भाजपा की कमंडल और मंडल की दोहरी चाल, विपक्ष क्यों बेहाल

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गुमनाम चेहरों को सत्ता सौंप कर भारतीय जनता पार्टी के आलाकमान ने जो संदेश देने की कोशिश की है, वह नेताओं को तो मिल चुका है, पर राजनीति के तमाम जानकार इस के अपने अलगअलग मतलब निकाल रहे हैं, लेकिन यह एकदम सौ फीसदी तय है कि केंद्र में ऐसा नहीं होने वाला है, बल्कि केंद्र की सत्ता को और मजबूत करने के लिए ही इन राज्यों में इतनी कवायद की गई है.

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह राजनीति के व्याकरण को ही बदल रहे हैं. वह व्याकरण यह है कि फैसला एक है, लेकिन उस के संदेश कई निकल रहे हैं. एक पौजिटिव संदेश यह निकला है कि पिछली कतार में बैठा संगठन के लिए काम करने वाला कार्यकर्ता भी किसी दिन बड़ा नेता बन कर मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ सकता है, लेकिन इसे भाजपा में साल 2014 के बाद समयसमय पर लाई जा रही वीआरएस स्कीम भी माना जाना चाहिए.

अगर थोड़ा पीछे मुड़ कर देखा जाए, तो इसी स्कीम के शिकार भाजपा के बड़े मुसलिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी और शहनवाज हुसैन के साथ बिहार में सुशील मोदी भी हुए थे. यह संदेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लिए भी है, क्योंकि साल 2023 की राजस्थान और मध्य प्रदेश की जीत के बाद वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान मान कर चल रहे थे कि उन्हें तो कोई हटाने की हिम्मत ही नहीं करेगा, मगर वैसा हुआ नहीं.

राज्यों में भाजपा का शिवराज सिंह चौहान के कद का कोई नेता नहीं है, इसलिए भाजपा आलाकमान ने साल 2022 में उत्तर प्रदेश के घटनाक्रम को देखते हुए कोई जोखिम नहीं लेना चाहा. जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद नौकरशाह रहे अरविंद शर्मा से जिस तरह से पेश आए थे, किसी ने ऐसी कल्पना तक नहीं की थी, जबकि वसुंधरा राजे के तीखे तेवर और भाजपा नेतृत्व से टकराव के किस्से कोई नए नहीं हैं. साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाजपा की कमान संभालने से पहले भी वसुंधरा राजे अकसर भाजपा आलाकमान की परवाह न करते देखी गई हैं.

वसुंधरा राजे को हटा कर भाजपा नेतृत्व ने एक संदेश यह भी देने की कोशिश की है कि यह सब अब नहीं चलने वाला है. यहां तक कि नतीजे आने के बाद भी वसुंधरा राजे विधायकों की बाड़ेबंदी में सक्रिय दिखी थीं. आखिर में राजनाथ सिंह ने उन्हें कोई घुट्टी पिलाई और विधायक दल की बैठक में केंद्रीय नेतृत्व की ओर से भेजा गया एक लाइन का प्रस्ताव उन्हीं से पेश करवाया.

इन बदलावों के पीछे भाजपा का एक बड़ा मकसद यह भी है कि वह साल 2024 के आम चुनाव में विपक्ष को मंडल की राजनीति के दौर में नहीं लौटना देना चाहती है. वह 25 साल से सफलता का सूत्र बने कमंडल के साथ मंडल का तालमेल भी बैठना चाहती थी.

राजस्थान में भजन लाल शर्मा कमंडल के आइकन हैं तो मध्य प्रदेश में मोहन लाल यादव और छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय मंडल का झंडा बुलंद करेंगे. सत्ता संभालते ही तीनों मुख्यमंत्री मंडल और कमंडल को साधने में जुट गए हैं.

भाजपा ने हिंदुत्व के मुद्दे के साथसाथ क्या विपक्ष को जातिगत राजनीति में भी पीछे छोड़ दिया है? सनद रहे कि मंडल आयोग ने क्षेत्रीय पार्टियों और जातिगत पहचान से जुड़ी राजनीति को भी पंख दिए थे.

उत्तर प्रदेश और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) जैसी पार्टियों का कद बढ़ा. राहुल गांधी समेत समूचा विपक्ष हर सभा में जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाते रहे हैं.

वैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस के जवाब में हर बार यही कहा कि देश में सिर्फ चार जातियां हैं- गरीब, किसान, महिला और युवा. आरोप भी लगाया कि विपक्ष जाति सर्वे के जरीए देश को बांटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसी का नाम है कि जो कहा और दिखाया जाता है वह असल में होता नहीं है.

भाजपा ने तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री का चुनाव अलग तरीके से कर के यादव ओबीसी के बीच एक मजबूत आधार बना कर समाजवादी पार्टी और राजद के मुसलिमयादव गठजोड़ को साल 2024 के लिए सीधे चुनौती दी है.

आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में 50 फीसदी ओबीसी वोटर हैं. कहा जाता है कि मध्य प्रदेश में भाजपा की जीत में ओबीसी समुदाय के वोटरों की बड़ी भूमिका रही है, इसीलिए भाजपा ने यहां ओबीसी समुदाय के मोहन यादव को ही सीएम बनाया, लेकिन साथ में ब्राह्मण राजेंद्र शुक्ला और अनुसूचित जाति से आने वाले जगदीश देवड़ा को डिप्टी सीएम बना दिया.

राजेंद्र शुक्ला जो कभी कांग्रेसी हुआ करते थे, इस समय मध्य प्रदेश के सब से बड़े और जनाधार वाले ब्राह्मण नेता हैं. विंध्य क्षेत्र में उन की छवि विकास पुरुष की है. यही वजह है कि कभी कांग्रेस का गढ़ रहा विंध्य क्षेत्र चुनाव दर चुनाव भाजपा की कामयाबी की नई इबारत लिख रहा है. अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज नेता के बेटे अजय सिंह को अपनी विरासत बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है.

सतना से भाजपा के कई बार के सांसद गणेश सिंह की हार को अपवाद माना जाना चाहिए. यह राजेंद्र शुक्ला का ही कमाल है कि ऐन चुनाव के समय कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवासन तिवारी के नाती सिद्धार्थ तिवारी को सिटिंग एमएलए का टिकट काट कर त्योंथर से जीता कर लाए.

वहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासी इलाकों में मिली बढ़त को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने इसी समुदाय के विष्णु देव साय को सीएम पद दिया है. राजस्थान में भी पार्टी ने ब्राह्मण सीएम के साथ राजपूत और दलित समुदाय से आने वाले 2 डिप्टी सीएम भी नियुक्त कर दिए हैं. जाहिर है कि मोदीशाह की जोड़ी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं, जिस का असर 2024 के चुनाव में दिखना चाहिए, वह भी बिना किसी चुनौती के साथ.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने विधानसभा में आदिवासी नेता उमंग सिंगार को नेतृत्व सौंप कर मुकाबले की कोशिश की है, लेकिन यह देखना होगा कि वह विपक्षी साथियों के साथ कितना तालमेल बैठाती है.

एक मनुवादी ने मोदी के किएधरे पर पेशाब फेरा

यह सब अचानक नहीं हुआ है और न ही प्रवेश शुक्ला नाम का ब्राह्मण नौजवान सिर्फ शराब के नशे में था, बल्कि उस के दिलोदिमाग पर तो सनातन धर्म, धर्मग्रंथों और हिंदू राष्ट्र का नशा ज्यादा था, जिसे बेइंतिहा नफरत की शक्ल में एक वीडियो के जरीए अब दुनिया देख रही है. इस पर भी हैरत की बात यह है कि इस घटिया हरकत पर एतराज भी एक सियासी रस्म के तौर पर जताया जा रहा है मानो विश्वगुरु बनने का रास्ता दलितों, आदिवासियों, औरतों और मुसलमानों से नफरत करने और उन्हें सताते रहने के ‘धर्म टोल’ से हो कर ही जाता है.

मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले सीधी के वायरल हुए इस वीडियो में एक नौजवान दूसरे नौजवान के चेहरे पर पेशाब करता नजर आ रहा है. कुबरी गांव के रहने वाले इस ब्राह्मण नौजवान का नाम प्रवेश शुक्ला है, जो पेशाब करते समय एक हाथ कमर पर रखे हुए है और दूसरे हाथ से बड़ी बेफिक्री से सिगरेट भी फूंक रहा है.

पीड़ित नौजवान कोई खिलाफत नहीं कर पा रहा है. हालांकि वह प्रवेश शुक्ला की पेशाब को चरणामृत की तरह भी नहीं ले रहा है, इसलिए उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त यानी पागल भी कहा जा रहा है.

इस वीडियो पर बवाल मचना कुदरती बात थी, क्योंकि इस तरह की हैवानियत वाली हरकत अब कम देखने में आती है, नहीं तो दबंग सवर्ण अभी भी पुराने तरीकों से ही नीची जाति वालों को सताने में ज्यादा भरोसा करते हैं, क्योंकि उन में पकड़े जाने, जुर्म साबित होने और कानूनन सजा होने का जोखिम कम रहता है. इस के बाद भी कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जिस में वंचित समाज को सताने की 2-4 खबरें न आती हों.

सीधी के वीडियो को सभ्य समाज पर कलंक और भोलेभाले आदिवासियों की बेइज्जती बताने और मानने वालों को इस कट्टर और घटिया सोच की वजह या जड़ पहले समझ लेनी चाहिए कि वह दरअसल ‘रामचरितमानस’ है, जो बिना किसी लिहाज या लागलपेट के छोटी जाति वालों से नफरत करने का संदेश देती है. प्रवेश शुक्ला जैसे कई नौजवान तो उसे अमल में लाते हैं, परवाह उन्हें भी समाज, संविधान या कानून की नहीं रहती.

कौन हैं कोल आदिवासी

पीड़ित नौजवान कोल आदिवासी समुदाय का है. इस जाति के आदिवासी आमतौर पर भूमिहीन हैं और लोहे को गलाने और उस का सामान बनाने का काम करते रहे हैं. कुछ लोग बांस के आइटम भी बनाने लगे हैं.

विंध्य इलाके के रीवा जिले का बरदीजादा इलाका इन का उत्पत्ति या मूल स्थान माना जाता है. यहां से होते ये लोग झारखंड और ओडिशा तक फैल गए हैं.

झारखंड में संथाली और मध्य प्रदेश में कोली भाषा बोलने वाले इस मेहनती समुदाय की माली हालत कभी ठीक नहीं रही. खाली समय में ये मजदूरी करने विदेश यानी बड़े शहरों की तरफ पलायन कर जाते हैं. झारखंड के गिरिडीह और देवधर के अलावा दुमका जिले में इन की आबादी सब से ज्यादा है.

इन लोगों के हिंदुओं से अलग रीतिरिवाज और खुद के अपने देवीदेवता हैं. ये देवीदेवता हैं काली माता और सिंगबोगा. अब कुछ पढ़ेलिखे कोल हिंदू मंदिरों में भी जाने लगे हैं, क्योंकि इन के पास चढ़ाने को पैसा होता है, इसलिए इन्हें यह सहूलियत पंडेपुजारियों ने दे रखी है.

कोल समुदाय के 12 गोत्र होते हैं, जिन में मुर्मू के अलावा सोरेन, मरांडी, किस्कू खास हैं. धर्मग्रंथों में भी इन का जिक्र मिलता है, लेकिन किस अंदाज और हैसियत से, इसे इस दोहे से समझिए, जिस से प्रवेश शुक्ला ने समझा और ज्यादातर सवर्ण भी इस तरीके से ही समझते हैं.

तुलसीदास द्वारा लिखी गई ‘रामचरितमानस’ के ‘उत्तरकांड’ के दोहा संख्या 99 (3) में कहा गया है :

‘जे बरनाधम तेलि कुम्हारा. स्वपच किरात कोल कलवारा.’

मतलब तेली, कुम्हार, चांडाल, भील और कोल, कलवार आदि बेहद नीच वर्ण के लोग हैं.

गरमाई सियासत

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. ऐसे में भाजपा को प्रवेश शुक्ला की इस मनुवादी हरकत से तगड़ा झटका लगा है, क्योंकि वह उस के विधायक केदार शुक्ला का प्रतिनिधि रहा है. हालांकि केदार शुक्ला सरासर झूठ बोलते हुए इस बात को नकारते रहे, लेकिन जल्द ही उन का आरोपी को दिया नियुक्तिपत्र भी वायरल हो गया. यह भी सामने आया कि वह भाजपा का पदाधिकारी भी है.

जब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ सहित दूसरे छोटेबड़े कांग्रेसियों ने इस पर हल्ला मचाया, तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रवेश शुक्ला के खिलाफ एनएसए यानी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए. गिरफ्तारी के बाद थाने जाते समय भी प्रवेश शुक्ला के चेहरे और चालढाल की ठसक देखने के काबिल थी मानो उस ने इनसानियत को शर्मसार करने वाला गुनाह नहीं, बल्कि ‘रामचरितमानस’ में लिखे मुताबिक पीड़ित को नीच वर्ण का साबित कर दिया है. इस बाबत तो उसे सजा के बजाय इनाम मिलना चाहिए, क्योंकि भगवा गैंग के हिंदू राष्ट्र में होना यही है.

मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में भाजपा की सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस ने पूरा जोर 30 फीसदी आदिवासी वोटों को लुभाने में लगा रखा है. प्रधानमंत्री नरेंद मोदी 1 जुलाई, 2023 को शहडोल के आदिवासियों के बीच खाट लगा कर बैठे हुए आदिवासियों की बदहाली के बाबत कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कोस रहे थे. और तो और उन्होंने आदिवासी इलाकों की जानलेवा बीमारी सिकल सैल एनीमिया का जिम्मेदार भी कांग्रेस को ठहरा दिया, जबकि डेढ़ साल का अरसा छोड़ दें, तो पिछले 20 साल से भाजपा सत्ता में है और उस ने आदिवासियों और सिकल सैल एनीमिया के लिए क्या किया, यह सवाल अब इस पेशाब कांड के बाद पूछना बेमानी है.

यह हुआ भाजपा राज में भाजपा राज में दलित, आदिवासियों पर जोरजुल्म के मामले लगातार बढ़े हैं, जिस से अदिवासी समुदाय उस से खफा है. इस ताजा मामले ने तो उस आग में घी डालने का ही काम किया है.

छिंदवाड़ा के एक भाजपा कार्यकर्ता का नाम न छापने की शर्त पर कहना है कि सीधी पेशाब कांड ने मोदी और शिवराज के किएधरे पर पेशाब फेर दिया है. अब हम आदिवासियों से क्या खा कर और किस मुंह से वोट मांगेंगे? क्या यह कह कर कि आओ हमें वोट दो, हम तुम्हें पेशाब देंगे?

यह हकीकत राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े भी बयां करते हैं कि साल 2018 में दलित, आदिवासियों के साथ हुई प्रताड़ना के 4,753 मामले दर्ज किए गए थे, जिन की तादाद साल 2019 में 5,300 हो गई थी और फिर साल 2021 में ऐसे दर्ज मामलों की तादाद 6,899 हो गई थी. इस तरह दलितआदिवासी समाज को सताने के मामले में मध्य प्रदेश टौप पर बना हुआ है.

हिंदुत्व है वजह

उम्मीद है कि मध्य प्रदेश में यह जगह शायद ही कोई दूसरा प्रदेश छीन पाएगा, क्योंकि यहां खासतौर से आदिवासियों पर जोरजुल्म करने की छूट और लाइसैंस मिले हुए हैं. ज्यादातर मामलों में हिंदूवादी ही आरोपी पाए गए हैं. सिवनी जिले के गांव सिमरिया की मौब लिंचिंग इस की बड़ी मिसाल है. इस कांड में बजरंगियों ने गौमांस की तस्करी के शक में 2 आदिवासियों संपत्त बट्टी और धानशाह को लाठियों से पीटपीट कर मार डाला था.

दरअसल, यह लड़ाई आदिवासियों के हिंदू होने और न होने की है. हिंदूवादी आदिवासियों में इतनी दहशत फैला देना चाहते हैं कि वे खुद को हिंदू धर्म का मानते हुए पूजापाठ और दानदक्षिणा करने के अलावा उन की गुलामी भी करें. लेकिन आदिवासी समुदाय उन की ज्यादतियों के सामने झुक नहीं रहा है.

जय आदिवासी युवा संगठन यानी जयस के मुखिया डाक्टर हीरालाल अलावा ने बताया, “हम ने आदिवासी समुदाय की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से इस घटिया कांड पर दखल देने की मांग की है. रही बात हम आदिवासियों पर अत्याचार की तो हमारी खामोशी अब वोटिंग के दिन टूटेगी, जिसे आप नतीजे के दिन सुनेंगे कि भाजपा मध्य प्रदेश में कर्नाटक की तरह 65 सीटों पर सिमट गई.

पैर धोने का पाखंड

हल्ला और आदिवासी समुदाय का बढ़ता गुस्सा देख कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी कुरसी खिसकती लगी तो वे इतना घबरा गए कि उन्होंने 6 जुलाई, 2023 की सुबहसुबह पीड़ित दशमत रावत को भोपाल सीएम हाउस बुला कर उस के पैर धोए. उन्होंने इस घटना पर दुख जताते हुए दशमत को फूलमाला पहनाई, उस की आरती उतारी और उसे गणेश की एक तसवीर भी तोहफे में दी. सीएम हाउस का माहौल बड़ा ही पौराणिक और घर वापसी सरीखा था.

इस थूक कर चाटने से न तो दशमत के साथ हुई ज्यादती की भरपाई होनी है और न ही आदिवासियों को समाज में इस से कोई इज्जत मिलने वाली है. मुख्यमंत्री के एक आदिवासी के पूजापाठ और आरती से तुलसीदास का लिखा मिट नहीं जाना है, बल्कि यह और गहरा सकता है. कहने का मतलब यह नहीं है कि पेशाब का बदला पेशाब ही होना चाहिए, लेकिन दिखावे के इस पछ्तावे का मतलब हर कोई खूब समझ रहा है कि यह एक सियासी और धार्मिक पाखंड ही है.

IAS और पत्रकार की दिलचस्प प्रेम कहानी: प्यार का मोल नहीं

मध्य प्रदेश के 57 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक अपने फेसबुक वाल पर अकसर कुछ न कुछ करंट न्यूज से संबंधित जानकारियां, टिप्पणियां, तसवीरें आदि पोस्ट किया करते रहे हैं.

कई बार सामयिक, राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं पर अपने विचार भी लिख डालते हैं. साथ ही उन में पारिवारिक जिंदगी पर भी कुछ बातें होती हैं. जैसे बेटी की शादी, आयोजनों में भागीदारी, दिवंगत पत्नी से जुड़ी यादें, दोस्तों के साथ तसवीरें, साहित्य और देशदुनिया की बातें भी होती हैं.

इसी सिलसिले में पहली अप्रैल को उन्होंने हैशटैग के ‘सुखदुख’ का इस्तेमाल करते हुए एक भावुक पोस्ट लिखी थी.

दरअसल, चौंकाने वाली उस पोस्ट में उन्होंने अपने दिल की बात लिख डाली थी, जो एक तरह से उन की व्यक्तिगत सूचना भी थी. उस के जरिए उन्होंने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत के बारे जानकारी दी थी. उसी के साथ एक अन्य हैशटैग के साथ भोपाल की एक 56 वर्षीया आईएएस आधिकारी शैलबाला मार्टिन का भी जिक्र किया था. उन का विशेष परिचय दिया था, जो एकदम से निजी था.

बात 2 साल पहले की है. एक टेलीविजन डिबेट पर राकेश पाठक और शैलबाला मार्टिन आमंत्रित किए गए थे. उन्हें एक ऐसे टौपिक पर बहस में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था, जो सरकार की नीतियों को लागू करने में आड़े आने वाले ब्यूरोक्रेट की मंशा को ले कर थी. उस में भ्रष्टाचार ही मुख्य मुद्दा था. उस डिबेट में काफी गरमागरम बहस हुई.

बतौर ब्यूरोक्रेट मार्टिन ने अपना दमदार पक्ष रखा, जबकि एक पत्रकार के नजरिए से पाठक ने भ्रष्टाचार की वजहों का संतुलित विश्लेषण किया. उस डिबेट में राजनीतिक दलों से शामिल राजनेताओं ने भी अपनी बातें बड़ी साफगोई से रखते हुए अपने दामन पाकसाफ होने की दलीलें पेश की थीं.

डिबेट खत्म होने के बाद पत्रकार राकेश पाठक ने शैलबाला की तारीफ में सिर्फ इतना कहा, ‘‘आप के विचारों से मैं व्यक्तिगत तौर पर सहमत हूं.’’

शैलबाला ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आप ने भी सटीक तर्क दिए.’’

‘‘इसी बात पर एकएक कप कौफी हो जाए,’’ पाठक तुरंत बोल पड़े.

‘‘हांहां, क्यों नहीं. पेमेंट आप को करनी होगी.’’ हंसती हुई बोली, ‘‘इस बीच आप के साथ कुछ और बातें शेयर करने का मौका मिल जाएगा. मुझे भी लिखने का शौक है.’’

कुछ मिनटों में दोनों एक छोटे से राउंड टेबल पर आमनेसामने बैठे थे. कौफी का प्याला आ चुका था. पाठक ने कौफी का प्याला हाथ में लेते हुए पूछा, ‘‘आप की नजर में भ्रष्टाचार की जड़ कहां है?’’

‘‘जनता में,’’ शैलबाला तुरंत बोल पड़ीं.

‘‘वह कैसे?’’ पाठक ने दूसरा सवाल किया.

‘‘जनता हड़बड़ी में रहती है. हर काम शार्टकट में चाहती है. जन प्रतिनिधि पर आंखें मूंद कर भरोसा कर लेती है. नियमकानून से दूरी बनाए रखती है. जाति के जरिए रास्ते बनाती है. केवल अधिकार की बात करती है. अपना कर्तव्य कुछ नहीं समझती है. जुझारूपन की बहुत कमी है.’’

शैलबाला बोलती चली जा रही थीं और पाठक हाथ में कौफी का प्याला पकड़े उन्हें एकटक निहार रहे थे. शैलबाला ने भी अचानक महसूस किया कि डिबेट तो कब की खत्म हो चुकी है और वह उसी रौ में बह रही हैं. सौरी बोलते हुए कौफी का अपना प्याला हाथ में उठा लिया.

‘‘इस में सौरी की क्या बात है, आप ने बिलकुल सही कहा. जनता में जागरूकता की कमी है,’’ पाठक बोले.

‘‘जिस दिन जनता जागरूक हो जाएगी, उस दिन ला एंड और्डर उन के कदमों में होगा,’’ शैलबाला ने कहा.

उन की बातों से एक विश्वास झलक रहा था.

‘‘लेकिन जनता को जागरूक करेगा कौन?’’ पाठक ने फिर सवाल किया.

‘‘कम से कम वैसे जनप्रतिनिधि तो नहीं, जो वोट बैंक बनाने का दिमाग लगाते हैं. मेरे पास इस के उदाहरण भरे पड़े हैं. शायद ही कोई चुना हुआ जनप्रतिनिधि हो, जिस ने कौमन समस्या के समाधान की बातें की हों.’’

‘‘इस के लिए क्या किया जाना चाहिए?’’ पाठक ने पूछा.

‘‘आप पत्रकार हैं, आप ही बताइए क्या होना चाहिए, जिस से भ्रष्टाचार की बुनियाद पर जोरदार हथौड़ा लगाया जा सके,’’ शैलबाला ने पाठक के प्रश्न का उत्तर उन से ही जानना चाहा.

‘‘मेरा तो एक ही बात पर हमेशा जोर रहा है, ब्यूरोक्रेट को भी जनता के बीच जाना चाहिए,’’ पाठक बोले.

‘‘अरे, आप ने तो मेरे मन की बात कह दी. मेरे विचार आप से मिलते हैं. मैं भी ऐसा ही काफी पहले से सोचती थी,’’ शैलबाला चहकती हुई बोलीं.

‘‘तो फिर इस का इंतजार क्यों?’’ पाठक बोले.

‘‘आप इस में मेरा साथ देंगे तो बोलिए. मैं इस की कार्ययोजना बना सकती हूं. इस बारे में मेरी एक प्लानिंग है. उस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगी,’’ शैलबाला बोलीं.

‘‘क्यों आज क्यों नहीं? कौफी खत्म हो गई इसलिए तो नहीं?’’ पाठक हंसते हुए बोले.

‘‘उम्मीद करती हूं, आप से अगली मुलाकात इसी विषय को ले कर होगी,’’ शैलबाला बोलीं.

तभी मोबाइल पर एक नंबर फ्लैश हुआ और वह चलने को उठ खड़ी हुईं. पाठक समझ गए कि स्टूडियो के बाहर शैलबाला की गाड़ी तैयार है. उन्होंने फटाफट उन का निजी मोबाइल नंबर भी ले लिया. सोशल मीडिया पर दोनों दोस्त बन गए.

पाठक की सास ने कान में फूंका मंत्र

दरअसल, दोनों की वह पहली मुलाकात नहीं थी. उन की अकसर न्यूज और सरकार के प्रोजेक्ट के सिलसिले में औपचारिक मुलाकातें होती रहती थीं, लेकिन उस रोज की मुलाकात खास बन गई थी. उन्होंने एकदूसरे के मन को छू लिया था.

सामाजिक सरोकार की बातें करते हुए एक लक्ष्य पर निशाना साधने की पहल की थी. चेहरे पर प्रसन्नता और आत्मविश्वास के भाव थे. उन्होंने हाथ हिला कर अभिवादन के साथ एकदूसरे से विदा लिया था.

इस क्रम में दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी बढ़ गया. उन के बीच समाज और देशदुनिया की बातों के साथसाथ पारिवारिक बातें भी होने लगीं.

एक बार पाठक ने घर में छोटे से आयोजन के सिलसिले में शैलबाला को आमंत्रित कर दिया था. आयोजन काफी छोटा था, लेकिन उस मौके पर एक बड़ा निर्णय लिया जाना था. इस की जानकारी शैलबाला को तब हुई, जब वह पाठक परिवार के सदस्यों से मिलीं. पाठक ने बेटी के लिए एक रिश्ते की तलाश की थी. उस बारे में जब पाठक और उन की दिवंगत पत्नी की मां ने उन से राय मांगी, तब शैलबाला हतप्रभ रह गईं. यह बात उन के दिल को छू गई. परिवार में उन की अहमियत का एहसास हुआ.

इसी के साथ जब पाठक की बेटी ने निर्णय सुनाया कि वह भी उन की तरह आईएएस बनना चाहती है और वह उन की आदर्श हैं, तब शैलबाला और भी पाठक के परिवार के प्रति भावुक हो गईं. लौटते समय पाठक की सास ने उन के कान में धीमे से कहा था, ‘‘बेटी, जब फुरसत मिले, यहां आ जाया करो.’’

कहने को तो वह अपने राज्य मंत्रालय के दफ्तर और सरकारी बंगले के रहनसहन समेत रोजमर्रा के औपचारिक कामकाज में व्यस्त हो गई थीं, लेकिन अच्छा दोस्त बन चुके पाठक की सासूमां की बात दिमाग में रहरह कर आ ही जाती थी.

उन्हें अनायास लगने लगा था कि कोई है, जो उन्हें चाहता है. उन की बातों को महत्त्व देता है. एक परिवार है, जिस से जुड़ाव बन चुका है. कुछ लोग हैं, जिन से वह खुल कर बातें कर सकती हैं.

उन दिनों कोरोना काल के दूसरे फेज का दौर चल रहा था. महामारी के कारण प्रशासनिक कामकाज की व्यस्तताएं बढ़ी हुई थीं. इस दौरान अपने मातापिता, दोनों भाइयों का हालसमाचार लेती रहती थीं. साथ ही पाठक के परिवार वालों से भी फोन पर उन का समाचार ले लिया करती थीं.

यह कहें कि इस दौरान शैलबाला की पाठक समेत उन के परिवार के लोगों से निकटता और भी बढ़ गई थी.

शादी का प्रपोजल 

शैलबाला पाठक के घर गई हुई थीं. घर में उस दिन भी उन की मुलाकात पाठक की सासूमां से हुई. उन से पारिवारिक बातें होने लगीं. बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ, तब ऐसा लगा कि बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

तभी शैलबाला को मालूम हुआ कि पाठक की पत्नी प्रतिभा की 2015 में कैंसर से देहांत होने के बाद वह किस तरह से अपने आप को अकेला महसूस करने लगे थे.

बातोंबातों में पाठक की सास ने उन से पूछ लिया कि उन्होंने अभी तक शादी क्यों नहीं की? इस पर शैलबाला पहले तो थोड़ी देर चुप हो गईं, फिर उन्होंने बताया कि उन की शादी जब एक बार टल गई, तब टलती ही चली गई. कभी परिवार के लोगों को उन के योग्य लड़का नहीं मिला तो कभी कोई पसंद आया तो उस का धर्म आड़े आ कर दीवार बन गया.

पापा बहुत से रिश्ते बताते थे, लेकिन मुझे पसंद नहीं आया था. सच कहूं तो नौकरी के बाद मेरे पापा ने शादी को ले कर बात की थी. कई रिश्ते भी बताए, लेकिन मैं तब शादी के लिए तैयार नहीं थी.

कई बार कुछ लोगों ने मेरे मातापिता से बात किए बिना मुझ से संपर्क भी किया, लेकिन वे मुझे पसंद नहीं करते थे.

नौकरी के दौरान कई लड़कों से दोस्ती तो हो गई थी, लेकिन प्यार करने वाला कोई नहीं मिला था. कभी किसी को प्यार के लायक नहीं पाया. यह भी हो सकता है कि मैं ईसाई समुदाय से आती हूं, शायद इसलिए किसी ने मुझे प्रपोज नहीं किया.

मैं थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की हूं, हालांकि दिल से नरम हूं. शायद मुझे लगता था कि कोई ऐसा इंसान मेरी जिंदगी में आए जो मेरे गुस्से को कम कर सके. मुझे अच्छी तरह समझ सके. जब से पाठक से दोस्ती हुई है, तब से मेरा गुस्सा कुछ कम हुआ है.

जहां तक शादी की बात है, तब मुझे लगता था कि शादी की कोई उम्र नहीं होती. महिलाओं को अपने जीवन के फैसले खुद लेने की आजादी होनी चाहिए. मैं ने भी अपनी जिंदगी खुद तय की है. इस में मेरा परिवार भी मेरे साथ है.

शैलबाला की बातें सुनने के बाद पाठक की सास ने कह दिया, ‘‘तुम एकदूसरे को जानते हो. तुम्हारे विचार आपस में काफी मिलते हैं. फिर तुम लोग शादी क्यों नहीं कर लेते? कहो तो मैं दामाद से बात कर लूं.’’

‘‘लेकिन..’’

‘‘लेकिन उन की बेटियों को ले कर है न! दोनों बेटियां भी चाहती हैं कि तुम उन की मां की जगह ले लो. उन्होंने ही मुझे प्रपोज करने के लिए कहा है.’’

‘‘फिर भी मुझे सोचने का कुछ वक्त चाहिए,’’ शैलबाला बोलीं.

उस रोज शैलबाला ने अपनी पुरानी जिंदगी के पन्ने खोल दिए थे. उन्होंने बताया कि 11वीं कक्षा के बाद उन्होंने कभी भी अपने मातापिता से पढ़ाई के लिए पैसे नहीं मांगे. ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्चा उठाया. डाक्टर बनना चाहती थी, लेकिन पीएमटी में 2 कोशिशों के बाद भी सेलेक्शन नहीं हो पाया.

फिर बी.एससी. में एडमिशन ले लिया. ग्रैजुएशन के बाद दोस्तों ने कहा कि वह पीएससी की तैयारी क्यों नहीं करती? लेकिन विज्ञान विषय से पीएससी कठिन था. फिर इतिहास में एमए किया.

इतिहास और लोक प्रशासन विषय के साथ पीएससी में शामिल हुई. मुख्य परीक्षा से पहले पापा की तबीयत बिगड़ गई, लेकिन मेंस क्लियर हो गया. फिर इंटरव्यू में भी सफलता मिल गई. पहले ही प्रयास में चयन हो गया. सफर यूं ही चलता रहा.

शैलबाला मार्टिन 9 अप्रैल को 57 साल की हो गईं. राकेश पाठक उन से उम्र में महज एक साल बड़े हैं. दोनों की अपनी अलग पहचान है. इंदौर की रहने वाली शैलबाला मूलत: झाबुआ इलाके से हैं. वह ईसाई समाज की हैं. उन के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई हैं. शालीन, संभ्रांत, संवेदनशील, सुंदर व्यक्तित्व की धनी और सुलझी हुई 2009 बैच की आईएएस अधिकारी हैं.

एक अविवाहित, दूसरे विधुर

इन दिनों वह मध्य प्रदेश के राज्य मंत्रालय, वल्लभ भवन, भोपाल में अतिरिक्त सचिव (सामान्य प्रशासन विभाग) के पद की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. इस से पहले वह निवाड़ी जिले की कलेक्टर और बुरहानपुर की नगर आयुक्त भी रह चुकी हैं.

दूसरी तरफ डा. राकेश पाठक मूलरूप से ग्वालियर के रहने वाले हैं. वह नवभारत, नईदुनिया, नवप्रभात, स्टेट टुडे अखबार के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों कर्मवीर समाचार पत्र के मुख्य संपादक हैं.

जैसेजैसे समय बीतता रहा, वैसेवैसे पाठक और शैलबाला की दोस्ती प्रगाढ़ होती चली गई. उन के परिवार के सदस्यों का शादी को ले कर दबाव बनने लगा. पाठक की बेटियों ने भी पाठक और शैलबाला पर शादी करने की प्लानिंग तक कर डाली.

अंतत: वह दिन भी आ गया, जब पाठक ने न केवल शैलबाला को विवाह प्रपोजल दिया, बल्कि इसे अपने फेसबुक वाल पर सार्वजनिक भी कर दिया.

एक नजर पाठक के उस पोस्ट पर डालें, जो इस प्रकार है—

अब सुख दु:ख की साथी हैं शैलबाला मार्टिन आत्मीय स्वजनो,

आज हम आप से अपने सुखदु:ख की साथी मिस शैलबाला मार्टिन का परिचय करवा रहे हैं. शैलजी इंदौर की निवासी हैं. मध्य प्रदेश काडर की आईएएस अधिकारी हैं. कलेक्टर, निगम कमिश्नर रही हैं. मध्य प्रदेश सरकार में अनेक अहम पदों का दायित्व निभा चुकी हैं.

इन दिनों राज्य मंत्रालय, वल्लभ भवन भोपाल में एडिशनल सेक्रेटरी (सामान्य प्रशासन विभाग) के पद पर पदस्थ हैं. एक कर्मठ और संवेदनशील प्रशासक होने के साथ शैल यदाकदा लिखती भी हैं. उन की सीरीज ‘अमी एक जाजाबोर’ (मैं एक यायावर) उन की फेसबुक वाल पर पढ़ी जा सकती है.

इस में वह अपने आसपास की दुनिया को एक अलग नजर से देखती और दर्ज करती हैं. अगर ऐसे ही लिखती रहीं तो भविष्य में इसी शीर्षक से उन की किताब आएगी. जाहिर है लिखेंगी ही.

हम बीते लगभग 2 बरस से मित्र हैं. इस संगसाथ में हम ने जाना कि शैल हमारी हमखयाल होने के साथसाथ एक बेहतरीन इंसान हैं. अब हम जीवनसाथी होने जा रहे हैं.

बाबा कबीर कह गए हैं—

ये तो घर है प्रेम का खाला का घर नाय

सीस उतारे भूंय धरे तब बैठे घर माय.

…सो हम दोनों अपनाअपना शीश उतार कर प्रेम के घर में बस रहे हैं.

पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन में दोनों बेटियों सौम्या और शची ने शैल का पूरे परिवार के साथ परिचय करवाया. बेटियों की नानी मां सहित पूरे कुटुंब ने शैल का पाठक परिवार में स्नेहसिक्त स्वागत किया.

शैल के बड़े भाइयों विनयजी और विनोदजी सहित पूरे परिवार का आशीर्वाद भी हम दोनों को मिला है.

मेरी धर्मपत्नी प्रतिमा प्रकृतिप्रदत्त आयु को पूर्ण कर सन 2015 में अनंत की यात्रा पर प्रस्थान कर गई थीं. अपनी अदम्य जिजीविषा से उन्होंने 5 साल ब्लड कैंसर से मोर्चा लिया था. अब आगे की यात्रा शैल के साथ तय होगी. आप की शुभकामनाएं हमारा मार्ग प्रशस्त करेंगी. इसी पोस्ट के साथ उन्होंने नई जिंदगी की महत्त्वाकांक्षाओं का जिक्र करते हुए ईस्टर के बाद विवाह बंधन में बंधने की घोषणा भी कर दी थी.

दिल को मिल गया मुकाम

इस पोस्ट के आते ही कुछ मिनटों में एक आईएएस और पत्रकार की शादी की खबर सोशल साइट पर वायरल हो गई. देखते ही देखते यूट्यूब, प्रिंट, इलेक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया के लिए दोनों की लव स्टोरी अहम खबर बन गई.

मीडिया से ले कर ब्यूरोक्रेट जगत तक में दोनों चर्चा का विषय बन गए. उन के चाहने वालों के मन में जिज्ञासा जागी कि

आखिर उन के बीच प्रेम के बीज कब, कैसे अंकुरित हुए?

इस का जवाब जानने तक सोशल साइटों पर ही उन्हें अग्रिम बधाई देने वालों का तांता लग गया. शायद ही कोई हो, जिस ने नए रिश्ते को नजरंदाज किया हो. हालांकि अधिकतर उन के बीच की नजदीकियों से भी वाकिफ थे.

पाठक की दोनों बेटियों ने पिता के फैसले का दिल से स्वागत किया और सार्वजनिक रूप से शैलबाला मार्टिन को बधाई भी दी. बेटी सौम्या ने लिखा कि हमारे परिवार में आप का स्वागत है. इस नए खूबसूरत सफर के लिए आप को और पापा को ढेर सारा प्यार.

फिर भी एक बहस का हिस्सा बन गए. क्योंकि राकेश पाठक जहां ग्वालियर जिले के रहने वाले हिंदू ब्राह्मण परिवार से हैं, वहीं शैलबाला मार्टिन इंदौर की मूल निवासी ईसाई फैमिली से.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक उन की शादी की तारीख तय नहीं हुई थी. लेकिन ईस्टर के बाद होनी तय है. बताया जाता है कि उन की प्लानिंग कोर्ट मैरिज करने की है. उस के बाद रीतिरिवाजों के मुताबिक शादी होगी. विवाह की रस्मों में धर्म का कोई बंधन नहीं होगा.

शैलबाला के अनुसार उन्हें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं है. दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति गहरा सम्मान है. इस में धर्म का कोई बंधन है ही नहीं.

(कहानी का नाटकीय रूपांतरण किया गया है)

मौत के मुंह में पहुंचे लोग- भाग 3: मध्य प्रदेश की कहानी

अब पढि़ए मध्य प्रदेश की कहानी.

सूरत में ग्लूकोज, नमक और पानी से नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने के मास्टरमाइंड कौशल वोरा ने मध्य प्रदेश में भी इन इंजेक्शनों को बेच कर कोरोना मरीजों की जान से खिलवाड़ किया. कौशल ने मुंबई को सेंट्रल पौइंट बना कर दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, चेन्नई और मुंबई सहित पूरे देश में लाखों नकली इंजेक्शन सप्लाई किए थे.

कौशल से पूछताछ के आधार पर गुजरात पुलिस ने मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से सुनील मिश्रा, कुलदीप सांवलिया और जबलपुर के सपन जैन को मई के दूसरे सप्ताह में गिरफ्तार किया. इन्होंने कौशल से हजारों इंजेक्शन खरीद कर मध्य प्रदेश में बेचे थे.

इन लोगों ने इंदौर के ही एक दवा विक्रेता को भी 17 हजार रुपए प्रति इंजेक्शन के हिसाब से 100 नकली इंजेक्शन बेच दिए थे. आम जरूरतमंद लोगों को 40 हजार रुपए तक में एक इंजेक्शन बेचा.

खास बात यह भी रही कि गिरफ्तार दलाल कुलदीप सांवलिया ने कोरोना से पीडि़त अपनी मां को भी यही नकली इंजेक्शन लगवा दिए थे. दरअसल, उसे यह पता ही नहीं था कि ये इंजेक्शन नकली हैं.

इंदौर में पुलिस की जांचपड़ताल में पता चला कि कौशल वोरा के बनाए नकली इंजेक्शनों को लगाने के बाद कुछ कोरोना मरीजों की मौत भी हो गई थी. इस के बाद पुलिस ने कौशल वोरा, उस के पार्टनर पुनीत शाह और इंदौर के सुनील मिश्रा के खिलाफ गैरइरादतन हत्या की धाराएं भी जोड़ दीं.

बाद में इंदौर की विजय नगर पुलिस ने नकली इंजेक्शन बेचने के मामले में दवा बाजार के 3 दलालों आशीष ठाकुर, चीकू शर्मा और सुनील लोधी को मध्य प्रदेश के देवास से गिरफ्तार किया.

पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि आरोपी सुनील मिश्रा मूलरूप से मध्य प्रदेश के रीवा का रहने वाला है. उस ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा का प्री एग्जाम पास कर लिया था, लेकिन सन 2012 में वह मेंस क्लीयर नहीं कर सका. इस के बाद उस ने खंडवा रोड पर खुद का मार्केट खोला. उस के पिता मध्य प्रदेश टूरिज्म में मैनेजर थे.

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बाद में सुनील ग्लव्ज, मास्क व सैनेटाइजर की दलाली करने लगा था. एक साल पहले कारोबार के सिलसिले में उस का परिचय सूरत के कौशल वोरा और पुनीत शाह से हुआ था. इस के बाद ये आपस में व्यापार करने लगे. कोरोना की दूसरी लहर में जब रेमडेसिविर इंजेक्शन की किल्लत हुई, तो सुनील ने पैसा कमाने के मकसद से कुछ लोगों से इस इंजेक्शन के लिए संपर्क किया.

कौशल व पुनीत से बात हुई, तो उन्होंने सुनील को सूरत बुलाया और अपने ठाठबाट, लग्जरी कारों और महंगे होटलों में ठहरने के जलवे दिखाए. उन्होंने उसे ये इंजेक्शन दिलाने की हामी भर ली. बाद में उसे मुंबई बुला कर पहली बार में 700 इंजेक्शन दिए. सुनील ने ये इंजेक्शन इंदौर ला कर दवा बाजार के दलाल कुलदीप सांवलिया, चीकू, सुनील लोधी आदि के जरिए बेच दिए.

सुनील से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने नकली इंजेक्शन मामले में मई के पहले पखवाड़े में सागर के यूथ कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष प्रशांत पाराशर और सांवेर के होम्योपैथी डाक्टर सरवर खान को भी गिरफ्तार कर लिया. इंदौर के दवा बाजार के एक व्यापारी गोविंद गुप्ता को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया.

कांग्रेस नेता प्रशांत ने सुनील से 65 से ज्यादा इंजेक्शन खरीदे थे. यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास ने कोरोना संकट काल में एसओएस हेल्पलाइन शुरू की थी. इस में प्रशांत को भोपाल का कोऔर्डिनेटर बनाया था. प्रशांत ने कोरोना पीडि़तों की मदद के लिए एक अभियान शुरू किया था. इसी अभियान के तहत उस ने सुनील से खरीदे नकली इंजेक्शन लोगों को बेचे थे. प्रशांत को ये इंजेक्शन नकली होने का पता नहीं था.

भोपाल की नर्स निकली बेहद शातिर

भोपाल में इस दौरान एक रोचक किस्सा सामने आया. जे.के. अस्पताल की नर्स शालिनी वर्मा कोरोना मरीजों के लिए मंगाए गए रेमडेसिविर इंजेक्शन छिपा कर रख लेती थी और मरीज को सादा पानी का इंजेक्शन लगा देती थी.

नर्स शालिनी चुराए गए ये इंजेक्शन इसी अस्पताल में काम करने वाले अपने प्रेमी नर्सिंग कर्मचारी झलकन सिंह मीणा को महंगे दाम पर बेचने के लिए दे देती थी. पुलिस ने इस मामले में झलकन को गिरफ्तार कर लिया था. उस की प्रेमिका नर्स की तलाश की जा रही थी. पता चलने पर अस्पताल प्रबंधन ने दोनों कर्मचारियों को हटा दिया.

मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में अप्रैल के चौथे सप्ताह में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी में पुलिस ने निजी अस्पतालों के 2 डाक्टरों नीरज साहू व जितेंद्र ठाकुर सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया था. पूछताछ में पता चला कि ये लोग अस्पताल से चुरा कर इंजेक्शन महंगे दामों पर बेचते थे.

बाद में गुजरात पुलिस द्वारा गिरफ्तार सूरत के कौशल वोरा और इंदौर के सुनील मिश्रा से पूछताछ में पता चला कि इन्होंने जबलपुर के सिटी हौस्पिटल में भी नकली इंजेक्शन सप्लाई किए थे. इस का खुलासा होने के बाद जबलपुर की ओमती थाना पुलिस ने सिटी हौस्पिटल के संचालक सरबजीत सिंह मोखा, दवा सप्लायर सपन जैन और अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया.

पुलिस में मुकदमा दर्ज होने का पता चलने पर अस्पताल संचालक मोखा खुद को कोरोना पौजिटिव बताते हुए 10 मई को अपने ही अस्पताल में भरती हो गया. इस पर पुलिस ने अस्पताल में पहरा लगा दिया. पुलिस ने दूसरे ही दिन मोखा की कोरोना जांच कराई. जांच रिपोर्ट निगेटिव आने पर मोखा को 11 मई को गिरफ्तार कर लिया गया.

उस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत काररवाई की गई. मोखा विश्व हिंदू परिषद के नर्मदा डिवीजन का जिलाध्यक्ष था. यह मामला सामने आने के बाद उसे पद से हटा दिया गया.

दूसरे दिन अदालत ने उसे जेल भेज दिया. मोखा ने दवा सप्लायर सपन जैन के माध्यम से सुनील मिश्रा से करीब 500 इंजेक्शन मंगाए थे. नकली इंजेक्शनों का मामला सामने आने के बाद सिटी हौस्पिटल को सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम से बाहर कर दिया गया. पुलिस ने 17 मई की रात सरबजीत सिंह मोखा की पत्नी जसमीत कौर और मोखा के सिटी अस्पताल की मैनेजर सौम्या खत्री को भी गिरफ्तार कर लिया.

मोखा के बेटे हरकरण सिंह की तलाश की जा रही थी. उस के अस्पताल में नकली रेमडिसिविर इंजेक्शन लगाने से 15 से ज्यादा लोगों की मौत होने की शिकायतें पुलिस को मिलीं.

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लखनऊ अस्पताल में हुआ इंजेक्शनों का गड़बड़ घोटाला

लखनऊ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में भी यही हाल सामने आया. अप्रैल के दूसरे पखवाड़े में पुलिस ने रेमडेसिविर इंजेक्शनों की कालाबाजारी में 2 डाक्टरों सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया. इन से पूछताछ के आधार पर एक नर्सिंग छात्र सहित 4 लोगों को पकड़ा गया और 91 नकली इंजेक्शन बरामद किए.

इन के अलावा 4 दूसरे लोगों को गिरफ्तार कर 191 इंजेक्शन बरामद किए गए. इन गिरफ्तारियों से पता चला कि लखनऊ के किंग जार्ज मैडिकल कालेज का स्टाफ भी इंजेक्शनों के गड़बड़ घोटाले में शामिल था. बाद में भी कई लोग गिरफ्तार किए गए.

मध्य प्रदेश : दांव पर सब दलों की साख

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर मध्य प्रदेश की जनता और चुनी गई कांग्रेसी सरकार से गद्दारी की थी या फिर अपनी गैरत की हिफाजत की थी, इस का सटीक फैसला अब मीडिया या चौराहों पर नहीं, बल्कि जनता की अदालत में 10 नवंबर, 2020 को होगा जब 28 सीटों पर हुए उपचुनावों के वोटों की गिनती हो रही होगी. इन 28 सीटों में से 16 सीटें ग्वालियरचंबल इलाके की हैं, जहां वोट जाति की बिना पर डलते हैं और इस बार भी भाजपा और कांग्रेस के भविष्य का फैसला हमेशा की तरह एससीबीसी तबके के लोग ही करेंगे, जिन का मूड कोई नहीं भांप पा रहा है.

साल 2018 के विधानसभा के चुनाव में इन वोटों ने भाजपा और बसपा को अंगूठा दिखाते हुए कांग्रेस के हाथ के पंजे पर भरोसा जताया था, लेकिन तब हालात और थे. ये हालात बारीकी से देखें और समझें तो महाराज कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर कम, बल्कि एट्रोसिटी ऐक्ट से पैदा हुई दलितों और सवर्णों की भाजपा से नाराजगी ज्यादा थी.

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दलित इस बात से खफा थे कि भाजपा सवर्णों को शह दे रही है और इस मसले पर अदालत भी उस के साथ है, इस के उलट ऊंची जाति वाले इस बात से गुस्साए हुए थे कि संसद में अदालत के फैसले को पलट कर मोदी सरकार उन की अनदेखी करते हुए दलितों को सिर चढ़ा रही है, जबकि वे हमेशा उसे वोट देते आए हैं.

इसी इलाके में बड़े पैमाने पर एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर हिंसा हुई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही तबकों के वोट भाजपा से कट कर कांग्रेस की झोली में चले गए और वह इस इलाके की 36 सीटों में से 26 सीटें ले गई.

भाजपा राज्य में 230 सीटों में से महज 109 सीटें ले जा पाई और कांग्रेस 114 सीटें ले जा कर बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की मदद से अल्पमत की सही सरकार बना ले गई.

दिग्गज और तजरबेकार कमलनाथ ने बहैसियत मुख्यमंत्री जोरदार शुरुआत की जिस से लोगों को आस बंधी थी कि 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार भाजपा से बेहतर साबित होगी, लेकिन सवा साल में ही कांग्रेस की खेमेबाजी और फूट उजागर हुई तो हुआ वही जिस का हर किसी को डर था.

कमलनाथ और परदे के पीछे से सरकार हांक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी शुरू कर दी नतीजतन वे राम भक्तों की पार्टी से जा मिले जिस के एवज में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में ले लिया और उन के 22 समर्थक विधायकों की मदद से सरकार बना ली जिस की अगुआई एक बार फिर वही शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं, जिन्हें जनता ने 2018 में खारिज कर दिया था.

इतना ही नहीं, भाजपा ने सिंधिया समर्थक 14 विधायकों को मंत्री पद से भी नवाजा और वादे या सौदे के मुताबिक सभी को उन की सीटों से ही टिकट भी दिए.

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सब की हालत पतली

अब क्या ये सभी कांग्रेसी भाजपा के हो कर दौबारा जीत पाएंगे, यह सवाल बड़ी दिलचस्पी से सियासी गलियारों में पूछा जा रहा है जिस का सटीक जवाब तो 10 नवंबर को ही मिलेगा, पर इन नए भगवाइयों की हालत खस्ता है, जो पहले भाजपा की बुराई करते थकते नहीं थे और अब जनता को बता रहे हैं कि भाजपा क्यों कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन ऐसा करते और कहते वक्त उन की आवाज में वह दमखम नहीं रह जाता जो 2018 के चुनाव प्रचार के वक्त हुआ करती था. कांग्रेस इन्हें गद्दार और दागी कह तो रही है, लेकिन उस के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर क्यों वह अपने विधायकों को बांधे रखने में नाकाम रही और क्यों उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने मजबूर होना पड़ा.

अब ज्यादातर सीटों पर मुकाबला कांग्रेस बनाम कांग्रेस छोड़ चुके नए भाजपाइयों के बीच हो रहा है. भाजपा को बहुमत के लिए 9 सीटें और चाहिए, जबकि कांग्रेस को सरकार बनाने पूरी 28 सीटों पर जीत की दरकार है. लेकिन राह दोनों की ही आसान नहीं है, तो इस की अपनी वजहें भी हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रह गए हैं और भाजपा कार्यकर्ता सिंधिया खेमे की खातिरदारी में जुटने से बच रहा हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि ये जीत भी गए तो उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता को यह बताने लगे हैं कि वे और उन के समर्थक दिलोदिमाग दोनों से भाजपाई हो चुके हैं. इस के लिए वे जयजय श्रीराम का नारा सड़कों पर आ कर लगाने लगे हैं और भाजपाई उसूलों पर चलते हुए संघ के दफ्तर की भी परिक्रमा करने लगे हैं.

दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को यह एहसास है कि उन के पास खासतौर से इस इलाके में जमीनी कार्यकर्ताओं का टोटा है और 16 में से कोई 10 सीटों पर सिंधिया खेमे के उम्मीदवारों की खुद की अपनी भी साख है जिसे तोड़ पाने के लिए उन के पास काबिल और लोकप्रिय उम्मीदवार नहीं हैं जिस की भरपाई करने वे सिंधिया की गद्दारी को चुनावी मुद्दा बनाने की जुगत में भिड़े हैं.

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भाजपा निगल रही बसपा वोट

कोई मुद्दा न होने और कोरोना महामारी के चलते वोटिंग फीसदी कम होने के डर से भी सभी पार्टियां हलकान हैं. ऐसे में जो पार्टी अपने वोटर को बूथ तक ले आएगी, तय है कि वह फायदे में रहेगी. साफ यह भी दिख रहा है कि कोरोना के डर के चलते बूढ़े वोट डालने नहीं जाएंगे. इस इलाके में कभी मजबूत रही बसपा अब दम तोड़ती नजर आ रही है. 2018 के चुनाव में वह यहां महज एक सीट जीत पाई थी जो अब तक का उस का सब से खराब प्रदर्शन था, इस के बाद भी 6 सीटों पर उस ने भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बराबरी से बिगाड़ा था. बसपा के वोटरों पर इन दोनों पार्टियों की नजर है, जिस के चलते दोनों का दलित प्रेम उमड़ा जा रहा है.

मायावती का भाजपा के लिए झुकाव किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दलित समुदाय कई फाड़ हो चुका है. सामाजिक समरसता के जरीए भाजपा एससीबीसी तबके में थोड़ीबहुत ही सही सेंध लगा चुकी है. उसे उम्मीद है कि अगर इस तबके के 30 फीसदी वोट भी उसे मिले तो सवर्ण वोटों के सहारे दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही इस जंग को वह जीत लेगी. दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछली बार की तरह ये वोट उसे ही मिलेंगे. बसपा के खाते में अब वही वोट जा रहे हैं जो 20 साल से उसे मिलते रहे हैं, लेकिन मायावती के ढुलमुल रवैए के चलते दलित नौजवान वोटर यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी पार्टी हकीकत में उस की हिमायती है.

साख का सवाल

ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह साबित करने में पसीने आ रहे हैं कि 2018 की तरह वोट उन के नाम पर पड़ेंगे तो शिवराज सिंह भी यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा और वे खुद पहले की तरह अपराजेय हैं, इसलिए उन्होंने ‘शिवज्योति ऐक्सप्रेस’ का नारा दिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बूआ कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे भी अपने बबुआ के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रही हैं.

साख मायावती की भी दांव पर लगी है कि बसपा अगर इस बार भी सिमट कर रह गई तो आगे के लिए उस के दामन में कुछ नहीं रहेगा. कमलनाथ को भी साबित करना है कि वे एक बेहतर मुख्यमंत्री थे जो अपनों की ही साजिश का शिकार हुए थे.

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यानी अब जो जीता वह सिकंदर हो जाएगा और हारे के पास हरि नाम भी नहीं बचेगा, इसलिए सारे नेता वोटरों को लुभाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब का सहारा ले रहे हैं, जिन्हें मालूम है कि यह चुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा अहम उन के वजूद के लिए है और जानकारों की दिलचस्पी इस इलाके में बिहार के बराबर ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अगर कांग्रेस वोटर के दिमाग में यह बात बैठा पाई कि भाजपा ने जोड़तोड़ कर सरकार बना कर राज्य का भला नहीं किया है तो बाजी भगवा खेमे को महंगी भी पड़ सकती है, क्योंकि विकास और रोजगार के मुद्दों पर तो वोटर की नजर में दोनों ही पार्टियां नकारा हैं.

शादी के नाम पर धोखाधड़ी करने वालों से बचकर रहे

13 नवंबर 2019 को मध्यप्रदेश की जबलपुर पुलिस ने एक यैसे मामले का खुलासा किया था , जिसमें कुंवारे लड़को की दूसरे राज्यों की खूबसूरत लड़कियों से शादी कराकर धोखाधड़ी की जाती थी. जबलपुर निवासी संजय सिंह नाम के युवक ने पुलिस को शिकायत में बताया  कि एक बेवसाइट के माध्यम से शादी के लिए रिश्ते की बात आगे बढ़ी तो लड़की ने अपने परिवार की तंगी का रोना रोया. चूंकि लड़की खूबसूरत थी और फोन पर प्यार भरी बातें करती थी, तो संजय ने लड़की के झांसे में आकर शादी का खर्च उठाने के लिए उसके खाते में पांच लाख रुपए डाल दिए.कुछ दिनों बाद जब लड़की का मोबाइल बंद आने लगा तो संजय ने अपने आपको ठगा हुआ महसूस किया. बाद में पुलिस ने मामले की पड़ताल करते हुए बिहार निवासी मनोहरलाल और लड़कियों के बड़े गिरोह को पकड़ा था.

आजकल अपराधियों द्वारा धोखाधड़ी और ठगी के नये नये तरीके ईजाद किए जा रहे हैं, जिनके माध्यम से भोले भाले गांव कस्बों के लोगों के साथ पढे लिखे शहरी युवकों को भी लूटा जा रहा है. शादी विवाह तय कराने, शादी होने के बाद कुछ दिन ससुराल में रहकर सोने चांदी के गहने हड़पकर दुल्हन के गायब होने की घटनाएं आम हो गई हैं.

कहा जाता है कि शादी कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है.अपने लड़के लड़कियों की‌ शादी तय करने के पहले बिचोलियों की बातों पर भरोसा न कर दोनों पक्षों को एक दूसरे के साथ बैठकर आर्थिक स्थिति के साथ वर बधु की शिक्षा और काम धंधे के बारे में अच्छी तरह से जानकारी जुटा लेना चाहिए. क‌ई वार लोग बढ़ा चढ़ा कर अपनी हैसियत बताते हैं, इसलिए इसकी जानकारी तीसरे पक्ष से जुटाने में भी कोई परहेज़ नहीं करना चाहिए.अपनी लड़की की शादी तय कर लड़के वालों से नगदी रकम और स्वर्ण आभूषण लूटने वालों से सावधान रहने की जरूरत है.

मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के पश्चिम में आखिरी छोर पर बसा एक गांव है सिरसिरी . यह गांव दो जिलों रायसेन और होशंगाबाद की सीमाओं से लगा हुआ है . कल कल बहती नर्मदा नदी और दुधी नदी के संगम पर बसे सिरसिरी गांव की आबादी मुश्किल से दो हजार होगी . आज भी इस गांव में स्वास्थ्य और शिक्षा की अच्छी सुविधायें गांव वालों को नसीब नहीं है .यही कारण है कि इस गांव के लड़कों की शादी मुश्किल से हो पाती है .

पहुंच बिहीन और बुनियादी सुख सुविधाओं से कोसो दूर  खेती किसानी वाली पृष्ठभूमि के इस गांव में शिवनारायण शर्मा का परिवार रहता है . नर्मदा नदी के तटो की उर्वर भूमि में कृषि कार्य करने वाले शिवनारायण के परिवार में एक अविवाहित वेटा रूपेश है ,जिसकी उम्र लगभग 25-26 वर्ष होगी.  रूपेश को गांव वाले प्यार से रूपा के नाम से भी बुलाते हैं, . गांव में कक्षा दसवी तक पढ़ने के लिये एक सरकारी हाई स्कूल है जिसमें केवल एक शिक्षक ही है . यही कारण है कि दसवी कक्षा पास होते ही गांव वाले अपने लड़के लड़कियों की शादी कर देते हैं . गांव देहात के परिवेश के लिहाज से  रूपेश की उम्र अधिक होने एवं दूरस्थ गांव में निवास करने के चलते शादी के लिये रिश्ते तो आते थे ,  परन्तु लड़की वाले गांव के हालात देखकर रिश्ता तय करने से परहेज करते थे . रूपेश की  शादी न होने से शिवनारायण काफी परेशान रहते थे .

दीपावली का त्यौहार बीतते ही रायसेन जिले के बम्हौरी गांव के एक परिचित रिश्तेदार कौशल प्रसाद शर्मा ने रूपेश की शादी के लिए रिश्ते की पेशकश की. कौशल प्रसाद ने शिवनारायण को बताया कि भोपाल के महामाई वाग इलाके में रहने वाले नंदकिशोर शर्मा अपनी वेटी रागिनी के लिये लड़का तलाश रहे हैं.  शिवनारायण ने इसके लिए हामी भर दी तो कुछ दिनों के बाद नंदकिशोर शर्मा रूपेश को देखने सिरसिरी गांव आ ग‌ए.

रिश्ते की बात चली तो घर वालों की खुशी का ठिकाना न रहा . नंदकिशोर शर्मा ने शिवनारायण को बताया  – “मेरी वेटी रागिनी बी ए तक पढ़ी लिखी  है . उसने कम्प्यूटर और ब्यूटी पार्लर का कोर्स भी किया है,परन्तु परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है . इसके चलते रागिनी की शादी नहीं हो पा रही है “.

शिवनारायण  ने भी यह सोचकर कि मुश्किल से वेटे के लिये कोई अच्छा रिश्ता आया है ,हामी भरते हुए कहा – “देखिए हमें दहेज की कोई भूख नहीं है . हमें तो अपने वेटे के लिये सुंदर और सुशील लड़की चाहिये “.

बात आगे बढते ही शिवनारायण रुपेश के लिए लड़की देखने रूपेश और कौशल प्रसाद के साथ भोपाल पहुंच गए. नंदकिशोर ने उनकी खूब खातिरदारी की . जब रागिनी उनके लिए चाय नाश्ता लेकर आई तो शिवनारायण और रूपेश को पहली ही नज़र में रागिनी भा गई.

लड़के लड़की की देखा परखी होते ही जब दोनों पक्षों की रजामंदी हुई तो पंडित को बुला कर सगाई की रस्म भी हो गई. पूरी तैयारी से गये शिवनारायण ने सगाई में पांच तोले सोने से बनी चूड़ियां और एक अंगूठी ,पायल , साड़ी , मिठाई और फल फूल देकर धूमधाम से सगाई की रस्म निभाई .

दोनों पक्षों के रिश्तेदारों की सहमति से 5 दिसम्बर शादी का मुहुर्त चुना गया . साथ ही केटरिंग का खर्चा आधा आधा देने की बात पर सबकी सहमति भी बन गई . नंदकिशोर वोले – “हम भोपाल के अवधपुरी इलाके के मैरिज गार्डन से  शादी समारोह करना चाहते हैं “.

शिवनारायण ने कहा – “ये तो बड़ी खुशी की बात है”.

“लेकिन मेरिज गार्डन में

कैटरिंग का खर्चा लगभग 4 लाख रूपये आयेगा” नंदकिशोर ने माथे पर चिंता की लकीरें बनाते हुए कहा.

शिवनारायण बोले -” आप चिंता न करें आधा खर्च हम दे देंगे”.

शादी समारोह की सहमति बनने के बाद दोनों पक्षों के शादी के आमंत्रण कार्ड भी बंटने लगे .  शादी के करीब एक सप्ताह पहले जब नंदकिशोर निमंत्रण पत्रिका देने सिरसिरी गांव आये तो उन्हे शिवनारायण ने केटरिंग के खर्च के लिये अपने हिस्से के दो लाख रूपये उसी समय यह सोचकर दे दिये कि उन्हें शहर में शादी की व्यवस्थाएं करने में कोई अड़चन न हो .

गांव देहात में प्रचलित परम्पराओं के अनुसार शिवनारायण के घर में मंगलगान होने लगे . 4 दिसम्बर को रूपेश के परिवार द्वारा गांव वालों को भोज में पंगत की जगह डिनर दिया गया . दूसरे दिन वे बड़े ही धूमधाम से अपने रिश्तेदारों और गांव के प्रमुख लोगों के साथ बस में सवार होकर दूल्हे की बारात लेकर शाम को भोपाल पहुच गये .लड़की पक्ष द्वारा कार्ड में दिये गये पते 284 /सी सेक्टर अवधपुरी में एक मैरिज गार्डन के पास जब वारात पहुंची तो वहां कोई इंतजाम न देखकर वारातियों को निराशा हुई . लड़के के पिता को यह तो पता था कि लड़की के परिवार वालों की माली हालत ठीक नहीं है , लेकिन बारात के रूकने के लिये कोई माकूल इंतजाम न पाकर उन्हे भी हैरानी हुई . मैरिज गार्डन में मौजूद कर्मचारी से पूछताछ करने पर पता चला कि इस गार्डन में आज की तारीख में कोई शादी नहीं है ,तो वारातियों के साथ लड़के के पिता का माथा ठनका . लड़की के पिता के मोबाइल नंबर पर बात करने की कोशिश की तो पता चला उनका मोबाइल स्विच आफ बता रहा है . आनन फानन में वारात की बस को सड़क किनारे खड़े करके वे नंदकिशोर के घर महामाई का वाग पहुंचे तो मकान मालिक ताराचंद जैन ने बताया कि वो एक महिना पहले ही मकान छोड़कर चले गये हैं .मकान मालिक ने बताया कि वे यह बताकर भी नहीं गये हैं कि कहां शिफ्ट हो रहे हैं .

अपने वेटे की शादी के अरमान पूरा न होते देख शिवनारायण को बड़ा दुख हुआ .पल भर को उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया .होश आते ही उन्हे समझ आ गया था कि वेटे से शादी करने के नाम पर उनसे ठगी की गई है .दुल्हन रागिनी के अपने परिवार के साथ गायब होने से शिवनारायण को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें . उन्हे बार बार यही डर सता रहा था कि  समाज में उनकी क्या इज्जत रह जायेगी . जैसे तैसे  शिवनारायण और दूल्हे के परिजनों ने वारातियों से आकर यह कह दिया कि लड़की के परिवार में गमी हो जाने के कारण शादी स्थगित हो गई है , इसलिये अब विवाह कार्यक्रम बाद में होगा . दूल्हे रूपेश को जब दुल्हन के गायब होने की जानकारी दी गई तो रूपेश का दिल कांच की तरह टूट गया . रूपेश ने जो अपनी शादी के लिए जो सपनों का महल बनाया था,वह   ताश के पत्तों की तरह पल भर में विखर चुका था .

किसी तरह साथ में आये वारातियों को बहाना बनाकर वापिस सिरसिरी गांव रवाना कर शिवनारायण अपने ममेरे भाई रमाकांत शुक्ला के साथ भोपाल के ऐशवाग पुलिस थाने पहुंचे .

उस समय पुलिस थाने में अपने कक्ष में मौजूद टी आई अजय नायर किसी जरूरी केस की फाईल पलट रहे थे . शिवनारायण और रमाकांत ने जैसे ही पुलिस थाने के अंदर बने टीआई साहब के कमरे में प्रवेश किया तो उनका ध्यान फाइल से हटा . प्रश्नवाचक निगाहो से घूरते हुये उन्होने पूछा – ‘‘क्या काम है कैसे आये हो’’ ? शिवनारायण ने घबराते हुये कहा – “साब हमारे साथ ठगी हुई है . रिपोर्ट लिखाने आये हैं” . टीआई अजय नायर ने दोनों को सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुये कहा – ‘‘ हां , बताइये किसने आपके साथ धोखाधड़ी की  हैं’’ . भरी ठंड में अपने माथे पर उभर आये पसीना को पोंछते हुये शिवनारायण ने एक ही सांस में उनके साथ हुई घटना का ब्यौरा दे दिया . टीआई अजय नायर ने हबलदार को बुलाकर शिवनारायण की रिपोर्ट लिखने का निर्देश दिया और भरोसा भी दिलाया कि उनके साथ न्याय होगा . जल्द ही धोखाधड़ी करने वाले नंदकिशोर को  खोज निकालेंगे .भोपाल के एशवाग पुलिस स्टेशन में अपने साथ हुई ठगी और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद शिवनारायण दूसरे दिन सुबह जब अपने गांव सिरसिरी पहुंचे तो उनके वेटे की वारात वैरंग आने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी . शिवनारायण के घर में खुशी की जगह मातम जैसा माहोल था .दूल्हा रूपेश और उसकी मां गहरे सदमें में थे . भोपाल के अखवारों में इस धोखाधड़ी की खबर प्रकाशित हुई थी जो सोशल मीडिया में वायरल होकर गांव तक भी पहुंच चुकी थी . सिरसिरी गांव में शिवनारायण के घर उनके शुभचिंतकों का आना जाना शुरू हो गया था .

इस घटनाक्रम को चार महीने का समय हो चुका है , लेकिन भोपाल की ऐशबाग थाने की पुलिस को गायब दुल्हन और इसके परिजनों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है. शिवनारायण को दो लाख नगद, लगभग तीन लाख रुपए के आभूषण, कपड़े और गांव में कराये गये भोज में तीन लाख रुपए सहित लगभग आठ लाख रुपए की चपत लगी है. शादी कराने के नाम पर हुई धोखाधड़ी की यह घटना बताती है कि हमें विवाह संबंध तय करने से पहले अच्छी तरह से तहकीकात पूरी करके आगे के कदम उठाना चाहिए. शादी तय करने में केवल बिचोलियों पर भरोसा कर उतावले होने पर लाखों रुपए लुटने के साथ समाज में किरकिरी भी होती है.

कर्जमाफी: क्या फटेहाल किसानों को राहत मिलेगी?

5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में 3 राज्यों में कांग्रेस ने अपनी पकड़ बना कर यह जता दिया है कि वह दमदार तरीके से वापसी करने को तैयार है. अपने वादों में दम भरने के लिए उसने किसान कर्जमाफी मुद्दे को सब से अहम रखा था.

किसानों का कर्ज तो माफ हुआ ही, साथ ही छत्तीसगढ़ में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने धान का समर्थन मूल्य बढ़ा कर वाहवाही भी बटोर ली. पर एक बात समझ से परे रही कि किसानों का जो कर्ज माफ हुआ है, वह किसके पैसों से हुआ है? जनता ने जो टैक्स सरकार को अदा किया उन पैसों से या फिर पार्टी फंड से?

सरकार बनने से पहले नेताओं ने किसानों के कर्ज को माफ करने का ऐलान किया था और आननफानन इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया. लेकिन हकीकत कुछ दिनों बाद सामने आएगी कि इस में कितने किसानों का कर्ज माफ हुआ, कितनों का नहीं. क्योंकि इस तरह के कामों में अनेक नए नए नियम सामने आ जाते हैं, जिस के कारण सभी कर्जदारों को इस का सौ फीसदी फायदा नहीं मिलता.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करने की बात कही थी. सत्ता संभालते ही तीनों राज्यों की सरकारों ने सब से पहला काम किसानों की कर्जमाफी का किया. कहीं किसान आम चुनाव 2019 में बिदक न जाएं इसलिए उन्हें खुश करने के लिए ऐसा किया गया.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी. राजस्थान के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किसानों की कर्जमाफी का ऐलान कर दिया. राज्य सरकार किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज माफ करेगी. इससे सरकारी खजाने पर 18,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

इस पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा कि हम ने 10 दिन की बात कही थी, लेकिन यह तो 2 ही दिन में कर दिया.

कांग्रेसशासित तीनों राज्यों की कर्जमाफी के ऐलान के बाद असम में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भी किसानों को कर्जमाफी का तोहफा दिया. इस कर्जमाफी का फायदा 8 लाख किसानों को मिल सकता है, जिससे सरकार पर 600 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

वहीं दूसरी ओर गुजरात सरकार ने भी ग्रामीण इलाकों के बिजली उपभोक्ताओं का बिल माफ करने का ऐलान किया. सरकार किसानों के लोन का 25 फीसदी (अधिकतम 25 हजार रुपए) माफ करेगी. इस योजना का लाभ उन किसानों को मिलेगा, जिन्होंने पीएसयू बैंकों और किसान क्रैडिट कार्ड के जरिए लोन लिया था.

रायपुर में मुख्यमंत्री का पद संभालते ही भूपेश बघेल ने नया छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का संकल्प दोहराते हुए 3 बड़े फैसले लिए. कांग्रेस सरकार की पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों का 6,100 करोड़ रुपए का कर्ज माफ करने के अलावा धान का समर्थन मूल्य 2,500 रुपए प्रति क्विंटल करने का फैसला लिया गया जबकि तीसरा फैसला झीरम घाटी से संबंधित था.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,700 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 2,500 रुपए कर दिया.

वहीं मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ ग्रहण के थोड़ी देर बाद ही किसानों का कर्ज माफ करने के आदेश पर दस्तखत कर दिया था. इस आदेश के साथ ही किसानों को सरकारी और सहकारी बैकों द्वारा दिया गया 2 लाख रुपए तक का अल्पकालीन फसल कर्ज माफ होगा.

इस फैसले के अलावा सरकार ने कन्या विवाह और निकाह योजना में संशोधन कर अनुदान राशि 28,000  से बढ़ा कर 51,000 रुपए करने का फैसला लिया. इस के साथ ही सरकार ने अब सभी आदिवासी अंचलों में जनजातियों में प्रचलित विवाह प्रथा से होने वाले एकल और सामूहिक विवाह में भी मदद देने का फैसला किया है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पहली फाइल साइन की है, वह है किसानों का 2 लाख रुपए तक का लोन माफ करने की. जैसा उन्होंने वादा किया था.

किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग, मध्य प्रदेश के प्रमुख सचिव के दस्तखत के साथ जारी एक पत्र में लिखा गया है कि 31 मार्च, 2018 के पहले जिन किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज बकाया है, उसे माफ किया जाता है.

बताते चलें कि इस बार मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने कमलनाथ की अगुआई में ही लड़ा था. कमलनाथ को अरुण यादव की जगह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया और उन की अगुआई में ही पार्टी चुनाव में सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी.

कांग्रेस को बहुमत के लिए जरूरी 116 सीटें अपने दम पर तो नहीं मिलीं लेकिन समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीयों के सहयोग से वह राज्य में सरकार बनाने में कामयाब हो गई.

लोकसभा चुनाव भी नजदीक ही है. इसी को ध्यान में रखते हुए असम सरकार ने भी किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान कर दिया है. इस कर्जमाफी का फायदा 8 लाख किसानों को मिलेगा. इससे सरकार पर 600 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इस के अलावा गुजरात सरकार ने भी ग्रामीण इलाकों के बिजली उपभोक्ताओं का बिल माफ करने का ऐलान किया.

वहीं किसानों के लिए एक ब्याज राहत योजना भी होगी, जिस के तहत किसानों को 4 फीसदी ब्याज दर पर लोन दिया जाएगा. इस के अलावा असम सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली पैंशन को 20,000 से बढ़ा कर 21,000 रुपए करने की तैयारी में है.

कांग्रेसशासित राज्यों में हुई किसानों की कर्जमाफी आम आदमी के लिए परेशानी का सबब तो बना ही, क्योंकि इस का बोझ आने वाले समय में आम आदमी पर पड़ेगा. भले ही कर्जमाफी के फैसले से किसानों की कुछ हद तक चिंता कम हुई हो, पर यह टिकाऊ योजना नहीं है. इस से अच्छा होता कि सरकार उन के भले के लिए कोई ऐसी ठोस योजना तैयार करती तो शायद किसान खुशहाल होता.

जानें काले गेहूं पर सफेद झूठ

मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से 40 किलोमीटर दूर बसे कस्बे देपालपुर के गांव शाहपुरा के एक किसान सीताराम गेहलोत इन दिनो बेहद खुश हैं. जो भी सुनता है उनके गांव की तरफ भागता है. सीताराम ने काला गेंहू बोया है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं और जो जानते हैं वह बड़ा दिलचस्प और हैरतअंगेज है कि इस गेंहू की बनी रोटी खाने से न केवल कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ठीक होती है बल्कि दूसरी कई डायबिटीज़, मोटापा और हाइ ब्लडप्रेशर सरीखी बीमारियाँ भी दूर होती हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि काला गेंहू खाने से तनाव भी दूर होता है और दिल की बीमारी यानि हार्ट अटैक भी नहीं होता.

सीताराम गेंहू की यह अनूठी किस्म पंजाब के नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नालाजी इंस्टीट्यूट यानि एनएबीआई से लाये हैं. जिसे नाबी भी कहा जाता है. गेहूं का रंग हरे और पकने के बाद पीले के अलावा भी कुछ और खासतौर से काला हो सकता है इस बात पर भरोसा करना मुश्किल काम है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि काले रंग का गेहूं होता है पर क्या वह वाकई उतना चमत्कारी होता है जितना बताया जाता है, यह जरूर शक वाली बात है.

lie on black wheat

सीताराम गेहलोत काले गेंहू के बीज के लिए 2 साल से नाबी के चक्कर काट रहे थे, तब कहीं जाकर इस साल उन्हें 5 किलो बीज मिला जिसे वे श्री विधि से उगा रहे हैं इस विधि में फसलों की पैदावार ज्यादा होती है और फसल पर तेज हवा और पानी का असर नहीं होता.

काला गेहूं हर किसी की जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय है, वजह केवल इसका रंग ही नहीं बल्कि वे गिनाई जा रही खूबियां भी हैं जिनसे कई बीमारियां न होने या उनके दूर होने की भी चर्चा जमकर होती रहती है. फसल की पैदावार और बढ़वार के वक्त इस गेहूं की  वालियों का रंग हरा ही होता है. लेकिन जैसे जैसे फसल बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनका रंग बदलकर काला होने लगता है. यह कोई कुदरत का करिश्मा नहीं है, बल्कि जानकारों की मानें तो एंथोसायनिन नाम का रसायन इसका जिम्मेदार है, जिसकी अधिकता से फसलें नीली बैंगनी या फिर काले रंग की होती हैं. अनाज, सब्जी या फलों का रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट की तादाद पर निर्भर रहता है. अधिकतर पेड़ पौधे हरे क्लोरोफिल की वजह से होते हैं.

दरअसल, एंथोसायनिन एक अच्छा एंटीऔक्सीडेंट होता है, जो हरे रंग के गेहूं के मुकाबले काले गेहूं में 40 गुना ज्यादा तक होता है. काले गेहूं में आयरन भी 60 फीसदी से ज्यादा पाया जाता है.

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अगर ये खूबियां कुदरत ने काले गेहूं को बख्शी हैं तो कुछ कमियां भी उसमें हैं. मसलन इसमें स्टार्च और प्रोटीन के अलावा दूसरे पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं. फिर क्यों और कौन काले गेहूं को अमृत सरीखा बताकर बेच रहा है, इसकी जांच होनी चाहिए. जानकार हैरानी होती है कि कुछ वेबसाइट्स पर काले गेहूं का आटा 2 से लेकर 4 हजार रु प्रतिकिलों तक बिक रहा है.

इस बारे में मध्य प्रदेश कृषि विभाग में कार्यरत स्वदेश विजय कहते हैं कि यह हम भारतीयों के चमत्कारों के आदी हो जाने की वजह से है. जबकि हकीकत में काले गेहूं के बाबत ऐसा कोई दावा जानकारों ने नहीं किया है. हां, काले गेंहू पर काम कर रही नाबी की वैज्ञानिक मोनिका गर्ग ने यह जरूर माना है कि अभी इसका प्रयोग चूहों पर किया गया है जिसके नतीजे उत्साहवर्धक आए हैं. जिन चूहों पर काले गेंहू का प्रयोग किया गया उनका वजन कम हुआ है और उनका कोल्स्ट्रोल और शुगर भी कम हुआ लेकिन इन्सानों के मामले में भी ऐसा हुआ है या होगा इसका दावा नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि एंथोसायनिन आक्सीडेंट की वजह से इंसानों को भी फायदा होगा पर वह ठीक वैसा ही जैसा दूसरे एंटऔक्सीडेंट्स से होता है.

तो फिर काले गेंहू के नाम पर हल्ला क्यों इस सवाल का जबाब साफ है कि इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश करने वाले जरूर तबियत से चांदी काट रहे हैं. बात ठीक वैसी ही है कि दो सर, चार सींग और छह पैरों वाले पैदा हुये बछड़े को लोग भगवान का अवतार या लीला मानते उसका पूजा पाठ शुरू कर देते हैं, दक्षिणा भी चढ़ाने लगते हैं. फसलों के मामले में भी बगैर सोचे समझे और जाने अगर लोग महज रंग की बिना पर अंधविश्वासी होकर पैसा लुटा रहे हैं तो वे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं.

काले गेंहू से अगर कैंसर ठीक होता है तो कोई वजह नहीं कि इस जानलेवा और लाइलाज बीमारी से एक भी मौत हो और शुगर के मरीजों जिनकी तादाद देश में 6 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है को तो रोज सुबह शाम गुलाबजामुन की दावत उड़ाना चाहिए क्योंकि काला गेंहू जो है. हकीकत में एक साजिश के तहत सफेद झूठ फैलाकर काले गेंहू का काला कारोबार कुछ लोग कर रहे हैं जैसे चमत्कारी विज्ञापन वाले किया करते हैं कि हमारी दवाई की एक खुराक लो और सालों पुराना बावसीर जड़ से मिटाओ. बावसीर के मरीज ठीक हो जाने के लालच के चलते एक नहीं बल्कि हजारों खुराक फांक जाते हैं, लेकिन उनकी सुबह की तकलीफ दूर नहीं होती.

यह तय है कि काले गेंहू में कुछ ऐसे गुण हैं जो हर फसल में नहीं होते और होते भी हैं तो  अलग अलग तरीके से होते हैं, इसमें कुछ तत्व ज्यादा हैं जो हैरानी की बात नहीं पर सनसनी और हैरानी गेंहू के काले होने के नाम पर फैलाई जा रही है तो लोगों को इससे सावधान भी रहना चाहिए.

अब सिंधिया ने बताया नरेंद्र मोदी को नाना

जैसे जैसे मध्यप्रदेश मे चुनाव प्रचार शबाब पर आता जा रहा है वैसे वैसे नेताओं के तेवर भी तीखे होते जा रहे हैं. बड़े नेता विपक्षी नेताओं का सीधे नाम लेने के बजाय उन्हें उनके प्रचिलित नामों से संबोधित कर तंज कस रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल गांधी को राहुल बाबा कहना शुरू कर दिया है जो लगभग पप्पू का पर्याय ही है. वैसे तो छोटे बच्चे को बाबा प्यार से कहा जाता है लेकिन शिव भक्तों को भी बाबा कहने का चलन है. अब अमित शाह राहुल को कौन सा वाला बाबा कह रहे हैं इसे समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नही.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान घोषित तौर पर मामा हैं वे खुद को मामा कहलवाने में फख्र भी महसूस करते हैं लेकिन एक मीटिंग मे कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मामा के साथ साथ नाना संबोधन का भी जिक्र किया तो जनता बिना समझाए समझ गई कि इशारा नरेंद्र मोदी की तरफ है. अशोकनगर जिले की मुंगावली विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार बृजेन्द्र सिंह यादव का प्रचार करते उन्होंने कहा कि जनता इस बार मामा और नाना दोनो को बोरिया बिस्तर बांध कर भगा देगी .

नाना के खिताब पर भाजपा खेमे की प्रतिक्रिया जब आएगी तब आएगी पर राहुल गांधी अक्सर राफेल मुद्दे को हवा देते चोर चौकीदार कहते रहते हैं. यह संबोधन अगर ज्यादा चलन में आ गया तो तय है भाजपा को कड़ा कदम उठाना पड़ेगा सवाल आखिर उसके मुखिया की साख का जो है राजनीति मे ऐसे प्रिय अप्रिय संबोधन वाले नेताओं की भरमार है कुछ संबोधनों से इमेज चमकती है तो कुछ से बिगड़ती भी है. कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह दिग्गी राजा के संबोधन से भले ही नवाजे जाते हों पर साल 2003 के चुनाव प्रचार मे उमा भारती ने उन्हें मिस्टर बंटाढार कहते चुनाव प्रचार अभियान चलाया था तो कांग्रेस की लुटिया ही डूब गई थी. इस तरह के रखे हुए नाम क्या सच में वोटर की मानसिकता पर फर्क डालते हैं इस पर कोई मान्य शोध भले ही न हुआ हो लेकिन सामान्य अनुभव बताता है कि इससे फर्क तो पड़ता है मसलन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को महारानी कहने से जनता में नकारात्मक संदेश जाता है पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की चाउर ( चावल ) वाले बाबा की छवि और संबोधन ने उन्हें 2013 के चुनाव मे काफी फायदा पहुंचाया था. धान के बोनस को लेकर किसान उनसे इस बार खफा हैं इसलिए भाजपा इस बार इस संबोधन से बच रही है.

मध्यप्रदेश मे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महाराज बनाने पर शिवराज सिंह ने एतराज जताया था जिसकी गंभीरता समझते सिंधिया ने खुद को आम आदमी कहा था और अपने संसदीय क्षेत्र मे दलितों आदिवासियों के घर जाना शुरू कर दिया था जिससे यह मुद्दा तूल नही पकड़ पाया था हालांकि अपने चुनावी विज्ञापनों में भाजपा कह यही रही है कि माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज. बड़े ही नही कई छोटे मोटे नेता भी इसी तरह के नामों और संबोधनों से जाने जाते हैं जो अक्सर किसी न किसी रिश्ते को प्रदर्शित करते हुए होते हैं मसलन मामा, चाचा, कक्का, दाउ, दीदी और भाभी वगेरह. आत्मीयता भी इन संबोधनों से जाहिर होती है अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नाना बनाने पर भाजपा खुश ही होगी क्योंकि बतौर मामा शिवराज सिंह ने खूब लोकप्रियता बटोरी है पर अब ज्योतिरादित्य उन्हें कंस और शकुनि के बाद तीसरा मामा भी कहने लगे हैं तो लोगों का खूब मनोरंजन भी हो रहा है.

मायावती की साख पर सवाल

चुनाव के पहले और चुनाव के बाद नेताओं की बदलती फितरत से पीछा छुड़ाना उनको भारी पड़ता है. जनता को उनकी कही बातों पर भरोसा नहीं होता है. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से 3 बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में भाजपा के साथ नहीं जाने की बात कहती है तो उनपर जनता को यकीन नहीं हो रहा है. छत्तीसगढ़ के चुनाव प्रचार में मायावती वहां के मुद्दो पर राय देने की जगह पर केवल अपनी सफाई देने की कोशिश कर रही हैं. वह कांग्रेस और भाजपा दोनो की सांपनाथ-नागनाथ कहती है. छत्तीसगढ की जनता को यह समझ नहीं आ रहा कि चुनाव में सांपनाथ-नागनाथ नजर आने वाली भाजपा-कांग्रेस के साथ चुनाव के बाद मायावती समझौता कैसे कर लेती हैं?

5 राज्यों के विधनसभा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, मणिपुर और तेलंगाना के पहले बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहती थी. अचानक बसपा ने यूटर्न लिया और खुद की चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. मायावती उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की बात भले करती हो पर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में वह सपा के साथ भी नहीं है. यहां सपा-बसपा भी अलग अलग ही चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस नेता सुरेन्द्र सिंह राजपूत कहते हैं, असल में मायावती उसूल की नहीं अपने मुनाफे की राजनीति करती हैं. ऐसे में वह वहां अकेले चुनाव लड़ रही हैं. कांग्रेस हमेशा की साम्प्रदायिकता विरोधी विचारधरा को एकजुट करके चुनाव लड़ना चाहती है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में मायावती की बसपा कहीं चुनावी लड़ाई में नहीं हैं. वह वोट काटने का काम करेंगी. जिसका प्रभाव कांग्रेस पर अधिक पड़ेगा. छत्तीसगढ में भाजपा और कांग्रेस के बीच पिछले चुनाव में सीट और वोट प्रतिशत दोनों के बीच बहुत ही कम फासला था. ऐसे में कुछ वोटों के कटने से ही जीत हार का गणित बदल सकता है. मायावती को लगता है कि छत्तीसगढ में अगर उनकी पार्टी कुछ सीटें भी ले आई तो वह किंगमेकर बन सकती है. जिसके बाद उनके लिये अपनी कोई भी बात मनवानी सरल होगी. चुनाव के पहले सांपनाथ-नागनाथ कहने वाली मायावती भाजपा-कांग्रेस के साथ नहीं जायेगी इसकी कोई गांरटी नहीं है.

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