कंगना राणावत की फिल्म ‘इमर्जेंसी’ में दिखेगा इंदिरा गांधी का काला सच?

कंगना राणावत की फिल्म ‘इमर्जेंसी’ की रिलीज डेट आ गई है. यह फिल्म 17 जनवरी, 2025 को सिनेमाघरों में लगेगी. कंगना राणावत ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इस फिल्म का पोस्टर शेयर करते हुए लिखा, ‘देश की सब से शक्तिशाली महिला की गाथा और वह क्षण जिस ने भारत की नियति बदल दी.’

फिल्म ‘इमर्जेंसी’ देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जिंदगी पर बनी है, जिस में कंगना राणावत इंदिरा गांधी का किरदार निभा रही हैं. इस फिल्म में अनुपम खेर जयप्रकाश नारायण बने हैं और श्रेयस तलपड़े ने प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी का किरदार निभाया है. इस के अलावा इस फिल्म में सतीश कौशिक, मिलिंद सोमन और महिमा चौधरी भी नजर आएंगे.

यह फिल्म उस इमर्जेंसी को दिखाती है, जो इंदिरा गांधी द्वारा साल 1975 से साल 1977 तक लगाई गई थी. कंगना राणावत ने खुद इस फिल्म का डायरैक्शन भी किया है. इस फिल्म को सैंसर बोर्ड की तरफ से मंजूरी मिल चुकी है.

ट्रैलर को देखते हुए यह लगता है कि यह फिल्म बताती है कि कैसे भारत में साल 1975 से साल 1977 के बीच नागरिक अधिकारों और प्रैस की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे.

कंगना राणावत की यह कोशिश भारतीय राजनीति के एक ऐतिहासिक हिस्से को बड़े परदे पर दिखाने की है, जो दर्शकों को अपने साथ जोड़ने और जागरूक करने में कामयाब हो सकती है.

कंगना राणावत ने अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत साल 2006 में फिल्म ‘गैंगस्टर’ से की थी, जिस के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बैस्ट फीमेल डैब्यू का अवार्ड मिला था. इस के बाद उन्होंने कई कामयाब फिल्मों में काम किया, जिन में ‘वो लम्हे’, ‘शाकालाका बूमबूम’, ‘लाइफ इन ए… मैट्रो’, ‘फैशन’, ‘राज : दि मिस्ट्री कन्टिन्यूज’, ‘एक निरंजन’, ‘काइट्स’, ‘वन्स अपौन ए टाइम इन मुंबई’, ‘नौकआउट’, ‘नो प्रोब्लम, ‘तनु वैड्स मनु’ और ‘क्वीन’ जैसी फिल्में शामिल हैं.

कंगना राणावत ने अपनी अदाकारी के लिए कई अवार्ड भी जीते हैं, जिन में 3 नैशनल फिल्म अवार्ड और 4 फिल्मफेयर अवार्ड शामिल हैं.

कंगना राणावत विवादों में भी रही हैं. उन्होंने कई बार अपने बयानों और सोशल मीडिया कमैंट्स से विवाद पैदा किया है. उन्हें अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए भी जाना जाता है और उन्होंने साल 2024 में मंडी, हिमाचल प्रदेश लोकसभा सीट से सांसद का चुनाव लड़ा था और वे जीती थीं.

कंगना राणावत की कुछ खास फिल्में इस तरह हैं :

-गैंगस्टर (2006)
-फैशन (2008)
-तनु वैड्स मनु (2011)
-क्वीन (2014)
-मणिकर्णिका : द क्वीन औफ झांसी (2019)
-पंगा (2020)
-इमर्जेंसी (2025 में रिलीज होगी)

फिल्म ‘इमर्जेंसी’ की शूटिंग की शुरुआत साल 2022 में हुई थी, लेकिन इस की रिलीज में देरी हुई, क्योंकि इसे सैंसर बोर्ड से मंजूरी नहीं मिल रही थी. हालांकि, अब यह फिल्म साल 2025 की शुरुआत में रिलीज हो जाएगी.

इस फिल्म की खासीयत

-कंगना राणावत ने इंदिरा गांधी का किरदार निभाने के साथसाथ इस फिल्म का डायरैक्शन भी किया है.

-इस फिल्म में इमर्जेंसी के दौरान हुई घटनाओं को दिखाया गया है, जिस में नागरिक अधिकारों और प्रैस की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे.

-यह फिल्म एक राजनीतिक ड्रामा है, जो देश की राजनीति के एक खास हिस्से को दिखाती है.

कंगन राणावत अपने राजनीतिक विचारों और बयानों के चलते कई विवादों में रही हैं. उन के कुछ विवादास्पद बयानों में शामिल हैं :

-उन्होंने मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से की थी, जिस पर कई लोगों ने एतराज जताया था.

-उन्होंने सीएए और एनआरसी के समर्थन में बयान दिए थे, जिस पर कई लोगों ने उन की आलोचना की थी.

-वे कई राजनीतिक दलों के साथ विवादों में रही हैं, जिन में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी शामिल हैं.

-फिल्म इंडस्ट्री में उन के साथी कलाकारों और दूसरे लोगों के साथ भी मतभेद शामिल हैं.

कंगना राणावत के भाजपा और कांग्रेस से जुड़े कई विवाद और कनैक्शन हैं. उन्होंने कई बार अपने बयानों और सोशल मीडिया कमैंट्स से दोनों दलों के साथ अपने मतभेद और समर्थन जाहिर किए हैं.

कंगना राणावत ने भाजपा के समर्थन में कई बयान दिए हैं, खासकर जब उन्होंने सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया था. उन्हें भाजपा के कई नेताओं के साथ देखा गया है, जिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं.

कंगना राणावत ने कांग्रेस के कई नेताओं के साथ मतभेद जाहिर किए हैं, खासकर जब उन्होंने कांग्रेस की नीतियों की आलोचना की थी. उन्होंने कांग्रेस के कई नेताओं पर हमला बोला है, जिन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी शामिल हैं.

‘कहे तोसे सजना’ गाने के लिए शारदा सिन्‍हा को मिले थे 76 रुपए, सास नहीं चाहती थीं बहू गाए

भोजपुरी गीतों की मशहूर गायिका शारदा सिन्‍हा नहीं रहीं, लेकिन 90 के आखिरी दशक में हिट फिल्म ‘मैं ने प्‍यार किया’ के एक गाने ने उनको हर घर तक पहुंचा दिया था. इसके बोल थे, ‘कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया…’

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

भोजपुरी को बौलीवुड में पौपुलर बनाने का श्रेय

‘मैं ने प्‍यार किया’ मूवी ने इंडियन सिनेमा को बहुत कुछ दिया. इस मूवी से सलमान खान की पहचान मजबूत हुई थी. इस के साथ ही राजश्री प्रोडक्‍शन की नई पीढ़ी के रूप में डायरैक्‍टर सूरज बड़जात्‍या एक बड़ा नाम बन कर उभरे थे. इतना ही नहीं, एक साधारण नाम भाग्‍यश्री रातोंरात मशहूर हीरोइन बन गई थीं. इस के अलावा इस सुपरहिट मूवी की जो बात दर्शकों को बहुत पसंद आई थी, वह था इस का मशहूर गाना ‘कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया, पगपग लिए जाऊं तोहरी बलैया…’

उस दौर में कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था कि हिंदी मूवी के रोमांटिक गाने में भोजपुरी भाषा का इतनी खूबसूरती से इस्‍तेमाल किया जा सकता है. यही वजह थी कि उस दौर की यंग जनरेशन की जबान पर यह गाना आसानी से चढ़ गया था, जो आज भी कानों में गूंज रहा है.

पहला गाना केवल 76 रुपए में गाया

कहा जाता है कि ‘मैं ने प्‍यार किया’ मूवी में गाने के लिए लोकगायिका शारदा सिन्‍हा को 76 रुपए मिले थे, जबकि इस मूवी से बतौर ऐक्‍टर डैब्‍यू कर रहे सलमान खान को 30,000 रुपए मिले थे. इस मूवी का बजट 1 करोड़ रुपए था, जबकि इस ने 45 करोड़ रुपए की कमाई की थी.

‘मैं ने प्‍यार किया’ में गाए अपने गाने के अलावा शारदा सिन्‍हा के 2 गाने और भी बहुत पौपुलर हुए थे. शारदा सिन्‍हा ने मूवी ‘हम आप के हैं कौन’ में ‘बाबुल जो तुम ने सिखाया, जो तुम से पाया, सजन घर ले चली…’ गाया था. यह गाना दुलहन की विदाई के सीन के साथ रखा गया था. यह गाना इतना पौपुलर हो चुका है कि आज साल 2024 में भी दुलहनों की विदाई के दौरान इसे बजाया जाता है.

डायरैक्‍टर अनुराग कश्‍यप की फेमस मूवी ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ में भी शारदा सिन्‍हा ने एक गाना गाया है, जिस के बोल हैं, ‘तार बिजली के जैसे हमारे पिया…’ लेकिन धीरेधीरे कर के शारदा सिन्‍हा ने बौलीवुड से दूरी बना ली. काफी सालों बाद इन्‍होंने हुमा कुरैशी की एक्टिंग से सजी वैब सीरीज ‘महारानी’ में ‘निर्मोहिया’ गाना भी गाया.

संगीत के साथ स्‍टडी भी करती रहीं

शारदा सिन्‍हा का जन्‍म बिहार के सुपौल जिले में साल 1952 में हुआ था. इनके पिता सुखदेव ठाकुर शिक्षा विभाग से जुड़े थे. ऐसा कहा जाता है कि शारदा सिन्‍हा के परिवार में कई दशकों तक बेटी का जन्‍म नहीं हुआ था, इसलिए इन के जन्‍म के बाद इन्‍हें काफी लाड़दुलार मिला. शारदा सिन्‍हा 8 भाईबहनों में एकलौती लड़की थीं. गाने की शौकीन होने की वजह से ही शारदा का दाखिला उन के पिताजी ने भारतीय नृत्‍य कला केंद्र में कराया. संगीत की स्‍टडी करने के साथसाथ उन्‍होंने सामान्‍य शिक्षा भी जारी रखी. उन्‍होंने ग्रेजुएशन और पोस्‍ट ग्रैजुएशन किया.

सास को पसंद नहीं था बहू गाना गाए

मैथिली गीतों से अपनी पहचान बनाने वाली शारदा सिन्हा की शादी 1970 में ब्रज किशोर सिन्‍हा से हुई. इन के 2 बच्‍चे हैं बेटा अंशुमन सिन्‍हा और बेटी वंदना. एक इंटरव्‍यू के दौरान शारदा सिन्‍हा ने कहा था कि उन की सासु मां नहीं चाहती थीं कि वे गाना गाएं. यहां तक कि गांव की ठाकुरबाड़ी में भी उन्‍हें गाने की इजाजत नहीं थी.

बाद में शारदा सिन्‍हा ने पीएचडी किया और बिहार के समस्‍तीपुर कालेज में लेक्‍चरर के रूप में जौइन किया और बाद में वहीं प्रोफैसर भी बनीं.

कैसे हुआ लोकगीत से साक्षात्‍कार

एक इंटरव्‍यू के दौरान शारदा सिन्‍हा ने बताया था कि जब भी उन के पिता का ट्रांसफर होता, तो वे छुट्टियों में गांव चली जाती थीं. इसी दौरान उन्‍होंने गांव में लोकगीत सुने. धीरेधीरे यह रुचि में बदल गई. क्‍लास 6 से उन्‍होंने संगीत सीखना शुरू किया. इन के गुरु पंडित रघु झा पंचगछिया घराने के संगीतज्ञ थे.

लोक‍गायिका शारदा सिन्‍हा को ‘ब‍ि‍हार की स्‍वर कोकिला’ कहा जाता है. 1991 में ‘पद्मश्री’ और 2018 में ‘पद्मभूषण’ से सम्‍मानित लोकगायिका शारदा सिन्‍हा ने दिल्‍ली के आल इंडिया इंस्‍टीट्यूट औफ मैडिकल साइंसेज में आखिरी सांस ली. करीब डेढ़ महीना पहले ही शारदा सिन्‍हा के पति बृज किशोर सिन्‍हा का ब्रेन हैमरेज की वजह से देहांत हो गया था. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार साल 2017 से ही शारदा सिन्‍हा ब्लड कैंसर से जूझ रही थीं. शारदा सिन्‍हा को बिहार में राजकीय सम्‍मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी.

Singham Again का ट्रेलर हुआ रिलीज, दिवाली पर जलेगी अर्जुन कपूर की लंका

डायरेक्टर रोहित शेट्टी (Rohit Shetty) के निर्देशन में बनी मोस्ट अवेटेड फिल्म सिंघम अगेन(Singham Again) जल्द ही सभी सिनेमाघरो में आने वाली है, आज 7 अक्टूबर को फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ है. फिल्म जल्द ही दीवाली(Diwali) पर रिलीज होगी और स्क्रीन पर एक्शन, रोमांस के साथ धमाल मचाएंगी.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)


बता दें कि ये ट्रेलर (Trailer) शानदार स्टारकास्ट और दमदार एक्शन सीक्वेंस से भरपूर हिन्दी मसाला फिल्मों मे से एक साबित होने वाला है. ये ट्रेलर हिंदी फिल्म के इतिहास का सबसे लंबा ट्रेलर कहा जा रहा है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ‘सिंघम अगेन’ का ट्रेलर करीब 4 मिनट 45 सेकंड का है. जिसमें एक्शन, ड्रामा, कौमेडी, ह्ययूमर सबकुछ दिखाया जाएगा. फिल्म के ट्रेलर को लेकर इतना सस्पेंस बना हुआ है, तो फिल्म को लेकर कितना क्रेज होगा. फिल्म भी बौलीवुड के सितारे से भरी है. जहां एक से बढ़कर एक स्टार एक साथ एक ही स्क्रीन पर देखने को मिलेंगे.

फिल्म में इस एक्शन पैक्ड में अजय देवगन, करीना कपूर, अक्षय कुमार, दीपिका पादुकोण, टाइगर श्रौफ, अर्जुन कपूर, जैकी श्रौफ सभी अपने धांसू स्टाइल और किरदार के साथ नजर आएंगे.

बता दें कि ‘सिंघम अगेन’ का ट्रेलर लौंच इवेंट मुंबई में नीता मुकेश अंबानी के कल्चरल सेंटर NMACC (Nita Mukesh Ambani Cutltural Centre) में आयोजित होगा. यहां दर्शकों और मीडिया की भारी भीड़ के बीच फिल्म की पूरी स्टारकास्ट एकसाथ मौजूद होगी. इस ट्रेलर लौन्च में हाल ही मां बनीं दीपिका पादुकोण भी पहुंच सकती हैं.

बता दें कि सिंघम अगेन’ के सैटेलाइट, डिजिटल और म्यूजिक राइट्स ने 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली है. यह अजय देवगन (Ajay Devgan) और रोहित शेट्टी (Rohit Shetty) के लिए सबसे बड़ी नौन-थियेट्रिकल डील साबित हुई है.

‘रामायण’ से जुड़ी है फिल्म की कहानी

सिंघम रिटर्न्स की कहानी को राम, सीता और रावण से कनेक्ट करने की कोशिश की गई है. ट्रेलर की शुरुआत में अजय देवगन और करीना कपूर के साथ उनका बेटा दिखाया गया है, जो कहता है कि सीता के लिए राम हजारों किलोमीटर दूर लंका चले गए थे. यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है और करीना कपूर का किडनैप हो जाता है. ट्रेलर को देखकर जितनी कहानी समझ आ रही है उसके मुताबिक, सिंघम रिटर्न्स में अजय देवगन यानी बाजीराव सिंघम अपनी पत्नी के लिए रावण यानी अर्जुन कपूर से लड़ते दिखाई देंगे.

टाइगर बनें लक्ष्मण, तो रणवीर बने हनुमान

रोहित शेट्टी की कौप यूनिवर्स फिल्म सिंघम रिटर्न्स की कहानी में अजय देवगन को श्रीराम की तरह, टाइगर श्रौफ को लक्ष्मण और रणवीर सिंह को भगवान हनुमान की तरह दिखाया गया है. ट्रेलर में रामायण के कई फ्लैशबैक भी देखने को मिलते हैं.

दीपिका बनीं ‘लेडी सिंघम’

दीपिका पादुकोण की मां बनने के बाद पहली फिल्म रिलीज होने जा रही है. हाल ही एक प्रैस कांफ्रेंस में रणवीर सिंह ने भी कहा कि इस मूवी में बेबी सिम्बा भी थी सिंघम रिटर्न्स में दीपिका पादुकोण एक महिला पुलिस ऑफिसर लेडी सिघम के रोल में दिख रही हैं. अब देखना है कि यह फिल्म रिलीज के बाद कितना धमाल मचाती है क्या रोहित शेट्टी एक बार फिर दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब होता है.

सलमान खान और मुंबई के अपराध का चढ़ता ग्राफ

फिल्म सितारे सलमान खान के घर के बाहर जिस तरह बेधड़क गोलियां चलाई गईं और अपराधियों ने अपने बेखौफ होने का परिचय दिया है, वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सरकार और पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है.

दरअसल, यह कांड बताता है कि महाराष्ट्र में प्रशासनिक कूवत में किस तरह लगातार गिरावट आ रही है. शासन और पुलिस प्रशासन द्वारा बड़ीबड़ी बातें करने के बावजूद असली आरोपियों के गरीबान पर हाथ नहीं डाला जा सका है. किराए के गोली चलाने वालों को पकड़ कर पुलिस अपनी पीठ थपथपा रही है.

आज के मौडर्न समय में जब हर जगह सीसीटीवी लगे हुए हैं, पुलिस के पास नई से नई तकनीकें हैं, इस के बावजूद अपराधी किस्म के लोग सलमान खान को धमकियां दे रहे हैं, जो सार्वजनिक तौर पर साबित हो चुका है, यह पूरी कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है. अभी तक तो जड़ से जुड़े आरोपियों को पुलिस के शिकंजे में होना चाहिए था, मगर वह सिर्फ खाक छान रही है. देखा जाए तो यह पूरा मामला एक मुख्यमंत्री के रूप में एकनाथ शिंदे के कामकाज और शख्सीयत पर ग्रहण लगाता है.

मामला यह है

करोड़ों लोगों के चहते बन चुके फिल्म कलाकार सलमान खान के मुंबई वाले घर के बाहर रविवार, 14 अप्रैल, 2024 को तड़के मोटरसाइकिल सवार 2 अनजान लोगों ने गोलीबारी की और भाग गए. इस सनसनीखेज मामले के बाद पुलिस ने उन के घर के आसपास सिक्योरिटी बढ़ा दी और आरोपियों की तलाश शुरू कर दी. हालांकि बाद में 2 आरोपी पकड़े, पर पुलिस यह नहीं पता लगा पाई कि यह गोलीकांड किस के कहने पर हुआ था. वैसे, बताया जा रहा है कि जेल में बंद गिरोहबाज लौरैंस बिश्नोई के छोटे भाई अनमोल बिश्नोई द्वारा अपलोड की गई एक फेसबुक पोस्ट में बौलीवुड हीरो सलमान खान पर रविवार की सुबह हुई गोलीबारी की जिम्मेदारी ली गई है.
इस तरह यह साफ हो चुका है कि सलमान खान को धमकी देने के पीछे कौन है और उस की मंशा क्या है.

पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या के मामले में वांटेड अनमोल बिश्नोई ने इस गोलीबारी को सलमान खान के लिए ‘पहली और आखिरी चेतावनी’ बताया है. सलमान खान को धमकी देते हुए कहा गया है कि अब से दीवारों या किसी खाली घर पर गोलियां नहीं चलाई जाएंगी.

मुंबई में अपराध शाखा के अफसरों ने कहा है कि वे फेसबुक पोस्ट की जांच कर रहे हैं. उधर, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सलमान खान से जुड़ी इस वारदात के मद्देनजर बात की और कहा कि राज्य सरकार किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की इजाजत नहीं देगी.

दरअसल, सलमान खान के बांद्रा इलाके में बने ‘गैलेक्सी अपार्टमैंट्स’ के बाहर रविवार, 14 अप्रैल, 2024 की सुबह तकरीबन पांच बजे 2 लोगों ने 4 गोलियां चलाई थीं और फिर भाग खड़े हुए थे.

इस वारदात के बाद महाराष्ट्र खासकर मुंबई में एक दहशत का माहौल बन गया है और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पद ग्रहण करने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ी घटना के रूप में दर्ज हो गया है, जिस का खत्म होना बहुत जरूरी है. चुनाव का समय है और ऐसे में उन की पार्टी को इस का खमियाजा भी झेलना पड़ सकता है.

एक अफसर के ‌मुताबिक, सुबूत इकट्ठा करने के लिए स्थानीय पुलिस, अपराध शाखा और फौरैंसिक विज्ञान की एक टीम भी मौके पर पहुंची और घटना की जांच शुरू कर दी गई. वैसे, पिछले साल मार्च महीने में सलमान खान के दफ्तर को एक ईमेल भेज कर सलमान खान को धमकी दी गई थी, जिस के बाद मुंबई पुलिस ने गिरोहबाज लौरैंस बिश्नोई, गोल्डी बराड़ और एक और के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी समेत दूसरी धाराओं में एक एफआईआर दर्ज कर ली थी.

इस मामले में मुंबई क्राइम ब्रांच ने भुज, गुजरात से 2 नौजवानों को गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार नौजवान गौनाहा थाने के मसही गांव के विक्की गुप्ता (24 साल) व सागर कुमार (21साल) हैं. पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार दोनों नौजवानों का जिले में कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.

हिमांशु मल्होत्रा को मिलेगा ‘मौका या धोखा’

इंसान के जीवन में कई इच्छाएं होती है मगर क्या आपने कभी सोचा है कि आपके द्वारा की गई एक इच्छा का परिणाम जीवन की सबसे बड़ी गलती बन जाए ? एक निर्णय जो आपके जीवन को नर्क से भी बत्तर बना दे. जी हाँ,  हंगामा पर बहुत जल्द प्रसारित होने वाली मर्डर मिस्ट्री ‘मौका या धोखा’ में नजर आने वाले अभिनेता हिमांशु मल्होत्रा ने भी ऐसा ही महसूस किया जब उनके किरदार अमित सहगल को शो में किरदार शालिनी (समीक्षा भटनागर) और सत्यजीत (आभास मेहता) ने धोखा देते है . मल्टीटैलेंटेड अभिनेता हिमांशु मल्होत्रा के चाहनेवालो को लिए इनकी यह नई  सीरीज किसी सौगात से कम नहीं है , जैसे अब तक उन्होंने अपने सभी प्रोजेक्ट से दर्शकों के दिल में जगह बनाये  है ठीक उसी तरह एक फिर सबका दिल जीतने के लिए पूरी तरह से तैयार है.

अपनी नई भूमिका के बारे में बात करते हुए हिमांशु मल्होत्रा कहते है कि, ”’मौका या धोखा’ एक ऐसी कहानी है जो एक अभिनेता को अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करती है. मेरे किरदार का नाम अमित सहगल है , जो अपनी एक ही इच्छा के कारण फंस गया है जो उसके जीवन को नियंत्रण से बाहर कर देता है। मेरा किरदार बहुत अलग है , निजी  जीवन मैं अपने किरदार से बिलकुल भी मेल नहीं करता इस वजह से किरदार में पूरी तरह से उतरना मुश्किल था . मगर यह सब मेरे लिए बहुत नया था इसलिए बहुत अच्छी तरह से मैं अपने किरदार के ढांचे में उतरा क्योकि चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने का मज़ा ही कुछ अलग होता है.  इस भूमिका की तैयारी करने और अपने चाहनेवालो  के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने में मुझे बहुत प्रयास, समय और समर्पण लगा. यह शो वास्तव में एक पेचीदा मर्डर मिस्ट्री है जिसका अनुभव दर्शकों के लिए शानदार होगा . इस सीरीज का हर एक एपिसोड ट्विस्ट और टर्न अन्य किरदारों के विभिन्न रंगों का अनावरण करेंगे , जिसका उतर चढ़ाव दर्शकों के मनोरंजन में चार चाँद लगा देगा.

वर्मा मलिक : दो सरनेम वाला एक शानदार गीतकार

आप ने ‘राष्ट्रीय गान’ के बारे में तो खूब सुना होगा, पर अगर आप से ‘बरात गान’ के बारे में पूछा जाए कि वह कौन सा गाना है, जो हर बरात में जरूर बजता है, तो यकीनन आप सिर खुजाते हुए कहेंगे कि गाने तो बहुत से हैं, लेकिन शायद ही ऐसी कोई बरात होगी, जिस में ‘आज मेरे यार की शादी है…’ गाना न बजा हो. बराती फरमाइश कर के बैंड वालों से इस गाने की धुन बजवाते हैं और फिर जम कर नाचते हैं.

इस ‘बरात गान’ को लिखा किस ने था? यह हमारा दूसरा सवाल है. दरअसल, आज हम आप को ऐसी शख्सीयत से मिलवा रहे हैं, जिन के 2 गाने हर शादीब्याह में जरूर बजते हैं. पहला गाना फिल्म ‘आदमी सड़क का’ से ‘आज मेरे यार की शादी…’ है और दूसरा गाना फिल्म ‘जानी दुश्मन’ से ‘चलो रे डोली उठाओ कहार’ है. गीतकार का नाम है वर्मा मलिक. पर यह अजीब सा उन का असली नाम नहीं है.

वर्मा मलिक 13 अप्रैल, 1925 को भारत के उस फिरोजपुर हिस्से में जनमे थे जो आज का पाकिस्तान है. इन के मांबाप ने नाम रखा था बरकत राय. और इस पूत के पांव पालने में ही दिखने लगे थे, क्योंकि इन्होंने छोटी सी उम्र में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं.

चूंकि तब भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तो बरकत राय कांग्रेस के सदस्य बन गए थे. स्कूल में पढ़ाई के दिनों वे अंगरेजों के खिलाफ कांग्रेस के जलसों और सभाओं में देशभक्ति के गीत गाते थे. इस दौरान उन्हें जेल भी हुई थी, लेकिन उम्र कम होने की वजह से वे रिहा कर दिए गए थे.

साल 1947 में जब भारत 2 हिस्सों में बंटा तो बरकत राय दंगों के दौरान जख्मी भी हुए थे और अपने परिवार के साथ जान बचा कर किसी तरह दिल्ली पहुंचे थे. दिल्ली में संगीतकार हंसराज बहल के भाई बरकत राय के काफी नजदीकी दोस्त थे. उन्होंने ही बरकत राय को मुंबई जाने की सलाह दी थी.

बरकत राय ने इस सलाह पर अमल किया और उन्हें फिल्मों में पहला मौका संगीतकार हंसराज बहल ने पंजाबी फिल्म ‘चकोरी’ में दिया था. जब बरकत राय का नाम पंजाबी फिल्मों में चमकने लगा तो उन्होंने कुछ दोस्तों की सलाह पर अपना नाम बरकत राय से बदल कर वर्मा मलिक रख लिया था.

वर्मा मलिक ने तकरीबन 40 पंजाबी फिल्मों में गीत और 3 फिल्मों में संवाद लिखे थे. उन्होंने कुछ फिल्मों का डायरैक्शन भी किया था. पर 60 के दशक में पंजाबी फिल्में बननी कम हो गईं तो वर्मा मलिक को काम मिलना बंद हो गया था.

मनोज कुमार का उपकार

बेरोजगारी के दिनों में जब वर्मा मलिक मनोज कुमार से मिले, तब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म ‘उपकार’ के लिए उन से एक गाना ‘एक तारा बोले…’ लिखवाया, पर पूरी फिल्म में उस गाने की सिचुएशन नहीं बन पाई तो वे उसे इस्तेमाल नहीं कर पाए, पर उन्होंने उस गाने को संभाल कर रख लिया था.

इस के बाद मनोज कुमार ने फिल्म ‘यादगार’ बनाई, तो उन्होंने इस गाने को कुछ बदलाव के बाद फिल्म में इस्तेमाल किया. ‘बातें लंबी मतलब गोल, खोल न दे कहीं सब की पोल, तो फिर उस के बाद इकतारा बोले तुनतुन…’ नामक यह गीत सुपरहिट साबित हुआ.

इस कामयाबी के बाद वर्मा मलिक ने भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और एक के बाद एक उन की कई फिल्मों के गाने सुपरहिट हुए. ‘पहचान’, ‘बेईमान’, ‘अनहोनी’, ‘धर्मा’, ‘कसौटी’, ‘विक्टोरिया नंबर 203’, ‘नागिन’, ‘चोरी मेरा काम’, ‘हमतुम और वो’, ‘जानी दुश्मन’, ‘शक’, ‘दो उस्ताद’, ‘कर्तव्य’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संतान’, ‘बेरहम’, ‘हुकूमत’, ‘एक से बढ़ कर एक’ जैसी कई फिल्मों में वर्मा मलिक ने हिट गाने लिखे.

वर्मा मलिक को 2 बार ‘फिल्मफेयर अवार्ड’ मिला था. पहली बार फिल्म ‘पहचान’ के गीत ‘सब से बड़ा नादान वही हैं…’ के लिए और फिर फिल्म ‘बेईमान’ के गीत ‘जय बोलो बेईमान की…’ के लिए.

वर्मा मलिक ने अपने फिल्मी कैरियर में शंकरजयकिशन, कल्याणजीआनंदजी, लक्ष्मीकांतप्यारेलाल, सोनिकओमी, जयदेव, आरडी बर्मन, बप्पी लाहिरी, चित्रगुप्त और राम लक्ष्मण जैसे संगीतकारों की धुनों पर शानदार गीत लिखे थे. संगीतकार सोनिकओमी के साथ उन की जोड़ी खूब जमी थी. उन्होंने तकरीबन 35 फिल्मों में एक साथ काम किया था.

साल 1976 में आई फिल्म ‘नागिन’ और साल 1979 में आई फिल्म ‘जानी दुश्मन’ और ‘कर्तव्य’ में लिखे वर्मा मलिक के गाने जैसे ‘तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना’, ‘तेरे इश्का का मुझ पे हुआ ये असर’, ‘तेरे हाथों में पहना के चूड़ियां’, ‘ले मैं तेरे वास्ते सब छोड़ के’, ‘कोई आएगा, लाएगा दिल का चैन’, ‘चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा’ ने लोगों के दिलों में जगह बना ली थी.

15 मार्च, 2009 में जुहू, मुंबई में 84 साल की उम्र में बरकत राय उर्फ वर्मा मलिक यह दुनिया छोड़ कर चले गए थे..

सरोजिनी नायडू का किरदार चुनौती से भरा – शांति प्रिया

90के दशक की मशहूर अदाकारा शांति प्रिया ने वी. शांताराम की बेटी के बेटे सिद्धार्थ राय, जो खुद फिल्म कलाकार थे, से साल 1992 में प्रेम विवाह किया था, जिन से उन के 2 बेटे हुए. सिद्धार्थ राय की साल 2004 में हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. इस के बाद शांति प्रिया ने फिल्म कैरियर को  छोड़ कर अपने दोनों बेटों की परवरिश में ही खुद को झोंक दिया था.

आज शांति प्रिया के दोनों बेटे शुभम और शिष्य अपने पैरों पर खड़े हैं. तब एक बार फिर शांति प्रिया ने फिल्म जगत में वापस कदम रखा है. इन दिनों वे ओटीटी प्लेटफार्म वैब सीरीज ‘धारावी बैंक’ में नजर आ रही हैं, जबकि बहुत जल्द ही वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि और उत्तर प्रदेश की पहली राज्यपाल सरोजिनी नायडू की बायोपिक फिल्म ‘सरोजिनी नायडू’ में नजर आने वाली हैं. हाल ही में शांति प्रिया से उन की निजी और फिल्म जिंदगी पर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

सवाल: आप ने तमिल फिल्में निशांति के नाम से की थीं, जबकि हिंदी और तेलुगु फिल्मों में शांति प्रिया के नाम से काम किया. ऐसा क्यों?

जवाब: जब कल्याणी मुरुगन ने मुझे तमिल फिल्म ‘इंगा ओरू पट्टूरण’ में काम करने का मौका दिया था, उस समय फिल्म के डायरैक्टर गंगइे अमरानन ने मेरा स्क्रीन नाम निशांति रखा था. लेकिन मेरी मां ने कहा कि यह नाम तो अशांति जैसा है.

मेरी बड़ी बहन भानु प्रिया उस समय तक बड़ी हीरोइन बन चुकी थीं. हम बहनों का असली नाम भानु और शांति है. मेरी बहन ने अपने नाम के साथ प्रिया जोड़ा था, तो मेरी मां ने मुझ से भी प्रिया जोड़ कर शांति प्रिया के नाम से कैरियर में आगे बढ़ने की सलाह दी.

सवाल: जब आप का ऐक्टिंग कैरियर उंचाइयों पर था, तब आप ने हिंदी फिल्म ‘इक्के पे इक्का’ के बाद ऐक्टिंग से ब्रेक ले लिया था. क्यों?

जवाब: फिल्म ‘इक्के पे इक्का’ से पहले मैं ने एक डायरैक्टर तरुण कुमार की फिल्म ‘अंधा इंतकाम’ साइन की थी. इस में सिद्धार्थ और रोहित राय हीरो थे. उस से 6-7 महीने पहले फिल्मफेयर अवार्ड में ‘न्यूकमर अवार्ड’ के लिए एकसाथ परफौर्म किया था. तो पहली मुलाकात सिद्धार्थ से तब हुई थी. उस के बाद हम ने एकसाथ फिल्म ‘अंधा इंतकाम’ की और हम दोनों में प्यार हो गया. फिर हम ने शादी कर ली.

सिद्धार्थ ने मुझ से कभी भी ऐक्टिंग करने से मना नहीं किया था, पर मैं ने अपनी मम्मी से सुना था कि शादी के बाद ऐक्टिंग करने में समस्याएं आती हैं.

शूटिंग कर के वापस लौटने के बाद घर की जिम्मेदारी निभाना, घर के काम करना आसान नहीं होता. हमारी फिल्म इंडस्ट्री में हर दिन फिल्म की शूटिंग का समय अलगअलग होता है, जिस के चलते पतिपत्नी के बीच समझदारी नहीं रह पाती. ये सारी बातें भी मेरे दिमाग में घूम रही थीं. इस के अलावा मैं

चेन्नई यानी यानी दक्षिण भारत की रहने वाली थी और अब मुझे दक्षिण मुंबई के रहनसहन में खुद को ढालना था. पति के परिवार और उन के घर के माहौल को समझने में मुझे काफी समय लगा था. फिर भी मैं ऐक्टिंग कर सकती थी. उन्होंने मना नहीं किया था. पर मेरी आदत रही है कि जो भी करो, ईमानदारी से करो, इसलिए मैं ने ऐक्टिंग से दूरी बना कर खुद को पूरी तरह से पारिवारिक जीवन में बिजी कर लिया था.

सवाल: अब आप के दोनों बेटे क्या कर रहे हैं?

जवाब: शुभम म्यूजिशियन है. उस के 2-3 अलबम बाजार में आ चुके हैं. वह खुद गीत लिखता है, संगीत की धुन बनाता है, खुद गाता है, खुद अलबम भी बनाता है. उस ने फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ में ऐक्टिंग भी की है. दूसरा बेटा शिष्य राय लेखक है. उस ने वैब सीरीज ‘सनफ्लावर सीजन 2’ का लेखन किया है.

सवाल: आप के पति सिद्धार्थ की अचानक हार्ट अटैक से मौत होने के बाद आप को किनकिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा था?

लकड़बग्घा फिल्म रिव्यू: कमजोर स्क्रीन प्ले पर कलाकारों की बेहतरीन एक्टिंग

  • रेटिंग: तीन स्टार
  • निर्माताः फस्ट रे फिल्मस
  • निर्देषकः विक्टरमुखर्जी
  • कलाकारः अंषुमन झा,मिलिंद सोमण, रिद्धि डोगरा,परेष पाहुजा,इकक्षा केरुंग, व अन्य
  • अवधिः दो घंटे 12 मिनट

पुरुष प्रेमियों के लिए एक जानवर की क्या अहमियत होती है, इसे समझने के लिए एक्षन,इमोषन व रोमांच से भर पूर फिल्म ‘‘लकड़बग्घा’’ से बेहतर कुछ नही हो सकता. लेकिन फिल्म की धीमीगति व रोमांच की कमी अखरतीहै.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में कोलकता का एक साधारण युवक अर्जुन बख्षी ( अंषुमनझा ) है,जो कूरियरब्वौय और अपने इलाके के बच्चों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग भी देताहै.अर्जुन को बेजुबान जानवरों से काफी प्यार करता है.उसने भारतीय नस्ल के कुत्तों को पाल रखा है.उसके पिता (मिलिंद सोमण ) ने उसे बचपन से ही बेजुबान और बेसहारा जानवरों,खास कर कुत्तों के लिए लड़ना सिखाया है.जब कोई इंसान किसी कुत्ते को नुकसान पहुंचाताहै, तो अर्जुन उसका दुष्मन बन जाता है.अर्जुन ऐसे ही पषुओं के दुष्मनों की हड्डी पसली तोड़ता रहता है.कोलकत्ता शहर में आए दिन बुरी तरह से घायल लोग मिलते हैं,इससे पुलिस हरकत में आती हैं.

इसकी जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच अफसर अक्षरा डिसूजा (रिद्धि डोगरा ) को सौंपा जाता है.अर्जुन बख्षी,अक्षरा का कूरियर देने जाता है ,तब दोनों की पहली मुलाकात होती है. उसके बाद अर्जुन अपने भारतीय नस्ल के कुत्ते शौंकु के लापता की षिकायतलिखने अक्षरा के पास जाता है.अपने कुत्ते षौंकू की तलाष के दौरान अर्जुन को अवैध पशु व्यापार के बारे में पता चलता है.अर्जुन को यह भी पता चलता है कि कई रेस्टोरेंट में मटन के नाम पर कुत्तों के मीट की बिरयानी खिलायी जाती है.एक दिन अचानक आर्यन की मुलाकात दुर्लभ लाल-धारी लकड़बग्घा (लकड़बग्घा) से हो जाती है,जिसे आर्यन विदेष भेजने की फिराक मेथा,पर अर्जुन उसे अपने साथ ले आने में सफल हो जाता है.

कहानी आगे  बढ़ती है और अक्षरा के साथ अर्जुन उसके भाई आर्यन डिसूजा से मिलता है और आर्यन की जानवरों के प्रतिसंवेदनशीलता की कमी से असहज महसूस करता है .परवह आर्यन के ेअसली व्यापार सेपरिचित नही होता.अर्जुन को बहुत देर से पता चलता है कि पषुओं का असली दुष्मन आर्यन डिसूजा ही है.आर्यन एक निर्दयीव्यवसायी, मांसप्रेमी, पशु-दवातस्करहै.इसके बाद अर्जुन और पशुओं के अवैध व्यापार में संलग्न आर्यन डिसूजा ( परेषपाहुजा ) के बीच युद्ध छिड़ जाताहै.अब क्या अर्जुन उन पशु सरगना का पर्दा फाश कर पाएगा?

समीक्षाः

भारतीय नस्ल के कुत्तों व जानवरों केा बाने ,उनसे प्रेम करने का एक अति आवष्यक संदेष देने वाली एक्षन व रोमांच प्रधान फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी पटकथा है.फिल्म में रोमांचक का अभा है.फिल्मकार ने कलकत्ता में षूटिंग की है, मगर कलकत्ता पोर्ट से पषुओं की होने वाली तस्करी के दृष्योंको नही रखा है.जब कि इस तरह के दृष्य होने चाहिए थे.फिल्म कार ने कुछ बातों को महज संवादों में ही समेट दिया.हो सकता है कि बजट की कमी के चलते ऐसा किया गया हो,मगर इससे फिल्म थोड़ी कमजोर हो जाती है.इतना ही नही एक क्राइम ब्रांच अफसर अक्षरा डिसूजा आखिर अपने ही घर यानी कि अपने भाई आर्यन डिसूजा की काली करतूतों से कैसे अनजान रहती है,यह समझ से परे है.

कमजोर पटकथा के बावजूद यह फिल्म अपनी अनूठी कहानी और विनम्र शैली में काफी प्रभावशाली है.अक्षरा व अर्जुन के बीच के रोमांस को और अधिक बेहतर किया जास कता था.निर्देषक विक्टर मुखर्जी सफल रहे हैं .फिल्म के कुछ दृष्य काफी बेहतर बने हैं.यह फिल्म पष्चि मीनस्ल के पालतू जानवरों के मालिकों कीमान सिकता को उजागर करने में सफल रही है, जोदे सी कुत्तों दूर भागते हैं.फिल्म में बिना मे लोड्ामा के कुछ भावुक दृष्य भी हैं.फिल्म की धीमी गति अखरतीहै. बेल्जियन संगीतका रसाइमन फ्रैंक्के टदेसी संगीत पर अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं.जीन मार्क सेल्वा का कैमरा वर्क कमाल का है.

अभिनयः

पषु प्रेमी अर्जुन के किरदार में अंषुमन झा थोड़ा कमजोर नजर आए हैं,मगर एक्षन दृष्योंमेे ंउन्होेने जबरदस्त कमाल किया है.उनकी मेहनत साफ साफ झलकती है.मार्शल आर्ट ट्रेनर के रूप में अंशुमन झा ने अपने किरदार को बाखूबी निभाया है.अंषुमन झा में काफी संभावनाएं हैं.क्राइम ब्रांच अफसर अक्षरा के किरदार में रिद्धि डोगरा ने एक बार फिर अपने अभिनय काजलवा विखेरने मंे सफल रही हैं.क्राइम ब्रांच अफसर के तौर पर उनके अंदर क्या चल रहा है,वह क्या सोच रही हैं,इसकी भनक वहदर्ष कों कोन हीं लगने देती .दर्षक लगातार कन्फ्यूज होता रहता है कि अक्षरा,अर्जुन के साथ है या अर्जुन को गिरफ्तार करना चाहती हैं?

इस फिल्म के दोआष्र्चय जनक पर फार्मेंस हैं. एक हैं परेष पाहुजा.अब तक रोमांटिक किरदार निभाते आए परेष पाहुजा ने इस फिल्म में अहंकारी, बुद्धिमान, परिष्कृत व अवैध पषु व्यापार में संलग्न विलेन आर्यन डिसूजा  के किरदार में परेष पाहुजा एकदम नए अवतार में नजर आए हैं.तो वहीं आर्यन की राइट हैंड फाइटर के किरदार में इष्का केरुंग ने जिस तरह के खतरनाक एक्षन दृष्य किए हैं,वह बिरला कलाकार ही कर सकता है.सिक्किम पुलिस की अफसर इक्षा की यह पहली फिल्म है,मगर जबरदस्त परफार्मेंस देकर वह  किसी का ध्यान अपनी तरफ खींचने में कामयाब रही हैं.मिलिंद सोमण की प्रतिभा को जाया किया गया है.

यह सब कई बार सपने जैसा लगता है -विक्की कौशल

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ रचनात्मक काम करने की मंशा के साथ बौलीवुड से जुड़ने के लिए जब विक्की कौशल फिल्म ‘‘गैंग्स आफ वासेपुर’’ में निर्देशक अनुराग कष्यप के सहायक के रूप में काम कर रहे थे,तब किसी को अनुमान नहीं था कि एक दिन वह अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर बहुत ही कम समय में एक नैशनल व दो फिल्मफेअर सहित कई अवार्ड अपनी झोली में डालने के साथ ही फोब्र्स पत्रिका में भी अपना नाम दर्ज कराने में सफल हो जाएंगे.फिल्म ‘मसान’ से शुरू हुई विक्की कौशल की अभिनय यात्रा ‘जुबान’,‘रामन राघव 2’,‘राजी’, ‘संजू’,‘उरीः द सर्जिकल स्ट्ाइक’, ‘सरदार उधम’ से होते हुए ‘‘गोविंदा नाम मेरा’’ तक पहंुच गयी है.इस अभिनय यात्रा के दौरान उनकी अभिनय क्षमता के नित नए आयाम सामने आते रहे हैं.उनका यह सफर आगे अभिनय के किन आयामों को छूने वाला है,यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.इन दिनों वह सोलह दिसंबर से ‘डिज्नी प्लस हाॅटस्टार’ पर स्ट्ीम होने वाली शश्ंााक खेतान निर्देशित फिल्म ‘‘गोविंदा नाम मेरा’’ को लेकर चर्चा में हैं.जिसमें उन्होेने अब तक निभाए गए किरदारों से काफी अलग किरदार निभाया है.

प्रस्तुत है ‘धर्मा प्रोडक्शंस’ के आफिस में विक्की कौशल से हुई

बातचीत के अंश…

सवाल- ‘मसान’ से ‘गोविंदा नाम मेरा’ तक की अपनी अभिनय यात्रा को आप किस तरह से देखते हैं?

जवाब -बहुत ही ग्रेटीट्यूड के साथ देखता हॅूं.मेरा हमेशा से मानना रहा कि इस इंडस्ट्ी में मुझसे भी ज्यादा प्रतिभा शाली लोग रहे हैं और आगे भी आते रहेंगें.मुझसे काफी मेहनती लोग भी रहे हैं और हैं भी.लेकिन उपर वाला मुझ पर मेहरबान था.वह सही समय पर सही लोगांे से मुझे मिलवाता रहा.लोगों को मेरे काम के जरिए मेरी प्रतिभा पर भरोसा होता गया.मुझे कुछ अच्छी फिल्में मिलती गयी और मैं भी अपनी तरफ से मेहनत कर अच्छा काम करता गया.और लोगों से जुड़ पाया.दर्शकांे का प्रेम बटोर पाया.यह सब कई बार सपने जैसा लगता है.सब कुछ अपने आप हो रहा है,कई बार मानना मुश्किल हो जाता है कि यह सब हो रहा है.जब नई फिल्म मिलती है,तो लगता है कि ऐसा भी हो रहा है.जो मैं सोचता था कि वह हो रहा है.मैं उपर वाले के साथ ही उनका शुक्रगुजार हॅूं,जो मुझे मौका दे रहे हैं.जितने भी मशहूर निर्देशक हैं,जिन्होने मुझ पर भरोसा करके मुझे चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने के अवसर दिए,उन सभी का मैं शुक्रगुजार हॅूं.सही मायनों में सबसे बड़ा मैनेजर उपर बैठा है,जो करिश्मे दिखाए जा रहा है और मैं सिर्फ उसका हिस्सा बन पा रहा हॅूं. एक किरदार को निभाते समय दो चीजें महत्वपूर्ण होती हैं.

 

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Vicky Kaushal (@vickykaushal09)

सवाल- आपकी अपनी कल्पना शक्ति और आपके जीवन के निजी अनुभव.आप किसी किरदार को निभाते समय किसका कितना उपयोग करते हैं?

जवाब– आप एकदम सही हैं.किसी भी किरदार को निभाने के दो हथियार होते हैं-एक कल्पना शक्ति और दूसरा आब्जर्वेशन यानी कि जिंदगी के अनुभव.मेेरे लिए आब्जर्वेशन बहुत अधिक महत्व रखता है.हम जब फिल्म नही कर रहे होते हैं,तब भी चल रहा होता है.हम अपनी जिंदगी में जिन लोगों से मिलते हैं,उन्हे देखकर अहसास होता है कि यह इंसान कुछ अलग था.इसको मैं कहीं उपयोग कर सकता हॅूं.तो आपकी स्टडी चल रही होती है.आप आब्जर्व कर रहे होते हैं.यह अलग अंदाज में बहुत अच्छा चल रहा है.

जब मैने फिल्म ‘संजू’ की थी.इसमें मेरा कमली का किरदार गुजराती था.तो इस फिल्म के किरदार कमली को निभाने से पहले मैं सूरत चला गया था.वहां पर एक हीरा/डायमंड बाजार है.वहां पर एक दुकान पर एक लड़का बैठा हुआ था,मैंने दूर बैठकर उसका वीडियो रिकार्ड किया था.वह वीडियो आज भी मेरे पास है.उस लड़के से मैं मिला नहीं,पर दूर चाय की दुकान पर बैठकर उसके हाव भाव देखे,उसका वीडियो रिकार्ड किया और उस लड़के के कई हाव भाव मैने कमली के किरदार में पिरोए.उसकी एक हरकत यह थी कि जब भी वह बात करता था,तो उसके हाथ बहुत चलते थे.मुझे लगा कि अगर इसके हाथ बांध दिए जाएं,तो यह बोल नहीं पाएगा.आपने फिल्म ‘संजू’ देखी होगी,तो देखा होगा कि कमली के हाथ बहुत चलते हैं.वैसे भी हर गुजराती हाथ चलाते हुए ही बात करता है.तो आब्जर्वेशन बहुत काम करता है. और जब आप उस पल में होते हैं,तब कल्पना शक्ति काम करती हैं.

हम सेट पर कैमरे के सामने कल्पना करते हैं कि अगर हमारा दोस्त इस परिस्थिति से गुजर रहा है,तो मुझे कैसा फील होगा? बौडी लैगवेज/ हाव भाव मंे आब्जर्वेशन काम आता है.कल्पना शक्ति और आब्जर्वेशन का मिश्रण ही एक नए किरदार को जन्म देता है. आपने दो फिल्में की हैं-एक ‘उरी.द सर्जिकल स्ट्ाइक.’ और दूसरी सरदार उधम सिंह.दोनो फिल्में देशभक्ति की बात करती हैं.पर दोनों का परिवेश, कहानी व किरदार एक दूसरे से बहुत अलग हैं.

सवाल- आप किस फिल्म में सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ी.किसमें कल्पना शक्ति व आब्जर्वेशन में से किसका ज्यादा उपयोग करना पड़ा?

जवाब- दोनों में बहुत मेहनत करनी पड़ी,पर दोनों में ही अलग किस्म की मेहनत करनी पड़ी.‘उरी’ में कमांडो का किरदार था.एक्शन था.उसकी सारी तैयारी दिमागी कम,शारीरिक ज्यादा थी.पहले तो मुझे अपनी शारीरिक बनावट उस तरह की बनानी थी.फिर एक्शन की ट्ेनिंग लेनी पड़ी.फिर आर्मी के अनुशासन को सीखना पड़ा.आर्मी के लोग मार्च कैसे करते हैं,उनकी बौडी लैंगवेज कैसी होती है,उनके इशारे क्या होते हैं,जब वह क्रिटिकल सर्जिकल स्ट्ाइक के लिए जाते हैं,जहां आवाज नहीं करना है.यह सब मुझे मिलिट्ी से ही सीखना पड़ा. जबकि फिल्म ‘सरदार उधम सिंह’ में हम यह नही दिखा रहे थे कि सरदार उधम सिंह ने क्या क्या किया.बल्कि हम यह दिखा रहे थे कि उस वक्त उनका स्टेट आफ माइंड क्या था.जब देश में बहुत कुछ घट रहा था,ब्रिटिशांे का राज था,यह इंसान अपने देश मंे रहकर नहीं बल्कि उनके देश में जाकर उनसे लड़ रहा था.वह सात समंुदर पारकर वहां गया था.आज भी अप लंदन जाना चाहते है तो 15 चीजे ंसोचते हैं.टिकट कैसे कराना है,वीजा लगवाना है,यह तैयारी,वह तैयारी…पर उधम सिंह की कहानी तो सौ साल पहले की है,जब हवाई जहाज होते नही थे. तब यह बंदा सात देशो में पैदल घूमता हुआ, कई वर्ष लगाकर वहां पहुॅचा.वहां रहते हुए कई वर्ष तक अपने गुस्से को पालकर रखा कि मैं अपने देश पर हो रहे जुर्म का बदला लूूंगा.और ऐसा बदला लूंूगा कि पूरी दुनिया जानेगी.तो उसका स्टेट आफ माइंड क्या था? यह जानने के लिए हमें बहुत इंटरनल मेहनत करनी पड़ी,वह शारीरिक मेहनत नही थी.एक इंसान को समझना,जिसने 21 वर्ष तक उस गुस्से को जिया,वह मनःस्थिति क्या है? इसको एक्स्प्लोर करना कए इंटरनल प्रोसेस था.इस तरह दोनो फिल्मांे के किरदारांे को निभाने का प्रोसेस बहुत ही अलग था.

 

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Vicky Kaushal (@vickykaushal09)

सवाल- उधमसिंह अगर ओटीटी की बजाय सिनेमाघरों में प्रदर्शित होती,तो उसका असर कुछ ज्यादा होता?

जवाब- देखिए,वह कैनवास तो सिनेमाघर के लिए ही बनाया गया था.पर जब हम फिल्म लेकर उस वक्त दुनिया जिस हालात में थी,उसे देखते हुए फिल्म को लोगों तक पहुॅचाने के लिए ओटीटी प्लेटफार्म ही बेहतर विकल्प था.तब कोविड कई देशों में चल रहा था,कई देशों में समाप्ति की ओर था.किसी को नही पता था कि कब सिनेमाघर बंद हो जाएंगे,कब ख्ुालेंगे, क्या होगा..सब कुछ अनिश्चितता का वातावरण था.फिल्म के निर्देशक सुजीत दा और हम सभी के लिए जरुरी था कि दुनिया भर में रह रहे भारतीयांे तक यह कहानी पहुॅचायी जाए.जिससे उन्हे पता चले कि हमारे यहां ऐसा भी हुआ है.आजादी से पहले यह किरदार भी था,जिसे हम सभी भूल गए हैं.जलियांवाला बाग की कहानी हमारी किताब में एक छोटा सा अध्याय है कि जलियांवाला बाग में गोलियंा चली थीं और इतने लोग मरे थे.पर उसकी ग्रैविटी को हम कभी नहीं जानते कि इतने लोगों का मरना कितना भयावह व दुःखद लगता है.एक उन्नीस साल का लड़का जब यह सब कुछ देख लेता है,तो कैसे एक रात में उसकी जिंदगी बदल जाती है.हम चाह रहे थे कि दुनिया भर में रह रहे भारतीय इसकी ग्रैविटी को समझें.आप अगर आज इंग्लैंड जाएं, तो वहां की नई पीढ़ी,युवा वर्ग को तो पता ही नही है कि ऐसा कुछ हुआ था.वह अपनी किताबों में नहीं बताएंगे कि हमारे पूर्वजों ने यह कर्म किया था.हमारी फिल्म ‘उधमसिंह’ देखकर उन्हे भी अहसास हुआ कि अच्छा,हमें किसी ने बताया नहीं कि ऐसा हुआ था.हमारी इतिहास की किताबों में भी इसका जिक्र नहीं है.तो हमारे लिए पहली प्राथमिकता उस दुनिया तक पहुॅचना जरुरी था.उस वक्त कोविड के चलते जो हालात थे,उसे देखते हुए हमारे लिए ओटीटी ही सर्वश्रेष्ठ प्लेटफार्म था.लोग जब चाहें तब फिल्म देख सकते हैं.मगर यह सच है कि अगर यह फिल्म सिनेमाघर मंे आती,तो लोगों पर इसका असर कुछ अलग हो सकता था.सिनेमाघर की अपनी खूबी है कि वह उस वक्त आपको इधर उधर देखने, सोचने नहीं देता और अपनी बात पहुॅचा देता है.

सवाल- आपने नसिरूद्दीन शाह व मानव कौल के साथ थिएटर किया.दोनों अलग किस्म का थिएटर करते हैं.वह अभिनय की जो ट्ेनिंग थी,अब किस तरह से मदद करती है?

जवाब- थिएटर पर काम करना रियाज था.थिएटर की खूबी यह है कि वह कलाकार को गलती करने का अवसर देता है.सिनेमा में आपने गलती की,तो अगला काम नही मिलेगा.थिएटर में आप गलतियों से ही समझ पाते हो कि अब नाटक में करना क्या है? नाटक में हम कम से कम तीन माह रिहर्सल करते हैं,जिसमें हम यह सीखते हैं कि हमें क्या नहीं करना है.रिहर्सल के दौरान हम हर दिन उसी नाटक को अलग ढंग से करके देखते हैं कि कुछ नया मिलेगा क्या? जबकि हमें पता होता है कि इस ढंग से करेंगे नहीं.तो उस वक्त कलाकार को अपने बेसिक इंस्टेंट्स का पता लग जाता है.थिएटर में लाइव दर्शक होता है,उससे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है.एक ही नाटक के हम कई षो करते हैं,उस वक्त हमें पता चलता रहता है कि नाटक कब खराब होता है और कब अच्छा.नाटक में कलाकार को सिर से लेकर पैर तक ख्ुाद को जानने का अवसर मिलता है.सिनेमा में कैमरा तो हमारे चेहरे तक ही नहीं आंखों तक आ जाता है.पर थिएटर में पूरा अभिनय करना होता है,वहंा आपके हाथ कहां जा रहे हैं,पैर कहां है,हर अंग पर ध्यान देना होता है.सिनेमा में मैने कई कलाकार को मैने देखा है कि उन्हें पता नहीं होता कि हाथों के साथ करना क्या है? हाथ छूट जाते हंैं, तो अलग से लगते हैं.थिएटर में वह सारी झिझक निकल जाती है.माना कि थिएटर में रीटेक नहीं होते और सिनेमा में रीटेक होते हैं.इसीलिए थिएटर को कलाकार का और सिनेमा को निर्देशक का माध्यम कहा जाता है.जब आप कलाकार के माध्यम से सिनेमा के माध्यम में आते हैं,तो आपका आत्म विश्वास बढ़ा रहता है.इंसान हमेशा गलतियंा करने से डरता है.अगर आपने गलती कर ही ली है,तो फिर डर खत्म हो जाता है.

सवाल- आपको नहीं लगता कि हर फिल्म कलाकार को दो तीन वर्ष बाद एक दो माह के लिए थिएटर करना चाहिए?

जवाब –मैं ऐसा कोई जरुरी नहीं मानता.थिएटर कलाकार को यही सिखाता है कि आप कितनी खूबी से आब्जर्व करते हो.कितनी खूबी से अपने काम को सराहते हैं.वह आप कहीं भी कर सकते हैं.मेरी नजर में हर इंसान कलाकार है.हर इंसान झूठ बोलता है,झूठ बोलना भी अभिनय ही तो है.एक बच्चा घर से बाहर कुछ करके आ जाता है और उसे पता होता है कि घर में डाॅंट पड़ेगी,तो वह अपनी एक कहानी गढ़कर पहुॅचता है. उस वक्त वह बच्चा ख्ुाद स्क्रिप्ट लिखता है,ख्ुाद निर्देशित करता है और ख्ुाद ही अभिनय भी करता है.और वह भी एकदम सच्चाई से परफार्म करता है. तो थिएटर सिर्फ यह सिखाता है कि आपसे जब परफार्मेंस मांगी जाए,तब आप दे सकंे.मेरी नजर में अक्षय कुमार बहुत अच्छे कलाकार हैं.जब वह काॅमेडी करते है, तो बहुत कमाल करते हैं.

पूरे कंविक्शन के साथ करते हैं.उन्होने तो कभी थिएटर नही किया.तो कलाकार का थिएटर करना जरुरी नही है.कलाकार के अंदर एक अवेयरनेस आना जरुरी है,फिर चाहे वह थिएटर से आए या किसी अन्य माध्यम से.

सवाल- फिल्म ‘गोविंदा नाम मेरा’ में आपको क्या खूबी नजर आयी थी? मैंने सुना है कि निर्देशक शशांक खेतान ने इस फिल्म के संदर्भ में आपसे पहले ही कोई चर्चा की थी?

जवाब- ‘उरीः द सर्जिकल स्ट्ाइक’ और ‘सरदार उधम सिंह’ के बाद मैं भूखा था,कुछ हल्का फुल्का करने के लिए.मैं सोच रहा था कि कुछ काॅमेडी,कुछ ंरंगीन सा करने को मिल जाए.मैं यह बात कैरियर में कुछ अच्छा होने की सोच के साथ नहीं सोच रहा था.कुछ समय से गंभीर किरदार करते हुए मुझे अंदर से कुछ अलग व नया करने की भूख पैदा हो गयी थी.मुझे बतौर कलाकार एक ताजगी का अहसास करना था.ऐसा कुछ करना था,जो इंटेस न हो,जिसमंे रोना धोना न हो.पर मुझे पता नही था कि ऐसा कुछ मेरे पास आएगा या नहीं…ऐसे वक्त में एक दिन शश्ंााक ने मुझे बुलाया,हमारी बातचीत हुई.तब कोविड की शुरूआत हो रही थी.शशांक ने कहा कि इस वक्त बहुत त्रासदी है.हर इंसान के अपने अपने तनाव हैं.क्यो न हम कुछ ऐसा बनाए,जहां दो घंटे के लिए हम तनाव भूल सके.लोग हमारी फिल्म देखकर अपनी टेंशन भूल जाएं.उन्होने कहा कि क्यों न काॅमेडी फिल्म बनायी जाए? तो मैने कहा कि यह विचार तो बहुत अच्छा है.शशांक ने कहा कि ठीक है.मैं कुछ लिख रहा हॅूं.लिखने के बाद वह मुझे बुलाएंगे.फिर जब उनका लेखन पूरा हो गया.उन्होने मुझे बुलाया और पूरी स्क्रिप्ट सुनायी,मुझे कमाल की स्क्रिप्ट लगी.कन्फ्यूजन से जो ह्यूमर पैदा होता है, उसे दर्शक की हैसियत से भी देखने में मजा आता है.जिस तरह से प्रियदर्शन,राज कुमार हिरानी, डेविड धवन की फिल्में होती है.इन सभी की फिल्मों में कन्फ्यूजन से हास्य पैदा होता है.इतने सारे किरदार होते हैं और इतनी अधिक खिचड़ी पक जाती है कि उसी से हास्य उभरकर आ जाता है.इसे देखने मंे मजा आता है.ऐसा ही फिल्म ‘गोविंदा नाम मेरा’ मंे है.कई अलग अलग तरह के किरदार इस कहानी का हिस्सा हैं.यह सारे किरदार किस तरह एक दूसरे से भिड़ते हैं और बीच में मर्डर हो जाता है.फिर हास्य के साथ क्या खिचड़ी पकती है,वही इस फिल्म की कहानी है.इसमें कुछ भी गंभीर से लेने वाली बात नही है.इसमें न सीख है और न ही सबक है.

सवाल- फिल्म के अपने किरदार को किस तरह से परिभाषित करेंगें?

जवाब- इस फिल्म में मेरे किरदार का नाम गोविंदा वाघमारे है.आप अपने आस पास नजर दौड़ाएंगे,तो पाएंगे कि हर इंसान का अपना संघर्ष चल रहा है.हर कोई अपनी अपनी जिंदगी में गोविंदा वाघमारे है.बेचारा सुबह उठता है.कोई इधर से तो कोई उधर से मार खाता है.घर से मार नहीं खाता,तो ट्ेन में चढ़कर मार खाता है.ट्ेन से उतरते वक्त मार खाता है.कहीं नौकरी कर रहा है,तो वहंा बाॅस की डांट खाता है.यानी कि कहीं न कहीं से हर इंसान हर दिन मार खाता रहता है.भले ही शारीरिक तौर पर न पड़ रही हो,पर उसे मार जरुर पड़ रही होती है.तो गोविंदा वाघमारे ऐसे ही लोगों का प्रतिनिधित्व करता है.फिल्म में गोविंदा वाघमारे अपनी पत्नी से मार खाता है.नौकरी में भी संघर्ष है, वह उसे बेहतर करना चाहता है.तो वहीं फिल्म में डाॅन है,वकील है, सौतेला भाई है.उसकी मां भी है,जो उसका घर हड़पना चाहती है.बीच मेे हत्या हो जाती है.आरोप गोविंदा पर ही लगता है,पर यह कैसे बचता है,यही इस किरदार की खूबी है.यही हम सभी की निजी जिंदगी मे भी होता है.जैसे ही नौ बजते हंैं,आप सड़क पर होते हैं और संघर्ष शुरू हो जाता है.रात में जिस तरह से कूड़ादान घर से बाहर रखा जाता हैउसी तरह हर इंसान दिन भर के संघर्ष को समेटकर कूड़ादान मंे भर रखते हैं.ऐसा हर दिन वह करता है.यही जिंदगी है.

तो गोविंदा वाघमारे के किरदार में भी इतनी सारी समस्याएं हैं,कि कुछ न कुछ कन्फयूजन,कुछ न कुछ टेंशन चलते ही रहते हैं.फिर भी जिंदगी ऐसी है कि उसमें काॅमेडी ढूढ़़ो,तो कुछ न कुछ मिल ही जाती है.मुस्कुराने की कोई न कोई वजह मिल ही जाती है.जब इंसान दूसरे की समस्या देखता है,तो उसकी अपनी समस्या खत्म हो जाती है.तो इस फिल्म में भी समस्या के साथ काॅमेडी की तलाश है.

सवाल- आप और आपकी पत्नी कटरीना कैफ दोनों एक ही क्षेत्र में कार्यरत हैं.यह कितना बोरिंग होता है और कितना फायदेमंद होता है?

जवाब –फायदेमंद तो जरुर होता है.जब हम लंबे समय के लिए शूटिंग करने बाहर जाते हैं,तो जो इसी क्षेत्र से हैं,वह इस स्थिति को समझ सकते हैं.जब दोनो एक ही प्रोफेशन में होते है,तो यह सुविधा होती है.क्यांेकि हम प्रोफेशन की प्लस व माइनस को समझते हैं.तो शाक नहीं लगता.बोरिंग या तकलीफ यह होती है कि हम घर में भी वही बातें होती हैं,जो बाहर हो रही थीं.तो कई बार हमें कामरशियसली बोलना पड़ता है कि अब हम काम की बात नही करेंगे.

सवाल- रचनात्मकता में कहीं कोई मदद मिलती है?

जवाब- जी हा हम लोग कई आडियाज एक दूसरे को देते रहते हैं.वह इतना अच्छा डांस करती हंै कि मैं अपने डांस के रिहर्सल वीडियो दिखाकर उनसे सलाह लेता हॅूं.वह अच्छा गाइड करती हैं.उन्होने तो ढेर सारे यादगार डांस किए हैं.

डाक्यूमेंट्री फिल्म- ‘‘नाम था कन्हैयालाल: एक सरहानीय प्रयास…’’

निर्माताः ‘कन्हैयालाल प्रोडक्शन’ के बैनर तले हेमा सिंह

निर्देषकः पवन कुमार और मुकेश सिंह

अवधिः एक घंटा 13 मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: एम एक्स प्लेअर

अमूमन हर फिल्म कलाकार बातचीत के दौरान दावा करता है कि वह उन फिल्मों का हिस्सा बनने का प्रयास करते हैं,जिन फिल्मों में उनके अभिनय को देखकर हर आम इंसान व भावी पीढ़ी उन्हें उनके इस दुनिया को अलविदा कहने के बाद भी याद रखें. लेकिन कलाकार की यह सोच मृगमरीचिका व छलावा के अलावा कुछ नही है. इस बात को समझने के लिए हर इंसान को  ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘एम एक्स प्लेअर ’पर स्ट्रीम  हो रही अभिनेता स्व. कन्हैलाल पर बनायी गयी डाक्यूमेंट्ी फिल्म ‘‘नाम था कन्हैयालाल’’ एक बार जरुर देखनी चाहिए.

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘मदर इंडिया’’ में दुष्ट साहूकार सुखीलाला,जो विधवा औरत पर बुरी नजर रखता है, का किरदार निभाकर अपने अभिनय से पूरे विश्व को हिलाकर रख देने वाले अभिनेता स्व. कन्हैयालाल को नई पीढ़ी के कलाकार व आज की पीढ़ी तक नहीं जानती.इस फिल्म में नरगिस,सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार,राज कुमार,कुमकुम, मुकरी जैसे कलाकारों ने भी अभिनय किया था. ज्ञातब्य है कि उस वक्त फिल्म ‘मदर इंडिया’ महज एक वोट के चलते आॅस्कर अवार्ड पाने से वंचित रह गयी थी.यह एक सुखद बात है कि अब कन्हैयालाल पर उनकी बेटी हेमा सिंह ने डाक्यूमेंट्ी  फिल्म ‘‘नाम था कन्हैयालाल’ का निर्माण किया है.

कहानीः

वाराणसी में दस दिसंबर 1910 को जन्में कन्हैयालाल के पिता भैरोदत्त चैबे ‘सनातन धर्म नाटक समाज’ के मालिक थे. और वह कई षहरों व गांवो में घूम घूमकर नाटक किया करते थे. कन्हैयालाल अपने पिता के  साथ जाते थे और स्टेज के पीछे  के कामो में हाथ बंटाया करते थे.सोलह साल की उम्र में कन्हैयालाल ने नाटक व गीत लिखने शुरू किए. पिता की मौत के बाद भाईयों ने कुछ समय तक नाटक कंपनी को चलाने का प्रयास किया. इस बीच बड़े भाई  संकटाप्रसाद चतुर्वेदी का विवाह हो गया था.एक दिन घर में किसी को बिना बताए संकटाप्रसाद मंुबई पहुॅच गए. उनकी तलाश कर उन्हें वापस वाराणसी ले जाने के लिए कन्हैयालाल को भेजा गया.

पर मुंबई  पहुॅचकर जब कन्हैयालाल ने अपने भाई को फिल्मों में अभिनय करते पाया,तो वह भी मुंबई  में रूक गए. उनके भाई संकटा प्रसाद ने मूक फिल्मों में बतौर अभिनेता अपनी एक जगह बना ली थी. कन्हैयालाल ने पहले कुछ फिल्मों के गीत व कुछ नाटक लिखे.उनका मकसद लेखक व निर्देशक बनना था. स्व लिखित नाटक ‘‘ 15 अगस्त’’ का मंचन भी किया. 1939 में फिल्म ‘एक ही रास्ता’ के सेट पर एक कलाकार के न पहुॅचने पर कन्हैयालाल ने बांके का किरदार निभाया. इसके बाद उनकी अभिनय की दुकान चल पड़ी. 1940 में महबूब खान ने अपनी फिल्म ‘‘औरत’’ में साहूकार सुखीलाला का किरदार निभाने का अवसर दिया. महबूब खान, कन्हैयालाल के अभिनय से इस कदर प्रभावित हुए कि जब  17 साल बाद जब महबूब खान ने ‘औरत’ का ही रीमेक फिल्म ‘मदर ंइडिया’ बनायी,तो सुखीलाला के किरदार के लिए उन्होेने कन्हैयालाल को ही याद किया. एक बार महबूब खान ने स्वयं बताया था कि लेखक वजाहत मिर्जा ने ही सलाह दी थी कि सुखीलाला के किरदार के लिए कन्हैयालाल को बुलाया जाए. 1939 से अभिनय में व्यस्त हो गए कन्हैयालाल अपनी जड़ों से जुड़े रहे. इसी कारण उन्होेने अपनी बुआ के कहने वाराणसी जाकर जावंती देवी से विवाह रचाया. कन्हैयालाल ने भूक (1947),बहन, गंगा जमुना, राधिका,लाल हवेली, सौतेला भाई, गृहस्थी, गोपी, उपकार, अपना देश, जनता हवलदार, दुश्मन, बंधन, भरोसा, हम पांच, तीन बहूरानियां, गांव हमारा देश तुम्हारा, दादी मां, गृहस्ती, हत्यारा, पलकों की छांव में, हीरा, दोस्त, धरती कहे पुकार के सहित कुल 115 फिल्मों में अभिनय किया.फिल्म ‘साधना’ के संवाद व गीत लिखे थे. 1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘हथकड़ी’’ उनके कैरियर की अंतिम फिल्म थी.

कन्हैयालाल भले ही फिल्मोें में अभिनय कर रहे थे,पर वह पूरी तरह से पारिवारिक इंसान थे. वह अपने बड़े बेटे को सबसे अधिक चाहते थे. बेटे के असामायिक मौत के बाद वह टूट गए थे. अंततः 14 अगस्त 1882 को 72 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया.

समीक्षाः

1982 में कन्हैयालाल के इंतकाल के बाद फिल्म इंडस्ट्री ने पूरी तरह से उन्हे भुला दिया.कम से कम मैने अपनी 40 वर्ष की फिल्म पत्रकारिता के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े किसी भी फिल्मी हस्ती के मंुह से कन्हैयालाल का नाम नहीं सुना. यह एक सुखद बात है कि कन्हैयालाल की मौत के 40 वर्ष बाद उनकी बेटी हेमा सिंह ने उन्ही के नाम प्रोडक्शन हाउस का नाम ‘कन्हैयालाल प्रोडक्शन’ रखकर अपने पिता पर यह डाक्यूमेंट्ी फिल्म बनायी है. इस डाक्यूमेंट्ी फिल्म में अमिताभ बच्चन,सलीम खान,जावेद अख्तर,बीरबल,अनुपम खेर,बोमन इरानी,गोविंदा,पंकज त्रिपाठी,पेंटल सहित लगभग बीस फिल्मी हस्तियों ने कन्हैयालाल पर बात की है.

मगर  इनमें से किसी ने भी कन्हैयालाल के अभिनय पक्ष या इंसान के तौर पर कुछ खास नही कहा.कुछ लोगों ने बेवजह एक वोट से फिल्म ‘मदर इंडिया’ के  आॅस्कर अवार्ड से वंचित हो जाने को ही तूल दिया.इस डाक्यूमेंट्ी में आम इंसान ही नही नई पीढ़ी के कुछ कलाकार यह कहते नजर आते हैं कि वह कन्हैयालाल को नही जानते.कन्हैयालाल ने 115 में से लगभग हर फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया था.मगर इस डाक्यूमेंट्ी में ‘मदर इंडिया’ के अलावा अन्य फिल्मों का जिक्र नही है.जबकि मैंने कहीं पढ़ा था कि खुद कन्हैयालाल ने एक पत्रकार को बताया था कि उन्हे 1972 में प्रदर्शित जेमिनी की फिल्म ‘‘गृहस्थी’’ में उनके द्वारा निभाए गए स्टेशन मास्टर के किरदार को काफी सराहना मिली थी और इस फिल्म से उन्हे काफी संतुष्टि मिली थी.फिल्म ‘औरत’ में दुष्ट साहूकार का किरदार निभाने के बाद फिल्म ‘‘बहन’’ में अच्छे स्वभाव वाले जेब कतरे का किरदार निभाया था.

इतना ही नहीं कन्हैयालाल के अभिनय से उस वक्त के कई कलाकार ठर्राटे थे.इतना ही नही कुछ फिल्मी हस्तियों ने कन्हैयालाल की शराब की आदत को लेकर काफी कुछ कहा है,जिसे इस फिल्म से हटाया जा सकता था.शराब तो लगभग हर इंसान की कमजोरी सी बन गयी है.किसी ने यह जिक्र नहीं किया कि कन्हैयालाल किन परिस्थितियों में शराब का सेवन किया करते थे.काश,लोगो ने उनका चरित्र हनन करने की बनिस्बत उनकी अभिनय प्रतिभा व उनके व्यवहार को लेकर कुछ बताया होता,तो अच्छा होता. इतना ही नही इस डाक्यूमेंट्ी में कन्हैयालाल ने जीवित रहते हुए जो इंटरव्यू पत्र पत्रिकाओं को दिए थे,उनका भी कहंी कोई जिक्र नहीं है.जबकि ऐसे इंटरव्यू की तलाश कर उन्हें इस डाक्यूमेंट्ी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए था.

कुछ कमियों के बावजूद हेमा सिंह के इस कदम को सुखद ही कहा जाएगा कि उन्होने चालिस वर्ष बाद ही सही पर अपने पिता स्व. कन्हैयालाल को लेकर इस डाक्यूमेंट्ी फिल्म को लेकर आयी है.फिल्म मेें हेमा सिंह और उनकी बेटी प्रियंका सिंह के अलावा कन्हैयालाल की वाराणसी मे रह रही रिष्तेदार रेखा त्रिपाठी ने कन्हैयालाल के जीवन पर कुछ अच्छी रोषनी डाली है.यह डाक्यूमेंट्ी होेते हुए भी मनोरंजक है.सूत्रधार के रूप में कृप कपूर सूरी ने बेहतरीन काम किया है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें