नारी दुर्दशा का कारण धर्मशास्त्र और पाखंड

नारी को आज भी दोयम दर्जे का ही नागरिक समझा जाता है.सदियों से इनके ऊपर कई माध्यमों से जुल्म ढाने की परंपरा निरन्तर जारी है. इसमें धर्मशास्त्रों और पण्डे पुजारियों का भी अहम योगदान रहा है.

नारी के ऊपर शोषण और जुल्म में स्वयं नारी लोग ही मददगार की भूमिका में हैं.समाज में रिवाज और धर्म का पाठ पढ़ाकर नारियों को जुल्म के रसातल में डुबो दिया है. धर्म का कानून बनाने वाले मनु ने लिखा है,  ”स्त्री शूद्रों न धीयताम” यानी स्त्री और शूद्र को शिक्षा नहीं देनी चाहिए. अंधभक्त महिलाएं इन्हें ही अपना भगवान का हुक्म मानती हैं.

प्राचीन संत शंकराचार्य ने लिखा है, ”नारी नरकस्य द्ववारम”, यानी नारी नरक का दरवाजा है. लेकिन शायद उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इसी नरक के दरवाजे से तुम भी पैदा हुवे है. तुलसीदास ने जिसे उनकी पत्नी ने दुत्कार दिया था, लिखा है, ”अधम ते अधम, अधम अति नारी’, भ्राता पिता पुत्र उर गारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी.”

“होहिं विकल सक मनहिं न रोकी,जिमि रवि मणि द्रव रविही विलोकि”

अथार्त चाहे भाई हो ,चाहे पिता हो,चाहे पुत्र हो नारी को अच्छा लगने पर वह अपने को रोक नहीं पाती जैसे रविमणि, रवि को देखकर द्रवित हो जाती है, वैसी ही स्थिति नारी की हो जाती है. वह संसर्ग हेतु ब्याकुल हो जाती है.

“राखिअ नारि जदप उर माही।जुबती शास्त्र नृपति बस नाही”

अथार्त स्त्री को चाहे ह्रदय में ही क्यों न रख लो तो भी स्त्री शास्त्र,और राजा किसी के वश में नहीं रहती है. नारी को पीड़ा दिलवाने में तुलसीदास की इस  चौपाई ने आग में घी का काम किया है, ”ढोल गंवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”

धर्मग्रन्थों में नारियों और दलितों के ऊपर शोषण जुल्म के प्रपंचो से पूरा भरा हुआ है.इस साजिश और छल प्रपंच को आज तक दलित और महिलाएं समझ नही पाईं हैं. उनके ही समझाई में आज भी बहुत बड़ी आबादी चलने को विवश है. स्वर्ग नरक पुनर्जन्म भाग्य भगवान की पौराणिकवादी संस्कृति में फंसकर अगला जन्म सुधारने के चक्कर में नारियां स्वयं को पुरुष की दासी समझते हुवे अन्याय कष्ट सहकर भी झूठे गौरव का अनुभव करती है. माता पिता भी बेटियों को पराया धन समझकर कन्यादान करके उन्हें अन्यायपूर्ण जीवन जीने को विवश करते हैं. दहेज,कन्यादान,सतीप्रथा,देवदासी प्रथा, पर्दाप्रथा, योनिशुचिता प्रथा, वैधब्य जीवन आदि नारी विरोधी प्रथाएँ धर्म की देन हैं.

इन प्रथाओं को  ग्रन्थों ने खूब महिमामण्डित किया है.  बेवकूफ अंधविश्वासी पिताओं की सनक पर बेटियों की कुर्बानी को स्वयंबर का नाम दिया गया. जुए के दांव पर नारियां लगाई गईं. बच्चे   पाने के लिए जबरन ऋषियों को सौंपी गईं.

नारियों की सहने से ज्यादा दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने औरतों की पढ़ाई और सामाजिक आजादी के लिए काम किया.

1955-56 में नए हिन्दू कानूनों से भारतीय नारियों का बहुत बड़ा उपकार किया. जिन लोगों ने नारियों की भलाई के लिए काम किया आज की औरतें उनका नाम तक नहीं जानतीं. जिन शास्त्रों और पौराणिकवादी व्यवस्था ने इन पर जुल्म ढाए उनकी ही पूजा अर्चना आज तक महिलायें करती हैं.

पढ़ी लिखी औरतें भी व्रत, उपवास और गोबर तक की पूजा करती आ रही हैं और आज भी बदस्तूर जारी है.

गीता प्रेस की पुस्तक है,  ”गृहस्थ में कैसे रहें”  जिसके लेखक रामसुखदास हैं. इस पुस्तक में प्रश्न उतर के माध्यम से बताया गया है कि हिन्दू महिलाओं को कैसे जीवन जीना चाहिए. उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत कर रहें हैं.

