अब पछताए क्या होत : बाबागीरी में बनते ब्रैंड

उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए

2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत.

किस करते वक्त पत्नी खा गई पति की जीभ

राजधानी दिल्ली में एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां एक पत्नी ने अपने पति की जीभ काट दी. घटना की जानकारी मिलने पर पहुंची पुलिस ने पति को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया. वहीं, मामले में कार्रवाई करते हुए पुलिस ने आरोपी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस फिलहाल मामले की जांच कर रही है. बाहरी दिल्ली के डीसीपी सेजू पी कुरुविल्ला के मुताबिक, शनिवार रात करीब साढ़े 10 बजे पुलिस को जानकारी मिली कि एक पत्नी ने अपने पति की जीभ काटकर अलग कर दी है. पुलिस ने मौके पर पहुंचकर घायल पति को पास के अस्पताल में भर्ती करवाया.

वहीं, पुलिस ने आरोपी महिला को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने बताया कि रणहौला निवासी करण (24) और काजल की कुछ साल पहले ही शादी हुई थी. शादी के कुछ दिन तक सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ समय बाद दोनों में झगड़ा होने लगा.

पुलिस ने बताया कि शनिवार शाम को दोनों के बीच मामूली कहासुनी हुई. इसके बाद कहासुनी झगड़े में बदल गई. गुस्से में आकर पत्नी काजल ने मौका पाकर पति की जीभ काट दी. चीख पुकार सुनकर आए पड़ोसियों ने पुलिस को घटना की सूचना दी.

परिजनों के अनुसार, करण ढोलक बजाने का काम करता है. उसी से घर का खर्चा चलता था. परिवार का कहना है कि आरोपी पत्नी के परिवार वाले ही अपनी बेटी को उकसाते थे. घटना के वक्त भी काजल अपने घर वालों से बात कर रही थी. तभी दोनों में झगड़ा हुआ था. पुलिस ने आरोपी पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 324 के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया है.

सर्जिकल के जश्न पर विपक्ष की स्ट्राइक

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की तरफ से विश्वविद्यालयों को 29 सितंबर को ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ मनाने का निर्देश दिए जाने को लेकर जबरदस्त राजनीतिक गतिरोध देखने को मिला. पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने कहा है कि राज्य में इसका पालन नहीं किया जाएगा. साथ ही पार्टी ने आरोप लगाया कि यह बीजेपी के राजनीतिक अजेंडे का हिस्सा है.

वहीं, केंद्र सरकार ने कहा कि इससे देशभक्ति झलकती है, न कि राजनीति. बहरहाल, केंद्र सरकार ने कहा कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के आतंकवादी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ मनाना विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों के लिए अनिवार्य नहीं है.

शुक्रवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा कि विश्वविद्यालयों को परामर्श जारी किया गया है, न कि उन्हें निर्देश जारी किया गया है. विपक्षी दलों के सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिकरण करने के आरोप को जावडेकर ने सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आलोचना पूरी तरह से बेबुनियाद और गलत है. उन्होंने कहा कि यूजीसी की तरफ से समारोह के लिए जो कार्यक्रम सुझाए गए हैं, उनमें सशस्त्र सेनाओं के बलिदान के बारे में पूर्व सैनिकों की तरफ से संवाद सत्र का आयोजन, नैशनल कैडेट कोर (एनसीसी) की तरफ से विशेष परेड शामिल हैं. कॉलेजों से कहा गया है कि एनसीसी की तरफ से परेड और पूर्व सैन्य अधिकारियों के लेक्चर का आयोजन करें.

वहीं, पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने बीजेपी नीत केंद्र सरकार की आलोचना में कहा कि बीजेपी सेना की छवि खराब कर रही है और उसका राजनीतिकरण कर रही है. उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थान यूजीसी के निर्देशों का पालन नहीं करेंगे. चटर्जी ने कहा, ‘हमारे सैनिकों के दिए बलिदान के नाम पर वह हमसे दिवस मनाने को कहते तो यह बात समझी जा सकती थी. हमारे मन में सैनिकों और उनके बलिदान के प्रति पूरा सम्मान है. सेना को हमेशा ही राजनीति और विवादों से परे रखा गया है. लेकिन हम देख रहे हैं कि बीजेपी सेना की छवि खराब करने और उसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है.’

टीएमसी के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि केंद्र के हरेक फैसले का विरोध करना टीएमसी सरकार की आदत हो गई है.

क्या UGC 8 नवंबर को भी सर्जिकल स्ट्राइक डे मनाएगा : कांग्रेस

यूजीसी के निर्देश पर कांग्रेस के सीनियर नेता कपिल सिब्बल ने हमला बोला है. साथ ही सवाल किया है कि क्या यूजीसी 8 नवंबर को हुई नोटबंदी को भी ‘सर्जिकल स्ट्राइक डे’ के रूप में मनाने की हिम्मत करेगा. शुक्रवार को पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री सिब्बल ने ट्वीट किया, ‘यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि वे 29 सितंबर को सर्जिकल स्ट्राइक दिवस के रूप में मनाएं. क्या इसका मकसद लोगों को शिक्षित करना है या फिर बीजेपी के राजनीतिक हितों की पूर्ति करना’ उन्होंने पूछा, ‘क्या यूजीसी 9 नवंबर (नोटबंदी का दिन) को लोगों की उनकी जीविका से दूर किए जाने को भी सर्जिकल स्ट्राइक दिवस के तौर पर मनाने की हिम्मत करेगा.’

अल्हड़पन के दीवानों का हश्र

20 साल की रूबी लखनऊ के आशियाना इलाके में नौकरी करती थी. देखने में वह बहुत
सुंदर भले ही नहीं थी, पर उस में चुलबुलापन जरूर था. यानी सांवले रंग में भी तीखापन, जो सहज ही किसी को भी अपनी ओर खींच लेता था. दिल खोल कर बात करने की उस की अदा से सब को लगता था कि रूबी उसे ही दिल दे बैठी है.रूबी अपने गांव से शहर आई थी. उसे अपने हुनर से ही गुजरबसर करने लायक जमीन तैयार करनी थी. वह बहुत सारे लोगों से मिलतीजुलती थी, जिन में से एक आनंद भी था. उम्र में वह रूबी से करीब 10 साल बड़ा था. इस के बाद भी रूबी और आनंद की आपस में गहरी दोस्ती हो गई.

रूबी काम पर जाती तो उसे लाने ले जाने का काम आनंद ही करता था. रूबी को भी इस से सहूलियत होती थी. उसे वक्तबेवक्त आनेजाने में कोई डर नहीं रहता था. एक तरह से रूबी को ड्राइवर और गार्ड दोनों मिल गए थे.

दोस्ती से शुरू हुई यह मुलाकात धीरेधीरे रंग लाने लगी. वक्त के साथ दोनों के संबंध गहराने लगे. आनंद चाहता था कि रूबी केवल उस के साथ ही रहे पर रूबी हर किसी से बातें करती थी. उस के खुलेपन से बातें करने से हर किसी को लगता था कि रूबी उस की खास हो गई है.

आनंद और रूबी का चक्कर चल ही रहा था कि वह इंद्रपाल के संपर्क में आ गई. इंद्रपाल उस के साथ काम करता था. अब रूबी कभीकभी आनंद के बजाय इंद्रपाल के साथ आनेजाने लगी. आनंद और इंद्रपाल में अंतर यह था कि इंद्रपाल रूबी की उम्र का ही था.

सीतापुर जिले का रहने वाला इंद्रपाल नौकरी करने के लिए लखनऊ आया था. आनंद को रूबी और इंद्रपाल का आपस में घुलनामिलना पसंद नहीं आ रहा था. वह सोच रहा था कि किसी दिन रूबी को समझाएगा.

एक दिन रूबी और इंद्रपाल शाम को आशियाना के किला चौराहे पर चाट के ठेले पर खड़े पानीपूरी खा रहे थे. रूबी को पानीपूरी बहुत पसंद थी. इत्तफाक से आनंद ने दोनों को देख लिया तो उसे गुस्सा आ गया.
जब रूबी आनंद से मिली तो उस ने कहा, ‘‘तुम आजकल अपने नए दोस्त से कुछ ज्यादा ही घुलमिल रही हो. यह मुझे पसंद नहीं है. अगर मुझ में कोई कमी हो तो बताओ, लेकिन तुम्हारा इस तरह से किसी और के साथ समय गुजारना मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘तुम भी क्याक्या सोचते रहते हो, हम दोनों केवल साथी हैं. कभीकभी उस के साथ घूमने चली जाती हूं, इस से तुम्हारेमेरे संबंधों में कोई फर्क नहीं पड़ेगा. तुम परेशान मत हो.’’

‘‘देखो, तुम्हें फर्क भले न पड़ता हो पर मुझे पड़ता है. मैं इसे सहन नहीं कर सकता. मेरे जानने वाले कहते हैं कि देखो तुम्हारे साथ रहने वाली रूबी अब किसी और के साथ घूम रही है.’’

‘‘लोगों का क्या है, वे तो केवल बातें बनाना जानते हैं. तुम उन की बातों पर ध्यान ही मत दो. तुम मुझ पर यकीन नहीं कर रहे, इसलिए लोगों की बातें सुन रहे हो.’’

‘‘रूबी, मैं ये सब नहीं जानता. बस मुझे तुम्हारा उस लड़के के साथ रहना पसंद नहीं है. जिस तरह से तुम उस के साथ घूमने जाती हो, उस से साफ लगता है कि तुम मुझ से कुछ छिपा रही हो.’’

रूबी ने आनंद से बहस करना उचित नहीं समझा. वह चुपचाप वहां से चली गई. उसे आनंद का इस तरह से बात करना पसंद नहीं आया. वह मन ही मन सोचने लगी कि आनंद से कैसे पीछा छुड़ाया जाए.

यही बात आनंद भी सोच रहा था. आनंद रूबी के चाचा से मिला और उसे रूबी और इंद्रपाल के बारे में बताया. यह बात उस ने कुछ इस तरह से बताई कि रूबी के चाचा उस पर बहुत नाराज हुए.

जब रूबी ने उन की एक नहीं सुनी तो वह बोले, ‘‘रूबी, अगर तुम्हें मेरी बात नहीं माननी तो नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाओ. इस तरह से बदनामी कराने से कोई फायदा नहीं है.’’

रूबी समझ गई थी कि उस के चाचा भी आनंद की बातों में आ गए हैं. कुछ कहनेसुनने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इसलिए वह चुप रही. अगले दिन रूबी ने यह बात इंद्रपाल को बताई. इंद्रपाल ने कहा कि रूबी हम यह दोस्ती नहीं तोड़ सकते. मुझे कोई डर नहीं है, जब तक तुम नहीं चाहोगी, हमें कोई अलग नहीं कर सकता.

रूबी को पता था कि आनंद अपनी बात का पक्का है. वह अपनी जिद को पूरा करने के लिए कोई भी काम कर सकता है. उसे चिंता इस बात की थी कि इंद्रपाल और आनंद के बीच कोई झगड़ा न हो जाए. वह दोनों के बीच कोई गलतफहमी पैदा नहीं करना चाहती थी.

रूबी ने इंद्रपाल से दूरी बनानी शुरू कर दी. यह बात इंद्रपाल को हजम नहीं हो रही थी. एक दिन उस ने रूबी से न मिलने का सबब पूछा तो रूबी ने ठीक से कोई जवाब नहीं दिया.

इस के बाद इंद्रपाल अकसर रूबी से बात करने की कोशिश में जुटा रहा. कई बार उस ने बात करने के लिए जोरजबरदस्ती भी करनी चाही. इस पर रूबी ने कहा, ‘‘मैं यह नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें कोई परेशानी हो. बेहतर है, तुम मुझ से दूर ही रहो.’’

रूबी पर निगाह रख रहे आनंद को लगा कि इंद्रपाल उस की राह का कांटा बन गया है. यह बात उस ने रूबी को भी नहीं बताई. आखिर आनंद के मन में इंद्रपाल को रास्ते से हटाने की एक खतरनाक योजना बन गई.

इस योजना के लिए उसे रूबी की मदद की जरूरत थी ताकि वह इंद्रपाल को एकांत में बुला सके. लेकिन रूबी इस के लिए तैयार नहीं थी. इस पर आनंद ने उसे समझाया कि इंद्रपाल को केवल समझाना चाहता है. इस पर रूबी इंद्रपाल को बुलाने के लिए तैयार हो गई.

15 जून, 2018 की बात है. रूबी ने फोन कर के इंद्रपाल को किला चौराहे पर मिलने के लिए बुलाया. इंद्रपाल के लिए रूबी का बुलाना बहुत बड़ी खुशी की बात थी. वह बिना कुछ सोचेसमझे किला चौराहे पर पहुंच गया. इस के बाद रूबी बातचीत करने के बहाने उसे बिजली पासी किला के जंगल ले गई, वहां पहले से ही आनंद, आलोक, अविनाश, गौरव, विकास और सुधीर घात लगाए बैठे थे.

इंद्रपाल को अकेला देख कर सब के सब उस पर टूट पड़े. जब मारपीट में इंद्रपाल बेसुध हो गया तो उसे गला दबा कर मार डाला. बाद में शव की पहचान छिपाने के लिए पैट्रोल डाल कर उसे जला भी दिया गया.

अगले दिन उस की लाश थाना आशियाना पुलिस को मिली. पुलिस ने आईपीसी की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के मामले की छानबीन शुरू की. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रपाल के घर सीतापुर जानकारी दी गई.

उस के पिता राजाराम यादव लखनऊ आए और अपने बेटे का दाहसंस्कार करने के बाद वह पुलिस के साथ अपराधियों की खोज में लग गए. थानाप्रभारी आशियाना जितेंद्र प्रताप सिंह ने मामले की छानबीन शुरू की. सीओ (कैंट) तनु उपाध्याय और एसपी (नौर्थ लखनऊ) अनुराग वत्स इस मामले की छानबीन में मदद कर रहे थे.

पुलिस ने इंद्रपाल के मोबाइल फोन की छानबीन की तो फोन में रूबी का नंबर मिला. नंबर की डिटेल्स से पता चला कि दोनों के बीच बहुत ज्यादा बातचीत होती थी. घटना के दिन भी रूबी के फोन से इंद्रपाल के फोन पर बात की गई थी. इस से पुलिस को मामले का सुराग मिलता दिखा.

पुलिस को अपनी छानबीन में यह भी पता चला कि रूबी के चाचा ने उसे इंद्रपाल से मिलने के लिए मना किया था और नौकरी छुड़वा दी थी. एसपी नौर्थ अनुराग वत्स ने बताया कि इंद्रपाल को धोखे से बुलाया गया था. पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे को जलाने की कोशिश की गई थी.

सीओ (कैंट) तनु उपाध्याय ने बताया कि जब पुलिस ने पूरी छानबीन कर ली तो रूबी से घटना के बारे में पूछा गया. रूबी ने शुरुआत में तो बहानेबाजी की पर पुलिस ने जब उसे सबूत दिखाए तो उस ने अपना अपराध कबूल कर लिया.

24 जून, 2018 को कथा लिखे जाने तक आनंद पकड़ से बाहर था. बाकी सभी आरोपी जेल भेजे जा चुके थे. रूबी का अल्हड़पन दोनों पर भारी पड़ा. एक की जान गई और दूसरा फरार है. थानाप्रभारी आशियाना जितेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि उसे जल्द ही पकड़ लिया जाएगा.

लखनऊ के एसएसपी दीपक कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर स्टोरी का परदाफाश करने के लिए सभी पुलिस कर्मचारियों को बधाई दी. पुलिस ने रूबी के साथ आनंद के साथियों आलोक, अविनाश, गौरव, विकास और सुधीर को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

खतरों में भरी राह लिव इन

नोएडा के खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव स्थित 4 मंजिला मकान में कुल 33 कमरे थे. सभी कमरों में नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली में काम करने वाले किराएदार रह रहे थे. इन में से कुछ लोग अपने परिवार के साथ रहते थे. लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे थे जो अकेले ही रहते थे. चूंकि सभी लोग नौकरीपेशा थे, इसलिए वे सुबह ही अपनी ड्यूटी पर चले जाते और देर शाम या रात को वापस अपने कमरों पर लौटते थे.

12 जून, 2018 की रात करीब 11 बजे की बात है. उस समय अधिकांश लोग अपने कमरों में सोने की तैयारी में थे. तभी कुछ लोगों को भयंकर बदबू आई. बदबू कहां से आ रही है, यह जानने के लिए कुछ किराएदार अपने कमरों से बाहर निकल आए. उसी समय एक युवक चौथी मंजिल से एक बड़े आकार का भूरे रंग का ट्रौली बैग अपने साथ ले कर सीढि़यों से उतरता दिखा.

वहां रहने वाले उस युवक के बारे में केवल इतना जानते थे कि वह ऊपर की मंजिल पर रहता है. उस का नाम किसी को मालूम नहीं था. ट्रौली बैग ले कर वह जिधर जा रहा था, उधर ही बदबू बढ़ती जा रही थी.

लोगों को शक हुआ कि उस के बैग में ऐसा क्या है जो इतनी बदबू आ रही है. एकदो लोगों ने उस से इस बारे में पूछा भी, लेकिन उस ने ठीक से कोई जवाब देने के बजाए उन्हें झिड़क दिया. इस के बाद उन लोगों को उस पर और भी ज्यादा शक बढ़ गया और वे उत्सुकतावश नीचे ग्राउंड फ्लोर पर आ गए.

दरअसल, पिछले 2 दिनों से उस मकान में एक अजीब तरह की सड़ांध आ रही थी. कई किराएदारों ने सड़ांध का पता लगाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पाया था. लेकिन ट्रौली बैग देख कर वे लोग समझ गए कि सड़ांध उसी बैग से आ रही है.

ग्राउंड फ्लोर पर उतरने के बाद वह युवक लाल रंग की कार की तरफ बढ़ रहा था, तभी लोगों ने इस की सूचना उस मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी को दे दी. राधेमोहन त्रिपाठी उस ट्रौली बैग वाले युवक के पास पहुंचे. वह उस युवक को पहचान गए. वह युवक चौथी मंजिल पर रहने वाला किराएदार शिवम विरदी था.

राधेमोहन ने शिवम से बैग के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. इस पर राधेमोहन ने उसे कार में बैठने से रोक लिया और नोएडा पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. जो किराएदार नीचे उतर आए थे, वे उस लाल रंग की कार के आगे खड़े हो गए ताकि वह कार ले कर वहां से न भाग सके. तब तक शिवम वह ट्रौली बैग ले कर कार में बैठ चुका था. उस ने कार का हौर्न बजा कर सामने खडे़ लोगों से हट जाने का संकेत किया. लेकिन वे नहीं हटे तो शिवम के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी.

शिवम ने जब देखा इतने सारे लोग उस के पीछे पड़ गए हैं तो वह कार से उतरा और उसे लौक कर के वहां से पैदल ही भाग खड़ा हुआ. लोग उस के पीछे भागे भी पर वह किसी की पकड़ में नहीं आया.

थोड़ी देर में खोड़ा थाने के थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार वहां आ गए. लोगों ने उन्हें पूरी बात बताई. कार के सामने पहुंच कर वह उस का मुआयना करने लगे. कार के दरवाजे लौक थे, इस के बावजूद कार से कुछ बदबू बाहर आ रही थी. उन्होंने साथ में आए स्टाफ से कार का शीशा तोड़ कर कार में रखा ट्रौली बैग बाहर निकालने को कहा.

पुलिसकर्मियों ने कार का शीशा तोड़ कर ट्रौली बैग बाहर निकाला तो उस में से बहुत तेज बदबू आ रही थी. इस से थानाप्रभारी ने बैग खुलवाया तो उन की शंका सच साबित हुई. उस में एक लड़की की लाश थी.

लाश काफी खराब अवस्था में थी. लाश देख कर लोगों ने बताया कि लाश शिवम की पत्नी ज्योति की है. ज्योति कई दिनों से दिखाई भी नहीं दे रही थी. लाश का मुआयना करने पर थानाप्रभारी ने देखा उस पर घाव के निशान थे. थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार ने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर के मामले की सूचना दे दी और जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उन्होंने लाल रंग की स्विफ्ट कार अपने कब्जे में ले ली.

मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी से पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि कार छोड़ कर फरार हुआ शिवम लुधियाना, पंजाब का रहने वाला है और पिछले 8 महीने से वह अपनी पत्नी ज्योति के साथ यहां रह रहा था. केयरटेकर को साथ ले कर थानाप्रभारी चौथी मंजिल स्थित शिवम के कमरे पर पहुंचे.

कमरे पर ताला लगा हुआ था. ताला तोड़ कर पुलिस टीम अंदर पहुंची तो देखा फर्श की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी. कमरे की तलाशी में पुलिस को कुछ कागजात मिले, उन में से एक में ज्योति के भाई का पता और फोन नंबर मिल गया.

थानाप्रभारी ने उस के भाई को फोन कर के बताया कि उस की बहन के साथ अनहोनी हो गई है, इसलिए वह जितनी जल्दी हो सके, नोएडा के खोड़ा थाने पहुंच जाए. उस कमरे को सील कर के पुलिस टीम थाने लौट गई.

अगले दिन सुबह फरार शिवम का हुलिया पता कर के नोएडा के बसस्टैंड तथा मैट्रो स्टेशन पर उस की तलाश की गई, मगर वह कहीं नहीं मिला. उधर थानाप्रभारी को बेसब्री से ज्योति के भाई के आने का इंतजार था. उस के आने के बाद ही आगे की काररवाई की जानी थी.

12 जून, 2018 की शाम को ज्योति का भाई लोधी सिंह वर्मा खोड़ा थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सब से पहले उसे अस्पताल में रखी लाश दिखाई. लाश देखते ही वह रोने लगा. उस ने उस की शिनाख्त अपनी छोटी बहन ज्योति के रूप में कर दी. लोधी सिंह की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस ने लोधी सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की बहन पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली के एक सैलून में जौब मिलने की बात बता कर लुधियाना से नोएडा चली आई थी.

चूंकि उस ने परिवार को अच्छी सैलरी मिलने की बात बताई थी, वैसे भी ज्योति तेजतर्रार थी, इसलिए उस के दिल्ली आने पर किसी ने ऐतराज नहीं किया था.

नौकरी लग जाने पर उस ने बताया था कि वह दिल्ली में अपनी एक सहेली के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती है. यहां आने के बाद भी वह प्रतिदिन अपने घर फोन कर के अपने बारे में जानकारी देती रहती थी. जब तक वह यहां रही, परिवार का कोई सदस्य उसे देखने के लिए नहीं आया.

इस वारदात के बाद लोधी सिंह को पता लगा कि वह किसी सहेली के साथ नहीं बल्कि शिवम के साथ रह रही थी. लोधी सिंह से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने फरार शिवम को तलाशने के लिए मुखबिर लगा दिए.

13 जून, 2018 की शाम को खोड़ा के कुछ लोगों ने नोएडा के लेबर चौक के पास शिवम को खड़े देखा. वह शायद किसी गाड़ी के इंतजार में वहां खड़ा था. पुलिस को सूचना देने से पहले ही लोगों ने उसे पकड़ लिया और इस की सूचना खोड़ा पुलिस को दे दी.

शिवम के पकड़े जाने की बात सुन कर थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार फौरन पुलिस टीम के साथ लेबर चौक पहुंच गए. वहां कुछ लोग शिवम को दबोचे खड़े थे. पुलिस ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी ज्योति की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि ज्योति की हत्या उस ने नहीं की है, बल्कि उस ने आत्महत्या की थी.

शिवम ने बताया कि 9 जून की रात को वह शराब पी कर घर लौटा तो ज्योति उस से नाराज हो गई. दोनों के बीच कहासुनी हुई तो ज्योति गुस्से में बाथरूम में गई और फंदा बना कर लटक गई.

आधी रात होने पर जब उस का नशा उतरा तो उस ने ज्योति को ढूंढना शुरू किया. वह उसे ढूंढते हुए बाथरूम में पहुंचा तो उस की लाश फंदे में झूल रही थी. यह देख कर वह घबरा गया और पुलिस से बचने के डर से उस ने 2 दिनों तक उस की लाश कमरे में ही छिपाए रखी. कल जब वह उसे ठिकाने लगाने के लिए जा रहा था, तभी लोगों ने उसे घेर लिया और लाश ठिकाने नहीं लगा सका.

यह सब बतातेबताते शिवम थानाप्रभारी से बारबार नजरें चुरा रहा था. यह देख कर थानाप्रभारी को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन्होंने शिवम से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि ज्योति की हत्या उस ने ही की थी. उस ने ज्योति की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

26 वर्षीय शिवम लुधियाना के फतेहपुर अवाना राजगुरू नगर में अपने पिता जगदीश विरदी और मां के साथ रहता था. उस के पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे. 2 साल पहले वह लुधियाना के एक मौडर्न सैलून के सामने से गुजर रहा था, तो उस की मुलाकात ज्योति से हुई. ज्योति उसी सैलून में नौकरी करती थी.

पहली ही नजर में ज्योति की खूबसूरती उस के दिल को भा गई. उस ने उत्सुकतावश पूछ लिया कि इस सैलून में लेडीज और जेंट्स दोनों की हेयर सेटिंग होती है? इस पर ज्योति ने उसे बताया कि यहां दोनों के लिए अलगअलग सैलून हैं और वह भी इसी सैलून में काम करती है. अगर उसे कभी जरूरत हो तो उसे फोन कर के आ जाए.

इस के बाद उस ने अपना फोन नंबर बताया तो शिवम ने जल्दी से उस का नाम पूछ कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. इस के बाद उस ने अपना नाम और नंबर भी ज्योति को बता दिया. यह उन दोनों की पहली मुलाकात थी. इस के बाद तो आए दिन किसी न किसी बहाने से दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया जो जल्दी ही प्यार में बदल गया.

दोनों का जब भी दिल करता, आपस में प्यार की मीठीमीठी बातें कर अपनी चाहतों का इजहार करने से नहीं चूकते थे. धीरेधीरे 2 साल गुजर गए. इस बीच शिवम ने लुधियाना के नामी इंस्टीट्यूट से बीसीए का कोर्स भी पूरा कर लिया. अब उसे भी नौकरी की तलाश थी. वह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो कर ज्योति को अपनी दुलहन बनाना चाहता था.

ज्योति के परिवार में उस के पिता की कुछ साल पहले ही मौत हो चुकी थी. इस समय घर में 2 बडे़ भाई धर्मेंद्र सिंह वर्मा और लोधी सिंह वर्मा तथा 5 बहनें थीं. बहनों में वह सब से छोटी थी.

दोनों को ऐसा लगता था कि उन की शादी में परिवार वाले बाधक नहीं बनेंगे. फिर भी दोनों फूंकफूंक कर कदम रख रहे थे. मजे की बात यह थी कि काफी समय गुजर जाने के बाद भी उन के परिवार वालों को उन के अफेयर की जानकारी नहीं थी.

इस बीच एक दिन जब दोनों मिले तो शिवम ने उसे बताया कि वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा है और नौकरी मिलते ही उसे भी वहां बुला लेगा. ज्योति इस के लिए पहले से ही राजी थी, इसलिए उस ने शिवम के प्रस्ताव पर फौरन हामी भर दी.

ज्योति के साथ नया जीवन गुजारने की उमंग में वह मन में नएनए सपने बुनता हुआ नोएडा आ गया. यहां उसे वीवो कंपनी में नौकरी मिल गई. वह कंपनी के कस्टमर केयर डिपार्टमेंट में काम करने लगा.

6 महीने बाद उस ने ज्योति को भी फोन कर के अपने पास बुला लिया. अक्तूबर में ज्योति नोएडा आ गई. साथ रहने के लिए दोनों ने खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव में वन रूम सेट किराए पर ले लिया और लिवइन में रहने लगे. वहां शिवम ने ज्योति को अपनी पत्नी बताया था. कुछ दिन बाद ज्योति वर्मा को भी गाजियाबाद के वसुंधरा एनक्लेव के एक ब्यूटीपार्लर में ब्यूटीशियन की नौकरी मिल गई. चूंकि दोनों ही नौकरी कर रहे थे, इसलिए उन्हें अब किसी तरह की टेंशन नहीं थी. दोनों खुश थे.

ज्योति और शिवम के शुरुआत के 3-4 महीने बेहद खुशनुमा थे, लेकिन परेशानी तब शुरू हुई, जब ज्योति शिवम के जल्दी शादी करने के प्रस्ताव को किसी न किसी बहाने टालने लगी. यह देख कर शिवम मन ही मन बहुत परेशान रहने लगा. इस के अलावा उन दोनों की सैलरी में भी भारी अंतर था. शिवम को जहां 14 हजार रुपए मिलते थे, वहीं ज्योति की सैलरी 22 हजार रुपए महीने थी.

इस के अलावा ज्योति ने अप्रैल महीने से घर लेट पहुंचना शुरू कर दिया था. इस से शिवम ने मन में सोचा कि ज्योति को कोई अमीर आशिक मिल गया है, इसलिए वह उस से किनारा करना चाह रही है. अपना शक दूर करने के लिए वह रोज ज्योति के घर लौटने पर उस का मोबाइल चैक करने लगा.

शिवम को अपना मोबाइल चैक करते देख कर ज्योति लपक कर उस से मोबाइल छीन लेती थी, साथ ही ऐसा करने से मना भी करती थी. इस के बाद शिवम का शक और बढ़ गया. नतीजतन आए दिन दोनों के बीच रोज लड़ाई होने लगी. शिवम को अब पक्का यकीन हो गया कि ज्योति जरूर किसी के साथ डेट पर जाने लगी है.

9 जून, 2018 की शाम शिवम विरदी ने शराब पी. उस ने सोचा कि आज वह ज्योति का मोबाइल छीन कर उस के वाट्सऐप और फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट चैक करेगा. देर शाम जब ज्योति घर लौटी तो पहले से गुस्से में भरे बैठे शिवम ने उस से मोबाइल छीन लिया. जब ज्योति ने इस का पुरजोर विरोध किया तो दोनों के बीच जम कर लड़ाई हो गई.

गुस्से में शिवम रसोई से चाकू उठा लाया और उस के पेट पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर तड़प कर ज्योति ने दम तोड़ दिया. ज्योति के मरने के बाद शिवम को लगा, उस से बहुत बड़ी गलती हो गई. लेकिन अब क्या हो सकता था. वह 72 घंटों तक लाश को एक ट्रौली बैग में बंद कर के रखे रहा और उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचता रहा.

12 जून को उस ने दिल्ली के लक्ष्मीनगर से एक सेल्फ ड्राइव स्विफ्ट कार किराए पर ली और उसे वंदना एनक्लेव स्थित मकान के सामने ले आया. जब वह ट्रौली बैग को उस में रखने जा रहा था, उसी समय ज्योति की लाश से निकलने वाली बदबू के कारण उस का भांडा फूट गया और वह खोड़ा के थानाप्रभारी के हत्थे चढ़ गया.

14 जून, 2018 को नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण, एसपी आकाश तोमर ने नोएडा स्थित अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर मीडिया को ज्योति वर्मा मर्डर केस का खुलासा होने की जानकारी दी.

उसी दिन आरोपी शिवम विरदी को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

तमाम युवक और युवतियां लिवइन में रहते हैं और अपनीअपनी नौकरी करते हैं, लेकिन सभी के अनुभव अच्छे नहीं होते. इस की वजह होती है दोनों की अंडरस्टैंडिंग ठीक न बन पाना. ज्योति और शिवम के मामले में भी यही हुआ.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सुखद दांपत्य के लिए सोच समझ कर बोलें

शेखर और नीता का विवाह हुए 2 साल ही हुए थे. दोनों दांपत्य जीवन से काफी खुश भी थे पर नीता की जरूरत से ज्यादा बोलने की आदत से शेखर कई बार मन ही मन झुंझला जाता था. नीता को अकेले में समझाने की कई बार कोशिश की, लेकिन नीता ने उस की बात पर ध्यान ही न दिया.

चाहे परिवार का कोई सदस्य हो या शेखर के औफिस के सहयोगी, नीता की जबान को कभी ब्रेक नहीं लगता. एक बार तो हद ही हो गई, एक पारिवारिक समारोह में वह शेखर के साथ शामिल हुई. कई दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ शेखर खुशी से एंजौय कर रहा था. शेखर के कजिंस ने कालेज के दिन याद किए तो नीता अपने स्कूलकालेज के किस्से सुनाने लगी.

वह एक बार जब शुरू हुई तो फिर रुकी ही नहीं. दोस्त, सहेलियों और टीचर्स के किस्से पर किस्से. अचानक उसी के बोलने की आदत पर एक कजिन ने चुटकी ली, ‘‘भाभी, आप बहुत लकी हैं जो शेखर जैसा शांत पति मिला. यह तो ज्यादा बातें करने वाली लड़कियों से बहुत दूर भागता था.’’

नीता के कान खड़े हुए, वह बोली, ‘‘अच्छा, कोई थी क्या?’’

‘‘नहीं, इस की कोई गर्लफ्रैंड नहीं थी. इतना कम बोलता था, कौन लड़की इस के साथ बोर होती.’’

नीता ने कहा, ‘‘इस का मतलब, मैं ज्यादा बोलती हूं?’’

‘‘नहीं भाभी, हां, यह तो है कि आप के जैसा नहीं है यह, नहीं तो सोचो, आप दोनों ही बोलते रहते तो सुनता कौन?’’ कजिन तो मस्ती कर रहा था, छेड़छाड़ हो रही थी पर नीता को तो जैसे बात का बतंगड़ बनाने का मौका मिल गया था. सब हैरान रह गए, वह फिर चुप ही नहीं हुई, अपने बोलने की आदत को अपना विशेष गुण समझती हुई सब को चुप करवा कर ही मानी, रंग में भंग पड़ता चला गया.

शेखर को यह सब देख कर बहुत दुख हुआ, शर्मिंदगी हुई. घर जा कर नीता को समझाया भी कि हर जगह ज्यादा बोलना ठीक नहीं होता पर वह इसी बात पर बहस करती गई कि किसी ने बोलने पर मुझे टोका कैसे?

बिना सोचेसमझे बोलने की आदत से नीता कई बार अनुचित बातें भी कह जाती, जिन से किसी भी लड़की को बचना चाहिए.

धीरेधीरे दोनों में किसी बात के बढ़ने पर अच्छीखासी बहस होने लगती. झगड़ा बढ़ जाता पर क्या मजाल जो कभी नीता चुप हो जाए. गुस्से में एक दिन शेखर का हाथ उठ ही गया जो वह कभी चाहता नहीं था. पर नीता का लगातार बहस करते जाना शेखर के हाथ उठाने का कारण बनने लगा.

नीता को यह समझने में काफी समय लगा कि उस के कम बोलने या कभी चुप रहने से दोनों का झगड़ा, बहस बंद हो जाती है. जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसे समझ आया कि हर बार झगड़े का कारण उस का लगातार बोलना ही था. अपनी इस कमी को सुधारने के बाद उसे फिर हमेशा शेखर का प्यार मिला. सारे दोस्तों, रिश्तेदारों से उस ने बोलने पर नियंत्रण करते ही अपने सुधरे व्यक्तित्व पर प्रशंसा भी बटोरी.

अमित और अंजलि भी देखने में बेहद स्मार्ट, सुंदर, सुशिक्षित दंपती माने जाते हैं. पर अमित की आदत है बिना सोचेसमझे वह कहीं भी कुछ भी बोल देता है.

अमित के सारे गुण इस एक अवगुण के सामने फीके पड़ जाते हैं. एक बार अमित ने घर में अपने दोस्तों को डिनर पर बुलाया हुआ था.

सभी खाने की तारीफ कर रहे थे. सुंदर, सुघड़ अंजलि बड़े उत्साह से मेहमानों की आवभगत कर रही थी. अमित के दोस्तों की पत्नियां अंजलि के स्वभाव, व्यवहार से तो अवगत थी हीं, घर में एक जगह पेंटिंग का सामान रखा देख एक दोस्त की पत्नी ने पूछा, ‘‘अंजलि, तुम पेंटिंग भी बनाती हो?’’

‘‘हां, कभीकभी. घर में ये सब पेंटिंग्स मेरी ही बनाई हुई हैं.’’ अमित के कानों में जब यह बात पड़ी तो वह फौरन बताने लगा, ‘‘और भी बहुत सी पेंटिंग्स रखी हैं ऊपर अलमारियों में, इसे लगा था कि बड़े पैमाने पर इस काम को करेगी और पेंटिंग्स बिकेंगी पर सब टांयटांय फिस, कोई नहीं बिकी. पूरा प्लान ही चौपट हो गया. अब तो पेंटिंग्स लोगों को उपहार में दे कर इस को खुश होना पड़ता है. इस के साथ ऐसा कई बार हुआ है. कई स्कूलों में इस ने ड्राइंगटीचर के लिए अप्लाई कर भागदौड़ भी की, पर कहीं बात नहीं बनी.’’

इन कटाक्षभरी बातों पर मेहमानों के सामने अंजलि की आंखों में नमी सी आ गई पर उस ने कुशलतापूर्वक उस समय स्वयं पर नियंत्रण रखा और बात उपहास में टाल दी. लेकिन अकेले में बाद में वह फूटफूट कर रोई. हालांकि, ऐसा अमित ने पहली बार नहीं किया था.

ज्यादा बोलना देखनेसुनने में कोई बहुत बड़ा अवगुण नहीं लगता पर ऐसे लोगों के साथ जीवन बिताना किसी यातना से कम नहीं होता. ज्यादा बोलने वाला पति या पत्नी कब किस के सामने क्या बोल दे, इस आदत को झेलने वाला इस शंका में कैसे जीता है, यह वही जानता है.

कहा जाता है कि जिस ने अपने मुंह और जबान पर नियंत्रण रख लिया, उस ने खुद को कई कष्टों से बचा लिया. जहां जरूरत हो, वहीं बोलना चाहिए, इसी में बुद्धिमानी है. यदि एक मूर्ख भी चुप बैठा रहे तो उसे समझदार ही समझ लिया जाता है, पर जैसे ही वह मुंह खोलता है, हकीकत सामने आ जाती है.

ज्यादा बोलने वाले इंसान इधरउधर की बातें कर के अकसर झूठी खबरों को बढ़ावा देते हैं. ऐसे लोग अच्छे श्रोता हो ही नहीं सकते. सामने वाले की बात खत्म होने से पहले ही अपनी बात शुरू कर देना मूर्खता की निशानी है. जिस व्यक्ति को यह धैर्य नहीं, वह मूर्ख है.

हर इंसान को सामने वाले की बात सुनने में तेज होना चाहिए और बोलने में धीमे. बिना सोचेसमझे बोलने वाले लोग अकसर अपनी शेखी बघारने वाले होते हैं. कहा जाता है, दूसरों को ही अपनी प्रशंसा करने दो, अपने होंठों को नहीं.

भले ही जबान छोटी सी होती है पर वह बड़ेबड़े नुकसान कर जाती है. जैसे एक जंगल को एक छोटी सी आग नष्ट कर सकती है ऐसे ही ज्यादा बोलना पतिपत्नी के मधुर रिश्ते में कड़वाहट भर कर नुकसान पहुंचा सकता है. इसलिए कम बोलें, अच्छा बोलें. सोचसमझ कर बात करें. जहां जरूरत न हो वहां चुप ही रहें. अनावश्यक बातों से रिश्ते में कटुता न आए, इस का ध्यान रखें.

यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो इस का मतलब है कि उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है. इसीलिए वह हृदय के तराजू में तोल कर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

सरकारी नौकरी के पीछे युवा

कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकौड़ा बेचने को भी रोजगार बताया तो पूरे देश में हंगामा मच गया. देशभर में प्रधानमंत्री की खिल्ली उड़ाई गई. विपक्षी पार्टियों ने तो यह शोर मचाया कि समोसेपकौड़े या चाय बेचना भला कोई रोजगार कैसे हो सकता है. ऐसा कह कर सरकार नौकरियां पैदा करने में अपनी नाकामी छिपा रही है.

विपक्ष का आरोप अपनी जगह सही है, पर यह इस मानसिकता को भी उजागर करता है कि नौकरी सिर्फ सरकारी होनी चाहिए. सरकारी नौकरी का यह मोह कितना विकट है, इस का उदाहरण इस साल मार्च में तब देखने को मिला जब महाराष्ट्र में मुंबई पुलिस में सिपाही की भरती के सिर्फ 1,137 पद निकले, लेकिन इस के लिए 2 लाख से ज्यादा युवाओं के आवेदन आए.

कुछ ऐसा ही हाल उत्तर प्रदेश में शिक्षक भरती के लिए मांगे गए आवेदन के समय हुआ, जिस में कुछ हजार पदों के लिए 10 लाख से ज्यादा एप्लीकेशंस आ गईं. जिस देश में नौकरियों का मामला एक अनार, सौ बीमार वाला हो, वहां कुछ सौ नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आ जाना हैरान नहीं करता. पर महाराष्ट्र में सिपाही बनने की कतार में करीब 2 हजार ऐसे लोग भी दिखे जिन के पास मैडिकल, ला, एमबीए या इंजीनियरिंग आदि की डिगरियां थीं, जबकि इस नौकरी के लिए जरूरी शैक्षिक योग्यता सिर्फ  8वीं पास थी.

यह ऐसा विरोधाभास है जो इस से पहले भी कई बार चपरासी, सफाईकर्मी जैसे कर्मचारियों की भरतियों में नजर आ चुका है. यों तो कोई पद छोटा या बड़ा नहीं होता पर इस बात से इत्तफाक रखने के बावजूद डाक्टरोंइंजीनियरों को चपरासीसिपाही बनने की लाइन में देखना हैरानी पैदा करता है.

सवाल उठता है कि क्या देश में बेरोजगारी सच में ऐसा लाइलाज मर्ज बन गई है कि अच्छीखासी योग्यता भी हमारे नौजवानों को, क्या सरकारी और क्या प्राइवेट, कैसी भी नौकरी के योग्य नहीं ठहरा रही है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर चपरासी से ले कर सिपाही बनने के लिए खड़े इन लाखों शिक्षित और ट्रेंड बेरोजगारों की लंबी कतारों का रहस्य क्या है.

महाराष्ट्र में सिपाही भरती के इन उम्मीदवारों के बारे में खुलासा यह हुआ कि ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के इन पढ़ेलिखे नौजवानों की अंगरेजी कमजोर थी. लिहाजा, ये प्राइवेट सैक्टर में जाने के बजाय कैसी भी सरकारी नौकरी प्राप्त करना बेहतर समझते हैं, क्योंकि प्राइवेट सैक्टर में अंगरेजी बोलचाल की मजबूरी है. लेकिन हमारे देश में जहां हर गली में अंगरेजी सिखाने वाले संस्थान मौजूद हैं, इस कथित मजबूरी में दूसरे तथ्य छिपे लगते हैं.

तथ्य यह है कि सिपाही बनने के एवज में 25 हजार रुपए महीने की सैलरी के अलावा रहने को घर, दूसरे भत्ते और मानसिक सुकून देने वाली ऐसी नौकरी की गारंटी मिलती है जिस के जाने का खतरा, प्राइवेट नौकरी के मुकाबले छटांकभर भी नहीं है, तमाम कामचोरी के बावजूद.

यही नहीं, किसी ठीक जगह तैनाती मिल जाए तो रिश्वतखोरी के बल पर ऊपरी कमाई के ढेरों मौके मौजूद होते हैं. बस, ऊपर वालों को उन का कमीशन वक्त पर पहुंचाया जाता रहे. सरकारी नौकरियों की यही कुछ खासीयतें हैं कि इंजीनियरिंगएमबीबीएस की डिगरी वाले लोग भी चपरासी, सिपाही और यहां तक कि सफाई कर्मचारी बनना मंजूर कर लेते हैं. इस का एक असर यह हुआ है कि हर साल सरकारी नौकरियों में कटौती भले ही की जा रही हो, लेकिन आवेदकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह कैसी दीवानगी

कुछ वर्षों से यह बात बारबार कही जाती है कि आवेदकों की सालदरसाल बढ़ती तादाद दरअसल सरकारी नौकरियों के बढ़ते आकर्षण के साथ डिगरी की कमजोर पड़ती ताकत के चलते है. लेकिन इस चिंता का कोई असर समाज और युवाओं में नहीं दिखाई दिया है. इस के उलट, बीते दशक में सरकारी नौकरी पाने की इच्छा और बढ़ी है.

इस का एक खुलासा इसी वर्ष  एसएससी यानी स्टाफ सिलैक्शन कमीशन की ओर से जारी आंकड़ों से हुआ. एसएससी के मुताबिक, 10 वर्षों में सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में 30 गुना बढ़ोतरी हुई है.

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यहां अहम सवाल यह उठता है कि जब देश का प्राइवेट सैक्टर नौकरियों के लिहाज से सरकारी रोजगारदाता संगठनों के मुकाबले चौगुना हो गया हो, तो हमारे पढ़ेलिखे और काबिल नौजवान आखिर सरकारी नौकरियों के पीछे क्यों पड़े हैं? आमतौर पर इस का जवाब यह कह कर दिया जाता है कि सरकारी नौकरी की सब से बड़ी खूबी जौब सिक्योरिटी है यानी कुछ भी हो जाए, नौकरी नहीं छूटती. कर्मचारी कितना ही निकम्मा, घूसखोर, लापरवाह क्यों न हो, कोई माई का लाल उस से उस की नौकरी नहीं छीन सकता.

कई मामलों में यह बात सच साबित होती है. तरहतरह के आरोपों में पकड़े गए सरकारी कर्मचारियों पर उन के विभाग कथित तौर पर कार्यवाही करते तो दिखते हैं, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि किसी कर्मचारी की लेटलतीफी, कामचोरी, लापरवाही, घूसखोरी की वजह से नौकरी गई हो.

किसी बड़ी घटना या लापरवाही हो जाने पर भले ही कर्मचारियों को कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया जाता है, विभागीय कार्यवाही के नाम पर एकाध प्रमोशन पर रोक लगा दी जाती है, लेकिन उन की नौकरी फिर भी कायम रहती है जबकि प्राइवेट सैक्टर में ऐसा नहीं है.

वैसे इस वर्ष भारतीय रेल विभाग ने दावा किया कि उस ने अपने 18,600 कर्मचारियों पर रिश्वतखोरी व दूसरे कई मामलों में कड़ी कार्यवाही की है. यह कड़ी कार्यवाही चाहे जितनी भी कठोर बताई जाए, फिर भी ऐसी नहीं होती कि किसी को नौकरी से हाथ धोना पड़े.

कहने को तो अब सरकारी नौकरियों में यह खतरा है कि वहां कामचोरी, रिश्वतखोरी, अनुशासनहीनता और लेटलतीफी जैसी बातों को ले कर सख्ती बरती जा सकती है, लेकिन यह कठोरता कम ही मामलों में नौकरी पर आंच लाती है.

बहरहाल, सरकारी नौकरी के सुरक्षित होने (जौब सिक्योरिटी) की बात को कई बार व्यंग्य में भी कहा गया है. जैसे, वर्ष 2016 में जब टाटा संस के चेयरमैन साइरस पलोनजी मिस्त्री की अचानक विदाई हुई, तो सोशल मीडिया पर एक चुटकुले को जबरदस्त ढंग से शेयर किया गया. चुटकुले का भाव यह था कि नौकरी हो तो सरकारी वरना अपना धंधा कर लेना ही ठीक है, क्योंकि प्राइवेट सैक्टर में साइरस मिस्त्री जैसे लोगों की नौकरी भी सुरक्षित नहीं है.

नौकरियां हजार, आवेदक करोड़

यह तो तकरीबन साफ है कि सरकारी नौकरियों को मलाईदार मानने की मानसिकता इसी तरह आगे भी कायम रह सकती है. इस का भी अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक महज 40 हजार नौकरियों के लिए होने वाली एसएससी की परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की तादाद 4 करोड़ सालाना पार कर जाएगी.

उल्लेखनीय है कि 2008-09 में इन नौकरियों के लिए 9 लाख 94 हजार युवाओं ने आवेदन दिए थे, जिन में से उस साल 30,323 लोगों को नौकरी मिली थी. आवेदकों की यह संख्या 2016-17 के बीच एसएससी की 18 परीक्षाओं के लिए 3 करोड़

37 लाख तक पहुंच गई यानी चाहे कुछ हो जाए सरकारी जौब की जो चमक है, वह आने वाले वक्त में भी फीकी पड़ती नजर नहीं आती.

इस मर्ज का एक सिरा इस से भी जुड़ा है कि अब अच्छीभली डिगरी (एमए, बीएड, पीएचडी आदि) रखने वाले नौजवान माली, चपरासी व सफाईकर्मी जैसी नौकरियों के लिए मारामारी करते हैं, बशर्ते नौकरी सरकारी हो. अकसर ऐसी घटनाओं के

बारे में इस अफसोस के साथ खबरें दिखाई जाती हैं कि अगर सफाई करने की ही नौकरी करनी थी तो आखिर इतनी पढ़ाईलिखाई करने का फायदा क्या हुआ?

बेशक, बेरोजगारी का यह संकट कुछ अनोखा ही है कि इंजीनियरिंग स्नातक और पीएचडी डिगरीधारक चपरासी, कुली जैसे पदों पर काम करने को राजी हो रहे हैं. यह स्थिति तब है, जब पिछले 2 दशकों में एक ओर युवाओं को विदेशों में बड़ी संख्या में रोजगार मिले हैं, तो दूसरी तरफ देश में नई तरह के कई कामधंधे विकसित

हुए, जिन में लाखोंकरोड़ों रोजगार पैदा हुए हैं. आईटी, बीपीओ, मीडिया, इंजीनियरिंग, फैशन टैक्नोलौजी से ले कर फिल्म निर्माण तक में लाखों नए रोजगार प्राइवेट सैक्टर में इसी अवधि में पैदा हुए हैं.

प्राइवेट सैक्टर भी डांवांडोल

एक समस्या यह भी है कि निजी क्षेत्र में भी अब नए रोजगारों के पैदा होने की गति थम गई है. कुछ विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि कहने को तो देश में औनलाइन शौपिंग जैसी नई चीजें आईं, पर इस सैक्टर में बड़ी मात्रा में रोजगार पैदा नहीं हुए, क्योंकि इस में मोबाइल ऐप आदि जरियों से लोगों को खुद ही शौपिंग करने का विकल्प दे दिया गया.

अब तो आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के कारण कई और नौकरियों पर खतरे की तलवार लटक रही है. इस के अलावा पिछले कुछ वर्षों में कई प्राइवेट एयरलाइंस बंद हुई हैं. दूरसंचार (टैलीकम्युनिकेशन) कंपनियों में जियो जैसी कंपनी के एकाधिकार के कारण दूसरी कंपनियों में तेज छंटनी चल रही है. ऐक्सपोर्ट से जुड़ी इकाइयों को बाहर से काम नहीं मिलने की वजह से उन में ताले पड़ गए हैं. वहीं ट्रंप प्रशासन की तरफ से वीजा कटौतियों के कारण देश के आईटी, बीपीओ सैक्टर को नए काम मिलने की दर में भारी गिरावट आई है.

इस के अलावा देश की आबादी में बढ़ोतरी की तुलना में रोजगार बाजार की सुस्त रफ्तार भी बेरोजगारी के नए संकट पैदा कर रही है. नतीजतन, इंजीनियरों को मजबूरीवश कुलीचपरासी की नौकरी भी आकर्षित कर रही है.

कहां गया स्किलइंडिया

बदलाव का एक छोर और है. असल में युवा स्वतंत्र कारोबार खड़ा करने या निजी क्षेत्र की मेहनत वाली नौकरियों के बजाय सरकारी नौकरियों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं. एक सच यह भी सामने आ रहा है कि ज्यादातर युवा एक के बाद एक डिगरियां तो हासिल करते जाते हैं, लेकिन वे स्वतंत्र आजीविका तलाश करने की जहमत नहीं उठाते.

जब उन की योग्यता के मुताबिक काम मिलना मुश्किल हो जाता है तो वे मजबूरी में सरकारी नौकरियों की तरफ भागते हैं. उम्र निकल जाने या अयोग्यता के कारण वह भी नहीं मिलती तो झक मार कर कोई प्राइवेट नौकरी खोजी जाती है. इसलिए सरकार के साथसाथ खुद युवाओं को भी अब इस पर विचार करना होगा कि उन के लिए क्या जरूरी है, कागजी योग्यता का वजन बढ़ाना या किसी काम के लिए खुद को योग्य साबित करना. अपनी डिगरियों की अनुपयोगिता को कोसने के बजाय वे यह देखें कि वे क्या काम कर सकते हैं.

यदि वे अपनी योग्यता पर ध्यान देंगे, तो सरकारी नौकरी के आकर्षण और उस की भेड़चाल से खुद को बचाते हुए अपने लिए उपयुक्त रोजगार खोज पाएंगे और बेरोजगारी की समस्या का निदान पेश कर पाएंगे. युवाओं को समझना होगा कि सरकारी नौकरी के पीछे भागते रहने का ट्रैंड बेरोजगारी के नए संकट खड़े करने के सिवा कुछ नहीं करेगा.

सरकारों को भी यह बात समझनी होगी कि महज कंपीटिशन की सख्ती इस का मुकम्मल इलाज नहीं है. नए अवसर पैदा करना एक रास्ता है जिस के बारे में न जाने क्यों सरकार ने सोचना बंद कर दिया है. कहने को तो सरकार स्किल इंडिया जैसा प्रोग्राम चला रही है पर उस का कोई ठोस लाभ मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है.

एसएससी में घटते मौके

अगर कर्मचारी चयन आयोग की नौकरियों को ही पैमाना माना जाए, तो आंकड़े कहते हैं कि पिछले 10 वर्षों में सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में 30 गुना इजाफा हुआ है. देश की केंद्रीय सेवाओं के तहत ग्रेड सी और डी नौकरियों के लिए परीक्षाएं आयोजित करने वाले एसएससी के आंकड़े बताते हैं कि देश में न सिर्फ सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, बल्कि इस से पता चलता है कि देश में कितनी ज्यादा बेरोजगारी है.

उल्लेखनीय है कि एसएससी वर्ष 1977 से ग्रेड बी और सी के लिए परीक्षा आयोजित कर रहा है. ग्रेड ए के पदों के लिए परीक्षा का आयोजन यूपीएससी यानी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन करता है. एसएससी के कुछ आंकड़े इस प्रकार हैं :

  • वर्ष 2016 से ले कर 31 दिसंबर, 2017 के बीच 3 करोड़ 37 लाख आवेदक एसएससी की 18 परीक्षाओं में शामिल हुए हैं. इन में 40 हजार से अधिक नौकरियां मिलनी हैं.
  • वर्ष 2008-09 में 9 लाख 94 हजार लोगों ने अलगअलग नौकरियों के लिए आवेदन दिए थे और उस साल 30,323 नौकरियां मिली थीं.
  • वर्ष 2015 में 1 करोड़ 48 लाख आवेदक अलगअलग परीक्षाओं में बैठे थे, जबकि 25,138 नौकरियां मिली थीं.
  • एसएससी के तहत संयुक्त स्नातक स्तर परीक्षा सब से बड़ी परीक्षा होती है, जिस में 40 लाख से अधिक आवेदक भाग लेते हैं.

टैलेंट का अभाव

जिन नौजवानों के पास उच्चशिक्षा की डिगरियां हैं और जो छोटी से छोटी सरकारी नौकरी पाने के लिए कतार में खड़े नजर आ रहे हैं, उन के बारे में एक मुश्किल यह है कि प्राइवेट सैक्टर उन्हें किसी काम का नहीं मानता है. इस की एक बानगी वर्ष 2016 में एक एचआर कन्सल्ंिटग फर्म द्वारा दुनिया की 42 हजार अहम कंपनियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में मिली थी.

ये ज्यादातर कंपनियां वैश्विक स्तर पर युवाओं को नौकरी देती हैं. इन की चिंता यह है कि इन्हें प्रतिभावान नौजवान नहीं मिल रहे हैं. इस कारण इन में से 47 फीसदी कंपनियों को अपने यहां खाली पदों को भरना मुश्किल हो रहा है. भारत में 48 फीसदी कंपनियों की यही शिकायत है यानी उन्हें नौकरी की अपेक्षा के मुताबिक काबिल लोग नहीं मिल रहे हैं. सब से खराब स्थिति आईटी सैक्टर की है, जहां कंपनियां युवाओं में स्किल की कमी से जूझ रही हैं.

हालांकि यह सर्वेक्षण एक और समस्या की तरफ इशारा करता है. इस के अनुसार, अब योग्य कर्मचारी अपनी मेहनत के बदले ज्यादा बेहतर पैकेज मांगते हैं, जबकि कंपनियां उन्हें जो वेतनभत्ते औफर करती हैं वे उन की उम्मीदों के मुकाबले काफी कम होते हैं.

नौकरी की योग्यता

कर्मचारियों की बढ़ी उम्मीदों के बीच टैलेंट की कमी का नतीजा यह निकलता है कि एक ओर काबिल कर्मचारियों का अभाव पैदा हो जाता है, तो दूसरी ओर डिगरियों को तमगे की तरह गले में लटकाए युवा उन सरकारी नौकरियों के लिए भी हाथपांव चलाता रहता है जिन के मुकाबले वह कई गुना ज्यादा काबिल हो सकता है. लेकिन असल में डिगरी से काबिलीयत का आकलन ही सरकारी नौकरी के लिए की जा रही कवायदों और प्राइवेट सैक्टर में योग्य लोगों की कमी का कच्चा चिट्ठा खोल देता है. हकीकत यह है कि जिन डिगरियों के बल पर कई नौजवान प्राइवेट नौकरी छोड़ कैसी भी सरकारी नौकरी कर लेने का दम भरते नजर आते हैं, उन में से ज्यादातर क्लर्क बनने लायक भी नहीं होते.

इस के कई खुलासे भारतीय उद्योगों के संगठन एसोचैम और रोजगारों के रूपस्वरूप का आकलन करने वाली संस्था एस्पायरिंग माइंड अतीत में कर चुके हैं. एसोचैम ने साल 2015 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि आईआईएम और चुनिंदा प्रबंधन संस्थानों के अलावा ज्यादातर संस्थानों से मैनेजमैंट की शिक्षा डिगरी पाए नौजवान किसी नौकरी के काबिल नहीं हैं. उन की ट्रेनिंग इस स्तर की नहीं है कि उन्हें डिगरी के मुताबिक नौकरी दी जा सके.

एसोचैम के मुताबिक, आईआईएम के अलावा अन्य संस्थानों से आए सिर्फ 7 फीसदी छात्र ही कायदे की नौकरी के योग्य होते हैं. बाकी छात्र तो 8 या 10 हजार रुपए महीने वाली नौकरी के लायक ही होते हैं, भले ही उन्होंने डिगरी हासिल करने पर लाखों रुपए क्यों न खर्च किए हों. कुछ यही दशा इंजीनियरिंग में भी पाई गई. एस्पायरिंग माइंड संस्था तो पिछले कई वर्षों से यह कहती रही है कि देश के संस्थानों से निकले करीब 8 प्रतिशत इंजीनियर ही ठीकठाक नौकरी के योग्य होते हैं.

शायद यही वजह है कि देश में हर साल जो 15 लाख युवा कालेजों से इंजीनियरिंग की डिगरी ले कर निकलते हैं, उन में से ज्यादातर क्लर्क, कुली, चपरासी आदि नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं. अब वक्त आ गया है जब खुद युवाओं समेत सामाजिक संगठनों और सरकार में इस बात पर विचार हो कि नौजवानों के लिए कागजी योग्यताओं का वजन बढ़ाते हुए सरकारी नौकरी पाने के अंतहीन प्रयास किया जाना जरूरी है या फिर किसी काम के लिए युवाओं को खुद को वास्तव में योग्य साबित करना.

युवाओं को देखना होगा कि आज भी गांव का नौजवान कसबाई या शहरी नौजवान के मुकाबले इसलिए ज्यादा संतुष्ट है, क्योंकि उसे स्थायी किस्म की सरकारी और ऊपर से आकर्षक दिखने वाली किसी प्राइवेट नौकरी के पीछे नहीं भागना है.

इस के उलट, उसे या तो खुद का कोई कारोबार शुरू करना होता है या फिर पारंपरिक पेशे में अपना हुनर दिखाते हुए आजीविका का प्रबंध करना होता है.

आज जहां सरकार और समाज को अब यह देखने की जरूरत है कि अधिक पूंजी लगा कर कम रोजगार पैदा करने की नीति न तो देश और न ही युवाओं का कोई भला कर रही है, वहीं युवाओं को भी सरकारी नौकरी में स्थायित्व खोजने के बजाय अपनी योग्यता साबित करने पर जोर देना होगा जो कागजी डिगरियों से ज्यादा इस पर निर्भर करती है कि वे असल में कितने हुनरमंद हैं.

आगामी अतीत (अंतिम भाग) : आशीष को मिली माफी

पूर्व कथा

ज्योत्स्ना अपनी बेटी डा. भावना से शादी में आने वाले मेहमानों की लिस्ट के बारे में पूछती हैं तो वह अपने खास दोस्त को बुलाने की बात कह कर कार में बैठ कर अस्पताल चली जाती है. कार ड्राइव करते हुए उस की आंखों के सामने बीमार पिता का चेहरा घूमने लगता है जो उसे और उस की मां को छोड़ कर चला गया था. अस्पताल में उस की मुलाकात डा. आर्या से होती है. मरीज निबटाने के बाद चाय पीते हुए वह अतीत में खो जाती है. अपने पापा के यों घर छोड़ कर जाने के बाद से वह शादी न करने का फैसला करती है और डा. अमन के प्रणय निवेदन को अस्वीकार कर देती है. ज्योत्स्ना भी समझा कर हार जाती हैं.

लगभग 6 महीने पहले उस के अस्पताल में एक नए मरीज के आने पर वह उसे जानापहचाना लगता है कि कहीं वह उस के पापा तो नहीं. नर्स से पूछने पर मालूम पड़ता है कि मरीज का नाम आशीश शर्मा है.

एक दिन अस्पताल पहुंचने पर वह उस मरीज को न पा कर नर्स से पूछती है तो वह भावना को एक पत्र देती है. जिस में वह उन मांबेटी से माफी मांगता है. उस के मन में विवाह के प्रति जो कड़वाहट होती है वह समाप्त हो जाती है. वह डा. अमन से शादी करने को तैयार हो जाती है और ज्योत्स्ना जुट जाती है उस की शादी की तैयारी में.

एक दिन आधी रात को भावना की नींद खुलती है तो ज्योत्स्ना को न पा कर वह बालकनी में आती है और मां से पूछती है कि यदि पापा आ जाएं तो क्या उन्हें माफ कर दोगी. ज्योत्स्ना कुछ नहीं कहतीं. तभी डा. आर्या की आवाज सुन कर भावना वर्तमान में लौट आती है और अपने आंसू पोंछती हुई बैग और कार्ड ले कर पत्र वाले पते पर जा पहुंचती है. भावना को अपने घर पर देख आशीश शर्मा चौंक जाता है.

और अब आगे…

आशीश शर्मा का पता ढूंढ़तेढूंढ़ते जब भावना उन के घर पहुंची तो शाम गहरा रही  थी. धड़कते हृदय से उस ने घंटी बजा दी. अंदर की आवाज पास आती हुई लग रही थी. थोड़ी देर बाद दरवाजा खुल गया. आशीश शर्मा उसे आश्चर्य व खुशी से भौचक हो निहार रहे थे.

‘‘तुम…तुम डा. भावना हो न?’’

‘‘हां, पापा,’’ वह कठिनाई से बोल पाई. बरसों बाद पापा बोलने के लिए उसे काफी प्रयास करना पड़ा.

‘‘आओ…अंदर आओ, बेटी…’’ आशीश शर्मा की खुशी का वेग उन के हावभाव से संभल नहीं पा रहा था. शायद वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें और क्या न करें.

हृदय में उठते तूफान को थामते हुए हाथ का कार्ड पकड़ाते हुए वह बोली,   ‘‘यह मेरी शादी का कार्ड है. आप जरूर आइएगा.’’

‘‘तुम्हारी शादी हो रही है…’’ वह खुशी से बोले. फिर कार्ड पकड़ते हुए धीरे से बोले, ‘‘तुम्हारी मम्मी जानती हैं सबकुछ…’’

‘‘हां…’’ वह झूठ बोल गई, ‘‘आप जरूर आइएगा,’’ कह कर वह बिना एक क्षण भी रुके वापस मुड़ गई.

आशीश शर्मा अंदर आ गए, थके हुए से वह कुरसी में धंस गए.

भावना एक आशा की किरण उन के दिल में जगा कर गुम हो गई थी. वह ही जानते हैं कि अपने परिवार से बिछड़ कर वह कितना तड़पे हैं…अपनी बड़ी होती बेटी को देखने के लिए उन्होंने कितनी कोशिश नहीं की…कितना कोसा उन्होंने खुद को, जब वह दामिनी के चंगुल में फंस गए थे…कैसा जाल फेंका दामिनी ने उन्हें फंसाने के लिए…उन की पत्नी एक शांत नदी की तरह थी और दामिनी थी बरसाती उफनता नाला, जो अपने सारे कगारों को तोड़ कर उन की तरफ बढ़ता रहा और वह स्वयं भी उस में बह गए.

उस समय तो बस, दामिनी को पाना ही जैसे उन का एकमात्र लक्ष्य रह गया था. क्यों इतना आकर्षित हो गए थे वह उस समय दामिनी की तरफ…दामिनी की तड़कभड़क, अपने में समा लेने वाले उद्दाम सौंदर्य के पीछे वह उस की चरित्रहीनता और बददिमागी को नहीं देख पाए.

दामिनी के सामने उन्हें अपनी शांत सौम्य पत्नी बासी व श्रीहीन लगी थी. लगा, उस के साथ जीने में कोई मजा ही नहीं है. एकरस दिनचर्या…तनमन का एकरस साथ…तब नहीं समझा अपनी सीमाओं में रहने वाली नदी की तरह ही उन की पत्नी ने भी उन के जीवन को व उन के परिवार को सीमाओं में बांधा हुआ है.

दामिनी का साथ बहुत लंबे समय तक नहीं रह पाया. शुरू में तो वह दामिनी के सौंदर्य के सागर में डूब गए, लेकिन दामिनी के रूप का तिलिस्म अधिक नहीं रह पाया. धीरेधीरे प्याज के छिलकों की तरह परत दर परत दामिनी का असली चेहरा उन के सामने खुलने लगा. अपनी जिस तनख्वाह में पत्नी व बेटी के साथ वह सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे, उसी तनख्वाह में दामिनी के साथ गृहस्थी की गाड़ी खींचना मुश्किल ही नहीं दूभर हो रहा था. उस के सैरसपाटे, बनावशृंगार व साडि़यों के खर्चे से वह परेशान हो गए थे. बात इतनी ही होती तो भी ठीक था. दामिनी परले दर्जे की झगड़ालू व बददिमाग थी. उन को हर पल दामिनी की  तुलना में ज्योत्स्ना याद आ जाती. धीरेधीरे उन के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं. वह कब, कहां और क्यों जा रही है यह पूछना भी उन के बस की बात नहीं रह गई थी. पति की तरह वह उस पर कोई भी अधिकार नहीं रख पा रहे थे.

वे दोनों लगभग 5 साल तक एकसाथ रहे. इन 5 सालों में वह इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे कि दामिनी के जीवन में फिर कोई आ गया है. वह उस को रोकना चाह कर भी रोक नहीं पाए या फिर शायद उन्होंने रोकना ही नहीं चाहा. तब पहली बार नकारे जाने का दर्द उन की समझ में आया था. सामाजिक मानमर्यादा के लिए इतने सालों तक वह किसी तरह दामिनी से बंधे रहे थे, लेकिन जब दामिनी ने उन्हें खुद ही छोड़ दिया तो उन्होंने भी रिश्ते को बचाने की कोई कोशिश नहीं की…दामिनी ने उन्हें तलाक दे दिया.

पिछले 5 साल तक उन्होंने कितनी बार कोशिश की ज्योत्स्ना के पास वापस लौटने की. वह ज्योत्स्ना के बारे में सबकुछ पता करते रहते थे. ज्योत्स्ना के जीवन में आतेजाते उतारचढ़ाव से वह अनभिज्ञ नहीं थे. कई बार दिल करता कि भाग कर जाएं ज्योत्स्ना के आंसू पोंछने… उन की बेटी डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी, जब वह मेडिकल में निकली थी तब उन्हें हार्दिक खुशी हुई थी…गर्व हो आया था बेटी पर…दामिनी ने तो कभी मां बनना चाहा ही नहीं था.

बेटी जब डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर के आ गई तब न जाने कितनी बार उस अस्पताल के गेट पर खड़े रहे थे पागलों की तरह, बेटी की एक झलक पाने के लिए, लेकिन कारों व लोगों की भीड़ में वह कभी भावना को देख नहीं पाए.

तभी उन के जीवन में यह दुखद मोड़ आया. आफिस में ही उन्हें पक्षाघात का अटैक पड़ा. उन के आफिस के दोस्त जब उन्हें अस्पताल ले जाने लगे तब वह बहुत मुश्किल से उन्हें उस अस्पताल का नाम समझा पाए, जहां उन की बेटी काम करती थी, इस उम्मीद में कि शायद उन की अपनी बेटी से अंतिम समय में मुलाकात हो जाए…और ऐसा हुआ भी पर भावना ने उन्हें पहचाना नहीं या फिर पहचानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

वह तो भावना को चिट्ठी लिख कर भी भूल गए थे, लेकिन आज भावना को अपने सामने देख कर उन का अपने परिवार के पास लौटने का सपना अंगड़ाई लेने लगा था. उन की सुप्त भावनाएं फिर जोर पकड़ने लगीं, लेकिन पता नहीं ज्योत्स्ना उन्हें माफ कर पाएगी या नहीं…

तभी बाहर सड़क पर किसी गाड़ी के हार्न की तेज आवाज सुन कर वह अपने अतीत से बाहर निकल आए. न जाने वह कब से ऐसे ही बैठे थे. उन्होंने कार्ड उठा कर उसे उलटापलटा और मन में निश्चय किया कि बेटी की शादी में अवश्य जाएंगे. परिणाम चाहे कुछ भी हो. ज्योत्स्ना उन का अपमान भी कर देगी तब भी वह उस दुख से कम ही होगा जो उन्होंने उसे दिया है और जो उन्हें अपने परिवार से अलग रह कर मिल रहा है. सोच कर उन का हृदय शांत हो गया.

उधर घर आ कर भावना अपने हृदय को शांत नहीं कर पा रही थी. पता नहीं उस ने अच्छा किया या बुरा…मम्मी पर इस की क्या प्रतिक्रिया होगी…मम्मी से कुछ भी कहने की उस की हिम्मत नहीं थी…अब तो जो भी होगा देखा जाएगा, यह सोच कर उस ने अपने दिलोदिमाग को शांत कर लिया.

आखिर विवाह का दिन आ पहुंचा. दुलहन बनी भावना खुद को शीशे में निहार रही थी. मम्मी पसीने से लस्तपस्त इधरउधर सब संभालने में लगी हुई थीं. बरात आने वाली थी. उस के डाक्टर मित्र मम्मी की थोड़ीबहुत मदद कर रहे थे, तभी बैंडबाजे की आवाज आने लगी. ‘बरात आ गई… बरात आ गई’ कहते सब बाहर भाग गए. वह कमरे में अकेली खड़ी रह गई.

पापा अभी तक नहीं आए…पता नहीं आएंगे भी या नहीं…काश, उस की कोशिश कामयाब हो जाती. तभी मम्मी उस को लेने कमरे में आ पहुंचीं.

‘‘चल, भावना…जयमाला के लिए चल,’’ तो वह मम्मी के साथ मंच की तरफ चल दी. जयमाला हुई, खाना खत्म हुआ, फेरे शुरू हो गए…खत्म भी हो गए, उस की निगाहें गेट की तरफ लगी रहीं. उस को ऐसा खोया देख कर मम्मी ने एकदो बार टोका भी पर उस के दिमाग में क्या ऊहापोह चल रही है, उन्हें क्या पता था.

फेरे के बाद उस के डाक्टर मित्र, रिश्तेदार सब अपनेअपने घर चले गए. सुबह विदाई के वक्त कुछ बहुत नजदीकी रिश्तेदार ही रह गए. उस की विदाई की तैयारियां हो रही थीं पर उस का हृदय उदास था. पापा ने यह अवसर खो दिया. इस खुशी के मौके व अकेलेपन के मोड़ पर मम्मी, पापा को माफ कर देतीं.

तभी डा. आर्या अंदर आ कर बोली, ‘‘भावना, तुम्हें कोई पूछ रहा है.’’

‘‘मुझे…’’

‘‘हां, कोई आशीश शर्मा हैं…’’

‘‘आशीश शर्मा…’’ वह खुशी के अतिरेक में डा. आर्या का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मेरा एक काम कर दो डाक्टर… उन्हें यहां ले आओ, मेरे कमरे में.’’

‘‘यहां…’’ डा. आर्या आश्चर्य से बोली, ‘‘कौन हैं वह.’’

‘‘सवाल मत करो. बस, उन्हें यहां ले आओ…’’

थोड़ी देर बाद डा. आर्या, आशीश शर्मा को ले कर कमरे में आ गई.

‘‘आप कल शादी में क्यों नहीं आए, पापा,’’ वह उलाहने भरे स्वर में बोली. उस के स्वर के अधिकार से बरसों की दूरी पल भर में छिटक गई. आशीश शर्मा ठगे से खडे़ रह गए. मन किया बेटी को गले लगा लें पर अपने किए अपराध ने पैरों में बेडि़यां डाल दीं. बाप का अधिकार उन के वजूद से छिटक कर अलग खड़ा हो गया.

‘‘बेटी, मैं ने सोचा, तुम्हारी मम्मी की न जाने क्या प्रतिक्रिया हो…तुम्हारी शादी है…उन का मूड मुझे देख कर खराब न हो जाए…मैं जश्न में विघ्न नहीं डालना चाहता था.’’

‘‘मम्मी कहां हैं डा. आर्या…’’ वह आश्चर्यचकित खड़ी डा. आर्या से बोली.

‘‘शायद अंदर वाले कमरे में विदाई की तैयारी कर रही हैं.’’

‘‘चलिए, पापा,’’ वह आशीश शर्मा का हाथ पकड़ कर अंदर जा कर मम्मी के सामने खड़ी हो गई. अचानक इतने वर्षों बाद अपने सामने आशीश शर्मा को यों लाठी के सहारे खड़ा देख कर ज्योत्स्ना संज्ञाशून्य सी देखती रह गईं.

‘‘तुम…’’

‘‘मम्मी, पापा आप से कुछ कहना चाहते हैं…बोलिए न पापा, जो कुछ आप ने पत्र में लिखा था.’’

‘‘मुझे माफ कर दो ज्योत्स्ना…जिस के लिए तुम्हें इतने दुख दिए वह तो वर्षों पहले मुझे छोड़ कर चली गई. मैं जानता हूं कि मेरा अपराध क्षमा के योग्य नहीं है, इसी कारण मैं इतने सालों तक वापस आने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया…मैं ने कोशिश तो बहुत की…मैं ही जानता हूं, कितना तड़पा हूं तुम दोनों के लिए… भावना की एक झलक पाने के लिए अस्पताल के गेट पर पागलों की तरह खड़ा रहता था…तुम्हें देखने के लिए स्कूल के चक्कर काटा करता था. कभी तुम दिख भी जातीं तो अपनेआप में मगन… फिर सोचता, कितने दुख दिए हैं तुम्हें… बहुत मुश्किल से संभली हो…कहीं मेरे कारण तुम्हारी मुश्किल से संभली जिंदगी फिर से बिखर न जाए…

‘‘यही सब सोच कर मेरी कोशिश कमजोर पड़ जाती. अपनी बीमारी में भी उसी अस्पताल में इसीलिए भरती हुआ कि जिंदगी के आखिरी दिनों में बेटी को जी भर कर देख लूंगा.

‘‘मुझे माफ कर दो ज्योत्स्ना…आज भी अगर भावना जोर नहीं देती तो मैं तुम से माफी मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाता,’’ लाठी को बगल के सहारे टिका कर आशीश शर्मा ने दोनों हाथ जोड़ दिए.

ज्योत्स्ना का मन किया कि वह फूटफूट कर रो पडे़. बेटी की विदाई, आशीश का यों माफी मांगना, इतने वर्षों का संघर्ष…उन की रुलाई गले में आ कर मचलने लगी. आंखें बरसने से पहले उन्होंने बापबेटी की तरफ अपनी पीठ फेर दी, लेकिन हिलती पीठ से भावना समझ गई कि मम्मी रो रही हैं.

मम्मी के दोनों कंधों को पकड़ कर भावना बोली, ‘‘पापा को माफ कर दीजिए…गलती उन से हुई है पर उस की सजा भी उन को मिल चुकी है… अकेलापन उन्होंने भी झेला है, भले ही अपनी गलती से…प्लीज मम्मी…मेरी खातिर…’’ उस ने मम्मी का चेहरा धीरे से अपनी तरफ किया.

‘‘बहुत बड़ी हो गई है तू यह सब करने के लिए…’’ मम्मी रुंधी आवाज में बोलीं पर उन की आवाज में गुस्सा नहीं बल्कि हार कर जीत जाने का एहसास था.

‘‘मम्मी, मैं इस घर को, अपने परिवार को पूर्ण देखना चाहती हूं,’’ कहते हुए भावना ने पापा का हाथ पकड़ कर उन्हें पास खींच लिया. ज्योत्स्ना ने भरी नजरों से आशीश की तरफ देखा, जैसे कह रही हों, तुम मेरी जगह होते तो क्या माफ कर देते, जो मैं करूं. लेकिन आशीश शर्मा ने हिम्मत कर के ज्योत्स्ना के कंधों के चारों तरफ अपनी बांहें फैला दीं. रोती हुई वह पति आशीश के कंधे से लग गईं. दोनों को अपनी बांहों के घेरे से बांध कर भावना भी रो रही थी.

विदाई की बेला पर कार में बैठते हुए भावना आंसू भरी नजरों से गेट पर एकसाथ खडे़ मम्मीपापा की छवि को जैसे अपनी आंखों में समा लेना चाहती थी.

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