जातिवाद का जहर और आधुनिक शैली का दिखावा

आधुनिक समाज में जातिवादी बातें बेमानी लगती हैं. लोगों की जीवनशैली और विचारधारा में परिवर्तन आया है. नेताओं की इन बातों और पाठ्यपुस्तकों से ऐसा लगता भी है, लेकिन हकीकत हूबहू ऐसी नहीं है. परदे के पीछे पुरानी तसवीर उभरती नजर आती है.

सरकारी नौकरी और ओहदे आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं. बाहरी समाज से ज्यादा जातिवाद, भाषावाद और भाईभतीजावाद सरकारी कर्मचारियों की सोसाइटी में देखने को मिलता है. सरकारी नौकरी व तबादले के कारण कर्मचारियों की आवासीय कालोनी ही उन का अपना परिवार होती हैं. किंतु जब आप इस सोसाइटी का हिस्सा बनते हैं तो आप के सामने इस के कई विकृत रंग नजर आते हैं. सरकारी आवास ज्यादातर शहरों व गांवों के बाहर बने होते हैं. आवास कर्मचारियों के पदानुसार तय होते हैं. बड़े शहरों में तो ये आवास फ्लैटनुमा होते हैं. एक बिल्डिंग में रहने के कारण लोग नेमप्लेट पर लगे नामों से एकदूसरे को जानते हों किंतु मेलमिलाप बहुत दूर की बात है. घरों के बंद दरवाजे उन के दिलों को भी बंद रखते हैं. महीनों में कभी कोई सीढ़ी पर नजर आ गया तो वह या तो मुसकराएगा या फिर यों ही निकल जाएगा, जैसे कोई अजनबी हो. एक बार ऐसा ही किस्सा देखने को मिला. आसपड़ोस में रहने वाले 2 अफसर दूसरे शहर में किसी कार्यक्रम में मिले और बातचीत के बाद उन्हें मालूम हुआ कि हम दोनों पड़ोसी हैं.

हालांकि, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के परिवारों में थोड़ाबहुत मेलजोल दिखाई देता है. ऐसे परिवेश में प्यारमुहब्बत तो ठीक है लेकिन ज्यादातर महिलाएं या परिवार ताकझांक के काम में लिप्त रहते हैं. किस के यहां कौन आया, कौन गया. परिवार में कौनकौन हैं, क्या हो रहा है. कब अवकाश लिया और क्या किया. जब तक सामने वाले का छिलका न उतार दें, चैन ही नहीं मिलता. अलगअलग लोगों की भिन्नभिन्न मानसिकता का स्वरूप यहां देखने को मिलता है.

एकदूसरे से बचना, प्राइवेसी को संभालना मुख्य मुद्दा होता है. अफसरों का मनमुटाव उन के परिवार में भी साफ झलकता है. एकदूसरे से निश्चित दूरी बनाए रखना आम बात है. एक समस्या ऐसी है जिस का सामना सोसाइटी में रहने आए हर नए परिवार को करना पड़ता है. नई जगह रोजमर्रा की चीजें दूध, पेपर, पानी, बाई जैसी आम जरूरतों के लिए स्वयं खोजखबर लेनी पड़ती है. पड़ोस में रहने वाले यह जानकारी देना तो दूर की बात है वे पानी के लिए भी पूछने से बचते हैं.

कानाफूसी की लत सरकारी कर्मचारियों के परिवारों में इस तरह की मानसिकता सर्वोपरि होती है. औफिस में सहकर्मियों के साथ संबंधों का असर उन के परिवारों पर भी पड़ता है. सहकर्मी का यदि किसी सहकर्मी से मेलमिलाप न हुआ तो उस के पारिवारिक संबंध बनते हुए भी बिगड़ जाते हैं. इन की पत्नियों के साधारणतया वार्त्तालाप के विषय ही यही होते हैं – ‘हमारे साहब ने यह काम किया,’ ‘हमारे साहब बहुत काम करते हैं,’ ‘ऐसा काम आया,’ ‘औफिस में किस ने क्या कहा’, ‘कहां क्या आया’ वगैरह. जैसे सिर्फ उन के पति ही काम करते हैं, बाकी तो आरामतलबी के लिए दफ्तर जाते हैं.

सरकारी अफसरों की पत्नियां अपने खुद के व्यक्तित्व पर नहीं बल्कि अपने पति के पदों को जीती हैं. उन में एकदूसरे से बड़ा दिखने की होड़ लगी रहती है. जिन के पति ओहदे में बड़े हैं, वे अपने पति के मातहत व सहकर्मियों के परिवारों से आवभगत व चमचागीरी की उम्मीद करती हैं. खुद को ऊंचा बता कर दूसरों को छोटा दर्शाना ऐसी महिलाओं की आदत होती है. पुरुषों के पदों व स्तर के अनुसार महिलाएं भी अपनाअपना दल तैयार करती हैं. यदि किसी नए परिवार ने किसी एक दल से वार्त्ता या मेलमिलाप किया तो अन्य दल के लोग उन से दूरी बना लेते हैं. जिसे समझना नए परिवारों के लिए मुश्किल होता है कि आखिर उन से क्या हो गया. कुछ ऐसे परिवार भी होते हैं कि जिन का मतलब सिर्फ कुरसी से होता है. जो आगे बढ़ने की सीढ़ी बने, उस की चमचागीरी करो.

सरकारी सोसाइटियों में जातिवाद व भाईभतीजावाद का बोलबाला होता है. बच्चों का बचपन इसी परिवेश में रह कर कहीं खो सा जाता है. वे जो देखते हैं, उसे ही आगे बढ़ाते हैं. ऐसे में भविष्य में उन के सामाजिक होने में दिक्कत आती है. यहां विजातीय परिवारों को मनमुटाव का सामना सब से ज्यादा करना पड़ता है. सजातीय परिवारों में यदि कोई कार्यक्रम होता है तो भाईबंधु बढ़चढ़ कर पैसा जमा कर बड़ा गिफ्ट देते हैं. भले ही किसी विजातीय का उन से संबंध न हो, पर बुलाए जाने पर भी विनम्र और विजातीय परिवार को सामाजिक मजबूरी के कारण शामिल होना पड़ता है. जातिवाद का संस्कार

हमारे एक हिंदीभाषी मित्र हैं. उन के ज्यादातर साथी मराठीभाषी थे. एक जगह वे 3 वर्ष रहे. उन के एक सहकर्मी की बेटी की शादी थी. सभी औफिस वालों ने मिल कर हारमोनियम व वाशिंग मशीन गिफ्ट की. परिवार की महिलाओं ने भी पैसे जमा कर साड़ी सैट दिए. हालांकि उन में कुछ परिवार जातिभाई थे लेकिन हमारे मित्र सब से हमेशा मीठी बातें करते व सभी परिवारों को अपना समझते रहे. प्रतिवर्ष होने वाले तबादले में पुरुष व महिलावर्ग ने उन्हें अलगअलग सैंड औफ दिया. उन का अच्छे से सत्कार किया. किंतु जब एक बार प्रमोशन पर उन का तबादला आया तो लोगों ने पल्ला झाड़ लिया. 10 दिनों बाद जब उन के किसी अपने का तबादला हुआ तो वही प्रथा फिर कायम हो गई. यहां तात्पर्य सैंड औफ या गिफ्ट से नहीं है, बल्कि लोगों की मानसिकता से है, जो भेदभाव को बढ़ावा देती है. ऐसे परिवेश में विजातीय व विभाषी लोग कट कर रहना ही पसंद करते हैं. जातिवाद व भाषावाद का जहर धीरेधीरे मन को ग्रसित करने लगता है. अपनी मेहनत व काबिलीयत के दम पर उच्च पद पर आसीन होने वाले प्रकाश चंद्र तबादले के बाद जलगांव पहुंचे. हिंदीभाषी प्रकाश चंद्र के अन्य सहकर्मी मराठी, मराठी ब्राह्मण, मराठा, एकदो अन्य जाति के थे. सभी के आवास एक ही सोसाइटी में थे. छलकपट से परे प्रकाश चंद्र से सहकर्मियों का अच्छा व्यवहार था, जो क्षणभंगुर निकला. हुआ यों कि जिले के जिलाधीश तबादले के बाद वहां आए. प्रकाश चंद्र के गुरु व ट्रेनर होने के कारण उन का व्यवहार उन के साथ स्नेहभरा था. उन्होंने उन की काबिलीयत देखते हुए उन्हें प्रमुख कार्यक्रम के कार्य प्रबंधन का कार्य सौंप दिया जो अन्य लोगों को नागवार गुजरा.

साम, दाम, दंड, भेद की नीति तोड़ो और जोड़ो की नीति पर कार्य करने लगे. लोगों ने अपनी जाति व भाषानुसार दंभ दिखाना व तिरस्कार करना शुरू कर दिया. औफिस में किसी तरह काम में अड़ंगा लगाना, परिवार की महिलाओं द्वारा सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन के परिवार को नजरअंदाज करना व तंज कसना आदि शुरू कर दिया. अपने जातिभाई लोगों को अच्छा बना कर प्रमुख के सामने प्रस्तुत करना जैसी ओछी हरकतों का असर मनमुटाव का सब से बड़ा कारण होता है. एक सहकर्मी, जो रिटायर होने वाले थे लेकिन अपने सेवाकाल में कभी प्रमोशन नहीं पा सके, सार्वजनिक वार्त्ता में बोले कि हमारे देश में बाहर के लोग नौकरियों में कटोरा ले कर आ गए. देश से उन का मतलब प्रदेश ही था.

