कपिल के शो में कैटरीना ने लगाएं ठुमके, वायरल हुआ Video…

जल्द ही सलमान खान के साथ फिल्म “भारत” में नजर आने वाली कैटरीना कैफ ने ‘द कपिल शर्मा शो’ में जमकर धमाल मचाया. हाल ही में दोनों फिल्म प्रमोशन के लिए कपिल के शो पर पहुंचे थे जहां कैटरीना जमकर थिरकी. सोशल मीडिया पर उनका वीडियों काफी पसंद किया जा रहा हैं. बता दे की फिल्म के रिलीज में अब बहुत ज्यादा समय नहीं बचा हैं.

 

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एक टक देखते रहे सलमान

कपिल के शो में कैटरीना अपनी फिल्म के गाने पर जम कर थिरकती नजर आईं. गाने पर कैटरीना की दिलकश अदाएं जिसने भी देखी बस देखता ही रह गया. जब कैटरीना ने अपने हुस्न का जलवा बिखेरना शुरु किया तो सलमान खान एक टक लगाए उनको देखते ही रह गए.

कैटरीना ने मचाया धमाल

कैटरीना की परफर्मेंस को देख कर सेट पर मौजूद सभी में एनर्जी आ गई और कैटरीना के साथ जमकर नाचे.

 

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वायरस हुई फोटोज

कैटरीना और सलमान खान की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही हैं. शो पर दोनों की जबरदस्त केमिस्ट्री को फैंस ने काफी पसंद किया. यहां पर सलमान और कैटरीना ने कपिल के सभी अटपटे सवालों का बड़े ही आराम से जवाब दिया.

हंसी से लोट पोट हुए सलमान

सलमान खान कपिल के शो पर कृष्णा और बाकी टीम के साथ खूब ठहाके लगाते नजर आए. इससे पहले भी सलमान कपिल के शो में आ चुके है. उस शो को कपिल के बेस्ट शोज में गिना जाता हैं.

 

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कपिल की मां से मिले सलमान

सलमान ने कपिल की मां से भी मुलाकात की. उन्होंने साथ में फोटो भी क्लीक करवाई.

बता दें की सलमान खान की फिल्म “भारत” 5 जून को ईद के मौके पर रीलिज होगी.

विदाई

पूर्व कथा

टीना और नरेश की शादी की सभी रस्में पूरी हो जाती हैं. विदाई के समय उस की मां केवल उसे अपना ध्यान रखने की सलाह देती है.

एक विवाह समारोह में नरेश की मां खूबसूरत टीना को देखती है और बहू बनाने का फैसला कर लेती है. 6 माह के अंदर नरेश और टीना की शादी हो जाती है.

शादी के बाद भी टीना मांमां की रट लगाए रहती है ससुराल में सभी लोग उसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन टीना बड़ी बेरुखी से उन के साथ पेश आती है और नरेश से मायके जाने की जिद करती है? टीना के घर जा कर नरेश को यह एहसास होता है कि उस के घर में मां का राज है पिता को कोई पूछता भी नहीं.

शादी के कुछ ही हफ्तों में नरेश टीना की असलियत समझ जाता है कि टीना की गृहस्थी के कामों में कोई रुचि नहीं है बल्कि बातबात पर वह उस से लड़ने के बहाने ढूंढ़ती है और नाराज हो कर आत्महत्या की धमकी देने लगती है.

टीना अपनी ससुराल और नरेश से जुड़ी हर बात की खबर अपनी मां को देती है और वह भी टीना को सही सलाह देने के बजाय नरेश पर नजर रखने को कहती है अब आगे…

अंतिम भाग

कहानी द्य डा. के. रानी

गतांक से आगे…

टीना ने महसूस किया कि नरेश कुछ दिनों से खोयाखोया सा रहता है. पत्नी की इच्छा के खिलाफ उस ने कभी मांबाप से मिलने की इच्छा जाहिर नहीं की. उसे यकीन था उस का प्यार और धैर्य एक दिन टीना को बदल देगा. लेकिन एक साल गुजर गया पर टीना के व्यवहार में कोई फर्क न था. अपनी सास से वह नरेश के अनुरोध पर 10-15 दिनों में एकआध मिनट के लिए बात कर लेती. हां, अपनी मम्मी से सुबहशाम नियम से बात करना वह कभी न भूलती.

एक दिन नरेश ने टीना को बताया कि उस के आफिस का माहौल कुछ ठीक नहीं चल रहा है. यही हाल रहा तो एक दिन वापस घर जाना पडे़गा. यह सुन कर टीना अंदर ही अंदर कांप गई कि कैसे रहेगी वह सासससुर, ननददेवर के बीच. सुबह- शाम खाना बनाना और घर की देखभाल करना उस के बूते की बात न थी. अब भी वह कई बार 9 बजे सो कर उठती. नरेश कभी विरोध न करता. चुपचाप चाय पी कर आफिस चला जाता है. नरेश की कही बात टीना ने तुरंत अपनी मम्मी को बताई.

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‘‘यह तो बड़ी बुरी खबर है टीना.’’

‘‘मम्मी, मैं तो नरेश के साथ दिल्ली आ जाऊंगी.’’

‘‘नरेश न माना तो…’’

‘‘इस के लिए आप कोई उपाय करो न मम्मी.’’

‘‘अच्छा, सोच कर बताती हूं,’’ कह कर नीता ने फोन रख दिया.

शाम को नरेश के आने से पहले  नीता ने टीना को फोन किया, ‘‘टीना, तुम्हारी बातों ने मुझे बड़ा विचलित किया है. ससुराल में कैसे रहोगी जीवन भर. मैं एक तांत्रिक को जानती हूं. उस के पास हर समस्या का उपाय है. वह हमारी समस्या चुटकियों में हल कर देंगे.’’

‘‘यह ठीक है मम्मी, कल सुबह बात करूंगी,’’ कह कर टीना आश्वस्त हो गई.

अगले दिन दोपहर को टीना के पास उस की मां का फोन आया,  ‘‘बेटी, घबराने की बात नहीं है. बाबा ने यकीन दिलाया है कि सब ठीक हो जाएगा. उन्होंने नरेश को पहनने के लिए एक अंगूठी दी है. मैं ने कूरियर से उसे तुम्हारे पास भेज दिया है. तुम उसे नरेश को जरूर पहना देना.’’

2 दिन में अंगूठी टीना के पास पहुंच गई. अगूंठी सोने की थी. टीना ने वह बड़े प्यार से नरेश की उंगली में पहना दी. नरेश ने प्रश्नवाचक दृष्टि से टीना को देखा.

‘‘मम्मी ने भेजी है तुम्हारे लिए.’’

‘‘मेरे पास तो अंगूठियां हैं.’’

‘‘यह स्पेशल है. बडे़ सिद्ध बाबा ने दी है. इस से तुम्हारे दफ्तर के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर नरेश ने बड़ी श्रद्धा से अंगूठी को आंखों से छुआ लिया. टीना आश्वस्त हो गई.

नरेश के साथ हुई पूरी बात टीना ने मम्मी को बताई. नीता बहुत खुश थी कि बाबा की अंगूठी वास्तव में चमत्कारी थी. वह बोली, ‘‘बेटी, तांत्रिक बाबा ने एक छोटा सा अनुष्ठान करवाने के लिए कहा है. तुम्हें 15 दिन के लिए मायके आना होगा. मैं ने सारा प्रबंध कर लिया है. तुम इस बारे में नरेश से बात करना. इस से उस का काम फिर से चल पड़ेगा.’’

शाम को टीना ने नरेश को मम्मी से हुई पूरी बात बता दी और उस से मायके जाने की अनुमति ले ली. नरेश स्वयं उसे दिल्ली छोड़ कर मुंबई आ गया.

नीता का हर पत्ता सही पड़ रहा था. मांबेटी नियम से बाबा के पास जातीं और घंटों अनुष्ठान में लगी रहतीं. इन 12-13 दिनों में बाबा ने अनुष्ठान के नाम पर हजारों रुपए ठग लिए. आखिर वह दिन आ पहुंचा जिस का मांबेटी को इंतजार था.

तांत्रिक बोला, ‘‘बेटी को अनुष्ठान का पूरा लाभ चाहिए तो अंतिम आहुति उसी व्यक्ति से डलवानी होगी जिस के लिए यह अनुष्ठान किया जा रहा है. आप अपने दामाद को तुरंत बुला लीजिए. ध्यान रहे, इस अनुष्ठान की खबर किसी को नहीं होनी चाहिए.’’

नीता और टीना ने एकदूसरे को देखा और घर की ओर चल पड़ीं. टीना ने खामोशी तोड़ी, ‘‘मम्मी, अब क्या होगा?’’

‘‘होना क्या है, अनुष्ठान के कारण नरेश का मन पहले ही काफी बदल गया है. तुम ने देखा है, वह तुम्हारी किसी बात का विरोध नहीं करता. मुझे यकीन है, वह तुम्हारी यह बात तुरंत मान लेगा. तुम फोन करो तो सही.’’

बाबा का ध्यान कर के टीना ने नरेश को फोन मिलाया.

‘‘कैसी हो टीना, कब आ रही हो?’’

‘‘जब तुम लेने आ जाओ.’’

‘‘तब ठीक है, आज ही चल देता हूं तुम से मिलने.’’

‘‘आज नहीं 2 दिन बाद.’’

‘‘कोई खास बात है क्या?’’

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‘‘यही समझ लो. मैं जिस काम के लिए मायके आई थी वह 2 दिन बाद खत्म हो जाएगा और उस में तुम्हारा आना जरूरी है. आओेगे न?’’

‘‘जैसी तुम्हारी आज्ञा, हम तो हुजूर के गुलाम हैं.’’

‘‘पर एक शर्त है कि यह बात तुम्हारे और मेरे सिवा किसी को मालूम नहीं चलनी चाहिए वरना अनुष्ठान का प्रभाव खत्म हो जाएगा.’’

‘‘मेरे तुम्हारे अलावा मम्मीजी भी तो यह बात जानती हैं.’’

‘‘मम्मी हम दोनोें से अलग थोड़े ही हैं. सच पूछो तो हमारी भलाई उन के अलावा कोई सोच ही नहीं सकता.’’

‘‘इस अनुष्ठान से तुम्हें यकीन है कि हम सुखी हो जाएंगे?’’

‘‘100 प्रतिशत. मम्मी ने हमारी खुशी के लिए क्या कुछ नहीं किया? दिनरात एक कर के ऐसे सिद्ध बाबा से अनुष्ठान करवाया है. तुम आ रहे हो न.’’

‘‘टीना, मैं ठीक समय पर घर पहुंच जाऊंगा.’’

‘‘अरे, बाबा घर नहीं, तुम्हारे लिए मम्मी होटल में कमरा बुक करा देंगी.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘बहुत भोले हो तुम. घर पर पापा भी तो हैं. उन्हें तुम्हारे आने से सबकुछ पता चला जाएगा जबकि यह बात सब से छिपा कर रखनी है.’’

‘‘ओह, आई एम सौरी,’’ कह कर नरेश ने फोन रख दिया.

टीना ने जैसे समझाया था उसी तरह अंतिम आहुति देने के लिए नरेश दिल्ली पहुंच गया. टीना उस के स्वागत में एअरपोर्ट पर खड़ी थी. वह नरेश को ले कर सीधा होटल आ गई और नरेश से लिपट कर बोली, ‘‘ये 15 दिन मुझे कितने लंबे महसूस हुए जानते हो?’’

‘‘तुम्हें ही क्यों मुझे भी तो ऐसा ही एहसास हुआ पर मजबूरी थी. तुम्हारी खुशी जो इसी में थी.’’

‘‘मेरी नहीं हमारी. आज के बाद हमारी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी.’’

‘‘चलो, कहां चलना है?’’

‘‘बाबा के शिविर में.’’

‘‘यह बाबा का शिविर कहां पर है?’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ चल रही हूं. तुम्हें खुद ब खुद पता चल जाएगा.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर नरेश चलने को तैयार हुआ. दरवाजे पर आ कर वह टीना से बोला, ‘‘डार्लिंग, मैं अपना पर्स तो अंदर ही भूल गया. तुम नीचे चलो मैं उसे लेकर आता हूं.’’

टीना होटल के मुख्य गेट पर आ गई. पापा की गाड़ी उस के पास थी. नरेश आ कर गाड़ी में बैठ गया. उधर नीता बाबा की विदाई की तैयारी में व्यस्त थी. अंतिम आहुति के साथ उसे बाबा को वस्त्र, धन और फलफूल देने थे. नीता ने कपड़े तो पहले ही खरीद लिए थे. ताजे फल खरीदने के लिए वह फल की दुकान पर खड़ी थी. टीना ने गाड़ी एक किनारे पार्क की और मम्मी की ओर बढ़ गई. फल खरीद कर टीना व नीता ज्यों ही दुकान से बाहर निकले सामने पापा के साथ नरेश के मम्मीपापा को देख कर वे दंग रह गईं.

नीता को काटो तो खून नहीं. वह अचकचा कर बोली, ‘‘आप यहां?’’

‘‘हम लोगों का यहां आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

‘‘नहींनहीं ऐसी बात नहीं है. असल में एक जरूरी काम से हमें जाना है. आप घर चलिए.’’

‘‘टीना, मेरी मम्मी को जरूरी काम नहीं बताओगी?’’

टीना चुप रही तो नरेश ही बोला, ‘‘मैं बताता हूं पूरी बात. मम्मीजी, बेटी के मोह में अंधी हो कर क्या कर रही हैं यह इन को खुद नहीं पता.’’

‘‘नरेश…’’ टीना चीखी.

‘‘मर गया तुम्हारा नरेश. तुम लोगों की पोल यहीं खोल दूं या तुम्हारे घर जा कर सबकुछ बताऊं?’’

‘‘यह क्या कह रहे हो नरेश तुम. क्या हुआ बेटा?’’ टीना के पापा ने पूछा.

‘‘यह आप अपनी पत्नी और बेटी से पूछिए भाई साहब, जो रातदिन मेरे घर को बरबाद करने की साजिश रचते रहे,’’ सुधा बोली.

‘‘बहनजी, मेरी इज्जत का कुछ तो लिहाज कीजिए. घर चल कर बात करते हैं,’’ टीना के पापा हाथ जोड़ कर बोले.

सुधा एक नेक इनसान की बात न टाल सकी.

घर आ कर उन्होंने पूछा, ‘‘माजरा क्या है नीता?’’

‘‘ये क्या बताएंगी मैं आप को बताती हूं,’’ सुधा बोली.

‘‘शादी के दिन से ही आप की बेटी ससुराल में नहीं रहना चाहती थी. वह अपनी हर इच्छा नरेश पर लादती रहती और उस के मना करने पर आत्महत्या की धमकी देती. बेचारा नरेश क्या करता, चुपचाप सबकुछ सहन करता. यह हर बात अपनी मम्मी को बताती और आप की पत्नी अपनी बेटी टीना को उल्टी शिक्षा देतीं. ताकि बेटी को ससुराल में रह कर कुछ न करना पड़े.’’

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‘‘यह सच नहीं है,’’ नीता बोली.

‘‘तो आप ही बात दीजिए सच क्या है?’’ नरेश तीखे स्वर में बोला.

‘‘मेरे बेटे को वश में करने के लिए ये मांबेटी किसी बाबा से अनुष्ठान करवा रही हैं. विश्वास न हो तो खुद चल कर देख लीजिए. हम स्वयं उस बाबा से मिल कर आ रहे हैं, सुधा बोली.’’

‘‘क्या यह सच है?’’ पापा ने पूछा.

‘‘यह क्या जवाब देंगी. इस ने तो एक पल को भी अपनी ससुराल को अपना घर नहीं समझा. इस में इस का भी क्या दोष? इसे अपनी मां से शिक्षा ही ऐसी मिली थी. अब अपनी बेटी को आप अपने ही पास रखिए. इस से न इसे तकलीफ होगी न इस की मम्मी को. मेरे बेटे को भी इन की ज्यादतियों से मुक्ति मिल जाएगी. इस एक साल में हमारे बेटे ने क्या कुछ न सहा… क्या सुख मिला इसे शादी का. ससुराल के नाम से ही चिढ़ है टीना को, बेचारा छिपा कर सब बातें अपनी मां को बताता रहा. मेरे समझाने पर उस ने टीना की, हर नाजायज बात स्वीकार कर ली. मुझे उम्मीद थी कि टीना को एक दिन अपनी गलती का एहसास जरूर होगा पर वह दिन देखना शायद हम लोगों की किस्मत में नहीं था.हम जा रहे हैं. आप अपनी बेटी को अपने पास रखिए. अगर हम इस की हरकतों से तंग आ कर इसे वापस मायके भेजते तो किसी को हमारी बात का यकीन न होता. सब हमें ही दोषी ठहराते. आज सबकुछ आप अपनी आंखों से देख सकते हैं,’’ नरेश के पापा बोले.

सुधा, पति व बेटे के साथ जाने लगी तो टीना के पापा ने उन के पैर पकड़ लिए.

‘‘भाई साहब, इस में आप का कोई दोष नहीं है. नीता ने आप को घर का मुखिया समझा ही कब? पहले ये खुद मनमानी करती रहीं अब वही सब बेटी के साथ दोहरा रही हैं.’’

‘‘मेरी बेटी की गलती को माफ कर दीजिए,’’ टीना के पापा बोले.

नरेश उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘पापाजी, ससुराल में टीना को रहना है. इस में आप और हम क्या कर सकते हैं. मम्मी की शह पर टीना ने कभी आप को पिता होने का ओहदा न दिया. जो लड़की पिता को कुछ न समझे वह ससुर को क्या समझेगी? अभी हम जा रहे हैं. बाकी निर्णय तो टीना को लेना है.’’

नरेश अपने मम्मीपापा के साथ वापस लखनऊ चला आया.

ससुराल वालों से जलील हो कर टीना बड़ी आहत थी. नीता की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? नरेश अपने मम्मीपापा के साथ मिल कर ऐसा खेल खेलेगा इस की टीना व नीता को रत्ती भर भी उम्मीद न थी.

अपने घर में अपने ही कर्मों से नीता बुरी तरह लज्जित हो गई. पति के सामने उस की हरकतों का कच्चा चिट्ठा दामाद ने खोल दिया. उन के जाते ही प्रकाश बोले, ‘‘तुम मांबेटी की हरकतों ने आज मेरी इज्जत सरेआम उछाल दी. जो कोई भी सुनेगा, थूकेगा तुम दोनों पर. कितनी ओछी हरकत की है तुम दोनों ने.’’

आज पहली बार प्रकाश की बातों का नीता ने पलट कर जवाब नहीं दिया. दामाद को अपनी ओर करने के चक्कर में वह खुद एकदम अकेली पड़ गई.

नीता को गुमसुम देख कर टीना बोली, ‘‘मम्मी, जो होना था सो हो गया. शायद मेरे भाग्य में यही लिखा था. अब मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘तुम्हारे ससुराल के रास्ते मैं ने ही अपने हाथों बंद किए हैं बेटी, उन्हें खोलना मेरा ही फर्ज है,’’ कह कर नीता ने अपनी ननद को फोन मिलाया और सारी बातें ज्यों की त्यों उन्हें बात दीं.

रमा ने भाभी की कही बातें सुनीं तो उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने ही टीना का रिश्ता अपनी ससुराल के दूर के रिश्ते में तय करवाया था.

‘‘भाभी, तुम चिंता मत करो. मैं सुधा व नरेश से बात करूंगी,’’ रमा बोली.

‘‘रमा, मुझे माफ कर दो. यह बात लोग सुनेंगे तो कहेंगे कि दामाद ने मेरी नासमझी को मेरे ही घर में सुबूत सहित सब को दिखा दिया. मेरे लिए तो चुल्लू भर पानी में डूब मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.’’

‘‘भाभी, हिम्मत रखो. जिंदगी के रास्ते एकदम सीधे नहीं, टेढे़मेढ़े होते हैं. एक रुकावट आने से मंजिल नहीं छूटती, रास्ते का फेर बढ़ जाता है. टीना को तुम ने लापरवाह बनाया है तो सुधारना भी तुम्हें ही होगा.’’

‘‘मैं सबकुछ करने को तैयार हूं. बस, टीना को इस बदनामी से बचा लो.’’

‘‘एक अच्छी पत्नी का अच्छी बहू होना जरूरी है. पति के दिल में उतरने का सब से सरल रास्ता उस के मातापिता की सेवा से बनता है. तुम उसे इस बार नरेश के पास नहीं सुधा के पास लखनऊ ले कर चलो. मैं भी वहीं पहुंच रही हूं.’’

नीता के पहुंचने से पहले रमा सुधा के पास पहुंच चुकी थी.

‘‘सुधा, टीना मक्कार नहीं भटकी हुई है. उसे रास्ता दिखाना तुम्हारा फर्ज बनता है. नीता के लाड़प्यार ने आज उसे इस स्थिति पर ला दिया है. यह दो जिंदगियों का सवाल है.’’

रमा के समझाने का सुधा पर अच्छा प्रभाव पड़ा. वह रमा का आग्रह न टाल सकी.

‘‘बहनजी, मैं वादा करती हूं कि आप के परिवार के बीच कभी कोई अड़चन नहीं डालूंगी,’’ नीता सिर झुका कर बोली, ‘‘यहां तक कि टीना से बात तक नहीं करूंगी. इसे जो कहना होगा अपने पापा से कहेगी, मुझ से नहीं. मैं टीना को आप की छत्रछाया में छोड़ कर जा रही हूं. हो सके तो इसे भी कुछ अच्छे संस्कार सिखा दीजिएगा.’’

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‘‘यह टीना के जीवन का प्रश्न है और उसे पति व उस के परिवार के साथ खुद को एडजस्ट करना है. हम उस पर कोई बोझ नहीं डालना चाहते,’’ सुधा बोली.

‘‘मम्मीजी, मुझे आप की हर शर्त मंजूर है. प्लीज, मुझे यहीं रहने दीजिए,’’ टीना बोली.

‘‘यह घर तुम्हारा ही था बेटी पर तुम ने इसे कभी अपना नहीं समझा. केवल पति तक सीमित हो कर रह गई थीं तुम्हारी भावनाएं. और भावनाएं शर्तों पर नहीं जगाई जा सकतीं.’’

‘‘भूल मुझ से हुई तो प्रायश्चित्त भी मैं ही करूंगी. 6 महीने आप के साथ रह कर अपने को एक अच्छी बहू साबित कर के दिखा दूंगी, मुझे एक मौका दीजिए.’’

सुधा ने नीता और टीना को माफ कर दिया. भारी मन से नीता ने टीना से विदा ली. चलते समय वह बेटी को नसीहत दे रही थी, ‘‘टीना, अपने व्यवहार से सब को खुश रखना. सासससुर की सेवा करना,’’ आगे वह कुछ न कह सकी. सही माने में सच्ची विदाई तो टीना की आज ही हुई थी, मां के आशीर्वाद के साथ.     द

कायाकल्प

लेखक- रिचा शर्मा

खिड़की से बाहर झांक रही सुमित्रा ने एक अनजान युवक को गेट के सामने मोटरसाइकिल रोकते देखा.

‘‘रवि, तू यहां क्या कर रहा है?’’ सामने के फ्लैट की बालकनी में खड़े अजय ने ऊंची आवाज में मोटर- साइकिल सवार से प्रश्न किया.

‘‘यार, एक बुरी खबर देने आया हूं.’’

‘‘क्या हुआ है?’’

‘‘शर्मा सर का ट्रक से एक्सीडेंट हुआ जिस में वह मर गए.’’

खिड़की में खड़ी सुमित्रा अपने पति राजेंद्र के बाजार से घर लौटने का ही इंतजार कर रही थीं. रवि के मुंह से यह सब सुन कर उन के दिमाग को जबरदस्त झटका लगा. विधवा हो जाने के एहसास से उन की चेतना को लकवा मार गया और वह धड़ाम से फर्श पर गिरीं और बेहोश हो गईं.

छोटे बेटे समीर और बेटी रितु के प्रयासों से कुछ देर बाद जब सुमित्रा को होश आया तो उन दोनों की आंखों से बहते आंसुओं को देख कर उन के मन की पीड़ा लौट आई और वह अपनी बेटी से लिपट कर जोर से रोने लगीं.

उसी समय राजेंद्रजी ने कमरे में प्रवेश किया. पति को सहीसलामत देख कर सुमित्रा ने मन ही मन तीव्र खुशी व हैरानी के मिलेजुले भाव महसूस किए. फिर पति को सवालिया नजरों से देखने लगीं.

‘‘सुमित्रा, हम लुट गए. कंगाल हो गए. आज संजीव…’’ और इतना कह पत्नी के कंधे पर हाथ रख वह किसी छोटे बच्चे की तरह बिलखने लगे थे.

सुमित्रा की समझ में आ गया कि रवि उन के बड़े बेटे संजीव की दुर्घटना में असामयिक मौत की खबर लाया था. इस नए सदमे ने उन्हें गूंगा बना दिया. वह न रोईं और न ही कुछ बोल पाईं. इस मानसिक आघात ने उन के सोचनेसमझने की शक्ति पूरी तरह से छीन ली थी.

करीब 15 दिन पहले ही संजीव अपनी पत्नी रीना और 3 साल की बेटी पल्लवी के साथ अलग किराए के मकान में रहने चला गया था.

पड़ोसी कपूर साहब, रीना व पल्लवी को अपनी कार से ले आए. कुछ दूसरे पड़ोसी, राजेंद्रजी और समीर के साथ उस अस्पताल में गए जहां संजीव की मौत हुई थी.

अपनी बहू रीना से गले लग कर रोते हुए सुमित्रा बारबार एक ही बात कह रही थीं, ‘‘मैं तुम दोनों को घर से जाने को मजबूर न करती तो आज मेरे संजीव के साथ यह हादसा न होता.’’

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इस अपराधबोध ने सुमित्रा को तेरहवीं तक गहरी उदासी का शिकार बनाए रखा. इस कारण वह सांत्वना देने आ रहे लोगों से न ठीक से बोल पातीं, न ही अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों का उन्हें कोई ध्यान आता.

ज्यादातर वह अपनी विधवा बहू का मुर्झाया चेहरा निहारते हुए मौन आंसू बहाने लगतीं. कभीकभी पल्लवी को छाती से लगा कर खूब प्यार करतीं, पर आंसू तब भी उन की पलकों को भिगोए रखते.

तेरहवीं के अगले दिन वर्षों की बीमार नजर आ रही सुमित्रा क्रियाशील हो उठीं. सब से पहले समीर और उस के दोस्तों की मदद से टैंपू में भर कर संजीव का सारा सामान किराए के मकान से वापस मंगवा लिया.

उसी दिन शाम को सुमित्रा के निमंत्रण पर रीना के मातापिता और भैयाभाभी उन के घर आए.

सुमित्रा ने सब को संबोधित कर गंभीर लहजे में कहा, ‘‘पहले मेरी और रीना की बनती नहीं थी पर अब आप सब लोग निश्ंिचत रहें. हमारे बीच किसी भी तरह का टकराव अब आप लोगों को देखनेसुनने में नहीं आएगा.’’

‘‘आंटी, मेरी छोटी बहन पर दुख का भारी पहाड़ टूटा है. अपनी बहन और भांजी की कैसी भी सहायता करने से मैं कभी पीछे नहीं हटूंगा,’’ रीना के भाई रोहित ने भावुक हो कर अपने दिल की इच्छा जाहिर की.

‘‘आप सब को बुरा न लगे तो रीना और पल्लवी हमारे साथ भी आ कर रह सकती हैं,’’ रीना के पिता कौशिक साहब ने हिचकते हुए अपना प्रस्ताव रखा.

सुमित्रा उन की बातें खामोश हो कर सुनती रहीं. वह रीना के मायके वालों की आंखों में छाए चिंता के भावों को आसानी से पढ़ सकती थीं.

रीना के साथ पिछले 6 महीनों में सुमित्रा के संबंध बहुत ज्यादा बिगड़ गए थे. समीर की शादी करीब 3 महीने बाद होने वाली थी. नई बहू के आने की बात को देखते हुए सुमित्रा ने रीना को और ज्यादा दबा कर रखने के प्रयास तेज कर दिए थे.

‘इस घर में रहना है तो जो मैं चाहती हूं वही करना होगा, नहीं तो अलग हो जाओ,’ रोजरोज की उन की ऐसी धमकियों से तंग आ कर संजीव और रीना ने अलग मकान लिया था.

उन की बेटी सास के हाथों अब तो और भी दुख पाएगी, रीना के मातापिता के मन के इस डर को सुमित्रा भली प्रकार समझ रही थीं.

उन के इस डर को दूर करने के लिए ही सुमित्रा ने अपनी खामोशी को तोड़ते हुए भावुक लहजे में कहा, ‘‘मेरा बेटा हमें छोड़ कर चला गया है, तो अब अपनी बहू को मैं बेटी बना कर रखूंगी. मैं ने मन ही मन कुछ फैसला लिया है जिन्हें पहली बार मैं आप सभी के सामने उजागर करूंगी.’’

आंखों से बह आए आंसुओं को पोंछती हुई सुमित्रा सब की आंखों का केंद्र बन गईं. राजेंद्रजी, समीर और रितु के हावभाव से यह साफ पता लग रहा था कि जो सुमित्रा कहने जा रही थीं, उस का अंदाजा उन्हें भी न था.

‘‘समीर की शादी होने से पहले ही रीना के लिए हम छत पर 2 कमरों का सेट तैयार करवाएंगे ताकि वह देवरानी के आने से पहले या बाद में जब चाहे अपनी रसोई अलग कर ले. इस के लिए रीना आजाद रहेगी.

‘‘अतीत में मैं ने रीना के नौकरी करने का सदा विरोध किया, पर अब मैं चाहती हूं कि वह आत्मनिर्भर बने. मेरी दिली इच्छा है कि वह बी.एड. का फार्म भरे और अपनी काबिलीयत बढ़ाए.

‘‘आप सब के सामने मैं रीना से कहती हूं कि अब से वह मुझे अपनी मां समझे. जीवन की कठिन राहों पर मजबूत कदमों से आगे बढ़ने के लिए उसे मेरा सहयोग, सहारा और आशीर्वाद सदा उपलब्ध रहेगा.’’

सुमित्रा के स्वभाव में आया बदलाव सब को हैरान कर गया. उन के मुंह से निकले शब्दों में छिपी भावुकता व ईमानदारी सभी के दिलों को छू कर उन की पलकें नम कर गईं. एक तेजतर्रार, झगड़ालू व घमंडी स्त्री का इस कदर कायाकल्प हो जाना सभी को अविश्वसनीय लग रहा था.

रीना अचानक अपनी जगह से उठी और सुमित्रा के पास आ बैठी. सास ने बांहें फैलाईं और बहू उन की छाती से लग कर सुबकने लगी.

कमरे का माहौल बड़ा भावुक और संजीदा हो गया. रीना के मातापिता व भैयाभाभी के पास अब रीना व पल्लवी के हितों पर चर्चा करने के लिए कोई कारण नहीं बचा.

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क्या सुमित्रा का सचमुच कायाकल्प हुआ है? इस सवाल को अपने दिलों में समेटे सभी लोग कुछ देर बाद विदा ले कर अपनेअपने घर चले गए.

अब सिर्फ अपने परिवारजनों की मौजूदगी में सुमित्रा ने अपने मनोभावों को शब्द देना जारी रखा, ‘‘समीर और रितु, तुम दोनों अपनी भाभी को इस पल से पूरा मानसम्मान दोगे. रीना के साथ तुम ने गलत व्यवहार किया तो उसे मैं अपना अपमान समझूंगी.’’

‘‘मम्मी, आप को मुझ से कोई शिकायत नहीं होगी,’’ रितु उठ कर रीना की बगल में आ बैठी और बड़े प्यार से भाभी का हाथ अपने हाथों में ले लिया.

‘‘मेरा दिमाग खराब नहीं है जो मैं किसी से बिना बात उलझूंगा,’’ समीर अचानक भड़क उठा.

‘‘बेटे, अगर तुम्हारा रवैया नहीं बदला तो रीना को साथ ले कर एक दिन मैं इस घर को छोड़ जाऊंगी.’’

सुमित्रा की इस धमकी का ऐसा प्रभाव हुआ कि समीर चुपचाप अपनी जगह सिर झुका कर बैठ गया.

‘‘सुमित्रा, तुम सब तरह की चिंताएं अपने मन से निकाल दो. रीना और पल्लवी के भविष्य को सुखद बनाने के लिए हम सब मिल कर सहयोग करेंगे,’’ राजेंद्रजी से ऐसा आश्वासन पा कर सुमित्रा धन्यवाद भाव से मुसकरा उठी थीं.

कमरे से जब सब चले गए तब सुमित्रा ने रीना से साफसाफ पूछा, ‘‘बहू, तुम्हें मेरे मुंह से निकली बातों पर क्या विश्वास नहीं हो रहा है?’’

‘‘आप ऐसा क्यों सोच रही हैं, मम्मी. आप लोगों के अलावा अब मेरा असली सहारा कौन बनेगा?’’ रीना का गला भर आया.

‘‘मैं तुम्हें कभी तंग नहीं करूंगी, बहू. बस, तुम यह घर छोड़ कर जाने का विचार अपने मन में कभी मत लाना, नहीं तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘नहीं, मम्मी. मैं आप के पास रहूंगी और आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देख, पल्लवी के नाम से मैं ने 1 लाख रुपए फिक्स्ड डिपोजिट करने का फैसला कर लिया है. आने वाले समय में यह रकम बढ़ कर उस की पढ़ाई और शादी के काम आएगी.’’

‘‘जी,’’ रीना की आंखों में खुशी की चमक उभरी.

‘‘सुनो बहू, एक बात और कहती हूं मैं,’’ सुमित्रा की आंखों में फिर से आंसू चमके और गला रुंधने सा लगा, ‘‘करीब 4 साल पहले तुम ने इस घर में दुलहन बन कर कदम रखा था और मैं वादा करती हूं कि उचित समय और उचित लड़का मिलने पर तुम्हें डोली में बिठा कर यहां से विदा भी कर दूंगी. जरूरत पड़ी तो पल्लवी अपने दादादादी के पास रहेगी और तुम अपनी नई घरगृहस्थी…’’

‘‘बस, मम्मीजी, और कुछ मत कहिए आप,’’ रीना ने उन के मुंह पर अपना हाथ रख दिया, ‘‘मुझे विश्वास हो गया है कि पल्लवी और मैं आप दोनों की छत्रछाया में यहां बिलकुल सुरक्षित हैं. मुझ में दूसरी शादी करने में जरा भी दिलचस्पी कभी पैदा नहीं होगी.’’

रीना अपने सासससुर के लिए जब चाय बनाने चली गई तो राजेंद्रजी ने सुमित्रा का माथा चूम कर उन की प्रशंसा की, ‘‘सुमि, आज जो मैं ने देखासुना है उस पर मुझे आश्चर्य हो रहा है, साथ ही गर्व भी कर रहा हूं. एक बात पूछूं?’’

‘‘पूछिए,’’ सुमित्रा ने पति के कंधे पर सिर टिकाते हुए कहा और आंखें मूंद लीं.

‘‘तुम्हारी सोच, तुम्हारा नजरिया… तुम्हारे दिल के भाव अचानक इस तरह कैसे बदल गए हैं?’’

‘‘आप मुझ में आए बदलाव का क्या कारण समझते हैं?’’ आंखें बंद किएकिए ही सुमित्रा बोलीं.

‘‘मुझे लगता है संजीव की असमय हुई मौत ने तुम्हें बदला है, पर फिर वैसा ही बदलाव मेरे अंदर क्यों नहीं आया?’’

‘‘संजीव इस दुनिया में नहीं रहा, ये जानने से पहले मुझे एक और जबरदस्त सदमा लगा था. क्या आप को उस की याद है?’’

‘‘हां, जो लड़का बुरी खबर लाया था वह संजीव का जूनियर था और तुम समझीं कि वह कोई मेरा छात्र है और मेरी न रहने की खबर लाया है.’’

‘‘दरअसल, गलत अंदाजा लगा कर मैं बेहोश हो गई थी. फिर मुझे धीरेधीरे होश आया तो मेरे मन ने काम करना शुरू किया.

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‘‘सब से पहले असहाय और असुरक्षित हो जाने के भय ने मेरे दिलोदिमाग को जकड़ा था. मन में गहरी पीड़ा होने के बावजूद अपनी जिस जिम्मेदारी का मुझे ध्यान आया वह रितु की शादी का था.

‘‘कैसे पूरी करूंगी मैं यह जिम्मेदारी? मन में यह सवाल कौंधा तो जवाब में सब से पहले संजीव और रीना की शक्लें उभरी थीं. उन से मेरा लाख झगड़ा होता रहा हो पर मुसीबत के समय मन को उन्हीं दोनों की याद पहले आई थी,’’ अपने मन की बातों को सुमित्रा बड़े धीरेधीरे बोलते हुए पति के साथ बांट रही थीं.

राजेंद्रजी खामोश रह कर सुमित्रा के आगे बोलने का इंतजार करने लगे.

सुमित्रा ने पति की आंखों में देखते हुए भावुक लहजे में आगे कहा, ‘‘मेरे बहूबेटे मुसीबत में मेरा मजबूत सहारा बनेंगे, अगर मेरी यह उम्मीद भविष्य में पूरी न होती तो मेरा दिल उन दोनों को कितना कोसता.’’

एक पल रुक कर सुमित्रा फिर बोलीं, ‘‘असली विपदा का पहाड़ तो रीना के सिर पर टूटा था. मेरी ही तरह क्या उस ने भी उन लोगों का ध्यान नहीं किया होगा जो इस कठिन समय में उस के काम आएंगे?’’

‘‘जरूर आया होगा,’’ राजेंद्रजी बोले.

‘‘अगर उस ने हमें विश्वसनीय लोगों की सूची में नहीं रखा होगा तो यह हमारे लिए बड़े शर्म की बात है और अगर हमारे सहयोग और सहारे की उसे आशा है और हम उस की उम्मीदों पर खरे न उतरे तो क्या वह हमें नहीं कोसेगी?’’

‘‘तुम्हारे मनोभाव अब मेरी समझ में आ रहे हैं. तुम्हारे कायाकल्प का कारण मैं अब समझ सकता हूं,’’ राजेंद्रजी ने प्यार से पत्नी का माथा एक बार फिर चूमा.

‘‘हमारा बेटा संजीव अब बहू और पोती के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है और ये दोनों हमें कोसें ऐसा मैं कभी नहीं चाहूंगी. इन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए ही मैं ने अपने को बदल डाला है. कभी मैं राह से भटकूं तो आप मुझे टोक कर सही राह दिखा देना,’’ सुमित्रा ने अपने जीवनसाथी से हाथ जोड़ कर विनती की.

‘‘उस की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि तुम्हारा यह कायाकल्प दिल की गहराइयों से हुआ है.’’

अपने पति की आंखों में अपने लिए गहरे सम्मान, प्रशंसा व प्रेम के भावों को पढ़ कर सुमित्रा हौले से मुसकराईं.

बालिका सेवा के नाम पर…

31जनवरी, 2019 की शाम जावरा क्षेत्र में पिपलोदा रोड स्थित कुटीर बालिका गृह के बाहर अफरातफरी
का माहौल था. बालिका गृह के गेट पर औद्योगिक क्षेत्र के टीआई बी.एल. सोलंकी, एसआई मधु राठौर और पुलिस बल के साथ खड़े थे.
भारी पुलिस बल को देख कर लोगों की भीड़ जुटने लगी थी. उसी समय पूर्व संचालिका रचना भारतीय अपने पति ओमप्रकाश भारतीय के साथ बालिका गृह से बाहर निकल आई.
रचना भारतीय अपने पति ओमप्रकाश के साथ आश्रम के प्रांगण में स्थित घर में रहती थी. रचना ने टीआई सोलंकी से आने की वजह जाननी चाही तो टीआई ने बताया कि वह जिला कलेक्टर के आदेश पर आश्रम में रहने वाली बच्चियों को वहां से हटा कर रतलाम के वन स्टाफ सेंटर में ले जाने के लिए आए हैं.
रचना और उस के पति ओमप्रकाश ने इस बात का विरोध करना चाहा लेकिन पुलिस के सामने उन की एक नहीं चली. पुलिस ने आश्रम में रह रही करीब 300 बालिकाओं को बसों में बैठाया. इतना ही नहीं टीआई बी.एल. सोलंकी ने रचना भारतीय व ओमप्रकाश को भी हिरासत में ले लिया. इस के बाद वह उन्हें ले कर थाने लौट आए. उन्होंने सभी बालिकाओं को रतलाम के वन स्टाफ सेंटर भेज दिया.
रचना और ओमप्रकाश भारतीय को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने की बात जल्द ही पूरे जावरा शहर में फैल गई. पर पुलिस की काररवाई चलती रही. टीआई सोलंकी ने अगले दिन क्षेत्र के 2 और चर्चित व्यक्तियों कुंदन वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष सुदेश जैन और सचिव दिलीप बरैया को भी गिरफ्तार कर लिया.
दरअसल इन की गिरफ्तारी की वजह यह थी कि कुटीर आश्रम से 24 जनवरी, 2019 को 5 बालिकाएं बालिका गृह का रोशनदान तोड़ कर फरार हो गई थीं.
आश्रम से बालिकाओं के भागने की सूचना मिलते ही पुलिस और बाल कल्याण समिति सक्रिय हो गई. जिस के चलते ये सभी बालिकाएं शाम को मंदसौर में मिल गईं. बालिकाओं से पूछताछ की गई तो पता चला कि रचना और उस का पति अन्य लोगों के साथ मिल कर इन लड़कियों का शारीरिक शोषण करते थे.

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कलेक्टर ने दिए थे जांच के आदेश

यह जानकारी जब रतलाम की कलेक्टर रुचिका चौहान को मिली तो उन्होंने जावरा क्षेत्र के एसडीएम एम.एल. आर्य को संस्था में रह रही दूसरी लड़कियों से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसडीएम ने आश्रम जा कर वहां रह रही करीब 300 लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने आपबीती एसडीएम साहब को बता दी.
एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर रुचिका चौधरी को सौंप दी. इस के बाद ही कलेक्टर रुचिका चौहान ने आदेश दिया कि कुटीर बालिका गृह में रह रही सभी बच्चियों को वहां से वन स्टाफ सेंटर रतलाम शिफ्ट कर दिया जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई की जाए.
जिला कलेक्टर के आदेश पर ही पुलिस ने बालिका गृह की पूर्व संचालिका रचना भारतीय तथा उस के पति ओमप्रकाश भारतीय, संस्था के वर्तमान अध्यक्ष और सचिव सुदेश जैन एवं दिलीप बरैया के खिलाफ भादंवि की धारा 354, 376, 324 एवं बालकों की देखरेख संरक्षण अधिनियम की धारा 75, पोक्सो 5डी, 4, 7/8 के तहत मामला दर्ज कर लिया.
जांच में पुलिस को पता चला कि रचना भारतीय पूर्व में इस बालिका गृह की संचालिका के पद पर थी. वह अपने पति ओमप्रकाश के साथ बालिका गृह के एक हिस्से में रहती थी. बाद में अपनी राजनैतिक पकड़ के चलते उसे बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था.

चूंकि वह एक साथ 2 पदों पर नहीं रह सकती थी, लिहाजा उस ने बालिका गृह की संचालिका का पद छोड़ना जरूरी समझा. यह पद छोड़ने के बाद रचना ने अपने विश्वसनीय सुदेश जैन और दिलीप बरैया को संस्था का अध्यक्ष और सचिव बनवा दिया था. पद छोड़ने के बाद भी रचना अपने पति के साथ इसी आश्रम में रहती थी.
सुदेश जैन और दिलीप बरैया नाम के ही पदाधिकारी थे. बालिका गृह से जुड़े सारे फैसले रचना और उस का पति ही लेते थे.
बहरहाल पुलिस ने दूसरे दिन सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया जहां से रचना भारतीय को रतलाम एवं ओमप्रकाश भारतीय, सुदेश जैन तथा दिलीप बरैया को जावरा जेल भेज दिया गया.
अदालत में पेश करने से पहले सुदेश जैन एवं दिलीप बरैया की मौजूदगी में टीआई बी.एल. सोलंकी तथा हुसैन टेकरीजहां के तहसीलदार के सामने आश्रम की सील तोड़ कर दस्तावेजों की जांच की गई.
साथ ही लापरवाही बरतने के आरोप में महिला सशक्तिकरण अधिकारी रहे एवं वर्तमान में महिला बाल विकास विभाग के सहायक संचालक रविंद्र मिश्रा को निलंबित कर दिया गया.
इस के अलावा रचना को बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया गया. बालिका गृह में लड़कियों के साथ किए जाने वाले शोषण की पूरी कहानी इस प्रकार सामने आई—

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कई साल पहले जावरा नगर पालिका के अध्यक्ष हुआ करते थे कुंदनमल भारतीय. ओमप्रकाश भारतीय कुंदनमल का ही बेटा था. जबकि रचना ओमप्रकाश भारतीय की पत्नी थी. कुंदनमल की मृत्यु के बाद सन 2015 में रचना ने कुंदन बेलफेयर सोसाइटी का गठन कर उस के अंतर्गत पिपलौदा रोड पर कुंदन कुटीर नाम से बालिका गृह का संचालन किया.

राजनैतिक पहुंच का उठाया लाभ

रचना और उस के पति की राजनीति में अच्छी पकड़ थी जिस के चलते जल्द ही इस बालिका गृह को शासन से मोटा अनुदान मिलने लगा. जानकारी के अनुसार पिछले 3 साल में ही शासन की तरफ इस बालिका गृह को करीब 38 लाख रुपए की अनुदान राशि मिली थी. सूत्रों की मानें तो इस अनुदान राशि के अलावा रचना प्रदेश भर से काफी बड़ी रकम दान के रूप में बेटोर रही थी.
जो 5 लड़कियां बालिका गृह से भागी थीं, उन्होंने बताया कि हम सभी रचना को मम्मा कहते थे और उस के पति को पापा. लेकिन उन की नीयत लड़कियों के प्रति अच्छी नहीं थी. पापा रोज शराब पीते थे और रचना मम्मा इस दौरान हम में से किसी एक लड़की को शराब के पैग तैयार करने का काम सौंप देती थी. मम्मा खुद भी शराब पीती थी और दूसरे लोग भी रोज आश्रम में आ कर उन दोनों के साथ शराब पीते थे.
रात के समय आश्रम में आने वाली एक महिला भी शराब पीए होती थी. मम्मा एक गुप्त रास्ते से लड़कियों के कमरों में आती थी. रात के खाने में हमें कुछ मिला कर खिलाया जाता था, जिस के बाद हम उठ ही नहीं पाते थे.
यह भी पता चला कि सन 2018 में लड़कियों की शिकायत पर बाल संरक्षण अधिकारी पवन कुमार सिसौदिया ने जांच कर के अपनी रिपोर्ट रतलाम में संबंधित विभाग के 2 अधिकारियों को सौंपी थी. लेकिन उन की जांच रिपोर्ट पर कोई काररवाई नहीं की गई.
शिकायत में बच्चियों ने आरोप लगाए कि रचना मम्मा का व्यवहार काफी खराब है. वह बातबात पर हम लोगों से मारपीट करती हैं. समय पर खाना भी नहीं दिया जाता. लड़कियों ने बताया कि रचना के पति हम लोगों के शरीर पर गलत नीयत से हाथ फेरते थे. मना या विरोध करने पर हमारे साथ मारपीट की जाती थी. वह कभीकभी किचन में आ कर लड़कियों के पैर में हाकी डाल कर उन्हें अपनी तरफ खींच लेते.

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बहरहाल अब शासन ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है बल्कि रचना के आश्रम में रहने वाली सभी बच्चियों को रतलाम और उज्जैन के आश्रमों में शिफ्ट कर दिया है, दूसरी तरफ रतलाम कलेक्टर के निर्देश पर पुलिस उन तमाम बच्चियों से संपर्क कर उन के बयान लेने की कोशिश कर रही हैं, जो कभी न कभी रचना के आश्रम में रही थीं.
कुंदन कुटीर बालिका गृह मामले में एक युवती से वीडियो बनवाने के संबंध में करीब 2 महीने से फरार चल रहे नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस से निष्कासित यूसुफ कड़पा को पुलिस ने गिरफ्तार कर भी लिया. गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने आरोपी को आननफानन में कोर्ट में पेश किया, जहां से कोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया.
इस मामले में पुलिस ने कोर्ट में आरोपी के पुलिस रिमांड की मांग भी नहीं की. पुलिस ने कोर्ट से उसे जेल भेजने का आग्रह किया, लेकिन कोर्ट ने आरोपी के आवेदन पर उसे कोर्ट से ही जमानत पर रिहा कर दिया.

बिग बौस की उर्वशी वाणी ने बदला लुक, फोटोज हुई वायरल

“बिग बौस 12” की कंटेस्टेंट उर्वशी वाणी इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी पौपुलर हो रही है. बिग बौस में सिंपल और स्वीट लगने वाली उर्वशी का न्यू लुक सामने आया है. उन्होंने इंस्टाग्राम पर कुछ फोटोज शेयर की है जिसे सभी बेहद पसंद कर रहे है. उर्वशी का ये ट्रांसफॉर्मेशन सुर्खियां बटोर रहा है. उनके मेकओवर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं. उर्वशी के ग्लैमरस लुक की तस्वीरें हैरान करने वाली हैं.


बिग बौस में रही सिंपल

सिंपल लुक और बिना मेकअप के रहने वाली उर्वशी, बिग-बौस के बाद सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहती हैं. हाल ही में उन्होंने अपनी कुछ फोटोज शेयर की जिसमें वन साइडेड ऑफ शॉल्डर टॉप और ब्लैक कलर की फ्रिल स्कर्ट पहनी नजर आ रही हैं. बात करे उनके हेयरस्टाइल की तो उन्होंने बालों का बन बनाया हुआ हैं मिनिमल मेकअप और डार्क लिपस्टिक में उर्वशी बेहद खूबसूरत लग रही हैं.

गाने का है शौक

उर्वशी को गाने का भी बहुत शौक है. इंस्टाग्राम पर शेयर उनके एक वीडियो में वो गाना सिखाते हुए नजर आ रही है.

सादगी ने जीता दिल

उर्वशी वाणी बिग-बौस में दीपक ठाकुर के साथ जोड़ी में गई थीं. उन्होंने अपनी सादगी से घरवालों का दिल जीता साथ ही फैंस का भी उन्हें बहुत प्यार मिला.

 

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ShahRukhKhan ki sabse bade wali FAN♥️ @iamsrk @srkuniverse

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फैन फौलोविंग

बिग बौस के बाद उनकी फैन फौलोविंग में भी इजाफा हुआ है. इंस्टाग्राम पर उन्हें 80 हजार से ज्यादा लोग फौलो करते हैं.

जब सनी लियोनी ने किया टीवी एंकर को Troll…

लोकसभा चुनाव 2019 का जश्न किसी त्योहार से कम नहीं रहा. देशभर में लोग चुनाव के नतीजे जानने के लिए उत्सुक थे, और ये उत्सुकता टीवी एंकर्स से लेकर पूरे न्यूजरुम में भी देखी जा रही थी. इसी के बीज एक मशहूर टीवी एंकर ने इसी उत्सुकती के चलते सनी देओल के नाम की जगह सनी लियोनी का नाम ले लिया.

 

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Love this #Berryglimmer Lip shade by @starstruckbysl 😍💋 #SunnyLeone

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दरअसल, देश के एक बड़े नामी न्यूज चैनल के एंकर के मुंह से जल्दबाजी में सनी देओल का नाम लेते वक्त सनी लियोनी निकल गया. हालांकि तुरंत ही उन्होंने अपनी गलती को करेक्ट भी कर लिया और मामला संभाल लिया. लेकिन सोशल मीडिया इतना क्विक है कि तुरंत ही एंकर की ये गलती वायरल हो गई और करोड़ों लोग इस गलती को सुनकर हंसी का लुत्फ उठाने लगे.

 

सबसे ज्यादा मजेदार बात ये है कि एंकर की इस गलती का मजाक बनाने में एक्ट्रेस सनी लियोनी ने भी देरी नहीं की, और हंसते हुए ट्वीट कर सवाल पूछ डाला, “आगे पर कितने वोट से?”  जैसे ही लोगों ने सनी का ये ट्वीट देखा टीवी एंकर दुबारा ट्रोल होना शुरु हो गए.

एंकर जब ये गलती कर बैठे थे तब सनी देओल पंजाब की गुरुदासपुर सीट से लोकसभा चुनावों में बढ़त के साथ वोटों की गिनती में आगे चल रहे थे. इसी बीच सनी देओल की सीटों की बढ़त के बारे में बताते हुए एंकर के मुंह से गलती से सनी लियोनी का नाम निकल गया.

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खास बात ये है कि सनी देओल पहली बार चुनावी मैदान में उतरे हैं और बीजेपी के टिकट से पंजाब के गुरुदासपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. इस सीट पर सनी से पहले एक्टर और दिग्गज नेता विनोद खन्ना लड़ा करते थे. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से ये सीट खाली थी. गुरुदासपुर बीजेपी का गढ़ माना जाता है और इसीलिए दोबारा इस सीट से बीजेपी ने स्टार कैंडिडेट सनी देओल को ही चुनावी मैदान में उतारा है.

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जब हमारे साहबजादे क्रिकेट खेलने गए

लेखक- कुंतल सिंघवी

हमारे साढ़े 6 वर्षीय बेटे को क्रिकेट खेलने का बहुत शौक है. यद्यपि इस खेल के संबंध में उन का ज्ञान इतना तो नहीं कि किसी खेल संबंधी प्रश्नोत्तर प्रतियोगिता में भाग ले सकें, पर फिर भी उन्हें खिलाडि़यों की पहचान हम से अधिक है और क्रिकेट की फील्ड की रचना कैसे की जाती है, इस बारे में भी वह हम से ज्यादा ही जानते हैं.

जब कभी टेस्ट मैच या एकदिवसीय मैच होता है तो वह बराबर टीवी के सामने बैठे रहते हैं. यदि कभी हमारा बाहर जाने का कार्यक्रम बनता है तो वह तड़ से कह देते हैं, ‘‘मां, मैं क्रिकेट मैच नहीं देख पाऊंगा, इसलिए मैं घर पर ही रहूंगा.’’ इस खेल के प्रति उन की रुचि व लगन पढ़ाई से अधिक है.

उन को इस खेल के प्रति रुचि अचानक ही नहीं हुई बल्कि जब वह मात्र 3 साल के थे तब से ही स्केल और पिंगपांग बाल को वह क्रिकेट की गेंद व बल्ला समझ कर खेला करते थे. अपनी तीसरी वर्षगांठ पर उन्होंने हम से बल्ला व गेंद उपहारस्वरूप झड़वा लिया. इस खेल में विकेट और पैड भी जरूरी होते हैं. इस की जानकारी उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच हुए मैच के दौरान हुई, जिस का सीधा प्रसारण वह टीवी पर देखा करते थे.

उन्होंने खाना छोड़ा होगा, पीना छोड़ा होगा, दोपहर में पढ़ना और सोना भी छोड़ा होगा, पर मैच देखना कभी छोड़ा हो, ऐसा हमें याद नहीं. हमारे देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री कौन है वह इस बात को भले ही न जानें, पर कपिलदेव, सुनील गावसकर, लायड, जहीर अब्बास को वह केवल जानते ही नहीं, उन के हर अंदाज से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं.

इस खेल के प्रति उन की रुचि तब और बढ़ गई, जब उन्होंने गावसकर को मारुति व रवि शास्त्री को आउडी कार मिलते देखी. उन्हें कार पाने का इस से सरल तरीका और कोई नहीं दिखा कि सफेद कमीज पहन लो, पैंट न हो तो नेकर पहन लो, ऊनी दस्ताने पहन लो तथा छोटीबड़ी कैसी भी कैप पहन लो और बस, चल दो बल्ला और गेंद उठा कर खेल के मैदान में.

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कार के वह पैदाइशी शौकीन हैं. जब उन्होंने अपने जीवन के 4 महीने ही पूरे किए थे तब पहली बार कार का हार्न सुन कर बड़े खुश हुए थे. जब वह 8 महीने के थे तब घर के सदस्यों को पहचानने के बजाय उन्होंने सब से पहले तसवीरों में कार को पहचाना था.

तो जनाब, कार के प्रति उन के मोह ने उन्हें क्रिकेट की तरफ मोड़ दिया. फिर वह हमारे पीछे पड़ गए और बोले, ‘‘हम रोज घर पर खेलते हैं, आज हम स्टेडियम में खेलेंगे.’’

हम ने उन से कहा, ‘‘पहले आसपास के बच्चों के साथ घर के बाहर तो खेलो.’’ तो साहब, उन्होंने हमारी आज्ञा का पालन किया, अगले दिन शाम होते ही आ कर बोले, ‘‘आप लोग लान में खड़े हो कर देखिएगा, हम सड़क पर भैया लोगों के साथ खेलने जा रहे हैं.’’ हम मांबाप दोनों ही उन्हें दरवाजे पर इस तरह शुभकामनाओं के साथ छोड़ने गए जैसे वह विदेश जा रहे हों.

बहुत देर तक हम खेल शुरू होने का इंतजार करते रहे, क्योंकि करीबकरीब सभी बच्चे मय टूटी कुरसी के, जोकि उन की विकेट थी, सड़क पर पहुंच चुके थे. पर खेल शुरू होने के आसार न दिखने से हम अपना काम करने अंदर आ गए. करीब 20 मिनट बाद जब हम बाहर आए तो देखा, खिलाडि़यों में कुछ झगड़ा सा हो रहा है.

हम ने पतिदेव से, जोकि अपने बेटे के पहले छक्के को देखने की उम्मीद में बाहर खड़े थे, पूछा कि माजरा क्या है, अभी तक खेल क्यों नहीं शुरू हुआ तो उन्होंने कहा कि फिलहाल कपिल बनाम गावसकर यानी कप्तान कौन हो, का विवाद छिड़ा हुआ है.

4 बड़े लड़के कप्तान बनने की दलील दे रहे थे. एक कह रहा था, ‘‘विकेट (टूटी कुरसी) मैं लाया हूं, इसलिए कप्तान मैं हूं.’’ दूसरा कह रहा था, ‘‘अरे, वाह, बल्ला और गेंद तो मैं लाया हूं. मेरा असली बल्ला है, तुम्हारा तो टेनिस की गेंद से खेलने लायक है. अत: मैं बनूंगा कप्तान.’’ तीसरा जोकि अच्छी बल्लेबाजी करता था, बोला, ‘‘देखो, कप्तान मुझे ही बनाना चाहिए, क्योंकि सब से ज्यादा रन मैं ही बनाता हूं.’’

चौथा इस बात पर अड़ा हुआ था कि खेल क्योंकि उस के घर के सामने हो रहा था अत: बाल यदि चौकेछक्के में घर के अंदर चली गई तो उसे वापस वह ही ला सकता है, क्योंकि गेट पर उस की मां ने उस भयंकर कुत्ते को खुला छोड़ रखा था, जिस से वे सब डरते थे.

खैर, किसी तरह कप्तान की घोषणा हुई तो देखा बच्चे अब भी खेलने को तैयार नहीं, क्योंकि उन्हें उस की कप्तानी पसंद नहीं थी. यहां भी टीम का चयन करने में समस्या थी, क्योंकि जितने खिलाड़ी चाहिए थे, उस से 10 बच्चे अधिक थे. अब समस्या थी कि किसे खेल में शामिल किया जाए.

यहां कोई चयन समिति तो थी नहीं, जो इन की पहली कारगुजारी के आधार पर इन्हें चुनती. यहां तो हर कोई अपने को हरफनमौला बता रहा था.

खैर, साहब, जो बच्चे बल्ले नहीं लाए थे, उन्हें बजाय वापस घर भेजने के गली के नुक्कड़ पर खड़ा कर दिया गया ताकि अगर भूलेचूके गेंद वहां चली जाए तो वे उसे उठाने में मदद करें. जब टीम का चयन हो गया तो टास हुआ, 2 बार तो टास में अठन्नी पास की नाली में जा गिरी. तीसरी बार के टास से पता चला कि टीम ‘क’ पहले बल्लेबाजी करेगी तथा टीम ‘ख’ फील्डिंग.

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हमारे सुपुत्र चूंकि हमें फील्ड में यानी सड़क पर कहीं नजर नहीं आए तो हम ने समझा शायद ‘क’ टीम में होंगे, पर शंका का समाधान थोड़ी देर में हो गया जब वह मुंह लटका कर द्वार में प्रविष्ट हुए.

हम ने उन से पूछा, ‘‘आप वापस कैसे आ गए?’’ इस पर वह बोले, ‘‘हम सब से छोटे हैं, फिर भी सब से पहले हम से बल्लेबाजी नहीं करवाई और बड़े भैया खुद खेले जा रहे हैं.’’

हम ने उन्हें हतोत्साहित नहीं होने दिया और कहा, ‘‘जल्दी ही आप की बारी आ जाएगी, आप वापस चले जाइए.’’

वह अंदर गए, लगे हाथ एक कोल्ड डिं्रक चढ़ाई और जब वह वापस आए तो उन के चेहरे के भाव उसी तरह थे, जैसे ड्रिंक इंटरवल के बाद खिलाडि़यों के चेहरों पर होते हैं. जब वह फील्ड पर पहुंचे तो पता लगा उन की बारी आ चुकी थी, पर वह मौके पर उपस्थित नहीं थे, अत: 12वें नंबर के खिलाड़ी को बल्लेबाजी करने भेज दिया गया यानी बल्लेबाजी तो वह कर ही नहीं पाए.

अब फील्डिंग की बारी थी. वहां भी शायद वह अपनी अच्छी छाप नहीं छोड़ सके, क्योंकि अगले दिन जब हम ने उन्हें शाम को तैयार कर के भेजना चाहा तो वह तैयार नहीं हो रहे थे. हम ने कहा, ‘‘अरे भई, आज हम बिलकुल कहीं नहीं जाएंगे, लान में खड़े हो कर आप का ही मैच देखेंगे.’’ पर वह टस से मस नहीं हुए. उलटे उन के हाथ में क्रिकेट के बल्ले की जगह बैडमिंटन रैकिट था. यानी उन्होंने क्रिकेट से तौबा कर ली थी.

खैर, किसी तरह हम ने उन्हें खेलने भेजा. हम अपनी सब्जी गैस पर बनने रख आए थे. उसे देखने अंदर आ गए. वह तो खैर जलभुन कर राख हो ही चुकी थी, ऊपर से इन्होंने बताया कि हमारे नवाबजादे टीम से निकाल दिए गए हैं, इसीलिए खेलने नहीं जा रहे थे.

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हम ने उन से निकाले जाने का कारण पूछा तो पता चला कि फील्डिंग के समय उन्हें जो पोजीशन मिली थी, वह महत्त्व की थी और वहां पर चौकन्ना हो कर खड़े रहने की जरूरत थी. पर हमारे नवाबजादे जहां लपक कर कैच लेना था, वहां पर तो डाइव मार कर एक हाथ से कैच ले रहे थे. जैसा कभी उन्होंने गावसकर को आस्ट्रेलिया में लेते देखा था, और जहां पर डाइव लगानी थी, वहां सीधे हाथ आकाश में लिए खड़े थे. इस तरह वह 3-4 महत्त्वपूर्ण कैच छोड़ चुके थे, अत: कप्तान उन्हें गुस्से में घूरने लगा था.

जब 5वीं बार उन्हें एक खिलाड़ी को रन आउट करने का मौका मिला था तो उन्होंने गेंद बजाय खिलाड़ी को रन आउट करने के लिए विकेट पर मारने के अपने कप्तान के मुंह पर दे मारी, क्योंकि वह गुस्से में थे कि पारी की शुरुआत उन से क्यों नहीं करवाई गई. जब शाम से रात हुई और स्टंप उखाड़े गए, यानी कुरसी सरका ली गई तो उन्हें अगले दिन वहां आने से मना कर दिया गया.

हमारे लाड़ले का कहना था, ‘‘यह भी कोई क्रिकेट मैच है? पास में नाली बह रही है. इतने सारे मच्छर खाते हैं, न कोई ड्रिंक्स ट्राली आती है, न कोई फोटो खींचता है. हम तो विदेश जा कर ही खेलेंगे.’’

अनन्या पांडे का हौट अंदाज, देखें फोटोज

“स्टूडेंट औफ द ईयर – 2” से धमाकेदार डेब्यू करने वाली अनन्या पांडे इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं. अनन्या पांडे अपनी पहली फिल्म के बाद नये अंदाज में नजर आ रही हैं. हमेशा क्यूट लुक में नजर आने  वाली अनन्या अब हौट और बौल्ड अंदाज में सोशल मीडिया पर अपनी फोटोज शेयर कर रही हैं. उनके फैंस इस नये अंदाज को काफी पसंद कर रहे है.

 

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self-(dot)ing 🖤😉

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अनन्या पांडे की फैन फौलोविंग

सोशल मीडिया में अनन्या की फैन फौलोविंग देखते ही बनती है अकेले इंस्टाग्राम पर उनके 2.9 मिलीयन  फौलोवर्स हैं. फैंस के लिए वो काफी फोटोज शेयर करती हैं. इन फोटोज में फ्रेंडस के साथ पोज देती तो कभी सेल्फी लेती अनन्या काफी हौट लग  रही है. हाल ही में उन्होंने अपना एक फेस वौश का एड शेयर किया जिसमें वो बेहद पसंद की जा रही हैं.

 

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देख ज़रा पीछे मुड़के 😜 #TheJawaaniSong out now!!! ❤️ (Link in my bio)

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एक्टिंग से मचाया धमाल

बौलीवुड में भले ही “स्टूडेंट औफ द ईयर – 2” उतना कमाल नहीं दिखा पाई लेकिन अनन्या ने अपनी एक्टिंग से सभी का दिल जीत लिया है. फिर चाहे टाइगर के साथ उनकी कैमिस्ट्री हो या डायलोग डिलीवरी दर्शकों ने उनकी काफी सरहना की.

किंग खान की बेटी की बेस्ट फ्रेंड

बौलीवुड के रोमांस किंग शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान का 22 मई को बर्थडे था. इस मोके पर अनन्या पांडे ने सुहाना को बेहद ही स्पेशल तरीके से बर्थडे विश किया. अनन्या ने इंस्टाग्राम पर सुहाना के साथ की बचपन की एक क्यूट सी फोटो शेयर की थी. उन्होंने जो तस्वीर शेयर की है उसमें सुहाना खान, अनन्या पांडे और शनाया कपूर नजर आ रही हैं. तीनों ने हाथ में बंदूक ली ही हुई है. तस्वीर में तीनों ही बेहद क्यूट दिख रही हैं.

स्टूडेंट से लेकर स्टूडेंट औफ द ईयर तक…

29 मार्च 1999 को मुंबई में जन्मी अनन्या पांडे मशहूर एक्टर और कौमेडियन चंकी पांडे की बेटी हैं. उन्होंने अपनी स्कूलिंग “धीरुभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल” से की इसके बाद उन्होंने “University of Southern California” से ग्रेजुएशन कंप्लीट किया. अनन्या पांडे सुर्खियों में तब आई जब करण जौहर ने उनको  “स्टूडेंट औफ द ईयर – 2” में लेने का फैसला किया.

 

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all the single ladies put ya hands up 👯‍♀️ (even tho my hands are down in this lol)

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वायरल हुआ भोजपुरी एक्ट्रेस अंजना सिंह का ये हौट Video

अंजना सिंह की गिनती भोजपुरी इंडस्ट्री की टौप एक्ट्रेसेस में होती है. फैंस उनके बेहतरीन एक्टिंग और जबरदस्त डांस के कायल हैं. अंजना जल्द ही फिल्म ‘मेहंदी लगा के रखना पार्ट 2’ में नजर आने वाली हैं, जिसके लिए वो काफी मेहनत कर रही हैं. वैसे अंजना सिंह इन दिनों सोशल मीडिया पर भी काफी छाई हुई है. हाल ही में उनका एक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे अंजना सिंह ने खुद अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. देखें वीडियों-

 

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Varanasi Show

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ये भी पढ़ें- भोजपुरी एक्ट्रेस संभावना सेठ ने ऐसे गिराई 

 

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#morningeveryone😘 #Hathkadi 2coming soon

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वीडियो हुआ वायरल

अंजना सिंह ने वीडियो को शेयर करते हुए उन्होंने कैप्शन दिया,’वाराणसी शो’, वीडियो में वो बौलीवुड के सुपरहिट गानों पर जबरदस्त लटके-झटके दिखाती हुईं नजर आ रही हैं. वीडियो के लास्ट में उन्होंने सपना चौधरी के सुपरहिट गाने ‘ तेरी आंख्या का यो काजल’ पर डांस कर फैन्स का दिल लूट लिया.

 

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#goodmorning🌞#loveyourself💕 #keepblessing #instalove #AS🌈🌈

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फैन फौलोविंग

अंजना सिंह की फैन फौलोविंग देखते ही बनती है, अकेले इंस्टाग्राम पर उनके 3,46,000 फौलोवर्स है. उनकी इंस्टाग्राम गैलेरी हौट और बौल्ड फोटोज से भरी पड़ी है, जिसे फैंस काफी पसंद करते है.

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#goodmorning #lovewiththissong #ticktock #loveyourself #AS🌈🌈

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लखनऊ से टौप एक्ट्रेस तक

अंजना यूपी की राजधानी लखनऊ में पैदा हुईं. उन्होंने भोजपुरी फिल्म ‘फौलाद’ से अपने कैरियर की शुरुआत की. उनकी इस फिल्म को दर्शकों ने काफी पसंद किया. उनके गाने और फिल्मों को भोजपुरी दर्शकों के बीच काफी पसंद किया जाता है. उनको साल 2017 में इंटरनेशनल भोजपुरी फिल्म अवार्ड में “बेस्ट एक्ट्रेस व्यूअर्स चौइस अवार्ड ” से सम्मानित किया. इसके बाद फिल्म “जिगर” के लिए अंजना को इंटरनेशनल भोजपुरी फिल्म अवार्ड 2018 में “बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड” से नवाजा गया.

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नई फिल्म का ट्रेलर हुआ रिलीज

हाल ही में उनकी नई फिल्म ‘दुश्मन सरहद पार के’ का ट्रेलर यूट्यूब पर रिलीज हुआ है, जिसमें अंजना सिंह काफी हौट अंदाज में दिखाई दे रही हैं.

मासूमियत बनी मौत…

प्रसिद्ध धार्मिक नगरी चित्रकूट का एसपीएस यानी सदगुरु पब्लिक स्कूल अपने आप में एक ब्रांड है. अंग्रेजी माध्यम के इस स्कूल में

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों के बच्चे पढ़ते हैं, चित्रकूट (मध्य प्रदेश) से महज 6 किलोमीटर दूर स्थित है, कर्बी जिले (उत्तर प्रदेश) के सैकड़ों बच्चे यहां रोजाना पढ़ने के लिए बस से आते हैं.

इन्हीं सैकड़ों बच्चों में से श्रेयांश रावत और प्रियांश रावत की पहचान कुछ अलग हट कर थी. क्योंकि ये दोनों जुड़वां भाई भी थे और हमशक्ल भी. दोनों को पहचानने में कोई भी धोखा खा जाता था. 5-5 साल के ये मासूम अभी एलकेजी में पढ़ रहे थे. जुड़वां होने के अलावा एक और दिलचस्प बात यह भी थी कि रावत परिवार के ये दोनों ही नहीं बल्कि 11 बच्चे एसपीएस में पढ़ रहे थे. इन में से 2 श्रेयांश और प्रियांश के सगे बड़े भाई देवांश और शिवांश भी थे.

इन चारों भाइयों के पिता ब्रजेश रावत चित्रकूट के जाने माने तेल व्यापारी हैं. आयुर्वेदिक तेलों का कारोबार करने वाले ब्रजेश रावत ईमानदार, कर्मठ और मिलनसार व्यक्ति हैं. तेल के अपने पुश्तैनी कारोबार को उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. इसी वजह से कर्बी से ले कर चित्रकूट तक उन की अपनी एक अलग पहचान है.

अपने कारोबार में मशगूल रहने वाले ब्रजेश रावत हर लिहाज से सुखी और संपन्न कहे जा सकते हैं. कर्बी के रामघाट में उन का बड़ा मकान है, जिस में पूरा रावत परिवार संयुक्त रूप से रहता है. उन के घर में हर वक्तचहलपहल रहती है जिस की बड़ी वजह वे 11 बच्चे भी हैं जो एसपीएस में पढ़ते थे.

ईश्वर में अपार श्रद्धा रखने वाले ब्रजेश रावत ने कभी सपने में भी उम्मीद नहीं की होगी कि कभी उन के साथ भी ऐसी कोई अनहोनी होगी जो जिंदगी भर उन्हें सालती रहेगी और जिन श्रेयांश और प्रियांश की मासूम किलकारियां और शरारतों से उन का घर आबाद रहता है, उन की यादें उम्र भर उन्हें काटने को दौड़ती रहेंगी.

रोजाना की तरह 12 फरवरी को भी दोपहर में लगभग 12 बजे एसपीएस की बसें लाइन से लग गई थीं. बच्चे अपनी बसों का नंबर पढ़ते हुए उन में सवार हो रहे थे. छोटी कक्षाओं के बच्चों में स्कूल की छुट्टी के बाद घर जाने की खुशी ठीक वैसी ही होती है जैसी जेल से लंबी सजा काट कर रिहा हुए कैदियों की होती है.

क्लास से लाइन में लग कर बाहर आए प्रियांश और श्रेयांश भी अपनी बस में सवार हो गए, जिस में ड्राइवर और कंडक्टर के अलावा एक केयरटेकर भी थी. जब बस के सभी बच्चे आ कर अपनीअपनी सीटों पर बैठ गए तो गेट बंद होने के बाद ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी. इस बस का नंबर था एमपी19-0973.

स्कूल कैंपस से बस अभी 500 मीटर का फासला भी तय नहीं कर पाई थी कि न जाने कहां से एक लाल रंग की बाइक आई और बस के सामने रुक गई.

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ड्राइवर ने अचकचा कर बस धीमी की लेकिन जब तक वह माजरा समझ पाता तब तक बाइक पर सवार दोनों युवक नीचे उतर आए. उन में से एक के हाथ में पिस्टल थी. दोनों युवकों ने चेहरा भगवा कपड़े से ढक रखा था. फिल्मी स्टाइल में ही बस के गेट तक आए बदमाशों ने डरावनी चेतावनी दी और श्रेयांश और प्रियांश को नीचे उतार लिया.

कोई कुछ समझ या कर पाता इस के पहले ही दोनों ने श्रेयांश और प्रियांश को बाइक पर बीच में बैठाया और आंधीतूफान की तरह जैसे आए थे, वैसे ही उड़नछू हो गए. कहां गए यह कोई उन्हें ढंग से भी नहीं देख पाया.

यह जरूर है कि हर किसी को समझ आ गया कि दिन दहाड़े स्कूल बस में से दोनों का अपहरण हो गया है और अपहरणकर्ताओं का टारगेट श्रेयांश और प्रियांश ही थे, क्योंकि अगर किसी को भी उठाना होता तो बच्चे आगे की सीटों पर भी बैठे थे. लेकिन बदमाशों ने पीछे की सीट पर बैठे दोनों भाइयों को ही उठाया था यानी अपहरण की यह वारदात पूर्वनियोजित थी.

बाइक के नजरों से दूर होते ही कंडक्टर ड्राइवर और केयरटेकर सहित बच्चों का डर खत्म हुआ तो खासी हलचल मच गई. देखते ही देखते यह बात चित्रकूट की तंग और संकरी गलियों से होती हुई देश भर में फैल गई कि 2 जुड़वां भाईयों का दिनदहाड़े अपहरण हो गया.

अपहरण के बाद मिनटों में वारदात की खबर पुलिस और ब्रजेश रावत तक पहुंच गई. ब्रजेश भागेभागे स्कूल आए, लेकिन वहां उन के जिगर के ये दोनों जुड़वां टुकड़े नहीं थे. थी तो ऊपर बताई गई दास्तां जो हर किसी ने अपने शब्दों मे बयां की, जिस का सार यह था कि एक बाइक पर 2 नकाबपोश बदमाश आए. उन्होंने बाइक अड़ा कर बस रोकी, पिस्टल लहरा कर धमकाया और श्रेयांश व प्रियांश को बीच में बैठा कर उड़नछू हो गए.

मौके पर आई पुलिस के हाथ नया कुछ नहीं लगा, सिवाय उन सीसीटीवी फुटेज के जो स्कूल के कैमरों में कैद हो गई थी. इन फुटेज को देखने के बाद पुलिस वालों ने अंदाजा लगाया कि अपहरणकर्ताओं की उम्र 25-26 साल के लगभग है और उन की हरकतें देख लगता है कि वे पेशेवर हैं. पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि 2 संदिग्ध युवक कुछ दिनों से स्कूल की रैकी कर रहे थे. चूंकि स्कूल में अभिभावकों और दूसरे लोगों की आवाजाही लगी रहती है इसलिए किसी ने उन से कुछ पूछा या कहा नहीं था.

सीसीटीवी फुटेज में दोनों के चेहरे नहीं दिखे क्योंकि उन्होंने भगवा कपड़ा बांध रखा था लेकिन यह जरूर पता चला कि एक बदमाश काली और दूसरा सफेद रंग की टी शर्ट पहने हुए था. यह आशंका भी जताई गई कि दोनों बदमाश बच्चों को ले कर अनुसुइया आश्रम की तरफ भागे हैं और बीच में उन की बाइक रजौरा के पास गिरी भी थी.

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चंद घंटों में ही मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में इस हादसे पर खासा बवाल मचा तो पुलिस भी एक्शन में आ गई. सतना के एसपी संतोष सिंह गौर ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद से बच्चों की सुरक्षित वापसी की कोशिशें की जा रही हैं.

अब तक यह भी कहा जाने लगा था कि बदमाश बच्चों को ले कर बीहड़ों में कूद गए होंगे और जल्द ही ब्रजेश रावत से फिरौती मांगेंगे. आशंका यह भी जताई गई कि इस वारदात के पीछे साढ़े 5 लाख के ईनामी बबुली कोल गिरोह का हाथ हो सकता है.

पुलिस ने संदिग्ध लोगों को पकड़ कर उन से पूछताछ शुरू कर दी थी, लेकिन हाथ कुछ नहीं लग रहा था. चित्रकूट को छूती मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को सीज कर दिया गया. कर्बी के एसपी मनोज कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीमों ने हर जगह बच्चों और बदमाशों को तलाशना शुरू कर दिया.

ब्रजेश रावत ने बारबार यह बात दोहराई कि उन का किसी से भी व्यक्तिगत या पारिवारिक विवाद नहीं है और न ही अब तक यानि घटना वाले दिन तक उन से किसी ने फिरौती मांगी है. घंटों के सघन अभियान के बाद भी प्रियांश और श्रेयांश का कोई सुराग नहीं लग रहा था. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने डीजीपी वी.के. सिंह को तलब किया था. इसलिए पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते अपने महकमे के उन सभी अधिकारियों को चित्रकूट बुलवा भेजा, जो कभी भी एंटी डकैत गतिविधियों का हिस्सा रहे थे.

ये तजुर्बेकार अधिकारी नौसिखिए अपराधियों के सामने किस तरह गच्चा खा रहे थे. यह खुलासा बाद में 13 फरवरी को हुआ. उसी दिन आईजी ने मोर्चा संभालते हुए एसआईटी गठित कर डाली, जिस के तहत दोनों राज्यों की पुलिस के लगभग 500 जवान विंध्य के बीहड़ों में बच्चों को तलाशते रहे. अपराधियों का सुराग देने पर डेढ़ लाख रुपए के ईनाम का ऐलान भी किया गया लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

इसी बीच उम्मीद के मुताबिक अपहरणकर्त्ताओं ने रावत परिवार से संपर्क कर के मासूमों की रिहाई के एवज में 2 करोड़ रुपए मांगे. 19 फरवरी को रावत परिवार ने उन्हें 20 लाख रुपए दिए भी, लेकिन इस के बाद भी उन्होंने बच्चों को रिहा नहीं किया.

अब तक सार्वजनिक रूप से पुलिस की कार्यप्रणाली और लापरवाही की आलोचना होने लगी थी. चित्रकूट में तो आक्रोश था ही, कर्बी और सतना में भी लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किए. अब भाजपाई और कांग्रेसी भी राजनीति पर उतर आए थे, जिस से लगा कि इन नेताओं को बच्चों की सलामती और जिंदगी से प्यारी अपनी आरोपप्रत्यारोप की परंपरागत राजनीति है.

श्रेयांश और प्रियांश कहां और किस हाल में हैं इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था. सदमे में डूबे रावत परिवार के सदस्य बच्चों की खैरियत को लेकर चिंतित थे. हर किसी का रोरो कर बुरा हाल था खासतौर से ब्रजेश रावत की पत्नी बबीता रावत का जो बच्चों की जुदाई के गम में होश खो बैठी थी.

पुलिस भागादौड़ी करती रही, दावे करती रही लेकिन 20 लाख रुपए देने के बाद भी बच्चे वापस नहीं लौटे तो रावत परिवार किसी अनहोनी की आशंका से कांपने लगा.

आशंका गलत नहीं निकली. 24 फरवरी को पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के बबेरू के पास यमुना नदी से प्रियांश और श्रेयांश की लाशें बरामद कीं. इन दोनों मासूमों के शव जंजीर से बंधे हुए थे.

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आस और उम्मीदें तो पहले ही टूट चुकी थीं, जिन पर मोहर लगने के बाद 12 फरवरी से ज्यादा हाहाकार मचा. अब हर कोई यह जानने को बेताब था कि अपहरणकर्ता कौन थे, कैसे पकड़े गए और इन्होंने कैसे हैवानियत दिखाते हुए फिरौती की रकम लेने के बाद भी मासूमों पर कोई रहम नहीं किया. प्रदेश भर में पुलिसिया प्रणाली के खिलाफ फिर जम कर हल्ला मचा, धरनेप्रदर्शन हुए और उम्मीद के मुताबिक फिर सियासत गरमाई.

पूरे घटनाक्रम में सुकून देने वाली इकलौती बात यह थी कि हत्यारे पकड़े गए थे, जिन की तादाद 6 थी.

हत्यारों को पकड़ने में पुलिस की भूमिका कोई खास नहीं थी, क्योंकि वे इत्तफाकन धरे गए थे. 24 फरवरी को फिर एक बार सनसनी मची और इतनी मची कि पुलिस वालों और सरकार को जवाब देना मुश्किल हो गया.

श्रेयांश और प्रियांश के शव इस दिन उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में यमुना नदी के बबेरू घाट पर मिले थे. दोनों शव के हाथ पैर बंधे हुए थे.

हैवानों ने इन मासूमों की कैसे जान ली होगी, इस के पहले यह जानना जरूरी है कि हत्यारे थे कौन और इतने शातिराना ढंग से उन्होंने कैसे इस वारदात को अंजाम दिया था. जब एक एक कर 6 हत्यारे पकड़े गए तो दिल को दहला देने वाली कहानी कुछ इस तरह सामने आई, जिस ने साबित भी कर दिया कि लोग बेवजह पुलिस को नहीं कोस रहे थे.

इस वारदात का मास्टरमाइंड पदम शुक्ला निकला, जिस के पिता रामकरण शुक्ला, पुरोहित और सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट में संस्कृत के प्राचार्य हैं. पदम शुक्ला का छोटा भाई विष्णुकांत शुक्ला भाजपा और बजरंग दल से जुड़ा है. जानकीकुंड में रहने वाला शुक्ला परिवार भी चित्रकूट में किसी पहचान का मोहताज नहीं है, लेकिन इस की वजह इन के कुकर्म ज्यादा हैं.

अपहरण और हत्या का दूसरा अहम किरदार रामकेश यादव है जो मूलरूप से बिहार का रहने वाला है और पढ़ाई पूरी करने के बाद चित्रकूट में किराए का मकान ले कर रहता था. रामकेश रावत परिवार के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाता था.

उस का रावत परिवार में वही मान सम्मान था जो आमतौर पर ट्यूटर्स का होता है, रामकेश के दिल में अपराध का बीज यहीं से अंकुरित हुआ और इस से पेड़ बना पदम शुक्ला के दिमाग में.

इसमें कोई शक नहीं कि ब्रजेश रावत के पास पैसों की कमी नहीं थी, जिस का गुरुर उन्हें कभी नहीं रहा. संभ्रांत और संस्कारित रावत परिवार का वैभव रामकेश ने देखा तो इस रामनगरी में एक और रावण आकार लेने लगा.

पैसों की तंगी तो रामकेश को भी नहीं थी लेकिन रावत परिवार की दौलत देख उसके दिल में खयाल आया था कि अगर श्रेयांश और प्रियांश को अगुवा कर लिया जाए तो फिरौती में इतनी रकम तो मिल ही जाएगी कि फिर जिंदगी ऐशोआराम से कटेगी.

पाप का पौधा कितनी जल्दी वृक्ष बन जाता है, यह इस हत्याकांड से भी उजागर होता है. रामकेश ने जब यह आइडिया पदम से साझा किया तो उस की बांछें खिल उठीं.

फिर क्या था देखते ही देखते योजना बन गई और उस का पूर्वाभ्यास भी होने लगा. अपनी नापाक मुहिम को सहूलियत से पूरा करने के लिए इन दोनों ने अपने जैसे 4 और राक्षसों को साथ मिला लिया.

रातों रात मालामाल हो जाने के लालच के चलते इस नवगठित गिरोह में बहलपुर का रहने वाला विक्रमजीत, हमीरपुर का अपूर्व उर्फ पिंटू उर्फ पिंटा यादव, बांदा का लक्की सिंह तोमर और राजू द्विवेदी भी शामिल हो गए.

22 से 24 साल की उम्र के ये सभी अपराधी अभी पढ़ रहे थे. पदम आईटी सब्जेक्ट से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. लकी तोमर उस का सहपाठी था. राजू द्विवेदी एग्रीकल्चर फैकल्टी के एग्रोनामी विषय से एमएससी कर रहा था और पिंटू यादव उस का सहपाठी था. ये पांचों ग्रामोदय विश्वविद्यालय के छात्र थे.

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जब गिरोह बन गया तो इन शातिरों ने अपहरण की योजना बनाई. इस बाबत इन के बीच दरजनों मीटिंगें हुईं जिन में संभावित खतरों पर विचार कर उन से बचने के उपाय खोजे गए. पदम का घर घटनास्थल से पैदल दूरी पर है, वह उस इलाके के चप्पेचप्पे से वाकिफ था.

12 फरवरी को श्रेयांश और प्रियांश का अपहरण करने के बाद ये लोग कहीं ज्यादा दूर नहीं भागे थे, जैसा कि हर कोई अंदाजा लगा रहा था. बबुली कौल गिरोह का नाम भी इन्होंने जानबूझ कर अपहरण के वक्त लिया था जिस के चलते पुलिस ने मान लिया था कि हो न हो इस कांड में इसी गिरोह का हाथ है.

श्रेयांश और प्रियांश को इन्होंने 3 दिन चित्रकूट के ही एक मकान में रखा जो लक्की सिंह से किराए पर लिया गया था. आमतौर पर ऐसे हादसों में होता यह है कि अपराधी घटनास्थल से दूर जा कर फिरौती मांगते हैं, जिस से किसी की भी, खासतौर से पुलिस की निगाह में न आएं. जिस मकान में दोनों मासूमों को रखा गया था वह एसपीएस के नजदीक ही है. इस चालाकी की तरफ पुलिस का ध्यान ही नहीं गया.

जिस बाइक से अपहरण किया गया था उस पर कोई नंबर प्लेट नहीं थी, बल्कि नंबर प्लेट पर रामराज्य लिखा हुआ था. बाइक पर भाजपा का झंडा लगा होने के कारण पुलिस वाले उसे रोकने की हिमाकत नहीं कर पाए थे.

चूंकि पदम का भाई बजरंग दल का संयोजक था, इसलिए पुलिस वालों ने रामराज्य को ही बाइक का नंबर मान लिया था. चित्रकूट और बांदा का हर एक पुलिसकर्मी पदम के भाई विष्णुकांत और उस की बाइक तक को पहचानता है, जिस के छोटे बड़े भाजपा नेताओं से अच्छे संबंध हैं. कई बड़े नेताओं के साथ खिंचाए फोटो उस ने फेसबुक पर श्ेयर भी कर रखे हैं.

वारदात के तीसरे दिन ही इन्होंने ब्रजेश रावत से फिरौती के 2 करोड़ रुपए मांगे थे लेकिन सौदा 20 लाख रुपए में पट गया था जो ब्रजेश रावत ने इन्हें दे भी दिए थे. जब चित्रकूट में बच्चों को रखना इन्हें जोखिम का काम लगने लगा तो उन्हें वे रोहित द्विवेदी गांव बबेरू ले गए. उस ने ही श्रेयांस और प्रियांश के यहां रहने का इंतजाम किया था. रोहित का पिता ब्रह्मदत्त द्विवेदी सिक्योरिटी गार्ड है.

सौदा तय हो जाने के बाद ब्रजेश रावत को उम्मीद थी कि आरोपी बच्चों को छोड़ देंगे. इधर चित्रकूट सतना और बांदा सहित पूरे मध्य प्रदेश में लोग सड़कों पर आ कर पुलिसिया लापरवाही के खिलाफ धरने प्रदर्शन दे रहे थे, जिस से कुछ और हुआ न हुआ हो लेकिन

इन छहों पर बाहरी दबाव बनने लगा था.

20 लाख रुपए देने से ब्रजेश रावत को इकलौता सुकून इस बात का मिला था कि आरोपियों ने 19 फरवरी को उन से फोन पर बच्चों की बात करा दी थी. बेटों की आवाज सुन कर उन्हें आस बंधी थी कि वे सलामत हैं और आरोपी अगर वादे पर खरे उतरे तो बेटे जल्द घर होंगे और उन की किलकारियों से घर फिर गूंजेगा.

आरोपियों ने बच्चों के साथ कोई खास बुरा बर्ताव नहीं किया था लेकिन उन्हें सुलाने के लिए जरूर नींद की गोलियां खिलाई थीं. बच्चों को व्यस्त रखने के लिए वे उन्हें मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने देते थे. अब तक सब कुछ उन की योजना के मुताबिक हो रहा था और इन्होंने फिरौती में मिले 20 लाख रुपयों का बंटवारा भी कर लिया था, जिस का सब से बड़ा हिस्सा पदम शुक्ला को मिला था. एक आरोपी ने तो पैसे मिलते ही बाइक लेने का अपना सपना भी पूरा कर लिया था.

पुलिस अभी भी हवा में हाथपैर मार रही थी. इस मामले की एक हैरत वाली बात यह थी कि ब्रजेश शुक्ला का सेल फोन सर्विलांस पर रखा था लेकिन आरोपियों की पहचान उन के पास आ रहे फोन काल्स से नहीं हो पा रही थी. फिरौती के पैसे भी ब्रजेश रावत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के जरिए दिए थे, जिस की भनक मध्य प्रदेश पुलिस को नहीं लगी थी.

नवगठित इस गैंग के सदस्य कितने शातिर थे इस का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि रामकेश पहले की तरह ही रावत परिवार के दूसरे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए जाता रहा था.

इसी बहाने वह घर के सदस्यों से प्रियांश और श्रेयांश के बारे में पूछ कर ताजा अपडेट हासिल कर लेता था और साथियों को बता देता था. उस की हकीकत से बेखबर रावत परिवार उस की खातिरदारी पहले की तरह करता रहा था.

होहल्ले के चलते इन छहों को अब पकड़े जाने का डर सताने लगा था और ब्रजेश रावत की जेब से और पैसा निकालने की उम्मीदें भी खत्म हो चली थीं. इसलिए इन्होंने शायद बच्चों को छोड़ने का फैसला कर लिया था.

जब फैसला हो गया तो बच्चों को छोड़ने का मन बना चुके आरोपियों को यह खटका लगा कि कहीं ऐसा न हो कि बच्चे जा कर उन की पहचान उजागर कर दें. इन लोगों ने अब तक जिस जुर्म को छिपा रखा था, बच्चों के छोड़ने पर वह खुल सकता था. इसलिए दोनों के कत्ल का इरादा बन गया.

लेकिन इस से पहले मन में आ गए डर को दूर करने की गरज से इन लोगों ने श्रेयांश और प्रियांश से पूछा कि छूट कर वे पुलिस को उन की पहचान यानी नाम वगैरह तो नहीं बता देंगे.

मासूमियत की यह इंतहा ही थी कि दोनों बच्चों ने ईमानदारी से जवाब दे दिया कि वे उन्हें  पहचान लेंगे. यह जवाब सुनना था कि हथकडि़यां इन की आंखों के आगे झूलती नजर आने लगीं. जिस से अब तक के किए धरे पर तो पानी फिरता ही साथ ही हाथ आए 20 लाख रुपयों का लुत्फ भी जाता रहता.

अपना जुर्म छिपाने के लिए इन्होंने दोनों मासूमों के हाथपैर जंजीर से बांधे, फिर उन्हें क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश किया. इस के बाद पत्थर बांध कर उन्हें यमुना नदी के उगासी घाट पर पानी में फेंक दिया. यह 21 फरवरी की बात है.

साथ पैदा हुए साथ पले बढ़े और पढ़ेलिखे जुड़वां श्रेयांश और प्रियांश की लाशें भी साथसाथ 3 दिन पानी में तैरती रहीं और वे मरे भी साथ में. दोनों के शरीर पर वही स्कूल यूनिफार्म थी जो उन्होंने 12 फरवरी को स्कूल जाते वक्त पहनी थी.

लाशें बरामद हुईं तो इन मासूमों की हत्या को ले कर ऐसा बवाल मचा कि पूरा बुंदेलखंड इलाका त्राहित्राहि कर उठा. राजनेताओं ने भी चित्रकूट में बहती मंदाकिनी नदी में खूब हाथ धोए. भाजपाई और कांग्रेसी बच्चों की मौतों पर अफसोस जताते एकदूसरे को कोसते रहे.

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को निशाने पर रखा तो कांग्रेसी भी यह कहने से नहीं चूके कि यह सब भाजपाइयों का कियाधरा है.

राजनीतिक बवंडर से परे यह हुआ था कि आईटी से इंजीनियरिंग कर रहे 2 आरोपी बेहतर समझ रहे थे कि अगर वे अपने सेल फोन से ब्रजेश रावत से बात करेंगे तो फौरन धर लिए जाएंगे, इसलिए वे फोन काल के लिए या तो इंटरनेट का सहारा ले रहे थे या फिर बहाने बना कर राहगीरों का फोन इस्तेमाल कर रहे थे जिस से पता नहीं चल रहा था कि अपराधी हैं कौन और कहां से फोन कर रहे हैं.

कहावत पुरानी लेकिन सटीक है कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों हो कोई न कोई भूल कर ही देता है ऐसा ही इस मामले में हुआ.

एक राहगीर से फोन मांग कर उन्होंने ब्रजेश रावत को फोन किया था तो उस राहगीर को बातचीत का मसौदा सुन इन पर शक हुआ था. हर किसी की तरह उसे भी श्रेयांश और प्रियांश के अपहरण के बारे में मालूम था.

ये लोग जिस का भी फोन लेते थे उसे यह कहना नहीं भूलते थे कि जिस नंबर पर फोन किया है उसे डिलीट कर देना. लेकिन इस समझदार और भले आदमी ने ऐसा नहीं किया और चुपचाप बिना इन की जानकारी के उन की बाइक का फोटो भी खींच लिया.

तब पुलिस ने इस राहगीर के नंबर पर फोन किया तो उस ने बाइक के फोटो पुलिस को दे दिए. इस बाइक के नंबर की बिना पर छानबीन की गई तो वह रोहित द्विवेदी की निकली. पुलिस ने उस की गरदन दबोच कर सख्ती की तो उस ने श्रेयांश और प्रियांश की हत्या का राज खोल दिया और पुलिस ने एक के बाद एक छहों हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया.

हत्यारों की गिरफ्तारी की खबर भी आग की तरह फैली और लोगों ने चित्रकूट में बेकाबू हो कर सदगुरु ट्रस्ट पर पत्थर फेंके, वाहन जलाए, तोड़फोड़ की. इस के बाद पूरे मध्य प्रदेश में इन मासूमों को श्रद्धांजलियां दी गईं और हर किसी ने इन हैवानों के लिए मौत की सजा की मांग की.

श्रेयांश और प्रियांश के शवों का पोस्टमार्टम बांदा में किया गया, जिस के बाद दोनों के शव रावत परिवार को सौंप दिए गए.

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इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कई बातें स्पष्ट नहीं हुई थीं, जिन के कोई खास माने भी नहीं वजह आरोपी अपना जुर्म स्वीकार चुके हैं. पिस्टल, बाइक, 17 लाख रुपए के अलावा वह बोलेरो कार भी बरामद की जा चुकी है. जिस में इन दोनों को चित्रकूट से बाहर ले जाया गया था.

चूंकि इस पर भी भाजपा का झंडा लहरा रहा था इसलिए पुलिस वालों ने उसे नहीं रोका. ब्रजेश रावत लगातार शक जताते रहे कि पकड़े गए लड़के तो मोहरे थे असल अपराधी और कोई है इसलिए मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए. छानबीन में यह बात भी सामने आई थी कि आरोपियों के संबंध उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता राजा भैया से थे. सीबीआई जांच होगी या नहीं यह तो नहीं पता, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने जरूर एक जांच कमेटी गठित कर दी है जो कई बिंदुओं पर जांच कर रही है.

मुमकिन है कुछ हैरान कर देने वाली बातें सामने आएं, लेकिन यह सच है कि चित्रकूट में लाखों की भीड़ जमा रहती है, इसलिए यहां अपराधों की दर बढ़ रही है.

सच यह भी है कि निकम्मे और गुंडे किस्म के युवकों ने शार्टकट से पैसा कमाने के लिए एक हंसतेखेलते घर के जुड़वां चिराग बुझा दिए, जिस की भरपाई कोई जांच पूरी नहीं कर सकती.द्य

 

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