Story In Hindi: धमकियां – गांव की रहने वाली सुधा को क्या अपना पाया शेखर?

Story In Hindi: *शेखर* और सुधा की मैरिज ऐनिवर्सरी के दिन सब बेहद खुश थे. शनिवार का दिन था तो आराम से सब सैलिब्रेशन के मूड में थे. पार्टी देर तक भी चले तो कोई परेशानी नहीं.

अनंत और प्रिया ने पार्टी का सब इंतजाम कर लिया था. अंजू और सुधीर से भी बात हो गई थी. वे भी सुबह ही आ रहे थे. प्रोग्राम यह था कि पहले पूरा परिवार लंच एकसाथ घर पर करेगा, फिर डिनर करने सब बाहर जाएंगे. इस तरह पूरा दिन सब एकसाथ बिताने वाले थे.

शेखर और सुधा अपने बच्चों के साथ समय बिताने के लिए अति उत्साहित थे. अनंत तो अपनी पत्नी प्रिया और बेटी पारूल के साथ उन के साथ ही रहता था, बेटी अंजू अंधेरी में अपने पति सुधीर और बेटे अनुज के साथ रहती थी. मुंबई में होने पर भी मिलनाजुलना जल्दी नहीं हो पाता था, क्योंकि बहूबेटा, बेटीदामाद सब कामकाजी थे.

इसलिए जब भी सब एकसाथ मिलते, शेखर और सुधा बहुत खुश होते थे.सब की आपस में खूब बनती थी. सब जब भी मिलते, महफिल खूब जमती, जम कर एकदूसरे की टांग खींची जाती, कोई किसी की बात का बुरा न मानता. बच्चों के साथ शेखर और सुधा भी खूब हसंतेहंसाते.

12 बजे अंजू सुधीर और अनुज के साथ आ गई. सब ने एकदूसरे को प्यार से गले लगाया. शेखर और सुधा के साथसाथ अंजू सब के लिए कुछ न कुछ लाई थी. पारूल और अनुज तो अपनेआप में व्यस्त हो गए. हंसीमजाक के साथसाथ खाना भी लगता रहा. लंच भी बाहर से और्डर कर लिया गया था, पर प्रिया ने स्नेही सासससुर के लिए खीर और दहीबड़े उन की पसंद को ध्यान में रख कर खुद बनाए थे, जिसे सब ने खूब तारीफ करते हुए खाया.

खाना खाते हुए सुधीर ने बहुत सम्मानपूर्वक कहा, ”पापा, आप लोगों की मैरिडलाइफ एक उदाहरण है हमारे लिए. कभी भी आप लोगों को किसी बात पर बहस करते नहीं देखा. इतनी अच्छी बौंडिंग है आप दोनों की. मेरे मम्मीपापा तो खूब लड़ते थे. आप लोगों से बहुत कुछ सीखना चाहिए.”

फिर जानबूझ कर अंजू को छेड़ते हुए कहा,” इसे भी कुछ सिखा दिया होता, कितना लड़ती है मुझ से. कई बार तो शुरूशुरू में लगता था कि इस से निभेगी भी या नहीं.”

अंजू ने प्यार से घूरा,”बकवास बंद करो, तुम से कभी नहीं लड़ी मैं, झूठे…”

प्रिया ने भी कहा,”जीजू , आप ठीक कह रहे हैं, मम्मीपापा की कमाल की बौंडिंग है. दोनों एकदूसरे का बहुत ध्यान रखते हैं. बिना कहे ही एकदूसरे के मन की बात जान लेते हैं. यहां तो अनंत को मेरी कोई बात ही याद नहीं रहती. काश, अनंत भी पापा की तरह केयरिंग होता.”

अनंत से भी रहा नहीं गया, झूठमूठ गले में कुछ फंसने की ऐक्टिंग करता हुआ बोला,” मेरी प्यारी बहन अंजू, यह हम दोनों भाईबहन क्या सुन रहे हैं? क्यों न आज मम्मीपापा की बहू और दामाद को इस बौंडिंग की सचाई बता दें? हम कब तक ताने सुनते रहेंगे,” कहता हुआ अनंत अंजू को देख कर शरारत से हंस दिया.

शेखर ने चौंकते हुए कहा,”अरे, कैसी सचाई? क्या तुम बच्चों से अपने पेरैंट्स की तारीफ सहन नहीं हो रही?”

अनंत हंसते हुए बोला,”मम्मीपापा, तैयार हो जाइए, आप की बहू और आप के दामाद से हम भाईबहन आप की इस बौंडिंग का राज शेयर करने जा रहे हैं…”

फिर नाटकीय स्वर में अंजू से कहा,”चल, बहन, शुरू हो जा…”

*अंजू* ने जोर से हंसते हुए बताना शुरू किया,”जब हम छोटे थे, हम रोज देखते कि पापा मम्मी को हर बात में कहते हैं कि मैं तुम्हारे साथ एक दिन नहीं रह सकता. अम्मांपिताजी ने मेरे साथ बहुत बुरा किया है कि तुम से मेरी शादी करवा दी. मेरे जैसे स्मार्ट लड़के के लिए पता नहीं कहां से गंवार लड़की ले कर मेरे साथ बांध दिया,” इतना सुनते ही प्रिया और सुधीर ने चौंकते हुए शेखर और सुधा को देखा.

शेखर बहुत शर्मिंदा दिखे और सुधा की आंखों में एक नमी सी आ गई थी, जिसे देख कर शेखर और शर्मिंदा हो गए.

अनंत ने कहा,”और एक मजेदार बात यह थी कि रोज हमें लगता कि बस शायद कल मम्मी और पापा अलग हो जाएंगे पर हम अगले दिन देखते कि दोनों अपनेअपने काम में रोज की तरह व्यस्त हैं.

“सारे रिश्तेदारों को पता था कि दादादादी ने अपनी पसंद की लड़की से पापा की शादी कराई है और पापा को मम्मी पसंद नहीं हैं. हम किसी से भी मिलते, तो हम से पूछा जाता कि अब भी तुम्हारे पापा को तुम्हारी मम्मी पसंद नहीं हैं क्या?

“हमें कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहें पर सब मम्मी की खूब तारीफ करते. सब का कहना था कि मम्मी जैसी लड़की संयोग से मिलती है पर पापा घर में हर बात पर यही कहते कि उन की लाइफ खराब हो गई है, यह शादी उन की मरजी से नहीं हुई है. उन्हें किसी शहर की मौडर्न लड़की से शादी करनी थी और उन के पेरैंट्स ने अपने गांव की लड़की से उन की शादी करा दी.

“हालांकि मम्मी बहुत पढ़ीलिखी हैं पर प्रोफैसर पापा अलग ही दुनिया में जीते और मैं और अंजू मम्मीपापा के तलाक के डर के साए में जीते रहे.

“कभी अनंत मुझे समझाता, तसल्ली देता कि कुछ नहीं होगा, कभी मैं उसे समझाती कि अगले दिन तो सब ठीक हो ही जाता है. हमारी जवानी तो पापा की धमकियों में ही बीत गई.”

फिर अचानक अनंत जोर से हंसा और कहने लगा,”धीरेधीरे हम बड़े हो गए और समझ आ गया कि पापा सिर्फ मम्मी को धमकियां देते हैं, हमारी प्यारी मां को छोड़ना इन के बस की बात नहीं.”

प्रिया और सुधीर ने शेखर को बनावटी गुस्से से कहा,”पापा, वैरी बैड, हम आप को क्या समझते थे और आप क्या निकले… बेचारे बच्चे आप की धमकियों में जीते रहे और हम आप दोनों की बौंडिंग के फैन होते रहे. क्यों, पापा, ये धमकियां क्यों देते रहे?”

शेखर ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा,”वैसे अच्छा ही हुआ कि आज तुम लोगों ने बात छेड़ दी, दिन भी अच्छा है आज.”

*उन* के इतना कहते ही अंजू ने कहा,”अच्छा, दिन अच्छा हो गया अब मैरिज ऐनिवर्सरी का, बच्चों को परेशान कर के?”

”हां, बेटा, दिन बहुत अच्छा है आज का जो मुझे इस दिन सुधा मिली.”

अब सब ने उन्हें चिढ़ाना शुरू कर दिया,”रहने दो पापा, हम आप की धमकियां नहीं भूलेंगे.”

”सच कहता हूं, मैं गलत था. मैं ने सुधा को सच में तलाक की धमकी देदे कर बहुत परेशान किया. मैं चाहता था कि मैं बहुत मौडर्न लड़की से शादी करूं, गांव की लड़की मुझे पसंद नहीं थी. हमेशा शहर में रहने के कारण मुझे शहरी लड़कियां ही भातीं. जब अम्मांपिताजी ने सुधा की बात की तो मैं ने साफसाफ मना कर दिया पर सुधा के पेरैंट्स की मृत्यु हो चुकी थी और भाई ने ही हमेशा सुधा की जिम्मेदारी संभाली थी.

“अम्मां को सुधा से बहुत लगाव था. मैं ने तो यहां तक कह दिया था कि मंडप से ही भाग जाऊंगा पर पिताजी के आगे एक न चली और सारा गुस्सा सुधा पर ही उतरता रहा.

“मेरे 7 भाईबहनों के परिवार को सुधा ने ऐसे अपनाया कि सब मुझे भूलने लगे. हर मुंह पर सुधा का नाम, सुधा के गुण देख कर सब इस की तारीफ करते न थकते पर मेरा गुस्सा कम होने का नाम ही ना लेता पर धीरेधीरे मेरे दिल में इस ने ऐसी जगह बना ली कि क्या कहूं, मैं ही इस का सब से बड़ा दीवाना बन गया.

“जब आनंद पैदा हुआ तो सब को लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा पर मैं नहीं सुधरा, सुधा से कहता कि बस यह थोड़ा बड़ा हो जाए तो मैं तुम्हे तलाक दे दूंगा.

“फिर 2 साल बाद अंजू हुई तो भी मैं यही कहता रहा कि बस बच्चे बड़े हो जाएं तो मैं तुम्हे तलाक दे दूंगा और तुम चाहो तो गांव में अम्मां के साथ रह सकती हो.

“फिर बच्चे बड़े हो रहे थे तो मेरी बहनों की शादी का नंबर आता रहा. सुधा अपनी हर जिम्मेदारी दिल से निभाती रही और मेरे दिल में जगह बनाती रही पर मैं इतना बुरा था कि तलाक की धमकियों से बाज नहीं आता…

“सुधा घर के इतने कामों के साथ अपना पूरा ध्यान पढाईलिखाई में लगाती और इस ने धीरेधीरे अपनी पीएचडी भी पूरी कर ली और एक दिन एक कालेज में जब इसे नौकरी मिल गई तो मैं पूरी तरह से अपनी गलतियों के लिए इतना शर्मिंदा था कि इस से माफी भी मांगने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.

“मन ही मन इतना शर्मिंदा था कि आज इसलिए इस दिन को अच्छा बता रहा था कि मैं तुम सब के सामने सुधा से माफी मांगने की हिम्मत कर पा रहा हूं.

“बच्चो, तुम से भी शर्मिंदा हूं कि मेरी तलाक की धमकियों से तुम्हारा बालमन आहत होता रहा और मुझे खबर भी नहीं हुई.

“सुधा, अनंत और अंजू, तुम सब मुझे आज माफ कर दो…”

प्रिया ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा,”मम्मी, आप भी कुछ कहिए न?”

सुधा ने एक ठंडी सांस ली और बोलने लगी,”शुरू में तो एक झटका सा लगा जब पता चला कि मैं इन्हें पसंद नहीं, मातापिता थे नहीं, भाई ने बहुत मन से मेरा विवाह इन के साथ किया था. लगा भाई को बहुत दुख होगा अगर उस से अपना दुख बताउंगी तो…

“इसलिए कभी भी किसी से शेयर ही नहीं किया कि पति तलाक की धमकियां दे रहा है. सोचा समय के साथ शायद सब ठीक हो जाए और ठीक हुआ भी. तुम दोनों के पैदा होने के बाद इन का अलग रूप देखा. तुम दोनों को यह खूब स्नेह देते, कालेज से आते ही तुम दोनों के साथ खूब खेलते.

“मैं ने यह भी देखा कि मुझे अपने पेरैंट्स के सामने या उन के आसपास होने पर ये तलाक की धमकियां ज्यादा देते हैं, अकेले में इन का व्यवहार कभी खराब भी नहीं रहा. मेरी सारी जरूरतों का हमेशा ध्यान रखते. मैं समझने लगी थी कि यह हम सब को प्यार करते हैं, हमारे बिना रह ही नहीं सकते.

“ये धमकियां पूरी तरह से झूठी हैं, सिर्फ अपने पेरैंट्स को गुस्सा दिखाने के लिए करते हैं.

“यह अपने पेरैंट्स से इस बात पर नाराज थे कि उन्होंने इन के विवाह के लिए इन की मरजी नहीं पूछी, सीधे अपना फैसला थोप दिया.

“जब मैं ने यह समझ लिया तो जीना मुश्किल ही नहीं रहा. मुझे पढ़ने का शौक था, किताबें तो यह ही ला कर दिया करते. पूरा सहयोग किया तभी तो पीएचडी कर पाई.

“रातभर बैठ कर पढ़ती तो यह कभी चाय बना कर देते, कभी गरम दूध का गिलास जबरदस्ती पकड़ा देते और अगर अगले दिन अम्मांपिताजी आ जाएं तो तलाकपुराण शुरू हो जाता, पर मैं इन के मौन प्रेम का स्वाद चख चुकी थी, फिर मुझे कोई धमकी असर न करती,” कहतेकहते सुधा बहुत प्यार से हंस दी.

*शेखर* हैरानी से सुधा का मुंह देख रहे थे, बोले,”मतलब तुम्हें जरा भी चिंता नहीं हुई कभी?”

”नहीं, जनाब, कभी भी नहीं,” सुधा मुसकराई.

अनंत और अंजू ने एकदूसरे की तरफ देखा, फिर अनंत बोला,” लो बहन, और सुनो इन की कहानी, मतलब हम ही बेवकूफ थे जो डरते रहे कि हाय, मम्मीपापा का तलाक न हो जाए, फिर हमारा क्या होगा?

“हम बच्चे तो कई बार यह बात भी करने बैठ जाते कि पापा के पास कौन रहेगा और मम्मी के पास कौन?

“हमें तो फिल्मी कोर्टसीन याद आते और हम अलग ही प्लानिंग करते. पापामम्मी, बड़ा जुल्म किया आप ने बच्चों पर. ये धमकियां हमारे बचपन पर बहुत भारी पड़ी हैं.”

शेखर ने अब गंभीरतापूर्वक कहा,”हां, बच्चो, यह मैं मानता हूं कि तुम दोनों के साथ मैं ने अच्छा नहीं किया, मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मेरे बच्चों के दिलों पर ये धमकियां क्या असर कर रही होंगी, सौरी, बच्चो.”

अंजू ने चहकते हुए शरारत से कहा,”वह तो अच्छा है कि मम्मी ने यह बात एक दिन महसूस कर ली थी कि आप की तलाक की धमकियां हमें परेशान करती हैं तो उन्होंने हमें बैठा कर एक दिन समझा दिया था कि आप का यह गुस्सा दादादादी को दिखाने का एक नाटक है. कुछ तलाकवलाक कभी नहीं होगा, तब जा कर हम थोड़ा ठीक हुए थे.”

शेखर अब मुसकराए और नाटकीय स्वर में कहा,”मतलब मेरी खोखली धमकी का किसी पर भी असर नहीं पड़ रहा था और मैं खुद को तीसमारखां समझता रहा…”

सुधीर ने प्रिया की ओर देखते हुए कहा,”प्रिया, अनंत और अंजू कोई धमकी कभी दें तो दिल पर मत लेना, यार, हमें तो बड़े धमकीबाज ससुर मिले हैं, पर यह भी सच है कि आप दोनों की बौंडिंग है तो कमाल…

“एक सारी उम्र धमकी देता रहा, दूसरा एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकालता रहा, बस 2 बेचारे बच्चे डरते रहे.”

हंसी के ठहाड़ों से घर के दीवार चहक उठे थे और शेखर सुधा को मुग्ध नजरों से निहारते जा रहे थे. Story In Hindi

Hindi Story: चाहत – क्या शोभा अपना सपना पूरा कर पाई?

Hindi Story: “थक गई हूं मैं घर के काम से, बस वही एकजैसी दिनचर्या, सुबह से शाम और फिर शाम से सुबह. घर का सारा टैंशन लेतेलेते मैं परेशान हो चुकी हूं, अब मुझे भी चेंज चाहिए कुछ,”शोभा अकसर ही यह सब किसी न किसी से कहती रहतीं.

एक बार अपनी बोरियत भरी दिनचर्या से अलग, शोभा ने अपनी दोनों बेटियों के साथ रविवार को फिल्म देखने और घूमने का प्लान किया. शोभा ने तय किया इस आउटिंग में वे बिना कोई चिंता किए सिर्फ और सिर्फ आनंद उठाएंगी.

मध्यवर्गीय गृहिणियों को ऐसे रविवार कम ही मिलते हैं, जिस में वे घर वालों पर नहीं बल्कि अपने ऊपर समय और पैसे दोनों खर्च करें, इसलिए इस रविवार को ले कर शोभा का उत्साहित होना लाजिमी था.

यह उत्साह का ही कमाल था कि इस रविवार की सुबह, हर रविवार की तुलना में ज्यादा जल्दी हो गई थी.

उन को जल्दी करतेकरते भी सिर्फ नाश्ता कर के तैयार होने में ही 12 बज गए. शो 1 बजे का था, वहां पहुंचने और टिकट लेने के लिए भी समय चाहिए था. ठीक समय वहां पहुंचने के लिए बस की जगह औटो ही एक विकल्प दिख रहा था और यहीं से शोभा के मन में ‘चाहत और जरूरत’ के बीच में संघर्ष शुरू हो गया. अभी तो आउटिंग की शुरुआत ही थी, तो ‘चाहत’ की विजय हुई.

औटो का मीटर बिलकुल पढ़ीलिखी गृहिणियों की डिगरी की तरह, जिस से कोई काम नहीं लेना चाहता पर हां, जिन का होना भी जरूरी होता है, एक कोने में लटका था. इसलिए किराए का भावताव तय कर के सब औटो में बैठ गए.

शोभा वहां पहुंच कर जल्दी से टिकट काउंटर में जा कर लाइन में लग गईं.

जैसे ही उन का नंबर आया तो उन्होंने अंदर बैठे व्यक्ति को झट से 3 उंगलियां दिखाते हुए कहा,”3 टिकट…”

अंदर बैठे व्यक्ति ने भी बिना गरदन ऊपर किए, नीचे पड़े कांच में उन उंगलियों की छाया देख कर उतनी ही तीव्रता से जवाब दिया,”₹1200…”

शायद शोभा को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता यदि वे साथ में, उस व्यक्ति के होंठों को ₹1200 बोलने वाली मुद्रा में हिलते हुए नहीं देखतीं.

फिर भी मन की तसल्ली के लिए एक बार और पूछ लिया, “कितने?”

इस बार अंदर बैठे व्यक्ति ने सच में उन की आवाज नहीं सुनी पर चेहरे के भाव पढ़ गया.

उस ने जोर से कहा,”₹1200…”

शोभा की अन्य भावनाओं की तरह उन की आउटिंग की इच्छा भी मोर की तरह निकली जो दिखने में तो सुंदर थी पर ज्यादा ऊपर उड़ नहीं सकी और धम्म… से जमीन पर आ गई.

पर फिर एक बार दिल कड़ा कर के उन्होंने अपने परों में हवा भरी और उड़ीं, मतलब ₹1200 उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिए और टिकट ले कर थिएटर की ओर बढ़ गईं.

10 मिनट पहले दरवाजा खुला तो हौल में अंदर जाने वालों में शोभा बेटियों के साथ सब से आगे थीं.

अपनीअपनी सीट ढूंढ़ कर सब यथास्थान बैठ गए. विभिन्न विज्ञापनों को झेलने के बाद, मुकेश और सुनीता के कैंसर के किस्से सुन कर, साथ ही उन के बीभत्स चेहरे देख कर तो शोभा का पारा इतना ऊपर चढ़ गया कि यदि गलती से भी उन्हें अभी कोई खैनी, गुटखा या सिगरेट पीते दिख जाता तो 2-4 थप्पड़ उन्हें वहीं जड़ देतीं और कहतीं कि मजे तुम करो और हम अपने पैसे लगा कर यहां तुम्हारा कटाफटा लटका थोबड़ा देखें… पर शुक्र है वहां धूम्रपान की अनुमति नहीं थी.

लगभग आधे मिनट की शांति के बाद सभी खड़े हो गए. राष्ट्रगान चल रहा था. साल में 2-3 बार ही एक गृहिणी के हिस्से में अपने देश के प्रति प्रेम दिखाने का अवसर प्राप्त होता है और जिस प्रेम को जताने के अवसर कम प्राप्त होते हैं उसे जब अवसर मिलें तो वे हमेशा आंखों से ही फूटता है.

वैसे, देशप्रेम तो सभी में समान ही होता है चाहे सरहद पर खड़ा सिपाही हो या एक गृहिणी, बस किसी को दिखाने का अवसर मिलता है किसी को नहीं. इस समय शोभा वीररस में इतनी डूबी हुई थीं कि उन को एहसास ही नहीं हुआ कि सब लोग बैठ चुके हैं और वे ही अकेली खड़ी हैं, तो बेटी ने उन को हाथ पकड़ कर बैठने को कहा.

अब फिल्म शुरू हो गई. शोभा कलाकारों की अदायगी के साथ भिन्नभिन्न भावनाओं के रोलर कोस्टर से होते हुए इंटरवल तक पहुंचीं.

चूंकि, सभी घर से सिर्फ नाश्ता कर के निकले थे तो इंटरवल तक सब को भूख लग चुकी थी. क्याक्या खाना है, उस की लंबी लिस्ट बेटियों ने तैयार कर के शोभा को थमा दीं.

शोभा एक बार फिर लाइन में खड़ी थीं. उन के पास बेटियों द्वारा दी गई खाने की लंबी लिस्ट थी तो सामने खड़े लोगों की लाइन भी कम लंबी न थी.

जब शोभा के आगे लगभग 3-4 लोग बचे होंगे तब उन की नजर ऊपर लिखे मेन्यू पर पड़ी, जिस में खाने की चीजों के साथसाथ उन के दाम भी थे. उन के दिमाग में जोरदार बिजली कौंध गई और अगले ही पल बिना कुछ समय गंवाए वे लाइन से बाहर थीं.

₹400 के सिर्फ पौपकौर्न, समोसे ₹80 का एक, सैंडविच ₹120 की एक और कोल्डड्रिंक ₹150 की एक.

एक गृहिणी जिस ने अपनी शादीशुदा जिंदगी ज्यादातर रसोई में ही गुजारी हो उन्हें 1 टब पौपकौर्न की कीमत दुकानदार ₹400 बता रहे थे.

शोभा के लिए वही बात थी कि कोई सुई की कीमत ₹100 बताए और उसे खरीदने को कहे.

उन्हें कीमत देख कर चक्कर आने लगे. मन ही मन उन्होंने मोटामोटा हिसाब लगाया तो लिस्ट के खाने का ख़र्च, आउटिंग के खर्च की तय सीमा से पैर पसार कर पर्स के दूसरे पौकेट में रखे बचत के पैसों, जोकि मुसीबत के लिए रखे थे वहां तक पहुंच गया था. उन्हें एक तरफ बेटियों का चेहरा दिख रहा था तो दूसरी तरफ पैसे. इस बार शोभा अपने मन के मोर को ज्यादा उड़ा न पाईं और आनंद के आकाश को नीचा करते हुए लिस्ट में से सामान आधा कर दिया. जाहिर था, कम हुआ हिस्सा मां अपने हिस्से ही लेती है. अब शोभा को एक बार फिर लाइन में लगना पड़ा.

सामान ले कर जब वे अंदर पहुंचीं तो फिल्म शुरू हो चुकी थी. कहते हैं कि यदि फिल्म अच्छी होती है तो वह आप को अपने साथ समेट लेती है, लगता है मानों आप भी उसी का हिस्सा हों. और शोभा के साथ हुआ भी वही. बाकी की दुनिया और खाना सब भूल कर शोभा फिल्म में बहती गईं और तभी वापस आईं जब फिल्म समाप्त हो गई. वे जब अपनी दुनिया में वापस आईं तो उन्हें भूख सताने लगी.

थिएटर से बाहर निकलीं तो थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक छोटी सी चाटभंडार की दुकान दिखाई दी और सामने ही अपना गोलगोल मुंह फुलाए गोलगप्पे नजर आए. गोलगप्पे की खासियत होती है कि उन से कम पैसों में ज्यादा स्वाद मिल जाता है और उस के पानी से पेट भर जाता है.

सिर्फ ₹60 में तीनों ने पेटभर गोलगप्पे खा लिए. घर वापस पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी तो शोभा ने अपनी बेटियों के साथ पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए घूम कर जाने वाली बस पकड़ी.

बस में बैठीबैठी शोभा के दिमाग में बहुत सारी बातें चल रही थीं. कभी वे औटो के ज्यादा लगे पैसों के बारे में सोचतीं तो कभी फिल्म के किसी सीन के बारे में सोच कर हंस पड़तीं, कभी महंगे पौपकौर्न के बारे में सोचतीं तो कभी महीनों या सालों बाद उमड़ी देशभक्ति के बारे में सोच कर रोमांचित हो उठतीं.

उन का मन बहुत भ्रमित था कि क्या यही वह ‘चेंज’ है जो वे चाहतीं थीं? वे सोच रही थीं कि क्या सच में वे ऐसा ही दिन बिताना चाहती थीं जिस में दिन खत्म होने पर उनशके दिल में खुशी के साथ कसक भी रह जाए?

तभी छोटी बेटी ने हाथ हिलाते हुए अपनी मां से पूछा,”मम्मी, अगले संडे हम कहां चलेंगे?”

अब शोभा को ‘चाहत और जरूरत’ में से किसी 1 को चुनने का था. उन्होंने सब की जरूरतों का खयाल रखते हुए साथ ही अपनी चाहत का भी तिरस्कार न करते हुए कहा,”आज के जैसे बस से पूरा शहर देखते हुए बीच चलेंगे और सनसेट देखेंगे.”

शोभा सोचने लगीं कि अच्छा हुआ जो प्रकृति अपना सौंदर्य दिखाने के पैसे नहीं लेती और प्रकृति से बेहतर चेंज कहीं और से मिल सकता है भला?

शोभा को प्रकृति के साथसाथ अपना घर भी बेहद सुंदर नजर आने लगा था. उस का अपना घर, जहां उस के सपने हैं, अपने हैं और सब का साथ भी तो. Hindi Story

15 August Special: देशभक्ति को दिलों में जगाते ऐसे गाने जो कर देंगे आंखें नम

15 August Special: 15 अगस्त का दिन हर भारतीय के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि गर्व, भावनाओं और देशभक्ति का प्रतीक है. आजादी के दिन के इस खास मौके पर देशभर में उत्साह और जश्न का माहौल छा जाता है. कहीं लोग आसमान में रंगबिरंगी पतंगों से इसे सजाते हैं, तो कहीं परिवार के साथ बैठ कर आजादी पर बनी मोटिवेशनल फिल्में देखते हैं. कई जगहों पर घरों की छतों से पतंग उड़ाने के साथसाथ स्पीकर्स पर गूंजते देशभक्ति गीत माहौल को और भी रोमांचक बना देते हैं. ऐसे गीत, जिन्हें सुनते ही दिल में जोश उमड़ आता है और आंखें अपने आप नम हो जाती हैं, चाहे उन्हें कितनी ही बार क्यों न सुना जाए. तो चलिए आप को बताते हैं कुछ ऐसे गाने जिन्हें आप इस 15 अगस्त को जरूर सुन सकते हैं.

तेरी मिट्टी (Teri Mitti)

‘बी प्राक’ की दमदार आवाज में गाया ‘तेरी मिट्टी’ ऐसा गीत है जो सीधे दिल के सब से गहरे कोनों को छू जाता है. इस गाने को सुनते ही भावनाओं का एक सैलाब उमड़ पड़ता है, जो आंखों को नम और दिल को भारी कर देता है. अक्षय कुमार की फिल्म ‘केसरी’ का यह गीत आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही गहराई से बसता है. इस की पौपुलैरिटी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यूट्यूब पर इसे अब तक 411 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

संदेशे आते हैं (Sandese Aate Hain)

फिल्म ‘बौर्डर’ का यह गाना 15 अगस्त के जश्न का एक अहम हिस्सा बन चुका है. इसे सुने बिना आजादी का दिन अधूरा सा लगता है. घर से बाहर कदम रखते ही कहीं न कहीं से इस की धुन कानों में गूंज ही जाती है. भले ही फिल्म ‘बौर्डर’ साल 1997 में रिलीज हुई थी, लेकिन इस गीत की देशभक्ति और जज्बात आज भी उतने ही ताजा हैं, जितने उस वक्त थे.

ऐसा देश है मेरा (Aesa Desh Hai Mera)

शाहरुख खान और प्रीति जिंटा की फिल्म ‘वीरजारा’ का यह गीत हमारे देश की मिट्टी, किसानों और सभी कल्चर्स की झलक को बखूबी पेश करता है. इस की मधुर धुन और गहरे बोल ने इसे हर भारतीय के दिल के बेहद करीब बना दिया है. यही वजह है कि स्कूलों और कौलेजों में बच्चे अकसर इस गाने पर परफौर्म करते नजर आते हैं. यूट्यूब पर भी इस गाने को करीब 250 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

चक दे इंडिया (Chak De India)

शाहरुख खान की फिल्म ‘चक दे इंडिया‘ का टाइटल सौन्ग हर देशभक्त के अंदर अपने देश के लिए कुछ कर दिखाने का जुनून भर देता है. इस के जोशीले लिरिक्स और दमदार म्यूजिक में ऐसा जादू है कि इसे सुनते ही मन में एक अलग सा जोश और गर्व महसूस होने लगता है. 15 August Special

15 August Special: देशप्रेम से भर देंगी आप का दिल – देखें 15 अगस्त की टौप 6 फिल्में

15 August Special: 15 अगस्त आते ही हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज्बा अपने आप उमड़ने लगता है. कोई इस दिन को आसमान में रंगबिरंगी पतंगों से सजा कर मनाता है, तो कोई छुट्टी का फायदा उठा कर घर पर परिवार के साथ वक्त बिताना पसंद करता है. अगर आप भी इस आजादी के दिन को खास बनाना चाहते हैं, तो क्यों न इसे परिवार संग कुछ बेहतरीन फिल्मों के साथ सैलिब्रेट किया जाए? यहां हम आप के लिए 6 ऐसी चुनिंदा फिल्में ले कर आए हैं, जिन्हें 15 अगस्त पर परिवार के साथ मिल कर देखना आप के लिए एक अलग ही ऐक्सपीरियंस होगा.

बौर्डर (1997)

1997 में आई फिल्म ‘बौर्डर’ एक क्लासिक फिल्म है. इस फिल्म में लोंगेवाला की लड़ाई की सच्ची घटनाओं और 1971 के भारतपाक युद्ध को एक अलग ही फील के साथ को दिखाया गया है.

लक्ष्य (2004)

‘लक्ष्य’ की कहानी एक ऐसे युवक के इर्दगिर्द घूमती है, जो शुरुआत में जीवन में किसी स्पष्ट दिशा के बिना भटक रहा होता है. कारगिल युद्ध पर बनी यह फिल्म देशसेवा का गहरा संदेश देती है.

द लेजेंड औफ भगत सिंह (2002)

अजय देवगन द्वारा निभाया गया भगत सिंह का किरदार भला कोई कैसे भूल सकता है. यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की सोच और बलिदान को दर्शाती है, जिस ने अपने भारत के लिए शहादत को चुना.

एलओसी कारगिल (2003)

यह फिल्म कारगिल में लड़े भारतीय सैनिकों और उन के परिवारों द्वारा याद किए जाने की कहानी है. 1999 के कारगिल युद्ध (आपरेशन विजय) पर आधारित, यह फिल्म उन की वीरता और बलिदान को दिखाती है.

चक दे इंडिया (2007)

इस मूवी में शाहरुख खान लीड रोल में है, इस मूवी में उन्होंने भारतीय महिला हौकी टीम के कोच की भूमिका निभाई है, जो इंडियन वुमन्स टीम को जीत दिलाने के लिए जीतोड़ मेहनत करता है, यह फिल्म अंत तक आपको अपनी जगह से हिलने नहीं देगी.

शेरशाह (2021)

कारगिल युद्ध के कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर आधारित ‘शेरशाह’ एक ऐसी कहानी है, जो साहस, देशभक्ति और बलिदान की मिसाल पेश करती है. इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कैप्टन विक्रम बत्रा का किरदार इतनी ईमानदारी के साथ निभाया है कि दर्शकों की आंखें नम हो जाएं. 15 August Special

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Sexual Harassment: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 28 साल है और मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव की रहने वाली हूं. मेरे परिवार में मैं, मेरी बहन और मेरी मां हैं. मेरे पिताजी का देहांत कुछ समय पहले ही हो गया था. गांव के लड़के मुझे और मेरी बहन को छेड़ते रहते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि हमारे आगेपीछे कोई नहीं है. एक बार एक लड़के ने मेरे साथ खेत में जबरदस्ती करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं वहां से भाग निकली, लेकिन यह बात किसी को बताने की हिम्मत नहीं हुई. हमारा घर से निकलना मुश्किल होता जा रहा है. मेरी मां हम दोनों की शादी करवा देना चाहती हैं, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हमारे बाद मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं रहेगा. वे कैसे अपना पेट पालेंगी, क्योंकि हम दोनों बहनें ही नौकरी कर के घर का गुजारा चला रही हैं. ऐसे में मुझे शादी करना फैसला बिलकुल सही नहीं लग रहा. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

जैसा कि आप ने बताया कि आप के पिता का देहांत हो गया है, तो ऐसे में आप को और आप की बहन को स्ट्रौंग बनने की जरूरत है. दुनिया सीधेसादे लोगों को नोच डालती है. लोगों को ऐसा जरूर लगता होगा कि आप के सिर पर किसी मर्द का साया नहीं है तो आप के साथ कुछ भी किया जा सकता है और यही सोच आप को बदलनी है.

आज की लड़कियां हर चीज में आगे हैं फिर चाहे वह घर चलाना हो या फिर किसी का मुकाबला करना हो. कोई भी आप का या आप की बहन का फायदा उठाने की कोशिश करता है तो ऐसे में आप दोनों को चुप नहीं बैठना है, बल्कि डट कर सामना करना है. आप पुलिस की भी मदद ले सकती हैं ताकि गांव के बाकी लोगों के मन में भी डर बैठ जाए.

रही बात शादी की तो आप की मां की चिंता गलत नहीं है. वे चाहती हैं कि आप दोनों का उन के सामने घर बस जाए. आप ऐसा कर सकती हैं कि गांव के आसपास ही कोई अच्छा घर देख कर शादी कर लें ताकि पास रहते हुए अपनी मां की देखभाल भी कर सकें. आप शादी करने से पहले ही अपने होने वाले पति को बता दीजिएगा कि शादी के बाद आप को अपनी मां का खयाल भी रखना पड़ेगा. कहीं ऐसा न हो कि इस बात को ले कर आपके और आप के पति के बीच बाद में कोई विवाद हो. यही सलाह आप अपनी बहन को भी दे सकती हैं.

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15 August Special: फौजी ढाबा

15 August Special: ढाबा चलाने के लिए करतार सिंह ने 4 लड़कों का स्टाफ भी रख छोड़ा था, जो ग्राहकों को अच्छी सर्विस देते थे. उन की मजे में जिंदगी कट रही थी.

फौज में सूबेदार करतार सिंह का बड़ा जलवा था. अपनी बहादुरी के लिए मिले बहुत सारे मैडल उस की वरदी की शान बढ़ाया करते थे. बौर्डर से जब भी वह गांव लौटता तो पूरा गांव अपने फौजी भाई से सरहद की कहानी सुनने आ जाता था.

करतार सिंह सरहद की गोलीबारी और दुश्मन फौज की फर्जी मुठभेड़ की कहानी बड़े जोश से सुनाया करता था. अपनी बहादुरी तक पहुंचतेपहुंचते कहानी में जोश कुछ ज्यादा ही हो जाता था. गांव का हर नौजवान बड़ी हसरत से सोचता कि काश, वह भी फौज में होता तो करतार सिंह की तरह वरदी पहन कर गांव आया करता.

गांव के बुजुर्ग तो करतार सिंह पर फख्र किया करते हैं कि उस ने उन के गांव का नाम देशभर में रोशन किया है.

इस बार करतार सिंह जब घर आया तो अपने पैरों के बजाय बैसाखी के सहारे आया. असली मुठभेड़ में उस की एक टांग में गोली लगी थी जिसे काटना पड़ा.

6 महीने सेना के अस्पताल में गुजारने के बाद करतार सिंह को छुट्टी दे दी गई और साथ में जबरदस्ती रिटायरमैंट के कागजात भी भारीभरकम रकम के चैक के साथ थमा कर उसे वापस घर भेज दिया गया.

फौजी की कीमत उसी वक्त तक है, जब तक कि उस के हाथपैर सहीसलामत रहते हैं. जिस तरह टांग के टूटने के बाद घोड़ा रेस में दौड़ने के लायक नहीं रह जाता तो उसे गोली मार दी जाती है, ठीक उसी तरह फौज लाचार हो जाने वाले को रिटायर कर देती है.

करतार सिंह को बड़ी रकम के साथ सरकार ने हाईवे से लगी हुई एक जमीन भी तोहफे में दी थी जिस पर आज उस ने ‘फौजी ढाबा’ खोल दिया था. 2 बेटियां और एक बीवी के अलावा कोई खास जिम्मेदारी करतार सिंह पर थी नहीं. फौज से मिली हुई रकम और ढाबे से होने वाली आमदनी ने पैसों की अच्छी आवाजाही कर रखी थी, इसलिए अब काम में सुस्ती आने लगी. नौकरों के भरोसे ढाबा चल रहा था.

करतार सिंह ज्यादातर नशे में धुत्त रहता था. वह पीता पहले भी था, लेकिन फौज में इतनी दौड़ाई रहती थी कि कभी नशा सवार नहीं हो पाता था. अब काम कुछ था नहीं, इसलिए नशा उतरने भी नहीं पाता था कि बोतल दोबारा मुंह से लग जाती.

जब मालिक नशे में रहे तो नौकरों को मनमानी करने से कौन रोक सकता है. आमदनी कम होने लगी, पैसे गायब होने लगे.

मजबूर हो कर ढाबे की कमान बीवी सरबजीत कौर ने संभाली. अब वह गल्ले पर खुद बैठती और काम नौकरों से कराती.

तीखे नाकनक्श की सरबजीत कौर के ढाबे पर बैठते ही ढाबे ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली. दाल मक्खनी और पिस्तई खीर के साथ सरबजीत कौर का तड़का भी फौजी ढाबे की पहचान बन गया.

एक बार फिर से ग्राहकों की तादाद कम होने लगी. सरबजीत कौर ने इस की वजह मालूम की तो एक नौकर ने बताया कि चंद कदम के फासले पर एक ढाबा और खुल गया है. अब ज्यादातर ट्रक वहां पर रुकते हैं.

दूसरे दिन सरबजीत कौर ने खुद जा कर देखा कि नया ढाबा, जिस का नाम ‘भाभीजी का ढाबा’ था, वहां 25-26 साल की एक खूबसूरत औरत गल्ले पर बैठी है और ग्राहकों से मुसकरामुसकरा कर डील कर रही है.

‘फौजी ढाबा’ को तोड़ने के लिए गंगा ने शुरू से ही अपनी बीवी को बिठा कर करतार सिंह के ग्राहकों पर डाका डाल दिया था.

सरबजीत कौर के पास अब इस के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था कि वह अपने ब्लाउज के गले को बड़ा कर के गल्ले पर बैठा करे. इस तरकीब से कुछ सीनियर फौजी तो ढाबे पर आ गए, लेकिन अभी भी ‘भाभीजी का ढाबा’ नंबर वन पर चल रहा था.

‘फौजी ढाबा’ किस हाल से गुजर रहा था, इस की परवाह अब करतार सिंह को नहीं थी. उसे तो बस सुबहशाम 2 बोतल दारू और एक प्लेट चिकन टिक्का चाहिए था, जो किसी न किसी तरह सरबजीत कौर उस तक पहुंचा देती थी.

ढाबे की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से सरबजीत कौर पर आ गई थी. बच्चियां छोटी थीं. यों भी स्कूल जाने वाली बच्चियों को ढाबे के काम में लगाना मुनासिब नहीं था.

एक बार उस ने एक बच्ची को पलंग पर बैठे एक ड्राइवर के पास सलाद देने के लिए भेजा तो यह देख कर उस का खून खौल गया कि ड्राइवर ने बच्ची के गाल को नोचा और फिर ड्राइवर का हाथ बच्ची की गरदन से नीचे आ गया.

छोटी बच्ची सलाद की प्लेट पटक कर घर के अंदर भाग गई. दुकानदारी पर कहीं असर न पड़े, इसलिए सरबजीत कौर ने बात आगे नहीं बढ़ाई.

बाप नशे में धुत्त और मां दिनरात ढाबे के गल्ले पर बैठने के लिए मजबूर, ऐसे में बच्चियों पर कौन नजर रखे. कच्ची उम्र से जवानी की दहलीज पर पैर रखने वाली गीता की नजर चरनजीत से टकरा गई. 1-2 महीने से शनिवार की शाम को एक नए ट्रक के साथ एक नौजवान आ कर सब से अलग बैठ जाता. खाना खा कर सो जाता और दूसरे दिन वह ट्रक ले कर कहीं चला जाता. स्याह कमीज, स्याह पैंट और नारंगी रंग की पगड़ी में वह बहुत खूबसूरत लगता था.

पहली बार जब गीता ने देखा तो वह उसे देखती ही रह गई. इत्तिफाक से उस की नजर भी गीता की तरफ उठ गई तो उस ने नजर हटाई नहीं. अपनी बड़ीबड़ी आंखों से वह गीता को घूरता ही रहा.

साथ में बैठे क्लीनर ने जब पुकारा, ‘‘चरनजीते, कहां खो गया,’’ तो गीता को मालूम हुआ कि उस का नाम चरनजीत है.

दूसरे शनिवार को जब वह फिर वहां आया तो गीता के दिल की धड़कन तेज हो गई. उसे ऐसा लगा कि वह सिर्फ उसी के लिए आया है. लेकिन, चरनजीत के बरताव में कोई फर्क नहीं आया. खाना खा कर वह पलंग पर सो गया.

गीता ने घर से एक तकिया मंगा कर ढाबे के एक लड़के को देते हुए कहा कि उन साहब को दे आए. पहली बार किसी ग्राहक को तकिया पेश किया गया था. तकिए के कोने में गीता का मोबाइल नंबर और नाम भी लिखा था.

किसी को खबर भी नहीं हुई और चरनजीत और गीता एकदूसरे के इश्क में डूबते चले गए. मोबाइल पर बातें होती रहतीं. किसी को मालूम ही नहीं चल पाता कि चंद कदमों के फासले पर आशिक और माशूक बैठे एकदूसरे से हालेदिल बयां कर रहे हैं. स्कूल टाइमिंग में बाहर मुलाकातें होने लगीं.

एक दिन ऐसा भी आया, जब चरनजीत ने गीता से कहा कि ऐसा कब तक चलता रहेगा. हम लोगों को शादी कर लेनी चाहिए. गीता खामोश हो गई.

‘‘क्या मैं ने कुछ गलत बात कह दी?’’

‘‘नहीं, तुम ने कुछ गलत नहीं कहा. मेरे पापा सूबेदार रहे हैं, मेरी शादी वे किसी ट्रक ड्राइवर से कभी नहीं करेंगे.’’

‘‘फिर तो हम लोगों को अलग हो जाना चाहिए,’’ कहते हुए चरनजीत ने गीता का हाथ छोड़ दिया.

‘‘अब मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती…’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद गीता ने कहा, ‘‘मुझे यहां से ले कर कहीं दूर चले जाओ. वहीं शादी कर लेंगे.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है कि मैं तुम्हें भगा कर ले जाऊं. कितनी घटिया बात कही है तुम ने…’’ चरनजीत ने कहा, ‘‘मेरे मांबाप इस बात को पसंद नहीं करेंगे. तुम्हारे घर वाले भी यही सोचेंगे कि ट्रक ड्राइवरों का किरदार ऐसा ही होता है.

‘‘गीता, मैं पढ़ालिखा हूं. मास्टरी की है मैं ने. नौकरी नहीं मिली तो ड्राइवर बन गया.

‘‘यह मेरा अपना ट्रक है. शादी करूंगा तो इज्जत से करूंगा, वरना हम दोनों के रास्ते अलग हो जाएंगे. कल तुम्हारे मम्मीपापा से तुम्हारा हाथ मांगने आऊंगा. तैयार रहना.’’

करतार सिंह ने कभी सोचा भी नहीं था कि बेटियों की शादी भी की जाती है. उसे तो इस बात की फिक्र रहती थी कि कहीं रात में उस की बोतल खाली न रह जाए.

चरनजीत ने जब उस से उस की बेटी का हाथ मांगा तो सरबजीत कौर के साथ करतार सिंह के चेहरे का रंग भी बिगड़ गया. उसे ऐसा लगा, जैसे बोतल में किसी ने सिर्फ पानी मिला दिया था. पलभर में सारा नशा काफूर हो गया.

‘‘तुम ने गीता को मांगने से पहले यह नहीं सोचा कि तुम एक ट्रक ड्राइवर हो.’’

‘‘मैं ने यह तो नहीं सोचा, लेकिन यह जरूर सोचा कि आप की बेटी अगर मेरे साथ भाग जाएगी तो आप की कितनी बदनामी होगी. ट्रक ड्राइवरों पर से हमेशा के लिए आप का भरोसा उठ जाएगा.’’

ऐसा सुन कर फौजी करतार सिंह का सिर पहली बार किसी के सामने झुका था तो वह चरनजीत था.

‘‘अपने घर वालों से कहो शादी की तैयारी करें, गीता अब तुम्हारी हुई,’’ यह कह कर करतार सिंह ने शराब की बोतल को चरनजीत के सामने ही मुंह से लगा लिया. 15 August Special

15 August Special: वतनपरस्ती – क्यों समीक्षा और हफीजा की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई?

15 August Special: ‘‘नया देश, नए लोग दिल नहीं लगता… जी करता है इंडिया लौट जाऊं,’’ समीक्षा ने रोज का राग अलापा. ‘‘यह आस्ट्रेलिया है. सब से अच्छे विकसित देशों में से एक. यहां आ कर बसने के लिए लोग जमीनआसमान एक कर देते हैं और तुम यहां से वापस जाने की बात करती हो. अब इसे मैं तुम्हारा बचपना न कहूं तो और क्या कहूं?’’

‘‘तो क्या करूं? तुम्हारे पास तो तुम्हारे काम की वजह से अपना सोशल सर्कल है, दोनों बच्चों के पास भी उन के स्कूल के फ्रैंड्स हैं. बस एक मैं ही बचती हूं जिसे दिन भर चारदीवारी में अर्थहीन वक्त गुजारना पड़ता है. अकेले रहरह कर तंग आ गई हूं मैं.’’ ‘‘हां, लंबे समय तक चुप रहने के कारण तुम्हारे मुंह से बदबू भी तो आने लगती होगी,’’ प्रतीक चुटकी लेते हुए बोला.

‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है, मगर मैं वास्तव में गंभीर हूं अपनी समस्या को ले कर… मेरी हालत तो कुएं के मेढक जैसी होती जा रही है. शादी से पहले जो पढ़ाईलिखाई की थी उसे भी घरगृहस्थी में फंस कर भूल चुकी हूं अब तक.’’ ‘‘कौन कहता है कि तुम कुएं का मेढक बन कर जियो… मैं तो चाहता हूं कि तुम आसमान की ऊंचाइयां छुओ.’’

‘‘इस चारदीवारी को पार कर के घर के 3 प्राणियों के सिवा किसी चौथे की सूरत देखने तक को तो नसीब नहीं होती… आसमान की ऊंचाइयों तक क्या खाक पहुंचुंगी मैं?’’ ‘‘जिंदगी की दिशा में अमूलचूल परिवर्तन जिंदगी को देखने के नजरिए और जैसेजैसे जिंदगी मिले उस से सर्वोत्तम पल निचोड़ कर जीवन अमृत ग्रहण करने में है,’’ प्रतीक समीक्षा के हाथ से चाय का प्याला ले कर उसे अपने पास बैठाते हुए किसी फिलौसफर के से अंदाज से बोला.

‘‘मुझे तो इस जीवनअमृत के प्याले को पाने की कोई युक्ति नहीं समझ आती. तुम ही कुछ समाधान ढूंढ़ो मेरे लिए.’’ ‘‘मैं खुद भी कुछ समय से तुम्हारी परेशानी महसूस कर रहा था. जैसेजैसे बच्चे बड़े होते जाएंगे उन की दुनिया हम से अलग होती जाएगी… तब बच्चे अपनी जिंदगी में और भी व्यस्त हो जाएंगे और तुम्हारा एकाकीपन बद से बदतर होता चला जाएगा. अच्छा होगा कि तुम खुद को उस वक्त से मुकाबला करने के लिए अभी से तैयार करना शुरू कर दो और कुछ पढ़लिख लो.’’

‘‘पढ़नालिखना और इस उम्र में… चलो तुम्हारी बात मान कर मैं कोई कोर्स कर भी लूं तो उस से होगा भी क्या? 1-2 साल में कोर्स पूरा हो जाएगा और मैं जहां से चलूंगी वहीं वापस आ कर खड़ी हो जाऊंगी… इस उम्र में मुझे कोई काम तो मिलने से रहा… वह भी यहां आस्ट्रेलिया में.’’ ‘‘नौकरी मिलने का आयु से संबंध जितना इंडिया में होता है उतना यहां आस्ट्रेलिया में नहीं. यहां तो एक तरह का चलन है कि बच्चों के थोड़ा बड़ा हो जाने के बाद मांएं खुद को रिबिल्ट करती हैं और जो भी कोर्सेज तत्कालीन इंडस्ट्री की जरूरत में होते हैं उन्हें कर के फिर से वर्कफोर्स में लौट आती हैं.’’

‘‘हां, अब तुम्हारा आशय कुछकुछ समझ में आ रहा है मुझे. मैं कल दोपहर में आराम से सभी यूनिवर्सिटीज की वैबसाइट पर जा कर देखूंगी कि मेरे लिए क्या ठीक रहेगा.’’

कई दिनों तक विभिन्न शिक्षण संस्थानों की वैबसाइट्स पर घंटों व्यतीत करने के बाद आखिर समीक्षा को एक कोर्स पसंद आ गया. ‘इवेंट मैनेजमैंट’ का. 15 साल बाद फिर से पढ़ाई शुरू करने की घबराहट मिश्रित उमंग के साथ वह टेफ इंस्टिट्यूट पहुंच गई.

यहीं पर उस की मुलाकात हफीजा से हुई. उस ने भी इवेंट मैनेजमैंट कोर्स में प्रवेश लिया था और अपने अंगरेजी के अल्प ज्ञान के कारण कुछ घबराई, सकुचाई अपनेआप में सिमटी सी रहती थी. हफीजा के हालात पर समीक्षा को बड़ी सहानुभूति होती. उसे लगता कि उसे हफीजा को सीमित दायरे से निकालने में उस की थोड़ी मदद करनी चाहिए. वह बचपन से सुनती आई थी कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है. व्यावहारिक जीवन में इस की सत्यता को परखने की दृष्टि से समीक्षा ने हफीजा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. अब वह जब भी मौका मिलता हफीजा को अपने साथ अंगरेजी बोलने का अभ्यास कराने लगती.

समीक्षा जैसी बुद्धिजीवी दोस्त पा कर हफीजा भी बेहद प्रफुल्लित जान पड़ती थी. कृतज्ञता से सिर से पांव तक डूबी हुई वह मौकेबेमौके समीक्षा के परिवार को अपने घर बुला कर इराकी खाने की लजीज दावतें देती. समीक्षा भी अपने भारतीय पाककौशल का प्रदर्शन करने में पीछे न रहती और इंस्टिट्यूट जाने के लिए 2 लंच पैक तैयार कर के ले जाती. एक स्वयं के लिए और दूसरा अपनी हफीजा के लिए. वे दोनों क्लासरूम में पासपास बैठतीं, साथसाथ असाइनमैंट्स करतीं. दोनों के बीच की घनिष्ठता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी. पंजाबी समीक्षा का गोरा रंग, तीखे नैननक्श, इराकी हफीजा से मिलतेजुलते से होने के कारण सभी उन्हें बहनें समझते. उन के बीच का अंतराल तब दृष्टव्य होता जब कोई उन से बात करता. समीक्षा धाराप्रवाह अंगरेजी बोलती तो हफीजा टूटीफूटी और वह भी पक्के इराकी लहजे में.

‘‘तुम्हारी इंग्लिश इतनी अच्छी कैसे है?’’ अपनी टूटीफूटी इंग्लिश से मायूस हफीजा से एक दिन रहा न गया तो उस ने समीक्षा से पूछ

ही लिया. ‘‘इंग्लिश एक तरह से हमारे देश की दूसरी भाषा है. हमारे यहां अच्छे से अच्छे इंग्लिश माध्यम के स्कूल हैं. उच्च शिक्षा का माध्यम ज्यादातर इंग्लिश ही है. इंग्लिश में अनगिनत पत्रपत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता है,’’ समीक्षा ने गर्व के साथ कुछ इस अंदाज में ‘इंडिया का हाल ए अंगरेजी’ बयां किया जैसेकि द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाला कोई सैनिक किसी को अपने जीते हुए पदकों की गिनती करा रहा हो.

थोड़ी देर हफीजा किंकर्तव्यविमूढ सी समीक्षा की बात सुनती रही, फिर बोली, ‘‘जिंदगी आसान रहती है तुम जैसों के लिए तो इंग्लिश भाषी देशों में आ कर. हमारे जैसों को यहां आ कर सब से पहले तो यहां की जबान सीखने की जंग लड़नी पड़ती है… बाकी चीजें तो बाद की हैं.’’ ‘‘हां हफीजा वह तो ठीक है, लेकिन मैं कई बार सोचती हूं कि ऐसे हालात में तुम यहां आ कैसे गईं, क्योंकि लोकल भाषा का ज्ञान वीजा मिलने की एक जरूरी शर्त है.’’

‘‘मैं… मैं वह क्या है मैं दूसरे तरीके से यहां आई थी,’’ हफीजा उस वक्त तो होशियारी के साथ बात टालने में कामयाब हो गई.

बहरहाल वक्त के साथ धीरेधीरे समीक्षा को पता चल गया कि हफीजा एक विधवा है. उस के पति की मृत्यु उस के बेटे के जन्म के 3-4 महीने पहले ही हो गई थी. अपने कुछ रिश्तेदारों की मदद से वह आस्ट्रेलिया चली आई थी एक रिफ्यूजी बन कर. वे सब रिश्तेदार भी कई साल पहले इसी तरीके से यहां आ कर अब तक आस्ट्रेलियन नागरिक बन चुके थे. पढ़ाई के साथसाथ वह एक रेस्तरां में कुछ घंटे वेटर का काम किया करती थी.

हफीजा का लाइफस्टाइल देख कर समीक्षा हैरान रहती थी. हफीजा का पहनावा किसी रईस से कम नहीं था. वह अच्छे इलाके में अच्छा घर किराए पर ले कर रहती थी और उस का बेटा भी उस क्षेत्र के सब से अच्छे स्कूल में पढ़ता था. ‘‘मुश्किल होती होगी तुम्हें अकेले संभालने में… कैसे संभव हो पाता है ये सब? कुछ घंटे वेटर का काम कर के तो किसी का भी गुजारा नहीं हो सकता यहां?’’ एक दिन घुमावदार तरीके से समीक्षा ने हफीजा के लाइफस्टाइल का राज जानने की उत्सुकता में पूछा. ‘‘मैं एक सिंगल मौम हूं, इसलिए मुझे ‘सोशल सिक्युरिटी अलाउंस’ मिलता है

सरकार से.’’ हफीजा के सत्य वचन समीक्षा को और भी जिज्ञासु बना गए. सो उस ने तहकीकात जारी रखी, ‘‘और तुम ने बताया था कि तुम जब आस्ट्रेलिया आई थी तो तुम्हें इंग्लिश का एक शब्द भी नहीं आता था, पर अब टूटीफूटी ही सही, मगर तुम्हें कामचलाऊ इंग्लिश आती ही है. कैसे सीखा ये सब तुम ने अपने दम पर?’’

‘‘मुझे यहां आ कर ‘एडल्ट माइग्रेंट इंग्लिश प्रोग्राम’ के तहत सरकार की तरफ से 510 घंटे की मुफ्त ट्यूशन मिली थी… अंगरेजी सीखने के लिए.’’

‘‘अच्छा तभी मैं सोचूं कि तुम्हारे इतने ठाट कैसे हैं… अब पता चला कि तुम्हारे देश से इतने सारे लोग रोजरोज बोट में बैठबैठ कर यहां क्यों चले आते हैं… क्यों कुछ खास देशों से आने वाले शरणार्थियों को ले कर नैशनल न्यूज में इतना होहल्ला होता है,’’ जल्दबाजी में समीक्षा के मुंह से सच्चे, मगर कड़वे शब्द बाहर फिसल गए. ‘‘हम से ज्यादा तो इंडियंस यहां आते हैं,’’ हफीजा ने अपना बचाव करते हुए कहा.

‘‘हां आते तो हैं पर आने का तरीका तुम लोगों वाला नहीं है. हमारे जैसे उच्चशिक्षित लोग स्किल माइग्रेशन वीजा पर आते हैं या फिर स्टूडैंट वीजा पर. दोनों ही स्थितियों में हम इन देशों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में अपना योगदान देते हैं…’’ हफीजा ने तत्काल समीक्षा की बात बीच में काटी, ‘‘और हां वह क्या फरमाया तुम ने कि नैशनल न्यूज में हम जैसों को ले कर होहल्ला होता रहता है… क्या तुम ने कभी ‘एसबीएस’ टीवी देखा है… कैसीकैसी डौक्यूमैंटरीज आती हैं उस पर तुम्हारे इंडिया के बारे में… उफ वह खुले हुए बदबूदार गटर, गंदी झुग्गीझोंपडि़यां,’’ हफीजा ने नाक सिकोड़ कर हिकारत से कहा, ‘‘कुछ साल पहले एक औस्कर अवार्ड विनर मूवी भी तो बनी थी तुम्हारे देश के बारे में. उस में भी तो ये सब गंद ही दिखाया गया था… क्या नाम था उस का… हां याद आ गया ‘स्लमडौग मिलियनेयर…’ ओएओए हाल तेरे देश का बदहाल है, फिर भी तेरा दिमाग आसमां पर है,’’ हफीजा समीक्षा की बेइज्जती करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. ‘‘हम स्वाभिमानी लोग हैं… कम से कम तुम्हारी तरह मुफ्त की चीजों के लिए इधरउधर नहीं भागते फिरते. हमारा इंडिया, इंडिया है और तुम्हारा इराक, इराक… है कोई मुकाबला क्या… न ही हो सकता. इन विकसित देशों को हमारे जैसे प्रतिभासंपन्न लोगों की बहुत जरूरत होती है, इसलिए बड़ी कंपनियां हमारे वीजा स्पौंसर कर के हमें यहां बुलाती हैं. दुनिया भर की इनफौरमेशन टैक्नोलौजी हम इंडियंस के बलबूते पर ही चल

रही है. हम, हम हैं… हम बिना जरूरत के शरणार्थी बन कर विकसित देशों का आर्थिक विदोहन करने के लिए नहीं आते,’’ अब तक समीक्षा भी इंडोनेशिया में असमय फटने वाले ज्वालामुखी में तबदील हो चुकी थी. ‘‘बड़े ही फेंकू होते हो तुम लोग… ऐसे ही विद्वान हो तो अपने ही देश में सदियों तक गुलाम क्यों बने रहे… क्यों लुटतेपिटते रहे अपनी ही जमीं पर विदेशियों के हाथों?’’

‘‘लुटेरे तो वहीं आते हैं न जहां धनदौलत के अंबार लगे होते हैं. इतिहास गवाह है कि हमारा इंडिया प्राचीनकाल से ही अकूत संपदा और ज्ञान का केंद्र रहा है. जिसे देखो वही दुनिया भर से हमारा धन और ज्ञान लूटने चला आता था. जब ब्रिटिश लोग आए थे तो हमारी जीडीपी पूरे विश्व की 25% थी… यह हाल तो हमारे देश का तब था जबकि ब्रिटिश लोगों के आने के पहले भी अनगिनत आक्रमणकारी टनों संपदा लूट कर ले जा चुके थे. जगत गुरु है हमारा इंडिया समझीं तुम…?’’ समीक्षा के दिलदिमाग एक हो कर उसे आपे से बाहर कर चुके थे. ‘‘ऐसी ही चाहत है दुनिया को तुम लोगों की तो मेलबौर्न में इंडियन स्टूडैंट्स को ले कर इतने फसाने क्यों हुए थे?’’ जाने कहांकहां से हफीजा भी इंडियंस के बारे में खोदखोद कर नएपुराने तथ्य निकाल रही थी.

‘‘कुछ एक पागल लोग तो सब जगह होते हैं… थोड़ीबहुत ऊंचनीच तो सब जग हो जाती है… मगर तुम लोग, तुम तो जहां रहते हो वहीं दंगा करते हो. पूरी दुनिया सच जान चुकी है तुम्हारा… शांति से रहना तो तुम लोगों ने सीखा ही नहीं है. सुविधाओं का फायदा उठाने पहुंच जाते हो अच्छे देशों में, मगर सगे किसी के नहीं होते तुम लोग.’’

जवाब में हफीजा ने समीक्षा को खा जाने वाली निगाहों से घूरा. समीक्षा ने बदले में एक विदूप मुसकराहट उस की ओर फेंकी और अपनी किताबें समेटने लगी. हफीजा कुरसी को लात मारते हुए क्लासरूम से बाहर निकल गई. शुक्र है यह नजारा देखने के लिए उस वक्त वहां कोई नहीं था. वे दोनों फुरसत के क्षणों में एक खाली क्लासरूम में अंगरेजी का अभ्यास करने के लिए आई थीं. मगर यह हसीन गुफ्तगू अचानक बेहद संगीन मोड़ ले गई. उस दिन के बाद दोनों पक्की सहेलियां क्लासरूम के ओरछोर पर बैठने लगीं. एकदूसरे को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए. फिर कभी उन्होंने आपस में आंखें नहीं मिलाईं. यह आपसी दुश्मनी थी या फिर अपनीअपनी वतनपरस्ती, कहना मुश्किल है. 15 August Special

15 August Special: गर्व से कहो हम भारतीय हैं

15 August Special: ऐसी ही एक टौप क्लास तौलियाधारियों की है. पूरा जहां, जहां घर में कुरतापाजामा, लुंगी, अपरलोअर, बरमूडाटीशर्ट वगैरह पहनता हो तो पहनता रहे, अपनी बला से. हम नहीं बदलेंगे की तर्ज पर सुबह उठने के बाद और नौकरी या दुकान से घर आने के बाद ये उसी तौलिए को, जिसे नहाने के बाद इस्तेमाल किया था, लपेटे घूमते रहते हैं. इसी तौलिए को लपेटेलपेटे ये रात को नींद के आगोश में चले जाते हैं.

आप सोचते होंगे कि तौलिया अगर सोते समय खुल जाता होगा तो बड़ी दिक्कत होती होगी? जिसे आजकल की भाषा में ऊप्स मूमैंट कहते हैं. सोते समय तौलिया खुल जाए तो खुल जाए, क्या पता चलता है. वह तो जब कोई सुबहसवेरे दरवाजे की घंटी बजा दे और ये अलसाए से बिस्तर से उठें तब जा कर पता चलता है कि तौलिया तो बिस्तर की चादर से गलबहियां करे पड़ा है. तब वे जल्दी में तौलिए को लपेट दरवाजा खोलने आगे बढ़ते हैं.

वैसे भी सोते समय क्या, यह तौलिया किसी भी समय, खिसकते समय की तरह जब चाहे कमर से खिसक जाता है और ये उसे बारबार संभालते देखे जा सकते हैं. लेकिन ये तौलिया टाइप वाले भाईजी लोग बड़े जीवट होते हैं. भले ही ये बड़े अफसर हों, नेता हों या बड़ेछोटे कारोबारी हों, तौलिए से अपना लगाव नहीं छोड़ पाते हैं.

मैं तो अपने पड़ोस में एक मूंदड़ाजी को जानता हूं. बाजार के बड़े सेठ हैं, लेकिन बचपन से ही उन को जो तौलिए में देखता आ रहा हूं तो आखिरी समय में भी तौलिए में ही देखा. बाद में घर वालों को पता नहीं क्या सू झा कि तौलिया रूपी कफन में ही उन का दाह संस्कार कर दिया गया. शायद कहीं वसीयत में उन की आखिरी इच्छा ही यह न रही हो?

मेरा बचपन से जवानी का समय उन के तौलिए में ही लिपटेलिपटे कट गया. उन की पत्नी और बच्चों ने कई बार कोशिश की थी कि वे कुरतापाजामा नहीं तो कम से कम लुंगीबंडी अवतार में आ जाएं, लेकिन वे नहीं माने तो नहीं माने. बोले, ‘यह हमारी परंपरा है. हमारे पिता और उन के पिता भी इसी तरह से रहते थे.’

वे आगे गर्व से दलील देते हैं कि गरमी प्रधान इस देश में तौलिए से अच्छा व आरामदायक और कोई दूसरा कपड़ा नहीं है. वे यह भी बताने लगते हैं कि अगर एक आदमी साल में 2 जोड़ी कुरतापाजामा या लुंगी लेता हो, तो उन पर कम से कम 1,000 रुपए का खर्चा आता है और उन्होंने जब से होश संभाला है, तब से तौलिए से ही काम चला

रहे हैं, तो सोचें कि 40-50 सालों में 50,000 रुपए तो बचा ही लिए होंगे. वाह रे परंपरा के धनी आदमी, वाह रे तेरा गणित.

हम तौलिए में ही अपना यह पूरा लेख नहीं लपेटना चाहते. महज तौलिए की ही बात से तो कई पाठक भटकाव के रास्ते पर चले जाएंगे. कई हिंदी फिल्मों के सीन दिमाग पर छा जाएंगे कि कैसे किसी छरहरी हीरोइन के गोरे व चिकने बदन से तौलिया आहिस्ता से सरका था.

चाहे फिल्म का कोई सीन हो या कोई रोमांटिक गाना हो, जो बाथरूम में फिल्माया गया हो या बाथरूम से मादक अदाओं के साथ बाहर निकलती हीरोइन पर फिल्माया गया हो, दोस्तों की कही इसी बात पर तो फिल्म को देखने हम लोग दौड़े चले गए थे.

दूसरी ओर तौलिया नापसंदधारी टाइप सज्जन भी होते हैं. ये धारी वाला कच्छा पहन कर ही सुबह से देर रात तक घरआंगन, बाहर, बाजार, पड़ोस में दिखते रहते हैं.

हां, इस क्लास में हर चीज की तरह थोड़ा विकास यह हुआ है कि कुछेक धारीदार कच्छे में नहीं तो पैंटनुमा अंडरवियर में ही अब घर के अंदरबाहर होते रहते हैं. कुछ तो इन में इतने वीर हैं कि अपनी दुकान में भी इस परंपरागत कपड़े में ही काम चला लेते हैं. जो नहाधो कर शरीर पर तो एक कच्छा और एक बनियान चढ़ाई रात तक का काम हो गया. अल्प बचत वालों को अगर बचत सीखनी है तो इन से सीखें. लोग साल में 4 जोड़ी कपड़े खरीदते हैं तो ये 4 जोड़ी कच्छेबनियान खरीदते हैं.

आइए, अब आते हैं अगले परंपरागत संस्कारी पर. ये स्वच्छता अभियान को  झाड़ू लगाने वाले लोग हैं. ये कहीं भी हलके हो लेते हैं. ये वे लोग हैं, जो घर के बाहर की ही नाली में परंपरागत आत्मविश्वास से मूत्र त्याग करने का लोभ छोड़ नहीं पाते हैं. इस काम में वे पता नहीं क्यों गजब की ताजगी महसूस करते हैं.

डीएनए जोर मारने लगता है तो वे क्या करें? कितने भी धनी हों, इन्हें इस बात से  बिलकुल भी  िझ झक नहीं होती कि वे कहां खड़े हो कर या बैठ कर मूत्र विसर्जन कर रहे हैं.

यह तो साफ है कि अगर ये धोती, लुंगीधारी या तौलियाधारी हैं तो बैठ कर और पैंटकमीज में हों तो खड़े हो कर धारा प्रवाह हो जाते हैं, इसीलिए शायद ऐसे लोगों का पैंटकमीज से छत्तीस का आंकड़ा रहता है.

एक और परंपरागत जन हमारे यहां पाए जाते हैं. डायनासौर भले ही लुप्त हो गए हों, लेकिन ये सदियों से पाए जाते रहे हैं और कभी लुप्त नहीं होने वाले.

ये बस में हों, रेल में हों, बाजार में हों, आप से बात कर रहे हों, न कर रहे हों, इन का हाथ बराबर उन की एक पसंदीदा जगह पर पहुंच जाता है और अपने इस अनमोल अंग को चाहे जब अपनेपन से छू लेता है, सफाई से मसल लेता है.

आप किसी शराबी की शराब छुड़वा सकते हैं, लेकिन इन के हाथ को वहां जाने से नहीं रोक सकते. यकीन न हो तो ऐसे किसी सज्जन पर प्रयोग कर के देख लें. हां, सब के खाते में 1-2 पड़ोसी दोस्त ऐसे होते ही हैं. जैसे आदमी अपनी पलकें अपनेआप  झपकाता रहता है, वैसे ही इन का हाथ भी अपनेआप अपनी पसंदीदा जगह पर वजह या बेवजह पहुंचता रहता है. इन के बड़े पहुंच वाले लंबे हाथ होते हैं.

अब वक्त हो गया है, दूसरे परंपरागत जन की तरफ जाने का. ये कहीं भी खड़े हों, कुछ भी कर रहे हों, लेकिन खखारना नहीं छोड़ते. मौका मिलते ही गले को साधा, बजाया और थूका. पार्क में घूम रहे हों, कार, स्कूटर, साइकिल पर जा रहे हों, दफ्तर में बैठें हों, बस जब इच्छा हुई थूक दिया.

यह सीन तब और भी ज्यादा कलरफुल हो जाता है, जब ये पानतंबाकू चबाने के शौकीन हों. तब ये अपने आसपास की जगह के साथ हर रोज ही मुंह से होली खेलते रहते हैं.

गंगू ने तो अभी आप को केवल 4 जनों की क्लास बताई है, बाकी बाद में. नहीं तो आप अपनी संस्कृति पर गर्व करने लगेंगे और ‘गर्व से कहो हम भारतीय हैं’ कहने से खुद को रोक नहीं पाएंगे. 15 August Special

15 August Special: आजादी – झंडा फहराना कैसे बन गया गले की फांस

15 August Special: शंकर बाबू आटोरिकशा से उतर कर कारखाने की ओर जा ही रहे थे कि 2 सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया.

एक बोला, ‘‘थाने चलो, थानेदार ने बुलाया है.’’

दूसरा बोला, ‘‘अब तक कहां थे? 3 दिनों से हम तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं.’’

हैरानपरेशान शंकर बाबू आसपास देखने लगे. तब तक कारखाने के कुछ मुलाजिम पास आ गए और वे उन्हें ऐसे देखने लगे, मानो वे शातिर अपराधी हों.

शंकर बाबू उस कारखाने के माने हुए मजदूर नेता थे. इस लिहाज से उन्होंने सिपाहियों पर रोब जमाना चाहा, ‘‘आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’

‘‘थाने पहुंच कर जान लेना.’’

‘‘नहीं, बिना कुसूर जाने मैं तुम लोगों के साथ नहीं चल सकता.’’

इस पर एक सिपाही ने खास पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘‘चलते हो या लगाऊं एक…’’

यह सुनते ही शंकर बाबू का दिमाग चकरा गया. वे तुरंत सिपाहियों के साथ चलने को तैयार हो गए.

थानेदार के आगे शंकर बाबू को पेश करते हुए एक सिपाही ने कहा, ‘‘‘साहब, यही हैं शंकर बाबू. बड़ी मुश्किल से पकड़ कर लाए हैं. ये आ ही नहीं रहे थे, संभालिए जनाब.’’

इतना कह कर सिपाही ने शंकर बाबू को बेजबान जानवर की तरह थानेदार की ओर धकेल दिया.

शंकर बाबू को बहुत गुस्सा आया, मगर वे गुस्से को दबाते हुए थोड़ी तीखी आवाज में थानेदार से बोले, ‘‘मुझे क्यों पकड़ा गया है? मेरा कुसूर क्या है? मैं शहर का एक इज्जतदार आदमी आदमी हूं. मैं…’’

‘‘अरे छोड़ो इज्जतदार और बेइज्जतदार की बातें. यह बताओ कि 15 अगस्त को झंडा फहरा कर तुम कहां गुम हो गए थे? जानते हो कि कितना बड़ा राष्ट्रीय अपराध किया है तुम ने?’’

शंकर बाबू का सिर चकराने लगा, ‘‘राष्ट्रीय अपराध? क्या झंडा फहराना राष्ट्रीय अपराध है? नहींनहीं, यह तो मेरा मौलिक अधिकार है. जरूर कहीं कुछ गलतफहमी हुई है…’’ शंकर बाबू ने तनिक गुस्से में कहा, ‘‘मैं कहीं भी किसी वजह से जाऊं, क्या मुझे आप को बता कर जाना पड़ेगा? पहले साफसाफ मेरा अपराध बताइए.’’

शंकर बाबू का गुस्सा खुद पर ही भारी पड़ रहा था. थानेदार ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘अपनी आवाज नीची कर, वरना… एक तो अपराध करता है ऊपर से गरजता भी है. यानी चोरी और सीनाजोरी, वह भी मुझ से… थानेदार जालिम सिंह से? जिस से बड़ेबड़े गुंडेबदमाश थरथर कांपते हैं.’’

शायद जिंदगी में आज पहली बार शंकर बाबू का पुलिस के साथ सामना हुआ था. वे इस पुलिसिया अंदाज से सकपका गए थे. उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘माफ कीजिए, आप को कोई गलतफहमी हुई है. मैं तो एक पढ़ालिखा इनसान हूं, मजदूरों की अगुआई करता हूं. हो सकता है कि आप को किसी और शख्स की तलाश हो.’’

थानेदार थोड़ी नीची आवाज में बोला, ‘‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. मिस्टर शंकर, आप मजदूर नेता हैं न? आप ने 15 अगस्त को अपने यूनियन के दफ्तर में एक छोटा सा जलसा किया, झंडा फहराया और चल दिए. उस दिन से आप आज नजर आए हैं. इस समय… शाम के 7 बजे हैं, जबकि झंडा परसों से लगातार लहरा रहा है और आप कह रहे हैं कि अपराध नहीं किया?’’

इतना कह कर थानेदार ने सिपाहियों की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘डाल दो इस को लौकअप में.’’

तब तक शंकर बाबू की बीवी इलाके के नेताजी को ले कर थाने पहुंच गई थी. शंकर बाबू को काटो तो खून नहीं. सिपाही मुस्तैद हो गए थे. नेताजी को समय की नजाकत समझते देर नहीं लगी. उन्होंने हलकी मुसकान फैलाते हुए थानेदार से पूछा, ‘‘आखिर माजरा क्या है थानेदार साहब?’’

थानेदार भावुक होता हुआ बोला, ‘‘अरे साहब, इस ने राष्ट्रीय झंडे का अपमान किया है. यानी देश का, राष्ट्र का अपमान किया है. इसे इतनी भी जानकारी नहीं कि राष्ट्रीय झंडा यदि सुबह फहराया जाता है, तो शाम तक उसे नीचे उतार लिया जाता है.

‘‘इस ने अपने यूनियन के दफ्तर के सामने 15 अगस्त को झंडा फहराया था, जो अभी तक लहरा रहा है. यह भारतीय संविधान के तहत जुर्म है. कानूनी अपराध है.’’

शंकर बाबू को यह जानकारी नहीं थी. उन्होंने विनती भरी आवाज में थानेदार और नेताजी से निवेदन किया, ‘‘साहब, मैं बहुत शर्मिंदा हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई है. आइंदा कभी ऐसा नहीं होगा. मुझे बचा लीजिए.’’

थानेदार ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘हूं, रस्सी भी जल गई और ऐंठन भी चली गई.’’

नेताजी ने हालात को संभालते हुए कहा, ‘‘कानून तो अंधा होता है, मगर शंकर बाबू एक निहायत ही शरीफ आदमी हैं.’’

फिर नेताजी ने संकेत से शंकर बाबू को एक ओर ले जा कर धीरे से कहा, ‘‘भाई, यह तो राष्ट्र के अपमान का मामला है. बहुत बुरा हुआ, तुम अगर राष्ट्र धर्म निभा नहीं सकते थे, तो झंडा फहराया ही क्यों? यह तो जुर्म नहीं, घोर जुर्म है, इसलिए शेर को शेर की मांद में ही सुलट लो. चांदी के जूते से थानेदार का मुंह सिल दो.’’

शंकर बाबू को लगा कि वे आसमान से गिरे, खजूर में अटके. संभलते हुए उन्होंने लाचारी में हामी भर दी. नेताजी ने इशारे से थानेदार को अपने पास बुला लिया.

थानेदार ने नेताजी का सुझाव मान लिया और शंकर बाबू को यूनियन के दफ्तर जा कर झंडा उतारने का आदेश देते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आप के यूनियन के दफ्तर के सामने फहराया गया झंडा 15 अगस्त की शाम को ही उतार लिया गया था. जैसा नेताजी कहेंगे, वैसा ही होगा. ये हमारे नेता हैं. हम वही करते हैं, जो ये कहते हैं.’’

शंकर बाबू को लगा कि थानेदार की कुरसी के पीछे लगी महात्मा गांधी की तसवीर कांप रही है. शर्मिंदा हो रही है कि यह सब क्या है? कानून के रक्षक और राष्ट्र के खेवनहार दोनों ही मिलजुल कर आज झंडा उतारने की फीस वसूल कर के यह कैसा राष्ट्र प्रेम बांट रहे हैं? कैसी है इन की देशभक्ति? 15 August Special

15 August Special: और झंडा फहरा दिया

15 August Special: आमंत्रण कार्ड पर छपे ‘समरसता भोज’ के आयोजन की खबर पढ़ कर ठाकुर रसराज सिंह का माथा ठनक गया. आखिर वे उस गांव के मुखिया थे और उन की तूती आज भी बोलती थी. गांव की नई सरपंच ने उन से सलाह लिए बिना यह क्या अनर्थ कर दिया.

गुस्से से लाल हुए जा रहे ठाकुर रसराज सिंह ने अपने सचिव गेंदालाल को बुला कर डांटते हुए कहा, ‘‘क्यों रे गेंदा, पंचायत की सरपंच पगला गई है क्या. हम ठाकुरों और ब्राह्मणों को निचली जाति के लोगों के साथ बिठा कर भोज कराना चाहती है. हमारा धर्म भ्रष्ट करना चाहती है.’’

‘‘ठाकुर साहब, इस में हम कुछ नहीं कर सकते. नई सरपंचन सरकारी फरमान की आड़ ले कर हमें नीचा दिखाना चाह रही है. सरकार छुआछूत मिटाने के लिए गांवगांव ऐसे प्रोग्राम करा रही है और सरकारी अफसर उस का साथ दे रहे हैं,’’ सचिव गेंदालाल ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘तो सुन ले गेंदा ध्यान से, हम ऐसे प्रोग्राम में हरगिज नहीं जाएंगे. इन की यह हिम्मत कि हमारी बराबरी में बैठ कर ये निचली जाति के टटपुंजिए लोग भोजन करेंगे. कोई पूछे तो कह देना कि जरूरी काम के सिलसिले में शहर गए हुए हैं,’’ ठाकुर रसराज सिंह बोले.

ये वही ठाकुर साहब हैं, जो दिन के उजाले में इन दलितों के साथ छुआछूत का बरताव करते हैं और रात के अंधेरे में इन्हीं दलितों की बहनबेटियों को अपने बिस्तर पर सुलाते हैं. पंचायत में सरपंच कोई रहा हो, मरजी इन जैसे दबंगों की ही चलती है.

यही वजह थी कि सरकारी योजनाओं का फायदा इन दबंगों ने जरूरतमंद लोगों को न दिला कर अपने परिवार के लोगों को दिला दिया था. गरीब मजदूर के पास रहने को घर नहीं था, पर प्रधानमंत्री आवास इन दबंगों ने अपने बेटाबहू को अलग परिवार दिखा कर हड़प लिए थे.

श्रद्धा गांव की सरपंच तो बन गई थी, मगर उस के पास हक कुछ नहीं थे. वह सरपंच होने के नाते कुछ करने की सोचती, मगर गांव के मुखियाजी और उन की जीहुजूरी करने वाले लोग श्रद्धा को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

उस दिन को श्रद्धा आज तक नहीं भूली है, जिस दिन पंचायत की ग्राम सभा की बैठक थी. पंचायत का सचिव गेंदालाल ठाकुर, उपसरपंच मुन्ना महाराज और कुछ पंच वहां पहले से मौजूद थे. गांव की महिला सरपंच श्रद्धा जैसे ही पंचायत भवन में पहुंची, तो उस ने पाया कि उस के बैठने के लिए कुरसी तक नहीं रखी गई थी.

इधरउधर नजर दौड़ाने के बाद श्रद्धा ने सचिव की ओर देखते हुए कहा, ‘‘सचिव महोदय, सरपंच के बैठने के लिए कुरसी का इंतजाम नहीं है क्या?’’

इस बात पर ग्राम पंचायत का दबंग सचिव गेंदालाल तुनकते हुए बोला, ‘‘तुम्हें बैठाने के लिए कुरसी नहीं है. बैठना है तो घर से कुरसी ले आओ, नहीं तो कायदे से जमीन पर ही बैठो.’’

तभी उपसरपंच मुन्ना महाराज भी गेंदालाल के साथ सुर मिलाते हुए बोला, ‘‘सरपंचन बाई, यह मत भूलो कि तुम किस जाति की हो, आखिर गांव की मानमर्यादा का ध्यान तो तुम्हें रखना होगा. गांव में आज तक कोई भी निचली जाति का पंडितों और ठाकुरों के सामने बराबरी से नहीं बैठता.’’

‘‘मगर पंडितजी, जनता ने हमें सरपंच बनाया है और संविधान ने हमें यह हक दिया है कि हम सरपंच की कुरसी पर बैठें,’’ श्रद्धा ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘जनता ने तुम्हें मजबूरी में सरपंच बनाया है. चुनाव में गांव की सरपंच की कुरसी आरक्षण में तुम्हारी जाति में चली गई,’’ उपसरपंच मुन्ना महाराज बोला.

‘‘तुम अभी नईनई सरपंच बनी हो, इसलिए तुम्हें पता नहीं है. पहले भी सरपंच कोई रहा हो, पंचायत में फैसला तो पंडितों और ठाकुरों का ही चलता रहा है,’’ सचिव गेंदालाल तंबाकू मलते हुए बोला.

आखिर उस दिन सचिव और उपसरपंच की बात सुन कर महिला सरपंच अपमान का घूंट पी कर तो रह गई, मगर पढ़ीलिखी श्रद्धा को यह बात घर कर गई.

श्रद्धा यह सोच कर हैरान थी कि आजादी के इतने साल बाद भी गांव में छुआछूत इस कदर हावी है कि गांव के दबंग दलित सरपंच से जातिगत भेदभाव रखते हैं. ऊंची जाति के ये लोग नहीं चाहते कि जनता द्वारा चुनी गई सरपंच उन की बराबरी में बैठे.

इस मामले को बीते 2 महीने हो गए थे और जब 15 अगस्त को श्रद्धा तिरंगा झंडा फहराने पहुंची, तो उपसरपंच मुन्ना महाराज ने उसे झंडा फहराने से मना कर दिया.

मुन्ना महाराज ने साफ कर दिया कि कई सालों से पंचायत भवन में गांव के मुखिया ठाकुर रसराज सिंह ही झंडा फहराते आए हैं.

रसूख वाले लोगों ने एक सुर में यह फैसला ले लिया और श्रद्धा को बिना झंडा फहराए ही घर वापस आना पड़ा.

श्रद्धा गांव की लड़की जरूर थी, मगर उस ने राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र सब्जैक्ट ले कर अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी और उस की शादी इसी गांव के एक सरकारी टीचर परमलाल से हुई थी.

गांव में जब चुनाव का समय आया, तो निचली जाति के लोगों ने पढ़ीलिखी श्रद्धा को सरपंच पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. ऊंची जाति के लोगों से पूछताछ किए बिना सरपंच की दावेदारी की बात जब गांव के दबंगों को पता चली, तो उन्होंने उन के घर में काम करने वाली नौकरानी का परचा दाखिल करवा दिया. जब सरपंच के लिए चुनाव हुए, तो श्रद्धा को खूब वोट मिले और वह सरपंच बन गई.

पढ़ीलिखी श्रद्धा अपने पति के साथ खुश थी. इस बार गांव में जब सरपंच के चुनाव हुए, तो कुछ लोगों ने परमलाल को ही यह सलाह दी कि वह सरपंच पद के लिए श्रद्धा का परचा दाखिल करा दे.

दरअसल, इस बार पंचायत में सरपंच पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित था और गांव में जो दूसरे घरों की औरतें थीं, वे उतनी पढ़ीलिखी नहीं थीं. ज्यादातर औरतें घूंघट में रहती थीं. गांव में दलित जाति के मर्दों की भी यही सोच थी कि पंचायत का कामकाज देखना दूसरी किसी औरत के बस की बात नहीं है.

परमलाल ने गांव के कुछ अमीर लोगों से भी इस बारे में मशवरा किया, तो उन्होंने यह सोच कर हां कह दी कि सरपंच कोई बने, मरजी चलेगी तो गांव के मुखिया की ही.

परमलाल को गांव के लोग मास्साब कहते थे. उस दिन मास्साब जब अपने स्कूल का झंडा फहराने के बाद घर आए, तो श्रद्धा उतनी खुश नहीं थी. उस के चेहरे पर मायूसी देख कर मास्साब ने अंदाजा लगाया कि शायद सासबहू के बीच कोई कहासुनी हुई होगी.

भोजन करने के बाद रात में बिस्तर पर मनुहार के साथ परमलाल ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारा फूल सा चेहरा मुर झाया सा लग रहा है. क्या अम्मां ने कुछ भलाबुरा कह दिया?’’

‘‘जब से गांव की सरपंच बनी हूं, तब से अम्मां ने तो कुछ नहीं कहा, मगर आज पंचायत में मु झे झंडा फहराने का हक भी नहीं मिला. सचिव और उपसरपंच ने मेरी जानबू झ कर बेइज्जती की है,’’ श्रद्धा पूरी कहानी बताते हुए बोली.

‘‘अच्छा तो यह बात है. आखिर गांव के इन ऊंची जाति वालों से देखा नहीं जा रहा है कि एक दलित जाति की औरत सरपंच बनी बैठी है,’’ परमलाल उसे दिलासा देते हुए बोला.

‘‘इन्हें सबक कैसे सिखाएं और संविधान ने हमें जो हक दिया है, वह हमें कैसे मिलेगा?’’ श्रद्धा ने चिंता जताते हुए कहा.

‘‘देखो श्रद्धा, गांव के ये दबंग कानून से नहीं मानते. इन की पहुंच मंत्री तक है, कुछ करेंगे तो पुलिस इन का ही साथ देती है. तुम्हें याद नहीं कि छोटे भाई की शादी में घोड़े पर बैठ कर गांव में फेरी लगाने पर इन्होंने बापू के साथ कितना झगड़ा किया था.’’

‘‘हां, यह बात तो है, पर इन सब को सबक तो सिखाना होगा, तभी हम दलितों का हमारा असली हक मिलेगा,’’ श्रद्धा ने पक्का इरादा करते हुए कहा.

महात्मा गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद गांव में अभी भी छुआछूत है. गांव में ऊंची जाति के लोगों के महल्ले में लगे हैंडपंप का पानी भी दलित जाति के लोगों को पीने की आजादी नहीं है.

गांव के स्कूल में बनने वाले मिड डे मील में केवल दलित जाति के बच्चे ही खाना खाते हैं. घर वालों ने बच्चों को पट्टी पढ़ा दी थी कि निचली जाति के लोगों के साथ बैठ कर भोजन नहीं करना है.

गांव के इन दबंगों को सबक सिखाने के लिए परमलाल ने श्रद्धा से कहा, ‘‘क्यों न हम गांव में 26 जनवरी पर ‘समरसता भोज’ का आयोजन करें, जिस में स्कूल के बच्चे और गांव के सभी लोगों को आमंत्रित करें. तुम जनपद और जिले के अफसरों से मिल कर पंचायत के इस कार्यक्रम की जानकारी दे दो.

‘‘वैसे भी सरकार छुआछूत मिटाने पर जोर दे रही है. ऐसे आयोजन से पंचायत की वाहवाही होगी और हमें पता है कि गांव के दबंग भोज में शामिल होंगे नहीं और तुम्हें झंडा फहराने का मौका मिल जाएगा.’’

श्रद्धा को पति की यह सलाह अच्छी लगी. उस ने जिला और जनपद के अफसरों को इस प्रोग्राम की जानकारी दे कर उन्हें गांव आने का न्योता दिया.

अफसरों की सलाह से 26 जनवरी पर सामूहिक रूप से गांव की साफसफाई के साथ तिरंगा झंडा फहराना और समरसता भोज का आयोजन किया जाना पक्का हुआ था.

आयोजन के आमंत्रण कार्ड छपवा कर गांव के मुखिया और दूसरे लोगों को भी आमंत्रित किया गया.

श्रद्धा ने मुखियाजी के पास जा कर कहा था, ‘‘ठाकुर साहब, आप को ही इस प्रोग्राम में तिरंगा झंडा फहराना है.’’

मुखियाजी ने हामी भर दी, लेकिन सरपंच के जाने के बाद जब आमंत्रण पत्र को ठीक से पढ़ा तो समरसता भोज का प्रोग्राम देख कर उन की भौंहें तन गईं. प्रोग्राम में बड़े अफसर आ रहे थे. लिहाजा, उन्होंने इस का विरोध तो नहीं किया, पर गांव के ऊंची जाति के लोगों को इस प्रोग्राम में जाने से रोक दिया.

तय समय पर जब 26 जनवरी का प्रोग्राम पंचायत में शुरू हुआ, तो सरपंच और गांव के दूसरे लोगों के साथ सड़कों पर सफाई की गई. बड़े अफसर केवल हाथ में झाड़ू ले कर फोटो खिंचवाते नजर आ रहे थे.

प्रोग्राम में गांव के मुखिया ठाकुर साहब और उन के साथी मौजूद नहीं थे. सचिव गेंदालाल सरकारी मुलाजिम होने के चलते वहां पर मौजूद था, मगर उस के चेहरे के हावभाव से साफ जाहिर था कि उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था.

झंडा फहराने से पहले सरपंच श्रद्धा ने सचिव गेंदालाल से पूछा, ‘‘हमारे मुखियाजी दिखाई नहीं दे रहे, फिर झंडा कौन फहराएगा?’’

‘‘मुखियाजी किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं,’’ सचिव गेंदालाल बोला.

‘‘तो फिर देर किस बात की सरपंच महोदया, पंचायत की मुखिया आप हो. झंडा फहराने की जिम्मेदारी भी आप की है,’’ जनपद की एक महिला अफसर ने कहा.

श्रद्धा की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने जोश के साथ तिरंगे झंडे के स्तंभ और गांधीजी की फोटो पर तिलक लगाया और जैसे ही सभी सावधान की मुद्रा में खड़े हुए, तो श्रद्धा ने डोरी खींच कर तिरंगा झंडा फहरा दिया. तिरंगा फहराने से गिरे फूल जमीन पर बिखर गए. भारत माता की जयघोष के साथ राष्ट्रगान का गायन हुआ.

समरसता भोज में सभी लोगों ने एकसाथ कतार में बैठ कर भोजन किया. समरसता भोज में गांव के ऊंची जाति के दबंग शामिल नहीं थे, मगर उन्हें छोड़ कर गांव के सभी लोगों ने भरपेट भोजन किया.

आसमान में लहराते तिरंगे झंडे के साथ श्रद्धा का मन भी आज पूरी तरह उमंग से लहरा रहा था. 15 August Special

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