फायदे हैलमैट पहनने के

अगर कोई आप से पूछे कि आप हैलमैट क्यों पहनते हैं? तो आप का सीधा सा जवाब होगा कि हादसे के समय सिर को बचाने के लिए हैलमैट पहनते हैं. मगर हैलमैट पहनने की केवल यही एक वजह नहीं है. इस की जानकारी मुझे अपने दोस्त गिरधारीजी से मिली.

एक दिन मैं यों ही गिरधारीजी के घर गया. वे घर पर नहीं थे. भाभीजी ने आदर से मुझे बैठाया. अभी हम चायपानी कर ही रहे थे, इतने में गिरधारीजी घर आ गए. स्कूटर बाहर खड़ा कर हैलमैट लगाए हुए ही वे अंदर चले आए.

उन्होंने मुझे हैलमैट को उतार कर नमस्कार किया, यह सब मुझे बड़ा अटपटा लगा.

पूछने पर वे कहने लगे, ‘‘हैलमैट के बहुत फायदे हैं. जैसे अगर आप दफ्तर से देर से घर आए हैं. आप की बीवी खरीदारी पर जाने के लिए कब से आप का इंतजार करतेकरते थक गई है, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर होगा ही. जैसे ही आप घर में दाखिल होंगे, बीवी की बेलनरूपी मिसाइल से केवल हैलमैट ही आप को बचा सकता है और कोई नहीं.

‘‘अगर दफ्तर जाने में देर हो जाए. घबराने की जरूरत नहीं है. आप आराम से हैलमैट लगाए हुए ही दफ्तर के अंदर जाएं. बौस पहले आप को देखेगा, फिर घड़ी को देख कर चीखेगा, मगर आप को हैलमैट के चलते कुछ सुनाई नहीं देगा.

‘‘फिर भी बौस का गुस्सा न उतरा हो, तो वह केबिन में बुलाएगा. फिर आप कहिएगा, ‘सर, हैलमैट पहने था, इसीलिए आप की बातें सुन न सका.’

‘‘अगर आप की बीवी दफ्तर जाते समय रोज कभी सब्जी, कभी राशन लाने को कहे, तो आप भी परेशान हो जाते होंगे. दिनभर दफ्तर के पकाऊ काम से थके होने के चलते खरीदारी करना बड़ा सिरदर्द होता है. इस दर्द का इलाज यह हैलमैट ही है.

‘‘बीवी जब टमाटर मंगाए, तो घर में आलू ले जाइए. मिर्च की जगह नीबू खरीदें. बीवी गुस्सा होगी. कहना कि हैलमैट पहने हुए था. सुनाई नहीं दिया होगा. दूसरे दिन से बीवी आप से सब्जी मंगाना बंद कर देगी.

‘‘अगर आप के दोस्त आप से उधार मांगने के लिए दफ्तर के बाहर खड़े हो कर आप को आवाज दें. आप देख कर भी उन्हें अनदेखा कर दें. जब कोई उलाहना दे, तो कहें कि दोस्त, हैलमैट पहने था. सुनाई नहीं दिया होगा. इस तरह हैलमैट आप के रुपयों को डूबने से बचा लेता है.

‘‘अगर आप बीवी के साथ सड़क पर घूम रहे हैं, तो अगलबगल ताकझांक करने पर बीवी का कंट्रोल होता है. इस का भी अचूक उपाय है. हैलमैट पहन कर आप मनचाही जगह ताकझांक करो, कोई आप को पकड़ नहीं पाएगा.’’

मैं गिरधारीजी की बातों से हैरान था. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘हैलमैट में गुण बहुत हैं, सदा रखिए संग…’

नया क्षितिज (भाग-1) : अब क्या करेगी वसुधा

‘वसु,’ पीछे से आवाज आई, वसुधा के पांव ठिठक गए, कौन हो सकता है मुझे इस नाम से पुकारने वाला, वह सोचने लगी. ‘वसु,’ फिर आवाज आई, ‘‘क्या तुम मेरी आवाज नहीं पहचान रही हो? मैं ही तो तुम्हें वसु कहता था.’’ पुकारने वाला निकट आता सा प्रतीत हो रहा था. अब वसु ने पलट कर देखा, शाम के धुंधलके में वह पहचान नहीं पा रही थी. कौन हो सकता है? वह सोचने लगी. वैसे भी, उस की नजर में अब वह तेजी नहीं रह गई थी. 55 वर्ष की उम्र हो चली थी. बालों में चांदी के तार झिलमिलाने लगे थे. शरीर की गठन यौवनावस्था जैसी तो नहीं रह गई थी. लेकिन ज्यादा कुछ अंतर भी नहीं आया था, बस, हलकी सी ढलान आई थी जो बताती थी कि उम्र बढ़ चली है.

लंबा छरहरा बदन तकरीबन अभी भी उसी प्रकार का था. बस, चेहरे पर हलकीहलकी धारियां आ गई थीं जो निकट आते वार्धक्य की परिचायक थीं. कमर तक लटकती चोटी का स्थान ग्रीवा पर लटकने वाले ढीले जूड़े ने ले लिया था.

अभी भी वह बिना बांहों का ब्लाउज व तांत की साड़ी पहनती थी जोकि उस के व्यक्तित्व का परिचायक था. कुल मिला कर देखा जाए तो समय का उस पर वह प्रभाव नहीं पड़ा था जो अकसर इस उम्र की महिलाओं में पाया जाता है.

‘वसु’ पुकारने वाला निकट आता सा प्रतीत हो रहा था. कौन हो सकता है? इस नाम से तो उसे केवल 2 ही व्यक्तियों ने पुकारा था, पहला नागेश, जिस ने जीवन की राह में हाथ पकड़ कर चलने का वादा किया था लेकिन आधी राह में ही छोड़ कर चला गया और दूसरे उस के पति मृगेंद्र जिन्हें विवाह के 15 वर्षों बाद ही नियति छीन कर ले गई थी. दोनों ही अतीत बन चुके थे तो यह फिर कौन हो सकता था. क्या ये नागेश है जो आवाज दे रहा है, क्या आज 35 वर्षों बाद भी उस ने उसे पीछे से पहचान लिया था?

आवाज देने वाला एकदम ही निकट आ गया था और अब वह पहचान में भी आ रहा था. नागेश ही था. कुछ भी ज्यादा अंतर नहीं था, पहले में और बाद में भी. शरीर उसी प्रकार सुगठित था. मुख पर पहले जैसी मुसकान थी. बाल अवश्य ही थोड़े सफेद हो चले थे. मूंछें पहले पतली हुआ करती थीं, अब घनी हो गई थीं और उन में सफेदी भी आ गई थी.

‘तुम यहां?  इतने वर्षों बाद और वह भी इस शाम को अचानक ही कैसे आ गए,’ वसुधा ने कहना चाहा किंतु वाणी अवरुद्ध हो चली थी.

वह क्यों रुक गई? कौन था वो, उसे वसु कह कर पुकारने वाला. यह अधिकार तो उस ने वर्षों पहले ही खो दिया था. बिना कुछ भी कहे, बिना कुछ भी बताए जो उस के जीवन से विलुप्त हो गया था. आज अचानक इतने वर्षों बाद इस शाम के धुंधलके में उस ने पीछे से देख कर पहचान लिया और अपना वही अधिकार लादने की कोशिश कर रहा था. फिर इस नाम से पुकारने वाला जब तक रहा, पूरी निष्ठा से रिश्ते निभाता रहा.

आवाज देने वाला अब और निकट आ गया था. वसुधा ने अपने कदम तेजी से आगे बढ़ाए. अब वह रुकना नहीं चाहती थी. तीव्र गति से चलती हुई वह अपने घर के गेट पर आ गई थी. कदमों की आहट भी और करीब आ गई थी. उस ने जल्दी से गेट खोला. उस की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं. वह सीधे ड्राइंगरूम में जा कर धड़ाम से सोफे पर गिर पड़ी.

दिल की धड़कनें तेजतेज चल रही थीं. किसी प्रकार उस ने उन पर नियंत्रण किया. प्यास से गला सूख रहा था. फ्रिज खोल कर ठंडी बोतल निकाली. गटगट कर उस ने पानी पी लिया. तभी डोरबैल बज उठी.

उस के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. कहीं वही तो नहीं है, उस ने सोचते हुए धड़कते हृदय से द्वार खोला. उस का अनुमान सही था. सामने नागेश ही खड़ा था. क्या करूं, क्या न करूं, इतनी तेजी से इसलिए भागी थी कि कहीं फिर उस का सामना न हो जाए लेकिन वह तो पीछा करते हुए यहां तक आ गया. अब कोई उपाय नहीं था सिवा इस के कि उसे अंदर आने को कहा जाए. ‘‘आइए’’ कह कर पीछे खिसक कर उस ने अंदर आने का रास्ता दे दिया. अंदर आ कर नागेश सोफे पर बैठ गया.

वसुधा चुपचाप खड़ी रही. नागेश ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘बैठोगी नहीं वसु?’’ वसु शब्द सुन कर उस के कान दग्ध हो उठे. ‘‘यह तुम मुझे वसुवसु क्यों कह रहे हो? मैं हूं मिसेज वसुधा रैना. कहो, यहां क्यों आए हो?’’ वसुधा बिफर उठी.

‘‘सुनो, वसु, सुनो, नाराज न हो. मुझे भी तो बोलने दो,’’ नागेश ने शांत स्वर में कहा.

‘‘पहले तुम यह बताओ, यहां क्यों आए हो? मेरा पता तुम को कैसे मिला?’’ वसुधा क्रोध से फुंफकार उठी.

‘‘किसी से नहीं मिला, यह तो इत्तफाक है कि मैं ने तुम्हें पार्क में देखा. अभी 4 दिनों पहले ही तो मैं यहां आया हूं और पास में ही फ्लैट ले कर रह रहा हूं. अकेला हूं. शाम को टहलने निकला तो तुम्हें देख लिया. पहले तो पहचान नहीं पाया, फिर यकीन हो गया कि ये मेरी वसु ही है,’’ नागेश ने विनम्रता से कहा.

‘‘मेरी वसु, हूं, यह तुम ने मेरी वसु की क्या रट लगा रखी है? मैं केवल अपने पति मृगेंद्र की ही वसु हूं, समझे तुम. और अब तुम यहां से जाओ, मेरी संध्याकालीन क्रिया का समय हो गया है और उस में मैं किसी प्रकार का विघ्न बरदाश्त नहीं कर सकती हूं,’’ वसुधा ने विरक्त होते हुए कहा.

‘‘ठीक है मैं आज जाता हूं पर एक दिन अवश्य आऊंगा तुम से अपने मन की बात कहने और तुम्हारे मन में बसी नफरत को खत्म करने,’’ कहता हुआ नागेश चला गया.

वसुधा अपनी तैयारी में लग गई किंतु ध्यान भटक रहा था. ‘‘ऐसा क्यों हो रहा है? अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था. फिर आज यह भटकन क्यों? क्यों मन अतीत की ओर भाग रहा है? अतीत जहां केवल वह थी और था नागेश. अतीत वर्तमान बन कर उस के सामने रहरह कर अठखेलियां कर रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे किसी फिल्म को रिवाइंड कर के देखा जा रहा है, उस के हृदय में मंथन हो रहा था. उस के वर्तमान को मुंह चिढ़ाते अतीत से पीछा छुड़ाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. अतीत ने उसे सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए थे. उसे याद आ रहा था वह दिन जब वह पहली बार नागेश से मिली थी.

दिसंबर का महीना था. वह अपनी मित्र रिया के घर गई थी. वहां उस की 2 और भी सहेलियां आई थीं, शीबा और रेशू. रिया उन सब को ले कर ड्राइंगरूम में आ गई जहां पहले से ही उस के भाई के 2 और मित्र बैठे थे. दोनों ही आर्मी औफिसर थे. रिया के भाई डाक्टर थे, डा. रोहित. उन्होंने सब से मिलवाया. फिर सब ने एकसाथ चाय पी. वहीं उस ने नागेश को देखा. रिया ने ही बताया, ‘‘ये नागेश भाईसाहब हैं, कैप्टन हैं और यह उन के मित्र कैप्टन विनोद हैं. उन सब ने हायहैलो की, औपचारिकताएं निभाईं और वहां से विदा हो गए.

वसुधा पहली बार में ही नागेश की ओर आकर्षित हो गई थी. नागेश का गोरा चेहरा, पतलीपतली मूंछें, होंठों पर मंद मुसकान, आंखों में किसी को भी जीत लेने की चमक, टीशर्ट की आस्तीनों से झांकती, बगुले के पंख सी, सफेद पुष्ट बांहों को देख कर वसुधा गिरगिर पड़ रही थी. घर आ कर वह कुछ अनमनी सी हो गई थी. सब ने इस बात को गौर किया पर कुछ समझ न सके.

दिन गुजरते रहे और कुछ ऐसा संयोग बना कि कहीं न कहीं नागेश उसे मिल ही जाता था. फिर यह मिलना दोस्ती में बदल गया. यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला. घंटों दोनों दरिया किनारे घूमने चले जाते थे, बातें करते थे जोकि खत्म होने को ही नहीं आती थीं. दोनों भविष्य के सुंदर सपने संजोते थे.

दोनों के ही परिवार इस प्यार के विषय में जान गए थे और उन्हें कोई एतराज नहीं था. दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया. जब उन्होंने अपना मंतव्य बताया तो दोनों परिवारों ने इस संबंध को खुशीखुशी स्वीकार कर लिया और एक छोटे से समारोह में उन की सगाई हो गई.

अब तो वसुधा के पांव जमीन पर नहीं पड़ते थे. इधर नागेश भी बराबर ही उस के घर आने लगा था. सब ने उसे घर का ही सदस्य मान लिया था. विवाह की तिथि निश्चित हो गई थी. केवल 10 दिन ही शेष थे कि अकस्मात नागेश को किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में झांसी जाना पड़ गया.

एकदो माह की ट्रेनिंग के बाद विवाह की तिथि आगे टल गई. दोबारा तिथि निश्चित हुई तो नागेश के ताऊ का निधन हो गया. एक वर्ष तक शोक मनाने के कारण विवाह की तिथि फिर आगे बढ़ा दी गई. इस प्रकार किसी न किसी अड़चन से विवाह टलता गया और 2 वर्ष का अंतराल बीत गया.

वसुधा की बेसब्री बढ़ती जा रही थी. यूनिवर्सिटी में उस की सहेलियां पूछतीं, ‘क्या हुआ, वसुधा, कब शादी करेगी? यार, इतनी भी देरी ठीक नहीं है. कहीं कोई और ले उड़ा तेरे प्यार को तो हाथ मलती रह जाएगी.’

‘नहीं वह मेरा है, मुझे धोखा नहीं दे सकता. और जब मेरा प्यार सच्चा है तो मुझे मिलेगा ही,’ वसुधा स्वयं को आश्वस्त करती.

नागेश 15 दिनों की छुट्टी ले कर घर जा रहा था. उस ने आश्वासन दिया था कि इस बार विवाह की तिथि निश्चित कर के ही रहेगा. वसुधा उस से आखिरी बार मिली. उसे नहीं पता था, यह मिलना वास्तव में आखिरी है. अचानक उसे आभास हुआ कि शायद अब वह नागेश को कभी नहीं देख पाएगी, दिल धक से हो गया. लेकिन फिर आशा दिलासा देने लगी, ‘नहीं, वह तेरा है, तुझे अवश्य मिलेगा.’

एक ओर संशयरूपी नाग फन काढ़े हुए था और दूसरी ओर आशा वसुधा को आश्वस्त कर रही थी. इन दोनों के बीच में डूबतेउतराते हुए एक सप्ताह बीत गया कि अकस्मात वज्रपात हुआ. उस के पापा के पास नागेश के पिता का पत्र आया जिस में उन्होंने विवाह करने में असमर्थता बताई थी बिना किसी कारण के.

वह हतप्रभ थी, यह क्या हुआ. वह तो नागेश के पत्र की प्रतीक्षा कर रही थी. पत्र तो नहीं आया लेकिन उस की मौत का फरमान जरूर आया था. उस का दम घुट रहा था. ऐसा प्रतीत होता था मानो उसे जीवित ही दीवार में चुनवा दिया गया हो. चारों ओर से निगाहें उस की ओर उठती थीं, कभी व्यंग्यात्मक और कभी करुणाभरी. वह बरदाश्त नहीं कर पा रही थी.

एक दिन उसे अपने पीछे से किसी की आवाज सुनाई दी. ‘ताजिए ठंडे हो गए? अब तो जमीन पर आ जाओ.’ उस ने पलट कर देखा, उस की सब से गहरी मित्र रिया हंस रही थी. वह तिलमिला उठी थी लेकिन कुछ न कह कर वह क्लास में चली गई. वहां भी कई सवालिया नजरें उसे देख रही थीं.

धीरेधीरे ये बातें पुरानी हो रही थीं. अब उस से कोई भी कुछ नहीं पूछता था. एक रोज रिया ने हमदर्दी से कहा, ‘वसुधा, सौरी, मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था. मुझे तो अंदाजा भी नहीं था कि तेरे साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है.’ और वह वसुधा से लिपट गई.

6 महीनों बाद ही पापा ने उस का विवाह मृगेंद्र से सुनिश्चित कर दिया और वह विदा हो कर अपने पति के घर की शोभा बन गई. विवाह की पहली रात वह सुहागसेज पर सकुचाई सी बैठी थी. कमरे की दीवारें हलके नीले रंग की थीं. नीले परदे पड़े हुए थे. नीले बल्ब की धीमी रोशनी बड़ा ही रूमानी समा बांध रही थी. वह चुपचाप बैठी कमरे का मुआयना कर रही थी कि तभी एक आवाज आई, ‘वसु, जरा घड़ी उधर रख देना.’

मृगेंद्र का स्वर सुन कर वह धक से रह गई. खड़ी हो कर उस ने मृगेंद्र की घड़ी ले ली और साइड टेबल पर रख दी. अब क्या होगा. मृगेंद्र मेरे अतीत को जानने का प्रयास करेंगे. मैं क्या कहूंगी. मौसी ने कहा था, ‘बेटी, पिछले जीवन की कोई भी बात पति को न बताना. पुरुष शक्की होते हैं. भले ही उन का अतीत कुछ भी रहा हो लेकिन पत्नी के अतीत में किसी और से नजदीकियां रखना उन्हें स्वीकार्य नहीं होता है.’

लेकिन मृगेंद्र ने कुछ भी तो नहीं पूछा. बस, उस के दोनों कंधों से उसे पकड़ कर बैड पर बैठा दिया और स्वयं ही कहने लगे, ‘वसु, मैं यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान का प्रोफैसर हूं. इतना वेतन मिल जाता है कि अपने लोगों का गुजारा हो जाए. मेरे पास एक पुराने मौडल की मारुति कार है जो मुझे बहुत ही प्रिय है. मुझे नहीं पता कि तुम्हारी मुझ से क्या अपेक्षाएं हैं परंतु कोशिश करूंगा कि तुम्हें सुखी रख सकूं. मैं थोड़े में ही संतुष्ट रहता हूं और तुम से भी यही आशा करता हूं.’

वसु हतप्रभ रह गई. यह कैसी सुहागरात है. कोई प्यार की बात नहीं, कोई मानमनौवल नहीं. बस, एक छोटी सी आरजू जो मृगेंद्र ने उसे कितने शांत भाव से साफसाफ कह दी, मानो जीवन का सारा सार ही निचोड़ कर रख दिया हो. उसे गर्व हो रहा था. वह डर रही थी कि कहीं अतीत का साया उस के वर्तमान पर काली परछाईं न बन जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और वह सबकुछ बिसार कर मृगेंद्र की बांहों में समा गई.

उस ने अपनेआप से एक वादा किया कि अब वह मृगेंद्र की है और संपूर्ण निष्ठा से मृगेंद्र को सुखी रखने का प्रयास करेगी. अब उन दोनों के बीच किसी तीसरे व्यक्ति का अस्तित्व वह सहन नहीं करेगी. पेशे से मृगेंद्र एक मनोवैज्ञानिक थे, शायद, इसीलिए उन्होंने उस के मनोभावों को समझ कर उस के अतीत को जानने का कोई प्रयास नहीं किया.

2 वर्षों बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया जो हूबहू मृगेंद्र की ही परछाईं थी. जब उन्होंने उसे अपनी गोद में लिया तो उन की आंखें छलक आईं, गदगद हो कर बोले, ‘वसु, तुम ने बड़ा ही प्यारा तोहफा दिया है. मैं प्यारी सी बेटी ही चाहता था और तुम ने मेरे मन की मुराद पूरी कर दी.’ और उन्होंने वसुधा के माथे पर आभार का एक चुंबन अंकित कर दिया. उस का नाम रखा वान्या.

वान्या के 3 वर्ष की होने के बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया. बड़े प्यार से मृगेंद्र ने उस का नाम रखा कुणाल. अब वह बहुत ही खुश था कि उस का जीवन धन्य हो गया. वह एक सुखी और संपन्न जीवन व्यतीत कर रही थी कि उस के जीवन में फिर एक बेटी का आगमन हुआ, मान्या. कुणाल बहुत खुश रहता था क्योंकि उसे एक छोटी बहन चाहिए थी जो उसे मिल गई थी.

हंसतेखेलते विवाह के 15 वर्ष बीत गए थे कि एक दिन मृगेंद्र के सीने में अचानक दर्द उठा. वह उन्हें ले कर अस्पताल भागी जहां पहुंचने के कुछ ही क्षणों बाद डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित करते हुए कहा, ‘मैसिव हार्ट अटैक था.’

अब वह तीनों बच्चों के साथ अकेली रह गई थी. यूनिवर्सिटी के औफिस में ही उसे जौब मिल गई और जीवन फिर धीमी गति से एक लीक पर आ गया.

वान्या और मान्या ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली थी. कुणाल इंजीनियर बन गया था. उस ने तीनों बच्चों का विवाह उन की ही पसंद से कर दिया. तीनों ही खुश थे. वान्या और मान्या दोनों ही मुंबई में थीं और कुणाल अपनी कंपनी के किसी प्रोजैक्ट के लिए जरमनी चला गया था. बच्चों के जाने से घर में चारों ओर एक नीरवता छा गई थी. तीनों बच्चे चाहते थे कि वह उन के साथ रहे लेकिन पता नहीं क्यों उसे अब अकेले रहना अच्छा लग रहा था, जैसे जीवन की भागदौड़ से थक गई हो.

उस की सेवानिवृत्ति के 3 वर्ष बचे थे. उस ने वीआरएस ले लिया था क्योंकि अब वह नौकरी भी नहीं करना चाहती थी. जो कुछ पूंजी उस के पास थी, उस ने साउथ सिटी में 2 कमरों का एक छोटा सा फ्लैट ले लिया और अकेले रह कर अपना जीवन व्यतीत कर रही थी.

अचानक आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज हुई. वह यादों के भंवर से बाहर आ गई.

वह बहुत परेशान थी. शायद हृदय में अभी भी नागेश के लिए कुछ भावनाएं व्याप्त थीं. तभी तो न चाहते हुए भी उस के विषय में सोच रही थी. ‘क्या यह सच है कि पहला प्यार भुलाए नहीं भूलता,’ उस ने अपनी अंतरात्मा से प्रश्न किया? ‘हां’ उत्तर मिला. तो वह क्या करे, क्या नागेश से दोबारा मिलना उचित होगा? कहीं वह कमजोर न पड़ जाए. नहीं, नहीं, वह बड़बड़ा उठी. वह क्यों कमजोर पड़ेगी? जिस ने उस के जीवन के माने ही बदल दिए थे, उस धोखेबाज से वह क्यों मिलना चाहेगी? उस का और मेरा अब नाता ही क्या है? वसु मन ही मन सोच रही थी.

उस के मन में फिर विचार आया. एक बार बस, एक बार वह उस से मिल कर अपना अपराध तो पूछ लेती. ‘क्या उस ने सच में धोखा दिया था या कोई और मजबूरी थी. हुंह, उस की कुछ भी मजबूरी रही हो, मेरा जीवन तो उस ने बरबाद कर दिया था. फिर कैसा मिलना.’

वसु के मन में विरोधी विचारधाराएं चल रही थीं. लेकिन फिर उस का हृदय नागेश से मिलने के लिए प्रेरित करने लगा, हां, उस से एक बार अवश्य ही मिलना होगा. वह अपनी मजबूरी बताना भी चाह रहा था लेकिन उस ने सुनने की कोशिश ही नहीं की. अब उस ने सोच लिया कि कल सायंकाल पार्क में जाएगी जहां शायद उस का सामना नागेश से हो जाए.

बैड पर लेट कर उस ने आंखें बंद कर लीं क्योंकि रात्रि के 2 प्रहर बीत चुके थे. लेकिन नींद अब भी कोसों दूर थी. मन बेलगाम घोड़े की भांति अतीत की ओर भाग रहा था-नागेश जिस ने उस की कुंआरी रातों में चाहत के अनगिनत सपने जगाए थे, नागेश जिस के कदमों की आहट उस के दिल की धड़कनें बढ़ा देती थीं, नागेश जिस की आंखें सदैव उसे ढूंढ़ती थीं.

उसे याद आता है कि एक बार दोपहर में वह सो गई थी कि अचानक ही नागेश आ गया था. मां ने उसे झकझोर कर उठाया तो वह अचकचा कर दिग्भ्रमित सी इधरउधर देखने लगी. डूबते सूर्य की रश्मियां उस के मुख पर अठखेलियां कर रही थीं. नागेश उसे अपलक देखते हुए बोल उठा, ‘इतना सुंदर सूर्यास्त तो मैं ने अब तक के जीवन में कभी नहीं देखा. और उस का चेहरा अबीरी हो उठा था. नागेश, जिस ने पहली बार जब उसे अपनी बांहों में ले कर उस के होंठों पर अपने प्यार की मुहर लगाई थी, उस चुंबन को वह अभी तक न भूल सकी थी.

जब भी वह मृगेंद्र के साथ अंतरंग पलों में होती थी, तो उसे मृगेंद्र की हर सांस, हर स्पर्श में नागेश का आभास होता था. वह मन ही मन में बोल उठती थी, ‘काश, इस समय मैं नागेश की बांहों में होती.’ एक प्रकार से वह दोहरे व्यक्तित्व को जी रही थी.

प्रतिपल नागेश एक परछाईं की भांति उस के साथ रहता था. जब भी वह नागेश के विषय में सोचती, उस की अंतरात्मा उसे धिक्कारती, ‘वसु, तू अपने पति से विश्वासघात कर रही है. नहीं, नहीं, मैं उन्हें धोखा नहीं दे रही हूं. मेरे तन और मन पर मेरे पति मृगेंद्र का ही अधिकार है. लेकिन यदि अतीत की स्मृतियां हृदय में फांस बन कर चुभी हुई हैं तो यादों की टीस तो उठेगी ही न.’

स्मृतियों के झीने आवरण से अकसर ही उसे नागेश का चेहरा दिखता था और वह बेचैन हो जाती थी. किंतु जब से मृगेंद्र उस के जीवन से चले गए, वह हर पल, हर सांस मृगेंद्र के लिए ही जीती थी. यह सत्य था कि नागेश की स्मृतियां उसे झकझोर देती थीं लेकिन मृगेंद्र की शांत आंखें उस के आसपास होने का एहसास दिलाती थीं. हर पल उसे कानों में मृगेंद्र की आवाज सुनाई देती थी. उसे लगता, मृगेंद्र पूछ रहे हैं, ‘क्या हुआ, वसु, क्यों इतनी उद्विग्न हो रही हो? मैं तो सदा ही तुम्हारे पास हूं न, तुम्हारे व्यक्तित्व में घुलामिला.’

यह सत्य है कि मृगेंद्र का साया उस के अस्तित्व से लिपटा रहता था. फिर भी, वह क्यों नागेश से मिलना चाहती है. जिस ने, किसी मजबूरी से ही सही, उस से नाता तोड़ा और अब 35 वर्षों बाद उस को अपनी सफाई देना चाहता है. क्या वह पहले नहीं ढूंढ़ सकता था.

मृगेंद्र के जाने के बाद वह अकसर ही एक गीत गुनगुनाती थी- ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए, हम भरी दुनिया में तनहा हो गए…’ किस के लिए था यह गीत? नागेश के लिए? मृगेंद्र के लिए? दोनों ही तो खो गए थे और हां, वह इस भीड़भरी दुनिया में तनहाई का ही जीवन व्यतीत कर रही थी.

यादों का सैलाब उमड़घुमड़ रहा था. 15 वर्षों के क्षणिक जीवन में भी मृगेंद्र ने उसे इतना प्यार दिया कि वह सराबोर हो उठी थी. लेकिन, कहीं न कहीं आसपास नागेश के होने का एहसास होता था. हालांकि हर बार वह उस एहसास को झटक देती थी यह सोच कर कि यह मृगेंद्र के प्रति विश्वासघात होगा.

मृगेंद्र ने जब अपनी आंखें बंद कीं तब वह निराश हो उठी. उस के मन में एक आक्रोश जागा, यदि नागेश ने धोखा न दिया होता तो वह असमय वैरागिनी न बनी होती और उस की चाहत नागेश के लिए, नफरत में बदल गई. उसे सामने पा कर वह नफरत ज्वालीमुखी बन गई. नहीं, मुझे उस से नहीं मिलना है, किसी भी दशा में नहीं मिलना है. वह निर्मोही पाषाण हृदय, नफरत का ही हकदार है. यदि वह आएगा भी, तो उस से नहीं मिलेगी, मन ही मन में सोच रही थी.

लेकिन फिर, विरोधी विचार मन में पनपने लगे. आखिर एक बार तो मिलना ही होगा, देखें, क्या मजबूरी बताता है और इस प्रकार आशानिराशा के बीच झूलते हुए रात्रि कब बीत गई, पता ही नहीं चला.

खिड़की का परदा थोड़ा खिसका हुआ था. धूप की तीव्र किरण उस के मुख पर आ कर ठहर गई थी. धूप की तीव्रता से वह जाग गई, देखा, दिन के 11 बजे थे. ओहो, कितनी देर हो गई. नित्यक्रिया का समय बीत जाएगा.

जल्दी से नहाधो कर उस ने मृगेंद्र की तसवीर के आगे दीया जला कर, हाथ जोड़ कर उन को प्रणाम करते हुए बोली, मानो उन का आह्वान कर रही हो, ‘‘बताइए, मैं क्या करूं, क्या नागेश से मिलना उचित होगा? मैं हांना के दोराहे पर खड़ी हूं. एक मन आता है कि मिलना चाहिए, तुरंत ही विरोधी विचार मन में पनपने लगते हैं, नहीं, अब और क्या मिलनामिलाना, विगत पर जो चादर पड़ गई है समय की, उस को न हटाना ही ठीक होगा. मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं.’’

अचानक उसे ऐसा लगा जैसे मृगेंद्र ने उस की पीठ पर हाथ रख कर कहा, ‘क्या हुआ, वसु, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. तुम कुछ भी गलत नहीं करोगी. और फिर मैं तुम्हें कोई भी कदम उठाने से रोकूंगा नहीं. तुम एक बार नागेश से मिल लो. शायद, तुम्हारी जीवननौका को एक साहिल मिल ही जाए.’ हां, यही ठीक होगा, उस ने मन में सोचा.

दूसरे दिन सायंकाल वह जल्दी से तैयार हुई अपनी मनपसंद रंग की साड़ी, मैंचिंग ब्लाउज पहना, बालों का ढीलाढाला जूड़ा बनाया, अनजाने में ही उस ने नागेश के पसंददीदा रंग के वस्त्र पहन लिए थे. आईने में वह खुद को देख कर चौंक उठी, ‘‘क्यों? यह क्या किया मैं ने, क्यों उसी रंग की साड़ी पहनी जो नागेश को पसंद थी. क्या इस प्रकार वह अपने सुप्त प्यार का इजहार कर बैठी? नहीं, नहीं, यह तो इत्तफाक है, उस ने खुद को आश्वस्त किया.

जब वह पार्क में पहुंची तो नागेश कहीं नजर नहीं आया. वह चारों ओर देख रही थी लेकिन बेकार. क्या उस ने गलती की है यहां आ कर? क्या वह नागेश को अपनी कमजोरी का एहसास कराना चाहती थी. नहीं, नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं. वह तो नागेश के इसरार करने पर ही यहां आई थी. आखिर उन की बात भी तो सुननी ही चाहिए न.

नागेश को पार्क में न देख कर वह लौट पड़ी. तभी ‘‘वसु,’’ नागेश का स्वर सुनाई दिया. वह ठिठक गई, शरीर में एक सिहरन सी हुई. कैसे सामना करे वह उस का. कल तो झिड़क दिया था और आज मिलने आ पहुंची. भला वह क्या सोचेगा. पर वह अचल खड़ी ही रही.

नागेश सामने आ कर खड़ा हो गया, ‘‘मिलने आई हो न? मैं जानता था कि तुम आओगी अवश्य ही,’’ नागेश ने संयत स्वर में कहा, ‘‘चलो बैंच पर बैठते हैं.’’ और वह निशब्द नागेश के साथ बैंच पर जा कर बैठ गई. मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे. कल और आज में कितना अंतर था. कल वह एक चोट खाई नागिन सी बल खा रही थी और आज नागेश के सम्मोहन में बंधी बैठी थी.

दोनों के बीच कुछ पलों का मौन पसरा रहा. फिर, नागेश ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘वसु, मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहना चाहता, बस, यही चाहता हूं कि तुम्हारे मन में अपने लिए बसी नफरत को यदि किसी प्रकार दूर कर सकूं तो शायद चैन मिल जाए. 35 वर्ष बीत चुके हैं पर चैन नहीं है. तुम्हें तलाशता रहा कि शायद जीवन के किसी मोड़ पर तुम्हारा साथ मिल जाए पर असफलता ही हाथ लगी.’’

अब वसुधा चुप नहीं रह सकी, ‘‘क्यों आप ने विवाह किया होगा, आप के भी बालबच्चे होंगे, तो फिर चैन क्यों नहीं? और उस दिन आप ने यह क्यों कहा था कि मैं अकेला रह गया हूं. आप का परिवार तो होगा ही.’’

नागेश ने कातर दृष्टि से उसे देखा, ‘‘नहीं वसु, विवाह नहीं किया. मेरे जीवन में तुम्हारे सिवा किसी के लिए कोई भी स्थान नहीं था.’’

‘‘फिर क्यों आप ने धोखा दिया,’’ वसु ने भरे गले से पूछा.

‘‘धोखा, हां, तुम सही कह रही हो. तुम्हारी नजर में ही नहीं, तुम्हारे परिवार की नजरों में भी मैं धोखेबाज ही हूं पर यदि तुम विश्वास कर सको तो मैं तुम्हें बता दूं कि मैं ने तुम्हें धोखा नहीं दिया.’’

‘‘धोखा और क्या होता है, नागेश. तुम्हारा पत्र नहीं आया. तुम्हारे पिता ने एकतरफा फैसला सुना दिया बिना किसी कारण के. यदि विवाह करना ही नहीं था तो सगाई का ढोंग क्यों किया?’’ वसुधा ने तड़प कर कहा.

‘‘हां, तुम सही कह रही हो. कुछ तो अपराध मेरा भी था. मुझे ही तुम्हें पहले बता देना चाहिए था. इस के पूर्व कि मेरे पिता का इनकार में पत्र आता. न जाने क्यों मैं कमजोर पड़ गया और पिता की हां में हां मिला बैठा. दरअसल, उन के पास पैसा नहीं था और उन्हें दहेज की आशा थी जो तुम्हारे घर से पूरी नहीं हो सकती थी.

‘‘उसी समय दिल्ली के एक धनवान परिवार ने जोर लगाया और पिताजी को मनमाना दहेज देने का आश्वासन दिया. पिताजी झुक गए. मैं भी उन की हां में हां मिला बैठा. लेकिन जब विवाह की तिथि निश्चित हुई और ऐसा लगा कि मेरेतुम्हारे बीच में विछोह का गहरा सागर आ गया है, हम कभी भी मिल नहीं सकेंगे, तो मैं तड़प उठा और तत्काल ही विवाह के लिए मना कर दिया. भला जो स्थान तुम्हारा था वह मैं किसी और को कैसे दे सकता था? तभी मुझे फ्रंट पर जाने का पैगाम आया और मैं सीमा पर चला गया.

‘‘मुझे इस बात का एहसास भी नहीं था कि तुम्हारी शादी हो जाएगी. जब मैं लौटा तब तुम्हारे ही किसी परिचित से पता चला कि तुम्हारा विवाह हो चुका है. मैं खामोश हो गया. और उसी दिन यह प्रतिज्ञा ली कि अब यह जीवन तुम्हारे ही नाम है. मैं विवाह नहीं करूंगा. समय का इतना लंबा अंतराल बीत चला कि सबकुछ गड्डमड्ड हो गया. मैं ने कभी तुम्हारे वैवाहिक जीवन में दखल न देने की सोच ली थी, इसलिए एकाकी जीवन बिताता रहा.

‘‘समय की आंधी में हम दोनों 2 तिनकों की तरह उड़ चले. मुझे तो तुम्हारे मिलने की कोई भी आशा नहीं थी. कर्नल की पोस्ट से रिटायर हुआ हूं और यहां एक फ्लैट ले कर रहने आ गया. जीवन का इतना लंबा समय बीत चला कि अब जो कुछ पल बचे हैं उन्हें शांतिपूर्वक बिताना चाहता था कि समय देखो, अचानक तुम से मुलाकात हो गई.’’ नागेश चुप हो गया था.

वसुधा के नेत्रों से अविरल आंसू बह रहे थे, दिल में फंसा हुआ जख्मों का गुबार आंखों की राह बाहर निकलना चाहता था और वह उन्हें रोकने का कोई प्रयास भी नहीं कर रही थी.

रात्रि गहरा रही थी. ‘‘चलो वसु, अब घर चलें,’’ नागेश ने उठते हुए कहा. वसुधा चौंक कर उठी. अक्तूबर का महीना था. हलकीहलकी ठंड थी जो सिहरन पैदा कर रही थी. दोनों उठ खड़े हुए और अपनेअपने रास्ते हो लिए. घर आ कर वसुधा ने एक सैंडविच बनाया और एक कप चाय के साथ खा कर बैड पर लेटने का उपक्रम करने लगी. आंखें नींद से मुंदी जा रही थीं.

– क्रमश:

 

तरह तरह की फिल्मी सेवाएं

नैटफ्लिक्स चैनल की सफलता के बाद अब हौलीवुड की अन्य फिल्में दिखाने के लिए वाल्ट डिज्नी कंपनी भी अपना चैनल शुरू करने वाली है. डिज्नी की अपनी फिल्में व जिन फिल्मों के कौपीराइट्स उस ने ले रखे हैं, वे सभी उसी के चैनल पर औनलाइन रिलीज होंगी और जब चाहो, देखी जा सकेंगी. ब्रौडबैंड इंटरनैट की स्पीड जैसेजैसे सुधर रही है, लोग बिना इंटेरप्शन या विज्ञापनों के हाई क्वालिटी में स्ट्रीमिंग फिल्में नैटफ्लिक्स और अमेजौन पर देख रहे हैं.

ग्राहकों को अब इन चैनलों को अलगअलग सब्सक्राइब करना पड़ेगा जब तक कोई ऐसा औप्शन नहीं आ जाता जिस में सैटटौप बौक्स की तरह आप चैनल बदल कर स्ट्रीमिंग कंपनी बदल सकें लेकिन भुगतान एक ही जगह पर कर सकें.

बड़ी स्क्रीन पर दिखने वाली ये फिल्में शायद एक बार फिर सिनेमाहौलों पर संकट ला दें. मल्टीप्लैक्सों में अरबों रुपए लगाए गए हैं जिन में एक ही लौबी, एक ही फूड सर्विस के माध्यम से कई हौलों में फिल्में दिखाना संभव हुआ है. सिनेमा हौलों के दरवाजे पहले हर 2-3 घंटे में खुलते थे, पर अब मल्टीप्लैक्सों के दरवाजे हर समय खुले रहते हैं. दर्शकों को यह सुविधा भी हो गई है कि एक ही मल्टीप्लैक्स में कई फिल्में देखने को मिल जाती हैं. इस सुविधा ने सिंगल स्क्रीन हौलों को तो खत्म कर दिया लेकिन मल्टीप्लैक्सों को जान दे दी है. अब स्ट्रीमिंग औनलाइन फिल्मी सेवाएं मल्टीप्लैक्सों को चुनौती पेश कर रही हैं.

एंड्रौयड टीवी आने के कारण यह काम और आसान हो रहा है. एंड्रौयड स्टिक भी आ गई है जिस से पुराने टीवी पर स्ट्रीमिंग फिल्में देखना संभव हो गया. इस सब का दुखद पक्ष यह है कि यह सारी मेहनत केवल कोरा मनोरंजन देने के लिए की जा रही है. डिज्नी, नैटफ्लिक्स, अमेजौन या इसी तरह की कोई और सेवा न ज्ञान बांटने वाली हैं न मार्गदर्शन करने वाली. तमाशा ही जीवन का बड़ा हिस्सा बन रहा है.

कठिनाई यह है कि सर्कस से कभी रोटी पैदा नहीं होती. ग्रीक और रोमन राजाओं ने जनता को बहलाने के लिए सर्कसों का आयोजन किया और बड़ेबड़े पैंथियन बनाए थे पर उसी ने रोमन सभ्यता का अंत किया, क्योंकि आम जनता को कुछ साल तो बहकाया जा सका पर उसे रोटी न दी जा सकी.

स्ट्रीमिंग फिल्मी सेवाएं लोगों को बहलाएंगी, फिल्म एडिक्ट बनाएंगी पर नया करने या जीवन के संघर्षों से मुकाबला करना नहीं सिखाएंगी. भारत जैसे गरीब देश ही नहीं, अमेरिका जैसे अमीर देशों में भी जरूरत उत्पादकता की है, मनोरंजन की नहीं. ये सेवाएं लोगों को निचोड़ कर रख देंगी. ये अफीम से कम नहीं हैं.

मुल्लाजी की उलफत

‘‘सुनो भाई, मैं तुम्हारी बेटी को तालीम तो दे सकता हूं, पर एक बात है कि समय मुझे शाम की नमाज के बाद ही मिल सकेगा, चूंकि मदरसे में मुझे दूसरे बच्चों को तालीम देनी पड़ती है.’’

‘‘हांहां, ठीक बात है मुल्लाजी. दरअसल, मेरी बच्ची बड़ी हो गई है. बाहर भेजना मेरी शान के खिलाफ है. लड़कियां बाहर जाने से बेपरदा हो जाती हैं…

‘‘घर पर उस की अम्मी रहती हैं. मेरी एक ही बेटी है. कौन सा मुझे उस से नौकरी करानी है,’’ मियां जावेद अली ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं कल शाम को आ रहा हूं,’’ मुल्ला नसरूल ने कहा.

शाम को सजधज कर कपड़ों में इत्र लगा कर मुल्लाजी मियां जावेद अली के घर जा पहुंचे.

‘‘क्या नाम है आप का मोहतरमा?’’ मुल्ला नसरूल ने पूछा.

‘‘जी, उलफत.’’

‘‘बड़ा प्यारा नाम है. चलो, सबक सीखें.’’

उलफत की उम्र 15 बरस रही होगी. मुल्ला नसरूल उसे रोज पढ़ाने आते. वह धीरेधीरे पढ़ने में दिलचस्पी लेने लगी.

मुल्ला नसरूल अब उस के लिए घर जैसे बन गए. वे पूरी ईमानदारी से जावेद अली की बेटी को तालीम दे रहे थे. इसी में एक साल पूरा हो गया.

मुल्ला नसरूल की शादी हो चुकी थी. उन के 2 बच्चे थे. बीवी सुसराल में रह कर ससुर व देवर के साथ खेतीबारी का काम देखती. मुल्लाजी भी महीने में 1-2 दिन के लिए बच्चों से मिल आते.

धीरेधीरे उलफत को तालीम देने का तीसरा साल शुरू हो गया. मुल्ला नसरूल को उलफत से उलफत हो गई थी, लेकिन डर की वजह से वे अपने दिल की बात नहीं कर पा रहे थे.

जवानी की यही शुरुआत लड़कियों के लिए संभलने की होती है. बाहर के मर्दों से उलफत का सामना नहीं होता था, पर इस साल उस के अब्बू ने घर पर टैलीविजन लगवा दिया था, जिस में सिर्फ मजहबी चैनल था.

पर कुछ दिनों से उलफत ने अपना रवैया बदल लिया था. मां घर में रहती, तो भी वह मौका देख कर दूसरे चैनल देखती थी.

एक दिन मुल्ला नसरूल ने प्यार की आग को परखना चाहा कि कहीं उन का एकतरफा प्यार तो नहीं. उन्होंने सबक सिखाने के बहाने उस का हाथ पकड़ कर दबा दिया. उलफत शर्म से लाल हो गई. उस के चेहरे पर मुसकान तैर गई.

एक दिन शाम को जब मुल्लाजी उलफत को तालीम दे रहे थे, तब मियां जावेद अली वहां आ गए. उन्होंने पूछा, ‘‘मुल्लाजी, कैसी चल रही है हमारी बेटी की तालीम?’’

‘‘बहुत होशियार है आप की बेटी. जितना सबक मैं देता हूं, उतना याद कर के मुझे जबानी सुनाती है.’’

‘‘ठीक है, सबक सिखाना जारी रखें,’’ कह कर जावेद अली दुकान पर लौट गए.

रमजान शुरू हो गए. मुल्ला नसरूल उलफत को कम वक्त देने लगे. तालीम पा रहे बच्चों के इम्तिहान का समय आ गया.

कम वक्त गुजारने पर उलफत ने रूठ कर मुल्ला नसरूल से कहा, ‘‘मेरे लिए आप के पास वक्त नहीं है. मैं आप से नहीं बोलती.’’

उलफत की नाराजगी दूर करते हुए मुल्ला नसरूल ने कहा, ‘‘मैं ईद पर घर गया था. मां की तबीयत खराब थी, सो रुक गया. घर में मांबाप के अलावा कोई भी तो नहीं है. मैं अकेला क्याक्या करूं.’’

उलफत ने मुल्लाजी के मुंह पर हाथ रख कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने बेवजह आप पर शक किया.’’

मौका देख कर मुल्लाजी ने उलफत को अपने सीने से लगा लिया.

अब तो इश्क का खेल बिना डर के चलने लगा. मौका देख कर एकदूसरे से लिपट कर प्यार का इजहार करते.

वक्त का पहिया बहुत तेजी से घूम रहा था. एक दिन जावेद अली रास्ते मेें मुल्ला नसरूल से टकरा गए.

‘‘सुनिए मुल्लाजी,’’ जावेद अली ने कहा.

‘‘जी,’’ कह कर वे रुक गए.

‘‘कल मेरी बेटी उलफत की शादी की तारीख के लिए मेहमान आ रहे हैं. आप भी आइए. पर कल तालीम देने नहीं आना है, मेहमानों के स्वागत के लिए आना है.’’

‘‘जी,’’ कह कर मुल्ला नसरूल आगे बढ़ गए.

यह बात सुन कर मुल्ला नसरूल का दिल कहीं नहीं लग रहा था. वे ज्योंज्यों उलफत को भुलाने की कोशिश करते, उस का चेहरा सामने आ जाता.

आखिर जब मुल्लाजी से रहा नहीं गया, तो वे शाम के वक्त उलफत के घर जा पहुंचे.

‘‘आइए, अंदर आइए. उलफत आप को 3-4 दिनों से याद कर रही है. कहीं आप बाहर तो नहीं चले गए थे?’’ उलफत की अम्मी ने पूछा.

‘‘तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए मैं आ नहीं सका,’’ कह कर वे सोफे पर बैठ गए.

‘‘ठीक है, मैं उलफत को भेज देती हूं,’’ कह कर अम्मी अंदर चली गईं.

कुछ देर बाद उलफत सीधे आ कर सबक सीखने वाले कमरे में बैठ गई. इतने में मुल्ला नसरूल भी उसी कमरे में आ गए. वे दोनों एकदूसरे के गले मिल कर आंसू बहा रहे थे.

‘‘कल मेहमान आए थे. क्या हुआ?’’ मुल्ला नसरूल ने पूछा.

उलफत ने कहा, ‘‘आप की उलफत एक हफ्ते बाद निकाह करा कर दुबई चली जाएगी. अब्बू की लड़के के अब्बा के साथ बातचीत हो गई है. वे वीजा करा कर ले आए हैं,’’ इतना कह कर उलफत रो पड़ी.

उलफत रोते हुए आगे बोली, ‘‘शायद 2 दिन बाद मेरी पढ़ाई बंद हो जाएगी. फिर आप का आना भी नहीं होगा. मेहमान आने लगेंगे. कल तक का समय है. आप को जो भी करना है, कल सोच कर बताना.

‘‘मैं जहर खा कर मर जाऊंगी, पर आप के बगैर नहीं रह सकती.’’

 

‘‘ठीक है,’’ मुल्ला नसरूल ने कहा. थोड़ी देर की बातचीत के बाद मुल्ला नसरूल बाहर आ गए. सोचतेविचारते रात बीत गई.

अगले दिन मुल्ला नसरूल शाम के होने का इंतजार करने लगे. उन्होंने इरादा कर लिया था, सिर्फ उलफत का हां कहना बाकी था.

शाम को वक्त से पहले ही मुल्ला नसरूल उलफत के यहां पहुंच गए. उन्होंने अपने दिल की सारी बात उलफत के सामने रख  कर  कहा, ‘‘कम से कम 2-3 महीने तक लुकछिप कर गुजारने पड़ेंगे. पैसे का इंतजाम कर के चलना  होगा. मेरे पास तो…’’

‘‘ठीक है. मुझे मंजूर है. कल अम्मी मेरे लिए कपड़े लेने मौसी के साथ बाजार जाएंगी. मैं घर पर अकेली रहूंगी. आप बाहर आटोरिकशा ले कर खड़े हो जाना. मैं तैयारी कर के रखूंगी.’’

अगली शाम को मुल्ला नसरूल उलफत के घर के सामने आटोरिकशा ले कर खड़े हो गए. एक बैग में कपड़े और एक बैग में शादी के लिए खरीदे गए जेवर व नकदी भर कर उलफत मुल्ला नसरूल के साथ आटोरिकशा में आ कर बैठ गई.

इस तरह नकाब डाले उलफत चल पड़ी मुल्ला नसरूल के साथ जिंदगी का सबक सीखने.

Video : ब्वॉयफ्रेंड के कहने पर लड़की ने उतारे सारे कपड़े और फिर..

आये दिन लड़कियों से जुड़े कई मामले सामने आते रहते हैं. मोहतरमाओं के सिर पर प्यार और मोहब्बत का ऐसा परवान चढ़ा है कि वह अपने दीवाने पर सब कुछ लुटाने को तैयार हैं. प्यार में लड़कियां ऐसी पागल हैं कि अपने चाहने वाले पर सब कुछ न्योछावर कर देती हैं. इस समय इंटरनेट पर एक लड़की का अपने दोस्त के साथ चैटिंग करते हुए वीडियो वायरल हो रहा है. जिसमें लड़की बहुत कम कपड़े पहने हुए है. यह वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है.

