नारी दुर्दशा का कारण धर्मशास्त्र और पाखंड

नारी को आज भी दोयम दर्जे का ही नागरिक समझा जाता है.सदियों से इनके ऊपर कई माध्यमों से जुल्म ढाने की परंपरा निरन्तर जारी है. इसमें धर्मशास्त्रों और पण्डे पुजारियों का भी अहम योगदान रहा है.

नारी के ऊपर शोषण और जुल्म में स्वयं नारी लोग ही मददगार की भूमिका में हैं.समाज में रिवाज और धर्म का पाठ पढ़ाकर नारियों को जुल्म के रसातल में डुबो दिया है. धर्म का कानून बनाने वाले मनु ने लिखा है,  ”स्त्री शूद्रों न धीयताम” यानी स्त्री और शूद्र को शिक्षा नहीं देनी चाहिए. अंधभक्त महिलाएं इन्हें ही अपना भगवान का हुक्म मानती हैं.

प्राचीन संत शंकराचार्य ने लिखा है, ”नारी नरकस्य द्ववारम”, यानी नारी नरक का दरवाजा है. लेकिन शायद उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि इसी नरक के दरवाजे से तुम भी पैदा हुवे है. तुलसीदास ने जिसे उनकी पत्नी ने दुत्कार दिया था, लिखा है, ”अधम ते अधम, अधम अति नारी’, भ्राता पिता पुत्र उर गारी, पुरुष मनोहर निरखत नारी.”

“होहिं विकल सक मनहिं न रोकी,जिमि रवि मणि द्रव रविही विलोकि”

अथार्त चाहे भाई हो ,चाहे पिता हो,चाहे पुत्र हो नारी को अच्छा लगने पर वह अपने को रोक नहीं पाती जैसे रविमणि, रवि को देखकर द्रवित हो जाती है, वैसी ही स्थिति नारी की हो जाती है. वह संसर्ग हेतु ब्याकुल हो जाती है.

“राखिअ नारि जदप उर माही।जुबती शास्त्र नृपति बस नाही”

अथार्त स्त्री को चाहे ह्रदय में ही क्यों न रख लो तो भी स्त्री शास्त्र,और राजा किसी के वश में नहीं रहती है. नारी को पीड़ा दिलवाने में तुलसीदास की इस  चौपाई ने आग में घी का काम किया है, ”ढोल गंवार शुद्र पशु नारी,सकल ताड़ना के अधिकारी।”

धर्मग्रन्थों में नारियों और दलितों के ऊपर शोषण जुल्म के प्रपंचो से पूरा भरा हुआ है.इस साजिश और छल प्रपंच को आज तक दलित और महिलाएं समझ नही पाईं हैं. उनके ही समझाई में आज भी बहुत बड़ी आबादी चलने को विवश है. स्वर्ग नरक पुनर्जन्म भाग्य भगवान की पौराणिकवादी संस्कृति में फंसकर अगला जन्म सुधारने के चक्कर में नारियां स्वयं को पुरुष की दासी समझते हुवे अन्याय कष्ट सहकर भी झूठे गौरव का अनुभव करती है. माता पिता भी बेटियों को पराया धन समझकर कन्यादान करके उन्हें अन्यायपूर्ण जीवन जीने को विवश करते हैं. दहेज,कन्यादान,सतीप्रथा,देवदासी प्रथा, पर्दाप्रथा, योनिशुचिता प्रथा, वैधब्य जीवन आदि नारी विरोधी प्रथाएँ धर्म की देन हैं.

इन प्रथाओं को  ग्रन्थों ने खूब महिमामण्डित किया है.  बेवकूफ अंधविश्वासी पिताओं की सनक पर बेटियों की कुर्बानी को स्वयंबर का नाम दिया गया. जुए के दांव पर नारियां लगाई गईं. बच्चे   पाने के लिए जबरन ऋषियों को सौंपी गईं.

नारियों की सहने से ज्यादा दुर्दशा से द्रवित होकर सर्वप्रथम ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने औरतों की पढ़ाई और सामाजिक आजादी के लिए काम किया.

1955-56 में नए हिन्दू कानूनों से भारतीय नारियों का बहुत बड़ा उपकार किया. जिन लोगों ने नारियों की भलाई के लिए काम किया आज की औरतें उनका नाम तक नहीं जानतीं. जिन शास्त्रों और पौराणिकवादी व्यवस्था ने इन पर जुल्म ढाए उनकी ही पूजा अर्चना आज तक महिलायें करती हैं.

पढ़ी लिखी औरतें भी व्रत, उपवास और गोबर तक की पूजा करती आ रही हैं और आज भी बदस्तूर जारी है.

गीता प्रेस की पुस्तक है,  ”गृहस्थ में कैसे रहें”  जिसके लेखक रामसुखदास हैं. इस पुस्तक में प्रश्न उतर के माध्यम से बताया गया है कि हिन्दू महिलाओं को कैसे जीवन जीना चाहिए. उदाहरण के रूप में यहां प्रस्तुत कर रहें हैं.

प्रश्न: पति मार पीट करे, दुःख दे तो पत्नी को क्या करना चाहिए ?

उत्तर: पत्नी को तो यही समझना चाहिए कि मेरे पूर्व जन्म का कोई बदला है, ऋण है जो इस रूप में चुकाया जा रहा है, अतः मेरे पाप ही कट रहे हैं और मैं शुद्ध हो रही हूँ. पीहर वालों को पता लगने पर वे उसको अपने घर ले जा सकते हैं. क्योंकि उन्होंने मार पीट के लिए अपनी कन्या थोड़े ही दी थी.

प्रश्न: अगर पीहर वाले भी उसको अपने घर न लें जाएं तो वह क्या करें ?

उत्तर: फिर तो उसे पुराने कर्मों का फल भोग लेना चाहिए. इसके सिवाय बेचारी क्या कर सकती है? उसको पति की मार धैर्यपूर्वक सह लेनी चाहिए. सहने से पाप कट जाएंगे और आगे सम्भव है कि पति स्नेह भी करने लग जाए. यदि वह पति की मार पीट न सह सके तो पति से कहकर उसको अलग हो जाना चाहिए और अलग रह कर अपनी जीविका सम्बन्धी काम करते हुवे एवं भगवान का भजन स्मरण करते हुए निधड़क रहना चाहिए.

इस पुस्तक में सैकड़ों इसी तरह के प्रश्नों का उत्तर है जिसमें हिंदू परिवारों को दिशा निर्देश दिए गए हैं.

यह पुस्तक सती का समर्थन करती है और महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने की वकालत करती है. हिन्दू वादी संगठनों द्वारा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए निरंतर आवाज उठाई जाती है. अगर यह देश हिंदू राष्ट्र बनता है तो क्या नारियों के ऊपर इसी तरह के कानून लागू किये जायेंगे? पड़ोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश में कट्टरवादी मुस्लिम संगठन भी इसी तरह की सोच रखते हैं. मुस्लिम धर्म में भी तीन तलाक, हलाला और पर्दा प्रथा जैसी दकियानूसी बातें हैं और उसका समर्थन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग करते हैं.इन कुप्रथाओं पर जब सवाल उठाये जाते हैं तो इस्लाम धर्म को मानने वाले धार्मिक कट्टरपंथी संगठन मौत का फतवा जारी करते हैं. क्या हिंदू राष्ट्र में ऐसा ही होगा?

आज औरतों पर शोषण और जुल्म ढाने का हथियार के रूप में इन धार्मिक पुस्तकों का उपयोग किया जाता है.इसे बढ़ावा देने और प्रचार प्रसार करने में साधू,  महात्मा, पंडे,  पुजारी, मुल्ला लोग लाखों की संख्या में एजेंटों के रूप में कार्य कर रहे हैं.

देश के कोने कोने से महिलाओं के साथ अपने पति द्वारा जुआ में हारने जैसी कुकृत्य, अत्याचार ,अनाचार और बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आते रहती है जिन पर सहज रूप से विश्वास भी नहीं होता.

इस तरह की एक घटना जौनपुर जिला के जफराबाद थाना क्षेत्र के शाहगंज की  है. एक जुआरी शराबी पति ने सारे रुपये हारने के बाद अपने पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया. वह जुए में अपनी पत्नी को हार गया. इसके बाद उसके जुआरी दोस्तों ने उसके पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया.

दूसरी घटना कानपुर की है. जुआ खेलने के एक शौकीन पति ने अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. दांव हारने पर उसके चार दोस्तों ने उसके पत्नी पर हक जमाते हुए सामूहिक दुष्कर्म करना चाहा लेकिन बीबी किसी तरह किचन में घुस गई और उसने पुलिस को फोन कर दिया. तत्काल में पुलिस आ जाने की वजह से तारतार हो रही इज्जत बच गई.

महाभारत में द्रौपदी को जुए में हारने की घटना सर्वविदित है. आज भी दीवाली जैसे त्यौहार में संस्कृति और परम्परा के नाम पर जुआ खेलने का रिवाज सभ्य समाज तक में भी बरकरार है. सड़ी गली परम्परा को आज भी हम अपने कंधों पर ढो रहे है.

औरतों के ऊपर शोषण और जुल्म का समर्थन औरतों द्वारा ही किया जाता है. एजेंट के रूप में इनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

हर गाँव मे धार्मिक गुरुओं  द्वारा शिव चर्चा,  माता की चौकी, जागरण, हवन और प्रवचनों की बाढ़ सी आ गयी है जिसमें महिलाओं की हीउपस्थिति अधिक होती है. शुद्ध घी अपने परिवारवालों को नहीं खिला कर अंधभक्ति में जलाया जा रहा है.

अपने बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करके धार्मिक कर्मकांडों पर अपनी मेहनत की कमाई महिलाएं खर्च कर रही हैं. पूजा पाठ, व्रत उपवास में महिलाएं रोबोटों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं. हवनों, यज्ञों में महिलाओं की संख्या अधिक देखी जा रही है. शहरों से लेकर गांवों तक धार्मिक प्रवचनों और कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई है .

गांव गांव में मंदिर और मस्जिद बन रहे हैं. ज्ञान का केंद्र पुस्तकालय जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में थे मृतप्राय हो गए हैं. आपसी बातचीत भी खत्म होने की कागार पर है.

गांवो में सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों की हालत बहुत चिंतनीय है. इस ओर किसी का ध्यान नहीं है. ज्ञान का केंद्र जब नेस्तनाबूद होगा तो समाज मे अंधविसश्वास और धार्मिक पाखण्डों का मायाजाल बढ़ेगा ही. धार्मिक पाखण्डों को बढ़ावा देने में केंद्र की सरकार और चारण गाने वाले मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका में है.

घुड़चढ़ी- बराबरी का नहीं पाखंडी बनने का हक

रोहित

दरअसल, 24 जनवरी, 2022 को बूंदी जिले में केशवरायपाटन उपखंड के गांव चड़ी में श्रीराम मेघवाल की शादी थी. श्रीराम के परिवार वालों ने कलक्टर से शिकायत कर के कहा था कि लोकल दबंगों ने घोड़ी न चढ़ने की धमकी दी है, जिस के बाद इस शादी के लिए 3 अलगअलग पुलिस थानों के तकरीबन 60 पुलिस वालों को वहां तैनात किया गया और गांव को छावनी में तबदील कर दिया गया.

ठीक इसी तरह मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक दलित दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के लिए भी पुलिस की तैनाती करनी पड़ गई. जिले के बंडा थाना क्षेत्र के गांव गनियारी में अहिरवार जाति का कोई दूल्हा कभी घोड़ी पर नहीं चढ़ा था.

23 जनवरी, 2022 को दिलीप अहिरवार की शादी थी. दूल्हे और परिवार की इच्छा थी कि वे लोग बरात की निकासी घोड़ी पर ही करेंगे. पुलिस की निगरानी में शादी तो घुड़चढ़ी के साथ हो गई, लेकिन बरात निकलने के बाद ही दबंगों ने दूल्हे के घर पर पथराव कर दिया.

ये भी पढ़ें : बदहाली: कोरोना की लहर, टूरिज्म पर कहर

ऐसे ही मध्य प्रदेश के रतलाम में भी कुछ साल पहले एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से पहले हैलमैट पहनना पड़ा. दरअसल, दूल्हे के घोड़ी चढ़ने के चलते ऊंची जाति के दबंगों द्वारा दूल्हे की गाड़ी छीनी गई और पथराव किया गया, जिस के बाद पुलिस ने दूल्हे को हैलमैट पहना दिया, ताकि सिर पर चोट न लगे.

ऐसी कई घटनाएं हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार के अलावा देश के दूसरे राज्यों से हर साल सामने आती रहती हैं, जहां दलित दूल्हे को शादी में घोड़ी चढ़ने के अलावा तलवार रखने से रोका जाता रहा है.

जाहिर है, ऊंचा तबका इन परंपराओं को अपनी बपौती और जन्मजात हक सम?ाता है और निचली जातियों को इन परंपराओं को करने से भी रोकता है, जो कि लोकतांत्रिक और नए भारत में किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता.

पर कुछ सवाल जो दलित समाज को खुद से करने चाहिए कि घुड़चढ़ी में आखिर ऐसा है ही क्या कि आज के समय में भी इस परंपरा को अपनाया जाए? आखिर क्यों वे ऊंची जाति वालों की ऐसी फालतू परंपराओं को ढोने का हक समाज से चाह रहे हैं? क्या ऐसी सामंती परंपराओं को अपना कर दलितपिछड़े समाज का भला हो पाएगा? क्या यह महज ऊंची जाति वालों जैसा बनने या वैसा दिखने की कोशिश भर नहीं है?

पाखंड की घुड़चढ़ी

हिंदू धर्म में शादी को 16 संस्कारों में से एक संस्कार कहा गया है, जिस में तकरीबन 71 रस्मों को निभाया जाता है. इन्हीं रस्मों में एक घुड़चढ़ी भी है, जिसे ले कर ऊंची जाति वालों और दलितों के बीच अकसर विवाद बना रहता है. इस रस्म को ‘निकासी’ या ‘बिंदौरी’ भी कहते हैं. चूंकि ऊंची जाति वाले इस रस्म को केवल अपना हक सम?ाते हैं, इसलिए वे दलितों को उन की शादी में घोड़ी पर चढ़ने नहीं देते.

इस रस्म में दूल्हे को घोड़ी पर बैठा कर गाजेबाजे के साथ गांव या कसबे में घुमाया जाता है. रस्म में दूल्हे के दोस्त, परिचित और रिश्तेदार शामिल होते हैं. इस के बाद दूल्हा मंदिर में जा कर पूजा करता है.

‘निकासी’ के बाद वर वधू को ब्याह कर ही अपने घर लौटता है. इस में एक और रिवाज भी चलन में है, जिस के मुताबिक, जिस रास्ते से ‘निकासी’ होती है, उसी रास्ते से दूल्हा घर वापस नहीं लौटता. बाकी रस्मों की तरह घुड़चढ़ी रस्म भी तमाम ढोंगों से भरी पड़ी है. घुड़चढ़ी में पंडितों को पैसे देने, रिश्तेदारों को नेग देने व घोड़ी वाले को शगुन देने जैसी रीतियां भी शामिल हैं.

ये भी पढ़ें : क्रिकेट :  विराट कोहली धुरंधर खिलाड़ी का मास्टरस्ट्रोक

हिंदू धर्म की बाकी रस्मों की तरह ही यह कुछ ऐसी रस्म है, जो दलितों को धार्मिक पाखंडों की ओर ले जा रही है. आज दलितपिछड़ा समाज घुड़चढ़ी जैसे रीतिरिवाजों के पीछे भाग रहा है और इस रस्म के साथ वह हिंदू धर्म के उन पाखंडों में घिरता जा रहा है, जिन्होंने हजारों साल उसे ऊंची जाति वालों का सेवक और गुलाम बना कर रखा. दलितों का इन रस्मों के पीछे भागने का मतलब बताता है कि आखिरकार हिंदू परंपराएं सही हैं, जिन में ऊंचनीच और छुआछूत जैसी व्यवस्था शामिल है.

फुजूल की मान्यताएं

दूल्हे की घुड़चढ़ी को ले कर कई मान्यताएं हैं, जिन में सब से नजदीकी मान्यता के मुताबिक, यह वीरता और शौर्य का प्रतीक है. पौराणिक काल में जाहिर है, घोड़ों की अहमियत बहुत ज्यादा थी, क्योंकि वे मजबूत और तेजतर्रार होते थे. युद्ध के मैदान से ले कर स्वयंवरों में अपनी ताकत दिखाने के लिए राजा घोड़े पर सवार हो कर निकलता था.

ऐसी कई कथाकहानियों में ढेरों राजाओं का जिक्र है, जो घोड़े पर सवार हो कर युद्ध के मैदान में उतरते या स्वयंवर में भाग लेते थे. बहुत बार युद्ध की वजह फलां रानी या राजा की बेटी से स्वयंवर करना होती थी, तो बहुत बार युद्ध में अपने दुश्मन को हरा कर उस की पत्नी या उस की बेटी पर कब्जा जमाना होता था. जाहिर है, दोनों ही सूरत में राजा अपने लिए एक रानी ब्याह लाता था.

अब आज के समय में लोगों को कौन सम?ाए कि ‘भई, न तो तुम किसी युद्ध में भाग लेने जा रहे हो और न तुम्हें घोड़े पर सवार हो कर अपनी होने वाली पत्नी को बाकी प्रतिभागी उम्मीदवारों से लड़ कर जीतना है और न ही तुम्हारी होने वाली पत्नी तुम्हारे घोड़ी पर चढ़ जाने से तुम्हारी ताकत का अंदाजा लगा लेगी. यह तो सोचें कि अगर राजामहाराजाओं के समय कार का आविष्कार हो गया होता, तो ऊंची जाति वाले घोड़ों को छोड़ कर कार पर ही अपना कब्जा जमा चुके होते, क्योंकि कार घोड़े से ज्यादा तेज और मजबूत साधन है.

दूल्हे की घुड़चढ़ी को ले कर इसी तरह की एक और मान्यता कहती है कि घोड़ी ज्यादा बुद्धिमान, चतुर और दक्ष होती है, उसे सिर्फ सेहतमंद व काबिल मर्द काबू कर सकता है. दूल्हे का घोड़ी पर आना इस बात का प्रतीक है कि घोड़ी की बागडोर संभालने वाला मर्द अपनी पत्नी और परिवार की बागडोर भी अच्छे से संभाल सकता है.

अब इस के हिसाब से सोचें तो कौन है, जो परिवार की बागडोर नहीं संभालना चाहता. ऐसा अगर सच में हो रहा होता, तो सब लोग हमेशा घोड़े पर यहांवहां घूमते दिखाई देते. भारत ही क्या विदेशों में भी लोग कारों को छोड़ कर घोड़ों की ही सवारी कर रहे होते. जब परिवार के सब मसलों के हल एक घोड़ी से हो रहे होते, तो किसी दूसरी चीज की क्या जरूरत?

कुछ मान्यताएं यह भी कहती हैं कि पुराणों के मुताबिक, सूर्यदेव की 4 संतानों यम, यमी, तपती और शनि का जन्म हुआ, उस समय सूर्यदेव की पत्नी रूपा ने घोड़ी का रूप धरा था. तब से घुड़चढ़ी की परंपरा चलने लगी. वहीं कुछ का मानना है कि दूल्हे को राजा जैसी इज्जत मिले, इसलिए यह परंपरा वजूद में आई.

ये भी पढ़ें : अंधविश्वास: हिंदू धर्म में गोबर की पूजा, इंसानों से छुआछूत

अब मान्यता चाहे जो भी हो, कोई जवाब दे कि देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए डा. भीमराव अंबेडकर क्या इसीलिए संविधान सौंप कर गए कि कल को राजतंत्र और सामंती परंपरा के पीछे भागतादौड़ता दबाकुचला दलित समाज दिखे? वह भी उस हिस्से से उपजी परंपरा, जो जातिवाद बढ़ाने का परिचायक रही हो? क्या यह खुद से पूछा नहीं जाना चाहिए कि अतीत में घोड़ों पर चढ़ कर सवर्णों के शौर्य और वीरता से कौन से जातिवाद का खात्मा किया जा रहा था?

जरूरी क्या है

सवाल यह भी है कि ऐसी प्रथाओं के पीछे भागना ही क्यों है, जिन का न तो कोई मतलब है और न जातिवाद के खात्मे में कोई भूमिका? सवाल यहां बराबरी का नहीं, सवाल है उद्धार का है. सिवा पाखंडी अधिकार हासिल होने के, दलितों को इस परंपरा को अपना कर क्या मिलेगा? अगर ऐसे ही सवर्णों की परंपरा और प्रथाओं को अपना कर दलितों का उद्धार हो सकता तो फिर जनेऊ अपना लेने में ही क्या समस्या है, जिस की पहचान ही जाति के आधार पर श्रेष्ठ हो जाना है, फिर बताते रहें खुद को बाकियों से श्रेष्ठ और पवित्र.

हाल ही में सबरीमाला मंदिर में औरतों के माहवारी के दिनों में घुसने का मामला जोरों से उछला. संविधान में सभी को बराबरी का दर्जा हासिल है तो जाहिर है, औरतों के सबरीमाला मंदिर में जाने की मांग भी उठी, जिस में अपनेआप में कोई बुराई नहीं. इस का संज्ञान ले कर सुप्रीम कोर्ट ने भी मंदिर में घुसने की इजाजत दी.

ऐसे ही आज भी कई मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं दिया जाता, उन के साथ मारपीट की जाती है, उन्हें कहा जाता है कि धर्म के मुताबिक वे मंदिरों में नहीं घुस सकते, पर असल सवाल यह है कि जो धार्मिक ग्रंथ, भगवान और मंदिरों में बैठे धर्म के ठेकेदार मंदिरों में घुसने से रोकते हैं, उन्हें अशुद्ध मानते हैं, वहां घुसना ही क्यों है?

क्या सवाल यह नहीं हो सकता कि आज क्यों इतनी कोशिशों के बाद भी सीवर की सफाई करने, मैला ढोने, सफाई का काम करने, श्मशान में शवों को जलाने वाले ज्यादातर मजदूर निचली जातियों से ही आते हैं? क्यों सरकार इस क्षेत्र में काम करने वालों को सही उपकरण नहीं देती है, उन्हें सुरक्षा नहीं देती है? दबेकुचलों और पिछड़ों को आगे बढ़ने के अवसरों पर काम क्यों नहीं करती है? आखिर क्यों सरकारी नौकरियों को कम किया जा रहा है?

क्या यह एक दलितपिछड़े समाज के युवा के हक का सवाल नहीं, जिस के आरक्षण का मुद्दा बस घोड़ी चढ़ाना और मंदिरों में प्रवेश करना ही रह गया है? आखिर क्यों पिछड़े समाज से आने वाले नेता बेमतलब के मुद्दों में समय और ताकत खराब कर गलत दिशा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?

इस तरह की परंपराएं दलित समाज को पाखंड की भेंट चढ़ाने के लिए काफी हैं, जिस में वे खुद गोते लगाते दिखाई दे रहे हैं. इस से दलितों को अधिकार मिले न मिले, पर पाखंड में जरूर भागीदारी मिल रही है. यही वजह भी है कि दलित समाज से निकलने वाले नेता दलित और पिछड़ा विरोधी दलों के साथ तालमेल बैठाते नजर आ जाते हैं और दलितों के नाम पर मलाई चाटते हैं.

ये भी पढ़ें : सास बनी मिसाल, बहू ने किया कमाल

आज जरूरी है कि दलितों को सब तरह के पाखंड छोड़ने की हिम्मत पैदा करनी चाहिए, उन्हें ऊंची जाति वालों के लिए बनाई गई परंपराओं को मानने, उन्हें अपनी परंपरा बनाने से बचना चाहिए, वरना वे भेदभाव सहते ही रहेंगे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें