जान न पहचान ये मेरे मेहमान

मेरा शहर एक जानामाना पर्यटन स्थल है. इस वजह से मेरे सारे रिश्तेदार, जिन्हें मैं नहीं जानता वे भी जाने कहांकहां के रिश्ते निकाल कर मेरे घर तशरीफ का टोकरा निहायत ही बेशर्मी से उठा लाते हैं. फिर बड़े मजे से सैरसपाटा करते हैं. और हम अपनी सारी, यानी गरमी, दीवाली व क्रिसमस की छुट्टियां इन रिश्तेदारों की सेवा में होम कर देते हैं.

एक दिन मेरे बाप के नाना के बेटे के साले का खत आया कि वे इस बार छुट्टियां मनाने हमारे शहर आ रहे हैं और अगर हमारे रहते वे होटल में ठहरें तो हमें अच्छा नहीं लगेगा. लिहाजा, वे हमारे ही घर में ठहरेंगे.

मैं अपने बाल नोचते हुए सोच रहा था कि ये महाशय कौन हैं और मुझ से कब मिले. इस चक्कर में मैं ने अपने कई खूबसूरत बालों का नुकसान कर डाला. पर याद नहीं आया कि मैं उन से कभी मिला था. मेरी परेशानी भांपते हुए पत्नी ने सुझाव दिया, ‘‘इन की चाकरी से बचने के लिए घर को ताला लगा कर अपन ही कहीं चलते हैं. कभी कोई पूछेगा तो कह देंगे कि पत्र ही नहीं मिला.’’

‘‘वाहवाह, क्या आइडिया है,’’ खुशी के अतिरेक में मैं ने श्रीमती को बांहों में भर कर एक चुम्मा ले लिया. फिर तुरतफुरत ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के एक बढि़या पहाड़ी स्टेशन के टिकट बुक करवा लिए.

हमारी दूसरे दिन सुबह 10 बजे की बस थी. हम ने जल्दीजल्दी तैयारी की. सब सामान पैक कर लिया कि सुबह नाश्ता कर के चल देंगे, यह सोच कर सारी रात चैन की नींद भी सोए. मैं सपने में पहाड़ों पर घूमने का मजा ले रहा था कि घंटी की कर्कश ध्वनि से नींद खुल गई. घड़ी देखी, सुबह के 6 बजे थे.

‘सुबहसुबह कौन आ मरा,’ सोचते हुए दरवाजा खोला तो बड़ीबड़ी मूंछों वाले श्रीमानजी, टुनटुन को मात करती श्रीमतीजी और चेहरे से बदमाश नजर आते 5 बच्चे मय सामान के सामने खड़े थे. मेरे दिमाग में खतरे की घंटी बजी कि जरूर चिट्ठी वाले बिन बुलाए मेहमान ही होंगे. फिर भी पूछा, ‘‘कौन हैं आप?’’

‘‘अरे, कमाल करते हैं,’’ मूंछ वाले ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, ‘‘हम ने चिट्ठी लिखी तो थी…बताया तो था कि हम कौन हैं.’’

‘‘लेकिन मैं तो आप को जानता ही नहीं, आप से कभी मिला ही नहीं. कैसे विश्वास कर लूं कि आप उन के साले ही हैं, कोई धोखेबाज नहीं.’’

‘‘ओए,’’ उन्होंने कड़क कर कहा, ‘‘हम को धोखेबाज कहता है. वह तो आप के बाप के नाना के बेटे यानी मेरी बहन के ससुर ने जोर दे कर कहा था कि उन्हीं के यहां ठहरना, इसलिए हम यहां आए हैं वरना इस शहर में होटलों की कमी नहीं है. रही बात मिलने की, पहले नहीं मिले तो अब मिल लो,’’ उस ने जबरदस्ती मेरा हाथ उठाया और जोरजोर से हिला कर बोला, ‘‘हैलो, मैं हूं गजेंद्र प्रताप. कैसे हैं आप? लो, हो गई जानपहचान,’’ कह कर उस ने मेरा हाथ छोड़ दिया.

मैं अपने दुखते हाथ को सहला ही रहा था कि उस गज जैसे गजेंद्र प्रताप ने बच्चों को आदेश दिया, ‘‘चलो बच्चो, अंदर चलो, यहां खड़ेखड़े तो पैर दुखने लगे हैं.’’

इतना सुनते ही बच्चों ने वानर सेना की तरह मुझे लगभग दरवाजे से धक्का दे कर हटाते हुए अंदर प्रवेश किया और जूतों समेत सोफे व दीवान पर चढ़ कर शोर मचाने लगे. मेरी पत्नी और बच्चे हैरानी से यह नजारा देख रहे थे. सोफों और दीवान की दुर्दशा देख कर श्रीमती का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था, पर मैं ने इशारे से उन्हें शांत रहने को कहा और गजेंद्र प्रताप व उन के परिवार से उस का परिचय करवाया. परिचय के बाद वह टुनटुन की बहन इतनी जोर से सोफे पर बैठी कि मेरी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई. सोचा, ‘आज जरूर इस सोफे का अंतिम संस्कार हो जाएगा.’

पर मेरी हालत की परवा किए बगैर वह बेफिक्री से मेरी पत्नी को और्डर दे रही थी, ‘‘भई, अब जरा कुछ बढि़या सी चायवाय हो जाए तो हम फ्रैश हो कर घूमने निकलें. और हां, जरा हमारा सामान भी हमारे कमरे में पहुंचा देना. हमारे लिए एक कमरा तो आप ने तैयार किया ही होगा?’’

हम ने बच्चों के साथ मिल कर उन का सामान बच्चों के कमरे में रखवाया.

उधर कुढ़ते हुए पत्नी ने रसोई में प्रवेश किया. पीछेपीछे हम भी पहुंचे. शयनकक्ष में अपने पैक पड़े सूटकेसों पर नजर पड़ते ही मुंह से आह निकल गई. मेहमानों को मन ही मन कोसते सूटकेसों को ऐसा का ऐसा वापस ऊपर चढ़ाया. ट्रैवल एजेंसी को फोन कर के टिकट रद्द करवाए. आधा नुकसान तो यही हो गया.

श्रीमती चाय ले कर पहुंची तो चाय देखते ही बच्चे इस तरह प्यालों पर झपटे कि 2 प्याले तो वहीं शहीद हो गए. अपने टी सैट की बरबादी पर हमारी श्रीमती अपने आंसू नहीं रोक पाई तो व्यंग्य सुनाई पड़ा, ‘‘अरे, 2 प्याले टूटने पर इतना हंगामा…हमारे घर में तो कोई चीज साबुत ही नहीं मिलती. इस तरह तो यहां बातबात पर हमारा अपमान होता रहेगा,’’ उठने का उपक्रम किए बिना उस ने आगे कहा, ‘‘चलो जी, चलो, इस से तो अच्छा है कि हम किसी होटल में ही रह लेंगे.’’

मुझ में आशा की किरण जागी, लेकिन फिर बुझ गई क्योंकि वह अब बाथरूम का पता पूछ रही थीं. साबुन, पानी और बाथरूम का सत्यानाश कर के जब वे नाश्ते की मेज पर आए तो पत्नी के साथ मेरा भी दिल धकधक कर रहा था. नाश्ते की मेज पर डबलरोटी और मक्खन देख कर श्रीमतीजी ने नौकभौं चढ़ाई, ‘‘अरे, सिर्फ सूखी डबलरोटी और मक्खन? मेरे बच्चे यह सब तो खाते ही नहीं हैं. पप्पू को तो नाश्ते में उबला अंडा चाहिए, सोनू को आलू की सब्जी और पूरी, मोनू को समोसा, चिंटू को कचौरी और टोनी को परांठा. और हम दोनों तो इन के नाश्ते में से ही अपना हिस्सा निकाल लेते हैं.’’

फिर जैसे मेहरबानी करते हुए बोले, ‘‘आज तो आप रहने दें, हम लोग बाहर ही कुछ खा लेंगे और आप लोग भी घूमने के लिए जल्दी से तैयार हो जाइए, आप भी हमारे साथ ही घूम लीजिएगा. अनजान जगह पर हमें भी आराम रहेगा.’’

हम ने सोचा कि ये लोग घुमाने ले जा रहे हैं तो चलने में कोई हरज नहीं. झटपट हम सब तैयार हो गए.

बाहर निकलते ही उन्होंने बड़ी शान से टैक्सी रोकी, सब को उस में लादा और चल पड़े. पहले दर्शनीय स्थल तक पहुंचने पर ही टैक्सी का मीटर 108 रुपए तक पहुंच चुका था. उन्होंने शान से पर्स खोला, 500-500 रुपए के नोट निकाले और मेरी तरफ मुखातिब हुए. ‘‘भई, मेरे पास छुट्टे नहीं हैं, जरा आप ही इस का भाड़ा दे देना.’’

भुनभुनाते हुए हम ने किराया चुकाया. टैक्सी से उतरते ही उन्हें चाय की तलब लगी, कहने लगे, ‘‘अब पहले चाय, नाश्ता किया जाए, फिर आराम से घूमेंगे.’’

बढि़या सा रैस्तरां देख कर सब ने उस में प्रवेश किया. हर बच्चे ने पसंद के अनुसार और्डर दिया. उन का लिहाज करते हुए हम ने कहा कि हम कुछ नहीं खाएंगे. उन्होंने भी बेफिक्री से कहा, ‘‘मत खाइए.’’

वे लोग समोसा, कचौरी, बर्गर, औमलेट ठूंसठूंस कर खाते रहे और हम खिसियाए से इधरउधर देखते रहे. बिल देने की बारी आई तो बेशर्मी से हमारी तरफ बढ़ा दिया, ‘‘जरा आप दे देना, मेरे पास 500-500 रुपए के नोट हैं.’’

200 रुपए का बिल देख कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया और सोचा कि अभी नाश्ते में यह हाल है तो दोपहर के खाने, शाम की चाय और रात के खाने में क्या होगा?

फिर वही हुआ, दोपहर के खाने का बिल 700 रुपए, शाम की चाय का 150 रुपए आया. रात का भोजन करने के बाद मेरी बांछें खिल गईं. ‘‘यह तो पूरे 500 रुपए का बिल है और आप के पास भी 500 रुपए का नोट है. सो, यह बिल तो आप ही चुका दीजिए.’’

उन का जवाब था, ‘‘अरे, आप के होते हुए यदि हम बिल चुकाएंगे तो आप को बुरा नहीं लगेगा? और आप को बुरा लगे, भला ऐसा काम हम कैसे कर सकते हैं.’’

दूसरे दिन वे लोग जबरदस्ती खरीदारी करने हमें भी साथ ले गए. हम ने सोचा कि अपने लिए खरीदेंगे तो पैसा भी अपना ही लगाएंगे और लगेहाथ उन के साथ हम भी बच्चों के लिए कपड़े खरीद लेंगे. पर वह मेहमान ही क्या जो मेजबान के रहते अपनी गांठ ढीली करे.

सर्वप्रथम हमारे शहर की कुछ सजावटी वस्तुएं खरीदी गईं, जिन का बिल 840 रुपए हुआ. वे बिल चुकाते  समय कहने लगे, ‘‘मेरे पास सिर्फ

500-500 रुपए के 2 ही नोट हैं. अभी आप दे दीजिए, मैं आप को घर चल कर दे दूंगा.’’

फिर कपड़ाबाजार गए, वहां भी मुझ से ही पैसे दिलवाए गए. मैं ने कहा भी कि मुझे भी बच्चों के लिए कपड़े खरीदने हैं, तो कहने लगे, ‘‘आप का तो शहर ही है, फिर कभी खरीद सकते हैं. फिर ये बच्चे भी तो आप के ही हैं, इस बार इन्हें ही सही. फिर घर चल कर तो मैं पैसे दे ही दूंगा.’’

3 हजार रुपए वहां निकल गए. अब वे खरीदारी करते थक चुके थे. दोबारा 700 रुपए का चूना लगाया. इस तरह सारी रकम वापस आने की उम्मीद लगाए हम घर पहुंचे.

घर पहुंचते ही उन्होंने घोषणा की कि वे कल  जा रहे हैं. खुशी के मारे हमारा हार्टफेल होतेहोते बचा कि अब वे मेरे पैसे चुकाएंगे, लेकिन उन्होंने पैसे देने की कोई खास बात नहीं की.

दूसरे दिन भी वे लोग सामान वगैरह बांध कर निश्ंिचतता से बैठे थे और चिंता यह कर रहे थे कि उन का कुछ सामान तो नहीं रह गया. तब हम ने भी बेशर्म हो कर कह दिया, ‘‘भाईसाहब, कम से कम अपनी खरीदारी के रुपए तो लौटा दीजिए.’’

उन्होंने निश्ंिचतता से कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं.’’

आश्चर्य से मेरा मुंह खुला रह गया, ‘‘पर आप तो कह रहे थे कि घर पहुंच कर दे दूंगा.’’

‘‘हां, तो क्या गलत कहा था. अपने घर पहुंच भिजवा दूंगा,’’ आराम से चाय पीते हुए उन्होंने जवाब दिया.

‘‘उफ…और वे आप के 500-500 रुपए के नोट?’’ मैं ने उन्हें याद दिलाया.

‘‘अब वही तो बचे हैं मेरे पास और जाने के लिए सफर के दौरान भी कुछ चाहिए कि नहीं?’’

हमारा इस तरह रुपए मांगना उन्हें बड़ा नागवार गुजरा. वे रुखाई से कहते हुए रुखसत हुए, ‘‘अजीब भिखमंगे लोग हैं. 4 हजार रुपल्ली के लिए इतनी जिरह कर रहे हैं. अरे, जाते ही लौटा देंगे, कोई खा तो नहीं जाएंगे. हमें क्या बिलकुल ही गयागुजरा समझा है. हम तो पहले ही होटल में ठहरना चाहते थे, पर हमारी बहन के ससुर के कहने पर हम यहां आ गए, अगर पहले से मालूम होता तो यहां हमारी जूती भी न आती…’’

वह दिन और आज का दिन, न उन की कोई खैरखबर आई, न हमारे रुपए. हम मन मसोस कर चुप बैठे श्रीमती के ताने सुनते रहते हैं, ‘‘अजीब रिश्तेदार हैं, चोर कहीं के. इतने पैसों में तो बच्चों के कपड़ों के साथ मेरी 2 बढि़या साडि़यां भी आ जातीं. ऊपर से एहसानफरामोश. घर की जो हालत बिगाड़ कर गए, सो अलग. किसी होटल के कमरे की ऐसी हालत करते तो इस के भी अलग से पैसे देने पड़ते. यहां लेना तो दूर, उलटे अपनी जेब खाली कर के बैठे हैं.’’

इन सब बातों से क्षुब्ध हो कर मैं ने भी संकल्प किया कि अब चाहे कोई भी आए, अपने घर पर किसी को नहीं रहने दूंगा. देखता हूं, मेरा यह संकल्प कब तक मेरा साथ देता है.

भोजपुरी की कुछ हिट फिल्में

भोजपुरी सिनेमा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है, लेकिन इस भाषा में बनी बहुत सी फिल्मों ने उत्तर प्रदेश, बिहार समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में अपनी अमिट छाप छोड़ी थी.

उन्हीं में से कुछ फिल्मों की जानकारी यहां दी जा रही है, जिन्होंने अपने समय में कामयाबी के नए कीर्तिमान बनाए थे.

गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो

आज भोजपुरी सिनेमा जिस मुकाम पर?है, उस की बुनियाद साल 1963 में रखी गई थी. कहते हैं कि भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने भोजपुरी फिल्म बनाने की पेशकश की थी.

फिल्म भी ऐसी, जिस ने सिनेमाघरों में आते ही धमाल मचा दिया था. पहली ही फिल्म इतनी सुपरहिट हुई थी कि लगा अब भोजपुरी सिनेमा के आने वाले दिन सुनहरे साबित होंगे.

देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने खुद इस फिल्म को देखा था, जिस का नाम?था ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’.

किसी विधवा की दूसरी शादी की कहानी पर बनी इस फिल्म का डायरैक्शन कुंदन कुमार ने किया था, जिस में कुमकुम, असीम कुमार और नजीर हुसैन ने अहम किरदार निभाए थे.

जब यह फिल्म पटना के ‘वीणा’ सिनेमाघर पर लगी थी, तब लोग बैलगाडि़यों पर सवार हो कर इसे देखने दूरदूर से आए थे.

नदिया के पार

हालांकि यह फिल्म बौलीवुड में बनाई गई थी, लेकिन थी भोजपुरी. साल 1982 में आई इस फिल्म को राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनाया गया?था. केशव प्रसाद मिश्र के हिंदी उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर बनी इस फिल्म में सचिन, साधना सिंह, इंद्र ठाकुर, मिताली, लीला मिश्रा और राम मोहन ने बतौर कलाकार काम किया था.

‘नदिया के पार’ एक खालिस गंवई फिल्म?थी, जिस में पारिवारिक ड्रामा बड़ा गजब का था. बड़े भाई के लिए अपने प्यार की कुरबानी देने वाले छोटे भाई को बड़ा भाई आखिर में?क्या तोहफा देता था, यह देखना बड़ा ही रोचक था.

फिल्म ‘नदिया के पार’ के सारे गाने बेहतरीन थे. हालांकि उन में देहाती पुट था, लेकिन शहरों में?भी उन्हें खूब सुना गया था. ‘कौन दिशा में ले के चला रे बटोहिया’, ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरे’ और ‘जोगीजी वाह’ गीतों की मधुरता ने सब का दिल जीत लिया था.

पान खाए सैयां हमार

साल 1984 में आई फिल्म ‘पान खाए सैयां हमार’ भोजपुरी की बहुत कामयाब फिल्मों में से एक मानी जाती है.

हिंदी फिल्मों में चरित्र व खलनायक का किरदार निभाने वाले सुजीत कुमार ने इस फिल्म का डायरैक्शन किया था, जिस में वे हीरो भी खुद ही बने थे. उन के साथ बंदिनी और एसएन त्रिपाठी ने भी अहम किरदार निभाए थे.

इस फिल्म की एक और खासीयत यह थी कि इस में अमिताभ बच्चन और रेखा ने मेहमान कलाकार का किरदार निभा कर सब को चौंका दिया था.

गंगा

साल 2006 में आई इस फिल्म में जिन कलाकारों ने काम किया था, उन के नाम से ही?भोजपुरी सिनेमा में एक नई जान सी आ गई थी. वजह, इस फिल्म में बौलीवुड के ‘महानायक’ अमिताभ बच्चन और ‘ड्रीम गर्ल’ रहीं हेमामालिनी ने?भोजपुरी संवादों से जनता का दिल जीता था. उन के साथ नगमा, रविकिशन, मनोज तिवारी और अजल शर्मा ने भी अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरे थे.

इस फिल्म की कहानी ठाकुर विजय सिंह के इर्दगिर्द घूमती है. ठाकुर का वफादार नौकर बजरंग लालची रिश्तेदारों से छुटकारा दिलाना चाहता है.

इस फिल्म में ‘गंगा’ का किरदार नगमा ने निभाया था, जिन्हें भोजपुरी की ‘माधुरी दीक्षित’ कहा गया था.

ससुरा बड़ा पईसावाला

भोजपुरी सिनेमा में आए उतारचढ़ाव को फिर से नई बुलंदी पर ले जाने का काम फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसावाला’ ने किया था. साल 2005 में आई इस फिल्म ने कामयाबी के नए झंडे गाड़े थे और गायक से ऐक्टर बने मनोज तिवारी को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया था.

राजेश गुप्ता के डायरैक्शन में बनी इस फिल्म में भरपूर मनोरंजन था और यह माली तौर पर बड़ी कामयाब फिल्म साबित हुई थी.

भोले शंकर

साल 2008 में जब फिल्म ‘भोले शंकर’ सिनेमाघरों में रिलीज की गई थी, उस समय इस ने टिकट खिड़की पर सब से ज्यादा ओपनिंग का रिकौर्ड बनाया था और यह तब की सुपरहिट फिल्म मानी गई थी.

यह मिथुन चक्रवर्ती की पहली भोजपुरी फिल्म थी, जिस में उन्होंने शंकर का किरदार निभाया था, जो एक डौन होता है.

भारत में बढ़ती बेरोजगारी पर बनी इस फिल्म में भोले का किरदार मनोज तिवारी ने अदा किया था.

पंकज शुक्ला के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘भोले शंकर’ में मोनालिसा ने बतौर हीरोइन काम किया था.

नया पता

साल 2014 में बड़े परदे पर आई भोजपुरी फिल्म ‘नया पता’ ने भोजपुरी में नए सिनेमा के दरवाजे खोल दिए थे.

घर छोड़ कर परदेश में कमाने गए गंभीर मुद्दे पर यह फिल्म बनी थी, जिस के?डायरैक्टर पवन के. श्रीवास्तव थे.

इस फिल्म में यशवर्धन सिंह, शाह अहमद, अभिषेक शर्मा, जूली वर्शी वगैरह कलाकारों ने काम किया था.

दुलारा

साल 2015 में आई फिल्म ‘दुलारा’ के डायरैक्टर राजकुमार आर. पांडे ने आज की नौजवान पीढ़ी को उस लौंडा नाच से रूबरू कराया था, जिस में आदमी औरत के कपड़े पहन कर डांस करता था.

इस फिल्म के हीरो प्रदीप पांडेय ‘चिंटू’ ने पहले तो यह किरदार निभाने से मना कर दिया था, पर फिल्म की कहानी की मांग को समझते हुए हां कर दी थी. उन्होंने इस किरदार को काफी अच्छे तरीके से निभाया था.

मुंबई में हुए भोजपुरी फिल्म अवार्ड, 2016 में फिल्म ‘दुलारा’ को बैस्ट सोशल इशू के लिए स्पैशल जूरी अवार्ड दे कर सम्मानित किया गया था. इस में तनुश्री, रितु सिंह और मोहिनी घोष ने भी अपनी शानदार अदाकारी दिखाई थी.

बमबम बोल रहा है काशी

साल 2016 में आई फिल्म ‘बमबम बोल रहा है काशी’ ने जम कर कमाई की थी. इस फिल्म में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे की जोड़ी ने गजब का कमाल दिखाया था.

इस फिल्म की फिल्मकार बौलीवुड की हीरोइन प्रियंका चोपड़ा थीं. इसे सब से?ज्यादा थिएटर मिले थे और काशी यानी बनारस में इस ने पहले 3 दिनों में अपनी लागत वसूल ली थी.

यह एक पारिवारिक फिल्म थी, जिस में दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने काशी के किरदार में नेकदिल इनसान के किरदार को निभाया था, जो गरीब लोगों की मुफ्त में सेवा करता है.

संजय दत्त और ‘संजू’

फिल्म ‘संजू’ जो अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित है, पैसा तो खूब कमा रही है पर थोड़ी कंट्रोवर्सी भी खड़ी कर रही है. सवाल उठाया जा रहा है कि फिल्म के जरिए संजय दत्त को आखिर क्यों दूध का धुला साबित करने की कोशिश की गई है.

फिल्म उद्योग अपने सितारों को मालाएं पहनाए, यह उस का हक है. वह संजय दत्त की खामियों और गलतियों को नजरअंदाज कर दे और फिल्मों के सहारे उसे चढ़ा दे, यह भी उस का हक है पर आम जनता जिस तरह से फिल्म देखने जा रही है, यह अजीब है. इस फिल्म को देखने का मतलब है कि आप ने फिल्मकार की बात मान ली और संजय दत्त को सर्कम्सटांसेज का शिकार मान लिया.

संजय दत्त कोई बच्चा नहीं था कि वह नशेड़ी बन गया या उस ने एके 47 राइफल हथिया ली कि कहीं हिंदू आतंकवादियों की भीड़, उस के मुताबिक, उस की मां पर हमला न कर दे. संजय दत्त के अभिनेता पिता सुनील दत्त, जो राजनीति में भी रहे हैं, हमेशा कांग्रेस के साथ रहे हैं और दंगों में हिंदू उपद्रवियों ने हर ऐसे को शिकार बनाने की कोशिश की थी जिसे वे कांग्रेसी पिट्ठू समझते थे.

खतरे का अंदेशा होने का अर्थ यह नहीं कि सितारे का कोई बेटा खुद को हमलावर भीड़ को मारने के लायक समझ ले. ऐसा फिल्मों में होता है कि एक हथियारबंद व्यक्ति 100-200 की हमलावर भीड़ का मुकाबला कामयाबी के साथ कर लेता है. संजू को इस अपराध के लिए सजा मिली और सही ही मिली. उस ने चाहे गलती मान ली पर अदालतों ने उसे माफी लायक नहीं माना, यह अदालत का इंसाफ था. ऐसे में उस पर बनने वाली फिल्म का बैलेंस्ड होना जरूरी था. लेकिन ‘संजू’ फिल्म संजय दत्त की पोल नहीं बल्कि उस की गलतियों पर परदा डालने की कोशिश करती नजर आई है.

देशभर में आज यह माना जाने लगा है कि अगर आप के पास पैसा है, भीड़ है, पौलिटिकल सिक्योरिटी है तो कोई कुछ नहीं करेगा. तभी गौरक्षकों की हिम्मत बढ़ी हुई है. भाजपाई सरकारों के मंत्री तक हमलावरों का खुल्लमखुल्ला समर्थन कर रहे हैं. फिल्म निर्मातानिर्देशक राजकुमार हिरानी ने यही संजय दत्त के साथ ‘संजू’ के माध्यम से किया है. लेकिन, गलत तो गलत ही रहेगा.

जब WWE रिंग में सपना चौधरी संग राखी सावंत ने लगाए ठुमके

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी का एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जो उनके फैंस के चेहरों पर मुस्‍कान ले आएगा. वैसे तो सपना के हर डांस वीडियो को लोग काफी पसंद करते हैं और बेहद दिलचस्पी के साथ देखते हैं. लेकिन इस बार जो वीडियो सामने आया उसमें वे WWE रिंग में डांस करती दिख रही हैं. ये वीडियो उनके एक फैन पेज ने शेयर किया है. इसमें सपना के साथ राखी सावंत भी डांस करती नजर आ रही हैं.

गौरतलब है कि बिग बौस में आने से पहले सपना चौधरी हमेशा ही सलवार-सूट में दिखाई देती थीं. इसी में उनका हर डांस वायरल होता था. पर जबसे वे बिग बौस के घर से बाहर आईं हैं उनका जबरदस्‍त मेकओवर देखने को मिला है. वे अब वेस्‍टर्न ड्रेसेज में खूब दिखती हैं.

बता दें कि सपना चौधरी की काफी बड़ी फैन फौलोइंग है. वे बिग बौस 10 में भी दिखी थीं. वे वीरे दी वेडिंग में ‘हट जा ताऊ’ गाने पर थिरकतीं नजर आई थीं. हाल ही में उन्‍होंने भोजपुरी मेगास्‍टार रवि किशन की फिल्‍म ‘बैरी कंगना 2’ के लिए एक स्‍पेशल आइटम नंबर भी किया था.

उम्र को मात देते 50 + सितारे

खान तिकड़ी अब 50 प्लस हो चुकी है और आज अपने से आधी उम्र की हीरोइनों के साथ फिल्मों में रोमांस फरमा रही है. देखा जाए तो फिल्म अभिनेताओं ने आम लोगों को यह प्रेरणा दी है कि बढ़ती उम्र में भी अपनी बौडी को कैसे फिट रखा जा सकता है. सलमान ने जिस बौडी दिखाऊ परंपरा की शुरुआत की थी उसे 53 पार कर चुके आमिर, 50 के हो चुके अक्षय और 52 के शाहरुख आज तक अच्छे से निभा रहे हैं.

इंडस्ट्री में आज एक भी कलाकार नहीं है जो 20 प्लस हो कर सितारा की श्रेणी में आता हो. शीर्ष सितारा की कुरसी पर 50 प्लस कलाकारों का कब्जा बरकरार है. इन्होंने लोगों को दिखा दिया है कि उम्र चाहे कुछ भी हो, फिट रहने के लिए जज्बा होना चाहिए.

मिस्टर परफैक्ट

आमिर खान बौलीवुड में इकलौते ऐसे अभिनेता हैं जो किरदार के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल लेते हैं. जब पहली बार ‘गजनी’ में आमिर ने सिक्स पैक एब्स दिखाए तो लोगों को यकीन करना मुश्किल हो गया कि यह वही चौकलेटी बौय है जो कुछ सालों पहले सिर्फ रोमांटिक फिल्में करता था. फिल्म ‘दंगल’ में अपना वजन 70 से 98 किलो करने के लिए वे अमेरिका चले गए थे और वहां न्यूट्रीशनिस्ट व जिम ट्रेनर की देखरेख में उन्होंने अपना वजन बढ़ाया और फिल्म पूरी होने के बाद फिर कम किया.

आमिर के डेली रूटीन में ट्रैकिंग, साइक्लिंग, स्विमिंग और टैनिस खेलना शामिल है. वे अपने कैरेक्टर के अनुसार वजन घटाने के लिए रोज अपना शैड्यूल तैयार करते हैं.

खिलाड़ी कुमार की बौक्सिंग

बौलीवुड के खिलाड़ी अक्षय कुमार की फिल्मों में ऐंट्री ही उन के स्टंट और दमदार फिजिक से हुई थी. अक्षय कुमार आज 50 वर्ष के हो गए हैं, फिर भी अपनी दिनचर्या में स्पोर्ट्स को पहले नंबर पर रखते हैं. वे आज भी हफ्ते में 3 दिन बास्केटबौल खेलते हैं और एक बार में 10 मील दौड़ते हैं.

अक्षय कराटे में ब्लैक बैल्ट होल्डर भी हैं, इसलिए किक, बौक्सिंग और कराटे की प्रैक्टिस भी उन की दिनचर्या में शामिल है. बौडी को फिट और स्टेमिना को बनाए रखने के लिए वे वाक और ट्रैक का सहारा लेते हैं. खाने के मामले में भी अक्षय बड़े पक्के हैं. वे घर पर बना हुआ खाना और फल व सब्जियां खाना पसंद करते हैं.

बादशाह खान की बादशाहत

फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में शाहरुख के सिक्स पैक एब्स को कौन भूल सकता है. खुद को फिट रखने के लिए वे कड़ी ट्रेनिंग, वेट लिफ्टिंग और कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज करते हैं. आज भी वे रोजाना 10 गिलास पानी पीते हैं और 30 मिनट की कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज फैट बर्न करने के लिए करते हैं.

52 साल की उम्र में भी वे 100 पुश अप्स और 60 पुल अप्स करना कभी नहीं भूलते. अगर समय मिला तो मौर्निंग वाक और साइक्लिंग के साथ वे बेली डांस भी करते हैं.

सलमान के बाईसैप्स

अगर बौलीवुड में बौडी दिखाने का श्रेय किसी को जाता है तो वे सलमान खान हैं जिन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘मैं ने प्यार किया’ में पहली बार अपनी शर्ट उतार कर बौडी दिखाई थी. उन के पास बेहतरीन बाइसैप्स, ट्राइसैप्स और शानदार एब्स हैं. सलमान अपने एब्स को शेप में रखने के लिए कार्डियोवैस्कुलर ऐक्सरसाइज और वर्कआउट करते हैं. इस के अलावा 10 किलोमीटर तक साइकिल भी चलाते हैं.

आज भी नईनई हीरोइनों के साथ फिल्म बनाने वाले ये अधेड़ हीरो अपनी फिटनैस और स्टारडम से कहीं से भी नहीं लगते कि वे किसी भी मामले में आज के हीरो वरुण धवन और टाइगर श्रौफ से पीछे हैं. सोशल मीडिया पर इन की फैन फौलोइंग और फिल्मों का हिट होना इस बात का प्रमाण है कि अभी भी बौलीवुड की सितारा कुरसी पर इन्हीं 50 प्लस सितारों का कब्जा बरकरार रहेगा.

गुरुओं की दुकानदारी का महिमामंडन

हमारा एक वर्गविशेष प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को वैकल्पिक प्रणाली के तौर पर प्रस्तुत करता रहता है और उस के प्रति अपनी भावुकतापूर्ण ललक व्यक्त करता है.

गुरुशिष्य प्रणाली के प्रामाणिक दस्तावेज की खोज में ‘गुरुगीता’ नाम की एक पुस्तक पिछले दिनों दिखी. यह इस पुस्तक का 1986 में छपा 5वां संस्करण है. इस से पहले इस का तीसरा संस्करण 1920 में प्रकाशित किया गया था. दूसरा संस्करण 1920 से पूर्व छपा होगा.

यह 221 श्लोकों की पुस्तक है, भारतधर्म महामंडल, वाराणसी से छपी है.

इस में गुरु और शिष्य के संबंधों पर महादेवपार्वती के संवाद के रूप में बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है.

माहात्म्य में ही कह दिया गया है कि इस किताब की एक प्रति दान करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, इस के पाठ से गरीबी दूर होती है, बड़ेबड़े रोग ठीक हो जाते हैं, संपत्तियां प्राप्त होती हैं, बंध्या नारी के पुत्र पैदा हो जाता है और विधवा होने की आशंका दूर हो जाती है, पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है आदि.

इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयतेऽथवा, लिखित्वा वा प्रदीयेत सर्वकालफलप्रदम्.

205

इस गुरुगीता को जो भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या लिख कर दान करता है, उस की सब प्रकार की कामनाएं पूरी होती हैं.

सर्वपापहरं स्तोत्रं सर्वदारिद्र्यनाशनम्,

अकालमृत्युहरणं सर्वसंकटनाशनम्.

208

यह गुरुगीता सब प्रकार के पापों का नाश करती है, सब प्रकार की गरीबी को दूर करती है, असमय होने वाली मृत्यु का निवारण करती है और सब संकटों को नष्ट करती है.

सर्वशांतिकरं नित्यं वन्ध्यापुत्रफलप्रदम्,

अवैधव्यकरं स्त्रीणां सौभाग्यदायकं परम्.

213

इस के पाठ से सब पाप/दुष्ट ग्रह आदि शांत होते हैं, बांझ औरत को भी पुत्र की प्राप्ति होती है, स्त्रियों के विधवा होने की आशंका दूर होती है और परम सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

आयुरारोग्यमैश्वर्यपुत्रपौत्रादिवर्धकम्,

निष्कामतस्त्रिवारं वा जपन्मोक्षमवाप्नुयात्.

214

निष्काम भाव से इस का थोड़ा सा पाठ करने पर आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि होती है और इस का 3 बार जप करने से मोक्ष प्राप्त हो जाता है.

शुचिदेव सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु,

यस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते.

220

ज्ञानी मनुष्य गुरुगीता का पाठ करने से सदा पवित्र रहते हैं. ऐसे पवित्र मनुष्यों के दर्शन करने से पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिल जाता है.

गुरु का अर्थ

गुरु शब्द का अर्थ बताते हुए गुरुगीता कहती है कि ‘गु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ है उसे रोकने वाला :

गुशब्दस्त्वंधकार: स्याद् रुशब्दस्तन्निरोधक:

अंधकारनिरोधित्वाद् गुरुरित्यभिधीयते.

15

‘गुरु’ शब्द का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ शब्द का अर्थ उस को रोकने वाला. अंधकार को रोकने या दूर करने वाले को ‘गुरु’ कहते हैं.

लगता है गुरुगीता को अपने इस मनगढं़त अर्थ पर स्वयं भी विश्वास नहीं है. इसलिए  उस ने श्लोक 16 में इन्हीं शब्दों को तोड़मरोड़ कर एक नया अर्थ निकाल कर फिर से भरमाने की कोशिश की है :

गकार: सिद्धिद: प्रोक्तो रेफ:

पापस्य दाहक:,

उकार: शंभुरित्युक्तास्त्रियाऽऽत्मा

गुरु: स्मृत:.                       16

‘ग’ 6गकार8 का अर्थ है ‘सिद्धि देने वाला’, ‘र’ 6रकार8 का अर्थ है ‘पापों को दूर करने वाला’ और ‘उ’ 6उकार8 का अर्थ है ‘शिव’  अर्थात गुरु का अर्थ है, सिद्धिदाता शिव पापहर्ता शिव.

एक अन्य श्लोक में कहा है-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुगुरुर्देवो महेश्वर:,

गुरु: साक्षात् पर ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:.

147

अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु शिव है. गुरु परंब्रह्म है.

लगता है सदियों से गुरुओं के बारे में लोगों को संशय रहा है और हर ग्रंथ में गुरु महिमा इसीलिए गाई गई है कि यह संशय दूर रहे.

गुरु केवल ब्राह्मण

श्लोक नं. 34 कहता है, ‘गुरु’ केवल ब्राह्मण हो सकता है, यह पद उस के लिए गुरुगीता ने आरक्षित घोषित कर रखा है. शिष्य भी ऐरागैरा नहीं बन सकता. वह भी ‘कुलीन’ होना चाहिए. अर्थात यह सारा ऊंची जातियों का खेल है क्योंकि शूद्र के लिए शिक्षा का कहीं विधान ही नहीं है. शूद्र ‘कुलीन’ कैसे हो सकता है? क्षत्रिय व वैश्य शामिल हों तो भी आश्चर्य होगा. प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मणों की शिक्षा के लिए बनाई गई थी.

आज यदि उस गुरुशिष्य प्रणाली को निहित स्वार्थी तत्त्व लागू कर या करवा देते हैं तो हमारी शिक्षा की सब समस्याएं, आरक्षण मांगने वालों के आंदोलन, पढे़लिखे बेरोजगारों का संकट आदि पलक झपकते ही खत्म हो जाएंगे, क्योंकि तब पढ़ ही कुछ प्रतिशत जनसंख्या वाली उच्च जातियों के सदस्य सकेंगे. बाकी जब पढ़ ही नहीं पाएंगे, तब कैसा आरक्षण.

शिष्य का अर्थ

शिष्य के लिए जरूरी है कि वह आस्तिक हो अर्थात उस का दिमाग खुला नहीं, बंद होना चाहिए. वह सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो.

शरीरमर्थं प्राणांश्च गुरुभ्यो य: समर्पयन् ,

गुरुभि: शिष्यते योगं स शिष्य इति कथ्यते.

54

गुरु के लिए शरीर, धन और प्राणों तक को अर्पित कर दे क्योंकि वह गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है, इसलिए ‘शिष्य’ कहलाता है.

पत्नी भी गुरु को अर्पित

गुरुगीता बात यहीं नहीं खत्म करती, बल्कि यह भी कहती है कि शिष्य अपनी पत्नी भी गुरु को अर्पित करे :

आत्मदाराऽऽदिकं सर्वं गुरवे च निवेदयेत्.

55

अपनी पत्नी आदि सबकुछ गुरु को अर्पित करें.

इस के बाद शिष्य को खानेपीने के बारे में गुरुगीता का आदेश है कि वह गुरु के पैरों का धोवन पिए तथा उस का जूठा बचा खाना खाए :

गुरुपादोदकं पेयं गुरोरुच्छिष्टभोजनम्,

57

गुरु के पैरों को जिस पानी से धोया जाए, उसे पिए तथा गुरु का जूठा बचा खाना खाए.

यह मर्ज दवा से बेहतर है

जो लोग आज प्राचीन गुरुशिष्य प्रणाली को लाने के लिए चिल्ला रहे हैं, क्या उन के बच्चे ये सब करने को तैयार होंगे या यह सिर्फ गरीबों, दबे व कुचले लोगों और सदियों से अधिकारवंचितों के बच्चों के लिए ही प्रस्तावित किया जाएगा?

गुरु के पैर दबाने की गुरुगीता में बहुत महिमा गाई गई है :

सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरो: पादसेवनात्,

सर्वतीर्थावगाहस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम्.

169

गुरु के पैर दबाने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं. जितना फल सब तीर्थों में नहाने पर मिलता है, वह सब गुरु के पैर दबाने वालों को मिलता है.

इसी तरह की महिमा गुरु के पैरों का धोवन पीने की भी गाई गई है :

सप्तसागरपर्यंत तीर्थस्नानादिकै: फलम्,

गुरोरंघ्रिपयोबिंदुसहस्रांशेन दुर्लभम्.

161

सात समुद्रों तक जितने तीर्थ हैं, उन में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गुरु के पैरों की धोवन की एक बूंद पीने से उस से हजारगुना ज्यादा फल प्राप्त होता है.

यद्यपि गुरु को शिव, ब्रह्मा आदि कहा गया है और उसे इंसान के रूप में देखने वाले को नरकगामी घोषित किया गया है तथापि यह कटु यथार्थ है कि वास्तव में वह एक इंसान ही रहता है.

इसीलिए गुरुगीता ने शिष्य को आदेश दिया है कि वह यदि गुरु को कोई बुरा काम करता देखे या गुरु कोई बुरा काम उसी (शिष्य) से करे तो शिष्य का कर्तव्य है कि उस की बाबत कभी मुंह न खोले, उस के बारे में अंधा और गूंगा ही नहीं बना रहे, बल्कि बहरा भी बन जाए :

दुष्कृतं न गुरोर्ब्रूयात्,

परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्वताम्. 63

गुरु के कुकर्म की बाबत पर मुंह न खोलें. यदि उस के कुकर्म की चर्चा दूसरे लोग करें भी, तो उस चर्चा के प्रति बहरा बन जाएं, उसे अनसुना कर दें.

गुरोर्यत्र परीवादो निंदा वापि प्रवर्तते,

कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गंतव्यं वा ततोऽन्यत:.

70

जहां कोई गुरु के दुष्कर्म की चर्चा करे, उस की निंदा करे, वहां शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने कानों पर हाथ रख ले या वहां से उठ कर किसी और जगह चला जाए.

गुरु दुष्कर्म करते ही होंगे, तभी तो इन श्लोकों में उन्हें दबाने व छिपाने के लिए इतना जोर दिया गया है. इस से बढ़ कर गुरुशिष्य प्रणाली की विडंबना और क्या हो सकती है?

गुरु ही ईश्वर है

गुरुगीता शिष्य से आशा करती है कि उस का आस्तिकवाद गुरु पर ही केंद्रित हो, ईश्वर पर नहीं.

गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत्,

गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यं न भावयेत्.

66

हमेशा गुरु की मूर्ति का ध्यान करे, सदा गुरु के नाम का जाप करे, सदा गुरु की आज्ञा का पालन करे तथा गुरु के सिवा और किसी का चिंतन न करे.

शिष्य नौकर है

शिष्य सदा गुरु के नौकर (=भृत्य) की तरह ही अपने को समझे-

आज्ञया कुरुते कर्म शिष्यश्च भृत्यवत्.

75

अर्थात गुरु के व्यक्तिगत काम करें, उस के घर के काम करें आदि.

यदि गुरु संतुष्ट है तो शिष्य समझे कि उसे कोटिकोटि जन्मों में किए गए जप, व्रत, तप और कर्मकांड का फल प्राप्त हो गया है.

विष्ठा का कीड़ा

गुरुगीता कहती है कि शिष्य के लिए उचित है कि वह वाणी, मन, शरीर और कर्म के द्वारा गुरु का हित करे, उसे हर तरह से लाभ पहुंचाए. जो शिष्य गुरु का हित नहीं करता, उस के फायदे के लिए यत्न नहीं करता, वह अगले जन्म में टट्टी में कीड़ा बनता है.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान पूरी गुरुगीता में यह कहीं भी स्पष्ट नहीं होता कि गुरु शिष्य को कब और कैसे पढ़ातालिखाता था, और न ही यह स्पष्ट होता है कि शिष्य कभी कुछ पढ़तालिखता था भी या नहीं. इस के बारे में गुरुगीता के 79वें श्लोक में बहुत गोलमोल ढंग से सिर्फ यह लिखा मिलता है कि जैसे कोई मनुष्य खुरपे द्वारा मिट्टी को खोदतेखोदते एक दिन नीचे जल प्राप्त कर लेता है, उसी तरह जो शिष्य गुरुसेवा में लगा रहता है, वह गुरु की सारी विद्या को प्राप्त करने में एक दिन सफल हो जाता है.

पर इस से यह स्पष्ट नहीं होता कि गुरु किस विधि से और क्या पढ़ाता था? शिष्य कैसे सीखता था? उसे लिखना, पढ़ना, गणित आदि गुरु कैसे सिखाता था? कब से कब तक? क्या कोई पाठ्यक्रम भी होता था या नहीं और उसे किस प्रकार व्यवहार में लाया जाता था? शिष्य की योग्यता को सेवा के मीटर से मापने के अतिरिक्त क्या कोई अन्य विधि भी थी? उसे कैसे व्यवहार में लाया जाता था? कौन उस का स्तरीकरण, मानकीकरण और प्रामाणिकीकरण करता था?

गुरुडम का मकड़जाल

गुरुगीता में जिस गुरुशिष्य परंपरा का प्रतिपादन किया गया है और जिस शिक्षाविधि का वर्णन है, वह शिक्षापद्धति के स्थान पर गुरुडम स्थापित करने की ही विधि है.

यदि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा फिर लागू की जाती है तो शिक्षा का बेड़ा तो गर्क होगा ही.

एकलव्य की त्रासदी

प्राचीनकाल  में भी यही कुछ था. प्राचीनकाल के (महाभारतकालीन) शिष्यों में एकलव्य जैसा वफादार शायद कोई शिष्य नहीं था. उसे गुरु ने शिक्षा देने से इसलिए इनकार कर दिया था कि वह शूद्र था, आदिवासी था. ब्राह्मण गुरु उसे शिक्षा कैसे दे सकता था. शिक्षा के लिए जरूरी था कि शिष्य का पहले उपनयन संस्कार हो. वह संस्कार शूद्र का हो नहीं सकता था. सब धर्मशास्त्रों  ने उस के उपनयन संस्कार का निषेध किया है.

लाचार हो कर एकलव्य जंगल को लौट गया और एक अनगढ़ पत्थर को गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति के रूप में सम्मानित कर के स्वयं ही धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा. जैसा कहा जाता है, अभ्यास से आदमी पूर्ण हो जाता है, अपने निरंतर अभ्यास से एकलव्य भी धनुष चलाने में प्रवीण हो गया.

जब गुरुजी को यह पता चला कि उन की मूर्ति के प्रति सम्मान रखते व अभ्यास करतेकरते एकलव्य धनुष चलाने में इतना पारंगत हो गया है जितना शायद अर्जुन भी नहीं है, तो प्राचीन गुरुपरंपरा के प्रतिनिधि गुरुद्रोण ने उस विद्या के लिए गुरुदक्षिणा मांग ली जो उस ने उस कथित शिष्य को कभी दी ही नहीं थी और गुरुदक्षिणा भी ऐसी मांगी कि जिस से उस शूद्र की खुद अर्जित विद्या भी अनहोई के समान हो जाए. गुरु ने शिष्य का धनुष चलाने के लिए जरूरी अंग, उस का अंगूठा गुरुदक्षिणा के नाम पर कटवा लिया और एकलव्य का सारा अभ्यास पलभर में सदा के लिए मिट्टी में मिला दिया.

अंगूठा कट जाने पर वह अब पहले की तरह धनुष चलाने के योग्य नहीं रह गया था. इसी गुरु द्रोण के नाम पर भारत सरकार ने श्रेष्ठ कोच के लिए ‘गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार’ स्थापित किया हुआ है. जब उत्तम व श्रेष्ठ ‘गुरु’ का यह हाल है, उस का शिष्य के प्रति इस तरह का अमानवीय, भेदभावपूर्ण और  आपत्तिजनक व्यवहार है, तब छुटभैया गुरुओं के चरित्र की कल्पना आसानी से की जा सकती है.

शिष्य की बेटी, गुरु की दक्षिणा

उपनिषदों में एक ऐसे गुरु के दर्शन होते हैं जो अपने भावी शिष्य की सुंदर व युवा बेटी को अग्रिम दक्षिणा के रूप में ग्रहण करता है और उसे ‘ज्ञान’ बाद में देता है. गुरुदक्षिणा भी युवा लड़की के रूप में और वह भी अग्रिम. इस पर भी तुर्रा यह कि वह गुरु शुरू में ही शिष्य को उस समय की सामाजिक गाली देता है, उसे ‘शूद्र’ कह कर उस का संबोधन करता है.

छांदोग्य उपनिषद (अ. 4) में आता है कि जानश्रुति काफी सामान – गौएं, रथ आदि – रैक्व को देने को तैयार है ताकि वह गुरु उसे अपना शिष्य बना ले और उसे ज्ञान दे. फिर भी वह उसे शिष्य बनाने को तैयार नहीं होता. परंतु जब वह अपनी युवा बेटी उसे पत्नी के तौर पर पेश करता है और कहता है- जायायं (मैं यह अपनी बेटी आप के लिए पत्नी के तौर पर लाया हूं), तब गुरु रैक्व कहता है-

शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति.

(अरे शूद्र, इस कन्या के मुख के कारण मैं तुझे ज्ञान देता हूं) अर्थात कन्या का मुख देखते ही ‘गुरुजी’ ज्ञान बघारने को तत्पर हो गए. दूसरे शब्दों में, गुरुजी भावी शिष्य से उस की बेटी दक्षिणा के तौर पर अग्रिम लेते हैं, तब कहीं जा कर ज्ञान देते हैं.

क्या यह गुरुशिष्य संबंध पितापुत्र सा आदर्श संबंध है, जैसा अकसर प्रचार किया जाता है? क्या कोई पिता अपने पुत्र की पत्नी या बेटी इस तरह ग्रहण करता है?

गुरुगीता शिष्य को अपनी पत्नी गुरु को अर्पण करने का आदेश देती है जबकि उपनिषद के मुताबिक, शिष्य अपनी बेटी गुरु की भेंट चढ़ाता है. आखिर, ये सब क्या है?

गुरुपत्नियों से संबंध

गुरुपत्नियां भी यौनशोषण किया करती थीं. हर धर्मशास्त्र में, हर स्मृति में, गुरुपत्नी से संबंध बनाने वाले शिष्य की चर्चा है, कभी उसे गुरुपत्नीगामी कहा गया है तो कहीं गुरुतल्पगामी आदि.

हर स्मृति में ऐसे शिष्य को ही दोषी ठहराया गया है और उसे सख्त से सख्त दंड का भागी बनाया गया है, परंतु कहीं भी उस से गुरु की पत्नी को न दोषी कहा गया है और न उस के लिए किसी दंड का विधान किया गया है.

मनुस्मृति में इस विषय में कई वैकल्पिक विधान किए गए हैं. यदि शिष्य गुरुपत्नी से संबंध बनाए तो उस के लिए विधान है कि उसे लोहे की तपाई हुई शय्या पर लिटाया जाए तथा वह स्त्री की लोहे की बनी व आग में लाल की हुई मूर्ति का उसी तरह आलिंगन करे जैसे उस ने गुरुपत्नी से किया था. उस मूर्ति से तब तक उसे चिपटा कर रखे जब तक कि वह मर न जाए :

गुरुतल्प्यभिभाष्यैनस्तप्ते स्वप्यादयोमये.

सूर्मी ज्वलन्ती स्वाश्लिष्येन्मृत्युना

स विशुद्ध्यति.

(मनुमृति, 11/103).

इस तरह के बर्बर दंडविधान केवल शिष्य के लिए हैं, न कि उस के साथ सहयोग करने वाली गुरुपत्नी के लिए. यदि बलपूर्वक शिष्य ने यह करतूत की होती तो मनुस्मृति वैसा लिख सकती थी, जैसा अन्य कई मामलों में उस ने लिखा है. बलात्कार इस तरह के मामलों में वैसे भी एकदम असंभव व अकल्पनीय था. यह सबकुछ आपसी रजामंदी से या लुभाफुसला कर ही किया जाता था. स्पष्ट है, ये सब काम गुरुपत्नी ही कर सकती थी, अल्पायु व अबोध शिष्य नहीं कर सकता था.

यदि यह कहा जाए कि कुछ शिष्य भी गुरुपत्नियों को फुसला कर या बलपूर्वक उन से शारीरिक संबंध बना लेते थे तो यह भी प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के माथे पर कलंक ही है.

उस की कथित महानता के बावजूद यदि यह सब होता था तो वह परंपरा आज आदर्श कैसे हो सकती है? क्या गुरुओं, संस्कृति, धर्म, शिक्षा आदि के यही संस्कार थे? यदि वे संस्कार इस तरह की गिरावट भी नहीं रोक सके तो कैसी महानता?

विद्या मुक्ति दिलाती है

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा के पक्षधर कहते हैं कि प्राचीनकाल की विद्या का लक्ष्य बहुत महान था. ‘सा विद्या या विमुक्तये’

अर्थात विद्या वह होती है जो मुक्ति दिलाए. प्राचीनकाल की विद्या का उद्देश्य आजकल की तरह रोजगार के योग्य बनाना नहीं, बल्कि जन्ममरण के बंधन से मुक्त करना था.

जन्ममरण के इन बंधनों से मुक्त होने की उन्हीं की डींगें कुछ सार्थक हो सकती हैं जिन्होंने दुनियावी बंधनों व विदेशी हमलावरों की गुलामी से अपने को कभी मुक्त रहने या होने में रुचि दिखाई हो. जो लोग हजारों सालों तक कभी इस मुट्ठीभर गिरोह के गुलाम बने रहे तो कभी उस गिरोह के, उन की विद्या उन्हें इन सब से मुक्त क्यों नहीं करवा सकी? इहलोक में इस विद्या ने किस को मुक्त करवाया है? जो विद्या इस लोक में गुलामी से मुक्त नहीं करवा सकी, वह कथित परलोक में किसे और कैसे मुक्त करवाएगी? क्या है कोई प्रमाण ग्रंथों में या किसी के पास कि इस विद्या ने ‘इस’ को मुक्त करवाया है, इस ने ‘उस’ को मुक्त करवाया है?

जो विद्या कुषाणों, शकों, हूणों, तुर्कों, मुगलों, पुर्तगालियों, अंगरेजों आदि से हमें मुक्त न रख सकी, वह विद्या कब और किसे तथा कहां व कैसे मुक्त करती थी या करती है?

हमारी विद्या विमुक्ति के लिए नहीं, पराजय के लिए रही, इस से हम विमुक्त नहीं, विजित हुए:

सा विद्या या विजिताय

(हमारी विद्या हमारे हारते रहने का कारण सिद्ध हुई) अर्थात हमारी विद्या है- हारे को हरिनाम.

रोजगार बनाम भीख

जो लोग प्राचीन विद्या को रोजगार के पीछे न दौड़ने वाली बता कर उस की महानता सिद्ध करना चाहते हैं, हमारा उन से कहना है कि यदि प्राचीन भारत की विद्या रोजगार की उपेक्षा न करती तो अपने यहां न शिष्य भीख मांग कर खाता, न गुरु. वह विद्या विमुक्ति क्या दिलाती जो दूसरों के आगे हाथ फैलाना सिखाती थी?

भीख मांगना रोजगार न होने के कारण इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया गया कि मनुस्मृति ने यहां तक कह दिया कि जो ब्रह्मचारी (=विद्यार्थी) निरोग रहते हुए भीख नहीं मांगता वह अवकीर्णिव्रत करे.

अवकीर्णिव्रत में क्या होता है? इस में काने गधे की चरबी से चौरास्ते पर हवन करना होता है.

जैसे शिष्य भीख पर पलता था वैसे ही गुरु. शिष्य भीख मांग कर लाता और माल गुरु के आगे रख देता था तथा बाद में खुद खाता था-

जो पेटपूजा के लिए रोटी नहीं कमा सकता, जो भूख लगने पर हरेक के आगे हाथ फैलाता है, वह विमुक्ति के प्रति कितना गंभीर हो सकता है.

मांग कर खाने वालों, परोपजीवी लोगों को न आत्मसम्मान की चिंता होती है न मानवीय गरिमा की. वे तो मानो परतंत्र, पराधीन और गुलाम बनने के लिए अभिशप्त होते हैं. यही कारण है कि हम सब डींगों के बावजूद हजारों वर्षों तक विजित बने रहे, विमुक्ति तो हम ने बहुत लंबी व निरंतर गुलामी के बाद 1947 में प्राप्त की, वह भी अपनी विद्या के बल पर नहीं, बल्कि आधुनिक जगत में सीखी विद्या के बल पर.

ऐसे में न गुरुशिष्य परंपरा की फिर से स्थापना वांछनीय है, न कथित परलोक में कथिततौर पर विमुक्त करने वाली विद्या ही अपनाने योग्य है, क्योंकि उस से रोजगार की जगह भीख ही पल्ले पड़ती है.

आधुनिक शिक्षा मानवीय समानता पर आधारित है. यह अनेकता में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से प्रेरित है.   परंतु प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा वाली विद्या, एकता में अनेकता पैदा करती है तथा संगठन को विघटन में परिणत करती है.

जनेऊ : जातिभेद का नागपाश

प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा में विद्या की शुरुआत उपनयन (जनेऊ) संस्कार से होती है-

उपनीय गुरु: शिष्यं शिक्षयेत्.

(मनुस्मृति, 2/69)

अर्थात, गुरु शिष्य का उपनयन संस्कार कर के उसे शिक्षा दे.

उपनयन संस्कार की शुरुआत ही असमानता, भेदभाव और विघटन से ग्रस्त है, क्योंकि हर बच्चे के उपनयन का समय उस की जाति के अनुसार निर्धारित किया जाता है. ब्राह्मण के बालक का गर्भ से 8वें, क्षत्रिय के बालक का गर्भ से 11वें और वैश्य के बालक का गर्भ से 12वें वर्ष में उपनयन करने का विधान है:

जाति के अनुसार हर बालक के जनेऊ (यज्ञोपवीत) की सामग्री भी एकदूसरे से भिन्न होनी चाहिए.

ब्राह्मण के बालक का जनेऊ कपास से बने सूत का होना चाहिए, क्षत्रिय के बालक का यज्ञोपवीत सन की रस्सी का बना हो तथा वैश्य के बालक का यज्ञोपवीत ऊन (भेड़ के बालों) का बना हो.

कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्य,

शणसूत्रमयं राज्ञो, वैश्यस्याविजसौत्रिकम्.

(मनु., 2/44)

यानी जनेऊ की सामग्री भी जन्म पर आधारित जाति के भेदभाव की परिचायक होनी चाहिए ताकि बिना बोले ही वह सामग्री हरेक को ऊंचनीच, भिन्नतावाद और विघटन सिखा व बता दे.

शूद्र के लिए शिक्षा वर्जित

ऊपर हम ने देखा है कि उपनयन संस्कार अर्थात विद्या आरंभ संस्कार केवल 3 जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- के बालकों का होता था. बहुसंख्यक शूद्र जाति के बालकों के उपनयन अर्थात विद्या आरंभ का कहीं कोई विधान उपलब्ध नहीं होता. इस का मतलब स्पष्ट है कि प्राचीन शिक्षा पद्धति और गुरुशिष्य परंपरा के अनुसार शूद्र के लिए विद्या (पढ़नालिखना) वर्जित थी. अछूतों यानी आज के दलितों के लिए तो शिक्षा के पास फटकने की अनुमति भी न थी.

स्वामी दयानंद की अदया

स्वामी दयानंद सरस्वती का कहना है कि मूर्ख को शूद्र कहते हैं. जो पढ़लिख नहीं सकता था, वह शूद्र कहलाता था.

यह सरासर गलतबयानी है. ऐसा नहीं था कि वह पढ़लिख नहीं सकता था, वह अयोग्य था और मूर्ख था, वह शूद्र था, बल्कि वास्तविकता यह थी कि शूद्र को पढ़ने ही नहीं दिया जाता था, उसे अनपढ़ रखा जाता था और जानबूझ कर उसे मूर्ख बनाया जाता था.

जब शूद्र के विद्या आरंभ करने का कोई अवसर ही नहीं है, उस का उपनयन संस्कार ही नहीं है, किसी गुरु के पास उस के जाने का कोई विधान ही नहीं है और उसे पढ़ने दिया ही नहीं जाता, तब स्वामीजी ने उसे किस आधार पर ‘पढ़लिख सकने के अयोग्य’ घोषित कर दिया?

स्पष्ट है कि प्राचीन गुरुशिष्य परंपरा और शिक्षापद्धति केवल 3 जातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के बालकों को पढ़नेलिखने का अधिकार देती है और उन में भी परस्पर जातिगत भेद को हर कदम पर गहरा करती है.

इस तरह प्राचीन शिक्षापद्धति न केवल जातिगत भेदभाव को हवा देती है, बल्कि बहुसंख्यक शूद्र व दलित जातियों के लिए विद्या को वर्जित भी घोषित करती है.

इतना ही नहीं, यह गुरुशिष्य परंपरा का कहना है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जातियों की लड़कियों का उपनयन संस्कार नहीं होना चाहिए, उन को विद्या देने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सवर्ण लड़कियों का विवाह ही उन का विद्या आरंभ संस्कार है, पति की सेवा करना ही गुरुकुल में वास अर्थात विद्याध्ययन है तथा घरबार का कामकाज ही अग्निहोत्र आदि कर्म है.

संक्षेप में, न बहुसंख्यक शूद्रों (स्त्री-पुरुष दोनों) को पढ़ने का अधिकार है, न सवर्ण या असवर्ण लड़कियों को. यह है महान गुरुशिष्य परंपरा और प्राचीन शिक्षा पद्धति.

इस परंपरा के ‘गुरुगीता’ जैसे ग्रंथ ज्ञानियों को नहीं, शोषितों को पैदा करते हैं और गुरुओं के नाम पर शिष्यों की पत्नियां हथियाने  वालों को उकसाते हैं. यदि यह शिक्षा है तो अशिक्षा किसे कहते हैं? यदि यह ज्ञान है तो अज्ञान किसे कहते हैं और यदि इस तरह के लोग गुरु होते हैं तो गुरुकंटाल किन्हें कहते हैं?

मोटा पैसा बना रहे कोचिंग सैंटर

देश में बढ़ती बेरोजगारी ने मातापिता को अपने बच्चों के कैरियर के प्रति सचेत कर दिया है. यही वजह है कि आज हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं.

अपनी जिंदगीभर की खूनपसीने की कमाई से वे अपने बच्चों को अच्छे कोचिंग सैंटरों में दाखिला दिला कर आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करा रहे हैं.

देश में इलाहाबाद, दिल्ली, कोटा जैसे शहरों के अलावा मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर और छत्तीसगढ़ के रायपुर, भिलाई जैसे बड़े शहरों में पीएससी, यूपीएससी, बैंक, रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ ही साथ आईआईटी और मैडिकल की प्रवेश परीक्षा की कोचिंग देने वाले दर्जनों बड़े सैंटर हैं जो छात्रों व बेरोजगारों से मोटी फीस ले कर अपना कारोबार चमका रहे हैं.

इस के अलावा जिला और तहसील लैवल पर भी संविदा शिक्षक और पटवारी परीक्षा की तैयारी के लिए कुकुरमुत्ते की तरह कोचिंग सैंटर खुल गए हैं जो नौजवानों की जेब ढीली कर मोटा पैसा बनाने का काम कर रहे हैं.

बताया जाता है कि कैसे तथाकथित कोचिंग सैंटरों में उन लोगों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है जो खुद कभी किसी परीक्षा में पास नहीं हुए.

सरकारी नौकरी के साथसाथ मैडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छी रैंक पाने को बेताब हजारों नौजवान मजबूरन इन कोचिंग सैंटरों में जा कर परीक्षा की तैयारी करने में जुटे हुए हैं.

सपने बिकते हैं कोटा में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से 3 साल पहले शिक्षा नीति में बदलाव लाने की बात कही थी पर 3 साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी शिक्षा नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

देश के पढ़ेलिखे नौजवानों के लिए कैरियर गाइडैंस के लिए सरकारी कोशिशों का नतीजा सिफर ही रहा है. निजी क्षेत्रों ने इस का फायदा उठा कर कोचिंग के नाम पर बड़ेबड़े सैंटर खोल कर अपना धंधा जमा लिया है.

राजस्थान का कोटा शहर सपने बेचने वालों का शहर बन गया है. सौ से ज्यादा कोचिंग सैंटर यहां इंजीनियर और डाक्टर बनाने का सपना बेचते हैं.

कोटा में देशभर के तकरीबन एक लाख बच्चे पढ़ रहे हैं. इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ाई के अलावा बच्चों के रहनेखाने तक का खर्च हर साल 2 लाख रुपए से ज्यादा होता है.

इन कोचिंग सैंटरों से कोटा के रियल ऐस्टेट कारोबार ने भी पंख लगा कर ऊंची उड़ान भरी है. पूरे कोटा में होस्टलों की तादाद भी 500 से कम नहीं है. इस के अलावा बड़ी तादाद में छात्र पेइंग गैस्ट बन कर भी रह रहे हैं.

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मैडिकल और आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा में बने इन कोचिंग सैंटरों का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है. यही वजह है कि देशभर के मातापिता अपने बच्चों को 8वीं क्लास के बाद ही कोटा में कोचिंग के लिए भेजने लगे हैं.

दिल्ली भी कम नहीं

यूपीएससी, पीएससी की तैयारी के लिए इलाहाबाद, मेरठ के अलावा देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई सारे कोचिंग सैंटर हैं, जो होनहार नौजवानों को कलक्टर बनाने का सपना दिखाते हैं.

छोटेछोटे कमरों में चलने वाले इन कोचिंग सैंटरों में भी 2 लाख रुपए की मोटी फीस में 9 महीने के क्रैश कोर्स के जरीए आईएएस परीक्षा की तैयारी कराने का दावा किया जाता है.

दिल्ली में रह कर आईएएस की तैयारी कर रहे मध्य प्रदेश के एक छात्र सिद्धार्थ दुबे कहते हैं कि दिल्ली में 100 वर्गफुट का एक कमरा 8,000 से 10,000 रुपए तक मासिक किराए पर मिलता है. कोचिंग सैंटरों की फीस और महंगा किराया गरीब तबके के होनहार छात्रों के लिए टेढी खीर साबित होता है.

इन कोचिंग सैंटरों में पढ़ने वाले छात्र यह बात मानते हैं कि अकेले कोचिंग सैंटर के दम पर कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा पास नहीं कर सकता जब तक कि वह खुद मेहनत न करे.

आज कोचिंग सैंटरों में जाना छात्रों की मजबूरी हो गई है, क्योंकि देशभर के कोनेकोने से आए और छात्रों के संपर्क में रहने से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए मनमुताबिक माहौल मिल जाता है.

शासनप्रशासन और कारपोरेट की तिकड़ी मिल कर देश में लागू वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली को जानबूझ कर बदलना नहीं चाहती है. ऐसे में मजबूर हो कर छात्रों को कोचिंग सैंटरों के जाल में उलझना पड़ता है.

पैसे लेकर फर्जीवाड़ा

2 दिसंबर, 2017 को कर्मचारी चयन बोर्ड एसएससी की परीक्षा में मेरठ के डीएवी स्कूल में मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए बागपत के रहने वाले सौरभ धामा ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले राज खोले.

उस ने बताया कि मेरठ में एक कोचिंग के संचालक पंकज धामा ने उसे एसएससी की परीक्षा पास कराने के बदले मोटी रकम मांगी थी. सौरभ ने खुद और अपने भाई की नौकरी के लिए अपनी पुश्तैनी 7 बीघा जमीन भी गिरवी रख दी थी, जिस के बाद पंकज ने उसे पेपर के साथ आंसरशीट भी मुहैया करा दी थी.

नकल करते पकड़े गए अभ्यर्थी ने बताया कि मेरठ में कोचिंग सैंटर चलाने वाला पंकज धामा अब तक कई नौजवानों से मोटी रकम ले कर नौकरी लगा चुका है. इस परीक्षा में कई ऐसे अभ्यर्थी भी हैं जो पंकज के संपर्क में थे.

मेरठ की यह घटना बताती है कि कोचिंग सैंटर मोटी रकम ले कर देश की परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ कर के काबिल बेरोजगार नौजवानों का हक भी मारते हैं.

कोटा, दिल्ली, भोपाल और इंदौर के कोचिंग सैंटर तो आईआईटी और मैडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग लेने वाले छात्रों को 10वीं और 12वीं क्लास की परीक्षा में नियमित परीक्षार्थियों के रूप में शामिल कराने का काम भी करते हैं.

बताया जाता है कि ये कोचिंग सैंटर अपने यहां दर्ज बच्चों को उसी शहर के निजी स्कूलों से सांठगांठ कर उन को उन स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं. निजी स्कूल इन छात्रों की हाजिरी लगाते रहते हैं जबकि ये छात्र उन स्कूलों में कभी पढ़ने जाते ही नहीं हैं.

कोचिंग और सरकार

वर्तमान समय में जब नौजवान तबका अपने कैरियर के लिए मोटी रकम खर्च कर कोचिंग सैंटरों में जाने को मजबूर है तो सरकार क्यों इस दिशा में कोशिश नहीं करती? हर स्कूल, कालेज में कैरियर गाइडैंस देने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जाए, क्योंकि उचित मार्गदर्शन की कमी में स्कूल में पढ़ रहे छात्र को हायर सैकेंडरी पास करने के बाद कौनकौन से अवसर उपलब्ध हैं, इस की जानकारी भी नहीं रहती है.

कालेज के उबाऊ सिलेबस से हट कर क्यों न उन्हें प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराई जाए, जिस से ये नौजवान किसी कोचिंग सैंटर के मकड़जाल में न फंस कर अपने कैरियर को बना सकें? आखिर कब तक सरकारी तंत्र निजी संस्थानों के हाथों की कठपुतली बना रहेगा?

देश में विकासखंड लैवल पर शुरू हुए कौशल विकास केंद्रों में अच्छी तादाद में प्रशिक्षक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन्हें मजबूत बनाने की कोशिश की जाए तो शायद बेरोजगारों का भविष्य संवर सके.

छोटे होटलों पर गाज

लखनऊ में 6 जुलाई को जिलाधिकारी के निर्देश पर सिटी मजिस्ट्रेट ने चारबाग इलाके में कई ऐसे होटलों को बंद कर दिया जिन्हें सरकारी भाषा में अवैध कहा जाता है. लोगों का व्यापार तो ठप हुआ ही बीसियों लोग जिन का सामान कमरों में था रह गया और बाकी को अपना सामान उठा कर दूसरे होटल ढूंढ़ने पड़े.

इन होटलों से किसी को शिकायत न थी. यहां कोई ऐसा काम नहीं हो रहा था जिस से किसी को परेशानी हो रही हो. सरकारी बहाने थे कि फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट नहीं लिया गया, जीने संकरे थे, गलियां तंग थीं, ग्राहकों की ऐंट्री अच्छी नहीं थी.

इस तरह के छापे देशभर में पड़ते रहते हैं और सरकार अपनी पीठ थपथपाती रहती है कि उस ने महान काम किया. असल में यह कोरा जनविरोधी काम है और इस के पीछे रिश्वतखोरी को बढ़ावा देने की नीयत है. सरकार ने हर तरह के काम पर बीसियों कानून बना रखे हैं, तरहतरह की इजाजतें लेनी होती हैं. सरकारी दफ्तरों में बैठे बाबू इंजीनियर भी बन जाते हैं, इकोनौमिस्ट भी, फायर फाइटर भी और समाज के ठेकेदार भी. कानून ने प्रमाणपत्र देने के नाम पर अंधेरगर्दी मचा रखी है.

छोटे होटलों की जरूरत बहुत सख्त है. जो लोग खुद 3000 रुपए महीने के कमरे में रहते हैं, वे दूसरे शहर में जाने पर क्या सारी अनुमतियों वाले होटल में जाने लायक पैसे दे सकते हैं? वे घर जैसा वातावरण पा कर खुश हैं. वे 200 रुपए रोज का खर्च दे कर भी कसमसाते हैं.

रही बात आग से बचाव की तो किस घर के पास फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट है? आग तो कहीं भी लग सकती?है, फिर होटलों पर ही क्यों गाज गिरे? इसलिए कि होटल को बंद करने की, सील करने की धमकी दे कर पैसे वसूले जा सकते हैं.

जिस देश में 10 फुट×10 फुट के कमरे में 6 लोग रहते हैं, वहां होटलों को महंगा करना बेवकूफी है पर जब कानून बनता है, लागू होता है तो सरकारी नेताओं, अफसरों और बाबुओं की समाज की ठेकेदारी करने की चौगुनी नाक पैदा हो जाती है. वे समाज के हितों के ठेकेदार बन जाते हैं. वे होटल के कमरे का किराया 100 रुपए से बढ़वा कर 500 रुपए से 1000 रुपए करवा कर ही चैन से बैठते हैं क्योंकि तभी उन्हें लाख 2 लाख हर साल रिश्वत में मिलेंगे.

अफसोस यह है कि आमतौर पर जनता ही सस्तों को नंबर 2 का यानी कालाबाजारी करने वाले कहने लगती है जबकि एक तरह से वे नए शहर में आए गरीब या साधारण को कम सुविधा वाली छत देते हैं. ऐसे होटल जरूरी हैं और इन्हें अवैध कहना गलत है.

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