अर्शी खान ने ‘बीड़ी जलईले’ पर लगाए जबरदस्त ठुमके

अर्शी खान जब से बिग बौस के घर से बाहर आई हैं, तब से ही सुर्खियों में हैं. उनकी लोकप्रियता दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है. अब वे ऐंड टीवी के पौपुलर शो ‘बिट्टी बिजनेस वाली’ में नजर आने वाली हैं. लेकिन उनके तेवर पहले जैसे ही बिंदास रहेंगे और वे इस सीरियल में अपने स्पेशल डांस का तड़का लगाएंगी. सीरियल में शादी की सिक्वेंस के दौरान एक समारोह का आयोजन किया जाएगा और इसमें अर्शी खान अपनी अदाओं के जलवे बिखेरेंगी.

अर्शी खान खुशी के इस मौके पर बिपाशा बसु के ‘ओंकारा’ फिल्म के ‘बीड़ी जलईले जिगर से पिया’ पर थिरकती दिखेंगी, और अपने डांस से बूढ़े से लेकर जवान तक को नाचने के लिए मजबूर कर देंगी. अर्शी खान इस मौके पर रौयल ग्रीन और गोल्ड स्कर्ट में नजर आएंगी, और अपने बेहतरीन डांस मूव्ज दिखाएंगी.

अर्शी खान ने अपनी इस परफौर्मेंस के बारे में बताया, “मेरी डांस परफौर्मेंस को लेकर जबरदस्त रिएक्शन आया है. मुझे ‘बिट्टी बिजनेसवाली’ का कौन्सेप्ट पसंद है क्योंकि ये सीरियल महिलाओं की वित्तीय आजादी से जुड़ा है. मैं इससे कनेक्शन महसूस करती हूं. वैसे भी ‘बीड़ी जलईले’ बौलीवुड के बेस्ट डांस नंबर्स में से एक है. इस गाने पर बिपाशा बसु के डांस से कोई तुलना नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी मैंने इसपर काफी मेहनक और कोशिश की है. उम्मीद है दर्शकों को मेरा ये अंदाज पसंद आएगा.”

समझौता झुक कर नहीं बराबर बन कर करें

अगर डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन साथ बैठ कर एक  मेज पर खाना खा सकते हैं, समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, साथ लगभग हाथ में हाथ डाले घूम सकते हैं और फिर ट्रंप किम को अपनी गाड़ी का मुआयना तक करा सकते हैं तो किसी भी सासबहू, जेठानीदेवरानी, पड़ोसीपड़ोसी में दोस्ती हो सकती है.

कोरिया का इतिहास खून से भरा है. कोरिया के शासक ने 1950 में दक्षिणी इलाके पर कम्यूनिस्ट शासन थोपने के लिए उस पर युद्ध छेड़ा था, तो अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता ले कर उसे बचाने के लिए अपनी सेनाएं भेजी थीं. अमेरिका के अपने 35 हजार सैनिक मारे गए थे और दोनों कोरियाओं के 10 लाख से अधिक लोग मारे गए या घायल हुए और लाखों परिवार देश के विभाजन के कारण रिश्तेदारों से अलग हो गए.

1953 के बाद से दोनों कोरियाओं में तनातनी बनी रही. दक्षिणी कोरिया ने 30-40 सालों में बेहद आर्थिक उन्नति की तो उत्तरी कोरिया ने विशाल सेना खड़ी की और परमाणु बम बनाने शुरू कर दिए. किम उल सुंग और उन के बेटे के बाद वर्तमान चेयरमैन किम जोंग उन ने विवाद को विरासत में पाया और गंभीरता से बमों के बदले अपना रोब गांठना चाहा.

पर न जाने क्यों और कैसे इस साल के शुरू में मौसम बदलने लगा. दक्षिणी कोरिया में हुए खेलों में उत्तरी कोरिया ने पहली बार अपनी टीम भेजी. फिर किम जोंग उन ने दक्षिणी कोरिया के राष्ट्रपति से मिलने की अनुमति दी और इस मुलाकात से पहले वे खास ट्रेन में बैठ कर चीन में जिनपिंग से भी मिल आए.

चाहे दक्षिणी कोरिया के राष्ट्रपति से मुलाकात सीमा के पास ही हुई फिर भी किम की बौडी लैंग्वेज और छोटेछोटे हावभावों ने साफ कर दिया कि कहीं हृदय परिवर्तन हो चुका है.

12 जून को जब सिंगापुर में डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग उन की मुलाकात हुई तो दुनिया ने चैन की सांस ली कि अब एक खपती पागल से शासक के क्रूर फैसले को शायद नहीं झेलना पड़ेगा. चाहे इस मुलाकात में सिर्फ औपचारिक हस्ताक्षर हुए हों, यह साफ है कि फिलहाल दोनों में मतभेद कम हो रहे हैं और अगर इन दोनों में फैसला हो सकता है तो दुनिया की किसी भी सासबहू और जेठानीदेवरानी को समझौता करने से कोई नहीं रोक सकता.

लड़ाई में कुछ नहीं रखा कहना भी सही नहीं है, क्योंकि यदि उत्तरी कोरिया ने परमाणु बम न बनाए होते तो ट्रंप उसे कभी कोई भाव न देते. अब छोटे से टुच्चे से गरीब उत्तरी कोरिया के किम ट्रंप के साथ बराबरी का व्यवहार इसीलिए कर पाए कि वे लड़ने में सक्षम हैं. इसी तरह यह एक फलसफा है कि यदि सम्मान पाना है तो खुद को सक्षम बनाओ. अपने बलबूते पर. उत्तरी कोरिया ने न रूस से भीख मांगी है न चीन से जबकि दोनों कम्यूनिस्ट हैं. अपने बल पर बराबरी का स्तर पाया है. उस की गरीब जनता ने पेट काट कर शासकों की सनक को पूरा करा है.

अगर जेठानी से समझौता करना है तो झुक कर नहीं उस के बराबर बन कर करिए मैडम.

राजनीति की पिच पर इमरान की नई पारी

पाकिस्तान के आम चुनाव का नतीजा अप्रत्याशित नहीं है. और न ही इसे लेकर होने वाली प्रतिक्रियाएं. इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ यानी पीटीआई की इस जीत को कोई दूसरा दल मानने को तैयार नहीं दिख रहा. 2013 के आम चुनाव में इमरान खान एकमात्र ऐसे शख्स थे, जिन्होंने चुनावी नतीजों को खारिज किया था. इस बार भी वह एकमात्र ऐसे नेता है, जो इस नतीजे को स्वीकार कर रहे हैं. जब तक यह सरकार रहेगी, उनकी वैधता पर सवाल उठते रहेंगे.

इमरान खान के नए वजीर-ए-आजम बनने के कयास चुनाव के पहले से ही लगाए जा रहे थे. उनके लिए पाकिस्तानी फौज ने पिच तैयार की थी. जाहिर है, जीत इमरान की पीटीआई की ही होनी थी. हां, देखने वाली बात अब यह होगी कि इस ‘डीप स्टेट’ की अंपायरिंग में इमरान खान कब तक खेल पाते हैं? डीप स्टेट वहां की फौज व खुफिया एजेंसी आईएसआई के हुक्मरानों का वह गुट है, जो हुकूमत पर हावी रहता है. इमरान खान तुनक मिजाज किस्म के शख्स हैं, लिहाजा खतरा है कि अगले कुछ महीनों में वह ‘हिट विकेट’ भी हो सकते हैं.

इमरान खान जितनी आसानी से वजीर-ए-आजम की कुर्सी हासिल करते दिख रहे हैं, उनके लिए सरकार चलाना उतना ही मुश्किल जान पड़ता है. सबसे बड़ी चुनौती उन्हें अपनी स्वीकार्यता को लेकर आने वाली है. कानून बनाने में भी इमरान खान को दुश्वारियों का सामना करना पड़ेगा. यह तय है कि सीनेट (ऊपरी सदन) में कम से कम तीन वर्षों तक पीटीआई को बहुमत नहीं मिलने वाला. चुनाव के दरम्यान चले इमरान के जुबानी तीर इतने तीखे थे कि दूसरे दलों के लिए उसका दर्द भुला पाना आसान नहीं होगा. ऐसे में, शायद ही सभी पार्टियां मिलकर काम कर पाएंगी.

इमरान खान वैसे भी एक बदमिजाज शख्स माने जाते हैं, और यही हाल उनके सहयोगियों का भी है. आमतौर पर होता यह है कि चुनाव जीतने वाला नेता थोड़ा बड़प्पन दिखाता है और सभी को साथ लेकर सरकार चलाने की बातें करता है. मगर जीत के बाद पीटीआई नेताओं की पहली तकरीरें यही आई हैं कि वे विरोधियों को जेल में डालेंगे. इन सबसे चुनावी धांधली की जो तल्खियां हैं, वे और ज्यादा बढ़ेंगी. इसका सरकार की सेहत पर खूब असर पड़ेगा.

पंजाब के नतीजों ने भी पीटीआई की मुश्किलें बढ़ाई हैं. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक के रुझान व नतीजे यही बता रहे हैं कि यहां भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला. फिर भी संभावना पीटीआई के सत्ता में आने की ज्यादा है. चूंकि पार्टी का बहुमत कमजोर होगा और विपक्ष कहीं ज्यादा मजबूत साबित होगा, तो हुकूमत की राह में दुश्वारियां बनी रहेंगी. और अगर यह सूबा पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के हिस्से में चला जाता है, तो इमरान व मियां नवाज की तल्खियां स्वाभाविक तौर पर केंद्र सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी करेंगी. हालांकि पहले भी केंद्र और पंजाब में दो अलग-अलग दलों की सरकारें रही हैं, पर यहां आपसी समझ से हुकूमत करना आसान होता था. इस बार आपसी समझ की कोई संभावना नहीं दिख रही, इसीलिए वहां राजनीतिक अस्थिरता कहीं ज्यादा देखने को मिल सकती है.

इमरान को मुश्किलें उन वादों को पूरा करने में भी आएंगी, जो उन्होंने चुनाव के दौरान आवाम से किए थे. असल में, पाकिस्तान की आर्थिक सेहत ठीक नहीं है. आर्थिक संकट को संभालने का अर्थ होगा, चुनावी वादों से किनारे होना. इससे विकास दर, रोजगार, महंगाई जैसे मसले हावी होंगे. बिजली के दाम बढ़ेंगे और अर्थव्यवस्था कहीं ज्यादा चरमरा जाएगी. फिर फौज की भी अपनी आकांक्षा है, जिन्हें पूरा करने का दबाव इमरान खान पर होगा. जाहिर है, पाकिस्तान को क्रिकेट का सरताज बनाने वाला यह शख्स यही सोचेगा कि पक्ष में रहकर समाधान की बातें करना जितना आसान है, सत्ता में आकर उस ओर कदम बढ़ाना उतना ही मुश्किल. सियासत की इस सबसे मुश्किल पिच पर संभलकर खेलना उसके लिए कहीं ज्यादा टेढ़ी खीर साबित होने वाली है.

भारत के नजरिये से यह चुनावी नतीजा बहुत ज्यादा उत्साहवद्र्धक नहीं है. वहां वजीर-ए-आजम कोई भी बने, विशेषकर विदेश नीति फौज ही बनाती है. इमरान खान को भी कोई छूट नहीं मिलेगी. जब तक फौज नहीं चाहेगी, दोनों देशों के बीच का कोई भी विवादित मसला मुकाम तक नहीं पहुंचेगा. उल्टे, इमरान खान और उनके सहयोगियों के बयानात यही बता रहे हैं कि दोनों पड़ोसियों के बीच तल्खियां बढ़ेंगी. इमरान खान की जीत में उनकी भारत-विरोधी छवि का भी योगदान है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ नई दिल्ली के साथ अच्छे संबंध के हिमायती दिखते थे. हां, यह अलग बात है कि जमीनी स्तर पर उन्होंने भी ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे लगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधारने की कोई संजीदा कोशिश हुई है.

फिर भी, दुनिया को झांसा देने के लिए इमरान खान कुछ ऐसे प्रस्ताव लेकर आ सकते हैं, जो शांति की वकालत करेगा. सीमा पर सैनिकों की तादाद कम करने, कश्मीर की सीमा-रेखा से तोपखानों को 25-30 किलोमीटर दूर करने या परमाणु हथियारों को लेकर किसी समझौते पर पहुंचने जैसे प्रस्ताव वह भारत को दे सकते हैं. मगर इस तरह के कथित शांति-प्रस्ताव इमरान के लिए अपना उल्लू सीधा करने वाले ही होंगे. वह भारत के अंदरूनी हालात और कश्मीर का राग भी अलाप सकते हैं. इन सबसे जाहिरा तौर पर आपसी तनाव खत्म नहीं होगा, बल्कि बढ़ता ही जाएगा.

साभार : सुशांत सरीन

साहेब बीवी और गैंगस्टर 3 : सिर दर्द

2011 की सफल फिल्म ‘‘साहेब बीवी और गैंगस्टर’’ का तीसरा सिक्वअल है फिल्म ‘‘साहेब बीवी और गैंगस्टर 3’’. राजशाही कथा की तीसरी कड़ी में भी लालच, षडयंत्र, धोखाधड़ी और वासना की कहानी ही है. यहां भी साहब और पत्नी एक दूसरे के खिलाफ हैं. सभी अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते निर्दयतापूर्ण कदम उठा रहे हैं. परिणामतः कहानी में अंधेरे के साथ ही खूनी मोड़ भी हैं. मगर फिल्म की कमजोर कड़ी है इसकी पटकथा व निर्देशन तथा संय दत्त का अभिनय.

इस कड़ी में भी फिल्म की कहानी अति महत्वाकांक्षी रानी माधवी देवी (माही गिल) और उनके पति आदित्य प्रताप सिंह (जिम्मी शेरगिल) के इर्दगिर्द घूमती है. रानी माधवी देवी राजनीति में काफी उंचा कद रखती हैं. जबकि आदित्य प्रताप सिंह अपने राजशी रुतबे और खोए हुए प्यार को पाने के लिए संघर्षरत हैं. महत्वाकांक्षाओं व स्वार्थ के चलते आदित्य प्रताप सिंह और माधवी देवी पति पत्नी होते हुए भी एक दूसरे के खिलाफ साजिश रचते रहते हैं. आदित्य प्रताप सिंह की दूसरी पत्नी हैं रंजना सिंह(सोहा अली खान).

कहानी वहां से शुरू होती है, जहां पर दूसरा भाग खत्म हुआ था. आदित्य प्रताप सिंह जेल में हैं और माधवी देवी महल में है. एक दूसरी सियासत के राजकुमार उदय प्रताप सिंह (संजय दत्त) लंदन में अपना बार चलाते हैं. भारत में उदय का सौतेला भाई (दीपक तिजोरी), मां (नफीसा अली), पिता (कबीर बेदी) व प्रेमिका सुहानी (चित्रांगदा सिंह) रहते हैं.

माधवी देवी मंत्री बन गई हैं और वह अपने साहब आदित्य प्रताप सिंह को जेल में ही रखना चाहती हैं. उधर आदित्य प्रताप सिंह अपनी बहन(रिशिमा कंधारी) और कन्हैया (दीपराज राणा) की मदद से जेल से बाहर निकलने का जुगाड़ कर लेते हैं. तब माधवी अपने लंदन में रह रहे दोस्त उदय प्रताप को भारत बुलाती हैं. उदय व माधवी नजदीकियां बढ़ती हैं. जिसके चलते अब आदित्य प्रताप सिंह ओर उदय प्रताप आमने समाने आ जाते हैं.

उधर रंजना की लगभग हत्या हो चुकी है और अब उसके पिता रंजना के पति आदित्य प्रताप सिंह की हत्या करना चाहते हैं, मगर वह सच जानने का प्रयास नहीं करते कि रंजना ने खुद आत्महत्या की या उसका कत्ल हुआ, तो असली कातिल कौन है? पर अचानक पता चलता है कि रंजना तो अस्पताल में जिंदा है. खैर, वही चूहे बिल्ली के खेल के साथ हत्याओं का दौर जारी रहता है.

लेखक की सबसे कमजोर कड़ी यह है कि उन्होने कहानी में किरदार तो भर लिए, पर किरदारों को कहानी के सूत्र में पिरो नहीं पाए. रंजना को लगभग मरा हुआ बताकर लेखक उसे भूल जाते है, पर अचानक उन्हे याद आता है कि रंजना तो अस्पताल में है. फिल्म में एक दृश्य में राजमहल में एक राजनेता घूम रहा है, अचानक उनकी नजर अपने भाई की प्रेमिका पर पड़ती है और वह उसकी हत्या कर देता है.

इस तरह के अति बचकाने हत्या के दृष्य को देखकर सवाल उठता है कि क्या वास्तव में इस फिल्म को किसी लेखक ने लिखा है या उदय प्रताप उर्फ बाबा जिस तरह अपने पूरे साम्राज्य को लंदन में छोड़कर अचानक भारत पहुंचते है, वह भी बात जमती नही है. फिल्म में इस तरह राजवाड़ा, प्रिवी पर्स और स्पैनिश डिप्लोमेट की कहानी आती है कि सिर चकरा जाता है. चित्रांगदा सिंह का किरदार भी जबरन ठूंसा हुआ नजर आता है. यानी कि कहानी सिर के उपर से जाती है. फिल्म शुरू होने के कुछ मिनटों बाद ही दर्शक ‘त्राहि माम’ करने लगता है. किसी भी किरदार का कहीं कोई भावनात्मक जुड़ाव नजर ही नही आता. फिल्म की लंबाई भी काफी है. कुल मिलाकर पटकथा व संवाद लेखक के तौर पर संजय चैहाण व तिग्मांशु धुलिया बुरी तरह से निराश करते हैं.

फिल्म का क्लायमेक्स भी अति घटिया है. फिल्म में ऐसा कुछ नही है जिसके लिए इसे देखा जाए. शायद यही वजह रही कि संजय दत्त ने इस फिल्म के प्रचार से खुद को दूर रखा.

फिल्म में बेहूदे प्रेम गीत सुन व देखकर दर्शक फिल्मकार को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाता. मुजरा गीत भी प्रभावित नहीं करता.

बतौर निर्देशक तिग्मांशु धुलिया ने इस फिल्म में काफी निराश किया है. कम से कम यह फिल्म इस बात का अहसास ही नही दिलाती कि इसके निर्देशक ने कभी ‘हासिल’ व ‘पानसिंह तोमर’ जैसी बेहतरीन फिल्में निर्देशित की थी.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो जिम्मी शेरगिल व माही गिल को छोड़कर सभी प्रभावहीन है. मगर अति कमजोर पटकथा व निर्देशन के चलते जिम्मी शेरगिल व माही गिल का बेहतरीन अभिनय भी फिल्म को संभाल नहीं पाता. सोहा अली खान की प्रतिभा को जाया किया गया है. संजय दत्त भी निराश करते हैं. चित्रांगदा सिंह महज सेक्सी नजर आई हैं.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘साहब बीवी और गैंगस्टर 3’’ के निर्माता राहुल मित्रा और निर्देशक तिग्मांशु धुलिया हैं. फिल्म के पटकथा लेखक संजय चैहाण व तिग्मांशु धुलिया, संगीतकार राणा मजुमदार, अंजान भट्टाचार्य, सिद्धार्थ पंडित, कैमरामैन अमलेंदु चौधरी तथा फिल्म के कलाकार हैं -संजय दत्त, जिम्मी शेरगिल, माही गिल, दीपक तिजोरी, चित्रांगदा सिंह, सोहा अली खान, कबीर बेदी, दीपराज राणा, नफीसा अली, इमरान हासनी, रिशिमा कंधारी व अन्य.

पवन सिंह और आम्रपाली दुबे के इस गाने ने यूट्यूब पर मचाया धमाल

भोजपुरी फिल्म जगत के स्टार पवन सिंह और मशहूर भोजपुरी अभिनेत्री आम्रपाली दुबे के एक गाने ‘रात दिया बुता के’ ने इंटरनेट हंगामा मचाए हुए है. यह गाना रिलीज के पहले दिन ही हिट हो चुका था और लोग अब तक इस गाने बेहद पसंद कर रहे हैं. बता दें, यह गाना भोजपुर फिल्म ‘सत्या’ की है, जिसमें पवन सिंह और आम्रपाली दुबे जबरदस्त डांस करते हुए नजर आ रहे हैं. इस गाने को वेब म्यूजिक द्वारा दो बार यूट्यूब पर अलग-अलग समय पर अपलोड किया गया और दोनों ही गानों को मिलाकार अब तक 20 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया है.

एक साथ फिल्म में नजर आने वाली है यह जोड़ी

बता दें, भोजपुरी फिल्म ‘वांटेड’ सुपरहिट होने के बाद भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह के अपोजिट यूट्यूब क्वीन आम्रपाली दुबे नजर आएंगी. निर्देशक शशांक राय की भोजपुरी फिल्म ‘शेर सिंह’ की शूटिंग मुंबई में शुरू हो चुकी है. हालांकि इस फिल्म के एक शेड्यूल की शूटिंग बैंकौक और पटाया में किया जाएगा. ये जानकारी खुद निर्देशक शशांक राय ने दी. फिल्म में पवन सिंह और आम्रपाली के अलावा बौलीवुड खलनायक अशोक समर्थ, जसवंत कुमार, संजय वर्मा और स्वीटी सिंह भी नजर आएंगे.

उधर फिल्म ‘शेर सिंह’ के शूटिंग शुरू होते ही भोजपुरी बौक्स आफिस की गर्मी बढ़ने लगी है. चारों ओर इस फिल्म के चर्चे हैं. खासकर ट्रेड पंडितों को लगता भी है कि ये जोड़ी भोजपुरी सिनेमा के कई रिकौर्ड तोड़ देगी. उनका कहना है कि दोनों इस इंडस्ट्री के बड़े सितारे हैं. दोनों का अपना औडियंस वर्ग है, जिसका लाभ फिल्म को प्लस होकर मिल सकता है. फिल्म के निर्माता-निदेशक शशांक राय को भी ‘शेर सिंह’ से काफी उम्मीदें हैं. उनका कहना है कि फिल्म में बहुत कुछ नया होगा. यह बहुत बड़ी और मनोरंजन करने वाली फिल्म है.

फिल्म ”शेर सिंह” में एक्शन और रोमांस का लेवल अलग ही होगा. जहां फिल्म में पवन सिंह का किरदार शानदार है, वहीं आम्रपाली दुबे भी कम नज़र नहीं आएंगी. फिल्म के गाने और डांस में भी वेरिएंट्स मिलेंगे. कुल मिला कर फिल्म दर्शकों के दिल को छू लेने वाली है. निर्देशक शशांक राय ने बताया कि फिल्म ‘शेर सिंह’ के संगीतकार छोटे बाबा हैं, जबकि गीतकार सुमित सिंह चन्द्रवंशी, विनय निर्मल, मनोज मतलबी हैं. इस सुरीले गानों में आवाज इंदु सोनाली, व्यास जी, खुशबू जैन, अलका झा और प्रियंका सिंह की है. को-प्रोड्यूसर मनीष सिंह हैं . फिल्म की पटकथा वीरू ठाकुर ने लिखी है. डीओपी सुधांशु शेखर, इपी – राज वीर, एचओईपी राज वीर हैं. क्रिएटिव डायरेक्टर ठाकुर विजय और, कविता सुनीता क्रिएशन का होगा.

पूनम पांडे दे रही हैं ये हौट गिफ्ट, आखिर क्यों

बौलीवुड अदाकारा और सुपर हौट मौडल पूनम पांडे अक्सर ही अपनी हौट और सेक्सी तस्वीरों के चलते लाइमलाइट में रहती हैं. वो अक्सर ही अपनी हौट और बोल्ड तस्वीरों से फैंस के दिलों पर कब्जा जमाए रहती हैं. सोशल मीडिया पर हमेशा एक्टिव रहने वाली पूनम ने इस बार अपने फैंस को एक हौट गिफ्ट देने का फैसला किया है. पूनम का गिफ्ट पाने के लिए आपको सिर्फ एक छोटा सा काम करना होगा.

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दरअसल, पूनम ने अपने फैंस को एक स्पेशल औफर दिया है. पूनम ने हाल ही में इस औफर को लेकर ये तस्वीर साझा की है. उन्होंने कहा है कि ‘मेरी आखिरी तीन पोस्ट लाइक करें. मैं आपको एक हौट गिफ्ट दूंगी. ‘ इस औफर के लिए पूनम की जिन तस्वीरों को लाइक करना है उन्हें आप यहां पर देख सकते हैं.

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बता दें कि इस औफर को देने से पहले पूनम ने अपनी तीन बेहद हौट तस्वीरें शेयर की थीं. इन्ही तस्वीरों को लाइक करने के लिए पूनम ने अपने फैंस को ये जबरदस्त औफर दिया है.

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ये सभी तस्वीरें पूनम ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर साझा की हैं. तस्वीरों को लाइक करने के लिए आप पूनम के इंस्टा हैंडल पर जा सकते हैं.

 

रोटी बैंक, ताकि कोई भूखा न रहे

जीवन में जन्म और मृत्यु निश्चित है और कहते हैं कि हर इंसान के जन्म से पहले ही उस का प्रारब्ध लिख दिया जाता है. हम नहीं जानते कि इस में कितनी सचाई है, परंतु इतना अवश्य है कि इंसान अपनी मूलभूत आवश्यकताओं ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के लिए हमेशा संघर्ष करता है. जिस के पास ये तीनों चीजें जरूरत से ज्यादा हैं, वह अमीर कहलाता है, किंतु कुछ के पास 2 हैं तो वे ठीकठाक जिंदगी बिताते हैं, परंतु बहुत से लोग हमारे समाज में ऐसे भी हैं जिन के पास पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी तक उपलब्ध नहीं है. इन्हीं बातों को मद्देनजर रखते हुए राजकुमार भाटिया व उन के साथियों ने एक खास पहल की और उस पहल का नाम दिया ‘रोटी बैंक… ताकि कोई भूखा न रहे.’

उन्हें यह प्रेरणा तब मिली जब 2015 में एक दिन उन के पास एक व्यक्ति काम मांगने आया. राजकुमार भाटिया बताते हैं कि उस समय वे उसे कोई काम नहीं दे सकते थे. उन्होंने उसे कुछ पैसे देने चाहे, परंतु उस व्यक्ति ने पैसे लेने से इनकार कर दिया और बोला, ‘मुझे पैसे नहीं चाहिए, हो सके तो मुझे खाना खिला दीजिए.’

उन्होंने उसे खाना खिला दिया. परंतु उन के मन को यह बात कचोटती रही कि इंसान कितना मजबूर हो जाता है जब उस के पास पेट भरने के लिए दो रोटी भी नहीं होती और वह मांगने पर मजबूर हो जाता है. ऐसे अनेक लोग होंगे जो दो जून की रोटी को तरसते होंगे. फिर उन्होंने अपने मित्र सुधीर से बात की और रोटी बैंक शुरू किया. एक सफेद डब्बे पर ‘रोटी बैंक’ लिख कर रखा गया और इस तरह से इस कार्य की शुरुआत हुई. फिर एक के साथ एक लोग जुड़ते चले गए और कारवां बन गया.

रोटी बैंक टीम का कहना है, ‘‘रोटी बैंक एक प्रयोग है, एक साधना है, एक प्रयास है बढ़ रही सामाजिक गैरजिम्मेदारी को कम करने का. रोटी बैंक एक संघर्ष है भूख के विरुद्ध. रोटी बैंक एक मकसद है सेवा का, मानवता का. रोटी बैंक एक बैंक है जहां पैसा जमा नहीं होते, जहां जमा होती हैं रोटियां. रोटी बैंक एक कोशिश है, साधनसंपन्न लोगों को प्रेरित करने का कि वे अपनी रोटियों के साथ 2 रोटियां एक जरूरतमंद के लिए भी बनवाएं और उसे अपने आसपास की रोटी बैंक शाखा में जमा करवाएं जहां से उन रोटियों को भूख से संघर्ष कर रहे लोगों तक पहुंचाया जा सकें.’’

जानीमानी एंकर रिचा अनिरुद्ध, जो 92.5 एफएम में कार्यरत हैं, ने इस टीम से संपर्क किया और इस मुहिम को अपने कार्यक्रम के जरिए आम व खास लोगों तक पहुंचाया. हालांकि रोटी बैंक की टीम प्रचार नहीं चाहती थीं परंतु जनजन तक इस मुहिम को पहुंचाने के लिए कोई न कोई माध्यम तो चाहिए ही था. फिर एक दैनिक समाचारपत्र ने इन की मुहिम को छापा. इस तरह से लोग रोटी बैंक से जुड़ते चले गए.

रोटी बैंक की टीम ने स्कूलों से भी जुड़ना शुरू किया. आज दिल्ली के 9 स्कूल इस मुहिम से जुड़े हुए हैं. रोटी बैंक की टीम ने एक स्कूल में जा कर सुबह की प्रार्थना के दौरान रोटी बैंक के बारे में सब को बताया और बच्चों को प्रेरित किया ताकि वे अपने लंच के साथ एक पैकेट खाना उन बच्चों के लिए बनवाएं जो अभावग्रस्त हैं और जरूरतमंद हैं. इस तरह स्कूल भी इस मुहिम से जुड़ते चले गए.

स्कूलों के माध्यम से रोटी बैंक कपड़े, किताबकौपियां एकत्रित कर के रोटी बैंक से लाभान्वित बच्चों को शिक्षा प्रदत्त करवाने का प्रयास भी कर रहा है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.

society

रोटी बैंक के लिए यह बहुत गौरवशाली क्षण था जब 30 अप्रैल, 2017 को प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में रोटी बैंक के युवा कार्यकर्ताओं की सराहना की.

इस संस्था द्वारा अब तक रोटी बैंक के 63 सैंटर खोले जा चुके हैं जो इस कार्य में लगे हुए हैं. हर सैंटर से रोज खाना एकत्रित करना, फिर उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना अपनेआप में यह कार्य आसान नहीं है, परंतु बस, टीम की निष्ठा ने इस कार्य को कर दिखाया है.

एक बाल सुधार गृह में 300 से 400 पैकेट खाना रोज भेजा जा रहा है. सप्ताह में 2 दिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के बाहर दूरदूर से आए मरीजों के परिजनों को भोजन (रोटी पैकेट्स) पहुंचाने की भी व्यवस्था है.

आज तक एक दिन में 3,890 पैकेट बांटे गए हैं, यह एक दिन की अधिकतम संख्या है. 3 रोटी, साथ में अचार या सूखी सब्जी, यह एक पैकेट का निश्चित भोजन है जो किसी व्यक्ति की एक वक्त की भूख को शांत कर देता है. 31 दिसंबर, 2017 तक 5 लाख 58 हजार लोगों को रोटी बैंक द्वारा सम्मानपूर्वक भोजन करवाया जा चुका है. कूड़ा बीनने वाले बच्चों, स्कूल जाने वाले बच्चों और मजदूरों के बच्चों को खाना बांटा जाता है. नशा करने वालों और मंदिर के बाहर बैठ कर मांगने वालों को यह खाना नहीं दिया जाता.

कुछ लोग और कुछ वृद्ध ऐसे भी हैं जिन के पास सबकुछ है, परंतु देखभाल करने वाला, खाना खिलाने वाला कोई नहीं है, तो उन के लिए टिफिन भेजा जाता है, जो पूर्णतया गोपनीय रहता है ताकि उन के सामाजिक सम्मान में कमी न आ पाए. नई दिल्ली के महिंद्रा पार्क में झुग्गी के साथ घर में रह रहे दोनों पतिपत्नी घुटने की वजह से चलनेफिरने से लाचार थे, राजकुमार भाटिया उन का टिफिन खुद पहुंचाते थे. जब आसपास के लोगों को पता चला तो उन लोगों ने उस दंपती के खाने की जिम्मेदारी ली.

सार्थक कार्य

जब मन में सेवाभाव हो, तो लोग अपनेआप जुड़ जाते हैं. रोटी बैंक टीम के वौलंटियर्स फोटो और प्रचार से परहेज करते हैं और अपने काम को स्थिर भाव से अंजाम देते हैं. किसी भी पोस्टर, बैनर या पोस्ट पर इन के फोटो उपलब्ध नहीं हैं.

इस टीम का कहना है कि वह कभी किसी से चंदा या धनराशि नहीं लेगी. जितना भी करेगी अपने ही बलबूते पर करेगी. ‘रोटी बैंक’ इफरा यानी इंडियन फूड रिकवरी अलाएंस में साझीदार है. यह भारत सरकार का एक अभियान है, जिसे एफएसएसएआई यानी खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा संचालित किया जा रहा है.

रोटी बैंक बचा हुआ खाना नहीं लेता और यह टीम बीचबीच में खाना खा कर चैक करती है कि यह खाना ताजा है और खाने लायक है या नहीं.

किसी भी बड़े कार्य को शुरू करना तो आसान होता है परंतु उस का निरंतर प्रबंधन करना मुश्किल होता है. जब किसी की एक सार्थक पहल किसी दूसरे के मन को छू ले और सज्जन शक्तियां जब एकसाथ हो जाती हैं तो कार्य पूर्ण होने लगते हैं. रोटी बैंक के साथ ऐसा ही हुआ है और हो रहा है.

सिंगल्स को घर मिलना आसान नहीं

अरुणाचल प्रदेश से रिनी मुंबई पढ़ने आई. उसे अंदाजा नहीं था कि मुंबई में पेइंगगैस्ट बन कर रहना इतना कठिन होगा. वह अपना अनुभव शेयर करते हुए बताती है, ‘‘मैं अकेली रह रही थी. शहर में किसी को भी नहीं जानती थी. मुझे किचन के इस्तेमाल करने की मनाही थी और फ्रिज लौक्ड रहता था. लैंडलेडी की बेटी कभी भी गैस मीटर, बाथरूम, अलमारी चैक करने आ जाती थी. मैं अपने किसी भी फ्रैंड को कमरे में नहीं बुला सकती थी. कमरे में टीवी, वाईफाई कुछ नहीं था.

‘‘मैं काफी बोर होती थी. मैं ने अपने पापा से लैपटौप भेजने को कहा. एक दिन मेरे पिता के फ्रैंड ही मुझे लैपटौप देने मुंबई आ गए और मुझे डिनर के लिए ले गए. उस के बाद जो हुआ, मैं कभी भूल नहीं पाऊंगी. उस लेडी ब्रोकर ने, जिस ने मुझे यह घर दिलवाया था, फोन कर के कहा, ‘तेरे जैसी लड़कियों को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं. किस आदमी को घर पर बुलाया था. यह इज्जतदार लोगों का घर है. धंधा ही करना है तो कहीं और जाओ.’ उस के ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं और मैं बहुत तकलीफ महसूस करती हूं.’’

सिंगल लोगों को चाहे वे पढ़ने आए हों या नौकरी करने, अपने सिंगल होने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है. ‘भले ही हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं, लेकिन इस समाज में महिलाओं को घर ढूंढ़ने से ज्यादा आसान है कोई नौकरी ढूंढ़ लेना.’

एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम करने वाली ऋचा शर्मा कहती हैं,

‘‘4 साल से जब भी किराए पर मकान देखने जाती हूं, हाउसिंग सोसायटी के लोग मेरे प्रोफैशन पर अजीब प्रतिक्रिया देते हैं. मैं मीडिया इंडस्ट्री से हूं, इसलिए उन्हें यही लगता है कि मैं सिगरेट, ड्रिंक, ड्रग्स का सेवन करती हूं और लड़के भी मेरे घर आते होंगे आदि. यह हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं?’’

सिंगल और यंग वर्किंग वीमन को ही घर मिलने में कठिनाई नहीं होती, आश्चर्य इस बात का है कि बुजुर्ग लोगों को भी घर मिलना आसान नहीं है.

नासिक निवासी श्रेया हासे बताती हैं, ‘‘उन की 55 वर्षीय मां को उन की उम्र ‘ठीक’ न बताते हुए घर के अंदर जाने ही नहीं दिया गया.

‘‘मेरी मां 30 सालों से टीचर हैं. मुंबई के अंधेरी इलाके में उन्होंने ब्रोकर से बात कर ली थी. उन्हें 3 अन्य लड़कियों के साथ घर शेयर करना था. वे लड़कियां भी अपनी मां की उम्र जैसी महिला के साथ रूम शेयर करने में खुश थीं. मेरी मां ने पूरी पेमैंट कर दी थी, लेकिन घर पहुंचने पर ब्रोकर ने उन्हें घर में नहीं घुसने दिया. उस ने कहा कि वे उम्र के मापदंड पर खरी नहीं उतरतीं और दूसरी लड़कियों को बिगाड़ सकती हैं. वे अपना पूरा सामान लिए घर के बाहर ही खड़ी रहीं. आखिर में उन्हें अपनी किसी फ्रैंड के घर जाना पड़ा.’’

घर ढूंढ़ने की परेशानी सिर्फ महिलाओं को ही नहीं होती, 30 वर्षीय विनोद निगम, जो मार्केटिंग मैनेजर हैं, का अनुभव भी कुछ अलग ही है. वे कहते हैं, ‘‘घर देखने जाएं तो इतने पर्सनल सवाल कौन पूछता है. जब मैं घर ढूंढ़ रहा था, मकानमालिक ने तो मुझ से यह भी पूछ लिया कि मैं पोर्न तो नहीं देखता या लड़कियां घर पर तो नहीं आएंगी. मैं नौनवेज तो नहीं खाता क्योंकि मेरी ये आदतें सोसायटी के बच्चों को बिगाड़ सकती हैं.’’

सिंगल होना या दूसरे धर्म का होना भी मुश्किल बढ़ा देता है. सना शेख दिल्ली व बेंगलुरु में रहने के बाद अभी हाल ही में मुंबई शिफ्ट हुई हैं. लेकिन अभी तक उन्हें घर नहीं मिल पाया है. कारण? वह सिर्फ सिंगल वर्किंग लेडी ही नहीं बल्कि मुसलिम भी हैं.

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सना कहती हैं, ‘‘मैं ने कई घर औनलाइन देखे पर मकानमालिक ने बड़ी रुखाई से कहा कि वे अपना घर किसी मुसलिम को नहीं दे सकते.’’

आजम, जो आईटी फर्म में काम करते हैं, पिछले साल ही कुवैत से मुंबई आए थे. उन्हें लगता था कि शहर में यंग पौपुलेशन बहुत बड़ी संख्या में है, पर यहां अकेले रहने वालों के लिए घर की परेशानी देख कर बहुत हैरान हुए. वे कहते हैं, ‘‘सिंगल और ऊपर से मुसलिम, यह देख कर बड़ी कोफ्त हुई कि मकान किराए पर देने में मेरे धर्म से क्या आपत्ति हो सकती है.’’

आज की युवापीढ़ी चाहे लड़का हो या लड़की, दूसरे शहरों में जा कर अकेले रह कर पढ़ने या जौब करने की हिम्मत रखती है, वह समाज के ढांचे में फिट नहीं बैठ पाती. छोटे शहर हों या महानगर, स्थिति तकरीबन सब जगह एकसी ही है. समाज को इस के प्रति अपना रवैया बदलने की जरूरत है.

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