शुजीत सरकार के कौन से दो सपने कहां पूरे हुए?

मशहूर फिल्मकार शुजीत सरकार लंबे समय से शिमला में शूटिंग करने का सपना देखते आए हैं. मगर उनकी हर फिल्म की कहानी कुछ ऐसे विषय पर रही कि वह शिमला शूटिंग के लिए नहीं जा पाए. मगर अब उनका यह सपना पूरा हो गया. जी हां! हाल ही में शुजीत सरकार ने शिमला में पंकज कपूर और क्रिकेटर एम एस धोनी के साथ एक विज्ञापन फिल्म की शूटिंग की. यह पहला मौका होगा जब क्रिकेट जगत के धुरंधर एम एस धोनी और अभिनय जगत के धुरंधर कलाकार पंकज कपूर एक साथ किसी विज्ञापन फिल्म में एक साथ नजर आएंगे.

खुद शुजीत सरकार कहते हैं- ‘‘इस बार विज्ञापन फिल्म की शूटिंग करके मेरे दो सपने पूरे हो गए. मैं शिमला में शूटिंग करने की बात सोचा करता था. इसके अलावा अभिनय जगत के दिग्गज कलाकार पंकज कपूर के साथ काम करने की मेरी इच्छा रही है. मेरी नजर में पंकज कपूर अपने क्राफ्ट के मास्टर हैं. मेरी यह दोनो इच्छाएं एक ही बार में शिमला की खूबसूरत वादियों में पूरी हो गयी. शूटिंग के अनुभव बहुत मजेदार रहे. एम एस धोनी के साथ यह मेरी दूसरी एड फिल्म है.

स्वार्थ के रिश्ते

घटना 27 जुलाई, 2018 की है. उस दिन कोर्ट में शीलेश की पत्नी नलिनी के बयान होने थे. शीलेश तो कोर्ट जाने के लिए तैयार हो गया था, नलिनी तैयार हो रही थी. शीलेश पत्नी से जल्द तैयार होने की कह कर किराए की गाड़ी लेने के लिए चला गया.

उस समय दोपहर के 12 बजे बजने वाले थे. थोड़ी देर बाद शीलेश जब घर वापस आया तो उस ने पत्नी को आवाज दी, ‘‘नलिनी, गाड़ी आ गई है, जल्दी आ जाओ.’’

आवाज देने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो वह अंदर कमरे में गया. वहां का दृश्य देखते ही उस के होश उड़ गए, मुंह से चीख निकल गई. नलिनी पंखे पर फंदा लगा कर लटकी हुई थी. वह जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग आ गए. पत्नी की सांस चल रही है या नहीं, जानने के लिए शीलेश ने लोगों की मदद से नलिनी को फंदे से नीचे उतारा. लेकिन तब तक उस की मौत हो चुकी थी.

किसी ने इस की सूचना थाना जसराना को दे दी. सूचना मिलने पर थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और सीओ प्रेमप्रकाश यादव मौके पर पहुंच गए. कमरे से कोई सुसाइड नोट वगैरह नहीं मिला. पुलिस ने शव का निरीक्षण करने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भेज दिया.

इस के बाद पुलिस ने मृतका के घर वालों से बात की तो पति शीलेश ने आरोप लगाया कि अगर पुलिस समय रहते काररवाई करती तो नलिनी को शायद आत्महत्या नहीं करनी पड़ती. इस के लिए गुनहगार वे लोग भी हैं, जिन के खिलाफ नलिनी ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना जसराना का एक गांव है औरंगाबाद. शीलेश चंद्र अपनी पत्नी नलिनी और 10 साल के बेटे के साथ इसी गांव में रहता था. उस ने घर में ही परचून की दुकान खोल रखी थी, इस के अलावा वह जीवनबीमा का काम भी करता था. इस सब से उसे अच्छीखासी आमदनी हो रही थी.

नलिनी ग्रैजुएट थी. साल 2015 में उस ने ग्रामप्रधान का चुनाव लड़ा था. चुनाव के समय गांव के ही अमित उर्फ छटंकी ने नलिनी का पूरा चुनावी प्रबंधन देखा था और हर तरह से सहयोग भी किया था. गांव के रिश्ते से अमित नलिनी को चाची कहता था.

चुनाव के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. चुनाव में नलिनी कुछ वोटों के अंतर से हार भले ही गई थी, लेकिन इस बीच उस के अमित से अवैध संबंध बन गए थे.

कहने को 24 साल का अमित नलिनी से उम्र में 12 साल छोटा था, लेकिन वह अच्छी कदकाठी का गबरू जवान था. नलिनी भी हंसमुख व चंचल स्वभाव की आकर्षक नैननक्श वाली महिला थी.

घातक रिश्ता नलिनी और अमित का

अमित के 5 भाई थे. इन में से 4 भाई शहर में रह कर अपना काम कर रहे थे, जबकि अमित गांव में अपने बड़े भाई के साथ रहता था. अमित अपने भाइयों में सब से छोटा था. इसी वजह से सब प्यार से उसे छटंकी कहते थे. नलिनी और अमित दोनों एकदूसरे के प्यार में इस तरह डूबे कि उन्हें घर व गांव वालों का कोई डर ही नहीं रहा.

गुजरते समय के साथ दोनों के संबंध गहरे होते गए. शीलेश जब बीमा के काम से बाहर चला जाता, तो अमित चाची के घर पहुंच जाता. अमित ने होशियारी यह दिखाई कि नलिनी के साथ बिताए अंतरंग क्षणों को उस ने अपने मोबाइल में कैद कर लिया था.

नलिनी अमित को दिलोजान से चाहती थी. यह सिलसिला पिछले लगभग 4 सालों से चल रहा था. अवैध संबंध भला किसी के छिपे हैं जो इन के छिप जाते. कानाफूसी से होते हुए यह खबर पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गई.

शीलेश पत्नी पर बहुत विश्वास करता था. जब उसे पत्नी के बारे में पता लगा तो वह तिलमिला गया. गुस्से में उस का खून खौल उठा. उस ने पत्नी को जम कर खरीखोटी सुनाने के साथ ही अमित को भी बुराभला कहते हुए अपने घर न आने की सख्त हिदायत दे दी.

इसी बात को ले कर 16 जून, 2018 को शीलेश और अमित में विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट तक हो गई. मामला बढ़ने पर पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ शांति भंग की काररवाई की. इस मामले में अमित गिरफ्तार भी हुआ. जमानत के बाद उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया था.

अमित ने अपने मोबाइल से नलिनी के कई अश्लील फोटो खींचे थे. साथ ही कई वीडियो भी बना रखी थीं. उस ने शीलेश को दबाव में लेने और सबक सिखाने के लिए सोशल मीडिया पर नलिनी के अश्लील फोटो और वीडियो वायरल कर दिए. वायरल हुए वीडियो और फोटो वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए दोनों के परिवारों तक पहुंच गए.

फोटो और वीडियो देख कर घर वालों के होश उड़ गए. उधर गांव के युवक अश्लील वीडियो व फोटो मोबाइल पर देख कर मजे लेने के साथ ही शीलेश के ऊपर फब्तियां भी कसने लगे. इस के चलते पतिपत्नी का घर से बाहर निकलना तक मुश्किल हो गया.

शीलेश खून का घूंट पी कर रह गया. आखिर उस ने अमित व उस के साथियों के खिलाफ 20 जून, 2018 को थाना जसराना में मुकदमा दर्ज कराने के लिए तहरीर दी. पुलिस ने इस मामले में दिलचस्पी न ले कर पहले जांच कर के रिपोर्ट दर्ज करने की बात कही.

आरोपियों पर ब्लैकमेलिंग का आरोप

लोगों की फब्तियों से शीलेश और नलिनी गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे थे. आखिर किसी की सिफािरश के बाद पुलिस ने 16 जुलाई को अमित उर्फ छटंकी, अनिल व उस के भाई जितेंद्र के खिलाफ आईटी एक्ट में मुकदमा दर्ज कर लिया. दबाव में पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन उस ने आरोपियों के खिलाफ काररवाई नहीं की.

आरोपी खुले में ऐसे ही घूमते रहे. इस पर शीलेश और नलिनी ने उच्चाधिकारियों के औफिसों के कई चक्कर लगाए. इस के बाद थाना पुलिस ने नलिनी के आत्महत्या करने से 4 दिन पहले यानी 23 जुलाई, 2018 को नलिनी को बयान देने के लिए थाने बुलाया. उस के बयान के बाद 24 जुलाई को पुलिस ने उस का मैडिकल कराया.

पीडि़ता के बयानों के आधार पर मुकदमे में पुलिस ने गैंगरेप की धारा भी जोड़ दी. 27 जुलाई को पीडि़ता के कोर्ट में बयान होने थे. लेकिन वह बयान देने के लिए कोर्ट जाने को तैयार नहीं थी. जबकि पति आरोपियों के खिलाफ बयान देने का दबाव डाल रहा था.

काफी दबाव के बाद वह कोर्ट जाने के लिए तैयार हुई. 27 जुलाई को शीलेश और नलिनी ने कोर्ट जाने की तैयारी कर ली थी. इस के लिए शीलेश किराए की गाड़ी लेने गया था. जब वह लौट कर आया तो उसे नलिनी पंखे से लटकी मिली.

शीलेश का कहना है कि उस के गाड़ी लेने के लिए जाने के बाद नलिनी ऊहापोह में फंस गई होगी. क्योंकि गांव में उस की बहुत बदनामी हो चुकी थी, वह पड़ोसियों और घर वालों से आंखें नहीं मिला पा रही थी. उसे एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई दिखाई दे रही थी. वह अमित के विरुद्ध कोर्ट में बयान नहीं देना चाहती थी. लेकिन अमित से प्यार के चलते हो रही बदनामी से वह पूरी तरह टूट चुकी थी.

पीडि़ता के पति शीलेश ने पत्नी द्वारा आत्महत्या करने पर तीनों आरोपियों पर पत्नी के साथ दुष्कर्म करने, उस के अश्लील वीडियो व फोटो बना कर वायरल करने तथा ब्लैकमेलिंग करने का आरोप लगाया. उस ने कहा कि आरोपी और उन के परिजन उसे व नलिनी को धमकी दे रहे थे कि वह अपनी रिपोर्ट वापस ले लें, नहीं तो अंजाम और ज्यादा खतरनाक होगा.

उस का आरोप था कि पुलिस समय से काररवाई करती तो नलिनी को आत्महत्या के लिए बाध्य नहीं होना पड़ता. जब मीडिया में पुलिस की लापरवाही वाली बात आई तो पुलिस उच्चाधिकारी हरकत में आए. उच्चाधिकारियों ने इस मामले की अलग से जांच बैठा दी.

थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और इस मामले की विवेचना कर रहे इंसपेक्टर सोमपाल सिंह सैनी तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी में जुट गए. मुख्य आरोपी अमित पर दबाव बनाने के लिए पुलिस उस की भाभी रामप्यारी और बहनोई को थाने ले आई. बाद में बहनोई को थाने से छोड़ दिया गया.

आरोपी अमित ने भी की आत्महत्या

पीडि़ता द्वारा आत्महत्या किए अभी 12 घंटे ही बीते थे. उस का शव पोस्टमार्टम के बाद गांव पहुंच भी नहीं पहुंच पाया था कि 28 जुलाई, 2018 की रात में रेप के मुख्य आरोपी अमित उर्फ छटंकी ने भी अपने घर के बरामदे में पड़े लोहे के जाल पर फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली.

29 जुलाई की सुबह जब गांव वाले सो कर उठे तो उन्हें इस घटना की जानकारी मिली. इस से गांव में सनसनी फैल गई. सूचना मिलने पर पुलिस थाने से अमित की भाभी रामप्यारी को ले कर गांव पहुंच गई.

पुलिस ने अमित के शव को फंदे से उतार कर जरूरी काररवाई की और शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. अमित के पास से पुलिस ने एक सुसाइड नोट भी बरामद किया, जिस में लिखा था कि मेरी मौत का कोई जिम्मेदार नहीं है.

नलिनी ने मेरे लिए जान दी है. मैं भी उस के लिए जान दे रहा हूं. मेरी जान मुझे मिस कर रही है. मैं आ रहा हूं सनम. उस ने सुसाइड नोट में यह भी लिखा कि अनिल और उस का भाई जितेंद्र बेकुसूर हैं. सोशल साइट पर फोटो और वीडियो मैं ने ही वायरल किए थे.

रामप्यारी ने बताया कि सोशल साइट पर अश्लील फोटो नलिनी के पति शीलेश और अमित ने डाले थे. गांव के ही एक व्यक्ति के घर पर नलिनी के पति, देवर व गांव के कुछ लोगों की मीटिंग हुई थी. उस का आरोप था कि नलिनी को इन लोगों ने ही मारा है. मरने के बाद उसे पहले फंदे पर लटकाया फिर फंदे से उतार कर शोर मचा दिया गया.

रामप्यारी ने आगे बताया कि उस दिन इन लोगों ने हमारे साथ मारपीट के अलावा घर में आगजनी भी की. अमित के भाई वीर सिंह ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि नलिनी से अमित के संबंध पिछले 4 साल से थे. वह अमित से पैसे लेती रहती थी, इसलिए उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं कराना चाहती थी.

दबाव में उस ने रिपोर्ट तो लिखवा दी लेकिन वह उस के खिलाफ कोर्ट में बयान देने को मना कर रही थी, पर उस का पति गवाही देने के लिए उस पर दबाव डाल रहा था. नलिनी की मौत के बाद उस के पति, देवर व अन्य लोगों ने अमित को फंदे पर लटका कर उस की हत्या कर दी.

अमित द्वारा आत्महत्या कर लेने की सूचना पा कर एसएसपी सचिंद्र पटेल, एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह और कुछ देर बाद आईजी (आगरा रेंज) राजा श्रीवास्तव भी गांव पहुंच गए. तब तक मामले ने तूल पकड़ लिया था.

ग्रामीणों में भी आक्रोश था. गांव वालों का आरोप था कि नलिनी की मौत के बाद पुलिस दबिश दे कर आरोपियों को जल्दी गिरफ्तार करने का दावा कर रही थी, किसी की गिरफ्तारी तो हुई नहीं, उलटे आरोपी ने अपने ही मकान में गले में फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली.

आखिर पुलिस के दबिश देने के दावे में कितनी सच्चाई थी? आईजी ने भी घटनास्थल पर पहुंच कर नलिनी और अमित के घर वालों व ग्रामीणों से बात की.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इस मामले में थाना पुलिस की लापरवाही की जानकारी मिल चुकी थी. आईजी राजा श्रीवास्तव के निर्देश पर एसएसपी सचिंद्र पटेल ने मामले को गंभीरता से ले कर थानाप्रभारी मुनीश चंद्र और विवेचक इंसपेक्टर सोमपाल सिंह सैनी के विरुद्ध काररवाई करते हुए दोनों को निलंबित कर दिया.

फिरोजाबाद के थाना उत्तर में तैनात अतिरिक्त थानाप्रभारी रणवीर सिंह को जसराना का थानाप्रभारी नियुक्त किया गया. एसएसपी ने बताया कि मामले की जांच कराई जा रही है. गांव में बने तनाव को देखते हुए फोर्स तैनात कर दी गई.

आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला

इस मामले में अमित के भाई ताराचंद, नलिनी के पति शीलेश और देवर के अलावा गांव के ही 2 अन्य लोगों के खिलाफ अमित को आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज हुआ. इस संबंध में एसपी (ग्रामीण) महेंद्र सिंह का कहना था कि जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ काररवाई होगी. उधर नए थानाप्रभारी रणवीर सिंह ने फोटो व वीडियो वायरल करने में सहयोगी रहे 2 सगे भाइयों अनिल और जितेंद्र को गिरफ्तार कर लिया. उन से पूछताछ करने के बाद उन्हें अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

नलिनी के पति से झगड़ा होने के बाद अगर अमित संयम से काम लेता और बदला लेने के लिए फोटो और वीडियो वायरल करने जैसा गलत कदम न उठाता तो नलिनी और उसे आत्महत्या करने को बाध्य न होना पड़ता. गुस्से के वशीभूत अमित ने जो कदम उठाया, देखा जाए तो वह आत्मघाती था. अमित का यह कदम नलिनी और खुद उस के लिए फांसी का फंदा बन गया.

– कथा में पीडि़ता व उस के पति के नाम परिवर्तित हैं

शोको : धर्मगुरु को फांसी

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. यह बात जापान में एक जुलाहे के यहां चरितार्थ हुई. 5 मार्च, 1955 को दक्षिण जापान के कीसुशयु क्षेत्र में रहने वाले उस गरीब जुलाहे के यहां एक बेटे ने जन्म लिया. वह कोई साधारण बच्चा नहीं था. एक अजीब सा तेज था उस के चेहरे पर. बच्चे की दाईं आंख से न दिख पाने की बात को भी लोगों ने असाधारण बताया था.

लोगों की तारीफें सुनसुन कर जुलाहा भी अपनी किस्मत पर इठलाने लगा. बच्चे का नाम रखा गया शोको उर्फ चीजू. जुलाहे को क्या मालूम था कि उस का यह बेटा दौलत और शोहरत की बुलंदियों तक तो पहुंचेगा, लेकिन अमानवीयता और वीभत्सता की सीढ़ी पर चढ़ कर.

गरीब जुलाहे ने किसी तरह शोको को पालपोस कर नक्काशी के काम पर लगा दिया. नक्काशी का काम कर के किसी तरह दो जून की रोटी भर कमाने वाले जुलाहे का बेटा शोको उर्फ चीजू बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी था. गरीबी के फर्श और बेबसी की छत के नीचे लेटा शोको बस दौलत के सपने देखा करता था. मुफलिसी के चलते पढ़ना तो दूर, वह स्कूल का दरवाजा भी नहीं देख पाया था. पर यह उस का आत्मविश्वास ही था कि वह दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद कर रखने का दम भरता था.

शोको को गरीबी की चादर से बेहद नफरत थी. गरीबी ही वह शब्द था, जो उस के मन में टीस बन कर रिसता रहता था. किसी के आगे हाथ फैलाना उसे गवारा नहीं था. वह तो बलात छीन कर सब कुछ हासिल करना चाहता था.

जवानी तक पहुंचतेपहुंचते शोको की महत्त्वाकांक्षा साकार रूप लेने को बेताब रहने लगी. उस के सपने भी पंख लगा कर हकीकत के आसमान में उड़ने को मचल रहे थे.

शोको ने पहला मुकाम हासिल कर लिया था ‘अम’ के रूप में. अम नाम से पंजीकृत हुई शोको की इस कंपनी ने बहुत कम समय में ही ‘पहाड़ी जादूगर समुदाय’ के नाम से अपनी अलग पहचान बना ली थी.

शोको ने काफी सोचसमझ कर अपनी कंपनी का नाम अम चुना था. अम जापानी लोगों के लिए मन और मस्तिष्क को सुकून देने वाली एक कारगर दवा थी. कंपनी की सफलता का राज किसी हद तक इस का नाम था. लोगों को जहां यह नाम प्रभावित करता, वहीं शोको का व्यक्तित्व भी उन्हें अपनी ओर खींच लेता था. मात्र एक छोटे से कमरे में शुरू हुई शोको की कंपनी की आय का एकमात्र स्रोत था— स्वास्थ्य के लिए आपत्तिजनक पेय पदार्थों की बिक्री.

कम समय में यह कंपनी जहां सफलता की बुलंदी पर पहुंच गई थी, वहीं शोको के पास दौलत का ढेर लग गया था. मगर शोको को इस से संतुष्टि नहीं थी. यह तो उस का एक कदम भर था, उसे तो अभी और लंबा रास्ता तय करना था. इसी राह पर जाने के लिए शोको ने अम कंपनी को योगा स्कूल का रूप दे दिया था.

दूसरी ओर शोको ने अपने नाम के आगे असाहारा शब्द जोड़ कर इस स्कूल के मुख्य निदेशक की कुरसी संभाल ली थी. शोको की दौलत की भूख कुछ शांत हुई तो उसे शोहरत की भूख बेचैन करने लगी. किसी तरह उस ने जापान की लोकप्रिय पत्रिका ‘ट्विलाइट जोन’ में अपना एक लेख प्रकाशित करवाया.

उस लेख के साथ शोको की योग की मुद्रा में एक फोटो भी छपी. फोटो एक पहुंचे हुए योगी की तरह लग रही थी. कुछ उस लेख का मर्म था तो कुछ फोटो का प्रभाव कि शोको रातोंरात मशहूर हो गया. उस के प्रति लोगों की श्रद्धा भावना ऐसी उमड़ी कि सैकड़ों लोगों ने उस के स्कूल की सदस्यता ले ली. कह सकते हैं कि शोको को एक अचूक हथियार मिल गया था.

जल्दी ही शोको को चिंतक और आदर्श योगी के रूप में पहचाना जाने लग. अपनी फितरत के अनुसार अब वह देश में ऐसी जगह बनाना चाहता था, जहां सारा देश उस के आगे शरणागत होता नजर आए. अपने ईष्ट के रूप में लोग उसी का नाम लें और उस का ही अनुसरण करें.

यहीं से शोको के नए सफर की शुरुआत हुई. अब वह अपना योग स्कूल छोड़ कर आध्यात्मिक शांति की खोज में जापान के पहाड़ों और समुद्र के तटों पर भटकने लगा. एक ऐसे ही एकांत स्थान पर शोको की मुलाकात इतिहास के मर्मज्ञ एक छात्र से हुई. वह भी शोको के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. उस ने शोको को अपने गूढ़ रहस्य बताते हुए कहा, ‘‘अरमागीडन जल्द ही दस्तक देने वाला है. इस विनाशकारी स्थिति में केवल शुद्ध आत्मा वाले ही जीवित रह पाएंगे.’’

शोको ने इस कथन को काफी गंभीरता से सुना और वह चिंतन करने लगा. उसे लगा कि आध्यात्मिकता उसे बुला रही है. वही एक ऐसा मनुष्य है, जो शुद्ध आत्मा वाले लोगों का नेतृत्व कर सकता है.

उसे यह भी झूठा विश्वास हो चला था कि वह अकेला ऐसा प्राणी है, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति से दुनिया को विनाश के गर्त में जाने से बचा सकता है. इस के बाद शोको ने अपने पुराने चोले को उतार कर श्वेत और ढीलेढाले वस्त्र धारण कर लिए. सिर के बाल और दाढ़ीमूंछ भी बढ़ा ली.

वह अपने नए मिशन के तहत पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कई देशों की यात्रा पर निकल गया. वह जगहजगह आध्यात्मिक सत्संग करता और अम शब्द की शक्ति का प्रचार करता. उस ने दूसरी आध्यात्मिक संस्थाओं को भी अपनी शरण में लाने का पूरा प्रयास किया. इस का उसे लाभ भी मिला. उस की ख्याति उस से पहले उस स्थान पर पहुंच जाती, जहां वह अपने आध्यात्मिक भ्रमण के लिए जाता था.

धर्म की आड़ में बन गया धर्मगुरु

अपने इसी मिशन के अंतर्गत शोको असाहारा सन 1987 में भारत स्थित हिमालय की वादियों में बसे आध्यात्मिक शहर धर्मशाला पहुंचा. उस के साथ अनुयायियों का दल भी था. उस का उद्देश्य जहां हिमालय की महिमा का बारीकी से अध्ययन करना था, वहीं वह बौद्ध गुरु दलाई लामा का आशीर्वाद भी प्राप्त करना चाहता था. वह अपने मकसद में कामयाब रहा. उसे दलाई लामा का आशीर्वाद मिल गया. आशीर्वाद लेते हुए उस ने एक फोटो भी खिंचवाया.

जापान पहुंच कर शोको असाहारा ने इसे भुनाना शुरू कर दिया. उस ने दावा किया, ‘‘मुझे बौद्ध गुरु दलाई लामा ने आशीर्वाद दिया है. उन्होंने मुझे महात्मा बुद्ध की सत्य शिक्षाओं से लोगों को राह दिखाने का एक दैवीय अभियान सौंपा है.’’

शोको ने लोगों को यह बात जोर देते हुए बताई, ‘‘गुरु दलाई लामा ने मुझे विशेष तौर पर इस पावन कार्य के लिए चुना है. क्योंकि मैं महात्मा बुद्ध का सच्चा अनुयायी हूं.’’

शोको के आदेश पर उस के अनुयायियों ने अपने परिचितों और मित्रों को इस दैविक अभियान का लक्ष्य बताते हुए उन्हें इस मार्ग पर साथ चलने को कहा. शोको असाहारा का यह जादू काम कर गया.

अनुयायियों की जमात बढ़ती देख शोको ने अपनी दैविक शक्ति श्रद्धालुओं को देने का व्यवसाय शुरू कर दिया. उस ने श्रद्धालुओं के माथे पर अपना हाथ रखने की कीमत 350 डौलर रखी.

शोको का यह दैविक अभियान कई महीने चला. अनुयायी बढ़े तो दौलत के दरवाजे भी खुले. अपनी अगली योजना की जानकारी देते हुए शोको ने अपने शिष्यों को बताया, ‘‘समय की मांग को देखते हुए ‘पहाड़ी जादूगर संस्था’ अम को अब ‘अम परम सत्य’ में परिवर्तित कर दिया गया है.’’

शोको असाहारा की तकदीर कहें या उस के व्यक्तित्व का प्रभाव कि उस का यह आगाज कामयाब अंजाम तक पहुंच गया. अम परम सत्य अभियान शोको के नेतृत्व में बौद्ध, जैन धर्म की सत्यता और हिंदू धर्म की गूढ़ता का मिश्रण बन कर उभरा. शोको के रहस्यवादी उपदेश सुनने के लिए देश भर से श्रद्धालु उस की शरण में आने लगे.

जो भी जीवन के परम सत्य की खोज में शोको का अनुयायी बनता, उसे सब से पहले शोको के शरीर के रक्त की कुछ बूंदें पिलाई जातीं. इस के पीछे यह तर्क दिया जाता कि शोको अलौकिक शक्ति है. उस के रक्त में कई तरह के चुंबकीय आकर्षण हैं, जिन्हें ग्रहण करने से मनुष्य को अलौकिक दिव्य दर्शन का आभास होता है.

इस में भी व्यवसायीकरण था. शोको के रक्त की बूंदें प्रसाद स्वरूप नहीं दी जाती थीं, बल्कि उस की भी कीमत थी. वह भी छोटीमोटी नहीं, पूरे 7 हजार डौलर. बता दें कि शोको शादीशुदा था और 3 बेटियों का बाप भी. शोको की शादी तोमोको मैट्सुमोटो के साथ सन 1978 में हुई थी.

शोको हर काम फीस ले कर करता था

आध्यात्मिकता के नाम पर शोको का व्यवसाय जहां फलफूल रहा था, वहीं कलेवर भी बदलता जा रहा था. शोको ने एक और मुकाम की तरफ कदम रखते हुए अपने विशाल भव्य भवन में एक तालाब का निर्माण करवाया, जिसे उस ने एक जादुई तालाब का नाम दिया था.

वैसे तो तालाब का जल सामान्य था, लेकिन इस के पीछे यह तर्क दिया जाता कि शोको द्वारा इस जल को छू लेने से यह करिश्माई जल बन गया है. अनुयायियों द्वारा यह प्रचार किया जाने लगा कि इस जल को पीने से जहां शरीर विकारों से मुक्त हो जाता है, वहीं जीवन में छाया अहंकार भी दूर हो जाता है. तालाब के इस जल को पीने की कीमत रखी गई थी 800 डौलर. लोगों की नजरों में भगवान बन चुका शोको पड़ाव दर पड़ाव पार करता जा रहा था. सन 1987 के अंत तक शोको के अम परम सत्य पथ के अनुयायियों की संख्या करीब डेढ़ हजार तक पहुंच गई थी. शोको असाहारा ने अब अपना पहला अंतरराष्ट्रीय औफिस न्यूयार्क, अमेरिका में ‘अम यूएसए’ नाम से खोला.

दौलत और शोहरत शोको के कदम चूम रही थी. मगर शोको की हवस थी कि शांत होने का नाम नहीं ले रही थी. उस की निगाह तो विश्व पटल पर टिकी थी. शोको का योग स्कूल भी अब अन्य जापानी स्कूलों की तरह नहीं रहा था. इस स्कूल में अध्ययन केवल पत्राचार द्वारा ही होता था.

2 वर्षीय कोर्स की फीस 2 हजार डौलर रखी गई थी और दाखिले के रूप में लिए जाते थे 700 डौलर. अगर कोई दान देने में रुचि रखता था तो उसे शोको के जादुई तालाब का जल तोहफे के रूप में दिया जाता था.

कुछ भी हो, पर शोको के प्रवचनों में इतना दमखम और आकर्षण था कि उस से प्रभावित हो कर उस के शिष्य उस की शिक्षा का पालन करते थे. वह जमीन पर सोते, उस के लिए प्रार्थना करते, व्रत रखते और सभी सांसारिक बंधन छोड़ कर बस हर समय उस की सेवा में लगे रहते थे. इन शिष्यों ने शोको के आह्वान पर अपनी समस्त चलअचल संपत्ति और पूंजी शोको के शरणागत कर दी थी.

सन 1990 आतेआते शोको के शिष्य और शिष्याओं की संख्या में अच्छाखासा इजाफा हो गया था. गौरतलब बात यह थी कि इन में से 15-20 प्रतिशत की आयु मात्र 20 वर्ष थी.

शोको की आय बढ़ी तो उस का काफी पैसा टैक्स की अदायगी में जाने लगा. यह उस के लिए चिंता का विषय था. अत: शोको ने अपनी आय करमुक्त करने के लिए जापानी धार्मिक कारपोरेशन में कानून के तहत आवेदन दिया, मगर इसे निरस्त कर दिया गया.

परिणामस्वरूप टोक्यो के गवर्नर को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं. आखिर गवर्नर ने जापानी धार्मिक गतिविधियों के उल्लंघन का वास्ता दे कर शोको को कुछ रियायत दे दी.

इसी दौरान शोको के खिलाफ कई रिपोर्ट भी दर्ज हुईं, जिन में कहा गया कि वह लोगों को प्रभावित कर अपने जाल में फंसा लेता है और फिर उन की संपत्ति व जमापूंजी ठग लेता है. मगर शोको की ख्याति के चलते उस पर किसी तरह की काररवाई का दुस्साहस किसी ने नहीं किया.

शोको का सब से बड़ा उपासक और प्रेमी था हिडीयो मुराई. वह कुशाग्र बुद्धि एस्ट्रोफिजिक्स वैज्ञानिक था. उस ने समाचार पत्र में शोको के विषय में पढ़ा था. उसी से प्रभावित हो कर उस ने अपना सब कुछ शोको के चरणों में रख दिया और उस के ‘अम परम सत्य’ पथ का शिल्पकार बन गया.

अनपढ़ ने उच्चशिक्षित लोगों को बनाया शिष्य

शोको बेशक अनपढ़ था, पर उस के शिष्य उच्चशिक्षित थे. क्योरा यूनिवर्सिटी का छात्र सेइहि एंडो पूर्णत: शोको को समर्पित हो गया था. वहीं जेनेटिक्स इंजीनियर मासा की टसुचीया भी अपना उज्ज्वल भविष्य छोड़ कर शोको की शरण में आ गया था. इस क्रम में फुमिरो जीपो भी शोको का परम शिष्य था, जो दूरसंचार अनुसंधानात्मक केंद्र में अध्ययन कर चुका था और अवास्तविक राष्ट्रीय अंतरिक्ष आविष्कार एजेंसी में कार्यरत था. वह भी सब कुछ छोड़ शोको के पास आ गया.

हिडीयो मुराई ने शोको के लिए एक ऐसी टोपी का आविष्कार किया, जिसे पहनते ही ऊर्जा प्राप्त होती थी. जब इस टोपी को पहना जाता तो वह स्वयं उस व्यक्ति से जुड़ जाती थी. इस अद्भुत टोपी की कीमत थी 70 हजार डौलर.

शोको के पास वैज्ञानिकों की एक पूरी टीम थी. इसी ने शोको के आदेश पर एस्ट्रल और कौस्मिक अस्पताल का निर्माण किया. इस अस्पताल में चमत्कारी दवाओं का निर्माण होता था. इन दवाओं को यह कह कर बेचा जाता था कि इस में शोको के रक्त का अंश है, जिसे सेवन करने से परम शक्ति प्राप्त होती है.

शोको असाहारा का ‘अम परम सत्य’ पंथ अब कयामतवादी संप्रदाय का रूप ले चुका था. कहते हैं कि इस संप्रदाय में आना आसान था, लेकिन निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था. शोको के एक 25 वर्षीय शिष्य ने यहां से लौटने की कोशिश की तो परिणामस्वरूप उसे शोको के तथाकथित बदमाशों ने बिजली का करेंट दे कर मौत की नींद सुला दिया. इसी शिष्य के दोस्त को जब इस बारे में जानकारी मिली तो उस के साथ भी यही हुआ.

शुजी तागुची नामक इस शिष्य की शोको के अन्य 4 शिष्यों ने गरदन पकड़ी और झटके से घुमा दी. ‘चट’ की आवाज हुई और शुजी का मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया. शुजी की लाश को एक पौलीथिन की थैली में भर कर उस पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी गई. लेकिन उन्होंने एक गलती यह कर दी कि शुजी के घर संदेश भिजवा दिया कि वह शोको असाहारा के कामों में व्यस्त है, इसलिए घर नहीं लौट पाएगा.

दिनबदिन होता गया खतरनाक

यह सुन उस के मातापिता का परेशान होना लाजिमी था. कई महीने तक वह बेटे के घर लौटने का इंतजार करते रहे. वह नहीं लौटा तो निराश हो कर उन्होंने वकील तस्तुमी साकोमाटो से संपर्क कर अपनी व्यथा बताई. तस्तुमी ने उन्हें काररवाई करने का आश्वसन दिया.

इस की खबर कुछ और अभिभावकों को भी लग गई थी, जिन के बच्चे घरबार छोड़ कर शोको की शरण में चले गए थे. इन में ओयामा नामक एक युवती के मातापिता भी थे. उन्होंने बताया कि उन की बेटी अपना घर छोड़ कर कई सालों से शोको के पास रहती है. लाख समझाने पर भी वह घर नहीं लौटी. वह उस से मिलना चाहते हैं तो शोको के शिष्य मिलने तक नहीं देते.

सच्चाई का पता लगाने के लिए तस्तुमी शोको के कानूनी सलाहकार योशींबु से मिला. उस ने ओयामा के मातापिता द्वारा लगाए गए आरोपों की बात कही तो योशींबु ने इसे सिरे से नकार दिया. तब तस्तुमी ने ओयामा का टीवी पर इंटरव्यू करवाने की बात कही. लेकिन योशींबु ने स्पष्ट जवाब न दे कर उसे टाल दिया. यह खबर शोको तक पहुंची तो वह घबरा गया. ओयामा के टीवी पर इंटरव्यू से उस के तथाकथित संप्रदाय की काली करतूत उजागर हो सकती थी.

वकील तस्तुमी उस के लिए खतरे की घंटी बन कर आया था. अत: शोको ने अपने शिष्यों से तस्तुमी को धमकी भरे फोन करवाए. तस्तुमी धमकी से डरा नहीं, बल्कि वह अब विभिन्न माध्यमों से लोगों को जागरूक करने लगा. उस ने इस सच को लोगों के सामने उजागर किया कि शोको पाखंडी है. उस ने अपने शिष्यों और शिष्याओं को बंदी बना कर रखा हुआ है.

तस्तुमी की इस हरकत से शोको बौखला उठा. उस ने अपने संप्रदाय के वैज्ञानिकों को बुला कर तस्तुमी का मुंह सदा के लिए बंद करने का उपाय करने को कहा. शोको के इस आदेश का पालन हुआ.

एक योजना के तहत शोको के वैज्ञानिक शिष्यों हिडीई मुराई, सातोरो हाशिमोटो और डा. नाकागवा ने एक थैली में पोटैशियम क्लोराइड के 7 इंजेक्शन तैयार किए. फिर तीनों योकोहामा रेलवे स्टेशन पर तस्तुमी का इंतजार करने लगे. मगर कई घंटे बीत जाने पर भी उन्हें वह दिखाई नहीं दिया.

इस योजना के फेल हो जाने पर गुस्साए शोको के तथाकथित बदमाश शिष्यों का ग्रुप रात 3 बजे तस्तुमी के घर पहुंच गया. शोर सुन कर उस के एक वर्षीय बेटे की नींद खुल गई. एकाएक इतने लोगों को देख वह रोने लगा. तभी डा. नाकागवा (ग्रुप सदस्य) ने बच्चे के हाथ में इंजेक्शन लगा कर उसे मौत की नींद सुला दिया.

अब तक शोर और बच्चे के रोने की आवाज सुन कर तस्तुमी और उस की पत्नी भी जाग गए थे. उन्हें काबू में कर के विरोध करने से पहले ही जहरीले इंजेक्शन लगा कर दुनिया से विदा कर दिया गया. फिर तीनों की लाशें कपड़े में लपेट कर अपने साथ लाए ट्रक में लाद दीं और दूर पहाड़ों के बीच पहुंच कर तीनों लाशों के दांत निकाल लिए. इस के बाद तीनों लाशों को समुद्र की गहराई में फेंक दिया. यह घटना 3 नवंबर, 1989 की है.

तस्तुमी, उस की पत्नी और बेटे की हत्या हो जाने की खबर फैली जरूर, पर पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला. न ही पुलिस शोको के खिलाफ कोई सबूत जुटा पाई.

शोको के कयामतवादी संप्रदाय के वैज्ञानिकों हिडीई मुराई और सीची एंडो ने अब तक मौत की नींद सुलाने वाले कई तरह के पदार्थों का आविष्कार कर लिया था.

इधर शोहरत की चरम पर पहुंच चुका शोको अब जापान पर हुकूमत करना चाहता था. सरकार को एक झटके में हटा कर खुद वहां का शासक बनने की उस की इच्छा तीव्र होती जा रही थी. शोको की ख्याति अन्य देशों में भी फैल चुकी थी. इसी का लाभ उठाते हुए एक योजना के तहत सन 1992 में शोको अपने दलबल के साथ रूस पहुंचा.

वहां के नेता उस से प्रभावित थे. अत: वहां उस का जोरदार स्वागत हुआ. अपनी योजना के अनुसार शोको ने अपने राजनैतिक दायरे को विस्तार देना शुरू कर दिया, ताकि उस की आड़ में वह रूस में रह कर आधुनिक हथियारों का निर्माण कर उन्हें जापान ला सके.

शोको असाहारा दिखावे के लिए साधारण संत की तरह था, पर उस की वास्तविक जिंदगी ऐश और विलासपूर्ण थी. उस के पास दुनिया की सब से महंगी 11 कारों में से एक मर्सिडीज व रोल्स रौयस भी थीं. शोको की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि कब वह जापानी सरकार को गिरा कर देश के तख्तोताज पर विराजमान होगा.

मौत का बड़ा खेल खेलना चाहता था शोको

सन 1993 में इसी के चलते शोको वापस जापान लौट आया. टोक्यो के बाहरी इलाके में स्थित अपनी 8 मंजिला इमारत को उस ने पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया. यहीं पर शोको के वैज्ञानिक एक गैस ‘बासीलुसांथ्राक्स’ जिसे एंथ्रेक्स नाम से भी जाना जाता था, बनाने में कामयाब हो गए. इसी गैस का प्रयोग अंगरेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान किया था.

एंथ्रेक्स का असर धीरेधीरे होता है. इस के नथुनों में पहुंचने पर पहले जुकाम व बुखार होता है, फिर मितली, उल्टी होनी शुरू हो जाती है. शरीर पर काले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं. मस्तिष्क में इस के पहुंचने पर व्यक्ति कोमा में चला जाता है, फिर अंत में उस की दर्दनाक मौत होती है. एंथ्रेक्स गैस की गंध आसपास के इलाकों में फैलने लगी थी. शोको की इमारत से निकलने वाली इस गंध पर कुछ लोगों को संदेह हुआ तो उन्होंने पुलिस से शिकायत कर दी.

पुलिस ने प्रयोगशाला में छापा मारा तो वहां से बस सोयाबीन आयल के ड्रम ही मिले. फलस्वरूप पुलिस ने शोको के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की. दरअसल, शोको भी पहुंचा हुआ खिलाड़ी था. उसे पहले से पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. इसीलिए उस ने अपनी इस विशाल प्रयोगशाला से संवेदनशील और आपत्तिजनक पदार्थ पहले ही गायब करवा दिए थे.

शोको चाहता था कि उस के वैज्ञानिक बेहद खतरनाक गैस सेरिन का निर्माण जल्द से जल्द करें, ताकि वह मौत का तांडव कर लोगों में दहशत फैला सके और इसे सरकार की नाकामयाबी कह कर उसे उखाड़ फेंके.

मौत के इस भयानक खेल को अंजाम देने के लिए शोको ने भाउट फुजी नामक अपनी इमारत में सेरिन गैस का आविष्कार व निर्माण करने के लिए अपने वैज्ञानिकों को दिनरात एक कर देने का आदेश दे दिया था. उस ने अब इस इमारत का नाम बदल कर ‘सायतान-7’ कर दिया था. इंसान की मौत निश्चित करने के लिए सेरिन गैस की नाममात्र की मात्रा ही काफी होती है.

लंबे प्रयास के बाद आखिर शोको के वैज्ञानिकों ने इस गैस का निर्माण कर लिया. अब उस के वैज्ञानिकों, शिष्यों, सदस्यों और कर्मचारियों को इंतजार था तो बस अपने आका शोको के आदेश का, जिस से वह मौत का खेल खेल कर दहशत फैला सकें और अपने कयामतवादी संप्रदाय का लक्ष्य पूरा कर सकें.

टोक्यो की भूमिगत ट्रेन में प्रतिदिन करीब 10 लाख यात्री सफर करते थे. शोको का निशाना भूमिगत ट्रेन का सब से व्यस्ततम रेलवे स्टेशन था.

शोको के कहने पर शिष्यों ने रची बड़ी साजिश

20 मार्च, 1995 की सुबह के 8 बजे थे. टोक्यो वासी अंजान थे कि अगला पल उन की जिंदगी का काल बन कर आएगा. शोको का मुख्य वैज्ञानिक हिडीयो मुराई अपने 5 सहायकों कींची हीरोर, यासुओ हायाशी, मासानो योकोयामा, तोयीड़ा और डा. इराव हयाशी के साथ स्टेशन पर पहुंचा.

योजना के अनुसार सभी अलगअलग ट्रेनों में सवार हो गए. कासुमीगोसेकी स्टेशन आते ही हिडीयो के पांचों सहायकों ने छिपा कर रखे सेरिन के पैकेट खोल दिए. देखते ही देखते ट्रेनों में मर्मांतक चीखों से वातावरण थर्रा उठा.

ट्रेनों को रोका गया. जिसे जिधर जगह मिली, वह उधर ही अपनी जान बचाने को भागा. रेल प्रशासन भी हरकत में आ गया. इस भयावह स्थिति से निबटने के हर प्रयास किए गए. बावजूद इस के इस मौत के तांडव में 12 लोगों को जहां अपनी जान गंवानी पड़ी वहीं करीब 6 हजार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

इस घटना के बाद टोक्यो पुलिस ही नहीं, जापानी सरकार भी हिल गई. इसे आतंकवादी काररवाई मानते हुए इसे अंजाम देने वालों    को खतरनाक देशद्रोही आतंकी करार दिया  गया. टोक्यो की तमाम पुलिस और गुप्तचर संस्थाएं अपराधियों की तलाश में कमर कस कर जुट गईं.

घटना के 2 दिन बाद ही 22 मार्च, 1995 को करीब एक हजार पुलिसकर्मियों ने आखिर इस घटना को अंजाम देने वाले डा. इराव हयाशी, कीयोहीदी हायाकाता और टीमो मीस्तु नीमी के साथ शोको असाहारा के डेढ़ सौ शिष्यों को भी गिरफ्तार कर लिया.

अब तलाश थी मौत के सौदागार शोको असाहारा की. आखिर 16 मई, 1995 को दबिश दे कर शोको असाहारा को उस की ‘सायतान-7’ नामक इमारत से गिरफ्तार कर लिया गया. शोको असाहारा पर 11 सालों तक चले केस का अंतिम फैसला अक्तूबर, 2006 में आया.

11 सालों तक चले मुकदमे का अंतिम फैसला

जापान के सर्वोच्च न्यायालय ने कयामतवादी संप्रदाय चलाने वाले शोको को दी गई ‘मृत्युदंड’ की सजा पर अंतिम मोहर लगा दी. वैसे उसे यह सजा सन 2004 में ही सुना दी गई थी, पर शोको के वकीलों का तर्क था कि शोको की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है.

शोको ने केस की सुनवाई के दौरान कई बार सजा से बचने के लिए नाटक भी किया था. उस ने अपने वकीलों और बच्चों से बात करनी बंद कर दी, वह फर्श पर कुशन पर बैठता था और किसी बात का जवाब नहीं देता था. तब मनोवैज्ञानिकों ने उस की मानसिक दशा की जांच की और कहा कि वह जजों को गुमराह करने के लिए नाटक कर रहा है.

15 सितंबर, 2006 को जापान के सर्वोच्च न्यायालय ने बचावपक्ष की अपील फिर से सुनने के बाद उन की दलील को अंतिम तौर पर ठुकराते हुए शोको के गले में मौत का फंदा डालने का रास्ता साफ कर दिया. मगर उस के वकील कोई न कोई दलील पेश कर के उसे अब तक मौत से बचाए हुए थे. शोको की बेटी रायका मात्सुमोटा ने रहम के लिए कई बार गुहार लगाई.

मौत का खेल खेल कर दुनिया पर अपनी कयामतवादी हुकूमत स्थापित करने का ख्वाब सजाने वाला तथाकथित संत, एक्युपंक्चर विशेषज्ञ और आध्यात्मिक गुरु शोको असाहारा को 6 जुलाई, 2018 को फांसी पर लटका दिया गया.

शोको के साथ उस के 6 समर्थकों को भी फांसी की सजा दी गई. आखिरकार टोक्यो सबवे सेरिन गैस हमले के पीडि़तों को इंसाफ मिला. सालों से टोक्यो के लोग इस दिन का इंतजार कर रहे थे, जिन्होंने इस हमले में अपनों को खो दिया था. पिछले 23 सालों से उस दर्द को सीने में दबाए इन लोगों के चेहरे नम आंखों के साथ खुशी से खिल उठे.

मैं एक युवक से प्यार करती हूं. हम दोनों में कई बार शारीरिक संबंध भी बने. अभी उस ने मुझसे मिलना छोड़ दिया है. कहीं सैक्सपूर्ति के कारण तो उस ने मिलना नहीं छोड़ दिया.

सवाल
मैं एक युवक से 3 वर्षों से प्यार करती हूं. एक वर्ष पूर्व हम दोनों में कई बार शारीरिक संबंध भी बने. फिर हम ऐसे ही मिलते रहे. लेकिन पिछले महीने उस ने मुझ से साफ कह दिया कि अब हम तभी मिलेंगे जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा और मिलना बंद कर दिया. हां, फोन पर हमारी रोज बात होती है. मेरा उस के बिना मन नहीं लगता. कहीं सैक्सपूर्ति के कारण तो उस ने मिलना नहीं छोड़ दिया? कहीं वह मुझे धोखा तो नहीं दे रहा?

जवाब
आप का प्यार अगर शारीरिक संबंध की पूर्ति के कारण टूटना होता तो एक वर्ष पहले यह पूर्ति हो गई थी, तभी टूट जाता, लेकिन वह युवक आप को पाना चाहता है, इसी कारण उस ने संबंध रखा.

अब उसे लगता होगा कि इस मिलने मिलाने के चक्कर में कैरियर नहीं बना पा रहा. यही सोच कर कुछ समय की दूरी रख वह हमेशा का साथ चाहता है.

धैर्य रखिए आप का प्रेमी आप को धोखा देगा, ऐसा नहीं लगता. आप उस की सहायक बनिए. जब वह फोन करे, उसे उस के लायक जौब के बारे में बताइए व प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने को कहिए. साथ ही, अपना भी कैरियर बनाइए. फिर जब दोनों अपने पैरों पर खड़े होंगे तो यकीनन दोनों ओर से प्यार की सहमति भी मिलेगी और हमेशा का साथ बनेगा.

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जानिए आखिर महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं

महिलाएं किसी पुरुष को आखिर क्‍यों पसंद करती हैं? और ऐसी कौन सी खास बात है जिससे प्रभावित होकर वह किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाने के लिए अपने आप को राजी करती हैं? इस तथ्‍य पर रिसर्च करने के बाद टैक्‍सास विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने एक किताब लिखी है. इस किताब का नाम है वॉय वुमन हैव सेक्‍स. किताब सेक्‍स संबंधों को लेकर महिलाएं क्‍या सोचती हैं? इस सवाल पर कई रोचक खुलासे करती है, किताब में इस बात के 200 कारण बताए गए है, जिनके चलते महिलाएं किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाती हैं या उसे पसंद करती हैं.

टेक्सस यूनिवर्सिटी में साइकॉलजी के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस की लिखी किताब – वाय वुमेन हेव सेक्स ( महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं ) में करीब 200 कारणों को बताया गया है.

रिसर्च के दौरान देखा गया कि ज्यादातर पुरुषों को महिलाएं सेक्सुअली अट्रैक्टिव लगती हैं , जबिक महिलाओं को पुरुषों में ऐसी कोई बात नज़र नहीं आती. रिसर्च के दौरान 1000 महिलाओं का इंटरव्यू किया , जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ सोने के अपने कारण बताए.

एक महिला ने बताया – वह सेक्स इसलिए करती है ताकि बोरियत दूर कर सके क्योंकि सेक्स करना लड़ने से कहीं आसान है. जबकि कुछ दूसरी महिलाओं के लिए यह माइग्रेन और सिरदर्द दूर भगाने का उपचार है.

रिसर्च में कुछ महिलाओं ने ऐसी बातें भी कहीं जिन्हें सुनकर हैरानी हो सकती है. कुछ महिलाएं महज दया की वजह से पुरुषों के साथ सोती हैं जबकि कुछ महिलाएं अपने स्वार्थ के लिए सेक्स का इस्तेमाल करती हैं जैसे रुपये – पैसों के लिए और दूसरी कीमतों चीजों को हासिल करने के लिए.

कुछ ने कहा – मैंने किसी पुरुष के साथ इसलिए संबंध बनाए क्योंकि उसने मेरे लिए एक शानदार डिनर का आयोजन किया या उसने मुझ पर काफी रुपये खर्च किए.

यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों पर किए गए इस सर्वे में 10 में से 6 ने माना कि वह आमतौर पर ऐसे पुरुष के साथ सो चुकी हैं जो उनका बॉयफ्रेंड नहीं हैं. कुछ ने कहा – वह सेक्स इसलिए करती हैं ताकि अपनी सेक्सुअल परफॉर्मंस को इंप्रूव कर सकें. यही बताते हुए एक विद्यार्थी ने कहा – मैंने अपने बॉयफ्रेंड के साथ इसलिए सेक्स किया ताकि मैं अपने सेक्सुअल स्किल्स को और बेहतर बना सकूं.

इस रिसर्च में यह भी पता चला कि महिलाएं ऐसे पुरुषों पर ज्यादा आकर्षित होती हैं जो लंबे हों, जिनकी आवाज़ रौबदार हो और जिनके शरीर से मदहोश कर देने वाली महक आती हो.

 

 

इस तरह की फिल्म करना चाहती हैं मानुषी छिल्लर…

मिस वर्ल्ड 2017 मानुषी छिल्लर ऐक्टिंग की दुनिया में छा जाने के लिए तैयार हैं. अब वह बौलीवुड में काम का सही मौका तलाश रही हैं. उनका कहना है कि वह ऐक्शन फिल्म प्रोजेक्ट में काम करना पसंद करेंगी. मानुषी ने बताया, ‘मुझे ऐक्शन मूवी पसंद हैं और खासकर वे जिनमें मुझे ऐक्शन करने का मौका मिले. मुझे सुपरहीरो बनना है.’

बता दें कि जब मानुषी मिस वर्ल्ड बनी थीं तब ऐसी खबरें आई थीं कि करण जौहर मानुषी को लॉन्च करना चाहते थे, यह पूछने पर वह बताती हैं, ‘मेरे पास कोई प्रॉडक्शन हाउस नहीं है तो मैं नहीं बता सकती कि मेरी फिल्में कब आएंगी. जिंदगी में सबकुछ अपने आप होता है, एक सरप्राइज की तरह, इसलिए जब फिल्में आनी होंगी तो आ जाएंगी.’

हरियाणा को मिस इंडिया कौन्टेस्ट में रिप्रेजेंट करने वाली मानुषी छिल्लर ने फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीतने के बाद मिस वर्ल्ड का क्राउन जीता है. ब्यूटी क्वीन बनने के बाद जिंदगी कैसी गुजर रही है? इस पर मानुषी कहती हैं, ‘अब तक तो सब अच्छा है. मिस वर्ल्ड का खिताब हासिल किए हुए 11 महीने बीत चुके हैं. मैंने सारी दुनिया घूम ली है. बहुत से लोगों से मिली हूं, पिछले 11 महीने मेरी जिंदगी में रोलरकोस्टर राइड जैसा अनुभव रहा. मैंने बहुत कुछ सीखा है. इतना तो पिछले 11 साल में भी नहीं सीखा था. इसके बाद मुझे नहीं पता कि अगले साल क्या होने वाला है.’

गौरतलब है कि मानुषी छिल्लर मेडिकल स्टूडेंट हैं. उन्होंने मिस वर्ल्ड की तैयारी के लिए पढ़ाई से ब्रेक लिया था. यह पूछे जाने पर कि क्या वह लोगों का इलाज करना चाहती हैं? मानुषी कहती हैं, ‘मैं तो चाहती हूं कि लोग बीमार ही नहीं पड़ें. उनको डाक्टर के पास न जाना पड़े. लेकिन 3 साल के बाद लोग डाक्टर मानुषी छिल्लर के पास आ सकते हैं, तब तक मेरी मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो जाएगी.’

शर्मनाक : सीवर में दम तोड़ते सफाई मुलाजिम

14 सितंबर, 2018 को दिल्ली के डाबड़ी इलाके में सीवर की सफाई करते हुए अनिल नामक एक नौजवान की मौत हो गई. सफाई ठेकेदार द्वारा अनिल को 20 फुट गहरे सीवर में कमजोर रस्सी के सहारे नीचे उतार दिया गया था. रस्सी टूटने की वहज से अनिल सीवर में जा गिरा और उस की मौत हो गई. अनिल को किसी तरह के बचाव उपकरण मुहैया नहीं कराए गए थे.

इस से पहले 9 सितंबर, 2018 को दिल्ली के ही मोतीनगर के कैपिटल ग्रीन डीएलएफ अपार्टमैंट्स में सीवर की सफाई करते हुए 5 नौजवान मौत के मुंह में समा गए थे. मारे गए लोगों में 22 साल का राजा, 20 साल का विशाल, 24 साल का पंकज, 19 साल का सरफराज और 23 साल का उमेश था.

सीवर में सफाई करने वाले मुलाजिमों की मौतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं. ऐसी घटनाओं का अब तक न रुकने वाला एक सिलसिला बन गया है. इन घटनाओं की खबरें मीडिया की सुर्खियां बन कर खत्म हो जाती हैं पर शासनप्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती.

साल 2015 में बृहन्मुंबई नगरपालिका ने बताया था कि साल 2009 से ले कर साल 2015 के बीच 1386 सफाई मुलाजिमों की मौत हो गई थी. राष्ट्रीय कर्मचारी आयोग के मुताबिक, 1 जनवरी, 2017 से 31 सितंबर, 2017 तक सीवर में 132 मौतें हो गई थीं. इसी साल जनवरी से अब तक 89 जानें चली गई हैं.

अकेले दिल्ली में एक साल में 17 मौतें हो गईं. पिछले 5 सालों में दिल्ली में 74 सफाई मुलाजिमों की मौत सीवरों और सैप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान हुई हैं.

25 सितंबर, 2018 को इन मौतों को ले कर दलित संगठनों ने दिल्ली के जंतरमंतर पर प्रदर्शन किया और सीवर से होने वाली मौतें रोके जाने के लिए ठोस उपाय करने की मांग की गई.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि कैसी भी इमर्जैंसी में बिना सुरक्षा उपाय, उपकरणों और कपड़ों के सीवर में जाना अपराध है. इस के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता. सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में कहा गया है कि सफाई मुलाजिम के पास मास्क, ऐनक, जूते, दस्ताने, इमर्जैंसी सुरक्षा बैल्ट जैसे सुरक्षा सामान होने चाहिए. काम के वक्त एंबुलैंस गाड़ी खड़ी होनी चाहिए और बड़े अफसर की देखरेख में सीवर या सैप्टिक टैंक की सफाई की जानी चाहिए.

साल 1993 में देश में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने को ले कर पहला कानून आया था. बाद में 2013 में इस से संबंधित दूसरा कानून आया था जिस में सीवरों और सैप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर बैन है पर 2 कानूनों व अदालतों के आदेश के बावजूद जमीनी लैवल पर कोई बदलाव नहीं हुआ है. तमाम दिशानिर्देशों के बावजूद मौतों का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा है.

जानकारों का कहना है कि सीवरों और सैप्टिक टैंकों में गैसें इस कदर जहरीली होती हैं कि आदमी के एक बार सांस लेते ही मौत हो जाती है.

सीवेज सिस्टम में पैदा हो कर इकट्ठा होने वाली जहरीली गैसों का एक खतरनाक मिश्रण होता है. इन में हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया, मीथेन, कार्बन मोनोऔक्साइड, सल्फर डाईऔक्साइड, नाइट्रोजन औक्साइड शामिल होती हैं.

सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और मैगसेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक, सफाई मुलाजिमों की समस्याओं को ले कर किसी को चिंता नहीं है. सरकारें चुप हैं. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. यूरोप और दूसरे देशों में सीवेज सफाई के लिए मौडर्न उपकरणों का इस्तेमाल होता है और वहां सफाई मुलाजिमों की मौत न के बराबर होती है.

वे आगे कहते हैं कि सैप्टिक टैंक देश के कोनेकोने में हैं. जब ये भर जाते हैं तो सफाई मुलाजिमों को इन्हें साफ करने की जिम्मेदारी दी जाती है. सरकार इस के लिए कोई पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं करती या टैक्नोलौजी क्यों नहीं लाती है?

दरअसल, सीवर की सफाई का धंधा हिंदू जाति व्यवस्था का निम्नतम वंशानुगत पेशा है. जाति व्यवस्था में सब से निचली जातियों के हिस्से में साफसफाई, मरे पशुओं को उठाना, उन्हें ठिकाने लगाना जैसे काम आए हैं.

इसी व्यवस्था के चलते देशभर में लाखों सफाई मुलाजिम हर रोज अपनी जान जोखिम में डाल कर सीवर और गटर को साफ करते हैं. इन में ज्यादातर स्थानीय निकायों में ठेके पर काम करने वाले होते हैं. रोजीरोटी की कमी में बेहद गरीबी के चलते वे लोग यह काम करने पर मजबूर हैं.

आज भी लाखों लोग इस पेशे से जुड़े हुए हैं. सालों पहले मैला ढोने पर बैन लगने के बावजूद देश में तकरीबन 10 लाख परिवार यह गंदा काम करने पर मजबूर हैं.

आज दुनिया दूसरे ग्रहों पर घर बनाने की योजना बना रही है, बड़ेबड़े सैटेलाइट अंतरिक्ष में पहुंचाए जा रहे हैं पर गटरों की सफाई का काम अभी भी रोटी के लिए मजबूर हाथों से ही कराया जा रहा है. भले ही हम ने कितनी ही वैज्ञानिक तरक्की कर ली हो पर इन मौतों के पीछे शासनप्रशासन की पुरानी सोच ही जिम्मेदार है.

जहरीली गैसों से भरी सीवर लाइनों की सफाई करने वालों की सुरक्षा के प्रति हमारी पूरी व्यवस्था घोर लापरवाही से ग्रस्त है. अगर यंत्रों से सुरक्षा इंतजाम किए जाते तो ये मौतें नहीं होतीं.

ऐसा नहीं है कि साफसफाई के लिए आधुनिक व्यवस्था नहीं है. यंत्र हैं, औजार हैं, पर शहरों के शासक इन पर पैसा खर्च करने को तैयार नहीं हैं.

सरकार इसलिए नहीं चाहती क्योंकि मैला साफ करना, साफसफाई करना हमारी सामाजिक व्यवस्था में निचली जातियों के जिम्मे है और इस वर्ग के लोगों को इनसान नहीं समझा जाता.

दलितों के साथ सदियों से ही भेदभाव बरता गया है. उन्हें कीड़ेमकोड़ों की तरह समझा गया है इसलिए आज तक ऐसी मौतों के मामले में किसी को भी सजा नहीं दी गई है. मुआवजे के आदेश के बावजूद भी पैसा नहीं दिया जाता है.

यह इस तबके के प्रति पुरानी सामाजिक सोच का नतीजा है. समाज के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया है. ऊंची जाति के लोगों का सोचना है कि गंदा काम करना निचली जातियों के पिछले जन्मों के कर्मों का नतीजा है. उन के द्वारा किए गए पापों का फल है इसलिए शासनप्रशासन में बैठे ऊंची जाति के लोग साफसफाई करने वालों के साथ पुरानी सोच के हिसाब से बरताव कर रहे हैं.

साफसफाई करने वालों ने भी इसे अपनी किस्मत मान लिया है इसलिए शासनप्रशासन इन मौतों को रोकने के लिए गंभीरता से कोई ठोस उपाय नहीं कर पाता है.

रोजगार के मौके : हर चुनाव का यही मुद्दा

तकरीबन हर चुनाव में ‘रोजगार के मौके’ एक अहम मुद्दा होता है. नेता चुनाव प्रचार के दौरान नौजवानों को रोजगार देने और रोजगार के मौके देने का वादा करते हैं. यह बात और है कि चुनावी मौसम के खत्म होते ही नेताओं के वादों का सैलाब बरसाती नदी की तरह सूख जाता है.

राकेश मेरे पड़ोस में ही रहता था. स्कूल भेजा गया, पर पढ़ाई पूरी न कर पाया. अब जिस देश में बड़ेबड़े डिगरीधारी घर बैठे हैं, वहां राकेश को नौकरी मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता. जबरदस्ती पिता की राशन की दुकान पर बैठा दिया गया, लेकिन राकेश का दिल न लग पाया आटादाल बेचने में और इस वजह से इतना बड़ा नुकसान हो गया कि दुकान ही बंद हो गई और बेटे के साथ बाप भी बेरोजगार हो गया.

वह तो भला हो दादा का जो सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, इसलिए आटा दाल बेचना तो बंद हो गया लेकिन घर में आटा दाल की कमी न हुई.

अब लड़का घर बैठा था लेकिन दादी को परपोते का मुंह देखे बिना इस दुनिया से जाना मंजूर नहीं था तो राकेश की शादी करा दी गई. कुछ सालों में ही वह 2 बच्चों का बाप बन गया और ‘मरती हुई दादी’ अभी तक खैर से हैं.

राकेश की जिंदगी में सबकुछ था सिवा रोजगार के. कई चुनावी मौसम आएगए लेकिन रोजगार का कोई मौका न आया. कई साल बेमतलब की खाक छानने के बाद उस ने खुद ही रोजगार के मौके तलाश लिए और ‘हिंदुत्व की रक्षा’ का बीड़ा उठा लिया. राकेश धर्म के रखवालों की नजर में आ गया और एक हिंदूवादी संगठन का सदस्य हो गया.

10वीं जमात फेल राकेश अब राकेश कुमार योगी के नाम से मशहूर है. कल तक वह हर जगह कोसा जाता था, आज इज्जतदार है. उस ने साबित किया कि रोजगार के मौके खुद ही बनाने होते हैं, कोई सरकार नहीं देती.

अब दिलीप को ही देख लीजिए. वे काफी पढ़ेलिखे हैं. कई अखबारों में भी काम कर चुके हैं लेकिन नौकरी में टिक नहीं पाते. संपादक से अकसर अनबन हो जाती है. या तो वे खुद ही निकल जाते हैं या फिर निकाल दिए जाते हैं.

लेकिन सूचना का अधिकार का कानून उन के लिए वरदान साबित हो गया. पत्रकारिता छोड़ दी और बन गए सामाजिक कार्यकर्ता. भ्रष्टाचार से संबंधित सूचनाएं इकट्ठी करते हैं और अदालत में जनहित याचिका दायर करते हैं.

अब जिस का ‘हित’ अहित हो सकता है वो दिलीप को कुछ ‘दे’ कर समाज की इस सेवा में अपने योगदान के साथ साथ दिलीप जी की मदद भी कर देता है. एक पंथ दो काज हो रहे हैं. समाज की ‘सेवा’ भी हो रही है और खुद का भी काम हो रहा है. आखिर भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए ‘इनाम’ तो उन्हें मिलना ही चाहिए. उन के बेटे अंगरेजी स्कूल में मुफ्त में पढ़ते हैं. स्कूल के पास कुछ जरूरी कागजात नहीं हैं और दिलीप याचिका न दायर कर दें कहीं. स्कूल का नाम खराब हो जाएगा और भी कई मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. इस से तो अच्छा है कि दिलीप के बेटों को ‘शिक्षा दान’ ही दे दिया जाए.

दिलीप अपनी चिंता से मुक्त हो कर ‘समाजसेवा’ में लगे हुए हैं और देश की बदहाली की वजह पर चिंता जाहिर करते हुए पाए जाते हैं.

रोजगार के मौकों की कमी को कुसूरवार ठहरा कर बेरोजगार रहना कोई सही बात है क्या? और मान लीजिए कि नौकरी मिल भी गई तो कितना पैसा कमा लेगा कोई, इसलिए नौजवानों के लिए सही है कि वे मौके की कमी को ले कर सरकार को न कोसें बल्कि समाजसेवा से जुड़ जाएं.

अब जिन लोगों ने ‘सांसारिक मायामोह’ का त्याग कर दिया है वे अपने कपड़ों का रंग बदल कर रोजगार के नए मौके पैदा कर लेते हैं लेकिन सभी तो सांसारिक माया त्याग नहीं सकते क्योंकि परिवार के भरणपोषण की जिम्मेदारी है.

अब एक मास्टरजी ने बहुत कोशिश की कि लड़का कहीं सैट हो जाए. ‘ऊपर’ से भी कुछ देने को तैयार थे लेकिन कहीं बात न बनी. लड़के को न जाने कहां से आत्मबोध हुआ कि समाज में क्रांति लाना बहुत जरूरी है. वह भी कलम से. बस, एक साप्ताहिक अखबार निकाल कर संपादक बन बैठा और क्रांति की शुरुआत छोटे व्यापारियों के छोटे गुनाहों से परदा हटाने की हुई.

मास्टरजी शुरू में बहुत नाराज हुए लेकिन जब देखा कि सच में ‘क्रांति’ हो गई तब वह चुप हो गए. घर का पूरा हुलिया ही बदल दिया लड़के ने. नया टैलीविजन, नया सोफा, नई गाड़ी… ‘क्रांति’ की कहानी कहते थे.

कहां मास्टरजी लड़के को 15,000 रुपए की नौकरी दिला के सैट कराना चाहते थे लेकिन लड़का दिमाग वाला निकला, इसलिए रोजगार के मौके खुद ही तलाश करने चाहिए, न कि सरकार को कुसूरवार ठहराने में समय बरबाद करना चाहिए.

फर्जी इश्तिहारों के जरीए सत्ता पाने की बेताबी

राजस्थान में इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी चौसर बिछ चुकी है. 2013 में 200 में से 163 सीटें जीत कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी उस रिवाज को तोड़ने के लिए जद्दोजेहद कर रही है जो पिछले 20 सालों से राजस्थान में जारी है.

पार्टी एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस के बीच सत्ता की अदलाबदली के सिलसिले को तोड़ने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रही है.

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ‘राजस्थान गौरव यात्रा’ के जरीए प्रदेश को नाप रही हैं, वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी जगहजगह आयोजन कर पार्टी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए मंत्र दे रहे हैं.

इन सियासी दांवपेंचों के बीच वसुंधरा सरकार प्रचारप्रसार में भी जम कर पैसा बहा रही है. प्रिंट, इलैक्ट्रौनिक और सोशल मीडिया तो सरकारी इश्तिहारों से अटा हुआ है ही, राज्य के शहर, कसबे और गांव भी होर्डिंगबैनरों से भी अटे पड़े हैं.

इश्तिहारों की इस बाढ़ के बीच 30 अगस्त, 2018 को प्रदेश के अखबारों में एक पूरे पन्ने का इश्तिहार छपा था. इस में सरकार ने शिक्षा विभाग के कामकाज का लेखाजोखा पेश किया था.

दावा किया गया कि सरकार के बड़े कदमों की वजह से राजस्थान देश में 26वें नंबर से दूसरे पायदान पर पहुंच गया है. इस की पुष्टि करने के लिए इश्तिहार में 13 अलगअलग आंकड़ों का जिक्र है.

इश्तिहार में भरतपुर जिले के नंगला धरसोनी स्कूल के छात्र नितिन का फोटो और उस का बयान छपा है.

इस में लिखा है, ‘हमारे स्कूल में पंखे, फर्नीचर हैं, पीने का साफ पानी है और खेल का मैदान है. शिक्षक रोज आते हैं और अच्छा पढ़ाते हैं. स्कूल में खाना भी मिलता है और अब तो दूध भी मिलने लगा है. अब हमारे स्कूल में पहले से ज्यादा बच्चे पढ़ने लगे हैं. मेरा भी अब रोज स्कूल जाने का मन करता है. मुख्यमंत्री मैडम हमारे लिए अच्छा काम कर रही हैं. उन को धन्यवाद.’

जब नितिन के दावे की पड़ताल की गई तो चौंकाने वाली सचाई सामने आई. इश्तिहार में नितिन के हवाले से कहा गया है कि स्कूल में पंखे हैं. बिलकुल हैं, लेकिन इन्हें वसुंधरा सरकार ने नहीं बल्कि 8 साल पहले गांव के लोगों ने पैसा इकट्ठा कर के लगवाया था.

स्कूल में फर्नीचर होने का दावा तो पूरी तरह से फर्जी निकला. क्लासों में फर्नीचर के नाम पर टीचरों के बैठने की कुरसियों के अलावा कुछ भी नहीं है. ये भी वसुंधरा सरकार के आने से पहले की खरीदी हुई हैं.

छात्र दरीपट्टी पर बैठ कर पढ़ाई करते हैं. इन की बदहाली को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये 10-12 साल पुरानी हैं. स्कूल के ज्यादातर कमरों का फर्श उखड़ा हुआ है. कई कमरों में तो फर्श का नामोनिशान तक नहीं बचा है.

इश्तिहार के मुताबिक स्कूल में पीने का साफ पानी मुहैया है, लेकिन हकीकत में इस का यहां कोई इंतजाम नहीं है. स्कूल का हैंडपंप पिछले 4 साल से खराब पड़ा है. छात्र और टीचर अपने घर से पानी ले कर आते हैं.

अगर किसी का पानी खत्म हो जाए या लाना भूल जाए तो उसे आसपास के घरों में पानी पीने जाना पड़ता है.

स्कूल में पानी का पुख्ता इंतजाम नहीं होने की वजह से दोनों शौचालयों पर ताला लटका हुआ है. इस की वजह से स्कूल में पढ़ने वाली छात्राएं सब से ज्यादा परेशान हैं.

गांव वालों के मुताबिक, वे कई बार पानी का इंतजाम करने के लिए नेताओं और अफसरों से गुजारिश कर चुके हैं, लेकिन कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही.

जहां तक खेल के मैदान का सवाल है तो यह स्थापना के समय से स्कूल में है. हालांकि इस में छात्रों के खेलने की कोई सुविधा नहीं है. वैसे भी एक दर्जन नीम के पेड़ों की वजह से यहां खेलने की जगह बचती ही नहीं है.

छात्रों के मुताबिक, सुबह प्रार्थना सभा के अलावा यह मैदान उन के किसी काम नहीं आता. कभीकभी अपनी मरजी से लुकाछिपी जैसे पारंपरिक खेल जरूर खेलते हैं.

इश्तिहार में स्कूल में अच्छी पढ़ाई होने का दावा किया गया है, लेकिन अध्यापकों की कमी इस की पोल खोलती है. 8वीं तक के इस स्कूल में 7 पद स्वीकृत हैं, लेकिन अभी यहां सिर्फ 3 अध्यापक ही तैनात हैं.

प्रधानाध्यापक महेश मीणा संस्कृत पढ़ाते हैं और सतीश हिंदी, जबकि सुवरन सिंह प्रबंधक हैं. हैरत की बात  यह है कि स्कूल में गणित, विज्ञान और अंगरेजी जैसे महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले विषयों के अध्यापक नहीं हैं.

3 अध्यापक 8 कक्षाओं को कैसे पढ़ाते होंगे और पढ़ाई का लैवल कैसा होगा, यह समझा जा सकता है. प्रधानाध्यापक महेश मीणा कहते हैं, ‘‘हम 2 कक्षाओं को एकसाथ बिठा कर बच्चों को पढ़ाते हैं. बच्चों को सभी विषयों का कोर्स पूरा कराया जाता है.’’

राजस्थान सरकार के इश्तिहार में अगला दावा स्कूल में खाना और दूध मिलने का है. इस में कोई दोराय नहीं है कि वसुंधरा सरकार ने इसी साल जुलाई में अन्नपूर्णा दूध योजना शुरू की है. इस के तहत प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पहली से 8वीं कक्षा तक पढ़ने वाले 65 लाख छात्रों को हफ्ते में 3 दिन दूध दिया जाता है, लेकिन स्कूलों में दिए जाने वाले खाने में मौजूदा सरकार का कोई योगदान नहीं है.

स्कूलों में दोपहर का भोजन ‘मिड डे मील कार्यक्रम’ के तहत दिया जाता है. इस कार्यक्रम को केंद्र सरकार ने 15 अगस्त, 1995 को पूरे देश में लागू किया था. इसी के तहत साल 2004 में मैन्यू आधारित पका हुआ गरम भोजन देने का इंतजाम शुरू किया गया था.

इश्तिहार में स्कूल में छात्रों की तादाद बढ़ने का दावा भी सफेद झूठ है. स्कूल में वर्तमान में छात्रों की नामांकन संख्या 106 है. पिछले कई सालों से यह तादाद इस के इर्दगिर्द ही रही है. स्कूल का रिकौर्ड इस की पुष्टि करता है और गांव वाले भी यही कहते हैं.

यानी राजस्थान सरकार ने 30 अगस्त को अखबारों में छापे गए इश्तिहार में छात्र नितिन के जरीए स्कूल के कायाकल्प से जुड़े जो 7 दावे किए हैं, उन में से 6 फर्जी हैं, सिर्फ दूध मिलने का दावा सही है.

हैरानी की बात यह है कि खुद नितिन को अपने स्कूल की तथाकथित खूबियों की जानकारी अखबार में छपे इश्तिहार से ही पता चली.

इस बारे में जब नितिन से यह सवाल पूछा कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उन के स्कूल के लिए क्या किया है तो वह कुछ भी बता नहीं पाया. हालांकि उस ने इश्तिहार में छपे खुद के फोटो और उन के हवाले से कही गई कई बातों का भेद जरूर खोला.

नितिन ने बताया, ‘‘मैं सर के कहने पर जयपुर गया था. वहीं पर मेरा फोटो खिंचा था. वहां मुझ से किसी ने स्कूल के बारे में कुछ भी नहीं पूछा और न ही मैं ने कुछ बताया.’’

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि खुद के मौजूदा कार्यकाल को कांग्रेस के 50 साल के शासनकाल से बेहतर बताने वाली वसुंधरा सरकार को उपलब्धियों का तथाकथित अंबार होने के बावजूद फर्जी दावे क्यों करने पड़ रहे हैं?

इश्तिहार के इस गड़बड़झाले के बारे में पूछने के लिए शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी से कई बार संपर्क किया गया, लेकिन वे न तो अपने सरकारी आवास पर मिले और न ही फोन पर उपलब्ध हुए.

वैसे, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से जारी होने वाले इश्तिहारों में गड़बड़ी का यह पहला मामला नहीं है.

8 सितंबर को प्रदेश के अखबारों में छपे इश्तिहार में भी एक चूक सामने आ चुकी है. इस में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 37.2 लाख परिवारों को एलपीजी गैस कनैक्शन देने का जिक्र है और प्रधानमंत्री आवास योजना में 12 लाख से ज्यादा घरों के निर्माण की जानकारी है.

इस संबंध में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट कहते हैं, ‘‘राजस्थान की सरकार ने इश्तिहार में जो झूठ बोला है उस के लिए प्रदेश की जनता से माफी मांगनी चाहिए. इस इश्तिहार पर सरकारी खजाने का जो पैसा खर्च हुआ है उसे भाजपा को राजकोष में जमा कराना चाहिए.

‘‘भरतपुर के इस स्कूल की नहीं, प्रदेश के ज्यादातर स्कूलों की ऐसी ही हालत है. हजारों स्कूलों को बंद करने वाली यह सरकार किस मुंह से अपनी पीठ थपथपा सकती?है.’’

वहीं, मुख्यमंत्री रह चुके व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत का कहना है, ‘‘भाजपा को केवल मार्केटिंग करना और लोगों को झांसे में फंसाना आता है. झूठ बोलना और फर्जी दावे करना इन की फितरत है. वसुंधरा सरकार ने कोई काम किया हो तो इसे लोगों को गिनाएं. जब बताने के लिए कुछ है ही नहीं तो इसी तरह की फर्जी कहानियां सुनाई जाएंगी.’’

अशोक गहलोत आगे कहते हैं, ‘‘इस से बड़े शर्म की बात और क्या होगी कि राज्य की भाजपा सरकार फर्जी इश्तिहार पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए फूंक रही है. इन्होंने पहले सरकारी खर्चे पर प्रधानमंत्री का जयपुर में कार्यक्रम किया, फिर ‘गौरव यात्रा’ निकाली. हाईकोर्ट ने इन के मुंह पर तमाचा मारा है.

‘‘ये लोग कितनी भी कोशिश कर लें, कितना भी झूठ बोल लें, लेकिन राजस्थान की जनता अब इन के झांसे में नहीं आएगी. इन की विदाई तय है.’’

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