भारत में उभरती कौर्पोरेट चिकित्सा अच्छी या बुरी

कारोबार के हर क्षेत्र में इन दिनों एक नई संस्कृति का उभार होता नजर आ रहा है और वह है कौर्पोरेट संस्कृति. चिकित्सा के क्षेत्र में भी यह संस्कृति अपने पांव तेजी से फैला रही है. आजादी के बाद से ले कर अब तक अस्पताल प्रबंधन और इलाज में तकनीकी बदलाव के साथ ही साथ पेशेवर रवैया अपनाया जा रहा है. बिड़ला, टाटा, अपोलो, हिंदुजा जैसे बड़ेबड़े औद्योगिक घरानों के अस्पताल पहले से ही सुपर स्पैशलिटी अस्पताल के रूप में जाने जाते थे, अब रिलायंस, डालमिया, इमामी, फोर्टिस सहित बहुत सारे औद्योगिक ग्रुप कौर्पोरेट चिकित्सा के साथ स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कदम बढ़ा रहे हैं, फिर वह अस्पताल, नर्सिंगहोम, क्लिनिक, डायग्नौसिस सैंटर हो या स्वास्थ्य बीमा का क्षेत्र. चिकित्सा से जुड़े इन तमाम क्षेत्रों में कौर्पोरेट स्तर की सेवाएं दी जा रही हैं.

आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था को ले कर समयसमय पर हुए सर्वेक्षण का नतीजा यही कहता रहा है कि कौर्पोरेट अस्पताल संस्कृति के कारण आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र में बहुत बड़ा परिवर्तन आने वाला है. आधुनिक चिकित्सा मोटेतौर पर हर किसी को उपलबध हो रही है. वहीं रोजगार की भी गुंजाइश बढ़ी है. कौर्पोरेट अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को औपरेट करने वाले प्रशिक्षित लैब तकनीशियनों, रेडियोलौजिस्ट, फिजियोथेरैपी पैरामैडिकल स्टाफ, नर्सिंग कर्मियों और नई बीमारियों से निबटने के लिए विशेषतौर पर प्रशिक्षित डाक्टरों के लिए भी गुंजाइश बढ़ी है.

स्वास्थ्य सेवा के सितारे

भारत में स्वास्थ्य सेवा का पिछले ढाईतीन दशकों का सफर बड़ा दिलचस्प रहा है. कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति से पहले देश के निजी अस्पतालों में सुपरस्पैशलिटी सेवाएं आरंभ हुईं. इस ने स्वास्थ्य सेवा को एक नया आयाम तो दिया पर यह एक खास वर्ग तक ही सीमित थी. स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कुछ नाम हैं जिन्होंने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयां दी हैं और ये नाम इस क्षेत्र के सितारे हैं. ऐसा ही एक नाम हैं डा. प्रताप रेड्डी. इन के अवदानों को कभी भुलाया नहीं जा सकता. अपोलो फेम डा. रेड्डी को भारत के कौर्पोरेट चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणी के रूप में जाना जाता है. इस क्षेत्र में अपोलो एक क्रांति के रूप में उभर कर आया. कहते हैं डा. रेड्डी का मकसद भारत में अपोलो अस्पतालों की श्रृंखला के रूप में ऐसा मैडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का था जिस में हर किसी को इलाज मुहैया हो सके. देश का आम आदमी चिकित्सा का खर्च वहन कर सके.

चेन्नई में 1983 में अपोलो अस्पताल ने अपना पहला कदम रखा. आज दक्षिण एशिया और मध्यपूर्व के देशों समेत दुनिया के 9 देशों में अपोलो की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं. भारत में अपोलो के 64 वर्ल्ड क्लास अस्पताल व क्लिनिक हैं, लगभग 9 हजार बैड, डेढ़ हजार से अधिक फार्मेसी, लगभग 150 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और डायग्नौसिस सैंटर के साथ स्वास्थ्य बीमा, ग्लोबल कंसल्टैंसी, 15 नर्सिंग कालेज व अस्पताल मैनेजमैंट व रिसर्च फाउंडेशन हैं.

हमारे देश में डा. प्रताप रेड्डी के अलावा चिकित्सा क्षेत्र में एक और व्यक्तित्व है जो पूरे दिलोजान से अपने पेशे के लिए समर्पित है. और वह व्यक्तित्व है डा. देवी शेट्टी. दिल की बीमारी से ग्रस्त गरीबों के लिए डा. शेट्टी नाम किसी से छिपा नहीं. अब तक वे लगभग 20 हजार ओपन हार्ट सर्जरी कर चुके हैं. सफल सर्जरी का प्रतिशत 98 है. 1991 में डा. शेट्टी ने एक बच्चे की हार्ट सर्जरी की, जो कि देश में पहली सफल ओपन हार्ट सर्जरी के रूप में जानी जाती है. वे मदर टेरेसा के व्यक्तिगत डाक्टर थे.

मदर टेरेसा की सोहबत में इन के दिल में गरीबों के लिए दर्द पैदा हुआ और बिड़ला के कैलकटा हौस्पिटल में एक गरीब मरीज की ओपन हार्ट सर्जरी करने के बाद सर्जन के रूप में डा. शेट्टी ने अपनी फीस माफ कर दी. यह बात अस्पताल प्रबंधन को नागवार गुजरी. डा. शेट्टी ने उसी दम इस्तीफा दे दिया.

डा. शेट्टी बेंगलुरु चले गए और वहां उन्होंने मणिपाल हार्ट फाउंडेशन की स्थापना की. इस के बाद 2001 में नारायण हृदयालय के नाम से एक ट्रस्ट और अस्पताल की स्थापना की. अस्पताल के पीछे हैल्थ सिटी भी तैयार की गई है.

आज नारायण गु्रप का हृदयालय बेंगलुरु, अहमदाबाद, बरहमपुर, धारवाड़, गुवाहाटी, जयपुर, हैदराबाद और जमशेदपुर समेत 17 जगहों में 29 हैं. कोलकाता में डा. शेट्टी का अस्पताल रवींद्रनाथ टैगोर हार्ट फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है. डा. शेट्टी के लगभग हरेक अस्पताल में 4-5 बिल्ंिडग्स और 2-5 हजार बैड हैं. इन अस्पतालों में हार्ट, बौनमैरो, किडनी और लीवर प्रत्यारोपण से ले कर हर तरह की बीमारियों का इलाज समाज के हर स्तर के लोगों का हो रहा है.

बढ़ रहा है कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार

देश के महानगरों और बड़े शहरों में पिछले 2 दशकों से निजी अस्पतालों में इलाज से ले कर प्रबंधन तक का काम कौर्पोरेट ढांचे में ढल रहा है. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर के राज्यों समेत देशभर से लोगों के लिए दक्षिण भारत में चेन्नई, वेल्लोर, हैदराबाद, बेंगलुरु इलाज का सब से भरोसेमंद ठिकाना हुआ करता था. हर छोटेबड़े इलाज के लिए लोग दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. आंखों के लिए चेन्नई का शंकर नेत्रालय और हैदराबाद का एल वी प्रसाद अस्पताल, दूसरी अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए वेल्लोर के क्रिश्चियन मैडिकल कालेज और चेन्नई में अपोलो अस्पताल हैं. कोलकाता, बिहार और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के अलावा बंगलादेश और म्यांमार तक से मरीज दक्षिण भारत आते रहे हैं. यहां तक कि जमीनजायदाद तक बेच कर लोग दक्षिण भारत में कम खर्च में बेहतरीन इलाज के लिए जाते रहे हैं.

अब अगर कोलकाता की बात करें तो एक समय था यहां के लोग भी बेहतरीन इलाज के लिए ज्यादातर दक्षिण भारत का रुख किया करते थे. दक्षिण भारत ही उन का एकमात्र भरोसा था. उस समय यहां इक्केदुक्के निजी अस्पताल ही थे पर वे धनीमानी के लिए ही थे. आम आदमी इन अस्पतालों का रुख कर नहीं पाता था.

पर समय बदला और समय के साथ कोलकाता के चिकित्सा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया. पिछले 2 दशकों में अकेले ईस्टर्न बाईपास में 15-20 निजी कौर्पोरेट अस्पताल खुल चुके हैं और एक हद तक यहां अत्याधुनिक चिकित्सा का लाभ समाज के निचले स्तर के लोगों को भी मिल रहा है.

पिछले 5 सालों से अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा के नजरिए से कोलकाता पूर्वोत्तर भारत के लिए गेटवे बना हुआ है. इस के अलावा हर साल हजारों की संख्या में बंगलादेशी कोलकाता आ कर इलाज करा रहे हैं. पिछले साल कोलकाता के पियरलैस अस्पताल में 14 हजार बंगलादेश के नागरिकों ने अपना इलाज करवाया. दिल की बीमारी के अत्याधुनिक इलाज के लिए कोलकाता में प्रख्यात कार्डियक सर्जन डा. देवी शेट्टी का रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस बड़ा भरोसे का अस्पताल माना जाता है. यहां भी बंगलादेश समेत नेपाल, भूटान, म्यांमार से मरीज आते हैं.

लेकिन बंगलादेशी नागरिकों के लिए कोलकाता मैडिकल हब बना हुआ है. इस के पीछे एक बड़ा कारण दिल्ली, मुंबई या दक्षिण भारत में जा कर इलाज करवाने के बजाय कोलकाता में इलाज करवाने में ज्यादा सहूलियत होती है. दरअसल, दोनों का खानपान, रहनसहन और भाषा लगभग एकजैसी है. उस पर बंगलादेश बंगाल के बहुत ही करीब है. बंगाल में यही सुविधा नेपाली, भूटानी नागरिकों को मिलती है. जाहिर है बड़ी संख्या में नेपाल, भूटान के लोग कोलकाता इलाज कराने आते हैं.

इन्हीं वजहों से यहां के कौर्पोरेट अस्पतालों का कारोबार भी बढ़ रहा है. अब इस का फायदा एयरवेज कंपनियों को भी मिलता ही है. हाल ही में अपोलो और जेट एयरलाइंस ने फ्लाई टू गुड हैल्थ योजना के तहत इलाज और हवाईजहाज के किराए में 10 प्रतिशत छूट की भी घोषणा की है.

मल्टीस्पैशलिटी से कौर्पोरेट तक का सफर

निजी अस्पतालों के कौर्पोरेट अस्पताल में तबदील होने के बाद भारत में कुछ सरकारी अस्पताल भी सुपर स्पैशलिटी चिकित्सा सेवा उपलब्ध करा रहे हैं. वैसे भी आज देश में जो अस्पताल कौर्पोरेट अस्पताल के रूप में स्थापित हैं, उन के सफर की शुरुआत सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से ही हुई थी. दरअसल, सुपर स्पैशलिटी सेवाओं से अस्पतालों में कौर्पोरेट कल्चर की नींव पड़नी शुरू हुई. शुरू  के दिनों में इस तरह की सेवाओं को केवल बड़े निजी अस्पताल ही मुहैया करा रहे थे. लेकिन बाद में देश के कुछ नामीगिरामी सरकारी अस्पतालों में भी इस की शुरुआत हुई.

दिल्ली का एम्स इसी श्रेणी में आता है. आने वाले दिनों में एम्स की शाखाएं देश के अन्य राज्यों में भी खोले जाने का प्रस्ताव है. इस को ले कर राजनीति भी कुछ कम नहीं हो रही है. बहरहाल, जिस किसी राज्य में एम्स की शाखा खुलेगी, उस राज्य के लिए यह फख्र की बात होगी. वहीं, माना यह भी जा रहा है कि एम्स की स्थापना से उस राज्य में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति हो जाएगी. बजट में कई राज्यों में एम्स खोले जाने की घोषणा हो चुकी है.

एम्स की ही श्रेणी में आता है कोलकाता का सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल, जो एसएसकेएम अस्पताल के नाम से जाना जाता है. इस की स्थापना 1770 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी. तब यह कोलकाता का पहला अस्पताल था और प्रैसिडैंसी जनरल अस्पताल के नाम से जाना जाता था. आजादी के बाद इस का नाम सेठ सुखलाल करनानी अस्पताल पड़ा. यह कोलकाता का सुपर स्पैशलिटी सरकारी अस्पताल है. यहां अत्याधुनिक इलाज की सहूलियत है.

मुंबई के किंग एडवर्ड मैमोरियल अस्पताल को ही लें तो यह न्यूरोसर्जरी के लिए बैस्ट सरकारी अस्पताल के लिए जाना जाता है. हैदराबाद के निजाम इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस में 28 विभागों में से 14 विभाग ऐसे हैं जहां सुपर स्पैशलिटी सेवाएं मुहैया हैं. चंडीगढ़ का पीजीआईएमईआर और लखनऊ का संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस भी न्यूरोसर्जरी के लिए विख्यात है. ये इसी श्रेणी के सरकारी अस्पताल हैं, जहां अत्याधुनिक कौर्पोरेट चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है. यहां यह भी कहने की जरूरत है कि अगर सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण हो भी रहा है तो यह केवल बड़े शहरों तक ही सीमित है.

ऐसे में भरोसा कौर्पोरेट अस्पताल ही हैं. कुछ कौर्पोरेट अस्पताल हैं जिन की शाखाएं देशभर के विभिन्न राज्यों में हैं. फोर्टिस, अपोलो और टाटा मैमोरियल ऐसे ही कौर्पोरेट अस्पताल हैं. चेन्नई के शंकर नेत्रालय, क्रिश्चियन मैडिकल कालेज, अपोलो, कोलकाता के अपोलो, वेलव्यू और आमरी, हैदराबाद के इंडोयूएस सुपर स्पैशलिटी अस्पताल, एलवी प्रसाद अस्पताल, सैंचुरी अस्पताल, यशोदा अस्पताल से ले कर मुंबई के टाटा अस्पताल, बीच कैंडी, हिंदुजा, लीलावती, कोकिलाबेन अस्पताल, बेंगलुरु के सत्य साईंबाबा इंटरनैशनल अस्पताल, ऐक्सिस सुपर स्पैशलिटी,नैशनल इंस्टिट्यूट औफ मैंटल हैल्थ ऐंड न्यूरोसाइंस और दिल्ली में सर गंगाराम अस्पताल, सफदरजंग अस्पताल, राम मनोहर लोहिया अस्पताल और गुरुग्राम के मेदांता जैसे अस्पतालों में दुनियाभर से लोग इलाज कराने के लिए आते हैं.

मैडिकल टूरिज्म टैलीमैडिसिन

वर्ष 2012 से चिकित्सा क्षेत्र में मैडिकल टूरिज्म और टैलीमैडिसिन की संस्कृति ने जोर पकड़ा. एक वर्ष के अंदर रूस, यूक्रेन, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, अफ्रीका और दूसरे कई खाड़ी के देशों से मरीज दिल्ली से ले कर मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बेंगलुरु में इलाज के लिए आते हैं.

आंकड़ों की मानें तो 2012 में जहां एक लाख 72 हजार लोग इलाज के लिए भारत आए तो 2013 में 2 लाख 36 हजार और 2014 में एक लाख 84 हजार से अधिक विदेशी इलाज के लिए भारत आए. मैडिकल टूरिज्म मार्केट रिपोर्ट के अनुसार, अक्तूबर 2015 तक भारत का मैडिकल टूरिज्म लगभग 2 अरब 22 करोड़ रुपए का था. और अब उम्मीद की जा रही है कि 2020 में यह 4 खरब 67 अरब 18 करोड़ रुपए से 5 खरब 33 अरब 92 करोड़ रुपए तक हो जाएगा.

मैडिकल टूरिज्म में उफान का जो कारण रहा है वह कम खर्च में बेहतरीन इलाज है. मिसाल के तौर पर किसी बीमारी के इलाज के लिए अमेरिका में जो खर्च आता है, उस रकम के महज 10वें हिस्से में एक विदेशी मरीज भारत आ कर इलाज का पूरा खर्च उठा कर लौट जाता है. केवल अमेरिकी नहीं, दुनिया के तमाम हिस्से से लोग यहां आ कर इलाज करवाते हैं. हाल ही में दुनिया की सब से अधिक वजन वाली मिस्र की महिला नागरिक इमान अहमद इलाज के लिए मुंबई आई हैं. बताया जाता है कि अगले 2 सालों तक इमान अहमद का भारत में इलाज होगा.

एक अमेरिकी एजेंसी है जौइंट कमीशन इंटरनैशनल (संक्षेप में जेसीआई) यह एक अलाभकारी एजेंसी है. इस एजेंसी ने दुनियाभर में 21 हजार अस्पतालों को मान्यता दे रखी है. भारत के ऐसे 28 अस्पताल हैं जिन्हें जेसीआई की मान्यताप्राप्त है. इस एजेंसी की ओर से भारत में परामर्शदाता तेलंगाना के डा. महबूब अली खान हैं. यह जेसीआई कौर्पोरेट चिकित्सा पद्घति के बहुत सारे नियमों का पालन करता है.

विदेशी मरीजों का भारत में इलाज कराने के मामले में आईएसओ की तुलना में जेसीआई की मान्यता कहीं अधिक माने रखती है. ज्यादातर विदेशी मरीज जेसीआई द्वारा मान्यताप्राप्त अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं. अस्पताल और मरीज के बीच जेसीआई एक कड़ी का काम करता है.

बहरहाल, मैडिकल टूरिज्म का एक हिस्सा है टैलीमैडिसिन. यह वह तकनीक है जिस के तहत विदेश में बैठ कर कोई भारत के डाक्टरों से परामर्श कर सकता है. जब कोई मरीज विदेश या भारत के ही किसी दूरदराज के इलाके से आ कर कहीं किसी बड़े शहर में इलाज कराना चाहता है तो इलाज से पहले और बाद में टैलीमैडिसिन की सुविधा बड़ी सहूलियत देती है. भारत में इस की शुरुआत चित्तूर के अपोलो अस्पताल में अरागोंडा नामक प्रोजैक्ट के तहत हुई.

लेकिन आगे चल कर अपोलो अस्पताल के अलावा एशियन हार्ट फाउंडेशन, सूचना तकनीक विभाग, इसरो, दूसरे कई राज्य सरकारों और निजी संस्थाओं के सहयोग से रियल टाइम में मैडिकल परामर्श देने व लेने का काम होता है. कार्डियोलौजी, टैलीरेडियोलौजी, टैलीपैथेलौजी को सपोर्ट करती है. आज दिल्ली में एम्स, लखनऊ में संजय गांधी इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस के अलावा चंडीगढ़, ओडिशा, शिमला, कटक, रोहतक के कुछ अस्पतालों में इस की सुविधा उपलब्ध है.

पिछले कुछ सालों में इसरो के टैलीमैडिसिन नैटवर्क का विस्तार हुआ है. अब इस नैटवर्क से कम से कम 45 ग्रामीण अस्पताल और 15 सुपर स्पैशलिटी अस्पताल जुड़े हुए हैं जिन में अंडमान निकोबार से ले कर कारगिल, लेह, लक्षद्वीप शामिल हैं. जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है तो कोलकाता में स्कूल औफ ट्रौपिकल मैडिसिन, एसकेकेएम, नीलरतन सरकारी अस्पताल में भी टैलीमैडिसिन की सहूलियत है. इस के साथ ही, बंगाल के कई जिलों में भी टैलीमैडिसिन की सुविधा है. कोलकाता के रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट औफ कार्डियक साइंस और बेंगलुरु का नारायण हृदयालय को टैलीमैडिसिन का लिंक हब बनाया गया है.

सरकारी स्वास्थ्य बजट

सरकारी बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अलग से रकम मुहैया कराई जाती है. लेकिन पाया गया है कि ज्यादातर सरकारी अस्पताल कुछ अत्याधुनिक चिकित्सा से संबंधित डायग्नौसिस मशीनें और दूसरे कई उपकरण तो खरीद लेते हैं और उन का खूब प्रचार भी हो जाता है पर प्रशिक्षित तकनीशियनों व स्वास्थ्य अधिकारियों के अभाव में महंगी मशीनें पड़ीपड़ी कबाड़ हो जाती हैं.

आखिरकार इन आधुनिक उपकरणों का लाभ आम जनता को नहीं मिल पाता है. और ऐसी चिकित्सा सेवा पाने के लिए लोग मजबूरन इस उम्मीद के साथ, कि निजी अस्पतालों में उम्दा इलाज होगा, उधर का रुख करने लगते हैं, अपने बीमार परिजनों को भलाचंगा कर के घर लौटा ले जाने के लिए भले ही उन्हें कर्ज लेना पड़े या सबकुछ दांव पर लगाना पड़े. ऐसे में साफ है कि सरकारी अस्पताल ठूंठ बन कर रह जाते हैं. कर के रूप में जनता का पैसा जाया हो जाता है.

चिकित्सा का हब बना भारत

डेढ़दो दशकों से भारत विदेशी नागरिकों के लिए मैडिकल हब बन गया है. यहां यह देखा जाना जरूरी है कि आखिर भारत मैडिकल हब क्यों बना, खासतौर पर अंग प्रत्यारोपण का? एक कारण तो यही है कि विदेशी नागरिकों के लिए उन के देश की तुलना में भारत में इलाज का खर्च कहीं सस्ता है. इस सहूलियत की चर्चा पहले ही की जा चुकी है.

अंग प्रत्यारोपण के लिए भी विदेशी नागरिक भारत का रुख करना पसंद करते हैं. भारत के कुछ राज्य अलगअलग अंगों के प्रत्यारोपण के लिए दुनियाभर में जाने जाते हैं. मिसाल के तौर पर आंध्र प्रदेश हार्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, गुजरात किडनी और लीवर, कर्नाटक हार्ट, होमोग्राफ्ट, किडनी, लीवर, लंग्स, पैनक्रियाज, केरल हाथ, घुटना, माइक्रोवैस्कुलर, चेन्नई कोर्निया, हाथ, हार्ट किडनी, लीवर, लंग्स के प्रत्यारोपण के लिए हर साल हजारों की तादाद में विदेशी भारत के इन शहरों में आते हैं.

हाल ही में किसी अमेरिकी अखबार में एक विज्ञापन आया था, जिस में कहा गया था कि हर 15 घंटे में एक न्यूयौर्क निवासी किसी न किसी अंग के डोनर का इंतजार करते हुए लंबी नींद सो जाता है. इस विज्ञापन की टैगलाइन थी- ‘बीकम एन और्गन डोनर.’ यह विज्ञापन अमेरिका के महज एक शहर में देखा गया है. जाहिर है कि इस विज्ञापन के जरिए स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है. यही स्थिति है जो मानव अंग तस्करी को बढ़ावा देती है. केवल भारत में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में ऐसा रैकेट काम कर रहा है.

वैसे भी, दुनियाभर के एक प्रतिशत धनकुबेरों के लिए अंग प्रत्यारोपण कोई समस्या नहीं है. मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई के अस्पतालों में इलाज कराते सऊदी शेखों को देखा जा सकता है. बताया जाता है कि वे भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में छुट्टियां मनाने के नाम पर आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं.

हालांकि मानव अंगों की तस्करी के मामले सामने आने पर भारत के अस्पतालों को विदेशियों के लिए अंग प्रत्यारोपण हब बनाने को ले कर विरोध भी कम नहीं होता रहा है. हमारे देश में चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ी बिरादरी के एक बड़े धड़े का यह भी मानना है कि जिस तादाद में विदेशी नागरिक अंग प्रत्यारोपण के लिए भारत आ रहे हैं, इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब डाक्टर मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया ऐक्ट को धता बताते हुए देशी व विदेशी मरीजों के बीच अंतर करने लगेंगे. अगर ऐसा दिन आया तो देशी मरीज बगैर इलाज के मरने को मजबूर हो जाएंगे.

एयर एंबुलैंस की सुविधा

बेंगलरु की एयर रेस्क्यू, मेदांता की फ्लाइंग डौक्टर्स समेत देश में कई बड़े कौर्पोरेट एयर एंबुलैंस की सुविधा मोटे दामों पर उपलब्ध कराते हैं. इन हैलिकौप्टरों में आपातकालीन मैडिकल इक्विपमैंट समेत तमाम बुनियादी सुविधाएं होती हैं जो मरीजों को आम एंबुलैंस में मुहैया करवाई जाती हैं. फिलहाल दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता व चंडीगढ़ आदि जगहों पर एयर एंबुलैंस की सुविधा मौजूद है. कौर्पोरेट चिकित्सा की महंगी व खर्चीली सुविधाएं, जाहिर है, संपन्न तबके वाले ही अफोर्ड कर सकते हैं.

सरकारी अस्पताल : नियम ज्यादा सुविधाएं कम

भारत में मात्र एकचौथाई उच्चवर्गीय, साधनसंपन्न तथा शहरी लोग हैं जिन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान, राजीव गांधी सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल, संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस जैसे विश्व स्तरीय सुविधाओं से युक्त संस्थान हैं जहां लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से ले कर डे केयर सर्जरी तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं. इन के अतिरिक्त दूसरे कौर्पोरेट अस्पताल हैल्थ टूरिज्म तथा टैलीमैडिसिन जैसी आधुनिक सुविधाओं के भी विकल्प हैं. दूसरी ओर भारत में बसने वाले तीनचौथाई ग्रामीण तथा दूरदराज के लोगों के लिए उपलब्ध प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, कम्युनिटी हैल्थ सैंटर व जिला अस्पतालों में चिकित्सा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है. वहां न तो डाक्टर हैं, न ही दवाइयां. उस पर भी सरकारी नियमों का ऐसा जाल है कि कई मरीज तो पेपरवर्क पूरा होतेहोते दम तोड़ देते हैं.

सरकारी रवैया तथा लालफीताशाही के कारण इस सैक्टर में कोई भी काम ढंग से नहीं हो पा रहा है. दूसरे देशों में प्रति हजार जनसंख्या पर अस्पतालों में 3.96 बैड हैं जबकि भारत में मात्र 0.7 ही हैं. करीब 10 लाख भारतीय प्रतिवर्ष इलाज के बिना ही मर जाते हैं तथा लगभग 7 करोड़ लोग विशेषज्ञ की सुविधा नहीं प्राप्त कर पाते क्योंकि 80 फीसदी विशेषज्ञ शहर में ही रहना पसंद करते हैं, केवल 3 फीसदी ही ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं. भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर 74,150 कम्युनिटी हैल्थ सैंटर की जरूरत है लेकिन इस की संख्या आधे से भी कम है.

2025 तक भारत के अस्पतालों में करीब 17 लाख बैड की जरूरत होगी. पब्लिक सैक्टर द्वारा किए जाने वाले 860 मिलियन यूएस डौलर इनवैस्मैंट के बावजूद महज 15 से 20 फीसदी ही इस की आपूर्ति हो पाएगी. इनवैस्टमैंट कमीशन के अनुसार, पिछले 4 सालों के दौरान भारत की विकास दर 4 फीसदी की दर से बढ़ी है. उसी दर से भारतीयों की इनकम भी बढ़ी है. लेकिन इस के बावजूद बहुत बड़ी संख्या में लोगों को आधारभूत चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल रही हैं.

मानव अंग तस्करी

इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं पर मानव अंग की तस्करी का धब्बा भी लग रहा है. 1994 में मानव अंग के व्यापार को गैरकानूनी घोषित किया गया था. हालांकि पारिवारिक सदस्यों द्वारा अंग डोनेट करने पर किसी तरह की बंदिश नहीं है. इसी का लाभ उठा कर फर्जी दस्तावेज बना कर डोनर के रूप में ग्रामीण इलाकों के गरीबों को पैसों का लालच दे कर डोनर बना दिया जाता है. देशभर में कई गिरोह मानव अंग तस्करी के काम में लगे हुए हैं. इस काम में देश के कुछ निजी अस्पताल के डाक्टर से ले कर नर्सिंग स्टाफ तक की मिलीभगत होती है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में हर साल 1-2 लाख किडनी की जरूरत होती है.

वहीं, पूरे देश में विभिन्न तरह के अंगों के प्रत्यारोपण के लिए डोनर का इंतजार करने वालों की एक बहुत ही लंबी सूची है. ज्यादातर मरीजों का यह इंतजार कभी खत्म न होने वाला इंतजार बन कर रह जाता है. इंतजार ही इंतजार में बहुत सारे मरीजों की मौत हो जाती है. उन्हें डोनर नहीं मिलता. लेकिन वहीं विदेशी मरीज वीजा ले कर भारत आते हैं और अंग प्रत्यारोपण करवा कर लौट जाते हैं. माना जाता है कि अंग तस्करी से जुड़े एक बहुत बड़े रैकेट के कारण ही यह संभव हो पाता है. दिल्ली के एक निजी अस्पताल में मानव अंग (किडनी) की तस्करी का भंडाफोड़ हो चुका है. थौमसन रायटर्स फाउंडेशन के अनुसार, मानव अंग की तस्करी के मामले में अस्पताल प्रशासन ने भी स्वीकार कर लिया है कि अस्पताल में अनजाने में पीडि़तों के शरीर से अंगों को निकाला गया.

चिकित्सा का व्यावसायीकरण

‘‘दमा के इलाज के लिए दिल्ली के एक कौर्पोरेट अस्पताल गया था. जेब में 50 हजार रुपए थे. मैं ने सोचा कि दमे के इलाज में एक अच्छे अस्पताल में इस से ज्यादा क्या खर्च होगा. इतने में अच्छा इलाज हो जाएगा और मैं ठीक भी हो जाऊंगा. वहां जाने के बाद मुझे आईसीयू में भरती कर दिया गया. तमाम तरह की महंगी जांचें होने लगीं. दूसरे दिन मुझे पता चला कि आईसीयू का प्रतिदिन का चार्ज काफी ज्यादा है जो मेरे बजट से काफी ज्यादा है. अपने चिकित्सक से कहा कि मैं अब अच्छा महसूस कर रहा हूं, मुझे जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाए. लेकिन मुझे 4-5 दिनों तक आईसीयू में ही रखा गया और ठीक 5वें दिन मुझ से 2.5 लाख रुपए जमा करने के लिए कहा गया. इतनी बड़ी रकम की मैं ने कल्पना तक नहीं की थी. बहुत विनती करने के बाद किसी तरह 1.5 लाख रुपए दे कर अस्पताल से मुक्त हुआ.’’

– एक भुक्तभोगी.

यह हाल हर जगह का भले न हो लेकिन 10 में से कम से कम 6 लोग इस तरह की समस्या से रूबरू हो चुके हैं. मरीज किसी अस्पताल में भरती तो अपनी मरजी से हो सकता है लेकिन वहां से बाहर निकल पाना उस के हाथ में नहीं होता. सोती हुई सरकार सब देखते हुए भी अनदेखी करती है क्योंकि बड़े अस्पतालों के कर्ताधर्ता पहले ही उन की आंखों पर रिश्वत की पट्टी बांध चुके होते हैं. चिकित्सा के व्यावसायीकरण ने इलाज का तरीका तथा स्टैंडर्ड चाहे जितना भी उम्दा क्यों न किया हो, किंतु इस में दो मत नहीं है कि स्वास्थ्यसेवा पूरी तरह व्यापार बन चुकी है. इसी मानसिकता के तहत अस्पताल खोले भी जा रहे हैं और इसी संस्कृति के तहत चलाए भी जा रहे हैं.

– डा. दीपक प्रकाश और साधना शाह

संजय लीला भंसाली की फिल्म से सुहाना करेंगी बौलीवुड डेब्यू?

इंडस्ट्री में इन दिनों स्टार किड को लौन्च करने का सिलसिला शुरु है. शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान भी एक इंटरनैशनल मैगजीन में अपने पहले फोटोशूट से ग्लैमर वर्ल्ड में एंट्री कर चुकी हैं. अब फैंस सुहाना के बौलीवुड डेब्यू का इंतजार कर रहे है. लेकिन खबरों की मानें तो, संजय लीला भंसाली सुहाना को लौन्च करने वाले हैं. ऐसे में अगर संजय लीला भंसाली भी सुहाना को लौन्च करते हैं तो उनके अपोजिट कौन से बड़े स्टार का बेटा डेब्यू करेगा इस पर भी सबकी नजरें बनी रहेंगी.

बता दें कि सुहाना हाल ही में 18 साल की हुई हैं ऐसे में देखा जाए तो उनके अपोजिट ईशान खट्टर की भी जोड़ी जम सकती हैं. ईशान ने जाह्नवी कपूर के साथ धड़क से डेब्यू किया हैं और उनके काम को खूब पसंद भी किया गया. ईशान के अलावा सुहाना के अपोजिट सनी देओल के बेटे करन देओल को भी मौका मिल सकता हैं जो जल्द ही फिल्म ‘पल पल के दिल के पास’ से डेब्यू कर रहे है.

करन के अलावा सुनील शेट्टी के बेटे अहान शेट्टी भी नजर आ सकते हैं. सलमान खान अहान को जल्द इंडस्ट्री में लौन्च करेंगे. स्टार किड से अलग डायरेक्टर अनिल शर्मा के बेटे उत्कर्ष शर्मा के साथ भी सुहाना खान की जोड़ी जम सकती है. फिल्म गदर में छोटे जीते के किरदार में नजर आ चुके उत्कर्ष फिल्म जीनियस में नजर आने वाले है. इन सबके अलावा अदाकारा भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दासानी भी सुहाना की जोड़ी जम सकती है.

अभिमन्यु भी एक्शन फिल्म से बौलीवुड डेब्यू करने की तैयारी कर रहे है. अब देखना होगा की, संजय लीला भंसाली सुहाना को अपनी फिल्म से उन्हें इंडस्ट्री में लौन्च करते हैं या नहीं या एक बार फिर करण जौहर ही आगे बढ़कर अपने खास दोस्त की बेटी को ग्लैमर वर्ल्ड में एंट्री करवाते हैं.

इस अदाकारा को डेट कर रहे हैं फरहान अख्तर

बौलीवुड अभिनेता फरहान अख्तर और अधूना भवानी अक्टूबर 2016 में अलग हो गए. 2017 में दोनों ने एकदूसरे से तलाक ले लिया. इसके बाद फरहान के अफेयर की अपुष्ट खबरें लगातार आती रहीं. इस बीच फरहान का नाम श्रद्धा कपूर से भी जोड़ा गया, अब एक बार फिर फरहान अख्तर का नाम नई अदाकारा के साथ चर्चा में है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फरहान पहले श्रद्धा कपूर को डेट कर रहे थें. लेकिन दोनों के बीच रिलेशन लंबा चल नहीं सका. इन दिनों फरहान का नाम सिंगर-एक्ट्रेस शिबानी दांडेकर के साथ जुड़ रहा है. हाल ही में शिबानी भावेश जोशी फिल्म में अर्जुन कपूर के साथ आइटम नंबर में नजर आई थीं.

फरहान और शिबानी साल 2015 से एक-दूसरे को जानते हैं. लेकिन पिछले दिनों दोनों को साथ टाइम स्पेंड करते देखा गया. बता दें कि शिबानी दांडेकर मशहूर वीजे, एंकर अनुषा दांडेकर की बहन है.

पिछले दिनों फरहान की एक्स वाइफ अधूना के अफेयर की भी चर्चा थी. अधूना ने एक पिक्चर इंस्टाग्राम पर शेयर की है, जिसमें वे डिनो मोरिया के भाई निकोल मोरिया के साथ नजर आ रही हैं.

बात करें श्रद्धा कपूर की तो फरहान से अलग होने के बाद अभिनेत्री की मशहूर फोटोग्राफर संग अफेयर की चर्चा है. फिलहाल श्रद्धा अपनी आने वाली फिल्म ‘स्त्री’ के प्रमोशन में व्यस्त हैं. वहीं फरहान अपनी जल्द रिलीज होने वाली फिल्म ‘द स्काई इज पिंक’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा और जायरा वसीम अहम किरदार में नजर आने वाली हैं. शोनाली बोस इस फिल्म की डायरेक्टर हैं.

विश्वरूप 2 : इस फिल्म से दूरी ही भली

कमल हासन 2013 की अपनी सर्वाधिक विवादास्पद फिल्म ‘‘विश्वरूप’’ का सिक्वअल ‘‘विश्वरूप 2’’ लेकर आए हैं, जो कि आतंकवाद की समस्या पर उलझी हुई फिल्म है.

फिल्म ‘‘विश्वरूप 2’’ की कहानी वहीं से शुरु होती है, जहां ‘विश्वरूप’ की कहानी खत्म हुई थी. कहानी के केंद्र में रॉ एजेंट विशाम अहमद कश्मीरी (कमल हासन) व उनकी पत्नी डा. निरूपमा (पूजा कुमार) और उनकी सहयोगी अस्मिता (एंड्यिा जेरेमिया) हैं. विशाम जब अलकायदा  के मिशन से बाहर निकलता है, तो उसे पता चलता है कि आतंकवाद का जनक उमर कुरेशी (राहुल बोस) अब आतंकवाद को फैलाने के लिए भारत पहुंच चुका है.

इस बार विशाम का मकसद उमर कुरेशी का खात्मा करना है. कहानी आगे बढ़ती है तो विशाम की मुलाकात कई किरदारों से होती हैं. उन्हे भारत सरकार में कार्यरत राजेश मेहता (अनंत महादेवन) पर शक होता है और उनका शक सही निकलता है. आखिरकार कर्नल जगन्नाथ (शेखर कपूर) के हाथों राजेश मेहता मारे जाते हैं. पर राजेशमेहता ने उमर कुरेशी के साथ मिलकर जो चक्रव्यूह रचा था, उसी के चलते विशाम की मुलाकात सलीम (जयदीप अहलावत) से होती है.

फिर अचानक अल्माइजर की बीमारी की शिकार और वृद्धाश्रम में रह रही विशाम की मां (वहीदा रहमान) भी आ जाती हैं. खैर, कहानी कई उतार चढ़ाव व मोड़ के साथ आगे बढ़ती है. अंततः विशाम को उमर कुरेशी के आतंकवाद का सफाया करने में सफलता मिलती है. अंत में अस्पताल में मरणासन्न पड़े उमर कुरेशी के सामने विशाम उमर की पत्नी व दोनो बेटों को खड़ा करता है, जिन्हे अलकायदा मिशन के समय विशाम ने बचाकर सुरक्षित जगह पहुंचवाया था.

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कमजोर पटकथा और कहानी के बार बार अतीत व वर्तमान में आते जाते रहने के चलते फिल्म दर्शकों को दुविधा में डालती रहती है. बार बार कहानी अतीत में जाती रहती है और दर्शक उन कड़ियों को जोड़ने के प्रयास में सिरदर्द करा बैठता है. पूरे डेढ़ घंटे तक एक्शन व कई तरह के दूसरे फ्लैशबैक दृश्यों के बाद जब इंटरवल होता है तो दर्शक सोच में पड़ जाता है कि कमल हासन कहना या बताना क्या चाहते हैं.

इंटरवल के बाद कहानी इतनी तेजी से मोड़ लेती है कि सब कुछ बड़ा अजीबोगरीब सा हो जाता है. पटकथा के स्तर पर इतनी कमियां हैं कि फिल्म का विलेन भी ठीक से स्थापित नहीं हो पाता. फिल्म का मुख्य नायक रॉ का एजेंट है, मगर फिल्म में जासूसी का रंग भी नजर नहीं आता.

फिल्म के लेखक, निर्माता, निर्देशक व अभिनेता कमल हासन हैं, इसलिए उन्होंने सिर्फ अपने किरदार पर ही ध्यान दिया है. उनके अलावा कोई किरदार ठीक से विकसित नहीं हुआ.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो कोई भी कलाकार प्रभावित नही करता. फिल्म में एक्शन के सीन अच्छे बन पड़े हैं. लोकेशन ठीक ठाक है. कैमरामैन सनु वर्गीस ने बधाई वाला काम किया है. अन्यथा फिल्म कहीं से भी अपनी तरफ नहीं खिंचती है.

दो घंटे 25 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘विश्वरूप 2’’ का निर्माण कमल हासन व उनके भाई चंद्र हास हासन ने किया है. लेखक व निर्देशक कमल हासन, कैमरामैन सनु वर्गीस, संगीतकार घिबरन तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – कमल हासन, पूजा कुमार, राहुल बोस, शेखर कपूर, राजेंद्र गुप्ता, जयदीप अहलावत,अनंत महादेवन, वहीदा रहमान, एंड्यिा जेरेमिया व अन्य.

नोटिस का जवाब खून से

67   वर्षीय राजेंद्र व्यास मुंबई की ग्रांट रोड के एम.एस. अली मार्ग स्थित भारतनगर परिसर की सोसायटी में अपने परिवार के साथ रहते थे. वह मुंबई की एक मिल में नौकरी करते थे लेकिन मिल बंद हो जाने के कारण उन का झुकाव शेयर बाजार की तरफ हो गया था.

परिवार सुखी और संपन्न था. सोसायटी के लोगों में उन की इज्जत, मानसम्मान और प्रतिष्ठा थी. परिवार में उन की पत्नी सुरेखा व्यास के अलावा 2 बेटियां कीर्ति और शेफाली थीं. उन का कोई बेटा नहीं था, लेकिन उन्हें इस का कोई गम नहीं था. वह अपनी दोनों बेटियों को बेटों जैसा ही प्यार, दुलार करते थे. उन्होंने उन का पालनपोषण भी बेटों की तरह ही किया था.

राजेंद्र व्यास ने दोनों बेटियों को बेटों की तरह शिक्षित कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा किया था. बड़ी बेटी कीर्ति व्यास एमबीए, एलएलबी करने के बाद एक अच्छी पोस्ट पर काम कर रही थी. छोटी बेटी शेफाली भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती थी. सुरेखा गृहिणी के साथसाथ एक अच्छी मां थीं. उन्हें दोनों बेटियों से गहरा प्यार था.

परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन इस साल मार्च महीने में उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया था.

16 मार्च, 2018 की रात राजेंद्र व्यास और उन के परिवार पर भारी थी. उस दिन उन की बेटी कीर्ति सुबह पौने 9 बजे घर से औफिस जाने के लिए निकली थी और देर रात तक वापस नहीं लौटी. सुबह औफिस जाते समय वह किसी बात को ले कर थोड़ा परेशान जरूर थी, लेकिन उस ने परेशानी की वजह किसी से शेयर नहीं की थी. मां सुरेखा के पूछने पर उस ने मुसकरा कर बात टाल दी थी. मां ने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था.

इंतजार की काली रात

दोपहर 12 बजे सुरेखा ने घर पर लगे वाईफाई का पासवर्ड जानने के लिए कीर्ति को फोन किया. लेकिन कीर्ति ने फोन रिसीव नहीं किया. उस का फोन कभी स्विच्ड औफ तो कभी आउट औफ कवरेज आ रहा था.

कई बार फोन करने के बाद भी जब कीर्ति का फोन नहीं लगा तो उन्होंने यह सोचा कि हो सकता है उस ने अपना फोन बंद कर रखा हो. क्योंकि कीर्ति कंपनी में एक बड़ी पोस्ट पर थी.

ऊपर से मार्च का महीना कंपनी की सालाना क्लोजिंग का होता है. वह किसी मीटिंग वगैरह में भी व्यस्त हो सकती थी. उन्होंने सोचा कि यदि वह मीटिंग में होगी तो मीटिंग के बाद खुद ही फोन कर लेगी. पर पूरा दिन बीत गया, न तो कीर्ति का फोन आया और न ही उस ने कोई मैसेज भेजा.

कीर्ति का पूरा परिवार तब परेशान हो गया, जब शेफाली अपने औफिस से घर लौट आई, जबकि कीर्ति का कहीं पता नहीं था. दोनों का औफिस आनेजाने का समय लगभग एक ही था. कीर्ति अपने समय की पाबंद थी.

इसके अलावा वह औफिस से 1-2 बार घर में फोन कर के घर वालों का हालचाल जरूर पूछ लिया करती थी. इस के अलावा अगर उसे देर से आना होता तो इस की जानकारी वह घर वालों को दे दिया करती थी.

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लापता हुई कीर्ति

जैसेजैसे समय और रात गहरी होती जा रही थी, वैसेवैसे परिवार वालों का दिल बैठता जा रहा था. काफी समय निकल जाने के बाद भी जब कीर्ति घर नहीं पहुंची और न ही उस का कोई फोन आया तो घर वालों ने कीर्ति की कंपनी में फोन कर के उस के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि कीर्ति तो आज औफिस आई ही नहीं थी.

यह सुन कर घर में कोहराम मच गया. परिवार के अलावा जिसे भी कीर्ति के औफिस न पहुंचने की खबर मिली, सब स्तब्ध रह गए. घर वालों के अलावा जानपहचान वाले भी कीर्ति की तलाश में लग गए. ऐसी कोई जगह नहीं बची, जहां कीर्ति को नहीं खोजा गया. कीर्ति के साथ काम करने वाले लोग भी घर वालों के साथ मिल कर उसे ढूंढ रहे थे.

सभी यह सोच कर परेशान थे कि कीर्ति सुबह पौने 9 बजे अपनी ड्यूटी के लिए निकली थी तो वह अपने औफिस न पहुंच कर कहां चली गई. सभी का मन किसी अनहोनी को ले कर अशांत था. वह रात कीर्ति के घर वालों के लिए बड़ी बेचैनी भरी गुजरी.

सुरेखा और उन की बेटी शेफाली के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. पिता राजेंद्र व्यास की हालत भी ठीक नहीं थी. सोसायटी वाले और उन के नातेरिश्तेदार उन्हें धीरज बंधा कर पुलिस के पास जाने की सलाह दे रहे थे.

28 वर्षीय कीर्ति व्यास ने अपनी पढ़ाई पूरी कर जब सर्विस की कोशिश की तो उस की योग्यता के आधार पर उसे बड़ी आसानी से अंधेरी पश्चिम लोखंडवाला स्थित एक जानीमानी कंपनी बीब्लंट (सैलून) में नौकरी मिल गई.

इस कंपनी की सीईओ और एमडी दोनों मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी और जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर की पूर्वपत्नी अनुधा भवानी अख्तर थीं.

इस कंपनी का फिल्मी सितारों और बड़ेबड़े उद्योगपतियों के बीच एक बड़ा नाम है. यहां हेयर कटिंग और ब्यूटी के लिए आने वालों को 3 हजार से ले कर 10 हजार रुपए तक देने पड़ते हैं. इस कंपनी की दिल्ली, कोलकाता और चेन्नै सहित कई महानगरों में 50 से अधिक शाखाएं हैं, कंपनी का हेडऔफिस मुंबई में है.

यह कंपनी बड़े फिल्मी सितारों, उद्योगपतियों, टीवी कलाकारों आदि की हेयरकटिंग और ब्यूटी ड्रेसिंग का काम तो करती ही है, इस के अलावा टीवी और फिल्मों का फाइनैंस और ऐक्टिंग की कोचिंग क्लासें भी चलाती है.

यहां कोचिंग में आने वालों को 6 महीने की कोचिंग दी जाती है, जिस की फीस 3 लाख से ले कर 8 लाख रुपए के बीच होती है. कंपनी का सालाना टर्नओवर कई करोड़ का होता है.

बीब्लंट की फाइनैंस मैनेजर और लीगल एडवाइजर थी कीर्ति

इस कंपनी में कीर्ति व्यास लगभग 5 साल पहले आई थी. उस ने अपनी मेहनत और जिम्मेदारी से कंपनी के सीईओ और एमडी का दिल कुछ महीनों में ही जीत लिया था. कंपनी में उस की नियुक्ति फाइनैंस मैनेजर के पद पर हुई थी, लेकिन थोड़े ही दिनों में उसे कंपनी का लीगल एडवाइजर भी बना दिया गया था. कीर्ति की मेहनत से कंपनी को काफी लाभ हुआ था और टर्नओवर भी बढ़ गया था.

कंपनी के काम के प्रति वह जिम्मेदार और पाबंद तो थी ही, साथ ही वह वहां के कर्मचारियों के प्रति भी सख्त थी. काम में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही उसे जरा भी पसंद नहीं थी. कंपनी की लीगल एडवाइजर और फाइनैंस मैनेजर होने के नाते वह किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी. कंपनी के भले के लिए वह हर उस शख्स के प्रति सख्त थी जो लापरवाह रहता था. वह यह नहीं देखती थी कि कोई सीनियर है या जूनियर.

कीर्ति व्यास को गायब हुए अब तक 24 घंटे से अधिक हो चुके थे, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली थी. घर वालों के सामने अब सिर्फ पुलिस के पास जाने का रास्ता बचा था. लाचार और मजबूर हो कर कीर्ति के पिता राजेंद्र व्यास अपने नातेरिश्तेदारों और कंपनी के कुछ लोगों के साथ थाना डी.बी. मार्ग पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी से मिल कर उन्हें सारी बातें बताईं. थानाप्रभारी ने उन की बातें सुनने के बाद कीर्ति के अपहरण का मामला दर्ज करवा दिया.

मामला एक हाईप्रोफाइल कंपनी की अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए थानाप्रभारी किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने अपने अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को मामले की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर मामले की जांच तेजी से शुरू कर दी.

पुलिस ने कीर्ति के घर से ले कर औफिस तक सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, कीर्ति के फोन की काल डिटेल्स हासिल कर उस की कंपनी के सभी कर्मचारियों के बयान लिए. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

वह मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, उतना ही वह उलझता जा रहा था. जैसेजैसे समय बढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उन के वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव भी बढ़ता जा रहा था. पुलिस अपने तरीके से मामले की जांच तो कर ही रही थी, लेकिन कीर्ति के घर वाले भी उस की तलाश में गलियों और उपनगरों में कीर्ति के पोस्टर ले कर भटक रहे थे.

वह उपनगरों के अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों की खाक छान रहे थे. कीर्ति के हजारों पोस्टर छपवा कर मुंबई के गलीमोहल्लों के साथ सभी सार्वजनिक जगहों और वाहनों पर चिपकवा दिए गए. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया का भी सहारा लिया गया. लेकिन आशा की कोई किरण नजर नहीं आई.

सूरज हर दिन निकलता था. रात हर रोज होती थी. मगर कीर्ति के घर वालों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था.

घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा

जैसेजैसे कीर्ति व्यास के मामले को ले कर समय निकलता जा रहा था, वैसेवैसे कीर्ति के परिवार वालों का सब्र टूटता जा रहा था. जब एक महीने से अधिक का समय हो गया तो उन का धैर्य टूट गया. स्थानीय पुलिस से उन का भरोसा उठ चुका था. वे अपने परिवार के साथ पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर से मुलाकात कर मामले को क्राइम ब्रांच को सौंपने का निवेदन किया.

पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर इस मामले पर पहले से ही नजर बनाए हुए थे, उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए जौइंट पुलिस कमिश्नर संजय सक्सेना और डीसीपी (क्राइम) दिलीप सावंत को मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. अब तक इस संबंध में फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर पर काफी कुछ कहासुना जा चुका था.

बीब्लंट की मालिक सीईओ अनुधा भवानी अख्तर और बीब्लंट कंपनी को जानने वाले लोगों ने ट्वीट कर के कीर्ति के विषय में जानकारी देने की अपील के साथसाथ पुलिस की जांच पर तमाम प्रश्नचिह्न खड़े किए थे. यह हाईप्रोफाइल केस एक तरह से क्राइम ब्रांच की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था.

क्राइम ब्रांच यूनिट-2 के सीनियर पीआई प्रशांत राजे ने सहायक पीआई अर्जुन जगदाले, एपीआई सचिन माने, संतोष कदम, हैडकांस्टेबल संजीव गुडेवार, हृदयनाथ मिश्रा, प्रशांत सिढमे, प्रमोद शिर्के और राजेश सोनावाले के साथ इस मामले की कडि़यों को जोड़ना शुरू किया.

उन्होंने अपनी जांच की शुरुआत उन्हीं सूत्रों से की, जिन पर स्थानीय पुलिस कर चुकी थी. उन्होंने कीर्ति के घर वालों के बयान और कीर्ति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स का बारीकी से अध्ययन किया तो जांच में कई खामियां नजर आईं.

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कीर्ति के घर वालों के बयान के अनुसार कीर्ति सुबह सवा 9 बजे की विरार लोकल ट्रेन से ग्रांट रोड से अंधेरी जाया करती थी. लेकिन घटना वाले दिन सुबह उसे लेने के लिए उस की इमारत के नीचे ब्राउन कलर की एक फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार आई थी, जिस के कांच पर काले रंग की फिल्म चढ़ी हुई थी. इस से अंदर बैठे लोग दिखाई नहीं दे रहे थे. यह कार कीर्ति की कंपनी की मैनेजर खुशी सेजवानी की थी.

लेकिन उन्होंने जांच टीम को जो बयान दिया था, वह विश्वसनीय नहीं था. उन्होंने कहा था कि वह उस दिन कंपनी के अकाउंटेंट सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ग्रांट रोड अपने एक व्यक्तिगत काम से आई हुई थी.

लौटते समय उन्होंने कीर्ति को यह सोच कर अपने साथ लिया कि वह भी उन के साथ औफिस चली चलेगी. उस के साथ रहने से रास्ते का टाइम भी पास हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

रोड जाम होने के कारण कीर्ति ने यह कह कर उन की कार छोड़ दी कि वह औफिस के लिए लेट हो जाएगी. जबकि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में ऐसा कुछ नहीं था. उस समय रोड साफ था.

जांच में यह भी पता चला कि उस दिन कीर्ति का मोबाइल फोन वरली के भारतनगर में बंद हुआ था. जिस समय उस का फोन बंद हुआ, उसी समय खुशी सेजवानी और सिद्धेश तम्हाणकर के फोन की लोकेशन भी भारतनगर में पाई गई.

पुलिस को इस बात पर शक हो गया कि जब वह ट्रेन से गई थी तो उस का मोबाइल वरली में क्या कर रहा था. और उन दोनों का फोन उस के साथ क्यों था. इन सब सवालों के जवाब के लिए सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी को क्राइम ब्रांच के औफिस बुलाया गया. लेकिन वे पुलिस के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, जिस से पुलिस को उन पर शक हो गया.

खुल गया हत्या का राज

संदेह पुख्ता करने के लिए पुलिस ने खुशी सेजवानी की फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार को कब्जे में ले कर जांच के लिए सांताक्रुज की फोरैंसिक लैब में भेज दिया. परीक्षण में कार की डिक्की के अंदर खून के कुछ धब्बे पाए गए, जिस का डीएनए किया गया तो वह कीर्ति के डीएनए से मैच हो गया.

इस के बाद तो उन दोनों पर शक की कोई गुंजाइश नहीं बची. अब स्थिति साफ हो चुकी थी. पुलिस ने खुशी सेजवानी और सिद्धेश से पूछताछ की तो उन्होंने कीर्ति की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह दिल दहला देने वाली थी—

27 वर्षीय सिद्धेश तम्हाणकर अपने पूरे परिवार के साथ परेल, मुंबई के लालबाग में रहता था. उस के पिता सीताराम तम्हाणकर नौकरी से रिटायर हो चुके थे. पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिद्धेश के ऊपर थी. परिवार वालों का वह एकलौता सहारा था.

वह कंपनी में अपना काम ठीक से नहीं करता था. कंपनी के काम के बजाय उस का मन इधरउधर अधिक रहता था. कंपनी के सारे अकाउंट की जिम्मेदारी उस की थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी के प्रति जरा भी गंभीर नहीं था.

कीर्ति व्यास के काम को देखते हुए बीब्लंट कंपनी ने कीर्ति को जो जिम्मेदारियां दी थीं, वह उन का बड़ी ईमानदारी से पालन करती थी. अपने दूसरे सहयोगियों को भी वह कंपनी के प्रति निष्ठावान बनने की सलाह देती थी. वह खुद तो मेहनत करती ही थी, दूसरे कर्मचारियों से भी मेहनत करवाती थी जिस से कंपनी के कई लोग उस से खुश नहीं थे.

सिद्धेश तम्हाणकर भी उन्हीं में से एक था लेकिन कीर्ति को इस की कोई परवाह नहीं थी. कीर्ति ने 5 सालों में बीब्लंट कंपनी में अपनी एक खास जगह बना ली थी, जबकि कंपनी के अंदर 10-15 सालों से काम कर रहे लोग ऐसी जगह नहीं बना पाए थे. मेहनत की वजह से कीर्ति को कंपनी के कई अधिकार मिल गए थे. कंपनी की सीईओ और एमडी उस से काफी प्रभावित थीं.

कंपनी के सारे लोगों से कीर्ति का व्यवहार मधुर व सरल था. बाहर से आनेजाने वाले लोग भी कीर्ति को भरपूर मानसम्मान देते थे. लेकिन सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि कीर्ति ने जब कंपनी का काम संभाला था, तब से सिद्धेश तम्हाणकर की मनमानी पर रोक लग गई थी.

कीर्ति ने पहले तो सिद्धेश तम्हाणकर की काम के प्रति लापरवाही पर उसे कई बार समझाया, लेकिन सिद्धेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ. उस का रवैया पहले जैसा रहा. वह कंपनी के कामों पर ध्यान नहीं देता था.

जलन बन गई ज्वाला

सरकार ने जब से जीएसटी लगाई तो सिद्धेश की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई. क्योंकि जीएसटी की गणना उस की समझ से परे थी. पहले तो थोड़ीबहुत लापरवाही चल जाती थी, लेकिन जीएसटी में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं थी. काम सही ढंग और समय से पूरा करना ही पड़ता था.

जीएसटी की कम समझ होने के कारण सिद्धेश के अकाउंट में बहुत सारी गलतियां तो होती ही थीं, काम भी समय से नहीं हो पाता था. इस से कंपनी के नुकसान के साथसाथ बदनामी का भी डर था. चेतावनी के बाद भी सिद्धेश ने जब अपने काम में सुधार नहीं किया तो कीर्ति ने उसे कंपनी से निकालने का नोटिस दे दिया.

इस नोटिस से सिद्धेश बौखला गया. नौकरी जाने के बाद उस का और उस के परिवार का क्या होगा, सोच कर वह परेशान रहने लगा. कोई रास्ता न देख उस ने उसी कंपनी में काम करने वाली अपनी दोस्त खुशी सेजवानी से सलाह की.

बाद में वह कंपनी के सीईओ व एमडी अनुधा अख्तर के पास गया. लेकिन बात नहीं बनी. इस पर उस ने अपनी नौकरी जाने के डर से कीर्ति व्यास के प्रति एक खतरनाक निर्णय ले लिया था. उस ने सोचा कि क्यों न कीर्ति को ही खत्म कर दिया जाए. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था कि कीर्ति के न रहने से शायद उस की नौकरी भी रहे. इस काम में उस की मदद करने के लिए खुशी भी तैयार हो गई.

37 वर्षीय खुशी सेजवानी बीब्लंट कंपनी में कोचिंग क्लासेज के मैनेजर के पद पर काम करती थी. कंपनी में जितना महत्त्व कीर्ति का था, उतना ही महत्त्व खुशी का भी था. सेजवानी मुंबई सांताक्रुज पश्चिम के एस.बी. रोड स्थित एक अपार्टमेंट में अपने एकलौते बेटे के साथ रहती थी.

उस के पति एक कामयाब बिजनैसमैन थे. काम के सिलसिले में वह अकसर बाहर ही रहते थे. परिवार संभ्रांत और संपन्न था. घर पर नौकरनौकरानी थे. किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धेश और खुशी की गहरी दोस्ती थी. इतने बड़े अपराध में खुशी सेजवानी ने सिद्धेश का साथ क्यों दिया, पुलिस इस बात की जांच कर रही है.

अपराध की राह पर सिद्धेश और खुशी

16 मार्च, 2018 को सिद्धेश की नौकरी का आखिरी दिन था. इस के पहले कि कीर्ति कंपनी में आ कर सिद्धेश पर काररवाई करती, सिद्धेश और खुशी योजनानुसार अपनी कार ले कर कीर्ति के घर के पास पहुंच गए. फिर खुशी ने कीर्ति को फोन कर के कहा कि वह किसी काम से भारतनगर आई थी. काम खत्म हो जाने के बाद अब औफिस जा रही है. अगर उसे भी औफिस चलना हो तो आ जाए, साथसाथ चले चलेंगे.

कीर्ति औफिस जाने की तैयारी कर ही रही थी. खुशी का फोन आने के बाद उस ने उस के साथ चलने की हामी भर दी और फटाफट तैयार हो कर उस की गाड़ी में पहुंच गई.

गाड़ी खुशी सेजवानी चला रही थी, कीर्ति उस के बराबर में बैठ गई. सिद्धेश पीछे वाली सीट पर बैठा था. कुछ दूर चलने के बाद खुशी सेजवानी ने कीर्ति को मनाने की काफी कोशिश की कि वह सिद्धेश को दिया नोटिस वापस ले ले, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. तब पीछे की सीट पर बैठे सिद्धेश ने कीर्ति के गले में सीट बेल्ट डाल कर हत्या कर दी.

कीर्ति की हत्या करने के बाद खुशी ने कार अपने घर पर ला कर खड़ी कर दी और उस पर कवर डाल कर दोनों औफिस चले गए. मगर कंपनी के काम में उन का मन नहीं लग रहा था. उस दिन खुशी सेजवानी 4 बजे ही अपने औफिस से घर के लिए निकल गई. कार में शव होने के कारण सिद्धेश भी शाम 5 बजे के करीब खुशी के घर पहुंच गया.

मौका देख कर वे कीर्ति की लाश कार से निकाल कर घर के अंदर ले गए. फिर उसे ठिकाने लगाने के मकसद से उन्होंने लाश के 3 टुकड़े किए. फिर उन्हें कार की डिक्की में डाल कर चेंबूर के माहुल इलाके में ले गए. वहां आगे जा कर उन्होंने कीर्ति की लाश के तीनों टुकड़े नाले में डाल दिए. फिर उन्होंने कार की अच्छी तरह धुलाई करा ली.

बाद में कीर्ति के घर वालों के साथ वे दोनों भी उस की तलाश करने का नाटक करने लगे.

सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 5 मई, 2018 को उन की निशानदेही पर कीर्ति का बैग, मोबाइल फोन, कुछ नकदी भी बरामद कर ली. फिर उन दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 341, 363, 364 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस कीर्ति के शव के टुकड़ों को काफी कोशिशों के बाद भी बरामद नहीं कर पाई थी. माना जा रहा है कि वे टुकड़े नाले में बह कर कहीं आगे निकल गए होंगे. फिर भी पुलिस की कोशिश जारी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेटी ने दी बाप के कत्ल की सुपारी

अप्रैल के महीने में यूं तो इतनी गरमी नहीं पड़ती, लेकिन 2018 का अप्रैल महीना इस बार शुरू से ही कुछ ज्यादा गरमाने लगा था. इसीलिए जल्दी बंद होने वाले बाजार भी देर तक खुलने लगे थे. दिल्ली से मात्र 60 किलोमीटर दूर बसे उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक मोहल्ला है दयानंद नगर, जो शहर के सब से बड़े नाले के किनारे तंग गलियों वाला मोहल्ला है. इसी मोहल्ले में राकेश रूहेला अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कृष्णा के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था.

राकेश दिल्ली के शाहदरा के भोलानाथ नगर स्थित बाबूराम टैक्नीकल इंस्टीट्यूट में लैब टेक्नीशियन की नौकरी करते थे. वह सुबह 7 बजे अपने घर से निकल कर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन तक पैदल जाते थे. वहां से दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हो कर वह शाहदरा रेलवे स्टेशन पर उतरते और अपने इंस्टीट्यूट पहुंचते थे. शाम को भी वह इसी तरह ड्यूटी पूरी कर घर पहुंचते थे. ये उन का लगभग रोज का रूटीन था.

7 अप्रैल, 2018 की रात भी राकेश रूहेला रोजमर्रा की तरह करीब साढ़े 9 बजे दिल्ली से अपनी ड्यूटी खत्म कर के ट्रेन से शामली पहुंचे और वहां से नाला पट्टी रोड से पैदल घर की तरफ जा रहे थे.

रात करीब पौने 10 बजे वह अपने घर की गली के मोड़ के करीब पहुंचे ही थे कि उन के पास अचानक 2 युवक तेजी से आए, उन में से एक ने उन के पास जा कर गोली चला दी.

फायर की आवाज सुन कर आसपास खुली इक्कादुक्का दुकानों पर खड़े लोगों ने जब तक पलट कर देखा तब तक राकेश लहरा कर जमीन पर गिर चुके थे और उन्हें गोली मारने वाले दोनों युवक तेजी से विपरीत दिशा की तरफ भाग रहे थे.

लोगों ने देखते ही पहचान लिया कि गोली लगने के बाद जमीन पर खून से लथपथ पड़ा व्यक्ति राकेश रूहेला है. गली के नुक्कड़ पर ही किराने की दुकान चलाने वाला शैलेंद्र कुछ लोगों की मदद से जख्मी राकेश को एक टैंपो में लाद कर जिला अस्पताल ले गया. कुछ लोगों ने तब तक राकेश के घर जा कर इस बात की सूचना दे दी कि किसी ने राकेश पर गोली चलाई है.

मौत पर पत्नी और बेटी का नाटक

इस के बाद उन के घर में कोहराम मच गया. राकेश की पत्नी कृष्णा और बेटा तत्काल आसपड़ोस के लोगों को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. कृष्णा ने 3 नंबर गली में रहने वाले अपने देवर मुकेश को फोन कर के सारी बात बताई और जल्दी से सरकारी अस्पताल पहुंचने के लिए कहा. सरकारी अस्पताल पहुंचने के बाद घर वालों को डाक्टरों ने बताया कि राकेश की रास्ते में ही मौत हो चुकी थी.

पति की मौत की खबर सुनते ही कृष्णा का विलाप शुरू हो गया. मुकेश कुछ लोगों को साथ ले कर शामली कोतवाली पहुंचा, उस वक्त तक रात के करीब 11 बज चुके थे. थाने में मौजूद एसएसआई रफी परवेज को उस ने भाई की हत्या की जानकारी दी.

उस वक्त थानाप्रभारी अवनीश गौतम क्षेत्र की गश्त पर निकले हुए थे. जैसे ही थानाप्रभारी को इस घटना की खबर मिली तो उन्होंने एसएसआई को शिकायत की तहरीर ले कर मुकदमा दर्ज कराने और पुलिस दल के साथ सरकारी अस्पताल पहुंचने के निर्देश दिए.

राकेश का शव अस्पताल में ही रखा हुआ था. एसएसआई रफी परवेज ने मुकेश से ली गई तहरीर के आधार पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

इस के बाद वह एसआई सत्यनारायण दहिया, महिला एसआई नीमा गौतम, कांस्टेबल प्रताप व अन्य स्टाफ को साथ ले कर सरकारी अस्पताल पहुंच गए. तब तक थानाप्रभारी अवनीश गौतम भी वहां पहुंच गए.

घटना की सूचना उच्चाधिकारियों को भी दे दी गई थी. इसलिए सूचना मिलने के बाद सीओ (सिटी) अशोक कुमार सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस के सभी अधिकारियों ने मृतक के परिवार वालों के अलावा राकेश को अस्पताल लाने वाले शैलेंद्र से राकेश पर हमला करने वालों और घटनाक्रम के बारे में पूछताछ की. लेकिन न तो किसी ने ये बताया कि वे हमलावरों को पहचानते हैं, न ही परिजनों ने किसी पर हत्या का शक जताया.

हां, इतना जरूर पता चला कि मृतक अपने औफिस के लोगों और जानपहचान वालों के साथ मिल कर महीने की कमेटी डालने का काम करता था. अकसर उस के पास कमेटी की रकम होती थी.

परिजनों ने आशंका जताई कि कहीं राकेश को किसी ने लूटपाट के उद्देश्य से तो गोली नहीं मार दी. मगर घटनास्थल पर बतौर चश्मदीद शैलेंद्र व अन्य लोगों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि गोली चलने के तुरंत बाद हमलावर तेजी से भाग गए थे. उन्होंने राकेश से किसी तरह की छीनाझपटी होते नहीं देखी.

पुलिस को भी चश्मदीदों की बात में सच्चाई दिखी, क्योंकि राकेश की जेब में रुपयों से भरा पर्स, अंगुली में सोने की अंगूठी, कलाई में घड़ी और हाथ में लिया बैग एकदम सहीसलामत थे. रात बहुत अधिक हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

अगले दिन सीओ (सिटी) और थानाप्रभारी ने जांच अधिकारी रफी परवेज के साथ बैठ कर जब पूरे घटनाक्रम पर विचार करना शुरू किया तो उन्हें लगा कि मामला उतना सीधा नहीं है, जितना दिखाई पड़ रहा है.

क्योंकि अगर बदमाशों को लूटपाट या छीनाझपटी करने के लिए राकेश को गोली मारनी होती तो वे किसी सुनसान जगह को चुनते न कि उस के घर के पास ऐसी जगह को, जहां लोगों की काफी आवाजाही थी.

पुलिस को बेलने पड़े पापड़

पुलिस को लगा कि या तो हत्या किसी रंजिश के कारण की गई है या फिर किसी ऐसे कारण से जो फिलहाल पुलिस की नजरों से छिपा है. थानाप्रभारी एक बार फिर राकेश रूहेला के घर पहुंचे. उन्होंने राकेश की पत्नी, उन की दोनों बेटियों, बेटे और भाई मुकेश से पूछताछ की.

किसी ने भी राकेश की हत्या के लिए न तो किसी पर शक जाहिर किया और न ही किसी से रंजिश की बात बताई. सीओ (सिटी) अशोक कुमार सिंह ने क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार को भी बुला कर अपराध की इस गुत्थी को सुलझाने के काम पर लगा दिया.

राकेश की हत्या के अगले दिन पुलिस का सारा वक्त घर वालों और जानपहचान वालों से पूछताछ में लग गया. दोपहर बाद पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद राकेश का शव घर वालों को सौंप दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि राकेश की मौत सिर में गोली लगने से हुई थी और गोली करीब डेढ़ फुट की दूरी से मारी गई थी, जिस का मतलब था कि हत्यारे राकेश की हत्या करना चाहते थे.

अगले दिन राकेश की हत्या की जांच का काम तेजी से शुरू हो गया. कातिल तक पहुंचने के लिए पुलिस के पास बस अब एक ही रास्ता था कि वह इलाके में लगे सीसीटीवी की फुटेज का सहारा ले कर पता लगाए कि राकेश को गोली मारने वाले कौन लोग थे.

हांलाकि इस दौरान क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार ने अपनी टीम के साथ इलाके में सक्रिय लूटपाट गिरोह से जुड़े कई बदमाशों को हिरासत में ले कर पूछताछ कर ली थी. सत्यता की जांच के लिए तमाम बदमाशों के मोबाइल नंबरों की लोकेशन भी देखी गई, मगर इस वारदात में किसी के भी शामिल होने की पुष्टि नहीं हो सकी.

सीसीटीवी से खुलना शुरू हुआ राज

इधर थानाप्रभारी अवनीश गौतम ने स्टेशन से घटनास्थल तक लगे 6 सीसीटीवी कैमरों की जांच की, तो पता चला कि उन में से एक खराब था. कुल बचे 5 सीसीटीवी कैमरे बाकायदा काम कर रहे थे. पुलिस को पूरी उम्मीद थी कि अगर हत्यारे काफी दूर से राकेश रूहेला का पीछा कर रहे थे तो कहीं न कहीं वे सीसीटीवी फुटेज में जरूर कैद हुए होंगे.

थाना पुलिस ने क्राइम ब्रांच की मदद से इन सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखनी शुरू कर दीं. इसी बीच 12 अप्रैल को कोतवाली प्रभारी अवनीश गौतम का तबादला हो गया. उन की जगह जितेंद्र सिंह कालरा आए.

जितेंद्र सिंह कालरा को यूपी पुलिस में सुपरकौप के नाम से जाना जाता है. कार्यभार संभालते ही नए थानाप्रभारी का सामना सब से पहले राकेश रूहेला के पेचीदा केस से हुआ. उन्होंने इस मामले में अब तक की गई जांच पर नजर डाली.

राकेश हत्याकांड के हर पहलू को बारीकी से समझने के बाद कालरा को लगा कि जांच आगे बढ़ने से पहले उन्हें उन सीसीटीवी फुटेज को जरूर देखना चाहिए.

कालरा ने क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर धर्मेंद्र पंवार और उन की टीम के साथ बैठ कर फुटेज देखने का काम शुरू किया. 5 घंटे तक फोरैंसिक एक्सपर्ट के साथ सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद आखिर पुलिस को एक बड़ी कामयाबी मिली.

पता चला कि जिस जगह राकेश रूहेला को गोली मारी गई थी, उस से 50 कदम की दूरी पर एक इलैक्ट्रौनिक शौप से राकेश ने कुछ सामान खरीदा था. उसी समय 2 युवक राकेश का पीछा करते हुए दिखे. इन में से एक के हाथ में तमंचे जैसा हथियार दिखाई दे रहा था.

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हालांकि उन के चेहरे पूरी तरह तो नहीं दिख रहे थे, लेकिन आकृति देख कर ऐसा कोई भी व्यक्ति जिस ने उन लोगों को पहले कभी देखा हो, पहचान कर बता सकता था कि वे कौन हैं. सब से पहले थानाप्रभारी ने उस रात घटनास्थल के चश्मदीदों, इस के बाद मुकेश को थाने बुला कर उन से फुटेज देख कर कातिल की पहचान करने को कहा.

राकेश रूहेला की पत्नी कृष्णा व दोनों बेटियों तथा कृष्णा के देवर मुकेश ने सीसीटीवी में दिखे उन 2 लोगों को पहचानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन पुलिस को 2 ऐसे व्यक्ति मिल गए, जिन्होंने जांच को एक नई दिशा दे दी.

जिस किराने की दुकान के सामने राकेश को गोली मारी गई थी, उस समय उस दुकान के पास शैलेंद्र सिंह और राकेश का बेटा विशाल खड़े थे, उन्होंने सीसीटीवी में दिख रहे संदिग्धों की पहचान कर ली. शैलेंद्र ने फुटेज में दिख रहे दोनों युवकों की पहचान कर बताया कि राकेश को गोली मार कर जो युवक भागे थे, उन की आकृति बिलकुल सीसीटीवी फुटेज में दिखाई पड़ रहे युवकों जैसी ही थी.

संदेह गहराता गया, दायरा छोटा होता गया

शैलेंद्र ने बताया कि इन में से एक युवक को उस ने कई बार उसी गली में आतेजाते देखा था, जहां राकेश का घर था. कालरा ने गली के नुक्कड़ पर खड़े रहने वाले कुछ दूसरे लोगों से कुरेद कर पूछा तो उन्होंने भी दबी जुबान से बताया कि उन्होंने उस युवक को कई बार दिन में राकेश के घर आतेजाते देखा था.

इस के बाद थानाप्रभारी कालरा ने मृतक के परिजनों को भी सीसीटीवी फुटेज दिखाई. परिवार के सभी सदस्यों में से सिर्फ राकेश के 20 वर्षीय बेटे विशाल ने बताया कि सीसीटीवी में दिख रहे युवक का नाम समीर है, जो उस की बहन वैष्णवी उर्फ काव्या का पूर्व सहपाठी है और अकसर काव्या से मिलने के लिए भी आता था.

यह बात चौंकाने वाली थी. क्योंकि जब सीसीटीवी में दिख रहे युवक को राकेश की पत्नी व बेटियां जानतीपहचानती थीं तो उन्होंने उसे पहचानने से इनकार क्यों किया.

थानाप्रभारी कालरा को साफ लगने लगा कि दाल में कुछ काला है. क्योंकि जबजब उन्होंने कृष्णा और उस की दोनों बेटियों से पूछताछ की, तबतब वो रोनेबिलखने के साथ पूछताछ के मकसद को भटका देती थीं.

कालरा ने मृतक की पत्नी कृष्णा और उस के बच्चों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि कृष्णा की छोटी बेटी काव्या और समीर के बीच घटना के 2 दिन पहले से दिन और रात में कई बार बातचीत हुई थी. इतना ही नहीं जिस वक्त वारदात को अंजाम दिया गया, उस के कुछ देर बाद भी 3-4 बार दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई थी. समीर के मोबाइल नंबर की लोकेशन भी घटनास्थल के पास की मिली.

अब पूरी तरह साफ हो चुका था कि राकेश रूहेला की हत्या में कहीं न कहीं समीर शामिल है. पुलिस को यह भी पता चल गया कि समीर मोहल्ला हाजीपुरा नाला पटरी में रहने वाले डा. जरीफ का बेटा है.

समीर आया पुलिस की पकड़ में

थानाप्रभारी कालरा के पास अब समीर को पूछताछ के लिए हिरासत में लेने के लिए तमाम सबूत थे. उन्होंने टीम के सदस्यों को उस का सुराग लगाने को कहा. आखिर एक कांस्टेबल की सूचना पर उन्होंने 17 अप्रैल को नाला पटरी के पास खेड़ी करमू के रेस्तरां से उसे हिरासत में ले लिया. उस समय उस के साथ मृतक राकेश की बेटी काव्या के अलावा समीर का चचेरा भाई शादाब भी था.

थानाप्रभारी ने समीर को थाने ले जा कर पूछताछ की तो उसे टूटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. समीर ने कबूल कर लिया कि राकेश रूहेला की हत्या उस ने ही अपने चचेरे भाई शादाब के साथ मिल कर की थी और हत्या करने के लिए काव्या ने ही उसे मजबूर किया था. समीर से पूछताछ के बाद हत्या की जो हैरतअंगेज कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी.

काव्या की समीर के साथ पिछले 3 सालों से दोस्ती थी. वे दोनों हाईस्कूल में साथ पढ़ते थे. इंटरमीडिएट तक पढ़ाई के बाद काव्या कैराना स्थित एक कालेज से बीएससी करने लगी, जबकि समीर को उस के घर वालों ने एमबीबीएस की कोचिंग करने के लिए राजस्थान के कोटा में अपने एक रिश्तेदार के पास भेज दिया.

दरअसल, समीर के पिता जरीफ बीएएमएस डाक्टर थे और शामली में अपना क्लीनिक चलाते थे. उन की चाहत थी कि समीर बड़ा हो कर डाक्टर बने. इसीलिए उन्होंने डाक्टरी की कोचिंग के लिए उसे कोटा भेज दिया था. उन के रिश्तेदार का बेटा भी समीर के साथ ही एमबीबीएस की तैयारी कर रहा था.

काव्या से शुरू हुई समीर की दोस्ती गुजरते वक्त के साथ प्यार में बदल गई थी. काव्या के प्रति समीर की चाहत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि एक दिन उस ने अपने हाथ पर उस का नाम भी गुदवा लिया. काव्या को यह तो पता था कि समीर उस पर मरता है लेकिन उसे ये नहीं मालूम था कि उस की दीवानगी में वह उस का नाम अपने हाथ पर भी गुदवा लेगा.

इधर इंटरमीडिएट के बाद दोनों चोरीछिपे पढ़ाई के बहाने कभी घर में तो कभी घर के बाहर मिलतेजुलते थे. धीरेधीरे यह बात राकेश के कानों तक जा पहुंची. राकेश की पत्नी कृष्णा के संबध भी अपने पति से ठीक नहीं थे.

दरअसल, तेजतर्रार और चंचल स्वभाव वाली कृष्णा के चरित्र पर राकेश को पहले से ही शक था. राकेश को भनक थी कि कृष्णा उस के ड्यूटी जाने के बाद घर से बाहर अपने चाहने वालों से मिलती रहती है. राकेश को तो इस बात का भी शक था कि कृष्णा के चाहने वाले उस से मिलने के लिए घर में भी आते हैं.

यही कारण था कि अकसर राकेश और कृष्णा के बीच झगड़ा होता रहता था. अपनी इसी झल्लाहट में राकेश कृष्णा पर अकसर हाथ भी छोड़ देता था. जब राकेश शराब पी लेता तो वह कृष्णा को न सिर्फ गालियां देता, बल्कि मारपीट करने के दौरान यहां तक तंज कस देता कि उसे शक है कि उस की तीनों औलाद असल में उस की हैं या किसी और की.

पिता का विरोध करने के लिए जब उस की दोनों बेटियां वैशाली और वैष्णवी उर्फ काव्या कोशिश करतीं तो उन्हें भी राकेश की मार का शिकार होना पड़ता.

इस दौरान जब एक दिन राकेश को पता चला कि काव्या का चक्कर समीर नाम के एक मुसलिम युवक से चल रहा है तो उन का गुस्सा और बढ़ गया. उस ने पत्नी के साथ अब दोनों बेटियों पर भी लगाम कसनी शुरू कर दी. हालांकि समीर एमबीबीएस की तैयारी करने के लिए कोटा जरूर चला गया था, लेकिन वह हर हफ्ते चोरीछिपे अपने परिवार को बताए बिना शामली आता और काव्या से मिल कर चला जाता था.

काव्या और समीर की दोस्ती और परवान चढ़ रहे प्यार की कहानी की खबर काव्या की मां कृष्णा और उस की बड़ी बहन वैशाली को थी. इस की जानकारी राकेश को जब मोहल्ले के कुछ लोगों से मिली तो उस ने काव्या के साथ सख्ती से पेश आना शुरू कर दिया.

राकेश थक गया था लोगों के ताने सुन कर

शक की आग में जल रहे राकेश के गुस्से में एक दिन उस समय घी पड़ गया, जब वह अपनी ड्यूटी से घर लौट रहा था. मोहल्ले के ही एक व्यक्ति ने उसे रोक कर कहा, ‘‘राकेश भाई, आंखों पर ऐसी कौन से पट्टी बांध रखी है आप ने, जो दूसरे मजहब का एक लड़का सरेआम आप की बेटी को ले कर घूमता है. आप के घर आताजाता है. लेकिन न तो आप उसे रोक रहे हैं और न ही आप की धर्मपत्नी. अरे भाई अगर कोई डर या कोई दूसरी वजह है तो हमें बताओ, हम रोक देंगे उस लड़के को.’’

उस दिन कालोनी के व्यक्ति का ताना सुन कर राकेश के तनबदन में आग लग गई. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. इस से पहले भी अलगअलग लोगों ने दबी जुबान में इस बात की शिकायत की थी, लेकिन अब काव्या की शिकायतें खुल कर होने लगीं. खुद राकेश ने भी एकदो बार समीर को अपने घर आते देखा था.

राकेश ने पहले समीर को समझा कर कह दिया कि वह उस के घर न आया करे, क्योंकि काव्या से उस का मिलनाजुलना उन्हें पसंद नहीं है. बाद में जब समझाने पर भी समीर नहीं माना तो उस ने समीर को एक बार 2-3 थप्पड़ भी जड़ दिए. साथ ही धमकी भी दी कि अगर फिर कभी काव्या से मिलने की कोशिश की तो वह उसे पुलिस को सौंप देंगे.

इस के बाद से समीर ने काव्या से मिलने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी. अब या तो वह काव्या से सिर्फ उस के घर पर ही मिलता था या फिर दोनों शहर से बाहर कहीं दूर जा कर मिलते थे.

राकेश के ड्यूटी पर निकल जाने के बाद घर में क्याक्या होता, यह खबर रखने के लिए राकेश ने अपने घर में सीसीटीवी कैमरे लगवा लिए. इन सीसीटीवी कैमरों का मौनीटर उस ने अपने मोबाइल फोन में इंस्टाल करवा लिया. इसी सीसीटीवी के जरिए वह राज खुल गया, जिस का राकेश को शक था. उस ने मौनीटर पर खुद देखा कि किस तरह उस की गैरमौजूदगी में उस की पत्नी और बेटी से मिलने के लिए उन के आशिक उसी के घर में आते हैं.

पहले पत्नी उतरी विरोध पर

पत्नी और बेटी के चरित्र के इस खुलासे के बाद राकेश का मन बेटियों और पत्नी के प्रति खट्टा हो गया. राकेश के लिए पत्नी और बेटियों के साथ मारपीट करना अब आए दिए की बात हो गई.

रोजरोज की मारपीट और बंधनों से परेशान कृष्णा ने एक दिन अपनी दोनों बेटियों के सामने खीझते हुए बस यूं ही कह दिया कि जिंदा रहने से तो अच्छा है कि ये इंसान मर जाए, पता नहीं वो कौन सा दिन होगा जब हमें इस आदमी से छुटकारा मिलेगा.

बस उसी दिन काव्या के दिलोदिमाग में ये बात बैठ गई कि जब तक उस का पिता जिंदा है, वह और उस की मांबहनें आजादी की सांस नहीं ले सकतीं, न ही अपनी मरजी से जिंदगी जी सकती हैं.

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काव्या के दिमाग में उसी दिन से उधेड़बुन चलने लगी कि आखिर ऐसा क्या किया जाए कि उस का पिता उन के रास्ते से हट जाए. अचानक उस की सोच समीर पर आ कर ठहर गई. उसे लगने लगा कि समीर उस से जिस कदर प्यार करता है, बस एक वही है, जो उस की खातिर ये काम कर सकता है.

लेकिन इस के लिए जरूरी था कि समीर को भावनात्मक रूप से और लालच दे कर इस काम के लिए तैयार किया जाए. इस बात का जिक्र काव्या ने अपनी मां से किया तो उस ने भी हामी भर दी. बस फिर क्या था काव्या मौके का इंतजार करने लगी.

एक दिन मौका मिल गया. समीर ने रोजरोज चोरीछिपे मिलने से परेशान हो कर काव्या से कहा कि वह इस तरह मिलनेजुलने से परेशान हो चुका है, क्यों न वे दोनों भाग जाएं और शादी कर लें.

पिता को बताया जल्लाद

काव्या ने कहा कि वह उस से भाग कर नहीं बल्कि पूरे जमाने के सामने ही शादी करेगी लेकिन इस के लिए एक समस्या है. काव्या ने समीर से कहा कि उस के पिता उन के प्रेम में बाधा बने हैं. उन के जीते जी कभी वे दोनों एक नहीं हो सकते. उन के मेलजोल के कारण ही पिता आए दिन पूरे परिवार के साथ मारपीट करते है.

यदि वह उन्हें रास्ते से हटा दे तो वह उस के साथ शादी कर लेगी. काव्या ने समीर को ये भी लालच दिया कि सहारनपुर में उन का एक 100 वर्गगज का प्लौट है. अगर वो उस के पिता की हत्या कर देगा तो वह प्लौट वह उस के नाम कर देगी.

‘‘काव्या, ये तुम कैसी बात कर रही हो. ठीक है वो तुम लोगों के साथ सख्ती करते हैं, लेकिन इस का मतलब ये तो नहीं कि तुम उन की हत्या करने की बात सोचो.’’ समीर बोला.

‘‘समीर, तुम मेरी बात समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे हो. तुम्हें पता नहीं मेरा बाप इंसान नहीं है जानवर है, जानवर. वो सिर्फ मुझे ही नहीं मेरी बहन और मां को भी छोटीछोटी बात पर पीटता है.’’

काव्या ने समीर के सामने अपने पिता को ऐसे जल्लाद इंसान के रूप में पेश किया कि समीर को यकीन हो गया कि राकेश की हत्या के बाद ही काव्या और उस के घर वालों को चैन की सांस मिल सकेगी. लिहाजा उस ने काव्या से वादा किया कि वह किसी भी तरह उस के पिता की हत्या कर के रहेगा.

काव्या ने एक और बात कही, जिस से समीर का मनोबल और बढ़ गया. उस ने समीर को बताया कि उस के पिता कमेटी डालने का धंधा भी करते हैं, जिस की वजह से रोज उन के पास हजारों रुपए रहते हैं. काव्या ने उसे समझाया कि जब तुम उन्हें गोली मारो तो उन का बैग छीन कर भाग जाना, इस से लगेगा कि उन की हत्या लूट के लिए हुई है. और हां, बैग में जो भी रकम हो वो तुम्हारी.

इस के बाद समीर के सामने समस्या यह थी कि वह राकेश की हत्या करने के लिए हथियार कहां से लाए. लिहाजा उस ने काव्या से सवाल किया, ‘‘यार, तुम्हारे बाप को तो मैं मार दूंगा लेकिन समस्या ये है कि मेरे पास कोई पिस्तौल वगैरह तो है नहीं फिर मारूंगा कैसे?’’

‘‘तुम उस की फिक्र मत करो. कैराना में हुए दंगों के वक्त पापा ने अपनी हिफाजत के लिए एक तमंचा खरीदा था, साथ में कुछ कारतूस भी हैं. मैं 1-2 दिन में तुम्हें ला कर दे दूंगी. उसी से गोली मार देना उन को.’’

समीर न तो पेशेवर अपराधी था और न ही उस में अपराध करने की हिम्मत थी. इसलिए उस ने अपने चाचा अनीस के बड़े बेटे शादाब से बात की. वह समीर का ही हमउम्र था. दोनों की खूब पटती थी.

जब समीर ने अपनी मोहब्बत की मजबूरी शादाब के सामने बयां की तो वह भी पशोपेश में पड़ गया. समीर ने शादाब को ये भी बता दिया था कि इस काम को करने के बाद उसे न सिर्फ उस की मोहब्बत मिल जाएगी बल्कि सहारनपुर में 100 वर्गगज का एक प्लौट तथा वारदात के बाद कुछ नकदी भी मिलेगी, जिस में से वह उसे भी बराबर का हिस्सा देगा.

शादाब भी लड़कपन की उम्र से गुजर रहा था. लालच ने उस के मन में भी घर कर लिया. इसलिए उस ने समीर से कह दिया, ‘‘चल भाई, तेरी मोहब्बत के लिए मैं तेरा साथ दूंगा.’’

वारदात से 3 दिन पहले किसी बात पर राकेश ने फिर से अपनी पत्नी कृष्णा और बेटी काव्या की पिटाई कर दी. जिस के बाद काव्या को लगा कि अब पिता को रास्ते से हटाने में देर नहीं करनी चाहिए.

उस ने अगली सुबह ही समीर को फोन कर उसे एक जगह मिलने के बुलाया और वहां उसे घर में रखा पिता का तमंचा और 2 कारतूस ले जा कर सौंप दिए.

खेला मौत का खेल

उसी दिन उस ने अपने पिता की हत्या के लिए 7 अप्रैल की तारीख भी मुकर्रर कर दी. काव्या ने समीर से साफ कह दिया कि अब वह उस से उसी दिन मिलेगी जब वह उस के पिता की हत्या को अंजाम दे देगा. मोहब्बत से मिलने की आस में समीर ने भी अब देर करना उचित नहीं समझा.

7 अप्रैल को जब राकेश अपनी ड्यूटी पर गया तो उस दिन सुबह से ही समीर काव्या से लगातार फोन पर संपर्क में रहा. और दिन भर ये जानकारी लेता रहा कि उस के पिता दिल्ली से कब चलेंगे. काव्या वैसे तो अपने पिता को फोन नहीं करती थी, लेकिन उस दिन उस ने दिन में 2 बार उन्हें किसी न किसी बहाने फोन किया.

शाम को भी करीब साढे़ 8 बजे काव्या ने पिता को फोन कर के पूछा कि वह कहां हैं. राकेश ने बेटी को बताया कि वह ट्रेन में हैं. काव्या ने फोन करने की वजह छिपाने के लिए कहा कि इलैक्ट्रिक प्रेस का प्लग खराब हो गया है, जब वह घर आएं तो बिजली वाले की दुकान से एक प्लग लेते आएं.

बस ये जानकारी मिलते ही काव्या ने समीर को फोन कर के बता दिया कि उस के पिता रोज की तरह 9, सवा 9 बजे तक शामली स्टेशन पहुंच जाएंगे. जिस के बाद समीर भी शादाब को लेकर स्टेशन पहुंच गया.

रात को करीब साढ़े 9 बजे राकेश जब स्टेशन से बाहर आया तो समीर व शादाब उस का पीछा करने लगे. रास्ते में कई जगह ऐसा मौका आया कि एकांत पा कर वे राकेश पर गोली चलाने ही वाले थे कि अचानक किसी गाड़ी या राहगीर के आने पर वे राकेश को गोली न मार सके. इसी तरह पीछा करतेकरते दोनों राकेश के घर के करीब पहुंच गए.

इस दौरान राकेश ने बिजली की दुकान से इलैक्ट्रिक प्रेस का प्लग खरीदा और फिर घर की तरफ चल दिया. समीर को लगा कि अगर वह अब भी राकेश का काम तमाम नहीं कर सका तो मौका हाथ से निकल जाएगा और काव्या कभी उसे नहीं मिल सकेगी. उस ने तमंचा झट से शादाब के हाथ में थमा दिया और बोला, ‘‘ले भाई, मार दे इसे गोली.’’

सब कुछ अप्रत्याशित ढंग से हुआ. शादाब ने तमंचा हाथ में लिया और भागते हुए बराबर में पहुंच कर राकेश पर गोली चला दी. गोली मारने के बाद समीर और शादाब ने पलट कर यह भी नहीं देखा कि गोली राकेश को कहां लगी है और वो जिंदा है या मर गया.

बस उन्हें डर था कि वो कहीं पकड़े न जाएं, इसलिए वे तुरंत घटनास्थल से भाग गए. समीर ने सुरक्षित स्थान पर पहुंचते ही काव्या को फोन कर के सूचना दे दी कि उस ने उस के पिता को गोली मार दी है.

इस के बाद रात भर में काव्या और समीर के बीच कई बार बातचीत हुई. समीर को ये जान कर सुकून मिला कि गोली सही निशाने पर लगी और उस ने राकेश का काम तमाम कर दिया है.

समीर ने तमंचा और बचा हुआ एक कारतूस उसी रात घर के पास नाले के किनारे एक झाड़ी में छिपा कर रख दिया था, जिसे पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद उस की निशानदेही पर बरामद कर लिया. पुलिस ने इस मामले में हत्या के अभियोग के अलावा समीर और शादाब के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला भी दर्ज कर लिया.

एक गोली ने खत्म की लव स्टोरी

विस्तृत पूछताछ के बाद थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह कालरा ने समीर और शादाब के साथ काव्या को भी हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया.

लिहाजा 3 दिन तक जांच और कुछ अन्य साक्ष्य जुटाने के बाद थानाप्रभारी कालरा के निर्देश पर पुलिस टीम ने कृष्णा और वैशाली को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने पुलिस पूछताछ में राकेश की हत्या की साजिश में शामिल होने का अपराध कबूल कर लिया. पुलिस ने 17 अप्रैल को दोनों को जेल भेज दिया.

अनैतिक रिश्तों का विरोध करने वाले पति और पिता की हत्या की सुपारी देने वाली मां और बेटियां तो जेल में अपने किए की सजा भुगत ही रही हैं, लेकिन समीर ने प्रेम में अंधे हो कर अपने डाक्टर बनने के सपने को खुद ही तोड़ दिया.

– कथा पुलिस की जांच और काररवाई पर आधारित

कैसे करें लड़कियों को इंप्रैस

समाज बदल रहा है. धीरेधीरे लड़कालड़की के बीच का अंतर खत्म हो रहा है. कार्यस्थलों से ले कर समाज में हर जगह लड़कालड़की एकसाथ काम कर रहे हैं. परेशानी की बात यह है कि इतने बदलावों के बावजूद अभी तक पुरुषों की भाषा और सोच में बदलाव नहीं आया है. ऐसे में लड़कियों को कई बार असहजता का अनुभव होता है, जो विवाद का कारण भी बन जाता है. लड़कियों की सुरक्षा के लिए बने कानून इस तरह की कई घटनाओं को अपराध मानते हैं.

लड़कालड़की के बीच दूरी कम हो और ऐसे विवाद न हों, इस के लिए लड़कों को अपनी सोच व बातचीत का सलीका बदलने की जरूरत है. उन्हें लड़की को एक दोस्त और सहयोगी की नजर से देखना होगा, तभी आपस में अच्छा व स्वस्थ रिश्ता पनपेगा. इस सेघरपरिवार और समाज का भला होगा. लड़कियों के साथ अच्छा व्यवहार करना उन को बराबरी का दर्जा देने की बड़ी पहल है.

नेहा रवि के औफिस में काम करती है. दोनों एक ही रास्ते से अपने घर को जाते हैं. पहले दोनों अलगअलग साधनों से घर से औफिस जाते थे लेकिन अब रवि ने कार खरीद ली है. सो, दोनों एकसाथ कार से ही औफिस आनेजाने लगे हैं.

एकसाथ आनेजाने के बाद दोनों पैट्रोल का खर्च आपस में बराबरबराबर बांटते हैं. ऐसे में उन के बीच कभी इस बात का एहसास ही नहीं रहा कि कौन लड़का है और कौन लड़की. रवि और नेहा ने अपनी सोच बदली तो उन के बीच संबंध भी प्रगाढ़ होते गए. केवल रवि और नेहा ही ऐसे नहीं हैं. प्रकाश और कविता भी एकसाथ काम करते थे, जब कभी लंच में या सुबह की चाय का समय आता तो दोनों अपना खर्च खुद उठाते थे. इस का सब से अच्छा रास्ता यह था कि एक दिन का बिल प्रकाश देता तो दूसरे दिन का बिल कविता देती थी.

समान हों काम के अवसर

रवि और कविता ने अकसर देखा कि उन के साथ काम करने वाले साथियों का आपस में काम करतेकरते तनाव हो जाता था. इस का कारण था कि अकसर लड़कियां सोचती थीं कि उन को काम कम करना पड़े. वे अपने लड़की होने का फायदा उठाना चाहती थीं. लड़के उन के इस व्यवहार का लाभ उठाना चाहते थे. ऐसे में आपस का रिश्ता बजाय समझदारी के, स्वार्थ का हो जाता था, जिस की वजह से तमाम शिकायतें होने लगती थीं.

शिवानी और शैलेश के बीच कुछ ऐसा ही हुआ था. शैलेश अकसर शिवानी का काम खुद ही कर लेता था. यह बात शिवानी सभी से कहती भी थी. कई महीने तक यह सब चलता रहा. एक दिन शिवानी ने शैलेश के खिलाफ सब से शिकायत करनी शुरू कर दी. शिवानी की शिकायत थी कि कल रात पार्टी में शैलेश ने उस के साथ गलत व्यवहार करने की कोशिश की.

एक बार बात बिगड़ी तो शिवानी और शैलेश दोनों की ही तरफ से आरोपप्रत्यारोप का दौर चला. काम और व्यवहार से शुरू हुई बातचीत निजी संबंधों तक आ गई. दोनों की बातों से यह साफ हो गया कि शिवानी और शैलेश के बीच का रिश्ता केवल आपसी प्रलोभन पर था. शिवानी शैलेश से अपने काम कराती थी. शैलेश को लगता था कि इस के एवज में वह शिवानी से कुछ और हासिल कर सकता है. जब शिवानी ने शैलेश की मनमानी नहीं चलने दी तो दोनों के ही रिश्ते तनावपूर्ण हो गए. शिवानी और शैलेश के व्यवहार से यह बात साफ हो गई कि लड़कालड़की के बीच जहां रिश्तों में स्वार्थ आया वहां मामला बिगड़ते देर नहीं लगती है. ऐसे में दोस्ती में भी जिम्मेदारी बराबरबराबर ही बांटें.

आकर्षण के मोहपाश से बचें

किशोरावस्था और उस के बाद की उम्र में लड़कालड़की का आपस में आकर्षण होना कोई बड़ी बात नहीं है. यह आकर्षण स्वार्थ और लोभ में बदल भी जाता है. आमतौर पर पुरुष लड़कियों की मदद कर के उन से लोभ कर बैठता है. ज्यादातर मामलों में यह दैहिक आकर्षण भर होता है. कई बार लड़कियां खुद भी ऐसे मौके देती हैं,  जिस से कि वे अपनी बात को मनवा सकें.

कई बार यह शिकायत होती है कि कोई लड़का फलां लड़की का काफी समय से मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न कर रहा है. किसी भी लड़की का लंबे समय तक उत्पीड़न संभव नहीं होता है. यह तभी होता है जब दोनों तरफ से रजामंदी हो. जब नाराजगी होती है तो ऐसे आरोप लगाए जाते हैं. महिला कानूनों को देखें तो यह साफ हो जाता है कि बलात्कार की तमाम घटनाएं भी इस तरह की होती हैं, जिन में लंबे समय तक एकदूसरे के रिश्ते चलते हैं, फिर टूट जाते हैं.

आज के दौर में इस तरह के संबंधों के टूटने का प्रभाव लड़की पर तो पड़ता ही है, विवाद होने की दशा में लड़के की मानप्रतिष्ठा, कैरियर और घरसमाज भी टूट जाता है. विवेक के साथ भी कुछ ऐसे ही हुआ. उस की साथी प्रिया ने एकसाथ रहते हुए लंबा वक्त गुजार दिया. इस के बाद एक दिन दोनों के बीच जब विवाद हुआ तो प्रिया ने विवेक पर शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगा दिया. नतीजतन, विवेक को जेल जाना पड़ा. विवेक की नौकरी तो गई ही, उस का मानसम्मान और प्रतिष्ठा भी दावं पर लग गई.

कार्यस्थल की बात हो या वहां से बाहर की, लड़की के साथ समान व्यवहार रखें. आकर्षण के मोहपाश में फंस कर लड़के कई बार लड़कियों को छृने का प्रयास करते हैं. यह एक शारीरिक आकर्षण होता है और यही हर विवाद की जड़ भी होता है. कई बार तो लड़कियां पहले इस का लाभ उठाती हैं, लेकिन बाद में इस को ही मुद्दा बना लेती हैं. महिला कानून महिलाओं को ऐसे अवसर देते हैं जिन से वे अपने साथ रहने वाले को ही आरोपी बना सकती हैं.

सभ्य व्यवहार जरूरी

लड़कों के साथसाथ लड़कियों को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा. उन को खुद से लाभ उठाने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी. लिवइन रिलेशनशिप में रहते समय लड़कालड़की की समान सहमति होती है. इस के बाद जब कभी इन में विवाद होता है तो दोनों अलगअलग हो जाते हैं. आरोप लड़के पर लगते हैं. कानूनी रूप से लड़कियों को ज्यादा अधिकार मिलते हैं.

सामान्यतौर पर लड़कियों को ऐसे अवसरों का लाभ उठाने से बचना चाहिए. उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिना उस की सहमति के कोई लड़का लाभ नहीं उठा सकता है. जब दोनों की आपसी सहमति थी तो फिर केवल लड़के को दोष देना उचित नहीं है. लड़कियों या महिलाओं द्वारा जब कानून का गलत इस्तेमाल किया जाता है तो संबंधित कानून पर ही सवाल खड़े होने लगते हैं.

दहेज कानून और महिला हिंसा कानून में यह दुरुपयोग देखने को भी मिलता है. अब कोर्ट से ले कर समाज तक यह मानने लगा है कि ये कानून दुरुपयोग का जरिया बन रहे हैं. ऐसे में जब कोई महिला सही शिकायत भी करती है तो उसे लोग संदेह की नजर से देखते हैं. सही शिकायत को भी गलत माना जाता है.

कानून पर लोगों का भरोसा बना रहे, इस के लिए जरूरी है कि कानून का दुरुपयोग न हो. कानून और पुलिस हमेशा परेशान करने वाला काम ही करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि खुद समझदारी दिखाएं और ऐसे हालात पैदा ही न होने दें. सो, आपस में सभ्य व्यवहार रखना पड़ेगा.

लाभ उठाने की भूल न करें

लड़की यदि खुद से पहल कर लाभ उठाने वाला काम करती दिखे तो उस से दूर रहना चाहिए. अगर लड़की का काम करना है तो उस से उसी तरह का व्यवहार करें जैसे आप अपने पुरुषसाथी से करते हैं. ऐसा करने से हालात नहीं बिगड़ेंगे. कभी ऐसी शिकायत होगी भी, तो सफाई देना आसान होगा. गलत काम कर सफाई देना मुश्किल होता है.

ऐसे में सही रास्ते पर चलें जिस से परेशानी से बच सकें. अब लड़कियां केवल औफिस में ही काम नहीं करतीं, वे फील्ड जौब भी खूब कर रही हैं. ऐसे में उन के साथ काम करने का समय ज्यादा मिलता है. इस समय को अवसर समझ कर इस का लाभ उठाने की भूल न करें. लाभ उठाने की छोटी सी भूल ही आप के गले की फांस बनती है.

युवावस्था में ही नहीं, ऐसे हालात कभी भी बन सकते हैं. ऐसे में जरूरी है कि अब पुरुषवर्ग अपनी सोच और भाषा दोनों पर नियंत्रण रखे. कई बार आपस में बात करते समय लोग यह भूल जाते हैं कि कौन सी बात लड़कियों के सामने नहीं करनी चाहिए, जिस से लड़कियों को बुरा महसूस होता है. महिला और पुरुष का साथसाथ काम करना आज समय की जरूरत है. आपस में दूरी बना कर काम नहीं हो सकता. हर क्षेत्र में ऐसे हालात बन गए हैं. ऐसे में जरूरी है कि पुरुषवर्ग उन के साथ अपना व्यवहार बदले, अपनी बातचीत के सलीके से उन्हें इंप्रैस करे.

प्रियंका ने मीडिया को देख उतारी सगाई की ‘अंगूठी’

बौलीवुड की देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा और अमेरिकी सिंगर निक जोनास की सगाई की खबरों की गूंज बौलीवुड से लेकर हौलीवुड तक है. एक अंग्रेजी वेबसाइट के मुताबिक, प्रियंका ने 18 जुलाई को अपने 36वें जन्मदिन के मौके पर निक जोनास के साथ लंदन में सगाई की और जल्द ही जोड़ी शादी करने वाली है. लेकिन प्रियंका, निक या इनके परिवार की तरफ से अबी तक इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है.

सगाई के बाद जब प्रियंका भारत आईं तो मीडिया ने उनकी अंगूठी टटोलना शुरू किया, लेकिन उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा. वजह शायद यह है कि प्रियंका अपनी सगाई के बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहतीं, इसका अंदाजा आप उनके ताजा वीडियो से लगा सकते हैं. प्रियंका अपने लेटेस्ट वीडियो में अंगूठी को अपने जीन्स के पौकेट के अंदर छिपाती दिख रही हैं.

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निक जोनास का सिंगापुर कौन्सर्ट अटेंड करने के बाद प्रियंका हाल ही में भारत पहुंचीं. उन्हें मुंबई एयरपोर्ट के बाहर क्लिक किया गया. ताजा वीडियो में एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले प्रियंका अपने हाथ से अंगूठी निकालकर, पौकेट में रखते हुए कैमरे में कैद हुईं. उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

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बता दें कि पिछले दिनों उस समय प्रियंका चोपड़ा ने हर किसा को चौका दिया था जब उन्होंने सलमान खान की फिल्म ‘ भारत’ न करने का फैसला लिया था. इसे लेकर कई तरह के रिएक्शन आए थे. खबरों में निक जोनास को भी वजह बताया गया. वैसे प्रियंका चोपड़ा फरहान अख्तर के साथ एक फिल्म कर रही हैं, जिसकी शूटिंग जोर-शोर से चल रही है.

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