बेटी की माहवारी, पिता दिखाए समझदारी

एक सुबह प्रिया अपने स्कूल की एक पिकनिक ट्रिप के लिए तैयार हो रही थी. 9वीं जमात के दोनों सैक्शन को सूरजकुंड घुमाने का प्रोग्राम था. प्रिया अपने बैग में खानेपीने का सामान रख रही थी. तभी उस ने एक पैकेट उठाया और रसोईघर में जा कर उसे कैंची से काटने लगी. राकेश भी लाड़लाड़ में प्रिया के पीछे जा कर देखने लगा और पूछा, ‘‘क्या काट रही हो?’’ प्रिया ने प्लास्टिक का एक पैकेट दिखाते हुए कहा, ‘‘यह है. और क्या काटूंगी…’’ राकेश ने देखा कि प्रिया उस पैकेट से 2 सैनेटरी पैड निकाल कर अपने बैग में रख रही थी. राकेश ने बड़े प्यार से उस के सिर पर हाथ रखा और ‘ध्यान से रहना’ बोल कर रसोईघर से बाहर चला आया.

एक पिता का अपनी बेटी के लिए ऐसा लगाव यह दिखाता है कि बदलते जमाने में बेटी की माहवारी को ले कर पिता में यह जागरूकता होनी ही चाहिए. न तो प्रिया की तरह कोई बेटी सैनेटरी पैड को ले कर झिझक महसूस करे और न ही राकेश की तरह कोई पिता अपनी बेटी के ‘उन दिनों’ के बारे में जान कर शर्मिंदा हो. यह उदाहरण इस बात को भी सिरे से नकारता है कि सिर्फ मांबेटी में ही गुपचुप तरीके से माहवारी पर बात की जाए, क्योंकि आज भी समाज में यही सोच गहरे तक पैठी है कि औरत ही औरत की इस समस्या को अच्छी तरह से समझ सकती है और मर्दों को परदा रखना चाहिए, जबकि विज्ञान के नजरिए से सोचें तो माहवारी के बारे में जितनी जानकारी औरतों या लड़कियों को होनी चाहिए, उतनी ही मर्दों और लड़कों को भी होनी चाहिए, गरीब और निचली जाति में तो खासकर. माहवारी में सैनेटरी पैड कितना अहम होता है, स्कौटलैंड से इस बात को समझते हैं. माहवारी से जुड़ी गरीबी को मिटाने के लिए यह देश पीरियड प्रोडक्ट्स को बिलकुल मुफ्त बनाने वाला पहला देश बन गया है.

इस सिलसिले में स्कौटलैंड सरकार ने बताया कि वह ‘पीरियड प्रोडक्ट ऐक्ट’ लागू होते ही दुनिया की पहली ऐसी सरकार बन गई है, जो माहवारी संबंधी बने सामान तक मुफ्त पहुंच के हक की कानूनी तौर पर हिफाजत करती है. इस नए कानून के तहत स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटी और स्थानीय सरकारी संस्थाओं के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपने शौचालयों में सैनेटरी पैड समेत माहवारी संबंधी प्रोडक्ट मुहैया कराएं. पर, भारत जैसे देश में सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटने के बावजूद हालात उतने अच्छे नहीं हैं. यूनिसेफ के मुताबिक, दक्षिण एशिया की एकतिहाई से ज्यादा लड़कियां अपनी माहवारी के दौरान खासतौर पर स्कूलों में शौचालयों और पैड्स की कमी के चलते स्कूल से छुट्टी कर लेती हैं. माहवारी के चलते होने वाली बीमारियों के बारे में बहुत सी औरतें अनजान ही रहती हैं. अकेले भारत की बात करें, तो यहां 71 फीसदी लड़कियां अपना पहला पीरियड होने से पहले तक माहवारी से अनजान होती हैं. सरकारी एजेंसियों के मुताबिक, भारत में 60 फीसदी किशोरियां माहवारी के चलते स्कूल नहीं जा पाती हैं. तकरीबन 80 फीसदी औरतें अभी भी घर पर बने पैड (कपड़ा) का इस्तेमाल करती हैं.

हालात तब और बुरे हो जाते हैं, जब बेटियां अपने पिता या भाई से अपनी इस कुदरत की देन से होने वाली समस्याओं के बारे में खुल कर नहीं बता पाती हैं, जबकि ज्यादातर बेटियां अपने पिता को ही अपना हीरो मानती हैं. नाजनखरे दिखा कर उन से अपने सारे काम करा लेती हैं, पर जब माहवारी की बात आती है, तो चुप्पी साध लेती हैं. पिता भी तो अपनी लाड़ली पर जान छिड़कते हैं, फिर ऐसी कौन सी खाई है, जो इस मसले पर उन दोनों के बीच आ जाती है?

दरअसल, हमारे समाज में धार्मिक जंजाल के चलते मर्दों का इतना ज्यादा दबदबा है कि वे ऐसी समस्याओं पर बात करना बड़ा ओछा काम समझते हैं. उन के मन में यही खयाल रहता है कि ‘क्या अब ये दिन आ गए, जो मैं अपनी बेटी के ‘उन दिनों’ का भी हिसाबकिताब रखूं? दुकानदार से किस मुंह से सैनेटरी पैड मांगूंगा? पासपड़ोस में पता चल गया तो मेरी नाक कट जाएगी…’

यहीं भारत जैसे देश मार खा जाते हैं. इश्तिहारों में कितना ही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का राग अलाप लो, पर जब तक इस देश के मर्द समाज की औरतों के प्रति दकियानूसी सोच में बदलाव नहीं आता है, तब तक कोई ठोस नतीजा नहीं सामने आएगा, फिर वह लड़कियों की माहवारी की समस्या हो या उन की पढ़ाईलिखाई.

इस बदलाव की शुरुआत पिता को अपनी बेटी की माहवारी से ही करनी चाहिए. उन्हें अपनी बच्ची के बदलते शरीर के बारे में पूछताछ के लिए झिझकना नहीं चाहिए. बेटी के जवानी की दहलीज पर जाते ही उस में आ रहे शारीरिक बदलावों के बारे में बात करें. माहवारी शुरू होने से पहले ही बेटी द्वारा अच्छी साफसफाई बनाए रखने की अहमियत के बारे में बताएं. जिस तरह दूसरे कामों में बेटी का हौसला बढ़ाते हैं, वैसे ही माहवारी पर भी उन्हें हिम्मत दें कि यह तो हर बेटी को कुदरत से मिला एक नायाब तोहफा है, जिस से उसे मां बनने का सुख मिलता है और परिवार आगे बढ़ता है. यह छोटी सी पहल समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है.

20 साल बाद लौट कर घर आया, पुलिस ने यह सपना सच कराया

यह अकसर होता है कि किसी तरह की नाराजगी या कुछ बनने की फितरत या फिर कुछ नया कर गुजरने की लालसा से बहुत से नौजवान अपने घर परिवार को छोड़ कर निकल पड़ते हैं और फिर उन में से कुछ तो बड़ा मुकाम हासिल कर लेते हैं, मगर ज्यादातर आमतौर पर गुमनाम रह जाते हैं.

यही जिंदगी का एक ऐसा फलसफा है जो यह बताता है कि इनसान में कुछ कर गुजरने की चाह उसे ऊंचाइयों पर पहुंचा देती है. मगर कुछ ऐसे होते हैं जो घर ठिकाना छोड़ कर भटकते रह जाते हैं और कभी कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाते हैं और फिर जब कभी अपनों के बीच लौटते हैं तो अपने घर आ कर जो खुशी होती है, उसे शब्दों में कहा नहीं जा सकता. आइए, देखें कुछ ऐसी ही घटनाएं :

पहली घटना

एक नौजवान अपने पिता से नाराज हो कर घर परिवार छोड़ कर चला गया. पत्नी बच्चे सभी थे. 20 साल बाद लौटा तो मध्यवर्गीय इस परिवार के हालात बदल चुके थे और लड़का अपने बूते चार्टर्ड अकाउंटैंट बन गया था.

दूसरी घटना

एक बालक घर परिवार छोड़ कर चला गया, मगर लंबे समय तक दुखों का पहाड़ उठाया. वह जब 25 साल बाद लौटा तो उस के परिवार ने उसे पा कर खुशियां मनाईं और उसे एक नई जिंदगी मिल गई.

तीसरी घटना

एक बालक घर से नाराज हो कर बड़े शहर आ गया. 15 साल बाद जब वह अपने गांव लौटा तो उसे एहसास हुआ उस ने बहुत बड़ी गलती की थी.

पुलिस की अनोखी पहल

आप को बताते हैं एक ऐसे नौजवान की कहानी जो 20 साल बाद घर लौटा और इस में एक पुलिस अधीक्षक ने मददगार बनने का रोल निभाया.

झारखंड के गढ़वा जिले में पुलिस की एक अनोखी पहल देखने को मिली है, जहां पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने 20 साल से बिछड़े एक बेटे को उस के मांबाप से मिलाया.

दरअसल, यह मामला गढ़वा जिले के रंका थाना क्षेत्र के पिंडरा गांव का है, जहां 20 साल पहले रामजनम नाम का शख्स काम की तलाश में हरियाणा के पलवल जिले चला गया था. वहां उस की मुलाकात एक परिवार से हुई. परिवार ने उस सीधे सादे लड़के को अपने घर पर रख लिया.

देखते ही देखते 20 साल बीत गए, लेकिन रामजनम घर वापस नहीं लौटा. घर वालों को लगा उस का बेटा अब इस दुनिया में नहीं है. वहीं रामजनम ने भी अपने मां बाप से मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी.

अचानक रामजनम को अपने घर की याद आई तो उस ने यह बात अपनी मकान मालकिन को बताई जिस के बाद उस औरत ने गूगल से गढ़वा पुलिस का सरकारी नंबर निकाला और मोबाइल से बात करते हुए रामजनम की तसवीर शेयर की.

पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने तत्काल रंका थाना को फोटो गांव में भेज कर पता लगाने का निर्देश दिया, जिस के बाद थाना प्रभारी ने गांव में पहुंच कर फोटो की पहचान उस लड़के के मां बाप से कराई. मां बाप ने भी अपने बेटे को पहचान लिया, जिस के बाद पुलिस ने रंका थाना में मां बाप को ले जा कर उन के बेटे रामजनम से वीडियो काल से बात कराई.

रामजनम और उस के मां बाप वीडियो काल से बात कर के भावुक हो उठे. दोनों की आंखों में आंसू आ गए. इस घटना के बाद गढ़वा पुलिस की इस पहल की चारों तरफ तारीफ हो रही है.

पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने कहा, “हरियाणा से एक औरत का मेरे सरकारी नंबर पर फोन आया था. उन्होंने बताया कि एक नौजवान 12 साल से उन के यहां काम कर रहा है, जो गढ़वा जिले के रंका थाने के पिंडरा गांव का रहने वाला है. औरत द्वारा उस नौजवान की तसवीर भी भेजी गई थी. पुलिस के द्वारा उस गांव में जा कर उस की पहचान रामजनम सिंह के रूप में की गई, जो 20 साल पहले कमाने के लिए बाहर गया था और कभी वापस नहीं लौटा. उस के माता पिता को थाने बुला कर पुलिस ने वीडियो काल से बात कराई, जिस में रामजनम और उस के माता पिता दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया. घर और गांव के लोग उसे मरा समझ बैठे थे, लेकिन इस वाकिए ने परिवार के साथ साथ गांव वालों के चेहरे पर भी खुशी ला दी.

कामवालियों पर मालिक की ललचाई नजरें

आज के समय में ज्यादातर शहरी पतिपत्नी कामकाजी होते हैं. ऐसे में घरों में काम करने वाली बाई का रोल अहम हो जाता है. अगर एक दिन भी वह नहीं आती है, तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाता है. एक ताजा सर्वे के मुताबिक, मुंबई शहर में कामकाजी लोगों के घर उन की कामवाली बाई के भरोसे ही चलते हैं और अगर एक दिन भी वह छुट्टी ले लेती है, तो घर में मानो तूफान आ जाता है. सवाल यह है कि जो इनसान हमारे घर के लिए इतना अहम है, क्या हमारे समाज में उसे वह इज्जत मिल पाती है, जिस का वह हकदार है?

आमतौर पर घरों में काम करने वाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया अच्छा नहीं रहता, क्योंकि अगर घर में से कुछ इधरउधर हो गया, तो इस का सब से पहला शक बाई पर ही जाता है. इस के अलावा घर के मर्दों की भी कामुक निगाहें उन्हें ताड़ती रहती हैं और अगर बाई कम उम्र की है, तो उस की मुसीबतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं.

सीमा 34 साल की है. 4 साल पहले उस का पति एक हादसे में मारा गया था. उस की एक 14 साल की बेटी और 10 साल का बेटा है.

एक घर का जिक्र करते हुए सीमा बताती है, ‘‘जिस घर में मैं काम करती थी, उन की बेटी मुझ से एक साल बड़ी थी. एक दिन आंटी बाहर गई थीं. घर में सिर्फ अंकलजी, उन की बीमार मां और बेटी थी. मैं रसोइघर में जा कर बरतन धोने लगी. अंकलजी ने अपनी बेटी को किसी काम से बाहर भेज दिया.

‘‘मैं बरतन धो रही थी और वे अंकल कब मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला. जैसे ही मैं बरतन धो कर मुड़ी, तो उन का मुंह मेरे सिर से टकरा गया. मैं घबरा गई और चिल्लाते हुए घर से बाहर आ गई.

‘‘इस के बाद 2 दिन तक मैं उन के यहां काम करने नहीं गई. तीसरे दिन वे अंकल खुद मेरे घर आए और हाथ जोड़ कर बोले, ‘मुझे माफ कर दो. मुझ से गलती हो गई. मेरे घर में किसी को मत बताना और काम भी मत छोड़ना. आज के बाद मैं कभी तुम्हारे सामने नहीं आऊंगा.’

‘‘आप बताइए, उन की बेटी मुझ से बड़ी है और वे मेरे ऊपर गंदी नजर डाल रहे थे. क्या हमारी कोई इज्जत नहीं है?’’ कहते हुए वह रो पड़ी.

नीता 28 साल की है. पति ने उसे छोड़ दिया है. वह बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, वहां मालकिन ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. जब मैं काम करती थी, तो मालिक मेरे पीछेपीछे ही घूमता रहता था. मुझे गंदी निगाहों से घूरता रहता था.

‘‘फिर एक दिन हिम्मत कर के मैं ने उस से कहा, ‘बाबूजी, यह पीछेपीछे घूमने का क्या मतलब है, जो कहना है खुल कर कहो? मैडमजी को भी बुला लो. मैं गांव की रहने वाली हूं. मेरी इज्जत जाएगी तो ठीक है, पर आप की भी बचनी नहीं है.’

‘‘मेरे इतना कहते ही वह सकपका गया और उस दिन से उस ने मेरे सामने आना ही बंद कर दिया.’’

इसी तरह 35 साल की कांता बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, उन साहब के घर में पत्नी, 2 बेटे और बहुएं थीं. उन के यहां सीढि़यों पर प्याज के छिलके पड़े रहते थे. हर रोज मैं जब भी झाड़ू लगाती, मालिक रोज सीढि़यों पर बैठ कर प्याज छीलना शुरू कर देता और फिर सीढि़यों से ही मुझे आवाज लगाता, ‘कांता, यहां कचरा रह गया है.’

‘‘जब मैं झाड़ती तो मेरे ऊपर के हिस्से को ऐसे देखता, मानो मुझे खा जाएगा. एक महीने तक देखने के बाद मैं ने उस घर का काम ही छोड़ दिया.’’

30 साल की शबनम बताती है, ‘‘पिछले साल मैं जिस घर में काम करती थी, वहां दोनों पतिपत्नी काम पर जाते थे. उन का एक छोटा बेटा था. मैं पूरे दिन उन के घर पर रह कर बेटे को संभालती थी.

‘‘एक दिन मैडम दफ्तर गई थीं और साहब घर पर थे. मैं काम कर रही थी, तभी साहब आए और बोले, ‘शबनम, 2 कप चाय बना लो.’

‘‘मैं जब चाय बना कर उन के पास ले गई, तो वे सोफे पर बैठने का इशारा कर के बोले, ‘आ जाओ, 2 मिनट बैठ कर चाय पी लो, फिर काम कर लेना.’

‘‘मैं उन के गंदे इरादे को भांप गई और न जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई कि मैं ने उन के गाल पर एक चांटा जड़ दिया और अपने घर आ गई. उस दिन के बाद से मैं उन के घर काम पर नहीं गई.’’

इन उदाहरणों से कामवाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया दिखता है. ऐसे घरों में इन्हें एक औरत के रूप में तो इज्जत मिलती ही नहीं है, साथ ही जिस घर को संवारने में ये अपना पूरा समय देती हैं, वहीं मर्द इन्हें गंदी नजरों से देखते हैं.

क्या करें ऐसे समय में

 ऐसे हालात में आमतौर पर ज्यादातर कामवाली बाई चुप रह जाती हैं या काम छोड़ देती हैं. इस के पीछे उन की सोच यही होती है कि चाहे घर का मर्द कितना ही गलत क्यों न हो, कुसूरवार कामवाली बाई को ही ठहराया जाता है. वे अगर  मुंह खोलेंगी तो और भी लोग उन से काम कराना बंद कर देंगे, इस से उन की रोजीरोटी के लाले पड़ जाएंगे.

कई मामलों में तो कामवाली बाई को पैसे दे कर उस का मुंह भी बंद कर दिया जाता है. पर ऐसा करना मर्दों की गंदी सोच को बढ़ावा देना है, इसलिए अगर ऐसा होता है, तो चुप रहने के बजाय अपनी आवाज उठानी चाहिए.

आजकल तकनीक का जमाना है. अगर मुमकिन हो सके, तो ऐसी छिछोरी बातों को रेकौर्ड करें या वीडियो क्लिप बना लें, ताकि बात खुलने पर सुबूत के तौर पर उसे पेश किया जा सके.

क्या करें पत्नियां

 ऐसे मनचलों की पत्नियां भले ही अपने पति की हरकत को जगजाहिर न करें, पर वे खुद इस से अच्छी तरह परिचित होती हैं.

अच्छी बात यह रहेगी कि बाई के साथ अकेलेपन का माहौल न बनने दें. वे खुद बाई से काम कराएं. अगर पति मनचला है, तो ज्यादा उम्र की बाई को घर पर रखें.

कई बार कामवालियां भी मनचली होती हैं. उन्हें घर की मालकिन के बजाय घर के मालिक से ज्यादा वास्ता रहता है. ऐसे में उन्हें उन की सीमाएं पार न करने की हिदायत दें.

भगत सिंह का लव कन्फैशन

भ गत सिंह लाहौर के नैशनल कालेज के स्टूडैंट थे. तब भारतपाकिस्तान वाली सरहदें न थीं. उम्र कोई 20-21 साल. जवान और बेतहाशा खूबसूरत. औसत ऊंचाई, पतला व लंबा चेहरा, चेहरे पर हलके से चकत्ते, झानी दाढ़ी और छोटी सी मूंछ. उम्र की इस नाजुक दहलीज में विचारों की धार पैनी थी.

उस दौरान एक सुंदर सी लड़की कालेज में उन्हें देख कर मुसकरा दिया करती थी. चर्चा थी कि वह लड़की भगत सिंह को पसंद करती थी और उन्हीं की वजह से वह क्रांतिकारी दल के करीब आ गई थी. वही क्रांतिकारी दल जिस का नाम रूसी क्रांति से प्रेरित हो कर भगत सिंह ने फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन कर दिया था.

इस दल के बीच जब असैंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी तो भगत सिंह को दल की जरूरत बता कर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने से इनकार कर दिया. भगत सिंह के खास दोस्त सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि ‘भगत, तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है.’

इस आरोप से भगत सिंह उदास हो गए और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असैंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर दे कर अपने नाम करवाया. यह वही परिघटना है जिस पर आगे जा कर वामपंथी विचारकों में बड़ी बहस भी हुई कि भगत सिंह का खुद आगे आ कर बम फेंकने का निर्णय कितना सही था, जबकि बम फेंकने के बाद हश्र क्या होगा, यह सब को मालूम था.

8 अप्रैल, 1929 को असैंबली में बम फेंकने की योजना थी. लेकिन इस से पहले वे प्रेम को ले कर अपनी भावनाओं को अपने प्रिय दोस्त सुखदेव को बता देना चाहते थे. वे बता देना चाहते थे कि प्यार कभी बाधा नहीं बनता, बल्कि वह तो सहयोगी होता है लक्ष्य की प्राप्ति में.

5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के एक घर में भगत सिंह ने सुखदेव को पत्र लिखा, जिसे दल के एक अन्य सदस्य शिव वर्मा ने उन तक पहुंचाया. शिव वर्मा, जो आगे जा कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए थे.

पत्र 13 अप्रैल को सुखदेव की गिरफ्तारी के वक्त उन के पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सुबूत के तौर पर पेश किया गया. भगत सिंह ने इस पत्र में एक हिस्सा प्रेम को ले कर अपनी समझदारी को ले कर कहा.

उन्होंने कहा, ‘‘प्रिय सुखदेव, जैसे ही यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं जा चुका होऊंगा, दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं. हमेशा से ज्यादा. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेकानेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी. एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि, मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझ और मुझे पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए कमजोरी के.

‘‘आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं. पहले से कहीं अधिक. आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन सम?ा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी. मैं कमजोर नहीं हूं. अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं.’’

वे आगे लिखते हैं, ‘‘किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूं : हां, यह मेजिनी (इटली के राष्ट्रवादी आंदोलनकारी) था. तुम ने अवश्य ही पढ़ा होगा कि अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बरदाश्त नहीं कर सकता था. वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह मजबूत हो गया, बल्कि सब से अधिक मजबूत हो गया.

‘‘जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है सिवा एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है. प्यार अपनेआप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है. प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है. सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?’’

वे पत्र में आगे कहते हैं, ‘‘हां, मैं यह कह सकता हूं कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं.’’

प्रेम को ले कर इतनी स्पष्टता हैरान करती है कि उस दौरान भगत सिंह महज 21 साल के थे और 2 साल बाद वे 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिए गए. इतनी गहरी समझ रखने वाले भगत सिंह को आज घंटों इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और 16 सैकंड की रील्स देखने वाली जेनरेशन कितना समझ पाएगी, यह कहना मुश्किल है, पर अपने समय के वे असल इन्फ्लुएंसर जरूर थे. क्या आज यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि युवा इस तरह के पत्र, लिखना तो दूर, लिखने की सोच भी सकता है?

6 इंच के स्क्रीन में फंसा युवा अपनी मानवीय भावनाएं खोता जा रहा है. युवाओं के पास प्रेम का सही अर्थ नहीं है. गर्लफ्रैंड/बौयफ्रैंड तो है पर प्यार नहीं है. युवा कुंठित है. डरा हुआ है. भविष्य निश्चित नहीं. लिखना तक नहीं आता. न अपनी बातों को साफ शब्दों में रखना आता है. जाहिर है, युवा को इस तरह के पत्र लिखने या अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सब से पहले 6 इंच की आभासी दुनिया से विराम लेने की सख्त जरूरत है, पर क्या वह करेगा? बिलकुल नहीं.

इन्फ्लुएंसर्स करते पौयजनस फूड का प्रचार लोग होते बीमार

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ. वायरल वीडियो में दिखाया गया कि एक बच्चा जिस की उम्र लगभग 11-12 साल है, कुछ खा रहा है और खाते समय उस के मुंह से धुआं निकल रहा है. सामने ही एक स्टौल है जिस पर स्मोक्ड बिस्कुट लिखा हुआ है. बच्चा वहीं से बिस्कुट ले कर खा रहा है. असल में वह स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है.

दरअसल, स्मोक्ड बिस्कुट कोई अलग बिस्कुट नहीं है. नौर्मल बिस्कुट को ही लिक्विड नाइट्रोजन के साथ परोस दिया जाता है और इसे ही स्मोक्ड बिस्कुट कहा जाता है. असल में बच्चा वही स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है और बिस्कुट खाते ही बच्चे की तबीयत अचानक खराब हो जाती है. आननफानन बच्चे को हौस्पिटल ले जाया जाता है. जहां इलाज के बाद उसे घर भेज दिया जाता है. यह वीडियो कर्नाटक के दावणगेरे से आया है.

गुरुग्राम मामले में क्या हुआ

लेकिन यह कोई पहला केस नहीं है जहां कैमिकल का इस्तेमाल ठेलों, दुकानों, रैस्टोरैंटों में मिलने वाले फूड में किया जा रहा हो. इस से पहले भी खाने में कस्टमर को कैमिकल यूज्ड फूड दिया गया. अभी कुछ महीने पहले ही गुरुग्राम में एक केस आया था. जहां एक रैस्टोरैंट में डिनर करने गई फैमिली को माउथफ्रैशनर के नाम पर ड्राई आइस सर्व कर दी गई. ड्राई आइस खाते ही फैमिली के 5 लोग नेहा सबरवाल, मनिका गोयनका, प्रितिका रुस्तगी, दीपक अरोड़ा और हिमानी के मुंह से खून आने लगा. उन्हें उलटियां होने लगीं. वे दर्द से तड़पने लगे. जल्दबाजी में उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया. जहां इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया.

जब डाक्टर से ड्राई आइस के बारे में बात की गई तो डाक्टर ने आशुतोष शुक्ला को बताया, ‘जब इन 5 लोगों ने ड्राई आइस के टुकड़े खाए तो ठंड के कारण उन के मुंह में अल्सर हो गया और उस से खून आना शुरू हो गया. इसी वजह से उन की हालत खराब हुई.’

इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वाद के चक्कर में सेहत के साथ खिलवाड़ करना कितना महंगा साबित हो सकता है.

क्या है ड्राई आइस

बात करें अगर ड्राई आइस की तो ड्राई आइस जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसे सूखी बर्फ कहते हैं. जिस का टैंपरेचर 80 डिग्री तक होता है. यह सौलिड कार्बन डाइऔक्साइड से बना होता है. इसे आप आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि नौर्मल बर्फ को जब आप मुंह में रखते हैं तो वह पिघलने लगती है. जब नौर्मल बर्फ पिघलती है तो पानी में बदलने लगती है. वहीं ड्राई आइस पिघलती है तो वह सीधी कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है. यह अकसर मैडिकल स्टोर, किराने के सामान को स्टोर करने के लिए किया जाता है. इस का इस्तेमाल फोटोशूट और थिएटर के दौरान भी किया जाता है.

ड्राई आइस इतनी खतरनाक है कि पेट में जाते ही वहां छेद बना देती है, जो काफी जानलेवा साबित हो सकता है. जब यह कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है तो मुंह के आसपास के टिश्यूज और सेल्स को नुकसान पहुंचाती है.

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है.  2017 में दिल्ली में एक व्यक्ति ने गलती से ऐसी ड्रिंक पी ली थी जिस में लिक्विड नाइट्रोजन था. व्यक्ति को ड्रिंक से निकल रहे धुएं को हटाने के बाद उसे पीना था लेकिन उस ने धुएं हटने का इंतजार नहीं किया और उसे ऐसे ही पी लिया. इस के बाद उस व्यक्ति के पेट में दर्द हुआ और बाद में सर्जरी में पता चला कि उस के पेट में एक बड़ा छेद हो चुका है.

लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस दोनों पदार्थों के नाम से ही सम?ा आता है कि लिक्विड नाइट्रोजन तरल होता है और ड्राई आइस ठोस. ड्राई आइस का तापमान -78.5 डिग्री सैल्सियस तक होता है. वहीं लिक्विड नाइट्रोजन इस से भी ज्यादा ठंडी होती है और इस का तापमान -196 डिग्री सैल्सियस तक हो सकता है. दोनों पदार्थों का इस्तेमाल खानेपीने की चीजों में स्मोक इफैक्ट देने के काम में किया जाता है.

कितने खतनाक हैं ये

2018 में अमेरिकी सरकार के फूड एंड ड्रग विभाग ने खानपान में लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस के इस्तेमाल को ले कर एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ड्राई आइस या लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल सावधानी से न किया जाए तो अत्यधिक कम तापमान की वजह से यह घातक हो सकता है. इन्हें सीधेतौर पर खाना नहीं चाहिए. इस से स्किन और हमारे इंटरनल और्गन को नुकसान पहुंच सकता है.

लेकिन फिर भी दिनबदिन रासायनिक पदार्थों का खानपान में इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है और इन को बढ़ावा देने वाला और कोई नहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों का ग्रुप है, जो खुद को फूड व्लौगर कहते हैं. ज्यादा व्यूज बटोरने के लिए ये दुकानदारों को उकसाते भी हैं कि अलग और बेढंगी चीजें बनाएं, उस के लिए ऊटपटांग फ्यूजन किए जाते हैं. दुकानदार भी ज्यादा वायरल होने के चक्कर में कुछ भी चीजें खाने में इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों का ध्यान अनोखेपन पर जाए.

एक्सपैरिमैंटल फूड

सोशल मीडिया पर ये इन्फ्लुएंसर्स आएदिन ऐसे फूड स्टौल और रैस्टोरैंट को कवर करते हैं जो फ्यूजन के नाम पर कुछ भी बना रहे हैं, जैसे फेंटा मैगी, दही मैगी, चौकलेट पकोड़ा, पेस्टी मैगी, कौफी आइसक्रीम, गुलाबजामुन के पकौड़े, चुकंदर से बनी चाय, चौकलेट मोमोस, चौकलेट डोसा और न जाने क्याक्या. ये शरीर में जा कर कैसा प्रभाव छोड़ रहे हैं, इस पर कोई बात नहीं करता. इन क्या दिक्कतें हो रही हैं. इस पर कोई बात नहीं करता.

बहुत जगह दुकानदार वायरल होने के चक्कर में भरभर कर बटर, तेल, घी डाल कर दिखाता है. कोई आम इंसान जो नौर्मल या कहें घर का सिंपल खाना खाने वाला हो, इसे खा ले तो उस का सिर चकरा जाए, पैसे अलग उस के कुएं में जाएं.

मूक क्यों खाद्य विभाग

क्या फूड सेफ्टी एंड स्टेटैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्यों यह विभाग इस पर चुप है? जिस तरह सोशल मीडिया पर खाने से संबंधित ऊटपटांग चीजें वायरल होती रहती हैं, घटिया चीजें परोसी जाती हैं, क्या यह फूड सिक्योरिटी औफिसर की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ध्यान दे कि मैगी के साथ कोल्डड्रिंक का छौंका हैल्थ के लिए नुकसानदेह तो नहीं?

दरअसल, ये फूड औफिसर भी चीजों को चलता करने के मूड में रहते हैं या दुकानदारों से लेदे कर मामला रफादफा करते हैं. उन्हें नागरिकों की हैल्थ की परवा नहीं होती. सड़क के किनारे एक व्यक्ति ठेला खोल कर गरीबों को सस्ते में स्वाद वाला खाना तो दे रहा है पर साथ में बीमारियां भी दे रहा है. आम लोग कुछ कहते नहीं क्योंकि हर नुक्कड़, चौराहे पर यही कचरा परोसा जा रहा है.

फूड व्लौगर का साथ

फूड एक्सपैरिमैंट करने वाले दुकानदारों को फूड इन्फ्लुएंसर्स ने आसमान पर बैठा लिया है. जहां कहीं भी देखो, ये व्लौगर अपना कैमरा उठा कर चालू हो जाते हैं. न तो इन्होंने खाने की क्वालिटी चैक करने का कोर्स कर रखा है, न ही ये फूड की वैराइटीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं. अब इन को क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट किस एज ग्रुप के लिए है. इन्हें क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट को कितनी देर बाद खाना चाहिए? इन्हें क्या पता कि इसे खाने के बाद ठंडा पानी पीना चाहिए या नहीं?

सच बात तो यह है कि इन्फ्लुएंसर को एक्सपैरिमैंटल फूड की सिर्फ वीडियो नहीं बनानी चाहिए बल्कि उस के फायदे और नुकसान भी बताने चाहिए. तभी वह एक अच्छा जानकारी देने वाला मार्गदर्शक कहलाएगा.

अपने ही “मासूम” की बलि….

अगर आज ऐसा होता है तो इसका मतलब यह है कि आज भी हम सैकड़ो साल पीछे की जिंदगी जी रहे हैं. जहां अपने अंधविश्वास में आकर बलि चढ़ा दी जाती थी, अपने बच्चों को या किसी मासूम को. बलि चढ़ाना तो अंधविश्वास की पराकाष्ठा ही है.

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में शख्स ने अपने चार वर्षीय बेटे की बेरहमी से गला रेंतकर हत्या कर दी. घटना की वजह अंधविश्वास बताया गया है. शख्स की मानसिक स्थिति कुछ दिनों से ठीक नहीं थी. एक रात उसने परिवारजनों से कहा – “सुनो सुनो! मै किसी की बलि दे दूंगा.”

उसकी बात पर किसी ने तवज्जो नहीं दिया लगा कि यह मानसिक सन्निपात में कुछ का कुछ बोल रहा है.
एक रात उसने चाकू से एक मुर्गे को काटा फिर अपने मासूम बेटे का गला काट दिया. यह उद्वेलित करने वाला मामला शंकरगढ़ थानाक्षेत्र का है. हमारे संवाददाता को पुलिस ने बताया -शंकरगढ़ थानाक्षेत्र अंतर्गत ग्राम महुआडीह निवासी कमलेश नगेशिया (26 वर्ष) दो दिनों से पागलों की तरह हरकत कर रहा था. उसने परिवारजनों के बीच कहा – उसके कानों में अजीब सी आवाज सुनाई दे रही है, उसे किसी की बलि चढ़ाने के लिए कोई बोल रहा है.

एक दिन वह कमलेश चाकू लेकर घूम रहा था एवं उसने परिवारजनों से कहा कि आज वह किसी की बलि लेगा. उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए परिवारजनों ने उसे नजरअंदाज कर दिया था . मगर रात को खाना खाने के बाद कमलेश नगेशिया की पत्नी अपने दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सोने चली गई. कमलेश के भाईयों के परिवार बगल के घर में रहते हैं, वे भी रात को सोने चले गए.

देर रात कमलेश ने घर के आंगन में एक मुर्गे का गला काट दिया. फिर कमरे में जाकर वह अपने बड़े बेटे अविनाश (4) को उठाकर आंगन में ले आया. उसने बेरहमी से अपने बेटे अविनाश का चाकू से गला काट दिया. अविनाश की मौके पर ही मौत हो गई. सुबह करीब चार बजे जब कमलेश की पत्नी की नींद खुली तो अविनाश बगल में नहीं मिला. उसने कमलेश से बेटे अविनाश के बारे में पूछा तो उसने पत्नी को बताया कि उसने अविनाश की बलि चढ़ा दी है.

घटना की जानकारी मिलने पर घर में कोहराम मच गया. सूचना पर शंकरगढ़ थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी के नेतृत्व में पुलिस टीम मौके पर पहुंची. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले लिया . बच्चे के शव को पंचनामा पश्चात् पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया . थाना प्रभारी जितेंद्र सोनी ने बताया – परिजनों से पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया गया है. आरोपी दो दिनों से ही अजीब हरकत कर रहा था. पहले वह ठीक था. एक शाम परिवारजनों के सामने उसने किसी की बलि चढ़ाने की बात कही थी, लेकिन परिवारजनों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. मामले में पुलिस ने धारा 302, 201 का अपराध दर्ज किया है. मामले की जांच की जा रही है.

इस घटनाक्रम में परिजनों ने समझदारी से काम लिया होता और इसकी शिकायत पहले ही पुलिस में की होती या फिर उस व्यक्ति को मानसिक चिकित्सालय भेज दिया गया होता तो मासूम बच्चे की जिंदगी बच सकती थी. मासूम की बाली के इस मामले में सबसे अधिक दोषी मां का वह चेहरा भी है जो दोनों बच्चों को लेकर कमरे में सो रही होती है और पति एक बच्चे को उठाकर ले जाता है.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक गांव देहात में इस तरह की घटनाएं घटित हो जाती है, इसका दोषी जहां परिवार होता है वही आसपास के रहवासी भी दोषी हैं मगर पुलिस सिर्फ एक हत्यारे पर कार्रवाई करके मामले को बंद कर देती है.

कुल मिलाकर के ऐसे घटनाक्रम सिर्फ एक खबर के रूप में समाज के सामने आते है और फिर समाज सुधारक भूल जाते है कुल मिला करके आगे पाठ पीछे सपाट की स्थिति .यह एक बड़ी ही सोचनीय स्थिति है. इस दिशा में अब सरकार के पीछे-पीछे दौड़ने या यह सोचने से की सरकार कुछ करेगी यह अपेक्षा छोड़ कर हमें स्वयं आगे आना होगा ताकि फिर आगे कोई ऐसी घटना घटित ना हो.

अंधविश्वास: झूठे आदर्श पाखंड को जन्म देते हैं

आदर्श पाखंड़ को जन्म देते हैं आप को यह पढ़ कर शायद हैरानी हो कि भारत में जितने भी जानेमाने धर्मगुरु हुए हैं, उन में से ज्यादातर किसी न किसी ठीक न हो सकने वाली बीमारी से पीडि़त रहे हैं या अभी भी हैं. जो दूसरों को यह उपदेश देते थे कि ओम का उच्चारण करते रहने से, ओम की जय करने से, प्राणायाम करने से रोग पास भी नहीं फटकते, पर वे खुद किसी न किसी बीमारियों से जरूर पीडि़त थे. इस की एक खास वजह है.

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब भी कोई इनसान अपनी किसी कुदरती इच्छा को दबाने की कोशिश करता रहता है, तो उस की वह इच्छा उस आदमी के अचेतन मन में चली जाती है. फिर वह किसी न किसी मनोकायिक (साइकोसोमैटिको) बीमारी को जरूर जन्म देने लगती है. जनवरी, 2022 में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक अस्पताल में तब हड़कंप मच गया, जब जिले के सौस गांव से एक विक्षिप्त बाबा को एंबुलैंस में लाया गया था. वह गांव में कभी कीचड़ में लोट जाता, तो कभी पेड़ों पर चढ़ जाता या ड्रामा करता. अस्पताल में भी वह बाबा नर्सिंग स्टाफ के सामने नंगा हो जाता, तो कभी वार्डबौयों पर हमला करने लगता. उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया.

पर सवाल है कि ऐसे हालात आए ही क्यों? इसलिए कि बाबाओं को कहा जाता है कि इच्छाओं को दबाओ और वे खुद बीमार हो जाते हैं. राजा हो या रंक, साधु हो या संत, कोई भी कुदरत के इस नियम से बच नहीं पाता. बढ़ती इच्छाओं को दबाने के खिलाफ सजा देने का कुदरत का यह एक ढंग है. आप देखोगे कि जो भी इनसान ?ाठे आदर्शों की चादर ओढ़ कर पाखंड वाली जिंदगी जी रहा होगा, वह किसी न किसी बड़ी बीमारी से भी जरूरत पीडि़त होगा. वह बीमारी ही उस की मौत की वजह भी बन जाती है. भारत में यह भी एक विडंबना ही है कि लोग किसी के चरित्र का मूल्यांकन केवल इस बात से लगाते हैं कि अमुक इनसान ने अपनी कामवासनाओं को कितना कंट्रोल में रखा हुआ है.

जो इनसान कामवासनाओं के बारे में खुले स्वभाव का होता है, उसे हम चरित्रहीन मानने लगते हैं और जो ब्रह्मचारी होने का ढोंग करता हो, उस की पूजा करने लगते हैं और उसे दानदक्षिणा भी देने लगते हैं. एक गलत सोच के चलते हिंदू धर्म में हजारों सालों में सब से ज्यादा अहमियत ब्रह्मचर्य को दी गई है. साधुसंन्यासी इसलिए भी समाज में इज्जत पा रहे हैं, क्योंकि वे ब्रह्मचर्य पालन का दावा करते हैं. जिस तरह एक पीएचडी डिगरी लेने वाला अपने नाम के साथ डाक्टर लिखने लगता है, उसी तरह कई साधुसंन्यासी समाज में ज्यादा से ज्यादा इज्जत पाने के लिए अपने नाम के साथ ‘बाल ब्रह्मचारी’ की डिगरी भी जोड़ देते हैं.

मजे की बात यह है कि पूरे संसार में भारतीय ही सब से ज्यादा कामुक हैं. वे एक साल में ही पूरे आस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर बच्चे पैदा कर देते हैं. भारतीयों के बिस्तर उन के खेतों से ज्यादा उपजाऊ माने जाते हैं. मनोवैज्ञानिक इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि जब भी कोई इनसान हठपूर्वक ब्रह्मचर्य साधने की कोशिश करने लगता है, तो कामुकता भी उस का पीछा करती रहती है, जो अपना रूप बदल कर सामने आती रहती है. ब्रह्मचर्य की साधना करने वाला दिनरात अपने कामकेंद्र के इर्दगिर्द ही जिंदगी बिताने लगता है. वह किसी जंगल में या गुफा में तपस्या कर रहा होगा, तो उस के सपनों में अप्सराएं आ कर उस की साधना भंग करने लगेंगी.

कुछ अज्ञानी लोगों ने सोचेसमझे बिना ही वीर्य के संबंध में कई तरह की गलत बातें फैला रखी हैं. कुछ शास्त्रों में यह भी पढ़ने को मिलता है कि इनसान अगर 32 किलो भोजन खाता है, तो उस से शरीर में 800 ग्राम रक्त बनता है. उस 800 ग्राम रक्त में से केवल 20 ग्राम वीर्य ही बनता है. पर मैडिकल जांचपड़ताल से यह पता चला है कि पुरुष के शरीर में वीर्य बनना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. जिस तरह से पाचक ग्रंथियां भोजन को पचाने के लिए पाचक रस छोड़ती रहती हैं, उसी तरह से यौन ग्रंथियां वीर्य बनाती रहती हैं. जब वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है, तो वीर्य सपनों के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है. यह कुदरत द्वारा बनाई गई एक आनंददायक व्यवस्था है.

पर धर्मशास्त्र व कुछ धर्मगुरु ऐसा प्रचार करते हैं कि लोग हमेशा डरे रहें. शरीर के अंदर वीर्य बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती ही रहती है, इसलिए जरूरत से ज्यादा वीर्य को शरीर के अंदर रोक पाना मुमकिन नहीं है. पर बहुत से लोग खासतौर पर धर्मगुरु इस सच को छिपाने के लिए कई तरह के ढोंग करने लगते हैं. अपने नाम के साथ ‘बाल ब्रह्मचारी’ लिखना भी ऐसा ही एक ढोंग मात्र है. जो लोग हठपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे होते हैं, वे भी इस उम्मीद में जी रहे होते हैं कि स्वर्ग में जा कर तो उन की देखभाल अप्सराएं करेंगी, जो उन की हर आज्ञा का पालन करेंगी. जब इनसान अपनी किसी इच्छा को हठपूर्वक दबा लेता है, तो वह इच्छा उस के मन में जा कर दब जाती है, फिर इनसान को उस दबी हुई इच्छा को पूरा करने के लिए किसी न किसी पाखंड का सहारा लेना पड़ता है. जो लोग गृहस्थी त्याग देते हैं, वे आश्रम या कुटिया बना कर रहने लगते हैं.

जिन औरतों के पति नामर्द होने के कारण बच्चा पैदा नहीं कर सकते, उन्हें अपने आश्रम में अकेले में बुला लेते हैं. अपनी दबी हुई काम इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही तंत्र साधना के नाम पर औरतों की पूजा करने लगते हैं और तंत्र के नाम पर यौन क्रियाओं में लग जाते हैं. धर्मगुरुओं के आश्रमों में ऐसी बातें हमेशा होती ही रहती हैं, क्योंकि यह सब धर्म के नाम पर होता है, इसलिए लोग इन्हें चुपचाप सहन कर लेते हैं. भारत में कई धर्मगुरु यह ढोंग भी करते रहते हैं कि वे तो पैसों को हाथ तक नहीं लगाते. पर जब ये विदेशों में जाते हैं, तो वहां करोड़ों रुपयों में खेलने लगते हैं. महंगी से महंगी कारें खरीद लेते हैं. पांचसितारा आश्रमों को बना लेते हैं. हिंदू समाज ने समाधि लगाने को भी बहुत इज्जत दे रखी है, इसलिए कई साधुसंत यह ढोंग करने लगते हैं कि वे समाधि की उच्च अवस्था को भी हासिल हो चुके हैं.

कई तो अपने नाम के साथ भी ‘समाधिनाथ’ तक लिखने लगते हैं. लोेगों को प्रभावित करने के लिए वे अपनी समाधि का खूब प्रचार करते हैं और करवाते हैं. आम लोगों को प्रभावित करने के लिए वे कुछ दिनों के लिए खुद को मिट्टी में दबा लेते हैं, फिर जिंदा बाहर निकल आते हैं. अंधविश्वासी लोग इस काम को एक चमत्कार मान कर उन्हें खूब दानदक्षिणा देते हैं. इस मौके और हमदर्दी का फायदा उठा कर मंदिर बनाने के नाम पर लाखों रुपए जमा कर लिए जाते हैं. किंतु भोलेभाले लोग यह सम?ा ही नहीं पाते कि ऐसे काम केवल जादू दिखाने जैसी ट्रिक की मदद से ही किए जाते हैं. चमत्कार या भगवान को पाने से इस का कोई संबंध नहीं होता. ऐसे लोग प्राणायाम व सांसों को काबू में करने की कला सीख कर ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं. साइबेरिया के बर्फीले प्रदेश के भालू 6 महीने तक खुद को बर्फ में ही दबा कर सोए रहते हैं. बरसात के बाद मेढक जमीन के नीचे ही दबे पड़े रहते हैं. ठंड से बचने के लिए सांप भी खुद को मिट्टी के नीचे दबाए रखते हैं. इस से उन की कोई समाधि नहीं लग जाती.

कुछ दिन जमीन के नीचे दबे रहने का समाधि से कोई संबंध नहीं होता. एक धर्मगुरु का बायां हाथ काम नहीं करता था. इस विकलांगता को भी उन्होंने समाधि के नाम पर खूब भुनाया. वे बारबार कहते रहते थे कि जब वे समाधि में बैठे थे, तो उन के इस हाथ को दीमक लग गई थी. बहुत से धर्मगुरु अपने झूठे दावों का पाखंड कर के नाम कमाने में लगे रहे हैं. उन झूठे दावों को साबित करने के लिए उन्होंने कई तरह के इंतजाम कर रखे होते हैं. आप को अपने चारों ओर कई साधुसंन्यासी ऐसे मिल जाएंगे, जिन का बरताव पागलों जैसा होता है. कुछ तो छोटीछोटी बातों पर भी गुस्सा हो जाते हैं. भोलेभाले लोग यह सम?ाने लगते हैं कि इन पर भगवान का उन्माद छाया हुआ है, इसीलिए वे ऐसा बरताव कर रहे हैं. पर वे यह नहीं जानते हैं कि भगवान की कोई खुमारी नहीं होती. ऐसे लोग केवल मनोवैज्ञानिक वजहों से ही बीमार होते हैं.

ससुर-बहू के नाजायज संबंध, दुखद होता है अंत

आखिरकार कुंदन कुमार ने खुदकुशी कर ली. शायद इस बुजदिली के अलावा उसे कोई और रास्ता सूझ नहीं रहा था. जब अपने ही बेवफाई और बेईमानी करते हैं, तो एक समय के बाद नफरत खुद की बेबसी पर भी होने लगती है. फिर कुछ दिनों बाद जिंदगी बेमानी लगने लगती है. यही सब कई दिनों से कुंदन कुमार के साथ हो रहा था, जिस ने बीवी की बेवफाई और चाचा की मनमानी की सजा खुद को देते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिया. पटना बाजार इलाके के गांव कुरथौल के रहने वाले इस नौजवान की बीवी किसी जवान आशिक या पुराने यार के साथ नहीं,

बल्कि अपने ही चाचा ससुर जसवंत सिंह के साथ भाग गई थी. पीछे रह गए थे मां के लिए बिलखते 2 मासूम बच्चे और बीवी की इस हरकत पर कलपता कुंदन कुमार, जिस की दुनिया में अंधेरा छा गया था. 22 मई, 2022 को जहर खाने के पहले कुंदन कुमार इंसाफ पाने के लिए पुलिस थाने गया था, लेकिन वहां से भी उसे दुत्कार कर भगा दिया गया था. कुंदन कुमार की बीवी और चाचा में कब और कैसे जिस्मानी संबंध बन गए थे, इस की उसे भनक भी नहीं लगी. घर का बुजुर्ग होने के नाते गांव में ही रहने वाले जसवंत सिंह का घर में आनाजाना आम था.

कुंदन कुमार का माथा उस समय ठनका था, जब गांव के ही कुछ लोगों से उस ने इस बाबत सुना. पहले तो कुंदन कुमार को यकीन ही नहीं हुआ कि पिता समान चाचा अपनी बेटी समान बहू के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है और पत्नी की रजामंदी भी इस में है, पर जब यह सच निकला तो वह तिलमिला उठा. बेकार गया समझाना कुंदन कुमार ने बारीबारी से चाचा और पत्नी को समझाया कि यह ठीक नहीं है, रिश्तों की मानमर्यादा के खिलाफ है, लेकिन इश्क में गले तक डूबे इस बेमेल जोड़े के कानों पर जूं भी नहीं रेंगी. हद तो तब हो गई, जब टोकने पर जसवंत सिंह ने उसे जान से मारने की धमकी दे डाली. बात चूंकि पहले से फैल चुकी थी,

इसलिए कुंदन कुमार ने पुलिस की मदद लेनी चाही, पर वहां से भी निराशा ही हाथ लगी, तो दूसरे जो हकीकत में अपने थे, के गुनाह और गलती की सजा उस ने खुद को दे डाली. कुंदन कुमार की मौत के बाद गांव वालों ने पुलिस के निकम्मेपन और लापरवाही के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उस की पत्नी और चाचा के खिलाफ खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर लिया. अफसोस और हैरत की बात तो यह भी थी कि जो लोग ‘हायहाय’ कर रहे थे, उन में से कुछ थाने से लौटते समय उस पर ताने भी कस रहे थे. बात बहुत जल्द आईगई हो गई, लेकिन कई सवाल अपने पीछे छोड़ गई है कि आखिर क्यों ससुरबहू में जिस्मानी संबंध बन जाते हैं और इस हद तक हो जाते हैं कि वे आपस में नए लड़केलड़कियों जैसा इश्क करने लगते हैं?

क्यों प्यार में डूबे ससुरबहू को दीनदुनिया, की परवाह नहीं रहती है? कहने को तो कहा जा सकता है कि ‘दिल तो है दिल, दिल का एतबार, क्या कीजे… आ गया जो किसी पे प्यार, क्या कीजे…’ लेकिन ऐसा प्यार क्या वाकई प्यार होता है और उसे जायज करार देना चाहिए, जो अपने ही बेटे की गृहस्थी पर डाका डाले? यही प्यार किसी की हत्या और खुदकुशी की वजह बन जाए और इस से किसी को कुछ हासिल न हो, तो इसे प्यार क्या खा कर कहा जाए. इसे सिर्फ सैक्स की हवस कह कर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक बार समझाने या धमकाने पर हमबिस्तरी करने का सिलसिला रुकना मुमकिन है, लेकिन यह बात प्यार पर लागू नहीं होती,

जिस के चलते आशिक और माशूक वाकई अंधे हो जाते हैं और समझाइश के दायरे से काफी दूर हो चुके होते हैं. कत्ल ही कर दिया कुंदन कुमार की तरह की ही कहानी राजस्थान के अलवर के बहरोड़ इलाके के रहने वाले विक्रम सिंह की है, जिस की हत्या उस के पिता बलवंत सिंह और पत्नी पूजा ने मिल कर की थी. 5 मार्च, 2022 की रात के तकरीबन 3 बजे सैक्स के लिए तड़प रहा बलवंत सिंह अपने बेटेबहू के कमरे में गया और आहिस्ता से 29 साला पूजा को बुलाया, जो तुरंत चाबी भरी गुडि़या की तरह अपने 62 साल के ससुर के पीछेपीछे चल दी और ससुर के कमरे में पहुंचते ही उन दोनों ने रासलीला शुरू कर दी. लेकिन इस बार बेसब्र हो रहे ससुरबहू यह नहीं देख पाए कि विक्रम सिंह भी जाग गया है और दबे पैर उन के पीछे आ रहा है. पिता के कमरे का जो सीन विक्रम सिंह ने देखा, वह उस के लिए किसी सदमे से कम नहीं था. पूजा और बलवंत सिंह सबकुछ भूलभाल कर एकदूसरे से इस तरह से लिपटे थे कि अब कभी एकदूसरे से अलग ही नहीं होंगे. विक्रम सिंह का खून खौला,

लेकिन अपनेआप को काबू करते हुए वह किसी तरह अपने कमरे में आ गया. अभी विक्रम सिंह सोच ही रहा था कि यह क्या हो रहा है और वह क्या करे, तभी बलवंत सिंह और पूजा आ गए. उन दोनों ने उसे जकड़ा और दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अलवर के नामी कारोबारी बलवंत सिंह सुबह रोजाना की तरह सैर पर निकल गए, जिस से लोग उन्हें देख लें और पूजा भी घर के कामकाज में ऐसे लग गई मानो कुछ देर पहले उस ने पति को नहीं, बल्कि कान पर भिनभिनाते मच्छर को मारा हो. योजना के मुताबिक, उन दोनों ने फोन से जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों को विक्रम सिंह की मौत की खबर देते हुए रोनेधोने का कामयाब ड्रामा किया.

इन की साजिश भी कामयाब हो जाती, लेकिन शव यात्रा में शामिल आए लोगों का माथा यह देख कर ठनका कि किसी को भी विक्रम सिंह का चेहरा नहीं दिखाया जा रहा है. यह बात चोर की दाढ़ी में तिनका सरीखी थी, क्योंकि मरने वाले के अंतिम दर्शन आम रिवाज है. शक होने पर पूजा के ही भाई ने पुलिस वालों को फोन कर दिया. छानबीन और पूछताछ में उन दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. उजागर यह भी हुआ कि बलवंत सिंह की पत्नी की मौत 2 साल पहले हुई थी, तभी से इन दोनों में नाजायज संबंध बन गए थे. रईसों के इस घर में 64 लाख रुपए भी तिजोरी में रखे थे, जो बलवंत सिंह को एक जमीन बेचने के बाद मिले थे. मुमकिन है कि यह भारीभरकम नकदी भी इस वारदात की वजह रही हो. बलवंत सिंह जैसे विधुर बूढ़ों की सैक्स की भूख कैसे मिटे,

यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन बहू को अपने जाल में फंसा कर इसे शांत किया जाए, तो अंत दुखद होना कुदरती बात है, क्योंकि कोई बेटा यह बरदाश्त नहीं कर सकता कि उस के पिता और पत्नी आपस में सैक्स संबंध बनाते हुए उसे धोखा दें. प्यार या हवस कुंदन कुमार की मौत के बाद जितनी हैरानी कुरथौल गांव के लोगों को हुई थी, उतनी ही हैरानी अलवर शहर के लोगों को विक्रम सिंह की हत्या पर हुई थी. ऐसी खबरें, जिन में पूरा घर बरबाद हो जाता है, सोचने को मजबूर करती हैं कि आखिर यह प्यार था या हवस थी? देखा जाए, तो ऐसे संबंधों में दोनों ही चीजें बराबरी से रहती हैं. 1-2 बार ये संबंध भले ही लिहाज और दबाव में बनते हों, लेकिन फिर धीरेधीरे ससुरबहू दोनों को ही हमबिस्तरी की लत या आदत कुछ भी कह लें, पड़ जाती है और इस में उन्हें इतना मजा आने लगता है कि वे किसी अंजाम की परवाह नहीं करते हैं. यहां से पैदा होता है एक जुर्म,

फिर भले ही वह कुंदन कुमार की खुदकुशी हो या विक्रम सिंह की हत्या हो. ससुरबहू के नाजायज संबंध कभी हैरानी की बात नहीं रहे, कम से कम इस लिहाज से तो कतई नहीं कि ये एक मर्द और एक औरत के बीच कायम होते हैं, लेकिन चूंकि ये सभी के लिए नुकसानदेह साबित होते हैं, इसलिए ससुरबहू को इन के अंजाम पर गौर करते हुए इन्हें पनपने ही नहीं देना चाहिए और अगर पनप चुके हों तो तुरंत इन पर लगाम लगा देनी चाहिए. एकांत के मौके इफरात से मिलते हैं और कोई आसानी से शक नहीं करता, पर इस का बेजा फायदा उठाना अकसर बड़ी परेशानी का सबब बन जाता है. सच यह भी है कि पति के निकम्मे, आवारा, नशेड़ी, बेरोजगार, दब्बू या नामर्द होने पर ऐसे संबंधों के पनपने में सहूलियत रहती है. पत्नी को सैक्स की भूख मिटाने के लिए कहीं और नहीं ताकना पड़ता,

वह आसानी से ससुर से ही आशनाई कर बैठती है, लेकिन गलत आखिर गलत ही होता है, इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. वह दौर और था, जब बचपन में बेटे की शादी हो जाती थी और ससुर की उम्र 35-40 साल होती थी. घर का मुखिया होने के नाते वह बहू से जोरजबरदस्ती करता भी था, तो किसी की हिम्मत उसे रोकनेटोकने की नहीं होती थी. लेकिन अब बहुतकुछ बदल जाने के बाद भी इन नाजायज ताल्लुकात का सिलसिला थम नहीं रहा है, तो जरूरत जागरूकता और समझ की है कि राज आज नहीं तो कल खुलना ही है और एक अपराध होना तय है, तो क्यों न अभी से संभला जाए. द्य ड्डनहीं बनना ससुर के बच्चे की मां ससुर अगर जोरजबरदस्ती करे, तो बहू ज्यादा विरोध नहीं कर पाती. ऐसा ही कुछ ग्वालियर के नजदीक मालनपुर की सुमित्रा (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ. उत्तर प्रदेश के जालौन की सुमित्रा की शादी जून, 2021 में हुई थी. शुरू के कुछ दिन तो हंसीखुशी से बीते, लेकिन जल्द ही ससुर की नीयत उस की जवानी और खूबसूरती पर डोलने लगी.

13 फरवरी, 2022 को ससुर ने जबरदस्ती उस से शारीरिक संबंध बनाए, जिस से वह पेट से हो आई. यह बात उस ने घर वालों को बताई, तो बवंडर मच गया. अपनी गैरत बचाने और ससुर की हैवानियत उजागर करने के लिए सुमित्रा ने ग्वालियर हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए आपबीती बताई व बच्चा गिराने की इजाजत मांगी. 22 मई, 2022 को कोर्ट ने उस से हलफनामा मांगा है कि वाकई उस के पेट में पल रहे बच्चे का पिता उस का ससुर है और अगर बच्चा ससुर का नहीं हुआ, तो उस पर ससुर की इज्जत पर कीचड़ उछालने और बच्चे की हत्या करने का मुकदमा चलाया जाएगा. हाईकोर्ट ने यह सख्ती इसलिए भी बरती है कि कुछ मामलों में बहुत सी औरतें नजदीकी रिश्ते के किसी मर्द पर ऐसे ही आरोप लगा कर बाद में मुकर गईं.

अब देखना दिलचस्प होगा कि सुमित्रा क्या करती है. वैसे, सटीक तरीका डीएनए टैस्ट का है, जिस से यह पता चल जाता है कि बच्चा किस का है. यह इसलिए भी जरूरी है कि कोई औरत झूठा हलफनामा भी दे सकती है. सुमित्रा जैसी बहुओं को चाहिए कि वे ससुर की जोरजबरदस्ती का समय रहते विरोध करें और तुरंत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराएं. ससुरबहू ने की शादी हर मामले में यह जरूरी नहीं है कि बहू के साथ संबंध ससुर द्वारा उसे डराधमका कर, लालच दे कर या बहलाफुसला कर ही बनाए जाते हैं, बल्कि कई बार बहू खुद ससुर के प्यार में अंधी हो जाती है. ऐसा ही एक अजीबोगरीब मामला पिछले साल जून महीने में राजस्थान के अलवर में देखने में आया था, जब 52 साल के ससुर प्रभाती लाल ने अपनी 29 साल की बहू लाली देवी से शादी कर ली थी.

काम उन्होंने गुपचुप नहीं किया था, बल्कि पहले दिल्ली जा कर आर्य समाज मंदिर में सात फेरे लिए और फिर शादी रजिस्टर्ड कराने के लिए तीस हजारी कोर्ट भी गए थे. प्यार होने के बाद वे दोनों दिल्ली के द्वारका इलाके के सैक्टर-3 में जा कर किराए के मकान में बाकायदा मियांबीवी की तरह रहने लगे थे. उन्होंने समझदारी दिखाते हुए तमाम कानूनी एहतियात बरते थे. लाली देवी ने अलवर में ही अपने पति पर मारपीट का आरोप लगाते हुए उस से तलाक ले लिया था और बहू के प्यार में पड़े प्रभाती लाल ने भी अपनी बीवी को तलाक दे दिया था यानी शादी पर एतराज जताने की कोई वजह नहीं छोड़ी थी. दिलचस्प बात लाली देवी का 2 बच्चों की मां होना है. अब इस रिश्ते पर कोई उंगली नहीं उठा सकता है. यह और बात है कि दादा प्रभाती लाल ही अपनी बहू लाली देवी के बच्चों का पिता बन गया है और वह अपने ही पति की मां बन गई है. बहू को जायज और कानूनी तौर पर पत्नी बनाने का देश का यह पहला उजागर मामला है.

धर्म बना देता है लोगों को गुलाम

सुप्रीम कोर्ट चाहे लाख कह ले कि हर वयस्क को प्रेम व विवाह का मौलिक अधिकार है और किसी बजरंगी, किसी खाप, किसी सामाजिक या धार्मिक गुंडे को हक नहीं कि इस अधिकार को छीने, मगर असल में धार्मिक संस्थाएं विवाह के बीच बिचौलिए का हक कभी नहीं छोड़ेंगी. विवाह धर्म की लूट का वह नटबोल्ट है जिस पर धर्म का प्रपंच और पाखंड टिका है और इस में किसी तरह का कंप्रोमाइज कोई भी धर्म नहीं सहेगा, सुप्रीम कोर्ट चाहे जो कहे.

जो भी धर्म के आदेश के खिलाफ जा कर शादी करेगा, सजा सिर्फ उसे ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तेदारों को भी मिलेगी. सब को कह दिया जाएगा कि इस परिवार से कोई संबंध न रखो. कोई पंडित, मुल्ला, पादरी शादीब्याह न कराएगा. श्मशान में जगह नहीं मिलेगी, लोग किराए पर मकान नहीं देंगे, नौकरी नहीं मिलेगी.

धर्म का जगव्यापी असर है. जब लोग 7 समंदर पार रहते हुए भी कुंडली मिलान के बाद विवाह करते हों, गोरों व कालों की कुंडली भी बनवा लेते हों ताकि सिद्ध किया जा सके कि धर्म, रंग और नागरिकता अलग होने के बावजूद विवाह विधिविधान से हुआ है, तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट की फुसफुसाहट हिंदुत्व के नगाड़ों के बीच खो जाएगी.

पारंपरिक शादियां चलती हैं, तो इसलिए कि शादी चलाना पतिपत्नी के लिए जरूरी होता है, उन का कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड, धर्म से कोई मतलब नहीं होता. शादी दिलों का व्यावहारिक समझौता है. एकदूसरे पर निर्भरता तो प्राकृतिक जरूरत है ही, सामाजिक सुरक्षा के लिए भी जरूरी है और इस के लिए किसी धर्मगुरु के आदेश की जरूरत नहीं. यदि प्यार हो, इसरार हो, इकरार हो, इज्जत हो तो कोई भी शादी सफल हो जाती है. बच्चे मातापिता पर अपनी निर्भरता जता कर किसी भी बंधन को, शादी को ऐसे गोंद से जोड़ देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, कानून या कुंडली की जरूरत नहीं.

कुंडली, जाति, गोत्र, सपिंड के प्रपंच पंडितों ने जोड़े हैं, ये धर्म की देन हैं, प्राकृतिक या वैज्ञानिक नहीं. शादी ऐसा व्यक्तिगत कृत्य है जो व्यक्ति के जीवन को बदल देता है और धर्म इस अवसर पर मास्टर औफ सेरिमनीज नहीं मास्टर परमिट गिवर बन कर पतिपत्नी को जीवन भर का गुलाम बना लेता है.

शादी में धर्म शामिल है, तो बच्चे होने पर उसे बुलाया जाएगा और तभी उसे धर्म में जोड़ लिया जाएगा ताकि वह मरने तक धर्म के दुकानदारों के सामने इजाजतों के लिए खड़ा रहे.

विधर्मी से विवाह पर धर्म का रोष यही होता है कि एक ग्राहक कम हो गया है. चूंकि दूसरे धर्म का ग्राहक भी कम होता है, दोनों धर्मों के लोग एकत्र हो कर इस तरह के विवाह का विरोध करते हैं. आमतौर पर शांति व सुरक्षा तभी मिलती है जब पति या पत्नी में से एक धर्म परिवर्तन को तैयार हो.

अगर उसी धर्म में गोत्र या सपिंड का अंतर भुला कर शादी हो रही हो तो धर्म के दुकानदारों के लिए दोनों को मार डालने के अलावा कोई चारा नहीं होता. शहरों में तो यह संभव नहीं होता पर गांवों में इसे चलाना आसान है, संभव है और लागू करा जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट चाहे जितना कह ले, जब तक देश में धर्म के दुकानदारों का राज है और आज तो राज ही वे कर रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन आ चुके हैं, जैसा है.

नारी दुर्दशा का कारण धर्मशास्त्र और पाखंड

नारी को आज भी दोयम दर्जे का ही नागरिक समझा जाता है.सदियों से इनके ऊपर कई माध्यमों से जुल्म ढाने की परंपरा निरन्तर जारी है. इसमें धर्मशास्त्रों और पण्डे पुजारियों का भी अहम योगदान रहा है.

नारी के ऊपर शोषण और जुल्म में स्वयं नारी लोग ही मददगार की भूमिका में हैं.समाज में रिवाज और धर्म का पाठ पढ़ाकर नारियों को जुल्म के रसातल में डुबो दिया है. धर्म का कानून बनाने वाले मनु ने लिखा है,  ”स्त्री शूद्रों न धीयताम” यानी स्त्री और शूद्र को शिक्षा नहीं देनी चाहिए. अंधभक्त महिलाएं इन्हें ही अपना भगवान का हुक्म मानती हैं.

प्राचीन संत शंकराचार्य ने लिखा है, ”नारी नरकस्य द्ववारम”, यानी नारी नरक का दरवाजा है. लेकिन शायद उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इसी नरक के दरवाजे से तुम भी पैदा हुवे है. तुलसीदास ने जिसे उनकी पत्नी ने दुत्कार दिया था, लिखा है, ”अधम ते अधम, अधम अति नारी’, भ्राता पिता पुत्र उर गारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी.”

“होहिं विकल सक मनहिं न रोकी,जिमि रवि मणि द्रव रविही विलोकि”

अथार्त चाहे भाई हो ,चाहे पिता हो,चाहे पुत्र हो नारी को अच्छा लगने पर वह अपने को रोक नहीं पाती जैसे रविमणि, रवि को देखकर द्रवित हो जाती है, वैसी ही स्थिति नारी की हो जाती है. वह संसर्ग हेतु ब्याकुल हो जाती है.

“राखिअ नारि जदप उर माही।जुबती शास्त्र नृपति बस नाही”

अथार्त स्त्री को चाहे ह्रदय में ही क्यों न रख लो तो भी स्त्री शास्त्र,और राजा किसी के वश में नहीं रहती है. नारी को पीड़ा दिलवाने में तुलसीदास की इस  चौपाई ने आग में घी का काम किया है, ”ढोल गंवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”

धर्मग्रन्थों में नारियों और दलितों के ऊपर शोषण जुल्म के प्रपंचो से पूरा भरा हुआ है.इस साजिश और छल प्रपंच को आज तक दलित और महिलाएं समझ नही पाईं हैं. उनके ही समझाई में आज भी बहुत बड़ी आबादी चलने को विवश है. स्वर्ग नरक पुनर्जन्म भाग्य भगवान की पौराणिकवादी संस्कृति में फंसकर अगला जन्म सुधारने के चक्कर में नारियां स्वयं को पुरुष की दासी समझते हुवे अन्याय कष्ट सहकर भी झूठे गौरव का अनुभव करती है. माता पिता भी बेटियों को पराया धन समझकर कन्यादान करके उन्हें अन्यायपूर्ण जीवन जीने को विवश करते हैं. दहेज,कन्यादान,सतीप्रथा,देवदासी प्रथा, पर्दाप्रथा, योनिशुचिता प्रथा, वैधब्य जीवन आदि नारी विरोधी प्रथाएँ धर्म की देन हैं.

इन प्रथाओं को  ग्रन्थों ने खूब महिमामण्डित किया है.  बेवकूफ अंधविश्वासी पिताओं की सनक पर बेटियों की कुर्बानी को स्वयंबर का नाम दिया गया. जुए के दांव पर नारियां लगाई गईं. बच्चे   पाने के लिए जबरन ऋषियों को सौंपी गईं.

नारियों की सहने से ज्यादा दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने औरतों की पढ़ाई और सामाजिक आजादी के लिए काम किया.

1955-56 में नए हिन्दू कानूनों से भारतीय नारियों का बहुत बड़ा उपकार किया. जिन लोगों ने नारियों की भलाई के लिए काम किया आज की औरतें उनका नाम तक नहीं जानतीं. जिन शास्त्रों और पौराणिकवादी व्यवस्था ने इन पर जुल्म ढाए उनकी ही पूजा अर्चना आज तक महिलायें करती हैं.

पढ़ी लिखी औरतें भी व्रत, उपवास और गोबर तक की पूजा करती आ रही हैं और आज भी बदस्तूर जारी है.

गीता प्रेस की पुस्तक है,  ”गृहस्थ में कैसे रहें”  जिसके लेखक रामसुखदास हैं. इस पुस्तक में प्रश्न उतर के माध्यम से बताया गया है कि हिन्दू महिलाओं को कैसे जीवन जीना चाहिए. उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत कर रहें हैं.

प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए ?

उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न लें जाएं तो वह क्या करें ?

उत्तर: फिर तो उसे पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए. इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है? उसको पति की मार धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए. सहने से पाप कट जाएंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाए. यदि वह पति की मार पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिए और अलग रह कर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुवे एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिए.

इस पुस्तक में सैकड़ों इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर है जिसमें हिंदू परिवारों को दिशा निर्देश दिए गए हैं.

यह पुस्तक सती का समर्थन करती है और महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने की वकालत करती है. हिन्दू वादी संगठनों द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर आवाज उठाई जाती है. अगर यह देश हिंदू राष्ट्र बनता है तो क्या नारियों के ऊपर इसी तरह के कानून लागू किये जायेंगे? पड़ोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश में कट्टरवादी मुस्लिम संगठन भी इसी तरह की सोच रखते हैं. मुस्लिम धर्म में भी तीन तलाक, हलाला और पर्दा प्रथा जैसी दकियानूसी बातें हैं और उसका समर्थन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग करते हैं.इन कुप्रथाओं पर जब सवाल उठाये जाते हैं तो इस्लाम धर्म को मानने वाले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन मौत का फतवा जारी करते हैं. क्या हिंदू राष्ट्र में ऐसा ही होगा?

आज औरतों पर शोषण और जुल्म ढाने का हथियार के रूप में इन धार्मिक पुस्तकों का उपयोग किया जाता है.इसे बढ़ावा देने और प्रचार प्रसार करने में साधू,  महात्मा, पंडे,  पुजारी, मुल्ला लोग लाखों की संख्या में एजेंटों के रूप में कार्य कर रहे हैं.

देश के कोने कोने से महिलाओं के साथ अपने पति द्वारा जुआ में हारने जैसी कुकृत्य, अत्याचार ,अनाचार और बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आते रहती है जिन पर सहज रूप से विश्वास भी नहीं होता.

इस तरह की एक घटना जौनपुर जिला के जफराबाद थाना क्षेत्र के शाहगंज की  है. एक जुआरी शराबी पति ने सारे रुपये हारने के बाद अपने पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया. वह जुए में अपनी पत्नी को हार गया. इसके बाद उसके जुआरी दोस्तों ने उसके पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

दूसरी घटना कानपुर की है. जुआ खेलने के एक शौकीन पति ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. दांव हारने पर उसके चार दोस्तों ने उसके पत्नी पर हक जमाते हुए सामूहिक दुष्कर्म करना चाहा लेकिन बीबी किसी तरह किचन में घुस गई और उसने पुलिस को फोन कर दिया. तत्काल में पुलिस आ जाने की वजह से तारतार हो रही इज्जत बच गई.

महाभारत में द्रौपदी को जुए में हारने की घटना सर्वविदित है. आज भी दीवाली जैसे त्यौहार में संस्कृति और परम्परा के नाम पर जुआ खेलने का रिवाज सभ्य समाज तक में भी बरकरार है. सड़ी गली परम्परा को आज भी हम अपने कंधों पर ढो रहे है.

औरतों के ऊपर शोषण और जुल्म का समर्थन औरतों द्वारा ही किया जाता है. एजेंट के रूप में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

हर गाँव मे धार्मिक गुरुओं  द्वारा शिव चर्चा,  माता की चौकी, जागरण, हवन और प्रवचनों की बाढ़ सी आ गयी है जिसमें महिलाओं की हीउपस्थिति अधिक होती है. शुद्ध घी अपने परिवारवालों को नहीं खिला कर अंधभक्ति में जलाया जा रहा है.

अपने बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करके धार्मिक कर्मकांडों पर अपनी मेहनत की कमाई महिलाएं खर्च कर रही हैं. पूजा पाठ, व्रत उपवास में महिलाएं रोबोटों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं. हवनों, यज्ञों में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है. शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है .

गांव गांव में मंदिर और मस्जिद बन रहे हैं. ज्ञान का केंद्र पुस्तकालय जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में थे मृतप्राय हो गए हैं. आपसी बातचीत भी खत्म होने की कागार पर है.

गांवो में सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों की हालत बहुत चिंतनीय है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ज्ञान का केंद्र जब नेस्तनाबूद होगा तो समाज मे अंधविसश्वास और धार्मिक पाखण्डों का मायाजाल बढ़ेगा ही. धार्मिक पाखण्डों को बढ़ावा देने में केंद्र की सरकार और चारण गाने वाले मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका में है.

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