ऐसी विकृत मानसिकता को क्या कहें. मानसिक प्रताड़ना की हदें तब पार होती हैं जब बच्चों का भी मेलजोल बंद कराया जाता है. अच्छे संबंध भी जातिवाद व भाषावाद के कारण मनमुटाव में बदल जाते हैं. दूषित सोच

हाल ही में महेंद्र अपने बेटेबेटी को उच्चशिक्षा दिलाने के लिए मुंबई तबादला ले कर आए. इत्तफाक से वहां कुछ सहकर्मी उन के ही डिपार्टमैंट के निकले. सोचा, पुरानी पहचान है, अच्छी जमेगी. घर में आते ही सब से पहले लोगों की नजर इस बात पर थी कि उन के घर में क्याक्या सामान आया है. कभी कोई डोरबैल बजती तो पड़ोसियों की निगाहें परदे के पीछे से खिड़कीदरवाजे पर चिपकी मिलतीं, कौन, क्या, कैसे. ‘अरे, इन के यहां कितना सामान है,’ एक ही पगार वाले होने के बावजूद इस तरह की वार्त्ता गरमाती रहती है.

कालेज जाने में असुविधा होने से महेंद्र को बेटी को होस्टल में रखने का निर्णय लेना पड़ा. लेकिन यह बात किसी को जाहिर नहीं की. पारिवारिक समस्या से वे खुद ही जूझ रहे थे. लोगों ने सच जानने के लिए उन का जीना दूभर कर दिया. जातिवाद का प्रचंडस्वरूप तब देखने को मिलता है जब वही कार्य उन के अपने लोग करते हैं. विजातीय लोगों को इस का खमियाजा भुगतना पड़ता है, जिस का सरोकार उन के कार्य से भी नहीं होता है, लेकिन बातों की गरमाहट का बाजार व राजनीतिकरण होता रहता है.

तबादले और शारीरिक व मानसिक थकान के कारण कुछ दिनों के लिए महेंद्र ने दफ्तर से पूर्ण अवकाश ले लिया कि घर पर ही आराम करेंगे, गांव नहीं जाएंगे. चूंकि दीवाली की भी छुट्टियां थीं, दफ्तर का हर एक दिन का चार्ज किसी न किसी के पास रहता था. महेंद्र का चार्ज उन के तथाकथित मित्र पूरन के पास चला गया. पूरन को कुलबुलाहट होने लगी. शाम को तिलमिलाते हुए वे महेंद्र के घर पर टपक गए, क्यों छुट्टी ली. छुट्टी ले कर घर पर बैठे हो. हमारे ऊपर कितना काम है. वे बाल की खाल निकालने लगे. अवकाश के बाद दफ्तर में जातिवाद ने अपना जहर उगल दिया. साथ ही परिजनों का मनमुटाव भी प्रखर होने लगा. मिसेज महेंद्र ने कई प्रयत्न किए किंतु मिसेस पूरन की गर्मजोशी गायब थी.

सरकारी सोसाइटी में त्योहार भी सरकारी नजर आते हैं. सजातीय भाईबंधु फिर भी थोड़ाबहुत मेलमिलाप कर लेते हैं, किंतु दूसरे लोगों के साथ उन की गर्मजोशी कम ही नजर आती है. बड़े शहरों में जहां फ्लैटनुमा आवास होते हैं वहां त्योहारों की रौनक ज्यादा गायब रहती है. कुछ लोग दीवाली के

4-5 दिनों के अवकाश में बाहर चले जाते हैं. जो शेष रहते हैं, वे जगमगाते फ्लैटों में कैद ही रहते हैं. शहरों में जहां हर जगह रौनक होती है वहीं दूसरी ओर इन सोसाइटीज में चहलपहल भी नहीं होती है. एक ही जगह साथ रहने वाले लोगों का एकदूसरे से अपरिचित सा व्यवहार सोसाइटी को हृदयविहीन बनाता है. यहां भाषावाद, जातिवाद का राजनीतिकरण चरमोत्कर्ष पर होता है. यह ऐसा जहर है जो धीरेधीरे सामाजिक व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहा है.

आगामी अतीत (भाग-1) : ज्योत्स्ना की कहानी

तू ने अपनी लिस्ट बना ली… किसकिस को कार्ड भेजना है?’’ ज्योत्स्ना ने अपनी बेटी भावना से पूछा.

‘‘जी मम्मी, यह रही मेरी लिस्ट. पर एक कार्ड आप मुझे दे दीजिए, अपने एक खास दोस्त को भेजना है.’’

यह कह कर भावना ने  एक कार्ड लिया, अपना बैग उठाया, अपनी गाड़ी निकाली और अस्पताल की ओर चल दी.

भावना कार चला रही थी. उस की आंखों में अपने पापा का बीमार चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, कातर आंखें घूम रही थीं, जो शायद उस से क्षमायाचना कर रही थीं. उस के पापा कुछ समय पहले ही उस अस्पताल में दाखिल हुए थे जहां वह काम कर रही थी. उन्हें पक्षाघात हुआ था. उस के मम्मीपापा जब वह 15 साल की थी, एकदूसरे से अलग हो गए थे.

पापा तो मम्मी से अलग हो गए लेकिन उस का हृदय पापा की याद में तड़पता रहा था.

मम्मी के अथक प्रयास व कड़ी मेहनत ने उस के पैरों तले ठोस जमीन दी. वह डाक्टर बन गई. मम्मी के सामने पापा का नाम लेना भी मुश्किल था और वह इस को गलत भी नहीं समझती थी, आखिर जिस सहचर पर मम्मी को अथाह विश्वास था, जिस की उंगली पकडे़ वह जीवन डगर पर निश्ंिचत हो आगे बढ़ रही थीं, वही एक दिन चुपचाप अपनी उंगली छुड़ा कर चल देगा यह तो वह सोच भी नहीं सकती थीं. जीवनसाथी के धोखे के बाद तो मम्मी की दुनिया में उन की स्कूल की छोटी सी नौकरी और भावना के अलावा किसी के लिए भी जगह नहीं थी.

भावना गाड़ी खड़ी कर अपने केबिन में पहुंची तो बाहर मरीजों की भीड़ लगी हुई थी. उस की सहयोगी डाक्टर केबिन में बैठी हुई थी.

‘‘हैलो, डा. आर्या, कैसी हैं आप?’’

‘‘फाइन, डाक्टर. आज आप को देर हो गई. मरीजों की भीड़ लगी है.’’

‘‘हां, शादी की तैयारी के चलते आजकल थोड़ी देर हो जाती है.’’

इस के बाद भावना कुछ घंटों के लिए तो अपनेआप को भी भूल गई. 1 बजे  तक मरीज निबटे. उस ने एक कप चाय मंगवाई, धीरेधीरे चाय पीते हुए वह अतीत के दलदल में धंसने लगी.

पापा के यों चले जाने से वह इतनी आहत हुई थी कि उस ने मन ही मन विवाह न करने का फैसला कर लिया था. उस ने सोचा कि वह डाक्टर है और मानव सेवा व मम्मी की देखभाल में अपना जीवन गुजार देगी.

डा. अमन ने कितने ही तरीकों से उस के सामने प्रणय निवेदन किया पर उस ने हर बार ठुकरा दिया. जब मम्मी को पता चला तो उन्होंने उसे विवाह करने के लिए बहुत समझाया पर वह किसी भी तरह से तैयार नहीं हुई. मम्मी के जीवन के भयावह अनुभवों से उस के अंदर वैवाहिक जीवन के प्रति भारी कड़वाहट भर गई थी, जिसे वह किसी तरह भी अपने अंदर से निकाल नहीं पा रही थी. थकहार कर मम्मी भी चुप हो गईं.

लगभग 6 महीने पहले वह अस्पताल का राउंड लगा रही थी कि उसे एक बेड पर जानापहचाना सा चेहरा नजर आया. कृशकाय शरीर, खिचड़ी दाढ़ी…दर्द से कुम्हलाया चेहरा, वह पहचानने की कोशिश करने लगी. दिमाग पर जोर डाला तो याद आया कि यह तो उस के पापा का चेहरा है. क्या वह इस हाल में…यहां हो सकते हैं? उस के दिमाग में जैसे भूचाल सा मच गया.

उस ने नर्स की ओर देख कर पूछा, ‘सिस्टर, इन्हें क्या हुआ है?’

‘डाक्टर…बाईं तरफ लकवा पड़ा है. अब तो कुछ ठीक हो गए हैं.’

‘क्या नाम है इस मरीज का?’ कहते हुए वह खुद सामने लटके चार्ट को देखने लगी.

‘आशीश शर्मा.’

चार्ट पर लिखा यह नाम जहर बुझे तीर की तरह उस के दिल के आरपार हो गया. संज्ञाशून्य सी वह अपने मरीजों को देख कर वापस चली आई थी.

उस का हृदय अपने पापा की ऐसी हालत देख कर करुणा से छटपटा गया था. यद्यपि वह उस के मरीज नहीं थे पर वह उन के केश में दिलचस्पी लेने लगी. वह जब भी डाक्टर से उन के बारे में बात करती तो इस बात का ध्यान रखती कि डाक्टर को यह न लगे कि वह इस मरीज में इतनी रुचि क्यों ले रही हैं. उस ने अपने पापा को भी यह आभास नहीं होने दिया कि वह उन को पहचान गई है.

उस के पापा लगभग डेढ़ महीना अस्पताल  में रहे. कई बार सोचा कि मम्मी को उन के बारे में बताए पर कहने की हिम्मत न जुटा सकी. उस को यह देख कर आश्चर्य होता कि पापा के 1-2 दोस्त ही उन से मिलने आते थे. एक दिन वह अस्पताल पहुंची तो उन का बिस्तर खाली था.

‘यह मरीज कहां गया, सिस्टर…’

‘उन को डिस्चार्ज कर दिया गया, डाक्टर. अब उन का इलाज घर से ही होगा…डाक्टर, आप के नाम मिस्टर आशीश एक पत्र दे गए हैं. क्या वह आप के जानने वाले थे?’

सिस्टर ने डा. भावना को एक पत्र थमा दिया. पत्र पकड़ते ही उस की टांगें थरथरा गईं. अपने को संभाल कर वह अपने केबिन में आ कर कुरसी में धंस गई. कांपते हाथों से उस ने पत्र खोला. लिखा था :

‘प्रिय भावना,

तुम ने मुझे पहचाना हो या न पहचाना हो पर मैं तो तुम्हें पहले ही दिन पहचान गया था कि तुम मेरी बेटी, भावना हो. तुम्हें अपनी बेटी कहने का हक तो मैं बहुत पीछे छोड़ आया, लेकिन तुम्हारा पिता तो मैं ही हूं और यह मेरे लिए फख्र की बात है. बदनसीब हूं मैं…जो तुम जैसी बेटी को अपना नहीं कह सकता.

जिस के कारण तुम दोनों को छोड़ आया था वह तो मुझे छोड़ कर कभी की चली गई थी. भला अपनों का दिल दुखा कर किसी को सुख मिल सकता है कभी…यह भूल गया था मैं…तुम दोनों को अकेला छोड़ आया था, आज खुद भी अकेलेपन की सजा भुगत रहा हूं.

तुम दोनों मांबेटी का अपराधी हूं मैं…मेरा अपराध क्षमा के योग्य तो नहीं पर हो सके तो मुझे माफ कर देना…’

आगे के शब्द उस की आंसू भरी आंखों में धुंधला गए.

उस ने आंखें बंद कर पीछे सिर टिका दिया. आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. मम्मी का इतने सालों का अकेलापन, उन की छटपटाहट, अपने युवा हो रहे मन का बिना पापा के अजीब सा अकेलापन, भय सबकुछ मानसपटल पर उभर आया था. जिंदगी के वे सब लम्हे याद आ गए जब पापा की कमी शिद्दत से खली थी. बिना पुरुष के साथ के मम्मी को कई बार कमजोर पड़ते भी देखा था.

पापा के इतने बडे़ अपराध के बाद भी उस का मन उन्हें प्यार करता था लेकिन उन्हें माफ करने या न करने का अधिकार सिर्फ मम्मी को ही था. मम्मी यदि उन्हें माफ कर दें तो उस के लिए उन्हें फिर से अपनाना मुश्किल नहीं था.

पापा के माफीनामे को पढ़ने के बाद विवाह के प्रति जो नफरत की शिला उस के दिल पर पड़ी थी वह धीरेधीरे पिघलने लगी थी. उस ने डा. अमन को अपने आसपास आने की ढील  दे दी और अंत में उन का प्रणय निवेदन उस ने स्वीकार कर लिया था.

मम्मी उस की विवाह की स्वीकृति या खुशी से बौरा सी गईं. मां की बेरौनक जिंदगी में उस की खुशियां व सफलता ही तो रंग भर सकते थे, बाकी था ही क्या… पर पापा के बारे में जान कर उसे मम्मी की जिंदगी फिर भी अच्छी लग रही थी कि उन की जिंदगी में उस से जुड़ी खुशियां तो थीं. पापा की जिंदगी में तो कुछ भी नहीं था सिवा भीषण अकेलापन, अपने परिवार को छोड़ देने का दर्द और साथ में उन की इस बीमारी के, लेकिन  कैसे बताए मम्मी को…वह कई दिन तक इसी कशमकश में रही थी.

मम्मी उत्साहित हो उस की शादी की तैयारियों में लग गई थीं. वह दिनभर अस्पताल से थक कर चूर हो कर घर आती और बेसुध सी बिस्तर पर पड़ जाती. मम्मी की वह जरा भी मदद नहीं कर पा रही थी.

एक दिन रात को उस की नींद खुली, प्यास महसूस हुई तो पानी पीने के लिए उठ गई. बगल में नजर पड़ी तो बिस्तर खाली था. मम्मी शायद बाथरूम गई होंगी, सोच कर वह पानी पी कर लेट गई. थोड़ी देर तक जब मम्मी वापस नहीं आईं तो उस ने बाथरूम में झांका, वहां कोई नहीं था. वह बाहर आई, बालकनी में मम्मी कुरसी पर बैठीं, चुपचाप अंधेरे को घूर रही थीं.

‘मम्मी, आप यहां बैठी हैं, नींद नहीं आ रही है क्या?’  वह भी कुरसी खींच कर उन की बगल में बैठ गई, ‘शादी की तैयारियों के कारण आप बहुत थक गई हैं…अपना खयाल रखिए…’

कह कर उस ने मम्मी की तरफ देखा, धुंधलाती चांदनी में उन की आंखों का गीलापन उस ने लक्ष्य कर लिया.

‘क्या हुआ? मम्मी, आप रो रही थीं,’ उस ने स्नेह से पूछा, ‘मैं विदा होने वाली हूं इसलिए?’ उन का मूड ठीक करने के लिए उस ने हलका सा परिहास किया, ‘लेकिन मेरे विदा होने की नौबत नहीं आएगी…या तो अमन विदा हो कर यहां आएगा या फिर आप मेरे साथ चलेंगी.’

मम्मी की आंखों की नमी बूंद बन कर गालों पर लुढ़क गई. वह कोमलता से उन के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘मम्मी, क्या बात है?’

‘खुशी के आंसू हैं पगली…’ मम्मी हलका सा मुसकराईं, ‘हर लड़की विदा हो कर अपनी ससुराल जाती है. तू भी जाएगी. मैं तेरे साथ कैसे जा सकती हूं… मेरी शोभा तो अपने ही घर में रहने में है बेटा. यह तेरा मायका है. जबतब तू अपने मायके आएगी तो तेरे आने के लिए भी तो एक घर होना चाहिए. मेरे लिए तो यही खुशी की बात है कि तू इसी शहर में रहेगी और आतीजाती रहेगी.’

कहतेकहते मम्मी चुप हो गईं. वह साफ महसूस कर रही थी कि मम्मी अंधेरे में घूरते हुए अपने आंसू पीने का असफल प्रयास कर रही हैं.

‘मम्मी,’ वह धीरे से उन की हथेली अपने हाथों में ले कर सहलाती हुई बोली, ‘पापा की याद आ रही है न…’ कह कर उस ने मम्मी की प्रतिक्रिया देखने के लिए उन के चेहरे पर अपनी नजरें गड़ा दीं. पापा का नाम सुन कर हमेशा की तरह मम्मी इस बार भड़की नहीं, न ही कोई जवाब दिया, बस, चुपचाप अपने आंसू पोंछती रहीं.

‘है न मम्मी…’ उन की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच चुप्पी पसर गई.

‘मम्मी, एक बात कहूं?’ मम्मी ने अपनी प्रश्नवाचक नजरें उस के चेहरे पर गड़ा दीं.

‘फर्ज करो कि यदि आज पापा लौट आएं और अपने किए की माफी मांगें तो क्या आप उन्हें माफ कर देंगी?’

नाजुक समय था, कोमल मूड था सो बिना भड़के बेटी का गाल थपक कर बोलीं, ‘तू क्यों बेकार की बात सोचती है भावना…वह हमारे ही होते तो जाते ही क्यों…और आना ही होता तो अभी तक क्यों नहीं आए…इतने सालों बाद तू उस इनसान को क्यों याद कर रही है? बेटी, तेरी नई जिंदगी शुरू होने जा रही है…अमन अच्छा लड़का है, तू बहुत खुश रहेगी.’

‘मैं ही नहीं मम्मी, हम दोनों ही तो उन को याद कर रहे हैं…’

सुन कर मम्मी की आंखें एक बार फिर बरस गईं. फिर आंसू पोंछ कर बोलीं, ‘सोच रही थी भावना कि ऐसा कौन सा क्षण रहा होगा, मेरी तरफ से ऐसी कौन सी कमी रह गई होगी, जब आशीश का पैर फिसला…और उस क्षण का खमियाजा हम को ताउम्र भुगतना पड़ा…वरना तेरे पापा के व मेरे रिश्ते कड़वाहट भरे कभी नहीं रहे. हम अपने वैवाहिक जीवन से खुश थे. वह औरत अगर उन के जीवन में नहीं आई होती और तेरे पापा भटके नहीं होते तो आज हमारी जिंदगी कितनी खुशहाल होती और मेरी जिंदगी की शाम इतनी अकेली नहीं होती…कैसे कटेगी आगे की जिंदगी…जिंदगी की शाम में जीवनसाथी की कमी सब से अधिक खलती है भावना…याद रखना, तुम और अमन एकदूसरे के प्रति हमेशा ईमानदार रहना और इतने करीब रहना कि बीच में कोई तीसरा अपनी जगह बना ही न पाए.’

‘‘क्या सोच रही हैं डा. भावना, ड्यूटी का समय खत्म हो गया है, घर नहीं जाना है क्या?’’

डा. आर्या का स्वर सुन कर भावना वर्तमान में लौट आई. आंखें खोलीं तो देखा, उस की सहयोगी डा. आर्या उसे आश्चर्य से देख रही थी.

‘‘क्या बात है डा. भावना, आप रो रही थीं?’’

‘‘नहींनहीं, बस, ऐसे ही…कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं…’’ वह अपनी गीली आंखें पोंछती हुई बोली. उस ने अपना बैग खोल कर अंदर रखा कार्ड दोबारा देखा, उस परची को भी देखा जिस पर उस ने पापा का पता लिखा था और जिसे उस ने अस्पताल के रिकार्ड से हासिल किया था. बैग कंधे पर डाल कर वह बाहर निकल गई.

– क्रमश:

रिटायरमेंट (भाग-1) : क्या बेटे कायम रख पाए प्रतिष्ठा

चेक पर हस्ताक्षर करने के बाद हंसराज ने चीफ इंजीनियर शिवनारायण को कहा,  ‘‘इसे ले कर फौरन नई मशीनों के आर्डर के लिए तुम खुद सप्लायर के पास जाओ. यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि जितनी जल्दी हो सके, नई मशीनें फैक्टरी में लग जानी चाहिए और उस समय तक पुरानी मशीनों को ठीक कर के काम कीजिए. इस बात का खयाल रहे कि प्रोडक्शन और क्वालिटी पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए. अभी मैं जा रहा हूं लेकिन यह मत समझना कि मैं रिटायर हो गया हूं. कल सुबह से मैं रोज फैक्टरी आ रहा हूं और उसी पुराने तरीके से काम होगा. कुछ दिनों के लिए मैं ने आराम क्या कर लिया, तुम ने तो मुझे रिटायर कर दिया.’’

एक जोर की डांट लगा कर हंसराज कार में बैठ गए. इंजीनियर महोदय केवल जी…जी कर के रह गए. कार में बैठ कर हंसराज मन ही मन मुसकरा कर खुद से वार्तालाप करने लगे. हालांकि इस में इंजीनियर का कोई दोष नहीं है, लेकिन यही दुनिया का दस्तूर है, करे कोई और भरे कोई. किसी को तो बलि का बकरा बनना ही पड़ता है. अपने दोनों बेटों को तो कुछ नहीं कह सके, पर इंजीनियर शिवनारायण पर बुरी तरह बरस पडे़.

हंसराज ने अपना चश्मा आंखों से उतार कर कोट की जेब में रख लिया और आंखें मूंद कर अतीत में खो गए. 20 साल पहले की बातें चलचित्र की तरह एक के बाद एक कर के स्पष्ट होती चली गईं.

पत्नी और 2 छोटेछोटे बेटों के साथ नवयुग सिटी में रोजगार की तलाश में वह चंद पूंजी लेकिन मजबूत इरादों के साथ आए थे. एक छोटे से कारखाने में केवल एक छोटी सी मशीन के साथ काम शुरू किया. मेहनत के बलबूते पर आज वह 4 कारखानों के मालिक बन चुके थे. इस तरह हंसराज मलिक ने मलिक इंडस्ट्रीज की शुरुआत की.

मलिक इंडस्ट्रीज ने अपने उत्पाद की गुणवत्ता के चलते बाजार में लगभग एकाधिकार कर लिया था. बाजार में सामान का रेट और मानक हंसराज मलिक ही तय करते थे. बाकी सब केवल उन के अनुयायी बन कर रह गए थे. इतना सब होते हुए भी हंसराज मलिक घमंड से कोसों दूर थे. बेहद नम्र स्वभाव के, एक साधारण व्यक्तित्व और मध्यम कदकाठी के हंसराज सब की सहायता को हमेशा तत्पर रहते थे, अपने स्टाफ और कर्मचारियों की हमेशा जरूरत पर मदद के लिए तत्पर रहते थे. कभी एडवांस दे कर और कभी इनाम दे कर कोई भी स्टाफ, कर्मचारी या डीलर कभी भी उन के आफिस में उन से मिल सकता था.

हंसराज मलिक के बेटे पढ़लिख कर बडे़ हो गए तो धीरेधीरे उन्होंने व्यापार की बागडोर अपने बेटों को सौंप दी और खुद सामाजिक कार्यों में समय बिताने लगे. महीने में एकदो बार ही फैक्टरी या आफिस में जाते थे.

हंसराज मलिक के दोनों बेटों सौरभ और वैभव का स्वभाव अपने पिता से एकदम विपरीत था. उग्र स्वभाव और पैसे का घमंड. इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की डिगरियों से लैस दोनों बेटे अपने स्टाफ को नौकर समझते और तू तड़ाक और गाली दे कर उन से बात करते थे.

हंसराज मलिक का एक उसूल था कि अपनी कंपनी के बने सामान की क्वालिटी दूसरी कंपनियों से बेहतर रखनी है, लेकिन बच्चों ने गुणवत्ता से समझौता करना शुरू किया. उन्होंने सोचा, जब कंपनी का प्रोडक्ट अपने नाम से बिक रहा है, तब गुणवत्ता को उन्नीस कर के उत्पाद को बढ़ाने में ही फायदा है. धीरेधीरे कंपनी की साख पर सवालिया निशान उठने लगे. डीलर खराब सामान का हर्जाना मांगने लगे लेकिन बच्चों ने झुकना सीखा ही नहीं था, इसलिए हर्जाना देने से साफ मना कर दिया.

रामदीन मलिक कंपनी का सब से पुराना व खास डीलर था. जब वैभव और सौरभ से इस समस्या का कोई समाधान उसे नहीं मिला तो उस ने हंसराज मलिक से बात करने की सोची. वैसे भी रामदीन और हंसराज एकदूसरे से बहुत बेतकल्लुफ थे. हमउम्र और एकदूसरे के साथ शुरू से काम करने के कारण काफी खुल कर दोनों के बीच बातचीत हुआ करती थी.

हंसराज मलिक अपनी कोठी के लान में बैठे पकौड़ों के साथ चाय की चुस्कियां ले कर सर्दी के मौसम का भरपूर आनंद उठा रहे थे, तभी नौकर कोर्डलैस फोन के साथ आया.

‘साबजी, रामदीन साब का फोन है.’

हंसराज ने नौकर से फोन लिया और बोले, ‘राम के बच्चे, कैसा है तू, बडे़ दिन बाद तेरी आवाज सुन रहा हूं. कहां मर गया था.’

‘तेरी नगरी में शहीद हो गया हूं, मलिक, अफसोस, मेरे जनाजे पर भी तू नहीं आया.’

‘आजा यहां पर, पकौडे़ खा कर शहीद होने में ज्यादा मजा है,’ हंसराज ने चुटकी ली.

रामदीन के स्वर में उदासी थी, ‘चल, तेरी यह तमन्ना भी पूरी कर देता हूं. बोल, कहां मिलेगा.’

‘आजा घर पर, एकसाथ लंच करते हैं.’

1 बजे रामदीन हंसराज मलिक की कोठी पर पहुंच गया. हंसराज खिली हुई धूप का भरपूर आनंद लेते हुए अभी भी लान में बैठे थे.

‘तू मूर्ख ही रहेगा, रामदीन. अकेला भागता हुआ चला आया, छुट्टा सांड की तरह,’ कहते हुए हंसराज फोन रामदीन को थमा कर बोले, ‘तू फटाफट भाभी को फोन कर, मैं ड्राइवर को भेजता हूं.’

रामदीन ने कुरसी खींची और बैठते हुए कहा, ‘रहने दे मलिक, आज अकेले में तेरे से बात करनी है, परिवार के साथ फुरसत में बैठ कर बात करेंगे.’

‘मुझे तो फुरसत ही फुरसत है, अब तू भी रिटायरमेंट ले ले फिर दोनों यारों को फुरसत ही फुरसत.’

‘हंस, आज मैं मजाक के मूड में नहीं हूं. तुम से गंभीर विषय पर बात करनी है,’ और उस ने अपनी सारी समस्या हंसराज के सामने खोल कर रख दी.

रामदीन की बात सुन कर हंसराज गंभीर हो गए, ‘तुझे यह बात पहले बतानी चाहिए थी तो यह नौबत ही नहीं आती,’ इतना कह कर हंसराज ने फौरन वैभव को फोन किया.

‘बेटे, बिना किसी सवालजवाब के तुम अभी, फौरन रामदीन अंकल को खराब माल का हर्जाना दो,’ इस के बाद उन्होंने चीफ अकाउंटेंट वर्मा को फोन पर कहा कि आधे घंटे में रामदीन का पूरा हिसाबकिताब ले कर कोठी पर चले आओ. तीसरा फोन चीफ इंजीनियर शिवनारायण को लगाया और डांटते हुए कहा, ‘शिव, सामान की क्वालिटी खराब किस से पूछ कर की है और क्वालिटी कंट्रोल पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे हो, तुम फौरन क्वालिटी सुपरवाइजर चंदरपाल के साथ कोठी पर आओ.’

हंसराज मलिक के फोन से पूरी मलिक कंपनी में भूचाल आ गया. सभी 1 घंटे के अंदर मलिक साहब के आगे उपस्थित थे. वैभव और सौरभ भी बात की गंभीरता को भांप कर शीघ्र आ गए. हंसराज मलिक शिवनारायण और चंदरपाल पर बरस पडे़ कि इतने पुराने आदमी हो, खराब क्वालिटी का सामान बनाने से पहले मुझे बताने की कोई जरूरत भी नहीं समझी. मेरे बनाए हुए नियमों को तुम ने कैसे तोड़ा?

वैभव और सौरभ को सामने खड़ा देख कर उन दोनों की कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी कि कैसे बताएं कि उन के दोनों बेटों के कहने पर ही अधिक प्रोडक्शन के लिए क्वालिटी को हलका किया था. हंसराज के उग्र तेवर को देख कर वैभव बोला, ‘पापा, आप तो छोटी सी बात का बतंगड़ बना रहे हो. ऊपर से सब की पेशी भी कर दी.’

‘देखो, यह छोटी बात नहीं है, बल्कि हमारी कंपनी की साख का प्रश्न है, जो एकदम गलत है. उत्पादन अधिक करने के लिए हमें सोचना पड़ेगा, लेकिन रामदीन को पूरा हर्जाना दे दो.’

हंसराज ने वर्मा को हिदायत दी और शिवनारायण और चंदरपाल को क्वालिटी बेहतर करने का आदेश दे कर रवाना किया.

‘अच्छा हंस, अब मैं भी चलता हूं,’ रामदीन ने हंसराज को गंभीर देख कर जाने की इजाजत ली.

‘ठीक है राम, इस संडे को एक- साथ लंच पक्का. भाभी के साथ आना.’

‘मंजूर, मेरे आका,’ रामदीन के इस कथन के साथ दोनों गले मिल कर जुदा हुए.

रामदीन के जाने के बाद वैभव हंसराज पर बिगड़ पड़ा, ‘पापा, आप ने पूरे स्टाफ के आगे हमारी एक बात नहीं सुनी. क्या जरूरत थी रामदीन को हर्जाना देने की, वह सारी मार्किट में बताता फिरेगा कि हमारा माल खराब था. कम से कम मुझ से पूछ तो लिया होता.’

हंसराज ने बेटे को घूरती आंखों से देखते हुए कहा, ‘जैसा तुम समझते हो, रामदीन वैसा नहीं है. हम दोनों ने एकसाथ काम शुरू किया था. मार्किट में किसी को भनक भी नहीं होगी कि वह मुझ से खराब माल का हर्जाना ले गया है. लेकिन तुम मुझे यह बताओ कि क्या खराब माल सिर्फ रामदीन को बेचा था या किसी और को भी बेचा है.’

‘आप को रामदीन ने भड़का दिया है. माल में कोई खराबी नहीं है. अगले 2 साल के लिए आर्डर बुक हैं, हमें अपना उत्पादन बढ़ाना है.’

‘यह अच्छी खबर है कि 2 साल के आर्डर बुक हैं, यही मौका है जब हमें और मशीनें लगानी चाहिए. सोमवार को मैनेजर मीटिंग रखो, उस में सब के साथ विचारविमर्श करना है.’

‘पापा, इस के लिए मीटिंग की क्या जरूरत है. वैसे भी अभी मशीनों में निवेश कर रकम फंसाने की कोई जरूरत नहीं. समय आने पर इस विषय पर बात करेंगे. अभी तो मुझे क्लब जाना है,’ कह कर हंसराज के दोनों बेटे वैभव और सौरभ गाड़ी में बैठ कर क्लब के लिए रवाना हो गए.

बेटों के क्लब जाने के बाद हंसराज पूरे हालात का अवलोकन करने लगे कि बेटे उस की बात नहीं मान रहे हैं और जो रामदीन ने बताया वह गंभीर मसला है. आखिर कंपनी में क्या चल रहा है, उन्हें खुद ही पता करना पडे़गा.

अगले दिन सुबह नाश्ता करने के फौरन बाद हंसराज ने ड्राइवर को फैक्टरी नंबर 1 चलने को कहा. उन्होंने अपनी पुरानी मारुति निकलवाई. उस में बैठे और ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट कर चल दिया. उन की गाड़ी जैसे ही फैक्टरी नंबर 1 के गेट पर पहुंची, आराम से बैठे गार्ड हरकत में आ गए. क्योंकि वैभव और सौरभ ने अपना आफिस फैक्टरी नंबर 4 में बना रखा था, यहां कम ही आते थे और जहां मालिक कम आते हैं, कर्मचारी बेखौफ रहते हैं.

गार्ड ने मुश्तैदी से हंसराज को फौजी सैल्यूट लगाया. फैक्टरी का गेट खुलते ही हंसराज की कार उन के आफिस के आगे रुकी.

हंसराज कार से उतर कर अपने आफिस में जाने के बजाय चीफ क्वालिटी कंट्रोलर चंदरपाल के केबिन की तरफ चल पडे़. चंदरपाल उस समय चीफ इंजीनियर शिवनारायण के केबिन में था. हंसराज, चंदरपाल को न पा कर शिवनारायण के केबिन की तरफ बढे़. केबिन के दरवाजे पर ठिठक गए, क्योंकि अंदर दोनों माल की क्वालिटी के बारे में बात कर रहे थे :

‘इस बार के माल की क्वालिटी तो पहले से भी खराब है, क्वालिटी सुधारो शिवजी, मैं इस माल को कैसे पास कर सकता हूं. आप को मालूम है कि उस दिन सेठजी कोठी पर इस बारे में कितने गरम थे.’

‘चंदरपालजी, जैसे पहले पास करते थे वैसे कर दो.’

‘इस बार बिलकुल नहीं करूंगा. सेठजी से इस बारे में बात करूंगा. उन के सिद्धांतों को अब चकनाचूर नहीं होने दूंगा.’

‘पहले छोेटे सेठों से बात तो कर लो.’

‘क्या कर लेंगे, ज्यादा से ज्यादा नौकरी से निकाल देंगे. कोई चिंता नहीं. 3 साल बाद रिटायर होना है, समझ लूंगा उम्र बड़ी हो गई, लेकिन आप डरपोक हो. किस बात की चिंता करते हो.’

‘तुम्हारे जैसा निडर नहीं हूं,’ शिवनारायण बोले, ‘अभी बच्चे पालने हैं. तुम ने तो लड़की की शादी कर दी, मुझे तो अभी करनी है.’

तभी हंसराज केबिन में दाखिल हुए,  ‘क्या बातें कर रहे हो.’

सेठजी को अचानक देख कर दोनों भौचक्के अपनीअपनी कुरसियों से उठ खडे़ हो कांपती आवाज में बोले, ‘गुडमार्निंग सर.’

‘मार्निंग तो गुड है,’ हंसते हुए हंसराज बोले, ‘केबिन बहुत ठंडा है, चलो, बाहर धूप में बैठते हैं.’

फौरन ही धूप में कुरसियां लगाई गईं और वे आ कर कुरसियों पर बैठ गए.

‘शिव, यह क्वालिटी का क्या चक्कर है और मेरे बनाए सिद्धांतों को तुम लोगों ने कैसे तोड़ा?’

‘सर, हम तो छोटे मालिकों की आज्ञा का पालन कर रहे हैं. एक तो अधिक उत्पादन के लिए माल की क्वालिटी से समझौता किया जा रहा है और ऊपर से मशीनों के रखरखाव का जो बजट होता है उसे टाल दिया गया है, जिस के कारण क्वालिटी खराब हो रही है. कुछ मशीनों के पुर्जे बदलने जरूरी हैं. मशीन नंबर 5 और 8 बहुत खराब हालत में हैं, उन की जगह हमें नई मशीनों को खरीदना चाहिए…’

‘दूसरी फैक्टरियों में क्या हालात हैं?’ हंसराज ने बात को काटते हुए पूछा.

‘फैक्टरी नंबर 2 और 3 में भी कुछकुछ यहां जैसी ही स्थिति है. सिर्फ फैक्टरी नंबर 4 सही चल रही है,’ शिव ने बताया.

‘अच्छा, तुम मशीनों की रिपेयरिंग का कार्यक्रम बनाओ. मैं खुद सबकुछ देखता हूं,’ अभी बातें चल ही रही थीं कि बहुत जोर से आवाज आई और शिव मशीनों की तरफ भागा. जैसा उसे शक था, वही हो गया. मशीन नंबर 5 का मुख्य पुर्जा टूट गया और सभी मशीनों को रोकना पड़ा. पूरा उत्पादन रुक गया.

शिवनारायण अपनी पूरी टीम के साथ बैठ कर मशीनों का निरीक्षण करने लगा. कुछ देर बाद शिव ने आ कर हंसराज को बताया कि मशीन के पुर्जे बदलने पडें़गे. लेकिन जो पुर्जा चाहिए वह हमारे स्टाक में नहीं है.

– क्रमश:

वीडियो : सपना चौधरी ने कार की बैक सीट पर किया धमाकेदार डांस

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी इंटरनेट की सनसनी बन गई हैं. उनका कोई भी वीडियो सोशल मीडिया पर आते ही तेजी से वायरल होने लगता है. सपना चौधरी स्‍टेज पर जितना अपना डांस इंज्‍वाय करती हैं रीयल लाईफ में भी वे इतनी ही मस्‍तीखोर हैं. हाल में वे दोस्‍तों संग मस्‍ती करती नजर आईं. इस वीडियो को बेहद पसंद किया जा रहा है.

सपना चौधरी ने कार की पिछली सीट पर गोविंदा और रवीना टंडन की फिल्‍म का चर्चित गाना ‘किसी डिस्को में जायें…’ गाने पर डांस किया. वे सिर पर पल्‍लू लेकर डांस करती नजर आ रही हैं. हरियाणा की मशहूर डांसर इस वीडियो में मस्‍तीभरे मूड में नजर आ रही हैं.

 

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सपना चौधरी इनदिनों हर तरफ तहलका मचाये हुए हैं. उन्‍होंने ‘बिग बौस 11’ से खासा लोकप्रियता हासिल की थी. अक्‍सर सलवार-कमीज में नजर आनेवाली सपना चौधरी अब वेस्‍टर्न लुक में नजर आने लगी हैं. उनका मेकओवर भी फैंस को पसंद आ रहा है. पिछले दिनों उनके फोटोशूट की तसवीरें भी छाई हुई थी.

सपना चौधरी अभय देओल के साथ फिल्‍म नानू की जानू के एक गाने में नजर आ चुकी हैं. हाल में उन्‍होंने भोजपुरी फिल्‍म ‘बैरी कंगना 2’ में स्‍पेशल सान्‍ग भी किया था. इसे अलावा वे पंजाबी के स्‍पेशल सान्‍ग में भी अपना जलवा बिखेर चुकी हैं. गौरतलब है कि सपना चौधरी जल्‍द ही बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. वे ‘दोस्‍ती के साइड इफेक्‍ट्स’ में एक्टिंग करती नजर आयेंगी. जल्‍द ही वे बड़े पर्दे पर दिखेंगी.

41 की उम्र में दुल्हन बनेगी ये एक्ट्रेस…

टीवी सीरियल ‘बा बहू और बेटियां’ से फेमस होने वाली सुचिता त्रिवेदी जल्द शादी के बंधन में बंधने वाली हैं. बता दें कि सुचिता 41 की उम्र में दुल्हन बनेंगी. हाल ही में उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी मेहंदी की रस्म की तस्वीरें शेयर की हैं.

सुचिता की मेहंदी में टीवी जगत की कई हस्तियां शामिल हुईं. इसमें रिद्धी डोगरा, राकेश वशिष्ट, निशांत भट्ट और क्रुतिका देसाई शामिल थे. सुचिता के होने वाले पति का नाम निगम पटेल है. सुचिता अपनी मेहंदी के फंक्शन में काफी खुश नजर आ रही थीं. मेहंदी के मौके पर सुचिता ने पिंक कलर का लहंगा और मांग टीका लगा रखा था.

बता दें कि सुचिता ने 1983 में फिल्म ‘वो सात दिन’ से डेब्यू किया था. इसके बाद उन्होंने छोटे पर्दे का रुख किया. सुचिता ने मशहूर शो ‘कहानी घर-घर की’ और ‘खिचड़ी’ में भी काम किया है. टीवी शो ‘बा बहू बेबी’ में सुचिता ने मीनाक्षी ठक्कर का किरदार निभाया था. सुचिता 15 साल से टीवी इंडस्ट्री में काम कर रही हैं. सुचिता की फिल्मों की लिस्ट में ‘फिराक’, ‘कुछ कुछ लोचा है’ और ‘मिशन कश्मीर’ भी शामिल है. सुचिता कौमेडी सर्कस में भी नजर आ चुकी हैं.

घरों में औरतों को सही स्थान कब मिलेगा

लड़कियों की शिक्षा में मातापिता की सोच तो आड़े आती ही है, इस के साथ बड़ी समस्या है लड़कियों की होने वाली छेड़छाड़. बड़ी हो चली लड़कियों के साथ भद्दे मजाक करना, उन्हें गलत ढंग से छूना, उन की मौजूदगी में आपस में लड़कों का सैक्सी पौर्न देखना, पर्चियों पर प्रेम इजहार करना है तो पुरानी बात पर हर बड़ी होती लड़की के लिए यह चुनौती होता है.

लड़कियों को यह छेड़खानी आमतौर पर हंसने तक पर पाबंदी लगा देती हैं. गंभीरता का दुपट्टा ओढ़े रखना इन के लिए एक जरूरत बन जाती है. हंसे और फंसे की परंपरा में किसी भी छेड़खानी या चुटकुले की प्रतिक्रिया का न्यौता समझा जाता है. जो लड़कियां बोल्ड होते हैं, हर तरह की छेड़खानी का बराबर का जवाब देती हैं उन्हें होशियार नहीं माना जाता, चालू माना जाता है और उन्हें पटाने में लड़कों को कोई रुचि नहीं रहती.

लड़कों के साथ न पढ़ने या रहने देने की अपनी मुसीबतें होती हैं. जो सिर्फ लड़कियों के स्कूलों व कालेजों में पढ़ती हैं वे बहुत खुश नहीं रह पातीं और एक तरह से लड़कियों ने  स्कूल जेल से हो जाते हैं. जब बाहर जो भी लड़के मिलते हैं उन्हें लपक लिया जाता है क्योंकि चुनने का अवसर ही नहीं मिलता.

बनठन कर मनचाहा और थोड़ा बोल्ड व सैक्सी पहनने की चाह बहुत लड़कियों में होती है पर छेड़छाड़ का भय उन्हें अपनी खूबियों को दिखाने से रोकता है. इसलिए लड़कियां रेव पार्टियों को ढूंढ़ती हैं जहां चुने हुए लड़के हों जो चाहे अति करते हों पर छोटे स्तर के हैं और उन्हें किसी न किसी ने बुलाया होता है. रेव पार्टियों में लड़के अति करते भी हों तो सड़कछाप छेड़छाड़ नहीं कर पाते क्योंकि पार्टी के आयोजक को गुस्से डर होता है.

पिछड़ी व दलित जातियों की लड़कियां भारी गिनती में अब पढ़ने आ रही हैं और उन का प्रदर्शन अब तथाकथित सवर्णों से अच्छा है. ये लड़कियां पहली पीढ़ी की लढ़ीलिखी हैं और घरों में गरीबी के बावजूद जोखिम ले रही हैं. घर का घुटन भरा माहौल और बाहर छेड़छाड़ की बंदिशें लड़कियों को बेहद परेशान कर देती हैं. यह वैसे अच्छा भी है क्योंकि लड़कियां अब इसी वजह ज्यादा अच्छे नंबर लाने लगी हैं और नौकरियों के नए अवसर उन्हें ही मिल रहे हैं और छेड़छाड़ करने वाले लड़के अब दरदर भटक रहे हैं.

छेड़छाड़ वैसे हर समाज में, हर देश में हो रही है और इस का कोई सरल उपाय नहीं क्योंकि यह थोड़ी प्राकृतिक है. इस पर अगर कोई अंकुश लगा सकता है तो केवल घरों का माहौल. घरों में यदि लड़कियों को सही आदर मिले और बराबरी से रखा जाए तो बाहर ऐसे घरों के लड़के अपने आप सीमा में रहेंगे. जिन घरों में लड़कियों को पैर की जूती समझा जाता है वहीं के लड़के बाहर निकल कर छेड़ने को मर्दानगी मानते हैं. घरों में औरतों को सही स्थान कब मिलेगा यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि फिलहाल कई दशकों से कुछ हुआ नहीं है. 1950-70 के बीच बहुत बदलाव आया पर अब थम गया है.

भगवा भीड़ का अंधा कानून सुप्रीम कोर्ट की नहीं सुनेगा

सुप्रीम कोर्ट ने मौब लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा पीटपीट कर मार डालने की वारदातों की बुराई करते हुए कहा कि भीड़तंत्र को कानून की अनदेखी कर भयानक करतूत करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. सरकार लोगों की चीखपुकार की अनसुनी नहीं कर सकती.

सुप्रीम कोर्ट ने हालात की गंभीरता को देखते हुए सरकार से तुरंत सख्त कदम उठाने की बात कही ताकि सब को साथ ले कर चलने की सामाजिक और संवैधानिक व्यवस्था पर भरोसा रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने संसद से कहा कि वह मौब लिंचिंग को अपराध की श्रेणी में लाए और उचित सजा का इंतजाम करे. गौरक्षा और दूसरी वजहों से भीड़ द्वारा लोगों की जान लिए जाने पर कोर्ट ने तीखी बात कही.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ का यह फैसला ऐतिहासिक  माना जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से दिशानिर्देश पर अमल करने को कहा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तय कराना राज्य की जिम्मेदारी है कि कानून व्यवस्था असरदार ढंग से लागू रहे जिस से लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के राज में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक तानाबाना महफूज रहे. गड़बड़ी के समय राज्य को लोगों के संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत करने के लिए जिम्मेदारी से कार्यवाही करनी चाहिए. भीड़ का किसी को भी पीटपीट कर मार डालना कानून और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है.

पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गई बात का पालन केंद्र और प्रदेश सरकारें कितना करती हैं, यह देखने वाली बात है.

जिस दिन बड़ी अदालत अपना आदेश दे रही थी ठीक उसी दिन भारतीय जनता युवा मोरचा के भगवा लोगों ने झारखंड के पाकुड़ इलाके में स्वामी अग्निवेश को जम कर पीटा.

सुप्रीम कोर्ट ने मौब लिंचिंग में उन घटनाओं को शामिल किया है जिन में पीटपीट कर मार दिया जाता है. जिन घटनाओं में भीड़ द्वारा बुरे तरीके से पीटा जाता है वह भी बेहद गंभीर है. उन को भी मौब लिंचिंग की श्रेणी मेें रखना चाहिए.

जब भीड़ सत्ताधारी दल से जुड़ी होती है तो उस का हौसला बढ़ा हुआ होता है. कट्टरधारी संगठन किसी भी विचारधारा के हों, उन की सोच एक सी होती है. भीड़तंत्र द्वारा ही वे कानून को अपने तरीके से चलाना चाहते हैं. समय के साथसाथ इस तरह की घटनाओं में तेजी आ रही है.

हर धर्म यही सिखाता है कि अपने विरोधियों का मुंह बंद करो. कोई धर्म तर्क व तथ्य की बात नहीं सुनना चाहता. सरकारी कानूनों के बजाय धर्म अपने समर्थकों की मदद से मुंह बंद कराना चाहता है.

हिंदू धर्म में ऐसे कई नियम बने हैं जिन में भीड़ की तरह के फैसले बिना सुनवाई के तुरंत किए गए. एकलव्य का अंगूठा कटवाना और बातबात पर शाप देना एक तरह से बिना सुनवाई के फैसला सुनाना है. भीड़ यही करती है.

भीड़ धर्म और सरकार के साए में काम करती है. भीड़ ऐसे काम खुद नहीं करती, धर्म के ठेकेदार और सत्ताधारी दल के कर्ताधर्ता भीड़ को काम करने के लिए उकसाते हैं इसलिए ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से बहुत बदलाव नहीं होगा.

सत्ता पर कब्जा करने के लिए भीड़तंत्र को बढ़ावा दिया जाता है. धर्म कानून के राज के बजाय अपने धार्मिक कानून को चलाना चाहता है. सरकार इस के सहारे वोट बैंक की राजनीति करती है. ऐसे में हर नई घटना के बाद तेजी आती दिखेगी और फिर ऐसी घटनाएं होंगी. हर सरकार पुरानी सरकार का उदाहरण दे कर अपना बचाव करेगी.

मौब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट की कठोर लताड़ के बाद सत्ताधारी पार्टी के लोग बेतुकी सफाई दे रहे हैं कि कांग्रेस के समय में सिखों की हत्या भी मौब लिंचिंग ही तो थी, जबकि यह तर्क बाबरी मसजिद को गिराने में खारिज कर दिया जाता है.

ऐसे घटेगा हौसला

इतिहास गवाह है कि भीड़तंत्र के आगे सरकारें झुकती रही हैं. वे अपने वादों से मुकर जाती हैं. कानून अपना राज स्थापित नहीं कर पाता और प्रशासन लाचार हो जाता है. इस तरह की घटनाओं में इंसाफ नहीं मिलता. अगर मिलता भी है तो आधाअधूरा.

साल 1992 के बाद राम मंदिर का आंदोलन इस तरह के भीड़तंत्र का एक उदाहरण है. उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दे कर कहा था कि अयोध्या में कुछ नहीं होने पाएगा. भीड़तंत्र ने ढांचा ढहा दिया.

26 सालों के बाद भी इस का फैसला नहीं आ पाया है.

ऐसी घटनाओं से भीड़तंत्र को बढ़ावा मिलता है. गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा इस का बड़ा उदाहरण है. इस में महीनों तक गुजरात के शहरों में हिंदुओं की भीड़ों ने नरेंद्र मोदी की सरकार के तले निहत्थे बेकुसूर मुसलमानों को मारा था और 2000 से ज्यादा मौतों पर कोई गुनाहगार नहीं साबित हुआ.

उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के मुख्यमंत्री को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सीख दे कर पल्ला झाड़ लिया था. यह बयान एक प्रधानमंत्री का नहीं, एक साजिश थी कि विरोधियों को चुप कर दो और जो हो रहा है उसे होने दो.

धीरेधीरे इस तरह की घटनाओं ने तेजी पकड़नी शुरू की. इन का दायरा बढ़ने लगा. लोग एकजुट हो कर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने लगे.

भीड़तंत्र में जिस की लाठी उस की भैंस वाली कहावत खरी उतरती है. ऐसा नहीं है कि पहले ऐसी घटनाएं नहीं घटती थीं. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में एक समुदाय को मारने की घटनाएं भीड़तंत्र का ही उदाहरण हैं. तब एक समुदाय के खिलाफ हिंसा होती रही और बाकी समाज चुप्पी साधे रहा. पहले इस तरह की गिनीचुनी घटनाएं घटती थीं, पर अब इन की तादाद बढ़ती जा रही है.

गौरक्षा के नाम पर ऐसी तमाम घटनाएं घटीं जिन में भीड़तंत्र का गलत असर देखने को मिला. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखलाक की हत्या इस का सब से खास उदाहरण है.

उत्तर प्रदेश की ही तरह राजस्थान, हरियाणा और दूसरे प्रदेशों में भी घटनाएं घटीं. इन में सरेआम लोगों की पिटाई और हत्या की गई.

जिस देश में लोकतंत्र हो वहां भीड़तंत्र के नाम पर मनमानी हो, यह देश के संविधान की बेइज्जती है. जब प्रशासन और सरकार इस का अंग बन जाते हैं तो बात और भी बिगड़ जाती है.

बढ़ती घटनाएं घटता असर

देश में जातिधर्म अब संविधान से ऊपर उठता नजर आ रहा है. संविधान की मूलभावना को दरकिनार कर भीड़तंत्र के सहारे जातिधर्म को बढ़ावा मिल रहा है.

साल 2008 में गुर्जर समाज ने पिछड़े तबके के बजाय खुद को दलित जाति में शामिल किए जाने को ले कर आंदोलन किया. पुलिस और आंदोलन करने वालों के बीच हिंसक झड़पों में 37 लोगों की मौतें हुईं.

साल 2015 में गुजरात में पाटीदार समाज ने आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया. 25 अगस्त को अहमदाबाद में हुए प्रदर्शन में जनजीवन ठप हो गया.

अगस्त से सितंबर तक की घटनाओं में 14 लोगों की मौतें हो गईं. 200 से ज्यादा लोग घायल हुए. तमाम बसें जलाई गईं. केवल अहमदाबाद में ही 12 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ.

आरक्षण पाने के लिए जाट समुदाय ने साल 2016 में आंदोलन किया. हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में 340 अरब रुपए का नुकसान हुआ. रेलवे को 60 करोड़ रुपए का घाटा हुआ. ढाई दर्जन लोग मारे गए.

देश के अंदर इस तरह की हिंसक घटनाओं को कोर्ट से ले कर सरकार तक ने गंभीरता से लेने की बात कही. मुकदमे दर्ज हुए, पर असर कुछ नहीं पड़ा. एक घटना के बाद दूसरी घटना का सिलसिला जारी रहा.

आंध्र प्रदेश में कापू आंदोलन हुआ. कापू समुदाय ने खुद को पिछड़ी जाति में शामिल किए जाने की मांग को ले कर आंदोलन छेड़ा और रेलवे लाइन व नैशनल हाईवे को बंद कर दिया. ‘रत्नांचल ऐक्सप्रैस’ की कई बोगियों में आग लगा दी गई. यही नहीं, आरपीएफ के जवानों पर भी हमला किया गया.

अगस्त, 2017 में हरियाणा के पंचकूला में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद उपजी हिंसा में 29 लोगों की मौत और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

इसी तरह फिल्म ‘पद्मावत’ के विरोध में राजस्थान में करणी सेना ने फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की.

जनवरी, 2018 में जब यह फिल्म रिलीज हुई तो विरोध में हिंसक घटनाएं हुईं. अप्रैल, 2018 में ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन के विरोध में हिंसा हुई. वह भी भीड़तंत्र का ही उदाहरण है.

इन का है संरक्षण

देश की आजादी के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक देश का दर्जा मिला. आजादी की लड़ाई के समय महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा ले कर अंगरेजों को देश छोड़ने पर मजबूर किया था. उन्होंने कई ऐसे आंदोलनों को वापस लिया जिन में हिंसा होने लगी थी.

आजादी के समय अहिंसा ने अपना काम किया. आजादी के बाद जब देश को ज्यादा संविधान का पालन करना चाहिए था तब हिंसक घटनाएं घटने लगीं.

हिंसक घटनाएं भीड़तंत्र को बढ़ावा देती हैं. देश में होने वाले चुनावों के दौरान भी हिंसक घटनाएं घटती हैं. अगर 1977 और 1984 के चुनावों को छोड़ दें तो हर चुनाव में जातिधर्म का ही बोलबाला रहा है.

राजनीति धर्म और जाति पर केंद्रित हो गई है. जीत के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया जाता है. इस वजह से खेमेबंदी शुरू हो गई और भीड़तंत्र के खिलाफ कदम उठाना मुश्किल हो गया.

धर्म की कहानियों से सीख लेने वाले समाज को दिखता है कि धर्ममें ऐसी बहुत सी घटनाएं घटी हैं जहां पर अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया. देश में सब से लोकप्रिय पौराणिक ग्रंथ महाभारत और रामायण इस से भरे पड़े हैं.

रामायण में राजा बाली का उदाहरण देखें तो पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए राम ने उस से युद्ध किया और उस को मार कर वहां का राज उस के भाई सुग्रीव को दे दिया. शूर्पणखा ने जब लक्ष्मण के सामने शादी करने का न्योता दिया तो लक्ष्मण ने सबक सिखाने के लिए उस की नाक काट ली.

धार्मिक ग्रंथों में ऐसी कई कहानियां हैं जिन में यह पता चलता है कि अपनी बात को मनवाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है. इन कहानियों को पढ़ कर बढ़ रहे लोगों ने अब हिंसा का ही सहारा ले लिया है. राज्य से उन को जब भी शिकायत होती है, वे हिंसा का सहारा लेते हैं. यही वजह है कि सरकारी बसों, इमारतों, रेलवे लाइनों को नुकसान पहुंचा कर आंदोलन होता है.

यह बात और है कि हिंसा का सहारा ले कर चले आंदोलन कभी कामयाब नहीं होते. साल 2012 का अन्ना आंदोलन वर्तमान समय में इस का उदाहरण है.

कांग्रेस की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय में लोकपाल बिल को ले कर यह आंदोलन इतना असरदार हुआ कि कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. भाजपा कांग्रेस के विकल्प के रूप में सरकार बनाने में कामयाब हो गई.

सत्ता में पहुंचने के बाद भाजपा इस बात से अनजान है. उस के शासनकाल में कई ऐसी घटनाएं पूरे देश में घटी हैं जिन में हिंसा का सहारा लिया गया था. भाजपा चाहती तो उन को रोक सकती थी पर उस ने वोट बैंक का फायदा लेने के लिए ऐसा नहीं किया.

आज सोशल मीडिया का दौर है जिस में किसी भी घटना की प्रतिक्रिया बड़ी तेजी से सामने आती है. इस से हिंसा और भड़क जाती है. सोशल मीडिया से भी भीड़तंत्र को बढ़ावा मिलता है.

देश के किसी भी हिस्से में भीड़ जुटा कर कुछ भी किया जा सकता है. इस से लोगों को कितना नुकसान होता है, इस बात की परवाह किसी को नहीं होती है.

सड़क पर जाम लगने से कई मरीजों की जानें जा चुकी हैं. स्कूली बच्चे धूप में सड़क पर खड़े रहते हैं क्योंकि सड़क पर कोई धार्मिक यात्रा निकल रही होती है. कहीं सड़क पर नमाज पढ़ी जा रही होती है. वोट बैंक बढ़ाने के लिए सरकारें भीड़तंत्र को खुश करने में लगी रहती हैं. नतीजतन, लोकतंत्र में भीड़तंत्र का असर बढ़ता जा रहा है. केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निर्देश देने से भीड़तंत्र काबू में नहीं आने वाला है.

मंटो : अति सतही फिल्म

किसी भी इंसान के जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म में उस इंसान के व्यक्तित्व को सही अंदाज में पेश करना एक फिल्मकार की सबसे बड़ी कसौटी होती है. इस कसौटी पर अपने समय के मशहूर, सच को अपनी लेखनी के जरिए पेश करने वाले निडर विवादास्पद उर्दू भाषी लेखक सआदत हसन मंटो पर बायोपिक फिल्म का निर्माण करने वाली फिल्मकार नंदिता दास खरी नहीं उतरती हैं.

hindi film review manto

जी हां! फिल्म ‘‘फिराक’’ के साथ निर्देशन में कदम रखने वाली अदाकारा नंदिता दास अब लेखक व निर्देशक के तौर पर मशहूर निडर उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो की बायोपिक फिल्म ‘‘मंटो’’ लेकर आयी हैं. जिसमें उन्होने अपने समय के मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन की कहानी 1946 में बांबे (आज का मुंबई) शहर से शुरू की है. नंदिता दास का दावा  है कि उन्होंने इस फिल्म का निर्माण, लेखन व निर्देशन करने से पहले गहन शोध किया है. पर अफसोस फिल्म देखकर कुछ कमी महसूस होती है. दर्शक मंटो से वाकिफ नहीं है, जिन्होने मंटो पढ़ा नहीं है, उनके लिए तो यह फिल्म समझ से परे है. पर जिन्होने मंटो व मंटो की कहानियों को पढ़ा है, उन्हे इस फिल्म से जबरदस्त निराशा होगी.

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लघु कथाकार सआदत हसन मंटो (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) 1946 में मुंबई (1946 का बांबे) में फिल्म पटकथा लेखक के तौर पर कार्यरत थे. एक दिन उनका एक फिल्म निर्माता (ऋषि कपूर) से धन तथा कहानी में बदलाव को लेकर झगड़ा हो जाता है. पता चलता है कि निर्माताओं के साथ उनके इस तरह के झगड़े आम बात हैं. उस वक्त‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ के साथ उनके रिश्ते काफी कमजोर थे. जबकि इस संगठन से जुड़े कृष्णचंद्र और महिला लेखक इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) सहित कई लेखक उनके दोस्त थे.

अभिनेता श्याम चड्ढा (ताहिर राज भसीन) और मशहूर अभिनेता व निर्माता अशोक कुमार उर्फ दादा मुनि से उनके काफी घनिष्ठ संबंध थे. श्याम चड्ढा महज मंटो के दोस्त और उनकी तमाम कहानियों के प्रेरणा स्रोत भी हैं. पर उनकी सर्वाधिक मददगार और रीढ़ की हड्डी उनकी पत्नी साफिया थीं. भारत में सआदत हसन मंटो को तीन मुकदमों में बरी किया जा चुका था. तो वहीं साफिया एक बेटी की मां बन चुकी हैं.

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15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होते ही नए राष्ट्र पाकिस्तान के लाहौर शहर में साफिया (रसिका दुग्गल) अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए जाती हैं. इस बीच वह दूसरी बार मां भी बनने वाली हैं. हिंदू मुस्लिम के बीच तनाव के बावजूद मंटो मुंबई में ही रुकने का फैसला लेते हैं, क्योंकि उन्हें मुंबई से बेइंतहा प्यार है. पर एक दिन जब श्याम चड्ढा के परिवार को मुस्लिम हमले से बचाते हुए पाकिस्तान छोड़ना पड़ता है. तो श्याम क्रोध में मंटो से मुस्लिमों को लेकर अपशब्द कहते हैं. बात आगे बढ़ती है, तो मंटो के एक सवाल पर श्याम कह देते हैं कि पर ‘शायद मैं तुम्हारी हत्या कर सकता हूं.’ तब पहली बार मंटो को अपना धर्म याद आता है और वह पाकिस्तान जाने का निर्णय लेते हैं.

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1948 लाहौर रिफ्यूजियों से भरे शहर की टूटी फूटी इमारत में मंटो रहना शुरू करते हैं. वह खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं. इसी बीच उनकी कहानी ‘ठंडा गोश्त’ को लेकर अदालत में मुकदमें शुरू हो जाते हैं. मुसीबत के वक्त उनकी पत्नी साफिया उनके साथ खड़ी रहती हैं. साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उनके विचार भी कईयों को पसंद नहीं आते हैं. वह शराब पीने लगते हैं. मगर अपनी पत्नी व दो बेटियों के सुखद भविष्य के लिए वह लेखन जारी रखते हैं. उन्हे अपनी नन्ही बेटी के इलाज के लिए पैसे का मोहताज होना पड़ता है, पर वह समाज के विकृत मानसिकता के लोगों को अपनी लेखनी के जमीर कुचलने का हक नहीं देते. उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता है. बीच बीच में मंटो की ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो’, ‘तोबा टेक सिह’ जैसी कहानियों का नाट्य रूपांतरण भी दिखाया जाता है. पर अपनी शराब की लत व  बिगड़ते स्वास्थ्य व लेखन के बंद हो जाने पर एक दिन वह स्वयं लाहौर मेंटल अस्पताल के ‘‘अल्कोहल रिहैबिलेशन सेंटर’’ में भर्ती हो जाते हैं.

बतौर निर्देशक नंदिता दास ने फिल्म में चालीस के दशक, उस वक्त के उपकरण, वेषभूषा आदि को बहुत ही बेहतर तरीके से उकेरा है. वह मंटो के एकाकीपन, बेचैनी,खालीपन के साथ उनके कुछ अफसानों को जीवंत करने में सफल रही हैं. मगर मंटो के साथ वह पूर्ण न्याय करने में बुरी तरह से विफल रही हैं. मंटो के रहन सहन, खान पान आदि का चित्रण सही है. मगर जब उनके लेखन की बात आती है, तो मंटो की आत्मा की हत्या कर दी गयी. पूरी फिल्म में मंटो का वास्तविक व्यक्तित्व पूर्णरूपेण उभर नहीं पाया.

मंटो के लेखन और उनके जीवन में भी देश के बंटवारे का जो दर्द नजर आता है, वह फिल्म में कहीं नहीं उभर पाया. मंटो लिखित कहानी ‘खोल दो’ पढ़कर हर आम इंसान न सिर्फ विचलित होता है, बल्कि उसे रोना आ जाता है और कम से कम तीन चार दिन उसका जीवन अवसाद भरा रहता है. पर नंदिता दास ने इस फिल्म में ‘खोल दो’कहानी को इतने सतही अंदाज में पेश किया है कि दर्शक के चेहरे पर कोई भाव ही नहीं उभरता. यह लेखक व निर्देशक के तौर पर बहुत बड़ी विफलता है. यहां तक कि मंटो की जिंदगी में सबसे बड़ा भूचाल लेकर आने वाली कहानी थी-‘‘उपर नीचे और दरमियान’’. पर नंदिता दास ने तो इस कहानी का कहीं जिक्र ही नहीं किया.

कैमरामैन कार्तिक विजय ने भी काफी अच्छा काम किया है. संगीतकार स्नेहा खानविलकर व रफ्तार के कुछ गीत अच्छे बन पड़े हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो मंटो के किरदार को जीवंत बनाने में नवाजुद्दीन सिद्दिकी पूरी तरह से सफल रहे हैं और वह एक बेहतरीन अभिनेता हैं, यह बात पुनः उजागर हो गयी. नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपने अभिनय से विवादास्पद लेखक मंटो के एक पिता, पति और दोस्त के रूप को मुखर रूप से साकार किया है. साफिया के किरदार में रसिका दुग्गल और श्याम के किरदार में ताहिर राज भसीन ने जबरदस्त अभिनय किया है. इसके अलावा छोटे छोटे किरदारों में फरयना वझेर, जावेद अख्तर,चंदन रौय सान्याल, विनोद नागपाल, ऋषि कपूर, परेश रावल, इनामुल हक, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे आदि की भी परफार्मेंस ठीक है.

एक घंटे 56 मिनट की अवधि की अवधि वाली फिल्म ‘‘मंटो’’ का निर्माण नंदिता दास ने ‘वायकाम 18’ के साथ मिलकर किया है. फिल्म की लेखक व निर्देशक नंदिता दास,संगीतकार स्नेहा खानविलकर व रफ्तार, पार्श्व संगीत  कार जाकिर हुसेन, कैमरौन कार्तिक विजय तथा फिल्म के कलाकार हैं – नवाजुद्दीन सिद्दिकी, रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, फरयना वझेर, जावेद अख्तर, चंदन रौय सान्याल, विनोद नागपाल, ऋषि कपूर, इनामुल हक, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे, इला अरूण, दिव्या दत्ता,परेश रावल, तिलोत्तमा सोम, शशांक अरोड़ा, गुरूदास मान, दानिश हुसेन व अन्य.

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