Serial Story: स्वप्न साकार हुआ- भाग 3

लेखिका-  साधना श्रीवास्तव

घर आ कर पहले तो बबली की समझ में नहीं आया कि अब वह क्या करे. अगले दिन जब तनावरहित हो कर वह आगे के जीवन के बारे में सोच रही थी तो उसे पड़ोस में रहने वाली हमउम्र नर्स का ध्यान आया. बस, उस के मन में खयाल आया कि क्यों न वह भी नर्स की ट्रेनिंग ले कर नर्स बन जाए और अपने को मानव सेवा से जोड़ ले. इस से अच्छा कोई दूसरा कार्य नहीं हो सकता.

उस नर्स से मिल कर बबली ने पता कर के नर्स की ट्रेनिंग के लिए आवेदनपत्र भेज दिया और कुछ दिनों बाद उस का चयन भी हो गया. ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उसे सरकारी अस्पताल में नर्स की नौकरी मिल गई. नर्स के सफेद लिबास में वह बड़ी सुंदर व आकर्षक दिखती थी.

अस्पताल में डा. विक्रम सिंह की पहचान अत्यंत शांत, स्वभाव के व्यवहारकुशल और आकर्षक व्यक्तित्व वाले डाक्टर के रूप में थी. बबली को उन्हीं के स्टाफ में जगह मिली, तो साथी नर्सों से पता चला कि डा. विक्रम विधुर हैं. 2 साल पहले प्रसव के दौरान उन की पत्नी का देहांत हो गया था. उन की 1 साढ़े 3 साल की बेटी भी है जो अपनी दादीमां के साथ रहती है. इस हादसे के बाद से ही डा. विक्रम शांत रहने लगे हैं.

उन के बारे में सबकुछ जान लेने के बाद बबली के मन में डाक्टर के प्रति गहरी सहानुभूति हो आई. बबली का हमेशा यही प्रयास रहता कि उस से कोई ऐसा काम न हो जाए जिस से डा. विक्रम को किसी परेशानी का सामना करना पड़े.

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special: एक बेटी तीन मांएं

अब सुबहशाम मरीजों को देखते समय बबली डा. विक्रम के साथ रहती. इस तरह साथ रहने से वह डा. विक्रम के स्वभाव को अच्छी तरह से समझ गई थी और मन ही मन उन को चाहने भी लगी थी लेकिन उस में अपनी चाहत का इजहार करने की न तो हिम्मत थी और न हैसियत. वह जब कभी डाक्टर को ले कर अपने सुंदर भविष्य के बारे में सोचती तो उस का अतीत उस के वर्तमान और भविष्य पर काले बादल बन छाने लगता और वह हताश सी हो जाती.

एक दिन डा. विक्रम ने उसे अपने कमरे में बुलाया तो वह सहम गई. लगा, शायद किसी मरीज ने उस की कोई शिकायत की है. जब वह डरीसहमी डाक्टर के कमरे में दाखिल हुई तो वहां कोई नहीं था.

डा. विक्रम ने बेहद गंभीरता के साथ उसे कुरसी पर बैठने का इशारा किया. वह पहले तो हिचकिचाई पर डाक्टर के दोबारा आग्रह करने पर बैठ गई. कुछ इधरउधर की बातें करने के बाद

डा. विक्रम ने स्पष्ट शब्दों में पूछा, ‘मिस बबली, आप के परिवार में कौनकौन हैं?’

‘सर, मैं अकेली हूं.’

‘नौकरी क्यों करती हो? घर में क्या…’ इतना कहतेकहते डा. विक्रम रुक गए.

‘जी, आर्थिक ढंग से मैं बहुत कमजोर हूं,’ डाक्टर के सवाल का कुछ और जवाब समझ में नहीं आया तो बबली ने यही कह दिया.

डा. विक्रम बेहिचक बोले, ‘बबलीजी, आप को मेरी बात बुरी लगे तो महसूस न करना. दरअसल, मैं आप को 2 कारणों से पसंद करता हूं. एक तो आप मुझे सीधी, सरल स्वभाव की लड़की लगती हो. दूसरे, मैं अपनी बेटी के लिए आप जैसी मां के आंचल की छांव चाहता हूं. क्या आप मेरा साथ देने को तैयार हैं?’

बबली ने नजरें उठा कर डा. विक्रम की तरफ देखा और फिर शर्म से उस की पलकें झुक गईं. उसे लगा जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई. लेकिन सामने वह खामोश ही रही.

उसे चुप देख कर डा. विक्रम ने फिर कहा, ‘मैं आप पर दबाव नहीं डालना चाहता बल्कि आप की इच्छा पर ही मेरा प्रस्ताव निर्भर करता है. सोच कर बताइएगा.’

बबली को लगा कहीं उस के मौन का डा. विक्रम गलत अर्थ न लगा लें. इसलिए संकोच भरे स्वर में वह बोली, ‘आप जैसे सर्वगुण संपन्न इनसान के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए मुझे सोचना क्या है? लेकिन मेरा अपना कोई नहीं है, मैं अकेली हूं?’

बबली का हाथ अपने हाथों में ले कर अत्यंत सहज भाव से डा. विक्रम बोले, ‘कोई बात नहीं, हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे.’

बबली अधिक बोल न सकी. बस, कृतज्ञ आंखों से डा. विक्रम की तरफ देख कर अपनी मौन स्वीकृति दे दी.

विवाह से पहले विक्रम ने बबली को अपनी मां से मिलवाना जरूरी समझा. बेटे की पसंद की मां ने सराहना की.

संकर्षण: आशीष की गैर मौजूदगी में गगन ने उसकी पत्नी सीमा को बनाया गर्भवती

बबली से कोर्ट मैरिज के बाद डा. विक्रम ने एक शानदार रिसेप्शन का आयोजन किया, जिस में उन के सभी रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त तथा अस्पताल के सभी डाक्टर, नर्स व कर्मचारी शामिल हुए. हां, रिसेप्शन के निमंत्रणपत्र पर डा. विक्रम सिंह ने बबली का नाम बदल कर अपनी दिवंगत पत्नी के नाम पर आरती रख दिया था.

उन्होंने बबली से कहा था, ‘मैं चाहता हूं कि तुम को बबली के स्थान पर आरती नाम से पुकारूं. तुम को कोई आपत्ति तो न होगी?’

बबली उन की आकांक्षा को पूरापूरा सम्मान देना चाहती थी इसलिए सहज भाव से बोली, ‘आप जैसा चाहते हैं मुझे सब स्वीकार है. आप की आरती बन कर आप की पीड़ा को कम कर सकूं और तान्या को अपनी ममता के आंचल में पूरा प्यार दे सकूं इस से बढ़ कर मेरे लिए और क्या हो सकता है?’ इस तरह वह बबली से आरती बन गई.

ये भी पढ़ें- बहू-बेटी: आखिर क्यों सास के रवैये से परेशान थी जया…

अचानक तान्या के रोने की आवाज सुन कर बबली की तंद्रा टूटी तो वह उठ कर बैठ गई. सुबह हो गई थी. विक्रम अभी सो रहे थे. तान्या को थपकी दे कर बबली ने चुप कराया और उस के लिए दूध की बोतल तैयार करने किचन की तरफ बढ़ गई.

विक्रम की सहृदयता और बड़प्पन के चलते आज सचमुच सम्मान के साथ जीने की उस की तमन्ना का स्वप्न साकार हो गया और वह अपनी मंजिल पाने में सफल हो गई.

Serial Story: जड़ों से जुड़ा जीवन- भाग 2

लेखक-  वीना टहिल्यानी

पहले परिचय पर घुटनों के बल बैठ कर जौन ने उस के छोटेछोटे हाथों को अपने दोनों हाथों में ले लिया फिर हौले से उसे अंक में भर लिया. कैसा स्नेह था उस स्पर्श में, कैसी ऊष्मा थी उस आलिंगन में, मानो पुरानी पहचान हो.

मिली के मन में आता कि वह उसे दादा कह कर बुलाए. अपने देश में तो बड़े भाई को दादा कह कर ही पुकारते हैं. पर यहां संभव न था. यहां और वहां में अनेक भेद गिनतेबुनते मिली हर पल हैरानपरेशान रहती.

अपनी अलग रंगत के कारण मिली स्कूल में भी अलग पहचानी जाती. सहज ही सब से घुलमिल न पाती. कैसी दूरियां थीं जो मिटाए न मिटतीं. सबकुछ सामान्य होते हुए भी कुछ भी सहज न था. मिली को लगता, चुपचाप कहीं निकल जाए या फिर कुछ ऐसा हो जाए कि वह वापस वहीं पहुंच जाए पर ऐसा कुछ भी न हुआ. मिली धीरेधीरे उसी माहौल में रमने लगी. मां के स्नेह के सहारे, भाई के दुलार के बल पर उस ने मन को कड़ा कर लिया. अच्छी बच्ची बन कर वह अपनी पढ़ाई में रम गई.

अंधेरा घिरने लगा था. गुडनाइट बोल कर मिसेज स्मिथ कब की जा चुकी थीं और मिली स्थिर सी अब भी वहीं डाइनिंग टेबल पर बैठी थी…अपनेआप में गुमसुम.

दरवाजे में चाबी का खटका सुन मिली अतीत की गलियों से निकल कर वर्तमान में आ गई…

एक हाथ में बैग, दूसरे में कापीकिताबों का पुलिंदा लिए ब्राउन मौम ने प्रवेश किया और सामने बेटी को देख मुसकराईं.

मिली के सामने खाली प्लेट पड़ी देख वह कुछ आश्वस्त सी हुईं.

‘‘ठीक से खाया… गुड, वैरी गुड…’’

इकतरफा एकालाप. फिर बेटी के सिर में हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘मर्लिन, मैं ऊपर अपने कमरे में जा रही हूं, बहुत थक गई हूं…नहा कर कुछ देर आराम करूंगी… फिर पेपर सैट करना है…डिनर मैं खुद ले लूंगी…मुझे डिस्टर्ब न करना. अपना काम खत्म कर सो जाना,’’ कहतेकहते मिसेज ब्राउन सीढि़यां चढ़ गईं और मिली का दिल बैठ गया.

‘काम…काम…काम…जब समय ही न था तो उसे अपनाया ही क्यों? साल पर साल बीत गए फिर भी यह सवाल बारबार सामने पड़ जाता. समाज सेवा करेंगी, सब की समस्याएं सुलझाती फिरेंगी पर अपनी बेटी के लिए समय ही नहीं है. यह सोच कर मिली चिढ़ गई.

जब से जौन यूनिवर्सिटी गया था मिली बिलकुल अकेली पड़ गई थी. सुविधासंपन्न परिवार में सभी सदस्यों की दुनिया अलग थी. सब अपनेआप में, अपने काम में व्यस्त और मगन थे.

पहले ऐसा न था. लाख व्यस्तताओं के बीच भी वीकएंड साथसाथ बिताए जाते. कभी पिकनिक तो कभी पार्टी, कभी फिल्म तो कभी थिएटर. यद्यपि मूड बनतेबिगड़ते रहते थे फिर भी वे हंसते- बोलते रहते. हंसीखुशी के ऐसे क्षणों में मौम अकसर ही कहती थीं, ‘मर्लिन थोड़ी और बड़ी हो जाए, फिर हम सब उस को इंडिया घुमाने ले जाएंगे.’

मिली सिहर उठती. उसे रोमांच हो आता. उस का मन बंध जाता. उसे मौम की बात पर पूरा यकीन था.

डैड भी तब मां को कितना प्यार करते थे. उन के लिए फूल लाते, उपहार लाते और उन्हें कैंडिल लाइट डिनर पर ले जाते. मौम खिलीखिली रहतीं लेकिन डैड के एक अफेयर ने सबकुछ खत्म कर दिया. घर में तनातनी शुरू हो गई. मौम और डैड आपस में लड़नेझगड़ने लगे. परिवार का प्रीतप्यार गड़बड़ा गया. उन्हीं दिनों जौन को यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिल गया और भाई के दूर जाते ही अंतर्मुखी मिली और भी अकेली पड़ गई.

मौम और डैड के बीच का वादविवाद बढ़ता गया और एक दिन बात बिगड़ कर तलाक तक जा पहुंची. तभी डैड की गर्लफ्रेंड ने कहीं और विवाह कर लिया और मौमडैड का तलाक टल गया. उन्होंने आपस में समझौता कर लिया. बिगड़ती बात तो बन गई पर दिलों में दरार पढ़ गई. अब मौम और डैड 2 द्वीप थे जिन्हें जोड़ने वाले सभी सेतु टूट चुके थे.

ये भी पढ़ें- Short Story: कोरोना और अमिताभ

उन के रिश्ते बिलकुल ही रिक्त हो चुके थे. मन को मनाने के लिए मौम ने सोशल सर्विस शुरू कर ली और डैड को पीने की लत लग गई. कहने को वे साथसाथ थे, पर घर घर न था.

मिली को अब इंतजार रहता तो बस, जौन के फोन का लेकिन जब उस का फोन आता तो वह कुछ बोल ही न पाती. भरे मन और रुंधे गले से बोलती उस की आंखें…बोलते उस के भाव.

जौन फोन पर झिड़कता, ‘‘मर्लिन… मुंह से कुछ बोल…फोन पर गरदन हिलाने से काम नहीं चलता,’ और मिली हंसती. जौन खिलखिलाता. बहुत सी बातें बताता. नए दोस्तों की, ऊंची पढ़ाई की. वह मिली को भी अच्छाअच्छा पढ़ने को प्रेरित करता. खुश रहने की नसीहतें देता. मिली उस की नसीहतों पर चल कर खूब पढ़ती.

गंदगी भरे माहौल में साफ-सफाई का रखें ख्याल

फिल्में मनोरंजन का अच्छा जरीया होती हैं. हालांकि फिल्म बनाने वाले कभी यह नहीं मानते हैं कि उन की फिल्मों को देख कर लोग अपनी जिंदगी बनाते हैं या बिगाड़ते हैं, पर चूंकि फिल्मी कहानियों में कोई न कोई सीख छिपी रहती है, लिहाजा उन का दर्शकों पर कुछ न कुछ असर तो पड़ता ही है.

एक फिल्म आई थी ‘ट्रैफिक सिगनल’. उस में एक छोटे बच्चे का किरदार था, जो चौराहे पर भीख मांगता है. वह बच्चा रंग से काला होता है और उस के मन में यह बात गांठ बांध चुकी होती है कि गोरा करने की क्रीम से वह भी निखर जाएगा. ऐसा होता तो नहीं है, पर यह बात जरूर साबित हो जाती है कि गंदगी भरे माहौल में रहने का यह मतलब नहीं है कि आप हमेशा बिना नहाए, मैलेकुचैले कपड़ों में पैर भिड़ाते इधर से उधर घूमो और अपनी फूटी किस्मत को रोओ.

जब से शहर बने हैं, तब से उन के आसपास गंदी बस्तियों का जमावड़ा लगना शुरू हुआ है. पहले लोग गांवकसबों में ही रहते थे. गांवदेहात में कच्चे घर, खेतखलिहान, तालाबकुएं, ज्यादा से ज्यादा अनाज मंडी तक किसान और उस के परिवार की पहुंच थी, लिहाजा ऐसा मान लाया जाता था कि मोटा खाओ और सादा जियो.

इस सादा जिंदगी में नहानेधोने, कपड़े पहनने पर इतना जोर नहीं रहता था. ज्यादातर देहाती आबादी को कहें तो उठनेबैठने का भी शऊर नहीं था, तभी तो अगर कोई किसान नए कपड़े पहन कर, नहाधो कर घर से बाहर निकलता था तो दूसरे लोग मजाक में पूछ लेते थे कि जनेत (बरात) में जा रहा है क्या?

ये भी पढ़ें- सरकारी अस्पताल: गरीबों की उम्मीद की कब्रगाह

हां, तब भी एक तबका ऐसा था जो बनसंवर कर रहता था, फिर चाहे उस समाज की औरत हो फिर मर्द. वह तबका था बनियों का. ‘लाला’ समाज हमेशा से अपने बनावसिंगार और खानपान के प्रति सजग रहा है. तभी तो उन्हें सेठ और सेठानी का तमगा दिया गया.

बहुत से पढ़ेलिखे किसान भी खुद को अलग दिखाने के लिए बनठन कर रहते थे. सारा दिन खेत में मिट्टी में मिट्टी हुए, फिर घर वापस आए, नहाएधोए और पहन कर धोतीकुरता अपनी बैठक में मजमा लगा लिया. मुझे अपने बचपन की याद है कि ऐसे लोगों का पूरा गांव में रुतबा होता था. उन की बात सुनी जाती थी और उस पर अमल भी होता था. कई बार तो वे सरपंच से भी ज्यादा अहमियत रखते थे.

लेकिन आज भी बहुत से लोग अपनी पूरी जिंदगी इस बात को कोसते रह जाते हैं कि हाय इस गरीबी, गुरबत, फटेहाली में कैसे बनसंवर कर रहें? रहते तो कच्ची बस्ती में हैं या गांव की बदहाली में, तो फिर कैसे टिपटौप रहें? ये सब तो पैसे वालों के चोंचले हैं.

पर ऐसा बिलकुल नहीं है. इस बहानेबाजी की जड़ में किसी की गरीबी नहीं, बल्कि उस की काहिली और आलसपन होता है वरना खुद को साफसुथरा रखना कोई रौकेट साइंस नहीं है.

अगर शहरों में गंदी बस्तियों की बात की जाए तो वहां तो गांवदेहात से भी बदतर हालात होते हैं. अगर साधारण शब्दों मे परिभाषित किया जाए वे सब रिहायशी इलाके गंदी बस्तियां कहलाते है, जहां सेहतमंद जिंदगी की रिहायशी सुविधाएं मुहैया नही होतीं.

पर क्या वहां रहने वाले ऐसे उलट हालात में क्या साफसुथरे नहीं रह सकते हैं? बिलकुल रह सकते हैं और रहते भी हैं. यह बस उन की सोच पर निर्भर करता है. अमीर घरों में काम करने वाली औरतें जिन्हें ‘कामवाली’ ही कहा जाता है, वे खुद जितनी साफसुथरी रहती हैं, उन्हें उतना ही ज्यादा काम मिलने की उम्मीद रहती है.

यही कामवालियां अपने घर की धुरी होती हैं. जो खुद सजासंवरा होगा वह अपने परिवार को भी ऐसा ही देखना चाहेगा. सुबह नहानेधोने में ज्यादा पैसा खर्च नहीं होता है और जरूरी नहीं है कि आप के पास नए या ज्यादा जोड़ी कपड़े हों, बल्कि अच्छे से धुले हुए कपड़े भी सलीके से पहने जाएं तो भी शख्सीयत एकदम बदल जाती है और इन सब पर रोजाना खर्चा नहीं करना पड़ता है, बस अपनी चीजों और खुद को ढंग से रखना होता है.

ये भी पढ़ें- निष्पक्ष पत्रकारों पर सरकारी दमन के खिलाफ

सुबह टूथपेस्ट, टूथब्रश (अगर ये नहीं हैं तो नीम या बबूल की दातून), साबुन, तेल जैसी सामग्री नहानेधोने के काम आती है, जो ज्यादा महंगी नहीं होती. बाकी कपड़ों पर अपनी हैसियत से पैसा लगाया जाता है. महिलाओं के लिए लालीबिंदी भी ज्यादा पैसा खर्च नहीं कराती है. मर्दों को तो इतना भी नहीं करना पड़ता है.

फरीदाबाद की सैक्टर 31 मार्किट में जयलक्ष्मी किराना स्टोर के नितिन ने बताया, “साफसुथरा रहना एक आदत होती है और जो इस से बचता है, वह चाहे अमीर हो या गरीब, कहीं भी कामयाब नहीं हो सकता है. गंदे आदमी को कोई पसंद नहीं करता है.

“इस के लिए ज्यादा खर्च भी नहीं होता है. किसी कंपनी का टूथब्रश 20 रुपए (लोकल तो और भी सस्ता हो सकता है) तक का आ जाता है. टूथपेस्ट भी 10 रुपए से शुरू हो जाती है. नहाने और कपड़े धोने का साबुन भी 10 रुपए से शुरू हो जाता है. ये चीजें रोजरोज नहीं खरीदनी पड़ती हैं.”

याद रखिए कि जब किसी परिवार के बड़े अपनी साफसफाई पर ध्यान देते हैं तो बच्चे भी उन की देखादेखी अच्छी आदतें डाल ही लेते हैं, बस खुद पर आलस न हावी होने दें या गंदी बस्ती या गांवदेहात में रहने का रोना न रोएं.

ये भी पढ़ें- महिलाओं पर जोरजुल्म: जड़ में धार्मिक पाखंड

Serial Story: काले घोड़े की नाल- भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

मुखियाजी को घोड़े पालने का बहुत शौक था. बताते हैं कि यह शौक उन्हें विरासत में मिला हुआ था. आज भी मुखियाजी के पास 5 घोड़े थे, जिन की देखभाल का काम उन्होंने चंद्रिका नाम के एक  35 साला शख्स को दे रखा था.

मुखियाजी की उम्र तकरीबन 50-55 साल के बीच थी, फिर भी उन पर बढ़ती उम्र का कोई असर नहीं पता चलता था. रोज सुबहशाम दूध पीते और लंबी सैर को जाते. अपनी जवानी के दिनों में मुखियाजी ने आसपास के इलाकों में खूब दंगल जीते थे.

पीठ पीछे कोई मुखियाजी को कुछ भी कहे, लेकिन उन के सामने सभी नतमस्तक नजर आते थे.

मुखियाजी और उन की पत्नी की जिंदगी में एक बहुत भारी कमी थी कि उन के कोई औलाद नहीं थी. कई बार घरेलू नुसखों से इलाज करने की कोशिश भी की गई, पर कुछ नतीजा नहीं निकला. मुखियाइन की गोद हरी नहीं हो सकी और दोनों थकहार कर हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए.

मुखियाजी को अपनी वंशबेल सूखने की कतई परवाह नहीं थी. उन्हें तो अपनी जिंदगी में सभी इंद्रियों से सुख उठाना अच्छी तरह आता था.

मुखियाजी कुलमिला कर 3 भाई थे, मुखियाजी से छोटा वाला संजय और सब से छोटा विनय, दोनों भाई मुखियाजी के रसूख तले दबे हुए रहते थे. किसी की भी उन के सामने जबान खोलने की हिम्मत नहीं थी.

पिछले कुछ दिनों से मुखियाजी के मन में उन के किसी चमचे ने समाजसेवा करने का शौक लगा दिया था, तभी तो मुखियाजी हर किसी से यही कहते कि बड़े घर से तो हर कोई रिश्ता जोड़ना चाहता है, पर वे तो संजय और विनय की शादी किसी गरीब घर की लड़की से ही करेंगे.

हां… पर लड़की खूबसूरत और सुशील होनी चाहिए, समाजसेवा भी होगी और किसी गरीब का भला भी हो जाएगा.

आसपास के गांव में कम पैसे वाले ठाकुर भी रहते थे. उन में से बहुत से लोग मुखियाजी के यहां अपनी लड़कियों का रिश्ता ले कर पहुंचे. मुखियाजी ने लड़कियों के फोटो रखवा लिए और बाद में बात करने को कहा.

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special: मां का साहस

कुछ दिन बाद मुखियाजी ने उन सारे फोटो में से 2 खूबसूरत लड़कियों को पसंद किया. हैरानी की बात यह थी कि मुखियाजी ने जो 2 लड़कियां पसंद की थीं, वे भरेपूरे बदन की थीं.

मुखियाजी ने उन दोनों के पिताजी को बुलावा भेजा और हर किसी से अकेले में बात की, ‘‘देखिए, हम अपने भाई संजय के लिए एक लड़की ढूंढ़ रहे हैं… पर हमारी 2 शर्तें हैं…

‘‘पहली शर्त तो यह कि फोटो देख कर लड़की की होशियारी का परिचय नहीं मिलता, इसलिए हम लड़की से मिलना चाहेंगे… और दूसरी शर्त क्या होगी, यह हम आप को रिश्ता तय होने के बाद बताएंगे.’’

दूसरी शर्त वाली बात से लड़की का पिता थोड़ा घबराया, तो मुखियाजी ने उस से कहा कि ऐसी कोई शर्त नहीं होगी, जिसे वे पूरा न कर सकें. उन की इस

बात पर लड़की के बाप को कोई एतराज नहीं हुआ.

उन लोगों ने घर जा कर अपनी बेटियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया कि मुखियाजी के सभी सवालों का जवाब सही से देना और सासससुर की बात मानना एक अच्छी बहू के गुण होते हैं.

मुखियाजी को आखिरकार सीमा नाम की एक लड़की पसंद आ गई.

‘‘देखो सीमा, संजय को हम ने ही पालपोस कर बड़ा किया है, इसलिए वह हमारी हर बात मानता है. यही उम्मीद हम तुम से भी करते हैं… मानोगी न हमारी बात?’’ सीमा की पीठ पर हाथ फिराते हुए मुखियाजी ने कहा.

सीमा ने सिर्फ हां में सिर हिला दिया.

मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को बुलाया और कहा कि उन की लड़की उन्हें पसंद आ गई है. कोई अच्छा दिन देख कर वे सीमा और संजय की शादी कर दें.

फिर मुखियाजी ने सीमा के बाप मोती सिंह को अपनी दूसरी शर्त के बारे में बताया, ‘‘हमारी दूसरी शर्त यह है कि तुम हमें अपनी लड़की दे रहे हो, इसलिए हमारा भी फर्ज है कि हम तुम्हें अपनी तरफ से कुछ भेंट दें,’’ यह कह कर मुखियाजी ने 50,000 रुपए मोती सिंह को पकड़ा दिए.

मोती सिंह उन की दरियादिली पर खुश हो गया. उस ने मुखियाजी के सामने हाथ जोड़ लिए.

संजय और सीमा की शादी धूमधाम से हो गई थी, पर मुखियाजी का सख्त आदेश था कि अभी संजय और सीमा की सुहागरात का सही समय नहीं है, इसलिए संजय को अलग कमरे में  सोना पड़ेगा.

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special- सपने में आई मां: भाग 3

मुखियाजी अपने दोनों भाइयों के गांवों में रहने के सख्त खिलाफ थे. उन का साफ कहना था कि अगर तुम लोग गांव में रुक गए, तो यहां के गंवार लड़कों के साथ तुम लोग भी नहर पर बैठ कर चिलम पीया करोगे, आवारागर्दी करोगे और यह बात उन्हें मंजूर नहीं, इसलिए मेहमानों के जाते ही संजय और विनय

को शहर चलता कर दिया गया.

बेचारा संजय अभी अपनी पत्नी के साथ सैक्ससुख भी नहीं ले पाया था और उस से अलग हो जाना पड़ा.

सीमा ने संजय से न जाने की फरियाद भी की, पर मुखियाजी का आदेश संजय के लिए पत्थर की लकीर था, इसलिए वह कुछ न बोल सका.

इसी तरह संजय को गए हुए पूरे  6 महीने हो गए थे, सीमा ने एक मर्द के शरीर का सुख अभी तक नहीं जाना था. वह अकसर सोचती कि ऐसी शादी से क्या फायदा कि दिनभर घर का काम करो और रात में बिस्तर पर अकेले करवटें बदलो…

बाहर बारिश हो रही थी. सीमा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी कि उसे अपने पैरों पर किसी के गरम हाथ की छुअन महसूस हुई. वे हाथ उस की जांघों तक पहुंच गए थे, कोई उस के सीने पर अपने हाथों का दबाव डाल रहा था. सीमा की सांसें गरम हो गई थीं. उसे बहुत अच्छा लग रहा था.

सीमा को लगा कि उस का पति संजय ही वापस आ गया है. उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और मजा लेना शुरू कर दिया. उस आदमी ने सीमा के सारे कपड़े हटा दिए और उस पर  छा गया.

सीमा को आज पहली बार मर्द की मर्दानगी का मजा मिला था. थोड़ी ही देर बाद वह आदमी सीमा से अलग हो गया.

सीमा ने उस की तरफ देख कर प्यारमनुहार करना चाहा और अपनी आंखें खोलीं… पर यह क्या, ये तो संजय नहीं था, बल्कि मुखियाजी थे…

बिस्तर में बिना कपड़ों के सीमा भला मुखियाजी का सामना कैसे करती. उस ने तुरंत ही चादर से अपने शरीर को ढकने की नाकाम कोशिश की और बोली, ‘‘यह क्या किया मुखियाजी आप ने…’’

‘‘एक बात अच्छी तरह सम?ा ले सीमा… तु?ो अब मु?ो ही अपना पति सम?ाना होगा, क्योंकि संजय का सारा खर्चा मैं उठाता आया हूं. मेरे सामने वह चूं तक नहीं करेगा. मैं उस के माल का मजा उड़ा सकूं, इसीलिए उसे मैं ने शहर भेज दिया है…

‘‘और वैसे भी हम ने तेरे बाप को हमारी हर बात मानने के लिए पैसे दिए हैं,’’ मुखियाजी नशे में बोल रहे थे.

सीमा ऐसा सुन कर सन्न रह गई थी, पर मन ही मन उस ने अपनेआप को सम?ा लिया था, क्योंकि उसे मुखियाजी के रूप में उस के जिस्म को सुख पहुंचाने वाला मर्द जो मिल गया था.

फिर क्या था, मुखियाजी तकरीबन रोज ही सीमा के कमरे में आ जाते और दोनों सैक्स का जम कर मजा उठाते.

मुखियाजी के चेहरे की लाली बढ़ गई थी. नई जवान लड़की के जिस्म का रस पी कर जैसे उन की जवानी ही वापस आ गई थी.

कभीकभी जब मुखियाजी अपनी पत्नी के पास ही सो जाते, तो सीमा को जैसे सौतिया डाह सताने लगता. उसे अकेले नींद न आती, इसलिए कभी वह चूडि़यां खनकाती, तो कभी अपनी पायलें बजाते हुए मुखियाजी के कमरे के सामने से निकलती. हार कर मुखियाजी को उठ कर आना पड़ता और सीमा के जिस्म की आग को बु?ाना पड़ता.

इस दौरान शहर से संजय वापस आया, तो मुखियाजी की त्योरियां चढ़ने लगीं और उन्होंने उसे किसी बहाने यहांवहां दौड़ा दिया, ताकि वह सीमा के साथ न रह पाए.

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special- सपने में आई मां: भाग 3

फिर एक दिन उसे पैसा वसूली के लिए दूसरे गांव भेज दिया और जब वह वापस आया, तब तक शहर से उस के ठेकेदार का बुलावा आ चुका था. बेचारा संजय अपनी पत्नी के प्यार को तरसता रह गया.

कुछ समय बीता तो मुखियाजी अपने छोटे भाई विनय की शादी के बारे में सोचने लगे. उन्होंने शहर से विनय को भी बुलवा लिया था और बहू ढूंढ़ने लगे.

जल्दी ही उन्हें मुनासिब बहू मिल भी गई, जिस का पिता गरीब था और पहले की तरह ही उसे पूरे 50,000 रुपए देते हुए मुखियाजी ने लड़की के बाप से कहा कि बस अपनी लड़की से इतना कह दो कि विनय को पढ़ानेलिखाने में हम ने बहुत खर्चा किया है. हम ही उस के मांबाप हैं, इसलिए हमारी बात मान कर रहेगी तो सुखी रहेगी.

शादी के बाद सीमा को घर में मेहमानों के होने के चलते मुखियाजी से मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी. ऐसे में उसे अपने पति संजय का साथ और सुख मिला.

संजय भी बिस्तर पर ठीक ही था, पर मुखियाजी की ताकत के आगे वह फीका ही लगा था, इसीलिए सीमा मन ही मन सभी मेहमानों के जाने का इंतजार करने लगी, ताकि वह फिर से मुखियाजी के साथ रात गुजार सके.

सारे मेहमान चले गए थे. संजय और विनय को आज ही शहर जाना पड़  गया था.

अगले दिन से सीमा ने ध्यान दिया कि मुखियाजी उस के बजाय नई बहू रानी की ज्यादा मानमनुहार करते हैं. उन की आंखें रानी के कपड़ों के अंदर घुस कर कुछ तौलने की कोशिश करती रहती हैं. सीमा मुखियाजी की असलियत सम?ा गई थी.

Imlie और आदित्य को रंगे हाथ पकड़ेगी अनु, आएगा धमाकेदार ट्विस्ट

स्टार प्लस का सीरियल ‘इमली’ में इन दिनों धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है, जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो के बीते एपिसोड में आपने देखा कि मालिनी, इमली और आदित्य की सच्चाई जान चुकी है. आइए आपको बताते है शो के नए अपडेट्स के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि मालिनी अस्पताल से अपने ससुराल आई है. पर अब वह आदित्य का साथ नहीं पाना चाहती है. ऐसे में उसने आदित्य से दरी बनाना शुरु कर दिया है. तो दूसरी तरफ मालिनी की मां अनु इमली को अपने घर ले गई है.  अनु हर समय इमली की बेइज्जती कर रही है.

ये भी पढ़ें- Ghum Hai KisiKey Pyaar Meiin: विराट ने थामा सई का हाथ तो पाखी बनी विलेन

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Rupi kaur (@imlie_fanpage29)

 

‘इमली’ के अपकमिंग एपिसोड में ये दिखाया जाएगा कि आदित्य चोरी छिपे इमली को कॉलेज छोड़ने जाएगा. जैसे ही इमली घर वापस आएगी, अनु उससे कई सवाल पूछेगी. इतना ही नही, अनु इमली को थप्पड़ भी मारेगी. अनु ये भी कहेगी कि वो अपनी बेटी और उसके पति के बीच किसी को भी आते हुए नहीं देख सकती है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Rupi kaur (@imlie_fanpage29)

 

तो वहीं मालिनी की दादी अनु को रोकेगी और उसे समझाएगी लेकिन अनु पर किसी भी बात का असर नहीं होगा. शो के अपकमिंग एपिसोड में यह भी दिखाया जाएगा कि अनु को पता चल जाएगा कि पगडंडिया में इमली और आदित्य की शादी हो गई थी. इस सच का पता लगते ही अनु बौखला जाएगी और आदित्य की जमकर क्लास लगाएगी.

ये भी पढ़ें- Ghum Hai KisiKey Pyaar Meiin: विराट को देखकर फूटफूट कर रोई सई तो पाखी का हुआ बुरा हाल

 

View this post on Instagram

 

A post shared by imlie_show (@imliefp_)

 

खबरों के अनुसार अभी भले ही मालिनी आदित्य और इमली से दूर जाना चाहती हो लेकिन आने वाले दिनों में वह अपना हक के लिए लड़ेगी. अब तो अपकमिंग एपिसोड में ही पता चलेगा कि मालिनी अपने हक के लिए लड़ती है या नहीं.

Ghum Hai KisiKey Pyaar Meiin: विराट ने थामा सई का हाथ तो पाखी बनी विलेन

स्टार प्लस का ‘गुम है किसी के प्यार में’ में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है जिससे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा है. शो के बीते एपिसोड में आपने देखा कि विराट को गोली लगी थी और वह घायल था लेकिन अब उसके हालत में सुधार नजर आ रहा है. आइए बताते है शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

शो में यह दिखाया जा रहा है कि सई, विराट से मिलने गई है. और उसने ठान लिया है कि अब वह विराट से कभी दूर नहीं होगी. तो दूसरी तरफ पाखी चाहती है कि सई और विराट कभी ना मिले. और वह खुद विराट के करीब जाने की कोशिश कर रही है.

ये भी पढ़ें- ‘मसान’ एक्ट्रेस निहारिका रायजादा लेकर आयी हैं कोरोना वॉरियर्स के लिए ये गाना

 

सीरियल के लेटेस्ट एपिसोड के अनुसार, विराट पाखी के मुंह पर ही उसे रिजेक्ट कर देगा. और उससे यह भी कहेगा कि सई ने जो उसके लिए किया है वो दुनिया का कोई भी शख्स नहीं कर पाएगा. विराट की बातों को सुनकर पाखी को शॉक्ड हो जाएगी. तो वही सई का टूटे दिल को चैन मिलेगा.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sairat Love 💙 (@ghkkpm_svp)

 

खबर यह आ रही है कि  शो के अपकमिंग एपिसोड में विराट और सई नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे. अस्पताल में ही सई विराट का खूब ख्याल रखेगी. इस दौरान दोनों अपने प्यार का इजहार करेंगे. सई यकीन दिलाएगी कि वो अब उससे दूर नहीं जाएगी. विराट भी उससे वादा करेगा कि अब वह उसका साथ नहीं छोड़ेगा.

ये भी पढ़ें- जानें क्यों अनिता हसनंदानी को यूजर्स ने जमकर लगाई लताड़, सोशल मीडिया पर किया अनफॉलो

रिपोर्ट्स के अनुसार सई और विराट को साथ देखकर पाखी को कुछ भी समझ नहीं आएगा। ऐसे में वो दोनों को अलग करने के लिए कई दांव लगाएगी. शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या पाखी उन दोनों के एक-दूसरे से दूर कर पाएगी.

Mother’s Day Special: मां हूं न- भाग 3

‘‘अरे पगली, तुम मांबेटी न होती तो शायद मैं इस जिंदगी को इस तरह न जी पाता. इस जिंदगी पर सीनियर सिटिजन का ठप्पा लगाए निराशावादी जीवन जी रहा होता. तुम लोगों को मैं ने नहीं गढ़ा है, बल्कि तुम लोगों ने मुझे गढ़ा है. तुम्हारे कौशल का नटखट मेरी आंखों में बस गया है बेटा.’’

आरती ने तृप्ति की लंबी सांस ली. वह पिता जैसा प्यार देने वाले ससुर थे, उन्हीं के सहारे वह जी रही थी. अगर उन का सहारा न होता तो मांबेटी मांबाप के यहां आश्रित बन कर बेचारी की तरह जी रही होतीं. इन्हीं की वजह से आज वे सिर ऊंचा कर के जी रही थीं वरना नदी के टापू की तरह कणकण बिखर गई होतीं.

उगते सूरज की किरणों के बीच आराधना बालकनी में खड़ी हो कर कौफी पीती. विश्वंभर प्रसाद मौर्निंग वाक से वापस आते तो आराधना दरवाजा खोल कर उन के सीने से लग जाती, ‘‘गुड मौर्निंग दादू.’’

विश्वंभर प्रसाद दोनों हाथों से आराधना को गोद में उठा लेते. 80 साल के होने के बावजूद उन में अभी जवानों वाली ताकत थी. आराधना झटपट गोद से उतर कर सख्त लहजे में कहती, ‘‘दादादी, बिहैव योर एज.’’

‘‘अभी तो मैं जवान हूं. कालेज के दिनों में क्रिकेट खेलता था, मेरा हाइयेस्ट सिक्सर्स का रेकार्ड है.’’

ऐसा ही लगभग रोज होता था. सुबह जल्दी उठ कर विश्वंभर प्रसाद मौर्निंग वाक के लिए निकल जाते थे. पौने 7 बजे के फोन की घंटी बजती, जिस का मतलब था वह 10 मिनट के अंदर आने वाले हैं. आरती कहती, ‘‘अरू, जल्दी कर दादाजी के आने का समय हो गया है. जूस तैयार कर के टेबल पर प्लेट लगा.’’

आराधना जल्दी से कौफी खत्म कर के फ्रिज से संतरा, मौसमी या अनार निकाल कर जूस निकालने की तैयारी करने लगती. दूसरी ओर आरती किचन में नाश्ते की तैयारी करती. इस के बाद डोरबेल बजती तो आराधना दरवाजा खोल कर दादाजी के गले लग जाती. उस दिन किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही आरती चिल्लाई, ‘‘आराधना जल्दी जूस निकाल कर मेज पर प्लेट लगा, 8 बज गए दादाजी आते ही होंगे. लेकिन आज उन का फोन तो आया ही नहीं.’’

आराधना जूस के गिलास मेज पर रख कर प्लेट लगाने लगी. अंदर से आरती ने कहा, ‘‘आज उठने में मुझे थोड़ी देर हो गई. लेकिन पापाजी की टाइमिंग परफेक्ट है, वह आते ही होंगे.’’

8 से सवा 8 बज गए. न फोन आया न डोरबेल बजी. आराधना चिढ़ कर बोली, ‘‘मम्मी, दादाजी तो दिनप्रतिदिन बच्चे होते जा रहे हैं. खेलने लगते हैं तो समय का ध्यान ही नहीं रहता. आज आते हैं तो बताती हूं.’’

साढ़े 8 बज गए. दरवाजा खोले मांबेटी एकदूसरे का मुंह ताक रही थीं. मौर्निंग वाक करने वालों की तरह घड़ी का कांटा भाग रहा था. कांटा पौने 9 पर पहुंचा तो आराधना ने दादाजी के मोबाइल पर फोन किया. घंटी बजती रही, पर फोन नहीं उठा. आराधना के लिए यह हैरानी की बात थी. आरती ने उस के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कोई पुराना दोस्त मिल गया होगा फारेनवारेन का. बहुत दिनों बाद मिला होगा इसलिए बातों में लग गए होंगे.’’

ये भी पढ़ें- Short Story: गृहस्थी की डोर

‘‘आप भी क्या बात करती हैं मम्मी. एक घंटा होने को आ रहा है. नो वे…दादाजी इतने लापरवाह नहीं हैं. कम से कम फोन तो उठाते या खुद फोन करते.’’

आराधना बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि उस का फोन बजा. नंबर देख कर बोली, ‘‘ये लो आ गया दादाजी का फोन.’’

फोन रिसीव कर के आराधना धमकाते हुए बोली, ‘‘यह क्या…इतनी देर…मेरे का क्या…’’

‘‘एक मिनट मैडम, यह फोन आप के फैमिली मेंबर का है?’’

‘‘जी, यह फोन मेरे ग्रांडफादर का है. आप के पास कैसे आया?’’

‘‘मैडम, मुझे तो यह सड़क पर पड़ा मिला है.’’

हैरानपरेशान आरती बगल में खड़ी थी. उस ने पूछा, ‘‘अरू, कौन बात कर रहा है? पापा का फोन उसे कहां मिला, वह कहां हैं?’’

‘‘फोन ढूंढ रहे होंगे. एक तो गंवा दिया.’’

दूसरी ओर से अधीरता से कहा गया, ‘‘हैलो…हैलो मैडम.’’

‘‘जी सौरी भाईसाहब, वह क्या है कि मेरे ग्रांडफादर वाक पर गए थे. उन का फोन गिर गया होगा. आप कहां हैं? मैं लेने…’’

‘‘आप मेरी बात सुनेंगी या खुद ही बकबक करती रहेंगी.’’ फोन करने वाले ने तीखे लहजे में कहा, ‘‘यह फोन आप के ग्रांडफादर का है न, उन का एक्सीडेंट हो चुका है. मैं यह फोन पुलिस वाले को दे रहा हूं.’’

पुलिस वाले ने बताया कि यह फोन जिस का भी है, उन का एक्सीडेंट हो चुका है. आप जल्दी आ जाइए.

फोन कटते ही आराधना ने मां का हाथ पकड़ा और गेट की ओर भागी, ‘‘मम्मी, जल्दी चलो, दादाजी का एक्सीडेंट हो गया है.’’

एक जगह भीड़ देख कर आराधना रुक गई. आंसू पोंछते हुए भर्राई आवाज में बोली, ‘‘प्लीज मम्मी, मैं वहां नहीं जा सकती. दादाजी को उस हालत में नहीं देख सकती.’’

‘‘कलेजा कड़ा कर अरू, रोने के लिए अभी समय पड़ा है. अब जो कुछ भी करना है, हम दोनों को ही करना है.’’

आराधना का हाथ थामे आरती भीड़ के बीच पहुंची तो सड़क पर खून से लथपथ पड़ी देह आराधना के प्यारे दादाजी विश्वंभर प्रसाद की थी. आराधना के मुंह से निकली चीख वहां खड़े लोगों के कलेजे को बेध गई. वह लाश पर गिरती, उस के पहले ही क्लब के विश्वंभर प्रसाद के साथियों ने उसे संभाल लिया.

आरती बारबार बेहोश हुए जा रही थी. अगलबगल की इमारतें जैसे उस के ऊपर टूट पड़ी हों और वह उस के मलबे से निकलने की कोशिश कर रही हो, इस तरह हांफ रही थी. उस में यह पूछने की भी हिम्मत नहीं थी कि यह सब कैसे हुआ. वहीं थोड़ी दूरी पर 2 कारें आपस में टकराई खड़ी थीं. कांप रहे 2 लड़कों को इंसपेक्टर डांट रहा था.

ये भी पढ़ें- बेवफा कौन ?

बाद के दिन इस तरह धुंध भरे रहे, जैसे पहाड़ी इलाके में कोहरा छाया हो. आरती की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. सूरज उगता, कब रक्तबिंदु बन कर डूब जाता, पता ही न चलता. विश्वंभर प्रसाद का अंतिम संस्कार, शांतिपाठ सब हो गया था. चाहे बेटा समझो या पोती, जो कुछ भी थी, अरू ही थी.

यह सब जो हुआ था, बाद में पता चला कि 17 साल के निनाद को कार चलाने का चस्का लग चुका था. मांबाप घर में नहीं थे, इसलिए मौका पा कर दोस्त के साथ कार ले कर निकल पड़ा था. तेज ड्राइविंग का मजा लेने के लिए वह तेज गति से कार चला रहा था.

सुबह का समय था, सड़क खाली थी इसलिए वह लापरवाह भी था. अचानक सामने से कुत्ता आ गया. उस ने एकदम से ब्रेक लगाई, सड़क के किनारेकिनारे विश्वंभर प्रसाद आ रहे थे, निनाद स्टीयरिंग पर काबू नहीं रख पाया और…

यह जान कर आराधना का खून खौल उठा था. अपने मजे के लिए निनाद ने उस के दादाजी की जान ले ली थी. उस की आंखों के आगे से दादाजी की खून से लथपथ देह हट ही नहीं रही थी. उस की दुनिया जिस दादाजी के नाम के मजबूत स्तंभ पर टिकी थी, वह स्तंभ एकदम से टूट गया था, जिस से उस की हंसतीखेलती दुनिया उजड़ गई थी.

आरती जानती थी कि अगर वह टूट गई तो आराधना को संभालना मुश्किल हो जाएगा. सुबोध जब उसे छोड़ कर गया था, उस की गृहस्थी के रथ का दूसरा पहिया ससुर विश्वंभर प्रसाद बन गए थे, जिस से जीवन की गाड़ी अच्छे से चल पड़ी थी. लेकिन उन के अचानक इस तरह चले जाने से अब आराधना के जीवन की डोर उस के हाथों में थी.

‘‘मम्मी, मैं प्रैस जा रही हूं. आप भी चलेंगी?’’

‘‘क्यों?’’ आरती ने पूछा.

‘‘मैं मीडिया के जरिए सब को यह बताना चाहती हूं कि एक गैरजिम्मेदार जिस लड़के की वजह से मेरा घर बरबाद हो गया, मेरे सिर का साया उठ गया, उसे थाने से ही जमानत मिल गई. इस का मतलब मेरे दादाजी के जीवन की कीमत कुछ नहीं थी. मैं उस के घर जाना चाहती हूं, उस के मांबाप से लड़ना चाहती हूं कि कैसा है उन का पुत्ररत्न? मैं उसे छोड़ूंगी नहीं, हाईकोर्ट जाऊंगी. आखिर मांबाप ने उसे कार दी ही क्यों?’’

‘‘कल मैं उस के घर गई थी अरू, उस की मां मिली थी.’’ आरती ने धीरे से कहा.

‘‘व्हाट?’’

‘‘तुम्हारी तरह मैं भी उस की मां से लड़ना चाहती थी, पर…’’

‘‘पर क्या?’’

ये भी पढ़ें- Short Story: हिंदी की दुकान

‘‘मैं ने उस की मां को देखा. एक ही बेटा है, जो जवानी की दहलीज पर खड़ा है. नादान और गैरजिम्मेदार है, लेकिन वही उन का सहारा है. उसी पर उन की सारी उम्मीदें टिकी हैं. सर्वस्व लुट जाने का दुख मैं जानती हूं बेटा.

इस समय उस के मांबाप कितना दुखी, परेशान और डरे हुए हैं, यह मैं देख आई हूं. ऐसे में आग में घी डालने वाले शब्दों से उन के मन को और दुखी करना या उन्हें परेशान करने से क्या होगा अरू. मैं ने उन्हें माफ कर दिया बेटा. निनाद को भी माफ कर दिया.’’

‘‘मेरे दादाजी के हत्यारे को आप ने माफ कर दिया मम्मी?’’

‘‘क्या करूं बेटा, मां हूं न.’’ कह कर आरती अंदर चली गई.

आराधना को एक बार फिर महाभारत की द्रौपदी की याद आ गई.

Mother’s Day Special: मोह का बंधन- भाग 3

रोज की मालिश और दवा ने कमाल दिखाया तो 2 दिन में ही उन के पैर में आराम आ गया. अगले दिन वे सब घूमने निकल पड़े. बच्चों ने उन्हें एक शानदार मौल में घुमाया, कुछ शापिंग हुई और फिर सब ने चाट का आनंद लिया. बीना ने बहुत समय के बाद इतना सैरसपाटा किया था. उन का मन खुश हो उठा.

अगले दिन सुशांत ने मां को बताया कि इस रविवार को वह अपनी तरक्की होने की खुशी में दोस्तों कोपार्टी दे रहा है और पार्टी घर में ही रखी गई है तो बीना सोच में पड़ गईं कि उन सब अनजान चेहरों के बीच वह तो अलगथलग ही पड़ जाएंगी.

तभी सुशांत बोल पड़ा, ‘‘मां, उस दिन आप को हमारे साथ अपने वित्तीय अनुभव शेयर करने होंगे. उन से हमें भविष्य की योजना बनाने के लिए सही दिशा मिलेगी.’’

सुशांत की इस पेशकश ने बीना की उलझन को पल में सुलझा दिया पर साथ ही उन्हें हैरानी भरे एक नए मंजर में छोड़ दिया. वह तो उन दोनों से एक दूरी बनाए रखने की निरंतर कोशिश कर रही थीं पर उन्होंने उसे दूर होने कहां दिया था. क्या उन्हें अपनी जिंदगी में सचमुच मां की जरूरत थी या फिर यह एक दिखावा भर था? बारबार ऐसे खयाल उन के जेहन में आ रहे थे पर वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थीं.

रविवार की सुबह सुशांत ने पूछ लिया कि मां, आप की टाक का विषय क्या रहेगा?

‘‘अब यह तो शाम को ही पता चलेगा. सब्र करो, सब्र का फल मीठा होता है, क्यों मांजी?’’ अमृता ने चुटकी ली तो तीनों हंस पड़े.

बीना ने तैयारी तो की थी पर वह असमंजस में थीं कि क्या इतनी बड़ीबड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोगों के लिए उस की बातों का कुछ महत्त्व होगा.

शाम हुई तो एकएक कर मेहमानों का आना शुरू हो गया. अमृता और सुशांत गर्व से सब से मां का परिचय कराते जा रहे थे. थोड़ी देर बाद सुशांत ने सब का ध्यान आकर्षित किया, ‘‘दोस्तो, पार्टी है तो मौजमस्ती तो होगी ही पर साथ ही एक्सपर्ट एडवाइज भी हो जाए तो क्या बात है. तो मिलिए, आज की हमारी वित्तीय एक्सपर्ट श्रीमती बीना वर्मा से.’’

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बीना सामने आईं और उन्होंने ‘सुरक्षित वित्तीय निवेश’ के तरीकों पर प्रकाश डाला. सभी ने बहुत ध्यान से उन की बातें सुनीं और प्रशंसा की. थोड़ी देर में डिनर खत्म हो गया. सब ने सुशांत को फिर से बधाई दी और पार्टी संपन्न हो गई.

आज की शाम बीना को जो सम्मान मिला था उतना सम्मान तो उन्हें अपने आफिस में भी कभी नहीं मिला था जहां के लोगों को वह हमेशा अपना समझती थीं.

वह अभी इसी ऊहापोह में थीं कि सुशांत और अमृता आ गए. अमृता ने पूछा, ‘‘मांजी, पार्टी कैसी रही? हमें तो आप की टाक ने बहुत प्रभावित किया पर आज आप बहुत थक गई होंगी. चलिए, अब आराम कीजिए.’’

सुशांत ने उसी समय 2 लैपटाप दिखाते हुए कहा, ‘‘देखिए मां, प्रशांत भैया ने हमारे लिए क्या भेजा है? बिलकुल लेटेस्ट टेक्नोलाजी का लैपटाप. यह मेरी तरक्की का उन की ओर से गिफ्ट है.’’

‘‘चलो, यह तो बहुत अच्छा हुआ,’’ बीना बोलीं, ‘‘अब तुम दोनों घर पर अपने पर्सनल लैपटाप पर काम कर सक ोगे.’’

‘‘मांजी, यह दूसरा वाला तो आप के लिए है,’’ अमृता ने कहा, ‘‘भैयाजी ने खास आप के लिए भेजा है ताकि दूर रह कर भी आप हमसब के पास रह सकें. कल मैं आप को इस पर बातें करना सिखाऊंगी. सच, बड़ा मजा आएगा.’’

बीना भौचक्की रह गईं. क्या प्रशांत उन के बारे में इतना सोचता है? वह तो अब तक यही सोचती थीं कि परदेस में उसे मां की याद कहां आती होगी पर उन की सोच शायद गलत थी.

अगले दिन सुशांत ने उन्हें अपने लैपटाप पर प्रशांत और जूही द्वारा उन के लिए भेजे गए संदेश दिखाए. उन्हें पढ़ कर बीना की आंखें नम हो उठीं. इतना प्यार भरा था उन शब्दों में कि उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ.

प्रशांत ने उन से अपने लिए एक ईमेल अकाउंट खोलने के लिए बहुत बार कहा था पर उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया. आज पता चला कि प्रशांत उन की कितनी कमी महसूस करता है. आज बीना का दिल एक अजीब सी खुशी महसूस कर रहा था.

अगला दिन पैकिंग करने में बीता. बीना सोचती रहीं कि 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. शाम हुई तो सुशांत और अमृता फिर से दोहराने लगे, ‘‘मां, अब भी समय है, टिकट कैंसिल करा देते हैं. कुछ दिन और आप हमारे साथ रह जाओ. अभी तो जी भर के बातें भी नहीं हो पाई हैं.’’

ये भी पढ़ें- दो पहलू

‘‘बेटा, आनाजाना तो लगा ही रहेगा. फिर अब तो यह लैपटाप आ गया है न. इस से चैट करूंगी तुम सब से,’’ बीना ने मजाक के लहजे में कहा और अमृता को पास बुलाया फिर एक सुंदर सा हार उसे भेंट में दिया. उन्हें तो गहनों का कोई मोह रह नहीं गया था इसलिए वह चाहती थीं कि उन की चीजें बच्चों के काम आ जाएं. गहनों के लिए बहुएं आपस में लड़ें या उन में मनमुटाव हो, ऐसी स्थिति से वह बचना चाहती थीं और यही सोच कर हार बंगलौर ले आई थीं.

हार देख कर अमृता मुसकराने लगी तो बीना ने यह सोचा कि कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की कि शायद पुराने डिजाइन के बारे में वह उन से शिकायत नहीं करना चाहती होगी.

तभी सुशांत मां के हाथ में एक चाबी थमाते हुए बोला, ‘‘ठीक है, मांजी, आप इस हार को भी नए लौकर में रख दीजिएगा.’’

बीना हैरानी से बेटे की ओर देखने लगीं तो सुशांत ने बताया कि अमृता के कहने पर ही उस ने मोहननगर में आप के नाम से एक लौकर खुलवाया था. अमृता ने शादी में मिले सभी जेवर व नकदी, यह कहते हुए उस में रख दिए थे कि ये सब निशांत की शादी में काम आएंगे. आज उपहार- स्वरूप उन दोनों ने मां को उसी की चाबी भेंट की थी.

इतना जानना था कि बीना सोफे पर गिर सी गई. वह तो सदा इसी बात से आशंकित रहीं कि बच्चों का प्यारमनुहार शायद स्वार्थ से प्रेरित एक दिखावा था. अनेक अवसर आए जब उन का जी चाहा था कि बच्चों को गले से लगा लें पर अपने दिल की आवाज को दबाए रखा क्योंकि वह मोह के बंधन से आजाद रहना चाहती थीं. ऐसे मोह का परिणाम दुखद ही होगा, यही उन का विश्वास था पर आज उन्हें एहसास हुआ कि मोह के बंधन में न बंधने के चक्कर में वह तो बच्चों से स्नेह करना ही भूल गईं और इस सब में उन के बच्चे उन से कहीं आगे निकल गए. अलगथलग रहने के प्रण ने उन्हें पल भर भी बच्चों के साथ का सच्चा आनंद नहीं उठाने दिया था पर अब उन की आंखें खुल गई थीं.

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special: मां का फैसला

तभी सुशांत ने मां को हिलाते हुए पूछा, ‘‘मां, कहां खो गई थीं आप?’’

बीना ने बेटे को गले लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, सोच रही थी कि तेरी बात मान ही लूं.’’

सुनते ही सुशांत और अमृता के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई. अमृता ने फौरन कहा, ‘‘चलो, मांजी, फिर कुछ दिन तो मैं इस हार को जरूर पहन पाऊंगी,’’ यह सुन कर सब हंस पड़े. बीना ने खुशीखुशी बहू को अपना हार पहना दिया.

आज उन के चेहरे पर संतुष्टि की नई दमक थी. बच्चों के प्यार ने उन्हें रोक जो लिया था क्योंकि उन के मोह में पड़ने को उस का मन ललक उठा था. आखिर मोह को बंधन मानने के बंधन से उन्हें मुक्ति जो मिल गई थी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें