ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

पी .के . अर्थात प्रशांत किशोर जिन्हें आज भारतीय राजनीति की शतरंज का बाजीगर या चाणक्य कह सकते हैं- विक्रम और बेताल किस्से की तरह  आज देश की बहुचर्चित महिला नेत्री मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की पीठ पर बैठकर राजनीतिक सत्ता के प्रश्नों में ममता बनर्जी को कुछ इस तरह उलझाने कहें सुलझाने में लगे हैं कि देश में एक उथल-पुथल का दौर चल पड़ा है.

प्रशांत किशोर के सानिध्य में ममता बनर्जी अब देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हस्ती बतौर विपक्ष का केंद्र बनना चाहती हैं. प्रशांत किशोर का सीधा साधा गणित  है कि 2014 के बाद जिस तरह अधिकांश चुनाव में कांग्रेस खेत रही है ऐसे में कांग्रेस का विकल्प आज के समय में तृणमूल कांग्रेस ही है. जिस तरीके से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने शतरंज की बाजी बतौर राजनीतिक खेल खेला था उसमें ममता बनर्जी का जीतकर के सामने आना अद्भुत चमत्कारी कहानी जैसा है.

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हर कोई यही मान रहा था कि नरेंद्र मोदी के चक्रव्यूह में फंसकर के ममता बनर्जी राजनीति से हाशिए में जाना तय है. भाजपा हर हालात में पश्चिम बंगाल पर अपना  झंडा फहराएगी. ममता बनर्जी के तेवर  कुछ देश के मिजाज के कारण भाजपा तिनके की तरह उखड़ कर उड़ गई.

आज के हालात में आगामी 2024 के संसदीय चुनाव के मद्देनजर ममता बनर्जी कि यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो चुकी है की कांग्रेस का विकल्प सिर्फ तृणमूल कांग्रेस है. और भाजपा को सीधी चुनौती सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी इस देश में दे सकती हैं.

इस महत्वपूर्ण विषय पर आज हम इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे प्रश्नों को आपके समक्ष रख रहे हैं जिसकी बिनाह पर आप यह तय कर सकते हैं कि क्या सचमुच ममता बनर्जी नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भाजपा के कद को बौना साबित करने में सफल हो सकती है. अथवा ममता बनर्जी की महत्वकांक्षा के कारण एक बार फिर नरेंद्र दामोदर दास मोदी को सफलता मिल जाएगी.

सुब्रमण्यम स्वामी का सर्टिफिकेट!

ममता बनर्जी ने जिस तरीके से अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को चुनौती दी है वह अपने आप में प्रासंगिक  है.

यही कारण है कि जहां उन्हें सुब्रमण्यम स्वामी जैसे उथल-पुथल मचाने वाले राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने एक तरह से छवि बनाने में मदद की है, वहीं महाराष्ट्र में राजनीति के शरद पवार ने भी साथ खड़ा होने का संकेत दे दिया है.

दरअसल, कांग्रेस आज जिस तरीके से अपने ही मकड़जाल में उलझी हुई है वह एक संक्रमण का समय कहा जा सकता है. कांग्रेस राहुल और सोनिया गांधी के बीच झूल रही है, राहुल गांधी किसी पद पर नहीं होने के बावजूद हर एक मुद्दे पर बोल रहे हैं और अपना डिसीजन दे रहे हैं. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कुछ नया करना चाहती है. दूसरी तरफ कांग्रेस के  बड़े चेहरे कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद जैसे 23 नेता अपना एक अलग राग अलाप रहे हैं डफली बजा रहे हैं. परिणाम स्वरूप कांग्रेस की स्थिति लंबे राजनीतिक समय काल में सबसे कमजोर स्थिति में आ चुकी है कांग्रेस कुछ थकी हुई और उलझी हुई दिखाई दे रही है. भाजपा को जिस तरीके से घात प्रतिघात एक विपक्ष के द्वारा दिया जाना चाहिए कांग्रेस उसमें कमतर बनी हुई है.

ऐसे में निसंदेह राजनीतिक महत्वाकांक्षा  जागृत होनी ही है और यह समय की मांग भी कही जा सकती है. ममता बनर्जी ने जिस तरीके से विपक्ष के गठबंधन पर सवाल उठा दिया है और ताल ठोक के भाजपा और नरेंद्र दामोदरदास मोदी के खिलाफ बिगुल बजाया है उससे सबसे ज्यादा सकते में कोई है तो वह कांग्रेस पार्टी ही है. क्योंकि यह सीधे-सीधे उसे चुनौती मिल रही है की सत्ता सिंहासन खाली करो की ममता बनर्जी आ रही है!

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शायद यही कारण है कि कांग्रेस आज मुखर हो करके ममता बनर्जी पर हमला कर रही है. मगर आने वाले समय में अगर कांग्रेस ने अपने आप को अपनी जमीन पर मजबूती से खड़े होकर के अपनी “ताकत” नहीं दिखाई तो उसे उखड़ कर ममता बनर्जी को अथवा अरविंद केजरीवाल को रास्ता देना होगा, यह समय की मांग बन जाएगी.

देश की राजनीति में कई कई बार उथल-पुथल मचाने वाले और एकला होते हुए भी अपने अस्तित्व को एक राष्ट्रीय पार्टी की ताजा प्रदर्शित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने एक बड़ी गहरी बात कही है की राजनीतिक इतिहास में उन्होंने – जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, राजीव गांधी पीवी नरसिम्हा राव और मोरारजी  भाई देसाई जैसा कथनी और करनी में आज की राजनीति में किसी को पाया है तो वह ममता बनर्जी है.

सुब्रमण्यम स्वामी का यह सर्टिफिकेट ममता बनर्जी के लिए बहुत काम आने वाला है. क्योंकि आज की राजनीति में सबसे बड़ा संकट कथनी और करनी का ही है. ममता बनर्जी जिस तरीके से सादगी पूर्ण जीवन जी रही है वह देश की जनता को अपील करता है और अपनी और आकर्षित करता है उनमें महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी जैसे व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती है. आने वाले समय में जिस तरीके से तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ बनाने में लगी हुई है उसका सकारात्मक परिणाम भी आ सकता है कि भारतीय जनता पार्टी केंद्र से उखड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

भारतीय जनता पार्टी की हार: नहीं चला धार्मिक खेल

पश्चिम बंगाल ही नहीं, तमिलनाडु और केरल में भी भारतीय जनता पार्टी की हार से यह साबित हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी का ऊंचनीच और भेदभाव वाला खेल कम से कम कुछ राज्यों में तो नहीं चलेगा. पश्चिम बंगाल में जिस तरह से छोटी सी, अकेली सी, कमजोर सी ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी के खातेपीते दिखते लोगों की, धन्ना सेठों की बरात का मुकाबला किया यह काबिलेतारीफ था. 213 सीटें जीत कर उन्होंने भाजपा का इस बार 200 से पार का सपना धराशायी कर डाला.

तमिलनाडु और केरल में भारतीय जनता पार्टी इतनी बेचैन भी नहीं थी. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री दिल्ली में कामधाम छोड़छाड़ कर पश्चिम बंगाल में दिन में 3-3, 4-4 रैलियां करते फिरे जिन में दिखने को भारी भीड़ थी. कुछ ने बताया भी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तकरीबन 1,00,000 लोग वेतन पर 4 साल से बंगाल में हर जिले में फैला रखे थे जो रैलियों में भीड़ बढ़ाते थे. अब भीड़ में क्या पता चलता है कि यह बाहरी है या बंगाल का.

ममता बनर्जी की खासीयत रही कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, वे रोईगिड़गिड़ाई नहीं. वे दूसरी पार्टियों के पीछे भी नहीं भागीं. उन्होंने अपने विधायकों और सांसदों की ब्लैकमेल के जरीए चोरी को सीना तान कर सहा, उन की पार्टी ने सीबीआई और एनफोर्समैंट डिपार्टमैंट का कहर  झेला, उन्होंने चुनाव आयोग की साफ दिखती एकतरफा केंद्र सरकार की जीहुजूरी देखी. पर यह बंगाल की जनता भी देख रही थी.

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बंगाल को सम झ आ गया था कि भाजपा का मकसद तो पूजापाठी लोगों को सत्ता में बैठाना है. जो जमींदारी पहले अंगरेजों ने थोपी थी, वह अब मंदिरों, सरकारी दफ्तरों, सरकार के तलुए चाटते धन्ना सेठों को सौंपनी है. ममता बनर्जी छोटे मकान में खुश हैं, नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपने लिए राजपथ को तुड़वा कर विशाल बंगले, जिन में गुफाएं, कई मंजिल गहरे तहखाने और बंकर भी होंगे, बनवा रहे हैं. बंगाल की भूखी जनता को मालूम था कि ये लोग देने, बांटने नहीं लेने व छीनने आ रहे हैं.

देश के दूसरे राज्य में अगर भाजपा का पैर जमा है तो इसलिए कि भाजपा के बहुत से लोग छीन और लूट कर मजबूत हो गए हैं और वे जातजात, धर्मधर्म में अलगाव करा कर लोगों के कर्म का फल गीता के उपदेश पर डकार रहे हैं. भाजपा ने हर जाति के लिए हर गांव में एक छोटा मंदिर बनवा दिया है जो भाजपा कार्यालय का काम भी करता है और सरकार के अत्याचारों के समय जनता का मुंह बंद रखने का काम भी करता है. सदियों से इस देश में केवट, धींवर, निषाद, एकलव्य बस देते रहे हैं. लेना तो एकतरफा रहा है. पश्चिम बंगाल में यह रुका है. हालांकि कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला.

यह देश उसी तरह चलता रहेगा. तानाशाही चाहे दिल्ली की हो, कोलकाता, चेन्नई की हो या गली के महाजन की, चालू रहेगी. जब तक आम मेहनतकश धर्म और जाति की दीवारें नहीं तोड़ता, पूजापाठ के फंदे से नहीं निकलता, ये चुनाव नतीजे रेगिस्तान में बारिश से ज्यादा नहीं हैं. सारा पानी कुछ ही देर में रेत में जज्ब हो जाएगा.

इस बार महामारी ने अमीरों को भी डसा है. कोविड ने लगता है कि अमीरों को ज्यादा बीमार किया है जो वायरस से मुकाबला करना नहीं जानते. जो पहले से गंदे मकानों, गंदी सड़कों, गंदे पाखानों, गंदे कपड़ों के आदी हैं, उन्हें यह रोग या तो पकड़ नहीं पाया या फिर बिना पहचान कराए वे बीमार पड़े, मरे या ठीक हो गए, पर अस्पताल नहीं गए, सरकारी नंबरों में शामिल नहीं हुए.

कोविड ने गरीबों को बेकारी से ज्यादा मारा है. पिछले मार्चअप्रैल 2020 में जब कारखाने बंद हुए और इस बार फिर जब दोबारा बंद होने लगे तो लाखों की नौकरियां या धंधे चौपट हो गए. फर्क तो अमीरों को भी पड़ा जिन की बचत खत्म हो गई पर वे सह सकते थे. उन्हें भी दर्द  झेलना पड़ा क्योंकि वे इस के आदी नहीं थे. आम गरीब के लिए तो यह रोज की बात है.

यह गनीमत है कि देश में जगहजगह अस्पताल बन चुके हैं. 2014 के बाद तो मंदिर ही बन रहे हैं पर पहले धड़ाधड़ स्कूल और क्लिनिक बने थे. गांवोंकसबों में स्कूलों को अस्पतालों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और जो भी दवा मिल रही है वह ले कर बचने की कोशिश हो रही है. यह पक्का है कि दिल्ली में बैठी नरेंद्र मोदी की सरकार ने जिस हलके से इस बीमारी का गरीबों पर पड़ने वाले असर को लिया, वह बेहद खलता है.

हारीबीमारी किसी को भी हो सकती है और इसलिए इलाज की सुविधा सरकार को मुफ्त देनी होगी. मुफ्त का मतलब सिर्फ इतना है कि सब थोड़ाथोड़ा पैसा टैक्स की शक्ल में देंगे. हर गांवकसबे में एंबुलैंस और अस्पताल होने चाहिए चाहे केंद्र सरकार के हों, राज्य सरकार के या पंचायत के. जब थाने हर जगह बन सकते हैं तो अस्पताल क्यों नहीं. शायद इसलिए कि थानों के जरीए लोगों पर राज किया जाता है और अस्पताल में सेवा करनी होती है. सरकार के दिमाग में कहीं यह कीड़ा बैठा है कि वह राज करने के लिए है, लूटने के लिए, मंदिरों की तरह लेने के लिए है, किसी को कुछ देने के लिए नहीं.

अस्पताल खोलो तो नेताओं की मुसीबत आती है. शिकायतें शुरू हो जाती हैं कि डाक्टर समय पर नहीं आते, सफाई नहीं होती, दवाएं चोरी हो रही हैं, जगह कम है. थाना खोलो तो कोई शिकायत नहीं. पुलिस वालों का डंडा सब को ठीक कर देता है.

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नरेंद्र मोदी की सरकार वैसे भी उस पौराणिक सोच पर चलती है कि एक बड़े हिस्से का काम सेवा करना है, कुछ पाना नहीं. हमारे पुराण कहीं भी गरीबों को दान देने की बात करते नजर नहीं आते. फिर कोविड जैसी बीमारी के लिए, बेकारी के लिए या बीमारी के लिए दान की उम्मीद करना ही बेकार है. देशभर में गरीब यह मांग कर भी नहीं रहे. शहरी लोग ही औक्सीजन, वैंटिलेटर, बैड, रेमेडिसिवर का हल्ला मचा रहे हैं.

लेकिन यह न भूलें कि कोविड ने देश को 10-15 साल पीछे धकेल दिया है. सरकार टैक्स चाहे ज्यादा वसूल ले पर आम जनता गरीब हो गई है और गरीब और गरीब हो गया है. वह कोविड से चाहे मरे या न मरे खराब खाने और बेरोजगारी से जरूर मरेगा.

क्या सरकार के खिलाफ बोलना गुनाह है ?

देश में सरकार के खिलाफ हर बात कहने वाले के साथ अब वही सुलूक हो रहा है जो हमारी पौराणिक कहानियों में बारबार दोहराया गया है. हर ऋषिमुनि इन कहानियों में जो भी एक बार कह डालता, वह तो होगा ही. विश्वामित्र को यज्ञ में दखल देने वाले राक्षसों को मरवाना था तो दशरथ के राजदरबार में गुहार लगाई कि रामलक्ष्मण को भेज दो. दशरथ ने खूब विनती की कि दोनों बच्चे हैं, नौसिखिए हैं पर विश्वामित्र ने कह दिया तो कह दिया. वे नहीं माने.

कुंती को वरदान मिला कि वह जब चाहे जिस देवता को बुला सकती है. सूर्य को याद किया तो आ गए पर कुंती ने लाख कहा कि वह बिना शादीशुदा है और बच्चा नहीं कर सकती पर सूर्य देवता नहीं माने और कर्ण पैदा हो गया. उसे जन्म के बाद पानी में छोड़ना पड़ा.

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अब चाहे पश्चिम बंगाल हो, कश्मीर का मुद्दा हो, किसानों के कानून हों, जजों की नियुक्ति हो, लौकडाउन हो, नोटबंदी हो, जीएसटी हो, सरकार के महर्षियों ने एक बार कह दिया तो कह दिया. अब तीर वापस नहीं आएगा.

कोविड के दिनों में तय था कि वैक्सीन बनी तो देश को 80 करोड़ डोज चाहिए होंगी पर नरेंद्र मोदी को नाम कमाना था पर लाखों डोज भारतीयों को न दे कर 150 देशों में भेज दी गईं जिन में से 82 देशों को तो मुफ्त दी गई हैं. भारत में लोग मर रहे हैं, वैक्सीन एक आस है पर फैसला ले लिया तो ले लिया.

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यह हर मामले में हो रहा है. पैट्रोल, डीजल, घरेलू गैस के दाम बढ़ रहे हैं तो कोई सुन नहीं रहा.  चुनाव तो हिंदूमुसलिम कर के जीत लिए जाएंगे. नहीं जीते तो विधायकों को खरीद लेंगे जैसे कर्नाटक, असम, मध्य प्रदेश में किया.

जनता की न सुनना हमारे धर्मग्रंथों में साफसाफ लिखा है. राजा सिर्फ गुरुओं की सुनेगा चाहे इस की वजह से सीता का परित्याग हो, शंबूक का वध हो, एकलव्य का अंगूठा काटना हो. जनता बीच में कहीं नहीं आती. यह पाठ असल में हमारे प्रवचन करने वाले शहरों में ही नहीं गांवों में भी इतनी बार दोहराते हैं कि लोग समझते हैं कि राज करने का यही सही तरीका है. भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी ऐसे ही राज करती रही है, ममता बनर्जी भी ऐसे ही करती हैं, उद्धव ठाकरे भी.

यह हमारी रगरग में बस गया है कि किसी की न सुनो. हमारा हर नेता, हर अफसर अपने क्षेत्र में अपनी चलाता है चाहे सही हो या गलत. यह तो पक्का है कि जब 10 फैसले लोगे तो 5 सही ही होंगे. पर 5 जो खराब हैं, गलत हैं, दुखदायी हैं, जनता को पसंद नहीं हैं तो दुर्वासा मुनि की तरह जम कर बैठ जाने का क्या मतलब? आज सरकार लोकतंत्र की देन है, संविधान की देन है, पुराणों की नहीं. पौराणिक सोच हमें नीचे और पीछे खींच रही है. हर जना आज परेशान है. आज धन्ना सेठों को छोड़ कर हर किसान, मजदूर, व्यापारी परेशान है पर वह भी यही सोचता है कि राजा का फैसला तो मानना ही होगा. उस के गले से आवाज नहीं निकलती.

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यह सोच हर गरीब को ले डूबेगी. गरीब हजारों सालों से गरीब रहा क्योंकि वह बोला नहीं. उस ने पढ़ा नहीं, समझा नहीं, जाना नहीं. इंदिरा गांधी ने इस का फायदा उठाया. आज मोदी उठा रहे हैं. जिस अच्छे दिन की उम्मीद लगा रखी थी वह आएगा तो तब जब अच्छा होता क्या है यह कहने का हक होगा और सुनने वाला सुनेगा.

बिहार पर पड़ेगा पश्चिम बंगाल चुनाव का असर

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल और असम चुनाव में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया है. मुसलिम वर्ग वहां असर वाला माना जाता है. वहां रहने वालों में बड़ी तादाद में बिहार के लोग भी शामिल हैं. ऐसे में भाजपा ने 17 साल बाद शाहनवाज हुसैन को प्रमुखता देने का काम किया है. इस के जरीए वह पश्चिम बंगाल और असम के मुसलिमों को बताना चाहती है कि उन की चिंता भी उसे है.

दूसरी तरफ बिहार में नीतीश कुमार पर राष्ट्रीय जनता दल हमलावर है. उन को ‘निर्लज्ज कुमार’ का नाम दे कर 5 साल तक विधासभा के बौयकौट का नारा दिया गया है. कमजोर पड़ते नीतीश कुमार को भाजपा भी बिहार से दूर करना चाहती है. इस के लिए भाजपा की बहुतकुछ रणनीति पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों पर निर्भर करती है. असम और पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बिहार में भी राजनीतिक दंगल देखने को मिलेगा.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नया नाम ‘निर्लज्ज कुमार’ रख दिया है. तेजस्वी यादव का कहना है कि बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक की चर्चा के दौरान विधानसभा में मौजूद विधायकों को जिस बुरी तरह से मारापीटा गया और उन की बेइज्जती की गई, उसे शब्दों में बताया नहीं जा सकता है.

तेजस्वी यादव ने ये बातें अपने ट्विटर हैडिंल पर बताईं. उन्होंने लिखा, ‘महिला विधायक अनीता देवी नौनिया के पैर में चोट लगी. उन का ब्लाउज पकड़ कर घसीटा गया. उन के साथ बताई न जा सकने वाली बदसुलूकी की गई. जिस समय विधानसभा में यह हो रहा था, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के चरणों में बैठ कर आनंद ले रहे थे.’

तेजस्वी यादव ही नहीं, दूसरे कई विधायकों ने भी इस बात की शिकायत की. विधायक सत्येंद्र कुमार ने कहा, ‘एसपी ने मेरी छाती पर पैर रख कर मारा.’

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इस घटना के विरोध में तेजस्वी यादव ने कहा, ‘अगर सीएम नीतीश कुमार ने घटना पर माफी नहीं मांगी तो वे 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट करेंगे.’

किसी विरोधी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा के बौयकौट का यह पहला मामला है. वैसे, पिछले कुछ सालों में विधानसभा में मारपीट की तमाम घटनाएं हुई हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, पर किसी विपक्षी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट पहली बार हो रहा है.

राजद और बिहार सरकार के बीच विधानसभा में मारपीट का मामला नाक का सवाल बन गया है. राजद के नेता तेजस्वी यादव ही नहीं, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी इस घटना को ले कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए अपने ट्विटर पर लिखते हैं, ‘लोहिया जयंती के दिन कुकर्मी आदमी कुकर्म नहीं करेगा तो कुकर्मी कैसे कहलाएगा?’

लालू प्रसाद यादव अपने ट्विटर पर आगे लिखते है, ‘जब पुलिस विधानसभा में घुस कर विधायकों को मार सकती है, तो सोचिए जब उन के घर पर जाएगी तो क्या करेगी.’

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी अपने ट्विटर पर लिखा, ‘तुम ने आज जो चिनगारी भड़काई है, वह कल तुम्हारे काले सुशासन को जला कर राख कर देगी.’

इस घटना को ले कर तमाम ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखे, जिन में पुलिस महिला विधायक को घसीट कर ले जा रही थी. सरकार की तरफ से दावा किया गया कि राजद के विधायक विधानसभा अध्यक्ष को विधानसभा में आने से रोक रहे थे. विधायकों के हमले से उन्हें बचाने के लिए यह किया गया.

तेजस्वी यादव और लालू परिवार के विरोध पर बिहार के मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. नीतीश कुमार की खामोशी की वजह यह है कि वे इस घटना को तूल नहीं देना चाहते हैं, जबकि तेजस्वी यादव इस बात को मुद्दा बनाना चाहते हैं. आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार में राजनीति का नया अखाड़ा बनेगा.

क्या है बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021

बिहार विधानसभा में मारपीट की घटना का कारण राजद के विधायकों द्वारा बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 का विरोध किया जाना था. राजद और बाकी विपक्ष जैसे कांग्रेस और वाम दलों का कहना है कि नीतीश सरकार इस विधेयक की आड़ में पुलिस को विशेष अधिकार दे रही है, जिस के बाद पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. विधायक इस बात का विरोध कर रहे थे, जिस की वजह से विधानसभा में पुलिस बुलानी पड़ी और मारपीट की यह घटना घट गई, जिसे बिहार की राजनीति में एक काला अध्याय माना जा रहा है. यह केवल काला अध्याय ही नहीं है, विपक्षी दलों को एकजुट करने का जरीया भी बन गया है.

बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को ले कर राजद, कांग्रेस और वाम दल नीतीश सरकार पर हमलावर हैं. नीतीश कुमार की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी भी अलग से पूरे प्रकरण को देख रही है. उस के लिए भी यह अवसर की तरह से है. जैसेजैसे विपक्षियों द्वारा नीतीश कुमार पर हमले होंगे, उन की पकड़ बिहार से कम होगी. इस से भाजपा को नीतीश कुमार को हाशिए पर धकेलना आसान होता जाएगा.

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे के बाद बिहार की राजनीति में नए गुल खिलने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं. बिहार में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत करने की फिराक में है, जिस से नीतीश कुमार की ताकत को कम किया जा सके. भाजपा बिहार में नीतीश कुमार को इस कदर मजबूर करना चाह रही है कि वे भाजपा की हर बात मान लें. वे अपने मन से मुख्यमंत्री की कुरसी से हट जाएं, जिस से भाजपा वहां अपना आदमी बैठा सके.

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शाहनवाज बन सकते हैं भाजपा का नया चेहरा

बिहार की राजनीति में शाहनवाज हुसैन को ले कर अटकलों का दौर चल रहा है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शाहनवाज हुसैन बिहार में भाजपा का नया चेहरा होंगे. इन के जरीए वह मुसलिम वर्ग में अपनी पैठ बनाने का काम करेगी.

मुसलिम वर्ग बिहार में यादव समाज के साथ मिल कर भाजपा को विस्तार नहीं करने दे रहा है. राजद को कमजोर करने के लिए भी जरूरी है कि मुसलिम वर्ग को उस से अलग किया जाए. शाहनवाज हुसैन ऐसे नेता हैं जिन से यह काम हो सकता है.

साल 2001 में 32 साल की उम्र में केंद्र की अटल सरकार में शाहनवाज हुसैन को उड्डयन मंत्री बनाया गया था और साल 2003 में उन को कपड़ा मंत्री बना दिया गया था. तब वे भाजपा के ‘पोस्टर बौय’ कहे जाते थे.

शाहनवाज हुसैन की इमेज कट्टर मुसलिम की नहीं है. उन का प्रेम विवाह रेनू नामक लड़की से हुआ था, जो उन के साथ पढ़ती थी. साल 2004 में जब वे किशनगंज सीट से अपना चुनाव हार गए तो भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए. साल 2009 में वे सांसद बने, पर भाजपा में उन के महत्व को कम कर दिया गया.

तकरीबन 17 साल के बाद शाहनवाज हुसैन को केंद्र की राजनीति से बिहार भेजा गया. यहां नीतीश सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया.

भाजपा की मुख्यधारा में शाहनवाज हुसैन की वापसी को नए अर्थों में देखा जा रहा है. बिहार में शाहनवाज हुसैन को मंत्री बनाने के लिए विधानपरिषद का सदस्य बनाया गया. इस के बाद वे उद्योग मंत्री बनाए गए. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया.

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शाहनवाज हुसैन के बहाने भाजपा मुसलिमों को यह संदेश देने का काम कर रही है कि वह उन की चिंता करती है. दिल्ली में मोदीशाह की जोड़ी बनने के बाद शाहनवाज हुसैन को पहली बार महत्व दिया जा रहा है. शाहनवाज हुसैन के बारे में एक आकलन यह भी लगाया जा रहा है कि केंद्र में उन की उपयोगिता दिख नहीं रही थी, जिस कारण उन्हें बिहार भेजा गया है.

भाजपा उन के नाम पर कोई बड़ा दांव नहीं लगाएगी. भाजपा की रणनीति पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है. ये नतीजे बिहार में भी उथलपुथल मचा सकते हैं. इस में शाहनवाज हुसैन की भूमिका भी चर्चा में है. नीतीश कुमार का राजद द्वारा किया जा रहा विरोध भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिस की आड़ में भाजपा नीतीश कुमार पर दबाव बढ़ाने का काम करेगी.

ममता की ओर झुकते नीतीश?

इस बीच ऐसी अटकलें भी तेज हुई थीं कि नीतीश कुमार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार की बहुत ज्यादा बुराई करने को ले कर अजय आलोक से नाराज थे.

अजय आलोक ने पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख वशिष्ठ नारायण सिंह को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफे में लिखा था, ‘मैं आप को पत्र लिख कर यह सूचित कर रहा हूं कि मैं पार्टी प्रवक्ता के पद से इस्तीफा दे रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि मैं पार्टी के लिए अच्छा काम नहीं कर रहा हूं. मैं यह अवसर देने के लिए आप का और पार्टी का धन्यवाद करता हूं लेकिन कृपया मेरा इस्तीफा स्वीकार करें.’

बता दें कि अपने एक ट्वीट में अजय आलोक ने पहले भी जद (यू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर की कंपनी के ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने पर सवाल उठाए थे.

अजय आलोक पटना के मशहूर डाक्टर गोपाल प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं. आलोक अपने कालेज के दिनों से राजनीति में सक्रिय थे. उन्होंने साल 2012 में जद (यू) को जौइन किया था.

सांसद के घर कुर्की का आदेश

वाराणसी. इन लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की घोसी लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के नेता अतुल राय सांसद बने थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान एक छात्रा ने उन पर यह कहते हुए रेप का आरोप लगाया था कि अतुल ने उसे अपनी पत्नी से मिलाने के लिए अपने आवास पर बुलाया था और इस के बाद रेप किया था.

उस पीडि़ता का कहना है कि अतुल राय ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी, जबकि अतुल राय का कहना है कि वह छात्रा उन के औफिस आ कर चुनाव लड़ने के नाम पर चंदा लेती थी और चुनाव में उम्मीदवार बनने के बाद उन्हें ब्लैकमेल करने की कोशिश की गई.

छात्रा के आरोप के बाद न्यायिक मैजिस्ट्रेट ने अतुल राय की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए थे. वे जमानत के लिए हाईकोर्ट तक गए, लेकिन उन्हें जमानत नहीं मिली, तो वे फरार हो गए जिस के चलते 14 जून को पुलिसप्रशासन ने उन के घर पर कुर्की का नोटिस लगा दिया.

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बिजली के बहाने भिड़ंत

भोपाल. मध्य प्रदेश में बिजली की कटौती को ले कर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के एक नेता का सोशल मीडिया पर लंगर डाल कर बिजली गुल करने वाले लड़कों की भरती का इश्तिहार सामने आने से कांग्रेस और उस में तकरार और ज्यादा बढ़ गई.

दरअसल, दमोह जिले के मीडिया प्रभारी मनीष तिवारी ने 12 जून को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाला था, ‘विज्ञापन-बिजली गोल कराने वाले लड़कों की आवश्यकता है. नोट-लंगर डालने में ऐक्सपर्ट हों. संपर्क करें बीजेपी दमोह.’

इस मसले पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने कहा, ‘प्रदेश में भाजपा के लोग बिजली गुल कराने की एक बड़ी साजिश चला रहे हैं. बिजली गुल कराने के लिए टीम लगाई जा रही है.’

 राजस्थान कांग्रेस में रार

जयपुर. राजस्थान में सत्ता का सुख भोग रही कांग्रेस पार्टी में खेमेबंदी अब खुल कर सामने आ रही है. इस खेमेबाजी की एक तरफ वहां के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं, तो दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट.

दरअसल, दौसा जिले के भंडाना इलाके में मंगलवार, 11 जून को सचिन पायलट के पिता व केंद्रीय मंत्री रह चुके राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर कराई गई एक प्रार्थना सभा में सरकार के 15 मंत्रियों समेत 62 विधायक पहुंचे थे, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं आए थे. उन्होंने ट्विटर के जरीए राजेश पायलट को श्रद्धांजलि दी थी.

इस के ठीक एक दिन बाद जब अशोक गहलोत जयपुर में एमएसएमई के एक पोर्टल की शुरुआत कर रहे थे तो कई बड़े मंत्री जयपुर में होने के बावजूद वहां नहीं गए थे.

कैप्टन ने कन्नी काटी

चंडीगढ़. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में शनिवार, 15 जून को हुई नीति आयोग की बैठक में भाग लेने नहीं गए.

कैप्टन अमरिंदर सिंह के बैठक में शामिल न होने की वजह उन का बीमार होना बताई गई, जबकि वे पूरा एक हफ्ता हिमाचल प्रदेश में अपने फार्महाउस पर छुट्टियां बिता कर पंजाब लौटे थे.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह देश के ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री थे जो इस खास बैठक में शामिल होने नहीं गए.

गरमाई धरने की सियासत

बैंगलुरु. जेएसडब्लू जमीन सौदे में धांधली का आरोप लगाते हुए कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री रह चुके बीएस येदियुरप्पा और दूसरे नेताओं ने 14 जून को बैंगलुरु में पूरी रात धरनाप्रदर्शन किया जिस से एचडी कुमारस्वामी की राज्य सरकार कठघरे में आ गई.

यह मामला जेएसडब्लू स्टील कंपनी की बेल्लारी में 3,667 एकड़ जमीन की बिक्री का है. भाजपा ने आरोप लगाया कि जेएसडब्लू को सस्ती दर पर जमीन अलौट करने का फैसला सरकार ने जानबूझ कर किया है. ऐसा कर के सरकार अपनी झोली भरने का काम करना चाहती है, क्योंकि उसे राज्य में अपनी सरकार गिरने का डर है.

केजरीवाल ने उठाया मुद्दा

नई दिल्ली. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 जून को नीति आयोग की बैठक में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का मुद्दा उठाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में उन्होंने कहा, ‘दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए जिस का वादा सालों से किया जा रहा है लेकिन लगातार केंद्र सरकारें इनकार करती रही हैं.’

आम आदमी पार्टी ने हालिया लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का मुद्दा उठाया था. उस का कहना है कि केंद्र की दखलअंदाजी की वजह से वह अपनी योजनाओं को असरदार तरीके से लागू करने में कामयाब नहीं हो पा रही?है.

 मूर्ति पर हुई गिरफ्तारी

हैदराबाद. मंगलवार, 17 जून को कांग्रेस के सांसद रह चुके 2 बड़े नेताओं वी. हनुमंथा राव, हर्ष कुमार और उन के समर्थकों को तब गिरफ्तार कर लिया गया जब वे शहर के पंजागुट्टा चौराहे पर भीमराव अंबेडकर की मूर्ति लगाने की कोशिश कर रहे थे.

दरअसल, अप्रैल महीने में ग्रेटर हैदराबाद  नगरनिगम ने ‘अंबेडकर जयंती’ से एक दिन पहले ‘जय भीम सोसाइटी’ द्वारा अंबेडकर की मूर्ति को स्थापित किए जाने के बाद उस जगह से हटा दिया था. बाद में वह मूर्ति टूटीफूटी हालत में कूड़े में मिली थी, जिस का दलित संगठनों ने कड़ा विरोध जताया और इस के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की.

ग्रेटर हैदराबाद नगरनिगम के अधिकारियों ने कहा कि मूर्ति को बिना इजाजत लिए लगाया गया था, इसलिए हटा दिया गया.

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नेता के सामने पी लिया जहर

मुंबई. 15 जून को महाराष्ट्र के ऊर्जा राज्यमंत्री एमएम येरावर के सामने एक किसान ने जहर पी कर जान देने की कोशिश की. दरअसल, बुलढाणा में एक कार्यक्रम के दौरान ऊर्जा राज्यमंत्री मंच पर मौजूद थे, तभी ईश्वर खारटे नाम के एक किसान ने वहां सब के सामने कीटनाशक पी कर जान देने की कोशिश की.

अस्पताल ले जाए गए ईश्वर खारटे का आरोप है कि उस के दादा ने साल 1980 में बिजी के कनैक्शन के लिए अर्जी लगाई थी पर उन्हें अब तक कनैक्शन नहीं मिला है, जबकि संबंधित अधिकारी का कहना है कि ईश्वर खारटे ने बकाया जमा नहीं किया है, इसलिए उन्हें कनैक्शन नहीं मिला है.              द्य

 

पौलिटिकल राउंडअप

आतिशी का गंभीर आरोप

नई दिल्ली. लोकसभा चुनाव के आखिरी दौर में 9 मई को पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार आतिशी मार्लेना ने एक प्रैस कौंफ्रैंस में भावुक होते हुए भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर पर अपने खिलाफ ‘अश्लील और अपमानजक परचे’ बंटवाने का आरोप लगाया. इंगलिश भाषा में लिखे इस परचे में अव्वल दर्जे की घटिया भाषा का इस्तेमाल किया गया था. इस के जवाब में गौतम गंभीर ने आतिशी मार्लेना और अरविंद केजरीवाल को खुद पर लगे आरोपों को साबित करने की चुनौती दी और आपराधिक मानहानि का मामला भी दर्ज कराया.

जब मायावती गरजीं

लखनऊ. लोकसभा चुनाव के लिए छठे चरण की वोटिंग से पहले उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने 9 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री राजनीतिक फायदे के लिए जबरदस्ती पिछड़ी जाति के बने हैं. अगर मोदी जन्म से पिछड़ी जाति के होते तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बनाता.

मोदी ने तो कभी जातिवाद का दंश नहीं झेला है और ऐसी झूठी बातें करते हैं…

शरद पवार का दावा

मुंबई. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा शरद पवार ने 9 मई को सातारा में मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्होंने खुद इस बात का अनुभव लिया है कि वोटिंग मशीन का कोई भी बटन दबाओ, वोट भाजपा को ही जा रहा था, इसीलिए वे ईवीएम के चुनाव नतीजों के बारे में चिंतित थे.

शरद पवार ने बताया, ‘मेरे सामने किसी ने हैदराबाद और गुजरात की वोटिंग मशीनें रखीं और मुझ से बटन दबाने को कहा गया. मैं ने अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘घड़ी’ के सामने वाला बटन दबाया, लेकिन वोट भाजपा के चुनाव चिह्न ‘कमल’ पर गया. यह मैं ने अपनी आंखों से देखा है.’

सरकार का चमचा

मुंबई. 10 मई को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संजय निरुपम ने जम्मूकश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक को सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चमचा बताया जो बिलकुल सही है.

सत्यपाल मलिक ने 9 मई को श्रीनगर में मोदी की तर्ज पर कहा था कि प्रधानमंत्री रह चुके राजीव गांधी शुरू में भ्रष्ट नहीं थे, लेकिन कुछ लोगों के असर में आ कर वे बोफोर्स घोटाले के मामले में शामिल हो गए थे.

संजय निरुपम ने इस कथन पर अपनी राय देते हुए कहा, ‘हमारे देश के जितने राज्यपाल होते हैं, वे सरकार के चमचे होते हैं. सत्यपाल मलिक भी चमचा ही है. राजीव गांधी को बोफोर्स केस में अदालतों ने क्लीन चिट दी थी.’

नीतीश का बड़ा बयान

बक्सर. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 10 मई को एक चुनावी सभा में विपक्षी दलों पर आरक्षण को ले कर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया और कहा कि आज वोट के लिए विपक्षी दल इसे ले कर तरहतरह की बातें कर रहे हैं.

नीतीश कुमार ने कहा, ‘हमारे रहते दलित, महादलित, अल्पसंख्यक, अति पिछड़ों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को खत्म करने की किसी भी राजनीतिक दल की औकात नहीं है.’

सब ने की तारीफ

श्रीनगर. मंगलवार, 14 मई को 4 मछुआरे समेत 13 पाकिस्तानी नागरिकों को अटारीवाघा बौर्डर से पाकिस्तान भेजा गया था जबकि अप्रैल महीने में पाकिस्तान ने ‘सद्भावना’ के तहत 55 भारतीय मछुआरों और 5 नागरिकों को रिहा किया था. इस का दोनों देशों के उदार लोगों ने स्वागत किया. दूसरे देश के नागरिकों को बंद रखना कम से कम होना चाहिए.

विद्यासागर की मूर्ति ढहाई

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में मंगलवार, 14 मई को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का रोड शो था जिस में ईश्वरचंद्र विद्यासागर कालेज में हुई तोड़फोड़ में समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति ढहा दी गई थी. इस के बाद सत्ताधारी तृणमूल और भाजपा ने एकदूसरे पर यह कांड करने का इलजाम लगाया.

इस शर्मनाक घटना ने 50 साल पहले की उस घटना को ताजा कर दिया जब नक्सली मुहिम में शामिल नौजवानों ने विद्यासागर कालेज के आसपास विद्यासागर, राजा राममोहन राय, प्रभुल राय और आशुतोष मुखर्जी की मूर्तियां तोड़ दी थीं.

केस ही केस

तिरुअनंतपुरम. 15 मई. भारतीय जनता पार्टी के केरल के पत्तनमतिट्टा संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवार के. सुरेंद्रन पर 240 आपराधिक मामले दर्ज होने से वे सब से ज्यादा आपराधिक मामले वाले उम्मीदवार बन गए हैं.

के. सुरेंद्रन कासरगोड में रहते हैं और वे भाजपा के प्रदेश महासचिवों में से एक हैं. उन पर 240 मामलों में से 129 मामले काफी गंभीर हैं, जबकि ऐसे ही मामलों में दूसरे नंबर पर केरल के इडुक्की क्षेत्र

के कांग्रेस उम्मीदवार डीन कुरियाकोस हैं. उन के खिलाफ 204 आपराधिक मामले पैंडिंग हैं, जिन में से 37 मामले गंभीर हैं.

गोडसे पर सियासी गरमी

चेन्नई. इन चुनावों के दिनों में जब कमल हासन ने तमिलनाडु के करूर जिले में कहा था, ‘आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उस का नाम नाथूराम गोडसे था…’ तो इस बयान के बाद उन की रैलियों में पत्थर और अंडे फेंके जाने की घटनाएं सामने आईं. कमल हासन ने यह भी कहा कि कोई धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी और धर्म से बेहतर है और वे अपने बयान पर गिरफ्तार होने से डरते नहीं हैं. दूसरी तरफ जब प्रज्ञा भारती ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा तो एक भी हिंदूवादी ने अदालत का बहाना ले कर मुकदमा चला कर परेशान करने की कोशिश नहीं की.

अमिताभ को बना दो

मिर्जापुर. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार के आखिरी दिन

17 मई को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभिनेता बताया. उन्होंने उन पर तंज कसते हुए कहा कि इस से अच्छा तो अमिताभ को ही पीएम बना देते.

प्रियंका गांधी वाड्रा ने आगे कहा, ‘अगर मोदी फिर पीएम बने तो 5 साल और पिक्चर ही देखनी पड़ेगी, इसलिए तय कर लीजिए कि किसे वोट करना है, जमीन पर काम करने वाले नेता को या हवा में उड़ने वाले को… मोदी हर चुनाव में नई कहानी बनाते हैं… इस बार किसानों के लिए नई कहानी बनाई और कहा कि किसान सम्मान योजना लाए हैं.’

रघुवर का तंज

दुमका. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने

12 मई को झारखंड मुक्ति मोरचा पर हमला बोलते हुए कहा कि यह मोरचा अब बूढ़ा मोरचा हो गया है, जो न चल सकता है, न बोल सकता है, इसे जबरन चलाया जाता है. रघुवर दास ने हेमंत सोरेन पर तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने आदिवासियों की जमीन अपने नाम कर ली और आज आदिवासियों के नेता बने हुए हैं.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

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