व्हाट्सऐप बनाम व्हाट्सऐप

व्हाट्सऐप ने अपने सौफ्टवेयर में बदलाव कर एक बार में 5 से ज्यादा सदस्यों को मैसेज फौरवर्ड करने पर रोक लगा दी है. अभी तक स्मार्टफोन में सेव्ड कौंटैक्टों में से जितनों को चाहो उतनों को एक बार में ही कोई भी मैसेज, फोटो या वीडियो फौरवर्ड किया जा सकता था. इस का जम कर दुरुपयोग हो रहा है. एक तो, निरर्थक जोक, जमा किए फोटो व वीडियो बिना सोचेसमझे फौरवर्ड किए जा रहे हैं और दूसरे, घृणा फैलाने वाले मैसेज आसानी से वायरल किए जा रहे हैं.

हिंदू श्रेष्ठ हैं, यह सिद्ध करने के बहुत से मैसेज लगातार, बारबार फौरवर्ड किए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप के गु्रपों में आप उन लोगों को भी मैसेज पढ़वा सकते हैं जिन्हें जानते तक नहीं, क्योंकि कब कौन से गु्रप में आप को क्यों एड किया गया, यह पक्का नहीं होता. बहुतों से आप कभी न मिलेंगे या उन्हें देखेंगे.

व्हाट्सऐप एक शानदार तरीका है अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से लगातार संपर्क बनाए रखने का. मोबाइल तकनीक आधीअधूरी रह जाए अगर व्हाट्सऐप न हो या केवल पैसे देने पर मिले. अपने कौंटैक्टों का डेटा बेच कर व्हाट्सऐप बिना विज्ञापन लिए अपने सदस्यों को मुफ्त में सेवा दे रहा है. तभी थोक में इस में वीडियो और सहीगलत मैसेज डाले जा रहे हैं और फिर फौरवर्ड किए जा रहे हैं. व्हाट्सऐप कंपनी चाहती है कि आप ऐसा करें.

व्हाट्सऐप असल में दिल्ली के चांदनी चौक में बांटे जा रहे हैंडबिलों की तरह हो गया है जो जानेअनजाने लोगों को चाहीअनचाही जानकारी पहुंचा रहा है. यह सस्ता है, इसलिए दंगा फैलाने वालों के लिए वरदान है. कितने ही मैसेजों में साफ लिखा होता है कि हिंदू खतरे में है और इस मैसेज को फैलाओ ताकि हिंदू एक हो सकें. बहुमत वाले देश में हिंदुओं को एक करने की बात का उत्पात मचाने के अलावा क्या कोई और उद्देश्य होता है. व्हाट्सऐप इस देश में बढ़ते दंगों व मौब लिंचिंग का बड़ा हथियार बन गया है.

अब सरकारी दबाव में व्हाट्सऐप ने भारत में, केवल भारत में, एकसाथ 5 से ज्यादा लोगों को मैसेज करने पर रोक लगा दी है. हालांकि, 5-5 कर के आप कितनों ही को पहले की तरह मैसेज भेज सकते हैं. व्हाट्सऐप ने भारत में ही ऐसा क्यों किया, शायद इसलिए कि इसी देश में बैठेठाले हैं, इसी देश में अफवाहों पर ध्यान देने वाले हैं, इसी देश में तर्कहीन बातों को मानने वाले हैं, इसी देश में लोगों का धर्म के नाम पर खून खौलता है, इसी देश में धर्म और धार्मिक दुकानदारी सब से ज्यादा पनप रही है.

भारत में ही लोग पहले से जानते थे कि शनिदेव की महिमा के 100 परचे छपवा कर लोगों में बांटने से पुण्य मिलता है. अब छपाने का झंझट भी दूर. 100 लोगों को व्हाट्सऐप मैसेज फौरवर्ड करो और छुट्टी.

आखिर इस तरह के पुण्य कमाने वाले, धर्म की रक्षा करने वाले कौन हैं और यहीं क्यों हैं? दरअसल, ये धर्म की दुकानदारी के पीडि़त हैं. जिस तरह धर्म को इस देश में बेचा जा रहा है, उस तरह किसी और देश में नहीं. केवल इसी देश में झूठ को सही मानने की आदत खासे पढ़ेलिखों में भी है. यहां युवा भी तर्क के बदले अंधी सोच पर जोर देते हैं. व्हाट्सऐप को 20 करोड़ लोगों ने यहीं डाउनलोड किया है ताकि मुफ्त में गप्पें मारी जा सकें और तथाकथित पुण्य भी कमाया जा सके.

व्हाट्सऐप के नए कदम से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. असल में यह सेवा पैसे दे कर मिलनी चाहिए. लेकिन जब ऐसे ही फायदा हो रहा है तो क्यों व्हाट्सऐप कंपनी हरेक से डौलर दो डौलर लेती फिरे?

रिटायरमेंट (अंतिम भाग) : हंसराज का सपना पूरा हुआ

पूर्व कथा

हंसराज मलिक अपनी कंपनी के चीफ इंजीनियर को डांटते हुए नई मशीनों को लगाने का आर्डर देते हैं. और कल से अपने फैक्टरी आने की बात भी कहते हैं. यह निर्देश देते हुए वह कार में बैठ कर चले जाते हैं.

कार में बैठते ही वह अतीत की यादों में खो जाते हैं कि 20 साल पहले वह अपने परिवार के साथ काम ढूंढ़ने के लिए शहर में आए थे. किस तरह धीरेधीरे अपनी मेहनत के बल पर वह ‘मलिक इंडस्ट्रीज’ के मालिक बन गए.

इतनी तरक्की के बाद भी उन में कोई घमंड नहीं था. अपने कर्मचारियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते हंसराज अपने बिजनेस की बागडोर अपने दोनों बेटों सौरभ और वैभव को सौंप देते हैं. लेकिन उन के व्यापार करने का तरीका बिलकुल अपने पिता के विपरीत था. वे ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में डीलरों को खराब माल देना शुरू कर देते हैं.

रामदीन कंपनी का पुराना डीलर व हंसराज का दोस्त है. खराब माल देने की एवज में वह वैभव व सौरभ की शिकायत हंसराज से करता है तो हंसराज अपने चीफ एकाउंटेंट, चीफ इंजीनियर और बेटों को बुला कर डांटते हैं और रामदीन को हरजाना देने को कहते हैं. रामदीन के जाने के बाद सौरभ व वैभव अपने पिता को हरजाना देने की बात पर नाराज होते हैं.

सब के चले जाने के बाद हंसराज सोच में पड़ जाते हैं कि कंपनी में आखिर चल क्या रहा है. अगले दिन हंसराज फैक्टरी जाते हैं तो वहां वह चीफ क्वालिटी कंट्रोलर और चीफ इंजीनियर की बातें सुन लेते हैं. वे दोनों हंसराज को वहां देख कर चौंक जाते हैं. हंसराज के पूछने पर वे कंपनी और मशीनों की स्थिति से उन्हें अवगत कराते हैं.

और अब आगे…

मशीनों का निरीक्षण करने के बाद शिव आ कर हंसराज को बताता है कि कुछ पुरजे बदलने पड़ेंगे. किंतु जो पुरजे चाहिए वे हमारे स्टाक में नहीं हैं.

‘कितने दिन में पुरजे आएंगे?’ हंसराज पूछते हैं.

‘कम से कम 2 महीने लग जाएंगे?’

‘क्या कहते हो, 2 महीने. यानी कि 2 महीने फैक्टरी बंद. कंपनी का नाम खराब करने में तुम लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है,’ हंसराज अधिक क्रोधित हो उठे, ‘मैं ऐसा नहीं होने दूंगा. शिव, तुम अभी नए पुरजों का आर्डर दो और खराब पुरजों को रिपेयर करवा कर मशीनों को 1-2 दिन में चालू करो.’

रिपेयर के बाद मशीनें सिर्फ 2 दिन चलीं. इस बार हंसराज ने शिव से पूछा, ‘तुम्हें मालूम है कि जब यह फैक्टरी लगी थी तब रामनरेश की कंसलटेंसी ली थी. आजकल वह कहां है, काफी वर्षों से उस से मुलाकात नहीं हुई. वह जरूर इस समस्या का हल निकालेगा.’

शिव ने डायरी निकाली, ‘सर, फोन नंबर तो पुराने हैं,’ डायरी देख कर शिव बोला, ‘लेकिन कृष्णा नगर में मकान का नंबर लिखा है, वहीं जा कर पता चलेगा.’

‘चंदरपाल, सुनो, तुम जाओ,’ हंसराज मलिक बोले, ‘तुम उस को जानते हो और उस के घर भी गए हो.’

‘हां, सर, उस का मकान मैं ने देखा हुआ है,’ कह कर चंदरपाल निकल पड़ा.

रामनरेश घर पर ही मिल गया था. चंदरपाल को देखते ही पहचान लिया, ‘क्या हाल है, चंदरपाल, आज इधर कैसे आना हुआ. आजकल कहां हो?’

‘अभी तो वहीं मलिक इंडस्ट्रीज में टाइमपास कर रहा हूं. आप से थोड़ा सा काम है, सेठजी बात करना चाहते हैं,’ चंदरपाल ने नंबर डायल किया.

‘भई, हंस, किस गुफा में छिपे रहते हो, पुराने दोस्तों को भूल गए लगते हो… हुक्म करो मेरे आका, कैसे इस नाचीज की याद आ गई.’

‘सुना है, रामनरेश तू बड़ा आदमी बन गया. उत्तराखंड में तू ने बड़ीबड़ी फैक्टरियां लगवा दीं तो हम जैसे छोटे दोस्तों को भूल गया,’ हंसराज ने मजाक किया, ‘अच्छा एक बात जिस के लिए चंदरपाल को तेरे पास भेजा है, कुछ मशीनें चेक करवानी हैं, अभी आजा, शाम का नाश्ता एकसाथ करेंगे.’

‘कल सुबह आता हूं, अभी जरा दांतों के डाक्टर के पास जाना है. कल रात से दांत दुख रहे हैं.’

अगले दिन वादे के अनुसार रामनरेश ने फैक्टरी में मशीनों का निरीक्षण किया. निरीक्षण के बाद हंसराज से बोला, ‘यार हंस, तुम्हारी फैक्टरी में मशीनों की ये दुर्गति, मैं तो सोच भी नहीं सकता, तुम ऐसे तो कभी नहीं थे, तुम्हें तो मशीनें अपनी जान से अधिक प्यारी होती थीं.’

हंसराज अब किस मुंह से बताएं कि उन के अपने बेटे ही उन के सिद्धांतों की धज्जियां उडा़ रहे हैं, ‘खैर, इन बातों को छोड़, अब क्या करना है, यह बता.’

‘हंस, एक तो तुम कुछ मशीनों को रिटायर कर के नई मशीनों का आर्डर भेजो, लेकिन मशीनें आने में 7-8 महीने लग ही जाएंगे. तब तक पुराने पुरजों को बदलना पडे़गा, लेकिन पुरजों का आर्डर तुम कालीचरण वर्कशाप को ही देना. वैसे बाजार में सस्ते भी पुरजे मिल जाएंगे, लेकिन उन का कोई भरोसा नहीं होता. अच्छी क्वालिटी के पुरजे केवल कालीचरण ही दे सकता है. मैं कल उत्तराखंड जा रहा हूं पर कोई दिक्कत हो तो मेरे मोबाइल पर कांटेक्ट करना.’’

हंसराज ने शिवनारायण के साथ वैभव और सौरभ को भी खास हिदायत दी कि रामनरेश के बताए उपायों पर अमल करें, लेकिन परचेज डिपार्टमेंट का हैड तिलकराज बेहद चापलूस और रिश्वतखोर था, जहां से उसे अधिक कमीशन मिलता वहीं से सामान खरीदा जाता. छोटे सेठों को उस ने अपनी बातों से गुमराह कर रखा था.

इस बार उस ने वैभव और सौरभ के कान भर दिए कि कालीचरण से रामनरेश की सेटिंग है, रामनरेश को कालीचरण कमीशन देता है. वहां से पुरजे बनवाने की कोई जरूरत नहीं है. दूसरी बहुत सी वर्कशाप हैं, जहां से सस्ता और टिकाऊ सामान बन सकता है.

वैभव और सौरभ को तिलकराज पर भरोसा था. उन दोनों ने रामनरेश की सलाह अनसुनी कर के तिलकराज का रास्ता चुना, लेकिन पुरजे दोचार दिन में ही खराब हो जाते. ऐसे करते हुए 2 महीने बीत गए, मशीनें और भी खराब हो गईं. एक दिन एक मशीन में बहुत जोर से धमाका हुआ और 2 कर्मचारियों को चोट लग गई. घायल कर्मचारियों को अस्पताल में दाखिल कराया गया.

इस घटना को बीते अभी 2 दिन ही हुए थे कि कुछ अन्य मशीनों में भी खराब पुरजों के कारण धमाके हुए और कई कर्मचारी घायल हो गए. शिवनारायण काफी परेशान हो गए कि अब तो हंसराज को पूरी बात बतानी पडे़गी, तभी तिलकराज ने वैभव और सौरभ से कहना शुरू किया कि फैक्टरी में कुछ अनिष्ट हो रहा है, उस के पीछे किसी बुरी आत्मा का हाथ है और शुद्धि के लिए पूजाहवन आदि कराने की जरूरत है.

वैभव और सौरभ दोनों ने आपस में विचार किया कि पूजा करवानी चाहिए. आजकल हर जगह बिना पूजा के कुछ भी कार्य शुरू नहीं होता और हर व्यक्ति बिना भविष्यफल पढ़े घर से बाहर भी नहीं निकलता है. हर जगह वास्तुशास्त्र की धूम है. मशीनों की वास्तु के मुताबिक सेटिंग करानी पडे़गी.

वैभव और सौरभ दोनों की पत्नियां भी उन पंडितों के पीछे पड़ी रहती थीं. उन की किट्टी पार्टियों में आएदिन किसी अंगरेजी में लच्छेदार प्रवचन देने वाले को बुलाया जाता था. वैभव और सौरभ को भी जाना पड़ता था और वे दोनों भी पढ़ाईलिखाई भूल कर ढकोसलों के दलदल में फंसने लगे थे. तिलकराज को यह मालूम था और उस ने इस का पूरा फायदा उठाया.

अब तो तिलकराज का हौसला बढ़ गया, ‘सरजी, आप ने डिंपल कंपनी का नाम तो सुना होगा. फैक्टरी बंद होने की नौबत आ गई थी, तब एक पहुंचे हुए वास्तुशास्त्री से सलाह ले कर पूरी फैक्टरी को नए सिरे से बनवाया. अब तो उन के पौबारह हैं,’ तिलकराज ने आग में घी डाल दिया.

‘तिलक बिलकुल ठीक क ह रहा है. मैं ने भी कई आफिस देखे हैं, जो एकदम नए सिरे से वास्तु के हिसाब से बने हैं,’ वैभव ने सौरभ से कहा.

‘हां, ठीक बात है, पापा ने कभी इस बारे में नहीं सोचा. आज तो जमाना सिर्फ वास्तु का है. हमें शीघ्र ही एक अच्छे वास्तुशास्त्री से मिल कर उपाय कर लेना चाहिए,’ सौरभ ने हां में हां मिलाई फिर तिलक की ओर देख कर बोला, ‘क्या तुम ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हो?’

‘सरजी, बहुत विद्वान हैं. शास्त्री नगर के मंदिर के प्रमुख पंडित हैं. ज्योतिष के साथसाथ वास्तुशास्त्र के भी विद्वान हैं. बस, आप एक बार मिलेंगे तो किसी दूसरे के बारे में सब भूल जाएंगे. कहें तो आप की फोन पर बात करवा दूं,’ तिलकराज ने चापलूसी तेज करते हुए कहा.

‘हां, समय है तो बात करवाओ,’ सौरभ की यह बात सुनते ही तिलक ने झट से शास्त्रीजी का मोबाइल लगाया.

‘शास्त्रीजी, मैं तिलक.’

‘हां, वत्स, इस समय कैसे कष्ट उठाया,’ दूसरी तरफ से शास्त्रीजी बोले.

‘हमारे सेठजी आप से मिलना चाहते हैं, क्या आज आप समय निकाल सकेंगे?’’

कुछ क्षण बाद शास्त्रीजी बोले, ‘ठीक है, वत्स. कल 11 बजे का समय उचित रहेगा.’

‘ठीक है, शास्त्रीजी, मैं खुद आप को लेने आ जाऊंगा,’ तिलक ने कहा.

तिलकराज खुद शास्त्री नगर में रहता था और शास्त्रीजी उस के महल्ले के मंदिर में पुजारी थे. तिलक पूजापाठ में बहुत अधिक विश्वास रखता था, उस की पत्नी लगभग पूरा दिन ही मंदिर में रहती थी. शास्त्रीजी का नाम फैलाने में तिलक का काफी हाथ था, जहां भी मौका मिलता, शास्त्रीजी के गीत गाता थकता नहीं था. शास्त्रीजी भी तिलक का पूरा ध्यान रखते थे. चंदे, चढ़ावे और दानदक्षिणा का एक हिस्सा वे तिलक को देते. इस प्रकार तिलक और शास्त्रीजी एकदूसरे के पूरक थे.

अगले दिन ठीक 11 बजे शास्त्रीजी अपनी कार में फैक्टरी पहुंचे. पूरी फैक्टरी का निरीक्षण करने के बाद वैभव और सौरभ के केबिन में अपना लैपटाप निकाला और कुछ गणना के बाद बोले, ‘वत्स, पूरी फैक्टरी बिना सोच के वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत बनाई गई है, इसी कारण फैक्टरी में मशीनों का कष्ट रहेगा.’

‘कुछ उपाय बताइए,’ वैभव ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘वत्स, हमारे शास्त्रों में हर संकट का निवारण है. यदि आप तैयार हैं तो…’

‘शास्त्रीजी शुभ कार्य में देर नहीं होनी चाहिए,’ सौरभ ने उन की बात बीच में काट कर कहा.

‘वत्स, आप को अति शीघ्र यज्ञ करवाना होगा और वास्तु के हिसाब से मशीनों की दिशा बदलनी पडे़गी.’

वैभव और सौरभ के तैयार होने पर शास्त्रीजी ने शुक्रवार के 11 बजे का मुहूर्त निकाला.

‘वत्स, यज्ञ की सफलता के लिए जरूरी है कि कार्य में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए, जब तक यज्ञ होगा, फैक्टरी के दरवाजे बंद रहने चाहिए, जो जहां होगा, वहीं रहेगा, कोई भी अंदरबाहर नहीं आएगाजाएगा. यज्ञ का सारा सामान हम लाएंगे ताकि उस में किसी का गंदा हाथ न लग सके. इस महान यज्ञ की लागत और दक्षिणा 2 लाख 21 हजार रुपए होगी, जो आप को एडवांस में देनी होगी. यज्ञ संपन्न होने के बाद वास्तुशास्त्र के हिसाब से फैक्टरी में परिवर्तन के सुझाव दिए जाएंगे. आप को कुछ नहीं करना होगा. सब हम संभाल लेंगे.’

यज्ञ की रकम ले कर शास्त्रीजी तो चले गए. तिलक की खुशी की कोई सीमा नहीं थी, क्योंकि शास्त्रीजी से 20 प्रतिशत कमीशन पहले ही तय हो चुका था.

‘शास्त्रीजी बड़े हाईटेक हैं. लैपटाप ले कर काम करते हैं,’ वैभव ने सौरभ को इशारा किया.

‘भाई, हमारा लैपटाप तो पुराना हो गया है, शास्त्रीजी का लैपटाप एकदम स्लिम नया लेटेस्ट माडल है,’ सौरभ बोला.

‘नया लैपटाप लेने के बाद तिलक, मैं अपना पुराना लैपटाप तुम्हें दे दूंगा. तुम्हारे पास भी लैपटाप जरूर होना चाहिए. आजकल जमाना लैपटाप का है.’

यज्ञ की खबर सुनने से पहले ही हंसराज को अपनी साली के ससुर के देहांत पर पटना जाना पड़ा. ससुर पटना से भी 200 मील दूर एक छोटे शहर में रहते थे. जाने से पहले वह कह गए, ‘मैं 4-5 रोज में आ जाऊंगा.’

बेटों ने पिता के पीछे पूजा करना ज्यादा ठीक समझा. आखिर पूजा का दिन शुक्रवार आ गया. शास्त्रीजी के चेले ने 1 घंटा पहले आ कर पूजा की तैयारियां संपन्न कीं. ठीक 11 बजे फैक्टरी के दरवाजे बंद कर दिए गए और पूजा शुरू की. विधिविधान के साथ शास्त्रीजी के पूजा करने के तरीकों से सब मंत्रमुग्ध हो गए कि ऐसी विधि से पूजा अब तक सिर्फ टेलीविजन सीरियलों में ही देखी थी. 2 घंटे की पूजा के बाद शास्त्रीजी ने शंख बजाया. शंख की ऐसी आवाज वैभव व सौरभ ने महाभारत धारावाहिक में सुनी थी. सभी मुग्ध हो पूजा में तल्लीन थे. जैसे ही दूसरी बार शास्त्रीजी ने शंख बजाया, तभी एक जोर से धमाका हुआ और तीव्र कंपन और घरघराहट के साथ सारी मशीनें रुक गईं. वैभव ने आवाज दी, ‘शिव, फटाफट देखो, क्या हुआ?’

एक मशीन टूट गई थी. शुक्र यह था कि 2 मशीनमैनों को मामूली चोटें आईं, जिन्हें प्राथमिक चिकित्सा के लिए अस्पताल ले जाया गया.

2 रोज बाद जब हंसराज लौटे तो शिवनारायण के साथ निरीक्षण करते समय उन्होंने कहा, ‘शिव, रामनरेश यदि शहर में है तो उसे फौरन बुलाओ.’

संयोग से रामनरेश शहर में थे, जो कुछ समय बाद फैक्टरी में आ गए. रामनरेश ने आते ही शिकायत की, ‘हंस, तुम कंजूस कब से हो गए, मैं ने तुम्हें ऐसा कभी नहीं देखा था.’

‘क्या हुआ, नरेश, आज तो तेरे तेवर गरम हैं.’

‘तुम से कहा था कि कालीचरण वर्कशाप से पुरजे बनवाना, लेकिन सस्ते के चक्कर में एक तो 4 बार पुरजे बनवाए, जिस का परिणाम अब तुम देख रहे हो, साथ में पूरे बाजार में मुझे बदनाम कर दिया कि मैं कालीचरण से कमीशन लेता हूं. आखिर किस जन्म का बदला मुझ से ले रहे हो?’

रामनरेश की बात सुन कर हंसराज भौचक रह गए, लेकिन तुरंत समझ गए कि यह करतूत तिलक की होगी. मौके की नजाकत समझते हुए उन्होंने बात पलट कर रामनरेश से माफी मांगी और पूछा कि अब क्या करना चाहिए.

‘हंस, जो बात मैं ने पहले कही थी, वही दोहरा रहा हूं. नई मशीनों के लिए तुरंत आर्डर दे दो. मशीनें आने में कम से कम 6 महीने लग जाएंगे. तब तक कालीचरण से पुरजे बनवा लो. दो बातें मैं तुम्हारे लाड़लों से कहना चाहता हूं…पहली यह कि बिना किसी सुबूत के किसी पर आरोप नहीं लगाने चाहिए. दूसरी, बाजार में मेरी काफी अच्छी साख है, आज तक ईमानदारी और लगन से काम किया है, तभी आज 62 साल की उम्र में भी लोग मेरे पीछे घूमते हैं, कभी किसी के आगे काम के लिए चापलूसी नहीं की. और तुम मुझे बदनाम कर के क्या हासिल कर लोगे. क्या तुम्हारी मशीनें ठीक हो गईं? अच्छी क्वालिटी के पुरजे लगाने के बदले पूजा और वास्तु के चक्कर में पड़ गए.

‘अंधविश्वास नहीं करना चाहिए. हंस, तुम से एक बात पूछना चाहता हूं कि आज से 20 साल पहले जब तुम ने यह फैक्टरी लगाई थी, मैं उस समय भी तुम्हारा सलाहकार था, हम ने फैक्टरी एक्ट के नियमानुसार निर्माण किया और इसी फैक्टरी से लाभ कमा कर 3 और फैक्टरियां लगाईं. अगर हम ने वास्तु के हिसाब से फैक्टरी का निर्माण नहीं किया तो 20 साल तक लगातार मुनाफा क्यों आया?

‘एक बात मेरी और सुनो, लाभ और हानि, सुख और दुख एक सिक्के के दो पहलू हैं, जो बारीबारी से हमारी जिंदगी में आते हैं. दुनिया का कोई भी आदमी इस से बच नहीं सकता. इतिहास गवाह है, किसी भी अमीर या मशहूर आदमी की जिंदगी देख लो, उतारचढ़ाव, सुख और दुख से कोई नहीं बचा है.

‘क्या आप ने कभी कार ठीक करवाने के लिए कोई पूजा की है, तब इन मशीनों की पूजा क्यों. मेरी मंशा कोई भाषण देने की नहीं है लेकिन तिलक के झूठे प्रचार से मुझे ठेस लगी, शायद इसी कारण कुछ अधिक बोल गया,’ कहतेकहते रामनरेश की आंखें भर गईं और अपना ब्रीफकेस उठा कर अपनी कार में बैठ कर रवाना हो गया.

वैभव और सौरभ पर क्या असर हुआ. यह तो पता नहीं, लेकिन हंसराज ने शिवनारायण को बुला कर कहा कि फौरन नई मशीनों के आर्डर तैयार करें. आर्डर तैयार होते ही खुद हंसराज ने आर्डर और अग्रिम राशि के चेक पर दस्तखत किए और अपनी कार में बैठ कर घर के लिए रवाना हुए.

‘‘साबजी, घर आ गया है,’’ ड्राइवर की आवाज सुन कर हंसराज अतीत से वर्तमान में आ गए और धीरेधीरे चलते हुए कोठी के लान में कुरसी खींच कर बैठे और ड्राइवर से कहा, ‘‘अंदर बीबीजी को कहना, चाय के साथ यहीं लान में आ जाएं.’’

उन्हें लगा कि उन का रिटायरमेंट 5-7 साल के लिए फिर टल गया. अब जब तक बेटे पटरी पर न आ जाएं, उन्हें एक बार फिर कोल्हू का बैल बनना पडे़गा, पर जब कोल्हू अपना ही हो तो बैल बनने में क्या एतराज.

क्यों नेहा धूपिया ने 6 महीने तक छुपाई प्रेग्नेंसी की बात

बौलीवुड की हौट अदाकारा के रूप में अपनी पहचान रखने वाली नेहा धूपिया ने अंगद बेदी के साथ शादी की खबर अचानक देकर जहां अपने प्रशंसक को हैरान कर दिया था. वहीं नेहा ने अपनी प्रेग्नेंसी की खबर देकर भी सबको चौंका दिया था. लेकिन जब उन्होंने यह खबर शेयर की तो वह आलरेडी 6 महीने की प्रेग्नेंट थीं.

लेकिन नेहा धूपिया ने प्रेग्नेंट होने की बात इतनी देर में क्यों सबको बताई, अब इसकी वजह सामने आई है. खुद एक्ट्रेस ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. अपनी प्रेग्नेंसी को छुपाने की वजह बताते हुए मिड डे को दिए एक इंटरव्यू में नेहा ने कहा ”मुझे डर था कि अगर मैं अपनी प्रेग्नेंसी पहले बता दूंगी तो इसकी वजह से मेरे काम पर असर पड़ेगा.”

 

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आपको बता दें कि उस वक्त नेहा धूपिया काजोल के साथ फिल्म ‘हेलीकौप्टर ईला’ और अपने चैट शो नो फिल्टर नेहा करने में व्यस्त थीं. नेहा का कहना है ‘मुझे डर था कि लोग मुझे काम देना बंद कर देंगे. ये अच्छी बात थी कि छठे महीने तक मेरा बेबी बंप दिखाई नहीं दे रहा था. अगर बेबी बंप दिखता, तो लोगों को लगता मैं काम करने के लिए फिट नहीं हूं. खुश किस्मती से मेरा एनर्जी लेवल हाई था.”

मैटरनिटी लीव पर नेहा का कहना है “मैं उन महिलाओं के खिलाफ नहीं हूं, जो इस टाइम पर छुट्टी लेकर घर बैठ जाती हैं, बस ये मेरी च्वाइस थी कि मैं घर पर नहीं बैठना चाहती थी.”

 

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आपको बता दें कि नेहा ने अगस्त में अपने प्रेग्नेंट होने की खबर सोशल मीडिया पर शेयर की थी. वहीं अंगद ने भी नेहा के साथ कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की थीं, जिसमें नेहा धूपिया का बेबी बंप साफ नजर आ रहा था.

प्रिया ने किस करने पर अब्दुल को जड़ा तमाचा

इंटरनेट पर अपने आंखे मटकाकर लोगों को दीवाना बनाने वाली एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर की फिल्म ‘ओरु अदार लव’ का एक और गाना रिलीज कर दिया गया है. प्रिया प्रकाश वारियर के साथ को-एक्टर रोशन अब्दुल रहूफ भी लीड रोल में हैं. फिल्म का गाना फ्रीक पेन्ने (Freak Penne) काफी इंटरेस्टिंग तरीके से शूट किया गया है. लग्जरी गाड़ियां लड़के-लड़कियां डांस करते हुए दिखाई दे रहे हैं. रैपिंग मिक्स का यह गाना इंटरनेट पर रिलीज होते ही काफी वायरल हो चुका है. इस गाने को 24 घंटे के भीतर ही 12 लाख से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं.


इस गाने में एक सीन में जब एक्टर रोशन अब्दुल एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश को किस करते हैं तो वह जोरदार थप्पड़ भी जड़ देती हैं. लोगों को यह फनी सान्ग वीडियो काफी पसंद आ रहा है. प्रिया प्रकाश वारियर के इस नए गाने की खासियत उनके एक्सप्रेशंस ही हैं.

प्रिया प्रकाश के पुराने वाले एक्सप्रेशंस कायम हैं और उनका प्यारा-सा चेहरा इनको और भी खास बना देता है. रोशन उनके इश्क में दीवाने दिख रहे हैं. माहौल और गाना दोनों ही कमाल के हैं लेकिन प्रिया प्रकाश वारियर के एक्सप्रेशंस यहां भी धमाकेदार हैं. उनकी मुस्कान, उनकी यूएसपी है.

बता दें कि ‘ओरू अदार लव’ को उमर लुलू ने डायरेक्ट किया है और यह शान रहमान की धुन है. फिल्म सितंबर में रिलीज होगी और तब तक प्रिया प्रकाश के इस तरह के धमाके आते रहेंगे. प्रिया प्रकाश की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इंस्टाग्राम पर उनकी फैन फौलोइंग 60 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है. यहां तक कहा जाता है कि वे प्रमोशनल पोस्ट के लिए आठ लाख रु. तक चार्ज करती हैं.

बत्ती गुल मीटर चालू : दिव्येंदु शर्मा का शानदार अभिनय

सामाजिक मुद्दों या आम जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे पर एक कमर्शियल मनोरंजक फिल्म लिखना या निर्देशित करना हर किसी के बस की बात नहीं हो सकती. आम जनता के मुद्दे पर मनोरंजक फिल्म का मतलब रिश्तों की कहानी के साथ चलो और क्लायमेक्स में अदालत के अंदर दुनियाभर का संदेश परोसने वाला भाषण देते हुए उसे मन की भड़ास कहना तो कदापि नहीं होना चाहिए. मगर फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ के लेखक व निर्देशक ने इस फिल्म में यही किया है. परिणामतः देश का आम इंसान से कहीं ज्यादा निरीह और बेचारे तो लेखक व निर्देशक ही नजर आते हैं.

पूरे देश में हर घर में 24 घंटे बिजली का न होना और बिजली बिल का अनाप शनाप यानी कि जितनी बिजली उपयोग की, उसके मुकाबले कई गुना ज्यादा बिल का आना आम समस्या है. मगर इस समस्या को फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ के लेखक द्वय सिद्धार्थ व गरिमा तथा निर्देशक श्री नारायण सिंह ने उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्र में बिजली मुहैय्या कराने वाली एक निजी कंपनी ‘सूरज पावर टेक्नालाजी लिमिटेड’ नामक कंपनी को जिम्मेदार ठहराते हुए पूरी फिल्म गढ़ी है. और यहीं पर उनकी फिल्म कमजोर हो जाती है.

bollywood movie review batti gul meter chalu

जब फिल्म की नींव कमजोर हो, तब महज आम हिंदी फिल्मों के चर्चित कमर्शियल मसाले भरने से फिल्म अच्छी कैसे बनेगी? लेखक ने इस समस्या पर फिल्म की पटकथा लिखने या निर्देशक ने निर्देशन करने से पहले कोई शोध कार्य किया होता, तो उन्हें इस बात का अहसास रहता कि उत्तराखंड में इलेस्ट्रीसिटी की सप्लाई यानी मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी किसी निजी कंपनी के पास नहीं बल्कि यह काम सरकार खुद कर रही है. मुंबई और दिल्ली के कुछ इलाके में निजी कंपनियां बिजली मुहैय्या करा रही हैं. पर इस फिल्म में उत्तराखंड में बिजली मुहैया कराने वाली कंपनी के मालिक को भी अदालत में तलब कर लिया गया. यह है कल्पना की पराकाष्ठा…वैसे लेखक व निर्देशक दोनों के दावे हैं कि उन्होंने कुछ माह उत्तराखंड में बिताकर इस समस्या पर गहन शोध किया था.

इतना ही नहीं फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ में वकील एस के यानी कि शाहिद कपूर का मजेदार संवाद है. वह अपनी नाराज दोस्त ललिता यानी कि श्रद्धा कपूर को सुनाते हुए कहते हैं कि वह बिजली कंपनी पर इन इन धाराओं में मुकदमा दायर करेगें. छह सात धाराओं में से वह एक धारा 498 भी बोल जाते हैं. अब यह धारा बिजली कंपनी के खिलाफ कितनी जायज है, यह तो पढ़ा लिखा वकील बेहतर जानता है.

खैर, फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ की कहानी है उत्तराखंड की. कहानी शुरू होती है बचपन के तीन दोस्त सुशील कुमार पंत उर्फ एस के (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल उर्फ नौटी (श्रद्धा कपूर) और सुंदर मोहन त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) से. तीनों युवावस्था मे पहुंच चुके हैं. एस के वकील है, जो कि वकालत कम पर लोगों को ब्लैकमेल कर पैसा कमाते रहते हैं. वह लोगों को झूठे केस मे फंसाकर पैसा ऐंठता रहता है. नौटी खुद को बहुत बड़ी कास्ट्यूम डिजायनर मानती है. जबकि सुंदर मोहन त्रिपाठी किसी तरह एक प्रिंटिंग व पैकेजिंग फैक्टरी ‘यू के प्रिंटर्स’ खोलने में सफल होता है.

अब आम हिंदी कमर्शियल फिल्मों की तरह यहां भी इन तीन दोस्तों के बीच त्रिकोणीय प्रेम कहानी शुरू हो जाती है. एक दिन नौटी कहती है कि वह दोनों के साथ अलग अलग एक एक सप्ताह तक डेट करेगी, उसके बाद अपना निर्णय लेगी. पहले वह एस के के साथ डेट करती है, फिर दूसरे सप्ताह वह सुंदर मोहन त्रिपाठी के साथ डेट करती है. नौटी तय करती है कि उसे सुंदर मोहन त्रिपाठी के ही साथ जिंदगी बितानी है. एक दिन इन दोनों को प्यार /चुंबन करते एस के देख लेता है. तो उसे जलन होती है. जिसके चलते एस के अपनी तरफ से दोस्ती खत्म कर देता है.

इधर सुंदर की फैक्टरी में पहले माह डेढ़ लाख रूपए का बिल आता है. तो वह इसकी शिकायत करने के लिए बिजली उपभोक्ता मंच में जाता है.पर वहां के अधिकारी उसे समझाकर भेज देते हैं कि मीटर को चेक करने वाला एक दूसरा मीटर लगा देते हैं. उसके बाद उसे छह माह के बाद 54 लाख रूपए का बिल आता है. सुंदर अपनी इस समस्या को लेकर कई जगह जाता है, पर कोई समाधान नहीं निकलता.

अब तो फैक्टरी के साथ साथ घर के बिकने की नौबत आ जाती है. तब नौटी व सुंदर अपने चलता पुर्जा नुमा दोस्त व वकील एस के के पास मदद के लिए जाते हैं. एस के उनकी मदद करने की बजाय फैक्टरी बंद करने की वजह देकर भगा देता है. अंततः हारकर रात के अंधेरे में सुंदर मोहन त्रिपाठी आत्महत्या करने के लिए अपनी बाइक के साथ गंगा नदी में कूद जाता है. दूसरे दिन पुलिस को नदी से बाइक मिलती है. पर सुंदर मोहन त्रिपाठी का शरीर नहीं मिलता.

अब अपने दोस्त को इंसाफ दिलाने के लिए एस के अदालत का दरवाजा खटखटाता है और फिर वही आम फिल्मों का कमर्शियल मसाला. टीवी चैनल पर खबरें..व्हाट्सअप पर वीडियो वगैरह वगैरह..चलता है. सूरज पावर टेक्नालाजी की तरफ से अदालत में मुकदमा लड़ने आती है वकील गुलनार (यामी गौतम). पर अदालती लड़ाई में समस्या को लेकर गंभीर बातें नही की जाती. पर अदालत में अपनी मौजूदगी से सुंदर मोहन त्रिपाठी बता देते हैं कि वह जीवित बच गए.

अंत में एस के यानी कि शाहिद कपूर का लंबा  चौड़ा भाषण है कि विकास, कल्याण या अच्छे दिन के नाम पर कुछ नहीं हुआ. पर अपनी बात खत्म करने से पहले वह इसे अपने मन की भड़ास की संज्ञा देते हैं. फिर जज महोदया के निर्णय के साथ फिल्म खत्म.

पटकथा के स्तर पर कई कमियों के अलावा फिल्म में कुमायूंनी भाषा का उपयोग किया गया है. फिल्म में बहुत ही ज्यादा ‘बल’ और ‘ठहरा’ शब्द का उपयोग भी लोगों को खलता है. फिल्म की लंबाई भी बेवजह लंबी खींची गयी है. फिल्म की पटकथा के साथ साथ निर्देशन व एडीटिंग भी बहुत कमजोर है. इतना ही नहीं लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म का मूल मुद्दा ही गायब हो गया. फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ देखकर यह कहना मुश्किल है कि इस फिल्म के निर्देशक श्री नारायण सिंह ने ही ‘टौयलेट:एक प्रेम कथा’ का निर्देशन किया था.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो पूरी फिल्म सिर्फ व सिर्फ दिव्येंदु शर्मा की फिल्म है. उन्होंने कमाल का अभिनय किया है. शाहिद कपूर से बेहतर अभिनय की उम्मीदेंखत्म होती जा रही हैं. श्रद्धा कपूर ने ठीक ठाक काम किया है. यामी गौतम के हिस्से करने के लिए कुछ खास था ही नहीं. फिल्म के कैमरामैन अंशुमान महाले प्रशंसा के पात्र हैं.

दो घंटे 43 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बत्ती गुल मीटर चालू’’ का निर्माण नितिन चंदंचूड़, श्री नारायण सिंह, कुसुम अरोड़ा , निशांत पट्टी ने ‘टीसीरीज’ कंपनी के साथ मिलकर किया है. निर्देशक श्री नारायण सिंह, पटकथा लेखक विपुल रावल, गरिमा वहल व सिद्धार्थ सिंह, संवाद लेखक गरिमा वहल व सिद्धार्थ सिंह, संगीतकार अनु मलिक, रोचक कोहली व सचेत परंपरा, कैमरामैन अंशुमान महाले व कलाकार हैं – श्रद्धा कपूर, शाहिद कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम, सुधीर पांडे, समीर सोनी, फरीदा जलाल, सुप्रिाया पिलगांवकर, अतुल श्रीवास्तव व अन्य.

क्या निकला दीपा की अय्याशी का नतीजा

घटना 18 मई, 2018 की है. माधव नगर थाने के थानाप्रभारी गगन बादल अपने औफिस में बैठे
विभागीय कार्य निपटा रहे थे तभी उन्हें सूचना मिली कि थाना क्षेत्र के वल्लभ नगर में मां बादेश्वरी मंदिर के सामने रहने वाली दीपा वर्मा के घर से बड़ी मात्रा में धुआं निकल रहा है. शायद वहां आग लग गई है. यह थाना मध्य प्रदेश के जिला उज्जैन के अंतर्गत आता है.

थानाप्रभारी ने यह जानकारी दमकल विभाग के अलावा एसपी सचिन अतुलकर को भी दे दी. इस के बाद वह खुद सूचना में बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए.

जब तक वह मौके पर पहुंचे, तब तक दमकल विभाग की गाड़ी भी वहां पहुंच चुकी थी. पता चला कि दीपा वर्मा के घर में आग लगी थी. इस से पहले कि आग भयावक रूप लेती, दमकलकर्मी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने कुछ देर में आग बुझा दी. आग बुझने के बाद दमकल कर्मियों के साथ थानाप्रभारी जब उस मकान के अंदर पहुंचे तो किचिन में लिहाफ गद्दे वगैरह पड़े मिले. वह अधजले थे. उन कपड़ों से धुआं उठ रहा था.
दमकलकर्मियों ने उन अधजले लिहाफगद्दों को हटाया तो वहां का नजारा देख कर पुलिस चौंक गई. क्योंकि उन लिहाफगद्दों के नीचे एक महिला का शव औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उस की दोनों कलाइयों की नशें भी कटी हुई थीं. साथ ही उस की गरदन पर धारदार हथियार का घाव था.

मकान मालिक ने मृतका की पहचान 35 वर्षीय दीपा वर्मा के रूप में की. उस ने बताया कि यह 5 महीने से अशोक वर्मा के साथ इस मकान में रह रही थी. अशोक के अलावा इस के पास और भी कई युवक आते थे. कुछ ही देर में एसपी सचिन अतुलकर और एफएसल अधिकारी डा. प्रीति भी टीम के साथ मौके पर पहुंच गईं.

पुलिस ने जब जांच की तो बेडरूम में खून के धब्बों के अलावा सामान भी अस्तव्यस्त मिला. बेडरूम का दरवाजा भी टूटा हुआ था. इस से यह अनुमान लगाया कि घटना से पहले दीपा और हमलावर के बीच संघर्ष हुआ होगा. इस के बाद उस की हत्या कर लाश किचिन में ले जा कर जलाने की कोशिश की.

लाश को जलाने का तरीका भी अनोखा था. हत्यारे ने दीपा वर्मा की हत्या के बाद एलपीजी गैस सिलेंडर की नली चूल्हे से निकालने के बाद उसे दीपा वर्मा की जांघों के बीच डाल कर ऊपर से लिहाफगद्दे डाल दिए. फिर रैग्युलेटर से गैस औन कर के आग लगाई थी.

इस से इस बात की आशंका को बल मिला कि हत्या का मामला अवैध संबंधों से जुड़ा हो सकता है. दीपा वर्मा की हत्या की सूचना पा कर भैरवगढ़ में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर रहने वाला दीपा का भाई भी मौके पर पहुंच गया. उस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक शर्मा पर उस की हत्या का आरोप लगाया.

उस का कहना था कि दीपा पिछले 8 सालों से अशोक के साथ रह रही थी. पुलिस ने दीपा के भाई की तहरीर पर हत्या का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के दीपा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अशोक पहले से शादीशुदा है. उस की ब्याहता गांव में रहती है. वह दीपा के पास 1-2 दिन में चक्कर लगाता था.

उधर 3 डाक्टरों के पैनल ने दीपा का पोस्टमार्टम किया जिस में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि दीपा को जिंदा ही जलाया गया था. मरने से पहले दीपा के साथ बलात्कार किया गया था या नहीं इस की जांच के लिए उस की स्लाइड बना कर सागर जिले की लैबोरेटरी भेज दी. मामला गंभीर था इसलिए एसपी सचिन अतुलकर ने थाना माधव नगर के थानाप्रभारी गगन बादल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. एसआई बी.एस. मंडलोई, संजय राजपूत आदि के साथ साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और संतोष राव को उन की टीम में शामिल किया गया.

इंसपेक्टर शिंदे ने सब से पहले अशोक को पूछताछ के लिए बुलाया. अशोक ने बताया कि वह पिछले 8 सालों से दीपा के संपर्क में था. इसलिए वह अब उसे क्यों मारेगा. साथ ही उस ने बताया कि मेरी गैरमौजूदगी में दीपा दूसरे कई युवकों को अपने पास बुलाती और उन के साथ मौजमस्ती करती थी. उस ने उसे कई बार समझाया लेकिन दीपा ने अपनी आदत नहीं बदली थी. अशोक ने दीपा के प्रेमियों के नाम भी पुलिस को बता दिए.

उन में 2 को पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. उन दोनों से पूछताछ में दीपा के एक और प्रेमी धर्मेंद्र गहलोत का नाम सामने आया. धर्मेंद्र देवास रोड पर रहता था. इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और थानाप्रभारी गगन बादल दोनों टीम के साथ धर्मेंद्र के घर जा धमके.

संयोग से धर्मेंद्र घर पर ही मौजूद था. उस के दोनों हाथ की अंगुलियों में ताजे घाव थे. इंसपेक्टर शिंदे उस की चोट देखते ही समझ गईं कि दीपा वर्मा का कातिल उन के हाथ लग चुका है. इसलिए उन्होंने उस से सीधे सवाल किया, ‘‘दीपा को तूने क्यों मारा.’’

धर्मेंद्र को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि पुलिस इतनी जल्दी उस तक पहुंच जाएगी. इंसपेक्टर शिंदे का सवाल सुन कर वह हतप्रभ सा रह गया. वह इधरउधर की बातें करने लगा.

तभी पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली तो घर में छिपा कर रखे खून सने कपड़े और दीपा के दोनों मोबाइल फोन मिल गए. इस के बाद धर्मेंद्र के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. सो उस ने चुपचाप अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस से पूछताछ के बाद दीपा वर्मा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

दीपा वर्मा का परिवार उज्जैन का रहने वाला था. भैरवगढ़ इलाके में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर दीपा की मां अपने 2 बेटों के साथ रहती थी. दीपा बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस के इस स्वभाव को निमंत्रण समझ कर मोहल्ले के युवक उस की गली के चक्कर लगाने लगे थे.

बेटी के पैर बहक न जाएं, इसलिए महज 14 साल की उम्र में उस के पिता ने दीपा की शादी देवास के जलाल खेड़ी में रहने वाले राकेश वर्मा के साथ कर दी थी. इस तरह खेलनेकूदने की उम्र में ही दीपा पति के साथ वयस्कों की दुनिया देख चुकी थी.

पति राकेश उस की सुंदरता का कायल था. उम्र बढ़ने के साथ दीपा ने जब जवानी में कदम रखा तो उस की शारीरिक जरूरतें पहले से ज्यादा बढ़ गईं. लेकिन अब तक राकेश वर्मा को घरपरिवार की चिंता सताने लगी थी. इसलिए राकेश रोजीरोटी के चक्कर में यहांवहां भटकने लगा था, इस से परेशान हो कर दीपा ने इधरउधर ताकाझांकी शुरू कर दी.

राकेश को जब पता चला तो वह शराब पी कर उस के साथ मारपीट करने लगा. पति की ज्यादती से दीपा बहुत परेशान हो गई थी. शादी के 10 साल बाद 24 साल की दीपा गुस्से में पति को छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी.

अपना गुजारा करने के लिए उस ने फ्रीगंज इलाके में फाल, पीको की दुकान कर ली. मायके में आ कर कुछ समय तक तो दीपा की जिंदगी आराम से कटी लेकिन फिर उसे अपनी शारीरिक जरूरतें महसूस होने लगीं.

यूं तो दीपा चाहती तो उस के बचपन के दीवाने अब भी मोहल्ले में मौजूद थे, जो उसे अभी भी ललचाई नजरों से घूरते रहते थे. लेकिन दीपा अब बच्ची नहीं थी. उस की आंखों को अब ऐसे मर्द की तलाश थी, जो उस की दैहिक के अलावा दूसरी तमाम जरूरतें भी पूरी कर सके.

एक दिन उस की मुलाकात अशोक से हुई तो दीपा ने अशोक के लिए अपने दिल की लगाम ढीली छोड़ दी. राजनीति में दखल रखने वाला अशोक वर्मा शादीशुदा और एक बच्चे का पिता था. लेकिन उस के पास इतना पैसा था कि वह दीपा की जिंदगी भर तमाम जरूरतें पूरी कर सकता था.

दीपा का रूप उस के दिल को भा चुका था. इसलिए दीपा को राजी देख उस ने उस के सामने साथ रहने का प्रस्ताव रखा, जिसे दीपा ने तुरंत स्वीकार कर लिया.

तब अशोक ने दीपा को किराए का मकान दिला कर घर की तमाम जरूरतें भी पूरी कर दीं. जिस के बाद दीपा अशोक के साथ बिना शादी किए ही पत्नी की तरह रहने लगी. यह करीब 8 साल पहले की बात है.
अशोक राजनीति में भी दखल रखता था. उस के पास पैसा भी खूब था, इसलिए दीपा को काम करने की जरूरत नहीं रह गई थी. फिर भी समय काटने के लिए उस ने फाल लगाने और पीको करने का काम बंद नहीं किया था. लेकिन ऐसे मामले में वही हुआ जो होता है.

दीपा के साथ 4-5 साल गुजारने के बाद अशोक का मन उस से भर गया. हालांकि वह अपने वादे से तो नहीं मुकरा, वह दीपा की हर आर्थिक जरूरत पूरी करता रहा. पर दीपा के पास उस का आनाजाना जरूर कम हो गया. अब वह 1-2 दिन बाद दीपा के पास आता.

लेकिन दीपा जिस मिट्टी से बनी थी उस के चलते उसे रोजाना पुरुष संग की जरूरत थी. इसलिए अशोक की गैरमौजूदगी का फायदा उठा कर उस ने कई दूसरे युवकों से दोस्ती कर ली. वह उन्हें रात के अंधेरे में अपने घर बुलाने लगी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं.

यानी अशोक को यह बात पता चल गई. अशोक ने उसे बहुत समझाया, पर उस ने अपनी आदत नहीं बदली. अशोक की गैरमौजूदगी में दूसरे युवक दीपा के घर में आ कर रात गुजारने लगे. अशोक तो दीपा का दीवाना था इसलिए उस के बदचलन होने के बावजूद भी उस ने दीपा का साथ नहीं छोड़ा.

जिस मकान में दीपा की हत्या हुई वह मकान इसी साल जनवरी के महीने में अशोक ने ही किराए पर ले कर उसे रहने के लिए दिया था. कोई 3 साल पहले धर्मेंद्र की पत्नी दीपा की दुकान पर अपनी साड़ी पर फाल लगवाने के लिए साड़ी दे कर चली गई थी. बाद में धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर वह साड़ी लेने गया था. तभी दीपा से उस की पहली मुलाकात हुई थी.

वैसे दीपा धर्मेंद्र से उम्र में काफी बड़ी थी. लेकिन उस की खूबसूरती देख कर धर्मेंद्र का मन पागल हो गया. इसलिए उस के हाथ से साड़ी लेते समय उस ने जानबूझ कर उस की अंगुलियों को छू दिया.

ऐसा कर के धर्मेंद्र को इस बात का डर था कि कहीं वह बुरा न मान जाए. लेकिन दीपा काफी बोल्ड थी. उस ने सीधे कहा, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में अंगुली पकड़ रहे हो. इस बार अंगुली पकड़ी है तो लगता है अगली बार सीधे पहुंचा पकड़ोगे.’’

यह सुन कर धर्मेंद्र झेंप गया तो वह जोर से हंस दी. जिस के बाद दोनों की दोस्ती हो गई और फोन पर बातें होने लगीं. धर्मेंद्र दीपा से मिलना चाहता था. लेकिन उस से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. 10-15 दिन बाद एक रोज खुद दीपा ने ही कहा कि कब तक फोन पर बातें कर के आग भड़काते रहोगे, मिलोगे नहीं क्या?

‘‘मिलना तो चाहता हूं पर कहां मिलूं. यह बात समझ में नहीं आ रही है. अच्छा तुम एक काम करो, कल महाकाल मंदिर आ जाओ, वहीं मिलते हैं.’’ धर्मेंद्र बोला.

‘‘क्यों, मेरे साथ वहां क्या भजन करना है, जो मंदिर में बुला रहे हो. तुम सीधे मेरे घर आ जाओ, वहीं घंटा बजाएंगे.’’ कहते हुए दीपा ने अपने घर का पता बता दिया.

उसी दिन शाम को धर्मेंद्र दीपा के किराए वाले मकान में पहुंच गया. दोनों ने एकांत का लाभ उठाते हुए अपनी हसरतें पूरी कीं. जल्द ही दीपा ने धर्मेंद्र को अपनी अदाओं से वश में कर लिया.

इस के बाद धर्मेंद्र उस पर काफी पैसे भी लुटाने लगा था. दीपा से मिलनेजुलने में दिक्कत न हो इसलिए धर्मेंद्र ने उस के पति अशोक से भी दोस्ती बना ली थी. जब मन होता दोनों शराब और चिकन की पार्टी भी करते.

लेकिन कुछ समय बाद ही धर्मेंद्र को पता चल गया कि अशोक दीपा का पति नहीं है, बल्कि वह उस के साथ रखैल बन कर रह रही है. इतना ही नहीं दूसरे और युवकों के साथ भी दीपा के संबंध होने की जानकारी धर्मेंद्र को लग गई. यहां तक कि धर्मेंद्र जिन दोस्तों को दीपा के यहां ले गया था, उन के साथ भी दीपा ने अवैध संबंध बना लिए थे.

धर्मेंद्र ने दीपा को समझाया कि वह ऐसा न करे लेकिन उस ने उलटे धर्मेंद्र से ही मिलना बंद कर दिया. धर्मेंद्र उस से मिलने की चाहत व्यक्त करता तो वह किसी न किसी बहाने से उसे टाल देती थी.
धर्मेंद्र की पत्नी को भी यह जानकारी मिल गई कि उस का पति दीपा नाम की किसी महिला के पास जाता है. धर्मेंद्र पत्नी से लगातार झूठ बोलता रहा. जब उस ने दीपा से मिलना नहीं छोड़ा तो वह उस से झगड़ने लगी.

एक दिन धर्मेंद्र दीपा के पास गया तो वहां पर उस के 2 दोस्त कुक्कू और रवि मिले. दीपा ने उस दिन धर्मेंद्र को घर से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था.

धर्मेंद्र अपने घर वापस आ गया लेकिन उस की नजरों के सामने दीपा की कुक्कू और रवि के साथ अय्याशी की तसवीरें किसी फिल्म की तरह चलती रहीं. इसलिए सुबह होते ही वह फिर से दीपा के घर पहुंचा. उस समय दीपा अकेली थी.

कुक्कू और रवि के साथ मस्ती करने के फेर में रात भर शायद वह सोई नहीं थी. इसलिए अपनी नींद में खलल पड़ने से वह धर्मेंद्र पर नाराज होते हुए को उलटासीधा बोलने लगी. यह देख कर धर्र्मेंद्र का खून खौल उठा और उस ने दीपा की पिटाई की. गुस्से में उस ने उस की दोनों कलाइयों की नसें भी काट दीं, जिस से कमरे में खून फैल गया और वह बेहोश हो गई. अब वह उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहता था.

हाजा वह उसे खींच कर रसोई में ले गया और उस की सलवार निकाल कर उस ने एलपीजी सिलेंडर का पाइप गैस चूल्हे से निकाल कर उस की दोनों जांघों के बीच फंसा कर ऊपर से लिहाफ, दरी, गद््दा डाल कर रैग्युलेटर से गैस चालू कर दी, फिर आग लगा कर वह वहां से चला गया. उस ने सोचा कि सिलेंडर फटने के बाद लोग इसे दुर्घटना समझेंगे और वह बच जाएगा.

लेकिन जब मकान में धुआं निकलना शुरू ही हुआ था, तभी पड़ोसी राकेश वर्मा ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. धर्मेंद्र से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बैडरूम का दरवाजा कैसे टूटा, यह बात पुलिस पता नहीं लगा सकी.

उज्जैन के आईजी राकेश गुप्ता ने केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम के कार्य की सराहना करते हुए पुरस्कृत करने की घोषणा की.

(कथा में कुछ नाम परिवर्तित हैं)

आशिक की अधूरी मौत

मोहम्मद आसिफ ने सामने बैठी शबनम की पूरी बात सुनने के बाद एक गहरी सांस ले कर बुझे
मन से कहा, ‘‘आखिर वही हुआ जिस का मुझे डर था, आज सारी दुनिया हमारे प्यार की दुश्मन बन बैठी है. जब अपनों ने ही साथ देने से साफ इंकार कर दिया तो किसी दूसरे को क्या दोष दें.’’
‘‘आसिफ मैं अम्मीअब्बू तो क्या, अपनी खाला से भी बात कर चुकी हूं. मुझे भी वही सब जवाब मिले थे, जो तुम्हें अपने परिवार से मिले हैं.’’

फिर कुछ सोचते हुए आसिफ ने कहा, ‘‘शबनम, हमें घर से भाग कर अपनी एक नई दुनिया बनानी होगी.’’
आसिफ की बात बीच में ही काटते हुए शबनम ने कहा, ‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, क्या घर से भागना इतना आसान है? आसिफ मुझे तो ऐसा लग रहा है कि आज यह हमारी आखिरी मुलाकात है. आज के बाद हम कभी नहीं मिल सकेंगे. क्योंकि अगले हफ्ते मेरा निकाह है. इस बीच अगर तुम अपने घर वालों को मना सको तो ठीक है, नहीं तो मुझे भूल जाना और बेवफा कह कर दोषी मत ठहराना. खुदा हाफिज.’’ कह कर शबनम वहां से उठ कर अपने घर की तरफ चली गई. आसिफ काफी देर तक वहीं बैठा सोचता रहा.

मोहम्मद आसिफ पाकिस्तान के जिला कसूर के अंतर्गत आने वाले गांव जल्लोके का रहने वाला था. उस के पिता का नाम था खलील मोहम्मद. खलील मोहम्मद की 4 संतानों में आसिफ सब से छोटा था. उसे छोड़ कर सभी बहनभाइयों की शादी हो चुकी थी.

खलील मोहम्मद के पास अपने गुजारे लायक जमीन थी, जिस में घर खर्च बड़े मजे से चलता था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि आसिफ की जिंदगी में उस दिन से हलचल शुरू हुई, जिस रोज उस ने पहली बार शबनम को देखा था.

मन ही मन आसिफ ने उस की तारीफ की थी. उन की यह मुलाकात एक शादी समारोह में हुई थी. शबनम की एक झलक देखते ही आसिफ अपना दिल हार बैठा था. वह सोचने लगा कि अगर यह खूबसूरत लड़की उस की जिंदगी में आ जाए तो जिंदगी बन जाएगी.

जब मन में उसे पाने की चाहत ने जन्म लिया तो उस ने अपनी हमउम्र मामू, खाला आदि की लड़कियों के माध्यम से शबनम के पास पैगाम भिजवाने शुरू कर दिए. वह जल्द से उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करने लगा.

चूंकि वह उस के बड़े भाई हमीद की साली थी और आसिफ शबनम को पाने के लिए बेताब हो उठा. उस की चाहत को देखते हुए शबनम भी उस की ओर आकर्षित हो चुकी थी. यानी आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी.

जल्द ही आसिफ को शबनम के निकट रहने का मौका मिल गया. शादी समारोह के बाद सभी रिश्तेदार विदा हो कर अपनेअपने घरों को लौटने लगे, पर आसिफ के बड़े भाई हमीद को उस के ससुर ने कुछ दिनों के लिए अपने यहां रोक लिया. अपनी भाभी से जिद कर के आसिफ भी उन के साथ भाई की ससुराल में रुक गया.

एक तरह से वह शबनम के बिलकुल करीब पहुंच गया था. घर में गहमागहमी का माहौल था. घर के बडे़ अपनी बातों में मशगूल रहते थे तो बच्चे और किशोर अपनी अलग मंडली जमाए बैठे थे. ऐसे में आसिफ और शबनम को अपनेअपने दिल की बात कहने का अवसर मिल गया.

दोनों ने एकदूसरे के सामने प्यार का इजहार किया, साथ जीनेमरने की कसमें खाईं. दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था. शादी का फैसला करते वक्त दोनों ने यह बात सपने में भी नहीं सोची थी कि परिवार वालों को उन का फैसला मंजूर होगा भी या नहीं. दोनों अभी अपने प्यार की पींगे पूरी तरह बढ़ा भी नहीं पाए थे कि शबनम के अब्बू को उन की प्रेम कहानी का पता चल गया.

शबनम पर तो जैसे आफत का पहाड़ ही टूट पड़ा. इसी बात को ले कर ससुर और दामाद में भी कहासुनी हो गई. हामिद अपनी ससुराल से नाराज हो कर अपने गांव लौट आया. उस ने अपनी बीवी को भी सख्त ताकीद कर दी थी कि अब वह अपने अम्मीअब्बू को भूल जाए. आसिफ और शबनम के प्यार का घरौंदा बसने से पहले ही उजड़ गया.

आसिफ और शबनम ने अपनेअपने तरीकों से इस रिश्ते को कायम रखने के लिए बहुत कोशिश की. पर दोनों परिवारों की जिद के आगे उन की एक नहीं चली. शबनम के अब्बू ने शबनम का रिश्ता कहीं दूसरी जगह तय कर दिया था. जल्दी ही शादी का दिन भी आ गया. इस शादी में उस ने अपनी बेटी और दामाद को भी नहीं बुलाया था.

मोहम्मद आसिफ ने बड़ी बेबसी के साथ शबनम के घर की तरफ देखा. चारों तरफ जगमगाती लाइटें जल रही थीं, चहलपहल दिखाई दे रही थी. घर और आसपास के पेड़ों में लगे लाउडस्पीकर पर पंजाबी गाने बज रहे थे. वहां से 100 मीटर दूरी पर आसिफ एक जगह अंधेरे में बैठा था. वह नहीं चाहता था कि कोई उसे और उस के दर्द को देखे. जिसे देखना था वह अपनी खुशियों में व्यस्त थी.

लाउडस्पीकर पर बजते गाने आसिफ के दिल में तीर की तरह चुभ रहे थे. अंदर ही अंदर बेचैनी खाए जा रही थी.

बारात धीरेधीरे शबनम के घर की तरफ बढ़ रही थी. आवाज की तेजी बढ़ती जा रही थी. जैसे वे सारी आवाजें उस की तरफ आ रही हों. ढोल वाले के हर डंके की चोट में जैसे शबनम चीखचीख कर कह रही हो, ‘मैं जा रही हूं आसिफ. तुम को छोड़ कर. मेरी शादी किसी और के साथ हो रही है. अब मैं तुम्हारी नहीं रही.’

आसिफ धीरेधीरे वहां से उठा और खेतों की तरफ जाने लगा. वह इन आवाजों से दूर जाना चाहता था, बहुत दूर. काली अंधेरी रात में वह कहां जा रहा था, उसे पता नहीं चल रहा था. वह तो बस चले जा रहा था.
उस के मन में उस समय एक ही धुन सवार थी कि जितनी जल्दी हो सके, बोझ बनी इस जिंदगी से छुटकारा पा कर सुकून हासिल कर ले. वह चले जा रहा था, पर शहनाई की आवाज उस का पीछा नहीं छोड़ रही थी. उस ने अपने कदमों की रफ्तार और तेज कर दी थी.

वह शबनम के गांव से दूर आ चुका था. आवाजें उस का पीछा कर रही थीं. उस ने अपने दोनों कान बंद किए और वहीं बैठ गया. अचानक उस ने अपना मुंह आसमान की तरफ उठाया और चीखचीख कर रोने लगा. जैसे खुदा से शिकायत कर रहा हो.

अपने भीतर कितने दिनों से दबा कर रखे आंसुओं के भंडार को वह आज जी भर के निकालना चाहता था. वहां न कोई सुनने वाला था, और न कोई कुछ कहने वाला. वह रोता रहा, रोता रहा. तब तक जब तक जहर भरे सारे आंसू बाहर नहीं निकल गए.

मन हलका हो गया तो फिर से शबनम की यादों को समेटने लगा था. इस के पहले कि शबनम की यादों में पड़ कर कमजोर हो जाए, वह अपनी जगह से उठा और तेजी से एक ओर बढ़ता गया. आसिफ रात भर चलता रहा, उस के पैरों में बिजली सी तेजी थी, मानो वह जल्द से जल्द अपनी मंजिल पर पहुंचना चाहता हो.

सुबह के करीब 5 बजे वह भारतपाक सीमा के हुसैनीवाला क्षेत्र फिरोजपुर बौर्डर के पास पहुंच गया. वह एक पल के लिए वहां रुका और आसपास देख कर वहां का जायजा लेने लगा. जब दूर से उस ने 2 देशों की सीमा को विभाजन करने वाली तारों की बाड़ को देखा तो उस की आंखें चमक उठीं.

किसी सम्मोहनवश वह लगभग दौड़ता हुआ सीमा पर लगी बाड़ की ओर लपका. सीमा के दोनों ओर दोनों देशों के सुरक्षाकर्मी हाथों में आधुनिक हथियार लिए बड़ी मुस्तैदी से खडे़ थे, पर आसिफ सुरक्षाकर्मियों की नजरों के सामने से बिना भयभीत हुए ‘अल्लाह हू अकबर’ कहता हुआ सुरक्षा तारों को पार करने लगा.
सीमा के दोनों ओर के जवान इस अजूबे को हैरत की नजरों से देख रहे थे और सोच रहे थे कि वह कौन है और क्या करना चाहता है. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. क्योंकि आसिफ पाकिस्तान की ओर से सीमा पार कर के भारत की सीमा में प्रवेश कर चुका था.

अब भारतीय फौजियों को ही उसे रोकना था सीमा पर उस समय सीमा सुरक्षाबल की 118वीं बटालियन के जवान तैनात थे. उन्होंने आसिफ को चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘जहां हो वहीं रुक जाओ और वापस अपने सीमा क्षेत्र में लौट जाओ वरना गोली मार दी जाएगी.’’

सीमा सुरक्षाबल के जवानों की चेतावनी का आसिफ पर कोई असर नहीं हुआ. वह अपनी धुन में तारों को पार करने की कोशिश करता रहा. थोडे़ से प्रयास के बाद वह अपने इरादों में सफल हो कर भारतीय सीमा में प्रवेश कर गया.

भारतीय सीमा में प्रवेश करते ही सुरक्षाबलों ने उसे घेर लिया. एसआई राजवीर सिंह, हवलदार अरविंद कुमार, अशोक कुमार, सिपाही जुगल किशोर और पी.एच. डेविड ने आसिफ को गिरफ्तार कर अपनी हिरासत में ले लिया और यह सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

सीमा सुरक्षा बल के आला अधिकारियों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने आसिफ से जम कर पूछताछ की. किसी हारे हुए जुआरी की तरह आसिफ ने अपना दिल खोल कर जब अपने नाकाम प्यार की दास्तां सुनाई तो सभी दंग रह गए.

आसिफ ने अपने बयान में बताया कि उसे विश्वास था कि सीमा पर उस के द्वारा की गई इस हरकत के बदले जवान उसे गोली से उड़ा देंगे और वह दुनिया से मुक्त हो जाएगा. क्योंकि रमजान के पाक महीने में वह आत्महत्या जैसा गुनाह नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने सोचसमझ कर जवानों की गोली से अपने प्यार के लिए शहीद होने की सोची थी. अपनी नाकाम मोहब्बत के सदमे की वजह से उस की जीने की इच्छा खत्म हो गई है.

सुरक्षा एजेंसियों की पूछताछ के बाद अपने अधिकारियों के आदेश पर एसआई राजबीर सिंह ने आसिफ को जिला फिरोजपुर के थाना ममदोह की पुलिस के हवाले कर दिया.

थानाप्रभारी रछपाल सिंह ने आसिफ से पूछताछ करने के बाद बताया कि नौजवान मानसिक तौर पर परेशान है. उस से सभी पहलुओं से पूछताछ की गई है. युवक की तलाशी लेने पर उस की जेब से 1200 रुपए की पाकिस्तानी करेंसी और 2 नींद की गोलियां बरामद हुई थीं.

पूछताछ के बाद थानाप्रभारी रछपाल सिंह ने आसिफ के खिलाफ 28 मई, 2018 को इंडियन पासपोर्ट एक्ट 1920 की धारा-3 और फारेनर एक्ट-1946 की धारा-14 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया गया जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– पुलिस सूत्रों पर आधारित

महिलाओं पर आतंकवाद का असर

‘जहां पहुंची नहीं हैं सड़कें, वहां पहुंचा है आतंकवाद,

दशहत ही दशहत बस गई है दिलों में.’

इन पंक्तियों में जम्मूकश्मीर के बाशिंदों का दर्द छिपा है. आएदिन आतंकी वारदातों के चलते उन के दिलों में दहशत भरी हुई है. आतंकवाद की दशहत में यहां के लोग मुश्किलभरी जिंदगी गुजार रहे हैं. आतंकी घटनाओं का भयावह असर इंसानों के साथसाथ यहां की आबोहवा पर भी पड़ा है.

पिछले 15 सालों के दौरान कश्मीर के अलावा जम्मू और इस के आसपास के इलाकों में भी आतंकी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. 20 मार्च, 2002 को जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर, 26 मार्च, 2002 को जम्मू के कालूचक्क इलाके में, 22 जुलाई, 2013 को जम्मू के अखनूर में, 26 जुलाई, 2013 को जम्मू के सांबा जिले में और 14 फरवरी, 2015 को कठुआ जिले के लखनपुर क्षेत्र में आतंकियों ने हमले किए. 28 मार्च, 2017 को जम्मूकश्मीर की पंजाब सीमा से लगते बम्याल में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ हुई जो कई दिनों तक चली. जम्मू रीजन के कठुआ, पुंछ, राजौरी, उधमपुर इलाकों में अकसर आतंकी हमले होते रहते हैं.

दहशत की दस्तक

जम्मू क्षेत्र का 70 फीसदी हिस्सा पहाड़ी और पिछड़ा हुआ है. इस हिस्से के गांवों तक टेढ़ेमेढ़े रास्तों से हो कर जाना पड़ता है. सरकार की योजनाएं भले ही वहां न पहुंची हों, लेकिन आतंकवाद वहां अपनी दस्तक दे रहा है. आतंकवाद ने स्थानीय लोगों को बेबस जिंदगी गुजारने को मजबूर कर दिया है.

नवंबर 2013 को जम्मू के राजौरी इलाके में रात को रुखसाना के घर में घुस कर कुछ आतंकी उस के परिवार के साथ मारपीट करने लगे. तभी 13 साल की रुखसाना ने बहादुरी से उन का मुकाबला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. लेकिन इस घटना का बुरा असर यह हुआ कि अब स्थानीय लोग अपनी बेटियों को पढ़ाने के  बजाय उन की जल्दी शादी कराने लगे हैं.

पुंछ की परवीन कौसर ने बताया, ‘‘जब यहां आतंकी घटनाएं होती हैं तो हमारे बुजुर्ग हमें घर से बाहर नहीं निकलने देते. इन्हीं घटनाओं के चलते उन्होंने मेरी और मेरी छोटी बहनों की पढ़ाई बीच में छुड़ा कर हमें मौसी के घर पंजाब भेज दिया.’’

इसी तरह डोडा के नायबखान ने बताया, ‘‘मस्तराम मेरा करीबी दोस्त था, एक दिन रात का खाना खाने के बाद किसी ने उस के घर का दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोलने पर 5 नकाबपोश उस के घर के अंदर घुस गए और उस पर बंदूक तान दी. वे परिवार की लड़कियों के साथ जोरजबरदस्ती करने लगे. विरोध करने पर उस के परिवार के 4 सदस्यों की गोली मार कर हत्या कर दी गई. दोस्त की बीमार पत्नी के साथ उन्होंने बलात्कार किया. आखिर में मासूम बेटियों का बेरहमी से कत्ल कर दिया.

‘‘इस घटना के बाद मैं ने अपनी बेटियों को जम्मू में अपने नजदीकी रिश्तेदार के यहां छोड़ दिया. मस्तराम की बेटियों के साथ मेरी बेटियां भी चीड़ की लकड़ी के खिलौने बनाने का काम करती थीं लेकिन खिलौने बनाने का वह काम अब हमेशा के लिए बंद हो गया और इस लघु उद्योग से जुड़े सभी लोग बेरोजगार हो गए हैं.’’

रोजी, सेहत प्रभावित

आएदिन घाटी में घट रही इन घटनाओं ने लड़कियों की पढ़ाई को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि लोगों की रोजीरोटी के साधन भी छीन लिए. आतंकवादियों और सेना की अकसर होती मुठभेड़ों के कई दिनों तक चलने से जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाता है. महिलाओं के कामधंधे पर इस का सब से ज्यादा असर पड़ता है. जम्मू की ज्यादातर महिलाएं पशुपालन के साथसाथ खेतीबाड़ी का काम करती हैं. यहां का अधिकांश हिस्सा सुनसान और पहाड़ों का दुर्गम पैदल रास्ता है. ऐसे में आतंकी घटनाएं महिलाओं को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं.

society

सांबा जिले के रेड़मा गांव की सुनीता बताती है, ‘‘हमारा गांव पाकिस्तानी सीमा पर है. यहां हमेशा युद्ध का सा माहौल रहता है, जिस वजह से हम यहां पर कोई भी काम नहीं कर सकते.’’ इन घटनाओं का असर हर वर्ग और धर्म की महिलाओं पर पड़ता है.

हाल में जम्मूकश्मीर की महिलाओं के स्वास्थ्य पर रिसर्च हुई है जिस में पता चला है कि हृदय संबंधी बीमारियों में जम्मूकश्मीर की महिलाओं की संख्या पूरे विश्व में सब से ज्यादा है. मानसिक तनाव और अन्य दिमागी बीमारियों में भी इन की संख्या दुनिया में सर्वाधिक है. एशिया महाद्वीप की बात करें तो यहां विधवाओं की संख्या भी सब से अधिक है.

कश्मीर की रौसाना कौसर अपनी व्यथा बताते हुए कहती है, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरे पति असलम अपनी अम्मी की दवा लेने बाजार गए थे. तभी धमाकेदार आवाज सुनाई दी. मैं ने बाहर आ कर देखा तो सेना और आतंकियों के बीच मुठभेड़ चल रही थी. असलम के बारे में सोच कर मेरा कलेजा मुंह को आने लगा था. एक घंटे तक हम घर के अंदर परेशान रहे. जब गोलीबारी बंद हुई तो बाहर निकल कर मैं ने सेना से असलम की तसवीर ले कर पूछताछ की, परंतु उन का कोई पता नहीं चला. फिर हम ने खुद ही तलाश करनी शुरू कर दी. मैं ने असलम के गले में पड़ी तावीज से उन्हें पहचान लिया. असलम का चेहरा इतना बुरी तरह जख्मी था कि पहचान पाना मुश्किल था. उन का पूरा शरीर छलनी हो चुका था. जेब से निकले आधारकार्ड से ही असलम की पूरी पहचान हो पाई थी.’’

रौसाना ने आगे बताया कि असलम कपड़े की दुकान पर काम करते थे और उन पर हमारे 4 बच्चे और मांबाप निर्भर थे. अब घर चलाने में बड़ी दिक्कत आ रही है.

यह एक रौसाना की ही कहानी नहीं है बल्कि यह कहानी है जम्मूकश्मीर की हर महिला की, जो इन हालात से जूझती हैं. अकसर यहां की हर मां, पत्नी, बेटी व बहन परेशान रहती है कि घर से निकला हुआ बेटा, पति, बाप या भाई वापस आएगा भी या नहीं. ऐसी हालत में महिलाएं कैसे रह सकती हैं. राज्य और केंद्र सरकारें भले ही योजनाएं चलाएं लेकिन उन का फायदा रौसाना जैसी औरतों को नहीं मिलता. योजनाओं का फायदा तो शहरी महिलाएं उठाती हैं.

जागरूकता न होने के कारण पहाड़ी व दूरदराज के गांवों की महिलाएं इन से आज भी वंचित हैं. यदि आम महिलाओं को इन योजनाओं की जानकारी हो तो उन की दशा कुछ बेहतर हो सकती है.

कठुआ के वनी इलाके की एक महिला ने बताया कि उस के गांव में आज तक कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. हम अपने गांव से कई किलोमीटर पैदल चल कर दूसरे गांव के स्वास्थ्य केंद्र पर स्वास्थ्य की देखभाल या गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण कराते हैं. कई बार तो मौसम खराब होने या सेना की आतंकियों से मुठभेड़ होने के कारण रास्ते बंद होने से हमें घर पर ही महिलाओं की डिलिवरी करानी पड़ती है. यदि किसी महिला की हालत ज्यादा नाजुक हो तो गांव के नौजवान उसे चारपाई पर बैठा कर दूसरे गांव के स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाते हैं.

जम्मूकश्मीर की पारुल जसरोटिया ने पहली पर्वतारोही बन कर क्षेत्र का नाम रोशन किया है. वहीं दूरदराज के गांवों में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. उक्त महिला का यह भी कहना है कि यदि सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी हम महिलाओं को भी मिले, तो लघु उद्योग लगा कर हम अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं.

ताकि हौसला बना रहे

जम्मू के लोग हस्तकला, चित्रकला और चीड़ की लकड़ी से खिलौने बनाने में माहिर हैं. उन के इन उत्पादों की मांग भारत में ही नहीं, विदेशों में भी है. जम्मू के सांबा और कठुआ जिलों में ‘बेटी बचाओ,

बेटी पढ़ाओ’ अभियान पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. लेकिन छोटी उम्र में शादी और भ्रूणहत्या के मामले भी इसी जिले में ज्यादा पाए गए हैं.

स्वच्छ भारत अभियान के तहत घरघर में शौचालय का अन्य राज्यों के मुकाबले जम्मूकश्मीर में सब से कम निर्माण हुआ है. यहां आज भी महिलाएं खुले और सुनसान जगह पर शौच के लिए जा रही हैं. बरसात में गांव की महिलाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जम्मू क्षेत्र के इस 70 फीसदी हिस्से की बस्तियों में रह रही महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की बहुत जरूरत है. सरकार के साथसाथ समाज को भी इन के प्रति अच्छी सोच रखने की जरूरत है, ताकि इन में घुटनभरे माहौल से जूझने की ताकत आ सके.

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