वीडियो देखकर साफ तौर पर यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि अपने दोस्त के कहने पर लड़की ने अपने कपड़े उतार दिए हैं और दोस्त को खुलेआम सब कुछ दिखाना चाह रही है. वीडियो में लड़की अपने दोस्त से वीडियो चैट कर रही हैं. यह भी कह रही है कि मैं कपड़े पहने थी.

आपको बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जब लड़की अपने दोस्त के साथ अपना सब कुछ दिखा रही है बल्कि इसके पहले भी ऐसे कई वीडियो सामने आ चुके हैं. आजकल लड़के पहले लड़कियों को प्यार में फंसाते हैं और फिर उन्हें अपने हिसाब से उपयोग करते हैं. वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उनकी जिंदगी से तक खिलवाड़ करते हैं.

आप देखें लड़की यह वीडियो.

मांझी ही नाव डुबोए…उसे कौन बचाए

जब नाव गंगा नदी में डूबने लगी थी तो उस में सवार लोग तो बचाने के लिए चिल्ला ही रहे थे, किनारे खड़े लोग भी उन के बचाव के लिए चिल्लाने लगे थे. अचानक नाव में तेज हलचल हुई और उस में लगे इंजन से धुआं उठने लगा था. इस के बाद नाव 2 टुकड़ों में बंट गई थी. उस में बैठी सवारियों में जो लोग तैरना जानते थे, वे तैरने लगे थे. बाकी लोग जान बचाने के लिए शोर मचाते हुए हाथपैर चला रहे थे. शाम का समय होने की वजह से नदी में जो भी हो रहा था, साफ नजर नहीं आ रहा था. फिर भी शोर सुन कर नदी के किनारे खड़े लोगों में से जो लोग तैरना जानते थे, उन्होंने डूब रहे लोगों को बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी थी.

35 साल की आरती अपनी 5 साल की बेटी अनुष्का को सीने से लगाए गंगा नदी में डूब गई थी. गोताखोरों ने उस की लाश को निकाला तो बेटी मां के सीने से चिपकी थी. इस दर्दनाक दृश्य को जिस ने भी देखा, उस का कलेजा कांप उठा. बाद में पता चला कि अनुष्का सुबह से ही मां से पतंग खरीदने और मेला देखने की जिद कर रही थी. बेटी की जिद की वजह से ही आरती उसे गंगा उस पार मेला घुमाने ले आई थी. आरती के पति विनोद कुमार किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. पत्नी और बेटी की मौत से उन्हें मानो लकवा मार गया था. पटना सिटी की रहने वाली नर्मदा के परिवार के 4 लोगों की इस हादसे में मौत हो गई थी, जिस में उन की बहू, पोती और 2 नातिनें शामिल थीं. उन के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. उन की बेटी ऊषा का रोरो का बुरा हाल था. उस की 2 बेटियां अंजलि और अर्पिता पतंगबाजी का आनंद लेने गंगा उस पार गई थीं.

जाते समय बेटियों ने मां से लौट कर खिचड़ी खाने को कहा था. वह बारबार बेटियों की लाश को झकझोर कर उठाने की कोशिश करते हुए कह रही थी कि ‘अब खिचड़ी कौन खाएगा?’ कभी वह मां को चुप कराने लगती थी तो कभी बदहवास सी इधरउधर देखने लगती थी. पटना में गंगा किनारे पतंग उत्सव में भाग ले कर लौट रहे 70 लोगों से भरी नाव गंगा में डूब गई थी. पटना लौ कालेज घाट के सामने 14 जनवरी की शाम को साढ़े 5 बजे हुए इस हादसे में 27 लोगों की मौत हो गई थी. पर्यटन विकास निगम की ओर से मकर संक्रांति पर गंगा किनारे 14 से 17 जनवरी तक पतंग उत्सव का आयोजन किया गया था.

शाम को यह प्राइवेट नाव सबलपुर से एनआईटी घाट के लिए चली थी. नाव में क्षमता से ज्यादा 70 लोग सवार हो गए थे. नाव घाट से 15 मीटर ही आगे बढ़ी थी कि नाव का इंजन खराब हो गया था, जिस से नाव गंगा में डूब गई थी, जिस में से 19 लोग तो किसी तरह से तैर कर किनारे आ गए थे, बाकी लोग डूब गए थे. उन में से 24 लाशें बरामद की गईं, बाकी का कुछ पता नहीं चला.

हादसे में बच निकले देवेश कुशवाहा ने बताया कि नाव में काफी लोग सवार थे. शाम साढ़े 5 बजे नाव घाट से चली. नाव में पहले से ही थोड़ा पानी था. जैसे ही नाव कुछ मीटर आगे बढ़ी, ओवरलोड होने की वजह से इंजन का पिस्टन फट गया, जिस तेज धमाका हुआ और धुआं निकलने लगा. इस से पानी बाहर निकलने के बजाए नाव में ही आने लगा.

घटना के समय मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि नाव में क्षमता से काफी ज्यादा लोग सवार थे. अंधेरा होने की वजह से सभी को घर लौटने की हड़बड़ी थी. कुछ लोगों ने यह भी बताया कि नाव में पहले से ही सुराख था, जिस से उस में पानी भर रहा था. इंजन बंद होने के बाद नाव डगमगाने लगी तो जान बचाने के लिए अफरातफारी मच गई.

इस की एक वजह आयोजकों द्वारा की गई घोषणा थी. 3 बजे आयोजकों ने अचानक घोषणा कर दी कि सभी जल्द से जल्द जाने की तैयारी करें, क्योंकि 4 बजे के बाद नाव सेवा बंद कर दी जाएगी. इस के बाद वहां आए लोग रानीघाट और कालीघाट पर आ गए. सभी को घर जाने की हड़बड़ी थी. 3 बजे तक वहां करीब 30 हजार पर्यटक थे. भीड़ के हिसाब से नावों की संख्या काफी कम थी. एक घंटे के अंदर नदी का किनारा खाली करने की घोषणा के बाद लोग भेड़बकरियों की तरह नावों में सवार होने लगे. नाव वाले जल्दीजल्दी चक्कर लगा रहे थे, लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी. अंधेरा होने लगा था, जिस से वापसी की हड़बड़ी और बढ़ गई. लोग किसी भी हालत में घर लौटने के लिए उतावले हो रहे थे.

एनडीआरएफ के सूत्रों के अनुसार, जिस समय लोग गंगा में डूब रहे थे, उस समय एनडीआरएफ की गश्ती टीम वहां आए लोगों को नदी पार कराने में लगी थी. एक बड़े अफसर के आदेश पर गश्ती टीम की नौकाएं वीआईपी लोगों को ढोने के काम में लगा दी गई थीं. जिस समय नाव डूब रही थी, एनडीआरएफ की गश्ती टीम आधा किलोमीटर दूर थी. गश्ती टीम की नाव जब वहां पहुंची, सब कुछ शांत हो चुका था. एनडीआरएफ के एक अफसर ने बताया कि अगर एनडीआरएफ की टीम मौके पर होती तो किसी की जान नहीं जाती.

टीम की एक नाव में 6 लाइफ जैकेट और 6 हवा भरी ट्यूबें रहती हैं. एक ट्यूब को पकड़ कर 3-4 लोग डूबने से बच सकते थे. इतना ही नहीं, बोट के किनारे लटकी रस्सियों को पकड़ कर भी एक बार में 20 लोगों की जान बच सकती थी. गंगा में हुए इस हादसे के बाद प्रशासन और एनडीआरएफ एक बार फिर नाकाम साबित हुआ है. हादसे के सवा घंटे बाद राहत कार्य शुरू हो सका था. रेस्क्यू औपरेशन का यह हाल था कि हादसे के 3 घंटे बाद तक एक भी लाश को नहीं निकाला जा सका था. अंत में जिला प्रशासन के गोताखोर राजेंद्र साहनी को बचाव कार्य और लाशों को निकालने के काम में लगाया गया. इस के बाद लाशों के निकालने का सिलसिला शुरू हुआ.

रात के अंधेरे में जब एनडीआरएफ को कुछ नहीं सूझ रहा था तो राजेंद्र साहनी ने मछली मारने वाली बंसी की मदद से लाशों को खोजने और निकालने का काम शुरू किया. उन्होंने 2 घंटे में 75 बार पानी में डुबकी लगाई. इस बीच वह एकएक कर के लाशें निकालते रहे. 55 साल के राजेंद्र साहनी पिछले 20 सालों से सैकड़ों लोगों की जान बचा चुके हैं. हाई टेक्नीक से लैस एनडीआरएफ उन के सामने बौना नजर आ रहा था.

राजेंद्र साहनी अपने 15 साथियों के साथ सर्च औपरेशन में लगे थे. उन्होंने 14 जनवरी को 21 और 15 जनवरी को 4 लाशें निकाली थीं. इस के बाद एनडीआरएफ और एमडीआरएफ की टीम ने कमान संभाली. एनडीआरएफ का सर्च औपरेशन हाई टेक्नीक था. इस के बाद भी उसे लाशों को ढूंढने में कामयाबी नहीं मिली. वहीं राजेंद्र साहनी ने मछली पकड़ने वाली बंसी, प्लास्टिक की रस्सी और ईंट की मदद से लाशों को निकाला था. उन्होंने बताया कि काफी तेज नोक वाली बंसी के संपर्क में आते ही कोई भी चीज आसानी से फंस जाती है. एक साथ 50-60 बंसी को पतली सी प्लास्टिक की रस्सी से बांधा जाता है.

उन के बीच ईंटों के कई टुकड़ों को बांध कर नदी में डाल दिया जाता है. इस के बाद धीरेधीरे नाव रस्सी को खींचती है. यही प्रक्रिया बारबार दोहराई जाती है. बंसी में किसी भी चीज के फंसने का पता चलता है तो गोताखोर पानी के अंदर जा कर उसे निकाल लाते हैं. पिछले 20 सालों से गंगा में लाशों को खोजने और निकालने का काम कर रहे राजेंद्र अब युवकों को गोताखोरी सिखा रहे हैं. सरकार की ओर से सन 2000 के बाद से कोई गोताखोर नियुक्त नहीं किया गया है, जिस से नाव हादसों के बाद बचाव और राहत कार्य के लिए सरकार के पास ठोस इंतजाम न के बराबर है.

प्रशासन की आधीअधूरी तैयारियों की वजह से ही मकर संक्रांति का उल्लास मातम में बदल गया था. पतंग उत्सव को देखने के लिए करीब 30 हजार लोग गंगा किनारे पहुंचे थे, लेकिन इन के लौटने के लिए नावों का पर्याप्त इंतजाम नहीं किया गया था. इतना ही नहीं, हादसे के बाद पटना और सारण जिला का प्रशासन एकदूसरे पर गैरजिम्मेदारी का आरोप मढ़ने लगा था.

पटना प्रशासन का कहना था कि पतंग उत्सव की जिम्मेदारी छपरा प्रशासन को सौंपी गई थी. सोनपुर के एसडीओ मदन कुमार ने बताया कि आयोजनस्थल की जिम्मेदारी संभालने के लिए 2 मजिस्ट्रैट, 4 पुलिस अफसर, 3 सुपरवाइजर और 64 सिपाहियों की ड्यूटी लगाई गई थी.

सरकारी दावा है कि पर्यटन निगम की ओर से 2 स्टीमर, मौनिटरिंग के लिए 3 सरकारी नावों और 10 प्राइवेट नावों की व्यवस्था की गई थी. एनडीआरएफ की ओर से 10 नावों से पैट्रोलिंग की जा रही थी.

वहीं प्रशासन का दावा है कि उस की ओर से 4 नावें और 4 गोताखोरों को लगाया गया था. जिला प्रशासन यह भी दावा कर रहा है कि प्राइवेट नावों पर प्रतिबंध लगाया गया था. इस के बाद भी प्राइवेट नावें कानून की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों को ढोने में लगी थीं. पुलिस वाले भी लोगों को प्राइवेट नावों पर चढ़ा रहे थे.

पतंग उत्सव का आयोजन करने वाले बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम ने लोगों को गंगा के उस पार ले जाने और वापस पटना लाने के लिए मुफ्त में क्रूज की सवारी कराने का विज्ञापन छापा था. इस के बाद भी प्राइवेट नावों से लोगों को ढोया जा रहा था. निगम के एमडी उमाशंकर प्रसाद ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि उत्सव में उम्मीद से ज्यादा लोग पहुंच गए थे.

शाम को तकनीकी खराबी की वजह से क्रूज उस पार नहीं जा सका था. निगम की ओर से लोगों को भरोसा दिलाया जा रहा था कि उन्हें सहीसलामत पटना के घाटों तक पहुंचाया जाएगा, इस के बाद भी हड़बड़ी में वापस लौटने के चक्कर में लोग प्राइवेट नावों में सवार होने लगे थे.

उत्सव में पहुंचे लोगों ने बताया कि सरकारी क्रूज से लोगों को उतारने के लिए बांस का प्लेटफार्म बनाया गया था, जो दोपहर 2 बजे ही टूट गया था. इस के बाद क्रूज सेवा को बंद कर दिया गया था. इसी से लोग प्राइवेट नावों में सवार हो कर लौटने के लिए अफरातफरी मचाने लगे थे.

शुरुआती जांच में पता चला है कि ओवरलोडिंग की वजह से नाव डूबी थी. जिस नाव में 70 से ज्यादा लोग सवार थे, उस की क्षमता महज 40 लोगों की थी. इस का मतलब है कि पुलिस और प्रशासन के अफसरों की अनदेखी और लापरवाही से इतना दर्दनाक हादसा हुआ.

उत्सव से लौट कर आए पटना के लोहानीपुर के रहने वाले उमेश ने बताया कि उत्सव में हजारों लोग पहुंचे थे. पतंगबाजी के बाद जब वापसी का समय हुआ तो अंधेरा होने लगा, जिस से लोगों में लौटने की हड़बड़ी मच गई. नावों पर क्षमता से ज्यादा लोग सवार होने लगे. पुलिस उन्हें रोकने के बजाए चुपचाप तमाशा देखती रही.

पटना लौ कालेज के घाट के पास एनडीआरएफ ने पावर बैलून लाइट जला कर रेस्क्यू औपरेशन शुरू किया, जिस में दर्जन भर लोगों की जान बचाई जा सकी. एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, उत्सव में डिज्नीलैंड लगाने वाले आयोजक और नाविक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है.

नाविकों ने पुलिस को बताया कि हादसे में डूबी नाव पहले से ही खराब थी, जो डगमगा कर चल रही थी. उस में छोटेछोटे कई छेद भी थे. लकडि़यां भी सड़ी हुई थीं. इस के बावजूद उस में 70 लोगों को बिठा लिया गया था. नाव में छेदों से तेजी से पानी भरने लगा था, जिस से कुछ दूर पर ही नाव डूबने लगी थी. हादसे के बाद नाविक फरार हो गया था. पुलिस उस की तलाश कर रही है.

हादसे के बाद नाव वालों के भाग जाने से हजारों पर्यटक फंस गए थे. उन्हें पटना लाने का सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया था. यहां भी आपदा प्रबंधन विभाग फेल रहा. उत्सव में हजारों लोगों की भीड़ तो जुटा ली गई थी, लेकिन प्रशासन ने एक एंबुलैंस तक की व्यवस्था नहीं की थी.

हादसे से कुछ देर पहले तक गंगा नदी के किनारे उत्सव और उत्साह का माहौल था. लोग सेल्फी ले कर सोशल साइटों पर डाल रहे थे. पतंगबाजी कर रहे थे. डीजे की धुनों पर थिरक रहे थे. रानीघाट, एनआईटी घाट और गांधी घाट पर लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा था. लोग जैसेतैसे नावों पर सवार हो कर नदी उस पार उत्सव में पहुंचने की जुगत में लगे थे.

जिस नाव पर 40 लोगों की क्षमता थी, उस 60-70 लोग लद रहे थे. पुलिस वाले किसी को नाव पर सवार होने से मना नहीं कर रहे थे.

पटना से गंगा उस पार जाने वाली प्राइवेट नाव उस पार ले जाने का किराया तो लेते हैं, लेकिन लौटने का किराया नहीं लेते. लौटते समय लोग अपनी मरजी के मुताबिक किसी भी नाव में सवार हो सकते हैं. उन के लिए यह जरूरी नहीं है कि जिस नाव से वे आए हैं, उसी से लौटें. जो नाव पहले दिख जाती है, उसी पर लोग जैसेतैसे सवार हो जाते हैं.

उस पार से पटना के घाटों तक कितनी नावें चलती हैं, इस का जिला प्रशसन को पता नहीं है. नावें किस के नाम रजिस्टर्ड हैं, इस की भी कोई जानकारी नहीं है. बिहार में नदी के खतरनाक घाटों पर नावों का परिचालन बेरोकटोक होता है. पूरे राज्य में 600 घाटों को खतरनाक घोषित किया गया है. पटना में 31 घाट सरकारी फाइलों में खतरनाक दिखाए गए हैं.

इस के बाद भी सभी घाटों से नावें चल रही थीं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था. इसी वजह से आए दिन नाव हादसे होते रहते हैं. बिहार सरकार की नई नाव नियमावली के मुताबिक 15 से 30 सवारियों वाली नाव में कम से कम 2 नाविक और 30 से अधिक सवारियों की क्षमता वाली नावों में 3 नाविकों का होना जरूरी है.

लेकिन इस नियम पर कोई भी नाव संचालक अमल नहीं करता. किस जिले में कितनी नावें हैं, उन की हालत क्या है, इस का भी कोई लेखाजोखा परिवहन विभाग के पास नहीं है. न ही जिलों के जिलाधिकारी के पास हैं. किस नदी के किस घाट पर कितनी नावें चलती हैं, इस का भी अतापता नहीं है.

नावों की उम्र सीमा क्या है, इस का भी किसी को पता नहीं है. नावों की नियमित रूप से जांच का जिम्मा किस के पास है, इस की भी किसी को जानकारी नहीं है. परिवहन विभाग का कहना है कि नावों की नियमित जांच का जिम्मा मोटर वेहिकल इंसपेक्टर (एमवीआई) को दिया गया है.

नाव नियमावली बनने के बाद सन 2011 से ही नावों के रजिस्ट्रेशन का काम ठप है. हर नाव को रजिस्ट्रेशन नंबर दिया जाता है, पर किसी भी नाव पर नंबर नहीं लिखा होता. 14 जनवरी को एनआईटी के पास हुए नाव हादसे की जांच का जिम्मा प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत और डीआईजी शालिन को सौंपा गया है.

शुरुआती जांच में हर तरफ से लापरवाही ही लापरवाही नजर आ रही है. प्रशासन की लापरवाही और बदतर इंतजाम की वजह से ही लोगों की जानें गईं. मारे गए लोगों के परिजनों के बयान पर सोनपुर के अंचलाधिकारी अनुज कुमार के बयान पर उत्सव में खोले गए अस्थाई मनोरंजन पार्क के राहुल वर्मा और नाव चलाने वाले अज्ञात नाविकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है.

पानी में डूबे नाव के मालिक का नाम अशोक राय है और वह हादसे के बाद से फरार है. गंगा किनारे जहां पतंग उत्सव मनाया गया है, वह सारण जिले में पड़ता है. सबलपुर में प्रशासन की अनुमति के बगैर मनोरंजन पार्क बनाया गया था. वहां बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ लग गई थी. पार्क को पटना के आशियानानगर इलाके के मजिस्ट्रैट कालोनी के रहने वाले राहुल वर्मा के मेसर्स आर.के. इंटरप्राइजेज ने बनवाया था.

लालच ने बर्बाद कर दिया हंसता खेलता परिवार

27 जुलाई, 2016 को पंजाब के जिला जालंधर की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. हरप्रीत कौर की अदालत में हत्या के एक मुकदमे का फैसला सुनाया जाना था. चूंकि इस मुकदमे में हत्या का दोषी मुख्य ग्रंथी को माना गया था, इसलिए उस से हमदर्दी रखने वाले पंजाब के तमाम गुरुद्वारों के ग्रंथी, सेवादार तो आए ही थे, आम लोग भी अदालत में जमा थे. चूंकि यह चर्चित मामला था, इसलिए मीडिया वाले भी अदालत परिसर में जमा थे. जिस की हत्या हुई थी, उस की बहन रंजीत कौर और मां भी अन्य घर वालों के साथ फैसला सुनने अदालत आई थीं. पिछली तारीख पर दोनों पक्षों के वकीलों की बहस होने के बावजूद बचाव पक्ष के वकील के अनुरोध पर 11 बजे से साढ़े 12 बजे तक एक बार फिर बहस हुई. जबकि जज डा. हरप्रीत कौर ने पिछली तारीख पर हुई बहस के आधार पर ही इस मुकदमे का फैसला सुरक्षित कर लिया था. फिर भी बचाव पक्ष के वकील के अनुरोध पर उन्होंने बहस का आदेश दे दिया था, जो करीब डेढ़ घंटे तक चली थी.

लंच के बाद ठीक सवा 2 बजे जज डा. हरप्रीत कौर ने अदालत में प्रवेश किया तो वहां उपस्थित लोगों ने खड़े हो कर उन का स्वागत किया. इस के बाद वह अपनी सीट पर बैठ गईं तो मुकदमे के फैसले की फाइल पेशकार ने उन के सामने रख दी. उन्होंने इस मुकदमे में क्या फैसला सुनाया, यह जानने से पहले आइए इस पूरे मामले के बारे में जान लें.

5 अप्रैल, 2014 को जालंधर के पटेल अस्पताल की स्टाफ नर्स रंजीत कौर ने अपनी मां परविंदर कौर के साथ जा कर थाना डिवीजन नंबर 8 के थानाप्रभारी विमलकांत से मिल कर शिकायत दर्ज कराई थी कि उस की 30 साल की विधवा बहन कमलप्रीत कौर कल यानी 4 अप्रैल, 2014 से अपने पृथ्वीनगर स्थित मकान नंबर एनए-28 से दोपहर 12 बजे से स्कूटर के साथ गायब है.

दोपहर को उस के जेठ महेंद्र सिंह ने किसी से पैसा लेने के लिए बुलाया था. उसे महेंद्र सिंह का 14 साल का बेटा गगनदीप सिंह बुलाने आया था. उस के साथ वह भी गया था. देर रात तक कमलप्रीत नहीं लौटी तो उन्होंने महेंद्र सिंह को फोन किया. उस ने बताया कि कमलप्रीत को उस ने 12 बजे बुलाया था, लेकिन 2 बजे तक इंतजार करने के बाद भी जब वह नहीं आई तो वह अपने काम से कहीं और चला गया. उस के बाद से कमलप्रीत का कुछ पता नहीं है. उस के दोनों फोन भी बंद हैं.

विमलकांत ने रंजीत कौर की शिकायत पर कमलप्रीत की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश का आश्वासन दे कर उसे और उस की मां को घर भेज दिया. इस के बाद उन्होंने एएसआई अजमेर सिंह को कमलप्रीत के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी. इस मामले में वह कुछ करते, अगले दिन सवेरे ही रंजीत कौर थाने पहुंची और थानाप्रभारी को दूसरी तहरीर दे कर कहा कि उस की बहन कमलप्रीत के गायब होने के पीछे उस के जेठ महेंद्र सिह का हाथ है.

उसी ने उसे कहीं छिपा दिया है या फिर उस की हत्या कर के लाश गायब कर दी है. क्योंकि वह उस की बहन से रंजिश रखता था. रंजीत कौर की इस तहरीर के आधार पर विमलकांत ने अपराध संख्या 55/2014 पर कमलप्रीत के अपहरण का मुकदमा महेंद्र सिंह निवासी गुरुद्वारा भगतराम, गांव बुलीना, दोआबा के खिलाफ दर्ज करा कर उस की तलाश शुरू कर दी.

जांच शुरू करते ही विमलकांत ने कमलप्रीत के दोनों फोन नंबरों पर फोन किया. उन में से एक नंबर तो बंद था, पर दूसरे फोन की घंटी बज उठी. थोड़ी देर बाद किसी ने फोन उठाया तो उन के पूछने पर उस ने अपना नाम संजीव बता कर कहा, ‘‘सर, मैं लवली यूनिवर्सिटी का छात्र हूं. यह फोन मुझे लुधियाना जाने वाली बस में सीट के नीचे मिला था.’’

विमलकांत ने संजीव से थाने आ कर फोन जमा कराने को कहा तो उस ने थाने आ कर फोन जमा करा दिया. इस के बाद उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एएसआई संजीव कुमार, अजमेर सिंह, गुरदेव सिंह, जगदीश कुमार, हैडकांस्टेबल सतनाम सिंह, तरसेमलाल, मुंशी नरेंद्र मोहन और सिपाही जतिंद्र की एक टीम बनाई.

महेंद्र सिंह पुलिस के हाथ नहीं लग रहा था. उस के इस तरह गायब होने से उस पर संदेह बढ़ता जा रहा था. वह 2 दिनों से गुरुद्वारा साहिब से गायब था. पुलिस ने उस के बेटे गगनदीप सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मैं अपने पिता महेंद्र सिंह के कहने पर चाची कमलप्रीत को बुलाने गया था. मैं चाची के साथ ही था, लेकिन जम्मू रोड पर फ्लोईओवर से पहले चाची के फोन पर किसी का फोन आया तो फोन पर बात करने के बाद उन्होंने मुझे वहीं उतार दिया और अकेली ही फ्लाईओवर की ओर चली गईं.’’

बहरहाल, आगे की काररवाई करते हुए विमलकांत ने कमलप्रीत का हुलिया बता कर जिले के सभी थानों से उस के बारे में पता किया. इस के अलावा उस के फोटो सहित इश्तेहार शोरे गोगा छपवा कर शहर भर में चस्पा करवा दिए. महेंद्र सिंह की तलाश में पुलिस तो लगी ही थी, मुखबिर भी उस के बारे में पता कर रहे थे.

काफी मशक्कत के बाद मुखबिर की सूचना पर महेंद्र सिंह को पठानकोट चौक से गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने भाई गुरमेल सिंह की हत्या का बदला लेने के लिए कमलप्रीत कौर की हत्या कर उस की लाश को सीवर में फेंक दिया था.

महेंद्र सिंह को लगता था कि उस के भाई गुरमेल सिंह की मौत अधिक शराब पीने से नहीं, बल्कि अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए कमलप्रीत कौर ने अपने प्रेमियों सन्नी और प्रिंस के साथ मिल कर शराब में जहर दे कर कराई थी. उस के पास इस बात के सबूत भी हैं. मरने से पहले कमलप्रीत ने उसे लिख कर दिया था.

इस के अलावा भी महेंद्र सिंह ने कमलप्रीत कौर की हत्या की एक और कहानी सुनाई. लेकिन उस की बातों पर ध्यान दिए बगैर विमलकांत ने उसे साथ ले जा कर उस की निशानदेही पर कमलप्रीत कौर की लाश बरामद कर ली. उन्होंने एसीपी सतीश मल्होत्रा, एडीसीपी (प्रथम) नरेश डोगरा को भी घटनास्थल पर बुला लिया था.

विमलकांत ने महेंद्र सिंह की निशानदेही पर गांव बुलीना, दोआबा के गुरुद्वारा साहिब भगतराम के सीवर से कमलप्रीत कौर की जो लाश बरामद की थी, वह मात्र ब्रा और पैंटी में थी. उन्होंने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर थाने आ कर अपहरण के दर्ज मुकदमे को हत्या की धाराओं में तब्दील कर उसी दिन यानी 7 अप्रैल, 2014 को महेंद्र सिंह को जेईआईसी सिमरन सिंह की अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड अवधि के दौरान की गई पूछताछ में महेंद्र सिंह ने कमलप्रीत की हत्या की जो कहानी बताई, वह ईर्ष्या, आपसी रंजिश और दूसरे की संपत्ति हड़पने के लिए की गई हत्या की कहानी थी.

महेंद्र सिंह अपने 4 भाईबहनों में सब से बड़ा था. वह शुरू से ही काफी शरारती और लापरवाह किस्म का आदमी था. पिता सुरजीत सिंह की मौत के बाद सारे भाईबहन अपनीअपनी शादियां कर के अलग रहने लगे थे. महेंद्र सिंह के 2 बेटे और एक बेटी थी. बेटी शादी के बाद ससुराल चली गई थी तो बड़ा बेटा अलग रहने लगा था. उस के साथ सिर्फ छोटा बेटा गगनदीप सिंह ही रहता था.

महेंद्र सिंह की घटिया सोच और बुरी आदतों को सालों तक सहने के बाद अंत में परेशान हो कर उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. इस के बाद गांव के कुछ पुरानी जानपहचान वालों ने उस पर तरस खा कर बुलीना गांव के गुरुद्वारा भगतराम में उसे 4 हजार रुपए महीने की गुरुद्वारा के ग्रंथी पाठी की नौकरी दिलवा दी थी.

रहना और खानापीना सब गुरुद्वारा साहिब की ओर से था. वह चाहता तो फ्री का भोजन और बिना किराए के मकान में रह कर अपना और बेटे गगनदीप सिंह का भविष्य संवार सकता था. लेकिन उसे तो अपने और बेटे के भविष्य से ज्यादा चिंता अपने छोटे भाई के बढ़ते रुतबे और कमाई की थी.

महेंद्र सिंह का छोटा भाई गुरमेल भांगड़ा पार्टी में काम करता था. इस काम से उसे अच्छीखासी कमाई हो रही थी. वह मेहनती, ईमानदार और दूसरों की मदद करने वाला आदमी था. इसलिए वह हर तरह से सुखी था. उस की शादी कमलप्रीत कौर से हुई थी. कमलप्रीत कौर के पिता इकबाल सिंह बहरीन में काम करते थे. सालों पहले उन की मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद परिवार में विधवा मां परमिंदर कौर और छोटी बहन रंजीत कौर रह गई थी, जो पटेल अस्पताल में स्टाफ नर्स थी.

शादी के बाद गुरमेल और कमलप्रीत कौर 2 बेटियों खुशप्रीत कौर और राजबीर कौर के मातापिता बने. इस के बाद गुरमेल ने दोस्तों की मदद से लाम्मा पिंड चौक के पास राजा भांगड़ा ग्रुप के नाम से अपनी भांगड़ा पार्टी बना ली. देखते ही देखते उस का यह काम चल निकला और वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा.

पास में पैसे आए तो गुरमेल ने अपना मकान भी बनवा लिया. इस के अलावा उस की मां मरने से पहले पृथ्वीनगर वाला अपना मकान बहू कमलप्रीत के नाम कर गई थीं. जबकि महेंद्र सिंह उस मकान को हासिल करने के लिए दिनरात मां और भाई से झगड़ा करता रहता था.

इस तरह गुरमेल सिंह करोड़ों का मालिक बन गया था, जबकि महेंद्र सिंह के पास कुछ नहीं था. इसीलिए वह भाई की संपत्ति हथियाने की योजनाएं बनाने लगा था. दुर्भाग्य से 23 अक्तूबर, 2013 को गुरमेल की अधिक शराब पीने से मौत हो गई. उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं. पास में पैसे थे, इसलिए उस ने तमाम लोगों को काफी रकम उधार दे रखी थी, जिसे अब कोई लौटाने का नाम नहीं ले रहा था.

बहरहाल, छोटे भाई की मौत के बाद उस की जायदाद हथियाने के लिए महेंद्र सिंह को उचित मौका मिल गया था. उसे कुछ उन लोगों के बारे में पता था, जिन्होंने गुरमेल से रुपए उधार ले रखे थे. महेंद्र उन से रुपए वसूल करने लगा. इस के बाद वह गुरमेल की पत्नी कमलप्रीत कौर को बदनाम करने के लिए कहने लगा कि उस के पड़ोस में रहने वाले सन्नी और प्रिंस से अवैध संबंध हैं.

अपने अवैध संबंधों को छिपाने के लिए ही उस ने प्रिंस और सन्नी के साथ मिल कर गुरमेल को जहर मिली शराब पिला दी थी, जिस से उस की मौत हो गई थी. विमलकांत ने महेंद्र सिंह के इस बयान की पुष्टि के लिए सन्नी और प्रिंस को थाने बुला कर पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वे कमलप्रीत को बहन मानते थे, जिस की वजह से वे उस का छोटामोटा काम कर दिया करते थे.

बहरहाल, महेंद्र सिंह द्वारा फैलाई गई अफवाह पर किसी ने ध्यान नहीं दिया तो उसे गुस्सा आ गया और उस ने कमलप्रीत कौर की हत्या की योजना बना डाली. उसे लगा कि उस की मौत के बाद उसे अपनी मां द्वारा दी गई जायदाद तो मिल ही जाएगी, मृतक गुरमेल सिंह की बेटियों के संरक्षक के तौर पर उस की भी जायदाद उसे ही मिल जाएगी.

बहरहाल, कमलप्रीत कौर की हत्या की योजना बना कर उस ने 4 अप्रैल, 2014 की सुबह 11 बजे उसे फोन कर के कहा कि गुरमेल से एक आदमी ने डेढ़ लाख रुपए ले रखे थे, वह रुपए देने को तैयार है. 50-50 हजार कर के वह 3 बार में रुपए दे देगा. 50 हजार वह आज ही दोपहर को देने वाला है.

कमलप्रीत को उस की बातों पर विश्वास हो गया और वह रुपयों के चक्कर में उस के साथ जाने को तैयार हो गई. विश्वास जमाने के लिए उस ने दोपहर को उसे लाने के लिए अपने बेटे गगनदीप सिंह को भेज दिया. दोपहर साढ़े 12 बजे कमलप्रीत कौर गगनदीप को साथ ले कर अपनी ऐक्टिवा स्कूटर से निकली तो अपनी छोटी बहन रंजीत कौर को मैसेज कर दिया कि वह महेंद्र सिंह के साथ रुपयों की वसूली के लिए जा रही है.

कमलप्रीत कौर फ्लाईओवर तक पहुंची थी कि महेंद्र सिंह ने फोन कर के उस से कहा कि वह गगनदीप को वहीं छोड़ कर अकेली ही किशनपुरा आ जाए, यहीं से वह उस के साथ उस आदमी के गांव चलेगा.

महेंद्र सिंह से बात होने के बाद कमलप्रीत कौर ने गगनदीप को वहीं उतार दिया और खुद किशनपुरा की ओर चल पड़ी. किशनपुरा मोड़ पर महेंद्र सिंह उसे इंतजार करता मिल गया. कमलप्रीत ने उस से पूछा कि अब कहां चलना है तो उस ने कहा, ‘‘अभीअभी उस आदमी का फोन आया था कि वह रुपए ले कर गुरुद्वारा साहिब आ रहा है. इसलिए अब गुरुद्वारे चलना है.’’

महेंद्र सिंह झूठ बोल कर कमलप्रीत को गुरुद्वारा साहिब ले आया और उसे एक कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद उस ने गुरुद्वारा साहिब का मुख्यद्वार बंद किया और कमरे में आ कर उस की पिटाई कर के मन की भड़ास निकाली. इस के बाद कमलप्रीत की गरदन पर तलवार रख कर पूछा, ‘‘सचसच बता, प्रिंस और सन्नी तेरे यार हैं न? उन्हीं के साथ मिल कर तू ने मेरे भाई की हत्या की थी न?’’

‘‘मैं पति की हत्या कर के खुद को विधवा क्यों बनाऊंगी?’’ कमलप्रीत ने रोते हुए कहा, ‘‘आप को एक विधवा की जिंदगी के बारे में क्या पता होगा.’’

‘‘मुझे सब पता है. मरने के 2 महीने बाद गुरमेल ने मेरे सपने में आ कर मुझे बताया था कि जब तक मैं तुम से उस की मौत का बदला नहीं ले लेता, तब तक उस की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी.’’

महेंद्र सिंह का इरादा भांप कर कमलप्रीत कांप उठी थी. उस ने कमलप्रीत को कागज और पेन दे कर कहा, ‘‘इस पर लिखो कि तुम्हारा सन्नी और प्रिंस से नाजायज संबंध था और उन्हीं के साथ मिल कर तुम ने गुरमेल की हत्या की थी.’’

अपनी जान बचाने के लिए कमलप्रीत कौर ने महेंद्र ने जो कहा, वह लिख कर नीचे हस्ताक्षर कर दिए. दरअसल किसी वकील ने महेंद्र सिंह को सलाह दी थी कि अगर वह किसी तरह कमलप्रीत कौर को बदचलन साबित कर दे तो उस की बेटियों और मकान की देखभाल की जिम्मेदारी उसे मिल सकती है. इसीलिए उस ने ऐसा किया था.

कमलप्रीत ने जैसे ही उस की कही बातें कागज पर लिख कर दीं, उस ने धक्का दे कर उसे पलंग पर गिरा दिया और उस के सीने पर सवार हो कर गला दबाने लगा. जान बचाने के लिए कमलप्रीत कौर ने काफी संघर्ष किया, लेकिन महेंद्र सिंह के हाथों वह बच नहीं पाई.

कमलप्रीत की हत्या कर के महेंद्र सिंह ने कैंची से उस के शरीर के सारे कपड़े काट कर अलग किए और फिर गुरुद्वारा परिसर में ही बने सीवर टैंक में उस की लाश को डाल कर ढक्कन बंद कर दिया. इस के बाद कपड़ों को जला कर राख नजदीकी गांव जोहला के गुरुद्वारे के पास खेतों में बिखेर दी.

स्कूटर ले जा कर उस ने रेलवे स्टेशन की पार्किंग में खड़ी कर दी और कमलप्रीत कौर के दोनों मोबाइल फोन जालंधर से लुधियाना जा रही बस में रामामंडी के स्टैंड पर चढ़ कर बस की सीट के नीचे रख दिए और बाईपास के पास आ कर बस से उतर गया.

इतना सब कर के महेंद्र सिंह कमलप्रीत कौर के घर गया और उस की बहन रंजीत कौर तथा दोनों बेटियों से कहा कि उस ने किसी से रुपए लेने के लिए कमलप्रीत को बुलाया था, पता नहीं वह आई क्यों नहीं?

विमलकांत ने महेंद्र सिंह की निशानदेही पर रेलवे स्टेशन से स्कूटर और उस की चाबी, गुरुद्वारा साहिब के उस के कमरे से कैंची बरामद कर ली थी. उन्होंने जांच पूरी कर के समय से आरोप पत्र अदालत में दाखिल कर दिया था. इस मामले की सुनवाई 2 साल 3 महीने 18 दिन चली, जिस के बाद अदालत ने 28 जुलाई, 2016 को इस केस का फैसला सुना दिया.

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश डा. हरप्रीत कौर ने महेंद्र सिंह को कमलप्रीत कौर की हत्या, उस की लाश खुर्दबुर्द करने और साक्ष्य मिटाने का दोषी मानते हुए सश्रम उम्रकैद की सजा सुनाई, साथ ही 20 हजार रुपए जुरमाना भी लगाया. जुरमाना न अदा करने पर अतिरिक्त सजा का प्रावधान रखा. इस तरह महेंद्र सिंह को उस के किए की सजा मिल गई.

बिहार में युवक ने खुद की चढ़ाई बलि

 

साल 2017. 31 जनवरी की सुबह. सूरज पूरी तरह नहीं निकला था. चारों ओर हलका अंधेरा था. तकरीबन 6 बजे राजरप्पा मंदिर का दरवाजा खुला. अपनेअपने हाथों में पूजा के थाल लिए लोग अंदर जाने लगे. एक नौजवान तड़के 5 बजे से ही मंदिर के बाहर खड़ा था. कुछ देर तक वह मंदिर के आसपास चक्कर लगाता रहा, उस के बाद पास की ही भैरवी नदी में नहाने लगा. नहाने के बाद वह नौजवान नए कपड़े पहन कर मंदिर के अंदर गया और काफी देर तक पूजापाठ करता रहा. उस के बाद उस ने 15 बार मंदिर के चक्कर लगाए, फिर वह धीमे कदमों से मंदिर से बाहर निकला और बलि वेदी के पास पहुंच गया. वहां जमीन पर बैठ कर वह कुछ देर तक इधरउधर देखता रहा.

इस दौरान उस ने कई बार अपने गले पर हाथ फेरा. उस के बाद मुख्य दरवाजे के पास बैठ कर उस ने धारदार हथियार से अपना गला रेत डाला. नतीजतन खून से लथपथ उस का जिस्म फर्श पर तड़पने लगा और कुछ पल में ही उस का जिस्म शांत पड़ गया. मंदिर के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच के बाद मंदिर के प्रशासन और पुलिस को इस मामले की हकीकत का पता चला. झारखंड के राजरप्पा इलाके के छिन्नमस्तिका मंदिर में 31 जनवरी की सुबह एक नौजवान ने खुद की ही बलि चढ़ा दी. उस ने मंदिर की बलि वेदी के पास बैठ कर धारदार हथियार से अपना गला रेत लिया. फर्श पर खून ही खून नजर आ रहा था.

मंदिर में जमा लोगों के बीच अफरातफरी मच गई. मंदिर को तुरंत बंद कर दिया गया. राजरप्पा मंदिर में इस तरह की यह पहली वारदात हुई है. मंदिर में पशु बलि की प्रथा तो है, पर पहली बार किसी इनसान ने अपनी बलि दी. बलि देने वाले नौजवान की पहचान बिहार के बक्सर जिले के सिमरी ब्लौक के बलिहार गांव के संजय नट के तौर पर हुई है.

35 साला संजय नट सीआरपीएफ का जवान था. उस के पिता हृदय नट बिहार मिलिटरी पुलिस में सिपाही हैं. संजय नट की साल 2008 में सीआरपीएफ में बहाली हुई थी. फिलहाल वह ओडिशा के नौपाड़ा में सीआरपीएफ की 216 बटालियन में तैनात था. मंदिर के पुजारी ने पुलिस को खबर की और पुलिस ने मौके पर पहुंच कर लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. संजय नट की पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाल कर उस के घर वालों को सूचना दी गई. संजय नट के परिवार और गांव वालों को यकीन ही नहीं हो रहा है कि उस ने खुदकुशी कर ली है.

संजय नट की बीवी शारदा देवी ने बताया कि फिलहाल उन्हें कोई टैंशन नहीं थी और वे काफी खुशमिजाज इनसान थे. कोई यह मानने को तैयार ही नहीं है कि संजय नट जैसा जांबाज और हंसमुख इनसान खुदकुशी जैसा कदम उठा सकता है. संजय नट के घर वाले इस के पीछे कोई बड़ी साजिश मान रहे हैं और सरकार से इस मामले की पूरी छानबीन करने की गुहार लगाई है. संजय नट की बीवी शारदा देवी ने बताया कि 15 जनवरी, 2017 को वे छुट्टी पर घर आए थे. 29 जनवरी को वे हंसतेमुसकराते ड्यूटी जौइन करने घर से निकले थे. उन्होंने फोन कर के बताया भी था कि ओडिशा पहुंच कर ड्यूटी जौइन कर ली है. पता नहीं, वे कैसे झारखंड के राजरप्पा के छिन्नमस्तिका मंदिर पहुंच गए

संजय नट की मां भगीरथी देवी कहती हैं कि संजय अपनी नौकरी और परिवार से पूरी तरह खुश था. उसे किसी बात की पीड़ा नहीं थी. उस ने खुदकुशी नहीं की है, बल्कि किसी ने उस की हत्या की है. इस की गहरी छानबीन करने की जरूरत है. संजय नट की बेटी ने पुलिस को अलग तरह का बयान दे कर मामले में नया मोड़ दे दिया है. उस ने बताया कि उस के पिता धार्मिक स्वभाव के थे. वे अकसर कहा करते थे कि उन के ऊपर देवी आती है. खास बात यह है कि संजय नट ने जिस तरह के हथियार से अपना गला रेता था, वैसा ही हथियार मंदिर की देवी के हाथ में है. संजय की बीवी, मांबाप और बाकी घर वाले इस तरह की किसी बात से इनकार कर रहे हैं. सभी एक ही बात कह रहे हैं कि संजय को कोई तनाव नहीं था और न ही वह किसी पोंगापंथी के चक्कर में फंसा हुआ था. वह हर तरह से खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था.

राजरप्पा के थाना इंचार्ज अतिन कुमार ने बताया कि पहली नजर में तो मामला खुदकुशी का ही लग रहा है और मामले की पूरी जांच के बाद ही सचाई सामने आ सकेगी. इस बीच मंदिर के पुजारियों ने इसे  पोंगापंथी की शर्मनाक कारिस्तानी कह डाला. मंदिर के पुजारियों को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था कि किसी की जान गई है, बल्कि वे तो मंदिर के अपवित्र होने से परेशान थे. उन्हें यह डर सताने लगा कि मंदिर में किसी इनसान की लाश मिलने से उन के हजारों भक्त कहीं बिदक नहीं जाएं. इस से उन की मोटी कमाई को धक्का लग सकता था. इस के लिए पुजारियों ने नई नौटंकी रच डाली. पुलिस जब मंदिर से संजय नट की लाश को उठा कर ले गई, तो मंदिर का शुद्धीकरण किया गया. पुजारियों ने 5 गायों के दूध, पांच द्रव्य और 5 नदियों के पानी से मंदिर को अच्छी तरह से धोया. इस में तकरीबन 3 घंटे लगे. साफसफाई के बाद ही मंदिर के मुख्य दरवाजे को खोला गया.

मंदिर की न्याय समिति के सचिव शुभाशीष पंडा ने बताया कि नौजवान का गला रेत कर अपनी जान देना पूरी तरह से खुदकुशी का मामला है और मंदिर का उस से कोई लेनादेना नहीं है. राजरप्पा झारखंड के रामगढ़ जिले में है. कहा जाता है कि राजरप्पा का यह देवी मंदिर तकरीबन 6 हजार साल पुराना है. वहां हमेशा अंधभक्तों की भीड़ लगी रहती है. वैसे, सैंट्रल कोलफील्ड की बड़ी परियोजना की वजह से भी राजरप्पा जाना जाता है. राजरप्पा मंदिर रामगढ़ से तकरीबन 28 किलोमीटर और रांची से 80 किलोमीटर दूर है.

इस मंदिर की सिक्योरिटी के लिए कोई खास इंतजाम नहीं है. मंदिर की सिक्योरिटी होमगार्ड के 4 जवानों के हाथ में है. साल 2010 में मंदिर में मूर्ति चोरी होने के बाद सिक्योरिटी का यह इंतजाम किया गया था. मंदिर में हमेशा सैकड़ों लोगों की भीड़ रहती है और होमगार्ड के 4 जवानों के बूते सिक्योरिटी मुमकिन नहीं है. मंदिर परिसर में कुल 16 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, जिन में से 4 खराब पाए गए हैं.

बायोपिक रिलीज से पहले विवादों में फंसी सनी

पौर्न स्टार से बौलीवुड का सफर तय करने वाली अदाकारा सनी लियोनी इन दिनों अपनी बायोपिक को लेकर सुर्खियों में हैं. सनी अपनी बायोपिक में खुद ही एक्टिंग करती नजर आएंगी. सनी की बायोपिक ‘करनजीत कौर: द अनटोल्ड स्टोरी औफ सनी लियोनी’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. अब उन्होंने इस फिल्म का प्रमोशन भी शुरू कर दिया है. लेकिन खबर है कि यह फिल्म रिलीज से पहले ही विवाद में फंस गई है.

एसजीपीसी प्रवक्ता दिलजीत सिंह बेदी ने सनी की बायोपिक के नाम पर आपत्ति जताई है. फिल्म का नाम करनजीत कौर रखने पर दिलजीत सिंह ने कहा कि ऐसा करना सिक्खों की भावनाओं से खिलवाड़ है. उन्होंने कहा, ‘सनी लियोनी ने अपना धर्म बदल लिया है और अब उन्हें कौर शब्द का इस्तेमाल करने का कोई हक नहीं है.’

फिलहाल फिल्म के मेकर्स या सनी लियोनी की तरफ से अब तक इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. बता दें कि सनी की बायोपिक एक वेब सिरीज है जो 16 जुलाई से ZEE 5 ऐप पर शुरू की जाएगी. इस सिरीज को आदित्य दत्त ने डायरेक्ट किया है. ऐसा पहली बार होगा जब कोई एक्ट्रेस अपनी बायोपिक में खुद ही एक्टिंग करे.

नम्रता दत्त फिल्म ‘संजू’ में परेश रावल के किरदार से नहीं रखतीं इत्तेफाक

संजय दत्त की बायोपिक संजू में रणबीर कपूर के साथ ही बाकी एक्टर्स की परफौरमेंस को भी सराहना मिली है. खासकर सुनील दत्त बने परेश रावल की जबरदस्त एक्टिंग की तारीफ सभी ने की है लेकिन सुनील दत्त की बेटी नम्रता दत्त इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती हैं. फिल्म देखने के बाद उन्होंने कहा है कि वह परेश रावल से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाईं.

एक वेबसाइट से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मैं किसी को अपने पिता की जगह पर रखकर नहीं देख सकती. वह स्पेशल थे. ऐसा नहीं मैं परेश रावल को पसंद नहीं करती लेकिन मैं फिल्म में उनसे कनेक्ट नहीं कर पाई क्योंकि मैं औडियंस नहीं हूं, सुनील दत्त की बेटी हूं. ‘ नम्रता ने आगे कहा, ‘नरगिस बनीं मनीषा कोइराला भी ठीक ठाक थीं. सुनील दत्त और नरगिस की बेटी होने के नाते जजमेंट देना मुश्किल है. अगर औडियंस इन कलाकारों से कनेक्ट कर पाई तो अच्छी बात है.’

कुमार गौरव की वाइफ हैं नम्रता: कुमार ने ‘लव स्टोरी’ (1981), ‘तेरी कसम'(1982) और ‘नाम’ (1986) जैसी फिल्मों में काम किया था. वह संजय दत्त के करीबी थे और उनके बुरे दौर में हमेशा उनका सपोर्ट किया. रौकी की रिलीज के बाद जब संजय ड्रग्स के चंगुल में फंस गए थे तो उनका फ़िल्मी करियर डूब रहा था. ऐसे में कुमार ने नाम फिल्म प्रोड्यूस की और यह हिट साबित हुई.

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संजय की पूर्व पत्नी ने भी दिया फिल्म पर रिएक्शन: संजय की दूसरी पत्नी रह चुकी रिया पिल्लई ने भी फिल्म देखी है और वह इससे नाखुश बताई जा रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, रिया इस बात से हैरत में हैं कि फिल्म में उनका जिक्र तक नहीं है. मुंबई ब्लास्ट के दौरान संजय की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए थे. उस दौरान रिया, संजय के साथ थीं. दोनों ने 1987 में शादी की थी और 2005 में अलग हो गए थे.

संजय दत्त लिखेंगे आत्मकथा: संजू की सक्सेस से खुश संजय ने अब अपनी आत्मकथा लिखने का फैसला किया है,जि‍से वह अगले साल अपने जन्मदिन 29 जुलाई पर रिलीज करेंगे. इस औटोबायोग्राफी को संजय हार्पर कौलिन्स के सहयोग से प्रकाशित करेंगे. संजय ने कहा, ‘मैंने एक असाधारण जिंदगी जी है जो उतार-चढ़ाव, सुख और दुख से भरी है. मेरे पास बताने के लिए कई रोचक कहानियां हैं जो मैंने आज से पहले कभी नहीं बताईं. मैं अपनी यादें और एहसास बांटने के लिए बहुत उत्साहित हूं.’

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