दलित शब्द पर प्रतिबंध, शब्द नहीं सोच बदलें

केंद्र सरकार ने दलित शब्द का इस्तेमाल न करने को कहा है. सरकार ने कहा है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्द है इसलिए यही शब्द इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए.

सरकार के इस फैसले पर देशभर के कई दलित संगठन और बुद्धिजीवी पुरजोर तरीके से खिलाफत कर रहे हैं और इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.

इस निर्देश पर राजग सरकार के भीतर भी मतभेद है. केंद्र में मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया के नेता रामदास अठावले इस से खुश नहीं हैं. केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और भाजपा के दलित सांसद उदितराज ने भी दलित शब्द की पैरवी की है लेकिन केंद्रीय मंत्री राज्यवर्द्घन सिंह, प्रकाश जावड़ेकर जैसे नेता इस प्रतिबंध के पक्ष में हैं.

सरकार ने यह फैसला बांबे हाईकोर्ट के निर्देश पर दिया है. बांबे हाईकोर्ट की नागपुर बैंच ने सरकार को इस पर विचार करने के लिए कहा था. अदालत में पंकज मेश्राम नामक एक शख्स ने याचिका दायर की थी, जिस में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है. इस का मतलब अछूत, असहाय और नीचा होता है. यह उस समुदाय के लिए अपमानजनक है. इस शब्द का संविधान में भी कहीं इस्तेमाल नहीं किया गया है.

इस से पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी मोहनलाल माहौर नाम के एक आदमी ने दलित शब्द को ले कर याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है और इसे अनुसूचित जातियों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

भाजपा सरकार अदालत की सलाह की आड़ में दलित शब्द को प्रतिबंधित करना चाहती है क्योंकि यह शब्द सरकार को ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदू संगठनों को गहरा चुभ रहा है. इन्हें जबतब टीस दे रहा है.

‘दलित’ शब्द का अर्थ उत्पीडि़त यानी दबा कर रखा गया, जिस पर जुल्म ढाया गया होता है. आमतौर पर दलित की पहचान गरीब, भुखमरी से पीडि़त, अछूत, भेदभाव सहने वाला बेचारा और समाज का सब से निचला शख्स से होती है.

इस की एक सामाजिक पृष्ठभूमि है. दलित हिंदू वर्ण व्यवस्था के बाहर 5वां वर्ग है. चौथा शूद्र है पर दलित इस व्यवस्था से बाहर है जिस के साथ सदियों से गैरइनसानी बरताव होता रहा है. इसे गांव, शहर से बाहर रहने का शास्त्रीय आदेश है. इसे संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है.

यह शब्द सामाजिक व्यवस्था की पोल खोलता है. वह व्यवस्था जिस में भेदभाव, छुआछूत, असमानता, अत्याचार, शोषण को ईश्वरीय आदेश बताया गया है. ‘दलित’ जाहिर करता है कि प्राचीन ईश्वर प्रदत्त व्यवस्था किस कदर अमानवीय थी.

यह महज शब्द नहीं है बल्कि पूरी हिंदू व्यवस्था के खिलाफ बगावत, गुस्सा, आंदोलन है. इस से हिंदुत्व की बदनामी होती है. यह उस महान संस्कृति की पोल खोलता है, जिस का देशदुनिया में दंभ भरा जाता है.

दलितों में सभी अछूत जातियां आती हैं. दलित शब्द ने इन अछूत, दबीकुचली जातियों को एक होने का काम किया. जिस तरह मंडल आयोग में आई पिछड़ों के नाम पर पिछड़ी जातियां एक हुईं.

दलित किसी एक जाति का नाम नहीं है. दलित में दर्जनों जातियां शामिल हैं जो दलित के नाम पर एकजुट दिखती हैं. यही एकजुटता हिंदुत्व के लिए खतरा है.

दलित अब अपनी जाति छिपाता नहीं, गर्व होने की बात करता है. ‘मैं चमार हूं’, ‘चमार बौय’, ‘वाल्मीकि गर्व’ की बात की जाने लगी है. अपनी बदहाली के लिए दलित समाज और सरकार से सवाल पूछने लगे हैं. यह बात न समाज को पच रही है, न सरकार को.

भाजपा सरकार को दिक्कत यह है कि वह जिस हिंदू व्यवस्था को उज्ज्वल, विश्व में सर्वोच्च आदर्श बताना चाहती है उस में दागधब्बे और सड़ांध भरी हुई है.

भाजपा और संघ दलितों को हिंदू नहीं मानते पर हिंदू के नाम पर उसे दलितों के वोट चाहिए. भाजपा से दलित सवाल भी पूछते हैं कि अगर वे हिंदू हैं तो उन्हें मंदिरों, पूजापाठ, कर्मकांडों से दूर क्यों रखा जाता है? व्यवहार में भाजपा दलितों को वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही रखना चाहती है. वैसे, कांग्रेस कोई दूध की धुली नहीं है. 1947 से ही उस के नेता किसी तरह वह पौराणिक राज लाना चाहते थे जो अब संघ करना चाह रहा है. इस में अछूतों को जबरन जगह मिली है.

दलितों को भगवा रंग में रंगने के लिए समरसता कार्यक्रम जैसे तमाम प्रयास नाकाम होते दिखाई दे रहे हैं. रोहित वेमुला आत्महत्या, भीमा कोरेगांव जैसी घटनाओं ने भाजपा की चिंता को और बढ़ाया है.

दलित को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया गया, दलित को मूंछ रखने पर पीटा गया, मरी गाय की खाल उतारने पर दलितों पर हिंसा, दलित के साथ मौब लिंचिंग, इस तरह की घटनाओं से हिंदूवादी सरकारों की बदनामी होती है. इस से दुनिया में भारत को जातीय, नस्लीय भेदभाव वाला देश माना जाता है.

जो दिक्कत भाजपा को दलित शब्द से है, वही कांग्रेस को भी रही है. शब्द बदलने के कई बार प्रयास किए गए. वर्ण व्यवस्था के पक्षधर महात्मा गांधी ने भारतीय समाज में फैले छुआछूत को देखते हुए ‘हरिजन’ शब्द दिया था. इसे ले कर भी काफी विवाद हुआ था. लोग भी ‘हरिजन शब्द’ का इस्तेमाल करने से बचने लगे थे.

जवाहरलाल नेहरू के समय में छुआछूत जब हद पर थी तब दलित नेता जगजीवन राम ने उन के सामने यह समस्या रखी थी. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि दलितों से कहें कि वे अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाना बंद कर दें. तब जगजीवन राम ने इस पर आपत्ति की थी कि दलित तो जातिसूचक शब्द लगाना बंद कर दें और मालवीय जातिसूचक शब्द लगाएं, ऐसा नहीं हो सकता. इस का जवाहरलाल नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था.

उसी दौर में बहुत सारे लोगोें ने अपने नाम के आगेपीछे राम लगाना शुरू किया. मसलन सुरेशराम, जगजीवनराम. और भी तरहतरह के प्रयास हुए, पर समाज की सोच और व्यवस्था नहीं बदल पाई. भेदभाव, छुआछूत, अत्याचार कम नहीं हुआ.

दलित शब्द 60 के दशक में उस समय चलन में आया था जब महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन चला था. तब से अकेले महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी निचली जातियों में एकता पैदा हुई.

जब तक जाति रहेगी, वैर रहेगा,  इसलिए दलित शब्द पर ही क्यों, हर जातीय पहचान पर रोक लगाई जानी चाहिए. आजादी के 70 साल बाद भी जाति को ले कर सोच नहीं बदली है, बस शब्द ही बदले जाने की बातें की जा रही हैं.

सलमान की एक्स गर्लफ्रेंड का खुलासा, कम उम्र में हुआ था रेप

अभिनेता सलमान खान की एक्स गर्लफ्रेंड और अभिनेत्री सोमी अली ने कहा है कि जब वह 14 साल की थीं, तब वो यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म का शिकार हुई थीं. सोमी अली ने ऐसी दर्द से गुजरने वाली अन्य महिलाओं से भी आगे आकर यौन शोषण के खिलाफ #metoo से जुड़ने की अपील की है.

सोमी अली ने सोमवार को  इंस्टाग्राम  पर पोस्ट में लिखा, “पांच साल की उम्र में मेरा यौन उत्पीड़न हुआ था और 14 साल की उम्र में मेरे साथ दुष्कर्म हुआ. मैं उन सभी को सैलूट करना चाहूंगी जिन्होंने अपने साथ हुई ऐसी घटनाओं के बारे में बोला और जिन्होंने बोलने का फैसला किया है. मैं समझती हूं कि यह करना बहुत कठिन है क्योंकि मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है और मुझे इससे जुड़ी बात शेयर करने में बहुत लंबा समय लगा.

सोमी ने ये भी कहा, कि  यह तब और भी कठिन हो जाता है जब आपके आसपास मौजूद लोग भी आपकी मदद न करें जिन पर आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है. मेरे साथ भी ऐसा हुआ है और इसकी तकलीफ को बयान करना मुश्किल है. लेकिन मैं चाहती हूं कि ऐसी घटनाओं से गुजरने वाले लोग इस बात को जानें कि इसके बारे में खुलकर बोलने से आजादी मिलती है और ऐसा करना सही है.

आपको बता दे, सोमी ने ये भी कहा कि  “यह आपका सच है और सच बोलने से कभी मत डरिए. इस अवसर को व्यर्थ में मत जाने दीजिए. इस अवसर का हम सब को लंबे समय से इंतजार था. अभी आपके पास यह मौका है, आपकी बात सुनी जाए और आपको न्याय मिले. मुझे आप पर पूरा भरोसा है.”

आपको बता दें, भारत में इन दिनों #metoo हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है, राजनीति, फिल्म इंडस्ट्री से लेकर  मीडिया जगत तक के लोगों के चेहरा बेनकाब हो रहे हैं. अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद देश में #metoo कैम्पेन को एक नई पहचान मिली है. कई बड़े सितारे इस कैम्पेन की चपेट में आ चुके हैं. आलोक नाथ,सुभाष घई, विकास बहल, कैलाश खेर, चेतन भगत, साजिद खान जैसे सितारों पर महिलाओं ने सैक्शुअल हैरेसमेंट के आरोप लगाए हैं.

खतरनाक औरत

27 जून, 2018 की सुबह काशीपुर स्टेशन के अधीक्षक ने थाना आईटीआई को फोन कर के
बताया कि बाजपुर ट्रैक पर किसी की लाश पड़ी है. यह सूचना मिलते ही आईटीआई थानाप्रभारी कुलदीप सिंह अधिकारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. जब पुलिस वहां पहुंची, तब वहां कोई भी मौजूद नहीं था. वजह यह थी कि न तो वहां कोई आम रास्ता था और न ही कोई वहां से गुजरा था.
घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस ने लाश और घटनास्थल का मुआयना किया. साथ ही जरूरी काररवाई भी की. मृतक के गले और छाती पर चोट के निशान थे. उस की एक पैर की एड़ी भी कटी हुई थी, जो शायद ट्रेन की चपेट में आने से कट गई थी.

लेकिन लाश देख कर ही पता चल रहा था कि उस की मौत ट्रेन से कट कर नहीं हुई थी. इस का मतलब यह था कि उस की हत्या कर के डैडबौडी वहां फेंकी गई थी, जिस से यह मामला दुर्घटना का लगे.
रेलवे ट्रैक पर लाश मिलने की सूचना मिलते ही आसपास के गांवों के लोग एकत्र होने लगे. घटनास्थल पर काफी लोग जुट गए थे, उन में राजपुरम निवासी छत्तर ने मृतक की पहचान करते हुए पुलिस की बड़ी सिरदर्दी खत्म कर दी.

छत्तर ने मृतक की पहचान अपने जीजा राकेश उर्फ हरकेश के रूप में की. राकेश की हत्या की बात सुन कर उस के घर वाले तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पहुंचे उस के घर वालों से पुलिस ने राकेश के बारे में पूछताछ की और लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय भिजवा दी.

राकेश की लाश के पोस्टमार्टम के समय एक बात चौंकाने वाली पता चली. मृतक के पैरों पर जला हुआ इंजन औयल लगा मिला था. वैसा ही तेल वहां मौजूद मृतक राकेश के मौसेरे भाई इंद्रपाल के कपड़ों पर भी लगा हुआ था. यह पता चलते ही राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को अपने कब्जे में ले कर उसे मारनापीटना शुरू कर दिया.

वैसे भी राकेश के घर वालों को शक था कि उस की हत्या इंद्रपाल ने ही की है. पोस्टमार्टम के दौरान यह बात सामने आते ही उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि राकेश का हत्यारा वही है.

राकेश के घर वालों ने इंद्रपाल को ठोकपीट कर पुलिस के हवाले कर दिया. इंद्रपाल को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने उस से कड़ी पूछताछ की तो पहले तो उस ने साफ इनकार कर दिया कि राकेश की हत्या से उस का कोई लेनादेना नहीं है. लेकिन जब पुलिस ने उस के कपड़ों पर लगे काले औयल का राज पूछा तो वह पुलिस को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया.

आखिरकार उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया. पूछताछ में इंद्रपाल ने बताया कि राकेश की हत्या उस की बीवी माया ने कराई है. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस इंद्रपाल को थाना ले आई. थाने में उस से कड़ी पूछताछ की गई.

पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि राकेश की हत्या में मृतक की बीवी माया, इंद्रपाल निवासी मोहनतखतपुर, थाना कुंदरकी जिला मुरादाबाद, गुड्डू निवासी नगला थाना भगतपुर, जिला मुरादाबाद, रेखा निवासी खड़कपुर काशीपुर, जमुना निवासी खड़कपुर शामिल थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने आरोपियों की धरपकड़ शुरू की तो सभी आरोपी पकड़ में आ गए. गिरफ्तारी के बाद उन से पूछताछ की गई तो राकेश की हत्या की पूरी सच्चाई सामने आ गई.

मेहनतकश राकेश पहुंच गया शहर की ड्योढ़ी पर

बाजपुर, उत्तराखंड के गांव कनौरा निवासी हरकेश उर्फ राकेश की शादी करीब 17 साल पहले गांव परमानंदपुर (गौशाला) निवासी खानचंद्र की बेटी माया से हुई थी. माया देखने में खूबसूरत ही नहीं, तेजतर्रार भी थी.

राकेश के पास जुतासे की थोड़ी सी जमीन थी, जिस में इतनी पैदावार नहीं होती थी कि परिवार की गुजरबसर हो सके. राकेश फैक्ट्रियों में काम कर के परिवार का भरणपोषण करता था. बाद में एक फैक्ट्री में उसे लेबर का ठेका मिल गया तो उस की मेहनत कम हो गई और आमदनी ज्यादा.

शादी के कुछ समय बाद तक राकेश की घरगृहस्थी ठीक से चलती रही. इस बीच पतिपत्नी का तालमेल भी ठीक बैठ गया था. राकेश शुरू से ही अपनी बीवी माया को बहुत प्यार करता था. वह सुबह काम पर चला जाता और देर शाम घर लौटता था. घर आने के बाद वह दिन भर की थकान की वजह से खाना खापी कर जल्दी सो जाता था. उस की बीवी माया को यह पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि जब तक वह जागे, पति उस का साथ दे. लेकिन राकेश की अपनी मजबूरी थी, जो माया के अरमानों पर भारी पड़ती थी.

माया ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. लेकिन उस की हसरतों की उड़ान ऊंची थी. वह शुरू से ही शरारती थी, बनठन कर रहने वाली. राकेश के साथ शादी के बंधन में बंध कर वह ससुराल तो आ गई थी, लेकिन वह अपनी शादी से खुश नहीं थी.

शादी के बाद अनचाहे ही सही, राकेश के साथ रहना उस की मजबूरी थी. जबकि राकेश उसे पा कर खुश था. शादी के बाद वह उसे जी जान से चाहने भी लगा था.

गुजरते समय के साथ माया 3 बच्चों की मां बन गई. उस की बड़ी बेटी का नाम मधु था, उस से छोटा बेटा था आकाश और सब से छोटी थी बेटी प्रीति. राकेश काम के लिए गांव से शहर आता था. जब बच्चे थोड़े बड़े हो गए तो माया का मन शहर में रहने का होने लगा. यह बात मन में आते ही उस ने राकेश से कहा, ‘‘जब तुम्हें शहर में ही काम करना है तो क्यों न हम शहर में थोड़ी सी जमीन खरीद कर छोटा सा मकान बना लें.’’

राकेश अपने घर की स्थिति अच्छी तरह जानता था. उस के सामने पैसे की मजबूरी थी. उस ने इनकार कर दिया तो माया को मन मार कर गांव में ही रहने को मजबूर होना पड़ा.

शादी के कुछ सालों के बाद तक तो माया पत्नी का धर्म निभाती रही, लेकिन जब उस के दिमाग से राकेश की छवि धूमिल होने लगी तो उस का मन और निगाहें इधरउधर भटकने लगीं. जल्द ही उस ने अपने रंगढंग दिखाने शुरू कर दिए. उस ने चोरीछिपे ससुराल में कई लोगों से अवैध संबंध बना लिए. राकेश को इस बात की जानकारी कानोंकान नहीं हुई. हालांकि माया 3 बच्चों की मां बन चुकी थी, फिर भी उस के शरीर की कशिश बरकरार थी.

बदनाम है खड़कपुर

माया की एक बहन की शादी काशीपुर के गांव खड़कपुर निवासी सत्यभान से हुई थी. माया जब भी बहन से मिलने आती तो उस के बच्चे साथ आते थे और मौसी के घर रहने की जिद करते थे. राकेश ने कई बार अपने बच्चों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बच्चे जिद करते कि उन्हें भी मौसी की तरह शहर में ही रहना है.

आखिर बच्चों की जिद के आगे राकेश को झुकना पड़ा. करीब 6 साल पहले राकेश ने अपनी जुतासे की जमीन बेच दी. उस पैसे से उस ने खड़कपुर में 25 गज का प्लौट ले कर मकान बनवा लिया. इस के बाद राकेश अपने बीवीबच्चों के साथ खड़कपुर आ कर रहने लगा.

काशीपुर से लगे गांव खड़कपुर में शुरू से ही मजदूर और छोटामोटा काम करने वाले लोग रहते हैं. इसी वजह से यह इलाका हर मामले में चर्चित है. चाहे कच्ची शराब की बिक्री हो, जुआ हो या फिर देह व्यापार, खड़कपुर में सब मिलता है.

खड़कपुर आने के बाद माया की संगत कुछ ऐसी औरतों के साथ हो गई, जो देह व्यापार से जुड़ी थीं. नतीजतन उस के रहनसहन में काफी बदलाव आ गया. वह बनठन कर घर से निकलती थी. गलत औरतों के साथ माया की संगत देख कर राकेश का दिमाग घूमने लगा. उस ने माया को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने पति की एक नहीं मानी. फलस्वरूप घर में कलह और विवाद रहने लगा, जिस के चलते पतिपत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं.

उधर माया ने खड़कपुर निवासी रेखा, जानकी और कई ऐसी ही औरतों की टोली बना ली, जो देह व्यापार से जुड़ी हुई थीं. उन का सहयोग मिलते ही माया पूरी तरह देह व्यापार में उतर गई.
यह बात राकेश की बरदाश्त के बाहर थी. उस ने इस की शिकायत माया के मायके वालों से की, लेकिन उन लोगों ने माया का साथ देते हुए कहा कि वह बिना वजह उन की बेटी को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. माया ऐसी कतई नहीं है.

मायके वालों का साथ मिलने से माया के हौसले और बुलंद हो गए. राकेश के काम पर निकलते ही वह बच्चों को स्कूल भेज देती और फिर वह अपने धंधे में लग जाती. इस मामले में रेखा और जानकी उस का साथ दे रही थीं.

उन के सहयोग से उस का धंधा जोरों से चल निकला था. आसपास के लोग खड़कपुर में कच्ची शराब पीने आते तो वह अपने दलालों के माध्यम से उन्हें फंसाती और पैसा ले कर उन के साथ मौजमस्ती करती.
करीब 6 महीने पहले गांव तख्तपुर, कुंदरकी, जिला मुरादाबाद का रहने वाला राकेश का मौसेरा भाई इंद्रपाल भी काम की तलाश में खड़कपुर आया और राकेश के घर में रह कर एक फैक्ट्री में काम करने लगा.

राकेश के घर पर रह कर इंद्रपाल कुछ ही दिनों में अपनी भाभी के कर्मों से पूरी तरह से वाकिफ हो गया. जब इंद्रपाल को पता चला कि माया राकेश की गैरमौजूदगी में देह व्यापार करती है तो उस ने माया की दुखती रग पकड़ कर उस के साथ अवैध संबंध बना लिए.

हकीकत जान कर राकेश हुआ खफा

माया के साथ शारीरिक संबंध बनते ही इंद्रपाल ने नौकरी छोड़ दी और माया के लिए ग्राहक लाने लगा. इस के बदले माया उसे कमीशन देती थी, जो उस की मेहनत की कमाई से ज्यादा होता था.
देवरभाभी के बीच यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा, लेकिन जब राकेश को इस की जानकारी मिली तो उस ने इंद्रपाल को खरीखोटी सुना कर घर से भगाने की कोशिश की.

लेकिन इस मामले में माया इंद्रपाल का पक्ष ले कर उस के सामने खड़ी हो गई. जब राकेश को लगा कि देवरभाभी के सामने उस की नहीं चलने वाली तो उस ने बीवी से किनारा कर लिया. साथ ही माया से साफसाफ कह दिया कि आज के बाद वह अपना घर का खर्च भी खुद ही चलाए.

उस दिन के बाद माया राकेश से नफरत करने लगी. वह देह व्यापार की आदी हो चुकी थी, जिसे वह किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं थी. जिस दिन माया और राकेश के बीच तकरार हुई थी, उसी दिन माया ने सोच लिया था कि वह उसे अपने रास्ते से हटा कर रहेगी.

माया ने इंद्रपाल को भी राकेश के विरुद्ध भड़काना शुरू कर दिया था. उस ने इंद्रपाल से साफ कहा कि हमारे घर में जो भी फसाद हो रहा है, वह सब तुम्हारी वजह से है. राकेश को हम दोनों पर शक हो गया है. इसीलिए वह आए दिन मुझे मारतापीटता है. अगर तुम ने समय रहते उस का कोई इलाज नहीं किया तो तुम्हें यह घर छोड़ कर जाना पड़ेगा. माया की बात सुनते ही इंद्रपाल का पौरुष जाग उठा.

माया ने अपने धंधे में आड़े आ रहे पति को मौत की नींद सुलाने के लिए षडयंत्र रचना शुरू कर दिया था. वह राकेश की गैरमौजूदगी में अपनी पूरी मंडली को अपने घर बुला कर शराब पिलाती थी. जब सब शराब के नशे में हो जाते तो माया उन्हें अय्याशी की राह पर ले जाती. इस का नतीजा यह निकला कि माया का घर उस इलाके में चर्चित हो गया, जहां पर लोग शराब और शवाब दोनों का आनंद लेने के लिए आने लगे.
धीरेधीरे माया की करतूत राकेश के सामने आई तो उस ने फिर से माया को मारापीटा. इस के बाद माया ने राकेश से साफ कह दिया कि अगर उसे घर में मुंह बंद कर के रहना है तो रहे वरना रहने के लिए कहीं दूसरी जगह कमरा ले ले. माया ने यह भी कहा कि वह चाहे तो उसे तलाक दे सकता है.
माया ने बदल दिया पति

जब राकेश को लगने लगा कि माया किसी भी तरह सुधरने वाली नहीं है तो उस ने अपने बच्चों की खातिर अपने घर की तरफ से पूरी तरह से आंखें बंद कर लीं. इस के बाद भी माया के दिल को तसल्ली नहीं हुई.
उस के बाद वह इंद्रपाल के साथ उस की बीवी बन कर रहने लगी. इंद्रपाल उस का घर खर्च चलाने के साथसाथ उस की दिली तमन्ना भी पूरी करने लगा था.

इंद्रपाल की पहले से ही गुड्डू से अच्छी दोस्ती थी. उस ने अपने इस धंधे में गुड्डू को भी शामिल कर लिया. उस के बाद इंद्रपाल और गुड्डू दोनों माया, रेखा और जमुना के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाते और अपना कमीशन ले कर मौजमस्ती करते. जब इन लोगों की हरकतें हद पार करने लगीं तो राकेश एक दिन जमुना के पति धर्म सिंह से मिला.

उस ने अपनी बीवी और उस की बीवी जमुना की पोल खोलते हुए बताया कि दोनों ने कई औरतों के साथ मिल कर उस के घर को अय्याशी का अड्डा बना रखा है. यह पता चलने पर धर्म सिंह अपनी बीवी जमुना पर चढ़ बैठा.

उस ने जमुना से मारपिटाई भी की. जब ग्रुप की सभी मेंबरों को पता चला कि फसाद की असली जड़ राकेश है तो सब ने मिल कर उसे मौत के घाट उतारने में माया का साथ देने के लिए रास्ता खोजना शुरू कर दिया.

शराब के सुरूर में एक दिन जब इस मुद्दे पर बात हुई तो सब ने तय किया कि राकेश को ठिकाने लगाने से पहले किसी आरोप में धर्म सिंह को जेल भिजवाया जाए. इस गिरोह से जुड़ी सभी औरतों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. सभी के एकदूसरे के परिवार से घर जैसे संबंध बन गए थे.

इसी का लाभ उठाते हुए पहले से तैयार योजना के तहत रेखा ने किसी काम के बहाने धर्म सिंह को अपने घर बुलाया. रेखा को पता था कि धर्म सिंह शराब पीने का आदी है. इसी का लाभ उठा कर उस ने धर्म सिंह को पहले से घर में रखी कच्ची शराब पिलाई. जब धर्म सिंह नशे में डूब गया तो उस ने घर से बाहर आ कर शोर मचा दिया. रेखा के रोनेचीखने की आवाज सुन कर आसपास के लोग एकत्र हुए तो उस ने बताया कि धर्म सिंह उसे अकेला देख कर घर में घुस आया और उस की इज्जत लूटने की कोशिश करने लगा.

योजना रह गई धरी की धरी

रेखा की बात मान कर उस के पड़ोसी उस के घर के अंदर गए तो धर्म सिंह नशे की हालत में बेसुध सा पड़ा था. उस के कपड़े भी शरीर से उतरे हुए थे. यह देख कर पड़ोसियों ने समझा कि रेखा जो भी कह रही है, वह सच है.

बाद में रेखा अपनी मंडली की सभी सदस्यों और पड़ोसियों को साथ ले कर थाना आईटीआई पहुंची और धर्म सिंह के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश की. लेकिन जब पुलिस ने जांच की तो मामला फरजी पाया गया.

फलस्वरूप धर्म सिंह बच गया. जब यह गिरोह धर्म सिंह को फंसाने में फेल हो गया तो गिरोह के सदस्यों ने राकेश को मौत की नींद सुलाने की योजना पर ध्यान केंद्रित कर दिया. आखिरकार माया और उस के मौसेरे देवर इंद्रपाल ने अपने साथियों के साथ मिल कर राकेश की हत्या की साजिश रच डाली.

माया ने अपने पति राकेश से छुटकारा पाने के लिए सभी साथियों को 50 हजार रुपए देने की बात कही, जबकि इंद्रपाल को राकेश की बाइक देने का वादा किया. योजना बनने के बाद 26 जून को देर रात गुड्डू राकेश को शराब पिलाने के बहाने साथ ले कर रामनगर रोड स्थित गांव रमपुरा पहुंचा. वहां पहुंच कर गुड्डू ने उसे जम कर शराब पिलाई.

राकेश जब नशे में डूब गया तो गुड्डू ने मोबाइल से रेखा को फोन कर दिया. रेखा पहले से ही उस के फोन का इंतजार कर रही थी. रात के लगभग 10 बजे गुड्डू रेखा की मदद से राकेश को बाइक पर बिठा कर कचनाल गाजी गुसाईं स्थित अपने कमरे पर पहुंचा.

माया का देवर इंद्रपाल और जमुना वहां पहले ही पहुंच गए थे और इन लोगों का इंतजार कर रहे थे. ज्यादा नशा होने की वजह से राकेश गुड्डू के कमरे पर पहुंचते ही अर्द्धबेहोशी की हालत में फैल गया.

षडयंत्र हो गया कामयाब

जब सब लोगों को लगा कि राकेश को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाने का इस से बढि़या मौका नहीं मिलेगा तो इंद्रपाल और रेखा ने राकेश के हाथ पकड़े और गुड्डू ने उस का गला दबा दिया. जमुना ने इस काम में गुड्डू की मदद की. कुछ देर छटपटाने के बाद राकेश की मौत हो गई.

राकेश को मौत की नींद तो सुला दिया गया, अब बारी थी उस की लाश को ठिकाने लगाने की. पहले से बनी आगे की योजना के अनुसार राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालना था ताकि मामला रेल से कटने का लगे.

परेशानी यह थी कि जिस जगह गुड्डू का कमरा था, वहां से रेलवे लाइन तक जाने के लिए न तो कोई पगडंडी थी और न कोई रास्ता.

कोई और रास्ता न देख गुड्डू और इंद्रपाल ने राकेश की लाश कंधे पर रखी और रेलवे ट्रैक तक ले गए. वहां जा कर दोनों ने उस की लाश रेलवे ट्रैक के किनारे डाल दी.

रात के अंधेरे में राकेश की लाश को रेलवे लाइन पर डालने के लिए ले जाते वक्त इंद्रपाल का पैर रास्ते में पड़े जले हुए इंजन औयल पर पड़ गया था. बाद में राकेश की लाश को संभालते वक्त वह औयल मृतक राकेश के पैर पर लग गया था.

इंद्रपाल ने अपने कपड़ों पर लगे औयल को गंभीरता से नहीं लिया था. बाद में वही औयल इस केस को खोलने में सहायक बना. राकेश की लाश का एक पैर रेलवे लाइन से लगा हुआ था, इसीलिए ट्रेन आने पर उस के एक पैर की एड़ी कट गई थी.

राकेश की लाश को रेलवे ट्रैक पर डालने के बाद सभी अपनेअपने कमरे पर चले गए. उन्हें पता था कि कल को दिन निकलते ही रेल हादसे में राकेश की मौत की खबर फैल जाएगी.

अगले दिन सुबह इंद्रपाल ने मृतक के भाई कमल के मोबाइल पर फोन कर के बताया कि राकेश कल 2 बजे ड्यूटी पर गया था, लेकिन घर वापस नहीं आया. यह सूचना मिलते ही कमल अपने घर वालों के साथ खड़कपुर पहुंचा. इसी दौरान उसे सूचना मिली कि रेलवे लाइन पर एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. कमल ने रेलवे लाइन पर जा कर देखा तो वह लाश उस के भाई राकेश की थी.

केस के खुल जाने के बाद आईटीआई पुलिस ने राकेश के भाई कमल की तहरीर के आधार पर इंद्रपाल, रामकिशोर, रेखा और जमुना के खिलाफ भादंवि की धारा 147, 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. सभी आरोपी पकड़े जा चुके थे. इन सब को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया. राकेश की मौत और माया के जेल चले जाने के बाद उस के तीनों बच्चे बेसहारा हो गए. पुलिस ने बच्च राकेश के साढ़ू सत्यभान को सौंप दिए. इस मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी कुलदीप सिंह स्वयं ही कर रहे हैं.

इन आरोपियों को पकड़ने वाली टीम में थानाप्रभारी कुलदीप सिंह, एसआई कैलाश चंद, कांस्टेबल विनय कुमार, कांस्टेबल प्रकाश सिंह, कांस्टेबल कुंदन सिंह तथा गंगा सिंह शामिल थे.

नाकाम साजिश

कुलदीप कौर पिछले कई महीनों से परेशान थी, लेकिन परेशानी की वजह उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस का मन हर समय बेचैन रहता था. अजीबोगरीब विचार मन को उलझाए रखते थे. वह कितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करती, मन सकारात्मक सोच की ओर न जा कर नकारात्मक सोच में ही डेरा जमाए रहता था.

बुरे विचारों से जैसे कुलदीप का नाता जुड़ गया था. मन को समझाने और बुरे विचारों से दूर रहने के लिए वह अपना अधिकांश समय गुरुद्वारे में व्यतीत करने लगी थी.

कुलदीप कौर की चिंता का विषय सात समंदर पार पंजाब में बैठी अपनी मां राजविंदर कौर थीं. हालांकि 57 वर्षीय राजविंदर कौर की देखभाल के लिए गांव के घर में उस की भाभी शगुनप्रीत कौर थी, लेकिन भाभी पर उसे भरोसा नहीं था.

कुलदीप के पति मनमोहन सिंह ने उसे कई बार समझाया भी था कि बेकार में चिंता करने से कोई फायदा नहीं है. अगर मन इतना ही परेशान है तो इंडिया का चक्कर लगा आओ. वहां अपनी मां से मिल लेना. लेकिन समस्या यह थी कि उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी. डाक्टरों ने ऐसी हालत में हवाई यात्रा करने से मना कर रखा था. बहरहाल, इसी उधेड़बुन में कुलदीप कौर के दिन गुजर रहे थे.

भरापूरा परिवार था बलदेव सिंह का

कुलदीप कौर मूलत: गांव बुट्टर सिविया, थाना मेहता, जिला अमृतसर, पंजाब की रहने वाली थी. उस के जीवन के 16 बसंत भी अपने गांव बुट्टर में ही गुजरे थे. गांव में रहते ही उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखे थे. कुलदीप का छोटा सा परिवार था.

पिता बलदेव सिंह और मां राजविंदर कौर के अलावा उस के 2 भाई थे गगनदीप सिंह और सरबजीत सिंह. तीनों भाईबहनों का आपस में बहुत प्यार था. वे तीनों बहनभाई कम दोस्त ज्यादा लगते थे. आपस में इन की कोई बात एकदूसरे से छिपी नहीं रहती थी.

बलदेव सिंह जाट सिख किसान थे. उन के पास खेती की ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जितनी थी वह परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए काफी थी. इसीलिए बलदेव सिंह ने अपने तीनों बच्चों को सिर उठा कर आजादी से जीना सिखाया था.

उन्होंने तीनों बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ाया था. बच्चों के लिए अभी वह और भी बहुत कुछ करना चाहते थे, पर साल 2002 में उन की मौत हो गई.

बलदेव सिंह की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारियां राजविंदर कौर के कंधे पर आ गई थीं. उस वक्त उन का बड़ा बेटा गगनदीप जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था. वह मां का हाथ बंटा कर उस का सहारा बन गया. घर की गाड़ी फिर से अपनी स्पीड से दौड़ने लगी थी.

साल 2008 इस परिवार के लिए अच्छा साबित हुआ. इसी साल कुलदीप कौर के लिए एक अच्छे परिवार का रिश्ता आया, लड़के का नाम मनमोहन सिंह था. वह अच्छे घर का पढ़ालिखा गबरू जाट था और आस्ट्रेलिया में अपना कारोबार करता था. राजविंदर कौर को मनमोहन और उस का परिवार कुलदीप के लिए पसंद आया. कुलदीप को भी मनमोहन सिंह पसंद था. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद सन 2008 में कुलदीप कौर और मनमोहन सिंह की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. इस शादी से सभी लोग खुश थे.

अचानक हो गई गगनदीप की मौत

खुशी का माहौल था, पर कहीं अनहोनी मुंह पसारे इस परिवार की खुशियों को लीलने के लिए घात लगाए बैठी थी. कुलदीप की शादी के कुछ दिनों बाद ही इस परिवार को तब बड़ा झटका लगा, जब अचानक गगनदीप की मौत हो गई.

गगनदीप की मौत का सदमा उस की मां राजविंदर कौर और उस के छोटे भाईबहन को भीतर तक तोड़ गया. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे नाजुक मौके पर वह अपनी मां और छोटे भाई सरबजीत को अकेला छोड़ कर पति के साथ आस्ट्रेलिया जाए या यहीं रह कर उन का साथ दे.
संसार का नियम है, यहां लोग आतेजाते हैं, सब कुछ समय की गति से चलता रहता है. जबकि समय का चक्र और संसार के कामकाज कभी नहीं रुकते. वक्त का मरहम बड़े से बड़ा घाव भर देता है. बहरहाल, अपनी मां और भाई को दिलासा दे कर कुलदीप कौर अपने पति मनमोहन सिंह के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. कुलदीप को आस्ट्रेलिया गए 10 साल बीत गए थे.

इस बीच वह सरताज सिंह और सम्राट सिंह 2 बच्चों की मां बन गई थी. उस के पीछे मायके में छोटे भाई सरबजीत सिंह की भी शगुनप्रीत कौर के साथ शादी हो गई थी. सरबजीत भी 2 बच्चों बेटी मनतलब कौर और बेटे वारिसदीप सिंह का बाप बन गया था.

कुलदीप की अपनी मां और भाई से हर हफ्ते फोन पर बातें होती रहती थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में मशगूल थे कि साल 2015 की एक मनहूस खबर ने कुलदीप को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. इस घटना से राजविंदर कौर की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. उसे अपने पति और बड़े बेटे गगनदीप की मौत का इतना दुख नहीं हुआ था, जितना दुख सरबजीत की मौत का हुआ.

सरबजीत की मौत बड़े रहस्यमय तरीके से हुई थी. वह रात को खाना खा कर ऐसा सोया कि सोता ही रह गया. सरबजीत अपने परिवार का एकमात्र सहारा था. उस की मौत से परिवार की गाड़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई.

वक्त ने ताजा जख्मों पर एक बार फिर से मरहम लगाया. राजविंदर कौर ने अपने आप को पूरी तरह से अकेला मान कर जीना सीख लिया था. समय का चक्र फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगा. कुलदीप मां को फोन करकर के सांत्वना देती रहती थी. सैकड़ों मील दूर बैठी कुलदीप और कर भी क्या सकती थी. इसी तरह दिन गुजरते गए थे और साल 2016 आ गया.
दूसरे बेटे की मौत से टूट गई मां

कुलदीप कौर ने महसूस किया कि सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव से उस की मां के जो फोन आते थे, वह काफी मायूसी भरे होते थे. सुन कर कुलदीप को ऐसा लगता था, जैसे उस की मां बहुत परेशान और दुखी हैं. उस ने बहुत बार मां से इस बारे में पूछा भी था, पर मां ने उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. वह बहुत दुखी लग रही थीं. ज्यादा कुरेद कर पूछने पर राजविंदर ने सिर्फ इतना ही बताया कि पिछले कुछ समय से शगुन का चालचलन ठीक नहीं है.

कुलदीप कौर ने जब शगुन से इस बारे में बात की तो उस ने बताया, ‘‘दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. बीजी को एक तो बेटे की मौत का सदमा है, ऊपर से अकेलापन परेशान करता है. कभीकभी शुगर की बीमारी की वजह से भी उन्हें घबराहट होने लगती है. आप चिंता न करें, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शगुन की गोलमोल बातें कुलदीप की समझ से बाहर थीं. वह अच्छी तरह जानती थी कि शगुन बहुत चालाक है. वह सच्ची बात कभी नहीं बताएगी. इसीलिए कुलदीप ने अपने गांव के कुछ खास लोगों को फोन कर के विनती की कि वे उस के घर हो रहे क्रियाकलापों पर नजर रखें. गांव के जानकार लोगों ने कुलदीप कौर की बात मान कर राजविंदर के घर पर नजर रखनी शुरू कर दी.

बाद में उन्होंने कुलदीप को बताया कि उस की मां के घर में सामने से तो सब कुछ ठीक नजर आता है. शगुन लोगों के सामने तो राजविंदर कौर का बहुत खयाल रखती है. बाकी उन की पीठ पीछे घर में सासबहू का आपस में कैसा बर्ताव है, कुछ कहा नहीं जा सकता. बहरहाल, ऐसा जवाब सुन कर कुलदीप कौर मन मसोस कर रह जाती थी और अपनी मां की सलामती की दुआ करती थी.

29 अक्तूबर, 2016 को शगुन ने कुलदीप कौर को आस्ट्रेलिया फोन कर के खबर दी कि बीजी का देहांत हो गया है. शगुन ने मौत की वजह राजविंदर का शुगर लेवल कम हो जाना बताया था. उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी, डाक्टरों ने उसे यात्रा के लिए मना कर रखा था सो अपने घर के एकांत में कुलदीप ने छाती पीट कर मां की मौत का मातम मना लिया. अब उस के मायके के परिवार में सिवाय उस के कोई और नहीं बचा था.

राजविंदर की मौत के बाद 2-4 बार शगुन के फोन उसे आए थे, पर वह बिना सिरपैर की बातें ही किया करती थी. एक बात थी जो हर समय कुलदीप को परेशान कर रही थी. उसे हर समय ऐसा लगता था जैसे उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं थी. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घटी थी, पर क्या हुआ और कैसे यह बात उस की समझ में नहीं आती थी.

मां सरबजीत की मौत के बाद शगुन गांव की कोठी और सारी जमीन की मालकिन बन गई थी. कुलदीप अकसर यह भी सोचा करती थी कि कहीं उस की मां की मौत किसी षडयंत्र की वजह से तो नहीं हुई.
बहरहाल, कुलदीप ने एक बार फिर से अपने गांव के भरोसेमंद लोगों से अपनी मां की मौत से परदा उठाने के लिए विनती की. इस बात का पता लगाने में गांव के कुछ खास लोगों को पौने 2 साल का समय लग गया.

जुलाई 2018 में कुलदीप कौर को सूचना मिली थी कि उस की मां राजविंदर कौर की मौत में उस की भाभी शगुन का हाथ था. यह सुन कर वह ज्यादा हैरान नहीं हुई, क्योंकि उसे शगुन पर शुरू से ही शक था. यह तो दूर का मामला था, अगर वह कहीं पास होती तो कब की अपनी मां की मौत से परदा उठा देती.
खैर, अब भी देर नहीं हुई थी और अब वह पूरी तरह से यात्रा करने लायक थी. बीती जुलाई के दूसरे सप्ताह में वह आस्ट्रेलिया से भारत अपने गांव पंजाब पहुंच गई. जब अपने मायके के घर पहुंच कर उस ने वहां का नजारा देखा तो हैरान रह गई. उस की मां के घर 2 अनजान आदमी बैठे शगुन के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

गुस्से से बिफरते हुए जब कुलदीप कौर ने पूछा, ‘‘भाभी, ये लोग कौन हैं?’’ तो शगुन ने मिमियाते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, तुम्हारे भाई की मौत के बाद ये दोनों खेतों में काम करने में मदद करते हैं.’’

कुलदीप को शक हुआ भाभी पर

कुलदीप अच्छी तरह जानती थी कि शगुन जो बता रही है, बात वह नहीं है. पर उस वक्त उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा. कुलदीप के आने की वजह से वे दोनों व्यक्ति वहां से चले गए. अगले दिन सुबह उठ कर कुलदीप नहाईधोई और गुरुद्वारे चली गई.

अरदास के बाद वह अपने मौसा हरदयाल सिंह को साथ ले कर सीधे एसएसपी (देहात) अमृतसर परमपाल सिंह के पास जा पहुंची. कुलदीप ने अपनी मां की हत्या का शक जताते हुए उन्हें बताया कि मां की मौत में उस की भाभी और कुछ अन्य लोगों का हाथ है.

एसएसपी परमपाल सिंह ने कुलदीप द्वारा दिए प्रार्थनापत्र पर नोट लिख कर उसे संबंधित थाना मेहता भेज दिया. साथ ही उन्होंने थानाप्रभारी अमनदीप सिंह को फोन कर आदेश दिया कि इस मामले की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझाएं. कुलदीप कौर ने उसी दिन थानाप्रभारी अमनदीप से मिल कर आस्ट्रेलिया जाने से ले कर अपनी गैरहाजिरी में अपने भाई और मां की मौत का सारा हाल विस्तार से कह सुनाया.

कुलदीप कौर की पूरी बात सुनने के बाद अमनदीप सिंह ने तत्काल अपने खास मुखबिरों को शगुन और उस के साथियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया. जल्दी ही उन्हें रिपोर्ट भी मिल गई.

एसएसपी के आदेश पर उन्होंने कुलदीप कौर की शिकायत को आधार बना कर उसी दिन यानी 30 जुलाई, 2018 को राजविंदर कौर की हत्या का मुकदमा भादंसं की धारा 302, 201, 120बी और 34 पर दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी.

अमनदीप सिंह ने उसी दिन एएसआई कमलबीर सिंह, हवलदार जतिंदर सिंह, महिंदरपाल सिंह, कांस्टेबल महकप्रीत सिंह और लेडी हवलदार हरजिंदर कौर को साथ ले कर बुट्टर गांव पहुंचे और देर शाम शगुनप्रीत कौर और उस के आशिक सतनाम सिंह को हिरासत में ले लिया.

हत्या के इस मामले का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह भाग निकला था. संभवत: उसे पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. जसबीर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी, पर वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस ने की काररवाई

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने जब शगुनप्रीत और सतनाम सिंह से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उसी दिन राजविंदर कौर की हत्या के आरोप में शगुन और सतनाम सिंह को अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में राजविंदर की मौत की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी—
शगुनप्रीत कौर बचपन से ही दिलफेंक और महत्त्वाकांक्षी थी. शादी से पहले अपने गांव में उस के कई युवकों के साथ नाजायज संबंध थे. अपने पति सरबजीत की मौत से पहले भी उस का गांव के कई युवकों के साथ नैनमटक्का चल रहा था, पर परदे के पीछे. क्योंकि तब उसे अपने पति का डर था.
लेकिन पति की मौत के बाद उस ने सरेआम यारियां जोड़नी शुरू कर दी थीं. अब उसे रोकनेटोकने वाला नहीं था. शगुन के अपने गांव के ही एक युवक सतनाम सिंह के साथ नाजायज संबंध बन गए थे. सतनाम आवारा आदमी था और नशीली वस्तुएं बेचता था.

शगुन ने प्रेमी के साथ बनाई योजना

जसबीर सिंह सतनाम के नशे के धंधे में उस का भागीदार था. उसे जब शगुन और सतनाम के संबंधों का पता चला तो बहती गंगा में हाथ धोने के लिए वह भी मचलने लगा. शगुन को इस बात से कोई ऐतराज नहीं था, बल्कि वह खुश थी कि उस के 2-2 चाहने वाले हैं. सरबजीत की मौत के बाद सतनाम सिंह शगुन के ही घर पर रहने लगा था.

यह बात राजविंदर को मंजूर नहीं थी. सतनाम के वहां रहने का वह विरोध करती थी. शगुन अपनी मनमानी पर उतर आई थी. उसे न तो सास का कोई डर था और न शरम. वह तो बस हवा में उड़ी चली जा रही थी.
जब राजविंदर कौर का विरोध बढ़ गया तो शगुन ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस के 2 फायदे थे, एक तो राजविंदर की मौत के बाद उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहता और दूसरे सारी जमीनजायदाद उस के नाम हो जाती.

यह अलग बात थी कि राजविंदर की मौत के बाद सब कुछ उसे ही मिलने वाला था, पर उसे सब्र नहीं था. दूसरे उसे यह भी डर था कि मरने से पहले राजविंदर जायदाद किसी और के नाम न कर जाएं.
शगुनप्रीत और उस के आशिक सतनाम सिंह ने मिल कर राजविंदर कौर की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने गांव के ही जसबीर सिंह को चुना और उसे ढाई लाख रुपए देने का वादा कर के तैयार कर लिया.

अपनी योजना के अनुसार, 28 अक्तूबर 2016 की आधी रात को तीनों ने मिल कर सोते समय राजविंदर कौर को गला दबा कर मार डाला. अगली सुबह योजना के तहत शगुन ने कुछ देर गांव वालों के सामने राजविंदर की बीमारी का नाटक रचा और बाद में शोर मचा कर यह खबर फैला दी कि शुगर लेवल कम होने की वजह से राजविंदर की मौत हो गई है.

इतना ही नहीं, वह इतनी शातिर निकली कि रिश्तेदारों को बताए बिना ही जल्दबाजी में गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर सास का अंतिम संस्कार भी करा दिया. बाद में उस ने कुलदीप कौर को भी फोन कर के इस की खबर दे दी थी.

राजविंदर कौर की हत्या की योजना में शगुन और सतनाम सिंह ने ढाई लाख रुपए की सुपारी दे कर जसबीर को अपने साथ शामिल तो कर लिया था, पर हत्या के बाद उन्होंने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया था.

जसबीर काफी समय तक उन से पैसे मांगता रहा, जब उन्होंने पैसे देने से बिलकुल इनकार कर दिया तो गुस्से में आ कर उस ने गांव के कुछ लोगों के सामने इस बात का खुलासा कर दिया. गांव वाले पहले से ही तीनों पर नजर रखे हुए थे, सो उन्होंने यह खबर फोन द्वारा कुलदीप को दे दी.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने शगुनप्रीत कौर और उस के प्रेमी सतनाम सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. इस अपराध का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह फरार था.

पुलिस सूत्रों पर आधारित

कुदरती कहर के बाद अब नौकरशाही का कहर

आमतौर पर शहरों की बनावट ऐसी होती है कि बरसात के बाद अगर बाढ़ आ जाए तो भी घरों में पानी कम घुसता है. मगर इस बार केरल में जिस तरह बाढ़ आई और जिस तरह लाखों की गिनती में घरों की पहली मंजिलें डूब गईं, बहुत कम होता है. इस बाढ़ ने अरबों का नुकसान तो किया ही, लाखों की यादों और धरोहरों को भी पानी में बहा दिया.

अच्छे खातेपीते लोगों को न केवल रिलीफ कैंपों में हफ्ते गुजारने पड़े, उन के पीछे उन का सामान भी भीगता रहा और उस पर मिट्टी जमती रही. पानी उतरने के बाद जो मुसीबत अब केरल की औरतें झेल रही हैं वह है हर चीज को साफ करना और अंदर तक घुस गए पानी और मिट्टी को निकालना. साथ ही घरों की नींवें कमजोर न हो गई हों, इस का भी खयाल रखना.

केरल में लोगों के घरों में फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, माइक्रोवेव आम बातें थीं, क्योंकि वहां खाड़ी के देशों में नौकरी की वजह से पैसा बहुत है. केरलवासी वैसे भी मेहनती हैं और शिक्षित भी. उन के संपन्न घरों पर अचानक आई बाढ़ ने धावा बोल डाला और शहर के शहर पानी में डूब गए.

घरों की साफसफाई का चैलेंज इसलिए बड़ा है, क्योंकि इस तरह के फ्लड रोज नहीं आते और लोगों को मालूम ही नहीं होता कि क्या करें कैसे करें. मीडिया बताने की कोशिश कर रहा है कि साफसफाई कैसे करें. पर घर की हर चीज को निकालना, सुखाना और साफ करना एक आफत का काम है और आसान नहीं है.

लोगों की यादों के अलबम, फोटो, पत्र, किताबें, उपहार, सजावटी चीजें भी बाढ़ में नष्ट हो गई हैं और उन का गम पैसे से ज्यादा होता है. प्रौपर्टी के कागजात, टैक्सों की फाइलें, लाइसैंस, आईडी पू्रफ जैसे डौक्यूमैंटों का गल जाना तक नई आफत है, क्योंकि डुप्लिकेट तो डुप्लिकेट ही होता है और उसे पाने के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ेगी. ऐसा नहीं लगता कि नौकरशाही सिर्फ बाढ़ की वजह से उदार हो जाएगी और हरेक का काम बिना पैसे लिए रातदिन लग कर पूरा कर देगी.

जहां सरकार ने कागज रखे थे अगर वे भी पानी में भीग कर नष्ट हो गए होंगे तो उस का खमियाजा भी नागरिकों को ही भुगतना पड़ेगा, क्योंकि सरकार तो हर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेगी. बाढ़ के बाद सरकारी कर्मचारी ज्यादा काम करने लगें ताकि जनता को राहत मिल सके, इस के आसार तो बहुत कम हैं.

बाढ़ का हादसा ऐसा है जो महीनोंसालों तक परेशान करता रहेगा घरों को भी, व्यापारों को भी. शायद सरकारी कर्मचारी इस का अच्छा लाभ उठाएंगे. राहत में मिली सामग्री की हेराफेरी से और पिछली व नई हेराफेरियों को छिपाने में बाढ़ से ज्यादा अच्छा और क्या हो सकता है?

प्रमोशन में रिजर्वेशन : फायदे से ज्यादा वोट बैंक की चिंता

रिजर्वेशन का मकसद भले ही दलित और पिछड़े समाज की तरक्की से जुड़ा रहा हो पर अब यह वोट बैंक की राजनीति में बदल चुका है. यही वजह है कि रिजर्वेशन शब्द का नाम आते ही हल्ला मचना शुरू हो जाता है.

रिजर्वेशन को मानने वाले अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए दलित और पिछड़े तबके को डराने लगते हैं कि अब रिजर्वेशन के खत्म करने की साजिश रची जा रही है. रिजर्वेशन की खिलाफत करने वाले भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए लोगों को डराने लगते हैं कि इस से अगड़ी जातियों का नुकसान हो रहा है, उन की तरक्की में यह बेडि़यों की तरह पैर में पड़ा हुआ है.

विभिन्न अदालतों के फैसले रिजर्वेशन की अलगअलग श्रेणियों को प्रभावित करने की हालत में होते हैं. प्रमोशन में रिजर्वेशन भी रिजर्वेशन का एक ऐसा ही हिस्सा है. दलित वोटों के लिए मजबूर हो रही केंद्र सरकार की बातों को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके गोयल की अगुआई वाली वैकेशन बैंच ने कहा कि सरकार कानून के हिसाब से प्रमोशन में रिजर्वेशन दे सकती है.

इस से पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में पुराने हालात को बनाए रखने को कहा था. कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार अब प्रमोशन में रिजर्वेशन दे सकती है.

केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जो खुलेतौर पर अगड़ी जातियों की पार्टी मानी जाती है. ऐसे में उस के राज में रुके पड़े प्रमोशन में रिजर्वेशन देने के फैसले का विरोध उस के अपने ही लोगों के हाथों होने लगा. भाजपा अपने नेताओं के जरीए अपनी बात पुश्तैनी सवर्ण वोट बैंक के सामने साफ कर रही है.

प्रमोशन में रिजर्वेशन

प्रमोशन में रिजर्वेशन को ले कर दोनों ही खेमे अपनीअपनी बात कह रहे हैं. सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के संरक्षक शैलेंद्र दुबे कहते हैं, ‘‘सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने इंद्रा साहनी मुदकमे में 1992 में साफ कहा था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन पूरी तरह से असंवैधानिक है. इसी के बाद वोट बैंक की राजनीति के चलते 17 जून, 1995 को संविधान में संशोधन कर के कांग्रेस सरकार ने प्रमोशन में रिजर्वेशन को लागू किया था.

‘‘अब केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने जो आदेश जारी किया है वह सुप्रीम कोर्ट के 2 आदेशों के अनुपालन को ले कर है. सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को आदेश दिया था कि रिजर्व्ड मुलाजिमों को रिजर्व्ड वर्ग में ही प्रमोशन में रिजर्वेशन दे दिया जाए और अनरिजर्व्ड मुलाजिमों को अनरिजर्व्ड वर्ग में.’’

केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बताते हुए शैलेंद्र दुबे आगे कहते हैं, ‘‘प्रमोशन में ऐसे रिजर्वेशन सीनियरिटी के बगैर होंगे. 5 जून को सुप्रीम कोर्ट ने फिर आदेश दिया कि केंद्र सरकार नियमों के मुताबिक प्रमोशन दे तो अदालत को उस पर एतराज नहीं होगा. केंद्र सरकार के आदेश को अगर प्रदेश सरकार लागू करती है तो पिछले आदेशों से रिवर्ट किए गए दलित मुलाजिम अभी अपने पुराने पदों पर बहाल नहीं हो पाएंगे, क्योंकि एम. नागराज के मामले में संविधान पीठ का फैसला आना बाकी है.’’

आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक अवधेश वर्मा कहते हैं, ‘‘केंद्र सरकार द्वारा प्रमोशन में रिजर्वेशन के लिए जारी आदेश का उत्तर प्रदेश के दलित मुलाजिमों को तभी फायदा मिलना मुमकिन हो पाएगा जब रिजर्वेशन अधिनियम की धारा-3 (7) की 15 नवंबर, 1997 से बहाली होगी. इस के लिए जरूरी है कि केंद्र सरकार अपने आदेश में उत्तर प्रदेश के संशोधन जारी करे या फिर उत्तर प्रदेश सरकार इस बारे में शासनादेश जारी करे.’’

भाजपा की बहराइच से सांसद सावित्रीबाई फूले कहती हैं, ‘‘प्रमोशन में रिजर्वेशन के लिए लोकसभा में चर्चा हो इस के बाद उस को इस तरह से बनाया जाए जिस से आने वाले समय में इस में कोई फेरबदल न किया जा सके.’’

मायावती को घेरा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के इतर भाजपा इस मसले में बढ़ते शोर के लिए बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को सब से ज्यादा जिम्मेदार मान रही है कि वे प्रमोशन में रिजर्वेशन के मसले से दलित समाज में अपनी घुसपैठ बढ़ाना चाहती हैं. भाजपा के बड़े नेताओं ने पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है पर भाजपा में पिछड़े वर्ग के नेता और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह कहते हैं, ‘‘रिजर्वेशन का विरोध करने वालों को थप्पड़ मारो.’’

प्रमोशन में रिजर्वेशन का मसला बसपा नेता मायावती और सपा नेता अखिलेश यादव के बीच मतभेद का मसला भी रहा है. मई, 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने जब प्रमोशन में रिजर्वेशन पर रोक लगाई थी तब उस समय के मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने प्रमोशन में रिजर्वेशन की व्यवस्था को खत्म कर दिया था. अखिलेश और मायावती की नईनई दोस्ती के मद्देनजर भाजपा नेता अखिलेश यादव से प्रमोशन में रिजर्वेशन मसले पर उन के रुख को साफ करने को कह रहे हैं.

अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष डाक्टर लालजी प्रसाद निर्मल कहते हैं, ‘‘यह विधिसम्मत फैसला है. इस को खत्म करने की पटकथा खुद बसपा नेता मायावती ने साल 2007 में तब लिखी थी जब वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. उन्होंने तृतीय ज्येष्ठता नियमावली के नियम 8 में अनुसूचित जाति के मुलाजिमों को परिणामी ज्येष्ठता नियम बनाते समय साल 2006 में एम. नागराज केस में दिए गए मानकों के मुताबिक काम नहीं किया था.

‘‘एम. नागराज के केस में कहा गया था कि प्रतिनिधित्व की अपर्याप्ता, पिछड़ेपन की स्थिति और काम की दक्षता पर पड़ने वाले असर वगैरह का आकलन किया जाए. 2007 में मायावती सरकार के समय बिना इन आंकड़ों के ही परिणामी ज्येष्ठता की नियमावली जारी कर दी गई थी. इस के कारण ही बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को असंवैधानिक करार दिया. जिस समय अखिलेश यादव ने दलितों को डिमोट किया उस समय भी मायावती चुप रही थीं.’’

निशाने पर दलित

डाक्टर लालजी प्रसाद निर्मल कहते हैं, ‘‘मायावती ने बिना कमेटी बनाए प्रमोशन में रिजर्वेशन का फार्मूला लागू कर दिया जिस का खमियाजा बाद में दलितों को भुगतना पड़ा था. मायावती की ही तर्ज पर अखिलेश यादव ने भी बिना कमेटी बनाए दलित मुलाजिमों को रिवर्ट कर दिया था. दोनों ही गलत थे. दोनों को ही दलितों की फिक्र नहीं थी.

‘‘सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि सरकारें चाहें तो प्रमोशन में रिजर्वेशन दे सकती हैं. इस के बाद केंद्र ने आदेश जारी कर दिया है. ऐसे में साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में दलितों को प्रमोशन में रिजर्वेशन दिलवाने का काम कर रहे हैं.

‘‘केंद्र सरकार द्वारा आदेश जारी होने के बाद प्रदेश सरकार को नियमों में बदलाव कर के कैबिनेट में पास कराना होगा. साथ में कमेटी बनानी होगी जो कि एम. नागराज केस के आदेश में लगी शर्त के मुताबिक आंकड़े जुटा सके.’’

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘प्रमोशन में रिजर्वेशन एक तरह से वोट बैंक के लिए इस्तेमाल हो रहा है. मायावती से ले कर अखिलेश और अब भाजपा इस को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है. भाजपा से दलितों का मोह भंग हो रहा है. भाजपा ने दलितों को नवहिंदुत्व का जो पाठ पढ़ाया था अब वे भूल चुके हैं. यही वजह है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में उपचुनाव हार रही है.

‘‘साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सपाबसपा की दोस्ती को देखते हुए भाजपा परेशान है. अब वह दलित मुद्दों को उठाने की कोशिश कर रही है. प्रमोशन में रिजर्वेशन ही नहीं, बल्कि ऐसे बहुत से मुद्दे देखने को मिलेंगे जिन से भाजपा दलितों को अपनी ओर खींचने का काम करेगी.’’

बैकफुट पर भाजपा

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दलित नेता रामविलास पासवान, सवर्णों के घोर विरोधी उदित राज और रामदास अठावले को पार्टी से जोड़ा और जीत के बाद सांसद मंत्री बने. इस के बाद भी भाजपा में अगड़ों की एक अलग सोच और असर कायम रहा. नीतिगत फैसलों में इन की अहमियत कम रही. ऐसे में भाजपा की दलित विरोधी इमेज बरकरार रही.

बिहार में विधानसभा चुनाव के समय रिजर्वेशन के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का बयान आया तो वह मुद्दा बन गया. धीरेधीरे भाजपा में दलित मुद्दों को भगवा सोच से जोड़ कर प्रचार होने लगा.

असल में भाजपा और संघ की सोच हमेशा से सनातनी विचारधारा की रही है, जिस में दलित ही नहीं पिछड़ों को भी कोई अधिकार नहीं दिए गए हैं.

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा पर दबाव बनाया जाने लगा कि अब वह अगड़ी जातियों के लिए कुछ करे. समाज का अगड़ा वर्ग यह मानता है कि उस की खराब हालत की वजह दलितों को मिलने वाला रिजर्वेशन है, जिस की वजह से उन के बच्चों को सरकारी नौकरियां नहीं मिल रही हैं.

सरकारी नौकरियों का यही लालच अगड़ों और दलितों के बीच खाई का काम कर रहा है. दलित और पिछड़े भी अब अपने हकों को ले कर जागरूक हो गए हैं. ऐसे में वे अब भाजपा संगठन में अपने लिए ज्यादा हक मांग रहे हैं.

साल 2019 के चुनाव देख कर भाजपा अपने संगठन में ऐसे बदलाव कर सकती है. उत्तर प्रदेश में भी ऐसे ही कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे. लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस भाजपा को संविधान विरोधी साबित करने में जुटी है.

 हो रही कोशिश

उत्तर प्रदेश में सपाबसपा के एकजुट होने के असर से बचने के लिए पार्टी में दलित असर को दिखाने के लिए भाजपा कई बदलाव कर रही है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दलित के घर खाना खाना उस का एक हिस्सा है. इस के साथ ही साथ पूर्व डीजीपी ब्रजलाल को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बना कर राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दलित मित्र का दर्जा देने वाले अंबेडकर महासभा के अध्यक्ष डाक्टर लालजी प्रसाद निर्मल को अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम का अध्यक्ष बना दिया गया. अति पिछड़ी जाति से आने वाले भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष बाबूराम निषाद को पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष पद पर नामित किया गया.

इसी तरह दूसरे कई दलित नेताओं को विभिन्न निगमों और आयोग में पद दिए जाएंगे. भाजपा तकरीबन 65 फीसदी पद पिछड़ों और दलितों को देने का काम करेगी. सपाबसपा के वोट बैंक में सेंधमारी करने के लिए भाजपा ने मिशन 2019 के तहत यह योजना बनाई है.

भाजपा में जातीय खेमेबंदी कई लैवलों पर चल रही?है. ऐसे में चुनाव में दलित और पिछड़े भाजपा का कितना साथ देंगे, यह देखने वाली बात होगी. अगड़ों में ठाकुर और ब्राह्मण अपने हितों को ले कर आमनेसामने हैं. ऐसे में दलित पिछड़ों से बचे पदों पर ब्राह्मण नेता अपने दावे ठोंक रहे हैं.

अहम की लड़ाई में भाजपा के लिए सब से आसान रास्ता यही है कि चुनावी मुद्दा जाति की जगह धर्म पर टिक जाए तभी पार्टी जातीय विभाजन से होने वाले नुकसान को रोक पाएगी. मुख्यमंत्री पद पर ठाकुर बैठाने के बाद ब्राह्मण के रूप में प्रदेश अध्यक्ष डाक्टर महेंद्र नाथ पांडेय को बनाया गया. इस के बाद भी आपसी तालमेल नहीं बन पा रहा है.

सत्ता की सीढ़ी हैं दलित

असल में दलितों के साथ खाना खाना किसी बराबरी की निशानी नहीं है. यह चुनावी जरूरत है. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में दलित सत्ता की सब से मजबूत सीढ़ी हैं. देशभर में तकरीबन 17 फीसदी से ज्यादा दलित हैं.

आंकड़ों के आधार पर बात करें तो 84 लोकसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. 47 सीटें दूसरी पिछड़ी जातियों के लिए रिजर्व्ड हैं, जो माली और सामाजिक रूप से दलितों के ही बराबर हैं.

पूरे देश की 4120 विधानसभा सीटों में से 607 अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व्ड हैं. दलितों के लिए सब से ज्यादा 17 लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश में रिजर्व्ड हैं. इस के बाद बिहार में 6, महाराष्ट्र में 5, राजस्थान, मध्य प्रदेश में 4-4, कर्नाटक में 5, पश्चिम बंगाल में 10 और आंध्र प्रदेश में 7 सीटें रिजर्व्ड हैं.

आबादी के हिसाब से प्रदेशवार दलितों के हालात देखें तो पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी, बिहार में 17 फीसदी, मध्य प्रदेश में 15 फीसदी, झारखंड में 12 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 23 फीसदी, पंजाब में 32 फीसदी, हरियाणा में 20 फीसदी, राजस्थान और कर्नाटक में 17 फीसदी दलित आबादी है.

पहले दलित वोटर सब से ज्यादा कांग्रेस को पसंद करते थे. साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले उसे तकरीबन 30 फीसदी दलित वोट मिलते थे, तकरीबन 20 फीसदी बसपा को मिलते थे. भाजपा के हिस्से में  14 फीसदी तक वोट जाते थे.

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के पक्ष में 24 फीसदी दलित वोट गए. इस ने भाजपा को देश में बहुमत की सरकार दिलाई. भाजपा के कोर वोटरों के साथ दलित वोटरों का तालमेल नहीं बन पाया. भाजपा ने कई दलित नेताओं और संगठनों को अपनी पार्टी के साथ लिया. चुनाव के बाद दलित मुद्दों पर यह संगठन और नेता चुप हो गए.

ऐसे में हर प्रदेश में दलितों की आवाज बन कर नएनए लोग सामने आए और मजबूती के साथ अपनी बात रखी. नए उभरे दलित संगठनों में भीम सेना, दलित युवा दल, दलित फैडरेशन, दलित कारवां, अंबेडकर आर्मी और दलित राइजिंग खास हैं.

दलितों में उभरे केंद्र

भीम सेना ने उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में काम किया. सहारनपुर में भड़की जातीय हिंसा में इस के प्रमुख चंद्रशेखर रावण का नाम सामने आया. वह दलित राजनीति के केंद्र बिंदु में आ गया, वहीं गुजरात में जिग्नेश मेवाणी का नाम उभरा.

इस तरह से दलित चिंतक नेताओं और अगुआ में नएनए नाम उभरे. इस की वजह यह थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में दलितों के साथ एक के बाद एक घटनाएं घटीं पर केंद्र सरकार ने कोई मदद नहीं की.

दलित ऐक्ट में संशोधन के सवाल पर दलित नाराज हो गए. बारबार यह बात उठ रही है कि सरकार रिजर्वेशन खत्म करना चाहती है. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जातीय हिंसा हुई. भीमा कोरेगांव में ऐसा ही टकराव हुआ. देश के कई राज्यों में अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने की घटनाएं घटीं. इन घटनाओं और दलितों की सोच ने भाजपा को परेशानी में डाल दिया है.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘भाजपा ने धर्म के नाम पर दलितों को जोड़ कर पिछले लोकसभा चुनाव में वोट तो हासिल किए, पर समाज में उसे बराबरी का हक नहीं दिला सकी. भाजपा के कुछ मुद्दे हमेशा दलितों के विरोध में रहे हैं. इन में सब से अहम माली आधार पर रिजर्वेशन का मुद्दा है. इस के बहाने वह अगड़ी जातियों के वोट लेती रही है. जब वह सत्ता में है, ऐसे जुमले उछाल कर अगड़ों का साथ ले रही है. इस से दलित खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.

‘‘भाजपा अंबेडकर का भगवाकरण कर रही है. कहीं नाम बदला जाता है, तो कहीं रंग बदल दिया जाता है. अंबेडकर जयंती पर यह देखने को मिला कि भाजपा ने अंबेडकर का भगवाकरण कर दिया है. यह सब भाजपा को जीत तो नहीं दिला पाएगा, पर नाराजगी की वजह जरूर बनेगा.

‘‘अंबेडकर के असर को खत्म करने का प्रयोग किया जा रहा है. उन की कही बातों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है. देखते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में इस का क्या असर पड़ता है?’’

प्रमोशन में रिजर्वेशन को ले कर भाजपा का एक कैडर यह दिखा रहा है कि यह काम केंद्र सरकार का है, जबकि खुद भाजपा की सांसद सावित्रीबाई फुले इसे नाकाफी काम बता रही हैं.

भाजपा के लिए दलित वोट बैंक अहम है. सपाबसपा की दोस्ती ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा दी है. ऐसे में अब रिजर्वेशन खत्म करने की बात करने वाली भाजपा प्रमोशन में रिजर्वेशन को ले कर मुलायम हो गई है, जिस से 2019 में एक बार फिर से उसे सत्ता हासिल  हो सके.

‘युवा बच्चों के मां बाप को भी प्यार करने का हक’

बौलीवुड की कार्यशैली बहुत अलग है. यहां लोग बनने कुछ आते हैं और बन कुछ और ही जाते हैं. ऐसा ही फिल्मकार अमित रवींद्रनाथ शर्मा के साथ हुआ. दिल्ली में नाटकों में अभिनय करते करते सोलह वर्ष की उम्र में उन्हें प्रदीप सरकार के निर्देशन में एक विज्ञापन फिल्म में अभिनय करने का मौका मिला. उन्होंने अपनी मां से कहा था कि वह फिल्मों में हीरो बनेंगे. मगर उनकी पहचान निर्देशक के रूप में होती है. लगभग 1800 एड फिल्में निर्देशित कर चुके अमित शर्मा ने तीन वर्ष पहले असफल फिल्म ‘‘तेवर’’ का निर्देशन किया था और अब ‘‘बधाई हो’’ का निर्देशन किया है.

आप तो अभिनेता बनना चाहते थे. तो फिर निर्देशक कैसे बन गए?

आपने सही कहा. मेरे मन में अभिनेता बनने की ललक मेरी मां के एक फोन की वजह से पैदा हुई थी. मैं दिल्ली में ही रह रहा था. मैं रेखा जैन के ग्रुप ‘उमंग’ के साथ जुड़ा हुआ था. उसके बाद ‘संगम’ और ‘नवरंग’ ग्रुप के साथ जुड़कर भी थिएटर किया. एक दिन फिल्मकार प्रदीप सरकार से मुलाकात हुई. मनाली में एक विज्ञापन फिल्म की शूटिंग थी, उसमें उन्होंने मुझसे अभिनय करवाया. पर उसी दिन मैंने उनके साथ सहायक निर्देशक के रूप में काम करने की बात सोची. स्कूल की पढ़ाई पूरी करते ही मैंने प्रदीप सरकार के साथ काम करना शुरू कर दिया. पूरे छह साल उनके साथ काम किया.

इस दौरान प्रदीप सरकार के निर्देशन में 17 विज्ञापन फिल्मों में अभिनय किया. फिर लगा कि अब अपना काम शुरू किया जाना चाहिए. मैंने अपनी कंपनी ‘क्रोम पिक्चर्स’ शुरू की. हमारी कंपनी में मेरे अलावा हेमंत भंडारी और आलिया सेन शर्मा पार्टनर हैं. अब तक स्वतंत्र रूप से करीबन अठ्ठारह सौ से अधिक विज्ञापन फिल्में बना चुका हूं. मैं हर किसी से कहना चाहूंगा कि ‘आन द जौब ट्रेनिंग’ ही बेहतर ट्रेनिंग होती है. बीस साल की उम्र मे मैंने साढ़े चार मिनट की एक लघु फिल्म ‘फ्री फालोइंग’ बना डाली थी.

फिर मुझे विज्ञापन फिल्में बनाने का काम मिलने लगा. अब तक वही काम करता आ रहा हूं. तीन वर्ष पहले मुझे बोनी कपूर ने फिल्म ‘‘तेवर’’ निर्देशित करने का अवसर दिया था. इसे सफलता नही मिली थी. अब करियर की दूसरी फिल्म ‘‘बधाई हो’’ का निर्देशन किया है.

तो फिर आपके हीरो बनने के सपने का क्या हुआ?

अभी भी यह सपना ही है. मगर सेट पर अपना फ्रस्टे्शन अपने कलाकारों पर निकालता रहता हूं. उन्हें अभिनय करके बताता रहता हूं कि कलाकार को किस तरह से अभिनय करना है. कई बार कलाकार भी मुझसे कह देता है कि आप ही कर लीजिए, आप तो मुझसे बेहतर कर लेते हैं. मैं तो फिल्म ‘बधाई हो’ के सेट पर नीना गुप्ता को भी अभिनय करके बताता था, कि अब मुझे क्या चाहिए. क्योंकि मैं उन्हें बताता था कि मेरी मम्मी इस स्थिति में क्या करती. पर एक न एक दिन हीरो के रूप में कोई फिल्म जरुर करूंगा. मैंने अपनी मां से वादा किया था कि मैं फिल्म का हीरो बनूंगा. लेकिन जब मैं फिल्म निर्देशक बना, मेरी मां भी बहुत खुश थी.

बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘‘तेवर’’ मिलने में छह साल का समय लगा. अब दूसरी फिल्म ‘‘बधाई हो’’ आने में तीन साल लग गए?

देखिए, फिल्म लिखने में समय जाता है. ‘बधाई हो’ को लिखने में दो साल लग गए. फिर उसे बनाने में एक साल लगा. अब 19 अक्टूबर को रिलीज हो रही है.

तो आप मानते हैं कि ‘‘तेवर’’ की असफलता का आप पर असर नहीं पड़ा?

बिलकुल नहीं पड़ा. क्योंकि मेरे साथ तो कुछ बहुत ही अलग हुआ. ‘तेवर’ को बाक्स आफिस पर सफलता नहीं मिली. पर फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को मेरा काम बहुत पसंद आया. कई निर्माताओं और कौरपोरेट के लोगों ने बुला बुलाकर कहा कि मेरी फिल्म उन्हें बहुत पसंद आयी. लेकिन ‘तेवर’ जिस जौनर की फिल्म है. वह ‘जौनर’ अभी नहीं चल रहा है. यानीकि मेरी फिल्म ‘तेवर’ गलत समय पर आयी थी. उसी वक्त कई बड़े फिल्म निर्माताओं व कौरपोरेट कंपनियों ने वादा किया था कि मैं जब भी कोई फिल्म बनाना चाहूंगा, वह मेरे साथ होंगे. उसके बाद मेरे पास कई फिल्मों के निर्देशन के औफर आए थे, पर मैंने मना कर दिया था.

मैंने लोगों से साफ साफ कहा कि मैं सही कहानी के मिलने का इंतजार कर रहा हूं. देखिए, मैं संघर्षरत निर्देशक उस वक्त भी नहीं था, आज भी नही हूं कि जो भी फिल्म मिल जाए, लपक लूं. मैं घर पर खाली नहीं बैठा हुआ था. मुझे घर का किराया देने या किचन कैसे चलेगा, इसकी चिंता नही थी. हम तीन लोगों की प्रोडक्शन कंपनी है. हम लगातार एड फिल्में निर्देशित कर रहे हैं. इसलिए दूसरी फिल्म को निर्देशित करने की मुझे कोई जल्दबाजी नहीं थी. तीन साल के बाद अब मेरी फिल्म ‘‘बधाई हो’’ आ रही है, उस बात को लेकर मैं बहुत खुश हूं. मुझे पूरी उम्मीद है कि यह फिल्म चलेगी. दर्शकों को जरूर पसंद आएगी. इस फिल्म की कहानी ऐसी है, जिससे हर उम्र के लोग रिलेट करेंगे.

फिल्म ‘‘बधाई हो’’ दर्शकों को क्यों पसंद आएगी?

मैं स्पष्ट कर दूं कि ‘‘बधाई हो’’ वल्गर फिल्म नहीं है. यह एक पारिवारिक फिल्म है. यह एक ऐसी कहानी है, जिसके साथ सभी रिलेट करेंगें. कहानी में नयापन भी है. इन दिनों नयी तरह की कहानियां दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं. इसलिए मुझे पूरी उम्मीद है कि दर्शक मेरी फिल्म को पसंद करेंगे. मुझे खुशी है कि अब भारतीय दर्शक बदल चुका है. अब दर्शक को नयी चीजें सुननी हैं.

नयी कहानी देखनी है. अब वह सिर्फ मारधाड़ या पेड़ के आगे पीछे नाच गाना नहीं देखना चाहता. यदि यही दौर चलता रहा, तो हम भी कुछ बेहतरीन कहानियां दर्शकों को परोस सकेंगें. सिनेमा की गुणवत्ता में सुधार आएगा. यह सब दर्शकों की वजह से ही संभव होगा. अच्छे फिल्मकार, अच्छे कलाकार आदि तो पहले भी थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगें.

कुछ लोगों का मानना है कि कारपोरेट के आने के बाद सिनेमा में बदलाव आया. आप क्या मानते हैं?

सर, मैं अपने आपको फिल्मी दुनिया से बाहर का इंसान मानता हूं. इसलिए मैं इस बात की जानकारी नहीं रखता कि कौरपोरेट के आने के बाद दर्शक बदला या अपने आप बदला. पर मेरी जानकारी के अनुसार कौरपोरेट के आने के बाद भी कमर्शियल फिल्मों का दौर चल रहा था. कौरपोरेट को आकर पंद्रह वर्ष हो गए. जबकि दर्शकों की रूचि पिछले दो वर्ष के दौरान बदली है. ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘न्यूटन’, ‘निल बटे सन्नाटा’ यह सभी अलग तरह की फिल्में पिछले एक वर्ष में आयी हैं. मैं एक ही बात कहना चाहूंगा कि दर्शकों में आया यह बदलाव सिनेमा के लिए बहुत अच्छा है. यह बदलाव हम सब के लिए बहुत अच्छा है.

फिल्म ‘‘बधाई हो’’ के संबंध में क्या कहेंगे?

अधेड़ उम्र में एक औरत के पुनः मां बनने के बाद परिवार के हर सदस्य को जिस तरह की शर्मींदगी झेलनी पड़ती है, उस पर हमारी फिल्म ‘‘बधाई हो’’ है..फिल्म की कहानी यह है कि यदि किसी के घर में वास्तव में ऐसा हो जाए यानी कि अधेड़ उम्र की मां फिर से प्रिगनेंट हो जाए, तो क्या होगा? अगर उसका बेटा 25 साल का और दूसरा बेटा 12 वी कक्षा में पढ़ रहा है, तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

फिल्म ‘बधाई हो’ में मिस्टर और मिसेस कौशिक के रिश्ते में मैंने अपने माता पिता को देखा. हम अपनी फिल्म में यह कह रहे हैं कि पचास साल की उम्र में भी पत्नी से प्यार करना अच्छी बात है, कोई बुराई नहीं है. यही वजह है कि ट्रेलर बाजार में आने के बाद तमाम लोगों ने कहा कि यह तो उनकी अपनी कहानी है.

इसके लेखन में दो वर्ष का समय क्यों लगा?

अब इसको लिखने में दो वर्ष लग गए. क्योंकि यह ऐसा विषय था कि जरा सी असावधानी होने पर फिल्म वल्गर हो सकती थी. तो हमें नापतोल कर इसे लिखना पड़ा. वह लिखकर मेरे सामने पेश करते थे, मैं उसमें से कुछ चीजें रख लेता था, कुछ वापस कर देता था. वह फिर से लिखकर लाते थे. तो लेखन की यह यात्रा दो वर्ष की रही. इस बीच अक्षत व शांतनु के साथ मेरी बहुत ही जबरदस्त ट्यूनिंग रही. दोनों ने बहुत अच्छा लिखा है.

महानगरों में युवा पीढ़ी को यह बात क्यों पसंद नहीं आती. रिसर्च के दौरान आपको इसकी वजह समझ में आयी?

मैंने पहले ही कहा कि यह मार्डनाइजेशन का परिणाम है. यदि मैं अपनी फिल्म ‘बधाई हो’ का नकुल कौशिक हूं, मैं शादी लायक हूं और मेरी गर्लफ्रेंड है. मुझे पता चले कि मेरी मां प्रैगनेंट हैं, तो मेरा रिएक्शन यही होगा कि यह क्या मजाक बना रखा है? फिल्म में नकुल का छोटा भाई 12 कक्षा में पढ़ता है. कालेज में उसके दोस्त उसको छेड़ते हैं. तो यह समस्या टैबू बन चुकी है. जबकि इस तरह की घटना हो रही है. पर हम सुनते नहीं हैं. इसलिए हम इसे और ज्यादा टैबू बना देते हैं. इसी के चलते महानगरों में जब किसी के घर में यह घटना घटती है, तो दोस्त ताना मारते हैं. हमारी फिल्म में नकुल की गर्लफ्रेंड स्वाती शर्मा एकदम उल्टा है. उसे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता.

क्या आपको लगता हैं कि मार्डनाइजेशन के इस युग में हर रिश्ते को सेक्स से जोड़कर देखा जाता है?

हमारे हिंदुस्तान में सेक्स एक टेबू है. इस पर लोग खुलकर बात नही करते हैं. पता नहीं क्यों हम हर रिश्ते में लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं. अब किसी की गर्लफ्रेंड है, तो उनके बीच सेक्स संबंध या शारीरिक रिश्ते हो सकते हैं. इसमें लोगों के पेट में क्यों दर्द होता है? जिस दिन हमारे देश में सेक्स पर खुलकर बात होगी, स्कूलों में विधिवत इसकी शिक्षा दी जाएगी. तो लोगों को सच का एहसास होगा और लोग किसी भी रिश्ते को बदनाम करने की कोशिश नही करेंगे. पर हमारी फिल्म इस पर बात नही करती है. हमारी फिल्म तो माता पिता के प्यार में होने की कहानी है.

आप फिल्म ‘‘बधाई हो’’ के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं?

हम इस फिल्म के माध्यम से लोगों से कहना चाहते हैं कि आप बड़े हो गए हैं, इसके मायने यह नही है कि आपके माता पिता में प्यार खत्म हो गया. आपके युवा हो जाने से आपके माता पिता के बीच सेक्स संबंध नहीं हो सकते हैं, यह सोच गलत है. क्या उनकी जिंदगी खत्म हो गयी? आखिर वह भी इंसान हैं. उनकी भी अपनी शारीरिक जरुरतें हैं. इसी बात को हमने बहुत ही हल्के फुल्के हास्य के साथ परोसा है.

लोग कहते हैं कि आपको एड फिल्म बनाने और ट्रेलर बनाने में महारत हासिल है?

यह लोगों का बड़प्पन है. हम कम से कम 2000 एड फिल्में बना चुके हैं. यहां अनुभव बहुत मायने रखता है. देखिए, विज्ञापन फिल्म हो या फीचर फिल्म, पटकथा में दम होगा, तो फिल्म अच्छी बनेगी. जब फिल्म अच्छी बनती है, तो तारीफ होती हैं. एक एड फिल्म सफल होती है, तो नाम हो जाता है. इसी तरह एक फीचर फिल्म चल जाती है, तो निर्देशक का नाम हो जाता है, नहीं चलती तो निर्देशक का नाम खराब हो जाता हैं.

सोशल मीडिया पर फिल्म का प्रमोशन बाक्स आफिस पर कितना असर डालता है?

यह सवाल तो मार्केटिंग वालों से करना चाहिए. इस फिल्म में मार्केटिंग में मेरा जुड़ाव थोड़ा बहुत रहा है. पर सोशल मीडिया काफी ताकतवर हो गया है. इससे हम अपनी फिल्म को लेकर अवेयरनेस पैदा कर सकते हैं. अब हर इंसान के हाथ में मोबाइल है. वह सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ करता रहता है. लोग टीवी की बजाय मोबाइल फोन पर लगे रहते हैं. हम अपनी फिल्म को लेकर अवेयरनेस पैदा करने के लिए हर माध्यम का उपयोग कर रहे हैं. लोग फिल्म के पोस्टर सबसे पहले सोशल मीडिया पर डालते हैं. लोग यूट्यूब पर ट्रेलर देख लेते हैं.

आप सोशल मीडिया पर क्या लिखते हैं?

सच कहूं तो मैं इस मामले में बहुत पिछड़ा हुआ हूं. मेरे आफिस के लोग मुझे सिखा रहे हैं कि सोशल मीडिया पर कैसे बिजी रहना चाहिए. मेरी कंपनी के दो भागीदार हैं हेमंत और आलिया, इन्होंने मुझे जबरन सोशल मीडिया पर डाला है. अभी इंस्टाग्राम पर नया नया आया हूं. फिलहाल मुझे तो यही समझ में आया कि अपनी फिल्म का प्रचार करने के लिए सोशल मीडिया अच्छा माध्यम है. अब यह बाक्स आफिस पर क्या करता है, मुझे नही पता. देखिए, फिल्म ‘‘स्त्री’’ ने 125 करोड़ कमा लिए, अब इसका श्रेय माउथ पब्लिसिटी के साथ साथ सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया को जाता है. तो मिली जुली सरकार का मामला है. पर सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे कोई फिल्म नही चल सकती. अब इसी के साथ फिल्म का कंटेंट भी बहुत मायने रखता है.

क्या है प्रेम : हर युवा समझे प्रेम की परिभाषा

प्रेम मानव जीवन की मुधरतम भावना है लेकिन इस को परिभाषित करना लगभग असंभव है. प्रेम को शब्दों में परिभाषित करना उचित भी नहीं है. जिस तरह बहती हवा को या फूलों की खुशबू को हम देख नहीं सकते जबकि उसे अनुभव कर सकते हैं उसी तरह प्रेम भी एक एहसास है. प्रेम का अर्थ अलगअलग व्यक्तियों के लिए, अलग उम्र के लोगों के लिए और अलग रिश्तों के लिए भिन्न हो सकता है.

प्रेम जो आकर्षण से मिलता है, वह क्षणिक होता है. आकर्षण कम या समाप्त होते ही यह प्रेम लुप्त हो जाता है. जो प्रेम किसी सुखसुविधावश मिलता है, वह घनिष्ठता तो ला सकता है पर  वांछित और स्थायी उत्साह या आनंद नहीं देता है.

प्रेम अनंत होता है, आप जितना उस के निकट जाएंगे वह उतना ही अधिक आप को आकर्षक लगेगा. यह आकाश की तरह अनंत है, जिस की कोई सीमा नहीं है. प्रेम ज्ञान से प्राप्त होता है और इस के लिए खुद को समझने की जरूरत है. प्रेम की बात तो हर कोई करता है पर इस की समझ विरले को ही होती है.

आज हम आमतौर पर जिस प्रेम की बात करते हैं वह महज अस्थायी आकर्षण, सुविधा व वासनापूर्ति तक सीमित है. प्रेम एक समर्पण है जिस में अगर कोई अपेक्षा हो तो वह दूषित हो जाता है. मानव के ज्ञान, सुंदर व्यवहार, सदाचरण और उस के मन की निर्मलता से जो प्रेम उत्पन्न हो वही हमें अंदर से आनंदित कर सकता है. प्रेम एक अद्भुत भाव है जिस का असर सब पर होता है.

‘लव ऐट फर्स्ट साइट’ या पहली नजर में प्यार की बात सुनने में आती है और कुछ हद तक अनुभव भी होता है. पर समय के साथ यह कम या दूषित हो कर क्षीण हो जाता है व नफरत, क्रोध या ईर्ष्या में बदल जाता है.

प्रेम के रूप

बच्चा जब अपनी मां के गर्भ से बाहर आता है तो उस के लिए प्रेम का अर्थ मां होता है. एक प्रेमी के लिए उस का प्रेम उस की प्रेमिका होती है जिस की मिसाल हमें लैलामजनूं, हीररांझा या शीरींफरहाद से मिलती है.

किसी से प्रेम का अर्थ है कि वह आप के लिए आप से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है. यह दुखदायी भी हो सकता है क्योंकि उस के लिए आप को कुछ खोना पड़ता है. बदले में बिना कुछ पाए कुछ खोने में अगर आप को कष्ट नहीं होता है तो इस का मतलब आप का उस के प्रति सच्चा प्यार है. निश्छल, निष्कपट त्याग के बिना आप प्रेम को नहीं जान सकते हैं.

प्रेम अनमोल है, पर इसे मुफ्त में पा सकते हैं. आप तय नहीं कर सकते कि प्यार कब, कितना और कहां हो. प्यार को न तो खरीद सकते हैं न बेच सकते हैं. आप प्यार करने के लिए किसी को बाध्य नहीं कर सकते हैं. आप सैक्स या अपना जीवनसाथी खरीद सकते हैं. शादी का दायरा भी कोर्ट या अन्य नियमों से बंधा होता है. पर शादी अरैंज्ड हो या प्रेमविवाह, उस का प्यार से बहुत ज्यादा लेनादेना नहीं है.

प्रेम एक सर्वशक्तिशाली अनुभूति है जिसे सब मानते हैं, पर कुछ ही जानते हैं. अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए इस का उपयोग या दुरुपयोग भी हम कर सकते हैं.

प्राचीन ग्रीकवासी प्रेम को 7 शब्दों में परिभाषित करते थे-

स्टोगे : प्राकृतिक स्नेह जो प्यार हम अपने परिवार को देते हैं.

इरोज : यौन या कामुक इच्छा. यह सकारात्मक या नकारात्मक भी हो सकती है.

अगप : बिना शर्त का स्वाभाविक प्रेम.

ल्यूडस : क्रीड़ात्मक प्रेम, बच्चे का, छेड़खानी या फ्लर्टिंग.

प्राग्मा : दीर्घकाल तक प्यार जो विवाहित जोड़े में होता है.

फिलिया: मानसिक प्रेम

फिलौटिया : स्वयं से प्रेम.

हम जो महसूस करते हैं उसे दिमाग का दायां हिस्सा कंट्रोल करता है और हमारी भाषा को मस्तिष्क का बायां भाग कंट्रोल करता है. अगर हम बारबार और भिन्न परिस्थितियों में कहते हैं कि मुझे तुम से प्यार है (ढ्ढ रुश1द्ग ङ्घशह्व) तो यह प्रेम को कमजोर करता है, जैसे हम दिनभर में यह कह सकते हैं आई लव आइसक्रीम, आई लव माय पप्पी, आई लव शिमला, आई लव म्यूजिक या क्रिकेट या फिर आई लव यू (पत्नी या प्रेमिका से). आजकल आमतौर पर लोग आई लव यू, आई मिस यू का प्रयोग तो करते हैं, पर वास्तव में इस में प्रेम की भावना शायद ही होती हो.

एक पत्रिका ने वैज्ञानिकों, मनोवैज्ञानिकों, लेखकों आदि से यही प्रश्न किया था कि प्यार क्या है. उन के अलगअलग उत्तर देखें :

एक वैज्ञानिक के अनुसार : लव एक कैमिस्ट्री है. जैविक रूप से यह एक स्नायविक यानी न्यूरोलौजिकल स्थिति है जैसे भूख या प्यास. पर इसे हम ज्यादा समय तक महसूस करते हैं. हम अकसर कहते हैं कि प्यार अंधा होता है क्योंकि इस पर हमारा कंट्रोल नहीं होता है. हवस एक अस्थायी यौन इच्छा है जिस में कुछ रसायन टैस्टोस्टेरोन और औस्ट्रोजन

होते हैं, जबकि सच्चे प्यार में मस्तिष्क से अन्य रसायनों के मिश्रण फेरोमोंस, डोपामाइन, नौरएपिनफ्राइन, सेरोटोरिन, औक्सीटोसिन, वेसोप्रेसिन निकलते हैं.

एक दार्शनिक के अनुसार, प्यार एक भावुक प्रतिबद्धता है. यह किसी व्यक्ति, समाज, देश या प्रकृति से हो सकता है.

एक उपन्यासकार के अनुसार, प्रेम से बड़ेबड़े उपन्यास और कहानियां जन्म लेती हैं. प्यार इस बात पर निर्भर है कि आप किस के साथ किस परिस्थिति में हैं और कितना सुरक्षित हैं. आप को यह उतना ही जरूरी लगेगा जितना सांस लेने के लिए हवा. और इस के खोने से आप को शारीरिक व मानसिक पीड़ा होगी.

एक नन के अनुसार, प्यार को परिभाषित करने से आसान इसे अनुभव करना है. हम सभी रिश्तों और चीजों से ज्यादा प्रेम प्रकृति से करते हैं. प्रेम वह है जो किसी को कष्ट न पहुंचाए, बल्कि हो सकता है कि इस की कीमत हमें चुकानी पड़े.

एक मनौवैज्ञानिक के मतानुसार, प्रेम एक प्राकृतिक शक्ति है जिस पर हमारा ज्यादा कंट्रोल नहीं होता है, जैसे मौसम, चांद या सौरमंडल पर.

कुछ का मानना है कि प्रेम 2 व्यक्तियों के बीच एक असाधारण संबंध है जो परस्पर विश्वास, सम्मान और स्नेह से जुड़ा है और यह जितना गहरा होता है, प्यार उतना ही प्रबल होता है.

किंग सोलोमन ने कहा था, ‘‘जिस तरह आप पानी में अपना प्रतिबिंब देखते हैं, आदमी का मन भी उसी तरह है. आप को कोई प्यार करता है तो आप का दिल भी उस प्रेम को महसूस करता है.’’

उपरोक्त बातों के मद्देनजर हम कह सकते हैं कि प्यार को शब्दों में सीमाबद्ध कर परिभाषित नहीं किया जा सकता. यह अनंत खुले आकाश की तरह है. बस, इसे महसूस करें.

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