शनि के उपासक दाती महाराज पर शनि की कुदृष्टि

दिल्ली में छतरपुर स्थित शनिधाम मंदिर के संस्थापक मदनलाल मेघवाल उर्फ दाती महाराज उर्फ मदनलाल राजस्थानी एक युवती के यौनशोषण के आरोपों से घिरे

हुए हैं. टीवी चैनलों पर ‘शनि शत्रु नहीं मित्र’ का स्लोगन दे कर पिछले करीब 15 साल से ज्यादा समय से दिल्ली ही नहीं पूरे देश में अपने आभामंडल का प्रभाव फैला कर ख्याति पाने वाले दाती महाराज के खिलाफ एक युवती ने जून के पहले सप्ताह में दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस थाने में शिकायत दी. इस शिकायत का मजमून इस प्रकार था—

मदनलाल राजस्थानी ने अपने सहयोगियों श्रद्धा उर्फ नीतू, अशोक, अर्जुन आदि के साथ मिल कर 9 जनवरी, 2016 को दिल्ली स्थित आश्रम श्री शनि तीर्थ असोला फतेहपुर बेरी में मेरे साथ दुष्कर्म किया. यह तब हुआ, जब मुझे श्रद्धा उर्फ नीतू ‘चरण सेवा’ के लिए दाती मदनलाल राजस्थानी के पास ले गई. मैं चीखती रही, लेकिन किसी ने मेरी आवाज नहीं सुनी.

इस के बाद 26 से 28 मार्च, 2016 तक राजस्थान के पाली जिले में सोजत शहर स्थित आश्रम में दाती महाराज ने फिर मुझ से वही सब किया, जो दिल्ली के आश्रम में किया था. इस में अनिल और श्रद्धा ने दाती महाराज का साथ दिया. इन 3 दिनों में अनिल ने भी वही सब किया. चरण सेवा के नाम पर इन लोगों ने मेरे शरीर को जानवरों की तरह रौंदा.

इस घृणित कार्य के दौरान श्रद्धा ने कहा कि इस से तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा, यह भी सेवा ही है. तुम बाबा की हो और बाबा तुम्हारे. तुम कोई नया काम नहीं कर रही हो, सब करते आए हैं. कल हमारी बारी थी, आज तुम्हारी बारी है. कल न जाने किस की बारी होगी, बाबा समंदर है और हम सब उस की मछलियां हैं. इसे कर्ज समझ कर चुका दो.

ये 3 रातें मेरी जिंदगी की सब से भयानक रातें थीं. इन 3 रातों में मेरे साथ न जाने कितनी बार दुष्कर्म किया गया. यह सब करते हुए दाती महाराज ने एक बात कही, ‘‘तुम्हारी सेवा पूरी हुई.’’

इस घटना के बाद मेरी सोचनेसमझने की शक्ति जैसे खत्म हो गई थी. घुटघुट कर जीने से अच्छा है कि एक बार लड़ कर मरूं ताकि इस राक्षस की सच्चाई सब के सामने ला सकूं. न जाने कितनी ही लड़कियां यहां मेरी तरह बेबस और लाचार हैं.

मुझे नहीं पता कि इस शिकायत के बाद मेरा क्या होगा. शायद मैं आप लोगों के बीच न रहूं, पर मेरी पुकार आप सभी के बीच रहेगी. सिर्फ इसी उम्मीद के सहारे ये पत्र लिख रही हूं. शायद मुझे न्याय मिले और दूसरी लड़कियों की जिंदगियां बरबाद होने से बच सके. दाती महाराज को जीने का अधिकार नहीं है.

मेरी एक ही इच्छा है कि इस के कर्मों की सजा फांसी होनी चाहिए. आप से प्रार्थना है कि मेरा नाम, मेरी पहचान और मेरा पता गुप्त रखा जाए. वरना उस के द्वारा दी गई धमकियां ‘न तू रहेगी न तेरा अस्तित्व’ सच हो जाएगी. इन्हीं धमकियों की वजह से आज तक मैं चुप रही.

मुझे और मेरे परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए. अगर मुझे सुरक्षा नहीं दी गई तो यह तय है कि न मैं रहूंगी और न मेरा परिवार. सब खत्म हो जाएगा. दाती महाराज बहुत खतरनाक आदमी है. अब तक इसलिए चुप रही कि मुझे नहीं लगता था कि मेरा कोई साथ देगा लेकिन अब बरदाश्त के बाहर हो गया तो इस बारे में अपने मम्मीपापा को बताया. उन्होंने वचन दिया कि आखिरी सांस तक तुम्हारा साथ देंगे.

दाती महाराज के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा

युवती की इस शिकायत पर दिल्ली के फतेहपुर बेरी पुलिस थाने में 10 जून, 2018 को दाती महाराज उर्फ मदनलाल राजस्थानी और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस में दुष्कर्म की धारा 376, अप्राकृतिक संबंध की धारा 377, छेड़छाड़ की धारा 354 और धमकी देने की धारा 506 लगाई गई.

पुलिस ने इस मामले में दाती महाराज के अलावा 2 महिलाओं और 2 पुरुषों को नामजद किया. इन में एक महिला श्रद्धा उर्फ नीतू और दूसरी नीमा जोशी शामिल थीं. 2 पुरुष दाती महाराज के भाई हैं.

आमतौर पर टीवी चैनलों पर छाए रहने वाले और दिल्ली के फतेहपुर बेरी स्थित शनिधाम मंदिर के संस्थापक दाती महाराज कौन हैं, यह जानने के लिए हमें राजस्थान से शुरुआत करनी होगी.

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दाती महाराज का असली नाम मदनलाल मेघवाल है. मदनलाल का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिले के आलावास गांव में हुआ था. उस के पिता देवाराम मेघवाल ढोलक बजाने का काम करते थे. मदनलाल के जन्म के कुछ महीने बाद ही उस की मां का निधन हो गया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. इस के बाद गांव के एक आदमी के साथ मदनलाल दिल्ली आ गया था.

दिल्ली में उस ने कई दिनों तक दिहाड़ी मजदूरी की. फिर चाय की दुकानों पर छोटामोटा काम किया. इस के बाद वह टेंट की दुकान पर काम करने लगा. अपना खुद का काम करने के लिए उस ने कैटरिंग का काम सीखा और बर्थडे एवं छोटीमोटी अन्य पार्टियों में कैटरिंग करने लगा.

1996 में मदन की मुलाकात राजस्थान के एक ज्योतिषी से हुई. उस ज्योतिषी से उस ने जन्मपत्री और कुंडली वगैरह देखना सीख ली. इस के बाद मदनलाल ने कैटरिंग का काम छोड़ कर दिल्ली की कैलाश कालोनी में ज्योतिष केंद्र खोल लिया. साथ ही उस ने अपना नाम मदनलाल से बदल कर दाती महाराज कर लिया. उस ने अपना हुलिया और चोला भी बदल लिया था.

मदनलाल ने लोगों की कमजोर नस पकड़ी और अपना ज्योतिष ज्ञान शनि ग्रह के आसपास कें्रदित रखा. ऐसा इसलिए कि धर्मभीरु लोग सब से ज्यादा शनि से ही घबराते हैं. दाती महाराज लोगों की जन्मपत्री देख कर शनि की चाल का खौफ दिखाने लगा. साथ ही शनि के खौफ से बचने के ऐसे उपाय भी बताने लगा, जिस से उसे लाभ हो.

सन 1998 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने थे. इस दौरान एक नेता की जन्मपत्री देख कर दाती ने कह दिया कि वह चुनाव जीत जाएगा. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि वह नेता चुनाव जीत गया. इस खुशी में उस नेता ने फतेहपुर बेरी के अपने पुश्तैनी मंदिर का काम दाती मदनलाल को सौंप दिया.

बस फिर क्या था दाती महाराज के सितारे चमक उठे. वह राजनीतिक और कई तरह की भविष्यवाणी करने लगा. संयोग ऐसा रहा कि उन में से कुछ भविष्यवाणियां सच हो गईं. इस से दाती महाराज चर्चा में रहने लगा और उस की पूछ बढ़ गई.

न्यूज चैनलों के माध्यम से टीवी तक पहुंचे दाती महाराज

इस बीच दाती महाराज ने फतेहपुर बेरी में नेताजी द्वारा दिए गए मंदिर में शनिधाम मंदिर की स्थापना कर दी थी. मंदिर में आश्रम भी बना लिया था. साथ ही पाली के आलावास गांव से अपने 3 सौतेले भाइयों अशोक, अर्जुन और अनिल को भी दिल्ली बुला लिया था. आरोप है कि दाती ने अपने भाइयों व अन्य सहयोगियों के साथ मिल कर शनिधाम मंदिर के आसपास की जमीनों पर कब्जा कर लिया. दाती के सारे कामकाज, दिल्ली व पाली स्थित आश्रम, कालेज व अस्पताल का प्रबंधन तीनों सौतेले भाई देखते थे. वे ही रुपएपैसे का भी हिसाबकिताब रखते थे.

दाती महाराज के सितारे बुलंदी पर पहुंच गए तो उस ने टीवी चैनलों पर ‘शनि शत्रु नहीं मित्र है’ के नाम से कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू करवा दिया. साथ ही दाती ने खुद का यूट्यूब चैनल भी शुरू किया. टीवी कार्यक्रमों के जरिए दाती देश भर में मशहूर हो गया. वह शनि महाराज के नाम से ही पहचाना जाने लगा.

सांवला रंग, माथे पर तिलक, सिर पर लंबे बाल, चेहरे पर संवरी हुई काली दाढ़ी के बीच ठोढ़ी पर सफेद रंग और गले में रुद्राक्ष की माला, यही पहचान बनी दाती महाराज की. दाती महाराज केवल शनि ग्रह को शांत रखने के उपाय बताता था. दरअसल, ग्रहनक्षत्रों में केवल शनि ही ऐसा ग्रह है, जो सब से ज्यादा समय तक मानव जीवन को प्रभावित करता है.

मिली महामंडलेश्वर की उपाधि

कहा जाता है कि शनि के प्रभाव से इंसान रंक से राजा और राजा से रंक बन सकता है. दाती ने शनि ग्रह को भुनाने की कोशिश की और इसी के मद्देनजर अपने संस्थान का नाम शनिधाम रखा, जहां वह केवल शनि ग्रह पर ही चर्चा करता था.

सन 2010 में हरिद्वार में आयोजित महाकुंभ में श्री पंचायती महानिर्वाण अखाड़े की ओर से दाती महाराज को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई. इस के बाद उस ने अपना नाम श्रीश्री 1008 महामंडलेश्वर परमहंस दाती महाराज रख लिया. इस से पहले दाती महाराज दिल्ली के छतरपुर इलाके के फतेहपुर बेरी में शनिधाम मंदिर का निर्माण करा चुके थे.

इस मंदिर को उस ने श्री सिद्ध शक्तिपीठ शनिधाम पीठाधीश्वर नाम दिया. मंदिर में 2003 में शनिदेव की प्रतिमा स्थापित की गई. इस मंदिर में बने आश्रम में अस्पताल, गौशाला व अनाथालय भी हैं. बाद में दाती ने पाली के आलावास गांव में भी आश्रम बनवाया. इस के अलावा उन्होंने उज्जैन में भी अपने आश्रम की स्थापना की.

दुष्कर्म के मामले में जिस महिला श्रद्धा को भी आरोपी बनाया गया है, वह दिल्ली और पाली के आश्रम का कामकाज संभालती थी. ट्रस्ट में दाती महाराज के बाद दूसरे नंबर का स्थान श्रद्धा का ही था.

दाती महाराज के तमाम प्रमुख राजनेताओं और नौकरशाहों से संबंध हैं. उन्होंने कई प्रमुख नेताओं के साथ अपनी फोटो के फ्लैक्स आश्रम सहित पूरी दिल्ली में लगवा रखे थे. इन के जरिए वह अपना राजनीतिक रसूख दिखाते थे. फतेहपुर बेरी स्थित आश्रम पर शनि अमावस्या पर होने वाले कार्यक्रम में देश भर से कई प्रमुख नेता और दिग्गज हस्तियां आती थीं. बेटियों का जन्मदिन मनाने, अनाथ बेटियों की शादी करवाने और कंबल बांटने जैसे कामों से दाती महाराज ने सुर्खियां बटोरीं.

डरी हुई थी पीडि़ता

अब बात करते हैं पीडि़ता की. मूलरूप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली यह लड़की आजकल दिल्ली में अपने परिवार के साथ रहती है. उस के परिवार में मातापिता, 2 बहनें और एक भाई है. दोनों बहनों की शादी हो चुकी है.

करीब 25 साल की पीडि़ता दाती महाराज के उपदेश सुनने नियमित तौर पर उन के आश्रम जाती थी. दाती के एक सहयोगी ने उस की मुलाकात दाती से कराई. इस के बाद 2007 से 2016 तक वह सेवादार के तौर पर दाती के आश्रम में रही. उस ने दाती के आश्रम के सहयोग से अजमेर से एमसीए किया था.

बाद में वह अपने परिवार के साथ रहने लगी थी. लेकिन इस बीच उस का आश्रम में आनाजाना लगा रहा. इसी दौरान फरवरी 2016 में पहली बार दिल्ली के शनि मंदिर में उस से दुष्कर्म किया गया. फिर मार्च 2016 में उसे राजस्थान के पाली ले जा कर दुष्कर्म किया गया.

पीडि़ता का कहना है कि दाती महाराज ने उसे पुलिस में शिकायत नहीं करने के लिए धमकाया था. युवती ने पुलिस को बताया कि डर के मारे वह इतने समय तक चुप रही. परिवार की बदनामी का भी डर था.

पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर दाती महाराज ने कहा कि उन्हें बदनाम करने की साजिश के तहत उन के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया गया है. दाती ने दावा किया कि पीडि़ता अपनी 2 अन्य बहनों के साथ आश्रम में रहती थी. वह खुद 2 साल पहले अपनी मरजी से आश्रम छोड़ने से पहले खुद शपथपत्र दे कर गई थी.

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कुछ लोगों ने इस लड़की और उस के पिता को प्रलोभन दिया, जिस से ये लोग मुझ पर आरोप लगाने को तैयार हो गए. दाती का कहना था कि 2015 में अभिषेक नाम का आदमी शनिधाम में आता था.

उस ने सेवादारों से मेलमिलाप बढ़ाया. इस में कई लोग शामिल थे, इन्होंने पैसे का लेनदेन किया. विवाद होने पर अभिषेक ने उन्हें बताया कि उस ने सारा पैसा दाती महाराज को दिया है. दाती ने कहा कि अभिषेक ने उन्हें कोई पैसा नहीं दिया. इस के बाद उन लोगों ने यह साजिश रची.

पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर दाती महाराज गायब हो गए. वह बिना किसी को बताए दिल्ली छोड़ कर राजस्थान के पाली स्थित अपने आश्रम में चले गए.

आश्रम में पुलिस की काररवाई

इस के दूसरे दिन 11 जून को पीडि़ता ने दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल से मुलाकात कर अपनी आपबीती सुनाई. पीडि़ता से मुलाकात के बाद स्वाति ने ट्वीट कर कहा कि पीडि़ता गहरे सदमे में है. साथ ही उस की जान को खतरा भी है. इसलिए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर तत्काल उसे सुरक्षा मुहैया कराने और दाती महाराज को गिरफ्तार करने को कहा गया है. पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में पीडि़ता की मैडिकल जांच कराई.

पुलिस ने 12 जून को पीडि़ता के साकेत कोर्ट में धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराए. इस में पीडि़ता ने बताया कि 9 फरवरी, 2016 को दाती की सेवादार श्रद्धा उसे असोला स्थित शनिधाम आश्रम में चरण सेवा के लिए दाती के पास ले गई. मुझे गुफानुमा अंधेरे कमरे में सफेद रंग के कपड़े पहना कर भेजा गया. वहां दाती ने कहा, ‘मैं तुम्हारा प्रभु हूं. इधरउधर क्यों भटकना. मैं सब वासना खत्म कर दूंगा.’

फिर दाती व उस के सहयोगियों ने मेरे साथ दुष्कर्म किया. मार्च में पाली में यही कहानी दोहराई गई.

दाती महाराज ने 12 जून को विभिन्न समाचार चैनलों को मोबाइल से वीडियो बना कर भेजा और खुद पर लगे आरोपों को खारिज करते हुए पुलिस जांच में शामिल होने की बात कही. उन्होंने कहा कि वह फरार नहीं है.

इसी दिन पाली जिले के आलावास स्थित आश्रम की निदेशिका श्रद्धा ने दावा किया कि बाबा पाली स्थित आश्रम में हैं. फिलहाल पुलिस ने उन से कोई संपर्क नहीं किया है. जांच में पूरा सहयोग किया जाएगा.

मामला हाईप्रोफाइल होने के कारण दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने इस मामले की जांच 12 जून को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी. इसी के साथ पुलिस ने पीडि़ता और उस के परिवार को जान का खतरा देखते हुए सुरक्षा मुहैया करा दी.

दाती ने दावा किया कि वह फरार नहीं है

13 जून को दाती महाराज पाली जिले के आलावास स्थित श्री आश्वासन बालग्राम में दिन भर रहे. इस दौरान वह साधकों और मीडियाकर्मियों से मिलते रहे. मीडिया के समक्ष उन्होंने फिर दोहराया कि वह निर्दोष है. उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है.

दाती महाराज पर यौनशोषण का आरोप लगने के बाद पाली जिले में सोजत रोड पर स्थित आलावास आश्रम में रहने वाली 500 से ज्यादा बच्चियों के घरवाले वहां पहुंचने लगे. ये लोग अपनी बच्चियों की खैरखबर लेने आए थे.

14 जून को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सर्चवारंट ले कर असोला स्थित शनिधाम मंदिर पर छापा मारा. इस दौरान पीडि़ता भी पुलिस दल के साथ मौजूद रही. पुलिस ने पीडि़ता के साथ उस जगह की पहचान की, जहां उस से दुष्कर्म किया गया था. सर्च अभियान के दौरान क्राइम ब्रांच टीम ने मंदिर में सेवादारों सहित अन्य लोगों से पूछताछ की और सबूत जुटाए. पुलिस ने कहा कि बाबा की गिरफ्तारी को ले कर कोई जल्दबाजी नहीं है. पहली कोशिश पर्याप्त सबूत जुटाने की है, ताकि बाद में अदालत में केस कमजोर न पड़े.

दुष्कर्म के आरोपों में फंसने पर दाती के विदेश भागने की आशंका को देखते हुए 14 जून को दिल्ली पुलिस ने दाती का लुकआउट नोटिस जारी कर दिया. साथ ही सभी हवाईअड्डों को दाती के मामले की सूचना दे दी गई. एयरपोर्ट अथौरिटी से कहा गया कि दाती विदेश जाते हैं तो पहले दिल्ली पुलिस को सूचना दी जाए.

इस बीच दाती महाराज ने आलावास आश्रम से ही मीडिया से कहा कि वह 18 जून, 2018 को दिल्ली पुलिस के सामने पेश होंगे. उन्होंने कहा कि उन्हें 18 जून तक का समय दिया जाए ताकि वह गुरुकुल में रहने वाली बच्चियों के लिए आवश्यक व्यवस्था कर सकें. दूसरी ओर, दिल्ली महिला आयोग ने दाती की गिरफ्तारी न होने पर नाराजगी जताते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस दे कर जवाब मांगा.

दिल्ली के असोला स्थित शनिधाम मंदिर में क्राइम ब्रांच का सर्च अभियान 15 जून को भी चला. इस दौरान पुलिस ने कई सबूत जुटाए. मौके से डीवीआर हार्डडिस्क, पैनड्राइव आदि जब्त किए. मंदिर की तलाशी के दौरान क्राइम ब्रांच की टीम के साथ पीडि़ता भी रही, उस ने मंदिर में बने आश्रम के वे 2 कमरे पुलिस को दिखाए, जिन में उस से दुष्कर्म किया गया था.

दिल्ली के आश्रम की तलाशी का काम पूरा होने के बाद 15 जून को ही क्राइम ब्रांच की एक टीम पीडि़ता को साथ ले कर पाली के लिए रवाना हो गई. इसी के साथ दिल्ली पुलिस ने दाती महाराज को नोटिस जारी कर के पूछताछ के लिए 16 जून को दिल्ली तलब किया. हालांकि पुलिस के नोटिस पर दाती ने जांच में शामिल होने के लिए 18 जून तक का समय मांगा.

16 जून को क्राइम ब्रांच की टीम जब पाली जिले के आलावास स्थित उन के आश्रम में पहुंची तो इस से पहले ही वह वहां से फरार हो गए. उन के साथ आश्रम की संचालिका श्रद्धा और अन्य सहयोगी भी भाग गए. दाती ने अपना मोबाइल भी स्विच्ड औफ कर लिया. दूसरी ओर दिल्ली स्थित आश्रम से बाबा के भाई भी भूमिगत हो गए.

एसीपी जसवीर मलिक के नेतृत्व में पहुंची क्राइम ब्रांच टीम ने आलावास आश्रम में 3 घंटे तक जांचपड़ताल की. इस दौरान पीडि़ता भी पुलिस टीम के साथ रही. पीडि़ता ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उन 6 कमरों की तसदीक कराई, जहां उस के साथ यौनाचार हुआ था.

पुलिस टीम ने आश्रम से कई सबूत जुटाए. जांच काररवाई की वीडियोग्राफी भी कराई गई. पुलिस ने आश्रम के सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले और उन की डीवीआर व हार्डडिस्क जब्त कर ली. कई रजिस्टर व दस्तावेज भी जब्त किए गए.

इस दौरान आश्रम के उपमुख्य संचालक सहित करीब 20 सेवादारों से पूछताछ कर उन के बयान लिए गए. पीडि़ता के साथ रही बालिकाओं व युवतियों के भी बयान दर्ज किए गए. सर्च वारंट से ली गई आश्रम की तलाशी के दौरान वहां पुलिस बल तैनात रहा.

पुलिस टीम को आलावास आश्रम में उस समय हैरानी हुई, जब वहां लगभग 100 बालिकाएं ही मिलीं. अधिकांश कमरे खाली मिले, जबकि दाती कई दिनों से दावा कर रहे थे कि इस आश्रम में 700 से अधिक बालिकाएं हैं.

पुलिस को संदेह है कि आश्रम में रहने वाली बालिकाओं को दाती ने जबरन घर या अन्यत्र भेज दिया, क्योंकि दाती को डर था कि क्राइम ब्रांच की टीम बालिकाओं के बयान लेगी और उन से पूछताछ करेगी तो उस की पोल खुल सकती है. दिल्ली पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है क्योंकि आश्रम में दाती की बिना अनुमति कोई आजा नहीं सकता था.

16 जून को क्राइम ब्रांच टीम दिल्ली में दाती महाराज का इंतजार करती रही लेकिन वह नहीं पहुंचे. दाती ने पुलिस से 18 जून तक का समय पहले ही मांग लिया था. दाती के पाली आश्रम में भी नहीं मिलने पर पुलिस ने नोटिस जारी कर उन से 18 जून को पेश होने को कहा.

बाबा पर दुष्कर्म का आरोप लगने के बाद पहली बार 16 जून शनिवार को दिल्ली स्थित शनिधाम मंदिर में दाती महाराज की गैरमौजूदगी में पूजा की गई. सुबह साढ़े 5 बजे होने वाली पूजा आश्रम के सेवादारों ने की. इस से पहले प्रत्येक शनिवार को होने वाली इस पूजा को दाती महाराज ही करते थे. दाती पर आरोपों के कारण इस दौरान उन के सेवादार श्रद्धालुओं पर नजर रखे हुए थे.

16 जून को पाली स्थित आश्रम से फरार हुए दाती और आश्रम संचालिका श्रद्धा 17 जून को भी पुलिस या मीडिया के सामने नहीं आए. पुलिस 17 जून को दिल्ली एवं पाली स्थित आश्रमों पर नजर रखे रही, लेकिन दाती दोनों जगह ही नहीं पहुंचे. पुलिस को उम्मीद थी कि दाती 18 जून को दिल्ली में पुलिस के सामने पेश हो जाएंगे.

इस बीच क्राइम ब्रांच को दाती के खिलाफ ठगी की कई शिकायतें मिलीं. इन में धन दोगुना करने का झांसा दे कर रकम हड़पने की शिकायत भी शामिल रही. क्राइम ब्रांच ने इन शिकायतों को भी जांच के दायरे में ले लिया.

दाती महाराज समेत पांचों आरोपी 18 जून को भी दिल्ली में क्राइम ब्रांच के समक्ष पेश नहीं हुए. दाती की ओर से उन के वकील ने क्राइम ब्रांच में पेश हो कर दाती के स्वास्थ्य कारणों का हवाला दे कर पूछताछ को पेश होने के लिए एक सप्ताह की मोहलत मांगी.

इस के बाद पुलिस अधिकारियों ने कानूनविदों से सलाह कर दूसरा नोटिस जारी किया और दाती समेत सभी 5 आरोपियों को पेश होने के लिए 20 जून, 2018 तक का समय दे दिया. साथ ही यह भी कह दिया गया कि 20 जून तक हाजिर नहीं हुए तो उन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाएगा.

इस के बाद पुलिस ने जांच काररवाई तेज कर सभी आरोपियों के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. वहीं जयपुर से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता तथा बाल अधिकार विभाग की एक टीम उपनिदेशक के नेतृत्व में पाली स्थित आश्रम पहुंची और गायब बच्चियों के बारे में जानकारी जुटाई. इस के अलावा आश्रम के पंजीयन का नवीनीकरण कई साल से नहीं होने के मामले की भी जांच की.

इस बीच, योगगुरु स्वामी रामदेव ने 18 जून को कोटा में यह कह कर इस पूरे मामले में उबाल ला दिया कि जिन साधुओं का चरित्र ठीक नहीं है, उन्हें फांसी पर लटका देना चाहिए. केवल भगवा वस्त्र पहनने से साधु नहीं बनते, उन का आचरण व चरित्र भी ठीक होना चाहिए. धर्माचार्यों को भी चाहिए कि वे ऐसे संन्यासियों की गारंटी लें.

दबाव बढ़ने पर हाजिर होना पड़ा क्राइम ब्रांच के सामने

19 जून की दोपहर दाती महाराज दिल्ली में चाणकयपुरी स्थित क्राइम ब्रांच के औफिस में हाजिर हो गए. दरअसल, दाती के अचानक हाजिर होने के पीछे की कहानी यह रही कि दिल्ली की साकेत कोर्ट ने 21 जून तक दिल्ली पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी. इस पर पुलिस ने दाती के वकील के जरिए उन पर तुरंत हाजिर होने का दबाव बनाया.

इस बीच पुलिस को पता चला कि दाती महाराज दिल्ली में ही एक पांचसितारा होटल में ठहरे हुए हैं. पुलिस के भारी दबाव के चलते दाती 3 दिनों तक भूमिगत रहने के बाद 19 जून की दोपहर अपने वकील के साथ क्राइम ब्रांच के औफिस पहुंचे.

क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने दाती से 7 घंटे तक पूछताछ कर करीब डेढ़ सौ सवाल किए. दाती के कुछ जवाबों से पुलिस अधिकारी संतुष्ट नहीं थे. बाद में उन्हें रात 10 बजे छोड़ दिया गया और 22 जून को फिर हाजिर होने के निर्देश दिए.

अब सवाल दाती की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि इस बात का है कि दाती को अपनी बेगुनाही के सबूत खुद देने होंगे. अगर दाती ने गुनाह किया है तो पुलिस गिरफ्तार भी करेगी और अदालत में मुकदमा भी चलेगा. गुनहगारों को कानून सजा देगा. यह तय है कि इस मामले से लोगों का बाबाओं से भरोसा और कम हुआ है.

देखना यह है कि खुद को निर्दोष बताने वाले दाती महाराज पर शनि की कृपा होती है या उन के सिर पर शनि की ढैय्या गिरती है?

हनीट्रैप में शामिल ‘फ्रीडम 251’ कंपनी का मालिक

करीब सवा 2 साल पहले फरवरी, 2016 में मोहित गोयल अचानक सुर्खियों में आ गया था. कारण यह था कि मोहित ने ‘फ्रीडम 251’ नाम से दुनिया का सब से सस्ता स्मार्टफोन बेचने का दावा किया था. इस के लिए उस ने जो कंपनी बनाई थी, उस का नाम था रिंगिंग बेल्स. इस स्मार्टफोन की लौंचिंग भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह में की थी.

केवल 251 रुपए में स्मार्ट मोबाइल फोन देने की घोषणा से मोहित गोयल भारत के सब से अमीर उद्योगपति मुकेश अंबानी सहित दुनिया भर के बड़े उद्योगपतियों और मोबाइल फोन तथा दूरसंचार क्षेत्र की कंपनियों की नजर चढ़ गया था. इतने कम दाम में स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने की घोषणा से मोहित गोयल और उस की कंपनी रिंगिंग बेल्स भारत के हर घर में उस समय चर्चा का विषय बन गई.

अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन दे कर 17 से 21 फरवरी, 2016 तक फ्रीडम 251 स्मार्टफोन की औनलाइन बुकिंग की घोषणा की गई. इतने सस्ते दामों पर मोबाइल लेने वालों की होड़ में लगातार बुकिंग का इतना दबाव बढ़ा कि कंपनी की वेबसाइट ही क्रश हो गई. उस समय करीब साढ़े 7 करोड़ मोबाइल फोन की बुकिंग औनलाइन हुई.

इस मोबाइल की लौंचिंग के समय कंपनी ने इस के सस्ता होने का गणित बताते हुए भले ही हरेक बुकिंगकर्ता को चरणबद्ध तरीके से फोन डिलीवर करने का वादा किया था, लेकिन कंपनी अपना यह वादा पूरा नहीं कर सकी. इस का सीधा सा कारण था कि दुनिया भर में सब से सस्ते स्मार्ट मोबाइल फोन की कीमत उस समय 2 हजार रुपए से ज्यादा पड़ती थी. ऐसे में मोहित गोयल की रिंगिंग बेल्स कंपनी कब तक और कितना घाटा उठा सकती थी. कंपनी की जमापूंजी भी कोई बहुत ज्यादा नहीं थी.

बाद में मोहित गोयल पर कई तरह के आपराधिक मामले दर्ज हुए, उसे गिरफ्तार भी किया गया. अब उसी मोहित गोयल का एक घिनौना चेहरा सामने आया है. दिल्ली पुलिस ने 10 जून को गैंगरेप की शिकार एक महिला को उस के 2 साथियों सहित हनीट्रैप में गिरफ्तार कर लिया.

इस महिला के साथ पकड़े गए उस के साथियों में रिंगिंग बेल्स कंपनी का एमडी मोहित गोयल भी शामिल था. महिला और उस के दोनों साथी गैंगरेप के मामले में आरोपियों के परिजनों से सौदेबाजी कर 30 लाख रुपए लेते हुए रंगेहाथ पकड़े गए. आरोपियों के घर वाले इस से पहले पीडि़त महिला के कहने पर उस के साथियों को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे चुके थे.

होटल में किया गैंगरेप

गैंगरेप की इस कहानी को जाननेसमझने के लिए हमें दिल्ली से करीब 75 किलोमीटर दूर भिवाड़ी से शुरुआत करनी होगी. हरियाणा की सीमा पर स्थित राजस्थान के जिला अलवर की औद्योगिक नगरी भिवाड़ी में इसी 5 मई को पुलिस को बाईपास स्थित एक होटल में एक महिला से सामूहिक दुष्कर्म होने की सूचना मिली.

इस पर एडीशनल एसपी पुष्पेंद्र सिंह सोलंकी, डीएसपी सिद्धांत शर्मा और फूलबाग थानाप्रभारी विक्रांत शर्मा मौके पर पहुंचे. वहां पुलिस को एक युवती नशे की हालत में मिली. पुलिस ने उसी दिन देर शाम महिला को सिविल अस्पताल ले जा कर उस का मैडिकल कराया. पुलिस इस होटल से कुछ लोगों को पकड़ कर फूलबाग थाने ले गई, जहां उन से पूछताछ की गई.

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दूसरे दिन तबीयत सुधरने पर पीडि़त महिला ने पुलिस को बताया कि वह दिल्ली के जनकपुरी इलाके की रहने वाली है और इवेंट मैनेजमेंट का काम करती है. उस ने कुछ समय पहले दिल्ली के पीतमपुरा निवासी राकेश मंगल की पत्नी के जन्मदिन की पार्टी का इवेंट मैनेज किया था. इसी वजह से वह राकेश मंगल के संपर्क में थी.

घटना से कुछ दिन पहले राकेश मंगल ने उसे बताया था कि राजस्थान के अलवर में उन की एक कंपनी है. इस कंपनी में बड़ा इवेंट करना है. इस इवेंट की जिम्मेदारी संभालने के लिए राकेश ने उस महिला को राजी कर लिया.

राकेश मंगल 5 मई को महिला को अलवर स्थित अपनी कंपनी की साइट दिखाने और इवेंट के बारे में बताने के लिए कार में बैठा कर दिल्ली से अलवर के लिए ला रहा था. दिल्ली पार कर के जब गुड़गांव भी निकल गया तो मन टटोलने के लिए राकेश ने उस महिला से चायनाश्ते के बारे में पूछा.

महिला ने सुबह से भूखा होने के कारण चायनाश्ते की सहमति दे दी. इस पर राकेश मंगल ने कहा कि कुछ ही देर में भिवाड़ी आने वाला है. भिवाड़ी में कई अच्छे होटल हैं, वहां रुक कर चाय वगैरह पीएंगे.

राकेश मंगल ने भिवाड़ी में बाईपास स्थित एक होटल में चायनाश्ते के लिए गाड़ी रोक दी. इस होटल में राकेश मंगल के 4 साथी पहले से मौजूद थे. इन में राकेश के एक साथी विकास जिंदल ने होटल में पहले ही 3 कमरे बुक करा रखे थे. महिला को होटल में कमरे बुक होने का पता नहीं था.

महिला ने पुलिस को बताया कि राकेश मंगल और उस के साथियों ने कोल्डड्रिंक में नशीला पदार्थ मिला कर उसे पिला दिया, जिस से वह अचेत हो गई. इस के बाद 5 लोगों ने होटल के कमरे में उस से सामूहिक दुष्कर्म किया.

बाद में होश आने पर पीडि़त महिला ने अपनी सहेली को मोबाइल से मैसेज और लोकेशन भेज कर मदद की गुहार की. पीडि़ता की सहेली ने भिवाड़ी पुलिस से संपर्क कर मामले की जानकारी दी. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंच गई.

गिरफ्तार हुए पांचों आरोपी

भिवाड़ी पुलिस ने महिला के बयान के आधार पर फूलबाग थाने में मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने महिला से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में उसी दिन यानी 6 मई को पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इन में दिल्ली के पीतमपुरा निवासी राकेश मंगल, फ्रैंड्स एनक्लेव नांगलोई के विष्णु बंसल, रामपुरा लौरेंस रोड के विकास जिंदल, रोहिणी निवासी संजय गर्ग और संदीप कौशिक शामिल थे. पुलिस ने पांचों आरोपियों का भी मैडिकल कराया. ये पांचों आरोपी आपस में दोस्त और संपन्न परिवारों से थे.

पुलिस ने पांचों आरोपियों को उसी दिन अलवर ला कर मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया. मजिस्ट्रैट ने उन्हें एक दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया.

रिमांड अवधि पूरी होने पर 7 मई को पुलिस ने पांचों आरोपियों को भिवाड़ी के जुडीशियल मजिस्ट्रैट न्यायालय में पेश किया. मजिस्ट्रैट दीपिका सिंह ने पांचों आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में किशनगढ़बास उपकारागृह भेज दिया. दूसरी ओर पुलिस ने मजिस्ट्रैट के समक्ष पीडि़त महिला के धारा 164 के तहत बयान दर्ज करा दिए.

इस मामले में भिवाड़ी की फूलबाग थाना पुलिस ने आवश्यक जांचपड़ताल के बाद अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस ने चालान में पांचों आरोपियों को गैंगरेप का दोषी माना. यह मामला अब अदालत में विचाराधीन है.

देखा जाए तो इस कहानी को यहां खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन इस हाईप्रोफाइल मामले की कहानी का अभी केवल मध्यांतर ही हुआ है. कहानी का अगला अध्याय अब दिल्ली में शुरू होगा. अभी तक आप के जेहन में यह सवाल तेजी से घूम रहा होगा कि गैंगरेप की इस कहानी में 251 रुपए में मोबाइल देने वाली कंपनी रिंगिंग बेल्स का एमडी मोहित गोयल तो सामने ही नहीं आया? आप को सवाल का जवाब आगे की कहानी में मिलेगा.

आरोपियों से मांगे 10 करोड़

दरअसल, इस मामले में चालान पेश होने के बाद नया मोड़ आ गया. पीडि़त महिला ने गैंगरेप का मामला वापस लेने या इस मामले में सुनवाई के दौरान बयान बदलने के लिए आरोपियों से 10 करोड़ रुपए मांगे थे. बाद में बिचौलियों के माध्यम से ढाई करोड़ में सौदा तय हो गया. इस समझौते के तहत बिचौलियों के माध्यम से पीडि़त महिला को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे दिए गए थे. यह रकम बिचौलियों ने ली थी. पीडि़त महिला इस दौरान सामने नहीं आई थी.

बाकी रकम की दूसरी किस्त के रूप में 30 लाख रुपए 10 जून को दिल्ली में नेताजी सुभाष प्लेस इलाके में एक शौपिंग मौल में देने की बात तय हुई. इस बीच गैंगरेप के एक आरोपी के भाई ने नौर्थवेस्ट दिल्ली के नेताजी सुभाष प्लेस पुलिस थाने में इस बात की शिकायत कर दी. इस के साथ ही महिला और बिचौलियों से सौदेबाजी की बातचीत की रिकौर्डिंग, वाट्सऐप मैसेज व सीसीटवी कैमरे की रिकौर्डिंग भी पुलिस को सौंप दी.

इस शिकायत पर नौर्थवेस्ट के डिप्टी पुलिस कमिश्नर असलम खान के निर्देशन में एक टीम गठित कर आरोपियों को रंगेहाथ पकड़ने की योजना बनाई गई. पुलिस की योजना के मुताबिक गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों ने इस मामले में बिचौलिए की भूमिका निभा रहे विकास मित्तल और मोहित गोयल से कहा कि दूसरी किस्त की रकम तब देंगे, जब गैंगरेप का मुकदमा दर्ज कराने वाली महिला हमें लिखित में यह शपथपत्र देगी कि गैंगरेप के लगाए गए आरोप झूठे हैं.

बिचौलियों से उस महिला को शपथपत्र लिखवाने के लिए साथ लाने की बात तय हो जाने पर डीसीपी असलम खान के नेतृत्व में पुलिस ने अपना जाल बिछा दिया. इस के तहत गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों को 30 लाख रुपए से भरा बैग ले कर 10 जून को पहले से निर्धारित शौपिंग मौल में भेज दिया गया. इस मौल के आसपास पहले से पुलिस टीम सादा कपड़ों में तैनात थी.

महिला और उस के 2 साथी हुए गिरफ्तार

कुछ देर बाद एक महिला और 2 युवक उस शौपिंग मौल के औफिस में पहुंचे. उन्होंने गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों से बात की. रेप के आरोपियों ने बैग में से रकम निकाल कर मेज पर रख दी ताकि उन्हें विश्वास हो जाए कि दूसरी किस्त का पूरा पैसा आ गया.

इसी दौरान दिल्ली पुलिस की टीम ने उस शौपिंग मौल के औफिस में छापा मारा. छापे के दौरान मेज पर नोटों की गड्डियों के ढेर पड़े मिले. वहां एक महिला और 2 युवक मौजूद थे.

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पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया. इन में वह महिला भी थी, जिस ने भिवाड़ी के फूलबाग थाने में गैंगरेप का मुकदमा दर्ज कराया था और पकड़े गए 2 युवकों में एक मोहित गोयल और दूसरा उस का रिश्तेदार विकास मित्तल था. इन में मोहित गोयल आजकल गाजियाबाद में और विकास मित्तल दिल्ली में रह रहा था.

दिल्ली पुलिस जब महिला और उस के दोनों साथियों को पकड़ कर ले जा रही थी तो गैंगरेप के आरोपियों के परिवारों की महिलाओं ने उस महिला की जम कर धुनाई कर दी. इन महिलाओं का कहना था कि यह महिला झूठा आरोप लगा कर हमारे परिवार वालों को जेल में बंद करवा चुकी है और झूठे मामले को खत्म करवाने के लिए हम से पैसे ऐंठ रही है.

बाद में थाने ले जा कर की गई पुलिस की पूछताछ में पता चला कि मोहित गोयल और विकास मित्तल गैंगरेप की पीडि़त महिला के सहयोगी थे. ये दोनों युवक महिला की ओर से भिवाड़ी में दर्ज कराए गए गैंगरेप के मामले में आरोपियों के घर वालों से सौदेबाजी की रकम लेने उस के साथ आए थे.

दिल्ली पुलिस उस समय हैरान रह गई, जब पूछताछ में यह बात सामने आई कि मोहित गोयल नाम का जो शख्स गिरफ्तार किया था, वह 251 रुपए में स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने का दावा करने वाली कंपनी रिंगिंग बेल्स का मैनेजिंग डायरेक्टर था.

दिल्ली पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि विकास मित्तल ने एक कारोबारी से कर्ज के रूप में करोड़ों रुपए ले रखे थे. वह कारोबारी विकास पर रुपए वापस करने का दबाव बना रहा था. इसे ले कर उस का उस कारोबारी से कई बार विवाद भी हो गया था. इसे ले कर विकास परेशान था.

विकास मित्तल का पश्चिमी दिल्ली के पंजाबीबाग में रेस्तरां बार लाउंज है. इस लाउंज में बतौर इवेंट मैनेजर एक महिला काम करती थी. विकास ने इसी महिला के जरिए उस कारोबारी और उस के अन्य कारोबारी दोस्तों से हनीट्रैप के जरिए पैसा वसूलने की साजिश रची थी.

पूरी प्लानिंग से रची थी साजिश

इस के बाद विकास ने उस इवेंट मैनेजर महिला से बात की और उसे 30-40 लाख रुपए देने का वादा कर के कारोबारियों पर गैंगरेप का आरोप लगाने के लिए राजी कर लिया. विकास ने एडवांस के तौर पर इस महिला को 4 लाख रुपए भी दे दिए. मोटी रकम मिलने के लालच में महिला विकास का साथ देने को तैयार हो गई. विकास ने कारोबारियों से रकम वसूलने के लिए अपने कजन और रिंगिंग बेल्स कंपनी के एमडी मोहित गोयल को तैयार कर लिया.

विकास मित्तल और मोहित गोयल के कहने पर इवेंट मैनेजर महिला ने दिल्ली से 5 लोगों को जमीन खरीदने के लिए भिवाड़ी चलने की बात तय की. तय कार्यक्रम के मुताबिक दिल्ली निवासी राकेश मंगल, विष्णु बंसल, विकास जिंदल, संजय गर्ग और संदीप कौशिक 5 मई को भिवाड़ी पहुंच गए. ये पांचों लोग एकदूसरे को जानने के अलावा इवेंट मैनेजर महिला से भी परिचित थे.

भिवाड़ी पहुंच कर आराम करने के बहाने इन्होंने होटल में कमरे किराए पर ले लिए. होटल में पांचों ने मौजमस्ती की. इस के बाद महिला ने उन पांचों पर गैंगरेप का आरोप लगा कर भिवाड़ी के फूलबाग थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने जांचपड़ताल कर 6 मई को पांचों लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

दिल्ली पुलिस के सामने पूछताछ में जो बातें सामने आईं, उस के मुताबिक पांचों कारोबारियों की गिरफ्तारी होने पर विकास मित्तल और मोहित गोयल ने गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों से संपर्क किया और महिला को कुछ रकम दे कर शिकायत वापस लेने की बात कही.

विकास के कहने पर महिला ने आरोपियों के परिजनों से 10 करोड़ रुपए मांगे. बाद में विकास और मोहित की मध्यस्थता से ढाई करोड़ में सौदा तय हो गया. यह रकम 3 किस्तों में देने की बात तय हुई.

महिला को 4 लाख दिए थे एडवांस में

पहली किस्त के रूप में आरोपियों के घर वालों ने बिचौलियों को एक करोड़ 10 लाख रुपए दे दिए थे. यह रकम देने की कैमरे में रिकौर्डिंग भी की गई. दूसरी किस्त में 10 जून को 30 लाख रुपए देने तय थे, तभी दिल्ली पुलिस ने जाल बिछा कर कथित पीडि़त महिला और उस के सहयोगी मोहित गोयल व विकास मित्तल को रकम लेते रंगेहाथ पकड़ लिया.

महिला ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि उसे विकास मित्तल ने 4 लाख रुपए दे कर योजना में शामिल किया था. उसे यह नहीं पता था कि गैंगरेप के आरोपियों से मोहित गोयल और विकास मित्तल ने कितने रुपए वसूले हैं. उसे 10 जून को शपथपत्र पर दस्तखत करने के लिए बुलाया गया था.

दिल्ली पुलिस ने महिला और उस के दोनों सहयोगियों को 11 जून को रोहिणी कोर्ट में पेश किया, जहां ड्यूटी महानगर दंडाधिकारी सुशील कुमार ने महिला को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. बाकी 2 आरोपियों मोहित गोयल और विकास मित्तल को 2 दिन के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया गया. रिमांड अवधि पूरी होने पर इन दोनों को भी जेल भेज दिया गया.

जांच में यह बात भी सामने आई कि दिल्ली का रेस्तरां बार लाउंज संचालक विकास मित्तल खुद को कई आईएएस अफसरों और राजनेताओं का नजदीकी बताता था. अधिकारियों और नेताओं से अपने अच्छे संबंधों के नाम पर वह गैंगरेप के आरोपियों के परिजनों को धमकाता था.

दिल्ली पुलिस को आशंका है कि विकास मित्तल और मोहित गोयल हाईप्रोफाइल हनीट्रैप रैकेट चलाते हैं. पुलिस को इन के खिलाफ फोन पर धोखाधड़ी की कई शिकायतें मिली हैं. पुलिस ने ऐसे पीडि़तों से लिखित में शिकायत मांगी है. लिखित में शिकायत मिलने पर शिकायतों की जांच की जाएगी.

दूसरी ओर अलवर जिले की भिवाड़ी पुलिस का कहना है कि चूंकि इस मामले में पहले ही चालान पेश हो चुका है, इसलिए दिल्ली में पीडि़ता की गिरफ्तारी और रकम के लेनदेन का इस केस से कोई ताल्लुक नहीं है. अब मामला अदालत में है. आगे जो भी काररवाई होगी, वह अदालत के आदेश पर ही होगी.

रिंगिंग बेल्स कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित गोयल उत्तर प्रदेश के शामली शहर में गढ़ी पुख्ता के रहने वाले राजेश गोयल का बेटा है. शामली में सेंट आरसी कौन्वेंट स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह नोएडा चला आया था.

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नोएडा में उस ने एमिटी यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सितंबर 2015 में मोहित ने रिंगिंग बेल्स कंपनी की स्थापना की. उसी दौरान नोएडा की रहने वाली धारणा से मोहित की शादी हो गई.

सस्ता स्मार्टफोन देने की घोषणा के बाद टूट पड़ा मुसीबतों का पहाड़

भारत में 251 रुपए का सब से सस्ता स्मार्ट मोबाइल फोन बेचने का आइडिया मोहित का ही था. इस आइडिया को मूर्तरूप देने के काम में उस की मदद एस्ट्रोफिजिसिस्ट अशोक चड्ढा ने की. मोहित ने अपनी कंपनी रिंगिंग बेल्स में अशोक चड्ढा को प्रेसीडेंट बनाया और नोएडा में औफिस खोला.

उस समय इन लोगों ने यह कह कर भी प्रचार किया कि इतना सस्ता मोबाइल डिजिटल इंडिया अभियान का हिस्सा है. इस में सरकार भी सहयोग कर रही है. इस मोबाइल को मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया योजना का भी हिस्सा बताया गया.

बाद में मोहित गोयल की लोगों को 251 रुपए में स्मार्टफोन देने की योजना फेल हो गई. इस का सीधा सा कारण यह था कि मोबाइल की लागत बहुत ज्यादा आ रही थी और भरपाई कहीं से नहीं हो रही थी. अरबोंखरबों रुपए का घाटा सहन करने की कंपनी की क्षमता नहीं थी.

बाद में मोहित गोयल पर कई केस दर्ज हो गए. मोहित पर आरोप लगा कि उस ने मोबाइल फोन बेचने के लिए डिस्ट्रीब्यूटर बना दिए और उन से करोड़ों रुपए ले लिए. मोबाइल फोन की योजना फेल हो जाने पर डिस्ट्रीब्यूटर्स को पैसा नहीं लौटाया गया. भाजपा के ही वरिष्ठ नेता कीर्ति सोमैया ने इसे पोंजी स्कैम बताया था. रिंगिंग बेल्स के खिलाफ पुलिस में सैकड़ों शिकायतें पहुंची थीं.

पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले की जांचपड़ताल शुरू की तो कंपनी के प्रमोटर भूमिगत हो गए. इस बीच उत्तर प्रदेश पुलिस ने फरवरी 2017 में मोहित गोयल को गिरफ्तार कर लिया था. बाद में मोहित की जमानत 31 मई, 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट से हुई थी. इस दौरान रिंगिंग बेल्स का नोएडा औफिस बंद हो गया था.

मोहित गोयल महत्त्वाकांक्षी रहा है. इसीलिए उस ने भारत में 251 रुपए के स्मार्ट मोबाइल फोन के नाम पर एक बार तहलका मचा दिया था. अभी तो उस के खिलाफ कई जांचें चल रही हैं. अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वह इस तरह के हनीट्रैप के हथकंडे अपनाएगा, यह बात किसी ने सोची भी नहीं थी.

कसौटी पर कमलनाथ

मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले छिंदवाड़ा से कोई 12 किलोमीटर दूर नागपुर रोड पर लगभग 2,000 की आबादी वाला एक गांव है शिकारपुर. गांव के बाहर सड़क पर एक तख्ती पर तीर का निशान लगा है जो बताता है कि यह रास्ता कमलकुंज की तरफ जाता है. इस तख्ती को देखते ही वाहन धीमे हो जाते हैं. बसें हों या कारें उन में मौजूद लोग झांकझांक कर देखने की कोशिश करते हैं कि कमलकुंज की भव्यता, जिस के चर्चे उन्होंने सुने हैं, यहां से दिखती है या नहीं.

लगभग 20 एकड़ रकबे से घिरा कमलकुंज मध्य प्रदेश के नए कांग्रेस अध्यक्ष 71 वर्षीय कमलनाथ का निवास है. कमलकुंज की भव्यता किसी महल से कम नहीं है, इस में आधुनिक सुखसुविधाओं और विलासिता के तमाम साधन मौजूद हैं.

कमलनाथ साल 1980 से छिंदवाड़ा से लगातार सांसद रहे हैं. अपवादस्वरूप एक बार ही वे यहां से हारे हैं. छिंदवाड़ा के वोटर्स की कांग्रेस के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनावों में पूरे मध्यउत्तर भारत में कांग्रेस ने जो इकलौती सीट जीती थी वह छिंदवाड़ा ही थी.

तब कांग्रेस और इंदिरा विरोधी लहर में जीत का परचम कमलनाथ ने नहीं, बल्कि तत्कालीन सांसद गार्गी शंकर मिश्र ने लहराया था. गार्गी शंकर मिश्र अब नहीं रहे लेकिन उन का छोड़ा यह गढ़ और मजबूत हुआ है जिस का श्रेय कमलनाथ को जाता है. 1980 के आम चुनाव में एक सांवला, दुबलापतला नौजवान कांग्रेस आलाकमान यानी इंदिरा और संजय गांधी ने यहां उम्मीदवार बना कर भेजा था, जिस का नाम था कमलनाथ.

तब छिंदवाड़ा के लोग कमलनाथ से इतना ही परिचित थे. 90 का दशक आतेआते हालत यह हो गई थी कि कमलनाथ और छिंदवाड़ा लोकसभा सीट एकदूसरे का पर्याय बन गए थे. यह सिलसिला आज भी कायम है. 2014 के लोकसभा चुनाव की मोदी लहर भी यहां कमल नहीं खिला पाई थी. यहां के लोगों ने एक लाख से भी ज्यादा वोटों से कमलनाथ को विजयी बनाया था.

1980 का चुनाव कांग्रेस के लिए चुनौती था. हालांकि तब इंदिरा लहर थी, लेकिन कांग्रेस अंदर से डर भी रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि लोग आपातकाल की ज्यादतियों को भूले न हों. लेकिन केवल 3 सालों में ही यह साबित हो गया था कि विपक्ष कभी एकजुट नहीं हो सकता और राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी का कोई विकल्प है ही नहीं.

रहस्यमय हैं कमलनाथ

नए नवेले कमलनाथ को छिंदवाड़ा के लोगों ने हाथोंहाथ लिया, जिस की एक वजह इस प्रकार का प्रचार भी था कि राजीव और संजय गांधी के बाद वे इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे हैं. इस इलाके के लोगों की नेहरूगांधी परिवार के प्रति भक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1980 से पहले भी कांग्रेस यहां से कभी हारी नहीं थी. गार्गी शंकर मिश्र 1961 से लगातार छिंदवाड़ा सीट से जीतते रहे थे.

34 साल की उम्र में पहला लोकसभा चुनाव जीते कमलनाथ दरअसल संजय गांधी के खास नजदीकी दोस्तों में से एक थे. वे दून स्कूल में संजय गांधी के सहपाठी थे. स्कूली पढ़ाई के बाद भी यह दोस्ताना टूटा नहीं. कमलनाथ भले ही कोलकाता पढ़ने चले गए पर गांधी परिवार से उन का सतत संपर्क बना रहा था.

आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी में सत्ता पाने के लिए उठापटक हो रही थी तब युवा कमलनाथ इंदिरा गांधी और दूसरे कई विपक्षी नेताओं के बीच संदेशवाहक का काम करते थे. इंदिरा गांधी का भरोसा जीतने का ही इनाम था कि छिंदवाड़ा जैसी कांग्रेसी सीट उन्हें थाल में सजा कर दे दी गई थी.

तब कमलनाथ के बारे में लोग सिर्फ इतना ही जानते थे कि वे बड़े कारोबारी हैं और बंगाली हैं, पर हकीकत में कमलनाथ उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर की पैदाइश हैं. उन के पिता महेंद्रनाथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे. साल 1973 में कमलनाथ की शादी अलकानाथ से हुई थी. उन के 2 बेटे नकुल और बकुलनाथ उन का कारोबार संभालते हैं. इस समय नाथ परिवार लगभग 23 कंपनियों का मालिक है.

फिर धीरेधीरे पता चला कि कमलनाथ बंगाली नहीं, बल्कि पंजाबी खत्री जाति के हैं, हालांकि इस से कोई फर्क उन के रसूख और हैसियत पर नहीं पड़ा. लेकिन जैसे ही उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, मीडिया ने उन के बारे में छानबीन करनी शुरू कर दी.

इंटरनैट तक सिमटी इस छानबीन से किसी के हाथ कुछ खास नहीं लगा तो भोपाल में एक पत्रकार ने उन से पूछ लिया कि आप की जाति क्या है. इस संवेदनशील और अप्रत्याशित सवाल पर कमलनाथ घबराए नहीं, बल्कि आदतन होंठों पर उंगली रखते उन्होंने कसा हुआ जवाब दे कर उसे और रहस्यमय कर दिया कि मैं एक हिंदुस्तानी हूं.

यह हालांकि एक मुकम्मल जवाब था पर अभी भी किसी के पास इन जिज्ञासाओं के समाधान का कोई रास्ता नहीं है कि 1980 के पहले कमलनाथ क्या थे और किस जाति के हैं.

दोस्ती बनी सीढ़ी

आपातकाल से पहले कमलनाथ की कंपनी ईएमसी लिमिटेड घाटे में चलने के कारण बंद होने के कगार पर थी. कहा तो यह भी जाता है कि तब कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए कंपनी के पास पैसे भी नहीं थे. ऐसे में कमलनाथ को दून स्कूल के अपने सखा संजय गांधी की याद आई जिन की तूती देशभर में बोल रही थी. तब संजय गांधी की मरजी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिलता था.

संजय गांधी ने दोस्ती निभाई और 1975 से ले कर 1976 के बीच कमलनाथ की कंपनी को करोड़ों के ठेके दिलाए. तब ठेकों की राशि 5 करोड़ रुपये के लगभग थी. जो उस वक्त के लिहाज से भारीभरकम थी. इस एक साल में ईएमसी घाटे से उबर कर फायदे में आ गई और कमलनाथ का समय चमक गया.

हालांकि आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार ने कमलनाथ की कंपनी को ठेके देने के मामलों की जांच के लिए एक आयोग बनाया था लेकिन उस आयोग की एक ही मीटिंग हुई. कमलनाथ ने तब एक सधे कारोबारी की तरह जनता पार्टी की कलह का फायदा उठाया और इंदिरा गांधी और बीजू पटनायक, चौधरी चरण सिंह, भजनलाल, सुरेश राम व सगानलाल जैसे धाकड़ नेताओं के बीच पुल का काम किया.

ऐसे कई दिलचस्प किस्से एक बंगाली पत्रकार बरुण सेनगुप्ता की किताब ‘लास्ट डेज औफ द मोरारजी राज’ में हैं.

1980 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो लोग सबकुछ भूल गए. संजय गांधी की दुर्घटनावश मौत के बाद भी कमलनाथ गांधी परिवार के खासमखास बने रहे. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के बाद वे सोनिया गांधी के विश्वासपात्र हो गए.

फिलहाल कमलनाथ अकूत दौलत के मालिक हैं. छिंदवाड़ा वाला महल कमलकुंज शायद उन का सब से सस्ता मकान है. दिल्ली स्थित फ्रैंड्स कालोनी के उन के बंगले की कीमत 125 करोड़ रुपए आंकी जाती है. दिल्ली में ही उन के 2 और मकान सुलतानपुर और पंचशील नगर में हैं जिन की कीमत क्रमश: 32 और 14 करोड़ रुपए है.

कमलनाथ इस मुकाम तक यों ही नहीं पहुंच गए हैं, इस के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है, हालांकि कुछ विवाद भी उन के साथ जुड़े हैं. जब वे मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें बड़ी अंतरंगता से दोस्त कहा था. उसी दौरान सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी वायरल हुई थी जिस में बताया गया था कि शिवराज सिंह की मेहरबानी कमलनाथ की कंपनियों पर भी है, इसीलिए करोड़ों के ठेके उन्हें दिए गए हैं.

इस पर कमलनाथ बौखलाए नहीं लेकिन कंपनियों के ठेके और फायदे की बात भूलते उन्होंने शिवराज सिंह चौहान को नालायक दोस्त कह डाला तो शिवराज सिंह इतने घबरा गए कि वे भोपाल के नजदीक सीहोर की आमसभा में भीड़ से पूछते नजर आए कि बताओ, क्या मैं नालायक हूं.

इसलिए लाए गए

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री को नालायक कहने की हिम्मत कोई अगर कर सकता है तो वह शख्स बिलाशक कमलनाथ हैं. यही कांग्रेस चाहती भी थी कि जैसे भी हो, शिवराज सिंह चौहान का आत्मविश्वास लड़खड़ाना चाहिए.

इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन प्रदेश में कांग्रेस के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जिसे पेश कर वह सत्ताविरोधी वोटों को हथिया सके. कमलनाथ को अध्यक्ष बना कर सोनिया और राहुल गांधी ने एक तीर से कई निशाने एकसाथ साधे हैं जो साबित करते हैं कि इस राज्य के मामले में पहली बार कांग्रेस आलाकमान ने कोई बुद्धिमानीभरा फैसला लिया है.

पहला तीर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लगा है, जिन के नाम से अब तक प्रदेश कांग्रेस चलती थी और हर छोटाबड़ा नेता उन का लिहाज करता था. 1993 से ले कर 2003 तक दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते लोग उन की कार्यशैली से इतने नाराज रहे कि आज भी उन के नाम से बिदकते हैं कि उन से तो भाजपा और शिवराज सिंह चौहान ही अच्छे हैं.

कांग्रेस की दिक्कत यह थी कि अगर वह किसी छोटेमोटे नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाती तो उसे दिग्विजय सिंह की सरपरस्ती और इशारे पर ही काम करना पड़ता. ऐसे में मतदाताओं में संदेश यही जाता कि अगर कांग्रेस जीती तो फिर से दिग्विजय सिंह को झेलना पड़ेगा.

सीधेसीधे दिग्विजय सिंह की काट के लिए कमलनाथ को लाया गया है जिन के आने के बाद दिग्विजय सिंह ने टेढ़ामेढ़ा रास्ता छोड़ दिया है और अब कांग्रेस की एकजुटता के लिए ईमानदारी से प्रदेश में घूमते फिर रहे हैं.

कांग्रेस के पास एक बेहतर नाम गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का था, लेकिन इस नाम पर दिग्विजय सिंह तैयार नहीं थे. लिहाजा, बीच का रास्ता कमलनाथ के जरिए निकाला गया, जिन के पद संभालते ही कांग्रेस की अंदरूनी कलह थम गई है.

यह कलह, दरअसल, कांग्रेस को विरासत में मिली है. 80-90 के दशक तक कांग्रेस प्रदेश में 4 खेमों में बंटी थी, अर्जुन सिंह गुट, विद्याचरण शुक्ला गुट, माधवराव सिंधिया गुट और कमलनाथ गुट. होता यह रहा कि यह कलह और गुटबाजी तहसील स्तर तक फैली रहती थी, जिस गुट के नेता को टिकट नहीं मिलता था वह दूसरे गुट यानी अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हरवाने में अपनी शान समझने लगा था. इस गुटबाजी से राज्य में कांग्रेस इतनी कमजोर होती गई कि आलाकमान ने मान लिया कि इधर कुछ नहीं हो सकता, लिहाजा जो चल रहा है उसे चलने दो.

माधवराव सिंधिया की मौत के बाद उन का खेमा बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संभाल लिया तो अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह को भी पिता के नाम और काम का फायदा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन कर मिला. इस गुट की असली कमान दिग्विजय सिंह के हाथ में ही रही.

कमलनाथ से पहले अध्यक्ष रहे अरुण यादव ने ईमानदारी से काम करने की कोशिश की थी, लेकिन इस गुटबाजी की बीमारी का इलाज वे नहीं ढूंढ़ पाए तो चुनाव सिर पर आते देख कमलनाथ को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई.

फिलहाल प्रदेश में माहौल भाजपा सरकार के खिलाफ है. किसान, युवा, कर्मचारी और मजदूर सभी गुस्से में हैं कि शिवराज सिंह लगातार घोषणाओं का लौलीपौप तो पकड़ा देते हैं पर उस में मिठास नहीं है और इस नीम चढ़े करेले जैसे लौलीपौप को खाने को कोई तैयार नहीं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के काफी करीबी हैं. उन्हें किन शर्तों पर मनाया गया यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन हालफिलहाल मध्य प्रदेश कांग्रेस की फुरती देखने के काबिल है जो सत्ता और शिवराज विरोधी लहर का फायदा उठाने को, मजबूरी में ही सही, एक होती दिख रही है.

कमलनाथ की कदकाठी और हैसियत के लिहाज से मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद काफी छोटा है पर एक समर्पित व वफादार सिपाही की तरह वे मध्य प्रदेश में जमे हुए हैं और शिवराज सिंह चौहान सरकार पर ताबड़तोड़ हमले

कर रहे हैं जिस से घरों में दुबका बैठा कांग्रेसी कार्यकर्ता भी बाहर निकलने लगा है. उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर लगाए होर्डिंग्स पर लिखा था, ‘ऊपर भोलेनाथ नीचे कमलनाथ.’

कंगाली से जूझती कांग्रेस को कमलनाथ से एक दूसरा बड़ा फायदा फंडिंग का भी है. कमलनाथ की उदारता कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही, न ही वे खजाने के मुहताज हैं.

मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित कांग्रेस कार्यालय के पास चाय की इकलौती गुमटी पर लगातार कार्यकर्ताओं की भीड़ बढ़ रही है. ऐसे ही एक कार्यकर्ता ने बताया कि कमलनाथ उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा और अपने गुट के लोगों को तो 2-2 करोड़ रुपए देंगे, जिस से उन्हें चुनाव लड़ने में परेशानी न हो.

भले ही यह अफवाह हो लेकिन यह जरूर तय दिख रहा है कि ‘अब की बार 200 पार’ का नारा देने वाली भाजपा का चेहरा मध्य प्रदेश को ले कर उतरा हुआ है. शायद कमलनाथ ने भी इतनी मेहनत 1980 के बाद से ले कर अब तक नहीं की होगी जितनी इन दिनों वे कर रहे हैं.

कमलनाथ के एक समर्थक सीहोर के बलवीर सिंह तोमर का कहना है कि उन की कार्यशैली अनूठी है. कमलनाथ कभी किसी को बेइज्जत करने वाली राजनीति नहीं करते. हां, इतना जरूर है कि जिसे किनारे करना होता है उसे वे नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं.

कमलनाथ जमीनी नेता हैं और इन दिनों वे छिंदवाड़ा का विकास मौडल जनता के सामने पेश कर रहे हैं. हालांकि, हर कोई जानता है कि वाकई उन के सांसद और केंद्र में मंत्री रहते छिंदवाड़ा चमचमाने लगा है और वहां के लोग कमलनाथ के कामकाज से काफी खुश हैं. 9 बार की जीत इस का सुबूत है.

अपनी सहूलियत के लिए कमलनाथ ने 4 उपाध्यक्ष और बना लिए हैं. ये चारों जमीनी नेता बाला बच्चन, रामनिवास रावत, सुरेंद्र सिंह और जीतू पटवारी लंबे समय से किसी जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे थे.

तगड़ी है चुनौती

मध्य प्रदेश भाजपा का गढ़ है, जिसे भेद पाना आसान काम नहीं है. भाजपा का कार्यकर्ता हर बूथ पर है जबकि कांग्रेस का हर जगह नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि कमलनाथ के कांग्रेस अध्यक्ष बन जाने भर से कांग्रेस सत्ता में लौट ही रही है, हुआ इतना भर है कि कांग्रेस की संभावनाएं बढ़ गई हैं.

समय के बलवान कहे जाने वाले कमलनाथ यह मौका भुना पाएंगे या नहीं, इस में अभी वक्त है. लेकिन भाजपा का तिलिस्म तोड़ने को धनुष उठा चुके कमलनाथ के लिए संतोष की बात यह है कि पार्टी की अंदरूनी कलह फिलहाल थमी है या वाकई उस के कार्यकर्ताओं व नेताओं को यह एहसास होने लगा है कि इस बार चूके तो सत्ता में वापसी फिर कभी नहीं होगी.

बातबात में शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी को कोसने का कमलनाथ का टोटका कारगर साबित हो रहा है तो इस की वजह उन की बेदाग छवि और प्रदेश में बसपा से संभावित गठबंधन होना भी है. इस प्रस्तावित गठबंधन की शर्तें अभी तय नहीं हुई हैं, लेकिन कर्नाटक और हालिया उपचुनाव के नतीजों ने इन दोनों को ही क्या, बल्कि सभी दलों को समझा दिया है कि अगर सत्ता चाहिए तो उस का रास्ता भाजपाविरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने से हो कर ही जाता है.

2019 के आम चुनाव का रास्ता भी मध्य प्रदेश सहित राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव नतीजों से हो कर जाता है. ये नतीजे बताएंगे कि वोटर मोदी और राज्य सरकारों से कितना खुश और कितना नाराज है.

अस्वच्छता देश के हित में

आजकल जिसे देखो वही राष्ट्रहित में देश को अस्वच्छ बनाने में दिलोजान से जुटा है. कइयों ने तो इस कार्यक्रम की नब्ज और फायदे पहचान कर अपने पुराने सारे काम बंद कर देश को अस्वच्छ करने का नया काम शुरू कर दिया है. प्रोग्राम ताजाताजा है, इसलिए इस काम मेें अभी कमाई की अपार संभावनाएं हैं. वैसे भी, राष्ट्र स्तर पर जब कोई नया काम शुरू होता है तो उस में रोजगार के अपार अवसर हों या नहीं, पर कमाई की अपार संभावनाएं जरूर प्रबल रहती हैं. तब कमाई के हुनरी दाएंबाएं चोखी कमाई कर ही लेते हैं और हर नए प्रोग्राम से अपने बैंक खातों को ठीकठाक भर लेते हैं. अस्वच्छता से भी कमाई निकल आएगी. किसी दिमागदार ने क्या सपने में भी ऐसा सोचा था? नहीं न? कम से कम मैं ने तो ऐसा नहीं सोचा था कि अपने देश का कूड़ा भी इनकम के उम्दा सोर्स पैदा करने का हुनर रखता है.

वे कल कई दिनों बाद मिले. सुना था कि उन्होंने देश को अस्वच्छ करने का ठेका भर रखा है. इसलिए दिख नहीं रहे. ठेका भरें क्यों न, वे कुशल ठेकेदार हैं. हर किस्म के ठेके उन के आगेपीछे घूमते हैं. वैसे इस देश में बिना ठेके के कोई भी काम पूरा नहीं होता. काम चाहे बनाने का हो, चाहे गिराने का. हर जगह ठेके की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. इसीलिए तो हर किस्म की सरकार को ठेकेदार पर अपने से भी अधिक भरोसा होता है. इस देश में विकास और विनाश के मामले में उतनी भूमिका प्रकृति की नहीं, जितनी ठेके वालों की है. उन के बिना अपना देश टस से मस नहीं हो सकता. देश के सारे काम मरने से ले कर जीने तक के ठेके पर ही चल रहे हैं. दूसरी ओर मरने वाले, जीने वाले दिनरात अपने हाथ मल रहे हैं. बातों ही बातों में उन्होंने अपनी व्यस्तता व्यक्त करते हुए मेरी जेब से मेरा रूमाल निकाल अपना पसीना पोंछते कहा, ‘‘यार, जब से देश को अस्वच्छ करने का काम चला है, सिर खुजाने तक का वक्त नहीं निकाल पा रहा हूं. पता नहीं यह देश कब अस्वच्छ होगा? होगा भी या नहीं?’’ वाह, चेहरे पर क्या गंभीर आवरण. काश, ऐसा आचरण हमारा भी होता.

वे ठेकेदार वाले चेहरे का मूड छोड़, दार्शनिक वाले मूड में आए, तो मैं अपनी बगलें झांकने लगा. इस देश में कोई किसी मूड में हो या न हो, हर शख्स दार्शनिक वाले मूड में जरूर रहता है और अवसर न मिलने के बाद भी वह अपनी दार्शनिकता को झाड़ने का मौका निकाल ही लेता है. हम किसी और चीज में माहिर हों या नहीं, पर मौका निकालने में बड़े माहिर हैं. हमारी सब से बड़ी विशेषता भी यही है जो हमें दूसरों से अलग करती है. ‘‘जब तक हम रहेंगे, इस देश को स्वच्छ कोई नहीं कर सकता. मित्रो, अगर अफसरों के बदले भगवान के हाथ किन्हीं खाली हाथों में सौ झाड़ू पकड़ा दें और वे आगेआगे झाड़ू लगाते रहें तो दांत निपोरते उन के पीछेपीछे उन के ही खास बंदे कूड़ा डालते रहेंगे. अस्वच्छता का प्रोजैक्ट इस देश में कभी न खत्म होने वाला अनंतकालीन प्रोजैक्ट है. इसीलिए इस में कमाई की अपार संभावनाएं भी हैं,’’ मैं ने कहा तो उन्होंने अपने कंधे उचकाए, ‘‘नहीं, ऐसी तो बात नहीं, दोस्त. सरकार अस्वच्छता के प्रति पूरी तरह दृढ़संकल्प है. अब देखो न, सरकार ने पशुओं तक को तय कर दिया है कि वे सड़क पर एक तय वजन से अधिक गोबर नहीं कर सकेंगे. देखा, हमारी सरकार अस्वच्छता के प्रति कितनी वचनबद्ध है?’’

यह सुन कर न हंसा गया न रोया गया. वैसे किसी और जगह तो बंदा हंस सकता है, रो सकता है, पर जब अपनी ही चुनी सरकार के निर्णय पर बंदा हंसने लगे तो फजीहत सरकार की नहीं, डायरैक्टली-इनडायरैक्टली बंदे की ही होती है. ‘‘पर पशुओं के गोबर को तोल कर कौन पता लगाएगा कि उस ने तय मानकों के बराबर ही उस दिन का गोबर सड़क पर किया है?’’ मेरे लिए यह सवाल बहुत बड़ा था.

‘‘सरकारी मशीनरी काहे को है दोस्त? सारा दिन तो कुरसियों पर बैठ एकदूसरे को उल्लू ही बनाती रहती है. अब से सब तराजू ले कर हर पशु के पीछे…’’ इन दिनों वे इस सरकार के खास बंदे हैं, सो, सरकार की तरफ से फटाक से फाइनल फैसला दे डाला. ‘‘अपने यहां आदमी भले ही आदमी न हो, पर मान लो, जो समझदार पशु ने लाख रोकने के बाद भी निर्धारित सीमा से अधिक गोबर सड़क पर कर दिया तो?’’

‘‘अगर ऐसा पाया गया तो पशु के मालिक को सजा दी जाएगी,’’ एक और कड़ा फैसला. ‘‘पशु के मालिक को सजा…यह कहां का न्याय है, सर? गोबर करे कोई, और भरे कोई?’’

‘‘देखो जनाब, देश को अस्वच्छ रखने के लिए किसी को तो सजा देनी ही पड़ेगी न? अब पशु किस का है? मालिक का ही न? ऐसे में देश को अस्वच्छ बनाने के लिए या तो वह अपने पशु को समझाए या…’’ ‘‘पर किसी के समझाने से इस देश में समझता ही कौन है, चाचा?’’

‘‘नहीं समझता, तो सजा भुगते.’’ ‘‘पर पशु की सजा उस के मालिक को क्यों?’’

‘‘देखिए, सजा तो किसी न किसी को होनी ही है. सजा का काम हर हाल में होना है. उसे यह थोड़े ही देखना है कि वह किसे हो रही है. किसी को भी, बस, सजा हो जाए, ताकि कानून बना रहे…’’

वे अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि मैं ने साफ देखा कि सामने से लोग एक बंदे को गधे पर बैठा कर ला रहे थे. सोचा, किसी और के रंग के, रंगेहाथों पकड़ा गया होगा बेचारा. बिन पहुंच वालों के साथ अकसर ऐसा ही होता रहता है अपने समाज में. कमजोर के हाथ बिना रंग ही रंग दिए जाते हैं, उसे कोई भरोसा दे. और रंगे हाथों वाले पुलिस थाने के बाहर लगे नल में अपने हाथ उन्हीं का साबुन ले धोते रहते हैं. ‘‘यह क्या हो गया? क्या किया इस ने?’’

तो पास वाला मुसकराता बोला, ‘‘अरे, कुछ नहीं साहब, होना क्या?? इस का पशु दैनिक निर्धारित गोबर से अधिक गोबर कर देश को अस्वच्छ कर रहा था. पकड़ा गया, सो…पशु तो पशु है, सर. पर अगर कुछ समझदार को सजा दो तो वह सुधर जरूर जाता है. यही कानून का विधान है.’’

‘दिलबर’ गाने पर भोजपुरी अदाकारा अक्षरा सिंह ने मचाया धमाल

फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ काफी समय से ‘दिलबर’ गाने को लेकर सुर्खियों में है. रिलीज होते ही ये गाना हिट हो गया था. इसके बाद से ही फैंस सोशल मीडिया पर इस गाने पर डांस करते हुए अपने वीडियो साझा कर रहे हैं. इस मामले में अब सेलिब्रिटीज का नाम भी जुड़ गया है. दरअसल हाल ही में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी अदाकारा अक्षरा सिंह ने सोशल मीडिया पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया है. इस वीडियो में अक्षरा ‘दिलबर’ गाने पर अपने एक्सप्रेशंस से सभी का दिल जीत रही हैं. अक्षरा की बेहतरीन अदाओं के चलते उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है.

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अक्षरा सिंह के वीडियो को अब तक तकरीबन 40 हजार से ज्यादा लोगों ने लाइक किया है और इसे खूब शेयर किया जा रहा है.  अक्षरा ने अपने करियर की शुरुआत छोटे पर्दे पर डेली सोप्स से की थी. इसके बाद उन्होंने भोजपुरी फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया. अक्षरा इस वक्त भोजपुरी की टौप अभिनेत्रियों में से हैं और खबर है कि उन्हें बिग बौस सीजन 12 के लिए भी अप्रोच किया गया है.

बता दें कि फिल्म ‘सत्यमेव जयते’ में यह गाना रिक्रिएट करके डांसर नोरा फतेही पर फिल्माया गया है. इस गाने में नोरा ने जबरदस्त बेली डांस मूव्स किए हैं.

ये गाना रिलीज के बाद यू-ट्यूब पर ग्लोबली ट्रेंड कर रहा था. ऐसा करने वाला ये पहला बौलीवुड गाना है. अभी तक इस गाने को 15 करोड़ से ज्यादा बार यूट्यूब पर देखा जा चुका है. वहीं औरिजनल दिलबर सौन्ग की बात करें तो साल 1999 में आई फिल्म ‘सिर्फ तुम’ में ये गाना अभिनेत्री सुष्मिता सेन और संजय कपूर पर फिल्माया गया था. इस गाने में सुष्मिता ने भी काफी जबरदस्त डांस किया था.

बेवफाई रास न आई

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अहिरौली थानाक्षेत्र का एक गांव है शंभूपुर दमदियावन. इसी गांव में हरिदास यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के 2 बेटे थे संतोष यादव और विनोद यादव. संतोष बड़ा था. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह सन 2015 में उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर भरती हो गया था. उस की पहली पोस्टिंग चंदौली जिले के चकिया थाने में हुई थी. नौकरी लग जाने पर घर वाले भी बहुत खुश थे. जब लड़का कमाने लगा तो घर वालों ने उस का रिश्ता भी तय कर दिया.

30 दिसंबर, 2017 को उस का बरच्छा था, इसलिए वह एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव आया था. बरच्छा का कार्यक्रम सकुशल संपन्न हो गया था. अगली सुबह 8 बजे के करीब संतोष अपने 2 दोस्तों राहुल यादव और सुरेंद्र के साथ टहलते हुए गांव से बाहर की ओर निकला. शादी को ले कर राहुल और सुरेंद्र दोनों ही संतोष से हंसीमजाक कर रहे थे, तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया.

संतोष ने अपने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली तो वह नंबर उस के किसी परिचित का निकला. काल रिसीव कर के उस ने उस से बात करनी शुरू की. अपने दोनों दोस्तों से वहीं रुकने और थोड़ी देर में लौट कर आने की बात कह कर वह वहां से चला गया. संतोष के इंतजार में राहुल और सुरेंद्र वहां काफी देर तक खड़े रहे. जब 2 घंटे बाद भी वह नहीं लौटा तो दोनों दोस्त यह सोच कर घर लौट गए कि हो सकता है संतोष अपने घर चला गया हो.

संतोष के यहां मांगलिक कार्यक्रम था. घर में मेहमान आए हुए थे. दोस्तों ने सोचा कि हो सकता है वह उन के सेवासत्कार में लग गया हो और उसे लौटने का समय न मिला हो. संतोष को घर से निकले 3 घंटे बीत चुके थे. घर वाले उसे ले कर काफी परेशान थे कि सुबह का निकला संतोष आखिर कहां घूम रहा है. सब से ज्यादा परेशान उस के पिता हरिदास थे.

उन्होंने छोटे बेटे विनोद को संतोष का पता लगाने के लिए भेज दिया. विनोद को पता चला कि 3 घंटे पहले संतोष को राहुल और सुरेंद्र के साथ गांव से बाहर जाते देखा गया था. यह जानकारी मिलते ही विनोद राहुल और सुरेंद्र के घर पहुंच गया. दोनों ही अपनेअपने घरों पर मिल गए. विनोद ने उन से संतोष के बारे में पूछा तो वह यह सुन कर चौंक गए कि संतोष अब तक घर पहुंचा ही नहीं था. आखिर वह कहां चला गया.

राहुल ने विनोद को बताया कि वे तीनों साथ में गांव से बाहर निकले थे तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. वह कुछ देर में वापस आने की बात कह कर चला गया था. जब 2 घंटे बीत जाने के बाद भी वह नहीं लौटा तो वे दोनों यह सोच कर लौट आए कि शायद वह घर चला गया होगा.

संतोष को ले कर जितना ताज्जुब दोस्तों को हो रहा था, विनोद भी उतनी ही हैरत में डूबा हुआ था कि बिना किसी को कुछ बताए भाई आखिर गया कहां. इस से भी बड़ी बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. संतोष का नंबर मिलातेमिलाते विनोद भी परेशान हो चुका था.

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संतोष का जब कहीं पता नहीं चला तो विनोद घर लौट आया और पिता हरिदास को सब कुछ बता दिया. अचानक संतोष के लापता हो जाने की बात सुन कर हरिदास ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार स्तब्ध रह गया.

संतोष की गांव भर में तलाश की गई, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. संतोष को तलाशते हुए पूरा घर और नातेरिश्तेदार परेशान हो गए. विनोद भी मोटरसाइकिल ले कर संतोष को खोजने गांव के बाहर निकल गया था. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर 2 बजे के करीब गांव के कुछ चरवाहे बच्चे गांव से करीब आधा किलोमीटर दूर अरहर के खेत के पास अपने पशु चरा रहे थे. भैंसें चरती हुई अरहर के खेत में घुस गईं तो चरवाहे खेत में गए. चरवाहे जैसे ही बीच खेत पहुंचे तो वहां दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर उन के हाथपांव फूल गए.

अरहर के खेत के बीचोबीच संतोष यादव की खून से सनी लाश पड़ी थी. लाश देखते ही चरवाहे जानवरों को खेतों में छोड़ कर चीखते हुए उल्टे पांव गांव की ओर भागे. वे दौड़ते हुए सीधे हरिदास यादव के घर जा कर रुके और एक ही सांस में पूरी बात कह डाली.

बेटे की हत्या की बात पर एक बार तो हरिदास को भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन बच्चों से कहा, ‘‘बेटा, किसी और की लाश होगी. तुम ने ठीक से पहचाना नहीं होगा.’’

बच्चे पासपड़ोस के थे, इसलिए वे संतोष को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. बच्चों ने जब उन्हें फिर से बताया कि लाश किसी और की नहीं बल्कि संतोष चाचा की ही है तो हरिदास के घर में रोनापीटना शुरू हो गया.

हरिदास छोटे बेटे विनोद को ले कर अरहर के खेत में उस जगह पहुंच गए, जहां संतोष की लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी. बेटे की रक्तरंजित लाश देख कर हरिदास गश खा कर वहीं गिर पड़े. कुछ ही देर में यह बात पूरे गांव में फैल गई तो वहां पूरा गांव उमड़ आया.

यह सूचना थाना अहरौला के थानाप्रभारी चंद्रभान यादव को दे दी गई थी. चूंकि हत्या एक पुलिसकर्मी की हुई थी, इसलिए आननफानन में थानाप्रभारी एसआई रमाशंकर यादव, कांस्टेबल महेंद्र कुमार, अखिलेश कुमार पांडेय, ओमप्रकाश यादव और महिला कांस्टेबल अनीता मिश्रा के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना एसपी अजय कुमार साहनी और एसएसपी नरेंद्र प्रताप सिंह को भी दे दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. जिस जगह लाश पड़ी थी, वहां आसपास अरहर की फसल टूटी हुई थी. इस से लग रहा था कि मृतक ने हत्यारों से संघर्ष किया होगा.

संतोष की हत्या कुल्हाड़ी जैसे तेज धारदार हथियार से की गई थी. हथियार के वार से उस का जबड़ा भी कट कर अलग हो गया था. गले पर कई वार किए गए थे. इस के अलावा उसे 2 गोली भी मारी गई थीं. इस से साफ पता चलता था कि हत्यारे नहीं चाहते थे कि संतोष जिंदा बचे. इसलिए मरते दम तक उस पर वार पर वार किए गए थे.

मौकेमुआयने के दौरान पुलिस को वहां कारतूस का एक खाली खोखा भी मिला. संतोष के पास मोबाइल फोन था, जो उस के पास नहीं मिला. इस का मतलब था कि हत्यारे उस का मोबाइल अपने साथ ले गए थे. बहरहाल, पुलिस ने कागजी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने मृतक के पिता हरिदास यादव की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी चंद्रभान यादव ने सब से पहले संतोष के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स खंगाली तो पता चला कि संतोष के सेलफोन पर 30 दिसंबर, 2017 की सुबह आखिरी काल आजमगढ़ के छितौना गांव की रहने वाली ज्योति यादव की आई थी. पुलिस ने ज्योति को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. ज्योति से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि वह मृतक संतोष यादव की प्रेमिका थी.

पुलिस ने जब ज्योति से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने संतोष की हत्या की पूरी कहानी बता दी. उस ने कहा कि संतोष को उस ने ही फोन कर के गांव से बाहर अरहर के खेत में मिलने के लिए बुलाया था. वहां पहले से छिपे बैठे उस के घर वालों ने उसे मौत के घाट उतार दिया. पुलिस ने वारदात में शामिल अन्य आरोपियों की तलाश में दबिश दी तो वे सभी अपने घरों से गायब मिले.

पुलिस ने सिपाही संतोष यादव हत्याकांड का खुलासा 60 घंटों में कर दिया था. ज्योति से विस्तार से पूछताछ की गई तो उस ने अपने प्रेमी की हत्या की जो कहानी बताई, वह रोमांचित कर देने वाली थी—

22 वर्षीया ज्योति उर्फ रजनी मूलरूप से आजमगढ़ के अहरौला थाने के छितौना गांव के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी थी. 3-4 भाईबहनों में वह दूसरे नंबर की थी. रामकिशोर यादव की खेती की जमीन थी, उसी से वह अपने 6 सदस्यों के परिवार की आजीविका चलाते थे. सांवले रंग और सामान्य कदकाठी वाली ज्योति बिंदास स्वभाव की थी. वह एक बार किसी काम को करने की ठान लेती तो उसे पूरा कर के ही मानती थी.

ज्योति ने 12वीं तक पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई नहीं की. आगे की पढ़ाई में उस का मन नहीं लग रहा था. हालांकि मांबाप ने उसे आगे पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश बेकार गई थी.

ज्योति जिस स्कूल में पढ़ने जाया करती थी, उस स्कूल का रास्ता शंभूपुर दमदियावन गांव हो कर जाया करता था. ज्योति सहेलियों के साथ इसी रास्ते से हो कर आतीजाती थी. इसी गांव का रहने वाला संतोष कुमार यादव ज्योति के स्कूल आनेजाने वाले रास्ते में खड़ा हो जाता और उसे बड़े गौर से देखता था. ज्योति भले ही सांवली थी, लेकिन उस में गजब का आकर्षण था. यही आकर्षण संतोष को उस की ओर खींच रहा था.

संतोष ने ज्योति के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि वह पड़ोस के गांव छितौना के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी है और उस का नाम ज्योति है. ज्योति के बारे में सब कुछ पता लगाने के बाद संतोष उस के पीछे पागल दीवानों की तरह घूमने लगा.

ज्योति के घर से स्कूल जाते समय और स्कूल से लौटते समय वह गांव के बाहर खड़ा हो कर उस का इंतजार करता था. ज्योति ने संतोष की प्रेमिल नजरों को पढ़ लिया था. वह जान चुकी थी कि संतोष उस से बेपनाह मोहब्बत करता है. इस के बाद ज्योति के दिल में भी संतोष के प्रति चाहत पैदा हो गई.

ज्योति और संतोष दोनों एकदूसरे को चाहने जरूर लगे थे, लेकिन अपनी मोहब्बत का इजहार नहीं कर पा रहे थे. एक दिन ज्योति घर से स्कूल के लिए अकेली निकली. संतोष पहले से ही गांव के बाहर एक सुनसान जगह पर खड़ा उस का इंतजार कर रहा था.

जब उस ने देखा कि ज्योति अकेली है तो उस ने पक्का मन बना लिया कि कुछ भी हो जाए, आज उस से अपने दिल की बात कह कर ही रहेगा. ज्योति उस के नजदीक पहुंची तो संतोष उस के सामने आ कर खड़ा हो गया.

ज्योति के दिल की धड़कनें भी तेज हो गईं. जब वह रिलैक्स हुई तो संतोष बोला, ‘‘ज्योति, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

ज्योति कुछ बोले बिना साइड से निकल कर आगे बढ़ गई.

‘‘रुक जाओ ज्योति, एक बार मेरी बात सुन लो, फिर चली जाना.’’ वह बोला.

‘‘जल्दी बताओ, क्या कहना चाहते हो. किसी ने देख लिया तो जान पर बन आएगी.’’ ज्योति घबराई हुई थी.

‘‘नहीं, मैं तुम्हारी जान पर आफत नहीं आने दूंगा.’’ संतोष ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ ज्योति चौंक कर बोली.

‘‘यही कि आज से इस जान पर मेरा अधिकार है.’’

‘‘होश में तो हो तुम, क्या बक रहे हो, कुछ पता भी है.’’ ज्योति ने हलके गुस्से में कहा.

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‘‘मुझे पता है कि तुम पड़ोस के गांव छितौना के रामकिशोर यादव की बेटी हो,’’ संतोष कहता गया, ‘‘जानती हो, जिस दिन से मैं ने तुम्हें देखा है, अपनी सुधबुध खो बैठा हूं. न दिन में चैन मिलता है और रात को नींद आती है. बस तुम्हारा खूबसूरत चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहता है. मैं तुम से इतना प्यार करता हूं कि अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा.’’

‘‘लेकिन मैं तो तुम से प्यार नहीं करती.’’ ज्योति ने तुरंत कहा.

‘‘ऐसा मत कहो ज्योति, वरना मैं सचमुच मर जाऊंगा.’’ संतोष गिड़गिड़ाया.

‘‘ठीक है तो मर जाओ, किस ने रोका है.’’ कहती हुई ज्योति होंठ दबा कर मुसकराती हुई स्कूल की ओर बढ़ गई. संतोष तब तक उसे निहारता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. ज्योति की तरफ से कोई सकारात्मक उत्तर न पा कर वह मायूस हो कर घर लौट आया.

ज्योति ने संतोष के मन की टोह लेने के लिए अपने मन की बात जाहिर नहीं की थी, जबकि वह संतोष से दिल की गहराई से प्रेम करने लगी थी. ज्योति का नहीं में उत्तर सुन कर संतोष को रात भर नींद नहीं आई, इसलिए अगले दिन वह फिर उसी जगह जा कर खड़ा हो गया था, जहां उस की ज्योति से मुलाकात हुई थी.

ज्योति नियत समय पर घर से निकली. उस दिन उस के साथ उस की कई सहेलियां भी थीं. जैसे ही ज्योति संतोष के करीब आई, उस ने चुपके से एक कागज गिरा दिया और आगे बढ़ गई. संतोष ने जल्दी से कागज उठा कर अपनी कमीज की जेब में रख लिया. फिर ज्योति को वह तब तक निहारता रहा, जब तक उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.

इस के बाद वह जल्दी में जेब से कागज निकाल कर पढ़ने लगा. वह प्रेमपत्र था. ज्योति का प्रेमपत्र पढ़ने के बाद संतोष ऐसे उछला, जैसे उसे दुनिया का सब से बड़ा खजाना मिल गया हो. उस दिन के बाद से संतोष की हिम्मत और बढ़ गई. स्कूल की छुट्टी के बाद अकसर दोनों रास्ते में ही मिल जाया करते थे.

उन दिनों संतोष कोई काम नहीं करता था, लेकिन उस की ख्वाहिश थी कि उसे पुलिस विभाग में नौकरी मिल जाए. इसलिए वह तैयारी में जुट गया. साथ ही ज्योति के साथ उस की प्यार की उड़ान भी जारी रही. प्यार की बातें चाहे कोई कितनी भी छिपाने की कोशिश करें, छिपती नहीं हैं. लिहाजा इन दोनों के प्रेम के चर्चे दोनों के गांवों में होने लगे. उड़ती हुई यह खबर जब ज्योति के पिता रामकिशोर यादव तक पहुंची तो वह गुस्से से उबल पड़े. उन्होंने ज्योति का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया.

इतना ही नहीं रामकिशोर ने शंभूपुर दमदियावन पहुंच कर संतोष के पिता हरिप्रसाद से शिकायत की. उन्होंने कहा, ‘‘आप अपने बेटे संतोष को संभाल लें. वह मेरी बेटी का स्कूल आतेजाते पीछा करता है. याद रखो, भविष्य में अगर उस ने मेरी बेटी से मिलने की कोशिश की तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा. ठीक से समझ लो, मैं अपनी मानमर्यादा और इज्जत से किसी को भी खिलवाड़ नहीं करने दूंगा.’’

हरिप्रसाद को बेटे की करतूतों के बारे में पता चला तो उन्हें बड़ा दुख हुआ. उन्होंने जब संतोष से यह बात पूछी तो उस ने सब सचसच बता दिया. हरिप्रसाद ने उसे समझाया कि पहले वह अपने भविष्य को देखे, नौकरी की तैयारी करे. समय आने पर वह किसी अच्छी लड़की से उस की शादी करा देंगे.

पिता ने संतोष को ठीक से समझाया तो उस पर उन की बातों का गहरा असर हुआ. लिहाजा वह अपने भविष्य की तैयारी में जुट गया. उस की मेहनत रंग लाई और उस की नौकरी उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर लग गई.

सन 2015 में उस की चंदौली जिले के चकिया थाने में पहली पोस्टिंग हुई. ये बात उस ने सब से पहले ज्योति को बताई. यहां यह बताना जरूरी है कि रामकिशोर ने भले ही संतोष के पिता को धमकी दी थी. लेकिन संतोष और ज्योति पर इस का कोई खास असर नहीं हुआ.

वे दोनों फोन के जरिए एकदूसरे के करीब बने रहे. संतोष ने ज्योति को विश्वास दिलाया कि कुछ भी हो जाए, लेकिन वह शादी उसी से करेगा. यह सुन कर ज्योति काफी खुश थी. उस ने मां के जरिए यह बात अपने पिता और परिवार वालों तक पहुंचा दी. उस की यह कोशिश रंग लाई और उस का परिवार संतोष से उस की शादी कराने के लिए राजी हो गया.

एक तो संतोष को सरकारी नौकरी मिल चुकी थी, दूसरे दोनों एक ही जातिबिरादरी के थे. जब पूरा परिवार एकमत हो गया तो रामकिशोर बेटी का रिश्ता ले कर हरिप्रसाद के पास गए और कहा कि पुरानी बातें भूल कर नए रिश्ते जोड़ते हैं.

हरिप्रसाद रामकिशोर की धमकी को भूले नहीं थे. दूसरे संतोष भी पिता के पक्ष में आ गया था, इसलिए हरिप्रसाद ने रिश्ते से इनकार कर दिया. उस ने पिता से कह दिया कि वह उसी लड़की से शादी करेगा, जिस से वह चाहेंगे. रामकिशोर शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद घर लौट गए.

संतोष 2 साल तक ज्योति का दैहिक शोषण करता रहा था, उसे धोखे में रखे रहा था. अंत में उस ने ज्योति से शादी करने से साफ मना कर दिया था. उस ने ज्योति से साफ कह दिया था कि घर वालों के दबाव में उसे कहीं और शादी करनी पड़ रही है. वह भी किसी अच्छे से लड़के से शादी कर ले.

यह बात ज्योति से बरदाश्त नहीं हुई. उस ने रोरो कर मां के सामने सारी सच्चाई खोल दी. यह बात जब रामकिशोर और उस के बेटे सर्वेश को पता चली तो गुस्से के मारे उन के तनबदन में आग सी लग गई. दोनों ने फैसला किया कि जिस ने ज्योति की जिंदगी बरबाद की है, उसे किसी और लड़की से शादी नहीं करने देंगे. उस ने जो गुनाह किया है, उसे उस की सजा जरूर मिलनी चाहिए.

इस बीच सर्वेश को सूचना मिल गई थी कि 29 दिसंबर, 2017 को संतोष का बरच्छा होने वाला है. इस कार्यक्रम में वह गांव आएगा. संतोष 28 दिसंबर को एक सप्ताह की छुट्टी ले कर घर आया.

तय कार्यक्रम के मुताबिक 29 दिसंबर की शाम को संतोष का बरच्छा का कार्यक्रम संपन्न हुआ. वह बहुत खुश था. 30 दिसंबर की सुबह संतोष दोस्तों के साथ गांव के बाहर निकला, तभी उस के फोन पर ज्योति का फोन आ गया. उस ने संतोष को फोन कर के छितौना गांव के अरहर के एक खेत में मिलने को बुलाया. वहां पहले से ही ज्योति के अलावा उस के पिता रामकिशोर, भाई सर्वेश के साथ गांव के मनोज यादव, संजय यादव और आनंद मौजूद थे.

संतोष के पहुंचते ही रामकिशोर यादव, संजय यादव और आनंद ने संतोष को दबोच लिया. ज्योति को उन लोगों ने वहां से हटा दिया. गुस्से में सर्वेश ने कुल्हाड़ी से संतोष के चेहरे और गरदन पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. संतोष की हत्या करने के बाद वहां से भागते समय सर्वेश ने कुल्हाड़ी एक झाड़ी में छिपा दी. सर्वेश संतोष का फोन भी अपने साथ ले गया. रास्ते में उस ने फोन से सिम निकाल कर कहीं फेंक दी.

ज्योति के गिरफ्तार होने के 15 दिनों के भीतर गांव से एकएक कर के सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी आरोपियों ने अपनेअपने जुर्म कबूल कर लिए थे. सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने झाड़ी से कुल्हाड़ी भी बरामद कर ली. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. पुलिस ने अदालत में सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

तंत्रमंत्र के चक्कर में गई अनीता की जान

“भैया, दरवाजा खोलो.’’ गेट की कुंडी खटखटाते हुए मोहिनी ने तेज आवाज में कहा.

घर के अंदर से कोई आवाज नहीं आई तो मोहिनी ने और तेज आवाज लगाते हुए एक बार फिर दरवाजे की कुंडी खटखटाई. इस बार घर के अंदर से किसी पुरुष की आवाज आई, ‘‘कौन है?’’

‘‘भैया, मैं हूं.’’ मोहिनी ने बाहर से जवाब दिया.

इस के बाद घर के अंदर से किसी के चल कर आने की पदचाप सुनाई दी तो मोहिनी आश्वस्त हो गई.

दरवाजा श्याम सिंह ने खोला. गेट पर छोटी बहन मोहिनी को देख कर उस ने पूछा, ‘‘मोहिनी, रात को आने की ऐसी क्या जरूरत पड़ गई. घर पर मम्मीपापा तो सब ठीक हैं न?’’

‘‘भैया, मम्मीपापा तो सब ठीक हैं, लेकिन बड़ी दीदी ठीक नहीं हैं.’’ मोहिनी ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘भैया, अंदर चलो. मैं सारी बात बताती हूं.’’ मोहिनी श्याम सिंह को घर के अंदर ले गई.

श्याम सिंह ने पहले घर का दरवाजा बंद किया, फिर मोहिनी को ले कर अपने कमरे में आ गया. मोहिनी से कमरे में बिछी चारपाई पर बैठने को कह कर वह उस के लिए मटके से पानी का गिलास भर कर ले आया. गिलास मोहिनी के हाथ में देते हुए श्याम सिंह ने कहा, ‘‘मोहिनी, तुम पहले पानी पी लो, फिर बताओ ऐसी क्या बात हुई, जिसे ले कर तुम परेशान हो.’’

मोहिनी एक ही बार में पूरा पानी पी गई. फिर लंबी सांस ले कर कुछ देर चुपचाप बैठी रही. मोहिनी को चुप बैठा देख श्याम सिंह बेचैन हो गया. उस ने मोहिनी के सिर पर स्नेह से हाथ रख कर पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है?’’

चुप बैठी मोहिनी की आंखों में आंसू आ गए. वह बोली, ‘‘भैया, आप को यह तो पता ही है कि अनीता दीदी बहुत दिनों से बीमार थीं. दीदी 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन ज्यादा बीमार हो गईं. फिर अगले दिन बेहोश हो गई थीं. उस दिन के बाद से मैं ने दीदी को नहीं देखा, पता नहीं वह जिंदा भी हैं या नहीं?’’

श्याम सिंह ने बहन की आंखों में डबडबा आए आंसू पोंछ कर उस के इस शक की वजह पूछी.

‘‘मुझे शक इसलिए है कि घर में जिन तांत्रिकों ने डेरा जमा रखा है, वे मुझे दीदी के कमरे में जाने तक नहीं देते. दीदी के कमरे से बदबू आती है, लेकिन तांत्रिक दिन भर अगरबत्ती जलाए रखते हैं और इत्र छिड़कते रहते हैं ताकि बदबू न आए.’’

बहन की बातें सुन कर श्याम सिंह चिंता में पड़ गया. उसे पता था कि उस की बड़ी बहन अनीता बीमार रहती है और कुछ तांत्रिक उस का इलाज करने के नाम पर लंबे समय से घर में डेरा जमाए हुए हैं. उन तांत्रिकों ने उस के मातापिता को भी अपने जाल में कुछ इस तरह फंसा रखा था कि वे उन के कहे अनुसार ही चलते थे.

श्याम सिंह ने मोहिनी से पूछा, ‘‘मम्मीपापा को इस बात का पता है या नहीं कि दीदी के कमरे से बदबू आ रही है?’’

‘‘भैया, तांत्रिकों ने तंत्रमंत्र के नाम पर मम्मीपापा को अंधविश्वास में इतना डुबो दिया है कि वे उन की बातों से आगे कुछ नहीं सोचतेसमझते.’’ मोहिनी ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘अब तो तांत्रिक मम्मीपापा को भी दीदी के कमरे में नहीं जाने देते.’’

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कुछ देर चुप रहने के बाद मोहिनी ने कहा, ‘‘भैया, कुछ करो वरना वे तांत्रिक मम्मीपापा और मुझे भी मार देंगे.’’

‘‘तू चिंता मत कर, हम अभी थाने चलते हैं और उन तांत्रिकों की करतूत पुलिस को बता देते हैं.’’

यह बीती 27 फरवरी की रात करीब 9-10 बजे की बात है. श्याम सिंह छोटी बहन मोहिनी को साथ ले कर गंगापुर सिटी थाने जा पहुंचा.

थाने में मौजूद ड्यूटी अफसर को श्याम सिंह ने सारी बातें बताईं. मामला गंभीर था. ड्यूटी अफसर ने सूचना दे कर थानाप्रभारी दीपक ओझा को बुलवाया.

थानाप्रभारी ओझा ने श्याम सिंह से पूरी बात पूछी और लिखित में शिकायत देने को कहा. श्याम सिंह ने पुलिस को लिखित शिकायत दे दी. थानाप्रभारी ओझा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएसपी नरेंद्र शर्मा को सारी जानकारी दी. इस पर डीएसपी ने कहा कि वे गंगापुर सिटी थाने आ रहे हैं और अभी तुरंत काररवाई करेंगे.

कुछ ही देर में डीएसपी नरेंद्र शर्मा थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी दीपक ओझा से सारा मामला समझ कर शर्मा ने कहा कि यह एक लड़की के जीवनमरण से जुड़ा मामला है. पता नहीं कि वह लड़की जिंदा भी है या नहीं. इसलिए हमें अभी रात में ही काररवाई करनी होगी. उन्होंने थानाप्रभारी को तुरंत एक टीम तैयार करने को कहा. इसी के साथ उन्होंने श्याम सिंह को बुला कर उस से तांत्रिकों के बारे में कुछ सवाल पूछे. इतनी देर में पुलिस टीम तैयार हो गई. तब तक रात के करीब 11 बज गए थे. डीएसपी नरेंद्र शर्मा के नेतृत्व में गंगापुर सिटी थानाप्रभारी दीपक ओझा अपनी टीम के साथ श्याम सिंह और मोहिनी को साथ ले कर उन के बताए पते पर रवाना हो गए.

10-15 मिनट में पुलिस टीम इंद्रा मार्केट पहुंच गई. मोहिनी अपने मातापिता के साथ इसी मार्केट में बने मकान में रहती थी. श्याम सिंह ने इंद्रा मार्केट में एक जगह पुलिस टीम को रोक कर एक मकान की ओर इशारा कर के बताया कि यह हमारा मकान है.

पुलिस टीम उस मकान पर पहुंची, लेकिन वहां ताला लटक रहा था. पुलिस को पता लगा कि घर के लोग और तांत्रिक अंदर ही हैं. इस पर पुलिस टीम ने पड़ोस के मकान से हो कर उस घर में प्रवेश किया.

पुलिस टीम जब घर के अंदर पहुंची तो हैरान रह गई. एक कमरे में जमीन पर लगे बिस्तर पर अनीता की लाश पड़ी थी. उस की लाश पर चादर डाली हुई थी. अनीता के शरीर पर कपड़े भी नहीं थे. शरीर पर कई जगह पट्टियां बंधी हुई थीं.

घर में 6 लोग मौजूद थे. इन में मोहिनी के पिता ताराचंद राजपूत और मां उर्मिला देवी के अलावा 4 तांत्रिक थे. पुलिस ने ताराचंद और उस की पत्नी उर्मिला से पूछताछ की तो पता चला कि तांत्रिक उन्हें लगातार डरातेधमकाते रहे, उन्होंने अनीता का इलाज नहीं करवाने दिया. तांत्रिक उन से कहते रहे कि अनीता जीवित है और जल्दी ही ठीक हो जाएगी. इस के लिए तांत्रिक कमरे में तंत्रमंत्र का नाटक करते रहे.

पुलिस रात को ही अनीता के पिता ताराचंद राजपूत, मां उर्मिला के अलावा चारों तांत्रिकों को पकड़ कर गंगापुर सिटी थाने ले आई. पुलिस ने मकान सीज कर के वहां पुलिस कांस्टेबल तैनात कर दिया.

थाने ला कर चारों तांत्रिकों से पूछताछ की गई. पूछताछ में पता चला कि उस दिन रात घिरते ही मोहिनी मौका देख कर बिना किसी को बताए घर से निकल गई थी. वह अपने भाई श्याम सिंह को तांत्रिकों की करतूत बताने के लिए गई थी. तांत्रिकों को जब पता चला कि मोहिनी घर से गायब है तो एक तांत्रिक सपोटरा निवासी गजेंद्र उर्फ पप्पू शर्मा उस की तलाश में घर से निकला.

जाते समय गजेंद्र ने घर के बाहर से ताला लगा दिया था. इसी वजह से वह मौके पर नहीं मिला. बाद में वह फरार हो गया था. पुलिस ने 28 फरवरी को अनीता के मातापिता और चारों तांत्रिकों को गैरइरादतन हत्या और आपराधिक षडयंत्र की धाराओं में गिरफ्तार कर लिया. इन तांत्रिकों में सपोटरा निवासी गजेंद्र उर्फ पप्पू शर्मा की पत्नी मंजू, मथुरा निवासी बंटी उर्फ संदीप शर्मा, महूकलां निवासी नीटू चौधरी और धूलवास निवासी गोपाल सिंह शामिल थे.

उसी दिन पुलिस ने विधिविज्ञान प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों की टीम बुला कर मौके की जांचपड़ताल कराई. इस के बाद अनीता का शव सिविल अस्पताल पहुंचाया गया. शव का पोस्टमार्टम अस्पताल में 3 डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से कराया गया. मैडिकल बोर्ड में डा. बी.एल. बैरवा, डा. कपिल जायसवाल और डा. मनीषा गोयल शामिल थीं.

बाद में डा. बी.एल. बैरवा ने बताया कि शव काफी दिनों पुराना था. जांच के लिए विसरा ले कर विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया. पोस्टमार्टम कराने के बाद पुलिस ने अनीता का शव अंतिम संस्कार के लिए उस के भाई को सौंप दिया.

पुलिस की पूछताछ और जांचपड़ताल में अंधविश्वास की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

रणथंभौर अभयारण्य बाघों की शरणस्थली के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है. यह बाघ अभयारण्य राजस्थान के सवाई माधोपुर में है. इसी सवाई माधोपुर जिले में गंगापुर सिटी है. गंगापुर सिटी के इंद्रा मार्केट में ताराचंद राजपूत अपनी पत्नी उर्मिला और परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में 3 बेटे श्याम सिंह, गोविंद और नरेंद्र तथा 2 बेटियां थीं अनीता और मोहिनी.

अनीता कई साल पहले से बीमार रहती थी. ताराचंद ने बेटी का इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. ताराचंद पुराने विचारों के आदमी थे. कुछ लोगों ने उन्हें सयानेभोपों से बेटी का इलाज कराने की बात कही. उस दौरान तांत्रिक गजेंद्र और उस के साथी गोपाल सिंह, नीटू चौधरी और बंटी उर्फ संदीप शर्मा ताराचंद के संपर्क में आए. इन लोगों ने अनीता पर भूतप्रेत का साया बताया और ताराचंद के घर पर ही आ कर तंत्रमंत्र के नाम पर उस का इलाज करते रहे.

उन्होंने अपने अंधविश्वास से ताराचंद को इस कदर वशीभूत कर लिया कि उस की सोचनेसमझने की शक्ति कमजोर पड़ती गई. ताराचंद पूरी तरह उन तांत्रिकों के चंगुल में फंस गया.

कुछ दिन पहले इन तांत्रिकों ने ताराचंद से कहा कि अनीता अब बिलकुल ठीक हो गई है. साथ ही उसे यह भी बताया कि तंत्रमंत्र से उन्होंने अनीता के शरीर में देवी का प्रवेश करवा दिया है. इस के बाद इन तांत्रिकों ने अनीता को मोहरा बना कर ताराचंद के मकान के एक कमरे में मंदिर बना दिया. उस मंदिर में उन्होंने अनीता को एक गद्दी पर बैठा दिया.

बाद में ये तांत्रिक अनीता के शरीर में देवी होने की बात प्रचारित करके तंत्रमंत्र से दूसरे लोगों का इलाज करने लगे. गांवदेहात के नासमझ लोग बहकावे में आ कर ताराचंद के मकान पर इन तांत्रिकों के पास आने लगे. ये लोग इलाज करने के बहाने लोगों से किसी न किसी रूप में जेवर व पैसा आदि वसूलने लगे.

अपने घर में तांत्रिकों का डेरा देख कर ताराचंद के बेटे विरोध करने लगे. उन्होंने मातापिता को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं माने. तीनों बेटे बड़े हो गए थे. अनीता भी बड़ी थी.

पहले बीमार रहने और फिर तांत्रिकों के चक्कर में पड़ने की वजह से उस की शादी की उम्र भी निकल गई थी. बड़ी बहन की शादी नहीं होने और मातापिता के लगातार उन तांत्रिकों पर बढ़ते विश्वास के कारण घर में कलह रहने लगी.

रोजरोज की कलह से तंग आ कर तीनों भाई अलगअलग रहने लगे. उन्होंने अपने मातापिता का मकान छोड़ दिया. इन में 2 भाई श्याम सिंह और गोविंद गंगापुर सिटी में ही नहर रोड पर रहने लगे थे. तीसरा भाई नरेंद्र हरियाणा के बल्लभगढ़ में जा कर रहने लगा था. बड़ी बेटी अनीता और छोटी बेटी मोहिनी मातापिता के साथ इंद्रा मार्केट में अपने मकान में ही रहती रहीं.

तांत्रिकों ने ताराचंद को पूरी तरह से अपने प्रभाव में ले रखा था. अनीता के बहाने उन्हें लोगों को ठगने का ठिकाना मिल गया था. हालांकि इन सभी तांत्रिकों के अपने घरपरिवार थे, लेकिन ये दिनरात ताराचंद के मकान पर जब चाहे आतेजाते रहते थे.

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इसी साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर अनीता ज्यादा बीमार हो गई. इन तांत्रिकों ने ताराचंद और उस की पत्नी को डरा दिया कि अगर उसे अस्पताल ले गए तो यह मर जाएगी. इस का इलाज हम ही करेंगे.

ताराचंद पहले से ही तांत्रिकों के अंधविश्वास में डूबा हुआ था. अनीता की मां उर्मिला भी उन तांत्रिकों को बेटी पर तंत्रमंत्र करने से मना नहीं कर सकी. तांत्रिकों ने अनीता पर तंत्रमंत्र किया, लेकिन अगले ही दिन यानी 15 जनवरी को अनीता की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. वह बेहोश हो गई.

इस के बाद उन तांत्रिकों ने अनीता को एक कमरे में बंद कर दिया और तंत्रमंत्र के नाम पर उस का इलाज करने की बात कहते रहे. उस कमरे में केवल ये तांत्रिक ही आतेजाते थे. ये लोग दूसरे लोगों को उस कमरे में नहीं जाने देते थे.

ताराचंद और उर्मिला के बहुत जिद करने पर उन्हें कभीकभार उस कमरे में जाने देते थे. मोहिनी को भी वे लोग अनीता के कमरे में नहीं जाने देते थे. तांत्रिक मोहिनी को घर से बाहर भी नहीं निकलने देते थे.

ताराचंद या उर्मिला जब उस कमरे में जाते तो अनीता उन्हें बिस्तर पर लेटी ही मिलती. कमरे में दिनरात अगरबत्ती जलती रहती थीं. कमरा इत्र की खुशबू से महकता रहता था. तांत्रिक कहते थे कि अनीता जीवित है, लेकिन अभी वह तुम से बात नहीं कर सकती. कुछ दिन ठहर जाओ, वह पूरी तरह ठीक हो जाएगी, तब बात कर लेना. ताराचंद और उर्मिला उन तांत्रिकों की बातों पर भरोसा कर के चुप रह जाते थे.

मोहिनी उसी घर में रह रही थी. वह नहीं समझ पा रही थी कि बहन अगर जीवित है तो कमरे से बाहर क्यों नहीं निकलती? उसे बहन से मिलने क्यों नहीं दिया जाता? कुछ दिनों से उसे अनीता के कमरे से दुर्गंध आने लगी थी. कई बार वह उस कमरे में जाने की कोशिश करती, लेकिन तांत्रिक उसे रोक देते थे. उस कमरे में लगातार सुगंधित अगरबत्ती जलने और इत्र का छिड़काव होने से दुर्गंध इतनी ही थी कि घर में लेगों को महसूस हो जाए. घर से बाहर तक दुर्गंध नहीं जा रही थी.

लगातार कई दिनों तक बदबू आने से मोहिनी को शक हुआ कि दाल में जरूर कुछ काला है. उसे सब से ज्यादा चिंता अपनी बहन अनीता की थी, इसीलिए 27 फरवरी की रात मौका मिलते ही वह घर से निकल कर सीधे नहर रोड स्थित अपने भाई श्याम सिंह के घर पहुंच गई थी.

भाई को तांत्रिकों की सारी करतूतें बता कर उस ने अपना शक जाहिर कर दिया था. इस के बाद श्याम सिंह ने कोतवाली थाने पहुंच कर रिपोर्ट दर्ज कराई और पुलिस ने उस के मातापिता सहित चारों तांत्रिकों को गिरफ्तार कर लिया.

करीब 35 साल की बीमार युवती को इलाज के नाम पर डेढ़ महीने तक कमरे में बंद रखने और इस बीच उस की मौत हो जाने के बाद उस का शव घर में ही रख कर तंत्रमंत्र करने वाले तांत्रिकों को डर था कि मोहिनी उन का भेद खोल सकती है.

इसलिए वे उसे घर से बाहर नहीं निकलने देते थे. एक दिन मोहिनी ने उन तांत्रिकों से अनीता की मौत की आशंका जताई तो उन्होंने पिस्तौल दिखा कर उसे डरायाधमकाया कि उस ने अगर इस बारे में किसी से जिक्र किया तो अच्छा नहीं होगा.

तांत्रिकों ने अनीता के मातापिता और बहन मोहिनी को उन के ही घर में एक तरह से कैद कर के रखा हुआ था. उन के बाहर आनेजाने, किसी को फोन करने, मिलनेजुलने और बाहर की दुनिया से किसी तरह का संबंध रखने की सख्त मनाही थी. तांत्रिकों व उन के साथियों का 24 घंटे उन पर अघोषित पहरा रहता था.

तांत्रिक और उन के साथी अपने लिए कोई सामान खरीदने बाहर जाते तो वे घर के बाहर ताला लगा कर जाते थे ताकि बाहर का कोई आदमी अंदर न आ सके और अंदर से कोई बाहर न जा सके.

पुलिस ने तांत्रिकों से पूछताछ के बाद नीटू चौधरी की निशानदेही पर ताराचंद के मकान में उस कमरे से एक पिस्तौल और 8 जिंदा कारतूस बरामद किए, जिस कमरे में तांत्रिकों ने मंदिर बना रखा था. इसी कमरे की तलाशी में पुलिस को लाखों रुपए के जेवरात भी मिले. ये जेवरात ताराचंद और उस के परिवार के नहीं थे, बल्कि तांत्रिकों ने तंत्रमंत्र के नाम पर लोगों से ठगे थे. पुलिस ने अवैध हथियार मिलने पर नीटू चौधरी और फरार गजेंद्र शर्मा के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत अलग मामला दर्ज किया.

कथा लिखे जाने तक एक तांत्रिक गजेंद्र शर्मा फरार था. गिरफ्तार किए गए चारों तांत्रिक और मृतका अनीता के मातापिता अदालत के आदेश पर न्यायिक हिरासत में जेल में थे. गंगापुर सिटी थाने के सबइंसपेक्टर महेंद्र राठी इस मामले की जांच कर रहे थे.

यह विडंबना ही है कि विज्ञान के इस युग में तंत्रमंत्र के नाम पर ठगों ने अपना ऐसा जाल बिछा रखा है कि नासमझ और गांवदेहात को छोडि़ए, पढ़ेलिखे और अमीर लोग भी अंधविश्वास में फंस कर इन के बहकावे में आ जाते हैं. लेकिन यह अंधविश्वास की पराकाष्ठा है कि करीब एकडेढ़ महीने तक मृत युवती के शव को जीवित करने के नाम पर तांत्रिक कथित तौर पर जादूटोना करते रहे. दूसरों का भविष्य बताने वाले इन तांत्रिकों को खुद के भविष्य का पता नहीं था कि उन्हें जेल जाना पड़ेगा.

कायर : घना को मिल पाया अपना प्यार

घना जानता था कि श्यामा निचली जाति की लड़की है, पर उस के अच्छे बरताव की वजह से वह उस के प्रति खिंचता चला गया था. यहां तक कि वह श्यामा से शादी करने को भी तैयार था.

वैसे, घना जाति प्रथा को भारतीय समाज के लिए अभिशाप मानता था और अकसर अपने दोस्तों के साथ अंधविश्वास, जाति प्रथा जैसी बुराइयों पर बड़ीबड़ी बातें भी करता था.

घना कई बार अपने मन की बात श्यामा तक पहुंचाने की कोशिश कर चुका था, पर श्यामा ने उसे कभी भी आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया था.

आज घना को श्यामा से अकेले में बात करने का मौका मिल गया था और वह इस मौके को खोना नहीं चाहता था.

श्यामा आ रही थी. घना ने अपने गांव के दोस्तों को पहले ही चले जाने के लिए कह दिया था और खुद श्यामा का इंतजार कर रहा था.

जैसे ही श्यामा उस के करीब से गुजरी, घना ने उसे रुकने को कहा.

‘‘श्यामा,’’ घना ने अपना गला साफ करते हुए कहा.

‘‘जी,’’ श्यामा ने एक पल के लिए घना की ओर देखा और आगे बढ़ गई.

‘‘आज मौसम बहुत खराब है,’’ घना बोला.

श्यामा ने कुछ नहीं कहा.

‘‘श्यामा, मैं तुम से कुछ बात कहना चाहता हूं.’’

श्यामा फिर भी चुप रही. घना श्यामा के बहुत करीब आ गया.

श्यामा घना की बात को अच्छी तरह से सम?ा रही थी. उस ने गुस्से से घना की तरफ देखा.

घना थोड़ा सा सहम गया था, पर वह सोचने लगा कि अगर आज नहीं कहेगा, तो वह अपनी बात कभी नहीं कह पाएगा.

‘‘श्यामा… मैं…मैं… तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ जैसे कि श्यामा घना की बात का मतलब न सम?ा हो.

‘‘श्यामा, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं.’’

‘‘यह जानते हुए भी कि मैं निचली जाति की हूं और आप ऊंची जाति वाले.’’

‘‘हां.’’

‘‘मैं इस तरह की किसी भी बहस

में नहीं उल?ाना चाहती. अगर किसी ने यह सब सुन लिया, तो आप की बहुत बदनामी होगी.’’

‘‘श्यामा, मैं तुम से बहुत प्यार

करता हूं और तुम्हीं से शादी भी करना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम्हारे गांव के सब बराती निचली जाति वालों के हाथ का पका खाना खाएंगे? जो लोग निचली जाति वालों की छाया से भी दूर रहते हैं, क्या वे एक अछूत लड़की को अपने घर की बहू बनाएंगे?

‘‘घना, मु?ा गरीब पर दया करो. मैं किसी किस्सेकहानी का पात्र नहीं

बनना चाहती हूं. आप ऊंची जाति वालों की नजर में भले ही हमारी कोई इज्जत नहीं है, पर अपनी नजर में हमारी बहुत इज्जत है.

‘‘मेरे पिता एक स्कूल में मास्टर हैं. समाज में उन की भी कुछ इज्जत है. मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूं कि मेरे साथ आगे से ऐसी हरकत कभी मत करना.’’

श्यामा का ऐसा चेहरा देख कर घना सकते में आ गया. वह कुछ न बोल सका और चुपचाप वहीं खड़ा रह गया. श्यामा तेज कदमों से आगे बढ़ गई.

श्यामा जा चुकी थी, पर उस के कहे गए शब्द घना के कानों मेें बारबार गूंज रहे थे.

घना ने आसमान की ओर देखा. आसमान में घने बादल छाए हुए थे. वह सोचने लगा कि आज की रात फिर बर्फबारी होने वाली है. वह बहुत निराश था. क्या करे? कहां जाए? खुदकुशी कर ले? समाज की रूढि़यों, जाति प्रथा के चलते ही तो श्यामा ने उस के प्यार

को ठुकरा दिया था, वरना उस में क्या कमी थी.

घना को लगा कि यह जिंदगी ही बेकार है. वह बदहवास सा रास्ते से हट कर ऊपर पहाड़ी पर चढ़ने लगा. चारों तरफ अंधेरा बढ़ने लगा था. जब वह चलतेचलते थक गया, तो सुस्ताने के लिए एक बड़े पत्थर पर बैठ गया.

रात अब काफी हो चुकी थी. काफला और खड़कोट, दोनों गांवों के बीच, जहां पर खेत खत्म हो जाते हैं, वहां पर एक बेसिक स्कूल था. इस के बाद जंगल शुरू हो जाता था. बस्ती से दूर होने के चलते रात में स्कूल में कोई नहीं रहता था.

घना सोचने लगा कि आज की रात वह इसी स्कूल में बिता देगा. कल देखा जाएगा. अंधेरे में चलते, गिरतेपड़ते, ?ाडि़यों से गुजरते हुए उस का बदन बुरी तरह से छिल गया था. कई खरोंचें भी लग गई थीं.

जब घना स्कूल में पहुंचा, तब वहां भयंकर सन्नाटा पसरा हुआ था. वह स्कूल के बरामदे के एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गया. ठंड से उस की हड्डियां तक कांप रही थीं. श्यामा का एहसास उस के दिलोदिमाग से हटने का नाम नहीं ले रहा था.

घना सोचने लगा कि श्यामा का गांव यहां से थोड़ी ही दूर पर है. क्यों न एक बार फिर कोशिश की जाए. आज उसे किसी बात का डर नहीं था. न मरने का डर, न जंगली जानवरों का डर. लिहाजा, वह श्यामा के घर की तरफ चल पड़ा.

घना मास्टर बिछन दास के घर के सामने रुक गया.

खड़कोट गांव के एक हिस्से में ब्राह्मण और एक हिस्से में दलित रहते हैं. इसी गांव के दलित टोले के बिछन दास मास्टर की बेटी श्यामा सेंदुल कालेज में बीए के आखिरी साल में पढ़ रही थी.

मास्टर बिछन दास नजदीक के ही एक गांव में मिडिल स्कूल के हैडमास्टर थे. खेतीबारी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पत्नी भी अकसर उन के साथ ही

रहती थी.

बिछन दास का स्कूल बहुत ज्यादा दूर न होने के चलते वे हर 15 दिन बाद घर आ जाते थे. श्यामा अपनी बूढ़ी दादी मां के साथ गांव में रहती थी.

करीब के गांव का होने की वजह से और श्यामा में घना की खास दिलचस्पी होने के चलते उसे श्यामा और उस के घर के बारे में बहुतकुछ पता था.

घना जानता था कि श्यामा की मां अकसर उस के पिता के साथ ही रहती हैं. घर में उस की बूढ़ी दादी मां न साफ देखती हैं और न साफ सुनती हैं. उसे यह भी पता था कि श्यामा घर की अलग कोठरी में पढ़ाई करती है. हो सकता है कि वह अभी भी पढ़ रही हो.

घना जब श्यामा के घर के चौक में पहुंचा, तब उस ने देखा कि ऊपरी मंजिल की एक कोठरी में अभी भी रोशनी थी. वह जानता था कि श्यामा इसी कोठरी में पढ़ रही होगी.

घना ने दरवाजा खटखटाया. कमरे में कोई भी हलचल नहीं हुई. उस ने फिर दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ कोठरी से श्यामा की आवाज आई.

‘‘मैं… घना.’’

‘‘घना?’’

‘‘हां, घना.’’

‘‘इतनी रात में…’’

‘‘हां, दरवाजा खोल दो. अपनी बात कर के मैं यहां से चला जाऊंगा.’’

श्यामा ने घड़ी की ओर देखा. रात के 2 बज रहे थे. वह सोचने लगी, ‘क्या करूं? दरवाजा खोलूं, तो कहीं यह कोई ?ां?ाट न खड़ा कर दे. अपनी बात कहने के अलावा यह और क्या कर सकता है? यह मेरा घर है. एक दलित लड़की के घर में इतनी रात को… इसे भी तो अपनी इज्जत का खयाल होगा.’

श्यामा ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर घना खड़ा था. कपड़े फटे हुए, चेहरे पर खरोंचों के निशान, जिन से खून निकल रहा था.

श्यामा को उस पर तरस आ गया. उस ने उसे अंदर आने दिया. वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था. उस के चेहरे पर पीड़ा साफ ?ालक रही थी.

‘‘यह सब क्या है?’’ श्यामा ने हैरान होते हुए पूछा.

घना ने श्यामा के साथ कालेज से घर आते समय रास्ते में जो बातचीत हुई थी, उस के बाद की सारी घटना बता दी.

‘‘मैं क्या करूं श्यामा? मैं अपने को संभाल नहीं पा रहा हूं. तुम्हारे बिना मैं अब जी नहीं सकूंगा.’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? यह तो जबरदस्ती है. मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती. ऐसा कभी नहीं हो सकता. मैं ने आप से पहले भी कहा था.’’

‘‘ठीक है, तब फिर चलता हूं. मैं तुम्हारा नुकसान नहीं करना चाहता. ज्यादा क्या कहूं… शायद यह मेरी जिंदगी की आखिरी रात है,’’ कह कर घना उठने को हुआ.

‘‘इतनी रात को तुम कहां जाओगे?’’ श्यामा ने डर कर पूछा.

‘‘कहां जाऊंगा? जहां एक दिन सभी को जाना है. क्यों न मैं आज ही भिलंगना नदी में डूब जाऊं. मैं जी कर क्या करूंगा, खुद भी नहीं जानता. पर मैं तुम से माफी मांगता हूं. मैं ने तुम्हें बहुत तकलीफ दी है, मु?ो माफ कर देना.’’

घना ने दरवाजे की तरफ कदम रखा ही था कि श्यामा ने उस की बांह थाम कर उसे कुरसी पर बैठा दिया.

श्यामा सोचने लगी, ‘इसे अगर मैं आज ठुकरा दूं, तो हो सकता है कि यह सचमुच भिलंगना नदी में छलांग मार दे. जो शख्स इस बर्फीली रात में घने जंगल से हो कर मेरे घर आने की हिम्मत कर सकता है, वह खुदकुशी कर ले, तो इस में क्या हैरानी है. और खुदकुशी क्या, इसे तो कोई जंगली जानवर रास्ते में ही अपना निवाला बना सकता है. तब शायद किसी को कुछ पता न चले, पर मैं तो सबकुछ जानती हूं. तब मैं क्या खुद को कभी माफ कर पाऊंगी?

‘नहीं, मैं जिंदगीभर अपने को अपराधी सम?ाती रहूंगी और यह तो मु?ा से प्यार करता है और शादी भी करने को तैयार है. क्या हमारा समाज यह सब होने देगा? नहीं, समाज तो ऐसा कभी नहीं होने देगा. पर हम कहीं दूर दिल्लीमुंबई चले जाएंगे. वहां हमारी जातपांत से किसी को क्या मतलब होगा?’

श्यामा बहुत दूर की बात सोचने लग गई थी.

‘‘श्यामा, तुम डरो मत. मैं तुम्हारा कोई नुकसान करने नहीं आया हूं. मैं तो केवल तुम्हें अपने मन की बात बताने आया था, तुम पर खुद को थोपने नहीं. तुम चिंता मत करो. अब मु?ो जाना ही चाहिए,’’ इतना कह कर घना दोबारा उठ कर जाने लगा.

‘‘रुको…’’ श्यामा ने कहा. घना जैसा था, वैसे ही बैठ गया.

‘‘अच्छा सुनो, आप ने कहा कि आप मु?ा से बहुत प्यार करते हो. क्या आप मु?ा से शादी कर के समाज का सामना कर पाओगे?’’

‘‘हां, जरूर करूंगा. मैं जानता हूं कि यह समाज ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा, पर हम यहां से कहीं दूर अपनी दुनिया बसाएंगे.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘एक साल बाद मैं कालेज पास कर लूंगा, फिर देखना मु?ो कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी और फिर हम किसी मंदिर में शादी कर लेंगे.’’

‘‘ठीक है, जब आप इतना खतरा मोल ले कर इस बर्फीली रात में मेरे

घर तक आए हो, तब मैं आप पर पूरा

भरोसा करती हूं कि आप अपने वचनों को जरूर निभाओगे…’’ फिर कुछ सोच कर श्यामा ने पूछा, ‘‘आप ने कुछ खाया तो होगा नहीं?’’

‘‘नहीं, कुछ भी नहीं खाया. सुबह कालेज जाते समय खाया था, उस के बाद मुरली की दुकान पर एक कप चाय पी थी. मु?ो बहुत भूख लगी है,’’ भूख और ठंड का असर घना के चेहरे से साफ ?ालक रहा था.

‘‘क्या करूं? रोटी और आलू की सब्जी बची हुई है, पर मैं आप को खाने को दे भी नहीं सकती.’’

‘‘अरे, लाओ न फिर.’’

‘‘यह ठीक नहीं होगा. एक अछूत के घर में ब्राह्मण भोजन करेगा, यह नामुमकिन है. ऐसा नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं तो भूख से मरा जा रहा हूं और तुम्हें छुआछूत की पड़ी है.’’

‘‘तुम्हारा धर्म बिगड़ जाएगा. अगर ब्राह्मणों को पता चल गया, तो गजब हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हारे साथ जीनेमरने के लिए मैं ने आज इतना बड़ा जोखिम उठाया है. अब जबकि तुम्हारे हाथ का बनाया ही जिंदगीभर खाना है, तब आज की रात परहेज क्यों? और तुम तो जानती हो कि मैं जातपांत, छुआछूत में जरा भी यकीन नहीं करता हूं.’’

‘‘खाओगे?’’ श्यामा ने डरे मन

से पूछा.

‘‘हां, जरूर खाऊंगा. तुम लाओ तो सही.’’

‘‘चलो फिर, रसोईघर में चलो, वहीं गरमागरम खिलाऊंगी…’’ फिर कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘अच्छा, मैं यहीं पर लाती हूं. बाहर बहुत ठंड है.’’

श्यामा रसोईघर से खाना लाने चली गई. घना भविष्य के तानेबाने बुनने में खो गया. श्यामा थोड़ी ही देर में सब्जीरोटी ले कर आ गई. घना रोटी खाने लगा.

श्यामा को घना की इस हालत पर तरस आ रहा था. वह घना को देख रही थी और सोच रही थी, ‘यह मु?ो कितना चाहता है? एक ब्राह्मण का बेटा हो कर किस तरह अपने पुरखों के बनाए उसूलों को ताक पर रख कर एक अछूत के घर पर अपने पेट की भूख मिटा रहा है. इस बर्फीली रात में किस तरह भयानक जंगल से हो कर मेरे दरवाजे पर प्यार की भीख मांगने आया है,’ उस का सहज और सरल मन पिघल गया.

सुबह होने से पहले ही घना श्यामा के घर से निकल गया था. लेकिन अब उस के मन में एक उमंग थी, एक जोश था. वह सोचने लगा, ‘घर में कोई भी बहाना बना दूंगा.’

गांव के बीचोंबीच एक छोटी नदी बहती थी. घना ने उस नदी में हाथमुंह धोए और अपने घर की ओर चल पड़ा.

अब घना अकसर रात में बहुत ही सावधानी के साथ श्यामा के घर जाने लगा. दोनों अपनी भावी जिंदगी के बारे में खूब बातें करते, योजनाएं बनाते. इस बीच जब रिजल्ट निकला, तो घना फर्स्ट डिविजन के साथ अपने कालेज में अव्वल आया था. श्यामा की भी फर्स्ट डिविजन आई थी. दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था.

अपने मामा की सलाह पर घना ने दिल्ली में एक साल के कंप्यूटर कोर्स में दाखिला ले लिया. इस बीच घना जब भी गांव आता, दोनों सावधानी से मिलते रहे.

श्यामा ने एमए का पहला साल भी अच्छे नंबरों से पास कर लिया. घना का कंप्यूटर का कोर्स भी पूरा हो गया था. एक कंपनी में उसे अच्छी नौकरी मिल गई. नईनई नौकरी थी, इसलिए वह दिल्ली में बहुत मसरूफ हो गया.

श्यामा ने अब की बार भी बहुत मेहनत की थी, इसलिए उस ने एमए भी फर्स्ट डिविजन से पास किया थी.

श्यामा को लगा कि अब उस के सपने सच होने वाले हैं. वह बहुत

खुश थी. उस के पिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ने के लिए जल्दबाजी करने लगे, जबकि श्यामा इस बात से बहुत बेचैन थी.

काफला गांव का शिवप्रसाद उर्फ शिबी घना का दोस्त था. वह श्यामा और घना की प्रेम कहानी का एकमात्र गवाह भी था.

शिबी कई बार घना और श्यामा का संदेशवाहक भी रह चुका था, इसलिए श्यामा ने शिबी से अपनी चिंता घना तक पहुंचाने को कहा और घना को तुरंत गांव आने के लिए कहलवाया.

ऋषिकेश और घनसाली के रास्ते

पर घनसाली से 5 किलोमीटर पहले भिलंगना नदी के तट पर पिलखी के पिलखेश्वर महादेव के मंदिर में बैसाखी के दिन एक विशाल मेला लगता है. घना इस मेले में श्यामा से मिलने के लिए आया था. वे दोनों इधरउधर की बातें करते हुए मेले से दूर सीढ़ीनुमा खेतों के किनारे जंगल में एक बुरांस के पेड़ के नीचे बैठ गए.

जंगल में सन्नाटा था. दूर नीचे सड़क पर कभीकभार किसी गाड़ी के गूंजने की आवाज आ जाती थी. चीड़ के पेड़ों से हवा छन कर सनसन की आवाज करती हुई बह रही थी और घाटी में बह रही भिलंगना नदी की आवाज से अपनी आवाज मिला रही थी.

धूप अभी भी सुहावनी थी, पर माहौल में बेखुदी का सा आलम था. घना बहुत ही उदास और खोएखोए मन से श्यामा को देख रहा था.

‘‘तुम कैसी हो श्यामा?’’ घना ने बात शुरू की, लेकिन उस के चेहरे पर निराशा झलक रही थी.

आज घना के चेहरे पर श्यामा से मिलने की कोई चमक नजर नहीं आ रही थी. वह पहले की तरह चंचल नहीं लग रहा था.

‘‘ठीक हूं, आप सुनाओ. जब से आप की नौकरी लगी है, आप तो हमारे लिए दुर्लभ जीव हो गए हैं,’’ श्यामा ने शिकायत भरे लहजे में कहा था, पर वह आज बहुत खुश थी, क्योंकि घना को देखते ही वह मानो सारी चिंताओं से छुटकारा पा गई थी.

‘‘अच्छा हुआ, आप ठीक समय पर आ गए. आप को पता है कि पिताजी मेरा रिश्ता एक जगह पक्का कर रहे हैं. मुझे और लड़के को मिलाने भर की देर है. मैं कई दिनों से टाल रही हूं. मैं आप का ही इंतजार कर रही थी. अब आगे का प्लान आज ही तैयार करना है,’’ कह कर उस ने घना की ओर देखा. घना दूर कहीं अपने में ही खोया हुआ था.

‘‘सुन रहे हो… कहां खो गए हो?’’

‘‘काश, खो पाता,’’ घना ने बहुत ही दुखी मन से कहा. ‘‘यह भावुक होने का समय नहीं है. सामने हमारी मंजिल है, बस आगे बढ़ने की देरी है. अब हमारे सपने सच होने वाले हैं,’’ श्यामा ने चुलबुले मन से कहा.

‘‘काश, सच हो पाते.’’

‘‘अब आप ऐन मौके पर ऐसा क्यों बोले जा रहे हैं? आप अब अपने पैरों पर खड़े हो और हम ने जो ख्वाब देखे थे, वे सच होने के लिए हमें देख रहे हैं,’’ श्यामा ने हैरान हो कर कहा.

‘‘अपने पैरों पर तो मैं जरूर खड़ा हूं, पर… पर जिन्होंने इन पैरों पर खड़ा होने के लायक बनाया है, मैं उन का क्या करूं?’’

‘‘क्या मतलब है आप का?’’

‘‘मेरे घर वालों ने भी मेरे लिए एक रिश्ता पक्का कर दिया है.’’

‘‘आप ने मना नहीं किया?’’ श्यामा ने घबराहट में पूछा.

‘‘मैं ने कहा था कि मैं ने अपने लिए एक दलित लड़की पसंद कर ली है और मैं उसी से शादी करूंगा. पर यह सुनते ही घर में भूचाल आ गया था, जैसे घर में कोई मर गया हो. वे गांवबिरादरी की बात करने लगे. मां अपने दूध की कसम देने लगीं. हम कहीं के नहीं रहेंगे और दहाड़ें मारमार कर रोने लगीं.’’

‘‘लेकिन यह सब तो होना ही था. इस की तो हमें पहले से ही जानकारी थी. हम इस ऊंचनीच की दुनिया से दूर अपना घर बसाएंगे. हम ने यही ख्वाब तो देखे थे. और अब तो आप अपने पैरों पर खड़े भी हो गए हो. मुझे भी कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘श्यामा, आज तो हम चले जाएंगे, पर अपनी जड़ों से कट कर हम कब तक अलग रह पाएंगे. कभी न कभी तो हमें यहां वापस आना ही पड़ेगा, और तब… क्या ये लोग हमें भूल जाएंगे? क्या हमें चैन से जीने देंगे?

‘‘मैं भी चाहता था कि हमारे सपने सच हों, पर नदी में रह कर मगर से बैर भी तो नहीं कर सकते. अब भलाई इसी में है कि हम एकदूसरे को भूल जाएं और…’’

‘‘और क्या? आप को यह सब पहले नहीं सूझा था. घना, आप उस रात जिस बहादुरी से मेरे घर प्यार की भीख मांगने आए थे, मैं आप की उस बहादुरी की कायल थी. मैं मरमिटी थी आप पर उस दिन. उस दिन मुझे लगा था कि आप जरूर समाज की इन सड़ीगली रीतियों के खिलाफ लड़ोगे. मुझे क्या पता था कि वह आप की बहादुरी नहीं, बल्कि पागलपन था.

‘‘अच्छा हुआ कि समय से पहले ही आप की औकात का पता चल गया. कितना भरोसा किया था मैं ने आप पर. मैं आप को सामाजिक बुराइयों से लड़ने वाला एक शेर समझती थी, पर आप तो कायर हो. आप ने मेरे साथ विश्वासघात किया है.’’

घना अपराधी की तरह जमीन पर नजरें गड़ाए सुनता रहा. श्यामा के लिए अब वहां पर ठहरना मुश्किल हो गया था. उस ने नफरत से घना की ओर देखा और तेज कदमों से वहां से चली गई.

श्यामा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी. वह मेले के बजाय सीधे अपने घर चली गई. उस ने दरवाजा बंद किया. वह आज खूब रोना चाहती थी.

शाम को श्यामा की मां ने उसे रोटी खाने के लिए उठाया, ‘‘श्यामा उठ, रोटी खा ले.’’

‘‘नहीं मां, मन नहीं कर रहा है.’’

‘‘अरे बेटी, एक रोटी तो खा ले. भूखे पेट सोना अच्छा नहीं होता. कल लड़के वाले भी तुझे देखने आ रहे हैं,’’ मां ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

श्यामा न चाहते हुए भी उठी. उस ने मां का दिल रखने के लिए आधी रोटी खाई और फिर बिस्तर पर पड़ गई. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. घना के शब्दों से उसे इतनी पीड़ा हो रही थी, मानो उस के कानों में घना के शब्द नहीं, बल्कि गरमगरम सीसा पिघला कर डाला गया हो. उस का मन घना के लिए नफरत से  भर गया.

सुबह जब श्यामा की नींद खुली, तो धूप खिड़की के अंदर आ चुकी थी. उस ने एक अंगड़ाई ली और झटके के साथ पिछली बातों को भुला कर अपनी जिंदगी से दूर फेंकते हुए नए दिन का स्वागत करने के लिए अपने कमरे से बाहर निकल गई.

लड़के वाले दोपहर से पहले ही आ गए थे. उन का स्वागतसत्कार होने लगा. श्यामा मिठाई और चाय ले कर आई. उस ने सभी मेहमानों का स्वागत किया और मां के इशारे से वहीं पर बैठ गई.

श्यामा देखने में खूबसूरत तो थी ही, कदकाठी भी ठीक थी और सब से

बड़ी बात तो यह कि वह पढ़ीलिखी भी खूब थी.

बाद में लड़के के पिता ने कहा, ‘‘भाई, नया जमाना है. पढ़ेलिखे बच्चे हैं. उन्हें भी एकदूसरे के बारे में जानने का हक है.’’

वे सब बाहर चले गए. ‘‘मेरा नाम माधव है. सुना है, आप ने एमए किया है?’’ लड़के ने सन्नाटा तोड़ा.

‘‘जी हां, और मेरा नाम श्यामा है,’’ श्यामा ने सकुचाते हुए जवाब दिया.

‘‘एमए किस विषय में किया है

आप ने?’’

‘‘जी, समाजशास्त्र में.’’

‘‘मैं ने एमफार्मा किया है और मैं एक दवा कंपनी में सर्विस करता हूं,’’ कुछ देर रुक कर और श्यामा की आंखों में झांकते हुए वह हलके से मुसकराते हुए फिर बोला, ‘‘तो क्या विचार है? मेरा मतलब है कि आप मुझे अपने काबिल समझती हैं या नहीं?’’

‘‘जी, जैसा मेरे मांबाप उचित समझेंगे.’’

‘‘जी नहीं, मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं. आप के मांबाप को जब ठीक लगा, तभी तो उन्होंने हमें घर पर बुलाया है, आप की पसंदनापसंद जानने के लिए.’’

‘‘जी, पसंदनापसंद…? इस गांव में यह पहली बार हो रहा है कि लड़के और लड़की को उन की पसंदनापसंद जानने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है, वरना आज तक तो लड़का ही लड़की देख कर चला जाता था और अपनी पसंद बता देता था.’’

‘‘कुछ बातें समाज में तेजी से बदल रही हैं. हां, तो बताइए कि आप ने मुझे पसंद किया या नहीं?’’

‘‘जी, मुझे तो आप पसंद हैं…’’ श्यामा ने शरमाते हुए कहा था, ‘‘पर आगे जैसा मेरे पिताजी कहेंगे.’’

‘‘हां, यह हुई न बात. अब ठीक है.’’

उस दिन बात पक्की हो गई और फिर चट मंगनी और पट ब्याह भी हो गया. श्यामा सबकुछ भूल कर अपनी नई जिंदगी में मसरूफ हो गई. इस तरह एक साल कब बीता, पता ही नहीं चला.

श्यामा एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई थी. इस बीच माधव को 2 महीने की ट्रेनिंग के लिए विदेश जाना पड़ा. श्यामा बहुत दिनों से मायके नहीं गई थी, इसलिए वह मायके जाने की तैयारी करने लगी.

श्यामा अपने गांव आ गई. इस बीच उसे शिबी से पता चला कि घना पागल हो गया है. दिल्ली में उस के मामा ने उस की शादी किसी अमीर घर की लड़की से करवा दी थी.

बाद में पता चला कि उस की पत्नी का कालेज के दिनों में किसी ईसाई लड़के से चक्कर था. लड़की के घर वालों ने जबरदस्ती उस की शादी घना से करवा दी थी, लेकिन कुछ ही दिन बाद उन में अनबन शुरू हो गई और एक दिन वह घर से गहनेपैसे ले कर उसी लड़के के साथ भाग गई.

घना यह सदमा सहन न कर सका और दिमागी संतुलन खो बैठा. उस के पिता उसे गांव ले आए. गांव में उस को ठीक करने के लिए कई देवीदेवताओं की पूजा होने लगी.

पागलपन के दौरे में घना लोगों को कभी जाति की खोखली बातों पर और कभी अंधविश्वास पर भाषण देता है, इसलिए लोग समझते हैं कि उस पर भूत का साया है. घना के बारे में सुन कर श्यामा को बहुत दुख हुआ, पर वह कर भी क्या सकती थी?

श्यामा को मायके में 2 महीने से भी ज्यादा समय हो गया था. उस का पति उसे लेने के लिए आ गया था. 1-2 दिन रहने के बाद जब वे लोग जा रहे थे, तो रास्ते में कुछ लोग घना को पकड़ कर अस्पताल ले जा रहे थे. शायद पागलखाने…

अचानक घना की नजर श्यामा पर पड़ी. उस ने गौर से श्यामा को देखा, वह श्यामा को पहचानने की कोशिश कर रह था. उस के साथ के लोग घना को खींच कर ले जा रहे थे. उस ने श्यामा की तरफ हाथ जोड़े, मानो वह श्यामा से माफी मांग रहा हो.

श्यामा फफक कर रो पड़ी. माधव ने उसे रोने दिया. वह जानता था कि श्यामा बहुत ही कोमल मन की है. वह किसी का बुरा नहीं देख सकती.

उन की बस का समय हो रहा था. थोड़ी देर बाद वह उठी और उस ने अपने पति से चलने को कहा.

दिल्ली पहुंच कर एक दिन माधव ने उस से घना के बारे में पूछा. श्यामा ने सच छिपाते हुए बस उस के शादी वाले किस्से को बता दिया.

माधव ने एक लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ.’’

‘‘हां, एक कायर के साथ इस से ज्यादा और क्या हो सकता था?’’ श्यामा ने बहुत ही लापरवाही से कहा.

माधव को श्यामा का यह जवाब अच्छा नहीं लगा.

‘‘हां, कायर नहीं तो और क्या? जो समस्याओं का सामना मजबूती से न कर सके, वह कायर नहीं तो और क्या है? कभी कालेज के दिनों में बड़ीबड़ी बातें करता था, जब समस्याओं का सामना करने का समय आया, तो हिम्मत ही जवाब दे गई.’’

‘‘परंतु अगर कभी तुम मुझे छोड़ कर चली गई, तो मैं भी पागल हो जाऊंगा,’’ माधव ने मजाक किया.

‘‘मुझ पर इतना ही विश्वास करते हो,’’ फिर एक पल के लिए शरारत भरी नजरों से माधव की ओर देख कर उस ने घुड़की दी, ‘‘कायर कहीं के.’’

इतना कह कर उस ने माधव की छाती पर सिर टिका दिया. माधव ने उसे अपनी बांहों में कस लिया.

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