मुझे बैडमैथुन करने की आदत है. बिस्तर पर थोड़ी उछलकूद करने के बाद अंग से वीर्य निकल जाता है, फिर देर तक अंग ठंडा पड़ा रहता है.  शादी के बाद मैं बीवी के साथ कुछ कर पाऊंगा या नहीं.

सवाल
मैं 23 साल का हूं. मुझे बचपन से ही बैडमैथुन करने की आदत है यानी बिस्तर पर थोड़ी उछलकूद करने के बाद अंग से वीर्य निकल जाता है, फिर देर तक अंग ठंडा पड़ा रहता है. डर लगता है कि शादी के बाद मैं बीवी के साथ कुछ कर पाऊंगा या नहीं?

जवाब
हस्तमैथुन की तरह ही आप बैडमैथुन करते हैं. ये आदतें अच्छी नहीं हैं, पर इन्हें पक्का इरादा कर के छोड़ा जा सकता है. वैसे, इन से कोई नुकसान नहीं होता. शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा.

ये भी पढ़ें…

वीर्य की जानकारी आपके लिए है फायदेमंद

वीर्य आदमी के अंडकोष और अंग के मार्ग में मौजूद प्रोस्टै्रट, सैमाइनल वैसिकल और यूरेथल ग्रंथियों से निकले रसों से बनता है. वीर्य में तकरीबन 60 फीसदी सैमाइनल वैसिकल, 30 फीसदी प्रोस्ट्रैट ग्रंथि का रिसाव और केवल 10 फीसदी अंडकोष में बने शुक्राणु यानी स्पर्म होते हैं, जो वीर्य में तैरते रहते हैं. शुक्राणु की मदद से ही बच्चे पैदा होते हैं.

अंडकोष यानी शुक्राशय आदमी के शरीर के बाहर लटके होते हैं, क्योंकि शुक्राणु बनने के लिए शरीर से कुछ कम तापमान की जरूरत होती है. अगर किसी वजह से अंडकोष अंदर ही रह जाते हैं, तो ये खराब हो जाते हैं. शुक्राशय के 2 काम हैं, शुक्राणु बनाना और पुरुषत्व हार्मोन टैस्ट्रोस्ट्रान बनाना.

टैस्ट्रोस्ट्रान कैमिकल ही आदमी में क्रोमोसोम के साथ लिंग तय करता है. इसी के चलते बड़े होने पर लड़कों में बदलाव होते हैं, जैसे अंग के आकार में बढ़ोतरी, दाढ़ीमूंछें निकलना, आवाज में बदलाव, मांसपेशियों का ताकतवर होना वगैरह.

किशोर उम्र तक शुक्राशय शुक्राणु नहीं बनाते. ये 11 से 13 साल के बीच शुरू होते हैं और तकरीबन 17-18 साल तक पूरी तेजी से बनते हैं.

अंडकोष से निकल कर शुक्राणु इस के ऊपरी हिस्से में इकट्ठा हो कर पकते हैं. यहां पर ये तकरीबन एक महीने तक सक्रिय रहते हैं. शुक्राणु बनने की पूरी प्रक्रिया में 72 दिन का समय लगता है.

किशोर उम्र में बनना शुरू हो कर शुक्राणु जिंदगीभर बनते रहते हैं. हां, अधेड़ उम्र में इस के बनने की रफ्तार धीमी हो जाती है. शुक्राणु के बनने में दिमाग में स्थित पिट्यूटरी ग्रंथि, एफएसएच हार्मोन व टैस्टीज से निकले टैस्ट्रोस्ट्रान हार्मोन का हाथ होता है. इन हार्मोनों की कमी होने पर शुक्राणु बनना बंद हो जाते हैं.

वीर्य में मौजूद शुक्राणु 2 तरह के होते हैं, 3 3 या 3 4. अगर औरत के अंडे का मिलन 3 3 से होता है, तो लड़की और अगर 3 4 से होता है, तो लड़का पैदा होता है.

मां के पेट में बच्चे का लिंग आदमी के शुक्राणुओं द्वारा तय होता है. इस में औरत का कोई बस नहीं होता है. वीर्य में सब से ज्यादा रस सैमाइनल वैसिकल ग्रंथि से निकले पानी से होता है. इस में फ्रक्टोज शुक्राणुओं का पोषक तत्त्व होता है. इस के अलावा रस में साइट्रिक एसिड, प्रोस्ट्राग्लैंडिन और फाइब्रोजन तत्त्व भी पाए जाते हैं.

प्रोस्ट्रैट ग्रंथि का रस दूधिया रंग का होता है. इस में साइट्रेट, कैल्शियम, फास्फेट, वीर्य में थक्का बनाने वाले एंजाइम और घोलने वाले तत्त्व होते हैं. इन में अलावा मूत्र में स्थित यूरेथल ग्रंथियों का रिसाव भी वीर्य में मिल जाता है.

स्खलन के समय शुक्राशय से निकले शुक्राणु सैमाइनल वैसिकल व प्रोस्टै्रट के स्राव के साथ मिल कर शुक्र नली द्वारा होते हुए मूत्र नलिका से बाहर हो जाते हैं.

यह भी जानें

* एक बार में निकले वीर्य की मात्रा 2 से 5 मिलीलिटर होती है.

* वीर्य चिकनापन लिए दूधिया रंग का होता है और इस में एक खास तरह की गंध होती है.

* वीर्य का चिकनापन सैमाइनल वैसिकल व पीए प्रोस्टै्रट के स्राव के चलते होता है. अगर पीए अम्लीय है, वीर्य पीला या लाल रंग लिए है, तो यह बीमारी की निशानी है.

* वीर्य से बदबू आना भी बीमारी का लक्षण हो सकता है.

* 2-3 दिन के बाद निकला वीर्य गाढ़ा होता है, क्योंकि इस में शुक्राणुओं की संख्या ज्यादा होती है.

* वीर्य निकलने के बाद जम जाता है. पर इस में मौजूद रसायन फाइब्रोलाइसिन एंजाइम इसे 15-20 मिनट में दोबारा पतला कर देते हैं. अगर वीर्य दोबारा पतला न हो, तो यह बीमारी की निशानी है.

* 4-5 दिन बाद एक घन मिलीलिटर वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 8 से 12 करोड़ होती है. यानी एक बार में तकरीबन 40 करोड़ शुक्राणु निकलते हैं, पर एक ही शुक्राणु अंडे को निषेचित करने के लिए काफी होता है.

* अगर वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 6 करोड़ प्रति मिलीलिटर से कम हो, तो आदमी में बच्चे पैदा करने की ताकत कम होती है. अगर 2 करोड़ से कम हो, तो आदमी नामर्द हो सकता है.

* सामान्य शुक्राणु छोटे से सांप की शक्ल का होता है. इस का सिरा गोल सा होता है और सिर पर एक टोपी होती है, जिस को एक्रोसोम कहते हैं. साथ में गरदन, धड़ और पूंछ होती है.

* अगर शुक्राणुओं के आकार में फर्क हो, तब भी बच्चे पैदा करने की ताकत कम हो जाती है. यह फर्क सिर, धड़ या पूंछ में हो सकता है. अगर असामान्य शुक्राणुओं की संख्या 20 फीसदी से भी ज्यादा होती है, तो आदमी नामर्द हो सकता है.

* शुक्राणु वीर्य में हमेशा तैरते रहते हैं. अगर शुक्राणु सुस्त हैं या 40 फीसदी से ज्यादा गतिहीन हैं, तो भी आदमी नामर्द हो सकता है.

* अगर वीर्य में मवाद, खून या श्वेत खून की कणिकाएं मौजूद हों, तो यह भी बीमारी की निशानी है.

* वीर्य या शुक्राणु बनने में खराबी कई बीमारियों के चलते हो सकती है. हार्मोन के बदलाव से शुक्राणुओं की संख्या कम हो सकती है.

* शुक्राशय में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं, जैसे मम्स, लेप्रोसी, सिफलिस वगैरह.

* ट्यूमर, इंफैक्शन, फाइलेरिया से शुक्राशय खराब हो सकता है.

* शुक्राणु के बनने में प्रोटीन, विटामिन, खासतौर से विटामिन ई की जरूरत होती है.

वीर्य संबंधी गलतफहमियां

 *  अगर पेशाब के साथ वीर्य या वीर्य जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तो लोग तनावग्रस्त हो जाते हैं. वे समझते हैं कि उन की ताकत कम हो रही है. नतीजतन, वे कई बीमारियों को न्योता दे बैठते हैं, जबकि वीर्य के निकलने या धातु निकलने से जिस्मानी ताकत में कमी होने का कोई संबंध नहीं है.

* हस्तमैथुन करने या रात को वीर्य गिरने से नौजवान समझते हैं कि इस के द्वारा उन की ताकत निकल रही है और वे तनावग्रस्त हो जाते हैं, जबकि यह सामान्य प्रक्रिया है.

* वीर्य जमा नहीं होता. अगर वीर्य के साथ शुक्राणु बाहर न निकलें, तो शरीर में इन की कमी हो जाती है. इसी तरह शौच जाते समय जोर लगाने से भी कुछ बूंद वीर्य निकल सकता है, इसलिए घबराएं नहीं.

* कुछ लोगों में यह गलतफहमी है कि वीर्य की एक बूंद 40 बूंद खून के बराबर है. यह गलत सोच है. वीर्य जननांगों का स्राव है, जो लार, पसीना या आंसू की तरह ही शरीर में बनता है.

* कुछ लोगों का मानना है कि वे वीर्य गिरने के समय जीवनदायक रस को बरबाद करते रहे हैं.

* अगर वीर्य के निकल जाने से कीमती ताकत का नाश होता है, तो सभी शादीशुदा आदमी कमजोर हो जाते, इसलिए वीर्य और सैक्स संबंध के बारे में गलत सोच न बनाएं, तनाव से दूर रहें और कामयाब जिंदगी का लुत्फ उठाएं.

इरफान खान जल्द ही इंडिया लौटेंगे

बौलिवुड एक्टर इरफान खान के फैन्स के लिए खुशखबरी है. जी हां सही सुना आपने, कैंसर का लंदन में इलाज करा रहे इरफान जल्द ही इंडिया वापस लौटेंगे. इरफान के स्पोक्सपर्सन ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है. और कहा है कि वें दिवाली से पहले इंडिया वापस लौटेंगे.

इरफान खान ने इसी साल मार्च में एक ट्वीट में कहा था- ये पता लगा है कि मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर है. जिंदगी से इस बात की शिकायत नहीं की जा सकती कि इसने हमें वो नहीं दिया जिसकी हमें इससे उम्मीद थी. पिछले कुछ दिनों में मैंने सीखा है कि अचानक सामने आने वाली चीजें हमें जिंदगी में आगे बढ़ाती हैं. मुझे मेरे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर होने का पता चला, इसे कबूल करना आसान नहीं है. पर, मेरे आसपास मौजूद लोगों के प्यार और मेरी इच्छाशक्ति ने मुझे उम्मीद दी है.

सूत्रों के अनुसार इरफान इंडिया लौटने के बाद दिसंबर में हिंदी मीडियम 2 की शूटिंग शुरू कर देंगे हालांकि इरफान के स्पोक्सपर्सन ने कहा है कि वह हिंदी मीडियम 2 की शूटिंग दिसंबर में शुरू करने जा रहे हैं,  यह सारी खबरें केवल कयास पर आधारित है.

सर्वभक्ष अभियान: भ्रष्टाचार पर एक तीखा व्यंग्य

बैंक के पास से निकल रहा था कि गुरुजी दिख गए. वहरुपए गिनने में व्यस्त थे और अपने इस काम में इतने तल्लीन थे कि अपने आसपास का उन्हें ध्यान ही नहीं था. अत: उन्हें छेड़ते हुए हम ने कहा, ‘‘गुरुजी, अगर नोट गिनने में परेशानी हो रही हो तो हम भी कुछ मदद करें.’’

गुरुजी ने एक नजर हम पर डाली और बोले, ‘‘अरे, कहां? ये तो बस, थोड़े से ही नोट हैं,’’ फिर अफसोस करते हुए बोले, ‘‘वैसे भी इस माह छुट्टियों के कारण महीने के 12 दिन तो स्कूल बंद ही रहा है. ऐसे में दोपहर भोजन कार्यक्रम का बिल बने भी तो कहां से.’’

मैं ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘चलिए, कोई बात नहीं, इस माह कम छुट्टियां हैं तो मध्याह्न भोजन का बिल ठीकठाक होगा. वैसे भी आप परेशान क्यों हो रहे हैं? यह तो मध्याह्न

भोजन कार्यक्रम का पैसा है, कम हो

या ज्यादा, आप को क्या फर्क पड़ता है?’’

‘‘वह तो है, लेकिन ज्यादा नोट गिनने का अपना ही मजा है, भले ही वह नोट सरकारी ही क्यों न हों,’’ गुरुजी बोले.

‘‘आप भी गुरुजी कहां सरकारी और गैरसरकारी के चक्कर में पड़ गए. जब तक नोट आप की जेब में हैं तब तक तो वह आप की ही संपत्ति हैं अब क्या नोटों पर छपा हुआ है कि वह आप के हैं या सरकारी हैं? और फिर यदि नोट सरकारी हैं तो आप भी तो सरकारी आदमी ही हैं. अब सरकार के आदमी के पास सरकारी संपत्ति नहीं रहेगी तो क्या किसी ऐरेगैरे के पास रहेगी?

वैसे भी यह जिम्मेदारी भरा काम है इसीलिए तो सरकार ने यह जिम्मेदारी आप को सौंपी है,’’ हम ने अपनी ओर से गुरुजी को प्रसन्न करने की कोशिश की.

वह बोले, ‘‘कह तो तुम सही रहे हो.’’

हम ने उन्हें और चढ़ाते हुए कहा, ‘‘वैसे देखा जाए तो अपना कार्य करने के साथसाथ आप लोग तो इस योजना को संचालित कर के समाजहित में एक बड़ा कार्य कर रहे हैं. एक बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं.’’

‘‘जिम्मेदारी क्या है, व्यर्थ की परेशानी है,’’ फिर सिर झटकते हुए बोले, ‘‘ढेरों हिसाबकिताब रखो, दाल बनवाओ, सब्जी बनवाओ, रोटियां बनवाओ. सुबह से इसी में लगे रहना पड़ता है. ऊपर से बिलवाउचर बनवाओ, कैश बुक मेंटेन करो, आडिट करवाओ. इतना सबकुछ करने पर भी जांच पार्टी आ कर ऐसे जांच करती है जैसे हम ने कितना बड़ा गबन कर लिया हो.

उन्हें संतुष्ट करो, सब को खुश करतेकरते तो यहां जान निकली जा रही है.’’

‘‘यह सब को खुश क्यों करना पड़ता है?’’ हम चकराए. मेरे इस सवाल पर उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं ने कोई बेवकूफी भरा प्रश्न कर दिया हो. फिर बोले, ‘‘अब सब तो यहां पीछे पड़े हैं. हर कोई अपना हिस्सा चाहता है. जिसे न दो उसी से बुराई. मध्याह्न भोजन न हुआ मास्टरों को तंग करने का एक नया हथियार हो गया. कभी जिले के शिक्षा विभाग से कोई जांच पार्टी आ रही है, तो कभी ब्लाक से…और कहीं से नहीं तो स्कूल से तो पार्टी कभी भी आ धमकती है. सिर्फ आती ही नहीं है बल्कि ऐसी बारीकी से जांच व पूछताछ करती है कि उन्हें जवाब से संतुष्ट करतेकरते सिर दुखने लगता है. हर दिन हर समय जांच रूपी तलवार सिर पर लटकी ही रहती है.’’

‘‘तो इस में परेशानी की क्या बात है? आप जांच और पूछताछ से इतना घबराते क्यों हैं? अरे, यदि आप सही हैं, आप के काम में कोई खोट नहीं है, तो लाख जांच होने पर भी कोई आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. जब आप सबकुछ ठीक कर रहे हैं तो सिरदर्द का तो प्रश्न ही नहीं उठता.’’

गुरुजी थोड़ा ढीले हुए, ‘‘नहीं समझे आप. अरे भाई, जब इतनी बड़ी योजना है और हम इतनी मेहनत कर रहे हैं तो थोड़ीबहुत ऊंचनीच, थोड़ाबहुत पतलागाढ़ा तो चलता ही है…और चलाना भी पड़ता है. अब उस में ही आप छानबीन करने लग जाएं कि दाल इतनी पतली क्यों है या सब्जी में आलू इतने कम क्यों हैं, तो यह तो कोई बात नहीं हुई. अरे भाई, जब सरकार ने भरोसा कर के यह योजना हम शिक्षकों के सुपुर्द की है, तो आप भी तो थोड़ा विश्वास करो, थोड़ा भरोसा करो.’’

हम ने भी मजा लेते हुए पूछा, ‘‘लेकिन गुरुजी, यह पतलेगाढ़े का चक्कर है क्या? जहां तक मुझे पता है कि सारा भोजन एक स्पष्ट दिशानिर्देश के तहत बनाया जाता है, तो फिर उस का पालन करने से भोजन अपनेआप ही स्तरीय बनेगा, पौष्टिक बनेगा और ऐसे में एक बार नहीं लाख बार चैकिंग हो जाए, तो भी कोई आप का कुछ भी गलत नहीं कर सकता.’’

हमारे व्यंग्य को न समझते हुए गुरुजी बोले, ‘‘भैया, दिशानिर्देश तो हमें भी मालूम हैं. हमारे पास सबकुछ लिखित में है, लेकिन आप ही बताइए, कोई कहां तक उन नियमों का पालन करे. वेसे भी व्यावहारिकता में इन का पालन संभव है क्या?’’

‘‘क्यों, क्या दिक्कत है. जहां तक मुझे मालूम है, सबकुछ एकदम साफ, एकदम पारदर्शी है. फिर कानून के पालन में बुराई भी क्या है?’’

हमारे यह कहने पर वह भड़क कर बोले, ‘‘कानूनों के पालन की आप ने अच्छी चलाई. आप ही बताइए, आज कानूनों का पालन कर कौन रहा है? जिसे जहां मौका मिल रहा है वहीं वह कानूनों को तोड़मरोड़ कर उन की अपने हिसाब से व्याख्या कर रहा है. आज जब हर तरफ भ्रष्टाचार का बोलबाला है तो फिर आप शिक्षकों से ही कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे नियमों का पालन करें? और वे करें भी तो क्यों करें. आखिर वे भी तो इसी समाज का एक अंग हैं. अब आज यदि उन्हें प्रगति करने, आगे बढ़ने का एक मौका मिला है तो दूसरों के पेट में मरोड़ क्यों हो रही है?’’

उन की बातों का मतलब समझते हुए मैं ने कहा, ‘‘लेकिन उन्नति का यह तो कोई रास्ता नहीं हुआ. वैसे भी समाज आप शिक्षकों से कुछ और ही उम्मीद करता है. आप हमारे पथप्रदर्शक हैं, भावी पीढ़ी के निर्माता हैं. आप लोगों से एक आदर्श प्रस्तुत करने की उम्मीद तो समाज कर ही सकता है. यदि वह भी वही सब करने लगे तो उन में और दूसरों में अंतर ही क्या रह जाएगा?’’

‘‘इन्हीं लच्छेदार बातों से हमें सदियों से बेवकूफ बनाया जाता रहा है,’’ गुरुजी बोले, ‘‘लेकिन अब शिक्षक जागरूक हो गया है. अब वह अपने अधिकारों के प्रति जागृत है. उसे अपने अच्छेबुरे का ज्ञान है. ऐसी बातें कर के उसे अब और बरगलाया नहीं जा सकता.’’

गुरुजी शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे, अत: बातों का रुख मोड़ने के लिए हम ने प्रश्न किया, ‘‘और सुनाइए, सर्वशिक्षा अभियान तो इन दिनों बड़े जोरशोर से चल रहा है. सब ओर इसी अभियान के चर्चे हैं.’’

वही हुआ जो हम चाहते थे. गुरुजी कुछ शांत हुए, ‘‘हां, इस अभियान के नतीजतन हमारे यहां वर्ग, संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. शाला भवन का निर्माण और रसोईघर (किचिन शेड) निर्माण भी उसी अभियान के अंतर्गत हुआ है. वैसे इस अभियान से बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुझान बढ़ा है… हर कक्षा में छात्र संख्या में वृद्धि हुई है.’’

अब यह वृद्धि कैसे हुई और क्यों हुई इस का असली कारण समझते हुए भी हम ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालना उचित नहीं समझा. उन की मनोस्थिति भांपते हुए हम ने उन के मुताबिक ही एक प्रश्न किया, ‘‘15 अगस्त से तो हर छात्र बजट बढ़ा कर 1.50 से 2.00 रुपए प्रतिदिन कर दिया गया है. अब तो योजना का संचालन और भी आसान हो गया होगा.’’

गुरुजी बोले, ‘‘आप ऐसा सोचते हैं पर यह क्यों नहीं देखते कि यदि बजट बढ़ाया गया है तो मीनू में तो दोनों चीजें (दाल व सब्जी) देना अनिवार्य कर दिया गया है. बात तो आखिर वहीं की वहीं रही,’’ फिर सुझाव देते हुए बोले, ‘‘मेरे हिसाब से तो बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुए सरकार को इस बजट को और बढ़ाना चाहिए.’’

मन में आया कह दें कि सरकार यदि बजट बढ़ा कर 2 से 5 रुपए प्रति छात्र भी कर दे तो न तो आप का पेट भरेगा और न ही आप संतुष्ट होंगे, क्योंकि स्वार्थ और बेईमानी का गहरा चश्मा आप की आंखों पर चढ़ा हुआ है और जिस के चलते सभी तरह की गलत और अनैतिक गतिविधियों को भी सीना ठोक कर आप जायज बता रहे थे. गरीब बच्चों का पेट काट कर भी अपना पेट और घर भरने की कोशिश कर रहे थे.

ईश्वर एक कल्पना: आखिर ईश्वर है क्या

भारत की आबादी कभी 11 करोड़ थी और हिंदू धर्म में तब 33 करोड़ देवता थे. इस हिसाब से उस समय 1 व्यक्ति पर 3 देवताओं की कृपा थी. मगर विडंबना यह कि 3 देवता मिल कर एक व्यक्ति की कायाकल्प नहीं कर सके. इस से ईश्वर के सर्वशक्तिमान एवं सर्वज्ञ रूप की धज्जियां उड़ जाती हैं. अगर देवता की शक्ति की दृष्टि से देखें तो विकसित देशों का एकमात्र देवता हमारे 33 करोड़ देवताओं पर भारी बैठता है, क्योंकि वहां के एकमात्र देवता यीशु ने सभी लोगों को संपन्न बना दिया है और इसी एक देवता के अनुयायियों ने हमारे देश पर सालों राज किया मगर हमारे 33 करोड़ देवता उन मुट्ठी भर विदेशी लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए जिन्होंने इन देवताओं के भक्तों की सालों तक दुर्दशा की.

मोहम्मद गोरी ने 17 बार देश पर आक्रमण कर के मंदिरों को लूटा, पर हमारे देवता खड़ेखड़े मुंह देखते रहे. उन्होंने कभी गोरी को रोकने की कोशिश नहीं की. इस से 33 करोड़ देवताओं की शक्ति व वजूद पर प्रश्नचिह्न तो लग ही जाता है. भारत के ऋषिमुनियों ने लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए देवीदेवताओं और उन के कार्यों को रहस्य बना रखा था ताकि उन की रोजीरोटी आराम से चलती रहे. यही कारण है कि हिंदू धर्म ने रहस्यवाद को जन्म दिया. जहां हरेक चीज रहस्यमय लगती है तो देवताओं की संख्या भी रहस्यमय है, उन के कार्यकलाप भी रहस्यमय हैं, जिन्हें हिंदू धर्मग्रंथ एकदूसरे के विपरीत साबित करते हैं, जिस से एक धर्मग्रंथ की मान्यताओं का खंडन दूसरे धर्मगं्रथ कर देते हैं.

जहां हिंदू अपने देवताओं की संख्या 33 करोड़ बताते हैं, वहीं हिंदुओं का एक धर्मग्रंथ ऋग्वेद एक देवता नहीं, एक राजा (ईश्वर) को संपूर्ण सृष्टि का स्वामी बताता है : ‘एको विश्वस्य भुवनस्य राजा.’

ऋग्वेद – 6:36:4 (अर्थात इस संपूर्ण ब्रह्मांड का राजा एक ही है. वही एकमात्र ईश्वर (राजा) ही स्तुति एवं नमस्कार करने योग्य है.)

एक एव नमस्यो विक्ष्वीड्य : (अथर्ववेद 2:2:1)

देवताओं की तरह हिंदू धर्म में ग्रंथों की भी भरमार है. अलगअलग देवताओं की स्तुति करने वाले अलगअलग धर्मग्रंथ हैं. राम के लिए रामायण, कृष्ण के लिए गीता, शिव के लिए शिवपुराण आदि. हरेक देवता की शक्ति अलगअलग बताई गई है. विद्या की प्राप्ति के लिए सरस्वती को खुश करना पड़ता है. धन लक्ष्मी को मना कर पाया जा सकता है. हनुमान शक्ति की खान हैं. भाग्यवादी कृष्ण को अपना इष्ट मानते हैं.

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे कोई भी देवता सर्वगुण संपन्न नहीं हैं. हर देवता की अपनी एक अलग विशेषता है. राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं. कृष्ण वंचक, छलिया, झूठे और विघ्ननाशक हैं. शायद यही वजह है कि अलगअलग मतावलंबी अलगअलग देवताओं को मानते हैं. मगर यजुर्वेद केवल एक ही ईश्वर को सत्य मानता है. इस में स्पष्ट लिखा है :

‘नत्वावां अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जानिष्यते.’

(यजुर्वेद 27:36) (अर्थात हे ईश्वर, तेरे जैसा अन्य कोई न तो द्युलोक में पाया जाता है और न पृथ्वी के पदार्थों में है. न तेरे जैसा पैदा हुआ और न होगा.)

यह ऋचा इस धारणा का खंडन करती है कि ईश्वर का वास तो कणकण में है. उक्त पंक्तियां यही बताती हैं कि ईश्वर का वास पृथ्वी के किसी पदार्थं में नहीं होता है. इस में आगे लिखा हुआ है कि तेरे जैसा न कोई पैदा हुआ है और न होगा. इस का अर्थ साफ है कि रामावतार व कृष्णावतार की समस्त मान्यताएं काल्पनिक हैं. यदि हम अवतारवाद को सच मानते हैं तो वेद की ऋचाएं असत्य साबित हो जाती हैं, जिस में केवल एक ही ईश्वर को सत्य माना गया है.

जहां वेदों की ऋचाएं एक ओर मंदिर मूर्ति आदि में ईश्वर के वास का खंडन करती हैं, वहीं जगत की गति को ईश्वर से आच्छादित मानती हैं : ‘ईशावास्यमिदं सर्व यत्किंच जगत्यां जगत्.’

(यजुर्वेद 40:1) (अर्थात इस चराचर जगत में जो कुछ भी गति है वह सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर से आच्छादित है. इस हिसाब से सब चलने वाली वस्तुएं ईश्वर शक्ति से संपन्न हैं. मोटर, ट्रक, कार, जीप, जीवजंतु सभी गतिमान हैं. जिन की गति को ईश्वर से आच्छादित माना जा सकता है. तब यह ऋचा अपनी 27:36 की ऋचा का खंडन कर देती है, जिस में लिखा है कि ईश्वर न पृथ्वी के पदार्थों में पाया जाता है न द्युलोक में.)

कुछ विद्वान इसी एक सत्ता (ईश्वर) को अलगअलग नाम से पुकारते हैं. इस बात को ऋग्वेद में स्वीकार किया गया है. यदि इसे सत्य मान लिया जाए तो भी कई शंकाएं उठती हैं, जैसे : – ईश्वर एक है?

– उस के नाम अनेक हैं? – सभी उसी एक ईश्वर की बात

करते हैं? तब ईश्वरवाद स्वयं गलत सिद्ध हो जाता है. शिवपार्वती, रामसीता, राधाकृष्ण आदि एक ही ईश्वर हुए. तब इन को अलगअलग मानना बेकार है. इन के विवाह, पुत्रपुत्री और रासलीला सब गलत सिद्ध होती हैं.

वेदों में तो अग्नि को भी देवता माना गया है. उस के भय से मानव पहले भी डरता था. तब भय का मनोविज्ञान कार्य करता था. जब किसी डरावनी, अज्ञात और भयंकर चीज से सामना होता था और उस चकित समाज, समूह का बस नहीं चलता था तो उसे देवता मान लिया जाता था. आदि मानव अग्नि के विनाशकारी प्रकोप से डरता था इस कारण उस के इस प्रकोप को देवता का प्रकोप मान बैठता था. यही बात वायु, चंद्रमा, सूर्य आदि के बारे में भी लागू होती है. अज्ञात चीजों को उस ने देवता मान लिया था, क्योंकि इन की क्रियाएं उस वक्त रहस्यमयी थीं, आज मानव चंद्रमा पर जा कर उसे पत्थर का गोला सिद्ध कर चुका है, उसे देवता मानना कोरी मूर्खता है. तब भी यजुर्वेद में उन्हें देवता दर्शाया गया है :

‘तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तहु चन्द्रमा:, तदेव शुक्र तद ब्रह्म ता आप स प्रजापति:’

(यजुर्वेद 31:1) (अर्थात परमात्मा ही अग्नि, आदित्य, वायु, चंद्रमा, शुक्र, ब्रह्म आप: और प्रजापति आदि नामों को धारण करता है.)

विडंबना यह है कि जहां वेदों को ईश्वर द्वारा अवतरित ज्ञान का भंडार कहा गया है, वहीं ईश्वर अवतरित वेद एकदूसरे की काटती हुई बातों को व्यक्त करते हैं. जहां यजुर्वेद की 27:36 ऋचा ईश्वर को पृथ्वी लोक के पदार्थों में नकारती है, वहीं इसी वेद की 31:1 ऋचा अग्नि, वायु आदि में ईश्वर की उपस्थिति, ईश्वर का नाम धारण करने वाला बताती है. प्रत्यरूनस्तिष्ठाति सर्वतो, मुख:.

(यजुर्वेद 8:32:4) (वह परमेश्वर सर्वतोमुख हो कर विराजता है. यानी वह सब के सामने रहता है मगर दिखाई नहीं देता है.)

इस का तात्पर्य यह हुआ कि ईश्वर सभी के अच्छेबुरे कर्मों का साक्षी होता है. मगर उन्हें दंड नहीं दे पाता है. तब उस की लाचारी पर तरस आता है. यह सच है कि वायु हमें दिखाई नहीं देती. अग्नि को हम छू नहीं सकते. अगर वायु को स्पर्श से, अग्नि को ताप से हम महसूस कर सकते हैं, तब ईश्वर को हम क्यों महसूस नहीं करते हैं?

यदि वह प्रकाश है तो उस के रूप पर और उस की दूसरे पर निर्भरता पर तरस आता है, क्योंकि प्रकाश को प्रकाशित होने के लिए हवा का माध्यम चाहिए. एकं ज्योतिर्बहुधाविभाति.

(अथर्वर्वेद 13:3:17) (अर्थात एक ही प्रकाश है जो विभिन्न रूपों में आलोकित हो रहा है. इसी ऋचा को ऋग्वेद की 10:129 ऋचा रद्द कर देती है.)

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद् रजो नो व्योमा परो यत्.

किमावरीव:? कुह कस्य शर्मन्? अम्भ: किमासीद् गहरं गंभीरम्..

न मृत्युरासी दमृतं न तर्हि न रात्र्या अहय: आसीत प्रकेत:.

आसीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्वान्यन्न पर: किंचनास…

ऋग्वेद 10:129 यानी सृष्टि के आदिकाल में न तो असत था और न ही सत था. वहां न तो आकाश था, न तो स्वर्ग ही, जो उस से परे है. किस ने ढका था? यह कहां था? और किस की रक्षा में था? क्या उस समय गहन तथा गंभीर जल था? उस समय न तो मृत्यु थी और न अमरत्व था. उस समय दिन और रात का पार्थक्य न था. उस समय बस, एक ही था जो वायुरहित हो कर अपने सामर्थ्य से श्वास ले रहा था. उस से बढ़ कर अन्य कोई वस्तु थी ही नहीं.

जब वायु नहीं थी तब प्रकाश कहां से आ रहा था? वह आलोकित कैसे हो रहा था? आदि प्रश्न आलोकित प्रकाश का खंडन कर देते हैं. ‘अत्यमेक इत्थ पुरूरू चष्टे विविश्पति तस्य ब्रन्तान्यनु वश्चरामसि.’

(ऋग्वेद 8:25:16) (अर्थात वह एक ईश्वर ही सारी प्रजा का स्वामी है. वह सब का कुशल निरीक्षक है. हम अपने कल्याण के लिए उस की आज्ञाओं का पालन करते हैं.)

यदि यह सच मान लिया जाए तो जो कुछ भी इस संसार में हो रहा है या होता है, वह सबकुछ उसी ईश्वर की आज्ञा के पालन के फलस्वरूप होता है. तब बलात्कार, चोरी, लूटपाट, राहजनी आदि को जायज ठहराया जाना चाहिए. इन के लिए दुख, शोक, रोष, दया और पश्चाताप नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो कुछ हो रहा है, वह ईश्वर की मरजी से हो रहा है. व्यक्ति तो निमित्तमात्र है. जो कुछ करता है, वह ईश्वर करता है तो उस ईश्वर की सामर्थ्य पर दुख होता है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़ाता है. एक व्यक्ति दूसरे को मार डालता है. फिर भी यह कहना कि यह संसार उसी परमात्मा से परिपूर्ण है, उसी के इशारे पर चलता है. ईशावास्यमिदं सर्वम्.

(यजुर्वेद 40:10) (यह सब संसार उसी परमात्मा से परिपूर्ण है.) मनुष्यों की मधुर वाणियों में वही बोलता है, पक्षियों के कलरव में वही चहचहाता है, विकसित पुरुषों के रूप में वही हंसता है, प्रचंड गर्जन तथा तूफान में वही क्रोधभाव प्रकट करता है. नभोमंडल में चंद्रमा, सूर्य और ताराओं को वही सतत स्थान पर स्थिर कर देता है.

ऋग्वेद की 10:121:5 ऋचा बताती है कि मनुष्य जो भी बोलता है, वह परमेश्वर ही बोलता है. चाहे मनुष्य अच्छाबुरा कुछ भी बोले, वह ईश्वरीय कथन है. यानी इस लेख को लिखने वाला लेखक जो कुछ लिख रहा है वह भी ईश्वरीय कथन का अंश है, जो सत्य है. यह ईश्वर ही है जो लेखक से सत्य कथन लिखवा रहा है. यही वजह है कि हर चीज में ईश्वर का वास होने से उस का कोई निश्चित आकार नहीं है. (चाहे वेद स्वयं ही पृथ्वी के पदार्थ में परमेश्वर के वास का खंडन करते हों. चाहे वेद स्वयं ही परमेश्वर के कभी पैदा न हुए होने का सत्यापन करते हों.) वह ईश्वर मनुष्य और पक्षियों की वाणी में बोल कर भी निराकार, निर्गुण है. तब वेदों के कथन पर ताज्जुब होता है.

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महायश:. यजुर्वेद. 32:3

(अर्थात जिस प्रभु का बड़ा प्रसिद्ध यश है उस की कोई प्रतिमा (मूर्ति) नहीं है.) यह कैसी विडंबना है कि एक ओर वेद ईश्वर के एक रूप को उपास्य मानते हैं वहीं मूर्ति (मूर्त) रूप का खंडन करते हैं. इस पृथ्वी (पूरे ब्रह्मांड सहित) का स्वामी एक राजा को मानते हैं. वही उस के नाम को अनेक रूपों में व्यक्त करते हैं. अग्नि, वायु, चंद्रमा आदि उस के विभिन्न रूप मानते हैं.

वेदों की ऋचाएं जहां एक ओर रामकृष्ण आदि अवतारों को गलत सिद्ध करती हैं वहां स्वयं एक ही उपास्य को सार्थक सिद्ध नहीं कर पाती हैं. इस से लगता है कि ईश्वर की कल्पना एक सोचीसमझी साजिश के तहत की गई है, ताकि इस की रचना करने वाली जाति को बैठेबैठे रोजीरोटी मिलती रहे. यही वजह है कि शूद्रों को वेदपाठ की मनाही थी. इसीलिए कहा गया है कि यदि वेदों का एक शब्द भी शूद्र (आज की पिछड़ी जातियों के लोग) के कान में पड़ जाए तो उस के कान में पिघला हुआ शीशा भर देना चाहिए.

भोजपुरी अदाकारा मोनालीसा रखती हैं 800 दुपट्टे अपने पास

भोजपुरी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री मोनालीसा इन दिनों छोटे पर्दे पर अपने डरावने अंदाज के कारण छाई हुई हैं. बता दें, मोनालीसा धारावाहिक ‘नजर’ में दिख रही हैं. इस सीरियल में मोनालीसा की लंबी चोटी से लेकर उनके मेकअप तक, उनके हर अंदाज को फैंस खूब पसंद कर रहे हैं. ऐसे में अब मोनालीसा का कहना है कि सीरियल ‘नजर’ के कुछ सीक्वेंस के लिए वह अपने खुद के दुपट्टों का इस्तेमाल कर रही हैं. मोनालीसा कहती हैं कि वह जब भी किसी नए शहर में जाती हैं तो दुपट्टे जरूर खरीदती हैं. उन्होने कहा, “अभी मेरे पास फिलहाल 800 दुपट्टे हैं.”

रिपोर्ट के अनुसार धारावहिक ‘नजर’ पर बात करते हुए मोनालीसा ने कहा, “मैं अपनी मां को बनारसी दुपट्टे पहनते हुए देखकर बड़ी हुई हैं. वह इन दुपट्टों में बेहद खूबसूरत लगती थी. तभी से मैं दुपट्टों के कलेक्शन को लेकर गंभीर हो गई थी. उन्होंने बताया, “ जब मैंने सुना कि शो में मेरा किरदार मोहना पंजाबी सूट में दिखाई देगा तो मैंने खुद के कलेक्शन से कुछ दुपट्टों को लेने का निर्देशक से आग्रह किया.”

चैनल स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाले इस सिरियल में मोनालीसा डायन का किरदार निभा रही हैं, जिन्हें सूट के साथ खूबसूरत दुपट्टों में देखा जा सकता है. आपको बता दें, भोजपुरी फिल्‍मों की आदाकारा मोनालीसा  बिग बॉस के सीजन 10 में नजर आ चुकी हैं. यह पहला सीजन था, जिसमें सेलीब्रिटीज के साथ ही कौमन लोग भी कंटेस्‍टेंट बनकर पहुंचे थे. मोनालीसा इस शो में हुई अपनी शादी के चलते रातों-रात खबरों में छा गई थीं. उन्‍होंने अपने बौयफ्रेंड विक्रांत के साथ इसी शो में शादी की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इरादे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहन भागवत ने 3 दिन तक दिल्ली के सरकारी विज्ञान भवन में संघ की सोच और इरादों पर काफीकुछ नया कहा जो अब तक लिखी गई संघ की किताबों में नहीं था. जातिवाद यानी वर्ण व्यवस्था पर हर तरह से टिका संघ अब कहने को तो सब को साथ ले कर चलने की बात कर रहा है पर जमीनी तौर पर उस की सरकार ने न तो मुसलमानों के लिए, न पहले के अछूतों और शूद्रों के लिए, जो अब दलित और पिछड़े कहे जाते हैं, नया करने का कुछ ऐलान किया है.

बातें करने में हमारे पंडे, पुरोहित, ऋषिमुनि हमेशा ही माहिर रहे हैं. बात तो उन धर्मग्रंथों की है जो वर्ण व्यवस्था, छूतअछूत को हम पर थोपते हैं. क्या संघ उन्हें हिंद महासागर में फेंकने को तैयार है? कहने को कि हम सब को बराबर मानते हैं पर शादी तो कुंडली देख कर ही होगी, खाना तो बराबर वालों के साथ ही खाएंगे. मोहन भागवत ने इस अलगाव की दीवारों को मिटाने की कोई कोशिश की ही नहीं.

जिन देवीदेवताओं में ऊंचनीच का भेदभाव रहा, उन्हीं ने अपनों से लड़ाई की है. भारत भूमि में रहने वालों पर जीत की वजह से ही उन्हें पूजा जाता है और उन्हीं को सिरमाथे पर रख कर कैसे कह सकते हैं कि हम सब को बराबर मानते हैं.

रातदिन जो पाठ और कहानियां हिंदुत्व के नाम पर कही जाती हैं उन में जन्मों का जिक्र होता?है, दस्युओं, दैत्यों का जिक्र होता है. जिन के वारिस ही आज देश की बहुसंख्यक जनता हैं, उन के बारे में हिंदुत्व की क्या कोई नई सोच मोहन भागवत की कहने की हिम्मत है?

बारबार उन की पूजा करना जिन्होंने ऊंचनीच का भेदभाव खुल्लमखुल्ला थोपा था, उन की पूजा के नाम आज बदल लेना, उन के मंदिरों को बचाने के नाम पर आज बड़ी जमात को देशद्रोही बना देना किसी नई सोच की तैयारी नहीं लगता.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संचालक मोहन भागवत ने नई विदेशी तकनीक से बने, विदेशी माइको पर 3 दिन तक सरकारी विज्ञान भवन में संघ के नए इरादों और नई सोच पर वह कहा जो अब तक संघ के इश्तिहारों में नहीं हुआ करता था. मसलन, उन्होंने सब को, सारे देशवासियों को, सभी जातियों और धर्मों के लोगों को साथ बराबर की हैसियत से ले चलने की बात कही जबकि अब तक माना यही जाता है कि संघ उस वर्ण व्यवस्था में पूरा भरोसा करता?है जिस में शासक ऋषिमुनियों के इशारों पर चलते थे, क्षत्रिय केवल लड़ते थे, वैश्य खेती और व्यापार करते थे व शूद्र सब की सेवा करते थे. यह सब काम लोग अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार करते थे और इसी को करने के लिए उन का इस मानव योनि में अपनी जाति में जन्म हुआ है.

अब सुर बदलेबदले नजर आ रहे हैं. पर असल में हमेशा ही हमारे पंडे, पुरोहित, शास्त्री, प्रवचनकर्ता, ज्ञानी बातों के धनी रहे हैं. वे लच्छेदार बातें कहते रहे हैं. पुराणों से मनमरजी की कहानियां चुन कर अपनी जरूरत के हिसाब से पेश करते रहे हैं. मोहन भागवत ने जोकुछ कहा उन की सरकार केंद्र और 19 राज्यों में क्या उस पर कुछ फैसले ले चुकी है या लेने वाली है. अगर हां, तो मोहन भागवत ने कुछ गिनाया नहीं.

कहने और करने में बहुत फर्क है. जब से दलितों को छिटकने न देने की कोशिशें हुई हैं, ऊंचे वर्ण के लोग बिदकने लगे हैं. मुसलमानों को साथ ले चलने की बात कही गई पर भाजपा मुसलिमों को टिकट देती ही नहीं. दलितों को भी केवल आरक्षित सीटों पर ही टिकट दिए जाते हैं और शायद ही कोई दलित चेहरा भाजपा में असल में मोटा पद संभाले हुए हो.

बेमेल प्यार का एक अनूठा फसाना

तबरेज इलाहाबाद के विवेकानंद मार्ग पर चमेलीबाई धर्मशाला के पास स्थित प्रभात सिंह की मशीनरी पार्ट्स की दुकान पर नौकरी करता था. वह रोजाना सुबह 10 बजे के करीब दुकान पर पहुंचता तो कुछ देर बाद प्रभात भी वहां पहुंच जाता था. इस के बाद ही तबरेज दुकान खोल कर उस की साफसफाई करता था. 30 नवंबर, 2016 को भी जब तबरेज निर्धारित समय पर दुकान पर पहुंचा तो दुकान का शटर खुला मिला. यह देखते ही उस के मुंह से निकला, ‘‘लगता है भैया आज सुबहसुबह ही दुकान आ गए हैं.’’

लेकिन जब दुकान के भीतर गया तो वहां प्रभात नहीं दिखा. वह मन में बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐसे दुकान खोल कर कहां चले गए भला?’’

दुकान के अंदर आड़ातिरछा रखा सामान निकाल कर उस ने दुकान के बाहर लगा दिया. फिर दुकान की साफसफाई कर के वह दुकान में बैठ कर प्रभात के लौटने का इंतजार करने लगा. आधे घंटे से ज्यादा बीत गया पर प्रभात नहीं लौटा तो तबरेज पास की दुकान पर चाय पीने चला गया. प्रभात का जिनजिन दुकानों पर उठनाबैठना था, तबरेज वहां भी गया पर उसे उस का मालिक दिखाई नहीं दिया तो बुदबुदाते हुए वह वापस दुकान पर आ कर बैठ गया.

उसी समय चित्रा दौड़ती हुई बदहवास सी दुकान पर आई. जिस मकान में प्रभात की दुकान थी, चित्रा उसी मकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी थी. उस के साथ उस का चचेरा भाई गोलू भी था. वह बोली, ‘‘त…तब… तबरेज…’’

‘‘हां बताओ, तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आओ मेरे साथ, खुद ही चल कर देख लो.’’

किसी अनहोनी की आशंका के साथ तबरेज चित्रा और गोलू के पीछेपीछे उस के घर पहुंच गया. घर दुकान के एकदम पीछे ही था. जैसे ही वह कमरे में पहुंचा तो उस का मालिक प्रभात फांसी के फंदे पर झूला हुआ दिखा. यह देख कर उस की चीख निकल गई, ‘‘यह कैसे हो गया?’’

तभी चित्रा बोली, ‘‘पता नहीं, इन्होंने आत्महत्या क्यों कर ली? इन के हाथ में सुसाइड नोट भी है. तबरेज तुम इन के घर वालों को फोन कर के जानकारी दे दो.’’

तबरेज ने तुरंत अपने मोबाइल से प्रभात के पिता वीरेंद्र प्रताप सिंह को फोन कर के उस की आत्महत्या की जानकारी दे दी. प्रभात का घर वहां से कुछ ही दूरी पर था इसलिए थोड़ी ही देर में वीरेंद्र प्रताप सिंह अपने घर वालों और पड़ोसियों के साथ वहां पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी.

उस समय भी प्रभात रसोईघर के बगल वाले कमरे में फांसी पर लटका पड़ा था. खबर मिलने पर अनेक व्यापारी भी वहां पहुंच गए. घर के जवान आदमी की मौत पर घर वाले बिलखबिलख कर रो रहे थे. किसी ने सूचना थाना कोतवाली पुलिस को भी दे दी.

चूंकि घटनास्थल से थाना कोतवाली महज आधा एक किलोमीटर की दूरी पर है, इसलिए 10 मिनट में ही एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा व कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा मय फोर्स घटनास्थल पर पहुंच गए.

अब तक सत्येंद्र सिंह के मकान के बाहर भारी संख्या में भीड़ मौजूद हो चुकी थी, जिस के कारण रोड पर जाम लग गया था. पुलिस ने फांसी पर लटके प्रभात सिंह को नीचे उतारा. उस की मौत हो चुकी थी. शव की बारीकी से जांच की तो पहली ही नजर में मामला संदिग्ध नजर आया. प्रभात के सिर व शरीर पर चोटों के निशान थे.

यह देख प्रभात के घर वाले और अन्य व्यापारी हंगामा करने लगे. उन का आरोप था कि प्रभात की हत्या करने के बाद उसे फांसी पर लटकाया गया है, जिस से मामला आत्महत्या का लगे. मृतक के हाथ में 2 पेज का एक सुसाइड नोट भी था.

उस सुसाइड नोट में एक लड़की से प्रेम संबंध और उस की बेवफाई का जिक्र था. प्रभात और उस की तथाकथित प्रेमिका का कितना पुराना रिश्ता था, इस बात का उल्लेख उस नोट में किया गया था. सुसाइड नोट में कितनी सच्चाई है, यह बात जांच के बाद ही पता चलती.

मृतक के परिजनों ने सीधे तौर पर दुकान मालिक सत्येंद्र सिंह की बेटी चित्रा सिंह पर आरोप लगाया कि उस ने ही अपने सहयोगियों के साथ मिल कर प्रभात की हत्या की है. फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए.

प्रभात की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद उस के भाई प्रदीप की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया. पोस्टमार्टम के बाद शाम को जब पुलिस को रिपोर्ट मिली तो उस में भी बताया गया कि प्रभात के सिर पर लोहे की रौड जैसी किसी चीज से वार किया गया था, जिस से उस की मौत हुई थी.

मकान मालिक सत्येंद्र सिंह घटना से एकदो दिन पहले अपनी पत्नी राशि के साथ प्रतापगढ़ चले गए थे. वहां उन के किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी. घर पर उन की बेटी चित्रा और उस का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू मौजूद था.

एसपी (सिटी) विपिन कुमार टांडा के समक्ष चित्रा सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा, ‘‘सर, प्रभात सिंह का उस के प्रति एकतरफा प्यार था. वह मुझ से उम्र में भी दोगुना बड़ा था. भला मैं उस से कैसे प्रेम कर सकती हूं. मेरा उस की हत्या या आत्महत्या से कोई वास्ता नहीं है.’’

‘‘जिस वक्त प्रभात तुम्हारे कमरे में घुस कर फांसी पर लटका, उस वक्त तुम कहां थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, मैं रोज सुबह नहाने के बाद पूजा करती हूं. बुधवार को भी रोजाना की तरह नहाने के बाद मैं पूजा करने चली गई थी. पूजा के बाद मैं ने बालकनी से नीचे की ओर देखा तो नीचे प्रभात की कार दिखी. मैं यह सोचते हुए सीढि़यों से नीचे उतरी कि प्रभात आज दुकान पर इतनी जल्दी कैसे आ गए. तभी देखा कि वह हमारी रसोई के बगल वाले कमरे में लटका हुआ था. मैं समझ नहीं पाई कि यह काम करने के लिए उस ने मेरा घर ही क्यों चुना?’’ वह बोली.

घर में फर्श पर जो खून का धब्बा मिला था, उस के बारे में पुलिस ने उस से पूछा तो उस ने उसे चुकंदर का रस बताया.

पुलिस को लग रहा था कि यह झूठ बोल रही है इसलिए उस से और उस के चचेरे भाई गोलू से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने ही अपना जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने कहा कि प्रभात की हत्या करने का उन का कोई इरादा नहीं था. पर हालात ऐसे बन गए जिस से उस का कत्ल हो गया.

प्रभात सिंह इलाहाबाद शहर के कीडगंज थाना क्षेत्र के कृष्णानगर निवासी वीरेंद्र प्रताप सिंह का बेटा था. कारोबारी वीरेंद्र प्रताप सिंह के 4 बेटे और एक बेटी थी. उन की पत्नी कनकलता का देहांत हो चुका था. मांगलिक होने की वजह से प्रभात की शादी नहीं हुई थी.

वीरेंद्र प्रताप सिंह के एक दोस्त थे सत्येंद्र सिंह, जो प्रतापगढ़ में एक सरकारी मुलाजिम थे. कोतवाली थानाक्षेत्र के विवेकानंद मार्ग पर रहते थे. वीरेंद्र प्रताप ने सन 2003 में उन की एक दुकान किराए पर ली थी, जहां उस ने बंधु ट्रेडर्स के नाम से मशीनरी पार्ट्स बेचने का काम शुरू कर दिया. उस दुकान को प्रभात संभालता था.

दोस्ती के नाते सत्येंद्र उन से दुकान का किराया तक नहीं लेते थे. प्रभात का सत्येंद्र सिंह के घर में खूब आनाजाना था. दुकान के पीछे ही सत्येंद्र सिंह का आवास था. उन की एक बेटी चित्रा थी, घर में आनेजाने के कारण उन दोनों के बीच प्रेमसंबंध स्थापित हो गए. उस समय प्रभात की उम्र 36 साल और चित्रा की 16 साल थी.

कुछ दिनों बाद ही उन के संबंधों की खबर उन के घर वालों को भी हो गई. घर वालों ने उन्हें लाख समझानेबुझाने की कोशिश की लेकिन इस का उन पर कोई असर नहीं हुआ. बल्कि उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों की उम्र में काफी अंतर था. लेकिन प्यार का भूत जिन के सिर पर सवार होता है, उन के बीच उम्र आड़े नहीं आती.

धीरेधीरे समय आगे बढ़ने लगा. चित्रा जहां जवान थी तो दूसरी ओर प्रभात की उम्र ढलान की ओर बढ़ रही थी. शायद यही कारण था कि उस पर जान छिड़कने वाला प्रभात अब उसे नीरस नजर आने लगा था. वह उस से इतना प्यार करता था कि वह उसे कालेज तक छोड़ने और लेने जाने लगा था.

लेकिन चित्रा प्रभात से दूरी बनाने लगी थी और अपनी उम्र के लड़कों से मोबाइल पर घंटों बतियाती थी. प्रभात जब भी उसे फोन करता तो वह उस का फोन रिसीव नहीं करती. बारबार फोन करने के बाद वह उस का फोन उठाती तो बेमन से बात करती.

प्रभात समझ नहीं पा रहा था कि पिछले 10 सालों से प्यार करने वाली चित्रा के अंदर यह बदलाव कैसे आ गया. प्रभात के मना करने के बावजूद भी वह वाट्सऐप और फेसबुक पर पता नहीं किसकिस से चैटिंग करती रहती थी. किसी भी तरह वह प्रभात से अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन प्रभात उसे किसी भी हाल में छोड़ने या भुलाने को तैयार नहीं था.

29 नवंबर, 2016 की रात को प्रभात ने चित्रा से बात करने के लिए कई बार उस का नंबर मिलाया. पहले तो उस का मोबाइल व्यस्त आ रहा था पर बाद में वह स्विच्ड औफ हो गया. प्रभात ने सुबह उठ कर फिर से उस का मोबाइल नंबर डायल किया. घंटी बजने के बावजूद चित्रा ने फोन नहीं उठाया.

गुस्से में वह सुबह 8 बजे ही अपने घर से निकल गया और दुकान खोलने के बाद सीधे चित्रा के कमरे में पहुंचा. वहां चित्रा बिलकुल अकेली थी. मोबाइल रिसीव न करने की बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगा. उन का शोर सुन कर चित्रा का चचेरा भाई कौशिक उर्फ गोलू उठ गया.

उस ने देखा कि गुस्से से लालपीला प्रभात चित्रा के साथ मारपीट कर रहा है तो उस ने बीचबचाव करने की कोशिश की. उस समय प्रभात चित्रा का गला दबाए हुए था. गोलू ने बताया कि उस ने चित्रा दीदी को बचाने की कोशिश की. तब प्रभात उस से उलझ गया और हाथापाई करने लगा.

उसी दौरान गोलू की नजर दीवार से सटा कर रखे सरिए पर गई. किसी तरह उस ने प्रभात के चंगुल से खुद को छुड़ाया तो प्रभात चित्रा से भिड़ गया. तभी गोलू ने सरिया उठा कर पीछे से प्रभात के सिर पर दे मारा. एकदो वार और करने पर प्रभात नीचे गिर गया और मर गया.

इस के बाद दोनों ने एक रस्सी गले में बांध कर उसे कुंडे से लटका दिया ताकि मामला आत्महत्या का लगे. जहांजहां उस का खून गिरा था, उसे साफ कर के चुकंदर का जूस डाल दिया. फिर दोनों रोने का नाटक करने लगे. चित्रा को जब पता चला कि दुकान पर नौकर तबरेज आ चुका है तो वह घबराई हुई उस के पास गई और उसे कमरे में ला कर बताया कि प्रभात ने आत्महत्या कर ली है.

इधर मृतक के छोटे भाई सुधीर सिंह ने बताया कि प्रभात ने चित्रा के नाम लाखों रुपए की प्रौपर्टी और जायदाद कर दी थी. प्रभात उस से प्रौपर्टी वापस न मांग ले, इसलिए उस ने अन्य लोगों के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी. उधर चित्रा का कहना है कि वह प्रभात से प्यार नहीं करती थी. प्रभात एकतरफा उसे चाहता था.

पुलिस ने चित्रा और उस के चचेरे भाई गोलू को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभी यह पता नहीं लग सका है कि मृतक के हाथ में जो सुसाइड नोट मिला, वह किस ने लिखा था. फोरैंसिक जांच के बाद ही यह स्थिति साफ हो सकेगी. केस की विवेचना कोतवाली प्रभारी अनुपम शर्मा कर रहे हैं.

चमड़ी से दमड़ी बनाने वाले हसीन खेल का खुलासा

मध्य प्रदेश के शहर ग्वालियर के एसपी हरिनारायण चारी मिश्र को अपने मुखबिरों से सूचना मिली थी कि शहर में सैक्स की आड़ में रईस लोगों को ब्लैकमेल करने का कारोबार तेजी से फलफूल रहा है. चूंकि मामला बड़े लोगों से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने थाना मुरार के थानाप्रभारी रविंद्र सिंह गुर्जर को अपने औफिस में बुला कर इस मामले की जांच कर के तुरंत काररवाई करने का निर्देश दिया. मामला गंभीर और काफी संवेदनशील था, इसलिए जांच की जिम्मेदारी मिलते ही रविंद्र सिंह गुर्जर ने अपने मुखबिरों को सतर्क कर दिया. इस के अलावा खुद भी मामले पर नजर रखे हुए थे. इस का उन्हें मनचाहा परिणाम भी मिला.

24 सितंबर, 2016 को रविंद्र सिंह गुर्जर को एक मुखबिर ने सूचना दी कि सैक्स की आड़ में रईसों को ब्लैकमेल करने वाले गिरोह ने वार्ड 25 की पार्षद सपना नरवरिया के पति सुजीत नरवरिया को अपने जाल में फांस रखा है. वह आज पिंटो पार्क के पास गिरोह के सरगना की मांग पर मोटी रकम देने आने वाला है.

रविंद्र सिंह गुर्जर ने इस जानकारी से एसपी हरिनारायण चारी मिश्र को अवगत कराया और उन के निर्देश पर अपने नेतृत्व में पुलिस की एक टीम बनाई, जिस में एएसआई एस.एस. सोमवंशी, हवलदार प्रकाश कौरव, जयहिंद, हिम्मत सिंह, मनोज आदि को शामिल किया.

पुलिस टीम मुखबिर द्वारा बताई जगह पर पहुंची तो सुजीत नरवरिया वहां पहले से मौजूद दिखाई दिया. कुछ देर बाद वहां 2 युवक आए तो सुजीत नरवरिया ने जैसे ही अपनी जेब से नोटों की गड्डी निकाल कर उन युवकों के हाथ में रखा, सादे कपड़ों में आई पुलिस टीम ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया.

दोनों युवकों ने खुद को पुलिस वालों से घिरा पाया तो उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पुलिस ने दोनों को दबोच लिया.

दोनों को थाने ला कर पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम राम गुर्जर और पंकज कुशवाह बताए. उन्होंने आगे बताया कि उन के इस गैंग की सरगना डौली तोमर और उस का प्रेमी पवन है. पंकज और राम की निशानदेही पर रविंद्र सिंह गुर्जर ने डौली के अलावा गैंग के अन्य 5 युवकों को एक आई20 कार, 2 पिस्टल, एक तमंचा और जीवित कारतूसों के साथ गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में इन लोगों ने देह के जाल में फांस कर रईसों को लूटने की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

डौली और पवन के बीच प्यार की शुरुआत शहर की सरहद पर बने एक प्राचीन मंदिर में हुई थी.  दोनों अलगअलग जाति के थे. इस के बावजूद उन्होंने तय कर लिया था कि वे जिंदगी भर साथसाथ रहेंगे. दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें जुदा नहीं कर सकेगी.

डौली तोमर के घर वालों को जब किसी तरह पता चला कि वह किसी लड़के के साथ घूमतीफिरती है तो उन्होंने इस बारे में उस से बात की. डौली ने बेझिझक बता दिया कि पवन नाम के जिस लड़के से उस की दोस्ती है, वह बेहद शरीफ है और शादीपार्टी में बिजली सजावट का काम करता है.

जब घर वालों ने पवन की जाति पूछी तो डौली ने कहा कि वह जाटव है. इस पर घर वालों ने दोटूक कह दिया कि वे उस की शादी पवन से हरगिज नहीं कर सकते, साथ ही उन्होंने डौली को हिदायत दी कि वह पवन को भूल जाए. डौली पवन को अपने दिल में बसा चुकी थी. उसे भुलाना उस के लिए इतना आसान नहीं था.

घर वालों की हिदायत को दरकिनार कर उस ने पवन से मेलजोल जारी रखा. घर वालों को जब पता चला कि डौली नहीं मान रही है तो उन्होंने उस से नाता तोड़ लिया. अगले ही दिन डौली ने पवन के साथ कोर्टमैरिज कर ली.

पवन का एक परिचित था अवधेश राणा. उस ने पवन को मोटी रकम कमाने की तरकीब बताई, जो उसे पसंद आ गई. उस ने अपनी पत्नी डौली से उस के बारे में बात की तो वह भी उस का साथ देने को तैयार हो गई. इस के बाद उन्होंने अपना एक गैंग बनाया, जिस में लवली, ललित, लक्ष्मण, राज को भी शामिल कर लिया गया. इस तरह आपत्तिजनक फोटो खींच कर उसे ब्लैकमेल करने वाले गैंग की नींव पड़ गई.

इस गैंग का सरगना अवधेश बड़ी चालाकी से नामीगिरामी मर्द को ढूंढता था. इस के बाद लवली और डौली उस धनाढ्य को किसी भी तरह अपने जाल में फांसती थीं. ये दोनों शिकार को पूरी तरह फांसने के लिए फोन पर खुल कर बातें करती थीं और अपने अश्लील फोटो तक उस के मोबाइल पर वाट्सऐप कर देती थीं. इस के बाद योजना को अंजाम देने के लिए शिकार को अपने बैडरूम में ले आती थीं और उस के कपड़े उतारते ही उस से अर्धनग्न अवस्था में लिपट जाती थीं.

तभी इस गैंग के अन्य सदस्य खुद को पुलिस और पत्रकार बता कर बैडरूम में घुस आते और टीवी न्यूज चैनल का कैमरा और चैनल का माइक लिए आपत्तिजनक स्थिति की वीडियो बना लेते. इस के बाद धमकी दे कर वे शिकार से मोटी रकम ऐंठते थे. इस तरह इन्होंने तमाम लोगों को अपने जाल में फांस कर मोटी रकम ऐंठी थी. अवधेश ने इस बार शहर की एक पार्षद के पति सुजीत नरवरिया को अपना निशाना बनाया. सुजीत नरवरिया ठेकेदारी करता था. कुछ समय पहले ही उस की मुलाकात अवधेश राणा ने जडेरुआ डैम के निकट पानी के टैंकर की ठेकेदारी के संबंध में डौली तोमर से कराई थी. पहली ही मुलाकात में सुजीत डौली से बहुत प्रभावित हुआ था. बाद में दोनों के बीच दोस्ती हो गई. डौली ने उसे भी अपने रूपजाल में फांस लिया.

डौली ने सुजीत नरवरिया को जडेरुआ के निकट बुलाया और बड़े ही सुनियोजित ढंग से अपने और लवली के साथ सुजीत के अर्धनग्न हालत में आपत्तिजनक फोटो खिंचवा लिए. इस के बाद गैंग के अन्य सदस्यों ने खुद को पुलिसकर्मी बता कर सुजीत की जेब से 7 हजार रुपए निकाल लिए.

इस के बाद अवधेश, ललित, लक्ष्मण, राज, पवन और दोनों लड़कियां उसे कार में बैठा कर हाईवे पर ले गई, जहां सुजीत को धमका कर उस से 10 लाख रुपए की मांग की. उसे धमकी दी कि अगर उस ने रुपए नहीं दिए तो उस के खिलाफ रेप का केस दर्ज करा दिया जाएगा. बाद में मामला एक लाख रुपए में तय हो गया. गैंग ने 40 हजार रुपए तो सुजीत से तत्काल एटीम से निकलवा लिए थे, बाकी की रकम बाद में देने को कहा था. 2-3 दिनों बाद तक सुजीत ने पैसे नहीं दिए तो वे बारबार फोन कर के उस के फोटो वायरल करने की धमकी देने लगे. इस पर परेशान हो कर सुजीत नरवरिया ने किसी से यह बात कही तो उस ने यह बात एसपी हरिनारायण चारी मिश्र तक पहुंचा दी.

तब एसपी ने तत्काल इस मामले पर काररवाई करते हुए गैंग के ज्यादातर सदस्यों को पकड़वा लिया. गैंग का सरगना अवधेश राणा और डौली का प्रेमी पवन फरार है. पकड़े गए लोगों को पुलिस ने अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें