मुल्क : सामाजिक परिस्थितियों पर करारा प्रहार

‘दस’, ‘तथास्तु’, ‘रा वन’’, ‘तुम बिन’ जैसी फिल्मों के सर्जक अनुभव सिन्हा की नई फिल्म ‘‘मुल्क’’ सत्य घटनाक्रमों पर आधारित पूर्णरूपेण एजेंडे वाली फिल्म है. फिल्म‘‘मुल्क’’, मुल्क की बजाय महजब पर बात करती है. यह फिल्म हम (हिंदू) और वो (मुसलमान) के विभाजन की बात करते हुए वर्तमान समय की देश की सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर करारा प्रहार भी करती है. पर फिल्म के अंत में जिस तरह से जज अपना निर्णय सुनाते हुए उपदेशात्मक भाषण बाजी करता है, उससे फिल्म कमजोर हो जाती है.

फिल्म की कहानी बनारस के एक मोहल्ले से शुरू होती है. जहां हिंदू व मुस्लिम परिवार एक दूसरे के साथ बिना धर्म के भेदभाव के प्रेम पूर्वक रहते हैं. यहीं एक मुस्लिम परिवार है – वकील मुराद अली मोहम्मद (रिषि कपूर ) का. इस परिवार में उनकी पत्नी तबस्सुम (नीना गुप्ता), छोटा भाई बिलाल (मनोज पाहवा), बिलाल की पत्नी (प्राची शाह पंड्या), बेटा शाहिद (प्रतीक बब्बर), बेटी आयत हैं. बड़ा बेटा अल्ताफ लंदन में रहता है, जिसने एक हिंदू लड़की आरती मोहम्मद (तापसी पन्नू) से शादी की है. आरती मोहम्मद वकील भी हैं. आरती का अपने पति अल्ताफ से मतभेद हो गया है और दोनों अलग होने की सोच रहे हैं. क्योंकि अल्ताफ चाहता है कि आरती मां बनने से पहले तय करके बताए कि उनका होने वाला बच्चा किस धर्म को मानेगा.

बहरहाल, मुराद अली के जन्मदिन के जश्न का हिस्सा बनने के लिए आरती मोहम्मद लंदन से बनारस आती है. पर रात में ही शाहिद क्रिकेट मैच देखने कानपुर जाने की बात करके चला जाता है. पर पता चलता है कि वह कानपुर की बजाय इलाहाबाद गया था और इलाहाबाद के बस अड्डे पर हुए बम विस्फोट में 16 निर्दोष मारे जाते हैं. इस आतंकवादी हमले के तीन आरोपियों की पहचान होती है, जिनमें से एक शाहिद मोहम्मद है. दो आरोपी मारे जाते हैं. तीसरे आरोपी शाहिद मोहम्मद का एनकाउंटर एटीएस प्रमुख दानिश जावेद (रजत कपूर) कर देते हैं.

इसी के साथ अब मुराद अली मोहम्मद के पूरे परिवार को आतंकवादी मान लिया जाता है. पूरे परिवार की जिंदगी रातों रात बदल जाती है. मोहल्ले के सभी हिंदू इस परिवार से खुद को दूर कर लेते हैं. मुराद अली मोहम्मद के घर की दीवार पर लिख दिया जाता है कि ‘पाकिस्तान जाओ’.

उधर पुलिस शाहिद मोहम्मद के पिता और मुराद अली के छोटे भाई बिलाल को साजिशकर्ता मानकर गिरफ्तार कर लेती है. अब तक इलाके के सम्मानित वकील माने जाते रहे मुराद अली मोहम्मद को भी आरोपी बनाया जाता है. इस परिवार को आंतकवादी साबित करने के लिए एटीएस अफसर दानिश जावेद और सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) कमर कस लेते हैं.

अब मुराद अली मोहम्मद व उनके परिवार के सामने खुद को निर्दोष साबित करने व अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुनः अर्जित करने के लिए अदालती लड़ाई लड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह जाता. मुराद अली अदालत में खुद अपनी लड़ाई लड़ना चाहते हैं, मगर अदालत के अंदर उनकी देशभक्ति व मुस्लिम होने को लेकर जिस तरह के सवाल उठाए जाते हैं, उससे विचलित होकर वह मुकदमा लड़ने की जिम्मेदारी आरती मोहम्मद को दे देते हैं. उसके बाद बहस आतंकवाद या शाहिद को किस तरह फुसला कर इस तरफ ले जाया गया, उस पर नहीं होती है. बल्कि पूरी बहस मुस्लिम धर्म व मुराद अली के परिवार ने शाहिद को आतंकवादी बनाकर पैसा कमाने का व्यापार चला रखा था, इसी के इर्द गिर्द होती है.

धीरे धीरे बहस हम (हिंदू) और वो (मुसलमान) के विभाजन के साथ वर्तमान समय की सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों की तरफ जाती है. अदालत के अंदर अंततः आरती मोहम्मद कटघरे में खड़े मुराद अली से सवाल करती है कि आप देशभक्त हैं, यह कैसे साबित करेंगे? आप जैसी दाढ़ी वाले मुसलमान और एक दाढ़ी वाले आतंकवादी के फर्क को कैसे साबित करेंगे? फिल्म के अंत में जज कुछ सोचने पर विवश करने वाले सवालों के साथ लंबा भाषण देते हैं.

फिल्म की पटकथा में कुछ कमियां हैं, मगर बेहतरीन संवादों के चलते वह कमी दर्शक की नजरों से ओझल हो जाती है. फिल्म के संवाद हर इंसान को सोचने पर विवशकरते हैं. पटकथा लेखक ने फिल्म में कई सवाल उठाए, पर उन पर बाद में कोई बात ही नहीं की. मसलन-आयत ने जब अपने प्रेमी व अपने भाई शाहिद मोहम्मद को बंद कमरे में हाथ में बंदूक लिए व किसी से बात करते हुए सुना, तो फिर वह चुप क्यों रही? उसने इसकी जानकारी पूरे परिवार को क्यों नहीं दी?

मोबाइल के 14 सिम को लेकर वकील संतोष आनंद ने कई बार सवाल उठाए, पर उस पर फिल्म अंत तक कुछ नही कहती? इंटरवल से पहले फिल्म की गति न सिर्फ धीमी है, बल्कि एक ही जगह घूमती रहती है, पर इंटरवल के बाद फिल्म में तेजी आती है. कोर्ट के दृश्य अच्छे बन पड़े हैं. फिल्म में लेखक व निर्देशक ने नौकरी से लेकर प्रशासनिक स्तर पर सरकार मुस्लिमों के मुकाबले हिंदुओं को ज्यादा तरजीह देने का आरोप भी सरकार पर लगाया है.

इतना ही नहीं लेखक व निर्देशक अनुभव सिन्हा की इस फिल्म में काफी विरोधाभास है. एक तरफ वह सरकार व हिंदुओं पर हम (हिंदू) और वो (मुसलमान) के विभाजन की  बात करते हैं, तो वहीं वह मुस्लिम पुलिस अफसर दानिश जावेद को मुस्लिमों को आतंकवादी मानने के पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए आरोप लगाया है कि दानिश अली ने पूर्वाग्रह के ही चलते शाहिद मोहम्म्द को जिंदा गिरफ्तार करने की बजाय उसका एनकाउंटर कर पूरे मुस्लिम परिवार को आतंकवादी साबित करने का प्रयास किया.

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अनुभव सिन्हा ने ‘‘मुल्क’’ में सेक्यूलरिजम की बात करते हुए आतंकवाद, आतंकवादी और जिहाद की परिभाषा भी बतायी है. पर वह फिल्म के अंत में सौहाद्र या प्रेम या दो धर्मावलंबियों के बीच भाईचारा दिखाने की बजाय दिखाते हैं कि  अदालत मे सारी बहस व जज का उपदेशात्मक निर्णय सुनने के बावजूद फिल्म के अंत में जब चौबे (अशोक तिवारी), मुराद अली के नजदीक आकर उनसे गले मिलना चाहते हैं, तो मुराद अली उनकी जानबूझकर अनदेखी कर अपनी बहू आरती के पास चले जाते हैं.

कई कमियों के बावजूद अनुभव सिन्हा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे विषय पर फिल्म बनायी है, जिससे अमूमन फिल्मकार दूरी बनाकर रखते हैं. निर्देशक के तौर पर वह साधुवाद के पात्र हैं. उनकी पिछली सभी फिल्मों के मुकाबले ‘मुल्क’ बेहतर फिल्म है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो मुराद अली मोहम्मद के किरदार में रिषि कपूर ने अति शानदार अभिनय किया है. उम्र के साथ उनके अभिनय की  धार तेज होती जा रही है. वकील संतोष आनंद के किरदार में आशुतोष राणा काफी समय बाद अच्छा अभिनय करते हुए नजर आए हैं. पिछली कुछ फिल्मों में उनके अभिनय से धार गायब हो चुकी थी. प्रतीक बब्बर के किरदार की लंबाई काफी छोटी है और उनके हिस्से करने के लिए कुछ खास रहा नहीं. प्रतीक बब्बर के अभिनय में निखार नहीं आया. उन्हे काफी मेहनत करने की जरुरत है.

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यूं तो तापसी पन्नू एक बेहतरीन अदाकारा हैं, मगर इस फिल्म में ‘पिंक’ के मुकाबले उनकी अदाकारी उन्नीस ही रही. पर क्लायमेक्स में तापसी पन्नू की जानदार अदाकारी उभर कर आती है. जज के किरदार में कुमुद मिश्रा व एटीएस अफसर दानिश जावेद के किरदार में रजत कपूर ठीक ठाक रहे.

फिल्म का गीत संगीत प्रभावशाली नहीं है. फिल्म की शुरुआत में ही मुराद अली के घर पर रखी गयी गीत संगीत वाली पार्टी जबरन ठूंसी हुई लगती है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘मुल्क’’ का निर्माण दीपक मुकुट  और अनुभव सिन्हा ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक अनुभव सिन्हा, संगीतकार प्रसाद सशते, अनुराग सैकिया, कैमरामैन ईवान मुलिगन तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – रिषि कपूर, रजत कपूर, तापसी पन्नू, मनोज पाहवा, नीना गुप्ता,प्रतीक बब्बर, आशुतोष राणा, अशोक तिवारी, अश्रुत जैन, वर्तिका सिंह, प्राची शाह पंड्या, इंद्रनील सेन गुप्ता, अब्दुल कादिर अमीन व अन्य.

कारवां : खुद की तलाश की कहानी

रोड ट्रिप पर कई फिल्में बन चुकी हैं, मगर निर्देशक आकर्ष खुराना की रोड ट्रिप वाली फिल्म ‘‘कारवां’’ रोड ट्रिप के साथ आत्मखोज वाली फिल्म है. इस तरह की फिल्म बनाना आसान नहीं होता. अफसोस फिल्मकार आकर्ष खुराना  अपनी इस यात्रा में सफल नजर नहीं आते. वैसे यह फिल्म जिंदगी, प्यार, रिश्ते व मौत की कहानी भी है.

फिल्म की कहानी के केंद्र में अविनाश (दुलकेर सलमान) हैं, जो कि बंगलौर में एक आई टी कंपनी में नौकरी कर रहा है. वह मशहूर फोटोग्राफर बनना चाहता था. उसने अपनी खींची हुई तस्वीरों की एक प्रदर्शनी भी लगायी थी. मगर अपने पिता के दबाव के आगे चुप रहकर उसने फोटोग्राफी से दूरी बनाते हुए आई टी कंपनी में नौकरी करनी शुरू कर दी थी. अपने सपने का पीछा न कर पाने की वजह से अविनाश दुःखी और निराशापूर्ण जिंदगी जीता है.

इसी बीच उसके पिता बस से धार्मिक यात्रा पर निकले हुए हैं. अचानक ट्रेवल एजेंसी की तरफ से अविनाश के पास फोन आता है कि बस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी है, जिसमें उनके पिता की मौत हो गयी है और उनके पिता का शव हवाई जहाज से बंगलौर भेजा गया है, जिसे वह एअरपोर्ट पर जाकर ले ले. अविनाश अपने दोस्त शौकत (इरफान खान) के पास जाकर कहता है कि वह अपनी वैन दे दे. शौकत खुद उसके साथ चल देता है. दोनों एयरपोर्ट से शव लेकर निकलते हैं और अंतिम क्रिया करने की योजना बनाते हैं.

अचानक शौकत देखता है कि डिब्बे में बंद शव तो एक महिला का है. पता चलता है कि कोचीन में रह रही ताहिरा (कृति खरबंदा) की मां भी उसी बस में थी और उनकी भी मौत हुई है. गलती से शव अदला बदली हो गए हैं. अब अपने पिता के शव को लेने के लिए अविनाश अपने दोस्त शौकत के साथ कोचीन रवाना होता है.

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अचानक ताहिरा के फोन की वजह से अविनाष ऊटी के कौलेज जाकर ताहिरा की बेटी तान्या (मिथिला पालकर) को भी अपने साथ लेकर आगे बढ़ते हैं. उसके बाद भी इनकी यात्रा में कई पड़ाव आते हैं और अंत में अविनाश अपने पिता के शव का दाह संस्कार कोचीन में ही कर देता है. पर इस रोड यात्रा में शौकत को पत्नी मिल जाती है,तो वहीं अविनाश की मुलाकात अपनी कौलेज के दिनों की प्रेमिका रोमिला से होती है, जिसे बिना बताए वह गायब हुए थे. हालांक अब रोमिला की शादी एक डाक्टर से हो चुकी है.

रोड ट्रिप वाली इस फिल्म में पीढ़ियों के अंतराल की वजह से बिगड़ते रिश्ते, सोच सहित कई बातें की गयी हैं. इस यात्रा के दौरान सिर्फ अविनाश ही नहीं बल्कि शौकत भी अपनी खुद की खोज करता है. मगर फिल्म में कुछ परिस्थितियां अति बनावटी लगती हैं. फिल्म की पटकथा व संवाद बेहतर बन पड़े हैं. तमाम संवाद ऐेसे हैं, जिन्हें इरफान खान अपनी संवाद अदायगी की अदा से जिस तरह पेश करते हैं, उससे दर्शक हंसे बिना नहीं रहता.

पर इंटरवल के बाद फिल्म की गति धीमी हो जाती है. कथानक स्तर पर लेखक व निर्देशक दोनो ही चूके हैं. जब आप 2018 में फिल्म बना रहे हैं. फिल्म की मुख्य पात्र ऊटी के कौलेज में पढ़ रही एक मुक्त व आजाद ख्यालों वाली लड़की है, जो कि शराब व सिगरेट पीती है, खुलेआम सेक्स पर बात करती है. खुलेआम वह ‘गर्भ’ है या नहीं इसकी जांच करने वाली किट खरीदती है. ऐसे में मुस्लिम पात्र शौकत से उस पात्र के पहनावे पर एतराज जाहिर करवाना अजीब सा लगता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो इरफान खान एक बार फिर बेजोड़ अभिनेता के तौर पर उभरे हैं. वह जब भी परदे पर आते हैं, दर्शक के चेहरे पर मुस्कान ले ही आतेहैं. दक्षिण भारत में कई सफल फिल्में दे चुके उत्कृष्ट अभिनेता दुलकेर सलमान की हिंदी में यह पहली फिल्म है. मगर दुलकेर सलमान अविनाश राजपुरोहित के किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाए. यहां तक कि इरफान व दुलकेर की केमिस्ट्री भी परदे पर ठीक नहीं बैठी. जबकि मिथिला पालकर अपने सहज अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लेती हैं. वह कई जटिल भावनात्मक दृश्यों को बड़ी सहजता से निभा गयी हैं. फिल्म के कैमरामैन सर्वाधिक साधुवाद के पात्र हैं.

एक घंटे 54 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘कारवां’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला और प्रीती राठी गुप्ता ने किया है. फिल्म के निर्देशक व पटकथा लेखक आकर्ष खुराना,संवाद लेखक हुसैन दलवई, कहानीकार विजय नंबियार, संगीतकार प्रतीक खुहद, अनुराग सैकिया, इमाद शाह, कैमरामैन अविनाश अरूण और कलाकार हैं – इरफान खान, दुलकेर सलमान, मिथिला पालकर, कृति खरबंदा, अमला अनिकेनी, प्रीती राठी गुप्ता व अन्य.

नोट में खोट

भारतीय करेंसी के बड़े नोटों को 8 नवंबर, 2016 को एकाएक बंद कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकली नोटों के कारोबारियों को करारी चोट पहुंचाई थी. ये कारोबारी एक सुनियोजित तरीके से भारतीय अर्थव्यवस्था को खोखला करने की कोशिश में लगे थे. 500 और 1000 के नोट बंद करने के बाद भले ही कुछ दिनों के लिए बाजार में नकली नोट आने बंद हो गए थे. लेकिन स्थिति आज भी पूरी तरह बदली नहीं है.

कुछ जालसाजों ने तो नोट छापने की मशीन बेचने के बहाने लोगों को ठगना शुरू कर दिया है. भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी बपौती समझने वाले कुछ ऐसे गिरोह हैं, जो पुलिस प्रशासन की आंखों में धूल झोंक कर 5 सौ और 2 हजार रुपए के नकली नोट छाप रहे हैं और लोगों को रुपए तिगुना करने का लालच दे कर ठग रहे हैं.

असम के उत्तर लखीमपुर जिले के अंतर्गत कई गांव ऐसे हैं, जहां के अधिकांश लोग इस जालसाजी के धंधे में लगे हैं. एक दिन में अमीर बनने के लालच में लोग वहां अपनी गाढ़ी कमाई लुटाने चले जाते हैं.

आइए जानें, इस गांव के लोग आखिर नोट छापने और नोटों को दोगुना करने का धंधा किस तरह करते हैं.

असम के उत्तर लखीमपुर के एक गांव का रहने वाला है नजरूल काका नूर मोहम्मद उर्फ राहुल. उस का कहना है कि उसे भारतीय रिजर्व बैंक, दिल्ली की ओर से यह अनुमति मिली हुई है कि अगर कोई व्यक्ति उसे 37 लाख रुपए देता है तो वह नोट छापने वाली मशीन से 10 मिनट में एक करोड़ 15 लाख रुपए छाप कर उसे दे सकता है.

उत्तर लखीमपुर जिले के बिहपुरिया से 3 से 4 किलोमीटर दूर बंगालमरा पुलिस चौकी में आने वाले अहमदपुर, ठेंगिया, सोनापुर, फतेपुर, दौलतपुर, कुतुबपुर, इसलामपुर, मिरीसीट समेत तमाम गांवों में रहने वाले अधिकांश लोगों के यहां नोट छापने की मशीनें उपलब्ध हैं.

और तो और भारतीय रिजर्व बैंक का ‘लोगो’ भी मशीन पर है. राहुल ने बताया कि रिजर्व बैंक से नोट छपाई में काम आने वाले 10 करोड़ कागज और मशीन लेने के लिए 10 प्रतिशत रकम बैंक को देनी होगी, तब जा कर आप रुपए छापने की मशीन अपने शहर ले जा सकते हैं. और नोट छापने वाली मशीन के लिए हर महीने आरबीआई को 20 लाख रुपए देने होंगे अन्यथा मशीन वापस करनी होगी.

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यही नहीं मशीन में कोई गड़बड़ी आती है तो कंपनी दूसरी नई मशीन उपलब्ध करा सकती है. राहुल ने बताया कि नोट छापने की सभी जरूरी वस्तुएं नई दिल्ली स्थित आरबीआई उपलब्ध कराती है. राहुल का कहना है कि वह ग्राहकों को खुश करने के लिए पहले 10 हजार से ले कर 20 हजार रुपए लेता है और बदले में 10 का 30 और 20 का 60 हजार मशीन से छाप कर दे देता है. यानी दी गई रकम के 3 गुने नोट मिल जाते हैं.

सच्चाई जानने के लिए लेखक ने पिछले 10 दिनों से उन लोगों से बात करने की लगातार कोशिश की, जो घरों में मशीन से 2 हजार और 5 सौ के नोट छाप रहे हैं. लेखक ने खुद को राशन का थोक व्यापारी बताया. लेखक ने यह भी कहा कि वह 20 लाख रुपए देने को तैयार है, पर बदले में कितना मिलेगा.

जवाब आया कि 20 लाख रुपए के 60 लाख रुपए मिलेंगे, लेकिन हमारी ओर से 15 लाख अलग से दिए जाने का औफर है. यानी 20 लाख रुपए के बदले 75 लाख रुपए दिए जाएंगे.

मामले की तहकीकात करने के लिए लेखक ने असम पुलिस के कई आला अधिकारियों से संपर्क साधा तो पता चला कि रिजर्व बैंक औफ इंडिया का नाम ले कर जालसाजी करने वाले कुछ ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो इस तरह से लालच दे कर लोगों से असली रुपए लूट लेते हैं.

इस समय उत्तर लखीमपुर जिले के विभिन्न इलाकों से नोट दोगुना करने वाले गिरोह अपने जाल में फांस कर लोगों को लूट रहे हैं. गिरोह के लोगों ने अब तक कई लोगों से लाखों रुपए लूट लिए हैं.

गिरोह के जाल में केंद्रीय रिजर्व सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) का एक डीएसपी भी फंस कर लाखों रुपए लुटा चुका है. विस्तार से जानकारी हासिल करने के लिए लेखक ने किसी तरह गिरोह के सरगना से संपर्क साधने की कोशिश की, जिस में सफलता मिली.

हुआ यूं कि किसी तरह एक नेपाली युवती का फोन नंबर मिल गया. उस युवती से संपर्क साधने के बाद नोट दोगुना करने वाले राहुल का नंबर मिला.

राहुल से संपर्क करने की कोशिश की तो उस ने फोन काट दिया, लेकिन दूसरे दिन उस से खुद फोन किया और मतलब की बात की. ‘जय माता दी’ कह कर अपनी बात की शुरुआत करने वाले राहुल का असली नाम नजरूल काका नूर मोहम्मद है.

खुद को गुवाहाटी के दक्षिण गांव का रहने वाला बता कर उस ने कहा कि वह भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देश पर नोट दोगुने करता है. उस ने कहा, ‘‘आप कुछ रुपए ले कर बिहपुरिया आ जाएं, वहां आने के बाद काल करें. हमारा आदमी आप को मेरे घर ले कर आ जाएगा और 5 हजार या 10 हजार रुपए देने के बाद आप के नोट दोगुना कर दिए जाएंगे.’’

चूंकि यह पूरा धंधा गैरकानूनी रूप से चल रहा था, इसलिए हम ने असम पुलिस के एसटीएफ के एडीजीपी वाई.के. गौतम से संपर्क किया. वह हमारी मदद करने को तैयार हो गए. उन्होंने हमारे साथ पुलिस की एक टीम भी भेजी.

हम राहुल के कहे अनुसार, गुवाहाटी से निकल गए. तभी राहुल का फोन आया. उस ने बताया कि वह हर घंटे काल करता रहेगा. सोनापुर, हैबरगांव, कलियाभोमरा पुल और नारायणपुर तक राहुल फोन करता रहा. फिर अचानक 5 बज कर 17 मिनट पर राहुल का मोबाइल स्विच्ड औफ हो गया.

हम लगातार उस के नंबर पर संपर्क करते रहे, लेकिन उस का फोन बंद ही मिला. हम ने लखीमपुर के मां काली होटल में रात गुजारी. सबेरे हम ने नोट दोगुना करने वाले गिरोह की खोजबीन शुरू की, लेकिन कुछ पता नहीं चल सका.

दोपहर के समय हम बंगालमरा आउट पुलिस चौकी में गए. चौकीइंचार्ज जौन पाठरी से बात करने के बाद हमें नोट दोगुना करने वालों के बारे में सच्चाई पता चली.

चौकीइंचार्ज पाठरी ने बताया कि उन के इलाके के अलावा अन्य कई जगहों पर लोगों को नोट दोगुना करने वाले गिरोहों की कमी नहीं है. हर मकान में नोट छापने के नाम पर एक मशीन है, जिसे नोट छापने वाली मशीन बता कर लोगों को लूटा जा रहा है.

बाद में हमें पता चला कि राहुल नाम के इस शातिर ठग को भनक लग गई थी कि गुवाहाटी से पुलिस की टीम हमारे साथ है. तभी उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर दिया था.

तहकीकात करने पर पता चला कि नोट दोगुना करने वालों के जाल में अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय के साथसाथ विभिन्न प्रदेशों के लोग शिकार हो चुके हैं.

नोट दोगुना करने वाले गिरोह वाशिंग मशीन के आकार का एक डब्बा, जो कई रंगबिरंगी लाइटों से जगमगाता रहता है और उस पर आरबीआई का स्टीकर लगा रहता है, में पहले से कुछ असली नोट रख देते हैं और ग्राहक के सामने मशीन को चालू कर दिया जाता है.

मशीन के चालू होने के बाद डब्बे के ऊपर बने एक छेद से 2 हजार के नोट जो एक तरफ छपे हुए होते हैं और दूसरी तरफ सफेद रहता है, डाले जाते हैं. थोड़ी देर बाद एक अन्य स्विच को चालू करने पर नीचे बने छेद से तेज रफ्तार से 2 हजार के नोट एकएक कर के बाहर निकलने लगते हैं.

नोट के बाहर निकलने पर उस के पास आया ग्राहक उस नोट को ले कर बाजार में जाता है और कुछ चीजें खरीदता है. नोट के बाजार में चल जाने से ग्राहक को इस बात का विश्वास हो जाता है कि मशीन से असली नोट ही बाहर आते हैं. फिर वह दोबारा मोटी रकम ले कर उस के पास आता है. नोट दोगुना करने वाले गिरोह के सदस्य नोट के आकार के कागज के टुकड़े को एक तरफ कलर फोटोकापी किए हुए 2 हजार के नोट को लगा कर बंडल बना कर रस्सी बांध देता है.

वह बंडल यह कह कर ग्राहक को दे देता है कि आप ने 20 लाख रुपए दिए थे, ये रहे 60 लाख और कंपनी की ओर से 15 लाख रुपए का औफर भी इसी में है.

नोट के बंडलों को ले कर ग्राहक खुशीखुशी वहां से चला जाता है. बाद में उसे पता चलता है कि वह इस गैंग के द्वारा ठगा जा चुका है. डर और भय से वह इस की शिकायत पुलिस थाने में भी नहीं करता और न ही उस स्थान पर जाने की उस की हिम्मत होती है, जहां से वह नोट के आकार का बंडल ले कर आया हुआ होता है.

बंगालमरा आउट थाने के थानाप्रभारी ने पहले से जब्त की गई नोट छापने की तथाकथित मशीन के अलावा 2 हजार और 5 सौ रुपए के आकार के कागजों के बंडलों के अलावा रुपए की फोटोकापियों और गिरोह द्वारा बनाए गए आरबीआई के लोगो, प्रमाणपत्र आदि दिखाए.

उन्होंने कहा कि कुछ महीने पहले त्रिपुरा से आया एक व्यक्ति अपनी कार टीआर01सी 0741 जेन वाईएक्स से नोट दोगुना करने वाले गिरोह के चक्कर में फंसा था. उसी समय पुलिस की रेड हुई तो वह अपनी कार छोड़ कर भाग खड़ा हुआ.

नोट दोगुना करने वालों को कई बार गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन कोर्ट से जमानत पर छूटने के बाद वे फिर से इस धंधे को शुरू कर देते हैं और ग्राहकों की तलाश में ये लोग अपने एजेंट बाजार में छोड़ देते हैं. इस तरह से इन का धंधा चल रहा है.

जिम ट्रेनर की आखिरी ट्रेनिंग

तेंद्र मान ग्रेटर नोएडा स्थित एवीजे हाइट्स सोसाइटी में छठी मंजिल के फ्लैट में रहता था. यह फ्लैट उस के फुफेरे भाई प्रीतम का था. इस फ्लैट की एक चाबी प्रीतम के पास रहती थी और दूसरी जितेंद्र के पास. 12 जनवरी, 2018 को प्रीतम अपने भाई जितेंद्र से मिलने फ्लैट पर पहुंचा. जैसे ही उस ने फ्लैट का मुख्य दरवाजा खोला तो उसे अंदर कमरे का दरवाजा खुला मिला. दरवाजे से लौबी साफ दिख रही थी. वहीं से उस ने देखा कि फर्श पर गद्दा बिछा है और उस गद्दे पर कोई कंबल ओढ़े सो रहा है.

फ्लैट में घुसते ही उसे थोड़ी दुर्गंध आती महसूस हुई तो घबरा कर वह सीधे लौबी में पहुंचा. थोड़ा अजीब तो लग रहा था, पर यह सोच कर उस ने जितेंद्र को आवाज दी कि कंबल में वही सोया होगा. जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो प्रीतम ने कंबल हटाया. कंबल के नीचे जितेंद्र की लाश पड़ी थी. भाई की लाश देखते ही प्रीतम की चीख निकल गई.

चीख की आवाज सुन कर कई पड़ोसी भी वहां आ गए. प्रीतम ने फोन कर के इस की सूचना पुलिस को भी दे दी. कुछ देर बाद ही सूरजपुर थाने के थानाप्रभारी अखिलेश प्रधान एसआई सोहनवीर मलिक, हरिराज, कांस्टेबल कृष्णकुमार और राजेश कुमार घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने जितेंद्र की लाश पर से कंबल हटा कर देखा तो गद्दा खून से सना हुआ था. खून भी जम कर काला पड़ गया था. लाश से आ रही बदबू से लग रहा था कि उस की हत्या कई दिन पहले की गई होगी.

जितेंद्र मान की लाश चित अवस्था में थी. लाश पलटी तो उस की पीठ पर गोलियों के 3 निशान मिले. एक गोली उस की गरदन पर भी लगी थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसपी (देहात) सुनीति शर्मा और सीओ अमित किशोर श्रीवास्तव को भी दे दी.

कमरे का निरीक्षण किया गया तो वहां शराब और सोडे की खाली बोतलें और 2 खाली गिलासों के अलावा कुछ जूठे बरतन भी पड़े मिले. इस से लगा कि वहां 2 लोगों ने शराब पी थी और जितेंद्र की हत्या किसी जानकार ने ही की होगी.

थानाप्रभारी प्रधान मौकामुआयना कर ही रहे थे कि एसपी (देहात) सुनीति शर्मा और सीओ (ग्रेटर नोएडा) अमित किशोर भी मौके पर पहुंच गए. एसपी (देहात) सुनीति शर्मा ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि उन्हें गोलियों की आवाज नहीं आई थी. इस बात पर पुलिस भी हैरत में पड़ गई कि 4 गोलियां चलीं और पड़ोसी आवाज भी नहीं सुन सके.

फ्लैट में सारा सामान अपनी जगह रखा था, इसलिए वहां लूट की संभावना नजर नहीं आ रही थी. मृतक का मोबाइल फोन और पर्स नदारद था. यानी ये दोनों चीजें हत्यारा अपने साथ ले गया था.

प्रीतम ने जितेंद्र की हत्या की खबर उस के घर वालों को भी दे दी थी. उस के घर वाले भी वहां पहुंच गए. पुलिस ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

प्रीतम की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारे के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया. इस केस की जांच थानाप्रभारी ने खुद संभाली.

जितेंद्र मान की पृष्ठभूमि

13 जनवरी को पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. मरने की वजह गोलियों से शरीर के अंदरूनी अंगों की क्षति पहुंचना बताया गया था. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि हत्या 10 जनवरी को दोपहर से शाम के बीच की गई थी.

14 जनवरी, 2018 को सुबह के समय थानाप्रभारी अखिलेश प्रधान फिर से एवीजे हाइट्स सोसाइटी पहुंचे. उन्होंने गेट पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों से पूछताछ की. आगंतुक रजिस्टर भी चैक किया, पर वहां से कोई क्लू नहीं मिला. तब उन्होंने सोसाइटी में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज का निरीक्षण किया.

फुटेज से जानकारी मिली कि 10 जनवरी को दोपहर करीब साढ़े 11 बजे जितेंद्र मान सीढि़यों से फ्लैट में गया और 4 बज कर 20 मिनट पर फ्लैट से बाहर निकला और चला गया. इस के बाद थानाप्रभारी सोसाइटी से चले आए.

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उन्होंने जांच की तो पता चला कि दिल्ली के मुनीरका के रहने वाले प्रीतम ने अपने दोस्त नितिन चौधरी के साथ ग्रेटर नोएडा में कुछ दिनों पहले ही एक जिम खोला था. प्रीतम जिम में ज्यादा समय नहीं दे पाता था. घर से रोजाना ग्रेटर नोएडा आनाजाना उस के लिए संभव नहीं था, इसलिए उस ने जिम के नजदीक स्थित एवीजे हाइट्स सोसाइटी में किराए पर एक फ्लैट ले लिया था.

प्रीतम का एक ममेरा भाई था जितेंद्र मान, जो बाहरी दिल्ली के अलीपुर में रहता था. फिलहाल वह बेरोजगार था. उस ने कई साल जिम में प्रैक्टिस कर के अपना शरीर बना रखा था और एक अच्छा खिलाड़ी भी था. इसलिए प्रीतम ने उसे अपने जिम में ट्रेनर के रूप में रख लिया था.

चूंकि हत्या वाले दिन जितेंद्र प्रीतम के फ्लैट पर आया था, इसलिए थानाप्रभारी पूछताछ करने के लिए उस के जिम में पहुंच गए.

थानाप्रभारी ने जिम में पूछताछ की तो मालूम हुआ कि 10 जनवरी को जितेंद्र अपनी शिफ्ट पूरी कर के पौने 12 बजे घर जाने के लिए निकला था. एवीजे हाइट्स सोसाइटी जिम के पास है. अगर किसी गाड़ी से जाया जाए तो सोसाइटी का रास्ता 10 मिनट का है. एवीजे हाइट्स की सीसीटीवी फुटेज में जितेंद्र साढ़े 11 बजे सीढि़यां चढ़ कर फ्लैट में जाता दिखा था.

इस से साफ हो गया कि जिम से निकलने के बाद जितेंद्र सीधे घर आया था. इस के बाद दोपहर करीब साढ़े 12 बजे कोई जितेंद्र के फ्लैट में आया. वहां शराब पी गई. पुलिस ने जितेंद्र की काल डिटेल्स निकलवाई. उस काल डिटेल्स में 17 मोबाइल नंबरों को चिह्नित किया. इन में से एक फोन नंबर प्रीतम का निकला और 5 फोन नंबर जिम के कर्मचारियों व परिवार के लोगों के थे. इसलिए इन 6 नंबरों को संदेह से अलग कर दिया गया.

पुलिस ने 11 नंबरों की गहन छानबीन की तो चौंकाने वाली बात यह पता चली कि वह सभी फोन नंबर लड़कियों के थे. उन में से 10 लड़कियां घर पर ही मिल गईं. थानाप्रभारी ने उन्हें एसपी (देहात) सुनीति शर्मा के सामने पेश किया.

पुलिस इन्वैस्टीगेशन में आया लड़की का नाम

एसपी (देहात) सुनीति शर्मा ने सभी लड़कियों से अलगअलग बात की मगर कोई काम की बात पता नहीं चली. अब केवल एक लड़की बची थी, उस का फोन स्विच्ड औफ आने की वजह से संपर्क नहीं हो सका. पुलिस ने उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह फोन नंबर ग्रेटर नोएडा की होराइजन सोसाइटी के फ्लैट टी-1103 में रहने वाली सृष्टि गुप्ता का है. मोबाइल कंपनी से पते के साथ सृष्टि गुप्ता का फोटो भी मिल गया.

मामले की तह तक पहुंचने के लिए एसआई हरिराज सीधे होराइजन सोसाइटी पहुंचे. सृष्टि गुप्ता जिस फ्लैट में रहती थी, वह बंद मिला. इस पर एसआई ने सोसाइटी के सुरक्षाकर्मियों को सृष्टि का फोटो दिखाया. सुरक्षाकर्मियों ने फोटो पहचानते हुए कहा कि यह लड़की यहीं रहती है. उन्होंने  बताया कि सृष्टि स्टूडेंट है और फ्लैट में अकेली ही रहती है. उस के यहां एक मेड काम करने आती है.

पर कुछ दिनों से सृष्टि फ्लैट में नहीं है, इसलिए मेड भी काम पर नहीं आती. एसआई हरिराज ने उन सुरक्षाकर्मियों को अपना फोन नंबर देते हुए कहा कि जब भी सृष्टि सोसाइटी में आए तो वह उन्हें फोन कर दें.

एक दिन एसआई हरिराज को होराइजन सोसाइटी के एक सुरक्षागार्ड ने फोन कर के सूचना दी कि सृष्टि अपने फ्लैट में मौजूद है. सूचना मिलते ही एसआई हरिराज महिला कांस्टेबल मोनिका व ऋचा को ले कर सृष्टि के फ्लैट पर पहुंच गए. वह पूछताछ के लिए सृष्टि को सूरजपुर थाने ले आए.

संदेह के दायरे में आई सृष्टि

थानाप्रभारी अखिलेश प्रधान ने सृष्टि से जितेंद्र मान के बारे में पूछताछ की तो उस ने यह बात कबूल कर ली कि वह जितेंद्र मान को जानती है. क्योंकि वह पहले जितेंद्र के जिम में जाती थी.

‘‘आप कब से कब तक जिम जाती रहीं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘मार्च से सितंबर 2017 तक.’’ सृष्टि बोली.

‘‘जिम छोड़ने के बाद आप की जितेंद्र से कभी बात हुई?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘नहीं, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई.’’ सृष्टि ने बताया.

तभी थानाप्रभारी ने उस के फोन नंबर की काल डिटेल्स उस के सामने रखते हुए कहा, ‘‘आप झूठ क्यों बोल रही हैं? उस से आप की रोजाना बात होती थी.’’

थानाप्रभारी की बात का सृष्टि ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने अपनी नजरें भी झुका लीं. वह आगे बोले, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि 10 जनवरी को दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक आप कहां थीं?’’

कुछ देर के बाद वह बोली, ‘‘उस दोपहर को मैं अपना कैमरा रिपेयर कराने के लिए दुर्गापुरी चौक गई थी.’’

‘‘उस के बाद..?’’

‘‘उस के बाद रोजमर्रा का सामान लेने जीआईपी मौल गई थी. वहां से लौटतेलौटते शाम हो गई थी. आप चाहें तो इस बारे में दुकानदार और मौल से मेरी बात की सच्चाई जान सकते हैं.’’

थानाप्रभारी ने सृष्टि के घरपरिवार की भी जानकारी हासिल कर ली थी. उस ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के खुर्जा की रहने वाली है. उस के पिता की खुर्जा में मोबाइल एक्सेसरीज की दुकान है.

सृष्टि से पूछताछ के बाद थानाप्रभारी ने उसे हिदायत दे कर थाने से भेज दिया. साथ ही उन्होंने कांस्टेबल राजेश को सृष्टि की निगरानी के लिए लगा दिया.

आगे की जांच के लिए एक पुलिस टीम खुर्जा में सृष्टि के पिता सुधीर गुप्ता के पास भेजी गई. सुधीर गुप्ता ने बताया कि करीब 2 साल से उन के सृष्टि से कोई संबंध नहीं हैं. इस की वजह बताते हुए वह नरवस भी हो गए. उन्होंने कहा कि 2 साल पहले सृष्टि मेरठ यूनिवर्सिटी में बीबीए की पढ़ाई के दौरान किसी मुसलमान लड़के के चक्कर में पड़ गई थी. वह उसी के साथ रह रही थी. यह बात मुझे पता लगी तो मैं ने बेटी को समझाया, जब वह नहीं मानी तो हम ने उस से नाता ही तोड़ लिया.

आखिर फंस ही गई जितेंद्र मान की कातिल

17 जनवरी की शाम को कांस्टेबल राजेश ने थानाप्रभारी को सूचना दी कि एक इनोवा कार में सृष्टि अपना सामान रख रही है. उस का इरादा शायद फ्लैट खाली करने का है.

खबर मिलते ही थानाप्रभारी अखिलेश प्रधान पुलिस टीम के साथ होराइजन सोसाइटी पहुंच गए. पुलिस सृष्टि को फिर से थाने ले आई. इस बार उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार करते हुए कहा कि उस ने ही जितेंद्र मान की हत्या की थी. हत्या के पीछे उस ने जो कहानी बताई, वह प्रेम संबंधों पर आधारित निकली—

24 वर्षीय सृष्टि गुप्ता जब मेरठ यूनिवर्सिटी में बीबीए की पढ़ाई कर रही थी, तभी उस ने अपना खर्च चलाने के लिए नोएडा स्थित इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी के सेल्स डिपार्टमेंट में नौकरी जौइन कर ली थी.

वह फ्लैट बेचने के लिए टेलीकालिंग करती थी. इस काम के लिए उसे हर महीने 25 हजार रुपए वेतन मिलता था. एक दिन वह रुटीन में इमरान कुरैशी नाम के व्यक्ति से फ्लैट बेचने के लिए काल कर रही थी, तभी इमरान बातों बातों में उस की पर्सनल लाइफ से जुड़े सवाल पूछने लगा. जब सृष्टि ने बताया कि वह खुर्जा की रहने वाली है तो इमरान बोला, ‘‘मैं भी खुर्जा का रहने वाला हूं. मोहल्ला तारीनान में जो किला मसजिद है, उसी गली नंबर-7 में रहता हूं.’’

सृष्टि को जब यह पता चला कि इमरान भी खुर्जा का है तो उसे बड़ी खुशी हुई. उस दिन दोनों के बीच काफी देर तक बातचीत होती रही. उस दिन के बाद दोनों की अकसर फोन पर बातें होने लगीं, जो बाद में प्यार में बदल गईं. वे दोनों रेस्टोरेंट वगैरह में मिलने भी लगे.

इमरान न तो हैंडसम था और न ही ज्यादा पढ़ालिखा, मगर वह गले में सोने की मोटी चेन, अंगुलियों में हीरे की अंगूठियां पहनता था और स्कोडा कार से चलता था. इस सब से उस की संपन्नता साफ झलकती थी.

इमरान शादीशुदा था. इतना ही नहीं, उस के 4 बच्चे भी थे. उस के 6 भाई थे जो सभी बीफ एक्सपोर्ट करते थे. गोश्त के इस धंधे में उन्हें अच्छीखासी आमदनी होती थी.

इमरान की पैसों की चमकदमक देख कर सृष्टि उस पर मर मिटी. उसी ने होराइजन सोसाइटी में उसे फ्लैट ले कर दे दिया था. सृष्टि किराए के मकान से फ्लैट में आ गई. इतना ही नहीं, इमरान उसे हर माह 50 हजार रुपए खर्च के लिए भी देता था. जब इमरान उस का हर तरह से खयाल रखने लगा तो सृष्टि ने इमरान को अपना पति मान लिया और नौकरी छोड़ दी.

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मातापिता से नहीं था कोई संबंध

ये सारी बातें सृष्टि के पिता को पता चलीं तो उन्होंने अपनी बेटी से संबंध खत्म कर लिए, पर सृष्टि ने इस सब की परवाह नहीं की.

इसी दौरान सृष्टि की बीबीए की पढ़ाई पूरी हो गई. वह पत्रकार बनना चाहती थी, इसलिए उस ने ग्रेटर नोएडा के एक संस्थान में मास कम्युनिकेशन का कोर्स करने के लिए दाखिला ले लिया. इस का खर्च भी इमरान उठा रहा था.

इमरान सृष्टि पर दोनों हाथों से पैसा लुटा रहा था. सृष्टि ने शरीर की फिटनेस बनाए रखने के लिए एक जिम भी जौइन कर लिया. वह जिम प्रीतम का था, जिस में जितेंद्र मान ट्रेनर था.

जितेंद्र मान बाहरी दिल्ली के अलीपुर गांव के रहने वाले सत्यप्रकाश मान का बेटा था. सत्यप्रकाश के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे व एक बेटी थी. जितेंद्र भाइयों में छोटा था. जितेंद्र जब 2 साल का था, तभी उस की मां की मृत्यु हो गई थी. जब वह 10 साल का हुआ तो उस के पिता का भी स्वर्गवास हो गया.

जितेंद्र मान की एक बुआ मुंडका में रहती थी. भाई की मौत के बाद वह जितेंद्र को अपने साथ ले गई थी. उन्होंने ही जितेंद्र की परवरिश की. मान की बुआ का बेटा प्रीतम टोकस जितेंद्र से 3 साल बड़ा था. जितेंद्र ने आगे की पढ़ाई अपने फुफेरे भाई प्रीतम के साथ ही की. दोनों ने दयाल सिंह कालेज ने ग्रैजुएशन किया.

प्रीतम और जितेंद्र को कुश्ती व बौक्सिंग का शौक था. किशोरावस्था में पहुंचते ही दोनों का रुझान मुक्केबाजी की ओर हो गया. दोनों ने नैशनल लेवल के कोच राजेश टोकस से कोचिंग ली और दिल्ली की ओर से मुक्केबाजी प्रतियोगिता में भाग लेने लगे. बाद में जितेंद्र मान और प्रीतम ने हरियाणा स्टेट बौक्सिंग में भी अपना पंजीकरण करा लिया.

हरियाणा की ओर से खेलते हुए जितेंद्र ने देशविदेश की कई प्रतियोगिताओं में स्वर्णपदक जीते. उस ने उज्बेकिस्तान, क्यूबा, फ्रांस और रूस की कई चैंपियनशिप के जूनियर वर्ग में भारत की अगुवाई की.

जितेंद्र मान की उपलब्धियों का ही नतीजा था कि उसे फौज में नौकरी मिल गई. भरती के समय सेनाधिकारियों ने मान को आश्वस्त किया था कि जल्द ही उसे प्रमोशन दे कर हवलदार बना दिया जाएगा.

मान ने सेना के लिए कई बार मैडल जीते. कई साल बीतने के बावजूद पदोन्नति नहीं मिली तो 2 साल पहले मान नौकरी छोड़ कर घर आ गया. फिर वह प्रीतम के जिम में ट्रेनर के रूप में काम करने लगा.

पूर्व फौजी था जितेंद्र मान

मार्च, 2017 में सृष्टि ने प्रीतम की अल्टीमेट फिटनैस एकेडमी जौइन की. खूबसूरत होने के साथसाथ जितेंद्र मान का व्यक्तित्व भी आकर्षक था. जितेंद्र और सृष्टि की ऐसी दोस्ती बढ़ी कि दोनों जिम के बाहर भी मिलने लगे.

सृष्टि से मिलने के लिए जितेंद्र उस के घर तक पहुंचने लगा. एक दिन दोपहर में मान सृष्टि के घर आया तो उस ने कौफी बनाई. सृष्टि ने कौफी के दोनों कप मेज पर रख दिए. तभी मान ने उस से पानी मांगा. सृष्टि पानी लेने गई. तभी मौका देख कर मान ने उस की कौफी में नशे की गोली मिला दी. कौफी पीते ही सृष्टि अर्द्धबेहोश हो गई. इस के बाद मान ने उस के साथ शारीरिक संबंध बनाए तो ही, उस की वीडियो क्लिप भी बना ली.

उसी अश्लील वीडियो क्लिप के जरिए वह सृष्टि को ब्लैकमेल कर के उस का शारीरिक ही नहीं बल्कि आर्थिक शोषण भी करने लगा. यह बात सृष्टि ने इमरान को भी बता दी. उस ने इमरान से कहा कि जो पैसे तुम मुझे देते हो, उन में से आधे तो मान ऐंठ लेता है. उस ने इमरान को पूरी बात बता कर कहा कि वह किसी भी तरह जितेंद्र मान से पीछा छुड़ाना चाहती है.

इमरान कुछ देर सोचने के बाद बोला, ‘‘सृष्टि अवैध संबंध ऐसा खेल है, जिस में किसी न किसी को मरना पड़ता है.’’

यह सुन कर सृष्टि के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कहा, ‘‘इमरान, क्या तुम मुझे मार दोगे?’’

‘‘अगर तुम अपनी मरजी से मान के साथ मौजमस्ती कर रही हो तो मैं तुम्हें बेहिचक मार दूंगा.’’ इमरान ने जिंदगी और मौत के खेल में उसे भी शामिल करते हुए कहा, ‘‘और हां, अगर तुम वाकई मान की ब्लैकमेलिंग का शिकार हो रही हो तो तुम्हें ही उस का कत्ल करना होगा.’’

‘‘इमरान, मैं मान से बहुत परेशान हूं. मैं उस से वाकई निजात पाना चाहती हूं.’’ वह बोली.

‘‘तो ठीक है, तुम उसे निपटा दो. इस काम में मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हूं.’’ इमरान ने कहा.

इमरान ने रची थी साजिश

इस के बाद इमरान ने अपने ड्राइवर नफीस और सृष्टि को बिठा कर एक योजना बनाई. योजना के अनुसार, इमरान ने कहीं से एक पिस्तौल ला कर सृष्टि को दे दी और उसे पिस्तौल चलाना सिखा भी दिया. 9 जनवरी, 2018 को इमरान ने सृष्टि से जितेंद्र मान को फोन कराया.

सृष्टि ने उस से प्यार भरी बातें करते हुए कहा, ‘‘मान, कल मैं बिलकुल खाली हूं, इसलिए चाहती हूं कि कल कुछ खास एंजौय किया जाए.’’

‘‘बताओ जानेमन, तुम क्या चाहती हो?’’ मान बोला.

‘‘मैं चाहती हूं कि कल मैं तुम्हारे फ्लैट पर आ जाऊं. वहीं वोदका पिएंगे.’’ सृष्टि ने कहा.

‘‘ठीक है, तुम आ जाना. मैं इंतजार करूंगा.’’ जितेंद्र मान बोला.

जितेंद्र अपने भाई प्रीतम के एवीजे हाइट्स सोसाइटी स्थित फ्लैट में रहता था. 10 जनवरी, 2018 को सृष्टि एवीजे हाइट्स सोसाइटी पहुंच गई, जहां मान उस का इंतजार कर रहा था.

मान ने उस का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया. फिर उस के और सृष्टि के बीच खानेपीने का दौर चला. बाद में मान ने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं. इस के बाद सृष्टि ने मान से अश्लील क्लिपिंग डिलीट करने को कहा. इस पर मान ने कोई जवाब देने के बजाय उस की तरफ पीठ घुमा ली.

सृष्टि को समझ में आ गया कि वह क्लिपिंग डिलीट नहीं करेगा. उस ने अपने बैग से पिस्तौल निकाली और एकएक कर के उसे 4 गोलियां मारीं. कुछ ही देर में मान की मौत हो गई. सृष्टि ने लाश को चित कर के उसे कंबल ओढ़ा दिया.

इस के बाद सृष्टि ने मान के मोबाइल से जिम वाले फोन पर मैसेज किया, ‘‘मैं जरूरी काम से बाहर जा रहा हूं. शाम को जिम नहीं आऊंगा.’’

सृष्टि ने होशियारी तो बहुत की पर फंस ही गई

सृष्टि अपने साथ एक जोड़ी कपड़े ले कर गई थी. पहने हुए कपड़ों पर खून लग गया था, अत: बाथरूम में जा कर उस ने अपने कपड़े बदले. फिर फ्लैट को बाहर से बंद कर के चाबी पर्स में डाली और चेहरे पर स्कार्फ बांध कर सोसायटी से बाहर निकल आई. वहां से वह डीएलएफ मौल पहुंची, जहां इनोवा कार में इमरान व ड्राइवर नफीस उस का इंतजार कर रहे थे.

सृष्टि ने एक चालाकी यह भी की थी कि वह अपने दोनों मोबाइल नफीस के पास ही छोड़ गई थी. नफीस उस के मोबाइल ले कर दिलशाद गार्डन होता हुआ दुर्गापुरी चौक पहुंच गया था.

तभी योजनानुसार इमरान ने अपने फोन से सृष्टि के फोन पर 2 बार काल की, जो नफीस ने रिसीव कर ली थी. यह इन्होंने इसलिए किया था, ताकि वारदात के समय सृष्टि के फोन की लोकेशन घटनास्थल के बजाय कहीं दूसरी जगह की आए.

सृष्टि से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी इमरान व उस के ड्राइवर नफीस को भी गिरफ्तार कर लिया. इमरान की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल भी बरामद कर ली. लेकिन जितेंद्र का मोबाइल फोन बरामद नहीं हो सका. वह मोबाइल उस ने दनकौर नहर में फेंक दिया था.

इस के बाद इमरान और नफीस से भी उन्होंने पूछताछ की. तीनों अभियुक्तों को सीजेएम गौतमबुद्धनगर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अक्षरा सिंह ने भोजपुरी गानों पर लगाए जमकर ठुमके

भोजपुरी सिनेमा जगत में अपने एक्टिंग और डांसिंग से दर्शकों के दिल पर राज करने वाली अक्षरा सिंह ने एक बार फिर स्टेज पर धमाकेदार जलवे बिखेरे हैं. अक्षरा ने भोजपुरी गानों पर कुछ ऐसे ठुमके लगाये कि आप सपना चौधरी का डांस भी भूल जाएंगे. अक्षरा ने एक इवेंट पर धमाकेदार डांस किया, जिसे देखकर वहां पर मौजूद दर्शक झूम उठे और उनके डांस पर जमकर तालियां बजाईं.

इस डांस के अलावा अक्षरा का एक और वीडियो यूट्यूब पर काफी वायरल हो रहा है, हालांकि यह वीडियो 8 महीना पुराना है लेकिन फिर भी इंटरनेट पर अभी भी तहलका मचाये हुए है. वेव म्यूजिक भोजपुरी यूट्यूब चैनल पर रिलीज हुए इस स्टेज परफौर्मेंस को अभी तक 53 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. आप भी इस वीडियो में अक्षरा का जबरदस्त डांस देख सकते हैं.

बता दें कि अक्षरा सिंह ने भोजपुरी में कई हिट फिल्में दी हैं और उनके लाइव स्टेज परफौर्मेंस पर हजारों दर्शक उन्हें देखने के लिए मौजूद रहे. अक्षरा ने ‘आई हो दादा…’ गाने पर डांस से शुरुआत की और फिर जलवे बिखेर डाले. अक्षरा ने शानदार लुक में डिजाइनर ड्रेस पहना हुआ था. उन्होंने ब्लैक और ब्लू कलर के कौम्बिनेशन में लहंगा पहना हुआ है और इसी ड्रेस के साथ कई गानों पर डांस किया.

हाल ही में अक्षरा का सावन पर गाया गाना ‘भाग जाईब ससुरा से…’ काफी वायरल हुआ. इस गाने में अक्षरा सिंह ने जिस तरह का डांस किया है और गायकी की है, वह दोनों ही कमाल के हैं. यही बातें इस गाने को खास भी बनाती हैं.

भोजपुरी गाने नौजवानों को देते सपनों की नई उड़ान

भोजपुरी गाने केवल मनोरंजन ही नहीं करते हैं, बल्कि समाज और राजनीति की घटनाओं पर वार भी करते हैं. ‘नोटबंदी’, ‘नीतीश कुमार के महागठबंधन के टूटने’, ‘पतंजलि के सामान बेचने’ जैसी घटनाओं पर भोजपुरी में तुरंत गाने रैकौर्ड हो कर म्यूजिक बाजार में आ जाते हैं. ‘शादीब्याह’, ‘प्रेमविवाह’, ‘सुहागरात’ जैसे मुद्दों पर लिखे गए भोजपुरी गाने सब से ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं.

अब फिल्मों के बराबर ही भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री बन गई है. पहले जहां गायकों को कैसेट कंपनियों के आगेपीछे चक्कर लगाने पड़ते थे, वहीं अब वे अपने गाने का आडियोवीडियो खुद ही बना कर यूट्यूब पर पोस्ट कर देते हैं.

भोजपुरी गानों में अपना कैरियर बनाने वाले ज्यादातर लड़केलड़कियां गायकी की कोई बड़ी ट्रेनिंग ले कर नहीं आते हैं. गांवों और छोटे शहरों में रहने वाले नौजवानों के लिए भोजपुरी म्यूजिक  ने कैरियर बनाने के नए दरवाजे खोल दिए हैं.

भोजपुरी में गाने वाली लड़कियों की तादाद सब से ज्यादा है. कल्पना और इंदू सोनाली जैसी लड़कियों ने भोजपुरी फिल्मों में गाने गा कर धूम मचाई है.

भोजपुरी गानों से चमकने वाली लड़कियों में खुशबू उत्तम, निशा पांडेय,  अमृता दीक्षित, मोहिनी पांडेय, खुशबू तिवारी, पिंकी सिंह, निशा दुबे, ब्यूटी पांडेय, आर्या नंदिनी, अलका सिंह पहाडि़या, ज्योति गुप्ता और सोना सिंह जैसे तमाम नाम हैं.

इन लड़कियों में सब से अलग बात यह है कि  ये लोकगीत से ले कर हर तरह के गाने गाती हैं. ये लड़कियां बड़े आराम से ‘राजा छोट बा सामान धर के बड़ा करा’ जैसे गाने गाती हैं. ब्यूटी पांडेय का गाया यह गाना खूब सुना जा रहा है.

बात केवल ब्यूटी पांडेय की नहीं है, बल्कि और भी लड़कियां खूब नाम कमा रही हैं. खुशबू उत्तम का छोटू छलिया के साथ गाया गाना ‘धीरेधीरे डालो न अबहि जगइयां छोट बा’ लोगों में खूब पसंद किया जा रहा है.

इसी तरह खुशबू तिवारी का गाना ‘भतरू से पहले दे ले बानी’, पिंकी सिंह का गाना ‘राजा भंड़ुया सुताला बजत खटिया’ और मोहिनी पांडेय के विवाह गीतों में गाली गीत ‘रहरी की तीन पत्ता तीनों कचनार जी, अगुवा की तीन बहिनियां तीनों पक्की छिनार जी’ खूब बज रहा है.

भोजपुरी फिल्मों में हीरो का रोल निभाने वाले पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, अरविंद अकेला, चिंतामणि सिंह, रितेश पांडेय, नीलकमल सिंह, प्रमोद प्रेमी, गुंजन सिंह, गोलू गोल्ड, समर सिंह, आलम राज, दीपक दिलदार और आनंद राज जैसे गायक आज नौजवान दिलों की धड़कन बन गए हैं.

बदलते गांव की झलक

गायक चिंतामणि सिंह कहते हैं, ‘‘भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री में रोज नया हुनर आ रहा है. ऐसे में यहां पर गायकों के बीच कंपीटिशन बढ़ता जा रहा है. जिन गायकों को फिल्मों में गाने को नहीं मिल रहा है, वे अपने सुर की बदौलत अपना काम कर रहे हैं.

‘‘भोजपुरी गानों में आज की जिंदगी की झलक होती है, जिस के चलते लोग इन को खूब पसंद करते हैं. जो गायक समय के हिसाब से गाने देता है वही हिट होता है.’’

चिंतामणि सिंह का गाना ‘टोपेटोपे चुअता’ पहली बार में ही लोगों की पसंद बन गया है. आज गांवदेहात और छोटे शहरों में भी कपड़ों की पसंद के लिए औनलाइन शौपिंग का क्रेज बढ़ रहा है.

खेसारी लाल यादव ने अपने गाने ‘यूट्यूब पर देखले बानी वीडियो ब्लाउज रेडीमेड चाही’ में इस बात को समझाने की कोशिश की गई है.

इन गानों में गांव में प्रधान की दबंगई के साथ महिला प्रधान के बनने पर आए बदलाव को दिखाया जाता है. यह भी कि किस तरह से भौजी बन कर घर में रहने वाली औरत अब थानाकचहरी जाती है.

एक समय सारे गानों के केंद्र में सिपाही और दारोगा होते थे पर अब स्कूल में पढ़ाने वाले मास्टर और प्रधान भी गानों के केंद्र में आने लगे हैं.

पहले ये गाने केवल देवरभाभी, जीजासाली के रंगीन किस्सों पर ही बनते थे, पर अब शादी से पहले और शादी के बाद के संबंधों पर भी तैयार होते हैं.

सैक्स को ले कर गांवों में भले ही औरतों को कुछ कहने की आजादी न हो, पर भोजपुरी गानों में सैक्स सुख के लिए परेशान औरत की दास्तान सुनाने की हिम्मत दिखाई जाती है.

स्टूडियो की भरमार

भोजपुरी से ज्यादा खुलापन पंजाबी, गुजराती और हिंदी के गानों में है, पर जितनी बुराई भोजपुरी गानों के खुलेपन की होती है इतनी किसी और की नहीं होती. इस के बावजूद भोजपुरी गानों के आलोचकों से ज्यादा इन को पसंद करने वाले हैं. यही वजह है कि यूट्यूब पर सब से ज्यादा डाउनलोड होने वाले गानों में भोजपुरी गाने हैं.

भोजपुरी फिल्मों के बराबर ही भोजपुरी म्यूजिक का उद्योग खड़ा हो गया है. कुछ समय पहले तक तो गाने रैकौर्ड कराने और उन का वीडियो बनवाने के लिए लोगों को दिल्ली, मुंबई और वाराणसी के चक्कर लगाने पड़ते थे, पर अब ऐसे वीडियो पटना, हाजीपुर, छपरा, गोपालगंज और रांची में ही तैयार हो जाते हैं.

झारखंड और बिहार के शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवकसबों तक में गाने के डाउनलोड करने वाली दुकानें खुल गई हैं. गाने डाउनलोड करने की जितनी दुकानें बिहार और झारखंड में खुली हैं उतनी दुकानें किसी और प्रदेश में नहीं मिलेंगी.

35 से 40 रुपए में एक जीबी वाला मैमोरी कार्ड गानों से डाउनलोड किया जा रहा है. केवल पटना शहर में आडियो और वीडियो अलबम बनाने वाले तकरीबन 50 से ज्यादा स्टूडियो हैं.

हर स्टूडियो में एक महीने में 5 से 6 अलबम तैयार होते हैं. एक अलबम में तकरीबन 8 गाने होते हैं. एक आडियोवीडियो 50,000 से ले कर 80,000 हजार रुपए तक में तैयार हो जाता है.

पटना के अलावा हाजीपुर, छपरा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज और रांची में भी ऐसे वीडियो अलबम बनते हैं. बिहार में ऐसे बढ़ते रोजगार को देखते हुए मुंबई व दिल्ली जाने वाले यहां के रहने वाले लोग वापस अपने शहरों को लौट आए हैं.

बेहूदगी का दाग

जिस तेजी से भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, उसी तेजी से इस के गानों पर बेहूदा होने का दाग भी लग रहा है. मजेदार बात यह भी है कि हर कोई दूसरे पर बेहूदगी फैलाने का जिम्मेदार मान रहा है. पर सचाई यह है कि भोजपुरी गानों पर इस तरह के आरोप पुराने समय से ही लगते आ रहे हैं. इन गानों को सुनने वालों का एक बड़ा तबका है.

भोजपुरी फिल्मों की कामयाबी का फार्मूला भी ऐसे गाने ही होते हैं. हर फिल्म में 7 से 8 गाने होते हैं, इन में 1 से 2 आइटम गीत होते हैं. ठीक इसी तरह से वीडियो अलबम में भी बनते हैं. वैसे तो एक अलबम में हर तरह के गाने होते हैं, पर हिट वही होते हैं जो बेहूदा कहे जाते हैं.

यूट्यूब पर ऐसे भोजपुरी गाने ‘हौट सौंग’ के नाम से जाने जाते हैं. इन के नाम भी इसी तरह से रखे जाते हैं. यही नहीं, केला और बैगन तक का इस्तेमाल कर के शब्दों से बेहूदगी फैलाने का पूरा इंतजाम किया जाता है.

वीडियो अलबम के ‘गुदगुदी होता ए राजाजी’, ‘सील टूट जाई’, ‘खुलल इंटरनैट’, ‘डिस्कवरी देखा ए देवरू’, ‘दरदिया उठे ये ननदी’, ‘बाइलेंस ब्लाउज के’, ‘लहंगा में धइले बांटी सर्दी’, ‘जोवन चूसे देवरा’, ‘हमार लहंगा के अंदर वाईफाई बाटे’ जैसे नाम रखे जाते हैं.

गायिका खुशबू उत्तम कहती हैं, ‘‘गाना लिखने वाले ऐसे गानों के बीचबीच में कुछ शब्द डाल देते हैं. जब गाने वाला एतराज करता है तो वह लिखने वाला कहता है कि इसी शब्द में तो गाने का पूरा रस है.’’

दरअसल, ऐसा म्यूजिक बनाने वाले लोग गानों को जल्दी बाजार तक पहुंचा देते हैं जिन को लोग चटकारे ले कर सुनते हैं. लेखक और गायक को फायदा उसी गाने से होता है जिसे लोग मजे ले कर सुनते हैं. केवल अकेले में ही नहीं बल्कि शादीब्याह, बरात और ऐसे तमाम दूसरे मौकों पर भी ऐसे गाने खूब बजते हैं, जिन पर लोग डांस भी करते हैं.

अब ज्यादातर लोग अपने मोबाइल फोन में लोड कर के ऐसे गानों को सुनते हैं. कई ऐसे शब्द होते हैं जो भोजपुरी में खराब लगते हैं पर असल में उन का मतलब ऐसा नहीं होता है. आम भाषा में पति शब्द का प्रयोग किया जाता है, पर जब गाने में पति को भतार कहा जाता है तो यह बुरा लगता है.

जातिगत रिश्तों का जोर

जाति और धर्म के आधार पर भी गायक खूब गाने लिखते हैं. बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादव और भूमिहार बिरादरी के लोग ज्यादा हैं. ऐसे में इन जातियों को ले कर गाने ज्यादा बनने लगे हैं.

आलम राज का गाना ‘अहिरन की जौन हाउ’ और ‘यादवजी के बेटा पीछे पड़ गईल’ जैसे अनेक गाने हैं. पहले इन गानों में ऊंची जातियों में ठाकुर और पंडितों का जोर ज्यादा होता था. गानों के किरदार उसी तरह के बनते थे. फिल्मों की ही तरह गानों में भी दबंगई खूब पसंद की जाती है.

दबंगई के लिहाज से मशहूर जिलों के नाम पर गाने भी बनते हैं. आरा, आजमगढ़ और बलिया के नाम पर गाने खूब बनते हैं.

जानकार लोग बताते हैं कि पहले गायकों में ऊंची जाति के ही लोग आते थे, पर अब पिछड़ी और दलित जातियों के लोग भी गायकी में किसी से पीछे नहीं रहते हैं, जिस से वे अपने समाज पर ज्यादा लिखते हैं.

डांसर का बढ़ा रोल

गानों में आडियो से ज्यादा वीडियो का जोर रहता है. ऐसे में डांसर का रोल अहम हो जाता है. कई गाने आडियो में उतने पसंद नहीं किए जाते जितना वीडियो में पसंद किए जाते हैं. हर गायक को लगता है कि वह एक बार हिट हो जाए तो भोजपुरी गानों के सहारे उस को काम मिलने लगेगा.

वीडियो बनने के बाद ऐसे गाने स्टेज शो पर भी पसंद किए जाते हैं. ऐसे शो 50,000 से 5 लाख रुपए तक में होते हैं.

गानों से केवल गायक ही नहीं वीडियो डांस में भी कैरियर बन गया है. चांदनी सिंह, डिंपल सिंह, प्रिया शर्मा और प्रियंका ऐसे नाम हैं जो डांस के चलते ही रातोंरात चर्चा में आ गए.

निशा पांडेय का नाम तेजी से स्टेज डांसर के रूप में उभरा है. वे भोजपुरी की सपना चौधरी कही जाती हैं. पहले के मुकाबले गायकगायिका बदल गए हैं. पहले के गायक गांव तक सिमटे रहते थे, पर अब वे अपने गानों के ट्रैक रैकौर्ड कर के खुद ही रिलीज कर रहे हैं, जिस से उन को ज्यादा से ज्यादा लोग जानने लगे हैं.

पत्नी के 7 मूलभूत अधिकार

शादी के मंडप पर वरवधू सात फेरे और सात वचन लेते हैं जिस का लब्बोलुआब यह रहता है कि वे एकदूसरे के प्रति ताउम्र निष्ठा रखेंगे, एकदूसरे का ध्यान रखेंगे, सात जन्मों तक साथसाथ रहेंगे. यह अलग बात है कि शादी के 7 माह बाद ही उन में खटपट होने लगती है. दिलचस्प यह है कि इस खटपट को कानून ने ध्यान में रखा है. यदि पहले 7 वर्षों में किसी ब्याहता की मौत किसी भी कारण से होती है तो उस की जांच इस एंगल के आधार पर अवश्य की जाती है कि कहीं उस की मौत का कारण पति या उस की ससुराल वाले तो नहीं हैं. कानून कित्ता दूरदर्शी होता है. लोग केवल सात फेरों, सात वचनों व सात जन्मों के साथ की ही बात करते हैं, वे असल बात भूल जाते हैं कि पत्नी के पहले ही दिन से सात अधिकार और हो जाते हैं. मूलभूत अधिकार केवल संविधान ने न?ागरिकों को ही नहीं दिए हैं, हमारा समाज संविधान से भी ज्यादा दूरदर्शी व ताकतवर है. उस ने पत्नी को प्रथम दिवस ही 7 मूलभूत अधिकार दे दिए हैं. इन्हें ब्याह के बाद के डैरिवेटिव अधिकार भी कह सकते हैं. ये पत्नी होने पर पदेन उस के बटुए में आए अधिकार हैं और कुलमिला कर इन 7 अधिकारों का आउटकम यह होता है कि पति अधिक अधिकार में हो जाता है केवल पत्नी के.

पहला अधिकार : पति अपना दिमाग आले में ताले में रख दें, अब हर छोटीबड़ी बात में दिमाग पत्नी का चलेगा. पति के दिमाग का अब कोई उपयोग नहीं है. हां, यह जड़ न हो जाए, इसलिए 6 माह में एक बार निकाल कर उस का उपयोग करने की अनुमति होगी और यह भी उस की हां में हां मिलाने में. वैसे, अब वह जड़ ही रहे तो ज्यादा बेहतर होगा. हां, आजकल डिजिटल लौकर आ रहे हैं तो पति अपने दिमाग को डिजिटाइज कर के यहां भी रखवा सकता है. मतलब यह है कि आप अपने को बुद्धिमान समझने की गलतफहमी दिमाग से निकाल दें भले ही आप उच्चकोटि के वैज्ञानिक हों या कोई आला अधिकारी. घर में तो अब एक ही महान बुद्धिमान रहेगा.

दूसरा अधिकार : पत्नी के रिश्तेदार पति से ज्यादा अहम हैं. ब्याह के बाद पति के रिश्तेदारों से ज्यादा बड़े व अहम पत्नी के रिश्तेदार होते हैं, इस पर कोई अन्यथा वहम मन में न पाले. यह अधिकार पत्नी से कोई छीन नहीं सकता है. यदि पति का भाई या पिता घर आएं तो वह काम से छुट्टी न ले वरना उस की छुट्टी हो सकती है? लेकिन उस की छुट्टी यहां भी हो सकती है यदि उस ने यह घुट्टी न पी हो कि साले या उस के ससुरजी के आने पर उसे दफ्तर या अपने कामकाज को तुरंत तिलांजलि दे देनी है वरना उस की इज्जत का फालूदा बन उस की श्रद्धांजलि सभा हो जाएगी. यह पत्नी के मूलभूत अधिकार के तहत पति को निभाना ही है.

तीसरा अधिकार : अब आप का बातबात पर अपनी खिंचाई करवाने का अधिकार रहेगा. बात कुछ भी हो सकती है, दफ्तर से आधे घंटे ही सही बिना काम के देर कैसे हुई, सब्जी, फलफूल लाना कैसे भूल गए, दवा कैसे भूल गए. वह बातबात में आप को गरिया भी सकती है और आप को इस का प्रतिकार नहीं करना है. यदि वह गलत है तो भी आप को चुप रहना है और यदि आप सही हैं तो भी आप को चुप ही रहना है. यही दांपत्य जीवन की सफलता का राज है.

चौथा अधिकार : पत्नी के पांव पांव और पति के पैर, मूड तो पत्नी का ही माने रखेगा. पति को अब इश्क, जब पत्नी का मूड हो, तब करना होगा. उस के मूड का ध्यान रखना होगा. यदि वह बोलेगी कि बैठ जाओ तो बैठ जाना चाहिए, यदि वह बोले कि खड़े हो जाओ तो खड़े हो जाना होगा. मूडीज देशों की अर्थव्यवस्था का मूड बताती है लेकिन पत्नी का मूड इश्क के मूड के बारे में बताता है.

5वां अधिकार : सालभर के अंदर आप का कोई ऐसा दोस्त नहीं रहेगा जिसे कि आप जिगरी दोस्त कह सकें. यदि दोस्ती करनी हो तो पत्नी से ही करनी होगी. वही सब से अच्छी दोस्त होगी. बचपन की दोस्ती भूल जाएं, जवानी की भूल जाए, सब भूल जाएं. दोस्तों को एकएक कर के दूध से मक्खी की तरह निकाल दें, इसी में भलाई है. पत्नी तशरीफ लाई हैं तो दोस्त अब जीवन की छांछ हैं और पत्नी मलाई.

छठा अधिकार : अब आप गलतियों के पिटारे रहोगे. बातबात में आप की गलतियां ढूंढ़ी जाएंगी और आप को सिर झुका कर सब चुपचाप सहन करना है, जैसे कि गधा सदियों से करता आया है. आप का काम सिर नीचा करना है और उस का अधिकार है कि सिर ऊंचा कर के आप की नुक्ताचीनी कर आप को गधे से भी नीचे ले आए.

7वां अधिकार : अपनी हौबी को गोली मार दें. यदि आप की कोई ऐसी हौबी है जोकि पत्नी की नहीं है तो आप को पत्नी से पहले कंसल्ट करना पड़ेगा. यदि वह आज्ञा देगी तभी आप उसे जारी रख पाएंगे वरना तो घरगृहस्थी के कारण उसे आप को बायबाय करना होगा, चाहे यह लेख लिखना हो, खेल हो या कुछ भी हो यह उस की हौबी होगी कि वह आप की हौबी के लिए अनुमति देती है कि नहीं. जब सिद्धू राजनीति के लिए कौमेडी शो छोड़ सकता है तो आप खुद की पत्नीजी के लिए अपनी एक सड़ी सी हौबी के लिए काहे को अड़ी का विचार मन में रखते हो, हबी जी.

अब आप ने पत्नी के मूल अधिकार तो सुन ही लिए, तो मैं यह कह सकता हूं कि ये 7 अधिकार, वैसे, आप की कुलमिला कर भलाई के लिए ही हैं. सो, भरसक इन अधिकारों के एबसोल्यूट उपयोग में पत्नी की मदद करें, आप की जिंदगी एक अदद जिंदगी बन कर रह जाएगी. वैसे मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आप पूरा कोऔपरेट कर रहे हैं तभी तो साथ बने हुए हैं. और आप दफ्तर में भी टोटल सबऔर्डिनेशन के ही कारण अच्छे मातहत माने जाते हैं तभी तो समय पर पदोन्नति मिलती है तो पत्नी का भी मातहत ही तो बनने की बात गंगू कर रहा है. इसी में तो दांपत्य जीवन के नित सुकून, सुख, आनंद रूपी पदोन्नति के अवसर छिपे हैं.

रामराज्य : यही गुरु विश्वगुरु बनाएंगे

बाड़मेर के किसान छात्रावास में छात्राओं द्वारा हवनयज्ञ करते हुए देख कर आप को मान लेना चाहिए कि अब रामराज्य का आगाज हो गया है. अब स्कूलों में किताबकौपियों का भारी थैला कंधे पर लाद कर बच्चों को नहीं ले जाना पड़ेगा. इस देश के बड़ेबड़े शिक्षाविद व बुद्धिजीवी काफी समय से गंभीर चिंता जता रहे थे कि नन्हेनन्हे कंधों पर ज्यादा बोझ ठीक नहीं है, लेकिन वे इस का समाधान नहीं खोज पाए.

हमें रामराज्य के आविष्कारी पुरोधाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि अब छात्रावासों में रातरातभर आंखें फाड़ कर बच्चों को पढ़ने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ एक साप्ताहिक यज्ञ किया और बन गए एकदम वैज्ञानिक टाइप समझदार प्रोफैशनल. न किताबों का खर्च, न कौपियों का खर्च. पंडितजी एक शास्त्र ले कर आएंगे और हवनकुंड से निर्मित विशेष चक्रीय वातावरण में बच्चों को बैठा कर उन के दिमाग में डेटा ट्रांसफर कर देंगे. स्कूलों में तो बचपन में हम ने भी खूब चिल्लाचिल्ला कर सरस्वती वंदना की थी. अगर गुरुजी को होंठ हिलते नहीं दिखते थे तो डंडों की बौछार हो जाती थी और अगर जोर से गुरुजी को आवाज सुनाई दे जाती तो वे मुसकरा देते थे. ऐसा लगता जैसे सरस्वती का स्वर व विद्या हमारे बदले गुरुजी के दिमाग में घुस रही हो और गुरुजी को ठंडेठंडे नवरत्न तेल वाली कूलिंग का अनुभव हो रहा हो.

अभी कुछ दिनों पहले बाड़मेर के ही एक स्कूल की प्रार्थना का वीडियो देख रहा था, जिस में गुरुजी हारमोनियम बजा रहे थे. दिल को ऐसा सुकून मिल रहा था कि भई, भाड़ में जाए संविधान व धर्मनिरपेक्षता. हमें तो रामराज्य ही चाहिए. आप खुद सोचो कि छोटेछोटे बच्चे उठ कर हनुमान चालीसा पढ़ें, स्कूलों में तुलसीदास की चौपाइयां गाते लड़केलड़कियां नाचते रहें, शांत फिजाओं में वानर एकाएक उड़ने लग जाएं, बीचबीच में पुष्पक विमान के करतब दिखते रहें, हम घर से बाहर निकलें और आदमी के शरीर पर हाथी का सिर लगे विशेषटाइप के इंसान घूमते नजर आएं तो हमें और क्या चाहिए.

क्या करेंगे वैज्ञानिक शिक्षा से. हर जगह महंगाई का रोना. गाडि़यों के लिए महंगे पैट्रोलडीजल के चक्कर में हमारा तेल निकला जा रहा है. ऐसे में बिना ईंधन के पुष्पक विमान दोबारा उड़ने लगेंगे तो कितनी खुशी की बात होगी. नदियोंसमुद्रों को पार करने के लिए वानरभालू हम इंसानों के लिए पुल बनाएंगे. ग्लोबल वार्मिंग से मुक्ति के लिए हनुमानजी को बोल दें, वे 4-5 दिनों के लिए सूरज को ही गटक जाएंगे.

मालगाडि़यों व ट्रकों में बेतहाशा ईंधन फूंका जा रहा है, सड़कों पर पैसे बरबाद किए जा रहे हैं. आप सोचो, एक हाथ से द्रोणगिरि पर्वत को उठा कर उड़ने वाले हनुमानजी अकेले ही मालढुलाई का काम नहीं कर देंगे. सर्जिकल स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक चीखने की अब जरूरत ही नहीं रहेगी. हनुमानजी अकेले ही इसलामाबाद को आग लगा कर फूंक आएंगे. हथियारों की होड़ में देश का अकूत धन फूंका जा रहा है जबकि हमारे पास महामृत्युंजय जाप से दुश्मनों को खत्म करने वाले पंडितों की भरमार है. इन का उपयोग करेंगे तो पैसों की बचत होगी व हंगर इंडैक्स में शतक मारने की जलालत से इस देश को मुक्ति मिल जाएगी.

रोज मीडिया को हम गालियां देते हैं कि ये बिके हुए लोग हैं. तो सोचो, मीडिया का काम खुद नारदमुनि करने लगेंगे तो विश्वसनीयता में चारचांद लगेंगे कि नहीं. महाभारत वाला संजय बिना डिश के खर्चे के घटनाओं का लाइव टैलीकास्ट करेगा तो कितना मजा आएगा. तोड़नेमरोड़ने और एडिटिंग के सारे आरोपों से मुक्ति मिल जाएगी. बिगड़ते लिंगानुपात से जूझते देश में जब मिट्टी के घड़ों से लड़कियां निकलने लगेंगी तो एक तो हर कुंआरे के लिए पत्नी का इंतजाम हो जाएगा, दूसरा, मेरे जैसे ठालेबैठे व फोन में माथा मार रहे युवा लोग हल ले कर खेतों में जाएंगे तो किसानों की आय दोगुनी तो क्या, दसगुनी हो जाएगी.

अब बाड़मेर वाले गुरु ही इस देश को विश्वगुरु बनाएंगे. दिल्ली ने तो अकर्मण्यता की चादर ओढ़ ली है. ऐसे में वीरों की धरती वाले मरुस्थल के महापुरुष ही इस देश का कल्याण करेंगे.

गैरजिम्मेदार मातापिता और हिंसक बचपन

‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी, मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन…’ पर क्या आज के बच्चों का बचपन इतना सुहाना है कि वे उसे बारबार जीना चाहेंगे? जगजीत सिंह की इस गजल के विपरीत आज तो बच्चों का बचपन कहीं गुम ही हो गया है. आएदिन न्यूज चैनलों व समाचारपत्रों में बच्चों द्वारा परपस्पर एकदूसरे को मारनेपीटने की घटनाएं देखने और पढ़ने को मिलती हैं.

10 वर्षीय अभि ने एक दिन अपने से 2 साल छोटी बहन के हाथ पर इतनी जोर से काटा कि उस के हाथ से खून की धारा बह निकली. कारण सिर्फ इतना था कि बहन ने उस के बैग से स्कैचपैन ले लिए थे. कशिश की 12 वर्षीया बेटी बातबात पर चीखती है, गुस्से में घर का सामान इधरउधर फेंकने लगती है. कई बार तो वह खुद को ही चांटे मारना और बाल खींचना शुरू कर देती है.

दिन पर दिन बच्चे हिंसक होते जा रहे हैं, उन का बचपन खो सा गया है. वे अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. छोटीछोटी बातों पर चीखना, चिल्लाना, हिंसा करना और येनकेनप्रकारेण अपनी बात मनवाना उन की आदतों में शुमार हो चुका है. बच्चों के इस व्यवहार के पीछे उन की मानसिक अस्वस्थता है, जिस के कारण वे स्वयं पर से अपना नियंत्रण खो देते हैं. वे कई बार मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाली कू्ररतम घटनाओं को अंजाम दे देते हैं. यही नहीं, छोटीछोटी घटनाओं से तनाव में आ कर वे स्थायी मानसिक अवसाद तक की अवस्था में चले जाते हैं और कई बार तो अपने जीवन को समाप्त करने के आत्मघाती कदम तक उठाने से पीछे नहीं हटते. बच्चे के इस तरह के व्यवहार के जिम्मेदार उस के मातापिता ही हैं, क्योंकि बच्चे की प्रथम पाठशाला उस का परिवार होता है और उस का अधिकांश समय अपने परिवार में ही व्यतीत होता है. अपनी जीवन की व्यस्ततम आपाधापी में पेरैंट्स कहीं न कहीं वे अपने उत्तरदायित्व को भलीभांति निभा पाने में असफल हैं.

क्या हैं कारण समाज का बदलता स्वरूप : कुछ दशकों में भारतीय समाज में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार ने ले लिया है. बढ़ती महंगाई में अपना लिविंग स्टैंडर्ड कायम रखने के लिए पतिपत्नी दोनों ही जीतोड़ मेहनत करते हैं. परिवार में बच्चों की संख्या एक या दो तक ही सिमट कर रह गई है. परिणामस्वरूप, परिवार में बच्चों का अकेलापन बढ़ गया है और मोबाइल, टीवी, टैब व लैपटौप पर उन की निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गई है.

एकल परिवार होने के कारण मातापिता के औफिस जाने के बाद उन के प्रश्नों का जवाब देने या बातचीत करने वाला कोई नहीं होता. जिस से समाज या किसी व्यक्ति विशेष के प्रति उन के मन में उत्पन्न उचित या अनुचित धारणा स्थायी रूप से अपना स्थान बना लेती है और वे धीरेधीरे मानसिक अस्वस्थता का शिकार होते जाते हैं. मातापिता दोनों ही कामकाजी होते हैं. काम के दबाव के चलते वे बच्चे के मन में चल रही भावनाओं से अनभिज्ञ

रह जाते हैं. भोपाल के मनोचिकित्सक डा. सत्येंद्र त्रिवेदी कहते हैं, ‘‘आजकल एक नया चलन चला है, वीकैंड पर बच्चों को क्वालिटी टाइम देने का, पर क्या है यह क्वालिटी टाइम? बच्चे को तो हर पल अपने मातापिता की आवश्यकता होती है अपनी बातें सुनाने के लिए, अपनी परेशानियां और उलझनें सुनाने के लिए. वीकैंड पर बिताया गया क्वालिटी टाइम हंसीखुशी में बीत जाता है और बच्चे की परेशानियां मन में ही रह जाती हैं.’’

आधुनिक तकनीक : बच्चों के लिए आधुनिक तकनीक वरदान नहीं, अभिशाप है. आज के दुधमुंहे बच्चे टीवी देख या मोबाइल हाथ आते ही रोना बंद कर देते हैं. जिन बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलना चाहिए वे आज टैब, लैपटौप और मोबाइल में आंखें गड़ाए नजर आते हैं. कुछ घरों में बच्चे पूरे दिन टीवी के सामने रिमोट थामे बैठे रहते हैं जबकि हम सभी जानते हैं कि टीवी पर हिंसा, मारपीट और सासबहू के झगड़े ही दिखाए जाते हैं. यहां तक कि कार्टून कैरेक्टर भी हिंसामारपीट से अछूते नहीं हैं. बच्चों को हिंसा, महिलाओं का तिरस्कार, गालीगलौज और खूनखराबे वाले कार्यक्रमों को नहीं देखना चाहिए. बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है. वे जैसा देखते हैं वैसा ही सीखते

भी हैं. 10 वर्षीय आशु और उस की 3 वर्षीया बहन आशी प्रत्येक सीरियल नियमित देखते हैं. 3 वर्षीया वैष्णवी मोबाइल पर गेम खेलने में कईकई घंटे व्यस्त रहती है. यदि इस बीच कोई उस से मोबाइल ले लेता है तो वह जोरजोर से रोना और मारपीट करना शुरू कर देती है.

घरेलू वातावरण : उदिता के पिता को शराब पी कर घर पर मारपीट करने की आदत है. इस से उस का घर हर रोज महाभारत का मैदान बना रहता है. कई परिवारों में अभिभावक बातबात पर आपस में एकदूसरे पर चीखतेचिल्लाते रहते हैं, जिस का सीधा असर बच्चे के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है. ऐसे घरों में बच्चा खुद को अकसर एकाकी महसूस करने लगता है. मातापिता का परस्पर व्यवहार देख कर वह उन से बात तक करने का साहस नहीं कर पाता. मातापिता का व्यवहार देख कर उसे भी दूसरों के साथ हिंसक व्यवहार करने की आदत हो जाती है. मीडिया का रोल : बच्चों द्वारा देश के किसी भी कोने में किसी भी प्रकार का हिंसात्मक व्यवहार किया जाता है, तो मीडिया उस घटना को बारबार और बढ़ाचढ़ा कर बताता है. ऐसे में मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चा इस प्रकार की घटना को एक आदर्श के तौर पर अपने मनोमस्तिष्क में स्थापित कर लेता है.

मातापिता की अपेक्षाएं : आज प्रत्येक मातापिता अपने बच्चे को डाक्टर, इंजीनियर और कलैक्टर बनाना चाहता है. कई बार अभिभावकों द्वारा बच्चे को ऐसे विषय दिला दिए जाते हैं जिन में उस की तनिक भी रुचि नहीं होती. बच्चा जब कक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता तो कक्षा में शिक्षक और घर में मातापिता उस पर बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव बनाने लगते हैं, जिस से वह परेशान होता है. अनीष शुरू से ही पढ़ाई में कमजोर था. 10वीं तक तो किसी तरह काम चल गया परंतु 12वीं में विज्ञान पढ़ना उस के लिए काफी कठिन हो गया. अपनी तरफ से कठोर परिश्रम करने के बाद भी वह लगातार फेल हो रहा था. स्कूल में शिक्षक उस की खिल्ली उड़ाते, घर में मातापिता का व्यवहार तानाशाहीभरा था. अपने मन की बात किसी से न कह पाने के कारण वह तनाव में रहने लगा. तनाव के कारण उसे रात में नींद आनी बंद हो गई. एक माह तक लगातार यही स्थिति रहने के कारण वह सिजनोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी का शिकार हो गया. उस का इलाज चल रहा है.

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अकसर मातापिता को लगता है कि उन का बच्चा कहीं पिछड़ न जाए, इसलिए वे अपने बच्चों को स्कूल के साथसाथ टैनिस, पेंटिंग, डांस और क्ले मौडलिंग जैसी कक्षाओं में भी भेजते हैं. जिस से बच्चे को दो मिनट चैन की सांस तक लेने का वक्त नहीं मिलता. जबकि वास्तव में आज इन कक्षाओं की अपेक्षा बच्चों को भावनाओं, रिश्तों, जीवन मूल्यों की ओर तनावमुक्त जीवन जीने की शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है ताकि वे वर्तमान के साथसाथ अपना भविष्य भी सुखमय बना सकें.

लीक से हट कर चुनें कैरियर

कभी सोचा है कि चाय का स्वाद ले कर खासा पैसा कमाया जा सकता है या परफ्यूम की खुशबू सूंघ कर कैरियर बनाया जा सकता है. पालतू जानवरों की ग्रूमिंग और पपेट्री में भी डिगरीडिप्लोमा हासिल किए जा सकते हैं. एक साइबर हैकर बनने के लिए भी डिप्लोमा कोर्स है. आजकल फ्यूनरल मैनेजमैंट से ले कर साइन लैंग्वेज तक के कोर्स कराए जा रहे हैं. सुनने में ये कोर्स भले ही अजीब लगते हों, लेकिन आज इन्हीं में कैरियर की बढ़ती मांग और पैसा है. यंग जैनरेशन के लिए लीक से हट कर ये कोर्स उन के कैरियर व समय को देखते हुए बैस्ट साबित हो रहे हैं.

एथिकल हैकिंग

हैकिंग ऐक्सपर्ट बन कर आप डिगरी और नौकरी दोनों पा सकते हैं. कई बड़ी कंपनियां एथिकल हैकर्स को सिक्योरिटी के लिए हायर करती हैं. एथिकल हैकर्स कंपनियों की आईटी इन्फौर्मेशन व डाटाबेस को सुरक्षित रखते हैं. सुरक्षा एजेंसियां हैकर्स द्वारा किसी अकाउंट को हैक करा कर गोपनीय जानकारियां इकट्ठा करती हैं. इस से उन्हें अपनी जांच को आगे बढ़ाने या सुबूत जुटाने में मदद मिलती है. इस सब को देखते हुए एथिकल हैंकिंग का कोर्स कैरियर के लिहाज से काफी अहम है.

हैकिंग द्वारा हैकर आप के कंप्यूटर या आप के संबंधित अकाउंट पर पूरी तरह से हावी हो जाता है. इस के बाद उसे आप के डाटा को चुराने या खत्म करने की आजादी मिल जाती है. वाईफाई इंटरनैट कनैक्शन से चलने वाले सिस्टम को हैक करना ज्यादा आसान होता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटर में घुसपैठ की बढ़ती समस्या से निबटने के लिए एथिकल हैकिंग का नया कोर्स कैरियर के लिए विकल्प के तौर पर बेहतरीन मौका बन कर सामने आया है.

साइबर क्राइम का बढ़ना : आज इस कोर्स की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि आएदिन साइबर क्राइम  होते रहते हैं. यह कोर्स नया है, इस के बारे में लोगों को कम जानकारी है. लेकिन इस के विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है. जैसेजैसे लोगों की निर्भरता इंटरनैट पर बढ़ती जा रही है, नैटवर्क सिक्योरिटी एक चुनौती बनती जा रही है. इस लिहाज से आने वाले दिनों में एथिकल हैकर्स की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा होगी. हर कंपनी अपने डाटा को सुरक्षित रखने या प्रतिद्वंद्वी कंपनी की रणनीति को समझने के लिए एथिकल हैकर्स रखने लगी है.

क्या है नया : एथिकल हैकिंग

कोर्स में इंटरनैट से संबंधित तमाम चीजों के बारे में सिखाया जाता है. इस से संबंधित कोर्स में सिक्योरिटी टैस्टिंग की कार्यप्रणाली, स्निफिंग, प्रीविलेज एस्कलेशन, हैकिंग, अटैकिंग नैटवर्क वर्क सिस्टम, हैकिंग वैब ऐप्लिकेशन, क्रौस साइट स्क्रिप्टिंग, ब्रेकिंग आईपी, सिस्टम हैकिंग, पासवर्ड क्रैकिंग आदि से संबंधित जानकारी दी जाती है.

स्पा मैनेजमैंट

जब से लोगों ने अपनी हैल्थ और फिटनैस पर ध्यान देना शुरू किया है, स्पा बिजनैस में काफी बूम आया है. अब थ्रीस्टार और फाइवस्टार हौस्पिटैलिटी के कई स्पा खुल गए हैं. लिहाजा, ऐक्सपर्ट स्पा मैनेजरों की मांग बढ़ गई है. इन का काम पूरे स्पा को बेहतर तरीके से संभालना होता है. एक स्पा मैनेजर को स्टाफ पर नजर रखने के अलावा और्डर की सप्लाई, क्लाइंट्स को अच्छी सर्विस देने व स्पा में अधिक से अधिक लोगों को सर्विस लेने के लिए आने को प्रोत्साहित करना होता है. इस के अलावा, वह स्पा के लिए कुछ मार्केटिंग ऐक्टिविटीज व मार्केटिंग प्लानिंग्स में भी हिस्सा लेता है.

स्किल्स : आप का कंप्यूटरसेवी होने के साथ स्ट्रौंग कम्युनिकेशन स्किल व इंटरपर्सनल स्किल भी बेहतर होनी चाहिए. इतना ही नहीं, आप को पूरे स्पा को मैनेज करना होता है, इसलिए आप के भीतर और्गनाइजेशन स्किल भी अच्छी होनी चाहिए. आप को न सिर्फ अपने यहां कार्यरत लोगों की क्षमताओं को पहचानना आना चाहिए, बल्कि उन की क्षमताओं के हिसाब से उन से बेहतर काम करवाना भी आना चाहिए.

संभावनाएं : एक स्पा मैनेजर पार्टटाइम, फुलटाइम या कौन्ट्रैक्ट के आधार पर भी काम कर सकता है. स्पा मैनेजर की आवश्यकता होटल, रिसौर्ट, हैल्थ क्लब, क्रूज शिप या चिकित्सकीय सैलून आदि में होती है. एक स्पा मैनेजर विदेशों में जौब के लिए भी अप्लाई कर सकता है.

फोटोनिक्स

फोटोनिक्स का कोर्स आम साइंस के कोर्सों से हट कर है. जब से टैली कम्युनिकेशन का क्षेत्र बढ़ा है तब से कंप्यूटिंग, सिक्योरिटी समेत और भी कई कार्यप्रणालियों में फोटोनिक्स मुख्य तकनीक बन गई है. इस तकनीक का इस्तेमाल इमेजिंग, चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवा, प्रतिरक्षा, औप्टिक्स व इलैक्ट्रौनिक्स, बायोटैक्नोलौजी,  चिकित्सा विज्ञान, सर्जरी, माइक्रोबायोलौजी और लाइफसाइंस में भी होता है.

कैसे मिलेगी ऐंट्री : देश के कई प्रमुख शिक्षण संस्थान फोटोनिक्स कोर्स की शिक्षा देते हैं. भौतिकी, रसायन और गणित विषय के साथ 12वीं की परीक्षा न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण कैंडिडेट्स फोटोनिक्स ऐंड औप्टोमेट्रिक्स के ग्रेजुएशन कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं.

इस के अलावा, आप डिप्लोमा कोर्स में भी एंट्री ले सकते हैं. डिप्लोमा कोर्स करने के बाद आप फोटोनिक्स टैक्नीशियन बन सकते हैं. वैसे द्विवर्षीय टैक्नीशियन प्रोग्राम के जरिए भी फोटोनिक्स टैक्नीशियन बना जा सकता है.

पर्सनल स्किल : यदि आप इस में कैरियर बनाना चाहते हैं तो जरूरी है कि इस क्षेत्र में होने वाली नईनई गतिविधियों पर सतत निगाह रखें और ज्यादा से ज्यादा सीखने की कोशिश करें. आप की फिजिक्स व मैथमेटिक्स अच्छी होनी चाहिए. इस में इंस्ट्रूमैंट डिजाइन करने पड़ते हैं, लिहाजा क्रिएटिव होना भी जरूरी है.

कहां है नौकरी : इस क्षेत्र के विशेषज्ञ साइंटिस्ट के तौर पर भी काम कर सकते हैं. उन्हें फोटोनिक्स पर शोध का काम करना होता है. फोटोनिक्स इंजीनियर चाहें तो किसी अनुभवी इंजीनियर के सहायक बतौर अपना कैरियर शुरू कर सकते हैं. योग्यता और अनुभव के आधार पर आप आगे चल कर रिसर्च डायरैक्टर या प्रिंसिपल इंजीनियर भी बन सकते हैं.

कहां से करें : इंडियन इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी, मुंबई, नई दिल्ली, मणिपाल एकेडमी औफ हायर एजुकेशन, इंटरनैशनल स्कूल औफ फोटोनिक्स, कोचीन, सैंटर फौर एडवांस टैक्नोलौजी (केट), इंदौर, भाभा एटौमिक रिसर्च सैंटर, मुंबई, इंडियन इंस्टिट्यूट औफ साइंस, बेंगलुरु आदि संस्थानों से यह कोर्स किया जा सकता है.

पपेट्री

राजस्थान की लोककथाओं से निकल कर अब पपेट शो मौडर्न रंगढंग में रंग गए हैं. लगातार सरकारी उपेक्षा व उचित स्थान न मिलने के कारण यह कला धीरेधीरे लुप्त होने के कगार पर थी. लेकिन कई युवा थिएटर कलाकारों और कलाप्रेमियों ने इस कला को मौडर्न व एक कोर्स के रूप में शुरू करने का प्रयास किया है ताकि यह कला जिंदा रहे. इसे सीखने में सिर्फ उसी का मन रम सकता है जिस में क्रिएटिविटी हो और हर चीज को अलग नजरिए से देखता हो. किड्स इंटरटेनमैंट चैनलों और विज्ञापन एजेंसियों में इन की मांग हमेशा रहती है. लिज्जत पापड़ का वह खरगोश आज भी लोगों को याद है, वह पपेट का पहला विज्ञापन प्रयोग था.

कहां से करें : मुंबई यूनिवर्सिटी और कोलकाता पपेट थिएटर पपेट्री में सर्टिफिकेट कोर्स कराते हैं.

टी टेस्टिंग

अगर चाय पीने के शौकीन हैं तो टी टैस्टर बनना आप के लिए अच्छा कैरियर औप्शन हो सकता है. टी टैस्टर का काम अलगअलग चाय के स्वादों में अंतर समझना और टीलीफ, ग्रेड्स, कलर के बारे में जानकारी हासिल करना होता है. बेंगलुरू का इंडियन इंस्टिट्यूट औफ प्लांट मैनेजमैंट अपने सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए टी मार्केटिंग, टी बिजनैस, टी टैस्टिंग तकनीक के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देता है और डिप्लोमा व डिगरी दोनों कोर्स कराता है. यह कोर्स टी बोर्ड और वाणिज्य मंत्रालय के सहयोग से कराया जाता है. असम का डिप्रास इंस्टिट्यूट औफ प्रोफैशनल्स भी डिगरीडिप्लोमा कोर्स कराता है.

इमेज कंसल्टिंग

आप को ग्लैमर इंडस्ट्री के प्रति लगाव है तो इमेज कंसल्टैंट के तौर पर अपना कैरियर बना सकते हैं. फैशन और कम्युनिकेशन डिगरी से मिलतेजुलते इस सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए आप को कौर्पोरेट और फिल्म इंडस्ट्री में बड़ी आसानी से हाईप्रोफाइल जौब मिल सकता है. इस कोर्स में आप को इमेज, स्टाइल, एटिकेट, कंडक्ट, लैंग्वेज और बिहेवियर जैसे जरूरी टौपिक्स के बारे में ट्रेनिंग दी जाती है और फिर आप टौप पर्सनैलिटीज की इमेज बनाने में उन की मदद करते हैं.

पैट ग्रूमिंग

आप पैसा कमाने के साथ यदि जानवरों के साथ भी कुछ वक्त बिताना चाहते हैं तो पैट ग्रूमिंग में कैरियर बना सकते हैं. आजकल लोग अपने पालतू जानवरों की देखभाल के पीछे काफी पैसा खर्च करने को तैयार हैं. लोग ऐसे प्रोफैशनल्स की तलाश में रहते हैं जो उन के पैट्स को अच्छी तरह से शेप में रखें. साथ ही, पैट शोज और कंपीटिशंस भी काफी बढ़ गए हैं, इस को देखते हुए भी पैट ग्रूमर्स की डिमांड बढ़ गई है. यही वजह है कि कई वेटेरिनरी कालेज और टौप ग्रूमिंग इंस्टिट्यूट में इस के डिगरी कोर्सेज उपलब्ध हैं.

म्यूजिओलौजी

जिन की रुचि हिस्ट्री में है या जिन का दिमाग हमेशा एंटीक चीजों की तलाश व जानकारी जुटाने में लगा रहता है, म्यूजिओलौजी स्टडी उन के कैरियर के लिए बहुत अच्छा कदम साबित होगी. इस में आर्कियोलौजी, म्यूजियम मैनेजमैंट ऐंड कल्चर की जानकारी दी जाती है. नैशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट औफ हिस्ट्री ऐंड आर्ट, कन्वर्सेशन ऐंड म्यूजिओलौजी, नई दिल्ली कई कोर्स चलाते हैं. कोलकाता यूनिवर्सिटी भी एमए और एमएससी की डिगरी देती है.

बैचलर औफ रूरल स्टडी

भारत की आधी से ज्यादा आबादी जहां रहती है और आप उस से प्यार करते हैं तो बैचलर औफ रूरल स्टडी का कोर्स आप के लिए सब से अच्छा साबित होगा. इस कोर्स में एग्रीकल्चर, चाइल्ड डैवलपमैंट, रूरल मैनेजमैंट, कम्युनिटी डैवलपमैंट आदि विषय शामिल रहते हैं. गुजरात, उत्तर प्रदेश के कालेज डिप्लोमा कोर्स कराते हैं. भावनगर, यूनिवर्सिटी रूरल स्टडी में बैचलर और मास्टर डिगरी भी देती है.

जेरैंटोलौजी

उम्र बढ़ने पर साइकोलौजिकल और बायोलौजिकल क्या प्रभाव होते हैं, जेरैंटोलौजी में इस का अध्ययन किया जाता है. कई ओल्डएज होम और प्राइवेट व सरकारी हैल्थ सैक्टर्स में ऐसे पेशेवरों की मांग रहती है. आज कई ऐसे नर्गिंसहोम और हौस्पिटल हैं जो बुजुर्ग के इलाज और केयर के लिए जेरैंटोलौजी में डिगरी लेने वाले की तलाश में रहते हैं. इंस्टिट्यूट औफ होम इकोनौमिक्स नई दिल्ली, राम नारायण रुइया कालेज मुंबई, कोलकाता मैट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट औफ जेरैंटोलौजी में डिगरी और सर्टिफिकेट कोर्स करवाते हैं.

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