आंदोलन: एक राकेश टिकैत से हारी सरकार

आजादी के लिए किए गए आंदोलन से ले कर बाकी आंदोलनों तक किसान मुख्य धुरी रहा, पर उसे कभी श्रेय नहीं दिया गया. 3 कृषि कानूनों को ले कर पहली बार किसानों की ताकत को स्वीकार किया गया है.

इस से पहले किसानों को तरहतरह से बदनाम करने की जुगत की गई. राकेश टिकैत को सोशल मीडिया पर ‘राकेश डकैत’ लिखा गया. पर एक साल तक लंबी लड़ाई लड़ कर किसानों ने साबित कर दिया कि सही तरह से सरकार का विरोध हो तो कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है. ममता बनर्जी की तरह ही राकेश टिकैत ने भाजपा के ‘राजसूय यज्ञ’ को कामयाब होने से रोकने का काम किया.

कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर जब किसान नेता राकेश टिकैत ने आंदोलन शुरू किया, तो उस समय उन को सब से कमजोर नेता माना जा रहा था. यह पंजाब और हरियाणा के किसानों की लड़ाई मानी जा रही थी. उत्तर प्रदेश में इस को केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित माना जा रहा था.

पर, जैसेजैसे किसान आंदोलन आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे इस पर किसान नेता चौधरी राकेश टिकैत की पकड़ बढ़ती गई. 26 जनवरी, 2021 में जब किसानों ने ट्रैक्टर रैली की और लालकिले पर  झंडा उतारा गया, उस के बाद लगा कि किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा. पर इस घटना के बाद से किसान आंदोलन की कमान पूरी तरह से राकेश टिकैत के हाथ आ गई.

राकेश टिकैत के खिलाफ सरकार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता लामबंद होने लगे. इस से दुखी हो कर राकेश टिकैत की आंखों से आंसू निकल गए. राकेश टिकैत ने खुद को मजबूत करते हुए किसान आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया.

वहां से किसान आंदोलन की कमान राकेश टिकैत के पास आ गई. ऐसा लगा, जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट किसानों ने इस को अपनी बेइज्जती माना.

धीरेधीरे यह लड़ाई उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों में फैलने लगी. भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली के बौर्डर के साथसाथ लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, लखनऊ और पूरे उत्तर प्रदेश के किसानों को एकजुट करना शुरू किया. अब उत्तर प्रदेश किसान आंदोलन का अगुआ बन गया था.

ये भी पढ़ें- अखिलेश और जयंत क्या गुल खिलाएंगे!

आलोचनाएं दरकिनार

52 साल के राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन नामक संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. वे भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष रह चुके महेंद्र सिंह टिकैत के दूसरे बेटे हैं.

साल 2020 में कृषि कानून के विरोध में गाजीपुर बौर्डर पर धरनाप्रदर्शन को ले कर राकेश टिकैत चर्चा में आए. उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए की उपाधि हासिल की और साल 1992 में दिल्ली पुलिस में नौकरी की, लेकिन 1993-94 में लालकिले पर किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने दिल्ली पुलिस की नौकरी छोड़ दी और भारतीय किसान यूनियन के सदस्य के रूप में विरोध में शामिल हो गए.

इस के बाद से ही राकेश टिकैत की किसान राजनीति तेजी से आगे बढ़ने लगी. उन्होंने साल 2018 में हरिद्वार (उत्तराखंड) से ले कर दिल्ली तक ‘किसान क्रांति’ यात्रा निकाली.

राकेश टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता से डरे लोगों ने कभी उन को कांग्रेस का ‘दलाल’ कहा, तो कभी भाजपा का ‘दलाल’. कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई तेज करने के बाद भाजपा की आईटी सैल ने राकेश टिकैत का नया नामकरण ‘राकेश डकैत’ कर दिया.

उन के घरपरिवार और बच्चों के साथसाथ उन की जमीनजायदाद पर उंगली उठाई गई. पर राकेश टिकैत अपनी आलोचना से कभी डरे नहीं और कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी. जब केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का काम किया तो भी राकेश टिकैत ने कहा, ‘जब तक एमएसपी की गारंटी नहीं दी जाएगी, तब तक आंदोलन वापस नहीं होगा.’

राकेश टिकैत सम झदार नेता हैं. वे खेतीबारी से जुड़े हैं. उन्हें पता है कि किसान की उपज का लाभ बिचौलिए खा रहे हैं. किसान की पहली परेशानी खेती की उपज का सही दाम नहीं मिलना है. अगर एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी सरकार दे तो ही किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा.

ये भी पढ़ें- ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

किसान सरकार से सही कीमत के लिए लड़ सकता है. अगर मंडी निजी क्षेत्रों में चली गई, तो किसान वहां अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाएगा. ऐसे में एमएसपी पर गांरटी सब से जरूरी है.

किसानों से जुड़ी जनता

राकेश टिकैत नेता नहीं, बल्कि एक किसान हैं. यही वजह है कि वे दूसरे नेताओं जैसे दांवपेंच के माहिर नहीं हैं. वे 2 बार चुनाव लड़े और दोनों ही बार हार गए. इस हार को ले कर उन की आलोचना होती है और उन्हें कभी देश के किसानों का नेता नहीं माना गया.

इस के बाद भी राकेश टिकैत ने कभी इन बातों की परवाह नहीं की. वे किसानों के हित में अपनी आवाज को बुलंद करते रहे. कृषि कानूनों के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्हें वजनदार नेता नहीं माना गया था, पर धीरेधीरे वे किसान आंदोलन की धुरी हो गए.

यही वजह है कि किसान आंदोलन में राकेश टिकैत ने किसी भी सियासी पार्टी के नेताओं को आगे नहीं आने दिया. इस में उन्होंने केवल किसानों को ही जोड़ा और आंदोलन को मजबूत बनाया.

साल 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव है. किसान आंदोलन के चलते किसान सरकार से नाराज चल रहे थे. केंद्र सरकार की ‘किसान सम्मान निधि’ से भी किसान खुश नहीं थे, जिस की वजह से किसान और गांव के रहने वालों ने उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में भाजपा को हराने का काम किया.

राकेश टिकैत की दूसरी बड़ी कामयाबी यह थी कि जब वे जहांजहां जाते थे, तो कृषि कानूनों के साथसाथ बढ़ रही महंगाई, बेरोजगारी पर बात करते थे. वे आंदोलन कर रहे लोगों

का समर्थन करते थे, खुल कर और पूरी बेबाकी से सरकार के खिलाफ बोलते थे, जिस की वजह से किसानों और गांव के लोगों के साथसाथ आम शहरी लोगों का भी समर्थन उन्हें मिलने लगा था.

राकेश टिकैत आम लोगों को किसानों की परेशानियों से जोड़ने लगे, जिस में कृषि कानूनों के अलावा महंगाई, खाद, डीजल, पैट्रोल और छुट्टा जानवरों की परेशानियां थीं. मीडिया में जितना कोई नेता नहीं छप रहा था, उस से कहीं ज्यादा जगह किसान आंदोलन को मिलने लगी.

सरकार की परेशानी की वजह यह थी कि किसान के मुद्दे सुर्खियां बन रह रहे थे. किसान आंदोलन को तमाम कोशिशों के बाद भी खालिस्तानी या देश विरोधी साबित नहीं किया जा सका. इतना ही नहीं, यह किसान आंदोलन धर्म के मुद्दे को भी प्रभावित कर रहा था. इस से यह डर लगने लगा था कि यह एक साल चल गया और इस से ज्यादा चला तो धर्म की राजनीति पिटने लगेगी. लोग धर्म से ज्यादा किसान राजनीति की बात करने लगे थे.

झुके भी पर हटे नहीं

किसान आंदोलन की राह में 2 बड़े मोड़ आए थे, जब लगा कि अब किसान आंदोलन खत्म करने का रास्ता सरकार को मिल गया. राकेश टिकैत ऐसे मुद्दों पर  झुकते दिखे, पर आंदोलन से पीछे नहीं हटे. लालकिले की घटना के बाद सारे किसान नेता आंदोलन छोड़ कर पीछे हट गए, इस के बाद भी राकेश टिकैत डटे रहे.

दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटी, जहां 4 किसानों को कार से कुचल कर मार दिया गया. राकेश टिकैत ने  झुक कर सरकार और प्रशासन की बात को माना, लेकिन यह साफ कर दिया कि किसान आंदोलन चलता रहेगा.

लोगों को लग रहा था कि सरकार इस की आड़ ले कर किसान आंदोलन को तोड़ देगी. राकेश टिकैत की कामयाबी यह थी कि उन्होंने किसान आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया.

यही वजह है कि किसानों की ताकत के आगे हिंदुत्व की ताकत कमजोर पड़ने लगी. पौराणिक सोच रखने वाले नेताओं को लगा कि किसान आंदोलन कहीं हिंदुत्व के मुद्दे को कमजोर न कर दे. कोई अलग धारा न बन जाए. इस से बेहतर है कि कृषि कानूनों को खत्म किया जाए.

साल 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनावों को बहाना बना कर इस काम को किया गया, जिस से जनता को यह चुनावी स्टंट ही सम झ आता रहे. धर्म की हार की बात सामने ही न आ सके.

ये भी पढ़ें- सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन में मंदिरों की भूमिका पर सवाल उठाए थे. ऐसे में किसान और धर्म आमनेसामने न आ जाएं और धर्म को नुकसान न हो, इस कारण कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया. इस का श्रेय किसानों की एकजुटता को जाता है, जो अपने बलबूते लड़ाई लड़ते रहे और जीत हासिल की.

किसान की एक नजर खेती पर और दूसरी राजनीति पर – राकेश टिकैत, किसान नेता कृषि कानूनों के वापस होने के बाद पहली बार राकेश टिकैत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आए और इको गार्डन धरना स्थल पहुंच कर अपनी राय रखी. कुछ सवालों के जवाब उन्होंने अपने ही अंदाज में दिए :

कृषि कानूनों के वापस होने के बाद किसान आंदोलन को क्या खत्म माना जा रहा है?

किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ है. हमारा आंदोलन चलता रहेगा. यह आंदोलन अब पूरे देश में चल रहा है. किसानों ने तय किया है कि जब तक एमएसपी पर सरकार कानून बना कर गांरटी नहीं देगी, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा.

सारे देश के किसानों को एमएसपी के जरीए खेती की उपज की सही कीमत दिलानी है. एमएसपी का फायदा पूरे देश के किसानों को मिलना चाहिए. पहले सरकार यह गांरटी दे.

क्या कृषि कानूनों के वापस लेने के पीछे उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव हैं?

किसान देश की सब से बड़ी ताकत है. कृषि कानूनों को वापस ले कर सरकार ने केवल एक मांग मानी है. किसानों के लिए जरूरी है कि उन की दूसरी मांगें भी मानी जाएं. किसान आंदोलन में सैकड़ों किसान शहीद हुए हैं. हम अपने किसान भाइयों के बलिदान को बेकार नहीं जाने देंगे.

किसान के लिए खाद, बीज, सिंचाई, डीजल, पैट्रोल की कीमतें और खेती की उपज की सही कीमत दी जाए, जिस से उन्हें राहत मिले. छुट्टा जानवरों की परेशानी से नजात दिलाई जाए.

इस आंदोलन को तकरीबन एक साल हो गया है. आप ने किसानों को कैसे इस आंदोलन से जोड़ कर रखा?

सरकार किसानों की जमीन बड़ी कंपनियों को देने की तैयारी में थी. यह बात किसान सम झ गया था. किसान कभी भी अपने सम्मान का सौदा नहीं कर सकता. कंपनी का राज आने से किसान ही नहीं, बल्कि दूसरे लोग भी परेशान होते. जनता की रोटी बड़े लोगों की तिजोरी में कैद हो जाती. यह बात किसान सम झ गए हैं. इस के साथ में शहरी लोग भी सम झ गए हैं, तभी पूरे देश में किसान आंदोलन को समर्थन मिलने लगा.

सरकार लोगों को लड़ाने और तोड़ने का काम करती है. इन लोगों ने आंदोलन में शामिल हुए सिख समाज के लोगों को खालिस्तानी बता दिया और मुसलमानों को पाकिस्तानी. उत्तर प्रदेश के किसानों को केवल जाट बता दिया.

इन्होंने उत्तर प्रदेश के भीतर हिंदूमुसलिम दंगे कराए. ये लोग हरियाणा के अंदर गए तो वहां जाट और गैरजाट की राजनीति की. गुजरात के भीतर पटेल और गैरपटेल की राजनीति की.

इस तरह की घटनाओं के पीछे किस तरह के लोगों की सोच आप को दिखती है?

हम तो किसानों को यही सलाह देते हैं कि आरएसएस के लोग बेहद खतरनाक हैं. इन से बच कर रहो. बहुत से लोग सोचते हैं कि उन का बेटा पढ़लिख कर कलक्टर बनेगा. अब ऐसा नहीं होगा.

सरकार ने पिछले दरवाजे से बिना परीक्षा के ही आईएएस बनाने की तैयारी कर ली है. बिना परीक्षा के ही लगभग 40 लोगों को आईएएस बना दिया गया है, अभी 300 के करीब और बनेंगे.

किसानों को सजग रहना चाहिए. अपनी एक आंख दिल्ली पर तो दूसरी आंख खेती पर रखें. उत्तर प्रदेश सरकार गुंडागर्दी कर रही है. जिला पंचायत के चुनाव में सब ने देखा है. अब विधानसभा चुनाव में भी यही हो सकता है.

अखिलेश और जयंत क्या गुल खिलाएंगे!

आगामी 2022 में उत्तर प्रदेश में चुनावी समर कि अब रणभेरी बजने वाली है कि उससे पहले चुनावी बिसात का बिछना शुरू हो गया है. जिसमें सबसे पहले बाजी मारी है समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोक दल पार्टी के जयंत चौधरी ने. इन दोनों युवा नेताओं की युति जैसे ही एक मंच पर आई उत्तर प्रदेश की राजनीति मैं मानो एक भूचाल सा आ गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी उनकी भारतीय जनता पार्टी और दूसरी तरफ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए बेताब प्रियंका गांधी बड़े ही गंभीर भाव से इस गठबंधन को लेकर के गंभीर दिखाई दे रहे हैं.

परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा माहौल बनता दिखाई दे रहा है जिसमें अखिलेश यादव और जयंत चौधरी धीरे धीरे आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. क्योंकि उनकी रैली में जिस तरह लोगों की भीड़ उमड़ रही है वह अपने आप में संकेत दे रही है कि कुछ नया गुल खिलने जा रहा है. दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश ने जो नए आयाम गढ़े हैं उनके पक्ष में कहा जा सकता है कि आने वाले चुनाव में जहां योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व और उनके काम करने की शैली और साथ देश के भविष्य को देखते हुए राजनीति की सत्ता किस करवट बैठेगी यह सब देखने लायक होगा. इस बीच प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए जो राजनीतिक बिसात बिछाई है वह भी कम दिलचस्प नहीं है उन्होंने यह घोषणा करके सभी को चकित कर दिया है कि कांग्रेस अबकी बार अपने दम पर चुनाव लड़ने जाएगी.

ये भी पढ़ें- बोल कि लब “आजाद” हैं तेरे

इस रिपोर्ट में हम आपको कुछ ऐसे तथ्य बताने जा रहे हैं जो आपको चकित कर देंगे की उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या कुछ ऐसा भी होने जा रहा है जो किसी ने कभी कुछ सोचा ही नहीं था.

ऐसा भी होगा, किसने सोचा था?

कहते हैं, राजनीति में कभी कोई ना हमेशा के लिए मित्र होता है और ना ही हमेशा के लिए बैरी या शत्रु. यह तथ्य बारंबार भारतीय राजनीति के चरित्रों में भी हमने देखा है.

अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के प्रथम पंक्ति के नेता हैं जो एक समय मुख्यमंत्री रहे हैं और जिनके पास मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक थाती है. जब आप मुख्यमंत्री थे उस समय काल को याद करें तो उस दरमियान समाजवादी पार्टी के विशाल कुनबे में जो महाभारत हुआ उसके परिणाम स्वरूप समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश से सूपड़ा साफ हो गया.  दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी की  राष्ट्रीय पहचान मायावती ने एक समय में मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरीके से सत्ता का संचालन किया तो जन भावना उनके विपरीत हो गई. फलस्वरूप आप भी राजनीति की मुख्यधारा से हाशिए पर चली गई.

ऐसे में और क्या नया होना था आखिर भाजपा के सामने पूरा मैदान खाली था. प्रदेश में भारी बहुमत के साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी की छवि के बूते  योगी आदित्यनाथ की सरकार आ गई मगर 5 वर्षों के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ की छवि जहां एक  कार्यशील शख्सियत की है वहीं दूसरी तरफ अतिवाद के कारण लोगों में नाराजगी भी देखी जा रही है.

परिवर्तन देश की जनता की फितरत है चाहे कितना ही अच्छा हो जनता सत्ता को ताश के पत्तों की तरह फेंटती रहती है. इन परिस्थितियों के बीच यह कहना आसान नहीं की आगामी चुनाव में उत्तर प्रदेश में क्या होने जा रहा है मगर एक आम वोटर और नागरिक होने के नाते उत्तर प्रदेश का आम मतदाता यह भली-भांति जानता है कि चुनाव में वोट किस करवट बैठने जा रहा है.

ये भी पढ़ें- ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

समाजवादी और लोकदल

अखिलेश यादव राजनीति के मैदान में एक मंजे हुए खिलाड़ी के रूप में उत्तर प्रदेश में अब अपना स्थान बना चुके हैं. दरअसल, कोई भी शख्स जब 5 वर्ष तक मुख्यमंत्री रह लेता है तो वह प्रदेश की नब्ज को बहुत कुछ समझने लगता है और जब कोई शख्स 5 साल तक सत्ता में रहने  के बाद सत्ता से बाहर हो जाता है और लोगों के बीच रहता है तो वह कमजोर नहीं होता. अखिलेश यादव के साथ भी कुछ ऐसा ही है इन दिनों प्रदेश में जो राजनीतिक हवाएं चल रही हैं उसमें अखिलेश यादव का हंसमुख चेहरा और जयंत चौधरी की गंभीर मुद्रा नया गुल खिलाने के लिए तैयार है. जिस तरीके से इनकी रैलियों में लाखों लोग जुट रहे हैं और इन नेताओं को सुन रहे हैं उससे भारतीय जनता पार्टी और उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी भी चिंतित है. यही कारण है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की लाल टोपी पर तल्ख टिप्पणी करते हुए उसे प्रदेश के लिए खतरा बताया है. अब देखना यह रोचक होगा  कि “लाल टोपी” भाजपा के लिए खतरा है अथवा योगी आदित्यनाथ के लिए या फिर नरेंद्र दामोदरदास मोदी के लिए.

बोल कि लब “आजाद” हैं तेरे

यह सब इसलिए कि अपनी चिर परिचित शैली से अलग इन दिनों गुलाम नबी आजाद जिन्हें कभी मजाक में काग्रेस का “गुलाम” कहा जाता था अब खुलकर  रेलिया कर रहे हैं और कांग्रेस के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग बाण चला रहे हैं.

परिणाम स्वरूप उनकी रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है वही कांग्रेस आलाकमान के लिए यह एक चिंता का सबब बना हुआ है. लेकिन इन सबके बीच देश की सत्ता संभाल रही भारतीय जनता पार्टी और उसका आलाकमान जम्मू कश्मीर में शायद राजनीति की चौपड़ पर एक नया इतिहास लिखने के लिए बेताब है.

वहयह भली भांति जानता है कि भाजपा अकेले दम जम्मू कश्मीर में सत्ता नहीं वरण कर सकती ऐसे में गुलाम नबी आजाद की गलबहियां उसे रास आएंगी.

इधर, कांग्रेस आलाकमान अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारता हुआ दिखाई दे रहा है जिस तरीके से पंजाब में अमरिंदर सिंह जैसे बड़े कद के राजनीतिक हस्ती को कांग्रेस ने घर बैठे बाहर का रास्ता दिखा करके कांग्रेस को कमजोर किया, जैसा आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के साथ और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से पहले ममता बनर्जी के साथ शायद वही इतिहास की इबादत दोबारा लिखने के लिए कांग्रेस का भविष्य जम्मू कश्मीर में भी गुलाम नबी आजाद को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए लालायित है.

इन सब परिस्थितियों के बाद क्या जम्मू कश्मीर भी कांग्रेस के हाथों से बाहर नहीं निकल जाएगा?

आज हम इस रिपोर्ट में जम्मू कश्मीर की सियासी हलचल को लेकर के आपके समक्ष इस रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं जो यह बताएगा कि क्या गुलाम नबी आजाद के “आजाद लब” जम्मू कश्मीर की राजनीति में कुछ नयी आवाज बुलंद करने जा रहे हैं. आगामी परिसीमन के बाद जब चुनाव होंगे तो क्या मुख्यमंत्री के रूप में गुलाम नबी आजाद शपथ लेंगे.

ये भी पढ़ें- ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

गुलाम नबी आजाद की “आजादी”

राजनीतिक जानकार यह अच्छी तरह जानते हैं कि गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के एक ऐसे चेहरे हैं जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल के साथ भी घुले मिले हुए हैं. इस सब के बावजूद कांग्रेस पार्टी में “जी 123” का जो एक अलग कॉकस सामने आया है इसमें गुलाम नबी आजाद की उपस्थिति यह दर्शाती है कि उनके नाम में आरंभ भले ही गुलाम शब्द से होता है मगर वह हृदय से एक आजाद तबीयत के शख्स है. यही कारण है कि उन्होंने एक कर्तव्यनिष्ठ सच्चा कांग्रेसी होने के नाते कांग्रेस आलाकमान को आगाह किया कि अगर कांग्रेस को देश का नेतृत्व संभालना है तो पार्टी को महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए. मगर कांग्रेस ने इन सब चीजों को नकारा, अब हालात यह है कि जम्मू-कश्मीर में आजाद 4 दिसंबर तक लगातार  रैलियां करते रहे उनमें भारी भीड़ भी जुटती रही.यहां  स्पष्ट दिखाई दिया कि किस तरह गुलाम नबी आजाद को जम्मू कश्मीर की आवाम अपना समर्थन दे रही है. उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही है और राजनीतिक संकेत भी दिए हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि जहां वे कांग्रेस के प्रति आक्रामक है वहीं भाजपा के प्रति नरम दिखाई दे रहे हैं . नरेंद्र मोदी  देश की सरकार ने सबसे बड़ी रियासत जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांट दिया और केंद्र शासित राज्य बना दिया. इस पर आजाद अब मौन हैं.

ये भी पढ़ें- सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

दूसरी तरफ उनके खासम खास सारे बड़े नेता कांग्रेस को आंख दिखाते हुए पार्टी को लगातार छोड़ रहे हैं जिसका स्पष्ट संकेत यह है कि आने वाले समय में आजाद एक नई पार्टी का आगाज करने वाले हैं.

ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

पी .के . अर्थात प्रशांत किशोर जिन्हें आज भारतीय राजनीति की शतरंज का बाजीगर या चाणक्य कह सकते हैं- विक्रम और बेताल किस्से की तरह  आज देश की बहुचर्चित महिला नेत्री मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की पीठ पर बैठकर राजनीतिक सत्ता के प्रश्नों में ममता बनर्जी को कुछ इस तरह उलझाने कहें सुलझाने में लगे हैं कि देश में एक उथल-पुथल का दौर चल पड़ा है.

प्रशांत किशोर के सानिध्य में ममता बनर्जी अब देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हस्ती बतौर विपक्ष का केंद्र बनना चाहती हैं. प्रशांत किशोर का सीधा साधा गणित  है कि 2014 के बाद जिस तरह अधिकांश चुनाव में कांग्रेस खेत रही है ऐसे में कांग्रेस का विकल्प आज के समय में तृणमूल कांग्रेस ही है. जिस तरीके से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने शतरंज की बाजी बतौर राजनीतिक खेल खेला था उसमें ममता बनर्जी का जीतकर के सामने आना अद्भुत चमत्कारी कहानी जैसा है.

ये भी पढ़ें- झारखंड का बिहारीकरण: बोली के जरिए तकरार

हर कोई यही मान रहा था कि नरेंद्र मोदी के चक्रव्यूह में फंसकर के ममता बनर्जी राजनीति से हाशिए में जाना तय है. भाजपा हर हालात में पश्चिम बंगाल पर अपना  झंडा फहराएगी. ममता बनर्जी के तेवर  कुछ देश के मिजाज के कारण भाजपा तिनके की तरह उखड़ कर उड़ गई.

आज के हालात में आगामी 2024 के संसदीय चुनाव के मद्देनजर ममता बनर्जी कि यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो चुकी है की कांग्रेस का विकल्प सिर्फ तृणमूल कांग्रेस है. और भाजपा को सीधी चुनौती सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी इस देश में दे सकती हैं.

इस महत्वपूर्ण विषय पर आज हम इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे प्रश्नों को आपके समक्ष रख रहे हैं जिसकी बिनाह पर आप यह तय कर सकते हैं कि क्या सचमुच ममता बनर्जी नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भाजपा के कद को बौना साबित करने में सफल हो सकती है. अथवा ममता बनर्जी की महत्वकांक्षा के कारण एक बार फिर नरेंद्र दामोदर दास मोदी को सफलता मिल जाएगी.

सुब्रमण्यम स्वामी का सर्टिफिकेट!

ममता बनर्जी ने जिस तरीके से अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को चुनौती दी है वह अपने आप में प्रासंगिक  है.

यही कारण है कि जहां उन्हें सुब्रमण्यम स्वामी जैसे उथल-पुथल मचाने वाले राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने एक तरह से छवि बनाने में मदद की है, वहीं महाराष्ट्र में राजनीति के शरद पवार ने भी साथ खड़ा होने का संकेत दे दिया है.

दरअसल, कांग्रेस आज जिस तरीके से अपने ही मकड़जाल में उलझी हुई है वह एक संक्रमण का समय कहा जा सकता है. कांग्रेस राहुल और सोनिया गांधी के बीच झूल रही है, राहुल गांधी किसी पद पर नहीं होने के बावजूद हर एक मुद्दे पर बोल रहे हैं और अपना डिसीजन दे रहे हैं. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कुछ नया करना चाहती है. दूसरी तरफ कांग्रेस के  बड़े चेहरे कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद जैसे 23 नेता अपना एक अलग राग अलाप रहे हैं डफली बजा रहे हैं. परिणाम स्वरूप कांग्रेस की स्थिति लंबे राजनीतिक समय काल में सबसे कमजोर स्थिति में आ चुकी है कांग्रेस कुछ थकी हुई और उलझी हुई दिखाई दे रही है. भाजपा को जिस तरीके से घात प्रतिघात एक विपक्ष के द्वारा दिया जाना चाहिए कांग्रेस उसमें कमतर बनी हुई है.

ऐसे में निसंदेह राजनीतिक महत्वाकांक्षा  जागृत होनी ही है और यह समय की मांग भी कही जा सकती है. ममता बनर्जी ने जिस तरीके से विपक्ष के गठबंधन पर सवाल उठा दिया है और ताल ठोक के भाजपा और नरेंद्र दामोदरदास मोदी के खिलाफ बिगुल बजाया है उससे सबसे ज्यादा सकते में कोई है तो वह कांग्रेस पार्टी ही है. क्योंकि यह सीधे-सीधे उसे चुनौती मिल रही है की सत्ता सिंहासन खाली करो की ममता बनर्जी आ रही है!

ये भी पढ़ें- सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

शायद यही कारण है कि कांग्रेस आज मुखर हो करके ममता बनर्जी पर हमला कर रही है. मगर आने वाले समय में अगर कांग्रेस ने अपने आप को अपनी जमीन पर मजबूती से खड़े होकर के अपनी “ताकत” नहीं दिखाई तो उसे उखड़ कर ममता बनर्जी को अथवा अरविंद केजरीवाल को रास्ता देना होगा, यह समय की मांग बन जाएगी.

देश की राजनीति में कई कई बार उथल-पुथल मचाने वाले और एकला होते हुए भी अपने अस्तित्व को एक राष्ट्रीय पार्टी की ताजा प्रदर्शित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने एक बड़ी गहरी बात कही है की राजनीतिक इतिहास में उन्होंने – जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, राजीव गांधी पीवी नरसिम्हा राव और मोरारजी  भाई देसाई जैसा कथनी और करनी में आज की राजनीति में किसी को पाया है तो वह ममता बनर्जी है.

सुब्रमण्यम स्वामी का यह सर्टिफिकेट ममता बनर्जी के लिए बहुत काम आने वाला है. क्योंकि आज की राजनीति में सबसे बड़ा संकट कथनी और करनी का ही है. ममता बनर्जी जिस तरीके से सादगी पूर्ण जीवन जी रही है वह देश की जनता को अपील करता है और अपनी और आकर्षित करता है उनमें महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी जैसे व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती है. आने वाले समय में जिस तरीके से तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ बनाने में लगी हुई है उसका सकारात्मक परिणाम भी आ सकता है कि भारतीय जनता पार्टी केंद्र से उखड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

झारखंड का बिहारीकरण: बोली के जरिए तकरार

बिहार और ?ारखंड के बीच एक नया विवाद शुरू हो गया है. इस इलाकाई कार्ड के विवाद की आग को शुरू किया ?ारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उसे हवा दे दी है.

हेमंत सोरेन ने यह कह कर बवाल मचा दिया कि ?ारखंड में रहने वाले मगही और भोजपुरी बोलने वाले दबंग हैं और वे लोग ?ारखंड का बिहारीकरण कर रहे हैं, जिसे किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं किया जाएगा.

वहीं नीतीश कुमार ने हेमंत सोरेन पर पलटवार करते हुए कहा कि सियासी फायदा उठाने के लिए ऐसी बयानबाजी से बचना चाहिए. इस के बाद बिहार और ?ारखंड के कई नेताओं ने एकदूसरे के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया है.

गौरतलब है कि मार्च, 2018 में उस समय की भाजपा सरकार ने मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को दूसरी भाषा का दर्जा दिया था. अब हेमंत सरकार ने भाजपा की रोजगार नीति को पलट दिया है और ?ारखंड स्टेट सर्विस कमीशन में क्वालिफाइंग के लिए इन चारों भाषाओं को हटा दिया है.

इस मसले पर हेमंत सोरेन कहते हैं कि पहले की सरकार ने ऐसी बहाली नीति बना रखी थी, जिस से लोकल लोगों से ज्यादा बाहरी लोगों को मौका मिलता था. ?ारखंड राज्य आदिवासियों और स्थानीय लोगों की तरक्की के लिए बना था, न कि मगही और भोजपुरी बोलने वालों के लिए. बिहार और भोजपुरी व मगही भाषा के खिलाफ मोरचा खोल कर हेमंत सोरेन ने स्थानीयता का कार्ड खेला है.

हेमंत सोरेन यहीं नहीं रुकते हैं, बल्कि वे भोजपुरी और मगही बोलने वालों पर यह आरोप लगा देते हैं कि जब अलग ?ारखंड राज्य बनाने की लड़ाई चल रही थी, तो भोजपुरी और मगही बोलने वाले आदिवासियों को गंदीगंदी गालियां देते थे और आदिवासी औरतों के साथ गलत बरताव करते थे. इस से उन के मन में भोजपुरी और मगही वालों के खिलाफ काफी गुस्सा है.

ये भी पढ़ें- तीन कृषि कानून: प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की गलतियां

3 करोड़, 30 लाख की आबादी वाले ?ारखंड राज्य में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की आबादी तकरीबन साढ़े 6 फीसदी है, वहीं आदिवासियों की तादाद 26 फीसदी है. हिंदी के अलावा बंगला, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुट्टमाली, कुडुख, संथाली, मुंडारी, हो वगैरह बोलियां बोली जाती हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाषा के इस बवाल के बारे में कहते हैं कि बिहार और ?ारखंड तो भाईभाई हैं. ऐसे मसलों पर सोचसम?ा कर बोलना चाहिए. अगर इस से किसी को सियासी फायदा मिलता है तो ले ले, लेकिन ऐसे मसलों से दूर ही रहना चाहिए.

पिछले दिनों हेमंत सोरेन ने कह दिया कि भोजुपरी और मगही उधर की भाषा है और इसे बोलने वाले लोग ?ारखंड को बिहार बनाना चाहते हैं. ?ारखंड पर कब्जा करना चाहते हैं. स्थानीय भाषा पर ये दोनों बाहरी भाषाएं हावी हैं. अब समय आ गया है कि ?ारखंड की तरक्की के लिए लोकल भाषाओं को बढ़ावा दिया जाए.

ऐसा नहीं करने से आदिवासी राज्य और इलाकाई बोलियों का वजूद ही खत्म हो जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि हेमंत सोरेन की पढ़ाई पटना में हुई है और वे खुद अच्छीखासी मगही बोल लेते हैं.

ये भी पढ़ें- सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

हेमंत सोरेन से पहले ?ारखंड के मुख्यमंत्री रहे रघुवर दास कहते हैं कि हेमंत सोरेन की नीति ‘बांटो और राज करो’ की रही है. चुनाव से पहले उन्होंने  बढ़चढ़ कर ऐलान किया था कि 5 लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी.

मुख्यमंत्री अपने वादे को भूल गए हैं. अब जनता का ध्यान भटकाने के लिए वे ऐसा बचकाना बयान दे रहे हैं. मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे केवल आदिवासियों के मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि ?ारखंड की साढ़े 3 करोड़ जनता के सेवक हैं.

हेमंत सरकार के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव आग में घी डालते हुए कहते हैं कि क्या बिहार में संथाल और उरांव भाषा को मान्यता दी जाएगी? बिहार में रहने वाले संथाल और उरांव जातियों के लोगों की भाषा को सरकारी नौकरियों में मान्यता क्यों नहीं दी जाती है?

गौरतलब है कि बिहार के सहरसा, पूर्णियां, कटिहार, बांका, बेतिया और बगहा जिलों में संथाल और उरांव जातियों की बड़ी आबादी है.

बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल कहते हैं कि ?ारखंड के मुख्यमंत्री समाज को बांटने की कोशिश में लगे हुए हैं, जो राज्य और जनता के भले के लिए नहीं है.

?ारखंड हाईकोर्ट के वकील अभय सिन्हा कहते हैं कि बिहार के पढ़ेलिखे लोग ?ारखंड सरकार में ऊंचे पदों पर कायम हैं, इसी से हेमंत सोरेन को चिंता हो रही है.

हेमंत सोरेन आदिवासियों की बेहतरीन पढ़ाईलिखाई का इंतजाम करने और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के बजाय राजनीति का कार्ड खेल रहे हैं और आदिवासियों को लौलीपौप दिखा कर सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक मजबूत करने की फिराक में हैं.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अगर आदिवासियों को पढ़ालिखा कर बाहरी लोगों के बराबर खड़ा करेंगे, तभी आदिवासियों की तरक्की होगी और बाहरी लोगों का दबदबा भी खत्म होगा.

तीन कृषि कानून: प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की गलतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के व्यक्तित्व को करीब से जानने समझने वाले यह जानते हैं कि वह एक ऐसे राजनेता हैं जो पीछे मुड़कर नहीं देखते. या फिर यह कहें की आप यह भ्रम पैदा करते हैं की उन्होंने जो कदम उठाए हैं वह अंतिम सत्य हैं. और अगर कोई आलोचना करता है या उसमें मीन मेख निकालता है तो वह स्वयं गलत है. और फिर आगे चलकर के उनके समर्थक विरोध करने वालों पर ऐसे ऐसे आरोप लगाते हैं कि मानो नरेंद्र दामोदरदास मोदी का विरोध देश का विरोध है.

यही सब कुछ बहुत ही शिद्दत के साथ 1 साल तक तीन कृषि कानून के संदर्भ में यह प्रहसन भी देश और दुनिया ने देखा है.

पहले पहल तो इन तीन कृषि कानूनों को आनन-फानन में संसद में पास करवा दिया गया. और जब इसका विरोध हुआ तो कहा गया कि नहीं जो भी हुआ है वह सब तो कानून सम्मत है. क्योंकि नरेंद्र दामोदरदास मोदी तो देश के संविधान और कानून से हटकर के कुछ करते ही नहीं है. और फिर जब इन तीन कानूनों का विरोध होने लगा तो यह कहा गया कि जो लोग जो कानून को अपने हाथ में ले  रहे हैं वह लोग तो भोले भाले हैं और विपक्ष के नेताओं का मोहरा बने हुए हैं.

ये भी पढ़ें- सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

एक साल के इस लंबे विरोध और रस्साकशी के दृश्य ब दृश्य यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने संपूर्ण कबीना और उनकी भारतीय जनता पार्टी ने हर कदम कदम पर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि किसानों के लिए लाया गया यह कानून हर दृष्टि से किसानों के हित में है. क्योंकि यह सरकार किसानों के हित के अलावा कुछ देख ही नहीं रही है. और जो कुछ चुनिंदा लोग विरोध कर रहे हैं वह तो आतंकवादी हैं! वह तो भटके हुए लोग हैं !! बहुसंख्यक किसान तो उनके  साथ हैं ही नहीं. क्योंकि यह कुछ चुनिंदा लोग ही आंदोलन कर रहे हैं इस तरह की भ्रामक बातें हैं. शायद देश के राजनीतिक परिदृश्य में किसानों के संदर्भ में पहली बार सभी ने देखा और नरेंद्र मोदी और भाजपा के कट्टर समर्थक रात दिन यही गीत गाते रहेगी जो लोग सिंघु बॉर्डर पर और अन्य जगहों पर मोर्चा संभाले हुए हैं वे लोग तो देशद्रोही हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की यही गलती बहुत बड़ी गलतियां बन गई है. अब उन्हें न तो खाते बन रहा है ना निगलते. उन्होंने जिस तरीके से आनन-फानन में कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की है वह भी उनके गले की फांस बन चुकी है. और अब आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठेगा यह भारत की जनता तय करने वाली है.

गलती दर गलती

3 कृषि कानूनों के संदर्भ में अगर हम विवेचना करें तो देखते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने  ऐतिहासिक गलतियां ही गलतियां की हैं. पहली गलती तो किसानों को विश्वास में लिए बगैर कानून बना देना है.

दूसरी गलती विपक्ष को अपने विश्वास में लिए बगैर तीन कृषि कानूनों को संसद में पास करवाना उनका एक ऐसा कारनामा है जो एक बहुत बड़ी गलती है.

और तीसरा- जिस तरीके से उन्होंने अचानक कृषि कानूनों को वापस ले लिया है यह भी एक बहुत बड़ी गलती है. राजनीतिक और सामाजिक प्रेक्षकों का कहना है कि 19 नवंबर गुरु नानक जयंती के पावन अवसर पर जिस तरीके से अचानक सुबह-सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र  दामोदरदास मोदी ने कृषि कानूनों को टीवी पर आ कर के वापस लेने की घोषणा की. उससे अच्छा यह होता कि वह अचानक किसानों के बीच चले जाते और उनसे संवाद करते हुए सौहार्दपूर्ण माहौल में इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर देते.

ये भी पढ़ें- क्या कांग्रेसी कन्हैया की बांसुरी पर थिरकेंगे वोटर?

अथवा दूसरा पक्ष यह हो सकता था कि किसान नेताओं की एक बैठक आयोजित की जाती और उसमें प्रधानमंत्री जी उन सब की बात को सुनते हुए इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर सकते थे. तीसरा देश की विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ बैठक करके भी वे अपनी बात को देश की जनता के सामने रख सकते थे. जिसका निसंदेह सकारात्मक प्रभाव जाता. मगर जिस तरीके से उन्होंने अचानक टीवी पर अवतरण लेकर  घोषणा की है उससे फजीहत ही हो रही है . लोगों को मौका मिल गया है उन्हें चारों तरफ से घेर कर के मानो अभिमन्यु बना चुके हैं. अब देखना यह है कि आज के भारत के महाभारत में आधुनिक अभिमन्यु का  क्या हश्र होने वाला है. नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी गलती यह है कि वह सबको साथ लेकर के चलने में बहुत पीछे रह जाते हैं परिणाम स्वरूप उन्हें जिस तरीके से आलोचना का सामना करना पड़ रहा है वह उनकी छवि, उनके कार्यकाल और भारत की जनता के लिए भी दुर्भाग्य जनक है.

सियासत: ‘लालू के लाल’ टेढ़ी चाल

पिछले तकरीबन 40 साल तक बिहार से ले कर दिल्ली तक अपनी धमक रखने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और परिवार में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. लालू यादव के बड़े बेटे और विधायक तेजप्रताप यादव ने अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव और राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के खिलाफ मोरचा खोल रखा है.

इतना ही नहीं, तेजप्रताप यादव ने राजद के बराबर अपना नया संगठन भी बना लिया है, जिस का नाम छात्र जनशक्ति परिषद रखा है. इस संगठन का लोगो यानी चिह्न ‘बांसुरी’ रखा है. एक तरह से देखा जाए, तो उन्होंने राजद के चिह्न ‘लालटेन’ को भी छोड़ दिया है.

2 अक्तूबर, 2021 को अपने संगठन छात्र जनशक्ति परिषद के प्रशिक्षण शिविर में तो तेजप्रताप यादव ने अपने भाई तेजस्वी यादव और जगदानंद सिंह की धज्जियां उड़ा कर रख दीं.

तेजप्रताप ने तेजस्वी का नाम लिए बगैर कहा कि दिल्ली में उन के पिता लालू यादव को बंधक बना कर रखा गया है. उन्हें कोर्ट से जमानत मिले कई महीने गुजर गए और उन्हें पटना नहीं लाया जा रहा है. लालूजी की गैरमौजूदगी में जिस तरह से पार्टी को चलाया जा रहा है, उस से पार्टी चलने वाली नहीं है, टूट जाएगी, बिखर जाएगी.

समस्या: बिजली गुल टैंशन फुल

उन्होंने आगे कहा कि उन के पिता अपने सरकारी निवास के आउटहाउस में नियमित रूप से बैठते थे और जनता से मिलते थे. उन के घर का दरवाजा हमेशा खुला रहता था. आज यह हालत है कि मेन गेट को बंद रखा जाता है. घर से कुछ पहले ही मोटा रस्सा लगा कर लोगों के आनेजाने पर रोक लगा दी गई है. ऐसे कहीं पार्टी चलती है क्या? जब जनता ही नहीं होगी तो पार्टी किस के लिए? राजनीति किस के लिए?

तेजप्रताप यादव इतने पर ही नहीं रुके. तेजस्वी के बाद उन्होंने जगदानंद सिंह पर हमला बोल दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि कुछ लोग राजद का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना देख रहे हैं. ऐसे लोगों का सपना वे कभी भी पूरा नहीं होने देंगे.

पार्टी और परिवार की बखिया उधेड़ने के बाद वे कहते हैं कि पिताजी की खराब सेहत को ध्यान में रख कर वे काफी दिनों तक चुप रहे, लेकिन उन की चुप्पी का लोग नाजायज फायदा उठाने लगे.

गौरतलब है कि साल 2022 में राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होना है. इतना तो तय है कि लालू यादव ही फिर से अध्यक्ष बनेंगे, लेकिन अगर उन की सेहत ठीक नहीं रही तो तेजस्वी यादव को यह पद देने की अटकलें चल रही हैं.

लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की चाल शुरू से ही अलग तरीके की रही है. वे राजद से हसनपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं.

16 अप्रैल, 1988 को जनमे तेजप्रताप यादव गरम मिजाज वाले हैं और अपनी बातों को बिना किसी लागलपेट के कहते हैं. वे माथे पर चंदन का टीका लगाते हैं और बांसुरी बजाते हैं.

ये भी पढ़ें- आज भी लोग अंधविश्वास में फंसे हैं

उन के पिता लालू प्रसाद यादव जहां ब्राह्मणवाद और पाखंड के खिलाफ राजनीति करते रहे हैं, वहीं तेजप्रताप मंदिरों में घूमते हैं और मूर्तियों के आगे माथा टेकते हैं. मथुरा, वृंदावन के चक्कर लगाते हैं. लंबे बाल, गले में रुद्राक्ष की मालाएं, ललाट पर हवनकुंड की राख, हाथ मे त्रिशूल लिए जबतब घूमते रहते हैं.

वे कभी कृष्ण का रूप बना कर बांसुरी बजाने लगते हैं, तो कभी शंकर के भेष में तांडव करने लगते हैं. कभी गेरुआ कपड़े पहन कर विधानसभा पहुंच जाते हैं. तेजप्रताप यादव ने अपना नया फेसबुक पेज बनाया है और उस का नाम रखा है ‘सैकंड लालू तेजप्रताप यादव’.

जगदानंद सिंह से वे इसलिए भी नाराज हैं कि जगदानंद सिंह ने छात्र राजद के प्रमुख आकाश कुमार को हटा कर गगन कुमार को प्रमुख बना दिया था. आकाश कुमार तेजप्रताप के करीबी हैं.

