित्र स्थलों पर प्रवेश नहीं मिलता था, लेकिन अब कोई भी इन नियमों को नहीं मानता. ऐसा ही गैरपारसी विवाह के साथ है.

‘‘जरूरी नहीं कि बच्चों के लिए नवरोज करने पर ही धार्मिक व्यक्ति कहलाओगे. मैं नियमित पारसी धार्मिक चिह्न धारण नहीं करती, लेकिन सभी पारसी कार्यक्रमों में जाती हूं. तो पारसी व्यक्ति होना क्या है? बहुत सी बातें हैं जो साथ ले कर चलनी हैं. हम प्रगतिशील और उदार प्रवृत्ति के लोगों का एक समूह हैं. हम अन्य संस्कृतियों के लिए खुले हैं और मुझे लगता है कि हम अन्य समुदायों के साथ मिल कर कामयाब हो सकते हैं. मेरे लिए मेरी पारसी पहचान एक व्यक्तिगत चीज है.’’

दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा

वह पेट से थी. कोख में किस का बच्चा पलबढ़ रहा था, ससुराल वाले समझ नहीं पा रहे थे. सब अंदर ही अंदर परेशान हो रहे थे.

पिछले 2 साल से उन का बड़ा बेटा जुबैर अपने बूढ़े मांबाप को 2 कुंआरे भाइयों के हवाले कर अपनी बीवी सुगरा को छोड़ कर खाड़ी देश कमाने गया था. शर्त के मुताबिक उसे लगातार 2 साल नौकरी करनी थी, इसलिए घर आने का सवाल ही नहीं उठता.

इसी बीच जुबैर की बीवी सुगरा कभी मायके तो कभी ससुराल में रह कर समय काट रही थी. 2 साल बाद उस के शौहर का भारत आनाजाना होता रहेगा, यही बात सोच कर वह खुश थी.

सुगरा जब भी मायके आती तो हर जुमेरात शहर के मजार जाती. उस मजार का नाम दूरदूर तक था. कई बार तो वह वहां अकेली आतीजाती थी.

एक शहर से दूसरे शहर में ब्याही गई सुगरा ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. उस ने शहर के एक मदरसे में तालीम पाई थी. सिलाईकढ़ाई और पढ़ाई सीखतेसीखते मदरसे के हाफिज से उस की जानपहचान हो गई थी. वह हाफिज से हंसतीबोलती, पर प्यारमुहब्बत से अनजान थी.

मदरसे में पढ़तेपढ़ते सुगरा के अम्मीअब्बू ने रिश्तेदारी में अच्छा रिश्ता पा कर उस की शादी करने की सोची.

‘सुनोजी, रिश्तेदारी में शादी करने से आपस में बुराई होती है. हालांकि वह हमारी खाला का बेटा है. रोजगार की तलाश में है. जल्द लग नौकरी जाएगी,  पर…’ सुगरा की मां ने कहा था.

‘पर क्या?’ सुगरा के अब्बू ने पूछा था.

‘कल को कोई मनमुटाव हो गया या लड़के को लड़की पसंद न आई तो…’ सुगरा की अम्मी बोली थीं.

‘सुना है कि लड़का खाड़ी देश में कमाने जा रहा है. नौकरी वाले लड़के मिलते ही कहां हैं,’ सुगरा के अब्बू ने कहा था.

दोनों परिवारों में बातचीत हुई और उन का निकाह हो गया. पर मदरसे के हाफिज को सुगरा अब भी नहीं भुला पाई थी.

आज मुर्शिद मियां का परिवार जश्न मना रहा था. एक तो उन के बेटे जुबैर की नौकरी खाड़ी देश में लग गई थी, दूसरी उन के घर खूबसूरत सी बहू आ गई.

‘सुगरा, तुम जन्नत की परी जैसी हो. तुम्हारे आने से हमारा घर नूर से जगमगा गया,’ कह कर जुबैर ने सुगरा को अपने सीने से लगा लिया था.

उन दोनों के बीच मुहब्बत की खुशियों ने डेरा जमा लिया था. पूरा परिवार खुश था.

एक महीने का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला. जुबैर खाड़ी देश जाने की तैयारी करने लगा. सुगरा को उदासी ने घेर लिया था. उस के दिल से आह निकलती कि काश, जुबैर उसे छोड़ कर न जाता.

‘सिर्फ 2 साल की ही तो बात है,’ कह कर जुबैर सुगरा को आंसू और प्यार के बीच झूलता छोड़ कर नौकरी करने खाड़ी देश चला गया था.

सुगरा की मायूसी देख उस की सास ने अपने शौहर से कहा था, ‘इन दिनों सुगरा घर से बाहर नहीं निकलती है. बाबा के मजार पर हाजिरी देने के लिए उसे देवर रमजान के साथ भेज दिया करें, ताकि उस का मन बहला रहे.’

वे हंसे और बोले, ‘जुबैर के गम में परेशान हो रही होगी. भेज दिया करो. जमाना बदल रहा है. आजकल के बच्चे घर में कैद हो कर नहीं रहना चाहते,’ अपनी बात रखते हुए सुगरा के ससुर मुर्शिद मियां ने इजाजत दे दी थी.

सुगरा मजार आने लगी थी. उस की खुशी के लिए देवर रमजान उस से हंसताबोलता, मजाक करता था, ताकि वह जुबैर की याद भुला सके.

जुबैर को गए 2 महीने हो गए थे लेकिन सासससुर की खुली छूट के बाद भी सुगरा की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया था.

इसी बीच सुगरा के अब्बू आए और उसे कुछ दिनों के लिए घर ले गए. सुगरा ने अम्मी से आगे पढ़ने की बात कही, ताकि उस का मन लगा रहे और वह तालीम भी हासिल कर सके.

मायके में सुगरा के मामा के लड़के को तालीम देने के लिए बुलाया गया. अब सुगरा घर पर ही पढ़ने लगी थी.

एक दिन मजार पर हाफिज ने सुगरा की खूबसूरती की तारीफ क्या कर दी, उस के दिल में हाफिज के लिए मुहब्बत पैदा हो गई.

शादीशुदा सुगरा जवानी का सुख भोग चुकी थी. वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और हाफिज की तरफ झुकने लगी.

‘कल मजार पर मिलते हैं…’ आजमाने के तौर पर हाफिज ने कहा था, ‘शाम 7 बजे.’

यह सुन कर सुगरा शरमा गई.

‘ठीक है,’ सुगरा ने कहा था.

ठीक 7 बजे सुगरा मजार पर पहुंच गई. दुआ मांगने के बाद वह हाफिज के साथ गलियारे में बैठ कर बातें करने लगी.

हाफिज ने सुगरा को बताया कि मजार पर दुआ मांगने से दिल को सुकून मिलता है, मनचाही मुराद मिलती है.

अब वे दोनों रोजाना शाम को मजार पर मिलने लगे थे. उन के बीच के फासले कम होने लगे थे.

तकरीबन 4 महीने का समय बीत गया. एक दिन ससुराल से देवर आया और सुगरा की मां को अपनी अम्मी की तबीयत खराब होने की बात कह कर सुगरा को अपने साथ ले गया.

ससुराल में सुगरा जुबैर की याद में डूबी रहने के बजाय हाफिज की दीवानी हो गई थी. वह उस से मिलने को बेकरार रहने लगी थी.

धीरेधीरे सुगरा की सास ठीक हो गईं. सुगरा अब शहर के मजार पर जा कर हाफिज से मिलने की दुआ मांगती थी.

समय की चाल फिर बदली.

‘मैं कालेज में एक पीरियड में हाजिरी लगा कर आता हूं, तब तक तुम मजार पर रुकना,’ कह कर सुगरा को छोड़ उस का देवर कालेज चला गया.

इसी बीच सुगरा ने फोन पर हाफिज को मजार पर बुलाया. उन की मुलाकात दोबारा शुरू हो गई.

देवर के जाने के बाद मजार के नीचे पहाड़ी पर सुगरा अपनी जवानी की प्यास बुझाती और लौट कर मजार से दूर जा कर बैठ जाती. ससुराल में रह कर हाफिज से अपनी जवानी लुटाती सुगरा की इस हरकत से कोई वाकिफ नहीं था.

शहर की मसजिद में हाफिज को बच्चों को तालीम देने की नौकरी मिल जाने से अब सुगरा और उस के बीच की दूरियां मिट गईं. सुगरा को भी सासससुर से सिलाई सैंटर जा कर सिलाई सीखने की इजाजत मिलने की खुशी थी.

जुबैर को खाड़ी देश गए सालभर से ऊपर हो गया था.

‘तकरीबन 4-5 महीने की बात है,’ उस की अम्मी ने सुगरा से कहा था.

‘हां अम्मी, तब तक वे आ जाएंगे,’ सुगरा बोली थी.

पर सुगरा को अब जुबैर की नहीं हाफिज की जरूरत थी. सुगरा और हाफिज के बीच अब कोई दीवार नहीं थी. हाफिज की मसजिद वाली कोठी में वे बेफिक्री से मिलते थे.

सुगरा भी दिल खोल कर हाफिज के साथ रंगरलियां मनाने लगी थी और नतीजा…

सुगरा की तबीयत अचानक खराब होने पर उस की सास उसे अस्पताल ले कर गईं.

डाक्टर ने बताया, ‘आप की बहू मां बनने वाली है.’

घर लौट कर सास मायूसी के साए में डूब गईं. सोचा कि जब जुबैर डेढ़ साल से सुगरा से नहीं मिला तो फिर बहू के पैर भारी कैसे हो गए?

सुगरा ने जुबैर को फोन पर पूरी बात बताई.

जुबैर ने कहा, ‘दुआ मांगो सब ठीक हो जाएगा.’

जुबैर समझ गया था कि मामला क्या है, पर वह यह भी जानता था कि हल्ला मचाने पर वही बदनाम होगा. उसे अभी कई साल खाड़ी देश में काम करना था. एक बच्चा उस के नाम से रहेगा तो उसे ही अब्बा कहेगा न.

मेरे अपने बौयफ्रैंड के साथ शारीरिक संबंध रहे थे. क्या करूं, जिस से मेरे पति को मेरे संबंधों के बारे में पता न चले.

सवाल
मैं 23 वर्षीय अविवाहित युवती हूं. एक लड़के से प्यार करती थी पर पारिवारिक समस्या के चलते साल भर पहले हम दोनों अलग हो गए. अब मेरी कहीं और सगाई हो गई है और 6 महीने बाद शादी है. समस्या यह है कि मेरे अपने बौयफ्रैंड के साथ काफी दिनों तक शारीरिक संबंध रहे थे. अब भयभीत हूं कि विवाह के बाद मेरे पति पर यह बात जाहिर न हो जाए कि मैं विवाहपूर्व किसी से संबंध बना चुकी हूं. यदि ऐसा हुआ, तो मेरा क्या होगा. कोई उपाय बताएं, जिस से मेरे पति को मेरे अवैध संबंधों के बारे में पता न चले?

जवाब
आप अपने पति को अपने असफल प्रेम संबंध के बारे में न बताएं, वरना उन्हें आप के अवैध संबंधों के बारे में अंदेशा हो जाएगा. जब तक आप स्वयं नहीं बताएंगी वे नहीं जान पाएंगे कि आप के किसी से विवाहपूर्व शारीरिक संबंध रहे हैं.

सड़कों के गड्ढे

सरकारी कर्मचारियों के बढ़ते बोझ और उन की बढ़ती गैरजिम्मेदारी व रिश्वतखोरी से भारत ही नहीं, अमेरिका भी परेशान है. अमेरिका की केंद्र, राज्य व लोकल सरकारों का बजट का खासा हिस्सा उन के कर्मचारियों की देखरेख में लग जाता है. जिस काम के लिए उन्हें रखा गया वह पूरा ही नहीं हो पाता. अमेरिका में अब पिज्जा बनाने वाली डौमिनो कंपनी ने शहरों की दशकों से ठीक नहीं हुई सड़कों को ठीक करने का जिम्मा उठाने की पेशकश की है.

डौमिनो का कहना है कि वह नहीं चाहती कि सड़कों पर हुए गड्ढों के चलते उस का पिज्जा उस के ग्राहकों तक पहुंचने से पहले एक तरफ लुढ़क जाए और उस की टौपिंग पिज्जा के बौटम में चली जाए. इसलिए वह अपने मुनाफे में से सड़कों को ठीक कराएगी. उस की इस पेशकश को अमेरिका के 4 शहर मान भी गए हैं. अमेरिका के शहर अपनेआप में खासे स्वतंत्र होते हैं और पुलिस भी उन की अपनी होती है.

डौमिनो, अमेजौन, डिज्नी, गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियां अब धन्ना सेठ बन गई हैं और वे शहरों की सरकारों को तो क्या, कई बड़े देशों की केंद्र सरकार तक को खरीद सकने की हैसियत रखती हैं, ऐसा लगता है. उन्होंने लाखों कर्मचारियों को रखना शुरू कर दिया है.

20-25 वर्षों पहले ऐसी कंपनियां कमाती थीं. वे जो कुछ नया खोज कर पाती थीं, उस का उत्पादन करती थीं, जीवन को सुधारती थीं, बस. अब डौमिनो, मैक्डोनल्ड, नैटफ्लिक्स, गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियां तो आर्थिकतौर पर सरकारों का मुकाबला कर रही हैं जबकि कुल मिला कर वे नागरिकों को बहलाफुसला कर ही पैसा कमा रही हैं, कुछ ठोस दे कर नहीं. इन के चलते लोगों की मेहनत का पैसा बरबाद हो रहा है. वे कुछ नया नहीं कमा पा रहे हैं.

डौमिनो तेल और चीनी से भरा सेहत को नुकसान देने वाला पिज्जा या खाने की दूसरी चीजें बना रही है जिस का घर में बहुत सस्ता विकल्प मौजूद है. प्रचार के बल पर इन फूड डिलिवरी कंपनियों ने लोगों को आलसी बना दिया है कि उन्हें किचन में घुसना ही न पड़े और बरतन भी साफ न करने पड़ें. ये लोगों को मोटा व बीमार बना कर लूट रही हैं.

फेसबुक, गूगल निरर्थक गपों से पैसा बना रही हैं. इन कंपनियों ने अपने सदस्यों को लत डलवा दी है कि हर समय मोबाइल पर लगे रहो, कल्याण हो जाएगा.

नतीजा यह है कि लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं. बाहर निकलने से कतराते हैं और सड़कों, गाडि़यों, हवाई जहाजों, रेलों में उन की आंखें मोबाइलों पर जमी रहती हैं. लोग पर्यटनस्थल पर जाते हैं तो वहां का प्राकृतिक सौंदर्य उन की आंखें नहीं देखतीं, मोबाइल कैमरे देखते हैं. और फिर वहां की तसवीरें उन के मित्रों को जबरन देखनी पड़ती हैं.

इसी सब से उत्पादकता कम हो रही है और अमेरिका जैसा देश भी न पुराने शहरों का विकास कर पा रहा है और न नए शहरों का निर्माण. इंफ्रास्ट्रक्चर अगर कमजोर हो रहा है तो डौमिनो, मैक्डोनल्ड और गूगल, फेसबुक की वजह से. वे अपना धंधा चोखा बनाए रखने के लिए शहरों को और आलसी बनाने का लौलीपौप दे रही हैं.

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