प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए ?

उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न लें जाएं तो वह क्या करें ?

उत्तर: फिर तो उसे पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए. इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है? उसको पति की मार धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए. सहने से पाप कट जाएंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाए. यदि वह पति की मार पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिए और अलग रह कर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुवे एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिए.

इस पुस्तक में सैकड़ों इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर है जिसमें हिंदू परिवारों को दिशा निर्देश दिए गए हैं.

यह पुस्तक सती का समर्थन करती है और महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने की वकालत करती है. हिन्दू वादी संगठनों द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर आवाज उठाई जाती है. अगर यह देश हिंदू राष्ट्र बनता है तो क्या नारियों के ऊपर इसी तरह के कानून लागू किये जायेंगे? पड़ोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश में कट्टरवादी मुस्लिम संगठन भी इसी तरह की सोच रखते हैं. मुस्लिम धर्म में भी तीन तलाक, हलाला और पर्दा प्रथा जैसी दकियानूसी बातें हैं और उसका समर्थन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग करते हैं.इन कुप्रथाओं पर जब सवाल उठाये जाते हैं तो इस्लाम धर्म को मानने वाले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन मौत का फतवा जारी करते हैं. क्या हिंदू राष्ट्र में ऐसा ही होगा?

आज औरतों पर शोषण और जुल्म ढाने का हथियार के रूप में इन धार्मिक पुस्तकों का उपयोग किया जाता है.इसे बढ़ावा देने और प्रचार प्रसार करने में साधू,  महात्मा, पंडे,  पुजारी, मुल्ला लोग लाखों की संख्या में एजेंटों के रूप में कार्य कर रहे हैं.

देश के कोने कोने से महिलाओं के साथ अपने पति द्वारा जुआ में हारने जैसी कुकृत्य, अत्याचार ,अनाचार और बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आते रहती है जिन पर सहज रूप से विश्वास भी नहीं होता.

इस तरह की एक घटना जौनपुर जिला के जफराबाद थाना क्षेत्र के शाहगंज की  है. एक जुआरी शराबी पति ने सारे रुपये हारने के बाद अपने पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया. वह जुए में अपनी पत्नी को हार गया. इसके बाद उसके जुआरी दोस्तों ने उसके पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

दूसरी घटना कानपुर की है. जुआ खेलने के एक शौकीन पति ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. दांव हारने पर उसके चार दोस्तों ने उसके पत्नी पर हक जमाते हुए सामूहिक दुष्कर्म करना चाहा लेकिन बीबी किसी तरह किचन में घुस गई और उसने पुलिस को फोन कर दिया. तत्काल में पुलिस आ जाने की वजह से तारतार हो रही इज्जत बच गई.

महाभारत में द्रौपदी को जुए में हारने की घटना सर्वविदित है. आज भी दीवाली जैसे त्यौहार में संस्कृति और परम्परा के नाम पर जुआ खेलने का रिवाज सभ्य समाज तक में भी बरकरार है. सड़ी गली परम्परा को आज भी हम अपने कंधों पर ढो रहे है.

औरतों के ऊपर शोषण और जुल्म का समर्थन औरतों द्वारा ही किया जाता है. एजेंट के रूप में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

हर गाँव मे धार्मिक गुरुओं  द्वारा शिव चर्चा,  माता की चौकी, जागरण, हवन और प्रवचनों की बाढ़ सी आ गयी है जिसमें महिलाओं की हीउपस्थिति अधिक होती है. शुद्ध घी अपने परिवारवालों को नहीं खिला कर अंधभक्ति में जलाया जा रहा है.

अपने बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करके धार्मिक कर्मकांडों पर अपनी मेहनत की कमाई महिलाएं खर्च कर रही हैं. पूजा पाठ, व्रत उपवास में महिलाएं रोबोटों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं. हवनों, यज्ञों में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है. शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है .

गांव गांव में मंदिर और मस्जिद बन रहे हैं. ज्ञान का केंद्र पुस्तकालय जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में थे मृतप्राय हो गए हैं. आपसी बातचीत भी खत्म होने की कागार पर है.

गांवो में सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों की हालत बहुत चिंतनीय है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ज्ञान का केंद्र जब नेस्तनाबूद होगा तो समाज मे अंधविसश्वास और धार्मिक पाखण्डों का मायाजाल बढ़ेगा ही. धार्मिक पाखण्डों को बढ़ावा देने में केंद्र की सरकार और चारण गाने वाले मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका में है.

टोनही प्रथा का बन गया “गढ़”

छत्तीसगढ़ की सामाजिक बुराइयों में, सबसे बड़ी चुनौती है यहां की टोनही प्रथा. प्रदेश के गांवों में आज भी अक्सर किसी भी महिला को टोनही कह कर अपमानित करना, उसे नग्न करके गांव में घुमाना और सामूहिक रूप से मार डालना, आम बात है.

आज जब दुनिया विज्ञान और विकास के पथ पर बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है ऐसे में छत्तीसगढ़ की यह वीभत्स सामाजिक बुराई खत्म होने का नाम नहीं ले रही है और ना ही इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रयास किया जा रहा है. यही कारण है कि आए दिन महिलाओं के साथ अत्याचार शोषण का यह टोनही प्रथा का खेल  बदस्तूर चल रहा है. इस संदर्भ में जहां सरकार ने एक छोटा सा कानून बना करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है. वही सामाजिक चेतना प्रसारित करने वाले किसी व्यक्ति अथवा संस्था का नाम भी सुनाई नहीं देता. परिणाम यह है कि छत्तीसगढ़ में आए दिन महिलाओं को तंत्र मंत्र करने वाली कह कर प्रताड़ना का दौर बदस्तूर जारी है.

ये भी पढ़ें- भीम सिंह : पावर लिफ्टिंग का पावर हाउस

हाल ही में छत्तीसगढ़ के औद्योगिक नगर कोरबा जिसे एशिया के मानचित्र पर अंकित बताते हुए गर्व किया जाता है में एक मामला चर्चा का विषय बन गया. यहां एक व्यक्ति ने टोनही कह कर एक महिला को खूब प्रताड़ित किया और जब मामला थाने पहुंचा तो पुलिस ने भी मानो हाथ खड़े कर लिए परिणाम स्वरूप उस शख्स को एक तरह से संरक्षण मिल गया. वह पुनः महिला को प्रताड़ित करने लगा. जब मामला सुर्खियों में आया तब पुलिस को होश आया और पुलिस ने उक्त व्यक्ति को ढूंढना शुरू किया. यह एक नजीर हमें बताती है कि किस तरह छत्तीसगढ़ में तंत्र मंत्र के नाम पर महिलाओं के साथ अत्याचार की इंतेहा हो चली है और शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद में है.

यह है संपूर्ण मामला

अखबारों में  यह समाचार सुर्खियां बना —

“टोनही प्रताड़ना के मामले में फरार आरोपी बैगा राम सजीवन साहू, गिरफ्तार, रिमांड पर जेल दाखिल!”

जिसमें नीचे विस्तृत रूप से बताया गया  सारा संक्षिप्त यह कि-

टोनही प्रताड़ना के मामले में 12 दिनों तक फरारी काट रहे मुख्य बैगा राम सजीवन पिता राम सहाई साहु उम्र 54 वर्ष साकिन फुलसर पुलिस चौकी कोरबी के प्रभारी प्रेमनाथ बघेल के द्वारा लगातार आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। महिला को टोनही कह प्रताड़ित करने के आरोपी राम सजीवन के द्वारा अग्रिम जमानत पाने के लिए लगातार न्यायालय में आवेदन की प्रस्तुत किया गया था लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने आवेदन को खारिज कर दिया था.

तत्पश्चात आरोपी ने थक हार कर दिनांक 8 सितंबर मंगलवार को पुलिस चौकी में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया.

इस संपूर्ण घटनाक्रम को जानकर आप सहज ही अंदाज लगा सकते हैं कि छत्तीसगढ़ शासन पुलिस प्रशासन किस तरह महिलाओं के अत्याचार के संदर्भ में गंभीर है. गांव में कई तरीके से लोग महिलाओं को टोनही कह कर प्रताड़ित करते जाते हैं और पुलिस में शिकायत होने के बाद भी पुलिस ने गिरफ्तार नहीं करती और वह बड़े ही शान के साथ न्यायालय पहुंच जाते हैं यह तो शुक्र है कि न्यायालय में जमानत नहीं मिली अन्यथा यह घटना कहां जाकर पहुंचती आप अंदाजा लगा सकते हैं.

पुलिस इस संपूर्ण घटनाक्रम में यह बताते हुए बड़ा ही फक्र महसूस करती है और संवाददाताओं को बताती है-

ये भी पढ़ें- जुल्म की शिकार बेचारी लड़कियां

“इस मामले में पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा, के निर्देशन एवं एसडीओपी कटघोरा पंकज पटेल के मार्गदर्शन में विधिवत कार्रवाई करते हुए धारा 294, 506, 34 आईपीसी, 4, 5, 6, टोनही प्रताड़ना अधिनियम 2005 के तहत गिरफ्तार कर रिमांड पर जेल दाखिल कराया गया.”

महिलाओं की यही नियति बनी

यहां यह भी आपको बताते चलें कि कोरबा जिला में इसी तरीके के अन्य  तीन प्रकरणों में भी हीला हवाली करती रही और जब पानी सर से गुजरने लगा तब जाकर पुलिस ने कार्रवाई की दरअसल पुलिस उन्हीं मामलों में दिलचस्पी लेती है जिनमें उनके पैसों का खेल होता है अन्य अन्यथा वह यह सब टालती रहती है. मामला जब सुर्ख़ियों में आता है तब पुलिस कार्रवाई करने पर मजबूर हो जाती है यहां भी यही हुआ.

पूर्व के तीन टोनही प्रताड़ना के मुख्य आरोपियों को दिनांक 28 अगस्त 2020 को गिरफ्तार कर रिमांड पर  जेल दाखिल कराया गया.

इस मामले का तथ्य यह है कि   हरिनाथ साहु पिता बंधु साहु, ने स्थानीय पुलिस चौकी में सूचना दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी को उसके दो सगे भाई एवं भतीजे ने मिलकर   टोनही प्रताड़ना का आरोप लगाकर छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के एक मंदिर में गांव के सरपंच पति एवं एक जनपद सदस्य के कहने पर टोनही होने का सच्चाई जानने एवं देखने के लिए ले जाया गया था. जिसके पश्चात पुलिस के द्वारा  कार्यवाही करते हुए राम लखन, हीरालाल, एवं अजय साहु को गिरफ्तार कर रिमांड पर भेजा गया. छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील गणपति पटेल बताते हैं कि यह टोनही प्रथा को रोकने के लिए सरकार द्वारा तो टोनही अधिनियम बनाया गया है मगर इसका परिपालन जिस कठोरता से प्रशासन को कराना  चाहिए नहीं किया जा रहा वहीं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ जी.आर. पंजवानी के अनुसार देखा गया है छत्तीसगढ़ के गांव में रूढ़िवादिता हावी है वहीं दुश्मनी, वैमनस्य निकालने के लिए महिलाओं पर तंत्र मंत्र करके काला जादू फैलाने वाली टोनही का आरोप लगा  दिया जाता है.

ये भी पढ़ें- “हम साथ साथ हैं” पर कुदृष्टि!

बेटी को दी गई खुशी बनी मुहिम

यों तो घर की पहचान घर के मुखिया के नाम और काम से होती है, लेकिन बैतूल जिले के एक पनवाड़ी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह पूरी दुनिया के लिए एक दिन मिसाल बनेगा. उस की एक मुहिम ने बेटी को बतौर घर की मुखिया नई पहचान दी है. उस की अपनी बेटी आयुषी के नाम की प्लेट बेटियों की कोख में हत्या के लिए बदनाम राज्य हरियाणा में नया बदलाव लाएगी.

हरियाणा के पानीपत में ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी. उसी पानीपत में ऐसे घरों की तलाश की गई, जिन के घरों में बेटियां हैं. उन घरों के मातापिता को ‘लाडो फाउंडेशन’ से जोड़ने के लिए अपने कार्यक्रम ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ की जानकारी दे कर ऐसे लोगों की लिस्ट उन के सामने रख दी, जिन्होंने अपने या दादा के नाम की पहचान वाले घर को अपनी बेटी के नाम पर एक पहचान दी.

पानीपत के बाद कन्या भू्रण हत्या व बेटियों पर होने वाले जोरजुल्म के मामलों में बदनाम राजस्थान और पंजाब के शहरों की पहचान कर वहां पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश पहुंचाने के लिए बेटियों के नाम के डिजिटल साइन बोर्ड लगवा कर इस मुहिम को शुरू करने वाले अनिल यादव पहलवान की ‘लाडो फाउंडेशन’ के तहत 5 नवंबर, 2015 को ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ नामक मुहिम की शुरुआत की गई.

बढ़ता गया कारवां

अकसर कहा जाता है कि पान वाला चूना लगाने में ऐक्सपर्ट होता है. उस का लगाया चूना मुंह का स्वाद बना देता है और थोड़ी सी चूक हुई तो मुंह को जला भी देता है.

आदिवासी बहुल बैतूल जिला हैडक्वार्टर के बाशिंदे और 12वीं जमात तक पढ़ने के बाद बीते 20 सालों से वहीं पान की दुकान चलाने वाले अनिल यादव पहलवान ने बेटे और बेटी में फर्क समझने वालों और भू्रण हत्या करने वालों को अपनी इस मुहिम के जरीए पटकनी दे कर एक आदर्श मिसाल कायम की है. उन्होंने अपनी इस मुहिम में उन राज्यों को फोकस किया, जहां पर कन्या जन्म दर कम है. जहां बेटी का होना पाप माना जाता है, जहां पर अकसर कोख में ही कन्या भू्रण हत्या कर दी जाती है.

‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात का भरूच, राजस्थान का बारा जिला हैडक्वार्टर, पंजाब का अमृतसर जिला हैडक्वार्टर, दक्षिण भारत के केरल, उत्तर प्रदेश, रांची, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ का जिला दुर्ग, महाराष्ट्र का यवतमाल जिला, दिल्ली, बिहार का औरंगाबाद व ओडिशा तक शामिल रहा.

हरियाणा व राजस्थान के बाद अपने गृह प्रदेश में भोपाल, इंदौर, उज्जैन, रतलाम, जबलपुर, खंडवा, देवास, हरदा, होशंगाबाद, सीहोर, छिंदवाड़ा, खरगौन, ग्वालियर, सतना, सीधी, मंदसौर में भी लाडो फाउंडेशन के तहत तकरीबन 1,500 परिवारों के दरवाजे पर आप को ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ की नेम प्लेट में उस घर की मुखिया के रूप में बेटी का नाम पढ़ने को मिल जाएगा.

ऐसी एक नेम प्लेट की लागत तकरीबन 70 रुपए आती है. 2,000 लोगों तक पहुंची इस मुहिम को उत्तर से दक्षिण तक तारीफ भी मिली.

बेटियों को मिला सम्मान

इस मुहिम की शुरुआत अनिल यादव पहलवान की बेटी आयुषी के जन्मदिन से हुई. बेटी ने जब पिता से सवाल किया कि क्या उस के घर के दरवाजे पर पिता की जगह उस का नाम लिखा पढ़ने को मिल सकता है?

अनिल यादव पहलवान ने अपनी बेटी की तरह पूरे देश की बेटियों को एक अनुपम भेंट दी और उस का नाम दिया, ‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’.

इस मुहिम का असर हुआ कि बेटियों ने अपने पिता से जायदाद में नहीं, बल्कि सम्मान में अपना हक मांगा, जिसे स्वीकार करने वाले महज 4 साल में 2,000 लोग हो गए.

‘डिजिटल इंडिया विद लाडो’ से जुड़े केरल की आरापुरा तहसील चेंगनूर के गांव चेरीयनाड कोल्लागढ़ा के रजा थौमस और एलिजाबेथ ईसाई जोड़े ने अपनी दोनों बेटियों अक्जा व डेल्सी के नाम की नेम प्लेट अपने दरवाजे पर लगा दी है. अब रजा थौमस का घर उस की मुखिया अक्जा व डेल्सी थौमस के तौर पर पहचाना जाता है.

सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े थौमस परिवार के एक दोस्त बैतूल के बाशिंदे मैथ्यू पौल ने वह नेम प्लेट केरल पहुंचाई तो थौमस ने नेम प्लेट लगाते हुए केरल से तसवीर भेजी.

सराहना मिली, सम्मान नहीं

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत दूसरे राज्यों के वर्तमान मुख्यमंत्रियों ने इस मुहिम की तारीफ की. अनिल यादव पहलवान द्वारा खुद के खर्चे पर बना कर दी जाने वाली नेम प्लेट राज्य सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ मुहिम में मददगार साबित हो रही है, लेकिन प्रदेश की सरकार ने सम्मानपत्र देना तो दूर, एक पत्र तक नहीं लिखा.

इस समय बैतूल जिले के अनिल यादव पहलवान साल 2015 से ले कर आज तक इन नेम प्लेटों पर तकरीबन डेढ़ लाख रुपए खर्च कर चुके हैं, जबकि उन की पान की दुकान है. वे अपनी जेब से हर साल 20,500 रुपए इस काम  के लिए रखते हैं, ताकि कई चेहरों पर मुसकराहट लाई जा सके. यही वजह है कि गांवों से ले कर शहरों तक घरमकानबंगले को भी बेटी के नाम से पहचान मिलने लगी है और अनिल यादव पहलवान के साथ कारवां यों ही बढ़ता चला जा रहा है.

मिलेगा ताप्ती सम्मान

नदीनारी के मानसम्मान के लिए प्रदेश में मुहिम बनी मां सूर्यपुत्री ताप्ती जागृति समिति ताप्ती जन्मोत्सव पर साल 2020 का ताप्ती सम्मान अनिल यादव पहलवान को देगी.

इस समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता किशोर साहू व मीडिया प्रभारी रविंद्र मानकर ने इस बारे में ऐलान करते हुए उन की इस मुहिम की खुल कर तारीफ की है. यह समिति ऐसे लोगों को ताप्ती जन्मोत्सव व  दूसरे मौकों पर ताप्ती सम्मान से सम्मानित करती है, जो बेटी, नदी, नारी के रक्षक बन कर सामने आते हैं.

मर्दों की विरासत को नया नजरिया देती गांव की बिटिया

लेखक- देवांशु तिवारी

हाथ में तलवार, आंखें तिरछी और तेज आवाज में क्या कोई आप के दिल को छू सकता है? कई लोग कहेंगे कि दिल को छूने का तो नहीं पता, पर दिल में छेद जरूर कर सकती है ऐसी शख्सीयत, लेकिन आप को इतना सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि शीलू यह सबकुछ करती है और लोग उस को इस अंदाज में देख कर दंग रह जाते हैं.

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक छोटे से इलाके गुरुबक्शगंज की रहने वाली शीलू सिंह राजपूत एक आल्हा गायिका हैं.

याद रहे कि आल्हा गीत पुराने समय में राजामहाराजाओं के लड़ाई पर जाने से पहले गाया जाता था. इस गीत को केवल मर्द ही गाते थे.

ये भी पढ़ें- तुम रोको, हम तो खेलेंगी फुटबाल

पर, शीलू तो एक लड़की है, फिर भला वह क्यों गाने लगी वीर रस से भरा मर्दों का यह आल्हा? यही एक सवाल कभी समाज ने उस से पूछा था, जब छोटी सी उम्र में शीलू ने अपने हाथ में पहली बार तलवार थामी थी और आल्हा गाना शुरू किया था.

शीलू रायबरेली जिले के जिस हिस्से से आती है, वह बेहद पिछड़ा हुआ इलाका है. यहां ज्यादातर लड़कियों के हाथों में जिस उम्र में किताबें होनी चाहिए, वे चूल्हे में पड़ी लकडि़यों को जलाने वाली फुंकनी और गोलगोल रोटी बनाने वाला बेलन लिए हुए नजर आ जाएंगी. इन देहाती हालात के बीच शीलू ने अपनी अलग राह खुद चुनी है और इस में सब से बड़ी बात यह रही कि उस के पिता भगवानदीन ने उस का हर कदम पर साथ दिया.

आल्हा गायक लल्लू बाजपेयी का आल्हा सुन कर शीलू बड़ी हुई और आज एक जानीपहचानी आल्हा गायिका बन चुकी है. उस के इस हुनर को आज केवल उस के गांव वाले ही नहीं, बल्कि कई राष्ट्रीय व राजकीय मंच भी सराह चुके हैं. पहले गांव के जो लोग उस को ऐसा करते देख आंखें टेढ़ी कर लिया करते थे, आज वही अपनी लड़कियों को शीलू का आल्हा दिखाने लाते हैं.

शीलू ने आल्हा गायन के साथसाथ हाल ही में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की है. लेकिन जब भी वह आल्हा गाने मंच पर आती है, तो उस की मासूमियत कहीं ऐसे छिप जाती है मानो दोपहर का चमचमाता सूरज अचानक बदली में कहीं गुम हो जाता है.

ये भी पढ़ें- जाति ने बांट दिए दो कौड़ी के बरतन

चेहरे पर वही तेज, हाथों में धारदार तलवार और तिरछी आंखें. चारों ओर बैठे लोग उसे इस अंदाज में देख कर दंग रह जाते हैं.

लोग कहते हैं कि शीलू जब अपने हाथों में तलवार नचाते हुए आल्हा गाती है, तो मंच पर एक अजीब सा कंपन महसूस होता है और शरीर में अपनेआप रोमांच हो जाता है. उस का आल्हा दिल को ऐसे छू लेता है कि अगले दिन तक वह आवाज कानों में गूंजती रहती है.

शीलू का यह हुनर उस के परिवार को अब हर लमहा गर्व का अहसास कराता है और सीना ठोंक के चुनौती देता है समाज की हर उस रूढि़वादी सोच को, जो औरतों को हमेशा चारदीवारी के अंदर रहने को मजबूर करती है.

औरतों की आजादी कहां

ईरान में 39 साल बाद महिलाओं ने फिर आजादी का जश्न मनाया और हजारों की संख्या में तेहरान के सब से बड़े आजादी स्टेडियम में एक बड़ी स्क्रीन पर रूस में हुए फुटबौल विश्व कप का मैच देखा. दरअसल, यहां की महिलाओं को 1979 की इसलामिक क्रांति के बाद से ही खेल स्टेडियमों में आने की इजाजत नहीं थी. इस प्रतिबंध का संबंध सीधे धर्म से था.

पर 27 जून, 2018 को स्पेन और ईरान के मैच से पहले स्टेडियम को महिलाओं के लिए खोल दिया गया. ईरान के रूढिवादी नेताओं ने इस फैसले का विरोध किया. महाअभियोजक मोहम्मद जफर मोंटेजरी ने महिलाओं द्वारा इस तरह सिर से स्कार्फ हटा कर जश्न मनाने, गाने और नृत्य करने को शर्मनाक बताया. गौरतलब है कि ईरान में महिलाओं के लिए सिर पर स्कार्फ पहनना जरूरी है.

कुछ अरसा पहले स्कार्फ की अनिवार्यता के चलते भारत की शतरंज चैंपियन सौम्या स्वामीनाथन ने ईरान में एशियन टूरनामैंट में खेलने से इनकार कर दिया था. 29 साल की ग्रैंडमास्टर सौम्या ने इस नियम को मानवाधिकार का उल्लंघन बताया था. इस से पहले शूटर हिना सिद्द्धू ने 2016 में ईरान के एशियाई एअरगन मुकाबले से खुद को अलग कर लिया था. भारत के अलावा और कई अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी ऐसा कर चुके हैं. सऊदी अरब, ईरान जैसे मुसलिम और दूसरे पिछड़े देशों में महिलाओं के ऊपर तरहतरह की पाबंदियां लगी हुई हैं. सऊदी अरब में ऐसे बहुत से काम हैं, जो महिलाएं नहीं कर सकतीं.

ये भी पढ़ें- किस काम का हिंदू विवाह कानून

महिलाओं को घूमने, बैंक अकाउंट खोलने, पासपोर्ट बनवाने, शादी, तलाक, किसी तरह का कौंट्रैक्स साइन करने के लिए अपने घर के पुरुष सदस्यों से इजाजत लेनी जरूरी है.

महिलाएं वैसे कपड़े नहीं पहन सकतीं जो उन्हें खूबसूरत दिखाते हों.

अपने रिश्तेदारों के सिवा अन्य पुरुषों से महिलाएं एक सीमित समय तक ही बात कर सकती हैं.

संयुक्त अरब की महिलाएं सार्वजनिक स्वीमिंग पूल्स में नहीं जा सकतीं. उन्हें केवल महिलाओं के लिए बने जिम और स्पा में ही जाने की इजाजत है.

शौपिंग करने गई महिलाओं को ट्रायलरूम में कपड़े बदलने की भी इजाजत नहीं. उन्हें बिना ट्राई किए ही कपड़े पसंद करने होते हैं.

महिलाएं मातापिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार नहीं होतीं.

भारत में भी कमोबेश यही हाल है. कभी मासिकधर्म के नाम पर, कभी परदाप्रथा के नाम पर, कभी सड़ीगली परंपराओं के नाम पर तो कभी असुरक्षित माहौल के नाम पर उन के पैरों में बंदिशों की मोटीमोटी जंजीरें डाल दी जाती हैं. महिलाओं के कपड़ों को ले कर अकसर बखेड़े होते रहते हैं. लगता है जैसे शरीर महिलाओं का नहीं तथाकथित संस्कारों और परंपराओं का भार ढोते हुए समाज को सही रास्ता दिखाने का ठेका लेने वाले धर्मगुरुओं व पोंगापंडितों का है.

महिलाओं के साथ कोई अपराध हो तो उन्हें ही दोषी करार दिया जाता है. उन्हें परदे के अंदर रहने की हिदायत दी जाती है. हर तरह की चैलेंजिंग जौब से दूर रखा जाता है.

कोमलता कमजोरी नहीं

सवाल उठता है कि क्या महिला होना अपराध है? क्या पुरुषों की तरह औरतें इंसान नहीं? क्या उन का शरीर किसी और चीज से बना है? क्या उन के पास दिल और दिमाग नहीं? क्या वे सोचसमझ नहीं सकतीं? अपने फैसले खुद नहीं ले सकतीं? उन्हें इस कदर बांध कर और पुरुषों के अधीन क्यों रखा जाता है? यदि वे अपने बल पर जीने या कुछ कर दिखाने के काबिल हैं, तो उन्हें रोका क्यों जाता है? शरीर, हां एक शरीर ही है जो पुरुषों से थोड़ा अलग है. पुरुषों के मुकाबले महिलाएं शारीरिक रूप से थोड़ी नाजुक होती हैं. इसी कोमल तन और मन के नाम पर उन के साथ नाइंसाफियां की जाती हैं.

महिला की कोमलता को उस की कमजोरी मानने वाले पुरुष यह भूल जाते हैं कि इसी कोमल शरीर ने एक से एक ताकतवर पुरुषों को जन्म दिया है. पुरुषों ने इस हकीकत को नजरअंदाज करते हुए कोमलता के नाम पर महिलाओं के शरीर पर अधिकार जमाया.

ये भी पढ़ें- धर्म के नाम पर चंदे का धंधा

देह पर किस का अधिकार

देह पर अधिकार को ले कर हाल ही में अटौर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का एक दिलचस्प बयान सामने आया. आधार कार्ड को ले कर सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि नागरिक अपने शरीर के अंगों पर पूर्ण अधिकार का दावा नहीं कर सकते. वे आधार नामांकन के लिए डिजिटल फिंगरप्रिंट और आइरिस को लेने से मना नहीं कर सकते. भाजपा सरकार की ओर से रोहतगी ने तर्क दिया कि कोईर् भी व्यक्ति अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि कानून लोगों को आत्महत्या करने और महिलाओं को ऐडवांस स्टेज पर गर्भपात करने से रोकता है. यदि उन का अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार होता तो लोग अपने शरीर के साथ जो भी करना चाहते वह करने के लिए स्वतंत्र होते. बाद में उन के इस तर्क को कोर्ट ने सिरे से नकार दिया.

हालांकि यहां देह की बात दूसरे संदर्भ में की गई, मगर जब हम महिलाओं की देह की बात करते हैं तो कहीं न कहीं यही मानसिकता हमारे अंदर सिर उठाए रखती है. जहां तक इस बयान का हकीकत से संबंध है, महिलाओं के संदर्भ में इसे वास्तव में लागू किया जाता है. महिलाओं का अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार नहीं. पूर्ण क्या, बहुत सी जगह तो महिलाओं को अपने शरीर पर थोड़ा भी हक देने की फितरत नहीं रखी जाती.

टूट रही हैं दीवारें

लंबे अरसे से सऊदी अरब की महिलाओं को ड्राइविंग यानी गाड़ी चलाने का अधिकार नहीं था. वे केवल पिछली सीट पर बैठ सकती थीं. समयसमय पर वहां की महिलाएं इस के खिलाफ आवाज उठाती रहीं. 1990 में जब 47 महिलाओं ने इस के खिलाफ नारा बुलंद किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन के पासपोर्ट जब्त कर लिए गए. 2007 में महिला ऐक्टिविस्ट्स ने तत्कालीन उस समय के किंग अबदुल्लाह को ड्राइविंग से बैन हटाने के लिए 1000 हस्ताक्षरों के साथ एक याचिका दी पर कोईर् सुनवाई नहीं हुई. नवंबर, 2014 को संयुक्त अरब अमीरात तक ड्राइव करने की कोशिश के बाद ऐक्टिविस्ट्स लूजा इन हथलाउल और मायसा अल अमूदी को 73 दिनों तक हिरासत में रखा गया. इन पर आतंकवाद से जुड़े केस दर्ज किए गए.

बीते साल सितंबर में किंग सलमान ने अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान द्वारा सुधारों को लागू किए जाने के बाद महिलाओं की ड्राइविंग पर लगे बैन को हटाने का आदेश दिया और फिर गत 24 जून की आधी रात से महिलाओं की ड्राइविंग पर लगा बैन पूरी तरह से हट गया. महिलाएं कारों का स्टीयरिंग थामे इस आजादी का जश्न मनाती सड़कों पर नजर आने लगीं. आधिकारिक तौर पर उन्हें सड़कों पर ड्राइविंग करने की इजाजत जो मिल गई थी. लाइसैंस बनवाने के लिए महिलाओं की लंबी लाइनें लग गईं.

ये भी पढ़ें- ‘भाभीजी’ ड्रग्स बेचती हैं

संयुक्त अरब अमीरात दुनिया का ऐसा आखिरी देश है जहां इस तरह का प्रतिबंध कायम था. इस प्रतिबंध के हटने से खाड़ी देशों की 1.5 करोड़ से ज्यादा महिलाएं पहली बार सड़कों पर गाडि़या चला सकेंगी.

सोच बदलनी जरूरी भले ही प्रतिबंधों के टूटने पर महिलाओं का उत्साह बढ़ता है पर प्रतिबंधों को हटाने के साथसाथ लोगों की मानसिकता भी बदलनी जरूरी है. उदाहरण के लिए एक तरफ जहां संयुक्त अरब अमीरात की महिलाएं ड्राइविंग का हक मिलने के बाद आजादी का जश्न मना रही थीं, तो वहीं दूसरी तरफ इस खबर की रिपोर्टिंग करते हुए एक महिला रिपोर्टर का ऐसा वीडियो वायरल हुआ कि उसे देश छोड़ कर भागना पड़ा.

संयुक्त अरब अमीरात प्रशासन ने उस रिपोर्टर के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए. वजह थी रिपोर्टिंग के दौरान अश्लील कपड़े पहनना, दरअसल, टीवी की रिपोर्टर शिरीन का हैडस्कार्फ ढीला था और उस ने थोड़ा खुला गाउन पहना था. इसी बात को उछालते हुए संस्कृति के तथाकथित रखवालों ने ट्विटर पर नैकेड वूमन ड्राइविंग इन रियाद हैशटैग से वीडियो वायरल कर दिया.

आज के दौर में समाज की उन्नति के लिए स्त्रियों के बढ़ते कदमों को हौसला देने की जरूरत है न कि अपनी कुंठाओं और घटिया सोच के बोझ तले उन के अरमानों को कुचलने और बंदिशों की डोर से बांधने की.

ये भी पढ़ें- फांसी से बचाने के लिए सालाना खर्च करते हैं 36 करोड़ रुपए

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें