बच्चों को लील रहे पोंगापंथ के सिक्के

चंद सिक्कों के लालच में ही सही, गरीबों के बच्चे जान जोखिम में डाल कर नदियों में छलांग लगा रहे हैं. नदियों की तली में जा कर सिक्कों को बटोरने के चक्कर में पिछले कुछ महीनों में 3 बच्चों की जानें जा चुकी हैं.

पटना में गंगा नदी के किनारे बने गायघाट के पास 3 बच्चे सिक्कों के लालच में गंगा में कूदे, पर बाहर नहीं आ सके. छोटी पहाड़ी इलाके का रहने वाला 14 साल का पुन्नू राम और गायघाट के पास की एक झोंपड़पट्टी का रहने वाला 7 साल का साहिल सिक्कों को बटोरने के लिए गंगा में कूदे और डूब गए. तीसरे बच्चे की पहचान नहीं हो सकी.

गंगा के घाटों पर अकसर देखा जाता है कि बच्चे गंगा के गहरे और उफनते पानी में छलांग लगाते रहते हैं. उन बच्चों की उम्र अमूमन 8 से 12 साल के बीच होती है. उन्हें गंगा की तेज धारा में डूबने का जरा भी खौफ नहीं होता है.

10 साल का जुम्मन यह कह कर अच्छेअच्छों की बोलती बंद कर देता है, ‘‘जीने के लिए तो रोज मौत से खेलना ही पड़ता है साहब. गंगा के पेट से सिक्के निकालना ही हम सब का धंधा है. इसी से मेरी मां और बहन का गुजारा चलता है.’’

सिक्कों के लिए गंगा में छलांग लगाने के बाद कुछ पल के लिए वे पानी के भीतर गुम हो जाते हैं. इस से किनारे पर खड़े लोगों की सांसें अटक जाती हैं. थोड़ी ही देर के बाद बच्चे एकएक कर पानी की सतह पर आते हैं.

वे जल्दीजल्दी तैर कर किनारे आते हैं और अपना मुंह खोलते हैं. उस में से भरभरा कर कई सिक्के जमीन पर आ गिरते हैं. उस के बाद अपनी हथेलियों को खोल कर दिखाते हैं. उन में भी 1, 2, 5 और 10 के कई सिक्के होते हैं.

पटना में गंगा नदी के किनारे राजाघाट, गायघाट, गोसाईंघाट, कंगली गली, कालीघाट, अगमकुआं जैसी जगहों पर दर्जनों झोंपड़पट्टियां हैं. उन्हीं झोंपड़पट्टियों के बच्चे गंगा से सिक्कों को बटोरने में लगे रहते हैं. प्रशासन और पुलिस ने अपनी फाइलों में उन्हें ‘कौइन पिकर’ का नाम दे रखा है.

रेलगाडि़यों, बसों, कारों वगैरह से पुल पार करते समय लोग नदियों में अंधाधुंध सिक्के फेंकने लगते हैं. वे गंगा नदी समेत कई दूसरी नदियों में सिक्के फेंक कर यह समझते हैं कि उन्होंने एक झटके और सस्ते में काफी पुण्य कमा लिया है या ऊपर वाले को खुश कर दिया है. सिक्कों को नदी में फेंकने के बाद उन की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी, मन की हर मुराद पूरी हो जाएगी.

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पोंगापंथियों की इस अंधी सोच की वजह से जहां एक ओर हजारोंलाखों सिक्के बरबाद हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नदियों से सिक्के बटोरने के चक्कर में कई बच्चे नदी की गहराइयों में समा कर अपनी जान गंवा रहे हैं.

पटना के पुराने इलाके पटना सिटी

के गायघाट समेत कई घाटों पर सुबह से ले कर शाम तक नंगधड़ंग बच्चों का हुजूम गंगा नदी में छलांग लगाता दिख जाता है. हर बच्चे के हाथ में एक चुंबक होती है.

नदी में कूदने के बाद वे उस की तली तक पहुंच जाते हैं और चुंबक को इधरउधर घुमाते हैं. इस से कई सिक्के चुंबक से चिपक जाते हैं.

चुंबक से सिक्कों को छुड़ा कर बच्चे अपने मुंह में डाल लेते हैं और फिर से चुंबक को नदी की तली में इधरउधर घुमाने लगते हैं. इस बीच कुछ और सिक्के उस से चिपक गए तो ठीक वरना सांस लेने के लिए वे पानी की सतह पर आ जाते हैं.

सभी बच्चे अपनेअपने मुंह से सिक्के उगल कर उन्हें जमीन पर गिरा कर गिनते हैं. बाद में नदी किनारे खड़े अपने साथी को थमाते हैं. उस के बाद 5-7 मिनट तक लंबी सांसें ले कर फेफड़ों में ताजा हवा भरते हैं और सिक्कों की तलाश में दोबारा नदी की गहराइयों में डुबकी लगा देते हैं.

11 साल का मनोज बताता है कि वह स्कूल जाने के लिए घर से निकला है. स्कूल जाने के पहले कुछ देर तक वह गंगा में डुबकी लगा कर कुछ सिक्के निकाल लेता है और उस से चाट, गोलगप्पे, पकौड़े वगैरह खाता है. जिस दिन ज्यादा सिक्के हाथ लग जाते हैं तो वह घर के लिए चावल, आटा, दाल, चीनी वगैरह खरीद लेता है.

मनोज कहता है कि 6 साल पहले उस के पिता की मौत हो गई थी. अम्मां दाई का काम कर परिवार का पेट पालती हैं. वे अकसर बीमार रहती हैं जिस से रोज काम पर नहीं जा पाती हैं. इस से मालिक लोग उन के पैसे काट लेते हैं.

कम पैसों में 6 लोगों के परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल होता है, इसलिए नदी में गोता लगा कर सिक्के निकाल कर वह परिवार के लिए खाने का सामान खरीद लेता है. वह रोज 8 से 10 बार नदी में गोता लगाता है और तकरीबन 30 से 50 रुपए निकाल लेता है.

कुछ सिक्कों के लिए स्कूल से भाग कर नदी में बच्चों की छलांग सरकारी योजनाओं को मुंह चिढ़ा रही हैं. सरकार इस खुशफहमी में आंकड़े तैयार करती रहती है कि मिड डे मील के लालच में लाखों बच्चे स्कूल आ रहे हैं, साइकिल योजना की वजह से लड़कियां काफी दूरदूर से पढ़ने के लिए स्कूल आ रही हैं, नए कपड़ों को लेने के बहाने हजारों गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल आने लगे हैं, पर चंद सिक्कों के लालच में जान जोखिम में डाल कर गंगा नदी में छलांग लगाते बच्चे तमाम सरकारी योजनाओं का सच बयान कर देते हैं.

10 साल का दिलीप राम बताता है, ‘‘स्कूल में तो हमें भरपेट खाना मिल जाता है पर लाचार मांबाप क्या खाएंगे? मेरे कुछ दोस्त गंगा में डुबकी लगा कर सिक्के जमा करने का काम करते हैं, इसलिए हम भी इसी काम में लग गए. रोजाना तकरीबन 60 से 100 रुपए तक जमा हो जाते हैं. पुल को पार करते समय हर बस, ट्रक, कार और रेलगाड़ी से कई सिक्के नदी में लोग फेंकते हैं.’’

नदी में सिक्के फेंकने वालों को पुण्य मिले या न मिले, पर उन सिक्कों से कई गरीब बच्चों का पेट तो भर रहा है. लेकिन इस के लिए उन्हें अपनी नन्ही जान को खतरे में डालना पड़ रहा है.

इस मसले पर समाजसेवी आलोक कुमार कहते हैं कि अंधविश्वास की वजह से हजारोंलाखों सिक्के रोज ही नदियों में फेंके जाते हैं. किसी भी पुल से गुजरते हर छोटीबड़ी गाड़ी से दनादन सिक्के नदियों में फेंके जाते हैं.

पोंगापंथ के जाल में फंसे लोग समझते हैं कि नदियों में सिक्के डालने से उन्हें पुण्य मिलेगा या उन का सफर महफूज होगा, जबकि वे यह नहीं समझते हैं कि इस तरह से पुण्य कमाने के चक्कर में रोजाना हजारों सिक्के नदियों में फेंक दिए जाते हैं.

टूट गई मर्यादाओं की डोर

उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना रेहड़ के अंतर्गत एक गांव है लालबाग. गुरदास इसी गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे. पतिपत्नी और 2 बच्चे, यही उन का छोटा सा घरसंसार था. खेतीबाड़ी काफी थी, जिस से उन के परिवार की गाड़ी बड़े आराम से चल रही थी.

उन के यहां ऐशोआराम की हर चीज मौजूद थी. परिवार को खुश रखने के लिए वह कड़ी मेहनत करते थे. गुरदास के दोनों बच्चों में अमिता सब से बड़ी थी. वह पिता की आंखों का तारा थी तो बेटा बुढ़ापे की लाठी. अपने बच्चों पर वह बहुत गर्व करते थे.

बेटी के प्रति अटूट ममता को देख कर कभीकभी पत्नी सुखविंदर कौर पति से दिल्लगी कर बैठती थी कि बेटी तो पराई अमानत होती है. बेटी जब अपनी ससुराल चली जाएगी, तब उस के बिना कैसे रहोगे?

इस पर गुरदास पत्नी को टका सा जवाब दे देते, ‘‘तब की तब देखी जाएगी. नहीं होगा तो दामाद को घरजंवाई बना कर अपने पास रख लेंगे. तब तो मेरी बेटी मेरी आंखों के सामने रहेगी. आखिरकार दामाद भी तो बेटे जैसा होता है. जैसे मेरा एक बेटा वैसे दामाद दूसरा बेटा.’’

पति का टका सा जवाब सुन कर सुखविंदर कौर खामोश हो जाती.

21 दिसंबर, 2017 की बात है. गुरदास किसी काम से सुबहसुबह ही निकल गए थे. सुबह के 9-10 बजे के करीब अमिता मां से कुछ देर में वापस लौट कर आने की बात कह कर कहीं चली गई. घर से निकलते वक्त उस ने मां को ये नहीं बताया कि वह कहां और किस काम से जा रही है. बस इतना ही कहा कि थोड़ी देर में वापस लौट आऊंगी.

थोड़ी देर में लौट आने की बात कह कर घर से निकली अमिता को करीब 3 घंटे बीत गए थे. इतनी देर बाद भी वह घर नहीं लौटी थी. मां सुखविंदर कौर को चिंता सताने लगी कि थोड़ी देर में लौट कर आने को कह कर गई अमिता 3 घंटे बाद भी लौटी क्यों नहीं.

सुखविंदर ने अमिता का मोबाइल नंबर मिलाया पर वह स्विच्ड औफ मिला. सुखविंदर ने कई बार फोन लगाने की कोशिश की लेकिन फोन हर बार बंद ही मिला. उस का फोन बारबार स्विच्ड औफ बता रहा था.

इस से सुखविंदर अमिता को ले कर जहां चिंतित हो रही थी, वहीं दूसरी ओर उसे उस पर गुस्सा भी आ रहा था कि कम से कम घर पर फोन तो कर सकती थी. उस दिन अमिता स्कूल भी नहीं गई थी. स्कूल का बैग उस के कमरे की मेज पर वैसे ही पड़ा था, जैसे उसे रख कर गई थी.

अमिता का कुछ पता नहीं चला तो परेशान हो कर सुखविंदर ने पति को फोन कर के बेटी के वापस न लौटने की सूचना दे दी. अमिता 17 साल की थी. उस के गायब होने से घर वालों की चिंता बढ़नी स्वाभाविक थी. पत्नी के मुंह से बेटी के गायब होने की खबर सुन कर गुरदास के हाथपांव फूल गए. वह बुरी तरह घबरा गए और कुछ ही देर में घर लौट आए.

इधर सुखविंदर ने अपने बड़े बेटे गुलजार के बेटे यानी पोते कमलजीत को अमिता का पता लगाने के लिए गांव में भेजा. करीब एक घंटे में वह सारा गांव छान कर लौट आया लेकिन अमिता का कहीं पता नहीं लगा.

धीरेधीरे दिन ढल रहा था. शाम हो गई लेकिन अमिता अब तक घर नहीं लौटी थी. बेटी के रहस्यमय तरीके से गायब होने से घर ही नहीं, गांव में भी कोहराम मच गया था. गुरदास और सुखविंदर का रोरो कर बुरा हाल था. वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें.

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काफी सोचविचार करने के बाद गुरदास बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराने के लिए अपने पोते कमलजीत और गांव वालों के साथ रात 8 बजे थाना रेहड़ पहुंच गए. थानाप्रभारी सुभाष सिंह थाने में मौजूद थे.

गुरदास ने थानाप्रभारी को अपनी 17 वर्षीय बेटी अमिता के गायब होने की बात बताई. उन्होंने अमिता की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उन्हें घर भेज दिया.

अगले दिन यानी 22 दिसंबर, 2017 की सुबह थानाप्रभारी को मुखबिर ने सूचना दी कि जिम कार्बेट नैशनल पार्क बौर्डर के पास एक युवती की लाश पड़ी है. लाश पाए जाने की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ रवाना हो गए.

वहां पहुंच कर उन्होंने लाश का मुआयना किया तो ऐसा लगा जैसे युवती ने कोई जहरीला पदार्थ खा कर अपनी जान दी हो क्योंकि उस का पूरा शरीर नीला पड़ा हुआ था. ऐसा तभी होता है जब कोई जहरीले पदार्थ का सेवन करता है.

इस के अलावा सरसरी तौर पर उस के शरीर पर चोट का भी कोई निशान नजर नहीं आ रहा था. देखने से युवती किसी भले घर की लग रही थी. तभी थानाप्रभारी को याद आया कि बीती रात लालबाग के रहने वाले गुरदास अपनी बेटी की गुमशुदगी लिखाने आए थे. उन्होंने अपनी बेटी का जो हुलिया बताया था, वह मृतका से काफी मेल खा रहा था.

लाश की शिनाख्त के लिए उन्होंने एक सिपाही को भेज कर गुरदास को साथ लाने को कहा. सिपाही के साथ गुरदास घर और गांव के कुछ लोगों के साथ मौके पर पहुंच गए. युवती की लाश देखते ही वे फफकफफक कर रोने लगे. उन्हें रोता देख पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मृतका उन की ही बेटी है.

थोड़ी देर बाद जब गुरदास शांत हुए तो पुलिस ने उन से अमिता द्वारा खुदकुशी किए जाने के बारे में सवाल पूछे कि आखिर अमिता के साथ ऐसा क्या हुआ था कि उस ने इतना बड़ा कदम उठाया.

यह सुन कर गुरदास सकते में आ गए. वह खुद ही नहीं समझ पा रहे थे कि अमिता ने आत्महत्या क्यों की? इसलिए वह थानाप्रभारी के सवाल पर सुबकने लगे.

पुलिस ने उस समय गुरदास से ज्यादा पूछताछ कर के मौके की काररवाई निपटाई और लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. अब पुलिस की निगाह पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर आ कर टिक गई थी कि रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी कि अमिता की मृत्यु कैसे हुई?

2 दिनों बाद अमिता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट पढ़ कर थानाप्रभारी सुभाष सिंह चौंक गए. क्योंकि पोस्टमार्टम में बताया गया था कि अमिता 4 माह की गर्भवती थी और जहर खाने के साथसाथ किसी चौड़े दुपट्टे या शौल से उस का गला घोंटा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी कहानी ही उलटपलट कर रख दी थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद घटना शीशे की तरह साफ हो गई थी. पूरा मामला प्रेमप्रसंग का नजर आने लगा.

अब पुलिस को इस में 2 ही वजह दिखाई देने लगीं. पहली तो यह कि या तो उस के प्रेमी ने छुटकारा पाने के लिए उस की हत्या कर दी थी या फिर उस के घर वालों ने सामाजिक लोकलाज के चलते हत्या कर के लाश ठिकाने लगा दी थी.

यह मामला काफी पेचीदा हो गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद थानाप्रभारी ने गुरदास को थाने बुलवाया और उन से अमिता के प्रैगनेंट होने की बात बताई तो यह बात सुनते ही उन के पैरों तले से जमीन ही खिसक गई.

गुरदास को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था कि थानाप्रभारी ने जो उन से कहा है, वह सच है? वह तो यह सोचसोच कर हैरानपरेशान हो रहे थे कि जब लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. फिर समाज में वह अपना मुंह कैसे दिखाएंगे? पुलिस ने उन से यह बात भी पूछी कि क्या अमिता का किसी से चक्कर चल रहा था? पर वह कुछ भी बताने में असमर्थ रहे.

अमिता हत्याकांड की गुत्थी उलझ कर रह गई थी. धीरेधीरे 4 दिन बीत गए. कोई ऐसी कड़ी पुलिस के हाथ नहीं लग रही थी जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाती. पुलिस ने अमिता के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस में भी कोई ऐसा संदिग्ध नंबर नहीं मिला, जिसे संदेह के घेरे में लिया जा सके.

गुत्थी सुलझाने के लिए पुलिस ने मुखबिर लगा दिए. इधर घर वाले भी इस बात से काफी परेशान रहने लगे कि आखिर अमिता के पेट में किस का बच्चा पल रहा था. उस का प्रेमी कौन था? पुलिस विवेचना कर रही थी तो उधर घर वाले भी अमिता के प्रेमी की जानकारी के लिए जुट गए. पता नहीं क्यों गुरदास का पोता कमलजीत कुछ परेशान सा रहने लगा था. उस के बातव्यवहार में भी अचानक से परिवर्तत आ गया था.

बेटे की परेशानी देख उस के पिता गुलजार ने कमलजीत से बात की और पूछा कि आखिर वह इतना परेशान क्यों है? इस से पहले तो उसे इतना परेशान कभी नहीं देखा था. आखिर क्या बात हो सकती है, जो वह इतना परेशान है.

उधर मुखबिर ने पुलिस को कमलजीत के संदिग्ध चरित्र के बारे में बता दिया था. मुखबिर ने पुलिस को यह भी बताया था कि घटना वाले दिन सुबह के समय कमलजीत को अमिता के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ जाते देखा गया था.

मुखबिर की दी गई खबर पक्की थी. पुलिस ने इस की पड़ताल की तो बात सच निकली. सचमुच कमलजीत अमिता के साथ जिम कार्बेट नैशनल पार्क की तरफ जाते देखा गया था. इस के बाद पुलिस बिना समय गंवाए लालबाग पहुंच गई. कमलजीत घर पर ही मिल गया. वह घर छोड़ कर कहीं भागने की फिराक में था. पुलिस को देखते ही उस के मंसूबे पर पानी फिर गया.

पुलिस ने कमलजीत को हिरासत में ले लिया और थाने लौट आई. थाने में जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सारी बातें बता दीं. उस ने कहा, ‘‘हां सर, मैं ने ही अपनी बुआ को मारा है. मैं करता भी क्या? मेरे पास अपने बचाव का कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा था. वह मुझ पर शादी करने के लिए दबाव बना रही थी. उस से छुटकारा पाने के लिए मजबूरन मुझे ये कदम उठाना पड़ा.’’

कमलजीत से पूछताछ के बाद अमिता की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह रिश्तों को तारतार करने वाली निकली.

अमिता और कमलजीत एकदूसरे से रिश्तों के जिन पवित्र धागों से बंधे थे, वहां कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि बुआ और भतीजा यानी मांबेटे जैसे पवित्र रिश्ते की आड़ में समाज की मानमर्यादा को ताख पर रख कर इश्क के दरिया में डूबा जा सकता है.

22 वर्षीय कमलजीत गुरदास का एकलौता पौत्र था. गुरदास उसे बहुत प्यार करते थे. एक तरह से कमलजीत उन के दिल का टुकड़ा था. उन का संयुक्त परिवार था. एक ही छत के नीचे सारा परिवार हंसीखुशी से रहता था. उन की एकता की मिशाल की सारे गांव में चर्चा थी.

कमलजीत था तो दुबलापतला, लेकिन था बेहद फुरतीला और स्मार्ट. यही नहीं वह मजाकिया किस्म का भी था. बच्चों से ले कर बड़ेबूढ़ों के बीच बैठ अकसर वह गप्पें लड़ाया करता था. उस की गप्पें सुन कर सभी हंसतेहंसते लोटपोट हो जाया करते थे.

अमिता, कमलजीत की सगी बुआ थी. उन के बीच 4-5 साल का अंतर था. अमिता 17 साल की थी तो वहीं कमलजीत 22 साल का था. अमिता बेहद खूबसूरत थी. कमलजीत मन ही मन अमिता को चाहने लगा. एक दिन की बात है. अमिता, आंगन में बैठी अधखुले तन से नहा रही थी.

उस ने बरामदे के दरवाजे को ऐसे ही भिड़ा दिया था. अकसर वो ऐसे ही बेपरवाह हो कर नहाया करती थी. यह सोच कर उस पर सिटकनी नहीं चढ़ाई थी कि झट से नहा कर उठ जाएगी. वैसे भी उस वक्त घर के सारे पुरुष बाहर दरवाजे पर बैठे थे.

उसी समय कमलजीत अचानक किसी काम से आया और बरामदे का दरवाजा खोल कर धड़धड़ाता हुआ आंगन में दाखिल हो गया. अमिता उसे देख कर हड़बड़ा गई और गीले कपड़ों से जल्दीजल्दी अपने तन को ढकने की कोशिश करने लगी.

तब तक कमलजीत की नजरें अमिता के बदन से टकरा चुकी थीं. उसे उस हालत में देख कर कमलजीत का मन बेचैन और बेकाबू हो गया. उस समय उस ने खुद पर जैसेतैसे काबू पाया, लेकिन इस के बाद से वह अमिता बुआ के जिस्म को पाने के लिए मचल उठा.

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अमिता को पाने के लिए उस ने धीरेधीरे उस के चारों तरफ इश्क का जाल बिछा कर प्यार का दाना डालना शुरू कर दिया. कमलजीत का प्यार तो एक छलावा था. उस का एकमात्र उद्देश्य जिस्म की भूख थी. इस के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था. अमिता अपने भतीजे कमलजीत के नापाक और घिनौने इरादों से एकदम अंजान थीं.

योजना के मुताबिक, अमिता के दिल में जगह बनाने के लिए कमलजीत उस के पास ज्यादा से ज्यादा समय बिताने लगा. उस की छोटी से छोटी बातों का खयाल रखने लगा.

ये देख कर अमित कमलजीत से काफी प्रभावित रहने लगी. कमलजीत जिस आशिकाना नजरों से उसे देखता था, अमिता को समझते देर नहीं लगी कि वह दीवानों वाला प्यार करने लगा है.

अमिता उम्र के जिस दौर से गुजर रही थी, उस उम्र में अकसर लड़केलड़कियों के पांव फिसल जाया करते हैं. अमिता के भी पांव भतीजे के इश्क में फिसल गए. वह भी उसे उसी आशिकाना अंदाज से देखने लगी थी, जैसा कमलजीत उसे अपलक निहारता रहता था. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया और मौका देख कर उन्होंने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया.

चूंकि, अमिता और कमलजीत एक ही छत के नीचे रहते थे इसलिए घर के किसी भी सदस्य को उन के नापाक रिश्तों की भनक नहीं लगी और न ही उन पर किसी ने कोई शक किया. उन्हें जो भी बातें करनी होती थीं घर वालों से नजरें बचा कर कर लेते थे.

कमलजीत अमिता का पहलापहला प्यार था. वह उसे समुद्र की गहराइयों से भी ज्यादा चाहने लगी थी. प्यार में बंधे दोनों यह तक भूल गए कि उन के बीच रिश्ता क्या है? जब उन के प्यार का राजफाश होगा तो समाज के लोग उन के बारे में क्या सोचेंगे? उन की कितनी जगहंसाई होगी. इस का दोनों को तनिक भी खयाल नहीं हुआ. यह बात सन 2016 की है.

कमलजीत के प्यार का जादू अमिता के सिर चढ़ कर बोल रहा था. उसे कमलजीत के सिवाय कुछ नजर नहीं आ रहा था. कमलजीत भी इसी दिन के इंतजार में कब से बेताब बैठा था. अमिता भतीजे के बिछाए इश्क के जाल में अच्छी तरह से फंस चुकी थी.

बेहद भोलीभाली और सीधीसादी अमिता लोमड़ी से भी अधिक चालाक और शातिर भतीजे कमलजीत के रचे चक्रव्यूह को समझ नहीं पाई और अपनी आबरू लुटा बैठी.

प्यार के अंधे कुआं में डूबी अमिता कमलजीत के बांहों में आ गिरी. उन के बीच के सारे फासले, सारे रिश्ते पल भर में सिमट कर रह गए. दोनों एक जिस्मानी रिश्ते में समा गए. एक बार जो मिलन का खेल शुरू हुआ तो सिलसिला बन गया.

जिस का परिणाम यह हुआ कि अमिता के पांव भारी हो गए. जब उस के गर्भ में कमलजीत का 4 माह का पाप पांव पसारने लगा तो अमिता को अहसास हुआ कि वह कितनी बड़ी गलती कर बैठी थी. जब मांबाप इस हालात के लिए उस से पूछेंगे तो वह क्या जवाब देगी. ये सोचसोच कर उस की रातों की नींद और दिन का चैन लुट चुका था. हर घड़ी वह परेशानी की मौत मरती रही.

उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि क्या करे? किसे अपने मन का हाल सुना कर जी हलका करे. जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने कमलजीत से बात की कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है. जल्द से जल्द कोई उपाय करे नहीं तो समाज में जीना मुश्किल हो जाएगा.

अमिता के मुंह से ये सुनते ही कमलजीत के होश उड़ गए. घबराहट के मारे पसीना छूटने लगा. उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. उस के सिर से अमिता के इश्क का सारा भूत उतर गया. उस ने अमिता को समझाया कि उसे सोचने के लिए थोड़ा मौका दे. जल्द से जल्द कोई न कोई उपाय निकाल लेगा.

उधर अमिता उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. शादी का नाम सुन कर कमलजीत बुरी तरह घबरा गया. वह सोचने लगा कि लोग उस के बारे में क्या सोचेंगे की बुआभतीजे के रिश्ते को तारतार कर दिया. वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

कमलजीत ने शादी के लिए इनकार करते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि रिश्ते में हम बुआभतीजे लगते हैं. दुनिया क्या कहेगी? समाज हम पर थूकेगा.

इस पर अमिता ने कहा, ‘‘तुम ने उस समय यह बात क्यों नहीं सोची थी. अब मामला बिगड़ गया तो दुनियादारी याद आ रही है. मैं कुछ नहीं जानती. तुम्हें मुझ से शादी करनी ही होगी.’’

काफी सोचनेविचारने के बाद कमलजीत ने कहा, ‘‘मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है. इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए हम दोनों खुदकुशी कर लेते हैं. तब तो हम पर कोई अंगुली नहीं उठाएगा.’’

कमलजीत का यह आइडिया अमिता को पसंद आ गया. इस के बाद दोनों ने सुसाइड करने का प्लान बना लिया. प्लान के मुताबिक कमलजीत 20 दिसंबर, 2017 को बाजार से एक घातक कीटनाशक दवा खरीद लाया.

अगले दिन वह बहलाफुसला कर अमिता को घर से बाहर जिम कार्बेट नैशनल पार्क ले गया. दोनों को पार्क की ओर जाते हुए मोहल्ले के कई लोगों ने देखा था. पार्क पहुंच कर सामने मौत देख कर कमलजीत की रूह कांप उठी. उस ने मरने का अपना फैसला बदल दिया. बडे़ शातिराना अंदाज में उस ने अमिता से कहा, ‘‘तुम पहले जहर खा लो, फिर मैं खा लूंगा.’’

भतीजे की बातों पर यकीन कर के अमिता ने पहले जहर खा लिया. उस के बाद उस ने अपने प्रेमी कमलजीत से भी जहर खाने को कहा तो उस ने फिल्मी खलनायकों के अंदाज में हंसते हुए अमिता की तरफ घूर कर देखा और कहा, ‘‘मेरी प्यारी बुआ, तुम अभी भी मेरी फितरत को नहीं समझ पाई. तुम्हें पता नहीं कि तुम से पीछा छुड़ाने के लिए मैं ने यह कदम उठाया था. तुम तो मर जाओगी, लेकिन मैं… मैं अभी मरना नहीं चाहता.’’

जहर ने अमिता पर अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. अमिता का शरीर ढीला पड़ने लगा. तभी कमलजीत ने उस के गले में लिपटे दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. अमिता कटे वृक्ष की तरह जमीन पर धड़ाम से जा गिरी. कमलजीत ने उसे हिलाडुला कर देखा. वह मर चुकी थी. उस के बाद कमलजीत लाश को वहीं ठिकाने लगा कर इत्मीनान से घर लौट आया.

जिस चालाकी और सफाई से कमलजीत ने अपना काम किया था. उसे ऐसा लगा था कि पुलिस उस तक नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन अपराध कभी छिपता नहीं है. आखिरकार अपराधी को उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचना ही होता है. कमलजीत के साथ भी यही हुआ. उस से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक हत्यारा 7 लाशें

मार्च 2015 के अंतिम सप्ताह की 24 तारीख को पटियाला की विकास कालोनी में एक युवक की लाश मिली थी. लाश के टुकड़े कर के एक अटैची में बंद कर के अटैची को सुनसान जगह पर फेंक दिया गया था. मृतक के कई टुकड़े करने के बाद उस के चेहरे पर ईंटें मार कर कुचला गया था.

पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर के लाश की शिनाख्त करवाई तो पता चला कि अटैची में मिली लाश अनिल कुमार नामक युवक की थी. इस हत्या ने पूरे शहर में दहशत पैदा कर दी थी.

दहशत का एक कारण यह भी था कि पुलिस को इस तरह लाश कोई पहली बार नहीं मिली थी. सन 1995 से ले कर अब तक इसी तरह पुलिस ने पंजाब के अलगअलग शहरों से करीब 8 लाशें बरामद की थीं और ये सभी अनसुलझे मामले फाइलों में बंद हो चुके थे. यह ताजा मामला भी पहले मिली लाशों की फेहरिस्त में शामिल कर लिया गया था, क्योंकि अब से पहले मिली लाशें और अब मिली लाश को देख कर ऐसा लगता था जैसे इन सब का कातिल एक ही रहा हो.

इन सभी हत्याओं की कार्यप्रणाली एक जैसी ही थी. अब तक मिली सभी लाशें टुकड़ों में मिली थीं और उन सब के चेहरे पर ईंटें मार कर चेहरा बिगाड़ा गया था. इस तरह की हत्याओं का पहला मामला सन 1995 में लुधियाना में सामने आया था. मृतक का नाम नंदलाल था और उस की लाश भी पुलिस को अटैची में बंद टुकड़ों के रूप में मिली थी.

अनिल की तरह नंदलाल के चेहरे को भी ईंटें मार कर बिगाड़ा गया था. बाद में पुलिस की काफी मशक्कत के बाद मृतक की पहचान नंदलाल के रूप में हुई थी, पर पुलिस की दिनरात की मेहनत के बाद भी वह कातिल तक नहीं पहुंच पाई थी. अंतत: इस केस को अनसुलझा करार देने के बाद इस की फाइल बंद कर दी गई थी.

इस के बाद साल, 6 महीने में लुधियाना और पटियाला में इसी तरह लाशें मिलती रहीं और उन हत्याओं की जांच भी होती रही, पर कातिल को पकड़ना तो दूर की बात पुलिस उस का पता तक नहीं लगा पाई. समय के साथसाथ हत्याओं के ये सारे केस फाइलों में बंद हो कर रह गए थे.

लेकिन अनिल की इस ताजा हत्या ने एसपी (देहात) हरविंदर सिंह विर्क का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने इस तरह हुई हत्याओं की सभी फाइलें मंगवा कर उन का बारीकी से अध्ययन करने के बाद हत्यारे को पकड़ने का काम डीएसपी सौरभ जिंदल को सौंप दिया.

डीएसपी सौरभ जिंदल ने अपने विश्वसनीय पुलिसकर्मियों की टीम बना कर इस मामले की जांच शुरू कर दी. सब से पहले उन्होंने पटियाला के टैगोर सिनेमा के पीछे मिली राजिंदर कुमार नामक युवक की लाश से अपनी जांच शुरू की. राजिंदर की लाश भी 2015 में मिली थी और अब तक मिली अन्य लाशों की तरह उस की लाश के भी टुकड़े कर अटैची में बंद कर के टैगोर सिनेमा के पिछवाड़े फेंके गए थे. उस का चेहरा भी ईंट मार कर बिगाड़ा गया था.

डीएसपी सौरभ जिंदल ने जब राजिंदर की फाइल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पता चला कि राजिंदर की लाश के टुकड़ों के साथ उस के कपड़े भी मिले थे और उन कपड़ों में एक विजिटिंग कार्ड भी था, जो किसी सुरजीत नामक कौंटैक्टर का था.

डीएसपी सौरभ जिंदल ने सुरजीत को बुलवाया और मृतक राजिंदर की फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछा. फोटो देख कर उस ने झट से बता दिया कि राजिंदर उसी मकान मेंअपनी पत्नी के साथ किराए पर रहता था, जिस में वह खुद रह रहा था. आगे की पूछताछ में पता चल कि वह मकान किसी रीना नाम की औरत का था.

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यह जानकारी भी मिली कि रीना का चालचलन ठीक नहीं था. रीना के अवैध संबंध एक आदमी से थे और वह अकसर रीना के घर आया करता था. पड़ोसियों के अनुसार, रीना उस आदमी की रखैल थी और वह उस के इशारों पर नाचती थी.

रीना के पास आने वाला आदमी कौन था, उस का नाम क्या था और वह कहां का रहने वाला था, रीना के अलावा यह बात और कोई नहीं जानता था. बहरहाल, डीएसपी सौरभ जिंदल ने सब से पहले राजिंदर के बारे में उस की पत्नी से पूछताछ की.

उस की पत्नी का कहना था कि उस का पति सिंचाई विभाग में कार्यरत था और कई दिनों से घर से लापता था. आश्चर्यजनक बात यह थी कि राजिंदर की पत्नी ने उस के गायब होने की कहीं रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करवाई थी. जांच में यह भी पता चला कि राजिंदर कुमार भी रीना पर गलत नजर रखता था.

डीएसपी सौरभ जिंदल ने मामले की गहनता से जांचपड़ताल की तो कई बातें बड़ी विचित्र और रहस्यमयी दिखाई दीं. इसलिए जिंदल ने रीना से ही पूछताछ करना उचित समझा. रीना को अपने औफिस बुला कर जब उस से उस के प्रेमी के बारे में पूछा गया तो रीना ने अपने प्रेमी के बारे में कई रहस्य उजागर किए.

उस ने बताया कि उस के प्रेमी का नाम जगरूप सिंह था और वह पिछले काफी समय से अपनी मजबूरी के कारण उस के साथ रह रही थी, क्योंकि जगरूप उसे ब्लैकमेल कर रहा था और वह उसे धमकी दे कर कई बार कह चुका था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी या उस के बारे में किसी से कुछ कहा तो अन्य लोगों की तरह वह उस की भी हत्या कर देगा और उस की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर चीलकौवों को खिला देगा.

इन सब बातों के अलावा रीना से यह भी पता चला कि 45 वर्षीय जगरूप सिंह बदोवाल, लुधियाना का रहने वाला है. बदोवाल में जगरूप कहां रहता था, इस बात का रीना को पता नहीं था. डीएसपी सौरभ जिंदल के आदेश पर उन की पुलिस टीम ने बड़ी मेहनत करने के बाद लुधियाना के बदोवाल में जगरूप का घर ढूंढ निकाला, पर इतनी मेहनत के बाद यहां भी पुलिस के हाथ निराशा ही लगी.

दरअसल, जगरूप को किसी तरह से यह सूचना मिल गई थी कि पुलिस ने अब तक हुए ब्लाइंड मर्डर्स की फाइलों को खोल कर नए सिरे से जांच शुरू कर दी है और जल्द ही पुलिस उस तक पहुंचने वाली है. इसीलिए वह अपने घर बदोवाल से फरार हो गया था.

जगरूप की गिरफ्तारी को ले कर पुलिस ने रेड अलर्ट घोषित कर जगहजगह उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. इस बीच पुलिस को पता चला कि जगरूप लुधियाना के जालंधर बाईपास इलाके में कहीं रह रहा है. दिनरात मेहनत कर के पुलिस ने उस का ठिकाना ढूंढ तो लिया, लेकिन पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही वह वहां से भी फरार हो गया. पुलिस खाली हाथ पटियाला लौट आई.

अगली बार पुलिस ने रीना से पुन: पूछताछ कर जगरूप के उन सभी ठिकानों को घेर लिया, जहां उस के छिपने की संभावना हो सकती थी. अंत में अपने आप को चारों ओर से घिरा देख कर 4 जनवरी, 2018 को जगरूप सिंह ने एक व्यक्ति के जरिए सिविललाइंस थाने में आ कर सरेंडर कर दिया. इसी के साथ पिछले कई महीनों से जगरूप और पुलिस के बीच चल रहे चूहेबिल्ली के खेल का अंत हो गया.

जगरूप सिंह के पिता की मृत्यु उस के बचपन में ही हो गई थी. जगरूप बचपन से ही अय्याश प्रवृत्ति का था और ऐशोआराम की जिंदगी जीना चाहता था. बचपन से ही वह स्कूल में हमउम्र और अपनी उम्र से बड़ी लड़कियों से छेड़छाड़ करता रहता था. इसी के चलते उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. उम्र के साथसाथ उस का अय्याशी वाला शौक भी बढ़ता गया.

लेकिन अय्याशी के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत थी, जो उस के पास नहीं थे. अंतत: अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उस ने एक रास्ता खोज निकाला. अपने आप को शरीफ और पैसे वाला दिखा कर वह लड़कियों से पहले दोस्ती करता था और बाद में उन की अश्लील फोटो खींच कर उन्हें ब्लैकमेल करते हुए देहव्यापार के धंधे में धकेल देता था. उन की कमाई से वह खुद ऐश करने लगा. इस तरह जगरूप ने अनेकों लड़कियों की जिंदगी बरबाद की थी. उस के चंगुल में फंसने वाली लड़की का उस से बच निकलना असंभव था.

सन 1994 में जगरूप का बड़ा भाई आस्ट्रेलिया चला गया. वह वहां टैक्सी चलाने का काम करने लगा. इस काम में उसे अच्छी कमाई होने लगी. जब धंधा जम गया तो उस ने अपनी मां को भी हमेशा के लिए अपने पास आस्ट्रेलिया बुला लिया.

आस्ट्रेलिया जाने से पहले जगरूप की मां ने एक लड़की देख कर उस की शादी यह सोच कर करवा दी थी कि एक तो उन के आस्ट्रेलिया चले जाने के बाद जगरूप का खयाल कौन रखेगा और दूसरे उन का सोचना था कि शादी के बाद शायद जगरूप की जिंदगी में कोई ठहराव आ जाए, पर यह उन का मात्र भ्रम था.

जगरूप को न सुधरना था और न ही वह सुधरा. बल्कि दिनप्रतिदिन उस की अय्याशियां बढ़ती गईं. नईनवेली पत्नी के सामने जब जगरूप का घिनौना चेहरा आया तो समझदारी दिखाते हुए वह चुपचाप घर छोड़ कर अपने मायके चली गई और उस ने दोबारा मुड़ कर पति की तरफ नहीं देखा.

जगरूप के बताए अनुसार, उस ने अपनी जिंदगी का पहला कत्ल 22 साल की उम्र में मई 1995 में लुधियाना निवासी नंदलाल का किया था. नंदलाल की पत्नी जगरूप की प्रेमिका थी. नंदलाल को जब जगरूप के साथ अपनी पत्नी के संबंध होने का पता चला तो वह अपनी पत्नी को उस से संबंध तोड़ने के लिए कहने लगा. इसी बात को ले कर घर में क्लेश होने लगा था.

अपनी प्रेमिका के माध्यम से जगरूप को जब नंदलाल के क्लेश करने का पता चला तो उस ने बड़ी बेरहमी से उस की हत्या करने के बाद उस की लाश के कई टुकड़े कर दिए और चेहरे पर ईंटें मारमार कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया. जगरूप के आत्मसमर्पण करने से पहले बीते 23 सालों में भी लुधियाना पुलिस नंदलाल की हत्या की गुत्थी को नहीं सुलझा पाई थी.

इस बीच नंदलाल की हत्या के बाद पुलिस को या किसी अन्य व्यक्ति को उस के कार्यकलापों पर संदेह न हो, इस के लिए दिखावे के तौर पर जगरूप ने औटोरिक्शा चलाना शुरू कर दिया था. पर उस का असली धंधा वही रहा.

नाजायज संबंधों के चलते साल 1995 से अब तक 7 कत्ल करने वाला सीरियल किलर ऐश और आराम की जिंदगी जीने के लिए लड़कियों से गलत काम करवाता रहा. जगरूप के पकड़े जाने से कई ब्लाइंड मर्डर केस जो पुलिस की फाइलों में बंद हो चुके थे, खुल गए.

जगरूप ने अब तक लुधियाना और पटियाला में 7 हत्याएं करने का अपराध स्वीकार कर लिया. एसपी (डी) हरविंदर सिंह विर्क के सामने जगरूप ने यह भी स्वीकार किया कि वह 2 कत्ल के केसों में 4-5 साल तक जेल में भी रहा है. पुलिस जगरूप के इस बयान की जांच करेगी कि वह किनकिन केसों में जेल गया था, गया भी था या नहीं.

इस के अलावा पुलिस इस बात की भी जांच करेगी कि इन 7 हत्याओं के अतिरिक्त उस ने और कितनी हत्याएं की हैं. इन केसों के बारे में फिलहाल जानकारी जुटाई जा रही है. पुलिस के मुताबिक जगरूप सिंह महिलाओं के साथ संबंध बनाने के लिए उतावला रहता था.

उस का शिकार अधिकतर खूबसूरत विधवा या तलाकशुदा महिलाएं ही बनती थीं. अपने शिकार को जाल में फांसने के बाद वह धीरेधीरे उसे हलाल कर के अय्याशी के लिए रकम जुटाता था.

अब तक जगरूप ने कितनी महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बना कर उन्हें देहव्यापार के धंधे में झोंका, पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है. हालांकि जगरूप को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया है, फिर भी समयसमय पर पुलिस पूछताछ के लिए उस का रिमांड ले कर वास्तविकता तक पहुंचने का प्रयास कर रही है.

अब तक की गई पूछताछ से यह बात सामने आई कि आरोपी पहले महिलाओं को अपने प्रेमजाल में फंसाता था और फिर जबरदस्ती उन से धंधा करवा कर पैसे बनाता था. अगर कोई उस के बीच में आता था, तो वह उसे बड़ी बेरहमी के साथ मार देता था. अब तक उस ने जितने भी लोगों को मौत के घाट उतारा था, सभी हत्याएं उस ने बड़ी निर्ममता के साथ की थीं.

फीफा की शादी में फूफा दीवाना

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना होने का शौक सदियों से अशिक्षा और बेरोजगारी की तरह चारपहिया गाड़ी में सवार हो कर हमारा पीछा कर रहा है क्योंकि इस शौक को भी मालूम है कि हम इस के परमानैंट ग्राहक हैं जो कभी भी मोलभाव के लिए शौक की बलि और रिमांड नहीं लेते हैं.

वैसे तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनने का शौक 24 घंटे, सातों दिन अपनी सेवाएं देता है लेकिन फुटबाल वर्ल्ड कप के दौरान तो यह शौक ऐक्स्ट्रा लार्ज पैग लगा कर किसी महफिल में बैठने का फील लाता है.

फुटबाल वर्ल्ड कप के महासमर में समर (गरमी) के दौरान बेगानी शादी में अब्दुल्लाओं की तादाद लू की तरह जानलेवा हो जाती है.

हौकी में देश का नाम ध्यानचंद ने रोशन किया था लेकिन फुटबाल में हमारा नाम एलईडी लगा कर रायचंद रोशन कर रहे हैं.

हौकी में भारत के पास केवल एक ही ध्यानचंद था लेकिन फुटबाल में रायचंदों का बंपर प्रोडक्शन होता है. फुटबाल वर्ल्ड कप के दौरान ये हर जगह भिनभिनाते हुए नजर आते हैं.

फीफा वर्ल्ड कप में इन रायचंदों का रोल एक उम्रदराज फूफा का होता है. इन्हें भले ही फीफा का पूरा नाम न पता हो लेकिन अपने फेवरेट खिलाड़ी की जर्सी का नंबर और उस की हाफपैंट का नाप इन के दिमाग के सब से महफूज कोने में सेव रहता है.

ये रायचंद हर मैच के पहले ही उस के नतीजे के बारे में अपने अनुमानों के पत्थर सभ्य समाज पर फेंकते हैं जिस से बचने के लिए आम फुटबाल प्रेमी को उदासीनता का हैलमैट पहन कर चलना पड़ता है.

इन रायचंदों ने भले ही खुद कभी फुटबाल को पैर न लगाया हो लेकिन अपनी पसंदीदा टीम और उस के खिलाडि़यों को हमेशा दिल से लगाए रहते हैं. किसी भी टीम की हारजीत के पूर्वानुमान के साथसाथ नतीजे का पूरा विश्लेषण भी इन के पास वाजिब कीमत और दिलकश पैकिंग में मुहैया होता है.

रायचंदों की बातें भले ही इन की अधकचरी जानकारी की मीठी आवाज में चुगली करती हों, लेकिन इन के खुद पर भरोसे से लगता है मानो ये महान फुटबाल खिलाड़ी पेले के साथ खेले हों.

फुटबाल वर्ल्ड कप से हमारी दूर की रिश्तेदारी है क्योंकि किलोमीटर और औकात के हिसाब से यह अभी भी हमारी पहुंच से बहुत दूर है.

दूर की रिश्तेदारी होने के चलते कई सालों से हम इस में क्वालीफाई करने के लिए जद्दोजेहद करने की ऐक्टिंग करने में कामयाब हो पा रहे हैं. फुटबाल वर्ल्ड कप में भाग लेने के बजाय हम दूर से ही ‘भाग’ लेते हैं.

फुटबाल वर्ल्ड कप में हम भले ही क्वालीफाई न कर पाते हों लेकिन वर्ल्ड कप पर पौष्टिक चटकारे लेने के लिए क्वालीफाई करने से हमें कोई नहीं रोक सकता.

फुटबाल में हमारे पिछड़ने की अहम वजह यह है कि इस में रैड कार्ड और यैलो कार्ड दिखाए जाते हैं जबकि हमारी सरकार ने फिलहाल आधारकार्ड के अलावा और कोई भी कार्ड छूने या देखने को अपराध घोषित कर रखा है.

फुटबाल में हम इसलिए भी तरक्की हजम नहीं कर पाए, क्योंकि फुटबाल में गोल करने के लिए केवल 90 मिनट का समय होता है लेकिन हम तो गोल करने के लिए शुरू से ही पंचवर्षीय योजनाओं के आदी रहे हैं.

हम ने अपने कमिटमैंट को पुरुषों और महिलाओं दोनों के वर्ल्ड कप में क्वालीफाई न कर के किसी भी तरह के लिंगभेद से मुक्त रखा है.

हम ने दुनिया को संदेश देने की कोशिश की है कि केवल पुरुष या केवल महिला वर्ल्ड कप में खेलने के लिए हम लिंगभेद की नीति नहीं अपना सकते हैं, हमें लिंगभेद केवल जनसंख्या अनुपात में ही स्वादिष्ठ लगता है ताकि हम ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ जैसे आंदोलन चला कर अपनी सामाजिक जागरूकता को उचित मंच और फंड दे सकें.

फुटबाल के बारे में हमारी सोच डकवर्थलुईस नियम की तरह बिलकुल साफ है. हम नहीं चाहते कि फुटबाल भी हौकीगति को प्राप्त हो इसलिए हम फुटबाल को लोकप्रिय बनाने के लिए कोशिश का पेचकश नहीं कसते हैं.

अगर फुटबाल का खेल भी हौकी की तरह लोकप्रियता के हत्थे चढ़ गया तो फिर हौकी और फुटबाल दोनों अच्छा हौलिडे पैकेज ले कर गड्ढे में लंबी छुट्टियां मनाएंगे और दोनों को गड्ढे से निकालने के लिए खेल संघों के अध्यक्षों और दूसरे पदाधिकारियों को खेल बजट बढ़ा कर खिलाडि़यों के साथ विदेशी दौरों पर कहांकहां शौपिंग कर बजट का खात्मा करें, इस की चिंता करनी पड़ेगी जिस से उन के डिप्रैशन में चले जाने का खतरा है.

खिलाड़ी तो आतेजाते रहते हैं, लेकिन खेल संघों के अध्यक्ष और पदाधिकारी ही खेल की असली निधि हैं, इसलिए भारत जैसा विकासशील देश उन को डिप्रैशन का मेहमान बनने को मजबूर नहीं कर सकता?है.

हमारे राष्ट्रीय चिंतन बजट का अच्छाखासा हिस्सा हौकी की फिक्र के लिए आवंटित होता है. अगर हम ने फुटबाल की बुरी लत भी लगा ली तो पहले से ही घाटे में चल रहा हमारा राष्ट्रीय चिंतन किसानों की तरह खुदकुशी कर लेगा और चिंतन की खेती करने के बजाय हमें चिंतन विदेशों से मंगवाना पड़ेगा, इसीलिए अभी तक फुटबाल को हम ने राष्ट्रीय चिंतन के वाईफाई के नैटवर्क में आने से बैन कर रखा है.

यही दूर की सोच हमारे खेल चिंतन की बत्ती को हमेशा सुलगाए रखती है जिस में अच्छे नतीजों के भस्म होने की पूरी उम्मीदों के साथ चिंतन की निरंतरता बनी रहती है.

विधानसभा चुनाव : बिछ गई बिसात, सज गए मोहरे

इस साल के आखिर में 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान  में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को ले कर भारतीय जनता पार्टी ने अपना एजेंडा और रुख साफ कर दिया है कि वह अब मंदिर, मठों, आश्रमों और बाबाओं की जगह किसानों को फोकस करते हुए चुनावी जंग में कूदेगी. यह उस की दिली इच्छा नहीं, जबरन करना पड़ रहा है.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने 14 जुलाई, 2018 को मध्य प्रदेश के धार्मिक शहर उज्जैन से कहा था कि इस बार भी राज्य में शिवराज सिंह चौहान की अगुआई में भाजपा की सरकार बनेगी क्योंकि वे किसान के बेटे हैं. उन्होंने किसानी कब की पता नहीं क्योंकि तसवीरों में तो वे पूजन करते नजर आते हैं.

इसी वजह से शिवराज सिंह चौहान ने बिना नाम लिए कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन को यह ज्ञान नहीं है कि प्याज कैसे पैदा होता है और वे किसान हितों की बात कर रहे हैं.

भाषणों में उन्होंने यह बारबार कहा कि अब राज्य में कहीं किसानों की फसलें बिजली की वजह से नहीं सूखतीं.

मध्य प्रदेश के ही पिछड़े जिले राजगढ़ में 23 जून, 2018 को दिए गए नरेंद्र मोदी के भाषण में यही कहा गया था.

भाजपा की कोशिश यह है कि भाषणों के जरीए जनता को यह अहसास कराया जाए कि गांधी खानदान की वजह से पिछले 4 सालों में उस का भला नहीं हो पाया.

घर फूंक कर तमाशा

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रोज कोई न कोई घोषणा हर किसी के लिए कर रहे हैं. तकरीबन ढाई लाख शिक्षकों को शिक्षा विभाग में मिलाने की मांग उन्होंने पूरी की पर नाराज हड़ताली शिक्षक कोई खास खुश नहीं हुए. देरी से लिए गए इस फैसले से सरकारी खजाने पर 2,000 करोड़ से भी ज्यादा का बोझ पड़ा.

सातवें वेतनमान से भी खजाने पर बोझ और बढ़ा है. जन कल्याण वाली प्रचारित की जा रही संबल योजना से भी 2,500 करोड़ रुपए का भार खाली खजाने पर पड़ा है. इस लोकलुभावनी योजना के स्मार्टकार्ड पर ही 18 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं. राज्य के 1 करोड़, 80 लाख मजदूरों का रजिस्ट्रेशन सरकार कर रही है.

इस योजना के तहत सरकार कोई 88 लाख परिवारों का बिजली का बिल भरेगी. चुनावी साल में राज्य की हालत घर फूंक कर तमाशा देखने जैसी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है.

हालत यह है कि गले तक कर्ज में डूबी राज्य सरकार सालाना 12,000 करोड़ रुपए ब्याज के ही चुका रही है. डर तो इस बात का है कि जल्द ही उसे मुलाजिमों को पगार देने के लाले न पड़ जाएं.

छात्रों को खुश करने के लिए लाखों लैपटौप बांटे जा रहे हैं. बेरोजगारों को झांसा दिया जा रहा है कि जल्द ही लाखों नौकरियां दी जाएंगी और इस बाबत अगस्त के महीने में रोजगार मेले लगाए जाएंगे.

निशाने पर किसान

मध्य प्रदेश की साढ़े 8 करोड़ की आबादी में किसानों की तादाद साढ़े 5 करोड़ है और 230 विधानसभा सीटों में से 170 सीटों पर किसानों के वोट ही सरकार बनाने में अहम रोल निभाते हैं.

साल 2017 के जून के महीने में मंदसौर में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थीं जिस में 6 किसान मारे गए थे. तब शिवराज सिंह चौहान की किसान पुत्र वाली इमेज के चिथड़े उड़ गए थे. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिक्कतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. किसानों को खुश करने के लिए उन्होंने भावांतर योजना शुरू की जिस का अंजाम आम सरकारी योजनाओं सरीखा ही हुआ.

इस योजना के तहत इंतजाम ये किए गए थे कि किसानों की फसल की वास्तविक कीमत और समर्थन मूल्य में जो फर्क है वह सीधे किसानों के बैंक खाते में जमा हो जाएगा.

एक अंदाजे के मुताबिक, अकेले प्याज की खरीद में सरकार को लगभग 700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. प्याज के साथ दूसरी फसलों सोयाबीन और मूंग पैदा करने वाले किसानों का भी हाल जुदा नहीं रहा जो आज तक भुगतान की राह ताक रहे हैं.

इन घोषणाओं की पोल भी हफ्तेभर में खुलने लगी जब राज्य में हर तरफ से ये शिकायतें आने लगीं कि बिजली कंपनियों के मुलाजिम बिल काफी और चोरी के मुकदमे वापस लेने के बाबत घूस मांगने लगे हैं.

आदिवासी बाहुल्य जिले बैतूल और विदिशा के सिरोंज इलाके में किसानों ने इस बाबत हंगामा मचाया तो देखते ही देखते पूरे राज्य के किसान कहने लगे कि क्या फायदा ऐसी घोषणाओं से जिन में घूस देनी पड़े.

भोपाल के नजदीक सीहोर के एक किसान पर्वत सिंह राठौर का कहना है कि ऐसी घोषणाएं महज सियासी और किसानों को बेवकूफ बनाने वाली साबित होती हैं जिन में किसानों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए मुलाजिमों और अफसरों की जीहुजूरी करने के लिए मजबूर किया जाता है.

यही हाल सूखा राहत और फसल प्रोत्साहन राशि योजना का हुआ था जिन का हंगामा कुछ इस तरह मचाया गया था कि अब बस किसानों के दिन फिरने ही वाले हैं.

लेकिन विदिशा के एक युवा किसान रामचंद्र दांगी का कहना है, ‘‘मामा शिवराज सिंह ने किसानों का मजाक बना कर रख दिया है. हर दफ्तर में किसानों को साहबों के आगे एडि़यां रगड़नी पड़ती हैं. इस के बाद भी न तो काम होते हैं और न ही योजनाओं का फायदा मिलता है.’’

किसानों पर सियासत को ले कर भोपाल के एक जागरूक किसान संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि राज्य सरकार जब कर्मचारियों के लिए घोषणा करती है तो उस पर अमल भी तुरंत होता है.

हाल ही में कर्मचारियों की रिटायरमैंट उम्र 2 साल बढ़ाई गई तो उन्हें 20 से 50 लाख रुपए का सीधा फायदा हुआ. उन का महंगाई भत्ता बढ़ता है तो वेतन दूसरे महीने से ही बढ़ जाता है, लेकिन किसानों को कभी कोई सीधा फायदा नहीं होता.

मंदसौर गोलीकांड की गूंज देशभर में सुनाई दी थी जिस की पहली बरसी को ले कर मुख्यमंत्री इतने डरे हुए थे कि राहुल गांधी के पहुंचने के 2 दिन पहले ही वहां डेरा डाले पड़े रहे थे.

राहुल गांधी आए और पीडि़त परिवारों के लोगों से गले मिल कर चले गए लेकिन खासी आफत भाजपा के लिए खड़ी कर गए क्योंकि मुद्दा जज्बाती था.

राहुल गांधी का मंदसौर आना माने न रखता लेकिन इस गोलीकांड की जांच के लिए बनाए गए आयोग ने जब पुलिस को क्लीन चिट दे दी कि गोलियां उस ने नहीं चलाई थीं तो हर कोई हैरत में पड़ गया कि आखिर फिर किस ने किसानों की हत्या की थी. यह बात तो आयोग को उजागर करनी चाहिए थी.

ऐसे में खरगौन के एक युवा किसान विजय महाजन का यह कहना माने रखता है कि हमें इस से क्या मतलब कि गांधी परिवार ने हमारा कैसे और क्या नुकसान किया, हमें तो इस बात का जवाब चाहिए कि भाजपा और शिवराज सिंह चौहान ने हमारे लिए 15 सालों में ऐसा क्या कर दिया जिस के चलते हम उन्हें वोट दें?

पिछड़ रहे रमन सिंह

चुनावी तैयारियों में जुट गए रमन सिंह ने मईजून की चिलचिलाती गरमी में विकास यात्रा टुकड़ोंटुकड़ों में निकाली थी. इस विकास यात्रा की खास बात यह थी कि जिस रथनुमा बस में रमन सिंह सवार थे उस में ऐशोआराम की तमाम सहूलियतें थीं.

राज्य के हर कोने में पहुंचे रमन सिंह कुछ देर के लिए बस से नीचे उतरे और भाषण दे कर चलते बने. हर विकास यात्रा में भाजपा कार्यकर्ता ज्यादा नजर आए आम लोग नदारद रहे.

विकास यात्रा के दौरान रमन सिंह ने कोई 5,000 करोड़ की योजनाओं का ऐलान किया जिन का कहीं अतापता नहीं है. इस से रमन सिंह या तो हताश हो चुके हैं या फिर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से लबरेज हैं. उन्हें व्यापारियों के अलावा किसी तबके की फिक्र  नहीं है. उन से खफा ढाई लाख सरकारी मुलाजिमों ने 27 जून, 2018 को हड़ताल की थी तब रमन सिंह को झटका लगा था कि कर्मचारी भी उन से काफी खफा हैं.

इन हड़ताली मुलाजिमों का आरोप यह था कि भाजपा ने साल 2013 में जो वादे किए थे वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं.

90 विधानसभा सीटों वाले आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ की ढाई करोड़ की आबादी में से तकरीबन डेढ़ करोड़ हिस्सा किसान परिवारों का है जो सीधे 60 विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं.

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर किसान आदिवासी हैं जिन के रकबे भी छोटेछोटे हैं. राज्य के किसानों का शोषण किसी सुबूत का मुहताज नहीं जिन की हिफाजत और हक की रखवाली का दम नक्सली भरते रहते हैं. यह दीगर बात है कि चुनावों में नक्सली न तो काई दिलचस्पी लेते हैं और न ही दखल देते हैं.

रमन सिंह खुद भी किसान परिवार से हैं लेकिन किसानों की जमीनी परेशानियां समझते हैं, इस में शक है.

दूसरे राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ के किसानों को लुभाने के लिए भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ रही है. उन्हें जीरो फीसदी ब्याज पर कर्ज दिया जा रहा है. रियायती दरों पर खेतीकिसानी की मशीनें मुहैया कराई जा रही हैं और सस्ती बिजली दी जा रही है.

किसानों से धोखे के लिए बदनाम हो चले रमन सिंह ने गांव, गरीब और किसान का विकास का वादा किया था और 2013 के चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने धान का समर्थन मूल्य 2,100 रुपए प्रति क्विंटल करने की बात कही थी जिस का कहीं अतापता नहीं होने से किसानों में नाराजगी फैलने लगी है.

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक कृषि विस्तार अधिकारी की मानें तो बात हैरत की है कि कृषि लागत और मूल्य आयोग की रायपुर में हुई अहम बैठक में जहां बिहार ने धान का समर्थन मूल्य 2,400 रुपए और ओडिशा ने 2,970 रुपए क्विंटल मांगा वहीं छत्तीसगढ़ सरकार जाने क्यों 2,250 रुपए पर अटक गई, जबकि धान की खेती की लागत सभी राज्यों में लगभग बराबर 2,075 रुपए प्रति क्विंटल आती है.

इस साल भले ही बारिश अच्छी हो रही हो लेकिन राज्य के 27 में से 21 जिले सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं. सूखे से निबटने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से लगभग 4,400 करोड़ की राशि मांगी थी लेकिन मिली सिर्फ 395 करोड़ के लगभग और उसे भी अभी तक पूरी तरह किसानों में बांटा नहीं जा सका है.

खेती को मुनाफे का धंधा बनाने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह जैसे तमाम नेता लगातार खेती को नुकसान का धंधा बना रहे हैं. इस पर भी सीनाजोरी यह कि हम ही किसानों के हमदर्द हैं इसलिए उन के वोटों पर हमारा ही हक है. अब यह तो किसान खुद तय करेगा कि उसे किस को वोट देना है.

दिल्ली सरकार के अधिकार

संवैधानिक अधिकारों के नाम पर केंद्र सरकार दिल्ली के उपराज्यपाल का अनुचित प्रयोग कर के अरविंद केजरीवाल की सरकार को उस दिन से तंग कर रही थी जिस दिन से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, मई 2014 के आम चुनावों के बाद हुए दिल्ली के चुनावों में 70 में से 67 सीटें पा कर विधानसभा में काबिज हो गई थी. लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केजरीवाल की जीत कहीं गहरे खा गई. उन्होंने संविधान में उपराज्यपाल को मात्र निगरानी के लिए दिए गए अधिकारों का दुरुपयोग करा कर उपराज्यपाल को चौकीदार से मालिक बना दिया था.

यह भगवा सोच का पुराना तरीका था. हमारा पौराणिक इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जहां सत्ता पर पंडित या गुरुओं का इतना अधिक कंट्रोल होता था कि राजा असहाय रह जाता था. नरेंद्र मोदी उन्हीं पौराणिक गुरुओं की तरह उपराज्यपाल अनिल बैजल के माध्यम से दिल्ली सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर रहे थे ताकि अरविंद केजरीवाल खुद भारतीय जनता पार्टी के चरणों में झुक जाएं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सही व्याख्या करते हुए नरेंद्र मोदी और अनिल बैजल के पर अब कुतर डाले हैं.

अरविंद केजरीवाल कुशल प्रशासक हैं या कुशल ऐक्टिविस्ट, कहना कठिन है पर दिल्ली का शासन, जो अरविंद केजरीवाल के हाथों में आया है, खासा ठीक चला है. लोगों को जो शिकायतें हैं वे उन के काम के तरीकों से हैं, काम से नहीं. महल्ला क्लिनिक, राशन, शिक्षा आदि के मामलों में अरविंद केजरीवाल की नीतियां लीक से हट कर रही हैं और लोगों को उन से शिकायत नहीं है. इसीलिए वे विधानसभा उपचुनाव जीतते रहे, चाहे नगर निगम पर कब्जा न कर पाए हों.

राजनीति में अरविंद केजरीवाल की आप जैसी छोटी पार्टियों के होने से बहुत फायदे होते हैं क्योंकि इन से बड़ी पार्टियों पर अंकुश बना रहता है, उन का अहंकार टूटता रहता है. अखिल भारतीय बड़ी पार्टियों को शहरों की गलियों और आम लोगों की कठिनाइयों का एहसास नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की सरकार को अधिकार दे कर देश में लोकतंत्र को बचाने का सही कदम उठाया है. उम्मीद करें कि नरेंद्र मोदी अब कोई और बहाना न बनाएं.

क्या आपने देखा रानी चटर्जी का यह वीडियो

क्‍वीन औफ भोजपुरी रानी चटर्जी के वीडियो आए दिन इंटरनेट पर वायरल होते रहते हैं. इंटरनेट पर उनके वीडियो को इतना पसंद किया जाता है कि यूट्यूब पर रानी के वीडियो अपलोड होते ही लाखों व्यूज आने में जरा भी वक्त नहीं लगता. इन दिनों रानी का एक और वीडियो काफी वायरल हो रहा है. यह वीडियो उनकी फिल्म ‘नागिन’ के एक गाने ‘ससुरा में पूछी न भतार मोटाई पर’ का है, जिसमें वह जबरद्सत डांस करती हुई नजर आ रही हैं. पिछले साल यूट्यूब पर रिलीज हुए इस गाने को अब तक 11,393,428 बार देखा जा चुका है. इस फिल्म में रानी के साथ भोजपुरी के सुपरस्टार खेसारीलाल यादव लीड रोल में थे.

हिट हुई थी रानी की यह फिल्म

हाल ही में रानी चटर्जी और अभिनेता-निर्माता रोहित राज यादव व गुंजन पंत की फिल्‍म ‘ये इश्‍क बड़ा बेदर्दी है’ को काफी अच्‍छा रेस्‍पौन्स मिला. इस फिल्‍म ने भोजपुरी बौक्स औफिस पर भी अच्छा बिजनेस करने में सफल रही. इस फिल्‍म की पटकथा काफी बेहतरीन थी और इसका देशी टच दर्शकों को सिनेमाघरों की ओर खींचने में भी सफल रहा. बता दें, इस फिल्म की शूटिंग दमन, मुंबई, पटना और बिहटा के अलग–अलग खूबसूरत लोकेसंस पर की गई थी. फिल्‍म के निर्माता बीएन यादव व शिवजी सिंह और निर्देशक राम यादव थे. फिल्‍म के गाने का निर्देशन रंजय बाबला ने किया था और कहानी रामचंद्र सिंह ने लिखी थी.

इस फिल्म में नजर आने वाली हैं रानी

अब रानी चटर्जी अपनी नई भोजपुरी फिल्‍म ‘जीरो बनल हीरो’ में नजर आने वाली हैं, इस फिल्म की शूटिंग भी आगरा में पूरी हो चुकी है. इस फिल्म के निर्माता सत्‍येंद्र शुक्‍ला हैं. निर्देशक दीपक त्रिपाठी हैं. प्रचारक संजय भूषण पटियाला हैं. फिल्‍म में रानी चटर्जी के अलावा रजनीकांत संजय पांडेय, आदित्य मोहन, भावना सिंह चौहान, अनूप अरोरा, समर्थ चतुर्वेदी, सोनू पांडेय, नगीन वाडिल, बीआर शाहु, ग्लोरी मोहन्ता, सुधाकर मिश्रा, शुशील कुमार आदि मुख्‍य भूमिकाओं में नजर आने वाले हैं. फिल्‍म के संगीतकार धनंजय मिश्रा हैं. गीतकार प्‍यारे लाल और आजाद सिंह है. लेखक मनोज पांडेय, एक्‍शन प्रदीप खड़के, नृत्‍य निर्देशक महेश आचार्य व विजय राम और डीओपी शिवा चौधरी हैं.

वीडियो : देखें आम्रपाली दुबे का हौट बैली डांस

भोजपुरी सिनेमा की क्वीन आम्रपाली दुबे हर बार किसी न किसी कारण के चलते सुर्खियों में आ ही जाती हैं. वह जितनी गजब एक्टिंग करती हैं उतने ही शानदार तरीके से डांस भी करती हैं. इस बार उन्होंने नए धमाके साथ सोशल मीडिया पर एंट्री मारी हैं. हाल ही में आम्रपाली का एक गाने आम्रपाली तोहार खातिर का वीडियो वायरल हो रहा है. इस गाने में आम्रपाली ने इतना शानदार डांस किया है कि लोग खुद को इस पर डांस करने से रोक नहीं पा रहे हैं.

यह आम्रपाली की फिल्म लव के लिए कुछ भी करेगा का प्रोमोशनल सौन्ग है, जो इस समय सोशल मीडिया पर धूम मचा रहा है. इस गाने में आम्रपाली दुबे ने जबरदस्त डांस किया है. सबसे दिलचस्प बात है कि गाने में आम्रपाली का बैली डांस देखने को मिल रहा है. इस गाने को इंदु सोनाली और अमुज तिवारी ने आवाज दी है जबकि इसके बोल यादव राज और म्यूजिक अनुज तिवारी ने दिया है.

बता दें, आम्रपाली को भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में करीब 4 साल हो चुके हैं और आज वह सभी की फेवरेट एक्ट्रेस हैं. इससे पहले आम्रपाली ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सलमान खान की फिल्म के गाने ‘स्वैग से करेंगे सबका स्वागत’ पर डांस कर उसका वीडियो पोस्ट किया था. आम्रपाली के जबरदस्त डांस मूव ने फैंस के होश उड़ा दिए थे.

फिल्‍म ‘लव के लिए कुछ भी करेगा’ में विशाल सिंह, माही खान, नीलू सिंह, सूर्या शर्मा, स्नेहा मिश्रा जैसे कई कलाकार नजर आने वाले हैं. आम्रपाली जल्‍द ही भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्‍टार दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ के साथ फिल्‍म ‘महाबली’ में नजर आने वाली हैं.

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