बिकिनी में मस्ती करती दिखीं काजोल की बहन, तस्वीरें हुईं वायरल

काजोल की बहन तनीषा मुखर्जी एक लंबे समय से बौलीवुड में एक्टिव नहीं हैं पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों के बीच चर्चा में बनी रहती हैं. तनीषा अक्सर अपनी हौट फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. यही कारण है कि लगातार उनकी फैन फौलोविंग बढ़ती जा रही है.

हाल ही में उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपनी हौट तस्वीरें शेयर की, जिसके बाद अपने फैंस के बीच एक बार फिर से उनकी चर्चा तेज हो गई. इन तस्वीरों में तनीषा सी बीच पर मस्ती करती दिख रही हैं. तस्वीरों में वो बिकिनी में हैं, जो उनकी हौटनेस में चार चांद लगा रहा है.

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तो आइए देखें उनकी हौट तस्वीरें.

 

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Some #yoga in the pool Is super fun and super tough! #tanishaamukerji #travel #health #mindbodysoul #fun #nature #indonesia

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Missing this sea and sunshine! Been landlocked too long #rajaampat #diving #tanishaamukerji #nature #travel #saltlife

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तनीषा एक लंबे समय से इंडस्ट्री में एक्टिव नहीं हैं. इससे पहले वो ‘सरकार’ और ‘वन टू थ्री’ जैसी फिल्मों से बड़े पर्दे पर दिख चुकी हैं.

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मोदी की नैया

यह गनीमत ही कही जाएगी कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान से व्यर्थ का युद्ध नहीं लड़ा.

सेना को एक निरर्थक युद्ध में झोंक देना बड़ी बात न होती. पर जैसा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि युद्ध शुरू करना आसान है, युद्ध जाता कहां है, कहना कठिन है. वर्ष 1857 में मेरठ में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई ब्रिटिशों की हिंदुओं की ऊंची जमात के सैनिकों ने छेड़ी लेकिन अंत हुआ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर एकछत्र ब्रिटिश राज में, जिस में विद्रोही राजा मारे गए और बाकी कठपुतली बन कर रह गए.

आक्रमणकारी पर विजय प्राप्त  करना एक श्रेय की बात है, पर चुनाव जीतने के लिए आक्रमण करना एक महंगा सौदा है, खासतौर पर एक गरीब, मुहताज देश के लिए जो राइफलों तक के  लिए विदेशों का मुंह  ताकता है, टैंक, हवाईजहाजों, तोपों, जलपोतों, पनडुब्बियों की तो बात छोड़ ही दें.

नरेंद्र मोदी के लिए चुनाव का मुद्दा उन के पिछले 5 वर्षों के काम होना चाहिए. जब उन्होंने पिछले हर प्रधानमंत्री से कई गुना अच्छा काम किया है, जैसा कि उन का दावा है, तो उन्हें चौकीदार बन कर आक्रमण करने की जरूरत ही क्या है? लोग अच्छी सरकार को तो वैसे ही वोटे देते हैं. ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक बिना धार्मिक दंगे कराए चुनाव दर चुनाव जीतते आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दबदबा बिना सेना, बिना डंडे, बिना खूनखराबे के बना हुआ है.

नरेंद्र मोदी को खुद को मजबूत प्रधानमंत्री, मेहनती प्रधानमंत्री, हिम्मतवाला प्रधानमंत्री, चौकीदार प्रधानमंत्री, करप्शनफ्री प्रधानमंत्री कहने की जरूरत ही नहीं है, सैनिक कार्यवाही की तो बिलकुल नहीं.

रही बात पुलवामा का बदला लेने की, तो उस के बाद बालाकोट पर हमला करने के बावजूद कश्मीर में आएदिन आतंकवादी घटनाएं हो रही हैं. आतंकवादी जिस मिट्टी के बने हैं, उन्हें डराना संभव नहीं है. अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया में प्रयोग किया हुआ है. पहले वह वियतनाम से मार खा चुका है. अमेरिका के पैर निश्चितरूप से भारत से कहीं ज्यादा मजबूत हैं चाहे जौर्ज बुश और बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपतियों की छातियां 56 इंच की न रही हों. बराक ओबामा जैसे सरल, सौम्य व्यक्ति ने तो पाकिस्तान में एबटाबाद पर हमला कर ओसामा बिन लादेन को मार ही नहीं डाला था, उस की लाश तक ले गए थे जबकि उन्हें अगला चुनाव जीतना ही नहीं था.

नरेंद्र मोदी की पार्टी राम और कृष्ण के तर्ज पर युद्ध जीतने की मंशा रखती है पर युद्ध के  बाद राम को पहले सीता को, फिर लक्ष्मण को हटाना पड़ा था और बाद में अपने ही पुत्रों लवकुश से हारना पड़ा था. महाभारत के जीते पात्र हिमालय में जा कर मरे थे और कृष्ण अपने राज्य से निकाले जाने के बाद जंगल में एक बहेलिए के तीर से मरे थे. चुनाव को जीतने का युद्ध कोई उपाय नहीं है. जनता के लिए किया गया काम चुनाव जिताता है. भाजपा को डर क्यों है कि उसे युद्ध का बहाना भी चाहिए. नरेंद्र मोदी की सरकार तो आज तक की सरकारों में सर्वश्रेष्ठ रही ही है न!

न दहेज न बैंडबाजा और हो गई शादी

राजपूत समाज की एक शादी में दूल्हे और उस के परिवार ने टीके की रस्म में सवा लाख रुपए लेने से साफ इनकार कर दिया. शगुन का सिर्फ एक रुपया ही स्वीकार किया.

जोधा परिवार ढिमडा बेरा भांवता, अजमेर के रहने वाले अजय सिंह राठौड़ की शादी थी. उन की बरात टोंक जिले की निवाई तहसील के गांव माताजी का भूरटिया के रहने वाले चतर सिंह राजावत के घर गई, जहां उन की शादी कविता कंवर के साथ हुई.

इस दौरान जब टीके  की रस्म शुरू हुई तो दुलहन के पिता ने थाल में नोटों की गड्डियां रख कर दूल्हे की तरफ बढ़ाया. यह देख अजय ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मैं यह पैसा नहीं ले सकता. हमारे लिए तो दुलहन ही दहेज है. देना ही है तो एक रुपया शगुन के तौर पर दे दें.’

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दुलहन पक्ष के लोगों ने काफी समझाया, लेकिन दूल्हा अपनी बात पर अडिग रहा. उस ने भारीभरकम रकम के बजाय एक रुपए का सिक्का ही टीके के शगुन के तौर पर लिया.

दूल्हे की ऐसी पहल को देख कर शादी में आए हर किसी ने उस की तारीफ की.

दूल्हे के पिता कमलेश सिंह राठौड़ ने बताया कि हर लड़की को उस के मातापिता पढ़ालिखा कर बड़ा करते हैं. शादी में उन्हें दहेज की चिंता भी सताती है. लेकिन एक पिता जब अपनी बेटी को ही दे देता है तो इस से बढ़ कर और क्या चाहिए?

दूल्हे के पिता की यह बात सुन कर दुलहन के पिता चतर सिंह राजावत की आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने कहा कि वे बेटी की शादी में टीके के तौर पर सवा लाख रुपए देने को तैयार थे, मगर समधीजी ने यह रकम न ले कर बड़प्पन दिखाया है. यह समाज के लिए अच्छा संदेश है. ऐसा दामाद और ससुर पा कर उन का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.

देश में जहां एक तरफ लोग अपनी बेटियों की शादी में लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च कर के गरीब लड़कियों के परिवार वालों के सामने तमाम मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजपूत समाज के अजय सिंह राठौड़ ने शादी के मंडप का सामाजिक जागरूकता के लिए इस्तेमाल कर के समाज में एक बेहतरीन मिसाल पेश की है.

दरअसल, ‘5 लाख लड़कियां हर साल मां के पेट में मार दी जाती हैं सिर्फ दहेज की वजह से’ और ‘दहेज की कमी की वजह से लड़कियों की शादी न हो पाना’ जैसी सामाजिक हकीकत अजय सिंह राठौड़ और उन के पिता को काफी दिनों से बेचैन कर रही थी, इसलिए दहेज प्रथा के खिलाफ बिना दहेज और फुजूलखर्ची किए सादगी से शादी की और समाज में एक मिसाल कायम की.

अजय सिंह राठौड़ बताते हैं कि अपने आसपास मौजूद तमाम लोगों को देखासुना करते थे जो लैंगिक बराबरी और सुधार की बातें हमेशा करते थे, लेकिन सुधार की पहल खुद से करने में कतराते थे. लेकिन पिताजी की प्रेरणा से उन में बराबरी की समझ पैदा हुई और इस सादा शादी के जरीए दहेज जैसी सामाजिक बुराई के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश की गई.

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फेरों में लिया जिम्मा

हर किसी के लिए शादी उस का यादगार पल होता है, इसलिए उसे और ज्यादा यादगार बनाने के लिए कुछ न कुछ अलग किया जाता है. कुछ शादी के नाम पर लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च करना अपनी शान समझते हैं तो कुछ दहेज को समाज में शाप समझते हुए इस प्रथा को खत्म करने के लिए शादी में शगुन में बतौर एक रुपया स्वीकार कर रहे हैं.

ऐसा ही एक नजारा मंड्रेला कसबे में संचालित एक निजी स्कूल रुक्मिणी देवी विद्या पीठ के डायरैक्टर व फौजी रह चुके तेजाराम बड़सरा के डाक्टर बेटे विकास बड़सरा की शादी में देखने को मिला, जब उन्होंने दहेज न लेते हुए इलाके की 11 जरूरतमंद लड़कियों की पढ़ाईलिखाई का जिम्मा लिया.

मंड्रेला कसबे के नजदीक गांव सूखा का बांस, जिला चूरू के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डाक्टर विकास बड़सरा की शादी चिड़ावा की डाक्टर रुचिका के साथ हुई.

शादी में दूल्हे के पिता तेजाराम बड़सरा ने वर्तमान समय में दिनोंदिन बढ़ रही दहेज प्रथा के खिलाफ समाज को सही संदेश देने के लिए शगुन का एक रुपया ले कर अच्छा संदेश दिया.

तेजाराम बड़सरा ने बताया कि उन का परिवार शुरू से ही सामाजिक सरोकारों को निभाने में विश्वास रखने वाला रहा है. दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई के रूप में उभर रही है, ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हर किसी को अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाते हुए इस गलत प्रथा की खिलाफत करनी चाहिए.

डाक्टर विकास बड़सरा व डाक्टर रुचिका ने बताया कि उन्होंने सात फेरों के साथ ही ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की शपथ ली है. इस के तहत वे क्षेत्र की 11 जरूरतमंद बालिकाओं को गोद ले कर उन की पढ़ाईलिखाई का खर्चा उठाएंगे. उन की इस पहल की क्षेत्र के लोगों ने तारीफ की.

सीकर जिले की फतेहपुर तहसील के भींचरी गांव में महज एक रुपए में हुई शादी का असर भी तुरंत देखा गया. शादी में आए 2 और लोगों ने अपने बच्चों की शादी महज एक रुपए में करने का वादा करते हुए वहीं पर सगाई पक्की कर दी.

मुंशी खां बेसवा ने बताया कि बेसवा के रोशन खां के बेटे शमीर खान का निकाह भींचरी के इसहाक खान की बेटी अफसाना के साथ हुआ. निकाह में सिर्फ एक रुपया नेग दिया गया और दुलहन को मात्र एक जोड़ी कपड़ों में ही विदा किया. दोनों ही परिवारों द्वारा शादी का कार्ड भी नहीं छपवाया गया और न ही खाने का आयोजन किया गया. इस निकाह की बेसवा, भींचरी, आलमास, भगासरा समेत आसपास के कायमखानी समाज के लोगों ने तारीफ की.

कायमखानी समाज में शादी में डीजे बंद करने, सादगी से शादी करने और दूसरी सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए कायमखानी यूथ बिग्रेड सीकर के कार्यकर्ता इस जिले में एक साल से काम कर हैं और उन की मुहिम अब रंग ला रही है. एक साल की कोशिशों के बाद कायमखानी समाज के लोग डीजे और दहेज के बिना सादगी से शादी के लिए राजी हो रहे हैं.

बेसवा गांव से भींचरी गांव में बरात बेहद सादगी से की गई थी. शादी में शामिल सभी लोग अपने वाहनों से ही भींचरी आए.

दूल्हा पक्ष द्वारा एक भी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया गया था. बरात में डीजे या बैंडबाजा नहीं था. फोटोग्राफर को भी नहीं बुलाया गया. बरातियों को सिर्फ चाय पिलाई गई.

दूल्हे के पिता रोशन खान ने तो चाय के लिए भी मना कर दिया था. लेकिन दुलहन के पिता ने कहा कि चाय तो आदरसत्कार के लिए है.

न बराती, न बैंडबाजा

पिलानी के वार्ड 2 में रहने वाले रतनलाल रोहिल्ला ने 28 साल पहले बिना बैंडबाजा और बराती के शादी की थी. बिलकुल इसी तरीके से अपने बेटे रोहित की शादी कर मिसाल पेश की.

रतनलाल का कहना है कि शादी में गैरजरूरी खर्चा व समय की बरबादी को ले कर यह फैसला लिया गया. बेटे के लिए लड़की के नेगचार के लिए घर वालों और रिश्तेदारों के साथ कसबे के वार्ड 24 में आए थे.

नेहरू बाल मंदिर स्कूल में अध्यापक के पद पर काम कर रहे पवन कुमार दर्जी की बेटी सीमा के नेगचार के लिए पहुंचे. वर पक्ष ने इसी दिन सादगी के साथ शादी किए जाने का प्रस्ताव रख दिया. पवन कुमार के अलावा उन के चाचा रामकुमार दर्जी, डाक्टर आनंद, डाक्टर लक्ष्मण, मनीराम, लूनकरण वर्मा, चानण वगैरह ने प्रस्ताव मान लिया और शादी की तैयारी में जुट गए.

अचानक लिए गए इस फैसले और वरवधू पक्ष की रजामंदी से शादी हो गई. शाम को वरमाला के साथसाथ सात फेरे की रस्म भी पूरी की गई. मेहमान भी बहुत कम रहे. दहेज भी नहीं लिया गया. लोगों ने इस पहल की तारीफ भी की.

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महल्ले के प्रमुख पीडी जांगिड़ ने बताया कि दोनों परिवारों ने आज के जमाने को देखते हुए एक मिसाल कायम की है. महल्ले वाले न केवल हैरान हैं, बल्कि खुश भी हैं.

गौरतलब है कि दुलहन सीमा एमएससी कर चुकी है. दूल्हे रोहित ने दिल्ली, हल्द्वानी, मसूरी में स्किल डवलपमैंट का औफिस खोल रखा है. सात फेरों के लिए न मंडप, न ही पंडित, न घोड़ी और न ही कोई बैंडबाजा.

दुर्गादास कालोनी, सीकर में हुई इस अनूठी शादी को देख कर हर कोई हैरत में था. हर कोई यही कहता दिखा कि अगर सभी जगह ऐसा होने लगे तो दहेज के चलते न किसी की बेटी जलेगी और न ही किसी बहू को शर्मिंदा होना पड़ेगा.

शादी के गवाह बने लोगों ने इस के बाद दुलहन आनंद कंवर शेखावत व दूल्हे दीपेंद्र सिंह सहित इन दोनों के पिता उम्मेद सिंह व जीवण सिंह को शाबाशी भी दी कि दोनों परिवारों के इस अनूठे संकल्प से केवल 17 हजार रुपए में शादी हो गई, वरना दोनों परिवारों के लाखों रुपए दिखावे में खर्च हो जाते.

सामाजिक मंचों से भी आ रही जागरूकता अलवर जिले के अकबरपुर गांव में दहेज की फुजूलखर्ची के विरोध में पंचायत की गई. पंचायत में लोगों ने शादियों में बैंडबाजा, आतिशबाजी, महंगी गाड़ी वगैरह पर रोक लगाने का फैसला किया. अगर कोई इस नियम को तोड़ेगा तो उस का हुक्कापानी बंद कर दिया जाएगा.

ओमकार सिंह ने कहा कि दहेज प्रथा खत्म करने और फुजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए गुर्जर समाज में मुहिम चलाई जा रही है. दिखावे के चलते गरीब लोगों को अपनी बेटियों की शादी में दिक्कतें आ रही हैं. कुछ लोग दहेज देने से बचने के लिए बच्चियों की भू्रूण हत्या भी करा रहे हैं.

पंचायत में मौजूद पूर्व जिला पंचायत सदस्य रवींद्र भाटी ने कहा कि गुर्जर समाज में शादियों में दहेज के चलते फुजूलखर्ची बेहिसाब बढ़ गई है. समाज में लोग जमीन कब्जे के बदले मिले मुआवजे को बैंडबाजे, आतिशबाजी, महंगे टैंट, महंगी गाड़ी वगैरह पर लुटा रहे हैं.

पंचायत में फैसला किया गया है कि जो दहेज विरोधी फैसलों को नहीं मानेगा, उस का गुर्जर समाज बहिष्कार करेगा. साथ ही, गांव में दहेज की शादी भी नहीं होने देंगे.

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सोशल मीडिया कुंठित लोगों का खतरनाक नशा

सोशल मीडिया की बात हो और फेसबुक का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. वैसे तो मार्क जुकरबर्ग ने इसे अपनों से जुड़े रहने के लिए, उन का हालचाल लेने के लिए बनाया था, पर जैसे ही यह दुनियाभर में मशहूर हुआ और लोग खासकर भारत के लोग थोक के भाव में इस से जुड़ने लगे तो यह चंदू चाय वाले का वह अड्डा बन गया जहां नकारा, निकम्मे और कुंठित लोगों ने जम कर अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी. अब तो उन की भाषा भी इतनी फूहड़ हो गई है कि वे किसी की भी मांबहन एक करने में पीछे नहीं रहते हैं.

बानगी देखिए : नैशनल लैवल के एक कांग्रेसी नेता ने कहा, ‘भाजपा गाय के लिए पूरे देश को बरबाद कर रही है.’

किसी ने चुटकी ली, ‘भाई, तुम भी तो गधे के लिए पूरे देश को बरबाद करने पर तुले हो.’

इसी तरह किसी नेता ने हालिया सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल पूछा कि वायु सेना ने पेड़ पर बम गिराए या आतंकियों पर? तो किसी ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि बम चाहे जहां भी गिरा हो, पर धुआं तुम्हारे पिछवाड़े से काहे निकल रहा है?

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पाकिस्तान के साथ हुई तनातनी और उस के बाद पाकिस्तान के साथ कारोबार में कटौती करने के गंभीर नतीजों को नजरअंदाज करते हुए किसी मसखरे ने फेसबुक पर पोस्ट डाली, ‘भारत के लड़के फेसबुक पर टमाटर की डीपी लगा कर पाकिस्तानी लड़कियों से सैटिंग कर रहे हैं… सुधर जाओ कमीनो.’

फेसबुक से जुड़ा एक कड़वा सच और भी है कि पूरी दुनिया में इस के सब से ज्यादा ऐक्टिव यूजर्स यानी इस्तेमाल करने वाले लोग भारत में हैं. उन में से बहुत से तो इस में सिर्फ अपने दिमाग में भरा कचरा परोस रहे हैं. उन्हीं कुंठित लोगों से परेशान मार्क जुकरबर्ग के माथे पर अब चिंता की लकीरें साफ दिखाई देती हैं. इस से उन को मिलने वाले इश्तिहारों में भी भारी कमी आई है.

लिहाजा, मार्क जुकरबर्ग फेसबुक में बड़ा बदलाव करने जा रहे हैं. वे लोगों को सार्वजनिक मेलजोल की जगह निजी बातचीत की तरफ मुड़ने के लिए बढ़ावा देंगे. इस से फेसबुक पर आप के पोस्ट, मैसेज वगैरह बहुत ही सीमित लोगों तक पहुंचेंगे.

फेसबुक पर लग रहे निजता हनन और डाटा चोरी के आरोपों के बीच मार्क जुकरबर्ग का कहना है कि इस बदलाव से यूजर की निजता तय होगी. फेसबुक को ‘डिजिटल लिविंग रूम’ बनाने की बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘नए बदलाव के तहत यूजर ऐसे ही लोगों के साथ अपने पोस्ट साझा करेंगे जिन्हें वे अच्छी तरह जानते हैं.’

फेसबुक द्वारा इतना बड़े और कड़े कदम उठाने की एक सामाजिक वजह भी है. वह यह है कि बहुत से लोग फर्जी अकाउंट बना कर दूसरों को ठगने लगे हैं. इन्हें ‘क्लोन अकाउंट’ कहा जाता है, जहां यह नहीं पता चलता है कि सामने वाला असल में कौन है.

उत्तर प्रदेश के बरेली की ही एक मिसाल लेते हैं. वहां साल 2018 में सोशल मीडिया पर खूब जहर उगला गया. किसी की फेसबुक आईडी हैक कर उस में बेहूदा वीडियो क्लिप डाल दी गई तो किसी के साथ गालीगलौज की गई. आम जनता ही नहीं, देश के प्रधानमंत्री तक के खिलाफ ऊलजुलूल बातें की गईं.

हमारे देश में बहुत से लोग तो सैक्स को ले कर कुंठित रहते हैं. अगर वे किसी लड़की को अपना दोस्त नहीं बना पाते हैं तो सोशल मीडिया पर फर्जी अकाउंट बना कर किसी अनजान लड़की की इज्जत की धज्जियां उड़ाने से भी बाज नहीं आते हैं.

उत्तर प्रदेश में बस्ती के लालगंज थाना क्षेत्र की रहने वाली एक लड़की ने फेसबुक पर अपना अकाउंट बना रखा था. उसे फेसबुक पर ही किसी सोनिया नाम की लड़की की फ्रैंड रिक्वैस्ट आई. सोनिया को लड़की समझ कर उसे फ्रैंड बना लिया गया, जबकि किसी लड़के ने सोनिया के नाम से फर्जी अकाउंट बनाया था और फिर फोटोशौप की मदद से उस लड़की के फोटो को अश्लील बना कर वायरल कर दिया.

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इसी तरह ह्वाट्सएप भी सोशल मीडिया का एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां इस को इस्तेमाल करने वालों का बहुत बड़ा जमावड़ा है.

आंकड़ों की मानें तो भारत की सवा अरब आबादी में से तकरीबन 70 करोड़ लोगों के पास फोन हैं. इन में से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन हैं. साढ़े 15 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने ह्वाट्सएप पर अपनी उंगलियों का कमाल दिखाते हैं.

मौजूदा सरकार की धर्मनिरपेक्षता पर उंगली उठाने या ‘भारत में अब डर लगता है’ कहने की हिम्मत करने वालों को बहुत से लोग देश का सब से बड़ा दुश्मन समझते हैं.

हाल ही में इस मुद्दे पर किसी ने ह्वाट्सएप पर मैसेज कर दिया था कि ‘भारत में डर महसूस करने वाले अमेरिका घूम आएं, क्योंकि वहां एयरपोर्ट पर चड्डी उतार कर सारा डर दूर कर दिया जाता है.’

अभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक सांसद और विधायक के बीच हुई लड़ाई को भी महिमामंडित कर दिया गया. किसी ने तो शेर ही लिख डाला, ‘इतना तो मजनू भी नहीं पिटा था लैला के प्यार में, जितना विधायकजी पिट गए अपनी सरकार में.’

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो जैसे चुटकुले की टकसाल ही बना दिया गया है. मामला चाहे किसी से भी जुड़ा हो, उन को बेवजह बीच में घसीट दिया जाता है. अगर कोई उन के हक में कुछ बोल दे तो फिर बवाल सा मच जाता है.

हाल ही में ह्वाट्सएप पर किसी ने पोस्ट डाली थी, ‘दुनिया में 3 काम बहुत मुश्किल हैं…पहला हाथी को गोद में लेना, दूसरा चींटी को नहलाना और तीसरा केजरीवाल के चमचों को समझाना.’

सोशल मीडिया के सब से गलत इस्तेमाल के चलते हमारे रिश्तों में दरार आ रही है. नई पीढ़ी के इश्कबाज एकदूसरे से ज्यादा इस बात पर यकीन करते हैं कि सामने वाला ह्वाट्सएप पर किस के साथ कैसी बातें कर रहा है.

अब चूंकि स्मार्टफोन में तरहतरह के लौक आ गए हैं, पासवर्ड बन गए हैं तो अपनी सीक्रेट बातें अपनों से छिपाना आसान हो गया है.

मैं ने मैट्रो में कई बार देखा है कि स्कूलकालेज के तथाकथित प्रेमी जोड़े एकदूसरे के स्मार्टफोन में उन की दूसरों के साथ की गई चैटिंग खंगालते रहते हैं.

मजे की बात तो यह है कि अगर वे दूर हैं और फोन पर बतिया रहे हैं तो थोड़ा सा शक होते ही एकदूसरे की ह्वाटसएप की चैटिंग के स्क्रीनशौट तक मांग लेते हैं.

बहुत से प्रेमी जोड़े तो मौका मिलते ही सिर्फ मस्ती के लिए सैक्स करते वीडियो तक बना लेते हैं जो उन की लड़ाई या ब्रेकअप के बाद वायरल कर दिए जाते हैं. लड़के ऐसे वीडियो को ब्लैकमेलिंग के लिए भी इस्तेमाल करते हैं.

कई बार तो अपनी किसी सैक्स कुंठा को निकालने के लिए लड़कियां खुद अकेले में कभी नहाते हुए तो कभी कपड़े बदलते हुए वीडियो बना लेती हैं और उन्हें खुद ही वायरल कर देती हैं.

इस तरह का खुद से ही बेहूदा मजाक करने का यह कैसा अजीब दौर है? हम महाशक्ति बनने की राह पर हैं या दुनिया को बताना चाहते हैं कि हम से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं है?

चलो, मान लेते हैं कि राजनीति से जुड़े लोग ऐसी फालतू बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, पर अब तो लोग सोशल मीडिया पर इस तरह का जहर उगलने लगे हैं कि बहुतों की रिश्तेदारी और दोस्ती भी दांव पर लगने लगी है.

इतना ही नहीं, जातिवाद का अजगर भी रोजाना अपना आकार बढ़ा रहा है. किसी सिरफिरे ने पोस्ट कर दिया, ‘गणेश के सिर से भी हाथी को हटाया जाए, इस से बहुजन समाज पार्टी का प्रचार होता है.’

एक बड़े दैनिक अखबार ने सोशल मीडिया पर वायरल होती तसवीरों की पड़ताल की थी कि किस तरह झूठ को सच बनाने की कोशिश की गई थी. उन तसवीरों में यह कह कर प्रचार किया गया था कि इस बार महाशिवरात्रि पर इंदौर में कुछ मुसलिम औरतों ने कांवड़ उठाई थी. उस के बाद तो उन्हें बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया जबकि हकीकत तो यह थी कि वे तसवीरें साल 2015 की थीं और उन का इस बार की महाशिवरात्रि से कोई लेनादेना नहीं था.

ऐसे कुंठित लोगों का कोई ईमान नहीं होता है. वे सोशल मीडिया के ही शेर होते हैं. ऐसे लोग मस्तीमस्ती में कुछ भी ऊटपटांग पोस्ट कर देते हैं जिस का कभीकभार बड़ा भयानक नतीजा भी सामने आता है. लोगों की इन्हीं बेवकूफियों के चलते सरकार सोशल मीडिया को ले कर सख्त हो जाती है.

संवेदनशील मुद्दे पर तो इस के इस्तेमाल पर ही बैन लगा दिया जाता है. जम्मूकश्मीर में सेना और जनता के बीच तनाव और महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन इस के जीतेजागते उदाहरण हैं.

लोगों के इस तरह कुंठित होने की एक सब से बड़ी वजह यह भी है कि अब लोग जानकारी देने वाली किताबों और अच्छी पत्रिकाओं से दूर भागने लगे हैं. जब वे अपनी पढ़ाई की किताबों पर ही ढंग से ध्यान नहीं देते हैं तो फिर अच्छे साहित्य को किस हाथ से छुएंगे?

आज मोबाइल फोन में बसी सोशल मीडिया की यह जो आभासी दुनिया है वह ज्यादातर लोगों के लिए ऐसा नशा बन चुकी है जो उन्हें एड्स की तरह धीरेधीरे खोखला कर रही है.

इस लत से समय रहते पीछा छुड़ा लीजिए वरना किसी दिन (माफ कीजिए, सोशल मीडिया की ही जबान में) आप के पिछवाड़े से धुआं निकलेगा और आप को पता तक नहीं चलेगा.

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सोशल मीडिया पर इन चीजों से बचें

इस मायावी संसार की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस ने हमें विचारों से तानाशाह बना दिया है. अगर सामने वाला अपनी घटिया जबान से आप पर खांसता है तो आप उस पर पूरी उलटी ही कर देते हैं. लेकिन खुद पर लगाम लगाना भी हमारे ही हाथ में है.

याद रखें कि हम सोशल मीडिया पर कोई खबर नहीं, बल्कि जानकारी पढ़ या देख रहे होते हैं जिस का कोई पुख्ता सुबूत हो, यह जरूरी नहीं है इसलिए किसी भी तरह की नैगेटिविटी या नफरत फैलाने वाली बातों से बचें.

किसी ने कोई बात कही तो जरूरी नहीं है कि आप उस का जवाब दें. बहुत से लोग जानबूझ कर उकसाने वाली बात कहते हैं, उन को नजरअंदाज कर दें. धर्म, जातिवाद, देश या समाज की रक्षा का ठेका न लें. इस से कभी आप बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं.

जब तक जानकारी न हो, किसी के मैसेज को फौरवर्ड न करें. किसी के पेज को लाइक न करें. इस से आप या आप के दोस्त ठगी का शिकार हो सकते हैं.

सब से अक्लमंदी की बात यह है कि अपनी भाषा पर काबू रखें. गाली देने से तो एकदम बचें.

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Video: प्यार में पागल आलिया, वरुण को बोल बैठी रणबीर

रणबीर कपूर और आलिया भट्ट के इश्क के चर्चे आए दिन सुनने को मिलते हैं. कई पब्लिक प्लैटफौर्म पर भी दोनों ने खुल कर अपने रिश्ते के बारे में बोला है. पर ऐसा लग रहा है कि आलिया पर रणबीर का कुछ ज्यादा ही खुमार छाया हुआ है. प्यार में आलिया इस कदर डूबी हुई हैं कि वो अपनी सुधबुध सब खो बैठी हैं. शायद यही वजह है कि आलिया सबके सामने वरुण धवन को रणबीर बुला बैठीं.

हाल ही में आलिया अपने फिल्म ‘कलंक’ का प्रमोशन करने एक प्रोग्राम में पहुंची. इस कार्यक्रम में वरुण, सोनाक्षी और आदित्य रौय कपूर भी शामिल थे. इसी बीच एक सवाल जवाब के दौरान आलिया ने वरुण धवन का नाम लेने की जगह रणबीर कपूर का नाम ले बैठी. यह वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें आलिया वरुण को रोक कर कुछ बोलने कोशिश करती दिख रही हैं.

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वीडियो में देखा जा सकता है कि आलिया ने जैसे ही रण….बोला, वरूण ने तुरंत बात संभाल ली और आलिया से कहा कि वो इस बारे में बात न करें. फिर क्या था आलिया के साथ बैठे वरूण, सोनाक्षी और आदित्य ने मिल कर उनकी टांग खिंचाई करनी शुरू कर दी. इस पर आलिया शर्म के मारे लाल हो गई थी.

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बुजुर्गों की सेवा फायदे का सौदा

भारत में 10 करोड़ से भी ज्यादा बुजुर्ग हैं और साल 2050 तक इन की तादाद साढ़े 32 करोड़ हो जाने की उम्मीद है जो कुल आजादी का तकरीबन 20 फीसदी है.

मिनिस्ट्री फौर स्टैटिस्टिक्स ऐंड प्रोग्राम इंप्लीमैंटेशन द्वारा साल 2016 में दी गई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 10 करोड़, 39 लाख बुजुर्ग हैं जिन की उम्र 60 साल से ऊपर है. ये कुल आबादी का तकरीबन 8.5 फीसदी हैं.

एआईएससीसीओएन के 2015-16 के सर्वे के मुताबिक, अपने परिवार के साथ रह रहे 60 फीसदी बुजुर्गों को गालीगलौज व मारपीट तक सहनी पड़ती है, जबकि 39 फीसदी बुजुर्ग अकेले ही रहना पसंद करते हैं.

हैल्पएज इंडिया द्वारा देश के 19 छोटेबड़े शहरों में 4,500 से ज्यादा बुजुर्गों पर किए एक सर्वे के मुताबिक, 44 फीसदी बुजुर्गों का कहना है कि सार्वजनिक जगहों पर उन के साथ बुरा सुलूक होता है, वहीं 53 फीसदी बुजुर्गों का कहना है कि समाज उन के साथ भेदभाव करता है. ढलती उम्र, धीरेधीरे काम करने और ऊंचा सुनने की वजह से लोग उन से रूखा बरताव करते हैं.

सेवा करें मेवा मिलेगा

आमतौर पर इस मतलबी दुनिया में बुजुर्गों के पास अपनों का ही साथ नहीं होता, पर रुपएपैसों के मामले में उन का दबदबा रहता है. ज्यादा कुछ नहीं तो भी अपना मकान तो होता ही है.

ऐजवैल फाउंडेशन द्वारा की गई एक स्टडी के मुताबिक, 65 फीसदी बुजुर्गों के पास कोई आमदनी का जरीया नहीं होता, पर 35 फीसदी बुजुर्गों के पास प्रोपर्टी, पैसा, बचत, इन्वैस्टमैंट्स और पुश्तैनी जायदाद होती है.

कभी अच्छी नौकरी में रहे या अच्छा कारोबार करने वाले ज्यादातर बुजुर्ग अब बड़े घरों में अकेले ही जी रहे हैं. कुछ बुजुर्गों के बच्चे विदेश जा कर बस चुके हैं तो कुछ दूसरे शहरों में पढ़ाई या नौकरी के सिलसिले में रह रहे हैं.

इन बुजुर्गों की जिंदगी अपनों की कमी की खलिश में तप रही होती है. तनहा जिंदगी गुजारे नहीं गुजरती.

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इन बुजुर्गों में से कुछ अपने दूर के रिश्तेदारों को साथ रहने के लिए अपने घर बुला लेते हैं तो कुछ नौकरों के भरोसे ही अपनी बचीखुची जिंदगी गुजारने की कोशिश करते हैं.

यही नहीं, इस बुढ़ापे की उम्र में उन्हें कोई न कोई बीमारी भी जकड़े रहती है, सुनाई कम देने लगता है, नजरें धुंधली हो चुकी होती हैं वगैरह.

ऐसे में कोई शख्स बुढ़ापे की लाठी बन कर अगर इन की जिंदगी में शामिल हो जाता है, इन की खुशियों और गमों को बांटने की कोशिश करता है तो इन बुजुर्गों की बोझिल बूढ़ी आंखों में उस के लिए प्यार उमड़ पड़ता है. धीरेधीरे वह शख्स ऐसे बुजुर्गों के लिए अपनों से बढ़ कर बन जाता है. समय के साथ मुमकिन है कि बुजुर्ग अपना सबकुछ उस बेगाने के नाम लिख कर दुनिया से विदा हो जाएं और वह शख्स थोड़े समय में ही हजारपति से करोड़पति का सफर तय कर ले.

कोई चाहे मैनेजर हो, ड्राइवर हो या घरेलू नौकरानी, यह मुमकिन है कि अगर दिल लगा कर बुजुर्गों की सेवा की जाए तो मेवा खाने को जरूर मिलेगा. बस, सब्र रखना होगा.

यकीन रखिए, यह उस बेगाने के लिए फायदे का सौदा साबित होगा. ज्यादातर मामलों में बुजुर्ग अंतिम समय में काम आने वाले को बहुतकुछ दे देते हैं. उन से दूर रह रहे बच्चे भी काफी उदार हो जाते हैं और पिता या मां का अंतिम दिनों में खयाल रखने वालों का जम कर ध्यान रखते हैं.

इस सिलसिले में एक उदाहरण रांची से सटे एक गांव में रहने वाले रामलाल का लिया जा सकता है.

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रामलाल ने शुरू से ही अपनी जिंदगी में गरीबी देखी थी. वह रतनलाल के यहां माली का काम किया करता था. रतनलाल तीजत्योहार पर उस के बीवीबच्चों को पुराने कपड़े, मिठाइयां वगैरह दे देते थे. रामलाल भी रतनलाल के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करने लगा था.

समय के साथ रतनलाल बूढ़े हो चले. उन के दोनों बेटे शहर जा कर बस गए. घर में पतिपत्नी ही रह गए. पत्नी की तबीयत भी खराब रहने लगी थी. नौकर तो कई थे, पर धीरेधीरे जब उम्र के साथ रतनलाल कमजोर होने लगे और कमाई भी घटती चली गई तो नौकरों ने भी साथ छोड़ दिया.

ऐसे समय में एक रामलाल ही था जिस ने रतनलाल का साथ नहीं छोड़ा.  रामलाल की बीवी भी रतनलाल के घर साफसफाई का काम करने लगी. कुछ समय बाद रतनलाल की पत्नी चल बसीं. अब बस रामलाल व उस की बीवी ही  बुजुर्ग रतनलाल की देखभाल करते रहे.

एक दिन रतनलाल को भी लकवा मार गया. बेटे ने 2 दिन के लिए आ कर अपनी हाजिरी दी और रामलाल पर सब सौंप कर वह शहर चला गया.

रतनलाल पैसों के हिसाबकिताब से ले कर घर चलाने के सभी कामों के लिए रामलाल पर निर्भर थे. रामलाल के सामने हजारों रुपए यों ही पड़े रहते, पर उस ने कभी एक पैसा इधरउधर नहीं किया.

इधर रामलाल का बेटा शहर जा कर पढ़ना चाहता था. रामलाल ने यह बात रतनलाल को बताई थी, पर कभी पैसे मांगे नहीं. समय यों ही बीतता रहा.

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एक दिन रतनलाल ने एक वकील बुलाया और अपना बंगला रामलाल के नाम कर दिया. यह देख रामलाल हैरान रह गया.

रतनलाल ने उसे गले लगाते हुए कहा कि यह उस की मेहनत और ईमानदारी का बदला है. अपने बेटे ने जो नहीं किया, वह एक गैर ने किया. तो फिर बेटे का क्या हक? हक तो उस गैर का ही होगा न. रामलाल की आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे.

यह महज कहानी नहीं, बल्कि एक सचाई है.

कोई शौर्टकट नहीं

सेवा करें पर शौर्टकट में नहीं, बल्कि दिल से, ईमानदारी से करें. खाना बनाना हो, देखभाल करनी हो या बाहर के काम हों, सबकुछ अपना बन कर करें. आप अपने घर वालों के लिए जैसे जीजान लगा देते हैं, एक बार इन अकेले बुजुर्गों के लिए भी वैसा कर के देखें. वे आप की झोली खुशियों से भर देंगे.

प्रेग्नेंसी में गोल्फ खेल रहीं एमी जैक्सन, देखें वीडियो

अभिनेत्री एमी जैक्सन का कोई जवाब नहीं. वह पत्रकारों से दूर भागती रहती हैं, मगर इंस्टाग्राम व ट्वीटर सहित लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर वह लगातार अपने बारे में कुछ न कछ लिखती या फोटो पोस्ट करती रहती हैं. कुछ समय पहले एमी जैक्सन ने कहा था कि वह गर्भवती हैं, तब उन्होंने अपने बेबी बंप की तस्वीर पोस्ट की थी. अब उन्होने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट किया है. इस वीडियो में वह गर्भवती होते हुए भी गोल्फ खेलती नजर आ रही हैं.

amy jackson playing golf during pregnancy

amy jackson playing golf during pregnancy

जी हां, एमी जैक्सन ने जो वीडियो पोस्ट किया है, उसमें वह काले रंग की टू पीस बिकनी के ऊपर सफेद किमोनो पहने गोल्फ खेलती नजर आ रही हैं. वीडियो में उनका बेबी बंप भी नजर आ रहा है.

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गौरतलब है कि एमी जैक्सन ने अभी तक अपने ग्रीस के प्रेमी के साथ शादी नहीं की है. उनका इरादा 2020 में शादी करने का है, पर उससे पहले वह मां बन चुकी होंगी. एमी का दावा है कि वह अपने प्रेमी के साथ बहुत खुश हैं.

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इसके अलावा वो अपने बेबी बंप की फोटोज और वीडियोज पोस्ट करती रहती हैं. हाल ही में उन्होंने एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें वो सी बीच पर हैं और हवाओं से उनका गाउन हल्का सा हटता है और उनका बेबी बंप दिखता है.

 

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… coming soon 📸

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(EDITED BY : SHUBHAM SRIVASTAVA)

गरीबी बनी एजेंडा

राहुल गांधी का नया चुनावी शिगूफा कि यदि वे जीते तो देश के सब से गरीब 20 फीसदी लोगों को 72,000 रुपए साल यानी 6,000 रुपए प्रति माह हर घर को दिए जाएंगे, कहने को तो नारा ही है पर कम से कम यह राम मंदिर से तो ज्यादा अच्छा है. भारतीय जनता पार्टी का राम मंदिर का नारा देश की जनता को, कट्टर हिंदू जनता को भी क्या देता? सिर्फ यही साबित करता न कि मुसलमानों की देश में कोई जगह नहीं है. इस से हिंदू को क्या मिलेगा?

लोगों को अपने घर चलाने के लिए धर्म का झुनझुना नहीं चाहिए चाहे यह सही हो कि पिछले 5,000 सालों में अरबों लोगों को सिर्फ और सिर्फ धर्म की खातिर मौत की नींद सुलाया गया हो. लोगों को तो अपने पेट भरने के लिए पैसे चाहिए.

यह कहना कि सरकार इस तरह का पैसा जमा नहीं कर सकती, अभी तक साबित नहीं हुआ है. 6,000 रुपए महीने की सहायता देना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है. अगर सरकार अपने सरकारी मुलाजिमों पर लाखों करोड़ रुपए खर्च कर सकती है, उस के मुकाबले यह रकम तो कुछ भी नहीं है. यह कहना कि इस तरह का वादा हवाहवाई है तो गलत है, पर सवाल दूसरा है.

सवाल है कि देश की 20 फीसदी जनता को इतनी कम आमदनी पर जीना ही क्यों पड़ रहा है? इस में जितने नेता जिम्मेदार उस से ज्यादा वह जाति प्रथा जिम्मेदार है जिस की वजह से देश की एक बड़ी आबादी को पैदा होते ही समझा दिया जाता है कि उस का तो जन्म ही नाली में कीड़े की तरह से रहने के लिए हुआ है. उन लोगों के पास न घर है, न खेती की जमीन, न हुनर, न पढ़ाई, न सामाजिक रुतबा. वे तो सिर्फ ऊंची जातियों के लिए इतने में काम करने को मजबूर हैं कि जिंदा रह सकें.

देश का ढांचा ही ऐसा है कि इन गरीबों की न आवाज है, न इन के नेता हैं जो इन की बात सुना सकें. उन को समझाने वाला कोई नहीं. गनीमत बस यही है कि 1947 के बाद बने संविधान में इन्हें जानवर नहीं माना गया.

1947 से पहले तो ये जानवर से भी बदतर थे. अमेरिका के गोरे मालिक अपने नीग्रो काले गुलामों की ज्यादा देखभाल करते थे, क्योंकि वे उन के लिए काम करते थे और बीमार हो जाएं या मर जाएं तो मालिक को नुकसान होता था. हमारे ये गरीब तो किसी के नहीं हैं, खेतों के बीच बनी पगडंडी हैं जिस की कोई सफाई नहीं करता. हर कोई इस्तेमाल कर के भूल जाता है.

इन को 72,000 रुपए सालाना दिया जा सकता है. कैसे दिया जाएगा, पैसा कहां से आएगा यह पूछा जाएगा, पर कम से कम इन की बात तो होगी. ऊंची जातियों के लिए यह झकझोरने वाली बात है कि 25 करोड़ लोग ऐसे हैं जो आज इस से भी कम में जी रहे हैं. क्यों, यह सवाल तो उठा है. असली राष्ट्रवाद यही है, मंदिर की रक्षा नहीं.

पति के साथ हौट वर्कआउट करती दिखीं ‘चंद्रमुखी चौटाला’

टीवी पर चंद्रमुखी चौटाला के नाम से मशहूर कविता कौशिक अपने पति रोनित विस्बास के साथ छुट्टियां मना रही हैं. इस दौरान उन्होंने बहुत सी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की. इन तस्वीरों में दोनों वर्कआउट करते करते मस्ती भी कर रहे हैं. आइए देखें तस्वीरें.

 

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Shades of brownies 😍 #chocolateganache and #caramel ❤️

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Tu mera Hero ❤️

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आपको बता दें कि कविता और रोनित ने दो साल पहले ही शादी की थी. इन तस्वीरों में दोनों का एक दूसरे के लिए प्यार साफ देखा जा सकता है.

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एक दूसरे पर है भरोसा

इस तस्वीर को देखिए, ऐसा करने के लिए दोनों का एक दूसरे पर बहुत भरोसा होना जरूरी है. तस्वीरों से साफ जाहिर हो रहा है कि दोनों एक दूसरे को कितना अच्छे से समझते हैं.

 

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My beautiful and rather shocked village audience 😂❤️#inbetweenshots #pamperthelungs #yogaeverywhere #mindotaseeldarni

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अक्सर दोनों समुंद्र के किनारे वर्कआउट करते हुए दिखते हैं. हर हफ्ते कविता सी बीच से अपनी कोई ना कोई तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करती हैं.

मोदी जी की सेना कहने पर सैनिक हुए खफा

चुनावी माहौल के बीच देश में जिस तरह से फर्जी देशभक्ति का रंग भरा गया है उस से भारतीय जनता पार्टी कठघरे में आ गई है. हाल ही में पुलवामा कांड के बाद की गई तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक से देश में जिस तरह से सेना के कामों को भुनाया गया है वह गंभीर चिंता की बात है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो कई कदम आगे निकल गए. गाजियाबाद में की गई एक चुनावी रैली में उन्होंने भारतीय सेना को ‘मोदी जी की सेना’ बता दिया था. तब उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस के लोग आतंकवादियों को बिरयानी खिलाते हैं और ‘मोदीजी की सेना’ उन्हें सिर्फ गोली और गोला देती है. यह अंतर है.’

इस कथन पर बवाल मच गया. विरोधियों की तो छोड़िए खुद भाजपाई और कभी सेना जुड़े रहे जनरल वीके सिंह ने इस कथन पर एतराज किया. उन्होंने कहा कि ‘अगर कोई कहता है कि भारत की सेना ‘मोदी जी की सेना’ है तो वह गलत ही नहीं है देशद्रोही भी है.’

चुनाव आयोग ने भी योगी आदित्यनाथ को चेतावनी देने के अंदाज में कहा कि योगी आदित्यनाथ को सेना से जुड़े संदर्भों का राजनीतिक उद्देश्यों हेतु प्रयोग न करने और भविष्य में सचेत रहने की सलाह दी जाती है.

योगी आदित्यनाथ के इस बयान पर सैनिक भी नाराज दिखे. वे भाजपा द्वारा सेना के नाम पर वोट मांगने को किसी भी नजरिए से सही नहीं ठहरा रहे थे.

इस सिलसिले में सेना के वरिष्ठ लोगों जैसे जनरल एसएफ रोड्रिग्स, जनरल शंकर रॉय चौधरी और जनरल दीपक कपूर ने 11 अप्रैल 2019 को भारत के राष्ट्रपति और सेना के सर्वोच्च कमांडर राम नाथ कोविंद को एक चिट्ठी लिखी जिस में उन्होंने सेना को चुनाव के प्रचार में इस्तेमाल किए जाने पर आपत्ति जताई.

उन्होंने अपनी सेना को शांति के समय या युद्ध के दौर में दी गई सेवाओं का जिक्र किया और सेना के धर्मनिरपेक्ष होने का हवाला देते हुए कहा कि सेना का हर सैनिक, चाहे वह युद्धभूमि में हो या न हो, अपने फर्ज के प्रति ईमानदार होता है और भारत के संविधान को सर्वोच्च मानते हुए बिना किसी पक्षपात के अपने सीनियर के आदेश का पालन करता है. यही वजह है कि भारत के राष्ट्रपति को सेना का अध्यक्ष बनाया गया है.

आप इस बात से परिचित हैं कि सेना में किसी भी पद पर तैनात कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, किसी ऐसे विषय पर भी टिप्पणी नहीं करता है जो उस के हितों के कितना भी विपरीत क्यों न हो या हो सकता है.

लेकिन आज हम सब की दुखती रग पर उंगली रखी गई है तो सेना का अध्यक्ष होने के नाते हम आप को अवगत कराना चाहते हैं कि कुछ नेताओं ने सेना के किए गए कामों जैसे बौर्डर पार स्ट्राइक को सरकार की उपलब्धि बताते हुए भारतीय सेना को ‘मोदीजी की सेना’ बता डाला है. कई नेता और कार्यकर्ता तक सेना की वरदी में लोगों के बीच देखे गए हैं. इस के अलावा सेना को राजीतिक पार्टियों के पोस्टरों में भी इस्तेमाल किया गया है खासकर भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनदंन वर्थमान बहुत सी जगह नजर आए.

हमारे कुछ दूसरे सीनियर रिटायर्ड अफसरों ने भी इस सब के खिलाफ एतराज जताया है जिस की हम सराहना करते हैं. भारतीय जल सेना के एक भूतपूर्व चीफ ने भी इस सिलसिले में चुनाव आयोग को अपने विचार लिखे थे.  बाद में एक अधिसूचना भी जारी की गई थी जिस में सेना को ले कर कही गई ऐसी राजनीतिक टिप्पणियों, जिस में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का बयान भी शामिल था, पर सफाई मांगी गई थी. लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि इतना सब होने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.

अभी चुनावी माहौल है लेकिन कई राजनीतिक दल और नेता आचार संहिता का पालन नहीं कर रहे हैं जिस से हमें यह अंदेशा है कि आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी होती जाएगी.

आप हमारी इस बात से पूरी तरह सहमत होंगे कि भारत के संविधान और देश के राष्ट्रपति के अधीन भारतीय सेना का इस तरह का गलत इस्तेमाल हर वर्दीधारी, चाहे वह पुरुष हो या महिला, की नैतिकता और उस की सेवाओं पर प्रतिकूल असर डालेगा. इस का देश की सुरक्षा और एकता पर भी सीधा असर पड़ सकता है इसलिए हमारा आप से निवेदन है कि आप यह सुनिश्चित करें कि सेना की धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक चरित्र बना रहे.

निवेदन है कि इस के लिए आप वे सब जरूरी कदम उठाएं जिस से सभी राजनीतिक दल अपने एजेंडा को साधने के लिए सेना का किसी भी तरह से इस्तेमाल न करने पाएं.
सेना के इन वरिष्ठ अफसरों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के सामने भी इसी चिट्ठी के माध्यम से अपनी बात रखी है.

लेकिन अगले ही दिन भाजपा के खिलाफ राष्ट्रपति को लिखी गई चिट्ठी पर सेना के पूर्व अफसर बंटे
दिखाई दिए. पूर्व आर्मी चीफ एसएफ रोड्रिग्स ने कहा, ‘मैं नहीं जानता कि यह सब क्या है. मैं अपनी पूरी जिंदगी राजनीति से दूर रहा हूं…’

एसएफ रोड्रिग्स का नाम वायरल हो रही चिट्ठी में पहले नंबर पर है. उन्होंने कहा कि यह फेक न्यूज़ का क्लासिक उदाहरण है. राष्ट्रपति भवन के सूत्रों ने भी ऐसी कोई चिट्ठी मिलने से इनकार किया है. वैसे, पूर्व आर्मी चीफ शंकर रौय चौधरी ने चिट्ठी लिखे जाने की बात स्वीकारी है.

अब चिट्ठी पर मचे बवाल से यह सवाल उठता है कि क्या पूर्व आर्मी चीफ किसी के दबाव में तो ऐसा नहीं बोल रहे हैं? अगर ऐसा है तो यह और भी ज्यादा चिंता की बात है.

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