जहां से चले थे (भाग-1): क्या संध्या को मिल पाया अपने सपनों का राजकुमार

मां को अग्नि के सुपुर्द कर के मैं लौटी तो पहली बार मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दुनिया में बिलकुल अकेली रह गई हूं. श्मशान पर लिखे शब्द अभी भी मेरे दिमाग पर अंकित थे, ‘यहां तक लाने का धन्यवाद, बाकी का सफर हम खुद तय कर लेंगे.’ मां तो परम शांति की ओर महाप्रस्थान कर गईं और मुझे छोड़ गईं इस अकेली जिंदगी से जूझने के लिए.

मां थीं तो मुझे अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच सा प्रतीत होता था. शाम को जब तक मैं आफिस से न लौटती, उन की सूनी आंखें मुझे खोजती रहतीं और मुझे देख कर अपना सारा प्यार उड़ेल देतीं. मैं भी मां को सारे दिन के कार्यक्रमों को बता कर अपना जी हलका कर लेती. आफिस में अपनी पदप्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मुझे एक चेहरा ओढ़ना पड़ता था पर घर में तो मैं मां की बच्ची थी, हठ भी करती और प्यार भी. पर अब मैं बिलकुल अकेली पड़ गई थी.

कुछ दिन बाद आफिस के केबिन में बैठ कर मैं सामने दीवार पर देखने लगी तो मन में खयाल आया कि पापा के फोटो के साथ मां की भी फोटो लगा दूं, इतने में दरवाजा खोल कर मेरे निजी सचिव ने आ कर बताया कि कुछ जरूरी कागज साइन करने हैं, जो टेबल पर ही रखे हैं.

‘‘मिश्राजी, मेरी मानसिक हालत अभी ठीक नहीं है. मैं अभी कोई भी निर्णय नहीं ले सकती. अभी तो मां को गुजरे 4 दिन भी नहीं हुए हैं और…’’ इतना कह कर मैं भावुक हो गई.

‘‘सौरी, मैडम, मुझे इस समय ऐसा नहीं कहना चाहिए था,’’ कह कर वह वापस जाने लगे.

‘‘मिश्राजी, एक मिनट,’’ कह कर मैं ने उन्हें रोका और पूछा, ‘‘अच्छा, ब्रांच मैनेजर का इंटरव्यू कब है?’’

‘‘मैडम, चेयरमैन साहब खुद इस इंटरव्यू में बैठना चाहते हैं. आप कोई भी डेट…मेरा मतलब है जब भी आप कहेंगी मैं उन्हें बता दूंगा,’’ कह कर मिश्राजी चले गए.

हमारी मल्टीनेशनल कंपनी देश की 5 बड़ी ब्रांचों के लिए कुशल मैनेजर रखना चाहती थी. 6 महीने से चल रहे ये महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू अब निर्णयात्मक दौर में थे. उन का वार्षिक पैकेज भी 10 लाख रुपए का था. यानी मुझ से आधा. चेयरमैन को तो इस इंटरव्यू में आना ही चाहिए.

मैं अनमने और भारी मन से एकएक पत्र देखने लगी. मन कहीं भी टिक नहीं रहा था. मां की भोली सूरत बारबार आंखों के सामने तैर जाती. मैं ने सारी फाइलें बंद कर दीं और अपने सचिव को बता कर घर चली आई.

रिश्तेदार, सगेसंबंधी सब एकएक कर के जा चुके थे. महरी अपना काम समेट कर टीवी देख रही थी. शायद उसे इस का एहसास नहीं था कि मैं घर जल्दी आ जाऊंगी. उसे टीवी के पास बैठी देख कर मैं एकदम झल्ला गई और अपना सारा गुस्सा उस पर ही उतार दिया, फिर निढाल हो कर पलंग पर पसर गई.

थोड़ी देर में महरी चाय बना कर ले आई. मुझे इस समय सचमुच चाय की ही जरूरत थी. वह चाय मेज पर रख कर बोली, ‘‘मेम साहब, आप ही बताइए, मैं सारा दिन यहां अकेली क्या करूं. मांजी और मैं इस समय टीवी ही देखा करते थे. आप को पसंद नहीं है तो अपना घर खुद ही संभालिए,’’ कह कर वह तेजी से चली गई.

मेरे क्रोध और धैर्य की सीमा न रही. इस की इतनी हिम्मत कि मुझे कुछ कह सके, मेरी बात काट सके. वह इस बात पर मेरा काम छोड़ भी देती तो मैं उसे रोकती नहीं, चाहे बाद में मुझे कितनी ही परेशानी होती. झुक कर बात करना तो मैं ने कभी सीखा ही नहीं था. बचपन से आज तक मैं ने वही किया जो मेरे मन को भाया. जिस से सहमति नहीं बन पाती, उस से मैं किनारा कर लेती.

चाय पीने के बाद भी मुझे चैन नहीं आया. मैं बदहवास एक कमरे से दूसरे कमरे में बिना मकसद घूमती रही. मुझे लग रहा था कि मां की आकृति कहीं आसपास ही तैर रही है. मैं ने मां की तसवीर पापा की तसवीर के साथ लगा दी. उन की फोटो पर लगे गेंदे के फूल मुरझा कर पापा की तसवीर पर लगे नकली फूलों की शक्ल ले रहे थे.

मैं मां की तसवीर के पास जा कर उन्हें देखती रही और फिर बीते दिनों के ऐसे तहखाने में जा पहुंची जहां बहुत अंधेरा था. पर अंधेरा भी मैं ने ही किया हुआ था, वरना ये दोनों तो मेरे जीवन में उजाला करना चाहते थे.

मुझे अपना खोया हुआ बचपन याद आने लगा और मैं अपने ही अतीत के पन्नों को एकएक कर पलटने लगी.

इकलौती संतान होने के कारण मां और पापा का सारा प्यार मेरे ही हिस्से में था. जब भी पापा को कोई मेरे लड़की होने का एहसास करवाता, पापा हंस कर कहते कि यही मेरा बेटा है और यही मेरी बेटी भी. उन्होंने मेरी परवरिश भी मुझे बहुत सी स्वतंत्रता दे कर अलग ढंग से की थी. मां जब भी मुझे किसी लड़के के साथ देखतीं या देर शाम को घर आते देखतीं तो अच्छाबुरा समझाने लगतीं और पापा एक सिरे से मां की बात को नकार देते.

स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही मैं ने प्रोफेशनल कोर्स ज्वाइन कर लिया, साथ ही दूसरे वह सभी काम सीख लिए जो पुरुषों के दायरे में आते थे. मैं किसी भी तरह खुद को लड़कों से कम नहीं समझती और न ही उन को अपने ऊपर हावी होने देती थी. मेरे इस दबंग और अक्खड़ स्वभाव के कारण कई लड़के तो मेरे पास आने से भी डरते थे.

एक बार मैं कालिज टीम के साथ टेबलटेनिस का मैच खेलने सहारनपुर गई थी. रात को खाने के समय बातोंबातों में मुझे एक लड़के ने प्रपोज किया तो उस लड़के के कंधे पर हाथ रख कर मैं बोली, ‘एक बात तुम्हें साफसाफ बता दूं कि मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं और न ही मुझे आम लड़कियों की तरह हलके में लेना. दोबारा मेरे साथ नाम जोड़ने की कोशिश भी मत करना.’

वह लड़का तो चुपचाप वहां से चला गया पर मेरी अंतरंग सहेली वंदना ने मुझ से कहा, ‘इतना गुस्सा भी ठीक नहीं है संध्या. उस ने कौन सी तेरे साथ बदसलूकी की है, प्रपोज ही तो किया है. तू विनम्रता से इनकार कर देती, बातबात पर ऐसा रौद्र रूप दिखाना ठीक नहीं है.’ यह बात हमारे कालिज में दावानल की तरह फैल गई. मेरा कद 2 इंच और बढ़ गया. उस के बाद फिर किसी लड़के ने मेरी ओर आंख उठाने की भी हिम्मत नहीं की.

एम.बी.ए. करने के बाद मुझे एक से एक अच्छे आफर आने लगे. मैं भी दिखा देना चाहती थी कि मैं किसी से कम नहीं हूं. पापा का वरदहस्त तो सिर पर था ही. जहां मेरे साथ पढ़े लड़कों को 20 हजार के आफर मिले, मुझे 45 हजार का आफर मिला था.

पापा को अब मेरी शादी की चिंता सताने लगी, पर मैं अभी ठीक से सेटल नहीं हुई थी. वैसे भी मुझे अपने लिए एक ऐसा घरवर ढूंढ़ना था जो मेरी बराबरी और विचारों के अनुकूल हो. मैं पापा के अनुरोध को टालना भी नहीं चाहती थी और शादी कर के अपना आने वाला सुनहरा कल गंवाना भी नहीं चाहती थी. इसलिए पापा जब भी कोई रिश्ता ले कर आते मैं कोई न कोई कमी निकाल कर इनकार कर देती.

एक दिन मांपापा ने मेरी पसंद और नापसंद के बीच झूलते हुए दुखी मन से कहा, ‘शादी तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी. यही समाज का नियम है. तुम अपनी नहीं तो हमारी चिंता करो. लोग कैसीकैसी बातें करते हैं.’

पापा की जिद के सामने मुझे झुकना ही पड़ा और मैं विनम्रता से बोली कि जो आप को उचित लगे और मेरे विचारों के अनुकूल हो, आप उस से मेरा विवाह कर सकते हैं.

जल्दी ही एक जगह बात पक्की हो गई. लड़का भारतीय सेना में डाक्टर था. मुझे इस बात से संतोष था कि वह मेरे साथ नहीं रहेगा और मैं मनचाही नौकरी कर सकूंगी.

शादी के दिन मैं बड़े अनमने मन से तैयार हो रही थी. मुझे चूड़ा और कलीरें पहनना, महंगे लहंगे के साथ ढेर सारे जेवर और कोहनी तक मेहंदी रचाना आदि आडंबर लगे. मैं सोचती रही कि जल्दी से किसी तरह यह निबटे तो इस से मुक्ति मिले. हर शृंगार पर मैं पूछती कि इस के बाद तो कुछ नहीं बचा है.

‘क्यों, पति से मिलने की इतनी जल्दी है क्या?’ सहेलियों ने पूछा. कोई और अवसर होता तो मैं कभी का उन्हें भगा चुकी होती पर यह सामाजिक व्यवस्था थी उस पर मांपापा की इच्छा का भी खयाल था. जितनी देर होती रही मेरा धैर्य चुकता रहा.

उसी समय बरात आ गई. मेरी सहेलियां बरात देखने चली गईं और मैं अकेली कमरे में बैठी थी. तभी मेरे पास वाले कमरे से पापा की आवाज आई, ‘भाई साहब, हम से जो बन पड़ा है हम ने किया. कोई कमी रह गई हो तो हमें माफ कर दीजिए,’ मैं ने देखा, पापा हाथ जोड़ कर विनती कर रहे थे, ‘कार का इंतजाम इतनी जल्दी नहीं हो पाया वरना उसी में बिठा कर बेटी को विदा करता.’

‘कार की तो कोई बात नहीं, भाई साहब. बस, अपनी बेटी के महंगे गहने शादी के फौरन बाद ही उतरवा दीजिए.’

इतना सुनना था कि मेरे तेवर चढ़ गए. क्या मैं इतनी कमजोर और अनपढ़ हूं कि पापा को इतना कुछ देना पड़ रहा है. मैं ने वहीं पर तहलका मचा दिया कि इन दहेज के लालची लोगों के घर मैं नहीं जाऊंगी. चारों तरफ एक अफरातफरी का माहौल खड़ा हो गया. लड़के वालों को लोग अर्थपूर्ण नजरों से देखने लगे. पापा ने मुझे एक तरफ ले जा कर समझाने की कोशिश की, ‘बेटी, बात इतनी न बढ़ाओ कि संभालनी मुश्किल हो जाए,’ वे बोले, ‘लड़की की शादी में समाज और बिरादरी के भी कुछ नियम हैं. तुम क्या जानो कि क्या कुछ करना पड़ता है. बेटी पैदा होते ही अपना पिंजरा साथ ले कर आती है. इस में लड़के वालों की कोई गलती नहीं है.’

इतने में किसी ने पुलिस को खबर भेज दी. फिर क्या था, टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया. मैं ने जो सुना, देखा था, थोड़ा बढ़ाचढ़ा कर कह दिया.

लड़के और उस के घर वाले तो सलाखों के पीछे पहुंच गए और मुझे रातोंरात लोग पहचानने लगे. मैं इंटरव्यू पर इंटरव्यू देती रही और वे इसे छापते रहे.

उस के बाद तो कई सामाजिक संगठन और समाजसेवी संस्थाएं आ कर मुझे मानसम्मान देने के लिए समय मांगती रहीं.

कुछ दिनों में यह बात ठंडी हो गई, पापा ने थाने में कई चक्कर लगा कर उन्हें दहेज के आरोप से मुक्त करवा दिया पर उन पर लांछन तो लग ही चुका था. पापा उस दिन के बाद अंतर्मुखी हो गए और मां भी जरूरत भर की बातें ही करतीं.

उस हादसे से पापा इतना टूट गए कि दुनिया से उन्होंने नाता ही तोड़ लिया. हां, मरने से पहले पापा बता गए थे कि लड़के वालों की तरफ से कोई दहेज की मांग नहीं थी. कार देने का वादा तो मैं ने ही किया था और गहने उतरवाने की बात पहले से ही तय थी. देर रात को मेरा इतना शृंगार कर के होटल में जाना अनचाहे तूफान से बचने का उपाय था, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

वक्त गुजरता गया और वक्त के साथसाथ मैं ऊंचाइयां छूती गई. पापा की मृत्यु के बाद तो मां ने भी चुप्पी साध ली थी. मैं उन के दुख को अच्छी तरह जानती थी. उन्हें एक ही चिंता थी कि उन के बाद मेरा कौन सहारा होगा. एक दिन मां ने समझाते हुए कहा, ‘संध्या, जवान और खूबसूरत लड़की समाज की नजरों में वैसे भी खटकती रहती है. औरत कितनी भी सबल क्यों न हो उसे मजबूत सहारे की जरूरत पड़ती ही है, जो उसे समाज की बुरी निगाहों से बचा कर रखता है…’

‘मां, छोड़ो भी यह सब बातें. मैं तुम्हें दिखा दूंगी कि मुझे किसी सहारे की तलाश नहीं है. बस, समाज को समझाने और टक्कर लेने की हिम्मत होनी चाहिए,’ यह कह कर मैं वहां से उठ गई थी.

मां के कहे शब्द दिमाग में कौंधे तो मैं चौंक कर उठ बैठी. मांपापा का जो रक्षा कवच मेरे चारों ओर था वह अब टूट चुका था, अपना झूठा दंभ कहां दिखाती. घर के सभी काम, जो सुनियोजित ढंग से चल रहे थे, अब मुझे ही संभालने थे. मुझे इन 4 दिनों में ही अपना अंधकारमय भविष्य नजर आने लगा था.

क्रमशः

गैरजाति में शादी पर बवाल

तेलंगाना में एकसाथ 2 मामले सामने आए जिन में ऊंची जाति की लड़की के दलित युवकों से शादी पर लड़की के घर वालों का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया. एक मामले में दलित युवक को सरेआम पेशेवर हत्यारे से मरवा दिया गया और दूसरे में बेटी का हाथ काट डाला गया. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इन मामलों को ले कर बहुत सरगर्मी मच गई है, पर ऐसा सारे देश में हो रहा है, अभी से नहीं, सैकड़ों सालों से.

जैसेजैसे गिनेचुने दलित पढ़लिख कर अच्छे पदों पर पहुंच रहे हैं उन में और ऊंचों में दिखने में फर्क कम होता जा रहा है, लड़केलड़कियों में आपसी लगाव बढ़ रहा है. यह पंडों और समाज के ठेकेदारों को मंजूर नहीं क्योंकि हिंदू धर्म और समाज की रगों में राम, कृष्ण, शिव का खून बहे या नहीं बहे, जाति का जरूर बह रहा है और वे उस के एक कतरे को भी बिगड़ने नहीं देना चाहते.

रातदिन जो धर्म का ढोल पीटा जाता है, उस के पीछे छिपी बात यही होती है कि हिंदू धर्म में हो तो जाति को याद रखो. भगवाई साजिश के दौरान दलितों को पूजा करने का हक तो दे दिया गया है पर उन के अपने देवीदेवता को. उन के लिए खोदखाद कर ऊंचे देवीदेवताओं के दासों, मैल, कटे अंग, सेवकों की कहानियां गढ़ ली गई हैं और कौन किस देवता की पूजा करता है, उस से पता चल जाता है कि किस जाति का है. जैसे वाल्मीकि सफाई करने वालों को पकड़ा दिए गए कि इन्हें केवल वे ही पूजें. ऊंची जातियों के लोग वाल्मीकि मंदिरों के आगे फटकते भी नहीं हैं. यही काल भैरव का हाल है.

हैदराबाद की अमृता और प्रणय की शादी आर्य समाज मंदिर में हुई जहां अब सब से बड़ा काम ऊंचीनीची जातियों की शादियों का ही रह गया है. आर्य समाज का वेदों का डंका बजवाने का काम संघ ने अपने सिर पर ले लिया और 100 साल पहले बने मंदिर अब मैरिज सैंटर बन गए हैं. जाति का भेदभाव इस कदर है कि वहां जाते ही पता चल जाता है कि एक ऊंची जाति का है और दूसरा नीची जाति का.

ये मामले उत्तर भारत में बहुत हो रहे हैं. पर मीडिया पर यहां ऊंचों का कब्जा है और मामला दब जाता है. जो मरता है, उस के घर वाले डर कर शिकायत नहीं करते क्योंकि वे तो खुद नहीं चाहते थे कि शादी हो. अगर बच्चों में ऊंचीनीची जाति का फर्क हो तो नीची जाति के परिवार आमतौर पर घबराते हैं क्योंकि सदियों से ऐसे हर मामले में मरते वे ही रहे हैं.

70 साल के संविधान ने अभी कोई फर्क नहीं डाला है क्योंकि समाज तो वैसा का वैसा, चींटी की रफ्तार से चल रहा है.

बिग बी से आमिर ने क्यों कहा सौरी, जानिए वजह

मिस्टर परफेक्शनिस्ट  आमिर खान ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से महानायक अमिताभ बच्चन के साथ एक फोटो शेयर करते हुए उनसे माफी मांगी है. लेकिन इस तस्वीर को देखकर अंदाजा लागाया जा सकता है कि आमिर खान की मांफी मांगने के वजह क्या है.

आईए हम आपको बताते हैं, दरअसल यह तस्वीर बिग बी के गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ सेट की है. तो समझ गए होंगे आप, जी हां सही समझा आपने, जल्द ही ‘ठग्स ऑफ हिंदोस्तान’ के ये दोनों ‘ठग’ केबीसी के मंच पर साथ में नजर आने वाले हैं. इस फोटो को शेयर करते हुए आमिर सौरी बोले. साथ ही उन्होंने लिखा है कि मेरी सारी फरमाइशों के लिए माफ कीजिए, मैं खुद को नियंत्रित नहीं कर पा रहा था. इस बात से स्पष्ट है कि आमिर खान ने इस शो में अमिताभ बच्चन से कई फरमाइशें पूरी कराई हैं. तो होगा न, इस शो को देखना काफी दिलचस्प. इस शो में अमिताभ बच्चन और आमिर की नोक-झोक देखने को मिलेंगी.

अपको बता दें कि यह फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ एक्‍शन-एडवेंचर फिल्‍म ब्रिटिश लेखक और प्रशासक फिलिप मीडोज टेलर के 1839 के उपन्‍यास ‘कंफेशंस ऑफ ए ठग’  पर आधारित है. दरअसल इस एपिक में एक ऐसे ठग की कहानी है, जिसका गैंग 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों के लिए टेंशन की पुड़िया बन गया था.

आपको जल्द ही इस फिल्म से जुड़ी कई बातों के बारे में केबीसी के आने वाले एपिसोड में पता लग सकती है. आप इस एपिसोड में यह भी देख सकते हैं कि दोनों कलाकार एक दूसरे के साथ बेहद खुश और उत्साहित नजर आ रहे हैं.

गर्लफ्रैंड: हां में भी तकलीफ, ना में भी

रचित और सिद्धि में गहरी दोस्ती है. दोनों बाइक पर साथसाथ बेरोकटोक घूमतेफिरते हैं. रचित की मां सुधा कहती हैं, ‘‘अगर उन का बेटा अपनी गर्लफ्रैंड को घर ला कर मिलाए तो वे उस से मिलने से कैसे मना कर सकती हैं. आज की पीढ़ी के बच्चों को आप मना नहीं कर सकते?’’

लेकिन दुनियादारी की सीमाएं हैं. कोई भी मां नहीं चाहेगी कि उस का किशोर बेटा अपनी गर्लफ्रैंड के संग हाथ में हाथ डाले उस के सामने आ खड़ा हो.

बच्चों की आजादी पर मां को बाहरी टोकाटोकी का भी सामना करना पड़ता है. इसलिए ज्यादातर मांएं जानना चाहती हैं कि उन का बेटा किस से मिल रहा है? उस की गर्लफ्रैंड कैसी है? शायद यही कारण है कि मांएं अपने बेटे की शादी जल्दी और अपनी पसंद की युवती से करना चाहती हैं. मगर हर मां के लिए कुछ खास बातों पर ध्यान देना जरूरी है:

बेटे की पसंद

यदि आप के बेटे को कोई युवती बहुत पसंद है और वह उसे जीवनसाथी बनाना चाहता है, लेकिन आप उस की गर्लफ्रैंड को पसंद नहीं करतीं तो यह फीलिंग अपने तक ही रखें. अपने बेटे की गर्लफ्रैंड को गुलाब का कांटा न मानें. कांटे मां को नुकसान तो नहीं पहुंचाते हैं लेकिन चुभते जरूर हैं. बेटे पर एकाधिकार छिन जाने का भय मां को कुछकुछ सताने लगता है.

देख कर भी इग्नोर करें

अकसर जब बेटा अपनी मां को अपनी पसंद की युवती से मिलवाता है, तब आजकल की आधुनिक मां बाहरी मन से हां तो करती है लेकिन अंदर ही अंदर बेटे के हाथ से निकलने का डर उसे सताता है.

एक काउंसलर और पेरैंटल एडवाइजर का कहना है कि आप को मालूम होगा कि आप के बेटे के लिए क्या सही है और क्या गलत. आप अपने बेटे पर पूरी तरह से विश्वास भी करती हैं, लेकिन ऐसी कोई हरकत न करें जिस से आप के बेटे को लगे कि आप उस की दोस्त को नापसंद करती हैं. उसे उसी की गर्लफ्रैंड में लगने वाली नौनकंपीटिबल चीज के बारे में खुद न बता कर, उसे खुद एहसास होने दें. यदि आप का बेटा टीनएजर है और आप से अपनी रिलेशनशिप की बात छिपाता है, तो पहले थोड़ा इंतजार करें, फिर उस से खुद बात करें.

सैल्फ रैफ्लैक्ट

‘‘पता नहीं कैसी लड़की पसंद की है, मैं होती तो इस से भी अच्छी ढूंढ़ती. मान मेरी, गर्लफ्रैंड ही तो है, छोड़, पत्नी किसी और युवती को बना लेना.’’

अगर आप अपने बेटे की गर्लफ्रैंड की किसी आदत को पसंद नहीं करती हैं, तो आप की जिम्मेदारी है कि आप इस बात को इग्नोर करें. खुद की सोच में मौजूद नैगेटिविटी दूर करने की कोशिश करें. यह स्वीकार करना मुश्किल है, लेकिन जरूरी नहीं कि जो आप की नापसंद हो, वह दूसरे की भी नापसंद हो.

आप एक बार खुद की रिलेशनशिप में इन समस्याओं को झांक कर देखें. उस समय शायद आप दोनों पतिपत्नी भी विद्रोही स्वभाव के रहे होंगे. ऐसा ही आप का बेटा और उस की गर्लफ्रैंड है. इस बात का ध्यान रखें कि दोनों बच्चे हैं और आप ऐसे में उस लड़की से परफैक्ट होने की उम्मीद नहीं कर सकतीं. दुनिया में कोई भी व्यक्ति परफैक्ट नहीं हो सकता.

एक मौका दें

कई बार जब मां अपने बेटे की गर्लफ्रैंड से मिलती है तो मन में उस की खराब छवि ले कर आती है और बेटे के बारबार पूछे जाने या समझाने पर एक ही जवाब देती है, ‘रहने दे, मैं उसे अच्छी तरह से पहचान गई.’

यह इसलिए होता है क्योंकि शायद उस का आप पर पहला इंप्रैशन अच्छा नहीं रहा या फिर आप अभी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि आप के बेटे की भी कोई गर्लफ्रैंड हो सकती है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप उस की छोटीछोटी गलतियों पर बारबार बेटे से शिकायत करती रहें. उसे एक मौका दें. साथ ही खुद भी उस की पौजिटिव क्वालिटी को देखें. आप खुद सरप्राइज्ड होंगी जब उसे जानने की कोशिश करेंगी.

बात करें

‘अरे, वह तो बहुत बोलती है या जोर से हंसती है,’ इस तरह की बातें बेटे से न करें. बात करनी है तो उस की रिलेशनशिप के बारे में करें. लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि बातों के दौरान आप उस की गर्लफ्रैंड के बारे में शिकायत न करने लग जाएं. इस से वह आप से बात करना बंद कर सकता है.

इस के विपरीत यदि आप को पता चले कि बेटे और गर्लफ्रैंड के बीच कोई समस्या है तो उसे उस बात को सौल्व करने को कहें. इस से वह आप पर विश्वास कर रिलेशनशिप से जुड़ी सारी बातें आप को बताएगा. कई बार मां अनावश्यक रूप से बेटे पर दबाव बनाती है. इस से माहौल काफी घुटनभरा हो जाता है.

दोस्तों के साथ एंजौय या बाहर घूमनेफिरने पर भी मां की नजर रहती है. ऐसे में मां को अपने आचरण पर भी विचार करना होगा कि क्या सच में वे इस तरह का व्यवहार कर रही हैं? यदि सच में ऐसा है तो इस तरह के आचरण से किसी का भी भला नहीं होने वाला.

वक्त की जरूरत है कि हम सिर्फ मां बन कर नहीं बल्कि बेटे की दोस्त बन कर उस के साथ समय बिताएं.

आजकल अगर किसी लड़के की कोई गर्लफ्रैंड नहीं है तो भी उसे एक समस्या माना जाता है.

अभिभावक परेशान

अभिभावकों को जब यह एहसास होता है कि उन के किशोरवय बेटे की कोई गर्लफ्रैंड नहीं है तो उन के मन में अपने बच्चे के सैक्सुअल रुझान को ले कर तमाम खयाल उभरने लगते हैं. खासतौर से ऐसे समय पर जब समलैंगिक संबंधों को समाज स्वीकृति देने लगा हो.

डिप्रैशन में आ जाते हैं युवक

मेरी सहेली सीमा का बेटा मुंबई के एक होस्टल में रहता है. वह फाइनल ईयर का स्टूडैंट है. इस बार जब वह घर आया तो काफी परेशान दिखा. कारण सिर्फ यह था कि स्मार्ट और पढ़ाई में अच्छा होते हुए भी उस की कोई गर्लफ्रैंड नहीं थी  और जब वह क्लास खत्म होने के बाद होस्टल में लौटता तो अलगथलग पड़ जाता था. लगभग सारे ही लड़के अपनीअपनी गर्लफ्रैंड से चैट करने में लग जाते थे.

कई लड़के तो इस बात के लिए उस का मजाक भी बनाते थे. उस में अब हीनभावना घर करने लगी थी. वह इसे अपनी कोई कमी मानने लगा था. मुझे जब इस बात का पता चला तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा. इतनी मामूली सी बात के लिए वह इतना परेशान था. उस के डिप्रैशन का असर उस के व्यवहार और बात करने के तरीके पर स्पष्ट दिख रहा था. ज्यादा बोलने के बजाय वह चुप और गुमसुम रहने लगा था.

ऐसी स्थिति में एक मां ही बेटे के करीब होती है जो समझदारी से काम ले कर उसे डिप्रैशन में जाने से रोक सकती है. गर्लफ्रैंड होना स्टेटस सिंबल नहीं. दोस्ती करना या प्यार करना स्वाभाविक फीलिंग्स हैं. इसलिए यह सोच कर परेशान रहना कि लोग क्या कहेंगे या दोस्त क्या सोचेंगे कि कितना बैकवर्ड है, आज तक कोई गर्लफ्रैंड नहीं, गलत है. स्वस्थ रहो, मस्त रहो, खुद को पढ़ाई में या किसीकाम में व्यस्त रखो.

प्रेम त्रिकोण : एक औरत के नाजायज संबंध

12 अप्रैल, 2017 को जैसेजैसे रात गहराती जा रही थी, जगमोहन की चिंता बढ़ती जा रही थी. कभी वह दरवाजे की ओर ताकते तो कभी टिकटिक करती घड़ी की ओर. इस की वजह यह थी कि उन का जवान बेटा शिवकुमार शाम 4 बजे घर से निकला था तो अभी तक लौट कर नहीं आया था. परेशानी की बात यह थी उस का मोबाइल फोन स्विच औफ आ रहा था. बेटे से संपर्क नहीं हो सका तो जगमोहन ने रिश्तेदारों तथा उस के यारदोस्तों से पूछा, लेकिन कोई भी उस के बारे में कुछ नहीं बता सका. उन्होंने अपनी रिश्तेदार ममता से भी उस के बारे में पूछा था, उस ने भी कुछ नहीं बताया था.

जगमोहन ने वह रात चहलकदमी करते गुजारी. सवेरा होते ही जब उन्होंने पड़ोसियों से बेटे के गायब होने की चर्चा की तो किसी ने बताया कि वेदप्रकाश के बाग में पेड़ से एक युवक की लाश लटक रही है. जगमोहन पड़ोसियों के साथ वहां पहुंचे तो पेड़ से लटक रही लाश देख कर चीख पड़े.

क्योंकि वह लाश उन के बेटे शिवकुमार की थी. थोड़ी ही देर में यह बात पूरे गांव में फैल गई. फिर तो पूरा गांव वेदप्रकाश के बाग में इकट्ठा हो गया. लोगों का यही कहना था कि शिवकुमार ने फांसी लगा कर आत्महत्या की है. लेकिन जगमोहन यह बात कतई मानने को तैयार नहीं था. किसी ने फोन द्वारा इस घटना की सूचना थाना घाटमपुर पुलिस को दे दी थी.

थाना घाटमपुर के थानाप्रभारी अरविंद कुमार सिंह ने मिली सूचना की जानकारी अपने अधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ बडेरा गांव पहुंच गए. उस समय तक बाग में काफी भीड़ लग चुकी थी. घटनास्थल पर मौजूद जगमोहन ने अरविंद कुमार सिंह को बताया कि फांसी के फंदे पर लटक रहा युवक उन का बेटा शिवकुमार है, जो कल शाम 4 बजे से गायब था.

अरविंद कुमार सिंह ने बारीकी से घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 30 साल के आसपास थी. वह अपनी ही शर्ट के फंदे से लटक रहा था. उस के पैर जमीन को छू रहे थे. उस के शरीर पर भी चोटों के निशान थे. इस सब से यही लग रहा था कि पहले मृतक की जम कर पिटाई की गई थी. उस के बाद उसे फांसी पर लटकाया गया था. देखने में ही मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था.

अरविंद कुमार सिंह लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि एसपी (ग्रामीण) सुरेंद्रनाथ तिवारी और सीओ (घाटमपुर) जितेंद्र कुमार भी आ गए. अधिकारियों ने भी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस के बाद मृतक के पिता जगमोहन से पूछताछ की गई. जगमोहन ने बताया कि उस के बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई थी और गुमराह करने के लिए लाश को यहां लटका दिया गया है.

‘‘तुम्हें क्या किसी पर शक है?’’ एसपी सुरेंद्रनाथ तिवारी ने पूछा.

‘‘जी साहब, मुझे गांव की ममता और उस के प्रेमी पप्पू पर शक है.’’ जगमोहन ने कहा.

सुरेंद्रनाथ तिवारी ने थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि लाश की पोस्टमार्टम की काररवाई के बाद ममता और उस के प्रेमी पप्पू से पूछताछ की जाए. मौके की काररवाई निपटाने के बाद थानाप्रभारी अरविंद कुमार ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया.

ममता बडेरा गांव के ही अमित की पत्नी थी. अरविंद कुमार ने ममता को थाने बुलवा लिया. उस से शिवकुमार की मौत के बारे में पूछताछ की गई तो वह साफ मुकर गई कि उसे कुछ नहीं पता. इस का कहना था कि शिवकुमार उस की जातिबिरादरी का तो था ही और रिश्तेदार भी था. भला वह उस की हत्या क्यों करेगी. उस के घर वाले उसे झूठा फंसा रहे हैं.

ममता के साथ उस का 8 साल का बेटा कल्लू भी था. ममता उसे अपने साथ लाई थी. अरविंद कुमार ने उस मासूम को एकांत में ले जा कर उस से प्यार से पूछा तो उस ने सारा भेद खोल दिया. उस ने बताया कि उस की मम्मी और पप्पू चाचा ने मिल कर शिवकुमार चाचा को खूब पीटा था. उस के बाद रात में ही दोनों शिवकुमार चाचा को घर के बाहर ले गए थे.

बच्चे के बयान के बाद थानाप्रभारी ने ममता पर सख्ती की तो वह टूट गई. उस ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि हालात ऐसे बन गए कि उसे शिवकुमार की हत्या करनी पड़ी. इस के बाद पुलिस उस के प्रेमी पप्पू को भी हिरासत में ले कर थाने ले आई गई.

दोनों से की गई पूछताछ में शिवकुमार की हत्या के पीछे प्रेमत्रिकोण में की गई हत्या की कहानी सामने आई, जो इस प्रकार थी-

उत्तर प्रदेश के कानपुर (देहात) जनपद के डेरापुर थाने के तहत एक गांव है मटेरा. इसी गांव में जयकुमार अपने परिवार के साथ रहता था. उस के पास खेती की जो थोड़ीबहुत पुश्तैनी जमीन थी, उसी के सहारे वह अपना परिवार पाल रहा था.

उस की 3 बेटियां थीं, जिन में ममता सब से छोटी थी. बड़ी बेटियों की शादी करने के बाद छोटी बेटी ममता भी शादी के लायक हो गई थी. वह उस के हाथ पीले कर के चिंतामुक्त हो जाना चाहता था. इसलिए उस के लिए भी लड़का देखने लगा. उसे किसी से अमित बारे में पता चला तो वह उसे देखने पहुंच गया.

अमित कानपुर जनपद के कस्बा घाटमपुर से 2 किलोमीटर दूर बडेरा गांव का रहने वाला था. उस के पास भी खेती की ठीकठाक जमीन थी. उस के बड़े भाई अमन की शादी हो चुकी थी. अमित का मन न तो पढ़ाई में लगा और न ही खेती में. वह घाटमपुर स्थित कपड़ों के एक शोरूम पर काम करने लगा था जयकुमार को अमित ठीकठाक लगा तो उस ने ममता की शादी उस के साथ कर दी.

अमित ममता को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि ममता उस की कल्पना के अनुरूप निकली थी. हंसीखुशी से उन की गृहस्थी की गाड़ी चल निकली थी. उसी दौरान ममता एक बेटे कमल उर्फ कल्लू की मां बनी.

ममता की जेठानी बरखा तेजतर्रार थी. चूंकि ममता उस से ज्यादा खूबसूरत थी, इसलिए वह उस से ईर्ष्या करती थी. जबतब वह उसे महारानी कह कर ताने भी मारती थी. घरेलू कामकाज को ले कर भी दोनों में अकसर झगड़ा होता रहता था.

बरखा पति पर अलग रहने का दबाव बनाने लगी, लेकिन अमन राजी नहीं था. कुछ दिनों बाद बरखा ने त्रियाचरित्र की ऐसी चाल चली कि दोनों भाइयों के बीच खेती की जमीन और मकान का बंटवारा तक हो गया.

अमित अलग रहने लगा तो उस के ऊपर नौकरी के अलावा जमीन की देखरेख की भी जिम्मेदारी आ गई. वह दिनरात काम में व्यस्त रहने लगा, साथ ही वह शराब भी पीने लगा. कुल मिला कर व्यस्तता की वजह से वह पत्नी को समय नहीं दे पाता था.

एक दिन ममता घर में अकेली थी, तभी शिवकुमार आ गया. वह उसी की जाति का था और गांव के पूर्वी छोर पर रहता था. वह गांव के जानेमाने किसान जगमोहन का एकलौता बेटा था. वह पिता के साथ खेती के कामों में हाथ बंटाता था. वह रंगीनमिजाज था और बनसंवर कर रहता था.

शिवकुमार की दोस्ती अमित से थी, इसलिए ममता उसे अच्छी तरह जानती थी. ममता और शिवकुमार का आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे को अपलक देखते रह गए. ममता की खूबसूरती ने शिवकुमार के दिल में हलचल मचा दी. कुछ पलो बाद ममता के होंठ फड़के, ‘‘कैसे आना हुआ शिव, कोई काम था क्या?’’

‘‘हां भाभी, अमित के पास आया था. उस ने कुछ पैसे उधार लिए थे?’’ शिवकुमार ने कहा.

‘‘वह तो हैं नहीं, अभी खेतों पर गए हैं?’’ ममता ने कहा.

‘‘तो फिर मैं चलता हूं. कल सुबह आऊंगा.’’ शिवकुमार ने कहा.

‘‘अरे वाह, ऐसे कैसे चले जाओगे. आज इतने दिनों बाद तो आए हो, कम से कम चाय तो पीते जाओ.’’ ममता ने मुसकराते हुए कहा.

शिवकुमार भी यही चाहता था. कुछ देर में ही ममता चाय बना लाई. चाय पीने के दौरान शिवकुमार की नजरें ममता की देह पर ही टिकीं रहीं. जब दोनों की नजरें टकरातीं शिवकुमार कामुक अंदाज से मुसकरा देता. उस की मुसकराहट से ममता के दिल में हलचल मच जाती.

शिवकुमार ममता से मिल कर अपने घर लौटा तो ममता का खूबसूरत चेहरा उस के दिलोदिमाग में ही घूमता रहा. दूसरी ओर ममता का भी यही हाल था. वह शिवकुमार की आंखों की भाषा पढ़ चुकी थी. इस के बाद शिवकुमार ममता के नजदीक आने की तरकीबें सोचने लगा.

ममता का पति अमित शराब पीता था. इसी का उस ने फायदा उठाया. वह देर शाम शराब की बोतल ले कर उस के घर पहुंच जाता और दोनों जाम से जाम टकराने लगते थे. खानेपीने का खर्चा शिवकुमार ही उठाता था. वह ममता पर भी खर्च करने लगा था. उस की इस दरियादिली की ममता अपने पति से खूब तारीफ करती.

एक दिन शिवकुमार दोपहर को ममता के घर पहुंचा. उस समय वह घर में अकेली थी और चारपाई पर लेटी थी. शिवकुमार को देख कर वह उठ कर खड़ी होते हुए मुसकरा कर बोली, ‘‘अरे, तुम इस वक्त कैसे चले आए, तुम्हारी महफिल तो शाम को सजती है?’’

‘‘तुम ठीक कहती हो भाभी, लेकिन आज मैं दोस्त से नहीं, तुम से मिलने आया हूं.’’

‘‘अच्छा,’’ ममता खिलखिला कर हंसी, ‘‘इरादा तो नेक है.’’

‘‘नेक है तभी तो अकेले में मिलने आया हूं. भाभी मैं तुम से बहुत प्यार करने लगा हूं.’’ शिवकुमार ने सीधे ही मन की बात कह दी.

‘‘शिव, यह तुम ने कह तो दिया पर जानते हो प्यार की राह में कितने कांटे हैं?’’ ममता ने गंभीरता से कहा, ‘‘मैं शादीशुदा और एक बच्चे की मां हूं.’’

‘‘जानता हूं, फिर भी जब तुम चाहोगी, मैं सारी बाधाओं को तोड़ दूंगा.’’ शिवकुमार ने ममता के करीब जा कर कहा.

इस के बाद शिवकुमार के गले में बांहें डाल कर ममता ने कहा, ‘‘शिव, मैं भी तुम्हें बहुत चाहती हूं. लेकिन शर्म की वजह से दिल की बात नहीं कह पा रही थी.’’

शिवकुमार ने ममता को पकड़ कर सीने से लगा लिया. फिर तो मर्यादा भंग होते देर नहीं लगी. जिस्मानी रिश्ते की नींव पड़ गई तो वासना का महल खड़ा होने लगा. शिवकुमार को जब भी मौका मिलता, वह ममता के घर आ जाता और इच्छा पूरी कर चला जाता. जब शिवकुमार का  आने का सिलसिला बढ़ने लगा तो आसपड़ोस के लोगों की नजरों में दोनों खटकने लगे. मोहल्ले में इस बारे में चर्चा होेने लगी तो उड़तेउड़ते यह खबर अमित के कानों तक पहुंच गई.

अमित अपनी पत्नी ममता पर बहुत विश्वास करता था. पर इस बात ने उसे विचलित कर दिया. उसे पत्नी और विश्वासघाती दोस्त पर बहुत गुस्सा आया. उस ने शिवकुमार को खूब खरीखोटी सुनाई और ममता की जम कर पिटाई कर दी. ममता की जेठानी बरखा ने इस बात को चटकारे ले कर खूब प्रचार किया.

अमित की सख्ती के बाद शिवकुमार का उस के घर आनाजाना बंद हो गया. काफी दिनों तक ममता भी घर से बाहर नहीं निकली. इस से अमित ने सोचा कि शायद अब वह सुधर गई है. लेकिन उस की सोच गलत निकली. इस बीच उस ने पड़ोसी गांव मानपुर के रहने वाले पप्पू यादव से संबंध बना लिए थे. वह दबंग किस्म का युवक था और ब्याज पर पैसे देता था.

अमित ने भी उस से कुछ पैसे ब्याज पर ले रखे थे. पैसा व ब्याज वसूली के लिए वह अमित के घर आता रहता था. इसी आनेजाने में ममता ने उस से नाजायज संबंध बना लिए थे.

शिवकुमार कुछ समय तक ममता से नहीं मिल सका था, लेकिन बाद में वह चोरीछिपे उस से मिलने आने लगा था. अब ममता के पप्पू और शिवकुमार दोनों से संबंध बनाए थे. वह दोनों में से किसी को भी नाराज नहीं करना चाहती थी. किसी तरह अमित को पता चल गया कि ममता ने पप्पू यादव से संबंध बना लिए हैं तो वह बहुत दुखी हुआ.

काफी समझाने पर भी जब ममता नहीं मानी तो उस ने कलह करने के बजाय उस से दूर रहना उचित समझा. अत: वह पत्नी से अलग घाटमपुर में रहने लगा. बीचबीच में वह अपने बेटे से मिलने आ जाता था.

एक दिन शिवकुमार ममता से मिल कर घर से निकल रहा था, तभी पप्पू यादव आया. शक होने पर पप्पू ने ममता से पूछा. त्रियाचरित्र करते हुए उस ने कहा, ‘‘शिवकुमार मेरा रिश्तेदार है. इसलिए वह मेरे साथ जबरदस्ती करता है.’’

ममता की बात सुन कर पप्पू गुस्से से बोला, ‘‘अगर ऐसी बात है तो उसे सबक सिखाना पड़ेगा. तुम भी ध्यान रखो कि मेरी हो तो मेरी ही रहो. एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं.’’

इस के बाद पप्पू यादव शिवकुमार पर कड़ी नजर रखने लगा. 12 अप्रैल, 2017 की रात 10 बजे शिवकुमार ममता के घर पहुंचा. उस समय पप्पू यादव ममता के घर में ही था. आते ही शिवकुमार ममता के साथ जबरदस्ती करने लगा. उस ने पप्पू को देखा नहीं था.

ममता ने विरोध किया, लेकिन शिवकुमार नहीं माना. तभी पप्पू यादव ने उसे ललकारा. दोनों के बीच मारपीट होने लगी. उसी बीच ममता एक डंडा ले आई और शिवकुमार को पीटने लगी. शिवकुमार चीखने लगा. चीख से ममता के बेटे कल्लू की आंखें खुल गईं. डर की वजह से वह बिस्तर पर ही पड़ा रहा.

कुछ ही देर में शिवकुमार पस्त पड़ गया. इस के बाद ममता ने शिवकुमार के पैर पकड़ लिए और पप्पू यादव ने उस का गला दबा दिया. शिवकुमार की हत्या कर लाश को ठिकाने लगाना जरूरी था. आधी रात बीतने के बाद दोनों ने शिवकुमार की लाश को साइकिल पर रखा और उसे गांव के बाहर वेदप्रकाश के बाग में ले गए.

मामला आत्महत्या का लगे, इस के लिए उन्होंने शिवकुमार की शर्ट निकाल कर एक बांह उस की गरदन में कस दी और दूसरी पेड़ से बांध दी. शिवकुमार की लाश को लटका कर दोनों अपनेअपने घर आ गए.

सुबह के समय गांव के किसी व्यक्ति ने बाग में लटक रही लाश देखी तो उस ने यह बात गांव वालों को बता दी. जानकारी मिली तो जगमोहन बाग में पहुंचा तो बेटे की लाश देख कर दहाड़ें मार कर रोने लगा. इसी बीच किसी ने घाटमपुर पुलिस को सूचना दे दी थी.

पुलिस ने 15 अप्रैल, 2017 को अभियुक्त पप्पू यादव और ममता को रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष माती अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें स्वीकार नहीं हुई थीं.  ?

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इश्क की आग में बरबाद हुआ परिवार

2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था.

सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की.

मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था.

बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी.

लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे.

सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी.

इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी-

6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं.

काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया.

सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी.

अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया.

रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था.

इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

काशी इन सर्च आफ गंगा : बेअसर पटकथा, लचर अभिनय

फिल्म की कहानी शुरू होती है. जेल में एक इंसान चम्मच को दीवार पर या अपनी जंजीर पर खुरचता नजर आता है, जिसे देखकर दो पुलिस वाले आपस में बातें करते है,फिर कहानी फ्लैशबैक में शुरू होती है.

kashi in search of ganga film review story cast

कहानी बनारस की है, जहां काशी के एक घाट पर होली का त्यौहार मनाया जा रहा है. जब एक स्थानीय गुंडा बबीना (क्रांति प्रकाश झा) लखनऊ से आयी पत्रकार देविना (ऐश्वर्या दीवान) को छेड़ता है, तो घाट पर डोम का काम करने वाले काशी (शर्मन जोशी) उस गुंडे से देविना को बचाता है. फिर देविना के कहने पर काशी उसे अपने घर ले जाता है और अपने बूढ़े पिता व माता के अलावा युवा बहन गंगा (प्रियंका सिंह) से मिलाता है.

दूसरे दिन उसे पूरा बनारस शहर घुमाता है, रात में देविना उसे अपने साथ रात्रि भोज के लिए आमंत्रित करती है, जहां नाटकीय ढंग से दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ जाते हैं कि उनके बीच शारीरिक संबंध बन जाते हैं. फिर पता चलता है कि गंगा गायब है.

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देविना व काशी उस कालेज में जाते हैं, जहां गंगा पढ़ती है. पर कौलेज की प्रिंसिपल कहती है कि गंगा चौधरी उनके कौलेज में नहीं पढ़ती है. उसके बाद देविना एक लड़की श्रुति को काशी से मिलवाती है, जो कि कहती है कि वह गंगा के साथ कौलेज में पढ़ती है और गंगा का शहर के उद्योगपति व राजनेता पांडे (गोविंद नामदेव) के बेटे (पारितोष त्रिपाठी) के साथ प्रेम संबंध थे.

पिता की मर्जी के खिलाफ गंगा से उसका प्यार चलता रहा और गंगा गर्भवती हो गयी थी. उसके बाद से गंगा की श्रुति से मुलाकात नहीं हुई. अब काशी अपनी बहन की तलाश में पांडे के घर जाता है. फिर मसूरी जाकर पांडे के बेटे की हत्या कर देता है. अदालत में कार्यवाही के दौरान सभी गवाह यही कहते हैं कि काशी की बहन गंगा व उसके माता पिता तो बचपन में ही मारे गए थे.

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एक मनोवैज्ञानिक डाक्टर आकर कहता है कि काशी मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार है, जो कि सोचता है कि उसके माता पिता हैं. अचानक काशी का दोस्त रंगीला अदालत में बयान देता है कि पांडे ने ही गंगा की हत्या की है. काशी गुस्से में अदालत के अंदर ही पांडे पर हमला कर देता है, उसी वक्त देविना चालाकी से काशी के हाथ में बंदूक पकड़ा देती है और काशी धड़ाधड़ पांडे पर गोलियां बरसा देता है. काशी को पागल बताकर अदालत जेल भेज देती है. पर इस बीच देविना काशी से प्यार कर चुकी है. इसलिए वह जेल जाकर काशी को सच बता देती है कि उसने पांडे से बदला लेने के लिए यह कहानी रची. श्रुति उसकी बहन ही है. अंततः काशी के हाथों देविना भी मारी जाती है.

बेसिर पैर की कहानी व बकवास पटकथा के चलते दस मिनट बाद ही दर्शक सोचने लगता है कि आखिर फिल्मकार ने यह फिल्म बनायी ही क्यों? किरदार सही ढंग से गढ़े नहीं गए हैं. कहानी भी उबड़ खाबड़ रास्ते से होती हुई आगे बढ़ती रहती है. फिल्म पर लेखक व निर्देशक की कोई पकड़ नजर नहीं आती. दर्शक सिर्फ यह सोचता रहता है कि फिल्म कब खत्म होगी. मनोरंजन के नाम पर सिरदर्द देने वाली फिल्म है.

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जहां तक अभिनय का सवाल है तो किसी भी कलाकार का अभिनय प्रशंसनीय नहीं है. शर्मन जोशी ने अपने डूबते करियर पर यह फिल्म करके अपने हाथों कील गाड़ने का काम किया है. फिल्म के किरदार पर उनकी कोई पकड़ नजर नहीं आती. इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि शर्मन जोशी ने ‘काशी इन सर्च आफ गंगा’ जैसी फिल्म क्यों की. निर्देशक की कमी के चलते अखिलेंद्र मिश्रा, गोविंद नामदेव जैसे  वरिष्ठ कलाकारों का भी अभिनय भी उभर नही पाया. ऐश्वर्या दीवान की पहली फिल्म है, पर उनसे उम्मीद नहीं जगती.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काशी इन सर्च आफ गंगा’’ का निर्माण धीरज कुमार, मनीष किशोर, संजय व सुदेश सुवर्णा ने किया है. फिल्म के लेखक मनीशकिशोर, निर्देशक धीरज कुमार, संगीतकार अंकित तिवारी, विपिन पटवा व राज आसू, कैमरामैन अत्तर सिंह सैनी तथा कलाकार हैं – शर्मन जोशी, ऐश्वर्या दीवान,अखिलेंद्र मिश्रा, पारितोष त्रिपाठी, गोविंद नामदेव, क्रांति प्रकाश झा, मनोज जोशी व अन्य.

बाजार : शेयर बाजार की रोचक कथा

पैसा, धोखा, लालच, वासना, क्रोध, ईष्या/जलन, आलस्य व अहंकार इन इंसानी स्वभावों के साथ शेयर बाजार के उतार चढ़ाव व उससे जुड़े इंसानों की जिंदगी में झांकने वाली रोचक कहानी है-फिल्म ‘‘बाजार’’. जो कि हर वर्ग के दर्शक को पसंद आएगी. फिल्म में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि सपना और महत्वाकांक्षा बहुत अलग चीज हैं. ‘‘बाजार’’ में इस सवाल को बड़ी बारीकी से उठाया गया है कि पैसा कमाने के लिए या बड़ा आदमी बनने के लिए आप किस हद तक जाएंगे, कितनी लाइन क्रौस करेंगे?

फिल्म की कहानी के केंद्र में चार मुख्य पात्र हैं. शकुन कोठारी (सैफ अली खान) व उनकी पत्नी मंदिरा कोठारी (चित्रांगदा सिंह) तथा रिजवान अहमद (रोहन मेहरा) और उनकी प्रेमिका व सहकर्मी प्रिया रौय (राधिका आप्टे). सूरत में आंगड़िया के यहां नौकरी से शुरुआत कर शकुन कोठारी मुंबई में डायमंड मार्केट के साथ ही शेयर बाजार के राजा बने हैं. पचास करोड़ की कंपनी को उन्होंने पांच हजार करोड़ में बदल दिया. अब वह 10 हजार करोड़ के ऊपर का गेम खेल रहे हैं. वह ऐसे उद्योगपति हैं, जो पैसे के लिए कुछ भी करेंगे.

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शेयर बाजार से जुड़े लोग उन्हे धोखेबाज इंसान मानते हैं, जबकि खुद शकुन का मानना है कि वह तो सिर्फ व्यापार कर रहा है. पर उन्हें अपनी बेटियों के भविष्य का डर जरूर सताता है. शकुन कोठारी जिस उद्योगपति के यहां नौकरी करते थे, उसी की बेटी मंदिरा से शादी की है. शकुन कोठारी व मंदिरा समाज की नजर में पति पत्नी हैं, मगर इनके बीच काफी कड़वाहट है.

उधर इलाहाबाद में एक छोटी सी दुकान में काम करने वाले रिजवान अहमद का सपना मुंबई में बहुत बड़ा आदमी बनना है. उसकी तमन्ना शकुन कोठारी के साथ काम करने और शकुन की तरह मैगजीन के कवर पर अपनी फोटो छपे देखना है. रिजवान अहमद सिर्फ सपने नहीं देखता, बल्कि अति महत्वाकांक्षी युवक है. मुंबई में प्रिया रौय व रिजवान एक ही जगह काम करते हैं और फिर दोनों के बीच रोमांस भी है. इनके रोमांस के साथ साथ इनकी अपनी एक यात्रा है. पर यह जोड़ी बहुत परफैक्ट है. स्टाक मार्केट पर नजर रखने वाली सेबी के इंस्पेक्टर गुप्ता (मनीष चौधरी) लंबे समय से शकुन कोठारी की जांच कर रहे हैं, पर शकुन कोठारी कोई सबूत ही नही छोड़ता.

इधर शकुन और रिजवान दोनों अपने सपने व महत्वाकांक्षा को पूरी करने की दौड़ में लगे हुए हैं. दोनों शून्य से शुरुआत कर आकाश तक पहुंचते हैं. फिर किस तरह से टेलीकौम घोटाला होता है. पर अपनी इस यात्रा में शकुन व रिजवान दोनों में से कौन क्या खोता है? जब दोनों एक ही मुकाम पर पहुंच जाते हैं, तब दोनों के बीच क्या होता है, इसकी भी यात्रा है.

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बतौर स्वतंत्र निर्देशक गौरव के चावला की यह पहली फिल्म है. पर पहली ही फिल्म में उन्होंने कमाल का निर्देशन किया है.

शेयर बाजार बहुत ही शुष्क विषय है. ऐसे विषय पर मनोरंजक फिल्म बनाना आसान नहीं कहा जा सकता. मगर पटकथा लेखकों व निर्देशक की सूझबूझ के चलते यह ऐसी दिलचस्प व मनोरंजक फिल्म बनी है, जिसे देखते हुए वह इंसान भी आनंद लेता है, जिसे शेयर बाजार की जटिलताओं की समझ नहीं है. एक बेहतरीन पटकथा लेखन के लिए फिल्म के पटकथा लेखकों की भी दाद देनी पड़ेगी. फिल्म के संवाद काफी बेहतरीन बन पड़े हैं. फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि फिल्म सिर्फ शेयर बाजार की ही बात नहीं करती, बल्कि पारिवारिक रिश्तों, दोस्ती, प्यार व इंसानी भावनाओं की भी बात करती है.

इतना ही नही फिल्म में हर किरदार की अच्छाई व बुराई के साथ अपने सपनों/महत्वाकांक्षा को पाने के तरीकों और उसके परिणाम भी मनोरंजक व दिलचस्प तरीके से पेश किए गए हैं. फिल्म में इस बात को भी बड़ी बेबाकी के साथ चित्रित किया गया है कि जिस इंसान को आप अपना आदर्श मानते हैं, उसके करीब न जाएं यानी कि उससेन मिलें, अन्यथा उसकी हकीकत जानकर आपको झटका/सदमा लगेगा.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो शकुन कोठारी के किरदार में सैफ अली खान अपने अभिनय से काफी प्रभावित करते हैं. लंबे समय से उनका करियर गड़बड़ चल रहा था. लेकिन इस फिल्म से उन्होंने साबित कर दिखाया कि अभिनय में उनका कोई सानी नहीं है. एक काइयां गुजराती व्यापारी के रूप में वह एकदम जमते हैं.

रिजवान अहमद के किरदार में अपने समय के स्टार कलाकार रहे स्व.विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा ने ऐसा मंजा हुआ शानदार अभिनय किया है कि कहीं इस बात का अहसास नहीं होता कि बतौर अभिनेता यह उनकी पहली फिल्म है.

प्रिया रौय के किरदार में राधिका आप्टे ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह बेहतरीन अदाकारा हैं. यूं तो चित्रांगदा सिंह भी अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं,मगर किरदार की मांग के अनुार कई जगह उनका अभिनय कुछ कमतर नजर आता है.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘बाजार’’ का निर्माण निखिल आडवाणी, वायकाम 18, कायटा प्रोडक्शन, इम्माय इंटरटेनमेंट ने किया है. फिल्म के निर्देशक गौरव के चावला, पटकथा लेखक निखिल आडवाणी, परवेज शेख असीम अरोड़ा, संगीतकार तनिष्क बागची, यो यो हनी सिंह, सोहल सेन, कनिका कपूर, कैमरामैन स्वप्निल सोनावणे तथा फिल्म के कलाकार हैं – सैफ अली खान, चित्रांगदा सिंह, रोहन मेहरा, राधिका आप्टे, डेन्जिल स्मिथ, सौरभ शुक्ला, प्रियंका, अनुप्रिया गोयंका व अन्य.

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