रोटी बैंक, ताकि कोई भूखा न रहे

जीवन में जन्म और मृत्यु निश्चित है और कहते हैं कि हर इंसान के जन्म से पहले ही उस का प्रारब्ध लिख दिया जाता है. हम नहीं जानते कि इस में कितनी सचाई है, परंतु इतना अवश्य है कि इंसान अपनी मूलभूत आवश्यकताओं ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के लिए हमेशा संघर्ष करता है. जिस के पास ये तीनों चीजें जरूरत से ज्यादा हैं, वह अमीर कहलाता है, किंतु कुछ के पास 2 हैं तो वे ठीकठाक जिंदगी बिताते हैं, परंतु बहुत से लोग हमारे समाज में ऐसे भी हैं जिन के पास पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी तक उपलब्ध नहीं है. इन्हीं बातों को मद्देनजर रखते हुए राजकुमार भाटिया व उन के साथियों ने एक खास पहल की और उस पहल का नाम दिया ‘रोटी बैंक… ताकि कोई भूखा न रहे.’

उन्हें यह प्रेरणा तब मिली जब 2015 में एक दिन उन के पास एक व्यक्ति काम मांगने आया. राजकुमार भाटिया बताते हैं कि उस समय वे उसे कोई काम नहीं दे सकते थे. उन्होंने उसे कुछ पैसे देने चाहे, परंतु उस व्यक्ति ने पैसे लेने से इनकार कर दिया और बोला, ‘मुझे पैसे नहीं चाहिए, हो सके तो मुझे खाना खिला दीजिए.’

उन्होंने उसे खाना खिला दिया. परंतु उन के मन को यह बात कचोटती रही कि इंसान कितना मजबूर हो जाता है जब उस के पास पेट भरने के लिए दो रोटी भी नहीं होती और वह मांगने पर मजबूर हो जाता है. ऐसे अनेक लोग होंगे जो दो जून की रोटी को तरसते होंगे. फिर उन्होंने अपने मित्र सुधीर से बात की और रोटी बैंक शुरू किया. एक सफेद डब्बे पर ‘रोटी बैंक’ लिख कर रखा गया और इस तरह से इस कार्य की शुरुआत हुई. फिर एक के साथ एक लोग जुड़ते चले गए और कारवां बन गया.

रोटी बैंक टीम का कहना है, ‘‘रोटी बैंक एक प्रयोग है, एक साधना है, एक प्रयास है बढ़ रही सामाजिक गैरजिम्मेदारी को कम करने का. रोटी बैंक एक संघर्ष है भूख के विरुद्ध. रोटी बैंक एक मकसद है सेवा का, मानवता का. रोटी बैंक एक बैंक है जहां पैसा जमा नहीं होते, जहां जमा होती हैं रोटियां. रोटी बैंक एक कोशिश है, साधनसंपन्न लोगों को प्रेरित करने का कि वे अपनी रोटियों के साथ 2 रोटियां एक जरूरतमंद के लिए भी बनवाएं और उसे अपने आसपास की रोटी बैंक शाखा में जमा करवाएं जहां से उन रोटियों को भूख से संघर्ष कर रहे लोगों तक पहुंचाया जा सकें.’’

जानीमानी एंकर रिचा अनिरुद्ध, जो 92.5 एफएम में कार्यरत हैं, ने इस टीम से संपर्क किया और इस मुहिम को अपने कार्यक्रम के जरिए आम व खास लोगों तक पहुंचाया. हालांकि रोटी बैंक की टीम प्रचार नहीं चाहती थीं परंतु जनजन तक इस मुहिम को पहुंचाने के लिए कोई न कोई माध्यम तो चाहिए ही था. फिर एक दैनिक समाचारपत्र ने इन की मुहिम को छापा. इस तरह से लोग रोटी बैंक से जुड़ते चले गए.

रोटी बैंक की टीम ने स्कूलों से भी जुड़ना शुरू किया. आज दिल्ली के 9 स्कूल इस मुहिम से जुड़े हुए हैं. रोटी बैंक की टीम ने एक स्कूल में जा कर सुबह की प्रार्थना के दौरान रोटी बैंक के बारे में सब को बताया और बच्चों को प्रेरित किया ताकि वे अपने लंच के साथ एक पैकेट खाना उन बच्चों के लिए बनवाएं जो अभावग्रस्त हैं और जरूरतमंद हैं. इस तरह स्कूल भी इस मुहिम से जुड़ते चले गए.

स्कूलों के माध्यम से रोटी बैंक कपड़े, किताबकौपियां एकत्रित कर के रोटी बैंक से लाभान्वित बच्चों को शिक्षा प्रदत्त करवाने का प्रयास भी कर रहा है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.

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रोटी बैंक के लिए यह बहुत गौरवशाली क्षण था जब 30 अप्रैल, 2017 को प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में रोटी बैंक के युवा कार्यकर्ताओं की सराहना की.

इस संस्था द्वारा अब तक रोटी बैंक के 63 सैंटर खोले जा चुके हैं जो इस कार्य में लगे हुए हैं. हर सैंटर से रोज खाना एकत्रित करना, फिर उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना अपनेआप में यह कार्य आसान नहीं है, परंतु बस, टीम की निष्ठा ने इस कार्य को कर दिखाया है.

एक बाल सुधार गृह में 300 से 400 पैकेट खाना रोज भेजा जा रहा है. सप्ताह में 2 दिन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के बाहर दूरदूर से आए मरीजों के परिजनों को भोजन (रोटी पैकेट्स) पहुंचाने की भी व्यवस्था है.

आज तक एक दिन में 3,890 पैकेट बांटे गए हैं, यह एक दिन की अधिकतम संख्या है. 3 रोटी, साथ में अचार या सूखी सब्जी, यह एक पैकेट का निश्चित भोजन है जो किसी व्यक्ति की एक वक्त की भूख को शांत कर देता है. 31 दिसंबर, 2017 तक 5 लाख 58 हजार लोगों को रोटी बैंक द्वारा सम्मानपूर्वक भोजन करवाया जा चुका है. कूड़ा बीनने वाले बच्चों, स्कूल जाने वाले बच्चों और मजदूरों के बच्चों को खाना बांटा जाता है. नशा करने वालों और मंदिर के बाहर बैठ कर मांगने वालों को यह खाना नहीं दिया जाता.

कुछ लोग और कुछ वृद्ध ऐसे भी हैं जिन के पास सबकुछ है, परंतु देखभाल करने वाला, खाना खिलाने वाला कोई नहीं है, तो उन के लिए टिफिन भेजा जाता है, जो पूर्णतया गोपनीय रहता है ताकि उन के सामाजिक सम्मान में कमी न आ पाए. नई दिल्ली के महिंद्रा पार्क में झुग्गी के साथ घर में रह रहे दोनों पतिपत्नी घुटने की वजह से चलनेफिरने से लाचार थे, राजकुमार भाटिया उन का टिफिन खुद पहुंचाते थे. जब आसपास के लोगों को पता चला तो उन लोगों ने उस दंपती के खाने की जिम्मेदारी ली.

सार्थक कार्य

जब मन में सेवाभाव हो, तो लोग अपनेआप जुड़ जाते हैं. रोटी बैंक टीम के वौलंटियर्स फोटो और प्रचार से परहेज करते हैं और अपने काम को स्थिर भाव से अंजाम देते हैं. किसी भी पोस्टर, बैनर या पोस्ट पर इन के फोटो उपलब्ध नहीं हैं.

इस टीम का कहना है कि वह कभी किसी से चंदा या धनराशि नहीं लेगी. जितना भी करेगी अपने ही बलबूते पर करेगी. ‘रोटी बैंक’ इफरा यानी इंडियन फूड रिकवरी अलाएंस में साझीदार है. यह भारत सरकार का एक अभियान है, जिसे एफएसएसएआई यानी खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा संचालित किया जा रहा है.

रोटी बैंक बचा हुआ खाना नहीं लेता और यह टीम बीचबीच में खाना खा कर चैक करती है कि यह खाना ताजा है और खाने लायक है या नहीं.

किसी भी बड़े कार्य को शुरू करना तो आसान होता है परंतु उस का निरंतर प्रबंधन करना मुश्किल होता है. जब किसी की एक सार्थक पहल किसी दूसरे के मन को छू ले और सज्जन शक्तियां जब एकसाथ हो जाती हैं तो कार्य पूर्ण होने लगते हैं. रोटी बैंक के साथ ऐसा ही हुआ है और हो रहा है.

सिंगल्स को घर मिलना आसान नहीं

अरुणाचल प्रदेश से रिनी मुंबई पढ़ने आई. उसे अंदाजा नहीं था कि मुंबई में पेइंगगैस्ट बन कर रहना इतना कठिन होगा. वह अपना अनुभव शेयर करते हुए बताती है, ‘‘मैं अकेली रह रही थी. शहर में किसी को भी नहीं जानती थी. मुझे किचन के इस्तेमाल करने की मनाही थी और फ्रिज लौक्ड रहता था. लैंडलेडी की बेटी कभी भी गैस मीटर, बाथरूम, अलमारी चैक करने आ जाती थी. मैं अपने किसी भी फ्रैंड को कमरे में नहीं बुला सकती थी. कमरे में टीवी, वाईफाई कुछ नहीं था.

‘‘मैं काफी बोर होती थी. मैं ने अपने पापा से लैपटौप भेजने को कहा. एक दिन मेरे पिता के फ्रैंड ही मुझे लैपटौप देने मुंबई आ गए और मुझे डिनर के लिए ले गए. उस के बाद जो हुआ, मैं कभी भूल नहीं पाऊंगी. उस लेडी ब्रोकर ने, जिस ने मुझे यह घर दिलवाया था, फोन कर के कहा, ‘तेरे जैसी लड़कियों को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं. किस आदमी को घर पर बुलाया था. यह इज्जतदार लोगों का घर है. धंधा ही करना है तो कहीं और जाओ.’ उस के ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं और मैं बहुत तकलीफ महसूस करती हूं.’’

सिंगल लोगों को चाहे वे पढ़ने आए हों या नौकरी करने, अपने सिंगल होने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है. ‘भले ही हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं, लेकिन इस समाज में महिलाओं को घर ढूंढ़ने से ज्यादा आसान है कोई नौकरी ढूंढ़ लेना.’

एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम करने वाली ऋचा शर्मा कहती हैं,

‘‘4 साल से जब भी किराए पर मकान देखने जाती हूं, हाउसिंग सोसायटी के लोग मेरे प्रोफैशन पर अजीब प्रतिक्रिया देते हैं. मैं मीडिया इंडस्ट्री से हूं, इसलिए उन्हें यही लगता है कि मैं सिगरेट, ड्रिंक, ड्रग्स का सेवन करती हूं और लड़के भी मेरे घर आते होंगे आदि. यह हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं?’’

सिंगल और यंग वर्किंग वीमन को ही घर मिलने में कठिनाई नहीं होती, आश्चर्य इस बात का है कि बुजुर्ग लोगों को भी घर मिलना आसान नहीं है.

नासिक निवासी श्रेया हासे बताती हैं, ‘‘उन की 55 वर्षीय मां को उन की उम्र ‘ठीक’ न बताते हुए घर के अंदर जाने ही नहीं दिया गया.

‘‘मेरी मां 30 सालों से टीचर हैं. मुंबई के अंधेरी इलाके में उन्होंने ब्रोकर से बात कर ली थी. उन्हें 3 अन्य लड़कियों के साथ घर शेयर करना था. वे लड़कियां भी अपनी मां की उम्र जैसी महिला के साथ रूम शेयर करने में खुश थीं. मेरी मां ने पूरी पेमैंट कर दी थी, लेकिन घर पहुंचने पर ब्रोकर ने उन्हें घर में नहीं घुसने दिया. उस ने कहा कि वे उम्र के मापदंड पर खरी नहीं उतरतीं और दूसरी लड़कियों को बिगाड़ सकती हैं. वे अपना पूरा सामान लिए घर के बाहर ही खड़ी रहीं. आखिर में उन्हें अपनी किसी फ्रैंड के घर जाना पड़ा.’’

घर ढूंढ़ने की परेशानी सिर्फ महिलाओं को ही नहीं होती, 30 वर्षीय विनोद निगम, जो मार्केटिंग मैनेजर हैं, का अनुभव भी कुछ अलग ही है. वे कहते हैं, ‘‘घर देखने जाएं तो इतने पर्सनल सवाल कौन पूछता है. जब मैं घर ढूंढ़ रहा था, मकानमालिक ने तो मुझ से यह भी पूछ लिया कि मैं पोर्न तो नहीं देखता या लड़कियां घर पर तो नहीं आएंगी. मैं नौनवेज तो नहीं खाता क्योंकि मेरी ये आदतें सोसायटी के बच्चों को बिगाड़ सकती हैं.’’

सिंगल होना या दूसरे धर्म का होना भी मुश्किल बढ़ा देता है. सना शेख दिल्ली व बेंगलुरु में रहने के बाद अभी हाल ही में मुंबई शिफ्ट हुई हैं. लेकिन अभी तक उन्हें घर नहीं मिल पाया है. कारण? वह सिर्फ सिंगल वर्किंग लेडी ही नहीं बल्कि मुसलिम भी हैं.

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सना कहती हैं, ‘‘मैं ने कई घर औनलाइन देखे पर मकानमालिक ने बड़ी रुखाई से कहा कि वे अपना घर किसी मुसलिम को नहीं दे सकते.’’

आजम, जो आईटी फर्म में काम करते हैं, पिछले साल ही कुवैत से मुंबई आए थे. उन्हें लगता था कि शहर में यंग पौपुलेशन बहुत बड़ी संख्या में है, पर यहां अकेले रहने वालों के लिए घर की परेशानी देख कर बहुत हैरान हुए. वे कहते हैं, ‘‘सिंगल और ऊपर से मुसलिम, यह देख कर बड़ी कोफ्त हुई कि मकान किराए पर देने में मेरे धर्म से क्या आपत्ति हो सकती है.’’

आज की युवापीढ़ी चाहे लड़का हो या लड़की, दूसरे शहरों में जा कर अकेले रह कर पढ़ने या जौब करने की हिम्मत रखती है, वह समाज के ढांचे में फिट नहीं बैठ पाती. छोटे शहर हों या महानगर, स्थिति तकरीबन सब जगह एकसी ही है. समाज को इस के प्रति अपना रवैया बदलने की जरूरत है.

खूनी बन गई झूठी मोहब्ब्त

19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत कौर अपने पति हरजिंदर सिंह से यह कहते हुए घर से निकली थी कि उस के मायके में किसी की तबीयत खराब है, इसलिए वह राहुल को ले कर वहां जा रही है. पत्नी की यह बात सुन र हरजिंदर ने कहा, ‘‘ठीक है, हो आओ. ज्यादा परेशानी वाली बात हो तो तुम मुझे फोन कर देना. मैं भी पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘हां, तुम्हारी जरूरत हुई तो फोन कर दूंगी और कोई ज्यादा चिंता वाली बात नहीं हुई तो 2 दिन में वापस लौट आऊंगी.’’ कमलप्रीत बोली.

मूलरूप से पंजाब के जिला पटियाला के गांव बल्लोपुर की रहने वाली थी कमलप्रीत. करीब 12 साल पहले जब वह 19 बरस की थी, तब उस की शादी हरियाणा के गांव गणौली के रहने वाले हरजिंदर सिंह से हुई थी. यह गांव जिला अंबाला की तहसील नारायणगढ़ के तहत आता है.

शादी के ठीक एक साल बाद कमलप्रीत ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम राहुल रखा गया. इन दिनों वह गांव के सरकारी स्कूल में 5वीं कक्षा में पढ़ रहा था.

हरजिंदर का अपना खेतीबाड़ी का काम था, जिस में वह काफी व्यस्त रहता था. कमलप्रीत घर पर रहते हुए चौकेचूल्हे से ले कर सब कम संभाले हुए थी. जो भी था, सब बड़े अच्छे से चल रहा था. पतिपत्नी में खूब प्यार था. दोनों में अच्छी अंडरस्टैंडिंग भी थी. दोनों अपने बच्च् ों का भी सलीके से ध्यान रखे हुए थे. काफी दिनों से राहुल पिता से कहीं घुमा लाने की जिद कर रहा था तो पिता ने उस से पक्का वादा किया था कि वह उस के इम्तिहान खत्म होने के बाद उसे 2 दिन के लिए घुमाने शिमला ले चलेगा.

मगर पेपर खत्म होने के अगले रोज ही उसे अपनी मां के साथ नानी के यहां जाना पड़ गया. पत्नी के मायके जाने वाली बात पर हरजिंदर को कोई परेशानी वाली बात नहीं थी. पति की निगाह में कमलप्रीत एक सुलझी हुई मेहनती औरत थी, जो ससुराल के साथसाथ अपने मायके वालों का भी पूरा ध्यान रखती थी.

सुखदुख में वह अपने अन्य रिश्तेदारों के यहां भी अकेली आयाजाया करती थी. कुल मिला कर बात यह थी कि हरजिंदर को पत्नी की तरफ से कोई चिंता नहीं थी. इसलिए जब वह 19 मार्च को बेटे के साथ मायके के लिए घर से अकेली निकली तो हरजिंदर ने कोई चिंता नहीं की.

उसी रोज शाम के समय हरजिंदर ने पत्नी को यूं ही रूटीन में फोन कर के पूछा, ‘‘हां कमल, पहुंचने में कोई परेशानी तो नहीं हुई? बल्लोपुर पहुंच कर तुम ने फोन भी नहीं किया?’’

‘‘हांहां…वो ऐसा है कि अभी मैं बल्लोपुर नहीं पहुंच पाई.’’ कमलप्रीत बोली तो उस की आवाज में हकलाहट थी.

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पत्नी की ऐसी आवाज सुन कर हरजिंदर को थोड़ी घबराहट होने लगी. उस ने पूछा, ‘‘बल्लोपुर नहीं पहुंची तो फिर कहां हो?’’

‘‘अभी मैं शहजादपुर में हूं. किसी जरूरी काम से मुझे यहां रुकना पड़ गया.’’ कमलप्रीत ने पहले वाले लहजे में ही जवाब दिया.

‘‘शहजादपुर में ऐसा क्या काम पड़ गया तुम्हें? वहां तुम किस के यहां रुकी हो? सब ठीक तो है न? बताओ, कोई परेशानी हो तो मैं भी आ जाऊं क्या?’’

‘‘सब ठीक है, घबराने वाली कोई बात नहीं है. अच्छा, मैं फ्री हो कर अभी कुछ देर बाद फोन करती हूं. तब सब कुछ विस्तार से भी बता दूंगी.’’ कहने के साथ ही कमलप्रीत की ओर काल डिसकनेक्ट कर दी गई.

लेकिन हरजिंदर की घबराहट बढ़ गई थी. उस ने कमलप्रीत का नंबर फिर से मिला दिया. पर अब उस का फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

अचानक यह सब होने पर हरजिंदर का फिक्रमंद हो जाना लाजिमी था. कुछ नहीं सूझा तो उस ने उसी समय अपनी ससुराल के लैंडलाइन नंबर पर फोन किया. यहां से उसे जो जानकारी मिली, उस से उस के पैरों तले की जमीन सरक गई. ससुराल से उसे बताया गया कि यहां तो घर में कोई बीमार नहीं है और न ही कमलप्रीत के वहां आने की किसी को कोई जानकारी थी.

अब हरजिंदर के लिए एक मिनट भी रुके रहना संभव नहीं था. उस ने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और शहजादपुर की ओर रवाना हो गया. रास्ते भर वह कमलप्रीत को फोन भी मिलाता रहा था, पर हर बार उसे फोन के स्विच्ड औफ होने की ही जानकारी मिलती रही.

आखिर वह शहजादपुर जा पहुंचा. पत्नी और बच्चे की तलाश में उस ने उस गांव का चप्पाचप्पा छान मारा मगर पत्नी और बेटे राहुल के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. वहां से वह मोटरसाइकिल से ही अपनी ससुराल बल्लोपुर चला गया. कमलप्रीत को ले कर वहां भी सब परेशान हो रहे थे.

इस के बाद तो हरजिंदर सिंह और उस की ससुराल वालों ने कमलप्रीत व राहुल की जैसे युद्धस्तर पर तलाश शुरू कर दी. मगर कहीं भी दोनों मांबेटे के बारे में जानकारी हाथ नहीं लगी.

19 मार्च, 2018 का दिन तो गुजर ही गया था, पूरी रात भी निकल गई. 20 मार्च को भी दोपहर तक तलाश करते रहने के बाद सभी निराश हो गए तो हरजिंदर शहजादपुर थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को उस ने पत्नी और बेटे के रहस्यमय तरीके से गायब होने की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने कमलप्रीत और उस के बेटे राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अपने स्तर से दोनों मांबेटे को ढूंढने की काररवाई शुरू कर दी.

देखतेदेखते इस बात को एक सप्ताह गुजर गया, मगर पुलिस भी इस मामले में कुछ कर पाने में असफल रही.

बात 26 मार्च, 2018 की थी. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह उस वक्त अपने औफिस में थे. तभी एक अधेड़ उम्र के शख्स ने उन के सामने आ कर दोनों हाथ जोड़ते हुए दयनीय भाव से कहा, ‘‘सर, मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं यमुनानगर में रहता हूं.’’

‘‘जी हां, कहिए.’’ शैलेंद्र सिंह बोले.

‘‘अब क्या कहूं सर, एक भारी मुसीबत आन पड़ी है हमारे परिवार पर.’’

‘‘हांहां बताइए, क्या परेशानी है?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

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‘‘सर, मेरा एक भांजा है नीटू. उम्र उस की करीब 21 साल है. किसी बात पर उस का एक औरत से झगड़ा हुआ और हाथापाई में वह औरत मर गई. उस ने उस की लाश को कहीं ले जा कर दफन कर दिया. जब इस की जानकारी मुझे हुई तो हम ने उसे समझाया कि गलती हो जाने पर कानून से आंखमिचौली खेलने के बजाय पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना ही बेहतर होगा.’’ ओमप्रकाश ने बताया.

इस पर एकबारगी तो शैलेंद्र सिंह चौंके. फिर खुद को संभालने का प्रयास करते हुए बोले, ‘‘मतलब यह कि आप के भांजे ने किसी की जान ली, फिर उस की लाश भी ठिकाने लगा दी. अब सरेंडर का प्रस्ताव लेकर आए हो. तो यह भी बता दो कि किन शर्तों पर सरेंडर करवाओगे?’’

‘‘कोई शर्त नहीं सर. लड़का आप के सामने तो अपना अपराध कबूलेगा ही, अदालत में भी ठीक ऐसा ही बयान देगा. भले उसे कितनी भी सजा क्यों न हो जाए. बस आप से हमें सिर्फ इतना सहयोग चाहिए कि थाने में उस पर ज्यादा सख्ती न हो.’’ ओमप्रकाश ने कहा.

‘‘देखो, अगर वह हमें सहयोग करते हुए सच्चाई बयान करता रहेगा तो हमें क्या जरूरत पड़ी है उस से सख्ती से पेश आने की. जाओ, लड़के को ला कर पेश कर दो. यदि वह सच्चा है तो यहां उस के साथ किसी तरह की ज्यादती नहीं होगी.’’

‘‘ठीक है सर, मैं समझ गया. लड़का थाने के बाहर ही खड़ा है. मैं अभी उसे ला कर आप के सामने पेश करता हूं.’’ कहने के साथ ही ओमप्रकाश बाहर गया और थोड़ी ही देर में एक लड़के को ले कर थाने में आ गया.

‘‘यही है मेरा भांजा नीटू, सर.’’ उस ने बताया.

जिस वक्त ओमप्रकाश नीटू को ले कर थानाप्रभारी के औफिस में पहुंचा था, पुलिस वाले बगल वाले कमरे में एक अभियुक्त से गहन पूछताछ कर रहे थे. जरा सी देर में वहां से चीखचिल्लाहट की भयावह आवाजें आने लगी थीं.

ये आवाजें सुन कर नीटू थरथर कांपने लगा. फिर वह दबी सी आवाज में ओमप्रकाश से बोला, ‘‘मामा, ये लोग मेरा भी क्या ऐसा ही हाल करेंगे?’’

‘‘नहीं करेंगे बेटा, मैं ने एसएचओ साहब से सारी बात कर ली है. फिर जब तुम एकदम सच्चाई बयान कर ही रहे हो तो फिर डर कैसा?’’ ओमप्रकाश ने समझाया.

‘‘यही तो डर है मामा, मैं ने आप को भी पूरी सच्चाई नहीं बताई. दरअसल, मैं ने औरत के साथसाथ उस के बेटे का भी मर्डर कर दिया है और दोनों की लाशें एक साथ दफनाई हैं.’’

नीटू की यह बात थानाप्रभारी के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने नीटू को खा जाने वाली नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘मुझे पहले ही से शक था कि तुम्हारे अपराध का संबंध गणौली की कमलप्रीत और उस के बच्चे की गुमशुदगी से है.

अब तुम्हारे लिए बेहतर यही है कि तुम अपने घिनौने अपराध की सच्ची दास्तान अपने मामा को बता दो, वरना दूसरे तरीके से सच्चाई उगलवानी भी आती है.’’

थानाप्रभारी के इतना कहते ही ओमप्रकाश नीटू को ले कर एक दूसरे कमरे में ले गया. इस के बाद नीटू ने अपने अपराध की पूरी कहानी मामा को बता दी. नीटू के बताने के बाद ओमप्रकाश ने सारी कहानी थानाप्रभारी को बता दी.

थानाप्रभारी ने ओमप्रकाश के बयान दर्ज करने के बाद उसे घर भेज दिया फिर नीटू को गिरफ्तार कर उसे अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में उस से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से अपराध की एक सनसनीखेज कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

करीब एक साल पहले की बात है. अपनी रिश्तेदारी के एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए कमलप्रीत अकेली नारायणगढ़ के बड़ागांव गई थी. वहां जब वह नाचने लगी तो एक लड़के ने भी उस का खूब साथ दिया. उस ने बहुत अच्छा डांस किया था.

इस डांस के बाद भी दोनों एक साथ बैठ कर बतियाते रहे. लड़के ने अपना नाम सुमित उर्फ नीटू कहते हुए बताया कि यों तो वह शहजादपुर का रहने वाला है, मगर बड़ागांव में किराए का कमरा ले कर एक कंप्टीशन की तैयारी कर रहा है.

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कमलप्रीत उस की बातों से तो प्रभावित हो ही रही थी, उस का सेवाभाव भी उसे खूब पसंद आया. कमलप्रीत तो थकहार कर एक जगह बैठ गई थी, पार्टी में खाने की जिस चीज का भी उस ने जिक्र किया, वह ला कर उसे वहीं बैठी को खिलाता रहा.

इसी तरह काफी रात गुजर जाने पर कमलप्रीत को नींद सताने लगी. नीटू ने सुझाव दिया कि वह उसे अपने कमरे पर छोड़ आता है, जहां वह बिना किसी शोरशराबे के आराम से सो सकती है. थोड़ी झिझक के बाद वह मान गई.

अब तक नीटू को भी नींद आने लगी थी. अत: कमरे में चारपाई पर कमलप्रीत को सुलाने के बाद वह खुद भी जमीन पर दरी बिछा कर सो गया.

आगे का सिलसिला शायद इन के वश में नहीं था. रात के जाने किस पहर में दोनों की एक साथ आंखें खुलीं और बिना आगेपीछे की सोचे, दोनों एकदूसरे में समा गए. कमलप्रीत से नीटू 10 साल छोटा था, अत: उस मिलन के बाद कमलप्रीत उस की दीवानी हो गई.

इस के बाद यही सिलसिला चल निकला. दोनों किसी न किसी तरीके से, कहीं न कहीं मौजमस्ती करने का तरीका निकाल लेते.

देखतेदेखते एक बरस गुजर गया. अब कमलप्रीत ने नीटू से यह कहना शुरू कर दिया था कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर लेगी. मौजमस्ती तक तो ठीक था, कमलप्रीत की इस बात ने नीटू को परेशान कर डाला.

नीटू ने इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए आखिर मन ही मन यह निर्णय लिया कि वह कमलप्रीत को अच्छी तरह से समझाएगा. फिर भी न मानी तो वह उस का खून कर देगा. इस के लिए उस ने एक चाकू भी खरीद कर रख लिया था.

19 मार्च, 2018 की सुबह कमलप्रीत उस के यहां आ धमकी. उस के साथ एक लड़का था, जिसे उस ने अपना बेटा बताया. आते ही उस ने कहा कि वह अपने पति को हमेशा के लिए छोड़ आई है. आगे वह उस से शादी कर के अपने लड़के सहित उसी के साथ रहेगी.

नीटू ने उसे समझाने की कोशिश की. लगातार समझातेसमझाते पूरा दिन और सारी रात भी निकल गई. मगर वह अपनी जिद पर अड़ी रही तो 20 मार्च को नीटू ने चाकू से कमलप्रीत की हत्या कर दी.

यह देख कर उस का लड़का राहुल सहम गया. मगर वह इस मर्डर का चश्मदीद गवाह बन सकता था. इसलिए नीटू ने चाकू से उस का भी गला रेत दिया. दोनों लाशों को कमरे में छिपा कर नीटू अमृतसर चला गया.

वहां गोल्डन टेंपल में उस ने वाहेगुरु से अपने इस गुनाह की माफी मांगी. रात में वापस आ कर बड़ागांव के पास से गुजर रही बेगना नदी की तलहटी में दोनों लाशों को दफन कर आया. इस के बाद वह अपने मामा के पास यमुनानगर चला गया, जिन्होंने उसे पुलिस के सामने सरेंडर करने का सुझाव दिया था.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर न केवल चाकू बरामद किया बल्कि दोनों लाशें भी खोज लीं, जो जरूरी काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर नीटू को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में अंबाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

डेढ़ सौ करोड़ की ठगी

जमाकर्ताओं के करीब 150 करोड़ रुपए से ज्यादा हड़पने के आरोपी खेतेश्वर अरबन क्रैडिट सोसाइटी के चेयरमैन विक्रम सिंह राजपुरोजित को लंबे समय बाद आखिर सिरोही पुलिस ने पकड़ ही लिया. पुलिस ने उसे 9 जनवरी, 2018 को जोधपुर से गिरफ्तार कर लिया.

करीब डेढ़ साल पहले सोसायटी में परिपक्व हो चुकी अपनी जमापूंजी लेने निवेशक सिरोही स्थित खेतेश्वर सोसायटी के हैड औफिस पहुंचे तो उस समय उन्हें किसी तरह झांसा दे कर टाल दिया गया था. पर सोसायटी कर्मचारियों की बहानेबाजी ज्यादा दिनों तक नहीं चली.

निवेशकों को जब बारबार टरकाया जाने लगा तो वे परेशान होने लगे. फिर जुलाई 2016 में सोसायटी की सभी शाखाओं में ताले लटक गए तो निवेशकों को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ. इस के बाद निवेशकों ने अलगअलग थानों में सोसायटी संचालकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी थीं.

लोगों ने जोधपुर, पाली, सिरोही, पिंडवाड़ा, गुजरात के दमन व दीव समेत कई जगहों पर उस के खिलाफ मामले दर्ज कराए. शुरुआत में संबंधित थानों की पुलिस भी केवल मामले दर्ज कर उन्हें रफादफा कराने की कोशिश में रही, लेकिन जब इस डेढ़ सौ करोड़ की ठगी की बात उच्चाधिकारियों के संज्ञान में आई तो थाना पुलिस हरकत में आ गई.

विक्रम सिंह ने सन 1992 में सिरोही जिले के पालड़ीएम कस्बे से स्टोन क्रैशर लगा कर व्यवसाय शुरू किया था. जल्द ही उस के दिमाग में मोटा पैसा कमाने का आइडिया आया तो उस ने सन 2003 में खेतेश्वर अरबन क्रैडिट सोसायटी बनाई.

विक्रम सिंह ने अपने एक भाई राजवीर सिंह को सोसायटी का एमडी और दूसरे भाई शैतान सिंह को सोसायटी का पीआरओ बना दिया था. सोसायटी की ओर से वलसाड़, वापी, सेलवास, दमन, सरीगांव, उमरगांव, धरमपुर और चिखली में कुल मिला कर 9 ब्रांच खोली गई थीं.

गुजरात के अलावा उस ने गोवा, दमन, दादर व नगर हवेली में भी सोसायटी की शाखाएं खोली थीं. इन सभी में मैनेजर और अन्य स्टाफ की नियुक्तियां की गईं. इस के बाद आकर्षक जमा योजनाओं के जरिए लोगों से पैसे जमा कराए गए.

लोगों में विश्वास बढ़ाने के लिए इन्होंने स्थानीय लोगों को अपनी शाखाओं में नौकरी पर रखा. हालांकि बीच में जब किसी जमाकर्ता की मियाद पूरी हुई तो उन्हें रकम लौटाई भी गई, लेकिन उसी दौरान दूसरी आकर्षक योजनाएं भी लाई गईं, जिस से ग्राहक अपनी परिपक्व हुई राशि को फिर से सोसायटी में जमा करा दे.

जमा कराए लोगों के पैसों से सोसायटी के अध्यक्ष विक्रम सिंह राजपुरोहित ने सिरोही, पाड़ीव, आबू रोड, तलेटी, नयासानवाड़ा, पिंडवाड़ा, रामपुरा, अहमदाबाद, अंबाजी, मुंबई आदि जगहों पर अपने और रिश्तेदारों के नाम से करोड़ों रुपए की बेनामी संपत्ति खरीदी.

इतना ही नहीं, उस ने अपनी ही सोसायटी से अपने नाम 12 करोड़ का लोन भी लिया था. इस तरह लोगों को करीब डेढ़ सौ करोड़ का चूना लगा कर शातिरदिमाग विक्रम सिंह फरार हो गया.

फरारी के बाद वह नेपाल, गोवा, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा आदि जगहों पर घूमता रहा. कोई उसे पहचान न सके, इस के लिए वह साधु के भेष में रहता था. कभीकभी वह सपेरा भी बन जाता था. जोधपुर में वह महामंदिर इलाके में किराए पर मकान ले कर भी रहा था. वहां वह अपने भतीजे के संपर्क में था.

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पिछले डेढ़ साल से पुलिस पर विक्रम को पकड़ने का दबाव था, लेकिन वह पुलिस को लगातार चकमा दे कर बच निकलता था. उस की गिरफ्तारी पुलिस के लिए एक चुनौती बनी हुई थी, लेकिन सिरोही के एसपी ओमप्रकाश के निर्देश पर उस की गिरफ्तारी के लिए एक गोपनीय योजना बनाई गई, जिस की जानकारी केवल 2 लोगों को ही थी. एक थाना सिरोही के सीआई आनंद कुमार और दूसरे कांस्टेबल योगेंद्र सिंह को.

उन्हें यह निर्देश दिया गया था कि किसी भी तरह विक्रम सिंह का पता लगा कर उसे गिरफ्तार किया जाए. ये दोनों क्या प्लान कर रहे हैं, कहां आजा रहे हैं, यह बात थाने में किसी को भी पता नहीं रहती थी.

कांस्टेबल योगेंद्र सिंह जब भी विक्रम सिंह की तलाश में बाहर गए, तब उन्होंने जरूरी काम बता कर थाने से छुट्टी ली थी. 3-4 दिन तक तलाश कर के वे वापस लौट आते, दोबारा जाते तो भी छुट्टी ले कर ही जाते थे.

उधर विक्रम सिंह भी इतना शातिर था कि वह कभी मोबाइल से बात तक नहीं करता था. बहुत जरूरी होने पर विक्रम सिंह किसी नए फोन नंबर से बात करता था. इस के बाद वह तुरंत अपनी लोकेशन बदल लेता था. ऐसे में पुलिस के लिए यह चुनौती बन जाती थी कि लोकेशन को कैसे ट्रेस किया जाए.

पुलिस अपने मुखबिरों का भी सहारा ले रही थी. मुखबिरों की सूचनाओं पर काम किया गया. आखिरकार इन दोनों पुलिसकर्मियों की मेहनत रंग लाई. ये दोनों ही उस का करीब एक महीने से पीछा कर रहे थे.

कांस्टेबल योगेंद्र सिंह को पक्की खबर मिली कि आरोपी विक्रम सिंह जोधपुर में ही है. इस पर उन के साथ एक एसआई को भेजा गया. एसआई को यह नहीं पता था कि किस की गिरफ्तारी के लिए निकले हैं.

आखिर 9 जनवरी, 2018 को विक्रम सिंह जोधपुर में पुलिस के हत्थे चढ़ गया. उसे जोधपुर से सिरोही ला कर पूछताछ की गई. फिर पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर के उस का रिमांड लिया और विस्तार से पूछताछ की. सीआई आनंद कुमार 13 जनवरी को विक्रम सिंह राजपुरोहित को सिरोही स्थित खेतेश्वर सोसायटी के कार्यालय पर ले गए.

पुलिस ने कार्यालय की चाबी के बारे में विक्रम सिंह से पूछा तो उस ने चाबी की जानकारी होने से मना कर दिया. इस पर पुलिस ने ताला खोलने वाले एक युवक को बुला लिया. लेकिन वहां उन्हें मुख्य दरवाजे पर लगा ताला कुंदे समेत पहले से ही टूटा मिला.

मुख्य दरवाजे से लगते दूसरे दरवाजे पर इंटरलौक जरूर था, लेकिन वह भी अंदर से तोड़ा हुआ था. अंदर की अलमारी को तोड़ने पर उस में पुराने रेकौर्ड मिले.

इस के साथ ही उसी अलमारी के अंदर एक लौकर और था, उस में एक हजार व 500 का एकएक पुराना नोट मिला. कुछ नोट और पूजा सामग्री भी मिली. पुलिस जब खेतेश्वर सोसायटी के सिरोही कार्यालय पहुंची तो वहां लाइट कनेक्शन कटा मिला. पुलिस को टौर्च व मोबाइल की रोशनी में जांच करनी पड़ी.

काररवाई के दौरान विक्रम सिंह भी साथ था. उस ने खुद पुलिस को फाइलों के बारे में जानकारी दी कि किस से संबंधित कौन सी फाइल है.

पुलिस ने कार्यालय में रखी फाइलों और अन्य दस्तावेजों के बारे में जानकारी ली. इन फाइलों में लोगों की एफडी, बैंकों में पूर्व में जमा करवाए गए पैसों का लेखाजोखा था. पुलिस का कहना है कि विक्रम सिंह ने रेकौर्ड के अलावा अन्य दस्तावेज अपने बड़े भाई शैतान सिंह व छोटे भाई राजवीर सिंह के पास बताए होने की बात कही.

पुलिस का कहना है कि ये सभी पुराने लेनदेन का रेकार्ड है, जो सन 2010 से पहले के हैं. उस के बाद के कागजातों के बारे में भी पूछताछ की गई. कार्यालय में मैनेजर के कमरे की टेबल के पास कुछ कागजातों को जलाए जाने के भी सबूत मिले.

जांच से संबंधित तमाम दस्तावेज पुलिस थाने ले आई. पूछताछ में पता चला कि उस ने सोसायटी के माध्यम से हजारों लोगों की खूनपसीने की कमाई से करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपए ठगे थे. यहां एक बात यह भी बता दें कि खेतेश्वर सोसायटी में रुपए जमा करने वाले सब से ज्यादा जमाकर्ता सिरोही जिले के ही थे.

विक्रम सिंह की गिरफ्तारी के बाद जमाकर्ताओं को उम्मीद बंधी है कि शायद उन के खूनपसीने की कमाई उन्हें वापस मिल जाए. विक्रम सिंह और उस की खेतेश्वर सोसायटी के खिलाफ जमाकर्ताओं ने जहांजहां रिपोर्ट दर्ज कराई थी, वहां की पुलिस भी विक्रम सिंह से पूछताछ की तैयारी में थी.

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विक्रम सिंह के एक भाई श्याम सिंह पुरोहित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं. ठगी का मामला सामने आने पर विक्रम के भाई श्याम सिंह ने मीडिया के सामने आ कर सफाई दी कि पिछले लंबे समय से उन का विक्रम सिंह से कोई वास्ता नहीं रहा. वह घर आताजाता भी नहीं और यहां तक कि उस से बोलचाल तक नहीं है. साथ ही यह भी कि 4 महीने पहले जब उन की पत्नी की मृत्यु हो गई, तब भी वह घर पर नहीं आया था.

पुलिस विक्रम सिंह के उन भाइयों को भी गिरफ्तार करेगी जो सोसायटी में शामिल थे और उन तमाम शाखाओं के मैनेजरों से भी पूछताछ करेगी, जिन्होंने सोसायटी के माध्यम से लोगों को अच्छा रिटर्न देने का वादा कर के उन की खूनपसीने की कमाई हड़प ली थी.

कथा लिखने तक विक्रम सिंह की जमानत नहीं हो सकी थी. कोर्ट के आदेश पर उसे न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अविश्वास प्रस्ताव और राहुल गांधी

शुक्रवार 20 जुलाई को पहले अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कांग्रेस और विपक्ष के मुख्य वक्ता राहुल गांधी ने कुछ मिनटों तक नरेंद्र मोदी की जम कर खिंचाई की और जीएसटी, काले धन, रफाल लड़ाकू विमानों, चौकीदारी,नोटबंदी, बढ़ती बेरोजगारी, खुलेआम निर्दोषों के साथ भगवा भीड़ों का हमला और प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भरपूर कटाक्ष किए. अचानक उन्होंने अपने को भाजपाइयों द्वारा पप्पू कहे जाने की बात खुले में कह कर 20-25 कदम चल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झप्पी भी ले ली.

अपनी सीट पर लौट कर उन्होंने अपने साथियों को आंख भी मारी जो लोकसभा टीवी के कैमरों ने कैद कर ली और पूरे जोरशोर से झप्पी और आंख मारना विवाद का विषय बन गया.

अब यह निर्भर करता है कि कौन मोदी बनाम विपक्ष के किस पाले में है. जो मोदी समर्थक हैं वे इसे नाटक समझते हैं और प्रधानमंत्री के नजरिया के खिलाफ मानते हैं. जो विपक्ष में हैं वे इसे मास्टर स्ट्रोक मानते हैं.

राहुल गांधी ने 50 मिनट में जो नरेंद्र मोदी की आलोचना की उस के बाद झप्पी लेना नरेंद्र मोदी की कार्यशैली का हिस्सा ही है. नरेंद्र मोदी नवाज शरीफ और शी जिनपिंग की झप्पियां लेने में मशहूर हैं जबकि चीन और पाकिस्तान दोनों से संबंध इन झप्पियों के बावजूद सुधरे नहीं हैं. नवाज शरीफ तो अब पाकिस्तान की जेल में हैं और झप्पी लेने वाला राजनीतिक या व्यक्तिगत रूप से उन्हें सांत्वना तक नहीं दे रहा. झप्पी तो सिर्फ एक पौलीटिक्स पौस्चर है जो डोनाल्ड ट्रंप उत्तरी कोरिया के किम जोंग उन तक के साथ इस्तेमाल करते हैं.

राहुल गांधी ने यह साफ कह दिया है कि अब वे नरेंद्र मोदी से भयभीत नहीं हैं. वे बराबरी की हैसियत रखते हैं और प्रधानमंत्री के क्रिया कलापों पर खराखरा बोल सकते हैं. वे विपक्ष के दमदार नेता हैं. नरेंद्र मोदी को उकसा सकते हैं. तभी अविश्वास प्रस्ताव के उत्तर में नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की असफलताओं का जवाब इतिहास में खोजते रहे. उन्हें सरदार पटेल, चरणसिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल याद आ रहे थे, जबकि पहली गैर कांग्रेस सरकार को 1979 में भारतीय जनता पार्टी के कारण ही जनता पार्टी में विभाजन हुआ सरकार गिरी थी. लेकिन उन्होंने सरकार की उपलब्धियों को तो जल्दीजल्दी आंकड़ों से रिकार्ड के लिए पढ़ डाला पर तीखे बाण केवल जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी पर चलाए. मानो आज देश पर वे राज कर रहे हैं.

राहुल गांधी के तीखे सवालों और झप्पी का असर यह हुआ कि सरकार के कामकाज तो बट्टे खाते में चले गए और नरेंद्र मोदी के भाषण से लगने लगा मानो कि राज तो नेहरू परिवार ही कर रहा है और नरेंद्र मोदी एक विपक्षी नेता की तरह उस परिवार के गड़ेमुर्दे उखाड़ कर उसे सत्ता से हटाने की कोशिश में लगे हैं.

राहुल गांधी के व्यंग्य बांणों और झप्पी ने नरेंद्र मोदी को सरकार की सफाई देने की जगह भागीदार की अपनी परिभाषा देने पर मजबूर कर दिया. नरेंद्र मोदी यह साबित करने में लगे रहे कि राहुल गांधी को विरासत में जो राजगद्दी मिली है वह उस के लायक नहीं है और वे खुद एक गरीब घर के नेता की हैसियत से शायद राजघराने का विरोध करने में लगे हैं.

अविश्वास प्रस्ताव में भारी जीत के कारण भाजपा पर कोई आंच तो नहीं पर जिस तरह अगले ही दिन जीएसटी में बीसियों चीजों पर टैक्स कम हुआ और 5 करोड़ तक की टर्नओवर वाले व्यापारियों को मासिक की जगह त्रैमासिक रिटर्न भरने की छूट मिली. इस से साफ है कि राहुल के बाण मर्म पर लगे हैं. और भाजपा सरकार की जिद और हम ही सही हैं, हमेशा ही सही हैं का भाव टूट रहा है. शायद अब हर फैसला अब कांग्रेसी बाणों की नजर में लिया जाएगा. अगले दिन राजस्थान में एक भगवा भीड़ द्वारा पीटपीट कर हत्या करने पर गृहमंत्री और मुख्यमंत्री ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. पहले वे इस पिटाई का खुला समर्थन करते थे.

तमिलनाडु का खेल अभी भी खुला है

इन दिनों तमिलनाडु की सभी मुख्य सड़कें गहमागहमी से भरी हैं, क्योंकि सूबे के रिटेल स्टोर भारी डिस्काउंट की घोषणाएं कर रहे हैं. हालांकि तमाम त्योहार-उत्सव अभी थमे हुए हैं, क्योंकि अभी आषाढ़ का महीना चल रहा है और इस महीने को अमांगलिक माना जाता है. आषाढ़ में कोई शादी नहीं होती. बरसात का मौसम इसके मुफीद भी नहीं होता. फिर यह वह काल होता है, जब सूर्य अपनी दिशा बदलता है.

अगस्त के मध्य तक जैसे ही यह अवधि पूरी तरह खत्म होगी, राजनीतिक परिदृश्य में गतिविधियों के तेज होने की संभावना है, और यही गतिविधियां 2019 के आम चुनाव की पटकथा रचेंगी. जुलाई के अंत में डीएमके विपक्षी पार्टियों का एक सम्मेलन आयोजित कर रहा है, जिसका मकसद राज्यों के अधिकारों पर बल देने के साथ-साथ केंद्र को देश की संघीय भावना का स्मरण कराना है. क्षेत्रीय पार्टियां व राष्ट्रीय दलों की राज्य इकाइयां जमीनी कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए तैयार करने में जुट गई हैं.

लेकिन सबसे बड़े धमाके की उम्मीद सुपर स्टार रजनीकांत से है. इस साल की शुरुआत में उन्होंने राजनीति में उतरने का एलान किया था, हालांकि उन्होंने अपनी पार्टी की घोषणा अब तक नहीं की है. दरअसल, रजनीकांत अपने फैन्स क्लबों व विभिन्न क्षेत्रों के प्रशंसकों की मदद से जमीनी स्तर पर संगठन तैयार करने में जुटे हैं. भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व कई दूसरे हिंदू संगठन इसकी भूमिका तैयार कर रहे हैं. यहां तक कि मृतप्राय कांग्रेस भी अपनी पुरानी शिथिलता त्यागकर खुद को सक्रिय करने की कोशिश करती दिख रही है, लेकिन इन सबके बीच एक पार्टी पूरी तरह दिशाहीन दिख रही है, और वह है अन्नाद्रमुक.

2019 के आम चुनाव के मद्देनजर विभिन्न पार्टियों की व्यूह रचना को अभी अंतिम रूप मिलना बाकी है, मगर उनकी रूपरेखा मोटे तौर पर दिखने लगी है. लोकसभा चुनावों के अलावा, अब इस बात की भी संभावना टटोली जाने लगी है कि तमिलनाडु विधानसभा को वक्त से पहले भंग करके आम चुनाव के साथ ही इसके भी चुनाव करा लिए जाएं. इस विषय में राष्ट्रीय विमर्श अभी आधा-अधूरा है, लेकिन राज्य की पार्टियां इस दिशा में सोचने लगी हैं.

डीएमके कांग्रेस के साथ अपने पुराने गठबंधन के सहारे आगे बढ़ रही है. दरअसल, दोनों पार्टियों के मुखिया एम के स्टालिन और राहुल गांधी के निजी ताल्लुकात काफी अच्छे हैं. सीटों का बंटवारा इनके लिए एक मुश्किल मुद्दा जरूर होगा, लेकिन दोनों पार्टियों की जो स्थिति है, उसे देखते हुए वे लोकसभा और विधानसभा में एक-दूसरे के प्रति उदारता बरत सकती हैं.

वाम दलों के अतिरिक्त कुछ अन्य सेकुलर पार्टियों के भी इस गठबंधन से जुड़ने की संभावना है. साल 2014 में भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली वाइको की पार्टी (एमडीएमके) द्वारा इस बार पाला बदलने की संभावना है. इसी तरह, अभिनेता कमल हासन भी शायद इस कोरस में शामिल हो जाएं.

क्या जयललिता की सजायाफ्ता सहेली शशिकला के भतीजे दिनाकरन भी इन चुनावों में कोई कारक होंगे? दिनाकरन ने अम्मा मक्काल मुन्नेत्र कषगम नाम की अपनी पार्टी बनाई है और इस नवजात पार्टी के प्रति थेवर समुदाय में काफी आकर्षण है. जयललिता की मौत से खाली आरके नगर सीट को दिनाकरन ने जीता जरूर, मगर उन पर भारी ‘धनबल’ के इस्तेमाल का आरोप लगा, हालांकि लगता नहीं कि चुनौती पेश किए बिना वह अपने हथियार डाल देंगे. साल 2014 में अमित शाह ने सात पार्टियों का जो मजबूत गठबंधन बनाया था, उसने बस दो सीटें जीती थीं- एक भाजपा को मिली थी और दूसरी पीएमके को.

पिछला लोकसभा चुनाव तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया था. उस चुनाव में उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया और खराब सेहत के बावजूद जोरदार प्रचार किया था. नतीजे विस्मयकारी थे. उनकी पार्टी ने राज्य की 39 में से 37 सीटें जीत ली थीं. लेकिन ‘क्वीन’ न बनने की सूरत में ‘किंग मेकर’ बनने की उनकी साध पूरी नहीं हुई, क्योंकि नरेंद्र मोदी बड़े बहुमत के साथ सत्ता सदन में दाखिल हो गए.

साल 2014 में भाजपा ने तमिलनाडु में जिस एनडीए को खड़ा किया था, वह चुनाव नतीजे आने के कुछ ही दिनों में बिखर गया था. तभी से भाजपा वहां एक नया गठबंधन गढ़ने की कोशिश करती रही है. राज्य की राजनीति में वह नए-नए प्रयोग करती रही है. केंद्र सरकार की मदद से पार्टी राज्यपाल के दफ्तर, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग के सहारे तरह-तरह के दांव चलती रही. पिछले हफ्ते ही जांच एजेंसियों ने सड़क निर्माण से जुड़े एक बड़े कांट्रेक्टर के यहां छापा मारकर करीब 160 करोड़ रुपये की नगदी और सोना बरामद किए.

डीएमके नेता स्टालिन ने फौरन मुख्यमंत्री पलानीसामी को कठघरे में खड़ा करते हुए उन पर ‘बेनामी’ संपत्ति इकट्ठा करने का आरोप लगाया, क्योंकि कहा जा रहा है कि उस निर्माण कंपनी के मालिक मुख्यमंत्री के समधी हैं. दिलचस्प है कि यह छापेमारी संसद में अविश्वास प्रस्ताव के चंद रोज पूर्व हुई. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री के एक बेहद करीबी मंत्री ने संसद में एनडीए का समर्थन न करने का एलान किया था, लेकिन नाटकीय रूप से पार्टी ने रुख बदलते हुए अविश्वास मत के समर्थन में वोट डाला.

साफ है, सबकी निगाहें अन्नाद्रमुक पर लगी हैं. पलानीसामी के फीके नेतृत्व और हाशिये पर पडे़ निराश पन्नीरसेल्वम की इस पार्टी के मजबूत समर्थन आधार पर भाजपा और रजनीकांत जैसे नेता लंबे समय से अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं. पार्टी के विभाजन की सूरत में वे संभावित बड़े धड़े के साथ मिलकर अपने राजनीतिक आधार को ठोस करना चाहेंगे.

भाजपा के लिए एक कठिन चुनौती यह है कि तमिलनाडु में उसके पास कोई चमत्कारिक चेहरा नहीं है. इसलिए उसका अगला दांव रजनीकांत हैं. लेकिन रजनीकांत के रुख को लेकर आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता. इसलिए भाजपा फिर से पीएमके, डीएमडीके, यहां तक कि स्टालिन के नाराज बड़े भाई अलागिरी को रिझाने की कोशिश कर रही है. बहरहाल, खेल अभी काफी खुला है और भाजपा अपना हर दांव आजमाने में जुटी है.

साभार : एस श्रीनिवासन

पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर को उनकी इस फोटो के लिये लोगों ने किया ट्रोल

बौलीवुड फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में अभिनेता इरफान खान के साथ सशक्त भूमिका निभाने वाली पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर की हाल ही में सिगरेट के कश लगाती फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. इन तस्वीरों के सामने आने के बाद सबा कमर ट्रोलर्स के निशाने पर आ गई हैं. बताया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें एक फोटोशूट के दौरान की हैं. सबा कमर ने फोटोशूट के बीच में सिगरेट के लिए ब्रेक लिया था. हालांकि इन फोटो के सामने आने के बाद सबा ने ट्रोलर्स को कोई जवाब नहीं दिया है.

खबर है कि सबा कमर की ये तस्वीरें उनके फोटोशूट के दौरान उस समय ली गईं, जब उन्होंने अपने कपड़े बदलने के ब्रेक लिया था. ब्रेक के दौरान सबा की कुछ फोटो सिगरेट पीते हुए भी सामने आई हैं. ट्रोलर्स को सबा कमर का इस तरह सिगरेट पीना पसंद नहीं आया और उन्होंने सबा को ट्रोल करना शुरु कर दिया. इन सबके बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सबा का समर्थन कर रहे हैं.

ट्रोलर्स ने उनकी तुलना फिल्‍म ‘रईस’ में बौलीवुड के किंग खान यानी शाहरुख खान के साथ नजर आईं पाकिस्‍तानी एक्‍ट्रेस माहिरा खान से की. गौरतलब है कि पिछले साल रणबीर कपूर के साथ विदेश में सड़क पर सिगरेट के कश लगाती माहिरा के फोटो वायरल हुए थे. सोशल मीडिया पर माहिरा खान का एक वीडियो भी जमकर वायरल हुआ था, जिसमें वह सिगरेट पीती हुई नजर आ रही थीं.

आपको बता दें कि सबा कमर अभिनीत बौलीवुड फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ स्कूल में एडमिशन के मुद्दे पर केवल मनोरंजन तक ही  सीमित नहीं थी, बल्कि हिंदी बोलने वाले अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए क्या कर गुजरते हैं यह फिल्म में बेहतरीन तरीके से दिखाया गया था. फिल्म में इरफान खान, दीपक डोबरियाल और सबा कमर की बेहतरीन अदाकारी देखने को मिली थी.

क्लिक करें और देखें सपना चौधरी के 5 हौट डांस वीडियो

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी इन दिनों लोगों के दिलों पर राज कर रही हैं. बिगबौस के घर से बाहर आने के बाद उन्होंने अपना ऐसा मेकओवर किया है कि उनपर से लोगों की नजर ही नहीं हट रही है.

सलवार सूट में नजर आने वाली सपना अब ग्लैमरस ड्रेस में नजर आने लगी हैं. देश भर में उनके स्टेज शो हो रहे हैं. उन्हें बौलीवुड में काम मिल रहा है, एक के बाद एक नए गाने आ रहे हैं. तो आइए आज हम आपको सपना चौधरी के जबरदस्त डांस दिखाते हैं.

सपना चौधरी अब गाउन, रौकस्टार और वेस्टर्न ड्रेस में दिखाई देती हैं. हाल ही में उन्होंने कई फोटो शूट भी कराए, जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए.

नानू की जानू में तेरे ठुमके, भोजपुरी मूवी में मेरे सामने आके और अब पंजाबी मूवी जग जिउंदा ऐ में बिल्लौरी अक्ख. इन्होंने आते ही सोशल मीडिया पर आग लगा दी.

सपना चौधरी अब बौलीवुड फिल्मों में भी आइटम डांस करती नजर आती हैं. वीरे की वेडिंग में हट जा ताऊ, जर्नी औफ भैंगओवर में लव बाइट लोगों को काफी पसंद आए.आए दिन सपना चौधरी के डांस वीडियो भी सामने आ रहे हैं. हाल ही में आए सपना चौधरी के पहली पंजाबी गाने ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है. यह गाना दो दिन पहले ही रिलीज हुआ है.

वीडियो: ब्लैक हौट लहंगे में सपना ने मचाया पंजाबी गाने में धमाल

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी बौलीवुड और भोजपुरी में डांसिंग डेब्यू कर चुकी हैं और अपनी अदाओं से लोगों को दिवाना बना चुकी हैं. इसके बाद जबरदस्त स्टारडम हासिल कर चुकी सपना का एक नया पंजाबी गाना भी रिलीज किया गया है. रिलीज होने के कुछ ही देर में ये गाना सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. गाने में सपना चौधरी ब्लैक हौट पंजाबी लुक में नजर आ रही हैं.

सपना का ये गाना पंजाबी फिल्म ‘जग्गा जिउंदा ए’ का है. गाना का टाइटल है ‘बिल्लौरी अख…’ इस गाने में सपना चौधरी के डांस के साथ-साथ उनका लुक और अदाएं भी काफी पसंद की जा रही हैं. यू-ट्यूब पर इस गाने को अब तक करीब ढाई लाख लोगों ने देखा है. जबरदस्त मेकओवर और ब्लैक हौट लहंगे में सपना ने ऐसा धमाल किया है कि फैंस का दिल एक बार फिर से गद गद हो गया है.

सपना की लोकप्रियता की बात करें तो वो किसी बौलीवुड स्टार से कम पौपुलर नहीं हैं. सोशल मीडिया पर भी सपना चौधरी की काफी जबरदस्त फैन फौलोइंग है. ‘तेरी आंखिया का यो काजल’ से देश भर में काफी मशहूर सपना पिछले दिनों भोजपुरी फिल्म ‘बैरी कंगना-2’ में आइटम सौन्ग करते नजर आईं थी. सपना चौधरी ने फिल्म ‘वीरे की वेडिंग’ के गाने ‘हट जा ताऊ’ से बौलीवुड में डांसिंग डेब्यू किया था. इसके बाद से ही फैन को उनके बौलीवुड एक्टिंग डेब्यू का काफी बेसब्री से इंतजार है. ‘बिग बौस’ हाउस से निकलने के बाद सपना ने कई फिल्मों में डांस नंबर्स किए हैं.

धोखाधड़ी के आरोप में फंसी बंदगी कालरा

‘बिग बौस 11’ के एक्स कंटेस्टेंट बंदगी कालरा इन दिनों एक मुसीबत में फंस चुकी हैं. उनके ऊपर धोखाधड़ी का आरोप लगा है. बंदगी के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने सोशल नेटवर्किंग साइट इंस्टाग्राम अकाउंट पर ‘फेक आईफोन ऐड’ शेयर किया था, जिसके झांसे में आकर एक युवक को हजारों रुपयों का नुकसान हुआ. एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता युवराज सिंह यादव, जो इंस्टाग्राम पर बंदगीको फौलो कर रहा था. युवराज ने बताया कि हाल ही बंदगी ने अपने इंस्टाग्राम पर एक आईफोन X का एक फेक एड पोस्ट किया था.

83,000 हजार का फोन 61,000 में

इस आईफोन X का की रियल कीमत 83,000 हजार रुपये थी, लेकिन एड के मुताबिक इस फोन को दिल्ली बेस्ड एक कंपनी मात्र 61,000 रुपये में ही दे रही थी. इसके बाद युवराज ने फोन बुक करवा लिया. फोन बुक करवाने के लिए युवराज ने एक नंबर पर 13,000 रुपये का पेटीएम किया, लेकिन जब उसने दोबारा से बंदगी के इंस्टाग्राम अकाउंट को चैक किया तो वह एड उनके अकाउंट से डिलीट किया जा चुका था. इसके बाद युवराज को को थोड़ा शक हुआ तो उसने कंपनी से संपर्क किया. कंपनी वालों ने भी युवराज को दिलासा दिलाया कि उन्हें फोन जल्द ही मिल जाएगा.

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पुलिस करेगी पूछताछ

आखिर वो दिन भी आ गया जब युवराज के हाथ कुरियर लगा. तभी युवराज ने कुरियर वाले को बाकी की बचे पैसे 48,000 रुपये दे दिए, लेकिन जैसे ही युवराज ने कुरियर का पैकेट खोला तो अंदर सिर्फ आईफोन X का डम्मी था. यह देखते ही युवराज को अहसास हो गया कि वह किसी धोखाधड़ी का शिकार हो चुका है.

इसके बाद उसने बेंगलुरु में पुलिस स्टेशन मराठाहल्ली में एक शिकायत दर्ज करवाई. रिपोर्ट के अनुसार इस मामले की देखभाल कर रहे पुलिस निरीक्षक सादिक पाशा ने कहा है कि बंदगी को पूछताछ के लिए बुलाया गया है, क्योंकि वह धोखाधड़ी के मामले में आंशिक रूप से शामिल थीं. इसके लिए पुलिस द्वारा बंदगी को ईमेल भी किया जा चुका है.

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