शोकसभा – भाग 2

लेखक- मनमोहन भाटिया  

सुभाष व सारिका को घबराया देख कर डौली बोली, ‘‘सारिका, इतनी दूर क्यों खड़ी हो, मेरे नजदीक आओ.’’

‘‘इन कुत्तों की वजह से थोड़ा डर…’’

डौली कुछ सकुचा कर बोली, ‘‘डरो मत, कुछ नहीं कहेंगे.’’

सारिका नजदीक गई और दोनों देवरानीजेठानी गले मिल कर रो पड़ीं.

सुभाष ने डौली के भाइयों से पूछा, ‘‘अचानक क्या हो गया, कोई खबर ही नहीं मिली. सब कैसे हुआ?’’

‘‘बस, क्या बताएं, समझ लीजिए कि समय आ गया था, हम से रुखसत लेने का. हम लोग भी कोई कारण नहीं जान पाए. जब समय आता है तो जाना ही पड़ता है.’’

यह उत्तर सुन कर सुभाष ने कुछ नहीं पूछा, लेकिन देवरानीजेठानी आपस में कुछ फुसफुसा रही थीं. तभी डौली के छोटे भाई का मोबाइल फोन बजा. वह किसी को कह रहा था, ‘‘देख, यह हमारी इज्जत का सवाल है. हर कीमत पर वह प्रौपर्टी चाहिए. जीजा मर गया उस के पीछे, मालूम है न तुझे या समझाना पड़ेगा. देख टिंडे, खोपड़ी में 6 के 6 उतार दूंगा.’’

फोन पर भाई की बातचीत सुनते ही डौली बाथरूम का बहाना बना कर दूसरे कमरे में चली गई और सुभाष, सारिका ने मौके की नजाकत समझ कर विदा ली. चुपचाप दोनों घर वापस आ गए. सुभाष ने टीवी चलाया, लेकिन मन कहीं और विचरण कर रहा था.

सुभाष ने सारिका से पूछा, ‘‘क्या बातें कर रही थीं देवरानीजेठानी?’’

‘‘बात क्या करनी थी, बस इतना ही पूछा था कि क्या हुआ था?’’

‘‘तू ने तो पूछ भी लिया, मेरी तो हिम्मत ही नहीं हुई,’’ सुभाष ने पानी का गिलास हाथ में पकड़ते हुए कहा, ‘‘सारिका, मुझे तो लगता है कि बिहारी किसी गैरकानूनी धंधे में लिप्त था तभी तो उस ने कुछ ही सालों में इतना कुछ कर लिया…और जिस तरह से फोन पर किसी को धमकाया जा रहा था उस से मेरे विश्वास को और बल मिला है…’’

पति की बात को काटते हुए सारिका ने कहा, ‘‘छोड़ो इन बातों को, पहले आप पानी पी लो. हाथोें में अभी भी गिलास थामा हुआ है.’’

पानी पी कर सुभाष ने बात आगे जारी रखते हुए कहा, ‘‘आखिर भाई था, जानने की उत्सुकता तो होती है कि आखिर उस के साथ हुआ क्या था.’’

‘‘जिस गली जाना नहीं वहां के बारे में क्या सोचना. भाई था, लेकिन 10 साल में उन्होंने एक भी दिन आप को याद किया क्या?’’ सारिका ने कुछ व्यंग्यात्मक मुद्रा में कहा, ‘‘छोड़ो इन बातों को, थोड़ा आराम कर लें. फिर दोपहर को उठावनी में भी जाना है.’’

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इतना कह कर सारिका किचन में चली गई और सुभाष का मन सोचने लगा कि क्या रिश्ते केवल रुपएपैसों तक ही सिमट कर रह गए हैं. बचपन का खेल क्या सिर्फ एक खेल ही था. शायद खेल ही था, जो अब समझ में आ रहा है. समझ में तो काफी साल पहले आ चुका था, लेकिन दिल मानता नहीं था.

‘‘खाना लग गया,’’ सारिका की आवाज सुन कर सुभाष हकीकत के धरातल पर आ गया. खाना खाते हुए उस ने कहा, ‘‘उठावनी में हमें बच्चों को भी ले चलना चाहिए.’’

‘‘क्यों?’’ सारिका ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं. शादियों मेें हमारे साथ जाते हैं, गमी में भी जाना उन्हें सीखना चाहिए. समाज के नियम हैं, आज नहीं तो कल कभी तो उन्हें भी गमी में शरीक होना पड़ेगा. जब परिवार में एक गमी का मौका है तो हमारे साथ चल कर कुछ नियम, कायदे सीख लेंगे.’’

‘‘हमारे जाने से पहले वे आ गए तो जरूर साथ चलेंगे.’’

दोनों बच्चे साक्षी और समीर कालेज से आ गए. सुभाष को देख कर बोले, ‘‘क्या पापा, आप घर में, तबीयत तो ठीक है न.’’

‘‘तबीयत ठीक है, तुम्हारे बिहारी ताऊ का देहांत हो गया है, आज दोपहर को उठावनी में जाना है, इसलिए आज आफिस नहीं जा सका. सुनो, खाना खा लो, फिर हम को उठावनी में जाना है.’’

‘‘क्या हमें भी?’’ दोनों बच्चे एक- साथ बोले.

‘‘हां, बेटे, आप दोनों भी चलो.’’

‘‘हम वहां क्या करेंगे?’’ साक्षी ने पूछा.

‘‘शादीविवाह में हमारे साथ चलते हो, अब बड़े हो गए हो, गमी में भी जाना सीखो.’’

सुभाष परिवार सहित समय से पहले ही शोकसभा स्थल पर पहुंच गए. सुबह की तरह सुरक्षा जांच के बाद हाल के अंदर गए, अंदर अभी कोई नहीं था, सुभाष का परिवार सब से पहले पहुंचा था. ‘कमाल है, घर वाले ही नदारद हैं, शोकसभा तो समय पर शुरू हो जाती है, कम से कम डौली और उस के भाइयों को तो यहां होना ही चाहिए था,’ सोचते हुए सुभाष अभी इधरउधर देख ही रहे थे कि तभी रमेश परिवारसहित पहुंचा. दोनों भाई गले मिले.

‘‘मेशी, तू तो बहुत मोटा हो गया है. लाला बन गया है. क्या तोंद बना रखी है,’’ सुभाष की बातें सुन कर समीर और साक्षी हैरान हो कर सारिका से पूछने लगे, ‘‘मां, ऐसे मौके पर भी मजाक चलता है क्या?’’

‘‘बस, तुम दोनों चुपचाप देखते रहो.’’

रमेश ने सुभाष को कोई उत्तर न दे कर, समीर, साक्षी को देख कर पूछा, ‘‘बच्चों से तो मिलवा यार, कितने सालों बाद मिल रहे हैं… बच्चे तो हमें पहचानते भी नहीं होंगे, बड़े स्वीट बच्चे हैं तेरे, भाषी, तू ने भी अपने को मेंटेन कर के रखा है, भाभीजी भी स्लिमट्रिम हैं, कुछ टिप्स बबीता को भी दो, इस की कमर तो नजर ही नहीं आती है,’’ पत्नी की तरफ इशारा कर के मेशी ने कहा. यह सुन कर सभी हंस पड़े तभी डौली, भाई और परिवार के दूसरे सदस्यों ने हाल में प्रवेश किया. हंसी रोक कर सभी ने हाथ जोड़ कर सांत्वना प्रकट की. डौली ने समीर व साक्षी को देख कर उन्हें गले लगा लिया.

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‘‘सारिका के बच्चे कितने स्वीट हैं. किसी की नजर न लगे मेरे इन क्यूट बच्चों को.’’

साक्षी परेशान हो कर सोचने लगी कि डौली आंटी कैसी औरत हैं, इन का पति मर गया और ये शोकसभा में क्यूटनेस देखने में लगी हैं.

तभी डौली के बड़े भाई ने कहा, ‘‘बहना, यह कुत्ते का बच्चा टिंडा कहां मर गया, गधे को पंडित लाने भेजा था, सूअर का फोन भी नहीं लग रहा है.’’

बैंक से कर्ज लेकर दी पत्नी को सुपारी- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

लड़कियां किसी मामले में लड़कों से कम नहीं होतीं. पत्नी की बातें सुन शंभू के दिल को थोड़ा सुकून मिलता था. फिर भी उसे कभीकभी अपने बुढ़ापे के सहारे की जरूरत महसूस होती थी.
शंभु की एक साली थी खुशबू. वह अपने जीजा शंभू के दिल की बात को शिद्दत से महसूस करती थी. कभीकभी वह उस की दुखती रग पर अपने प्यार का मरहम भी लगा देती थी.

दरअसल, खुशबू का ज्यादातर समय बहन की ससुराल में ही बीतता था. रूबी के छोटेछोटे बच्चे थे. बच्चे संभालने में उसे दिक्कत होती थी. हाथ बंटाने के लिए उस ने बहन को अपने पास ही रख लिया था. खुशबू के पास रहने से उसे काफी राहत मिलती थी.

खुशबू जवान और खूबसूरत थी, ऊपर से चंचल, सो अलग. उस की खूबसूरती में शंभू कब डूब गया था, उसे पता ही नहीं चला. उसे एहसास तब होता था, जब साली कभी अपने घर लोहानीपुर भिखना चली जाती थी.

जीजा और साली के बीच मजाक का रिश्ता होता है. मजाकमजाक में शंभू खुशबू से ऐसेऐसे मजाक करता था जो उसे नहीं करने चाहिए थे. जीजा की रसीली बातें सुन कर खुशबू शरम से गुलाबी हो जाती थी. फिर अपना चेहरा दोनों हथेलियों में छिपा कर दूसरे कमरे में भाग जाती और वहां खिलखिला कर हंसती थी. खुशबू की यही अदा शंभू को भा गई थी.

खुशबू जब कभी लोहानीपुर चली जाती थी तो शंभू को अपना घर खालीखाली लगता था. फिर वह जल्द ही उसे बुला लाता था.

शंभू साली खुशबू के प्यार में डूब चुका था, खुशबू भी उसे बहुत चाहती थी. साली और जीजा का प्यार पत्नी की नाक के नीचे परवान चढ़ रहा था. रूबी को इस की भनक तक नहीं थी. उसे क्या पता था उस की अपनी ही बहन उस के सिंदूर पर डाका डाल रही है.

एक दिन शंभू खुशबू को शाम के वक्त पार्क घुमाने ले गया. पार्क घुमाना तो एक बहाना था. शंभू के मन में कुछ और ही चल रहा था. उसे अपने मन की बात साली से शेयर करनी थी. दोनों घास पर बैठ गए. शंभु ने अपने हाथों में उस की हथेलियां लेते हुए कहा, ‘‘खुशबू, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’ शंभु ने सीधे कह दिया.

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‘‘ये कैसी बहकीबहकी बातें कर रहे हैं, जीजू. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. दुनिया हम पर थूकेगी कि एक बहन ने बहन के घर में डाका डाल दिया. फिर दीदी के जिंदा रहते यह कैसे संभव है?’’ खुशबू जीजा की बातें सुन कर थोड़ा सकपका गई.

उन दोनों के बीच घंटों तक इसी मुद्दे पर बातें होती रहीं, लेकिन खुशबू बहन की जगह लेने के लिए फिलहाल तैयार नहीं हुई. उस ने शंभु से थोड़ा सोचने की मोहलत मांगी.

जीजा और साली के बीच की यह नजदीकियां रूबी को खटकने लगी थीं. खुशबू के हावभाव से उसे उस पर शक हो गया था कि दोनों के बीच कोई खिचड़ी पक रही है. उस दिन के बाद से रूबी बहन और पति दोनों पर पैनी नजर रखने लगी. वह अब खुद भी पति के करीब ज्यादा रहने लगी थी. यह देख कर शंभू का माथा ठनका कि कहीं पत्नी को उस पर शक तो नहीं हो गया.

बाद में दोनों के बीच में खुशबू को ले कर विवाद भी होने लगा था. रूबी ने पति से साफसाफ कह दिया कि खुशबू अब यहां नहीं रहेगी. वह बहुत सेवा कर चुकी, उसे मांबाप के पास लोहानीपुर भिखना वापस जाना होगा.

पत्नी की जिद के आगे शंभु की एक नहीं चली. खुशबू को जाना पड़ा. इस से शंभू नाराज था. वह साली की जुदाई में तड़प रहा था. उस की नजरों के सामने साली का चेहरा घूमता रहता था. शंभू ने खुशबू को अपना बनाने की ठान ली थी. इस के बदले वह पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए तैयार था. इस खतरनाक योजना की उस ने खुशबू को भनक तक नहीं लगने दी.

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बात पिछले साल अक्तूबर की है. शंभू किसी काम से पटना से बाहर गया हुआ था. लौटते समय पटना स्टेशन पर उस की मुलाकात जयप्रकाश नगर में रहने वाले सुपारी किलर 25 वर्षीय ऋषि कुमार से हुई. शंभू ऋषि के नाम और काम दोनों से वाकिफ था. उस ने ऋषि को बताया कि उसे साली से प्रेम हो गया है. वह पत्नी रूबी का काम तमाम कराना चाहता है.

ऋषि काम करने को तैयार हो गया. इस के बदले उस ने शंभू से 3 लाख रुपए की डिमांड की. सौदा ढाई लाख रुपए में तय हो गया.

Serial Story : शोकसभा

शोकसभा – भाग 3

लेखक- मनमोहन भाटिया  

यह सुन कर सुभाष तो मुसकरा दिए. समीर व साक्षी एकदम सन्न रह गए कि मौके की नजाकत खुद मृतक की पत्नी व साले ही नहीं समझ रहे हैं. तभी डौली के छोटे भाई का मोबाइल फोन बजा. फोन उसी टिंडे नाम के आदमी का था, जिस को अभी भद्दी गालियां निकाली जा रही थीं.

‘‘अबे, कहां मर गया, टिंडे,’’ छोटे भाई ने अभी इतना ही कहा था कि बड़े भाई ने छोटे भाई के हाथ से मोबाइल खींच लिया और चीख कर कहा, ‘‘कुत्ते, यहीं से ट्रिगर दबा दूं…’’ लेकिन दूसरे ही पल वह टिंडे को बधाई देने लगा, ‘‘वेलडन टिंडा, तू जीनियस है, तेरा मुंह मोतियों से भर दूंगा, आज तू ने जीजाजी की शहादत बेकार नहीं जाने दी, वेलडन, टिंडा… अच्छा, पंडित…ठीक है, ठीक है,’’ फोन काट कर बड़ा भाई डौली के गले लग गया, ‘‘बहना, उस हवेली का काम हो गया, टिंडे ने हवेली खाली करवा ली है.’’

‘‘शाबाश भाई, टिंडे ने आज जिंदगी में पहली बार कोई अच्छा काम किया है. खोटे सिक्के ने तो कमाल कर दिया.’’

‘‘बहना,’’ छोटा भाई बोला, ‘‘अच्छा, बड़े, पंडित को कौन ला रहा है?’’

‘‘चिंता न कर, आलू पंडित ला रहा है, बस पहुंचता ही होगा.’’

तभी एक मोटा आदमी पंडित के साथ आया. समीर और साक्षी उस मोटे आदमी को देख कर सोचने लगे, यह मोटा आदमी ही ‘आलू’ होगा.

पंडित के आने पर शोकसभा शुरू हो गई, रिवाज के अनुसार सभास्थल 2 भागों में बंट गया, पुरुष एक ओर व महिलाएं दूसरी ओर बैठ गईं. जो डौली अभी तक स्वीटनेस, क्यूटनेस ढूंढ़ रही थीं, वही दहाड़ें मार कर रो रही थीं, यह क्या मात्र दिखावा. पति मर गया, पत्नी को कोई अफसोस नहीं. सिर्फ बिरादरी के आगे झूठे आंसू.

1 घंटे तक पंडित की कथा चली, लेकिन समीर, साक्षी केवल डौली आंटी और उन के भाइयों के आचरण को ही देखते रहे. पंडित ने क्या कथा की, उन को कुछ नहीं सुनाई दी. सुभाष का मन भी उचाट था. वह भी बिहारी के बारे में सोचते रहे कि उस की मृत्यु सामान्य थी या कुछ और. खैर, 1 घंटे बाद शोकसभा समाप्त हुई. बिरादरी रुखसत होने लगी. सुभाष सभास्थल के बाहर आ गए, वहां कुछ पुराने परिचित वर्षों बाद मिले तो थोड़ीबहुत जानकारी बिहारी के बारे में मिलती रही कि बिहारी कई गैरकानूनी धंधों में लिप्त था, 2 बार जेल की हवा भी खा चुका था, जहां उस की मुलाकात शातिर अपराधियों से हुई और एक पुरानी हवेली पर कब्जे के कारण विरोधियों ने खाने में जहर दे दिया, जिसे फूड पौइजनिंग का नाम दे कर बिरादरी से छिपाया गया. उसी हवेली पर कब्जे का समाचार किसी टिंडे ने दिया था, जो सुभाष ने सुना था.

इधर सुभाष पुरुषों के बीच में और उधर सारिका महिलाओं में व्यस्त थी, जहां गहनों, डिजाइनों की बातें चल रही थीं. शोक प्रकट कर दिया तो दुनियादारी की बातों का सिलसिला चल रहा था.

‘‘सारिका, तू ने तो अपने को मेंटेन कर के रखा है, उम्र का पता ही नहीं चलता है. तेरे साथ तेरी लड़की को देख कर लगता है, हमारी देवरानी हमारी उम्र की है,’’ बबीता ने साक्षी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘शादी कब कर रही है.’’

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शादी के नाम पर साक्षी एकदम चौंक गई. ताऊजी की शोकसभा पर शादी के रिश्तों की बात कर रही है. लोग क्या कुछ पल भी चुप नहीं रह सकते, वही राग, लेकिन सारिका धीरे से मुसकरा कर बोली, ‘‘दीदी, अभी उम्र ही क्या है, फर्स्ट ईयर में पढ़ रही है, पहले पढ़ाई करे, फिर नौकरी, फिर शादी की सोचेंगे, अभी कोई जल्दी नहीं है.’’

‘‘पढ़ने से कौन रोक रहा है. अच्छा रिश्ता आए तो आंख बंद कर के हां कर देनी चाहिए, बाद में उम्र ज्यादा हो जाए तो अच्छे लड़के नहीं मिलते. मेरे भाई का लड़का एकदम तैयार है, अब तो आफिस जाना शुरू कर दिया है. हमारे से भी ज्यादा काम है उस का. कहे तो बात चलाऊं.’’

‘‘कौन से भाई का लड़का, बड़े या छोटे का?’’ सारिका पूछ बैठी.

साक्षी मन ही मन जलभुन गई पर कुछ बोली नहीं.

‘‘बड़े वाले का बड़ा लड़का. बचपन में जिसे गोलू कहते थे. याद होगा,’’ बबीता बोली.

‘‘अरे, हां, याद आया, गोलू जैसा नाम था वैसा फुटबाल की तरह गोल था…’’

सारिका की बात बीच में ही काटते हुए बबीता ने कहा, ‘‘अब तो जिम जा कर हैंडसम बन गया है, मिलेगी तो गश खा जाएगी.’’

‘‘अभी नहीं दीदी, पहले पढ़ाई पूरी कर ले फिर. अभी सुभाष को कोई जल्दी नहीं है. आजकल लड़कियां जौब भी करती हैं, पढ़ाई बहुत जरूरी है.’’

इतने में रमेश कुछ और रिश्तेदारों के साथ आया, ‘‘भाभीजी, आज हम कितने सालों बाद मिले हैं, भाषी कहां है? अरे, वहां कोने में खड़ा है, भाषी, इधर आ,’’ रमेश की आवाज सुन कर समीर और साक्षी सोचने लगे कि पापा ने एक अलग दुनिया दिखाई है, जिस की कभी कल्पना भी नहीं की थी.

‘‘यार भाषी, देख, आज सभी भाई, भाभी बच्चों सहित जमा हैं, एक यादगार अकसर है, हमसब की एकसाथ फोटो हो जाए,’’ कह कर रमेश ने अपने बेटे को आवाज लगाई, ‘‘जिम्मी, निकाल अपना नया मोबाइल और खींच फोटो. मोबाइल भी क्या चीज निकाली है, छोटा सा मोबाइल और दुनिया भर के फीचर्स.’’

जिम्मी फोटो के साथ वीडियो भी बनाने लगा. सभागार के बाहर शोक का कोई माहौल नहीं था, एक पिकनिक सा माहौल था. कुछ देर बाद सब ने विदा ली.

घर आ कर सुभाष टैलीविजन पर एक न्यूज चैनल देख रहे थे. समीर ने कहा, ‘‘पापा, यह अनुभव जिंदगी भर नहीं भुला पाऊंगा.’’

‘‘बेटे, मृत्यु जीवन का कटु सत्य है. किसी के जाने से संसार का कोई काम नहीं रुकता, हर तरह के लोग दुनिया में तुम्हें मिलेंगे, आज तुम ने देखा कि पत्नी को पति की मृत्यु का कोई दुख नहीं था. शोकसभा एक पार्टी लग रही थी, कहीं ऐसा भी देखोगे कि पत्नी पति की मृत्यु पर टूट जाती है, जितने लोगों के व्यवहार का विश्लेषण करोगे, उतनी ही दुनिया की गहराई को जान पाओगे.

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‘‘हर इनसान अपनी सुविधा के अनुसार जीने का मापदंड स्थापित करता है, अपने लिए कुछ और दूसरों के लिए कुछ और. बेटे, मैं आज तक दुनियादारी नहीं पहचान सका. यह एक विस्तृत विषय है, इसे समझने के लिए पूरा जीवन भी कम है. किताबों से बाहर निकल कर कुछ व्यावहारिक ज्ञान मिले, इसी उद्देश्य से तुम्हें वहां ले कर गए थे. कालेज के बाद असली जिंदगी शुरू होती है, जो रहस्यों से भरपूर है. मुझे लगता है कि बड़े से बड़ा ज्ञानी भी इन रहस्यों को नहीं जान पाया है, हां, अपनी एक परिभाषा वह जरूर दे जाता है.’’

आखिर कैसे होता है स्किन कैंसर, पहचानें लक्षण

धूप में ज्यादा रहने से या ज्यादा वक्त तक रेडियोएक्टिव तरंगों के संपर्क में रहने से स्किन कैंसर का खरता रहता है. दुनियाभर में स्किन कैंसर की शिकायतें बढ़ रही हैं और आने वाले समय में ये लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है. बढ़ते समय के साथ इसके नए नए प्रकार भी सामने आ रहे हैं.

क्या हैं संकेत

कैंसर का कोई भी प्राकर हो उसके संकेत आपको काफी पहले से दिखने लगेंगे. इसका सबसे पहले आपको अपने चेहरे, कान, गर्दन, होंठ व हाथों की त्वचा पर असर नजर आएंगे. इस खबर में हम आपको स्किन कैंसर के संकेतों के बारे में आपको बताएंगें जो कैंसर होने से ठीक पहले आपके शरीर पर होते हैं.

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  • शरीर पर लाल निशान

स्किन कैंसर का सबसे पहला संकेत है शरीर पर लाल निशानों का होना. ऐसा होने पर आप तुरंत किसी डाक्टर से संपर्क करें. ये निशान आपके सिर, गर्दन और हाथ पर होते हैं.

  • एग्जिमा

एग्जिमा एक तरह की त्वचा संबंधी बीमारी है. आम भाषा में इसे खाज भी कहते हैं. समान्य तौर पर ये समस्या कोहनी, हथेली या पैरों पर होती है. एग्जिमा होते ही आप स्किन स्पेशेलिस्ट से जांच कराएं.

  • ज्यादा मस्सों का होना

अगर आपके शरीर पर मस्सों की संख्या बढ़ने लगे तोसचेत हो जाइए. स्किन कैंसर वाले मस्सों में त्वचा से खून निकलने की शिकायतें भी होती हैं. अगर आपकी त्वचा पर मौजूद मस्से का आकार पांच या छह मिलीमीटर से अधिक है तो ये स्किन कैंसर का संकेत है.

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  • होठों पर बनने लगें निशान

होठों के सूखे पड़ने पर उसमें दरार का दिखना, इसके साथ ही उसपर पापड़ी वाले चकत्ते दिखने लगें तो ये कैंसर के संकेत हैं. आप तुरंत डाक्टर से संपर्क करें.

  • मस्सों का रंग

अगर आपको काल, नीला, सफेद या लाल रंग का मस्सा हो रहा हो तो ये आपके लिए खतरे की घंटी है. आपको तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए. वहीं भूरे या गुलाबी मस्से का होना एक समान्य बात है.

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शोकसभा – भाग 1

लेखक- मनमोहन भाटिया  

महानगरों की जिंदगी पूरी तरह बदल गई है. हर इनसान अपने में ही व्यस्त है. कुसूर किसी का भी नहीं है, वक्त की कमी सभी को है और हर कोई दूसरे से न मिलने की शिकायत करता है. लेकिन व्यक्ति क्या खुद अपने गिरेबान में झांक कर स्वयं को देखता है कि वह खुद जो शिकायत कर रहा है, स्वयं कितना समय दूसरों के लिए निकाल पाता है.

सुबह आफिस जाने के लिए सुभाष तैयार हो कर नाश्ते की मेज पर बैठे समाचारपत्र की सुर्खियों पर नजर डाल रहे थे कि तभी फोन की घंटी बजी. फोन उठा कर उन्होंने जैसे ही हैलो कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘क्या भाषी है?’’

एक अरसे के बाद भाषी शब्द सुन कर उन्हें अच्छा लगा और सोचने लगे कि कौन है भाषी कहने वाला, नजदीकी रिश्तेदार ही उन्हें भाषी कहते थे. तभी दूसरी तरफ की आवाज ने उन की सोच को तोड़ा, ‘‘क्या भाषी है?’’

‘‘हां, मैं भाषी बोल रहा हूं, आप कौन, मैं आवाज पहचान नहीं सका,’’ सुभाष ने प्रश्न किया.

‘‘भाषी, तू ने मुझे नहीं पहचाना, क्या बात करता है, मैं मेशी.’’

‘‘अरे, मेशी, कितने सालों बाद तेरी आवाज सुनाई दी है, कहां है तू. तेरी तो आवाज बिलकुल बदल गई है.’’

‘‘थोड़ा सा जुकाम हो रहा है पर यह बता, तू कहां है, कभी नजर ही नहीं आता.’’

‘‘मेशी, तेरे से मिले तो एक जमाना हो गया. क्या कर रहा है?’’

‘‘तेरे से यह उम्मीद न थी, भाषी. तू तो एकदम बेगाना हो गया है. मैं ने सोचा, कहीं तू विदेश तो नहीं चला गया, लेकिन शुक्र है कि तू बदल गया पर तेरा टैलीफोन नंबर नहीं बदला है.’’

‘‘क्या बात है मेशी, सालों बाद बात हो रही है और तू जलीकटी सुना रहा है.’’

‘‘भाषी, तू हरी के अंतिम संस्कार पर भी नहीं पहुंचा, आज उस की उठावनी है, इसलिए फोन कर रहा हूं, शाम को 3 से 4 बजे का समय है.’’

‘‘क्या बात करता है, हरी का देहांत हो गया. कब, कैसे हुआ, मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं.’’

‘‘4 दिन हो गए हैं. आज तो उस की शोकसभा है. आना जरूर.’’

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‘‘कहां आऊं, पता तो बता…आज 10 साल बाद हमारे बीच बात हो रही है. न पता बता कर राजी है, न पहले बताया. बस, गिलेशिकवे कर रहा है,’’ भाषी ने तीखे शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की.

मेशी ने उठावनी कहां होनी है, उस का पता बताया.

सुभाष की पत्नी सारिका रसोई में थी, टिफिन हाथ में ला कर बोली, ‘‘यह लो अपना लंच… नाश्ता यहीं ले कर आऊं या डाइनिंग टेबल पर लगाऊं.’’

‘‘टिफिन से खाना निकाल लो, आज आफिस नहीं जा रहा हूं.’’

‘‘क्यों? तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हां, मेशी का फोन आया था. अभी उसी से बात कर रहा था. हरी का देहांत हो गया है, वहां जाना है.’’

‘‘क्या?’’ सारिका ने हैरानी से पूछा.

‘‘आज शाम को हरी की उठावनी है.’’

‘‘4 दिन हो गए और हमें पता ही नहीं. किसी ने बताया ही नहीं,’’ इस से पहले सारिका कुछ और कहती सुभाष ने कहा, ‘‘रहने दे, हम क्यों अपना दिमाग और समय खराब करें. जब पता चल ही गया है तो हम अभी हरी के घर चलते हैं और शाम को उठावनी में भी चलेेंगे.’’

‘‘ठीक है, मैं भी तैयार हो जाती हूं, फिर साथ चलते हैं.’’

सारिका तैयार होने चली गई तो सुभाष अतीत में गुम हो गया. हरी, भाषी और मेशी तो उन के घर के नाम थे. तीनों ताऊ, चाचा के लड़के थे. बचपन में सब के मकान एकसाथ थे. तीनों की उम्र में 1-2 साल का ही अंतर था. एकसाथ स्कूल जाना, पढ़ना, खेलना. तीनों भाई ही नहीं दोस्त भी थे.

हरी यानी बिहारी, मेशी यानी रमेश और भाषी यानी सुभाष. तीनों बड़े हो गए लेकिन बचपन के उन के नाम नहीं गए. बाहरी दुनिया के लिए वे भले ही बिहारी, रमेश, सुभाष हों, लेकिन एकदूसरे के लिए हरी, मेशी और भाषी ही थे.

कालेज की पढ़ाई के बाद हरी ताऊजी की दुकान पर बैठ गया. रमेश चाचाजी की दुकान पर और सुभाष ने नौकरी कर ली, क्योंकि उस के पिताजी का व्यापार नुकसान की वजह से बंद हो चुका था और बहनों की शादी के खर्च के बाद मकान भी बिक गया. सुभाष मांबाप के साथ किराए के मकान में रहने लगा तो वे दूर हो गए फिर भी आपसी नजदीकियां और मेलजोल पहले जैसा ही रहा.

सुभाष की शादी सब से पहले हुई, फिर रमेश की और सब से बाद में बिहारी की. जहां सुभाष की पत्नी सारिका गरीब परिवार की थी वहीं रमेश और बिहारी की शादियां बड़े व्यापारियों की बेटियों के साथ बहुत धूमधाम से हुईं. अमीर घर की बेटियां सारिका से दूरी ही बनाए रखती थीं, लेकिन घर के बुजुर्गों के रहते कुछ बोल नहीं पाती थीं.

समय बीतता गया. घर के बुजुर्गों के गुजर जाने के बाद रमेश और बिहारी की पत्नियां सेठानी की पदवी पा गईं, उन के सामने सारिका का कोई पद नहीं था, नतीजतन, सुभाष और सारिका का बचपन के लंगोटिया मेशी, हरी का साथ छूट गया.

एक शहर में रहते हुए भी वे अनजाने हो गए. आज के भौतिकवाद में हैसियत सिर्फ रुपएपैसों से तौली जाती है. सुभाष सोचने लगा, शायद 15 साल बीत गए होंगे, मेशी और हरी से मिले हुए. शायद नातेरिश्ते भी सिर्फ पैसा ही देखते हैं. एक छोटी सी नौकरी करते हुए सुभाष बिहारी और रमेश के नजदीक न आ सका. तभी सारिका की आवाज ने सुभाष को अतीत से वर्तमान में ला दिया.

‘‘कब चलना है, मैं तैयार हूं.’’

सुभाष व सारिका बाइक पर बैठ बिहारी (हरी) के मकान की ओर चल पड़े. सुभाष ने रमेश से बिहारी के नए मकान का पता ले लिया था. सुभाष और सारिका जब बिहारी की कोठी के सामने पहुंचे तो उस की भव्यता देख कर हैरान हो गए और उस के सामने उन्हें अपने 2 कमरे के फ्लैट का कोई वजूद ही नजर नहीं आ रहा था. वे हिम्मत कर के अंदर जाने लगे तो बड़े से भव्य गेट पर गार्ड ने उन्हें रोक लिया और विजिटर रजिस्टर पर नामपता लिखवाया फिर इंटरकौम पर पूछ कर इजाजत ली, तब कहीं अंदर जाने दिया.

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अंदर कुछ लोग पहले से बैठे थे जिन्हें सुभाष नहीं जानते थे. उन्हें कोई रिश्तेदार नजर नहीं आया. काफी देर तक वे बैठे रहे. जो लोग मिलने आ रहे थे, उन के डिजिटल कैमरे से फोटो खींच कर एक लड़का अंदर जाता और फिर मिलने की इजाजत ले कर बरामदे में आता और अपने साथ अंदर छोड़ कर आता.

सुभाष ने बैठेबैठे नोट किया कि उस लड़के के पास रिवाल्वर था. अपने भाई के देहांत पर अफसोस करने आए मगर अफसोस का यह सिस्टम उन की समझ से बाहर था कि क्यों आगंतुकों को एकएक कर के अफसोस जाहिर करने के लिए अंदर भेजा जा रहा है. आखिर 1 घंटे बाद सुभाष को अंदर भेजा गया. एक आलीशान कमरे में उस की भाभी डौली सोफे पर अपने 2 भाइयों के साथ बैठी थी. सोफे के दोनों कोनों पर 2 खूंखार विदेशी नस्ल के कुत्तों को देख कर सुभाष और सारिका ठिठक गए और दूर से ही हाथ जोड़ कर सिर झुका कर अफसोस जाहिर किया.

बैंक से कर्ज लेकर दी पत्नी को सुपारी- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

9जुलाई, 2020 को शंभू रजक पत्नी रूबी को ससुराल से विदा करा कर लाया था और अपने गांव
झाईंचक लौट रहा था. दोनों बाइक पर थे. समय रहा होगा सुबह के 9 बजे का.

नैशनल हाइवे की चौड़ी और शानदार सड़क होने के बावजूद शंभू की बाइक की स्पीड 35-40 किमी प्रति घंटे की थी. वजह यह कि उस की पत्नी रूबी 4 माह के गर्भ से थी. रूबी तीसरी बार गर्भवती हुई थी. पहले भी उस की 2 बेटियां थीं.

शंभू लोहानीपुर भिवानी मोड़ से कुछ आगे निकल कर जगनपुरा मोड़ पर पहुंचा तो उस ने बाइक सड़क किनारे रोक दी. कुछ देर रुक कर वह बाइक ले कर चल दिया. जब वह थोड़ा आगे ब्रह्मपुर मोड़ पहुंचा, तो उस ने देखा मोड़ पर 2 युवक नीले रंग की बाइक लिए सड़क किनारे खड़े थे और आपस में बातचीत कर रहे थे. शंभु बाइक चलाते हुए आगे बढ़ गया. तभी वे दोनों पीछे से आए और शंभु को ओवरटेक कर के उस की बाइक से अपनी बाइक लगभग सटा कर चलने लगे.

शंभू बाइक से गिरतेगिरते बचा. युवकों की इस हरकत पर उसे गुस्सा आ गया. रूबी को बाइक से नीचे उतार कर वह उन दोनों से भिड़ गया. रूबी पति को मना कर रही थी कि जो हो गया, हो गया, अब बस भी करो, घर चलो, बदतमीजों के मुंह क्यों लगते हो, लेकिन शंभू ने पत्नी की एक न सुनी

आव देखा न ताव, वह युवकों से 2-2 हाथ करने के लिए उतावला हो गया. देखतेदेखते तीनों के बीच विवाद गहरा गया. तभी उन में से एक युवक ने अंटी में रखी देशी पिस्टल निकाली और शंभू पर गोली चला दी.

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गोली चलते ही जान बचाने के लिए शंभू नीचे झुक गया. गोली उस के पीछे खड़ी पत्नी रूबी के सिर में जा धंसी और वह सड़क पर गिर कर छटपटाने लगी. तब तक दोनों युवक मौके से फरार हो गए. सड़क पर गिरी रूबी की मौत हो गई.

शंभू पत्नी की लाश के पास बिलखबिलख कर रो रहा था. उसे रोता देख कर कुछ राहगीर रुक गए. उन्हें बातोंबातों में पता चला कि रोने वाले की पत्नी की 2 लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी और मौके से फरार हो गए.

धीरेधीरे तमाशबीनों की भारी भीड़ जमा हो गई थी. उसी भीड़ में से किसी ने पुलिस कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. वह इलाका गोपालपुर थाने में आता था.

हत्या की सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ थानाप्रभारी आलोक कुमार घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के कुछ देर बाद एसपी सिटी (पूर्वी) जितेंद्र कुमार भी वहां आ गए. पुलिस ने घटनास्थल की जांच की. मौके से पुलिस को कारतूस का एक खोखा मिला. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया.
एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार ने पीडि़त शंभू रजक से बदमाशों का हुलिया पूछा. उस ने बताया कि दोनों की उम्र 25 से 35 वर्ष के बीच रही होगी. वे नीले रंग की बाइक पर थे.

पूछताछ में शंभू ने पुलिस को यह भी बताया कि हत्यारों ने उस का पीछा 4 किलोमीटर पहले से करना शुरू किया था. पत्नी 4 माह की गर्भवती थी, इसलिए वह धीरेधीरे बाइक चला रहा था.

शंभू से घटना के संबंध में अहम जानकारी ले कर पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज, पटना भिजवा दिया. शंभू रजक की तहरीर पर पुलिस ने 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. उस के बाद पुलिस बदमाशों की सुरागरसी में जुट गई.

शंभू ने पुलिस को बताया था कि दोनों बाइक सवार 4 किलोमीटर से उस का पीछा कर रहे थे. पुलिस ने घटनास्थल से 4 किलोमीटर पहले तक बदमाशों की पहचान के लिए सभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले. आश्चर्य की बात यह थी कि सीसीटीवी फुटेज में कोई भी पीछा करता नजर नहीं आया.

यह देख कर जांच अधिकारी हैरान थे कि शंभु ने झूठ क्यों बोला. पुलिस को लगा कि कहीं न कहीं मामला संदिग्ध है और शंभू की भूमिका भी संदिग्ध है.

विवेचनाधिकारी आलोक कुमार ने इस की जानकारी एसएसपी उपेंद्र शर्मा और एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार को दी. यह सुन कर वे भी चौंके. दोनों पुलिस अधिकारियों ने आलोक कुमार से कहा कि शंभू को थाने बुला कर उस से गहन पूछताछ करो.

तब 11 जुलाई को थानाप्रभारी आलोक कुमार ने शंभू को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. फिर उस से 4 घंटे तक गहन पूछताछ की.

आखिरकार शंभू ने पुलिस के सवालों के आगे घुटने टेक दिए. उस ने अपना जुर्म कबूल करते हुआ कहा कि उसी ने ढाई लाख की सुपारी दे कर अपनी गर्भवती पत्नी की हत्या कराई थी.

उस ने बताया कि वह पत्नी से एक वारिस यानी बेटे की आस लगाए था. वह बेटे की बजाए बेटियां पैदा किए जा रही थी, इसलिए वह साली से शादी करना चाहता था. पत्नी उस की राह में रोड़ा बन गई थी. इसलिए उस ने उसे रास्ते से हटा दिया.

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शंभू की बात सुन कर सभी दंग रह गए. पूछताछ करने पर शंभू ने सिलसिलेवार पूरी कहानी पुलिस को बता दी. उस के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर दोनों हत्यारों को उसी दिन रात में जयनगर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में दोनों बदमाशों ने अपने नाम ऋषि कुमार और नवीन कुमार बताए. दोनों जक्कनपुर थाने के जयनगर (पटना) मोहल्ले के रहने वाले थे.

पूछताछ में दोनों बदमाशों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त नीले रंग की बाइक, एक देशी पिस्टल और एक जिंदा कारतूस बरामद किया.

पुलिस ने करीब 60 घंटों के अंदर रूबी हत्याकांड से परदा उठा दिया था. यही नहीं घटना में शामिल तीनों आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया गया था. पुलिस टीम की कार्यप्रणाली से खुश हो कर एसएसपी ने पुलिस टीम को 25 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

12 जुलाई को दिन में एसएसपी उपेंद्र शर्मा ने पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की. पत्रकारों के सामने तीनों आरोपियों ने पूरी घटना विस्तार से बताई. पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया.

तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद रूबी की हत्या की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

35 वर्षीय शंभू रजक मूलरूप से पटना जिले के थाना परसा बाजार इलाके के झाईंचक का रहने वाला था. उस के परिवार में पत्नी रूबी और 2 बेटियां थीं, जिन की उम्र 6 साल और 4 साल थी.

शंभू रजक के घर में सब कुछ था. शहर के बीचोबीच उस की लौंड्री की दुकान थी. दुकान अच्छीभली चलती थी. जिस से अच्छी कमाई होती थी. बस कमी थी तो एक बेटे की. रूबी पति को समझाती थी कि आजकल बेटीबेटे में कोई फर्क नहीं है.

बैंक से कर्ज लेकर दी पत्नी को सुपारी- भाग 3

सौजन्य-सत्यकथा

साली के इश्क में अंधे शंभू ने पत्नी रूबी की ढाई लाख रुपए में सुपारी दे दी. पेशगी के तौर पर उसे 50 हजार रुपए देने थे. उस समय उस के पास किलर को देने के लिए केवल 20 हजार रुपए थे.

बाकी पैसे के लिए उस ने बैंक से 30 हजार रुपए पर्सनल लोन लिया. उस ने किलर ऋषि को पेशगी के तौर पर 50 हजार रुपए दे दिए, बाकी के 2 लाख रुपए काम होने के बाद देना तय हुआ.

रकम पाने के बाद शूटर ऋषि अपने काम को अंजाम देने में जुट गया. कहते हैं जाको राखे साइयां, मार सके न कोय. कुछ ऐसा ही रूबी के साथ भी हुआ. रूबी की हत्या के लिए ऋषि ने कई प्रयास किए, लेकिन वह अपनी योजना को अंजाम नहीं दे सका. नया साल यानी 2020 का मार्च महीना बीत गया, रूबी सहीसलामत रही.

इसी बीच रूबी गर्भवती हो गई. उस के पांव भारी होते ही शंभू का मन यह सोच कर पिघल गया कि हो सकता है, इस बार वह अपने कुल के लिए एक चिराग दे दे तो सब कुछ ठीक हो जाए. पत्नी के लिए शंभू का प्यार छलक पड़ा. इस प्यार में भी उस का ही स्वार्थ था.

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लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था कि उस की कोख में पल रहा बच्चा बेटा है या बेटी. इस का पता तो 3 महीने बाद ही चल सकता था. तब तक उसे इंतजार ही करना था लेकिन शंभू ने यह फैसला कर लिया था कि अगर इस बार भी उस ने बेटी को जना तो उस का मरना तय है.

4 महीने बाद यानी जून महीने में शंभू ने किसी तरह यह पता लगा लिया कि रूबी के गर्भ में इस बार भी बेटी है. इस के बाद उस का प्यार पत्नी के लिए नफरत में बदल गया. उसी पल उस ने किलर ऋषि से कांटेक्ट किया और पत्नी को रास्ते से हटाने को कह दिया. शंभू की ओर से हरी झंडी मिलते ही ऋषि तैयार हो गया.

घटना को अंजाम कैसे देना है, इस की रूपरेखा दोनों ने मिल कर तैयार की. बस उसे अंजाम देना शेष था. इस खतरनाक योजना की भनक शंभू ने साली खुशबू तक को भी नहीं लगने दी.

योजना के मुताबिक, 8 जुलाई, 2020 को शंभू अपनी बाइक से दोनों बेटियों और पत्नी को ले कर ससुराल लोहानीपुर भिखना सासससुर से मिलने आया था. उस ने रूबी से कहा था कि कई महीने से तुम मायके नहीं गई हो, चलो तुम्हें मम्मीपापा से मिलवा लाते हैं. रात में वहीं रुक जाएंगे, अगली सुबह घर लौट आएंगे.

रूबी मायके जाने के लिए तैयार हो गई. ससुराल पहुंचने के बाद देर रात शंभू ने ऋषि को फोन किया कि शिकार तैयार है. अगली सुबह काम हो जाना चाहिए. कब और कहां, वह सुबह फोन कर के उसे बता देगा.

सुबह शंभू जब ससुराल से पत्नी और बच्चों को ले कर घर के लिए निकला तो उस ने ऋषि को फोन कर के बता दिया कि वह ससुराल से निकल रहा है, तैयार रहना. उस ने यह भी बता दिया था कि वह जगनापुर से ब्रह्मपुर होते हुए निकलेगा.

सब कुछ योजना के मुताबिक हो रहा था. जैसे ही शंभू बाइक ले कर जगनापुर से ब्रह्मपुर मोड़ पहुंचा, वहां किलर ऋषि अपने साथी नवीन कुमार के साथ पहले से खड़ा शंभू के आने का इंतजार कर रहा था.
ऋषि को देख कर उस ने अपनी बाइक की गति कम कर दी. उस के बाद सड़क पर खड़े ऋषि ने जानबूझ कर अपनी बाइक उस की बाइक में भिड़ा दी. ये सब पहले से तय सुनियोजित योजना की कड़ी थी.

बाइक में टक्कर लगते ही शंभू बाइक रोक कर उस से उलझने का नाटक करने लगा. दिखावे के तौर पर शंभू और ऋषि आपस में भिड़ गए. उधर पति को झगड़ते देख रूबी ने उसे समझाने की कोशिश की कि जो हुआ सो हुआ, झगड़े की कोई बात नहीं है, घर चलें.

शंभू ने उस की एक नहीं सुनी. शंभू ऋषि और रूबी के बीच में खड़ा था. यही वह चाहता भी था. उस ने ऋषि से इशारों में पूछा निशाना सही है क्या, पलक झपका कर उस ने हां में उत्तर दिया. फिर क्या था,ऋषि ने कमर में खोंसा पिस्टल निकाला और शंभू के सिर पर सटा दिया.

शंभू जानबूझ कर नीचे की ओर झुक गया. पिस्टल से चली गोली सीधे रूबी के माथे में जा घुसी. वह नीचे जमीन पर गिर पड़ी. थोड़ी ही देर में उस ने दम तोड़ दिया. तब तक ऋषि अपने साथी नवीन के साथ मौके से फरार होने में कामयाब हो गया.

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शंभू ने जिस चालाकी से पत्नी की मौत का तानाबाना बुना था, पुलिस अधिकारियों ने महज 60 घंटे में उस के मंसूबे पर पानी फेर दिया.

48 घंटे के भीतर किलर ऋषि और उस के साथी नवीन को पकड़ कर जेल पहुंचा दिया. ऋषि के खिलाफ पटना के विभिन्न थानों में करीब दरजन भर हत्या, हत्या के प्रयास, लूट आदि के मुकदमे दर्ज हैं. तीनों आरोपी शंभू रजक, ऋषि कुमार और नवीन कुमार जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए.

—कथा में खुशबू नाम परिवर्तित है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है

खेसारी लाल यादव के इस गाने को मिले 17 करोड़ से ज्यादा व्यूज, देखें वीडियो

भोजपुरी इंडस्ट्री के सुपरस्टार सिंगर खेसारी लाल यादव के गाने का फैस बेसब्री से इंतजार करते हैं. उनका सौन्ग रीलीज होते ही ट्रेंडिंग लिस्ट में शामिल हो जाता है. सोशल मीडिया पर सुपरस्टार खेसारी लाल यादव का सौन्ग जमकर वायरल होता है.

बता दें कि इन दिनों उनका एक गाना काफी सुना जा रहा है. इस गाने का नाम ‘लहंगा लखनुआ’ है. इस गानें में खेसारी लाल यादव और एक्ट्रेस अनिशा पांडेय के बीच शानदार केमेस्ट्री देखने को मिल रही है.

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इस गाने के वीडियो में दोनों के शानदार डांसिंग मूव्स देखने को मिल रहे हैं. इस गाने में अनिशा पांडे बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं तो वहीं खेसारी लाल यादव भी हैंडसम नजर आ रहे हैं.

इस गाने को खेसारी लाल यादव और भोजपुरी सिंगर अंतरा सिंह प्रियंका ने गाया है. इस भोजपुरी सौन्ग ‘लहंगा लखनुआ’ यूट्यूब पर काफी ज्यादा देखा जा रहा है. इस म्यूजिक वीडियो को सुशांत सिंह और कुमार चंदन ने डायरेक्ट किया है. फैंस इस गाने की वीडियो को खूब पसंद कर रहे हैं.

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