जगदानंद सिंह के इस कदम से तेजप्रताप इस कदर बौखला गए कि उन्हें ‘हिटलर’ कह दिया. तेजप्रताप ने जगदानंद से सफाई मांगी कि उन से राय लिए बगैर आकाश कुमार को क्यों हटा दिया गया? जगदानंद ने इस का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी. इस से तेजप्रताप का पारा सातवें आसमान तक जा पहुंचा.

इस बारे में जब जगदानंद सिंह से बात की गई, तो उन्होंने साफतौर पर कहा कि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के प्रति जवाबदेह हैं. प्रदेश छात्र राजद के अध्यक्ष का पद खाली था और भरा गया.

वहीं तेजस्वी यादव ने इस मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि पार्टी की बेहतरी के लिए प्रदेश अध्यक्ष को किसी भी तरह का फैसला लेने का हक है. उन के काम में किसी तरह का दखल देना ठीक नहीं है. साथ ही, तेजस्वी ने तेजप्रताप को नसीहत देने के लहजे में कहा कि बड़ों की इज्जत करना और अनुशासन में रहना बहुत ही जरूरी है.

लालू प्रसाद यादव को बंधक बनाने के तेजप्रताप के आरोप को टालते हुए तेजस्वी कहते हैं कि उन्हें कौन बंधक बना सकता है, जिस ने आडवाणी जैसे नेता को गिरफ्तार किया, देश को 2 प्रधानमंत्री दिए, 15 सालों तक बिहार पर राज किया.

हाल ही में राजद के वर्चुअल प्रशिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी यादव के काम की खूब तारीफ की थी. उन्होंने कहा कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में तेजस्वी ने काफी बेहतर तरीके से सरकार के खिलाफ हल्ला बोला. इस के साथ ही जगदानंद सिंह की भी तारीफ की. तेजप्रताप का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया.

इस से साफ है कि तेजप्रताप को बड़बोलेपन का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है. उन्हें पार्टी में हाशिए पर धकेल दिया गया है और जाहिर है कि यह सब लालू यादव की रजामंदी से हो रहा है. इन्हीं सब बात को ले कर तेजप्रताप यादव तिलमिलाए हुए हैं.

राजद के एक बड़े नेता दबी जबान में कहते हैं कि तेजप्रताप की एक ही खासीयत है कि वे लालू यादव के बेटे हैं. वे पार्टी में हंसीठिठोली की वजह बने हुए हैं. वे पार्टी को क्या मजबूत करेंगे? वे तो विरोधियों को हल्ला करने और राजद पर निशाना साधने का मौका देते रहते हैं.

लालू यादव और राबड़ी देवी के लाड़ले तेजप्रताप यादव राजनीतिक वजहों से कम, बल्कि अपनी खुराफात से ज्यादा चर्चा में रहते हैं.

मार्च, 2019 में अपनी पार्टी से बगावत कर उन्होंने ‘लालूराबड़ी मोरचा’ नाम की एक पार्टी भी बना डाली थी. थोड़ा पीछे चलें, तो साल 2015 के विधानसभा चुनाव में जब राजद, जदयू और कांग्रेस के महागठबंधन की सरकार बनी थी, तो उस समय तेजस्वी यादव को तेजप्रताप से ज्यादा तरजीह दी गई थी. तेजप्रताप को जहां स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था, वहीं तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री की कुरसी पर बिठाया गया था.

तेजप्रताप यादव की शादी भी डांवांडोल ही रही. राजद विधायक चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय से उन की शादी 12 मई, 2018 को हुई थी. शादी के 2-3 महीने बाद ही दोनों के बीच अनबन हो गई. उस के बाद से तेजप्रताप का अंदाज ही बदल गया. वे नवंबर, 2018 में अपनी पत्नी से तलाक लेने की अर्जी दाखिल कर चुके हैं.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: Sex Toys का स्वीट सीक्रेट

तेजप्रताप खुलेआम कहते थे कि उन की पत्नी उन्हें और उन के परिवार को गंवार कहती है. तेजप्रताप ने यह कह कर घर में खलबली मचा दी थी कि उन की पत्नी कहती है कि उन का भाई तेजस्वी उन से जलता है. उन्होंने अपनी पत्नी पर आरोप लगाया कि वह दोनों भाइयों के बीच दरार पैदा करना चाहती है.

पिछले लोकसभा चुनाव में उन के ससुर चंद्रिका राय जब सारण लोकसभा सीट से राजद के उम्मीदवार बनाए गए, तो तेजप्रताप ने इस का विरोध जताया था. जब उन की बात नहीं सुनी गई, तो वे अपने ससुर के खिलाफ चुनाव प्रचार में कूद गए थे.

इतना ही नहीं, जब उन के खास लोगों को राजद ने टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने अपने समर्थकों को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा और बाकायदा उन के सपोर्ट में प्रचार भी किया.

आज आलम यह है कि जिस राजद को लालू प्रसाद यादव ने तिनकातिनका जोड़ कर बड़ी ही मेहनत के बाद तैयार किया था, वह उन के जेल जाने के बाद बिखरने के कगार पर पहुंच गई है. उन की पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती, बेटे तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव उन की विरासत को संभालने में कुछ खास कामयाब होते नहीं दिख रहे हैं.

तेजस्वी यादव कुछ मजबूत जरूर हुए हैं, लेकिन भाई तेजप्रताप और बहन मीसा भारती के सियासी सपनों ने उन की आगे बढ़ने की रफ्तार पर ब्रेक लगा रखा है.

पिताजी को टैंशन नहीं देना चाहता – तेजप्रताप यादव

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सेहत ठीक नहीं रहने की वजह से तेजस्वी यादव और राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने पार्टी की कमान संभाल रखी है. लालू यादव का बड़ा बेटा होने के बाद भी पार्टी में तेजप्रताप यादव को तरजीह नहीं दी गई है, जिस से वे खुद को अलगथलग महसूस कर रहे हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप क्यों नाराज हैं? किस से नाराजगी है?

मैं किसी से नाराज नहीं हूं. राजद को बिखरते देख कर गुस्सा आता है. जिस पार्टी को पिताजी ने अपने खूनपसीने से सींचा है, उस की खराब हालत को मैं चुपचाप देख नहीं सकता.

आप लालूजी को यह सब बताते क्यों नहीं हैं?

लालूजी से कुछ छिपा हुआ रह सकता है क्या. उन से तो बात होती ही रहती है. उन की सेहत ठीक नहीं चल रही है और उन्हें ज्यादा टैंशन देना ठीक नहीं है.

आप के छोटे भाई तेजस्वी पार्टी के लिए मेहनत तो कर रहे हैं. आप क्या कहते हैं?

पार्टी की जड़ें मजबूत हैं, लेकिन कुछ लोग पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना देख रहे हैं. 4-5 लोग हैं. उन के नाम हर कोई जानता है, इसलिए मैं कुछ नहीं बोलूंगा.

आप ने अपना अलग संगठन क्यों बना लिया? इस से तो राजद कमजोर होगा?

राजद को मजबूत करने के लिए ही मैं छात्रों और नौजवानों को संगठित करने का काम कर रहा हूं.

क्या कांग्रेसी कन्हैया की बांसुरी पर थिरकेंगे वोटर?

Writer- बिरेन्द्र बरियार

28सितंबर, 2021 को वामपंथियों के ‘लाल सलाम’ के नारे से पल्ला झाड़ कर कन्हैया कुमार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया. जहां एक तरफ कांग्रेस को भरोसा है कि वे बिहार में पार्टी का मजबूत चेहरा बनेंगे, वहीं दूसरी तरफ कन्हैया कुमार को भी यकीन है कि कांग्रेस के कंधे पर सवार हो कर बिहार में उन की राजनीति चमक उठेगी.

कांग्रेस को जहां बिहार में एक दमदार नेता की तलाश थी, वहीं भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में हाशिए पर धकेल दिए गए कन्हैया कुमार को एक बड़े प्लेटफार्म की दरकार थी. कन्हैया कुमार के सहारे कांग्रेस राज्य में अपनी खोई हुई जमीन को एक बार फिर हासिल करने की कवायद में लगी है.

राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाना कन्हैया कुमार के लिए सब से बड़ी चुनौती है. पर क्या इस ‘कन्हैया’ की ‘बांसुरी’ की धुन में वोटरों को खींच पाने की ताकत है?

कन्हैया कुमार अचानक ही कांग्रेस में शामिल नहीं हो गए हैं. भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में दरकिनार कर दिए जाने और पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद से ही उन का इस पार्टी से मोह भंग हो गया था. उस के बाद से ही वे लगातार कांग्रेस नेताओं के संपर्क में रहने लगे थे.

कन्हैया कुमार ने साल 2019 में हुए 17वें लोकसभा चुनाव में भाकपा के टिकट पर बेगुसराय सीट से चुनाव लड़ा था. तब वे भाजपा के नेता गिरिराज सिंह से 4 लाख, 22 हजार वोट से हार गए थे.

पर पिछले कुछ महीनों से कन्हैया कुमार इस पार्टी में अलगथलग पड़ गए थे. जनवरी, 2021 में हैदराबाद में पार्टी की बैठक में अनुशासनहीनता के मामले में कन्हैया कुमार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया था. इस बैठक में कुल 110 सदस्य मौजूद थे और 107 सदस्यों ने इस निंदा प्रस्ताव का समर्थन किया था. कन्हैया कुमार पर पार्टी के सचिव इंदुभूषण के साथ बदसुलूकी करने का आरोप था.

ये भी पढ़ें- पेट्रोल-डीजल: प्रधानमंत्री का सांप सीढ़ी का खेल

‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहे जाने वाले बेगुसराय से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद से ही कन्हैया कुमार का भाकपा से मन ऊब गया था और वे पिछले कई महीनों से कांग्रेस के नेताओं से मिल रहे थे.

बिहार कांग्रेस के गलियारे में चर्चा है कि कन्हैया कुमार को बिहार कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है. कन्हैया कुमार भी बारबार यह दोहरा रहे हैं कि कांग्रेस को बचा कर ही देश को बचाया जा सकता है. महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी जैसे मसलों पर नाकाम रही भाजपा को कन्हैया कुमार अपने पक्ष में भुना सकते हैं.

यही नहीं, कन्हैया कुमार राजद नेता तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं. तेजस्वी और कन्हैया के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. इस के पीछे की वजह यह है कि साल 2019 में जब कन्हैया कुमार बेगुसराय लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे थे, तो राजद ने उन के खिलाफ तनवीर हसन को मैदान में उतार दिया था. महागठबंधन के वोटों का बिखराव होने से राजग को सीधा फायदा मिला और भाजपा के गिरिराज सिंह जीत गए.

तेजस्वी यादव को जहां राजनीति विरासत में मिली है, वहीं कन्हैया कुमार छात्र राजनीति की उपज हैं. कन्हैया कुमार से मिली चुनौतियों का सामना सब से ज्यादा तेजस्वी यादव को ही करना होगा.

लालू प्रसाद यादव की गैरमौजूदगी में तेजस्वी यादव महागठबंधन के नेता बने हुए थे और सभी घटक दलों को कबूल भी थे. कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने के बाद तेजस्वी यादव को कड़ी टक्कर मिलनी तय है.

तेजस्वी यादव के मुकाबले कन्हैया कुमार ज्यादा तेजतर्रार और काफी पढ़ेलिखे नेता हैं. कन्हैया कुमार अपनी सटीक बातों के दम पर अच्छेअच्छे नेताओं की जबान पर ताला लगा सकते हैं. कांग्रेस अगर महागठबंधन में रही, तो तेजस्वी और कन्हैया के बीच की खींचतान को देखना दिलचस्प होगा.

फिलहाल राजद कन्हैया कुमार को कितने हलके में ले रहा है, इस का नमूना राजद के प्रवक्ता भाई वीरेंद्र ने तब पेश किया, जब उन से पूछा गया कि कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने से बिहार में महागठबंधन पर क्या असर पड़ेगा, तो उन्होंने तपाक से सवाल दाग दिया कि यह कन्हैया कौन है?

गौरतलब है कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई. अब वह सबकुछ लुटा कर होश में आई है और कन्हैया कुमार के भरोसे अपनी डूबती नैया को पार लगाने की जुगत में लग गई है.

कन्हैया कुमार की वजह से अगड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा फिर से कांग्रेस से जुड़ सकता है, वहीं मुसलिमों में भी कन्हैया कुमार की अच्छीखासी पैठ है.

कांग्रेस के बड़े नेता कहते हैं कि जब तक कांग्रेस राजद से नाता नहीं तोड़ेगी, तब तक कांग्रेस का कुछ नहीं होने वाला है. आज की तारीख में बिहार कांग्रेस कुछ भी खोने की हालत में नहीं है, ऐसे में रिस्क ले कर बड़ा दांव खेला जा सकता है.

ये भी पढ़ें- पंजाब: पैरों में कुल्हाड़ी मारते अमरिंदर सिंह

राजद से नाता तोड़ कर कांग्रेस अकेले अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरे, तो उस से बिदका हुआ वोट बैंक दोबारा हासिल हो सकता है. राजद के भरोसे नैया पर लगाने की सियासत को छोड़ने का समय आ गया है.

साल 1985 तक कांग्रेस की हालत बिहार में काफी मजबूत रही थी. उस साल बिहार विधानसभा की कुल

323 सीटों (उस समय झारखंड बिहार का ही हिस्सा था) में से 196 सीटें कांग्रेस के खाते में आई थीं. तब 39.30 फीसदी वोट कांग्रेस को मिले थे.

उस के बाद से ले कर अब तक बिहार में राज कर रहे लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रामविलास पासवान जैसे धुरंधर नेता तो कांग्रेस विरोध की राजनीति की उपज हैं. कांग्रेस की कब्र पर ही दर्जनों बड़े नेताओं की फसलें पैदा हुई हैं और फलीफूली हैं.

लालू प्रसाद यादव के बिहार की सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस में गिरावट शुरू हो गई थी. साल 1990 में कांग्रेस को 323 सीटों में से केवल

71 सीटें ही मिल सकी थीं और उस का वोट फीसदी 24.86 रहा था.

उस के बाद से ही कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरता गया. साल 1995 में वह 320 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे

29 सीटें मिली थीं. उस का वोट फीसदी 16.51 हो गया था. साल 2000 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 323 सीटों में से 23 सीटों पर ही जीत सकी थी और उस का वोट बैंक घट कर 11.06 फीसदी रह गया था.

साल 2005 में कांग्रेस ने 51 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 9 सीटें ही उस के खाते में आ सकी थीं. उस का वोट फीसदी बढ़ कर 29.04 हुआ था, पर सीटें नहीं बढ़ सकी थीं. साल 2010 में वह 243 सीटों पर लड़ी थी, पर उसे केवल 4 सीटों पर ही जीत मिली थी. वहीं वोट 8.37 फीसदी मिल सके थे.

साल 2015 में महागठबंधन के बैनर तले 41 सीटों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे 27 सीटों पर जीत मिली थी. तब उस का वोट फीसदी भी बढ़ कर 39.49 हो गया था.

साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 70 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे, पर 19 ही विधानसभा में पहुंच सके थे.

कांग्रेस की नजर अब राज्य की 11 फीसदी अगड़ी जातियों, 16 फीसदी मुसलमानों और 14 फीसदी दलितों के वोट पर है. इसी को साधने के लिए कन्हैया कुमार को आगे लाया गया है.

अब देखने वाली बात यह होगी कि कन्हैया कुमार कांग्रेस के खिसक चुके वोट बैंक को किस तरह से अपने पाले में ला सकते हैं?

पेट्रोल-डीजल: प्रधानमंत्री का सांप सीढ़ी का खेल

देश के जनता ने देखा कि किस तरह केंद्र सरकार ने औचक पेट्रोल डीजल मूल्य में कमी करके अपनी पीठ थपथपाई. दरअसल,यह खेल उपचुनाव के परिणामों के पश्चात नरेंद्र दामोदरदास मोदी सरकार खेलने पर विवश हो गई, उपचुनाव के परिणामों ने केंद्र सरकार को भीतर तक हिला दिया है. इसलिए अचानक केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल के मूल्य कम कर दिए. और यह संदेश दिया कि यह देशवासियों के लिए दीपावली का तोहफा है. यह भी ध्यान रखना होगा कि आगामी कुछ महीनों में देश के राजनीतिक केंद्र उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. ऐसे में लगातार आंख बंद करके नित्य प्रतिदिन पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाते जाना… बढ़ाते जाना और किसी की नहीं सुनना अखिर क्या इंगित करता है.

अब जब चुनाव परिणाम विपरीत आए हैं तो श्रीमान प्रधानमंत्री जी की आंख खुल गई है. और मजे की बात देखिए देश के प्रधानमंत्री के कैबिनेट के गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर कहा कि यह हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की बहुत बड़ी संवेदनशीलता है. अगर आम जनता पेट्रोल डीजल के कम हुए दामों का स्वागत करती तो यह रेखांकित करने वाली बात होती. मगर आजकल देश की राजनीति में यह नया चलन शुरू हुआ है कि अपने ही मंत्रिमंडल के सदस्य प्रधानमंत्री की पीठ थपथपाते हैं और अपनी ही सरकार के गुण गाते हैं.

ये भी पढ़ें- प्रशांत किशोर: राजनीतिक दिवालियापन का स्याह पक्ष

वस्तुत: यह एक ऐसा खेल है जिसे सिर्फ “तमाशा” कहा जा सकता है. क्योंकि आप की नीतियां अच्छी हैं जनहितकारी हैं तो विपक्ष को सामने आकर के प्रशंसा करनी चाहिए. विपक्ष नहीं तो कम से कम आम जनता तो यह कहें केंद्र सरकार का यह कदम स्वागतेय है, जनहितकारी है. मगर लगातार पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाते चले जाना, बढ़ाते चले जाना, लोगों की त्रासदी के बीच आंख बंद करके अपने मंत्रालय में हंसते मुस्कुराते बैठे रहना और कोई टिप्पणी नहीं करना यह सब क्या है, यह कैसी संवेदनशीलता है.

दरअसल,पेट्रोल डीजल महंगा होना इसका सीधा सा अर्थ है पूरे देश में महंगाई को थोप देना. यह सभी जानते हैं कि जिस तरह कोरोना महामारी के बाद पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ते चले गए और यह बात परत दर परत सामने आई कि कोरोना संक्रमण के कारण हो रहे भारी अर्थव्यवस्था के नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल पर मूल्य वृद्धि का खेल शुरू करके घाटे की अंश को ठीक करने की व्यवस्था कर ली है, तो यह तो ऐसा हो गया कि एक हाथ से दो और दूसरे हाथ से ले लो.

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की यही चतुराई है जो कभी भी देश के हित की, जनता के हित की नहीं कही जा सकती. क्योंकि सरकार कोई व्यापारी नहीं है सरकार कोई सौदागर नहीं है. जो देश की जनता के साथ धंधे बाजी पर उतर आए और दोनों हाथों से उससे लेती ही चली जाए और जब थोड़ा बहुत दे दे इतना ढिंढोरा पीटा जाए की लोगों को लगे कि यह सरकार तो संवेदनशील है जनहितकारी है पूछिए ही मत.

खूब मारो और फिर- हंसाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार की यह नीति है कि पहले देश की जनता को खूब त्रस्त कर दो, हलाकान परेशान कर दो, आहिस्ते से पीठ थपथपा दो. पेट्रोल डीजल में मूल्य कम करने के बाद कहा जाता है कि दिवाली से एक दिन पहले सरकार ने पेट्रोल पर 5 रुपए और डीजल पर 10 रुपए एक्साइज ड्यूटी कम कर के देश की जनता को बहुत बड़ा तोहफा दिया है. यही नहीं, यह भी कहा जा रहा है कि इससे देश को वित्त वर्ष में करीब 43 हजार करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा. सवाल यह है कि जब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ते चले जा रहे थे लोग विरोध प्रकट कर रहे थे तो सरकार कानों में उंगलियां डालकर के क्यों चुप बैठी थी. अब देश में हुए उपचुनाव के बाद और सामने उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए यह दयानतदारी क्यों?

ये भी पढ़ें- पंजाब: पैरों में कुल्हाड़ी मारते अमरिंदर सिंह

लाख टके का सवाल यह है कि क्या दिवाली से पूर्व पेट्रोल डीजल में रेट कम करने के बाद आगे रेट में वृद्धि नहीं होगी इसकी क्या गारंटी है.

दरअसल, देश में विपक्ष अपनी बात को जिस शिद्दत के साथ कहने के लिए जाना जाता था आजकल उस में भारी कमी दिखाई दे रही है. एकमात्र लालू यादव ने बड़े ही तीखे अंदाज में मोदी सरकार के पेट्रोल डीजल दाम की कमी पर तंज कसा है और कड़े शब्दों में कहा है कि यह सब शरारत है.

अच्छा होता अगर देश का विपक्ष विशेष तौर पर कांग्रेस पार्टी सामने आकर यह कहती कि अगर हम केंद्र में अपनी सरकार बनाएंगे तो आते ही सारा टैक्स और वैट खत्म कर दिया जाएगा और पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में लाएंगे. इससे मोदी सरकार कटघरे में खड़ी हो जाती. मगर कांग्रेस पार्टी पता नहीं क्यों मौन है.

प्रशांत किशोर: राजनीतिक दिवालियापन का स्याह पक्ष

प्रशांत किशोर यानी पीके कुछ सालों से चर्चा में है. पीके को राजनीति के कुशल रणनीतिकार के रूप में ख्याति मिली हुई है.2014 में भाजपा को जीतने का श्रेय भी दिया गया है. उसके बाद कुछ एक चुनाव में जीत दर्ज करवाने के बाद यह माना जाता है कि प्रशांत किशोर एक ऐसा रणनीति कार है जो अपना खासा  महत्व रखता है.

मगर सार तथ्य यह है कि भारतीय राजनीति में आई गिरावट का पूरा लाभ उसने उठाया है और यह प्रचारित किया  गया कि प्रशांत किशोर तो एक कुशल रणनीतिकार है! जो किसी को भी “सत्ता के शीर्ष” पर पहुंचाने का माद्दा रखता है.

मगर ऐसा नहीं है क्या है, प्रशांत किशोर का सच क्या है, प्रशांत किशोर की भूमिका क्या है, और क्या है प्रशांत की ताकत, हम इस रिपोर्ट में यह सब बताने जा रहे हैं.

इस रिपोर्ट में दरअसल, हम आपको यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है. प्रशांत किशोर एक ऐसा शख्स है जो सिर्फ वक्त का फायदा उठाता रहा है. और इस देश को चलाने वाले रणनीतिकारों, राजनीतिज्ञों सत्ताधीशों के गर्भ गृह में घुसकर अपनी चला लेता है.

इसका सिर्फ एक कारण है राजनेता सत्ता के मोह में ऐसे लाचार और असहाय हो गए हैं कि उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता, कुछ दिखाई नहीं देता. ऐसे में अंधेरे में एक दिया उन्हें प्रशांत किशोर  में दिखाई देता है नेताओं को राजनीतिक पार्टियों को यह प्रतीत होता है कि प्रशांत किशोर उनकी डूबती नैया को पार लगवा सकता है.

ये भी पढ़ें- देश का उच्चतम न्यायालय और नरेंद्र दामोदरदास मोदी

प्रशांत किशोर के संपूर्ण कार्यकाल को खुली आंखों से देखें तो आप पाएंगे की यह पी के सिर्फ समय का सिकंदर है. इसने समय को साधा और आगे निकल गया.

क्या आपके पास इस प्रश्न का जवाब है कि 2014 में अगर प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता दिलाई, जिसमें नरेंद्र दामोदरदास मोदी प्रधानमंत्री बने तो क्या यह संभव है, सच है?

अगर प्रशांत किशोर भाजपा के साथ नहीं होते तो क्या नरेंद्र दामोदरदास मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनते? इसका सीधा सा जवाब यह है कि प्रशांत किशोर अगर नहीं भी होते तो भी भारतीय जनता पार्टी  बहुमत के साथ देश की सत्ता पर काबिज होने जा रही थी.

इससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रशांत किशोर  शतरंज का एक ऐसा मोहरा है जिसे देश की राजनीतिक पार्टियां अपने हिसाब से चलाने का प्रयास करती है और वह अपने प्रारब्ध से किसी ऐसे दल से जुड़ जाता हैं जो सत्ता में आ जाती है और हवा यह बहने लगती है कि यह प्रशांत किशोर की रणनीति है कुशल रणनीति है जबकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं है.

पी के की समझ और भूमिका

सीधी सी बात है कि अगर कोई शख्स सचमुच रणनीतिकार होता है तो ढोल पीटकर अपनी रणनीति बताता.

अगर आप खुद पर्दे के सामने है और कहा जा रहा है कि कुशल रणनीतिकार हैं तो यह एक साफ-साफ धोखा है, झूठ है. क्योंकि रणनीति कार पर्दे के पीछे ही काम करते हैं क्योंकि अगर आपकी बात सार्वजनिक हो गई तो फिर उसका सफल हो पाना संभव नहीं है. सीधी सी बात है कि अगर आप कोई खेल करने जा रहे हैं और वह सार्वजनिक हो जाता है तो सामने बैठे हुए राजनीतिक दल और उसकी घुर नेता, चूड़ियां पहन कर नहीं बैठें हैं.

सभी जानते हैं किप्रशांत किशोर 2014 के चुनाव में बीजेपी के साथ थे . बाद में उन्होंने बीजेपी को छोड़कर नीतीश कुमार का साथ पकड़ लिया . इसी साल 2021 हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में प्रशांत किशोर ने ममता बनर्जी के लिए पर्दे के पीछे से काम किया.

ये भी पढ़ें- पंजाब: पैरों में कुल्हाड़ी मारते अमरिंदर सिंह

जैसा कि हमने ऊपर स्पष्ट किया है और यह समझने वाली बात है कि जो राजनीतिक पार्टी और नेता जीत रहा होता है उसके साथ प्रशांत किशोर का नाम जुड़ जाता है और बाद में श्रेय बटोर लेते हैं. यह है कि इतने बड़े देश में कोई कभी सदैव सत्ता का भोग नहीं कर सकता. राजनीतिक पार्टियां तो बदलते रहेंगी और यह मानना कि किसी हारने वाले राजनेता और उसकी पार्टी को अपनी सूझबूझ से प्रशांत किशोर सत्ता से आसन पर बैठा देंगे एकदम असंभव है कोरी कल्पना है. अगर ऐसा कोई जादू का डंडा प्रशांत किशोर के पास होता तो राजनीतिक दल उसे अपने पास रखते वह इधर उधर राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर में नेताओं के ईर्द-गिर्द चक्कर नहीं लगा रहा होता.

यह भी परम सत्य है की प्रशांत किशोर या किसी ने ऐसा गुण हो वह सत्ता दिलाने की रणनीति बना ले तो फिर देश के एक बड़े नेता प्रशांत किशोर को अपने यहां कैद कर के ना रख लें, की  हे प्रशांत किशोर अब तुम कहीं नहीं जा सकते!!

आप यह समझ लीजिए कि अगर प्रशांत किशोर दर-दर भटक रहा है तो वह कोई कुशल रणनीति कार कतई नहीं है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें