पत्नी के 7 मूलभूत अधिकार

शादी के मंडप पर वरवधू सात फेरे और सात वचन लेते हैं जिस का लब्बोलुआब यह रहता है कि वे एकदूसरे के प्रति ताउम्र निष्ठा रखेंगे, एकदूसरे का ध्यान रखेंगे, सात जन्मों तक साथसाथ रहेंगे. यह अलग बात है कि शादी के 7 माह बाद ही उन में खटपट होने लगती है. दिलचस्प यह है कि इस खटपट को कानून ने ध्यान में रखा है. यदि पहले 7 वर्षों में किसी ब्याहता की मौत किसी भी कारण से होती है तो उस की जांच इस एंगल के आधार पर अवश्य की जाती है कि कहीं उस की मौत का कारण पति या उस की ससुराल वाले तो नहीं हैं. कानून कित्ता दूरदर्शी होता है. लोग केवल सात फेरों, सात वचनों व सात जन्मों के साथ की ही बात करते हैं, वे असल बात भूल जाते हैं कि पत्नी के पहले ही दिन से सात अधिकार और हो जाते हैं. मूलभूत अधिकार केवल संविधान ने न?ागरिकों को ही नहीं दिए हैं, हमारा समाज संविधान से भी ज्यादा दूरदर्शी व ताकतवर है. उस ने पत्नी को प्रथम दिवस ही 7 मूलभूत अधिकार दे दिए हैं. इन्हें ब्याह के बाद के डैरिवेटिव अधिकार भी कह सकते हैं. ये पत्नी होने पर पदेन उस के बटुए में आए अधिकार हैं और कुलमिला कर इन 7 अधिकारों का आउटकम यह होता है कि पति अधिक अधिकार में हो जाता है केवल पत्नी के.

पहला अधिकार : पति अपना दिमाग आले में ताले में रख दें, अब हर छोटीबड़ी बात में दिमाग पत्नी का चलेगा. पति के दिमाग का अब कोई उपयोग नहीं है. हां, यह जड़ न हो जाए, इसलिए 6 माह में एक बार निकाल कर उस का उपयोग करने की अनुमति होगी और यह भी उस की हां में हां मिलाने में. वैसे, अब वह जड़ ही रहे तो ज्यादा बेहतर होगा. हां, आजकल डिजिटल लौकर आ रहे हैं तो पति अपने दिमाग को डिजिटाइज कर के यहां भी रखवा सकता है. मतलब यह है कि आप अपने को बुद्धिमान समझने की गलतफहमी दिमाग से निकाल दें भले ही आप उच्चकोटि के वैज्ञानिक हों या कोई आला अधिकारी. घर में तो अब एक ही महान बुद्धिमान रहेगा.

दूसरा अधिकार : पत्नी के रिश्तेदार पति से ज्यादा अहम हैं. ब्याह के बाद पति के रिश्तेदारों से ज्यादा बड़े व अहम पत्नी के रिश्तेदार होते हैं, इस पर कोई अन्यथा वहम मन में न पाले. यह अधिकार पत्नी से कोई छीन नहीं सकता है. यदि पति का भाई या पिता घर आएं तो वह काम से छुट्टी न ले वरना उस की छुट्टी हो सकती है? लेकिन उस की छुट्टी यहां भी हो सकती है यदि उस ने यह घुट्टी न पी हो कि साले या उस के ससुरजी के आने पर उसे दफ्तर या अपने कामकाज को तुरंत तिलांजलि दे देनी है वरना उस की इज्जत का फालूदा बन उस की श्रद्धांजलि सभा हो जाएगी. यह पत्नी के मूलभूत अधिकार के तहत पति को निभाना ही है.

तीसरा अधिकार : अब आप का बातबात पर अपनी खिंचाई करवाने का अधिकार रहेगा. बात कुछ भी हो सकती है, दफ्तर से आधे घंटे ही सही बिना काम के देर कैसे हुई, सब्जी, फलफूल लाना कैसे भूल गए, दवा कैसे भूल गए. वह बातबात में आप को गरिया भी सकती है और आप को इस का प्रतिकार नहीं करना है. यदि वह गलत है तो भी आप को चुप रहना है और यदि आप सही हैं तो भी आप को चुप ही रहना है. यही दांपत्य जीवन की सफलता का राज है.

चौथा अधिकार : पत्नी के पांव पांव और पति के पैर, मूड तो पत्नी का ही माने रखेगा. पति को अब इश्क, जब पत्नी का मूड हो, तब करना होगा. उस के मूड का ध्यान रखना होगा. यदि वह बोलेगी कि बैठ जाओ तो बैठ जाना चाहिए, यदि वह बोले कि खड़े हो जाओ तो खड़े हो जाना होगा. मूडीज देशों की अर्थव्यवस्था का मूड बताती है लेकिन पत्नी का मूड इश्क के मूड के बारे में बताता है.

5वां अधिकार : सालभर के अंदर आप का कोई ऐसा दोस्त नहीं रहेगा जिसे कि आप जिगरी दोस्त कह सकें. यदि दोस्ती करनी हो तो पत्नी से ही करनी होगी. वही सब से अच्छी दोस्त होगी. बचपन की दोस्ती भूल जाएं, जवानी की भूल जाए, सब भूल जाएं. दोस्तों को एकएक कर के दूध से मक्खी की तरह निकाल दें, इसी में भलाई है. पत्नी तशरीफ लाई हैं तो दोस्त अब जीवन की छांछ हैं और पत्नी मलाई.

छठा अधिकार : अब आप गलतियों के पिटारे रहोगे. बातबात में आप की गलतियां ढूंढ़ी जाएंगी और आप को सिर झुका कर सब चुपचाप सहन करना है, जैसे कि गधा सदियों से करता आया है. आप का काम सिर नीचा करना है और उस का अधिकार है कि सिर ऊंचा कर के आप की नुक्ताचीनी कर आप को गधे से भी नीचे ले आए.

7वां अधिकार : अपनी हौबी को गोली मार दें. यदि आप की कोई ऐसी हौबी है जोकि पत्नी की नहीं है तो आप को पत्नी से पहले कंसल्ट करना पड़ेगा. यदि वह आज्ञा देगी तभी आप उसे जारी रख पाएंगे वरना तो घरगृहस्थी के कारण उसे आप को बायबाय करना होगा, चाहे यह लेख लिखना हो, खेल हो या कुछ भी हो यह उस की हौबी होगी कि वह आप की हौबी के लिए अनुमति देती है कि नहीं. जब सिद्धू राजनीति के लिए कौमेडी शो छोड़ सकता है तो आप खुद की पत्नीजी के लिए अपनी एक सड़ी सी हौबी के लिए काहे को अड़ी का विचार मन में रखते हो, हबी जी.

अब आप ने पत्नी के मूल अधिकार तो सुन ही लिए, तो मैं यह कह सकता हूं कि ये 7 अधिकार, वैसे, आप की कुलमिला कर भलाई के लिए ही हैं. सो, भरसक इन अधिकारों के एबसोल्यूट उपयोग में पत्नी की मदद करें, आप की जिंदगी एक अदद जिंदगी बन कर रह जाएगी. वैसे मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि आप पूरा कोऔपरेट कर रहे हैं तभी तो साथ बने हुए हैं. और आप दफ्तर में भी टोटल सबऔर्डिनेशन के ही कारण अच्छे मातहत माने जाते हैं तभी तो समय पर पदोन्नति मिलती है तो पत्नी का भी मातहत ही तो बनने की बात गंगू कर रहा है. इसी में तो दांपत्य जीवन के नित सुकून, सुख, आनंद रूपी पदोन्नति के अवसर छिपे हैं.

रामराज्य : यही गुरु विश्वगुरु बनाएंगे

बाड़मेर के किसान छात्रावास में छात्राओं द्वारा हवनयज्ञ करते हुए देख कर आप को मान लेना चाहिए कि अब रामराज्य का आगाज हो गया है. अब स्कूलों में किताबकौपियों का भारी थैला कंधे पर लाद कर बच्चों को नहीं ले जाना पड़ेगा. इस देश के बड़ेबड़े शिक्षाविद व बुद्धिजीवी काफी समय से गंभीर चिंता जता रहे थे कि नन्हेनन्हे कंधों पर ज्यादा बोझ ठीक नहीं है, लेकिन वे इस का समाधान नहीं खोज पाए.

हमें रामराज्य के आविष्कारी पुरोधाओं का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि अब छात्रावासों में रातरातभर आंखें फाड़ कर बच्चों को पढ़ने की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ एक साप्ताहिक यज्ञ किया और बन गए एकदम वैज्ञानिक टाइप समझदार प्रोफैशनल. न किताबों का खर्च, न कौपियों का खर्च. पंडितजी एक शास्त्र ले कर आएंगे और हवनकुंड से निर्मित विशेष चक्रीय वातावरण में बच्चों को बैठा कर उन के दिमाग में डेटा ट्रांसफर कर देंगे. स्कूलों में तो बचपन में हम ने भी खूब चिल्लाचिल्ला कर सरस्वती वंदना की थी. अगर गुरुजी को होंठ हिलते नहीं दिखते थे तो डंडों की बौछार हो जाती थी और अगर जोर से गुरुजी को आवाज सुनाई दे जाती तो वे मुसकरा देते थे. ऐसा लगता जैसे सरस्वती का स्वर व विद्या हमारे बदले गुरुजी के दिमाग में घुस रही हो और गुरुजी को ठंडेठंडे नवरत्न तेल वाली कूलिंग का अनुभव हो रहा हो.

अभी कुछ दिनों पहले बाड़मेर के ही एक स्कूल की प्रार्थना का वीडियो देख रहा था, जिस में गुरुजी हारमोनियम बजा रहे थे. दिल को ऐसा सुकून मिल रहा था कि भई, भाड़ में जाए संविधान व धर्मनिरपेक्षता. हमें तो रामराज्य ही चाहिए. आप खुद सोचो कि छोटेछोटे बच्चे उठ कर हनुमान चालीसा पढ़ें, स्कूलों में तुलसीदास की चौपाइयां गाते लड़केलड़कियां नाचते रहें, शांत फिजाओं में वानर एकाएक उड़ने लग जाएं, बीचबीच में पुष्पक विमान के करतब दिखते रहें, हम घर से बाहर निकलें और आदमी के शरीर पर हाथी का सिर लगे विशेषटाइप के इंसान घूमते नजर आएं तो हमें और क्या चाहिए.

क्या करेंगे वैज्ञानिक शिक्षा से. हर जगह महंगाई का रोना. गाडि़यों के लिए महंगे पैट्रोलडीजल के चक्कर में हमारा तेल निकला जा रहा है. ऐसे में बिना ईंधन के पुष्पक विमान दोबारा उड़ने लगेंगे तो कितनी खुशी की बात होगी. नदियोंसमुद्रों को पार करने के लिए वानरभालू हम इंसानों के लिए पुल बनाएंगे. ग्लोबल वार्मिंग से मुक्ति के लिए हनुमानजी को बोल दें, वे 4-5 दिनों के लिए सूरज को ही गटक जाएंगे.

मालगाडि़यों व ट्रकों में बेतहाशा ईंधन फूंका जा रहा है, सड़कों पर पैसे बरबाद किए जा रहे हैं. आप सोचो, एक हाथ से द्रोणगिरि पर्वत को उठा कर उड़ने वाले हनुमानजी अकेले ही मालढुलाई का काम नहीं कर देंगे. सर्जिकल स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक चीखने की अब जरूरत ही नहीं रहेगी. हनुमानजी अकेले ही इसलामाबाद को आग लगा कर फूंक आएंगे. हथियारों की होड़ में देश का अकूत धन फूंका जा रहा है जबकि हमारे पास महामृत्युंजय जाप से दुश्मनों को खत्म करने वाले पंडितों की भरमार है. इन का उपयोग करेंगे तो पैसों की बचत होगी व हंगर इंडैक्स में शतक मारने की जलालत से इस देश को मुक्ति मिल जाएगी.

रोज मीडिया को हम गालियां देते हैं कि ये बिके हुए लोग हैं. तो सोचो, मीडिया का काम खुद नारदमुनि करने लगेंगे तो विश्वसनीयता में चारचांद लगेंगे कि नहीं. महाभारत वाला संजय बिना डिश के खर्चे के घटनाओं का लाइव टैलीकास्ट करेगा तो कितना मजा आएगा. तोड़नेमरोड़ने और एडिटिंग के सारे आरोपों से मुक्ति मिल जाएगी. बिगड़ते लिंगानुपात से जूझते देश में जब मिट्टी के घड़ों से लड़कियां निकलने लगेंगी तो एक तो हर कुंआरे के लिए पत्नी का इंतजाम हो जाएगा, दूसरा, मेरे जैसे ठालेबैठे व फोन में माथा मार रहे युवा लोग हल ले कर खेतों में जाएंगे तो किसानों की आय दोगुनी तो क्या, दसगुनी हो जाएगी.

अब बाड़मेर वाले गुरु ही इस देश को विश्वगुरु बनाएंगे. दिल्ली ने तो अकर्मण्यता की चादर ओढ़ ली है. ऐसे में वीरों की धरती वाले मरुस्थल के महापुरुष ही इस देश का कल्याण करेंगे.

गैरजिम्मेदार मातापिता और हिंसक बचपन

‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी, मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन…’ पर क्या आज के बच्चों का बचपन इतना सुहाना है कि वे उसे बारबार जीना चाहेंगे? जगजीत सिंह की इस गजल के विपरीत आज तो बच्चों का बचपन कहीं गुम ही हो गया है. आएदिन न्यूज चैनलों व समाचारपत्रों में बच्चों द्वारा परपस्पर एकदूसरे को मारनेपीटने की घटनाएं देखने और पढ़ने को मिलती हैं.

10 वर्षीय अभि ने एक दिन अपने से 2 साल छोटी बहन के हाथ पर इतनी जोर से काटा कि उस के हाथ से खून की धारा बह निकली. कारण सिर्फ इतना था कि बहन ने उस के बैग से स्कैचपैन ले लिए थे. कशिश की 12 वर्षीया बेटी बातबात पर चीखती है, गुस्से में घर का सामान इधरउधर फेंकने लगती है. कई बार तो वह खुद को ही चांटे मारना और बाल खींचना शुरू कर देती है.

दिन पर दिन बच्चे हिंसक होते जा रहे हैं, उन का बचपन खो सा गया है. वे अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. छोटीछोटी बातों पर चीखना, चिल्लाना, हिंसा करना और येनकेनप्रकारेण अपनी बात मनवाना उन की आदतों में शुमार हो चुका है. बच्चों के इस व्यवहार के पीछे उन की मानसिक अस्वस्थता है, जिस के कारण वे स्वयं पर से अपना नियंत्रण खो देते हैं. वे कई बार मानवीय संवेदना को झकझोर देने वाली कू्ररतम घटनाओं को अंजाम दे देते हैं. यही नहीं, छोटीछोटी घटनाओं से तनाव में आ कर वे स्थायी मानसिक अवसाद तक की अवस्था में चले जाते हैं और कई बार तो अपने जीवन को समाप्त करने के आत्मघाती कदम तक उठाने से पीछे नहीं हटते. बच्चे के इस तरह के व्यवहार के जिम्मेदार उस के मातापिता ही हैं, क्योंकि बच्चे की प्रथम पाठशाला उस का परिवार होता है और उस का अधिकांश समय अपने परिवार में ही व्यतीत होता है. अपनी जीवन की व्यस्ततम आपाधापी में पेरैंट्स कहीं न कहीं वे अपने उत्तरदायित्व को भलीभांति निभा पाने में असफल हैं.

क्या हैं कारण समाज का बदलता स्वरूप : कुछ दशकों में भारतीय समाज में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. संयुक्त परिवार का स्थान एकल परिवार ने ले लिया है. बढ़ती महंगाई में अपना लिविंग स्टैंडर्ड कायम रखने के लिए पतिपत्नी दोनों ही जीतोड़ मेहनत करते हैं. परिवार में बच्चों की संख्या एक या दो तक ही सिमट कर रह गई है. परिणामस्वरूप, परिवार में बच्चों का अकेलापन बढ़ गया है और मोबाइल, टीवी, टैब व लैपटौप पर उन की निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गई है.

एकल परिवार होने के कारण मातापिता के औफिस जाने के बाद उन के प्रश्नों का जवाब देने या बातचीत करने वाला कोई नहीं होता. जिस से समाज या किसी व्यक्ति विशेष के प्रति उन के मन में उत्पन्न उचित या अनुचित धारणा स्थायी रूप से अपना स्थान बना लेती है और वे धीरेधीरे मानसिक अस्वस्थता का शिकार होते जाते हैं. मातापिता दोनों ही कामकाजी होते हैं. काम के दबाव के चलते वे बच्चे के मन में चल रही भावनाओं से अनभिज्ञ

रह जाते हैं. भोपाल के मनोचिकित्सक डा. सत्येंद्र त्रिवेदी कहते हैं, ‘‘आजकल एक नया चलन चला है, वीकैंड पर बच्चों को क्वालिटी टाइम देने का, पर क्या है यह क्वालिटी टाइम? बच्चे को तो हर पल अपने मातापिता की आवश्यकता होती है अपनी बातें सुनाने के लिए, अपनी परेशानियां और उलझनें सुनाने के लिए. वीकैंड पर बिताया गया क्वालिटी टाइम हंसीखुशी में बीत जाता है और बच्चे की परेशानियां मन में ही रह जाती हैं.’’

आधुनिक तकनीक : बच्चों के लिए आधुनिक तकनीक वरदान नहीं, अभिशाप है. आज के दुधमुंहे बच्चे टीवी देख या मोबाइल हाथ आते ही रोना बंद कर देते हैं. जिन बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलना चाहिए वे आज टैब, लैपटौप और मोबाइल में आंखें गड़ाए नजर आते हैं. कुछ घरों में बच्चे पूरे दिन टीवी के सामने रिमोट थामे बैठे रहते हैं जबकि हम सभी जानते हैं कि टीवी पर हिंसा, मारपीट और सासबहू के झगड़े ही दिखाए जाते हैं. यहां तक कि कार्टून कैरेक्टर भी हिंसामारपीट से अछूते नहीं हैं. बच्चों को हिंसा, महिलाओं का तिरस्कार, गालीगलौज और खूनखराबे वाले कार्यक्रमों को नहीं देखना चाहिए. बच्चों में अनुकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है. वे जैसा देखते हैं वैसा ही सीखते

भी हैं. 10 वर्षीय आशु और उस की 3 वर्षीया बहन आशी प्रत्येक सीरियल नियमित देखते हैं. 3 वर्षीया वैष्णवी मोबाइल पर गेम खेलने में कईकई घंटे व्यस्त रहती है. यदि इस बीच कोई उस से मोबाइल ले लेता है तो वह जोरजोर से रोना और मारपीट करना शुरू कर देती है.

घरेलू वातावरण : उदिता के पिता को शराब पी कर घर पर मारपीट करने की आदत है. इस से उस का घर हर रोज महाभारत का मैदान बना रहता है. कई परिवारों में अभिभावक बातबात पर आपस में एकदूसरे पर चीखतेचिल्लाते रहते हैं, जिस का सीधा असर बच्चे के मनोमस्तिष्क पर पड़ता है. ऐसे घरों में बच्चा खुद को अकसर एकाकी महसूस करने लगता है. मातापिता का परस्पर व्यवहार देख कर वह उन से बात तक करने का साहस नहीं कर पाता. मातापिता का व्यवहार देख कर उसे भी दूसरों के साथ हिंसक व्यवहार करने की आदत हो जाती है. मीडिया का रोल : बच्चों द्वारा देश के किसी भी कोने में किसी भी प्रकार का हिंसात्मक व्यवहार किया जाता है, तो मीडिया उस घटना को बारबार और बढ़ाचढ़ा कर बताता है. ऐसे में मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चा इस प्रकार की घटना को एक आदर्श के तौर पर अपने मनोमस्तिष्क में स्थापित कर लेता है.

मातापिता की अपेक्षाएं : आज प्रत्येक मातापिता अपने बच्चे को डाक्टर, इंजीनियर और कलैक्टर बनाना चाहता है. कई बार अभिभावकों द्वारा बच्चे को ऐसे विषय दिला दिए जाते हैं जिन में उस की तनिक भी रुचि नहीं होती. बच्चा जब कक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता तो कक्षा में शिक्षक और घर में मातापिता उस पर बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव बनाने लगते हैं, जिस से वह परेशान होता है. अनीष शुरू से ही पढ़ाई में कमजोर था. 10वीं तक तो किसी तरह काम चल गया परंतु 12वीं में विज्ञान पढ़ना उस के लिए काफी कठिन हो गया. अपनी तरफ से कठोर परिश्रम करने के बाद भी वह लगातार फेल हो रहा था. स्कूल में शिक्षक उस की खिल्ली उड़ाते, घर में मातापिता का व्यवहार तानाशाहीभरा था. अपने मन की बात किसी से न कह पाने के कारण वह तनाव में रहने लगा. तनाव के कारण उसे रात में नींद आनी बंद हो गई. एक माह तक लगातार यही स्थिति रहने के कारण वह सिजनोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी का शिकार हो गया. उस का इलाज चल रहा है.

प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अकसर मातापिता को लगता है कि उन का बच्चा कहीं पिछड़ न जाए, इसलिए वे अपने बच्चों को स्कूल के साथसाथ टैनिस, पेंटिंग, डांस और क्ले मौडलिंग जैसी कक्षाओं में भी भेजते हैं. जिस से बच्चे को दो मिनट चैन की सांस तक लेने का वक्त नहीं मिलता. जबकि वास्तव में आज इन कक्षाओं की अपेक्षा बच्चों को भावनाओं, रिश्तों, जीवन मूल्यों की ओर तनावमुक्त जीवन जीने की शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है ताकि वे वर्तमान के साथसाथ अपना भविष्य भी सुखमय बना सकें.

लीक से हट कर चुनें कैरियर

कभी सोचा है कि चाय का स्वाद ले कर खासा पैसा कमाया जा सकता है या परफ्यूम की खुशबू सूंघ कर कैरियर बनाया जा सकता है. पालतू जानवरों की ग्रूमिंग और पपेट्री में भी डिगरीडिप्लोमा हासिल किए जा सकते हैं. एक साइबर हैकर बनने के लिए भी डिप्लोमा कोर्स है. आजकल फ्यूनरल मैनेजमैंट से ले कर साइन लैंग्वेज तक के कोर्स कराए जा रहे हैं. सुनने में ये कोर्स भले ही अजीब लगते हों, लेकिन आज इन्हीं में कैरियर की बढ़ती मांग और पैसा है. यंग जैनरेशन के लिए लीक से हट कर ये कोर्स उन के कैरियर व समय को देखते हुए बैस्ट साबित हो रहे हैं.

एथिकल हैकिंग

हैकिंग ऐक्सपर्ट बन कर आप डिगरी और नौकरी दोनों पा सकते हैं. कई बड़ी कंपनियां एथिकल हैकर्स को सिक्योरिटी के लिए हायर करती हैं. एथिकल हैकर्स कंपनियों की आईटी इन्फौर्मेशन व डाटाबेस को सुरक्षित रखते हैं. सुरक्षा एजेंसियां हैकर्स द्वारा किसी अकाउंट को हैक करा कर गोपनीय जानकारियां इकट्ठा करती हैं. इस से उन्हें अपनी जांच को आगे बढ़ाने या सुबूत जुटाने में मदद मिलती है. इस सब को देखते हुए एथिकल हैंकिंग का कोर्स कैरियर के लिहाज से काफी अहम है.

हैकिंग द्वारा हैकर आप के कंप्यूटर या आप के संबंधित अकाउंट पर पूरी तरह से हावी हो जाता है. इस के बाद उसे आप के डाटा को चुराने या खत्म करने की आजादी मिल जाती है. वाईफाई इंटरनैट कनैक्शन से चलने वाले सिस्टम को हैक करना ज्यादा आसान होता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटर में घुसपैठ की बढ़ती समस्या से निबटने के लिए एथिकल हैकिंग का नया कोर्स कैरियर के लिए विकल्प के तौर पर बेहतरीन मौका बन कर सामने आया है.

साइबर क्राइम का बढ़ना : आज इस कोर्स की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि आएदिन साइबर क्राइम  होते रहते हैं. यह कोर्स नया है, इस के बारे में लोगों को कम जानकारी है. लेकिन इस के विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है. जैसेजैसे लोगों की निर्भरता इंटरनैट पर बढ़ती जा रही है, नैटवर्क सिक्योरिटी एक चुनौती बनती जा रही है. इस लिहाज से आने वाले दिनों में एथिकल हैकर्स की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा होगी. हर कंपनी अपने डाटा को सुरक्षित रखने या प्रतिद्वंद्वी कंपनी की रणनीति को समझने के लिए एथिकल हैकर्स रखने लगी है.

क्या है नया : एथिकल हैकिंग

कोर्स में इंटरनैट से संबंधित तमाम चीजों के बारे में सिखाया जाता है. इस से संबंधित कोर्स में सिक्योरिटी टैस्टिंग की कार्यप्रणाली, स्निफिंग, प्रीविलेज एस्कलेशन, हैकिंग, अटैकिंग नैटवर्क वर्क सिस्टम, हैकिंग वैब ऐप्लिकेशन, क्रौस साइट स्क्रिप्टिंग, ब्रेकिंग आईपी, सिस्टम हैकिंग, पासवर्ड क्रैकिंग आदि से संबंधित जानकारी दी जाती है.

स्पा मैनेजमैंट

जब से लोगों ने अपनी हैल्थ और फिटनैस पर ध्यान देना शुरू किया है, स्पा बिजनैस में काफी बूम आया है. अब थ्रीस्टार और फाइवस्टार हौस्पिटैलिटी के कई स्पा खुल गए हैं. लिहाजा, ऐक्सपर्ट स्पा मैनेजरों की मांग बढ़ गई है. इन का काम पूरे स्पा को बेहतर तरीके से संभालना होता है. एक स्पा मैनेजर को स्टाफ पर नजर रखने के अलावा और्डर की सप्लाई, क्लाइंट्स को अच्छी सर्विस देने व स्पा में अधिक से अधिक लोगों को सर्विस लेने के लिए आने को प्रोत्साहित करना होता है. इस के अलावा, वह स्पा के लिए कुछ मार्केटिंग ऐक्टिविटीज व मार्केटिंग प्लानिंग्स में भी हिस्सा लेता है.

स्किल्स : आप का कंप्यूटरसेवी होने के साथ स्ट्रौंग कम्युनिकेशन स्किल व इंटरपर्सनल स्किल भी बेहतर होनी चाहिए. इतना ही नहीं, आप को पूरे स्पा को मैनेज करना होता है, इसलिए आप के भीतर और्गनाइजेशन स्किल भी अच्छी होनी चाहिए. आप को न सिर्फ अपने यहां कार्यरत लोगों की क्षमताओं को पहचानना आना चाहिए, बल्कि उन की क्षमताओं के हिसाब से उन से बेहतर काम करवाना भी आना चाहिए.

संभावनाएं : एक स्पा मैनेजर पार्टटाइम, फुलटाइम या कौन्ट्रैक्ट के आधार पर भी काम कर सकता है. स्पा मैनेजर की आवश्यकता होटल, रिसौर्ट, हैल्थ क्लब, क्रूज शिप या चिकित्सकीय सैलून आदि में होती है. एक स्पा मैनेजर विदेशों में जौब के लिए भी अप्लाई कर सकता है.

फोटोनिक्स

फोटोनिक्स का कोर्स आम साइंस के कोर्सों से हट कर है. जब से टैली कम्युनिकेशन का क्षेत्र बढ़ा है तब से कंप्यूटिंग, सिक्योरिटी समेत और भी कई कार्यप्रणालियों में फोटोनिक्स मुख्य तकनीक बन गई है. इस तकनीक का इस्तेमाल इमेजिंग, चिकित्सा व स्वास्थ्य सेवा, प्रतिरक्षा, औप्टिक्स व इलैक्ट्रौनिक्स, बायोटैक्नोलौजी,  चिकित्सा विज्ञान, सर्जरी, माइक्रोबायोलौजी और लाइफसाइंस में भी होता है.

कैसे मिलेगी ऐंट्री : देश के कई प्रमुख शिक्षण संस्थान फोटोनिक्स कोर्स की शिक्षा देते हैं. भौतिकी, रसायन और गणित विषय के साथ 12वीं की परीक्षा न्यूनतम 50 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण कैंडिडेट्स फोटोनिक्स ऐंड औप्टोमेट्रिक्स के ग्रेजुएशन कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं.

इस के अलावा, आप डिप्लोमा कोर्स में भी एंट्री ले सकते हैं. डिप्लोमा कोर्स करने के बाद आप फोटोनिक्स टैक्नीशियन बन सकते हैं. वैसे द्विवर्षीय टैक्नीशियन प्रोग्राम के जरिए भी फोटोनिक्स टैक्नीशियन बना जा सकता है.

पर्सनल स्किल : यदि आप इस में कैरियर बनाना चाहते हैं तो जरूरी है कि इस क्षेत्र में होने वाली नईनई गतिविधियों पर सतत निगाह रखें और ज्यादा से ज्यादा सीखने की कोशिश करें. आप की फिजिक्स व मैथमेटिक्स अच्छी होनी चाहिए. इस में इंस्ट्रूमैंट डिजाइन करने पड़ते हैं, लिहाजा क्रिएटिव होना भी जरूरी है.

कहां है नौकरी : इस क्षेत्र के विशेषज्ञ साइंटिस्ट के तौर पर भी काम कर सकते हैं. उन्हें फोटोनिक्स पर शोध का काम करना होता है. फोटोनिक्स इंजीनियर चाहें तो किसी अनुभवी इंजीनियर के सहायक बतौर अपना कैरियर शुरू कर सकते हैं. योग्यता और अनुभव के आधार पर आप आगे चल कर रिसर्च डायरैक्टर या प्रिंसिपल इंजीनियर भी बन सकते हैं.

कहां से करें : इंडियन इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी, मुंबई, नई दिल्ली, मणिपाल एकेडमी औफ हायर एजुकेशन, इंटरनैशनल स्कूल औफ फोटोनिक्स, कोचीन, सैंटर फौर एडवांस टैक्नोलौजी (केट), इंदौर, भाभा एटौमिक रिसर्च सैंटर, मुंबई, इंडियन इंस्टिट्यूट औफ साइंस, बेंगलुरु आदि संस्थानों से यह कोर्स किया जा सकता है.

पपेट्री

राजस्थान की लोककथाओं से निकल कर अब पपेट शो मौडर्न रंगढंग में रंग गए हैं. लगातार सरकारी उपेक्षा व उचित स्थान न मिलने के कारण यह कला धीरेधीरे लुप्त होने के कगार पर थी. लेकिन कई युवा थिएटर कलाकारों और कलाप्रेमियों ने इस कला को मौडर्न व एक कोर्स के रूप में शुरू करने का प्रयास किया है ताकि यह कला जिंदा रहे. इसे सीखने में सिर्फ उसी का मन रम सकता है जिस में क्रिएटिविटी हो और हर चीज को अलग नजरिए से देखता हो. किड्स इंटरटेनमैंट चैनलों और विज्ञापन एजेंसियों में इन की मांग हमेशा रहती है. लिज्जत पापड़ का वह खरगोश आज भी लोगों को याद है, वह पपेट का पहला विज्ञापन प्रयोग था.

कहां से करें : मुंबई यूनिवर्सिटी और कोलकाता पपेट थिएटर पपेट्री में सर्टिफिकेट कोर्स कराते हैं.

टी टेस्टिंग

अगर चाय पीने के शौकीन हैं तो टी टैस्टर बनना आप के लिए अच्छा कैरियर औप्शन हो सकता है. टी टैस्टर का काम अलगअलग चाय के स्वादों में अंतर समझना और टीलीफ, ग्रेड्स, कलर के बारे में जानकारी हासिल करना होता है. बेंगलुरू का इंडियन इंस्टिट्यूट औफ प्लांट मैनेजमैंट अपने सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए टी मार्केटिंग, टी बिजनैस, टी टैस्टिंग तकनीक के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देता है और डिप्लोमा व डिगरी दोनों कोर्स कराता है. यह कोर्स टी बोर्ड और वाणिज्य मंत्रालय के सहयोग से कराया जाता है. असम का डिप्रास इंस्टिट्यूट औफ प्रोफैशनल्स भी डिगरीडिप्लोमा कोर्स कराता है.

इमेज कंसल्टिंग

आप को ग्लैमर इंडस्ट्री के प्रति लगाव है तो इमेज कंसल्टैंट के तौर पर अपना कैरियर बना सकते हैं. फैशन और कम्युनिकेशन डिगरी से मिलतेजुलते इस सर्टिफिकेट कोर्स के जरिए आप को कौर्पोरेट और फिल्म इंडस्ट्री में बड़ी आसानी से हाईप्रोफाइल जौब मिल सकता है. इस कोर्स में आप को इमेज, स्टाइल, एटिकेट, कंडक्ट, लैंग्वेज और बिहेवियर जैसे जरूरी टौपिक्स के बारे में ट्रेनिंग दी जाती है और फिर आप टौप पर्सनैलिटीज की इमेज बनाने में उन की मदद करते हैं.

पैट ग्रूमिंग

आप पैसा कमाने के साथ यदि जानवरों के साथ भी कुछ वक्त बिताना चाहते हैं तो पैट ग्रूमिंग में कैरियर बना सकते हैं. आजकल लोग अपने पालतू जानवरों की देखभाल के पीछे काफी पैसा खर्च करने को तैयार हैं. लोग ऐसे प्रोफैशनल्स की तलाश में रहते हैं जो उन के पैट्स को अच्छी तरह से शेप में रखें. साथ ही, पैट शोज और कंपीटिशंस भी काफी बढ़ गए हैं, इस को देखते हुए भी पैट ग्रूमर्स की डिमांड बढ़ गई है. यही वजह है कि कई वेटेरिनरी कालेज और टौप ग्रूमिंग इंस्टिट्यूट में इस के डिगरी कोर्सेज उपलब्ध हैं.

म्यूजिओलौजी

जिन की रुचि हिस्ट्री में है या जिन का दिमाग हमेशा एंटीक चीजों की तलाश व जानकारी जुटाने में लगा रहता है, म्यूजिओलौजी स्टडी उन के कैरियर के लिए बहुत अच्छा कदम साबित होगी. इस में आर्कियोलौजी, म्यूजियम मैनेजमैंट ऐंड कल्चर की जानकारी दी जाती है. नैशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट औफ हिस्ट्री ऐंड आर्ट, कन्वर्सेशन ऐंड म्यूजिओलौजी, नई दिल्ली कई कोर्स चलाते हैं. कोलकाता यूनिवर्सिटी भी एमए और एमएससी की डिगरी देती है.

बैचलर औफ रूरल स्टडी

भारत की आधी से ज्यादा आबादी जहां रहती है और आप उस से प्यार करते हैं तो बैचलर औफ रूरल स्टडी का कोर्स आप के लिए सब से अच्छा साबित होगा. इस कोर्स में एग्रीकल्चर, चाइल्ड डैवलपमैंट, रूरल मैनेजमैंट, कम्युनिटी डैवलपमैंट आदि विषय शामिल रहते हैं. गुजरात, उत्तर प्रदेश के कालेज डिप्लोमा कोर्स कराते हैं. भावनगर, यूनिवर्सिटी रूरल स्टडी में बैचलर और मास्टर डिगरी भी देती है.

जेरैंटोलौजी

उम्र बढ़ने पर साइकोलौजिकल और बायोलौजिकल क्या प्रभाव होते हैं, जेरैंटोलौजी में इस का अध्ययन किया जाता है. कई ओल्डएज होम और प्राइवेट व सरकारी हैल्थ सैक्टर्स में ऐसे पेशेवरों की मांग रहती है. आज कई ऐसे नर्गिंसहोम और हौस्पिटल हैं जो बुजुर्ग के इलाज और केयर के लिए जेरैंटोलौजी में डिगरी लेने वाले की तलाश में रहते हैं. इंस्टिट्यूट औफ होम इकोनौमिक्स नई दिल्ली, राम नारायण रुइया कालेज मुंबई, कोलकाता मैट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट औफ जेरैंटोलौजी में डिगरी और सर्टिफिकेट कोर्स करवाते हैं.

चुनाव और फेसबुक व्हाट्सऐप

फेसबुक ने भारतीय चुनाव आयोग को भरोसा दिलाया है कि अगले चुनावों से पहले वह फेक यानी झूठी खबरों को रोकने की पूरी कोशिश करेगा. इस तरह के छद्म समाचार को फेसबुक एक खास एल्ग्रोथिम के जरिए अपनेआप रोक देगा, उन्हें फौरवर्ड नहीं होने देगा. सोशल मीडिया के दूसरे अहम माध्यम व्हाट्सऐप ने भी इसी तरह का भरोसा दिलाया है.

फेक न्यूज यानी झूठी खबरें या कहें अफवाहें दुनियाभर की चिंता का विषय बन गई हैं. विचारों की स्वतंत्रता पर हमेशा ही झूठी खबरें या झूठे तथ्य देने पर अंकुश रहा है. जो स्वतंत्रता के हामी हैं उन्होंने भी कभी दुर्भावनाभरी बातों को प्रसारित करने का समर्थन नहीं किया.

पहले छपाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं थी. फेक न्यूज केवल अफवाहों के जरिए कानों से कानों तक पहुंचाई जा सकती थी. उस समय छपी सामग्री जिम्मेदार लोगों के हाथों में रहती थी. हर कोई प्रैस या छापाखाना स्थापित कर फेक न्यूज वाला अपना अखबार नहीं निकाल सकता था.

अब तो घर में बैठ कर ही पटियाला या प्लानीपट्टम में हुई मारपीट का वीडियो बनाया जा सकता है. लेटिन अमेरिकी फिल्मों के दृश्यों को कई बार आसानी से मार्फिंग और फोटोशौप के जरिए उन्हें भारतीय पृष्ठभूमि में बदल कर मुसलिमों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचार के रूप में दर्शाया जा सकता है.

जो लोग सदियों से पौराणिक झूठी खबरों पर विश्वास कर रहे हैं, जिन में प्रधानमंत्री से ले कर अधिकांश मंत्री शामिल हैं, वे इस तरह की फेक न्यूज पर विश्वास कर लेते हैं. तर्क शब्द तो उन की भाषा में है ही नहीं. वे तो विश्वास करते हैं कि मेढकमेढकी की शादी करा कर बारिश कराई जा सकती है या सर्जरी से हाथी का सिर आदमी पर लगाया जा सकता है और फिर उसे चूहे पर सवारी कराई जा सकती है.

उन्हीं लोगों ने फेक न्यूज का जम कर प्रचार किया है क्योंकि वे उस का लाभ उठाना जानते हैं और उठा भी रहे हैं. फेसबुक और व्हाट्सऐप ने अगर इन्हें बंद कर दिया तो जान लीजिए कि ये दोनों सोशल मीडिया के स्तंभ समाप्तप्राय हो जाएंगे.

तर्क की बात सुनने की व सत्य सहने की ताकत और बुद्धि भारतीयों में है ही नहीं. जो थोड़ी बहुत 1950 और 1960 के दशकों में दिखी थी वह अब तक गंगा के पानी की तरह जहरीली हो गई है. ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि फेसबुक और व्हाट्सऐप का अंत अब निकट ही है.

केजरीवाल बनाम मोदी : कोर्टों में लड़ाई

जब से ‘आप’ के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तब से उन्होंने दिल्ली वालों के हकों की लड़ाई लड़ने में कसर नहीं छोड़ी है. आज आलम यह है कि वे दिल्ली में मुख्यमंत्री की ताकत को बढ़वाने के लिए उपराज्यपाल के साथसाथ केंद्र सरकार से भी लोहा ले रहे हैं.

दरअसल, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला हुआ है. ऐसे में इस आधेअधूरे राज्य को ले कर कुछ फैसले लेने का हक केंद्र सरकार के पास है तो कुछ राज्य सरकार के पास.

जब तक अरविंद केजरीवाल की पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ ने दिल्ली से कांग्रेस के ‘हाथ’ और भारतीय जनता पार्टी के ‘कमल’ को पिछले विधानसभा चुनाव में बुहारा नहीं था, तब तक यहां इस तरह की नौबत नहीं आई थी कि बागडोर उपराज्यपाल के हाथ में है या मुख्यमंत्री के हाथ में, क्योंकि दोनों एक ही पार्टी के होते थे.

असली घमासान तभी शुरू हो गया था जब साल 2014 में दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटें जीत कर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने सीना तान कर विधानसभा में ऐंट्री मारी थी.

लोकसभा चुनावों के कुछ महीनों बाद ही अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के माथे पर काला टीका जड़ दिया था. तभी से केंद्र सरकार की शह पर उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री में ‘दिल्ली का बौस कौन ’की लड़ाई का बिगुल बज गया था.

खेल मानहानि का

इस अदालती खेल की शुरुआत कांग्रेस ने की थी. साल 2013 में दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित के राजनीतिक सचिव पवन खेड़ा ने अरविंद केजरीवाल पर केस किया था.

इस मामले पर तब अरविंद केजरीवाल ने खुद को बेकुसूर बताते हुए दलील दी थी कि पवन खेड़ा पीडि़त शख्स नहीं हैं और उन के खिलाफ शिकायत गलत है. पवन खेड़ा के पास यह मामला दर्ज करने का कोई हक नहीं है. शिकायत करने वाले पवन खेड़ा न तो कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं, न ही उन्होंने शीला दीक्षित के साथ अपने संबंधों का साफतौर पर खुलासा किया है.

साल 2013 में ही अमित सिब्बल ने भी अरविंद केजरीवाल पर मानहानि का केस कर दिया था. केजरीवाल ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने एक दूरसंचार कंपनी की पैरवी करने के लिए अपने पिता कपिल सिब्बल के पद का फायदा उठाया था.

साल 2014 में अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के दिग्गज नेता नितिन गडकरी को भारत के सब से भ्रष्ट नेताओं की लिस्ट में शुमार किया था. साथ ही, उन्होंने अरुण जेटली पर भी दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में हो रही धांधली में चुप्पी साधे रहने पर सवाल उठाए थे. उन का कहना था कि उन की नाक के नीचे भ्रष्टाचार हुआ था और उन्होंने कुछ नहीं किया.

अरविंद केजरीवाल ने ऐसे जो भी आरोप लगाए थे उन में उन के खिलाफ मानहानि के केस दर्ज करा दिए गए थे. बाद में उन्हें एहसास हुआ कि इस तरह के मसलों में उलझे रहने से वे बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली की जनता की भलाई के काम नहीं कर पाएंगे और साथ ही उन की इमेज पर भी बुरा असर पड़ रहा था. लिहाजा, इन केसों से नजात पाने के लिए उन्होंने संबंधित नेताओं से बात करना शुरू किया.

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने इस मसले पर बताया कि ये मानहानि के मामले हमारे राजनीतिक विरोधियों द्वारा हमें कमजोर करने और हमारे नेतृत्व को इन कानूनी मामलों में उलझाए रखने के लिए दर्ज कराए गए हैं. सभी मामलों को आपसी सहमति से सुलझाने का फैसला पार्टी की लीगल टीम की सलाह पर लिया गया.

दूसरों को भी तंग किया

जब अरविंद केजरीवाल या उन की पार्टी के दूसरे नेताओं ने मानहानि के मुकदमों में माफी मांगी तो पहली नजर में लगा कि वे हार गए हैं. उन्होंने केवल चर्चा में बने रहने के लिए ये मामले उछाले थे ताकि भ्रष्टाचार की परतें उघाड़ने के नाम पर दिल्ली की जनता की वाहवाही लूट सकें.

लेकिन माफी मांग कर अरविंद केजरीवाल ने सियासत में लंबे समय तक टिके रहने का टिकट पा लिया था क्योंकि मानहानि के किसी भी केस में अगर कोई कोर्ट उन्हें सजा सुना देती तो शायद उन का राजनीतिक कैरियर ही खत्म हो जाता.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी को कहां चैन था. साल 2016 में ‘आप’ के विधायक सोमनाथ भारती के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया था. इस से पहले विधायक संदीप कुमार और अमानतुल्ला खान पर भी मामला दर्ज किया था.

विधायक सोमनाथ भारती पर एम्स के चीफ सैक्रेटरी ने मामला दर्ज कराया था. उन्होंने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और एम्स के चीफ सिक्योरिटी अफसर को धमकाने का आरोप लगाया था.

साथ ही, उन्होंने यह भी कहा था कि विधायक ने बिना किसी सरकारी आदेश के जेसीबी मशीन से जबरन एम्स का गेट तुड़वाने की कोशिश की.

दरअसल, दिल्ली पुलिस की बागडोर दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है. यह केंद्र सरकार के अधीन है और अरविंद केजरीवाल की सरकार ने बारबार जनता को यह बताने की कोशिश की थी कि चूंकि भाजपा सरकार का उन पर बस नहीं चलता है, लिहाजा वह उन के विधायकों को तंग करने के मकसद से पुलिस में मामले दर्ज करा कर उन के हौसलों को तोड़ना चाहती है.

इसी तरह दिल्ली के प्रमुख सचिव अंशु प्रकाश के साथ तथाकथित मारपीट के आरोप में आम आदमी पार्टी के ओखला के विधायक अमानतुल्ला खान और देवली से विधायक प्रकाश जारवाल को गिरफ्तार कर 14 दिनों की हिरासत में भेज दिया था.

इस मसले पर दिल्ली पुलिस के वकील की दलील थी कि जांच जारी रहने तक उन विधायकों को जमानत न दी जाए. बाद में कोर्ट ने विधायकों की याचिका रद्द कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था.

आम आदमी पार्टी ने इस केस के सिलसिले में आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सलाहकार बीके जैन पर बयान बदलने का दबाव बनाया था. बीके जैन को हिरासत में ले कर पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया था.

आम आदमी पार्टी के लिए सब से बड़ा मामला लाभ के पद पर बैठे विधायकों की लड़ाई से जुड़ा था कि लाभ के पद के मामलों में चुनाव आयोग ने विधायकों की मान्यता रद्द कर दी थी. इस पर विपक्ष खासकर भारतीय जनता पार्टी ने जम कर चुटकी ली थी और इसे मीडिया की सुर्खियां बना दिया था.

पर आप वालों ने हिम्मत नहीं हारी और हाईकोर्ट में याचिका दे दी. दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की सिफारिश को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि विधायकों की अयोग्यता पर फिर से विचार किया जाए.

हाईकोर्ट के इस फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए तब अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर मैसेज किया था, ‘सत्य की जीत हुई. दिल्ली के लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को गलत तरीके से बरखास्त किया गया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के लोगों को न्याय दिया. दिल्ली के लोगों की बड़ी जीत.’

दरअसल, मार्च 2015 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था, जिस के बाद विपक्ष ने विधायक रहते हुए इन्हें लाभ का पद देने का आरोप लगाया था. हाईकोर्ट ने उन के 20 विधायकों को राहत दी थी.

उलझे उपराज्यपाल

भारतीय जनता पार्टी पिछले 3 साल से उपराज्यपाल के मारफत दिल्ली पर राज करना चाहती है ताकि अरविंद केजरीवाल को निकम्मा साबित कर सके.

अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट से 3 चीजें चाहते हैं जो अगर मिल जाएं तो केजरीवाल के मुताबिक दिल्ली में गवर्नेंस नए लैवल पर दिखाई देगी. वे 3 चीजें इस तरह हैं:

सलाह : इस शब्द पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार में लंबी लड़ाई चली है. दरअसल, संविधान का एक आर्टिकल 239ए है. इस के तहत दिल्ली में विधानसभा, मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल की व्यवस्था की गई है.

इस में ही एक हिस्सा है आर्टिकल 239एए (4). इस में लिखा गया है कि दिल्ली में उपराज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर काम करेंगे, पर पूरे कानून में यह कहीं पर नहीं लिखा है कि चुने हुए मुख्यमंत्री की सलाह मानना उपराज्यपाल के लिए जरूरी है या नहीं.

दूसरे राज्यों में वहां के राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य होते हैं, पर दिल्ली में ऐसा नहीं है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कहा है कि उपराज्यपाल जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल की सलाह ले सकते हैं, पर सलाह मानने को बाध्य नहीं हैं.

अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि कुछ विषयों को छोड़ कर उपराज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य हों, ताकि दिल्ली में चुनी हुई सरकार अपने हिसाब से काम कर सके.

सर्विसेज : दिल्ली की केजरीवाल सरकार के पास किसी भी कार्मचारी या अधिकारी की ट्रांसफरपोस्टिंग का अधिकार नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर के इस को केंद्र सरकार का विषय बताया था. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी थी.

केजरीवाल सरकार कहती है कि शीला दीक्षित के समय में सर्विसेज विभाग चुनी हुई सरकार के पास था लेकिन केंद्र ने केजरीवाल सरकार से यह अधिकार छीन लिया, जिस से एक अधिकारी या कर्मचारी पर चुनी हुई सरकार का कंट्रोल खत्म हो गया है.

एंटी करप्शन ब्रांच : अरविंद केजरीवाल और उन की आम आदमी पार्टी का उदय ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के मुद्दे पर हुआ था, तभी तो सरकार में आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपनी एंटी करप्शन ब्रांच के लिए भ्रष्टाचार पर कार्यवाही शुरू की और बड़ी तेजी से केस दर्ज किए लेकिन जून, 2015 में उपराज्यपाल ने अपनी पसंद के अधिकारी को एंटी करप्शन ब्रांच में नियुक्त कर दिया जिस से केजरीवाल का यह बड़ा हथियार उन के हाथ से निकल गया.

जहां तक सर्विसेज की बात है तो अरविंद केजरीवाल ने यहां तक कहा कि आईएएस अफसर तो एक तरह से हड़ताल पर चले गए हैं और इसी सिलसिले पर वे 11 जून, 2018 को उपराज्यपाल से मिलने उन के दफ्तर गए थे. तब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सोशल मीडिया पर अपनी 3 मांगों को गिनाया था.

मनीष सिसोदिया ने कहा था कि वे हड़ताल के बारे में उपराज्यपाल से 5 बार मिले लेकिन उन्होंने इसे खत्म कराने के लिए कुछ नहीं किया.

गौरतलब है कि मुख्य सचिव अंशु प्रकाश पर अरविंद केजरीवाल के आवास पर फरवरी, 2018 में हुए तथाकथित हमले के बाद से दिल्ली सरकार और नौकरशाही के बीच तीखी तकरार चल रही थी.

जब यह मामला सुलझने के बजाय उलझता चला गया तो 11 जून, 2018 को अरविंद केजरीवाल और उन की कैबिनेट के कुछ सदस्यों ने उपराज्यपाल अनिल बैजल से राजनिवास पर मुलाकात की और मनीष सिसोदिया द्वारा बताई गई अपनी तीनों मांगों के स्वीकार होने तक उन के दफ्तर में बैठे रहने का फैसला किया.

उसी दिन शाम के 6 बजे अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के जरीए अपनी बात जनता के सामने रखते हुए कहा कि उन्होंने उपराज्यपाल अनिल बैजल को एक चिट्ठी सौंपी. उपराज्यपाल ने कार्यवाही करने से इनकार कर दिया.

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय के इस धरने पर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने कहा कि अधिकारी किसी हड़ताल पर नहीं हैं और उन्होंने मुख्यमंत्री को विश्वास का माहौल बनाने और नौकरशाही की वास्तविक समस्याओं को हल करने की सलाह दी.

लेकिन अरविंद केजरीवाल राजभवन से टस से मस न हुए. धरने के चौथे दिन उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री को भी इस आरपार की लड़ाई में शामिल कर लिया.

इस मुद्दे पर उन्होंने नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी कि उपराज्यपाल हमारी बातें नहीं सुन रहे हैं. मैं आप से अपील करता हूं कि आप इस मामले में दखल दें और पिछले 3 महीने से जो आईएएस अधिकारियों की हड़ताल जारी है उसे खत्म कराएं.

उपराज्यपाल के निवास पर मुख्यमंत्री का धरना हो और सियासत न गरमाए, ऐसा हो नहीं सकता. आम आदमी पार्टी के नेता और राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने कहा कि आईएएस अधिकारी और उपराज्यपाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कठपुतली हैं.

दिल्ली में विपक्ष के नेता भाजपाई बिजेंद्र गुप्ता ने अरविंद केजरीवाल के इस धरने पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘वे लोग एयरकंडीशंड कार्यालय में धरने पर बैठे हुए हैं और बाहर उन्हें स्वादिष्ठ भोजन दिया जा रहा है, जबकि दिल्ली के लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. यह काम से भागने का एक नया तरीका है.’’

धरने का यह हाई वोल्टेज ड्रामा

9 दिनों तक चला. 4 जुलाई, 2018 को अपने ऐतिहासिक फैसले में जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली में फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं. उपराज्यपाल को कैबिनेट की सलाह के अनुसार ही काम करना होगा.

इस के अलावा सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना मुमकिन नहीं है.

इस फैसले के बाद अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह दिल्ली के लोगों और लोकतंत्र की जीत है.

इस के उलट केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इस मुद्दे पर ब्लौग लिख कर केजरीवाल सरकार को जवाब दिया. उन्होंने लिखा कि इस फैसले को किसी एक की जीत और दूसरे की हार के तौर पर नहीं देखना चाहिए. दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में पुलिस नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न तो किसी की शक्तियों को बढ़ाया है और न ही किसी की शक्तियां पहले की तुलना में कम की हैं.

अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में कौन कहलाएगा दिल्ली का असली सर्वेसर्वा.

फिल्म ‘मुल्क’ की रिलीज पर कोर्ट ने लगाई रोक

मुंबई की एक सेशन कोर्ट ने फिल्म ‘मुल्क’ की रिलीज पर फिलहाल रोक लगा दी है. ऋषि कपूर और तापसी पन्नू स्टारर ये फिल्म 3 अगस्त को रिलीज होनी है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता वंदना पुनवानी की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये रोक लगाई. वंदना ने आरोप लगाए है कि फिल्म बनाने में सहयोगी इंटरटेंटमेंट एजेंसी बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड ने उनकी प्रापर्टी का फिल्म बनाने में प्रयोग किया था. इस कंपनी ने अब बत उनकी प्रापर्टी का किराया नहीं चुकाया है.

याचिकाकर्ता ने कहा नहीं दिया किराया

याचिका कर्ता ने मांग की है कि जब तक बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड से प्रापर्टी के किराए से संबंधित विवाद सुलझ नहीं जाता तब तक फिल्म की रिलीज पर रोक लगायी जानी चाहिए. याचिका कर्ता के अनुसार एजेंसी ने वर्ष 2011 में उनका बंगला किराए पर लिया था. इस बंगले को वो औफिस के तौर पर प्रयोग करना चाहते थे. लेकिन स्थानीय निकाय की ओर से उन्हें रेजिडेंशियल प्रापर्टी को कौमर्शियल प्रापर्टी के तौर पर प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी. ऐसे में इस एजेंसी ने कराया देने से इनकार कर दिया.

bollywood

याचिकाकर्ता ने मांगे 50 लाख रुपये

याचिकाकर्ता ने वर्ष 2016 में डिंडोशी सत्र अदालत में अपील कर किराया दिलाए जाने की मांग की थी. उन्होंने इस बंगले का किराया लगभग 50 लाख रुपये के करीब मांगा है. पुनवानी ने महीने की शुरुआत में ही याचिका दाखिल कर विवाद सुलझने के पहले फिल्म की रिलीज को रोकने की मांग की है. एडिशनल सेशन जज एमएच शेख ने सोमवार को याचिका की सुनवाई के दौरान फिल्म की रिलीज पर आंतिरिक रोक लगाने का निर्देश दिया है. इस मामले में अगली सुनवाई 2 अगस्त को होनी है.

निदेशक ने कहा अभी नहीं मिले आदेश

फिल्म के निदेशक अनुभव सिन्हा के वकील विभव कृष्णा के अनुसार पुनवानी ने गलत आरोप लगाए हैं कि ‘बनारस मीडिया वर्क्स लिमिटेड’ के मुल्क के निदेशक अनुभव सिन्हा से संबंध हैं. हमें फिल्म पर रोक लगाए जाने के न्यायालय के आदेश की कौपी मिलते ही हम इसे मुम्बई हाई कोर्ट में चुनौती देंगे. न्यायालय के इस आदेश पर फिल्म के निदेशक अनुभव सिन्हा ने कहा कि हमें फिलहाल फिल्म पर रोक लीगाने के आदेश की कौपी नहीं मिली है.

फातिमा और सान्या ने किया ‘दिलबर’ पर जोरदार डांस

सुपरस्टार आमिर खान की फिल्‍म ‘दंगल’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत करने वाली अदाकारा फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा इन दिनों अपने डांस वीडियो को लेकर सुर्खियों में हैं. फिल्म में दोनों ने गीता और बबीता का रोल अदा किया था. फिल्म को काफी समय हो गया लेकिन इन दोनों की दोस्ती अभी भी कायम है.

इन्हें अक्सर आमिर खान के साथ या फिर एक-दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करते हुए देखा जाता है. अखाड़े में दंगल करने वाली ये अभिनेत्रियां असल जिंदगी में बेहतरीन डांसर हैं, इसका अंदाजा आप सान्या और फातिमा के इन ताजा वीडियो से लगा सकते हैं.

सोशल मीडिया प्लैटफौर्म इंस्टाग्राम पर इन्होंने अपने इन डांस वीडियो को शेयर किया है. वीडियो में दोनों ही ऐक्ट्रेस ‘सत्यमेव जयते’ के सुपरहिट ट्रैक ‘दिलबर’ पर डांस करती नजर आ रही हैं. सान्या के अलावा फातिमा ने भी अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर वीडियो शेयर किया है जिसमें दोनों एक साथ डांस करती नजर आ रही हैं.

A post shared by Shazeb Sheikh (@shazebsheikh) on

सान्या और फतिमा ने इसी गाने के चार और वीडियो भी जारी किए हैं. वीडियो में दोनों कोरियोग्राफर शाजेब शेख के साथ थिरक रही हैं.

बता दें, ‘दंगल’ से मिली पौपुलैरिटी के बाद सान्या और फातिमा बौलीवुड में अपने पैर जमा रही हैं. फातिमा जल्द ही आमिर खान स्टारर फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ में नजर आएंगी. जबकि सान्या मल्होत्रा अभिनेता आयुष्मान खुराना के साथ फिल्म ‘बधाई हो’ में दिखाई देंगी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें