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Hindi Emotional Story : प्रायश्चित

Hindi Emotional Story. आज सुधीर की तेरहवीं है. मेरा चित्त अशांत है. बारबार नजर सुधीर की तस्वीर की तरफ चली जाती है. पति कितना भी दुराचारी क्यों न हो पत्नी के लिए उस की अहमियत कम नहीं होती. तमाम उपेक्षा, तिरस्कार के बावजूद ताउम्र मुझे सुधीर का इंतजार रहा. हो न हो उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हो और मेरे पास चले आएं. पर यह मेरे लिए एक दिवास्वप्न ही रहा.

आज जबकि वह सचमुच में नहीं रहे तो मन मानने को तैयार ही नहीं. बेटाबहू इंतजाम में लगे हैं और मैं अतीत के जख्मों को कुरेदने में लग गई. सुधीर एक स्कूल में अध्यापक थे. साथ ही वह एक अच्छे कथाकार भी थे. कल्पनाशील, बौद्धिक. वह अकसर मुझे बड़ेबड़े साहित्यकारों के सारगर्भित तत्त्वों से अवगत कराते तो लगता अपना ज्ञान शून्य है. मुझ में कोई साहित्यिक सरोकार न था फिर भी उन की बातें ध्यानपूर्वक सुनती.

उसी का असर था कि मैं भी कभीकभी उन से तर्कवितर्क कर बैठती. वह बुरा न मानते बल्कि प्रोत्साहित ही करते. उस दिन सुधीर कोई कथा लिख रहे थे. कथा में दूसरी स्त्री का जिक्र था. मैं ने कहा, ‘यह सरासर अन्याय है उस पुरुष का जो पत्नी के होते हुए दूसरी औरत से संबंध बनाए,’ सुधीर हंस पड़े तो मैं बोली, ‘व्यवहार में ऐसा होता नहीं.’ सुधीर बोले, ‘खूबसूरत स्त्री हमेशा पुरुष की कमजोरी रही. मुझे नहीं लगता अगर सहज में किसी को ऐसी औरत मिले तो अछूता रहे. पुरुष को फिसलते देर नहीं लगती.’ ‘मैं ऐसी स्त्री का मुंह नोंच लूंगी,’ कृत्रिम क्रोधित होते हुए मैं बोली. ‘पुरुष का नहीं?’

सुधीर ने टोका तो मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. कई साल गुजर गए उस वार्त्तालाप को. पर आज सोचती हूं कि मैं ने बड़ी गलती की. मुझे सुधीर के सवाल का जवाब देना चाहिए था. औरत का मौन खुद के लिए आत्मघाती होता है. पुरुष इसे स्त्री की कमजोरी मान लेता है और कमजोर को सताना हमारे समाज का दस्तूर है. इसी दस्तूर ने ही तो मुझे 30 साल सुधीर से दूर रखा. सुधीर पर मैं ने आंख मूंद कर भरोसा किया. 2 बच्चों के पिता सुधीर ने जब इंटर की छात्रा नम्रता को घर पर ट्यूशन देना शुरू किया तो मुझे कल्पना में भी भान नहीं था कि दोनों के बीच प्रेमांकुर पनप रहे हैं.

मैं भी कितनी मूर्ख थी कि बगल के कमरे में अपने छोटेछोटे बच्चों के साथ लेटी रहती पर एक बार भी नहीं देखती कि अंदर क्या हो रहा है. कभी गलत विचार मन में पनपे ही नहीं. पता तब चला जब नम्रता गर्भवती हो गई और एक दिन सुधीर अपनी नौकरी छोड़ कर रांची चले गए. मेरे सिर पर तब दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. 2 बच्चों को ले कर मेरा भविष्य अंधकारमय हो गया. कहां जाऊं, कैसे कटेगी जिंदगी? बच्चों की परवरिश कैसे होगी? लोग तरहतरह के सवाल करेंगे तो उन का जवाब क्या दूंगी? कहेंगे कि इस का पति लड़की ले कर भाग गया. पुरुष पर जल्दी कोई दोष नहीं मढ़ता. उन्हें मुझ में ही खोट नजर आएंगे. कहेंगे, कैसी औरत है जो अपने पति को संभाल न सकी. अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मैं ने स्त्री धर्म का पालन किया. मैं ने उन वचनों को निभाया जो अग्नि को साक्षी मान कर लिए थे. तीज का व्रत याद आने लगा.

कितनी तड़प और बेचैनी होती है जब सारा दिन बिना अन्न, जल के अपने पति का साथ सात जन्मों तक पाने की लालसा में गुजार देती थी. गला सूख कर कांटा हो जाता. शाम होतेहोते लगता दम निकल जाएगा. सुधीर कहते, यह सब करने की क्या जरूरत है. मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूं. पर वह क्या जाने इस तड़प में भी कितना सुख होता है. उस का यह सिला दिया सुधीर ने. बनारस रहना मेरे लिए असह्य हो गया. लोगों की सशंकित नजरों ने जीना मुहाल कर दिया. असुरक्षा की भावना के चलते रात में नींद नहीं आती. दोनों बच्चे पापा को पूछते. इस बीच भइया आ गए. उन्हें मैं ने ही सूचित किया था.

आते ही हमदोनों को खरीखोटी सुनाने लगे. मुझे जहां लापरवाह कहा वहीं सुधीर को लंपट. मैं लाख कहूं कि मैं ने उन पर भरोसा किया, अब कोई विश्वासघात पर उतारू हो जाए तो क्या किया जा सकता है. क्या मैं उठउठ कर उन के कमरे में झांकती कि वह क्या कर रहे हैं? क्या यह उचित होता? उन्होंने मेरे पीठ में छुरा भोंका. यह उन का चरित्र था पर मेरा नहीं जो उन पर निगरानी करूं. ‘तो भुगतो,’ भैया गुस्साए. भैया ने भी मुझे नहीं समझा. उन्हें लगा मैं ने गैरजिम्मेदारी का परिचय दिया. पति को ऐसे छोड़ देना मूर्ख स्त्री का काम है. मैं रोने लगी. भइया का दिल पसीज गया.

जब उन का गुस्सा शांत हुआ तो उन्होंने रांची चलने के लिए कहा. ‘देखता हूं कहां जाता है,’ भैया बोले. हम रांची आए. यहां शहर में मेरे एक चचेरे भाई रहते थे. मैं वहीं रहने लगी. उन्हें मुझ से सहानुभूति थी. भरसक उन्होंने मेरी मदद की. अंतत: एक दिन सुधीर का पता चल गया. उन्होंने नम्रता से विवाह कर लिया था. सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ. सुधीर इतने नीचे तक गिर सकते हैं. सारी बौद्धिकता, कल्पनाशीलता, बड़ीबड़ी इल्म की बातें सब खोखली साबित हुईं. स्त्री का सौंदर्य मतिभ्रष्टा होता है यह मैं ने सुधीर से जाना. उस रोज भैया भी मेरे साथ जाना चाहते थे. पर मैं ने मना कर दिया.

बिला वजह बहसाबहसी, हाथापाई का रूप ले सकता था. घर पर नम्रता मिली. देख कर मेरा खून खौल गया. मैं बिना इजाजत घर में घुस गई. उस में आंख मिलाने की भी हिम्मत न थी. वह नजरें चुराने लगी. मैं बरस पड़ी, ‘मेरा घर उजाड़ते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई?’ उस की निगाहें झुकी हुई थीं. ‘चुप क्यों हो? तुम ने तो सारी हदें तोड़ दीं. रिश्तों का भी खयाल नहीं रहा.’ ‘यह आप मुझ से क्यों पूछ रही हैं? उन्होंने मुझे बरगलाया. आज मैं न इधर की रही न उधर की,’ उस की आंखें भर आईं. एकाएक मेरा हृदय परिवर्तित हो गया. मैं विचार करने लगी. इस में नम्रता का क्या दोष? जब 2 बच्चों का पिता अपनी मर्यादा भूल गया तो वह बेचारी तो अभी नादान है. गुरु मार्ग दर्शक होता है. अच्छे बुरे का ज्ञान कराता है. पर यहां गुरु ही शिष्या का शोषण करने पर तुला है.

सुधीर से मुझे घिन आने लगी. खुद पर शर्म भी. कितना फर्क था दोनों की उम्र में. सुधीर को इस का भी खयाल नहीं आया. इस कदर कामोन्मत्त हो गया था कि लाज, शर्म, मानसम्मान सब को लात मार कर भाग गया. कायर, बुजदिल…मैं ने मन ही मन उसे लताड़ा. ‘तुम्हारी उम्र ही क्या है,’ कुछ सोच कर मैं बोली, ‘बेहतर होगा तुम अपने घर चली जाओ और नए सिरे से जिंदगी शुरू करो.’ ‘अब संभव नहीं.’ ‘क्यों?’ मुझे आश्चर्य हुआ. ‘मैं उन के बच्चे की मां बनने वाली हूं.’ ‘तो क्या हुआ. गर्भ गिराया भी तो जा सकता है. सोचो, तुम्हें सुधीर से मिलेगा क्या? उम्र का इतना बड़ा फासला. उस पर रखैल की संज्ञा.’

‘मुझे सब मंजूर है क्योंकि मैं उन से प्यार करती हूं.’ यह सुन कर मैं तिलमिला कर रह गई पर संयत रही. ‘अभीअभी तुम ने कहा कि सुधीर ने तुम्हें बरगलाया है. फिर यह प्यारमोहब्बत की बात कहां से आ गई. जिसे तुम प्यार कहती हो वह महज शारीरिक आकर्षण है. एक दिन सुधीर का मन तुम से भी भर जाएगा तो किसी और को ले आएगा. अरे, जिसे 2 अबोध बच्चों का खयाल नहीं आया वह भला तुम्हारा क्या होगा,’ मैं ने नम्रता को भरसक समझाने का प्रयास किया. तभी सुधीर आ गया. मुझे देख कर सकपकाया. बोला, ‘तुम, यहां?’ ‘हां मैं यहां. तुम जहन्नुम में भी होते तो खोज लेती. इतनी आसानी से नहीं छोड़ूंगी.’

‘मैं ने तुम्हें अपने से अलग ही कब किया था,’ सुधीर ने ढिठाई की. ‘बेशर्मी कोई तुम से सीखे,’ मैं बोली. ‘इन सब के लिए तुम जिम्मेदार हो.’ ‘मैं…’ मैं चीखी, ‘मैं ने कहा था इसे लाने के लिए,’ नम्रता की तरफ इशारा करते हुए बोली. ‘मेरे प्रति तुम्हारी बेरुखी का नतीजा है.’ ‘चौबीस घंटे क्या सारी औरतें अपने मर्दों की आरती उतारती रहती हैं? साफसाफ क्यों नहीं कहते कि तुम्हारा मन मुझ से भर गया.’ ‘जो समझो पर मेरे लिए तुम अब भी वैसी ही हो.’ ‘पत्नी.’ ‘हां.’ ‘तो यह कौन है?’ ‘पत्नी.’ ‘पत्नी नहीं, रखैल.’ ‘जबान को लगाम दो,’ सुधीर तनिक ऊंचे स्वर में बोले. यह सब उन का नम्रता के लिए नाटक था.

‘मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतने बड़े पाखंडी हो. तुम्हारी सोच, बौद्धिकता सिर्फ दिखावा है. असल में तुम नाली के कीड़े हो,’ मैं उठने लगी, ‘याद रखना, तुम ने मेरे विश्वास को तोड़ा है. एक पतिव्रता स्त्री की आस्था खंडित की है. मेरी बददुआ हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी. तुम इस के साथ कभी सुखी नहीं रहोगे,’ भर्राए गले से कहते हुए मैं ने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. भरे कदमों से घर आई. इस बीच मैं ने परिस्थितियों से मुकाबला करने का मन बना लिया था. सुधीर मेरे चित्त से उतर चुका था. रोनेगिड़गिड़ाने या फिर किसी पर आश्रित रहने से अच्छा है मैं खुद अपने पैरों पर खड़ी हूं. बेशक भैया ने मेरी मदद की. मगर मैं ने भी अपने बच्चों के भविष्य के लिए भरपूर मेहनत की. इस का मुझे नतीजा भी मिला. बेटा प्रशांत सरकारी नौकरी में आ गया और मेरी बेटी सुमेधा का ब्याह हो गया. बेटी के ब्याह में शुरुआती दिक्कतें आईं. लोग मेरे पति के बारे में ऊलजलूल सवाल करते. पर मैं ने हिम्मत नहीं हारी.

एक जगह बात बन गई. उन्हें हमारे परिवार से रिश्ता करने में कोई खोट नहीं नजर आई. अब मैं पूरी तरह बेटेबहू में रम गई. जिंदगी से जो भी शिकवाशिकायत थी सब दूर हो गई. उलटे मुझे लगा कि अगर ऐसा बुरा दिन न आता तो शायद मुझ में इतना आत्मबल न आता. जिंदगी से संघर्ष कर के ही जाना कि जिंदगी किसी के भरोसे नहीं चलती. सुधीर नहीं रहे तो क्या सारे रास्ते बंद हो गए. एक बंद होगा तो सौ खुलेंगे. इस तरह कब 60 की हो गई पता ही न चला. इस दौरान अकसर सुधीर का खयाल जेहन में आता रहा. कहां होंगे…कैसे होंगे? एक रोज भैया ने खबर दी कि सुधीर आया है. वह मुझ से मिलना चाहता है. मुझे आश्चर्य हुआ. भला सुधीर को मुझ से क्या काम. मैं ने ज्यादा सोचविचार करना मुनासिब नहीं समझा. वर्षों बाद सुधीर का आगमन मुझे भावविभोर कर गया. अब मेरे दिल में सुधीर के लिए कोई रंज न था.

मैं जल्दीजल्दी तैयार हुई. बाल संवार कर जैसे ही मांग भरने के लिए हाथ ऊपर किया कि प्रशांत ने रोक लिया. ‘मम्मी, पापा हमारे लिए मर चुके हैं.’ ‘नहीं,’ मैं चिल्लाई, ‘वह आज भी मेरे लिए जिंदा हैं. वह जब तक जीवित रहेंगे मैं सिं?दूर लगाना नहीं छोड़ूंगी. तू कौन होता है मुझे यह सब समझाने वाला.’ ‘मम्मी, उन्होंने क्या दिया है हमें, आप को. एक जिल्लत भरी जिंदगी. दरदर की ठोकरें खाई हैं हम ने तब कहीं जा कर यह मुकाम पाया है. उन्होंने तो कभी झांकना भी मुनासिब नहीं समझा. तुम्हारा न सही हमारा तो खयाल किया होता. कोई अपने बच्चों को ऐसे दुत्कारता है,’ प्रशांत भावुक हो उठा.

‘वह तेरे पिता हैं.’ ‘सिर्फ नाम के.’ ‘हमारे संस्कारों की जड़ें अभी इतनी कमजोर नहीं हैं बेटा कि मांबाप को मांबाप का दर्जा लेखाजोखा कर के दिया जाए. उन्होंने तुझे अपनी बांहों में खिलाया है. तुझे कहानी सुना कर वही सुलाते थे, इसे तू भूल गया होगा पर मैं नहीं. कितनी ही रात तेरी बीमारी के चलते वह सोए नहीं. आज तू कहता है कि वह सिर्फ नाम के पिता हैं,’ मैं कहती रही, ‘अगर तुझे उन्हें पिता नहीं मानना है तो मत मान पर मैं उन्हें अपना पति आज भी मानती हूं,’ प्रशांत निरुत्तर था. मैं भरे मन से सुधीर से मिलने चल पड़ी. सुधीर का हुलिया काफी बदल चुका था. वह काफी कमजोर लग रहे थे. मानो लंबी बीमारी से उठे हों. मुझे देखते ही उन की आंखें नम हो गईं. ‘मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम सब को बहुत दुख दिए.’ जी में आया कि उन के बगैर गुजारे एकएक पल का उन से हिसाब लूं पर खामोश रही. उम्र के इस पड़ाव पर हिसाबकिताब निरर्थक लगे. सुधीर मेरे सामने हाथ जोड़े खड़े थे. इतनी सजा काफी थी.

गुजरा वक्त लौट कर आता नहीं पर सुधीर अब भी मेरे पति थे. मैं अपने पति को और जलील नहीं देख सकती. बातोंबातों में भइया ने बताया कि सुधीर के दोनों गुर्दे खराब हो गए हैं. सुन कर मेरे कानों को विश्वास नहीं हुआ. मैं विस्फारित नेत्रों से भैया को देखने लगी. वर्षों बाद सुधीर आए भी तो इस स्थिति में. कोई औरत विधवा होना नहीं चाहती. पर मेरा वैधव्य आसन्न था. मुझ से रहा न गया. उठ कर कमरे में चली आई. पीछे से भैया भी चले आए. शायद उन्हें आभास हो गया था. मेरे सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘इन आंसुओं को रोको.’ ‘मेरे वश में नहीं…’ ‘नम्रता दवा के पैसे नहीं देती.

वह और उस के बच्चे उसे मारतेपीटते हैं.’ ‘बाप पर हाथ छोड़ते हैं?’ ‘क्या करोगी. ऐसे रिश्तों की यही परिणति होती है.’ भइया के कथन पर मैं सुबकने लगी. ‘भइया, सुधीर से कहो, वह मेरे साथ ही रहें. मैं उन की पत्नी हूं…भले ही हमारा शरीर अलग हुआ हो पर आत्मा तो एक है. मैं उन की सेवा करूंगी. मेरे सामने दम निकलेगा तो मुझे तसल्ली होगी.’ भैया कुछ सोचविचार कर बोले, ‘प्रशांत तैयार होगा?’ ‘वह कौन होता है हम पतिपत्नी के बीच में एतराज जताने वाला.’ ‘ठीक है, मैं बात करता हूं…’ सुधीर ने साफ मना कर दिया, ‘मैं अपने गुनाहों का प्रायश्चित्त करना चाहता हूं. मुझे जितना तिरस्कार मिलेगा मुझे उतना ही सुकून मिलेगा. मैं इसी का हकदार हूं,’

इतना बोल कर सुधीर चले गए. मैं बेबस कुछ भी न कर सकी. आज भी वह मेरे न हो सके. शांत जल में कंकड़ मार कर सुधीर ने टीस, दर्द ही दिया. पर आज और कल में एक फर्क था. वर्षों इस आस से मांग भरती रही कि अगर मेरे सतीत्व में बल होगा तो सुधीर जरूर आएंगे. वह लौटे. देर से ही सही. उन्होंने मुझे अपनी अर्धांगिनी होने का एहसास कराया तो. पति पत्नी का संबल होता है. आज वह एहसास भी चला गया. Hindi Emotional Story

Hindi Story : अनदेखी का दर्द

Hindi Story. बाएं तरफ के लकवे से पीडि़त होने के कारण पिछले 3 साल से काशी प्रसाद अपने घर के बारामदे में बिछी खाट पर लेटे रहते थे. 60 साल की उम्र में हुई इस बीमारी में उन की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी पत्नी सोमवती पर थी, क्योंकि घर में कोई और नहीं रहता था. काफी इलाज के बाद वे ठीक से बोलने जरूर लगे थे, लेकिन बिना सहारा दिए ज्यादा चलफिर नहीं पाते थे.

ऐसा नहीं है कि काशी प्रसाद की कोई संतान नहीं थी. 5 बेटियां और एक बेटा ऋतुराज था. लेकिन, जब 3 एकड़ की खेती से जिंदगी की बुनियादी जरूरतों ने पूरा होने से इनकार कर दिया तो ऋतुराज पीठ पर बैग लाद कर दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने चला गया. बेटियां अपने ससुराल में बस गई थीं, जो कभीकभार ही मांबाप के पास आती थीं.

काशी प्रसाद खेतीकिसानी करने वाले और उसी के सहारे जिंदगी जीने वाले ठेठ गंवई शख्स थे. जाति से ब्राह्मण भले थे, लेकिन कुछ खास पढ़ेलिखे नहीं थे. हालांकि, जातिगत श्रेष्ठता और 3 एकड़ खेत का मालिक होने का घमंड उन में कूटकूट कर भरा हुआ था.

वे अपने चरित्र में एक ऐसे किसान थे, जिस के लिए खेत ही उस की सब से कीमती जायदाद थी. यही खेत उन के इलाके, गांवसमाज और रिश्तेनाते में उन की सामाजिक और माली हैसियत का मापदंड था. गांव के लोग बेटे ऋतुराज को इसी खेत के कारण अकसर मजाक में जमींदार भाई के उपनाम से भी पुकारते थे.

अपने इन खेतों में काशी प्रसाद जब भी मजदूर लगाते थे तो एक सख्त मालिक की तरह उन मजदूरों की निगरानी करते थे. इलाके में छोटी जातियों के लोग उन के इस सख्त बरताव के कारण बहुत मजबूरी में ही उन के खेतों में काम करने को तैयार होते थे, क्योंकि वे मजदूरों से बहुत हाड़तोड़ काम तो लेते ही थे, जातिगत दंभ के कारण बदजबानी भी कर देते थे. इस दौरान वह एक बेरहम जमींदार की रोल में होते थे, जिस के लिए इस जायदाद और जेब में मौजूद रुपयों से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं था.

हालांकि, इन खेतों सहारे इस परिवार का जीवन 90 के दशक तक तो ठीक से चल गया, लेकिन देश में उदारीकरण का दौर आने के बाद, खेती से होने वाली यह आमदनी तेजी से गिरने लगी.

जब खेतीकिसानी अन्य सैक्टर के मुकाबले हाशिए पर गई तो काशी प्रसाद भी चिंतित जरूर हुए, लेकिन अर्थव्यवस्था में आ रहे इस बदलाव को वक्त के मुताबिक पढ़ नहीं पाए.

हालांकि, अर्थव्यवस्था में किसानों की कमजोर होती इस भूमिका को उन के ही खेतों में काम करने वाले भूमिहीन मजदूरों ने बहुत जल्दी पढ़ लिया और वे नए ठिकाने की तलाश में शहरों की तरफ तेजी से शिफ्ट होने लगे.

दरअसल, मजदूरी बढ़ाए जाने की मांग को किसान इसलिए नहीं मानते थे क्योंकि कोई किसानों की आमदनी में कोई बढ़ोतरी ही नहीं हो रही थी.

असल में, काशी प्रसाद को अतीत में कभी यह लगता ही नहीं था कि उन का परिवार ऐसे दिन भी देख सकता है जब ये खेत उन की जिम्मेदारी उठाने में असहाय हो जाएंगे. जाति से ब्राह्मण होने और 3 एकड़ खेत का मालिक होने के गुरूर ने बेटे ऋतुराज की बेहतर पढ़ाईलिखाई पर भी उन्होंने इसलिए भी कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे यह मानते थे कि खेत होने से समाज में शादीब्याह तो हो ही जाएगा और फिर इसे कहां नौकरी करने जाना है.

लेकिन, अब जब खेती में गुजारा करने का कोई ठोस औप्शन नहीं बचा तो अपने 10वीं फेल बेटे ऋतुराज को दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के बाबत जाने से नहीं रोक पाए.

हालांकि, ऋतुराज के दिल्ली जाने के दौरान, काशी प्रसाद के द्वारा गांव में यह अफवाह भी फैलाई गई कि बेटा दिल्ली में बिजनैस करने लगा है, क्योंकि उन का सामंती मन यह स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करता था कि 3 एकड़ खेत के मालिक का बेटा, और एक ब्राह्मण दिल्ली में डंडा लिए दूसरों की दुकान की रखवाली करेगा?

एक जमींदार सोच, जिसे इलाके में ऊंची सामाजिक और माली हैसियत वाले पालनहार की तरह देखा और इज्जत दी जाती रही हो, का बेटा दिल्ली में एक मामूली सुरक्षा गार्ड की नौकरी कैसे कर सकता है?

यह व्यवस्था का पहला बड़ा झटका था जिस ने काशी प्रसाद जैसे सामंती मिजाज के लोगों को यह सिखाया कि वक्त के साथ नौकरी देने वाले मालिक भी नौकर बन सकते हैं. समय किसी के साथ पक्षपात नहीं करता है, उस की अपनी गति होती है और उस के मुताबिक खुद को ढालना ही होता है.

असल में, खेती के घाटे में जाने के बाद, काशी प्रसाद अपनी बाकी बची जिंदगी में ऋतुराज को कहीं नई जगह सैटल होते देखना चाहते थे. चूंकि अब उन्हें खेती में कोई ठोस आमदनी और भविष्य नहीं दिख रहा था इसलिए खेतों को बंटाई पर दे कर, मन मसोस कर वक्त, समाज और हालात में आ रहे बदलाव के मुताबिक खुद को समझाने और ढालने में लगे हुए थे.

लेकिन, इस बदलाव से उन्हें गहरा दुख इसलिए था क्योंकि उन की सामाजिक, माली हैसियत साल दर साल अप्रासंगिक होती जा रही थी और समय की आंधी में वे बहुत पीछे होते जा रहे थे.

यही नहीं, काशी प्रसाद को अपनी इस बीमारी से उपजी नाकामी और विकलांगता का कोई खास मलाल नहीं था. वे मानते थे कि चलाचली की शुरू हुई इस बेला में ये सब समस्याएं आना लाजिमी ही हैं, इसलिए इस का कोई मलाल भी नहीं होना चाहिए.

उन्हें मलाल इस बात का था कि अपनी पूरी जिंदगी में जिस श्रेष्ठता बोध को उन्होंने देखा और जिया था, अब वह खत्म होती जा रही है. आखिर यह कैसा दौर आया है कि उन के जैसे लोगों को केवल अप्रासंगिक ही नहीं बनाता जा रहा है, बल्कि पुराने सामाजिक, पारिवारिक संबंधों को केवल पैसे से जुड़े रिश्तों में बदल रहा है.

काशी प्रसाद को इस बात का भी बहुत दुख था कि अब गांवसमाज के लोग उन का हालचाल लेने भी नहीं आते हैं, जबकि उन के दौर में इसी गांवसमाज और जाति के लोगों से संपर्क, संवाद न केवल मजबूत रहता था, बल्कि वह एक जिंदादिल समाज के गवाह रहे थे.

उन के दौर में समाज में सामूहिकता की जो भावना थी वह भी अब मरती जा रही थी. किसी के दुखदर्द में शामिल होने की भावना और सामाजिक भाईचारा जिस तरह जमींदोज हो रहा था, वह उन्हें बहुत तकलीफ देता था.

असल में पिछले कुछ सालों में, समाज में पैसे की अहमियत बढ़ने के साथ जिस तरह का एकाकीपन पसरा था उस से उन्हें पीड़ा थी. उन्होंने, अपने दौर में वह वह समाज देखा था जहां लोग एक दूसरे के दुखसुख में न सिर्फ शामिल होते थे बल्कि समाज में सामूहिकता और मदद करने भावना बहुत मजबूत थी. किसी का छप्पर उठाना हो, शादी विवाह हो, भोज हो या फिर लाश उठाना…

समाज के लोग एकदूसरे की मदद के लिए खुले दिल से तत्पर रहते थे. लेकिन अब कोई किसी का हालचाल पूछने के लिए तैयार नहीं था. आखिर लोग इतना कैसे बदल सकते हैं?

यही नहीं, बदलते वक्त ने पुराने रिश्तेनाते, भाईचारा और सामाजिक संबंधों को बेरहमी से तोड़ डाला था. अब लोग केवल खुद के विकास पर केंद्रित हो गए थे, जहां किसी नैतिकता, सामाजिक बंधन और मान्यताओं और रिश्तों की कोई कद्र नहीं थी. यह सोच उदारीकरण के दौर में बने समाज में बहुत तेजी से उपजी थी, जिस ने समाज को मजबूत करने वाली मान्यताओं को गटर में डाल दिया था.

दरअसल, अपने दौर में काशी प्रसाद समाज के लिए बहुत सहयोगी इनसान थे. जब गांवसमाज में लोगों के यहां शादीब्याह, तिलक, भोज या तेरहवीं आदि के कार्यक्रम होते थे तो उन्हें इस कार्यक्रम में खाना बनाने की जिम्मेदारी दी जाती थी. वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते थे. गांव और पट्टीदारी सब जगह उन्हें इस काम के लिए बुलाया जाता था.

काशी प्रसाद भोजन तैयार करने की एक टीम रखते थे, जो उन के निर्देशन में काम करती थी. इस टीम ने कभी भी इस जिम्मेदारी के लिए किसी से एक पैसे नहीं लिए. उन्होंने कितने विवाह, तिलकोत्सव, भोज, तेरही और अन्य सामाजिक कामों में यही जिम्मेदारी संभाली कि उन्हें संख्या खुद ही याद नहीं थी.

इस के पीछे उन का सिर्फ एक ही तर्क होता था कि अगर कुछ भी गड़बड़ हुआ तो गांव की बड़ी बदनामी होगी. लेकिन, जब आज वे इसी काम को पेशेवर हलवाइयों द्वारा किए जाते हुए देखतेसुनते तो उन्हें बड़ा दुख होता था.

दरअसल, उदारीकरण के दौर में तैयार हुई नई पीढ़ी के पास इन सामाजिक परंपराओं को संजोने, दूसरे के दुखसुख में शामिल होने जैसी भावुक चीजों में कोई रुचि नहीं रह गई थी.

उदारीकरण ने जिस तरह से हर सेवा, सहायता का मुद्रीकरण किया था, उस का ही असर था कि समाज के लिए हमेशा खड़े रहने वाले काशी प्रसाद और उन के जैसे लोग आज खुद को अप्रासंगिक और बेकार समझने लगे थे.

लेकिन, वक्त के साथ बदलाव एक जरूरी चीज है, जिसे रोका नहीं जा सकता था. हालांकि, इस बदलाव में भी काशी प्रसाद जैसे लोगों को अनदेखा, अप्रासंगिक होने से बचाने की जिम्मेदारी भी इसी नए बने समाज की थी, जिस में वह नाकाम हो गया था. अनदेखा और अप्रासंगिक होने की यह टीस काशी प्रसाद जैसे

लोगों के दिल में गांठ बन कर चुभती थी. आखिर, हम अपने पुरखों की अनदेखी करने के अपराधी बन चुके थे. Hindi Story

Story : डौलर और मिट्टी

Story. पिता का खेत बेच कर अमेरिका जाने वाले गगनदीप ने वहां जो देखा, वह रंगीन अमेरिका तो बिलकुल नहीं था. क्या अपनी मिट्टी बेच कर वह डौलर कमा पाया?

खन्ना के उस छोटे से गांव में उस दिन लड्डू बंट रहे थे. गुरबचन सिंह का सब से छोटा बेटा गगनदीप अमेरिका जा रहा था.

सुबह से ही लोग बधाई देने आ रहे थे, ‘‘वाह भाई गुरबचन, अब तो तेरे भी डौलर आएंगे.’’

गुरबचन सिंह बस मुसकरा देते. भीतर खुशी भी थी और एक ऐसी बेचैनी भी, जिसे वे कह नहीं पा रहे थे.

आंगन में गगनदीप की मां बारबार बैग खोल कर देख रही थीं, ‘‘ऊन का स्वेटर रख लिया? दवाएं?’’ ‘‘हां मां, रख लीं,’’ गगनदीप की आंखों में केवल अमेरिका था. उसे लगता था, कुछ घंटों बाद जिंदगी बदल जाएगी.

चारपाई पर बैठा गगनदीप का सब से करीबी दोस्त परमजीत चुपचाप सब देख रहा था. दोनों बचपन से साथ पढ़े, कबड्डी खेले थे, लेकिन पिछले 2 सालों में गगनदीप बदल गया था. जहां पहले वह फसल देख कर खुश होता था, अब वही खेत उसे पिछड़ापन लगते थे.

एक दिन गगनदीप ने परमजीत से कहा था, ‘‘यार, सच बताऊं… इस देश में रखा ही क्या है? रोजगार नहीं, सिस्टम नहीं… यहां तो बस मिट्टी में मिट्टी होना है. जिंदगी बनानी है तो अमेरिका जाना पड़ेगा.’’

परमजीत ने कहा था, ‘‘देश छोड़ना बुरा नहीं है गगन, लेकिन अपने देश को छोटा समझना ठीक नहीं.’’

गगनदीप हंस पड़ा था, ‘‘ये बातें वही करते हैं जिन्हें कभी मौका नहीं मिला.’’ उस दिन परमजीत ने बहस नहीं की. बस इतना कहा, ‘‘ठीक है. लौट कर मिलना, फिर बात करेंगे.’’ ‘‘लौटना? मैं? कभी नहीं,’’ गगनदीप ने जवाब दिया था.

गुरबचन सिंह किसान थे. 4 बेटों में गगनदीप सब से छोटा था. खेती से घर चल जाता था, पर बड़े सपने पूरे नहीं होते थे.

तभी गांव में डाला का नाम सुनाई देने लगा. लोग कहते, ‘‘बंदा महंगा है, पर काम कर देता है.’’ पहली मुलाकात में ही डाला ने कहा, ‘‘50 लाख लगेंगे.’’ गुरबचन के चेहरे का रंग उड़ गया, ‘‘इतने सारे?’’ ‘‘अमेरिका है बाऊजी, पड़ोस का शहर नहीं.’’

रातभर किसी को नींद नहीं आई. सुबह गुरबचन खेत की ओर निकल गए. गेहूं की बालियां हवा में झूम रही थीं. उन्होंने मुट्ठीभर मिट्टी उठा कर हथेली में रगड़ी. यही जमीन उन के पिता छोड़ गए थे, जिस ने कभी भूखा नहीं सोने दिया. शाम को उन्होंने फैसला कर लिया. खेत का एक हिस्सा बिकेगा. बेटा जाएगा.

रजिस्ट्री वाले दिन दस्तखत करते समय गुरबचन के हाथ एक पल को कांपे जरूर, मगर कलम नहीं रुकी. उन्हें लगा, यह सौदा जमीन का नहीं, बेटे के भविष्य का है.

दिल्ली एयरपोर्ट पर डाला जल्दी में था, ‘‘सब लोग यहीं तक. आगे मैं संभाल लूंगा.’’ मां ने गगनदीप को गले लगाया, ‘‘बेटा, ध्यान रखना.’’ गुरबचन ने जेब से 500 का नया नोट निकाला, ‘‘इसे खर्च मत करना, बस पास रखना.’’

गगनदीप ने हंसते हुए बटुए में रख लिया. उसे लगा, कुछ दिनों बाद यह नोट सिर्फ याद बन जाएगा.

हवाईजहाज जब बादलों के ऊपर पहुंचा तो गगनदीप ने नीचे देखा और मन में कहा, ‘अब मेरी असली जिंदगी शुरू होगी.’ उसे नहीं पता था, असली जिंदगी से पहले उसे एक ऐसे इम्तिहान से गुजरना होगा, जिस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

हवाईजहाज के विदेशी धरती पर पहुंचते ही एयरपोर्ट के बाहर डाला के आदमी ने गगनदीप का पासपोर्ट रख लिया, ‘‘कुछ दिनों के लिए हमारे पास रहेगा.’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘यही नियम है. तुम ज्यादा सवाल मत पूछो.’’

उस जवाब में अपनापन नहीं, कठोरता थी. पहली बार उस के मन में शक उठा, पर अब वह हजारों किलोमीटर दूर था. 2 दिन बाद गगनदीप और कुछ और लड़कों के साथ एक सुनसान जगह ले जाया गया. वहां पंजाब, हरियाणा, गुजरात के कई लड़के थे. सब की कहानी अलग, सपना एक ही.

एक लड़के ने धीरे से पूछा, ‘‘तुम्हें भी सीधे अमेरिका का वादा किया था?’’ गगनदीप ने सिर हिलाया. वह लड़का मुसकराया, ‘‘यहां किसी को पूरी बात नहीं बताते. बता दें तो कोई आएगा ही नहीं.’’

रात के अंधेरे में उन्हें एक गाड़ी में बैठाया गया, फिर शुरू हुआ वह सफर, जिसे गगनदीप कभी भूल नहीं पाया. कभी सुनसान रास्ते, कभी जंगल, कभी घंटों पैदल चलना. कहा जाता, ‘‘रुकना मत, पीछे मत देखना.’’

दिन की धूप शरीर जला देती और रात की ठंड हड्डियों में उतर जाती. घर से पहने नए जूतों में अब गगनदीप के पैर सूज गए थे. एक रात बारिश में फिसलन भरे रास्ते पर पीछे चल रहा एक लड़का गिर पड़ा. गगनदीप उसे उठाने बढ़ा तो साथ चल रहे आदमी ने रोक दिया, ‘‘आगे चलो.’’ ‘‘लेकिन वह…’’ ‘‘रुके तो तुम भी यहीं रह जाओगे.’’

गगनदीप कुछ पल खड़ा रहा, फिर मजबूरी में आगे बढ़ गया. उस रात उसे लगा, कुछ रास्ते मंजिल तक नहीं, इनसान के अंदर तक जाते हैं.

कई दिनों बाद बताया गया कि वे अमेरिका की सीमा के पास हैं. सब के चेहरों पर उम्मीद लौट आई. गगनदीप ने सोचा, ‘बस, अब सब ठीक हो जाएगा.’ पर अमेरिका पहुंच कर पता चला कि कागजों के बिना आदमी कितना अकेला हो सकता है. उसे एक भारतीय मूल के आदमी के पास भेजा गया, जिस ने साफ कहा, ‘‘यहां वही करना जो कहा जाए.’’ ‘‘काम क्या होगा?’’ ‘‘जो मिलेगा.’’ ‘‘बाहर जा सकते हैं?’’

‘‘तुम्हारे पास सही कागज नहीं हैं. बाहर पुलिस गिरफ्तार कर सकती है,’’ उस एक वाक्य ने सारे सपने तोड़ दिए. जिस देश को गगनदीप आजादी की धरती समझा था, वहीं वह डर कर जीने को मजबूर था.

जिंदगी अब एक कमरे और एक गोदाम के बीच सिमट गई थी. सुबह अंधेरे में उठना, भारी सामान उठाना, पैकिंग करना. 12-13 घंटे काम के बाद थके शरीर से लौटना. छोटे से कमरे में कई लोग रहते थे. किसी के पास घर फोन करने की हिम्मत नहीं थी. सब अपने सपनों के मलबे पर बैठे थे.

एक रात गगनदीप ने बटुआ खोला. पिता का दिया हुआ 500 का नोट अब भी रखा था. उसे देखते ही मां का चेहरा, पिता के खेत और नहर किनारे बैठा परमजीत याद आ गया और अपनी ही आवाज, ‘मिट्टी से पेट नहीं भरता, डौलर से जिंदगी बनती है.’

आज वही वाक्य ताने की तरह गूंज रहा था. गगनदीप ने नोट सीने से लगा लिया और कई महीनों बाद खुल कर रोया. इस बार वह अमेरिका की मुश्किलों के लिए नहीं, अपनी गलती के लिए रो रहा था.

उधर गांव में भी सब बदल रहा था. शुरू में जब फोन आता तो मां पड़ोसियों को बतातीं, ‘‘मेरा बेटा अमेरिका में है,’’ फिर फोन कम हुए, फिर बंद हो गए.

गुरबचन ने डाला को फोन किया, ‘‘मेरे बेटे से बात क्यों नहीं हो रही?’’ डाला की आवाज बदल चुकी थी, ‘‘बाऊजी, चिंता मत करो. वहां थोड़ा माहौल खराब है.’’ गुरबचन समझ गए, बात सिर्फ फोन की नहीं है.

अमेरिका अब गगनदीप के लिए सपना नहीं, एक बंद कमरा था. एक दिन गोदाम में भारी सामान उठाते हुए उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वह गिर पड़ा. होश आया तो वह फर्श पर पड़ा था.

मालिक ने पानी का गिलास बढ़ा कर कहा, ‘‘थोड़ी देर बैठ जाओ, फिर काम शुरू कर देना.’’ गगनदीप को लगा कोई पूछेगा, ‘‘डाक्टर के पास चलें?’’ पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस दिन समझ आया, पराए देश में सब से बड़ी तकलीफ अकेलापन नहीं, बेबसी होती है.

उसी गोदाम में काम करने वाला एक बुजुर्ग भारतीय मजदूर कई दिनों से उसे देख रहा था. एक रात उस ने पूछा, ‘‘बेटा, कब से हो यहां?’’ गगनदीप का दर्द फूट पड़ा. उस ने सब बता दिया… जमीन बिकना, डाला, गैरकानूनी रास्ता…

बुजुर्ग ने लंबी सांस ली, ‘‘तुम अकेले नहीं हो. हर साल बहुत लोग ऐसे आते हैं. अगर सच में घर जाना है तो भारतीय दूतावास वालों से बात करो.’’ ‘‘पर मेरे पास कोई कागज नहीं.’’ ‘‘बेटा, मुसीबत में अपने देश के दरवाजे पर जाने के लिए सब से पहले कागज नहीं, हिम्मत चाहिए.’’

यह बात गगनदीप के दिल में उतर गई. कई कोशिशों के बाद वह अफसरों तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हुआ.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘आप अपना नाम बताइए…’’ कुछ पल चुप रह कर वह भर्राई आवाज में बोला, ‘‘गगनदीप सिंह… पंजाब से….’’ महीनों बाद उस ने अपनी पहचान दोबारा बोली थी.

कुछ दिन बाद भारत में गुरबचन के फोन की घंटी बजी. अनजान नंबर देख कर हाथ कांपने लगे. ‘‘गुरबचन सिंहजी?’’ ‘‘जी…’’ ‘‘आप के बेटे के बारे में बात करनी है…’’ और फिर वही आवाज आई, ‘‘पापा…’’  गुरबचन कुछ बोल नहीं पाए. आंखों से आंसू बह निकले, ‘‘बेटा… तू ठीक है?’’ गगनदीप ठीक कहां था, पर उस ने कहा, ‘‘हां पापा…’’ बस इतना ही कह पाया वह.

भारतीय दूतावास और अफसरों की मदद से औपचारिकताएं पूरी हुईं और आखिर वह दिन आया जिस का इंतजार था. भारत लौटने की इजाजत मिल गई.

दिल्ली एयरपोर्ट पर हवाईजहाज उतरा. दरवाजा खुला तो गगनदीप कुछ पल वहीं खड़ा रहा. सामने वही देश था, जिसे छोड़ते समय उस ने कभी न लौटने की बात कही थी. आज उसी धरती पर कदम रखते हुए आंखें नम थीं.

वह धीरेधीरे बाहर आया, फिर अचानक झुक गया. उस ने जमीन को छुआ, थोड़ी सी धूल हथेली में ली और माथे से लगा ली. कुछ दिनों बाद गगनदीप गांव लौटा. गांव वही था, गलियां वही, खेत वही, लेकिन गगनदीप बदल चुका था.

परमजीत मिलने आया. दोनों देर तक बिना बोले बैठे रहे. आखिर में परमजीत ने पूछा, ‘‘अमेरिका कैसा लगा?’’ गगनदीप मुसकराया, ‘‘बहुत बड़ा था.’’ ‘‘और?’’ गगनदीप ने खेतों की ओर देखा, ‘‘बहुतकुछ था वहां… बस अपना कोई नहीं था.’’

गगनदीप धीरेधीरे खेत की मेंड़ तक गया, नीचे झुका और मुठ्ठी भर कर मिट्ठी उठा ली.

परमजीत ने पूछा, ‘‘क्या कर रहा है?’’ गगनदीप ने मिट्टी जेब में रखते हुए कहा, ‘‘इस बार इसे साथ रख रहा हूं.’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘ताकि फिर कभी भूल न जाऊं कि मैं कहां का हूं.’’

दूर खेतों में हवा चल रही थी. गेहूं की बालियां धीरेधीरे झूम रही थीं और गगनदीप को पहली बार लगा कि वह सचमुच घर लौट आया है.

— कुमार नवीन

Hindi Story : सबसे बड़ा रुपय्या

Hindi Story. घर के कामों के बोझ से लदीफदी सरिता को कमर सीधी करने की फुरसत भी बड़ी कठिनाई से मिला करती थी. आमदनी बढ़ाने के लिए शेखर भी ओवरटाइम करता. अपनी जरूरतें कम कर के भविष्य के लिए रुपए जमा करता. सरिता भी घर का सारा काम अपने हाथों से कर के सीमित बजट में गुजारा करती थी.

सेवानिवृत्त होते ही समय जैसे थम गया. सबकुछ शांत हो गया. पतिपत्नी की भागदौड़ समाप्त हो गई. शेखर ने बचत के रुपयों से मनपसंद कोठी बना ली. हरेभरे पेड़पौधे से सजेधजे लान में बैठने का उस का सपना अब जा कर पूरा हुआ था.

बेटा पारस की इंजीनियरिंग की शिक्षा, फिर उस का विवाह सभी कुछ शेखर की नौकरी में रहते हुए ही हो चुका था. पारस अब नैनीताल में पोस्टेड है. बेटी प्रियंका, पति व बच्चों के साथ चेन्नई में रह रही थी. दामाद फैक्टरी का मालिक था.

शेखर ने अपनी कोठी का आधा हिस्सा किराए पर उठा दिया था. किराए की आमदनी, पेंशन व बैंक में जमा रकम के ब्याज से पतिपत्नी का गुजारा आराम से चल रहा था.

घर में सुख- सुविधा के सारे साधन उपलब्ध थे. सरिता पूरे दिन टेलीविजन देखती, आराम करती या ब्यूटी पार्लर जा कर चेहरे की झुर्रियां मिटवाने को फेशियल कराती.

शेखर हंसते, ‘‘तुम्हारे ऊपर बुढ़ापे में निखार आ गया है. पहले से अधिक खूबसूरत लगने लगी हो.’’

शेखर व सरिता सर्दी के मौसम में प्रियंका के घर चेन्नई चले जाते और गरमी का मौसम जा कर पारस के घर नैनीताल में गुजारते.

पुत्रीदामाद, बेटाबहू सभी उन के सम्मान में झुके  रहते. दामाद कहता, ‘‘आप मेरे मांबाप के समान हैं, जैसे वे लोग, वैसे ही आप दोनों. बुजर्गों की सेवा नसीब वालों को ही मिला करती हैं.’’

शेखरसरिता अपने  दामाद की बातें सुन कर गदगद हो उठते. दामाद उन्हें अपनी गाड़ी में बैठा कर चेन्नई के दर्शनीय स्थलों पर घुमाता, बढि़या भोजन खिलाता. नौकरानी रात को दूध का गिलास दे जाती.

सेवा करने में बहूबेटा भी कम नहीं थे. बहू अपने सासससुर को बिस्तर  पर ही भोजन की थाली ला कर देती और धुले कपड़े पहनने को मिलते.

बहूबेटों की बुराइयां करने वाली औरतों पर सरिता व्यंग्य कसती कि तुम्हारे अंदर ही कमी होगी कि तुम लोग बहुओं को सताती होंगी. मेरी बहू को देखो, मैं उसे बेटी मानती हूं तभी तो वह मुझे सुखआराम देती है.

शेखर भी दामाद की प्रशंसा करते न अघाते. सोचते, पता नहीं क्यों लोग दामाद की बुराई करते हैं और उसे यमराज कह कर उस की सूरत से भी भय खाते हैं.

एक दिन प्रियंका का फोन आया. उस की आवाज में घबराहट थी, ‘‘मां गजब हो गया. हमारे घर में, फैक्टरी में सभी जगह आयकर वालों का छापा पड़ गया है और वे हमारे जेवर तक निकाल कर ले गए…’’

तभी शेखर सरिता के हाथ से फोन छीन कर बोले, ‘‘यह सब कैसे हो गया बेटी?’’

‘‘जेठ के कारण. सारी गलती उन्हीें की है. सारा हेरफेर वे करते हैं और उन की गलती का नतीजा हमें भोगना पड़ता है,’’ प्रियंका रो पड़ी.

शेखर बेटी को सांत्वना देते रह गए और फोन कट गया. वह धम्म से कुरसी पर बैठ गए. लगा जैसे शरीर में खड़े रहने की ताकत नहीं रह गई है. और सरिता का तो जैसे मानसिक संतुलन ही खो गया. वह पागलों की भांति अपने सिर के बाल नोचने लगी.

शेखर ने अपनेआप को संभाला. सरिता को पानी पिला कर धैर्य बंधाया कि अवरोध तो आते ही रहते हैं, सब ठीक हो जाएगा.

एक दिन बेटीदामाद उन के घर आ पहुंचे. संकोच छोड़ कर प्रियंका अपनी परेशानी बयान करने लगी, ‘‘पापा, हम लोग जेठजिठानी से अलग हो रहे हैं. इन्हें नए सिरे से काम जमाना पडे़गा. कोठी छोड़ कर किराए के मकान में रहना पडे़गा. काम शुरू करने के लिए लाखों रुपए चाहिए. हमें आप की मदद की सख्त जरूरत है.’’

दामाद हाथ जोड़ कर सासससुर से विनती करने लगा, ‘‘पापा, आप लोगों का ही मुझे सहारा है, आप की मदद न मिली तो मैं बेरोजगार हो जाऊंगा. बच्चों की पढ़ाई रुक जाएगी.’’

शेखर व सरिता अपनी बेटी व दामाद को गरीबी की हालत में कैसे देख सकते थे. दोनों सोचविचार करने बैठ गए. फैसला यह लिया कि बेटीदामाद की सहायता करने में हर्ज ही क्या है? यह लोग सहारा पाने और कहां जाएंगे.

अपने ही काम आते हैं, यह सोच कर शेखर ने बैंक में जमा सारा रुपया निकाल कर दामाद के हाथों में थमा दिया. दामाद ने उन के पैरों पर गिर कर कृतज्ञता जाहिर की और कहा कि वह इस रकम को साल भर के अंदर ही वापस लौटा देगा.

श्ेखरसरिता को रकम देने का कोई मलाल नहीं था. उन्हें भरोसा था कि दामाद उन की रकम को ले कर जाएगा कहां, कह रहा है तो लौटाएगा अवश्य. फिर उन के पास जो कुछ भी है बच्चों के लिए ही तो है. बच्चों की सहायता करना उन का फर्ज है. दामाद उन्हें मांबाप के समान मानता है तो उन्हें भी उसे बेटे के समान मानना चाहिए.

अपना फर्ज पूरा कर के दंपती राहत का आभास कर रहे थे. बेटे पारस का फोन आया तो मां ने उसे सभी कुछ स्पष्ट रूप से बता दिया.

तीसरे दिन ही बेटाबहू दोनों आकस्मिक रूप से दिल्ली आ धमके. उन्हें इस तरह आया देख कर शेखर व सरिता हतप्रभ रह गए. ‘‘बेटा, सब ठीक है न,’’ शेखर उन के इस तरह अचानक आने का कारण जानने के लिए उतावले हुए जा रहे थे.

‘‘सब ठीक होता तो हमें यहां आने की जरूरत ही क्या थी,’’ तनावग्रस्त चेहरे से पारस ने जवाब दिया.

बहू ने बात को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों ने अपने खूनपसीने की कमाई दामाद को दे डाली, यह भी नहीं सोचा कि उन रुपयों पर आप के बेटे का भी हक बनता है.’’

बहू की बातें सुन कर शेखर हक्केबक्के रह गए. वह स्वयं को संयत कर के बोले, ‘‘उन लोगों को रुपया की सख्त जरूरत थी. फिर उन्होंने रुपया उधार ही तो लिया है, ब्याज सहित चुका देंगे.’’

‘‘आप ने रुपए उधार दिए हैं, इस का कोई सुबूत आप के पास है. आप ने उन के साथ कानूनी लिखापढ़ी करा ली है?’’

‘‘वे क्या पराए हैं जो कानूनी लिखापढ़ी कराई जाती व सुबूत रखे जाते.’’

‘‘पापा, आप भूल रहे हैं कि रुपया किसी भी इनसान का ईमान डिगा सकता है.’’

‘‘मेरा दामाद ऐसा इनसान नहीं है.’’ सरिता बोली, ‘‘प्रियंका भी तो है वह क्या दामाद को बेईमानी करने देगी.’’

‘‘यह तो वक्त बताएगा कि वे लोग बेईमान हैं या ईमानदार. पर पापा आप यह मकान मेरे नाम कर दें. कहीं ऐसा न हो कि आप बेटीदामाद के प्रेम में अंधे हो कर मकान भी उन के नाम कर डालें.’’

बेटे की बातें सुन कर शेखर व सरिता सन्न रह गए. हमेशा मानसम्मान करने वाले, सलीके से पेश आने वाले बेटाबहू इस प्रकार का अशोभनीय व्यवहार क्यों कर रहे हैं. यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

आखिर, बेटाबहू इस शर्त पर शांत हुए कि बेटीदामाद ने अगर रुपए वापस नहीं किए तो उन के ऊपर मुकदमा चलाया जाएगा.

बेटाबहू कई तरह की हिदायतें दे कर नैनीताल चले गए पर शेखर व सरिता के मन पर ंिंचंताओं का बोझ आ पड़ा था. सोचते, उन्होंने बेटीदामाद की सहायता कर के क्या गलती की है. रुपए बेटी के सुख से अधिक कीमती थोड़े ही थे.

हफ्ते में 2 बार बेटीदामाद का फोन आता तो दोनों पतिपत्नी भावविह्वल हो उठते. दामाद बिलकुल हीरा है, बेटे से बढ़ कर अपना है. बेटा कपूत बनता जा रहा है, बहू के कहने में चलता है. बहू ने ही पारस को उन के खिलाफ भड़काया होगा.

अब शेखर व सरिता उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब दामाद उन का रुपया लौटाने आएगा और वे सारा रुपया उठा कर बेटाबहू के मुंह पर मार कर कहेंगे कि इसी रुपए की खातिर तुम लोग रिश्तों को बदनाम कर रहे थे न, लो रखो इन्हें.

कुछ माह बाद ही बेटीदामाद का फोन आना बंद हो गया तो शेखरसरिता चिंतित हो उठे. वे अपनी तरफ से फोन मिलाने का प्रयास कर रहे थे पर पता नहीं क्यों फोन पर प्रियंका व दामाद से बात नहीं हो पा रही थी.

हर साल की तरह इस साल भी शेखर व सरिता ने चेन्नई जाने की तैयारी कर ली थी और बेटीदामाद के बुलावे की प्रतीक्षा कर रहे थे.

एक दिन प्रियंका का फोन आया तो शेखर ने उस की खैरियत पूछने के लिए प्रश्नों की झड़ी लगा दी पर प्रियंका ने सिर्फ यह कह कर फोन रख दिया कि वे लोग इस बार चेन्नई न आएं क्योंकि नए मकान में अधिक जगह नहीं है.

शेखरसरिता बेटी से ढेरों बातें करना चाहते थे. दामाद के व्यवसाय के बारे में पूछना चाहते थे. अपने रुपयों की बात करना चाहते थे. पर प्रियंका ने कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया.

बेटीदामाद की इस बेरुखी का कारण उन की समझ में नहीं आ रहा था.

देखतेदेखते साल पूरा हो गया. एक दिन हिम्मत कर के शेखर ने बेटी से रुपए की बाबत पूछ ही लिया.

प्रियंका जख्मी शेरनी की भांति गुर्रा उठी, ‘‘आप कैसे पिता हैं कि बेटी के सुख से अधिक आप को रुपए प्यारे हैं. अभी तो इन का काम शुरू ही हुआ है, अभी से एकसाथ इतना सारा रुपया निकाल लेंगे तो आगे काम कैसे चलेगा?’’

दामाद चिंघाड़ कर बोला, ‘‘मेरे स्थान पर आप का बेटा होता तो क्या आप उस से भी वापस मांगते? आप के पास रुपए की कमी है क्या? यह रुपया आप के पास बैंक में फालतू पड़ा था, मैं इस रुपए से ऐश नहीं कर रहा हूं, आप की बेटी को ही पाल रहा हूं.’’

पुत्रीदामाद की बातें सुन कर शेखर व सरिता सन्न कर रह गए और रुपए वापस मिलने की तमाम आशाएं निर्मूल साबित हुईं. उलटे वे उन के बुरे बन गए. रुपया तो गया ही साथ में मानसम्मान भी चला गया.

पारस का फोन आया, ‘‘पापा, रुपए मिल गए.’’

शेखर चकरा गए कि क्या उत्तर दें. संभल कर बोले, ‘‘दामाद का काम जम जाएगा तो रुपए भी आ जाएंगे.’’

‘‘पापा, साफ क्यों नहीं कहते कि दामाद ने रुपए देने से इनकार कर दिया. वह बेईमान निकल गया,’’ पारस दहाड़ा.

सरिता की आंखों से आंसू बह निकले, वह रोती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, तू ठीक कह रहा है. दामाद सचमुच बेईमान है, रुपए वापस नहीं करना चाहता.’’

‘‘उन लोगों पर धोखाधड़ी करने का मुकदमा दायर करो,’’ जैसे सैकड़ों सुझाव पारस ने फोन पर ही दे डाले थे.

शेखर व सरिता एकदूसरे का मुंह देखते रह गए. क्या वे बेटीदामाद के खिलाफ यह सब कर सकते थे.

चूंकि वे अपनी शर्त पर कायम नहीं रह सके इसलिए पारस मकान अपने नाम कराने दिल्ली आ धमका. पुत्रीदामाद से तो संबंध टूट ही चुके हैं, बहूबेटा से न टूट जाएं, यह सोच कर दोनों ने कोठी का मुख्तियारनामा व वसीयतनामा सारी कानूनी काररवाई कर के पूरे कागजात बेटे को थमा दिए.

पारस संतुष्ट भाव से चला गया.‘‘बोझ उतर गया,’’ शेखर ने सरिता की तरफ देख कर कहा, ‘‘अब न तो मकान की रंगाईपुताई कराने की चिंता न हाउस टैक्स जमा कराने की. पारस पूरी जिम्मेदारी निबाहेगा.’’

सरिता को न जाने कौन सा सदमा लग गया कि वह दिन पर दिन सूखती जा रही थी. उस की हंसी होंठों से छिन चुकी थी, भूखप्यास सब मर गई. बेटीबेटा, बहूदामाद की तसवीरोें को वह एकटक देखती रहतीं या फिर शून्य में घूरती रह जाती.

शेखर दुखी हो कर बोला, ‘‘तुम ने अपनी हालत मरीज जैसी बना ली. बालों पर मेंहदी लगाना भी बंद कर दिया, बूढ़ी लगने लगी हो.’’

सरिता दुखी मन से कहने लगी,‘‘हमारा कुछ भी नहीं रहा, हम अब बेटाबहू के आश्रित बन चुके हैं.’’

‘‘मेरी पेंशन व मकान का किराया तो है. हमें दूसरों के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ शेखर जैसे अपनेआप को ही समझा रहे थे.

जब किराएदार ने महीने का किराया नहीं दिया तो शेखर ने खुद जा कर शिकायती लहजे में किराएदार से बात की और किराया न देने का कारण पूछा.

किराएदार ने रसीद दिखाते हुए तीखे स्वर में उत्तर दिया कि वह पारस को सही वक्त पर किराए का मनीआर्डर भेज चुका है.

‘‘पारस को क्यों?’’

‘‘क्योेंकि मकान का मालिक अब पारस है,’’ किराएदार ने नया किराया- नामा निकाल कर शेखर को दिखा दिया. जिस पर पारस के हस्ताक्षर थे.

शेखर सिर पकड़ कर रह गए कि सिर्फ मामूली सी पेंशन के सहारे अब वह अपना गुजारा कैसे कर पाएंगे.

‘‘बेटे पर मुकदमा करो न,’’ सरिता पागलों की भांति चिल्ला उठी, ‘‘सब बेईमान हैं, रुपयों के भूखे हैं.’’

शेखर कहते, ‘‘हम ने अपनी संतान के प्रति अपना फर्ज पूरा किया है. हमारी मृत्यु के बाद तो उन्हें मिलना ही था, पहले मिल गया. इस से भला क्या फर्क पड़ गया.’’

सरिता बोली, ‘‘बेटीदामाद, बेटा बहू सभी हमारी दौलत के भूखे थे. दौलत के लालच में हमारे साथ प्यारसम्मान का ढोंग करते रहे. दौलत मिल गई तो फोन पर बात करनी भी छोड़ दी.’’

पतिपत्नी दोनों ही मानसिक वेदना से पीडि़त हो चुके थे. घर पराया लगता, अपना खून पराया हो गया तो अपना क्या रह गया.

एक दिन शेखर अलमारी में पड़ी पुरानी पुस्तकों में से होम्योपैथिक चिकित्सा की पुस्तक तलाश कर रहे थे कि अचानक उन की निगाहों के सामने पुस्तकों के बीच में दबा बैग आ गया और उन की आंखें चमक उठीं.

बैग के अंदर उन्होंने सालोें पहले इंदिरा विकासपत्र व किसान विकासपत्र पोस्ट आफिस से खरीद कर रखे हुए थे. जिस का पता न बेटाबेटी को था, न सरिता को,  यहां तक कि खुद उन्हें भी याद नहीं रहा था.

मुसीबत में यह 90 हजार रुपए की रकम उन्हें 90 लाख के बराबर लग रही थी.

उन के अंदर उत्साह उमड़ पड़ा. जैसे फिर से युवा हो उठे हों. हफ्ते भर के अंदर ही उन्होंने लान के कोने में टिन शेड डलवा कर एक प्रिंटिंग प्रेस लगवा ली. कुछ सामान पुराना भी खरीद लाए और नौकर रख लिए.

सरिता भी इसी काम में व्यस्त हो गई. शेखर बाहर के काम सभांलता तो सरिता दफ्तर में बैठती.

शेखर हंस कर कहते, ‘‘हम लोग बुढ़ापे का बहाना ले कर निकम्मे हो गए थे. संतान ने हमें बेरोजगार इनसान बना दिया. अब हम दोनों काम के आदमी बन गए हैं.’’

सरिता मुसकराती, ‘‘कभीकभी कुछ भूल जाना भी अच्छा रहता है. तुम्हारे भूले हुए बचत पत्रों ने हमारी दुनिया आबाद कर दी. यह रकम न मिलती तो हमें अपना बाकी का जीवन बेटीदामाद और बेटाबहू की गुलामी करते हुए बिताना पड़ता. अब हमें बेटीदामाद, बेटाबहू सभी को भुला देना ही उचित रहेगा. हम उन्हें इस बात का एहसास दिला देंगे कि उन की सहायता लिए बगैर भी हम जी सकते हैं और अपनी मेहनत की रोटी खा सकते हैं. हमें उन के सामने हाथ फैलाने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी.’’

सरिता व शेखर के चेहरे आत्म- विश्वास से चमक रहे थे, जैसे उन का खोया सुकून फिर से वापस लौट आया हो. Hindi Story

Hindi Story : परिणीता

Hindi Story. उस ने आज फिर शाम होते ही खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया और मुझे उलझन होने लगी. मैं खुद को रोक नहीं पाया और अब मैं उस के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था.

थोड़ी देर में उस ने दरवाजा खोला, ‘‘क्या है अजय? मैं कुछ देर अकेला रहना चाहता हूं. प्लीज, मुझे छोड़ दो,’’ और वह अजीब सी दयनीय सूरत बना कर एक तरह से मुझ  से निवेदन करने लगा.

मुझे यह देख कर घबराहट होने लगी. मैं ने उस के कमरे में लगभग दाखिल होते हुए पूछा, ‘‘क्यों इतनी परेशानी हो रही है? मैं दोस्त हूं तुम्हारा, मुझे अपना दर्द बताओ. कहने से दर्द कम हो जाता है. अकेले घुटघुट कर सहने से अच्छा है कि दर्द को कह दिया जाए,’’ मैं देख रहा था कि उस की आंखें भर आई थीं और लग रहा था कि अभी वह रो देगा.

मैं ने उस की बांह पकड़ कर सोफे पर बैठा दिया और खुद उस के पास ही बैठ गया, ‘‘रवि, मुझेबताओ क्या है जिस ने तुम्हें इतना अकेला बना दिया है कि तुम मुझे अपने बचपन के दोस्त से भी नहीं बताना चाहते? इस तरह से घुटते रहोगे तो बीमार पड़ जाओगे. मुझे अपना सारा दर्द बताओ. हम जरूर कुछ मदद कर सकते हैं,’’ मैं ने उसे समझाया.

र  वि इतना सुनते ही रो पड़ा और बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए लिपट गया, ‘‘अजय, मैं जीना नहीं चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब कुछ नहीं बचा है. मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो गया है.’’

‘‘मुझे बताओ क्या बात है?’’ मैं ने उसे सहलाते हुए कहा.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वह कुछ संभलते हुए बोला, ‘‘अजय, मेरी जिंदगी में तूफान है और मैं एक ऐसी जगह खड़ा हूं जहां से न तो पीछे जा सकता हूं और न आगे,’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद रवि ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘अजय, पहली बार मुझे जिंदगी में परिणीता से मिलने के बाद ऐसा लगा था कि कोई अनजानी सी ताकत है जो हमें करीब लाने की कोशिश कर रही है. यह सही था कि मुझे उस से प्यार हो गया था, धीरेधीरे हम कब एकदूसरे के होते चले गए हमें खुद ही पता न चला.

‘‘परिणीता मेरी जिंदगी में एक खूबसूरत सपने की तरह थी और हम दोनों इस सपने से बेहद गहरे जुड़े थे. हम इस सपने को जीना चाहते थे, लेकिन परिणीता के घर वालों को हमारे प्यार का पता चल गया. उस पर बंदिशों का पहरा लगा दिया गया और शादी के लिए एक लड़के की तलाश शुरू कर दी गई.

‘‘परिणीता एक बहुत ही होनहार लड़की थी. उस का सपना एक कामयाब मैनेजर बनने का था. वह मैनेजमैंट का कोर्स करने वाली थी. उस ने मुझे कहा था कि वह एमबीए करना चाहती है, लेकिन इस प्यार की वजह से मुझेडर लग रहा है कि उस के घर वाले जबरदस्ती उस की शादी कहीं भी करा देंगे और उस के सपने पूरे नहीं हो पाएंगे. मेरे लिए इस से बड़ी हार और कुछ नहीं हो सकती.

‘‘अजय, तुम उस के पिता से मिलो और उन्हें समझाओ कि उस के सपनों के साथ इस तरह से नाइंसाफी न करें. मैं खुद को रोक लूंगा. वे कहेंगे तो मैं कहीं दूर चला जाऊंगा. लेकिन वे परिणीता को अपना सपना पूरा करने दें,’’ इतना कह कर रवि चुप हो गया, उस की आंखें भर आई थीं.

मैं ने उसे तसल्ली दी और कहा कि मैं कोशिश करूंगा परिणीता के पिता से मिलने की, लेकिन दिक्कत यह थी कि मैं इस के पहले कभी परिणीता के पिता से मिला नहीं था और मेरा उन से पहले से कोई परिचय भी नहीं था.

बहरहाल, मैं ने रवि से वादा तो कर ही लिया था और उस की घबराहट देखने के बाद इस के अलावा और कोई चारा भी नहीं था.

उ  से उस के घर छोड़ कर मैं लौट आया और सोचने लगा कि कैसे परिणीता के पिता से मिला जाए और इस मामले पर किस तरह बात की जाए कि परिणीता की पढ़ाई न रुके और वह अपने सपने को पूरा कर सके… यह सब सोचते हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला.

अगले दिन मैं अपने औफिस जाने के लिए निकला और सोचा कि आज शाम लौटते हुए परिणीता के पिता से मिलने जाऊंगा.

औफिस पहुंच कर मैं अपने काम में बिजी हो गया था और लौटने के समय एक डिपार्टमैंटल स्टोर में कुछ जरूरी सामान खरीदने लगा. इसी बीच मुझे लगा कि कोई बहुत गौर से मु?ो देख रहा है. मैं ने ध्यान दिया तो कुछ दूरी पर मुझे लगा कि शायद परिणीता ही खड़ी थी… हां… यह परिणीता ही थी और उस के साथ उस की मां भी थीं.

मैं ने बिना समय गंवाए उन के पास पहुंचा और अभिवादन किया, ‘‘नमस्ते, आंटी.’’

‘‘नमस्ते बेटा, कैसे हो?’’ ‘‘मैं ठीक हूं आंटी… परी, कैसी हो?’’ मैं ने परिणीता से पूछा.

‘‘ठीक हूं,’’ उस ने उदास लहजे में जवाब दिया.

मैं ने जानबूझ कर पूछा, ‘‘क्या हाल है? पढ़ाई ठीक से चल रही है कि नहीं? देखो, अगले महीने यूनिवर्सिटी के मैनेजमैंट कोर्स का एंट्रैंस एग्जाम है. फार्म भर देना और तैयारी शुरू कर दो.’’

‘‘जी, ठीक है,’’ परिणीता औपचारिक रूप से बोली.

‘‘आंटी, आप की तबीयत ठीक है न?’’ मैं ने बात को बढ़ाने के लिए उस की मां से पूछा.

‘‘अब क्या तबीयत ठीक रहेगी बेटा, उम्र भी हो गई है. बस, परी की चिंता लगी है. इस के हाथ पीले हो जाएं तो मन को आराम मिले,’’ वे बोलीं.

‘‘अरे आंटी, ऐसी भी क्या जल्दी है… परी एक बहुत ही होनहार लड़की है. उसे आगे पढ़ाइए. शादी तो हो ही जाएगी,’’ मैं ने उस की मां को अपने मकसद की तरफ ले जाने की कोशिश की.

‘‘मैं तो चाहती ही हूं क्योंकि शादी में भी आजकल लड़के वाले नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, पर इस के पापा जिद किए हुए हैं और जल्दी शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘आंटी, ऐसी क्या बात है कि अंकलजी जैसे समझदार आदमी भी इस तरह की जिद कर बैठे हैं?’’

‘‘असल में इस के पापा रवि को पसंद नहीं करते और परी को यहां से हटाना चाहते हैं.’’

‘‘आंटी, रवि की वजह से परी का भविष्य बरबाद करना क्या उचित है? रवि से ज्यादा जरूरी परी की पढ़ाई, उस का भविष्य है, उस के सपने हैं और हर मांबाप का सब से बड़ी जिम्मेदारी अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने में सहयोग करना है न कि किसी छोटी समस्या को ले कर बच्चों के भविष्य को निराशा में धकेल देना,’’ मैं ने समझाने की पुरजोर कोशिश की.

‘‘मैं समझ  सकती हूं और चूंकि लड़के वाले भी हर जगह नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, इसलिए भी मैं नहीं चाहती कि परी की पढ़ाई में रुकावट आए.’’

‘‘आंटी, आप कहें तो मैं अंकल से बात करूं?’’ ‘‘कोशिश कर लो, मगर मु?ो नहीं लगता कि वे मानेंगे,’’ परिणीता की मां के स्वर में निराशा झलक रही थी.

‘‘ठीक है आंटी, मैं बात करूंगा, लेकिन जब मैं बात करूं तो आप भी वहां मौजूद रहेंगी. मैं कल सुबह ही आऊंगा.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ इतना कह कर उस की मां आगे बढ़ गईं और परिणीता थोड़ा पीछे रही. मैं ने उसे देख कर कहा, ‘‘बिलकुल परेशान मत होना. सब ठीक हो जाएगा.’’

मेरी बातें सुन कर परिणीता को तसल्ली हुई.

अगली सुबह होने के बाद मैं परिणीता के पिता से मिलने उसके घर पहुंचा तो देखा कि उस के पिता बाहर निकल रहे थे.

‘‘नमस्ते अंकल,’’ मैं उन के सामने पहुंच कर बोला. ‘‘नमस्ते बेटा, क्या हाल है? आजकल दिखाई नहीं देते,’’ वे बोले.

‘‘अंकल, काम बहुत बढ़ गया है औफिस में और इस के कारण जल्दी जाना होता है और लौटने में भी देर हो जाती है, इसलिए कहीं भी चाह कर भी नहीं जा पाता,’’ मैं ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘देखो बेटा, अकेले रहोगे तो ऐसे ही परेशान रहोगे. या तो घर से किसी को बुला लो और नहीं तो बेहतर होगा कि शादी कर लो, सब सही हो जाएगा.’’

‘‘अंकल, मेरी सगाई हो चुकी है और शादी अभी कुछ समय बाद यानी अगले साल होगी. तब तक मेरी होने वाली वाइफ का भी बीएड पूरा हो जाएगा. हालांकि, मेरे मांबाप चाहते थे कि इसी साल शादी हो जाए, लेकिन ऋचा यानी मेरी होने वाली पत्नी से पता चला कि वह बीएड करना चाहती है तो मेरे मांबाप और मैं ने खुशीखुशी स्वीकार कर लिया,’’ मैं ने लगभग समझाते हुए कहा.

‘‘क्यों बेटा, वह शादी के बाद भी तो बीएड कर सकती है?’’ अंकल ने अपना नजरिया बताया.

‘‘अंकल, शादी हो जाने के बाद हर लड़की के हालात बदल जाते हैं और सोच में बदलाव आ जाता है. उम्मीदें भी हर किसी की परिवार में बढ़ जाती हैं, इसलिए लड़की ससुराल में रह कर पढ़ाई कर सकती हैं लेकिन उसे बहुतकुछ खोने का डर भी रहता है और अपने मातापिता के यहां रह कर वह अपनी पढ़ाई अच्छी तरह से बिना किसी दबाव के आसानी से पूरी कर सकती है,’’ मैं ने अंकल को प्रैक्टिकल पक्ष समझाने की कोशिश की.

‘‘हां, तुम्हारी बात कुछ सही है. चलो, ठीक है. बीएड कर लेने के बाद वह तुम्हारे लिए भी मददगार होगी.’’

हम लोग बात करते हुए थोड़ी दूर बाजार तक आ गए थे.

‘‘अंकल, बुरा मत मानना, पर आप परी को भी आगे पढ़ने से क्यों मना कर रहे हैं? जब वह एमबीए करना चाहती है तो उसे करने दीजिए, शादी तो बाद में भी हो जाएगी ’’ मैं ने अपने मेन मुद्दे पर आते हुए कहा.

‘‘देखो अजय, परी का मामला कुछ अलग है. मेरी भी इच्छा थी कि परी एमबीए करने के बाद ही अपने घर विदा हो लेकिन हालात कुछ बदल गए हैं.’’

‘‘शायद रवि के बारे में आप कुछ कहना चाहते हैं. मेरे विचार से इस मसले पर भी समझदारी से काम लेना ही मुनासिब होगा. जहां तक परी की पढ़ाई की बात है, मुझे  पूरा विश्वास है कि रवि का मसला कोई बाधा नहीं बनेगा,’’ मैं ने पूरे विश्वास से कहा.

‘‘जहां तक मैं समझाता था रवि एक समझदार लड़का था, लेकिन वह परी के साथ रिश्ते बनाए, यह सोच कर मु?ो बहुत धक्का लगा.

‘‘अंकल, आप की चिंता जायज है. लेकिन परी मेरे लिए बहन की तरह है और इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि सिर्फ रवि ही नहीं, बल्कि परी भी बहुत तेज दिमाग और समझदार लड़की है. ये दोनों ही बहुत भावुक हैं इसलिए ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है जिस से दोनों के परिवारों को कोई चिंता हो,’’ हम बात करते हुए एक पार्क में बैंच पर बैठ गए थे.

‘‘अजय, यह कैसे मुमकिन है कि परी इन हालात में पढ़ाई को एकाग्रता से पूरा कर पाएगी?’’ अंकल ने काफी सावधानी के साथ कहा.

‘‘इसलिए कि रवि खुद चाहता है कि परी को आगे एमबीए करने में कोई बाधा नहीं आए. वह तो जब तक परी की पढ़ाई पूरी न हो जाए अपना ट्रांसफर कहीं दूर करा लेना चाहता है,’’ मैं ने सच बता दिया.

‘‘क्यों? रवि इतनी परेशानी किसलिए उठाएगा? उसे ऐसा कुछ करने की कुछ भी जरूरत नहीं है.’’

‘‘अंकल, सच तो यह है कि जब 2 लोग आपस में सच्चा प्यार करते हैं तो वे सिर्फ और सिर्फ एकदूसरे को खुश देखना चाहते हैं चाहे इस के लिए उन्हें अपनी खुशी अपनी भावनाओं को आहत ही करना पड़े और इस में कोई शक नहीं है दोनों का प्यार तो एक सच्चाई है.’’

‘‘अजय, यह प्यार नहीं है, इस उम्र की भावनाओं का उभार है.’’

‘‘मैं आप को अपनी समझ  से कह रहा हूं, आप को मानने के लिए कोई दबाव नहीं दे रहा हूं. अगर आप को बुरा लगा तो मुझे  माफ कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, मुझे कोई बुरा नहीं लगा. तुम इसे गलत मत समझना,’’ अंकल की आवाज में भर्राहट सुनाई दे रही थी.

‘‘अंकल, आप भी मेरे पिता समान हैं. मैं आप की किसी बात का बुरा नहीं मान सकता और चूंकि मैं परी को भी अपनी बहन समझाता हूं, इसलिए इस हक से सच को कहने की हिम्मत कर सका,’’ मैं ने अंकल को संभालने की कोशिश की.

अ चानक ही अंकल ने मुझे अपने गले से लगा लिया और बुरी तरह से फूटफूट कर रोने लगे, ‘‘बेटा, मैं क्या करूं… परी मेरी एकलौती बेटी है और कभी भी मैं ने उसे किसी बात के लिए मना नहीं किया, उस की हर इच्छा पूरी की, पर आजकल मुझे  क्या हुआ है… मैं कैसे इतना कठोर हो गया…’’

अंकल को घर छोड़ कर मैं चला गया. हालांकि देर हो गई थी. औफिस में बौस को भी देरी का कारण समझना पड़ा, पर मन में एक तरह का संतोष हो रहा था कि सबकुछ अच्छे तरीके से मैं ने उन लोगों को समझा दिया था.

शाम को घर आने के बाद फोन बजने लगा, ‘‘अजय, मैं अंकल बोल रहा हूं… तुम घर आ गए?’’

‘‘जी अंकल, मैं घर आ गया हूं.’’ ‘‘बेटा, कुछ बात करनी थी. मैं तुम से मिलना चाहता हूं. क्या मैं इस समय तुम से मिलने आ सकता हूं?’’

‘‘जी बिलकुल आ सकते हैं, लेकिन आप परेशान न हों, मैं खुद आ रहा हूं.’’ ‘‘नहीं बेटा, मैं आ रहा हूं,’’ अंकल ने फोन रख दिया.

थोड़ी देर में अंकल आए और अंदर आ कर बैठ गए, ‘‘दरवाजा बंद कर दो.’’ मैं ने दरवाजा बंद कर दिया और पूछा, ‘‘क्या बात है अंकल, कुछ परेशानी है?’’

‘‘नहीं अजय, मैं ने काफी सोचा और परी की मम्मी से भी बात की. परी की पढ़ाई पूरी कराने के बाद ही हम उस की शादी करेंगे, यह हम लोगों ने तय कर लिया है.’’

‘‘अंकल, यह तो बहुत ही अच्छी बात है. आजकल लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाने में मांबाप को पूरा सहयोग देना चाहिए. बहुत ही होनहार लड़की है परी. मु?ो बहुत खुशी हुई कि अब परी अपने सपनों को पूरा कर पाएगी,’’ मैं बहुत खुश हुआ. मु?ो लगा कि मेरी कोशिश कामयाब हो गई है.

‘‘बेटा, तुम ने मेरी आंखें खोल दीं. मैं ने परी को काफी टैंशन दी है. मैं उस से माफी मांगूंगा, पर बेटा तुम्हे परी को एडमिशन दिलाने में मदद करनी होगी.’’

‘‘जरूर अंकल, मैं पूरी तरह से मदद करूंगा. आखिर वह मेरी भी बहन ही तो है, आप चिंता न करें.’’

‘‘अगर बहन मानते हो तो एक जिम्मेदारी और निभानी पड़ेगी. कर सकोगे?’’ ‘‘आप बोलिए तो मैं हर जगह परी के भाई होने की जिम्मेदारी निभाऊंगा और मुझे  बहुत खुशी होगी.’’

‘‘तो तुम्हें रवि को बताना होगा कि भले हम परी की शादी उस के एमबीए पूरा करने पर करेंगे लेकिन सगाई हम इस महीने में ही कर देना चाहते हैं.’’

‘‘ठीक है अंकल, लेकिन क्या किसी लड़के को देखा है और बातचीत पक्की हुई है?’’ ‘‘हां देखा और समझ भी है. परी को पसंद भी है, इसलिए रवि से

कहना कि अपने मातापिता को मुझ  से मिलने दे और सगाई की तारीख जल्द ही तय कर ली जाए,’’ कहते हुए अंकल मुसकरा रहे थे और उन के चेहरे पर एक तरह की शांति नजर आ रही थी. Hindi Story

Funny Story in Hindi : डिजिटल दुआएं

Funny Story in Hindi. राम प्रसाद के बड़े भाई श्याम प्रसाद पिछले 5 दिनों से अस्पताल में थे. पर बड़े भाई का बेटा और पत्नी को मोबाइल से ही फुरसत नहीं थी. क्या श्याम प्रसाद को लोगों की डिजिटल दुआएं लगीं?

राम प्रसाद पिछले 5 दिनों से शहर के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू के दरवाजे के सामने बिछी कुरसियों पर बैठे रहते थे. डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक उन के बड़े भाई श्याम प्रसाद के फेफड़ों में पानी भरने की समस्या खड़ी हो रही थी, इसलिए वे वहां भरती थे.

राम प्रसाद की आंखों में नींद आने का नाम नहीं था और उन के चेहरे पर बड़े भाई के खोने का एक गहरा डर साफ दिख रहा था. वे बैठेबैठे पलपल डाक्टरों की टीम को देखते रहते. वे तो खेतमाटी का कीड़ा थे, कभी शहर और अस्पताल का मुख नहीं देखा. बाहर के सब कामकाज उन का बड़ा भाई श्याम प्रसाद ही संभालता था. मातापिता चल बसे थे, दोनों एक ही छत के नीचे गांव में रहते थे.

आज तो 11 बज गए, अभी तक गांव से टिफिन भी नहीं पहुंचा. राम प्रसाद की भाभी एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और एकलौता बेटा अपने नानके में रह कर वहां पढ़ाईलिखाई कर रहा है. 3 दिन से राम प्रसाद का टिफिन गांव से शहर में मजदूरी करने आते लड़कों के हाथ पहुंच जाता था. शहर के खानपान से वे बहुत ही परहेज करते थे.

कल खाने का टिफिन देते समय लड़कों ने कहा था, ‘‘अंकल, कल तो हम आप का टिफिन ले कर नहीं आ पाएंगे. अपने स्कूल से छुट्टी ले कर आप का भतीजा मोहित घर आ गया है, कल आप का खाने का टिफिन वही ले कर आएगा.’’

रा  म प्रसाद भतीजे की राह देख ही रहे थे कि अचानक अस्पताल के गलियारे में हलचल सी मच गई.  कुछ ही क्षणों के बाद वे देखते हैं कि उन का भतीजा मोहित अपने 2 साथियों के साथ उन के सामने खड़ा है.

राम प्रसाद की नजर भतीजे मोहित के हाथों पर दौड़ी. मोहित के हाथों में खाने का टिफिन नहीं था. एक हाथ में चमचमाता आईफोन और दूसरे हाथ में बालों की सैटिंग करने का जैल.

‘‘मोहित, खाने का टिफिन ले कर नहीं आया क्या?’’ राम प्रसाद ने अपनी भूख का एहसास करते हुए पूछा.

‘‘नहीं चाचू, आप का टिफिन पीछेपीछे मम्मी ले कर आ रही हैं, बस पहुंचने वाली ही होंगी. सुबह भैंस ने लेट दूध दिया था.’’

राम प्रसाद भतीजे से कुछ ओर पूछने वाले ही थे, उन से पहले भतीजा ही पूछ बैठा, ‘‘अच्छा चाचू, पहले यह बताओ कि डैडी की तबीयत कैसी है? मैं ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ‘प्रे फौर माई डैडी’ का स्टेटस डाल दिया है, जिस में अभी तक 3,000 लाइक आ चुके हैं.’’

राम प्रसाद ने मोहित की ओर हैरानी से देखा, पर उस की आंखें फोन पर गड़ी हुई थीं. इतने में आईसीयू में जाने का समय भी हो गया.

राम प्रसाद के साथ मोहित तुरंत अंदर गया और देखा कि डैडी की आंखें बंद और औक्सीजन लगी हुई थी. सांसों की गति सामान्य नहीं थी और उन से बात करने की भी सख्त मनाही थी.

तभी मोहित ने अपना आई फोन आगे किया और अपना एक उदासी भरा भावुक चेहरा बनाया, ‘क्लिक’. एक सैल्फी पोज लिया. दूसरे एंगल से डैडी की फोटो भी खींच ली.

साथ खड़े राम प्रसाद ने उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा ‘‘मोहित बेटा, कल बड़ा डाक्टर कह रहा था कि इस समय दवा और दुआ दोनों की जरूरत है.’’

मोहित ने बिना चाचू की तरफ देखे जवाब दिया, ‘‘चाचू, आप चिंता मत करो. मैं ने अभी अभी गुगल पर सर्च कर के देश के नामीगिरामी डाक्टरों को ट्विटर पर टैग कर दिया है. सोशल मीडिया की ताकत को दुआओं से कम मत सम?ा,’’ और आईसीयू से बाहर निकल आया.

इसी बीच गांव से खाने का टिफिन ले कर मोहित की मम्मी भी पहुंच चुकी थीं. उन्होंने पति का हाल पूछा.

‘‘नहीं, अभी पापा की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ?’’ बेटे ने मम्मी से कहा.

राम प्रसाद खाने का टिफिन ले कर दूसरी तरफ निकल पड़े थे. अगले  कुछ घंटों बाद नर्स ने आ कर खुशखबरी सुनाई, ‘‘श्याम प्रसादजी को जनरल वार्ड में शिफ्ट किया जा रहा है. अब आप लोग अपना सामान उठा कर वहां चलिए, औक्सीजन लगी रहेगी और आप लोग भी अपने मरीज का ध्यान रखें.’’

भाई राम प्रसाद के चेहरे पर चमक सी चमक आई और उन्होंने राहत की सांस ली. वे वार्ड में जा कर उन के पास बैठ गए. वे देख रहे थे कि भाभी भाई के पास आईं और उन्होंने अपने चेहरे पर चिंता की लकीरें ओढ़ते हुए हलके से स्वर में कहा, ‘‘आप जल्दी से ठीक हो जाएं… आप के बिना मेरा जीवन अधूरा है,’’ इतना कह कर भाभी ने अपनी आंखें फोन पर गड़ा लीं.

मोहित वार्ड के बैकग्राउंड को चैक कर रहा था. उस ने देखा लाइट कम है, इस में फोटो अच्छी नहीं आएगी. उस ने वहां मौजूद नर्स से बहस कर के डैडी के पीछे वाली खिड़की के परदे हटवाए ताकि फोटो शूट के लिए नैचुरल लाइट मिल सके.

फिर मोहित ने डैडी के हाथ में लगी ग्लुकोज की सूई को इस तरह सैट किया कि वह कैमरे में धुंधली न दिखाई दे. साथ ही एक भावुक पोस्ट लिखी, ‘आप सभी शुभचिंतकों की दुआओं से मेरे डैडी मौत के मुंह से वापस लौट आए हैं और इस मुश्किल समय में मुझे एहसास हुआ कि परिवार ही सबकुछ है.’

अगले पल मोहित वार्ड के दूसरे कोने में बैठ कर फिर फोन की स्क्रीन में जा घुसा, ‘‘शर्मा के लड़के ने अभी तक कमैंट नहीं किया. मौसाजी ने लाइक किया. मामाजी ने लाइक तो किया लेकिन कमैंट नहीं किया…’’  कुछ और लोगों को चैक कर बड़बड़ाने लगा जैसे इस के हाथ से क्रिकेट का वर्ल्ड कप फिसल गया हो.

दूसरी तरफ बैठी मम्मी उठ कर मोहित के पास गईं. उन की भी आंखें फोन पर जमी हुई थीं. उन्होंने मोहित को डांटते हुए पूछा, ‘‘अरे मोहित, तुझे  भी कुछ शर्महया नहीं रहीं. पूरे खानदान और ग्रुप से जुड़े लोग पूछ रहे हैं कि भाभीजी, अब भाई साहब की तबीयत कैसी है? अगर सपोर्ट की जरूरत है तो बेझिझक लिखिए. दूसरा काम छोड़ो… जल्दी लाइव आओ और उन को अपने डैडी की तबीयत बता कर थैंक्स बोलो.’’

इसी बीच श्याम प्रसाद में आंखें खोलने की हिम्मत. उन्होंने मोहित की मम्मी की आवाज सुन कर सूखे होंठों से पुकारा, ‘‘थोड़ा पानी दो…’’

पर वे तो एकांत मैं बैठी फोन में बिजी थीं. राम प्रसाद उठे और उन्होंने पानी का गिलास अपने बड़े भाई के होंठों पर लगाया.

कुछ देर बाद मोहित की मम्मी ने देखा, तो वे फोन बंद कर के उठीं.

‘‘अरे देवरजी, मैं तो इन के लिए सूप ले कर आई थी बाजार से. सोचा कि जब आंखें खोलेंगे तब दूंगी. लो, यह सूप पिला दो. मैं देखूं कि मोहित ने कौन सी फोटो डाली है… मेरी पसंद की साड़ी ठीक लग रही है या नहीं…’’

देवर ने भाभी के चेहरे के भाव को पढ़ कर उन के हाथ में से सूप का गिलास पकड़ा और चम्मच की मदद से भाई को पिलाने लगे.

तब तक सूप ठंडा हो चुका था. देवरजी ने भाभी की तरफ आंखें तरेरीं और सूप को गरम करने कैंटीन में निकल गए.

वैसे भी वे अपनी भाभी और भतीजे के बरताव को देख कर बोर हो गए थे. जलभुन रहे थे.

सूप गरम कर के राम प्रसाद ले आए और भाई को एकएक चम्मच कर के  पिलाने लगे. सूप पिलाते हुए उन की समझ  में नहीं आ रहा था कि भाई की जान आईसीयू में रह कर बची है या डिजिटल सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की दुआओं से.      Funny Story in Hindi

-नेपाल सिंह

Hindi Story : साजिश

Hindi Story. शिकार शेरनियां करती हैं शेर नहीं. बच्चों को पालने और परिवार को संभालने की जिम्मेदारी शेरनियों के कंधों पर होती है शेरों के नहीं. यह कुदरत का नियम है जिसे कोई ताकत नहीं बदल सकती. इस के लिए शेरनियां अपनी जान की परवाह भी नहीं करती हैं. तभी तो जंगल में उन से बढ़ कर कोई शिकारी नहीं होता.

इस में कोई शक नहीं कि इनसानों में भी शेरनियां पाई जाती हैं. भले ही शक्ल और सूरत में वे शेरनियों जैसी न हों, लेकिन हिम्मत और चपलता में वे शेरनियों को भी मात दे देती हैं. जटपुर की वीरवती भी किसी शेरनी से कम न थी.

‘‘मादर… चाहूं तो दरांती से तेरी गरदन अभी धड़ से अलग कर दूं,’’ वीरवती ने शौनाथ की छाती पर घूटना टेक कर और उस की गरदन पर तीखे दांतों वाली दरांती रखते हुए कहा.

शौनाथ को एकदम से बाजी पलटने की उम्मीद बिलकुल न थी. उस ने तो कितनी ही औरतों की इज्जत को इसी अंदाज में तारतार कर दिया था, लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में बाजी पलट गई.

वह उस से अपने प्राणों और इज्जत की भीख मांगते हुए गिड़गिड़ाया, ‘‘वीरवती, मु?ो माफ कर दे. किसी को पता चल गया तो मैं समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचूंगा.’’

‘‘वाह, कुत्ते के पिल्ले, वाह. अपनी इज्जत तो बड़ी प्यारी है और जब दूसरों की इज्जत से खेलता है तो उस का कुछ नहीं. कमीने, समाज में बड़ा सफेदपोश का अवतार बना फिरता है, तेरी काली करतूतों का चिट्ठा खुलना ही चाहिए. तू हमें सम?ाता क्या है? कान खोल कर सुन ले, मैं बेवा हूं कोई धंधे वाली नहीं.’’

‘‘माफ कर दे, वीरवती, माफ कर दे. तू देवी है देवी.’’

‘‘सूअर की औलाद, तू ने मु?ो छूने की हिम्मत ही कैसे की? मन तो करता है, कठफोड़वे, तेरा खून पी जाऊं, जहांतहां चोंच मारता फिरता है. औरतों को अपनी रखैल सम?ाता है.’’

‘‘नहीं, नहीं, वीरवती. तु?ो पहचानने में मु?ा से भूल हो गई. आज पता चला हर औरत एक सी नहीं होती. तेरे पांव पड़ता हूं, मु?ो माफ कर दे. मेरी बीवी और औलाद को मेरी करतूतों का पता चल गया तो वे मु?ो घर में भी न घुसने देंगे.’’

‘‘तेरे जैसा घटिया आदमी परिवार तो क्या समाज में भी रहने लायक नहीं. तेरे जैसे नालायक को तो जीने का हक ही नहीं होना चाहिए जो अपनी औरत को दगा दे कर इधरउधर मुंह मारता फिरता है और दूसरी औरतों पर गंदी नजर रखता है.’’

‘‘वीरवती, अब मैं इन रास्तों की ओर कदम भी नहीं रखूंगा. मां कसम.’’

‘‘मां नहीं, बाप की कसम खा. तेरे जैसे नामर्द की जबान पर ‘मां’ शब्द शोभा नहीं देता.’’

शौनाथ अभी भी गिड़गिड़ा रहा था लेकिन ऐसा लगता था वीरवती उसे माफ करने के मूड में नहीं थी. वह शेरनी सी दहाड़ कर बोली, ‘‘मु?ो महानता का तमगा गले में लटका कर घूमने का शौक नहीं. सजा तो तेरी करनी की तु?ो मिल कर रहेगी और वह भी ऐसी जिसे तू जिंदगीभर याद रखेगा. किसी गैर औरत की ओर गंदी नजर उठाने से पहले हजार बार सोचेगा,’’ यह कहते हुए वीरवती ने उस का बायां कान ‘खच्च’ से दरांती से साफ कर दिया.

खून की एक तेज धार शौनाथ की कनपटी से बह निकली. उस के मुंह से दर्दनाक चीख निकली. उस ने बहते खून को रोकने के लिए कनपटी पर अपना हाथ रख लिया और दर्द से कराहता हुआ तेजी से वहां से चल पड़ा. उस के शरीर का बायां भाग खून से लथपथ हो चुका था.

‘‘जा याद रखना शैतान कि एक औरत की इज्जत पर हाथ डालने का क्या नतीजा हो सकता है…’’

जमीन पर पड़े कटे हुए कान पर वीरवती ने जोर से पैर मारा तो वह जमीन में धंस गया. फिर उस ने चारे की गठरी उठाई और गांव की ओर चल दी. कितने ही खयाल उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.

वीरवती जब ब्याह कर गांव में आई थी तो सबकुछ ठीकठाक था. उस का आदमी राकेश शराब तो पीता था लेकिन इतनी ज्यादा भी नहीं. पता नहीं किस कारण से उस के आदमी को कैंसर हो गया और उस का पता तब चला जब वह तीसरी स्टेज में पहुंच कर लाइलाज हो गया और 2 साल पहले ही उस की मौत हो गई थी.

बेटा लवकेश गलत संगत में पड़ गया था और हत्या के केस में 20 साल की उम्र में ही जेल की हवा खाने चला गया था. अपनी बेटी बाला को पढ़ने के लिए उस ने गढ़वाल के श्रीनगर भेज दिया था. अब वह अपने घर में अकेली रहती थी. वह अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती थी, इसलिए भैंस पाल कर दूध बेचने का काम करने लगी थी.

उ  स का आदमी 5 बीघा खेती की जमीन छोड़ गया था. कितनों ने ही उस की आर्थिक तंगी देख कर उस के सामने उस की खेती की जमीन खरीदने का प्रस्ताव रखा था लेकिन उस ने जमीन बेचने से साफ मना कर दिया था. उस जमीन में वह अनाज, गन्ना और भैंसों के लिए चारा उगाती थी. अपनी मेहनत के बलबूते उस ने अपनी आर्थिक तंगी पर जीत पा ली थी.

शौनाथ गांव का बड़ा जमींदार और रसूखदार आदमी था. वह हमेशा गांव की कमजोर और बेबस औरतों पर गंदी नजर रखता था और उन की कमजोरी का फायदा उठाता था. उस ने वीरवती को भी ऐसी ही कमजोर और लाचार औरत सम?ा लिया था.

उस दिन जब वह भैंसों के लिए अपने खेत में चारा काटने गई थी तो पीछे से चुपचाप आ कर शौनाथ ने उसे दबोच लिया था. बस यही उस से सब से बड़ी गलती हो गई थी. उसे पता नहीं था कि वीरवती बचपन में कुश्ती लड़ती थी और उसे कुश्ती के दांवपेंच अच्छे से आते थे.

वीरवती ने एक ही ?ाटके में उसे नीचे पटक दिया था और शेरनी सी उस की छाती पर घुटना टेक कर सवार हो गई थी.

शौनाथ को उस दिन ऐसा सबक मिल गया था कि उस दिन के बाद से उस ने किसी औरत की तरफ गलत नजर उठा कर देखने की हिमाकत न की थी. लोग अब उसे ‘कनकटा’ कहने लगे थे. कटे हुए कान को छिपाने के लिए वह हमेशा पगड़ी बांध कर रहने लगा था. उस का कान कैसे कटा, यह बात उस ने किसी को नहीं बताई थी.

वीरवती ने बिटिया बाला को पढ़ालिखा कर काबिल बना दिया था. वह एक इंटर कालेज में इकोनौमिक्स की लैक्चरर हो गई थी. वीरवती ने उस की शादी उसी की मरजी से उसी के कालेज में हिंदी के लैक्चरर सुमित से कर दी थी. उस की जिंदगी अब खुशियों से भरी थी. बस वीरवती को अब इंतजार था बेटे लवकेश का जेल से बाहर आने का.

एक दिन वीरवती को खबर मिली कि सरकार 15 अगस्त पर कुछ कैदियों को रिहा करने जा रही है.

उन कैदियों में लवकेश का नाम भी था. इस से बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी.

लवकेश 10 साल बाद जेल से बाहर आया तो वीरवती उसे किराए की कार में बैठा कर घर लाई. इतने लंबे समय बाद उस का बेटा जेल से बाहर आया था इस खुशी में उस ने गांव में बड़े भारी भोज का आयोजन किया. उस में जटपुर गांव की भीड़ ही नहीं, बल्कि आसपास के गांव की भीड़ भी उमड़ पड़ी थी.

वीरवती ने लवकेश के लिए कई चीजें तैयार की थीं. उस में सुंदर डिजाइन का एक तकिया भी था। उस तकिए को लवकेश को देते हुए उस ने कहा, ‘‘ले बेटा, यह तेरा सिरहाना है. सिरहाना हमारा सम्मान होता है. तू 10 साल जेल में काट कर आया है. अब अपना सम्मान और यश बढ़ाना. दुष्ट लोगों से बच कर रहना.’’

‘‘मां, तू कैसी बातें करती है? एक अपराधी का और वह भी हत्या के आरोपी का कोई सम्मान होता है भला. मैं 10 साल जेल में अपराधियों के बीच में रह कर आया हूं. मैं भले ही जेल से बाहर आ गया हूं लेकिन मेरा दिमाग अभी भी अपराधियों की तरह ही सोचता है. मेरे मन से ये बातें अभी तो नहीं निकलतीं. अभी किसी अच्छे काम को करने को मन नहीं होता. जेल की जिंदगी का आदी हो गया हूं. किसी काम को करने का मन नहीं करता.’’ ‘‘न बेटा, ऐसा मत सोच. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मां, यह बात कैसे मान लूं? भोज में कितने लोग आए, सब गड़पगड़प भोजन तो खा गए, लेकिन किसी ने सीधे मुंह मु?ा से बात भी नहीं की. सब के सब आज भी मु?ो हत्यारा और अपराधी ही सम?ाते हैं. शौनाथ चाचा को छोड़ कर कोई मेरी छुआई लेने को तैयार भी नहीं.’’

शौनाथ का नाम सुनते ही वीरवती का खून खौल उठा. लेकिन उस ने खुद को शांत ही रखा. उस ने सोचा कि लवकेश को अगर शौनाथ की काली करतूत बता दी तो कहीं वह उस का काम तमाम ही न कर दे. एक हत्या की सजा तो वह काट कर आ ही रहा है, कहीं दूसरी हत्या वह अपने सिर न ले ले. वह उस के दोबारा जेल जाने के सोचने मात्र से सिहर उठी. उस ने बस इतना कहा, ‘‘बेटा, शौनाथ से दूर ही रहना. वह मु?ो अच्छा आदमी नहीं लगता.’’

‘‘मां, पूरे गांव में लेदे कर एक ही तो आदमी है जो इतने प्यार से मु?ो अपने पास बैठाता है. उसी से मु?ो तुम चेता रही हो, सावधान कर रही हो.’’

यह सुन कर वीरवती के मन में शौनाथ को ले कर कुछ शंका सी हुई, लेकिन अपनी शंका को अपने मन में रखते हुए उस ने कहा, ‘‘ठीक है बेटा. जैसा तेरा मन. रात घनी हो गई है, अब तू सो जा.’’

इस बात को हुए 4 दिन भी नहीं गुजरे थे कि लवकेश ने अपनी मां को दूध में नींद की गोलियां मिला कर गहरी नींद सुला दिया और फिर उसी तकिए से अपनी मां का दम घोंट दिया जिस तकिए को वीरवती ने उस के लिए बड़े जतन से तैयार किया था. अफवाह फैला दी गई थी कि वीरवती की रात में हार्ट अटैक से मौत हो गई.

जब वीरवती की अर्थी को लोग कंधा दे कर ले जा रहे थे तब शौनाथ मन ही मन खुश हो कर सोच रहा था, ‘वीरवती, बेइज्जती का बदला पूरा हुआ. तेरे अपराधी सोच के बेटे ने इस लालच में तु?ो यमलोक पहुंचा दिया कि तेरे मरने के बाद पूरी जायदाद पर उस का हक होगा. उस बेवकूफ को भी मैं कहीं का नहीं छोड़ने वाला. मेरी पहली योजना कामयाब रही तो दूसरी भी जरूर होगी.’

शौनाथ वीरवती की अर्थी के पीछे पीछे गंगा के घाट तक गया. जब उस की चिता जल रही थी तब वह गंगा की ढांग पर खड़ा गंगा की लहरों की तरफ मुंह किए कुटिल मुसकान से मुसकरा रहा था कि उस की साजिश पूरी तरह से कामयाब रही. उस की बेइज्जती का बदला आज पूरा हुआ. इस का ब्याज लवकेश को वह बरबाद कर के वसूलेगा.

तभी गंगा की एक तेज लहर उस ढांग से टकराई. ढांग नीचे गिरी और इसी के साथ शौनाथ भी मुंह के बल गिरा. कई दिन बाद उस की सड़ीगली लाश गोताखोरों को कई किलोमीटर दूर जा कर मिली. Hindi Story

Heart Touching Hindi Story : नादान इश्क

सर्दियों की हलकी धूप उस छोटे से कसबे की गलियों में बिखरी हुई थी. सुबह के 8 बजे थे. सड़क किनारे चाय की टपरी पर भाप उड़ाती चाय की चुसकियों के साथ अखबार की हैडलाइंस पर एक गहरी चर्चा चल रही थी.

उसी कसबे में एक 2 कमरों के छोटे से घर में रहने वाली 19 साल की नेहा स्कूल की यूनिफौर्म पहन कर आईने के सामने खड़ी थी. एक हाथ से अपने बाल संवार रही थी और दूसरी ओर उस की नजर बारबार मेज पर करीने से रखी किताबों पर दौड़ रही थी.

चूंकि आज उसे इम्तिहान देने जाना था, बाहर आंगन में उस के पिता साइकिल तैयार कर रहे थे ताकि समय पर उसे इम्तिहान सैंटर पहुंचा सकें, जबकि रसोई में उस की मां टिफिन बनाते हुए आवाज लगा रही थीं, ‘‘नेहा, बेटा नाश्ता कर लो, नाश्ता तैयार है.’’

नेहा बिना कुछ बोले अपनी तैयारी में जुटी रही. आखिर वह उस परिवार का एकमात्र उम्मीद थी और उस पर उस के पिता को हद से ज्यादा भरोसा था. उस के पिता अनंत एक सरकारी दफ्तर में चपरासी थे. महीने की सीमित तनख्वाह से किसी तरह घर चलता था.

कई बार महीने के आखिरी दिनों में मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटी की पढ़ाई पर आंच नहीं आने दी. उन का एक ही सपना था कि उन की बेटी पढ़लिख कर अफसर बने और वह जिंदगी जी सके जो वे खुद कभी नहीं जी पाए.

नेहा पढ़ाई में बहुत तेज थी. स्कूल में हमेशा फर्स्ट आती थी. महल्ले के लोग अकसर उस की मिसाल दिया करते थे. उस के पिता जब भी किसी से मिलते तो गर्व से कहते कि ‘मु झे नेहा को अफसर बनाना है’ और यह कहते ही उन की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी.

नेहा भी अपने मातापिता के संघर्ष में डट कर उन के साथ खड़ी रहती. उस ने कभी किसी चीज की जिद नहीं की. न ही महंगे कपड़े और न ही आईफोन की जरूरत महसूस की थी उस ने. उस के लिए उस के मांबाप ही उस की पूरी दुनिया थे.

जब 12वीं में अच्छे अंक आए तो शहर के सब से अच्छे कालेज में नेहा का दाखिला हो गया. कसबे से रोज बस पकड़ कर वह शहर जाती थी. पहले दिन जब उस ने कालेज की बड़ी इमारत, हरेभरे मैदान और सैकड़ों छात्रों की भीड़ देखी तो उस की आंखें खुशी से भर गईं. उसे लगा जैसे उस के सपनों को पंख मिल गए हों. उस ने मन ही मन तय किया कि वह यहां भी अपनी मेहनत से पहचान बनाएगी.

लेकिन शायद जिंदगी ने नेहा के लिए कुछ और ही लिख रखा था. कालेज के पहले ही हफ्ते नेहा की मुलाकात आदित्य से हुई. लंबा कद. आत्मविश्वास से भरी मुसकान. बात करने का ऐसा अंदाज कि सामने वाला सहज हो जाए. एक अजब का आकर्षण था उस में. पढ़ाई में भी अच्छा था और कालेज के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी आगे रहता था.

उन दोनों की पहली मुलाकात लाइब्रेरी में हुई थी. जब अचानक से नेहा के हाथ से कुछ किताबें गिर गईं तो वहीं पास ही बुक शैल्फ में अपने लिए किताब ढूंढ़ रहे आदित्य ने किताबें उठा कर उसे दी थीं.

‘‘शायद ये आप की हैं.’’ ‘‘जी… धन्यवाद.’’

‘‘फर्स्ट ईयर?’’ ‘‘जी, हां.’’

‘‘वैलकम टू आवर कालेज.’’  ‘‘थैंक्स.’’

बस इतना सा परिचय था. पर नेहा को आदित्य का बरताव अच्छा लगा.

कुछ दिनों बाद कैंटीन में फिर मुलाकात हुई.

‘‘आप हमेशा अकेली बैठती हैं.’’   ‘‘मेरे यहां ज्यादा दोस्त नहीं बने अभी तक.’’

‘‘तो आज से मैं आप का दोस्त. आई हौप यू डौन्ट माइंड.’’

नेहा मुसकरा दी.

धीरेधीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी. पहले क्लास के नोट्स. फिर लाइब्रेरी. फिर कैंटीन की चाय. फिर कालेज खत्म होने के बाद बसस्टैंड तक साथ चलना. आदित्य हर छोटी बात का ध्यान रखता.

कभी उस के लिए समोसा खरीद लाता. कभी कहता कि ज्यादा पढ़ाई मत किया करो, आंखों पर असर पड़ेगा. कभी उस की तारीफ करते हुए कहता कि बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत सुंदर लगती है.

नेहा की जिंदगी में पहली बार कोई ऐसा आया था जो उसे इतने अपनापन से देखता था. उसे लगता था जैसे दुनिया में उस से ज्यादा उस की परवाह कोई नहीं करता.

वह हर रात आदित्य के साथ चैटिंग में डूबी रहती और हर सुबह उस के ‘गुड मौर्निंग’ के इंतजार से उस का दिन शुरू होता. दोनों घंटों फोन पर बातें करते. कभी भविष्य की. कभी सपनों की. कभी उस घर की जहां वे साथ रहेंगे.

आदित्य अकसर कहता, ‘‘एक दिन मैं तुम्हें इतनी खुशियां दूंगा कि तुम अपने सारे दुख भूल जाओगी.’’

नेहा हंस देती, ‘‘सच?’’ ‘‘अपनी जान से भी ज्यादा चाहता हूं तुम्हें.’’

‘‘हमेशा साथ रहोगे न?’’ ‘‘मरते दम तक.’’

इन शब्दों ने धीरेधीरे नेहा के मन में ऐसा भरोसा पैदा कर दिया कि अब आदित्य उस के लिए सांस लेने से भी ज्यादा जरूरी हो गया था.

अब नेहा घर लौटते ही कमरे में चली जाती. मां कुछ पूछती तो कह देती कि पढ़ाई करनी है, जबकि घंटों फोन पर बातें चलती रहतीं.

एक सुबह नेहा के पिताजी ने उसे पास बैठा कर बड़े प्यार से सम झाते हुए कहा, ‘‘बेटा, इस बार पहले से मेहनत ज्यादा करना. कालेज की पढ़ाई आसान नहीं होती.’’

नेहा ने बिना उन की तरफ देखे जवाब दिया, ‘‘मु झे पता है पापा,’’ और वहां से उठ कर चली गई.

नेहा के मातापिता ने नोटिस किया था कि वह अब पहले जैसी विनम्र नहीं रही थी. वह छोटीछोटी बातों पर चिड़चिड़ाने लगी थी.

मां ने एक दिन प्यार से नेहा को खाने की टेबल पर बुलाते हुए कहा, ‘‘बेटा, खाना ठंडा हो रहा है.’’

नेहा अचानक से  झुं झला कर बोली, ‘‘मां, हर वक्त ऐसे परेशान मत किया करो.’’

मां कुछ पल के लिए नेहा को देखती रह गईं. यही बेटी कभी उन की रसोई में बैठ कर रोटियां सेंका करती थी और आज खाना खाने को कहने पर झुं झला रही है.

पहले सैमेस्टर का नतीजा आया. नेहा के नंबर उम्मीद से बहुत कम थे. पिता ने रिपोर्टकार्ड हाथ में ले कर सिर्फ इतना कहा, ‘‘कोई बात नहीं. अगली बार मेहनत कर लेना.’’

लेकिन नेहा ने अपने पिता की बात सुनने के बजाय  झुं झला कर कहा, ‘‘आप हर समय पढ़ाईपढ़ाई मत किया कीजिए.’’

पिता रामस्वरूप चुप हो गए. पहली बार बेटी ने उन से इस लहजे में बात की थी. उन्हें लगा जैसे उन की परवरिश कहीं रास्ता भटक रही है.

उधर आदित्य ने नेहा सम झाने के बजाय और करीब खींच लिया, ‘‘मार्क्स से जिंदगी नहीं चलती नेहा. जिंदगी प्यार से चलती है.’’

नेहा ने आदित्य की आंखों में देखा. उसे सचमुच लगा कि शायद वही सही कह रहा है. और यहीं से उस की जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया, जहां से लौटना आसान नहीं था.

उन दिनों वसंत का मौसम था. शहर की सड़कों के किनारे लगे गुलमोहर के पेड़ों पर नई पत्तियां निकल आई थीं. कालेज का हर कोना जैसे युवाओं की हंसी और सपनों से भर गया था. कैंटीन में बैठ कर घंटों बातें करना. लाइब्रेरी में एक ही मेज पर आमनेसामने बैठ कर पढ़ने का बहाना करना. क्लास खत्म होने के बाद बसस्टैंड तक साथसाथ पैदल चलना.

यह सब अब नेहा और आदित्य की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था. नेहा को अब यह एहसास भी नहीं होता था कि कब उस के चेहरे की मुसकान आदित्य के आने से जुड़ गई और कब उस की हर सुबह और हर रात उसी के नाम हो गई.

उसे लगता था कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, एक इनसान कभी नहीं बदलेगा और वह इनसान आदित्य था. उस ने अपने भविष्य की हर तसवीर में आदित्य को शामिल कर लिया था. उसे लगता था कि मेहनत कर के नौकरी तो कभी भी मिल जाएगी, लेकिन इतना सच्चा प्यार दोबारा शायद कभी नहीं मिलेगा.

आदित्य भी अपने बरताव से नेहा के इस विश्वास को हर दिन और मजबूत करता था. वह कभी उस की पसंद का चौकलेट ले कर आ जाता, कभी बिना बताए बसस्टैंड पर उस का इंतजार करता. कभी उस की तबीयत थोड़ी भी खराब होती तो दवा ले कर पहुंच जाता. वह अकसर उस की आंखों में देखते हुए कहता, ‘‘नेहा, अगर पूरी दुनिया भी हमारे खिलाफ हो गई, तब भी मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा.’’

नेहा ने मुसकरा कर उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मु झे किसी दुनिया से डर नहीं, जब तक तुम मेरे साथ हो.’’

आदित्य ने हलके से मुसकरा कर कहा, ‘‘एक दिन मैं तुम्हें दुलहन बना कर अपने घर ले जाऊंगा.’’

यह सुनते ही नेहा शरमा गई. वह घर लौटते समय पूरे रास्ते उन्हीं बातों को याद कर के मुसकराती रही. उस के सपनों में अब किताबों की जगह एक छोटा सा घर था. खिड़की पर रखे फूल थे. रसोई में चाय बनाती हुई वह खुद थी और दरवाजे से मुसकराते हुए अंदर आता आदित्य था. उसे लगता था कि उस की मंजिल अब बदल चुकी है.

धीरेधीरे नेहा का पढ़ाई से मन उठने लगा. किताब खोलती तो शब्दों की जगह आदित्य का चेहरा दिखाई देता. क्लास में लैक्चरर पढ़ा रहे होते और वह मोबाइल में आए उस के मैसेज पढ़ कर मुसकराती रहती. पहले जो लड़की हर विषय के नोट्स सब से पहले बनाती थी, अब वही अकसर अधूरे नोट्स ले कर घर लौटती.

इम्तिहान नजदीक आए, लेकिन उस के भीतर पहले जैसी बेचैनी नहीं थी. उसे यकीन था कि जिंदगी का सब से बड़ा इम्तिहान तो वह पास कर चुकी है. उसे प्यार मिल चुका है.

घर में भी बदलाव साफ दिखाई देने लगा था. मां कई बार नेहा के कमरे में जातीं तो उसे फोन पर धीमी आवाज में बातें करते हुए पातीं. जैसे ही मां अंदर आतीं, वह जल्दी से फोन काट देती.

‘‘किस से बात कर रही थी?’’  ‘‘कालेज की दोस्त थी.’’

‘‘इतनी देर तक.’’ ‘‘मां, हर बात बताना जरूरी है क्या.’’

मां चुप हो गईं. उन्हें पहली बार अपनी बेटी उन से दूर जाती हुई महसूस होने लगी.

एक शाम पिता ने नेहा को अपने पास बैठाया, ‘‘नेहा.’’ ‘‘जी…’’

‘‘तुम पहले जैसी नहीं रही हो.’’ ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कमजोर हो रही है. घर में भी तुम पहले जैसा बरताव नहीं करती. अगर कोई परेशानी है तो मु झे बताओ.’’  नेहा ने नजरें फेर लीं.

‘‘आप लोग बेवजह मेरी चिंता करते हैं.’’ ‘‘बेटा, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं.’’

‘‘बस पापा. मु झे हर बात पर सम झाइए मत.’’

वे कुछ क्षण उसे देखते रहे. फिर धीरे से उठ कर बाहर चले गए. उस रात उन्होंने खाना भी ठीक से नहीं खाया. पत्नी ने पूछा भी कि क्या हुआ है, लेकिन उन्होंने केवल इतना कहा, ‘‘हमारी बेटी बड़ी हो गई है.’’

नेहा ने पहली बार अपने पिता की बु झी हुई आंखें नहीं देखीं.

उधर आदित्य नेहा को अब कालेज से बाहर भी मिलने के लिए कहने लगा. कभी शहर के पार्क. कभी नदी किनारा. कभी कोई शांत कैफे. नेहा बिना किसी  िझ झक के जाने लगी. घर पर वह एक्स्ट्रा क्लास या प्रोजैक्ट का बहाना बना देती. उस के  झूठ अब उसे  झूठ नहीं लगते थे. उसे लगता था कि वह अपने भविष्य के लिए ही तो यह सब कर रही है.

एक दिन आदित्य ने नेहा के हाथ थाम कर कहा, ‘‘नेहा, मेरा एक दोस्त बाहर गया हुआ है. उस का कमरा खाली पड़ा है, चलो न वहीं आराम से बैठ कर बातें करेंगे. यहां हर जगह भीड़ रहती है.’’

नेहा कुछ पल चुप रही. फिर बनावटी डर चेहरे पर लाते हुए कहा, ‘‘अगर इस तरह मिलते हुए किसी ने हमें देख लिया तो?’’

‘‘तुम मु झ पर भरोसा तो करती हो न?’’  ‘‘दुनिया में सब से ज्यादा.’’

‘‘फिर डर कैसा.’’   नेहा आदित्य के साथ चली गई.

उस दिन दोनों ने बातें करतेकरते सारी हदें पार कर दी. जब होश आया तो दोनों भविष्य के सपनों में खो गए. नौकरी, शादी. बच्चों के नाम. किस शहर में रहेंगे. किस तरह का घर होगा. सबकुछ तय कर लिया था दोनों ने और कई बार सारी हदें पार की थीं दोनों ने.

कमरा छोड़ने से पहले आदित्य ने नेहा की हथेली अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘अब तुम सिर्फ मेरी हो.’’

नेहा ने बिना एक पल सोचे आदित्य के सीने से लग कर कहा, ‘‘और तुम सिर्फ मेरे.’’

समय के साथ दोनों की निकटता बढ़ती गई. भरोसा इतना गहरा हो गया कि नेहा ने अपने जीवन का हर फैसला आदित्य के भरोसे छोड़ दिया. उसे लगा कि 2 लोगों के बीच जब मन का रिश्ता इतना मजबूत हो जाए तो बाकी सारी दूरियां अपनेआप मिट जाती हैं. उस ने कभी यह नहीं सोचा कि भरोसा जितना बड़ा होता है, उस के टूटने की आवाज भी उतनी ही भयानक होती है.

दिन बीतते गए. दूसरे सैमेस्टर का नतीजा पहले से भी खराब आया. इस बार कालेज के कई लैक्चरर ने नेहा को बुला कर सम झाया.

‘‘नेहा, तुम बहुत प्रतिभाशाली छात्रा थीं. आखिर हुआ क्या है?’’

नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया. उसे अब अंकों की चिंता नहीं थी. उसे लगता था कि कुछ साल बाद जब वह आदित्य की पत्नी बन जाएगी तो यह सब पीछे छूट जाएगा. लेकिन जिंदगी उतनी आसान नहीं थी जितनी उस ने अपने सपनों में देखी थी.

तकरीबन 2 महीने बीत गए. एक दिन सुबह उठते ही उसे तेज घबराहट हुई. कई दिनों से उस की तबीयत ठीक नहीं थी. उसे कमजोरी रहने लगी थी. पहले उसने इसे सामान्य सम झ कर नजरअंदाज किया. लेकिन जब लगातार कुछ बदलाव महसूस हुए तो उसके मन में अनजाना डर पैदा होने लगा. कांपते हाथों से उसने एक जांच करवाई.

रिपोर्ट नेहा के हाथ में थी. उस की आंखें एक ही लाइन पर टिक गईं. वह मां बनने वाली थी. रिपोर्ट उस के हाथ से फर्श पर गिर गई. कुछ क्षणों तक उसे लगा जैसे उस के आसपास की सारी आवाजें खत्म हो गई हों. कमरे की दीवारें घूमती हुई महसूस होने लगीं. उस के सामने अपने पिता का चेहरा घूम गया. मां की मुसकान याद आ गई. वह छोटी सी नेहा, जो कभी अपने पिता का हाथ पकड़ कर स्कूल जाया करती थी, जैसे अचानक कहीं बहुत पीछे छूट गई.

नेहा ने कांपते हाथों से आदित्य को फोन लगाया, ‘‘मु झे तुम से अभी मिलना है.’’

आदित्य नेहा की आवाज सुन कर घबरा गया, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें?’’ ‘‘बहुत जरूरी बात है.’’

‘‘ठीक है. एक घंटे बाद वहीं मिलो जहां हम पहली बार साथ बैठे थे.’’ फोन कट गया.

नेहा बैंच पर बैठी आदित्य का इंतजार करती रही. उस की आंखों में डर था, लेकिन उस डर से कहीं ज्यादा भरोसा था. उसे पूरा यकीन था कि आदित्य उस का हाथ थाम कर कहेगा, ‘‘डरने की जरूरत नहीं. अब हम शादी कर लेते हैं.’’

नेहा को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि उस की जिंदगी का सब से मुश्किल दौर अब शुरू होने वाला है.

नेहा उस पुराने पार्क की लोहे की बैंच पर बैठी थी, जहां कभी दोनों ने साथ बैठ कर अपने भविष्य का पहला सपना बुना था. उसी जगह आज उस की उंगलियां कांप रही थीं. बारबार वह अपने हाथों में पकड़ी रिपोर्ट को देखती और फिर सामने सड़क पर नजरें टिक जातीं.

हर गुजरती बाइक पर उसे लगता कि शायद आदित्य आ गया. तकरीबन आधे घंटे बाद वह तेज कदमों से उस के सामने आ कर खड़ा हुआ. उस के चेहरे पर वही मुसकान थी, लेकिन नेहा की आंखों में मुसकान की जगह घबराहट थी.

‘‘क्या हुआ नेहा, तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’ नेहा ने बिना कुछ कहे रिपोर्ट आदित्य की ओर बढ़ा दी.

आदित्य ने रिपोर्ट पढ़ी. उस के चेहरे की मुसकान धीरेधीरे गायब हो गई.

कुछ पल तक दोनों के बीच खामोशी पसरी रही.

नेहा ने कांपती आवाज में कहा, ‘‘अब हमें शादी कर लेनी चाहिए.’’

आदित्य ने गहरी सांस ली, ‘‘इतनी जल्दी फैसला मत करो.’’  ‘‘जल्दी.’’

‘‘हां. मु झे सोचने के लिए थोड़ा समय चाहिए.’’  ‘‘सोचना क्या है आदित्य. तुम ने ही तो कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’

आदित्य ने नेहा का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मैं तुम्हें छोड़ नहीं रहा हूं. बस थोड़ा समय दो.’’

आदित्य की यही बात नेहा के टूटते हुए मन के लिए सहारा बन गई. उस ने राहत की सांस ली. उसे लगा कि शायद सचमुच कुछ समय की बात होगी.

उस दिन के बाद भी आदित्य नेहा से पहले की तरह मिलता रहा. वह उसे हंसाने की कोशिश करता. कभी आइसक्रीम खिलाता. कभी कहता कि सब ठीक हो जाएगा. कभी उस के सिर पर हाथ फेर कर कहता, ‘‘मैं हूं न.’’ नेहा फिर यकीन कर लेती.

लेकिन धीरेधीरे सबकुछ बदलने लगा. पहले जहां आदित्य दिन में 10 बार फोन करता था, अब कईकई घंटे उस का फोन नहीं आता था. मैसेज का जवाब देर से मिलने लगा. मिलने के बहाने कम होने लगे. जब भी नेहा शादी की बात छेड़ती, वह कोई नया कारण बता देता.

‘‘अभी मेरे घर में माहौल ठीक नहीं है.’’

‘‘पापा की तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘मेरी नौकरी का मामला अटका हुआ है. थोड़ा इंतजार कर लो.’’

नेहा हर बार चुप हो जाती. वह खुद को सम झाती कि हर रिश्ते में मुश्किल समय आता है. प्यार का मतलब साथ निभाना होता है. लेकिन उस के भीतर पल रहा डर हर दिन थोड़ा और बड़ा हो रहा था.

अब नेहा के शरीर में भी बदलाव दिखाई देने लगे थे. वह ढीले कपड़े पहनने लगी. कालेज जाना तकरीबन बंद हो गया. घर में उस ने बीमारी का बहाना बना दिया. मां दिनरात उस की सेवा करतीं और सोचतीं कि शायद पढ़ाई का तनाव है. पिता डाक्टर के पास चलने की बात कहते तो वह मना कर देती.

एक रात मां नेहा के सिरहाने बैठी थीं, ‘‘बेटा…’’ ‘‘हां, मां,’’ नेहा बोली.

‘‘तुम हम से कुछ छिपा तो नहीं रही हो न?’’

नेहा की आंखें भर आईं. एक पल के लिए उस का मन हुआ कि वह मां के गले लग कर सबकुछ बता दे. लेकिन अगले ही पल आदित्य का चेहरा सामने आ गया. उस ने सोचा, ‘बस कुछ दिनों की बात है. शादी हो जाएगी. फिर सब ठीक हो जाएगा.’

नेहा ने जबरन मुसकराते हुए कहा, ‘‘नहीं, मां.’’

मां ने नेहा के सिर पर हाथ फेरा और कमरे से बाहर चली गईं.

दरवाजा बंद होते ही नेहा फूटफूट कर रो पड़ी. अगले दिन उस ने आदित्य को मिलने के लिए बुलाया. इस बार उस के चेहरे पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.

‘‘आदित्य, अब और इंतजार नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं.’’   ‘‘कब तक?’’

‘‘थोड़ा समय लगेगा.’’   ‘‘मेरे पास समय नहीं है.’’

आदित्य चुप रहा. नेहा ने उस की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘चलो, अभी मेरे घर चलते हैं. मैं सब सच बता दूंगी.’’

आदित्य जैसे चौंक गया, ‘‘तुम पागल हो गई हो क्या.’’

‘‘तो फिर अपने घर चलो.’’  ‘‘वह भी मुमकिन नहीं है.’’

‘‘क्यों?’’  ‘‘क्योंकि वे…’’ आदित्य रुक गया.

‘‘क्योंकि क्या?’’  आदित्य ने नजरें  झुका लीं, ‘‘मेरे घर वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं हैं.’’

नेहा कुछ क्षण तक उसे देखती रह गई. उसे लगा जैसे उस ने ठीक से सुना नहीं, ‘‘क्या कहा तुम ने?’’

‘‘पापा कभी नहीं मानेंगे.’’ ‘‘लेकिन तुम ने कहा था कि तुम दुनिया से लड़ जाओगे.’’

‘‘मैं ने कोशिश की.’’ ‘‘कब?’’

आदित्य के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था.

नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे, ‘‘तुम मेरे साथ मजाक कर रहे हो न?’’ ‘‘नहीं.’’

‘‘तुम ने कहा था कि मैं तुम्हारी पत्नी बनूंगी.’’   ‘‘मैं चाहता था.’’

‘‘चाहता था…’’ नेहा के मुंह से ये शब्द निकले और जैसे उस की पूरी दुनिया बिखर गई.

नेहा अचानक उस के पैरों के पास बैठ गई. उस ने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘‘आदित्य, ऐसा मत करो. मैं कहीं की नहीं रहूंगी.’’

आदित्य घबरा गया, ‘‘उठो नेहा. लोग देख रहे हैं.’’

‘‘मु झे किसी की परवाह नहीं है,’’ नेहा ने आदित्य के पैर पकड़ लिए, ‘‘मु झे छोड़ कर मत जाओ. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगी.’’

पास से गुजरते लोग रुक कर देखने लगे.

नेहा रोते हुए बोलती जा रही थी, ‘‘अगर तुम्हारे घर वाले नहीं मानते तो हम कहीं दूर चलेंगे. शादी कर लेंगे. मैं किसी चीज की मांग नहीं करूंगी. छोटे से कमरे में रह लेंगे. मैं नौकरी कर लूंगी. बस, मु झे अकेला मत छोड़ो.’’

आदित्य का चेहरा तनाव से भर गया. कुछ देर तक वह चुप खड़ा रहा. फिर धीरे से बोला, ‘‘मु झे सोचने दो.’’

नेहा ने आदित्य के आंसू भरे चेहरे की ओर देखा, ‘‘सच…’’ ‘‘हां, एकदम सच.’’

‘‘तुम मु झे छोड़ोगे नहीं?’’ आदित्य ने धीमे से कहा, ‘‘नहीं.’’

बस, यही एक शब्द फिर नेहा के लिए उम्मीद बन गया.

अगले कुछ दिनों तक आदित्य फिर सामान्य बरताव करता रहा. उस ने नेहा को यकीन दिलाया कि उस ने एक रास्ता सोच लिया है.

एक शाम आदित्य ने कहा, ‘‘हम यहां नहीं रह सकते. सब को पता चल जाएगा.’’

‘‘फिर?’’ ‘‘हम बड़े शहर चलते हैं.’’

‘‘कहां?’’ ‘‘वहां मेरे एक परिचित हैं. पहले हम शादी करेंगे. फिर नौकरी ढूंढ़ लेंगे. जब सब शांत हो जाएगा, तब घर वालों को भी मना लेंगे.’’

नेहा की बु झी हुई आंखों में फिर रोशनी लौट आई, ‘‘सच में सब ठीक हो जाएगा?’’

आदित्य मुसकराया, ‘‘मैं ने तुम से वादा किया है.’’

उस रात नेहा ने पहली बार चैन की सांस ली. उस ने अपने छोटे से बैग में 2 जोड़ी कपड़े रखे. मांपिता की एक पुरानी तसवीर अपने पर्स में रखी और बिना किसी को बताए, अगली सुबह वह आदित्य के साथ बस में बैठ गई. खिड़की के बाहर सड़कें पीछे छूटती जा रही थीं.

नेहा को लग रहा था कि वह अपनी जिंदगी की सब से बड़ी मंजिल की ओर जा रही है. उसे यह बिलकुल नहीं मालूम था कि वह जिस सफर पर निकली है, उस की मंजिल कोई नया घर नहीं, बल्कि ऐसा अंधेरा है जहां से लौटने के बाद इनसान पहले जैसा कभी नहीं रह पाता.

बड़ा शहर नेहा ने केवल फिल्मों और तसवीरों में देखा था. ऊंचीऊंची इमारतें. रात में भी दिन जैसा उजाला. सड़कों पर बिना रुके दौड़ती गाडि़यां. हर चेहरे पर जल्दी और हर कदम में बेचैनी. बस से उतरते समय उस ने आदित्य का हाथ कस कर पकड़ लिया. उसे डर भी लग रहा था और भरोसा भी था. डर इस अनजान शहर का था, और भरोसा उस हाथ का जिसे उस ने अपनी पूरी जिंदगी सम झ लिया था.

आदित्य नेहा को एक तंग सी गली में बने पुराने मकान तक ले गया. ऊपर दूसरी मंजिल पर एक छोटा सा कमरा था. कमरे में एक लोहे का बिस्तर, एक पुरानी अलमारी, एक प्लास्टिक की मेज और कोने में रखा गैस का छोटा चूल्हा. नेहा ने कमरे को देखा और मुसकरा दी, ‘‘यहीं रहेंगे हम?’’

आदित्य ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘हां, कुछ दिन. फिर सब ठीक हो जाएगा.’’

उस रात दोनों ने बाहर से सस्ता खाना मंगवाया. नेहा ने पहली बार बिना किसी डर के भविष्य की बातें कीं. उस ने कहा, ‘‘जब हमारी शादी हो जाएगी न, तब मैं सब से पहले मांपापा से माफी मांगूंगी. उन्होंने मेरे लिए बहुतकुछ किया है.’’

आदित्य ने नेहा की बात सुन कर सिर हिलाया और कहा, ‘‘हां, सब ठीक हो जाएगा.’’

नेहा को आदित्य की आंखों में वही पुराना यकीन दिखाई दिया. उसे लगा कि पिछले कुछ दिनों का तनाव अब खत्म हो गया है.

अगले 2-3 दिन आदित्य उसे शहर घुमाता रहा. कभी नदी के किनारे बने पार्क में ले जाता, कभी किसी सस्ते ढाबे में खाना खिला देता. कभी कहता, ‘‘बस 2-4 दिन और. फिर मंदिर में शादी कर लेंगे.’’

नेहा हर बार मुसकरा देती. वह अपने भीतर पल रही नई जिंदगी के बारे में सोचती और उस के चेहरे पर अनजानी ममता उतर आती.

उस ने अपने मन में उस बच्चे के लिए भी सपने बुनने शुरू कर दिए थे. उसे लगता था कि बुरा समय बस अब खत्म होने ही वाला है.

लेकिन चौथे दिन सुबह सबकुछ बदल गया. आदित्य जल्दीजल्दी तैयार होने लगा.

नेहा ने पूछा, ‘‘इतनी सुबह कहां जा रहे हो?’’ ‘‘एक जरूरी काम है. दोपहर तक लौट आऊंगा.’’

‘‘मैं भी चलूं?’’ ‘‘नहीं, तुम यहीं आराम करो,’’ आदित्य ने जातेजाते नेहा के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘दरवाजा अंदर से बंद कर लेना.’’

नेहा मुसकरा कर बोली, ‘‘जरा जल्दी आना.’’

आदित्य ने पलट कर उसे देखा और बोला, ‘‘हां.’’

दरवाजा बंद हुआ. आदित्य के कदमों की आवाज सीढि़यों से नीचे उतरती चली गई.

नेहा खिड़की के पास खड़ी हो कर आदित्य सड़क पर जाते हुए देखती रही. उसे क्या पता था कि यह उस की जिंदगी में आदित्य की आखिरी  झलक थी.

दोपहर बीत गई. शाम हो गई. रात हो गई. आदित्य नहीं लौटा.

नेहा ने कई बार फोन मिलाया. हर बार एक ही आवाज आई, ‘आप जिस नंबर से संपर्क करना चाहते हैं वह अभी स्विचऔफ है.’

नेहा ने खुद को सम झाया और बोली, ‘‘शायद किसी काम में फंस गया होगा.’’

अगला दिन भी निकल गया. फिर तीसरा. फिर चौथा. फोन अब भी बंद था.

नेहा का सब्र टूटने लगा. उस ने उन सभी दोस्तों को फोन किया जिन के बारे में वह जानती थी. किसी ने फोन नहीं उठाया. जिस ने उठाया, उस ने इतना ही कहा, ‘‘मु झे नहीं पता. बहुत दिनों से नहीं दिखा. घर पर भी नहीं है.’’

अब कमरे में रखा राशन खत्म होने लगा था. आदित्य जो थोड़ेबहुत पैसे छोड़ गया था, वे भी धीरेधीरे खत्म हो गए. कई बार नेहा केवल पानी पी कर ही सो जाती.

एक हफ्ते बाद मकान मालकिन दरवाजे पर आईं, ‘‘बेटी, किराया कब दोगी?’’

नेहा ने  िझ झकते हुए कहा, ‘‘बस, 2-3 दिन और.’’  ‘‘2-3 दिन से काम नहीं चलेगा. मकान किराए पर है, कोई धर्मशाला नहीं है.’’

नेहा ने सिर  झुका लिया. उस रात उस ने फिर आदित्य को दर्जनों बार फोन लगाया. कोई जवाब नहीं मिला.

अगले दिन नेहा काम की तलाश में निकली. वह एक दुकान पर गई, ‘‘कोई काम मिल जाएगा क्या?’’

दुकानदार ने नेहा को ऊपर से नीचे तक देखा.

‘‘इस हालत में काम करोगी? जाओ, घर पर आराम करो और अपने आदमी से कहो कि थोड़ी और मेहनत करे कि तुम्हें इस हालत में काम न करना पड़े.’’

नेहा दिनभर काम की तलाश में भटकती रही, पर किसी ने काम न दिया. शाम तक उस के पैर जवाब दे चुके थे. वह खाली हाथ लौट आई.

कुछ दिनों बाद नेहा के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा. भूख इनसान से उस का आत्मसम्मान भी धीरेधीरे छीन लेती है.

एक सुबह नेहा शहर के पुराने मंदिर के बाहर सीढि़यों पर बैठ गई. सामने आनेजाने वाले लोग कभी 2 रुपए रख जाते, कभी 5. कई लोग बिना देखे निकल जाते. कुछ लोग दया से देखते. कुछ नफरत से.

नेहा हर सिक्के के साथ थोड़ाथोड़ा टूटती जा रही थी. उसे अपने पिता याद आते, जो पसीना बहा कर कमाई हुई रोटी घर लाते थे. उसे अपनी मां याद आतीं, जो हमेशा कहती थीं, ‘‘मेहनत की कमाई सब से बड़ी दौलत होती है.’’

और आज उन की वही बेटी हाथ फैला कर बैठी थी.

एक शाम मंदिर की सीढि़यों पर बैठेबैठे नेहा के पेट में अचानक तेज दर्द उठा. दर्द इतना तेज था कि वह चीख पड़ी.

लोग इकट्ठा हो गए. किसी ने पानी दिया. किसी ने एंबुलैंस को फोन किया. कुछ ही देर में उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया.

घंटों की पीड़ा के बाद नेहा ने एक सेहतमंद बच्चे को जन्म दिया. नर्स ने बच्चे को उस की गोद में रखा. नेहा ने कांपते हाथों से उसे सीने से लगा लिया. उस की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. वह पहली बार कई दिनों बाद मुसकराई. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अब मेरे पास तुम हो.’’

उस छोटे से बच्चे ने आंखें भी नहीं खोली थीं, लेकिन जैसे उस ने अपनी मां के टूटे हुए दिल को एक पल के लिए फिर धड़कना सिखा दिया था. लेकिन जिंदगी का सब से बेरहम दौर अभी बाकी था.

सरकारी अस्पताल में नेहा तकरीबन एक हफ्ते तक भरती रही. अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच उस ने पहली बार बिना किसी डर के अपने बेटे को भरपूर देखा. उस की छोटीछोटी उंगलियां. बंद आंखें. मासूम चेहरा. जब वह अपनी नन्ही मुट्ठी उस की उंगली पर कस कर बंद कर लेता, तो नेहा को लगता जैसे उस के टूटे हुए जीवन का एक छोटा सा टुकड़ा फिर से जुड़ गया हो.

नेहा के पास न कोई अपना था, न कोई रिश्तेदार, न कोई ऐसा जो उस के सिर पर हाथ रख कर कह देता कि सब ठीक हो जाएगा. फिर भी वह हर सुबह अपने बेटे का चेहरा देख कर जीने की हिम्मत जुटा लेती. उस ने उस का नाम आरव रखा. उसे लगता था कि अगर पूरी दुनिया ने उसे छोड़ दिया है, तो भी यह छोटा सा बच्चा उस की दुनिया बन जाएगा.

अस्पताल से छुट्टी मिलने के दिन नेहा ने अपने बेटे को पुराने कपड़े में सावधानी से लपेटा और धीमेधीमे कदमों से उस कमरे की ओर चल पड़ी, जहां से उसे पूरा यकीन था कि उस की नई जिंदगी फिर शुरू होगी.

रास्तेभर वह यही सोचती रही कि मकान मालकिन को हाथ जोड़ कर कुछ दिन और मांग लेगी. कहीं कोई छोटामोटा काम मिल जाएगा. वह मेहनत करेगी. अपने बेटे को पढ़ाएगी. उसे कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने देगी. उस के मन में पहली बार भविष्य के लिए एक छोटी सी उम्मीद जगी थी.

लेकिन उस गली में पहुंचते ही नेहा के कदम वहीं रुक गए. कमरे के बाहर उस का पुराना बैग, कुछ कपड़े, टूटा हुआ स्टील का डब्बा और 2-3 किताबें धूल में पड़ी थीं. दरवाजे पर नया ताला लगा था. अंदर से किसी और परिवार के बच्चों की आवाजें आ रही थीं.

नेहा कुछ सम झ नहीं पाई. तभी मकान मालकिन बाहर निकलीं. उन्होंने नेहा को देखा और गहरी सांस ले कर बोलीं, ‘‘बेटी, मैं कब तक इंतजार करती. 6 महीने से किराया नहीं मिला था. मु झे भी घर चलाना है. मजबूरी में कमरा किसी और को देना पड़ा.’’

नेहा की आंखें भर आईं, ‘‘मेरे सामान का क्या…’’

‘‘जो था, बाहर रख दिया. बाकी कुछ खराब हो गया.’’

नेहा कुछ पल तक दरवाजे को देखती रही. यही वह कमरा था, जहां बैठ कर उस ने अपने आने वाले जीवन के कितने सपने देखे थे. आज उसी कमरे में कोई और रह रहा था. उस के हिस्से में केवल धूल में पड़ी कुछ किताबें थीं, जिन के पन्नों पर अब भी उस का नाम लिखा था.

नेहा ने चुपचाप अपना सारा सामान समेटा. अपने बेटे को सीने से लगाया और बिना कुछ कहे वहां से चल दी. उस दिन के बाद शहर की सड़कें ही उस का घर बन गईं.

सुबह नेहा मंदिरों, चौराहों और बाजारों के बाहर बैठ जाती. कोई 2 रुपए दे देता. कोई बचा हुआ खाना रख जाता. कोई उसे देख कर मुंह फेर लेता. शाम ढलते ही वह रेलवे स्टेशन पहुंच जाती. प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर, जहां रात में भीड़ कम हो जाती थी, वहीं एक खंभे के पास वह अपने बच्चे को गोद में ले कर बैठ जाती.

Heart Touching Hindi Story

कभी कोई पुराना कंबल मिल जाता, कभी अखबार बिछा कर रात काटनी पड़ती. बरसात की रातों में छत से टपकते पानी से बचने के लिए वह अपने बच्चे को सीने से चिपका कर घंटों बैठी रहती. ठंडी हवाओं में वह खुद कांपती रहती, लेकिन अपने बेटे के ऊपर अपनी चुन्नी डाल देती.

स्टेशन पर आनेजाने वाले लोग नेहा को रोज देखते. कुछ दया से देखते. कुछ हिकारत से. कुछ लोग कहते, ‘‘देखो, यह जरूर घर से भागी होगी.’’

कोई कहता, ‘‘आजकल की लड़कियां खुद अपनी जिंदगी बरबाद करती हैं.’’

नेहा सब सुनती, लेकिन कुछ नहीं कहती. क्योंकि उसे मालूम था कि सच बताने से भी कोई उस का दर्द नहीं बांट पाएगा.

कई बार रात को जब पूरा स्टेशन शांत हो जाता, दूर कहीं इंजन की सीटी सुनाई देती और प्लेटफार्म की पीली रोशनी उस के चेहरे पर पड़ती, तब वह अपने बेटे को देख कर धीरेधीरे रोने लगती.

‘‘बेटा, मु झे माफ कर देना. तुम्हारी कोई गलती नहीं थी. गलती मेरी थी. मैं ने उन हाथों को छोड़ दिया जिन्होंने मु झे चलना सिखाया था, और उस हाथ को पकड़ लिया जो बीच रास्ते में छोड़ कर चला गया.’’

नेहा की आंखों के सामने बारबार अपने पिता का चेहरा आ जाता. वह सुबह याद आती, जब पिता ने साइकिल से उसे कालेज छोड़ा था. मां याद आतीं, जो उस के बैग में बिना बताए उस के पसंद के परांठे रख देती थीं. उसे अपनी किताबें याद आतीं. अपना कमरा. अपनी मेज. अपनी अधूरी कौपियां.

नेहा को लगता, काश समय एक बार पीछे लौट जाए. काश उस दिन वह बसस्टैंड पर आदित्य से मिलने के बजाय घर लौट गई होती. काश उस ने अपने पिता की आंखों में छिपी चिंता पढ़ ली होती. लेकिन जिंदगी में ‘काश’ सब से बेबस शब्द होता है. वह केवल दिल में गूंजता है, समय को कभी वापस नहीं लाता.

दिन गुजरते गए. आरव अब बड़ा होने लगा था. जब वह अपनी मां का चेहरा देख कर हंसता, तो नेहा कुछ देर के लिए अपने सारे दुख भूल जाती. वह उसे सीने से लगा कर कहती, ‘‘तू बड़ा हो कर पढ़ेगा. बहुत पढ़ेगा. किसी की मीठी बातों में कभी अपना रास्ता नहीं खोएगा.’’

एक रात बहुत तेज बारिश हुई. प्लेटफार्म के उस कोने तक भी पानी आ गया. पूरी रात नेहा जागती रही. उस ने अपने बेटे को भीगने नहीं दिया. सुबह होने से कुछ पहले ठंडी हवा चलने लगी. कई दिनों की भूख, कमजोरी और लगातार जागने से उस की आंखें भारी हो गईं. उस ने अपने बेटे को सीने से लगा कर खंभे से पीठ टिकाई.

कुछ ही क्षणों के लिए नेहा की आंख लग गई. जब उस की नींद खुली तो सूरज निकल चुका था. उस ने आदतन अपने बच्चे को सीने से और कस कर लगाने के लिए हाथ बढ़ाया.

लेकिन… उस की बांहें खाली थीं. वह एकदम से उठ बैठी. उस ने घबरा कर इधरउधर देखा. पुराना कंबल वहीं पड़ा था. उस की चुन्नी भी वहीं थी. लेकिन आरव वहां नहीं था. एक पल के लिए उसे लगा कि शायद वह सपना देख रही है.

फिर वह पागलों की तरह प्लेटफार्म पर दौड़ने लगी, ‘‘मेरा बच्चा… किसी ने मेरा बच्चा देखा है?’’

उस की आवाज पूरे स्टेशन पर गूंज उठी. वह हर किसी से पूछती, ‘‘भैया, मेरा बेटा देखा क्या?’’

‘‘दीदी, मेरा बच्चा… अभी यहीं था.’’

कोई सिर हिला देता. कोई बिना रुके आगे बढ़ जाता. नेहा टिकट खिड़की तक भागी. चाय वाले के पास गई. कुलियों से पूछने लगी. चलती ट्रेनों के दरवाजों तक दौड़ी. हर डब्बे में  झांक कर रोती रही, ‘‘आरव… बेटा… एक बार आवाज देदे.’’

लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं आई.

घंटों तक नेहा पूरे स्टेशन पर नंगे पांव दौड़ती रही. उस के पैरों से खून निकल आया. गला बैठ गया. आंखों के आंसू सूख गए. आखिरकार वह उसी खंभे के पास लौट आई, जहां पिछली रात उस ने अपने बेटे को सीने से लगा कर सुलाया था.

नेहा जमीन पर बैठ गई. उस ने उस छोटे से कंबल को अपनी गोद में रखा. धीरेधीरे उसे सीने से लगाने लगी, जैसे उस में अब भी उस का बच्चा सो रहा हो.

नेहा की आंखें शून्य में टिक गईं. होठ कांपे, ‘‘मैं ने सब खो दिया… पहले अपने मांपापा… फिर अपना घर… फिर अपना सम्मान… और अब… अब मेरा बच्चा भी.’’

स्टेशन पर भीड़ पहले की तरह चलती रही. ट्रेनें आती रहीं. ट्रेनें जाती रहीं. लोग अपनेअपने सफर में बिजी रहे. लेकिन उस प्लेटफार्म के एक कोने में बैठी एक मां की दुनिया हमेशा के लिए रुक चुकी थी.

कहते हैं कि उस स्टेशन पर कई महीनों तक एक बिखरे बालों वाली औरत रोज हर आने वाली ट्रेन के सामने जा कर एक ही सवाल पूछती दिखाई देती थी, ‘‘क्या आप ने मेरे आरव को देखा है?’’

उस की आवाज में ऐसी पीड़ा होती थी कि सुनने वाले कुछ पल के लिए ठहर जाते, लेकिन किसी के पास उस का जवाब नहीं होता था.

और बहुत दूर, उसी छोटे से कसबे में, एक बूढ़ा पिता हर शाम अपने घर के दरवाजे पर कुछ देर तक सड़क की ओर देखता रहता है. उस की पत्नी आज भी रोटी बनाते समय एक अतिरिक्त रोटी सेंकती है. दोनों के बीच अब बातें बहुत कम होती हैं. शायद दोनों के दिल में एक ही उम्मीद अब भी जिंदा थी कि एक दिन दरवाजे पर दस्तक होगी, उन की बेटी दौड़ कर आएगी और मां के गले लग कर रोते हुए कहेगी, ‘‘मां, मैं घर आ गई.’’

लेकिन वह दस्तक आज तक कभी नहीं हुई.

– मुकेश सिंह

Story in Hindi : शादी का उपहार

Story in Hindi. जलालाबाद में खतरनाक सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे की तलहटी में भयंकर लावा उबल रहा था. ज्वालामुखी का लावा भी इतना गरम नहीं होता जितना इनसानी दिमागों में भरा नफरती लावा. एक खबर ने कट्टरपंथियों को बैठेबिठाए नफरत का गरमागरम मसाला थमा दिया था. उन की भूखप्यास इसी नफरत से पैदा और शांत होती है.

बड़े मदरसे में जो कौम की बैठक बुलाई गई थी उस में लावा उगलने वाले कितने ही ज्वालामुखी पहुंच गए थे. भले आदमी तो एक किनारे आ कर बैठ गए थे. लावा उगलने वाले ज्वालामुखियों ने लावा उगलना शुरू किया.

‘‘उस काफिर ने हमारी कौम की लड़की की तरफ आंख उठा कर भी कैसे देखा…’’ सत्तार ने गरम लावा उगलते हुए कहा.

‘‘वह काफिर का बच्चा कहीं भी हो हम उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे. वह शहर के काजी की लड़की को ले कर भागा है. उस ने हम सब का मुंह काला किया है. हम उसे जिंदा दफन कर देंगे… हमारे दीन को खराब करने वाला,’’ नौजवान आदिल ने भड़ास निकालते हुए कहा.

जब कुछ और नासम?ा से नौजवान कट्टरपंथियों ने अपनी कैंची सी जबान चला ली और उन के पास और कुछ कहने के लिए नहीं रहा तब सुल?ो हुए जमाने की खैरखबर रखने वाले वकील सुलेमान साहब बोले, ‘‘दीनी भाइयो, यह मामला ऐसा नहीं है कि इस में इतना गरम हुआ जाए. मेरी सलाह है कि कानून के दायरे में रह कर बात की जाए. हमारे मुल्क में कानून और संविधान का शासन है.’’

‘‘अरे वकील साहब, अपने कानून को अपनी जेब में रखिए,’’ सत्तार ने तैश में आ कर कहा.

‘‘सत्तार भाई, हर देश में कानून का राज है और उस के हिसाब से सजाएं भी दी जाती हैं. अपने यहां हत्या करने पर दफा 302 लगती है जिस में आजीवन कारावास से ले कर फांसी के फंदे पर भी लटकाया जा सकता है,’’ वकील सुलेमान ने फिर से सम?ाया.

तभी इब्राहिम बोला, ‘‘डराओ मत वकील साहब. हमारे लड़के मरने से नहीं डरते. हमारी कौम डरने वाली कौम नहीं है.’’

‘‘लेकिन इब्राहिम भाई, यह मामला कोई दीनी मामला नहीं है. यह तो प्रेम प्रसंग का मामला है. हर चीज में दीन को बीच में नहीं लाना चाहिए. दूसरे समाजों की लड़कियां भी तो हमारे समाज में आती हैं. वे भी इसी तरह सोचने लगें तो रोज खून की नदियां बहें. हम दीन के जिस बंद कमरे में रह कर सोचते हैं, क्या उस में खिड़कियां नहीं होनी चाहिए?’’

‘‘वकील साहब, आप कहना क्या चाहते हैं? यही कि काजी साहब की बेटी एक काफिर के साथ ही रहे और हम बुजदिलों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें?’’ इब्राहिम ने पूछा.

‘‘मेरा तो केवल इतना कहना है कि हमीदा अपनी मरजी से राजन के साथ गई है. वह बालिग है और वह अपने फैसले लेने के लिए आजाद है. अगर पुलिस उसे पकड़ कर अदालत में पेश कर भी दे और वह अपना बयान राजन के पक्ष में दे दे तो आप और हम कुछ नहीं कर सकेंगे.

‘‘किसी ने कानून को हाथ में लेने की कोशिश की तो जेल की हवा और खानी पड़ेगी. वकील होने के नाते मेरा यही कहना है कि पुलिस को कानून के मुताबिक अपना काम करने देना चाहिए. बातों के हवाई फायर करने से कोई फायदा नहीं. मेरी बात किसी को सम?ा में आई हो तो ठीक, नहीं आई हो तो आप की मरजी चाहे जो करो, मैं तो चला.’’

यह कह कर वकील सुलेमान साहब तो वहां से चले गए. उन के जाने के बाद कट्टरपंथियों ने उन की बातों की खूब मजम्मत की. जो लोग वकील साहब की बातों से सहमत थे वे कुछ न बोल सके और धीरेधीरे उस सभा से उठ कर चलते बने.

कुछ देर बाद सभा बेनतीजा खत्म हो गई. लोग बड़बड़ाते हुए अपनेअपने घरों को लौट गए. यह सुल?ो हुए वकील साहब की बातों का ही असर था कि बहता हुआ गरम लावा ठंडा हो कर बह गया.

हमीदा के पिता काजी मोहम्मद इलियास भी एक सुल?ो हुए इनसान थे. काजी होने के बावजूद वे प्रगतिशील सोच के थे. मृदुभाषी और मिलनसार थे. ऐसा नहीं था कि उन्हें हमीदा और राजन के संबंधों का पता नहीं था. हमीदा को मदरसे में पढ़ाने के बजाय उन्होंने उसे आधुनिक शिक्षा की तालीम के लिए इंगलिश मीडियम के स्कूल में पढ़ाया. उन के इस फैसले पर उन के समाज के कुछ लोगों ने उंगली भी उठाई, लेकिन उन्होंने किसी की न सुनी.

हमीदा को बीएएमएस कराने के लिए उन्होंने उसे लखनऊ भेजा. राजन को भी वही कालेज मिला जो हमीदा को मिला था. अपने शहर में भी वे एक दूसरे के सहपाठी थे, लेकिन लखनऊ में यह रिश्ता उम्र के साथ सहपाठी से प्रेमसाथी में बदल गया.

इस पर हमीदा के पापा ने उसे कौम और मजहब की दुहाई दे कर सम?ाया भी लेकिन हमीदा ने अपनी यह बात कह कर मामले को खत्म कर दिया, ‘‘पापा, मैं पुरानी, रूढि़वादी और सड़ीगली सोच के साथ जिंदगी नहीं जीना चाहती. ये मजहब और संप्रदाय लोगों ने अपने हिसाब से बनाए हैं. जब भाषाएं और बोलियां भी नहीं थी तब भी इनसान इस धरती पर था. पूरी धरती पर हम सब होमो सेपियंस की ही संतानें हैं. साइंस पढ़ कर भी अगर मूढ़ बनी रहूं तो फिर मेरे पढ़ने का क्या फायदा…’’

‘‘बेटी, फिर भी एक बार सोच ले. समाज और कौम भी तो एक सच्चाई है. हमें मजहब वालों के साथ रहना है नहीं तो अलगथलग पड़ जाएंगे.’’

‘‘पापा, मु?ो मजहब की ये जंजीरें पसंद नहीं. जिन्हें इन जंजीरों में बंध कर मजहब की गुलामी करनी है, वे शौक से करें. मैं उन्हें नहीं रोक रही हूं. इस देश का कानून और संविधान मु?ो आजादी से जीने की इजाजत देता है. फिर किसी को मेरे फैसले से परेशानी क्यों?

‘‘पापा, कहीं से तो इस की शुरुआत होगी. हम कब तक मजहब के बंद और घुटन भरे कमरे में ताला लगा कर बैठे रहेंगे. इस ताले को कभी न कभी किसी न किसी को तो तोड़ना ही पड़ेगा.’’

‘‘वह तो ठीक है हमीदा, लेकिन.’’

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं पापा. राजन मु?ो पसंद है. अब मैं किसी और के साथ रहने की सोच भी नहीं सकती. हम दोनों ने साथ रहने का फैसला कर लिया है.’’

हमीदा बेटी, मैं तो बस यह कहना चाहता था कि मैं शहर काजी हूं, कौम से बंधा आदमी हूं. इस उम्र में क्रांतिकारी फैसले नहीं ले सकता. कल तेरे फैसले के साथ मैं न खड़ा हो पाऊं तो मु?ो दोष मत देना.’’

‘‘अरे पापा, आप भी कैसी बातें करते हो… फैसला मेरा है, मैं आप को दोष क्यों दूंगी? मैं आप की मजबूरी को सम?ाती हूं.’’

इलियास सम?ा गए कि हमीदा और राजन का रिश्ता काफी आगे निकल चुका है और हमीदा की वापसी अब नामुमकिन है. वे भी नहीं चाहते थे कि उन की लाडली पर मौडर्न और सभ्य विचारों वाली उन की बेटी का यह रिश्ता खत्म हो. लेकिन वे आने वाली समस्याओं से रूबरू थे.

इस रिश्ते को एक नाम मिलते ही उन की शहर काजी की उपाधि तो जानी तय थी ही, अगर कट्टरपंथी इस के बाद उन्हें दोष देते हुए उन की दाढ़ी नोंच लें तो यह भी मुमकिन था.

लेकिन समस्या तब विकराल हो गई जब राजन के घर वालों ने एक मुसलिम लड़की को स्वीकार करने से मना कर दिया. मना ही नहीं कर दिया बल्कि राजन से सारे संबंध खत्म करने की भी धमकी दे दी. जब वे कोर्ट मैरिज कर के आए तो उन के लिए दोनों परिवारों के दरवाजे बंद हो गए.

राजन को लगता था कि उस के मम्मीपापा मान जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब वह क्या करें? जोकुछ पैसा दोनों के पास था, वह भी कोर्टकचहरी में खत्म हो गया था. कोर्ट में हमीदा के बयान भी हो गए थे. बयान वाले दिन पुलिस ने बड़ी मशक्कत से उन दोनों को कट्टरपंथियों के हाथों से बचाया था. उस दिन से वे गुमनाम जिंदगी जी रहे थे.

ऐसे में राजन का दोस्त मुकेश काम आया. वह गढ़मुक्तेश्वर में रहता था. मुकेश ने उन्हें गढ़मुक्तेश्वर बुला लिया था और एक छोटा सा, सस्ता सा रूम किराए पर दिलवा दिया. एक छोटे अस्पताल में राजन को कम सैलरी की जौब मिल गई. मजबूरी में बहुतकुछ करना पड़ता है. जैसेतैसे उन की गुजरबसर होने लगी.

नौकरी तो हमीदा को भी मिल रही थी लेकिन कुछ कारणों से राजन ने उसे अभी रूम पर ही ठहरने को कहा. सब से बड़ा कारण कट्टरपंथियों से सुरक्षा को ले कर ही था. अस्पताल सार्वजनिक जगह होती है कब, कौन आ कर उस की हमीदा को नुकसान पहुंचा दे, क्या पता.

राजन और हमीदा के परिवार वालों को नहीं पता था कि वे दोनों कहां हैं, क्या कर रहे हैं, कौन उन की मदद कर रहा है. उन दोनों को हमेशा कट्टरपंथियों का डर सताता रहता. लेकिन 1-2 महीने गुजरने पर यह डर एक हद तक कम हो गया. उन्हें लगने लगा था कि जल्दी से कोई सोच भी नहीं सकता कि वे गढ़मुक्तेश्वर में रह रहे होंगे. सच भी यही था. हर कोई यही सोचता था कि वे दोनों लखनऊ या दिल्ली जैसे बड़े शहर में रह रहे होंगे.

अगर दुनिया में उन की किसी को चिंता थी तो वे थे हमीदा के पापा इलियास. जिस दिन से उन्हें यह पता चला था कि राजन के घर वालों ने उन्हें पनाह देने से मना कर दिया है, उन की आंखों की नींद उड़ गई थी.

वे हर समय हमीदा को ले कर चिंतित रहते. रोज अखबार पढ़ते और प्रेम में लुटीपिटी लड़कियों की खबर पढ़ कर उन की रूह कांप जाती. ऐसी हर लड़की में उन्हें अपनी हमीदा नजर आती.

वे रोज शाम को अपने दोस्त वकील सुलेमान के पास जाते और उन से अपना दर्द बयान करते. सुलेमान को ही उन्होंने दोनों को गुप्त रूप से तलाशने का जिम्मा सौंप रखा था.

सुलेमान बड़ी शिद्दत से हमीदा और राजन को तलाशने में लगे थे. वे वकील थे और इस बाबत उन की जानपहचान दूरदूर तक थी. अपने तरीके से वे इस मुहिम में लगे थे. बड़े मदरसे में भी सुलेमान ने इलियास साहब के कहने पर ही बात को संभाला था. तब से शहर काजी का उन पर और ज्यादा विश्वास जम गया था.

तकरीबन 2 महीनों के बाद सुलेमान ने वह खबर शहर काजी मोहम्मद इलियास को सुनाई जिस का उन्हें बड़ी बेसब्री से इंतजार था.

अब तक उन की आंखें हमीदा के इंतजार में तकरीबन पथरा गई थीं.

सुलेमान ने खबर सुनाई, ‘‘पुख्ता खबर है काजी साहब. आप की बेटी और दामाद गढ़मुक्तेशवर में हैं.’’

फिर सुलेमान ने जितनी जानकारी मिली थी वह सब सुना दी.

काजी साहब तो खुशी के मारे पागल हो गए. उन्होंने कहा, ‘‘सुलेमान, हमें अभी चलना होगा. शाम होतेहोते पहुंच जाएंगे.’’

सुलेमान कहना चाहते थे कि सुबह चलेंगे लेकिन काजी साहब की बेचैनी देख कर उन्हें ‘हां’ कहना पड़ा.

‘‘सुलेमान, तुम अपनी कार निकालो. खर्चापानी सब मेरा. बस, मैं घर से बेटी के लिए कुछ ले आऊं,’’ यह कह कर काजी साहब घर की ओर ?ापटे.

न जाने आज उन के पैरों में कहां से इतनी ताकत आ गई थी कि चार कदम की दूरी वे एक कदम में नाप रहे थे.

घर पर उन्होंने केवल इतना बताया, ‘‘बेगम, सुलेमान के साथ जा रहा हूं. देर रात तक आऊंगा. इंतजार मत करना.’’

सुलेमान ने अभी अपनी कार ठीक से निकाली भी नहीं थी कि काजी साहब कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर ‘धम्म’ से बैठ गए.

सुलेमान ने कार को तेज रफ्तार से गढ़मुक्तेशवर की और दौड़ा दिया. समय से पहले वे वाया चांदपुर, गजरौला होते हुए गढ़मुक्तेशवर पहुंच गए.

सुलेमान को रूम तलाशने में थोड़ी देरी हुई तो काजी साहब की बेचैनी उबाल खाने लगी, ‘‘सुलेमान, तुम्हें सही से पते के बारे में जानकारी भी है कि नहीं?’’

‘‘काजी साहब, आप थोड़ा सब्र रखिए.’’

‘‘सुलेमान, जिस दिन जुदा हुई बेटी से मिलने चलोगे, उस दिन पूछना यह सवाल… तब बताऊंगा.’’

तभी सुलेमान ने कार एक गली में ले जा कर रोकी और साइकिल पर सवार एक छोटी लड़की से पूछा, ‘‘बेटी, कुंदन सिंह का मकान कौन सा है?’’

‘‘हां बेटी, कुंदन सिंह का मकान, जल्दी से बताओ,’’ काजी साहब उस लड़की का जवाब आने से पहले ही उतावले हो कर बोले.

सुलेमान और वह लड़की उन्हें अचंभे से देखने लगे कि जरूर उन के साथ कोई गड़बड़ है. इस से पहले

कि वह लड़की कुछ पूछती और बोलती, तभी बराबर के घर का दरवाजा खुला और सामने से आवाज आई, ‘‘पापा.’’

फिर क्या था. कौन बाप बेटी के इस मिलन का बखान अपने शब्दों में कर सकता है. दोनों मिले, फफकफफक कर रोए, आंसुओं से सराबोर हो गए. अगर सुलेमान उन्हें अंदर न ले जाते तो गली में ही मजमा लगना तय था.

क मरा छोटा सा था. बराबर में छोटी सी रसोई थी. उस कमरे में बिना गद्दे का एक तख्त पड़ा था. उस पर एक दरी और चादर बिछी थी. कोई कुरसी नहीं थी. साफ पता चल रहा था हमीदा और राजन कैसे अपने दिन काट रहे थे.

काजी साहब और सुलेमान चाचा को उस ने तख्त पर बिठाया. नीचे एक टाट की बोरी थी जो हमीदा ने अपने लिए बिछा ली थी. वह उन की क्या आवभगत करती, उन के लिए रसोई से पानी लाई और राजन के आने का इंतजार करने लगी जिस से कि उस से दूध मंगवा कर चाय बनाई जाए.

कुछ देर बातों का सिलसिला चला. हमीदा अपने फैसले से वाकई खुश थी. उस ने बताया, ‘‘पापा, बस कुछ ही दिनों की बात है फिर तो मैं भी उसी अस्पताल में जौब करने लगूंगी.’’

‘‘हां बेटी, सब दिन एक से नहीं होते. हिम्मत वालों के सामने कुदरत भी ?ाक जाती है. तुम ने बड़ी बहादुरी से एक संकट ?ोल लिया है, आगे की राह तुम्हारी हिम्मत देख कर खुद ब खुद आसान हो जाएगी.’’

कुछ देर और बैठने के बाद काजी साहब ने कहा, ‘‘अच्छा बेटी, अब हम चलते हैं.’’

‘‘पापा, ऐसे नहीं जाने दूंगी. राजन से मिल कर जाना. पता नहीं आज कैसे देर हो गई ? इस समय तक तो, आ जाते थे.’’

‘‘आ गया. इंतजार खत्म,’’ राजन ने अपने दोनों हाथों में सामान ले रखा था.

‘‘हमीदा, तुम जल्दी से चाय बनाओ. अब अंकल और पापा से मैं बात करूंगा.’’

हमीदा सामान ले कर रसोई में गई तो नमकीन, बिसकुट, दूध, सब्जी और दूसरे सामान देख कर चौंक गई. सोचने लगी, ‘अभी तो राजन की सैलरी मिलने की तारीख भी नहीं आई, फिर इतना सामान यह कहां से लाया. खैर चलो, कोई बात नहीं. वह तो बाद में पूछूंगी, फिलहाल चाय बनाती हूं और नमकीनबिसकुट के साथ पापा और अंकल को बढि़या सी चाय बना कर पिलाती हूं,’ उसे राजन पर गर्व हो रहा था.

खुशीखुशी चाय पीने के बाद काजी साहब बोले, ‘‘अच्छा बेटी, अब रुकने के लिए मत कहना. रात हो आई है और घर भी पहुंचना है. लो, तुम दोनों के लिए एक छोटा सा उपहार है. शादी का उपहार सम?ा कर रख लो, मना मत करना.’’

फिर काजी साहब ने हमीदा को एक बार फिर से गले लगाया तो उन की आंखों से फिर से आंसू छलक पड़े.

‘‘पापा, आप फिर से रोने लगे.’’

‘‘हां बेटी, ये रुखसती के आंसू बचा रखे थे. तु?ो डोली में बैठाते समय ये आंसू निकलते, कमबख्त अभी तक बचे पड़े थे.’’

यह सुन कर हमीदा भी रोने लगी, जैसे सचमुच बाप के कंधे पर सिर रख कर उस की रुखसती अब हो रही हो. यह देख कर सुलेमान की आंखें भी नम हो गईं. उन्होंने भी हमीदा को गले लगाया. अब सब के दिल हलके हो गए थे.

चलते समय काजी साहब ने कहा, ‘‘बेटी, हम वहीं हैं जो थे. तूफान गुजर गया है. अब मैं तुम से मिलने आता रहूंगा. तुम दोनों खुश रहना.’’

जब हमीदा और राजन उन को विदा कर के कमरे में पहुंचे तो हमीदा ने पूछा, ‘‘राजन, इतना सामान लाने के पैसे तुम्हारे पास कहां से आ गए और तुम्हें कैसे पता चला कि पापा और वकील चाचा आए हैं?’’

‘‘हमीदा, जब मैं वापस आया तो बाहर कार खड़ी देखी. मैं चुपके से तुम्हारी बातें सुनने लगा. तब मैं वापस गया और यह सामान ले आया.’’

‘‘लेकिन पैसे?’’

तभी हमीदा ने देखा कि राजन अपना बायां हाथ छिपा रहा है. उस ने उस के बाएं हाथ की कलाई पकड़ी तो उस पर घड़ी नहीं थी, जो उस ने प्यार के तोहफे के रूप में कभी राजन को उस के जन्मदिन पर भेंट की थी.

हमीदा सम?ा गई कि राजन वह सामान कैसे लाया. राजन थोड़ा सा शर्मिंदा हुआ.

तब हमीदा ने कहा, ‘‘राजन, शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं. मेरा वादा है जैसे ही मैं नौकरी शुरू करूंगी, अपनी पहली सैलरी से तुम्हें वैसी ही घड़ी तोहफे में दूंगी और तुम वादा करो तुम अब मु?ो नौकरी करने से रोकोगे नहीं…’’

‘‘बिलकुल नहीं रोकूंगा मेरी प्यारी हमीदा.’’

‘‘हां, हम दोनों खूब मेहनत करेंगे और खूब पैसा कमाएंगे,’’ जैसे ही हमीदा ने यह बात जोश में कही, उस का हाथ पापा के दिए शादी के उपहार से टकराया और वह उपहार तख्त से नीचे गिर गया.

‘‘ले पगली, कंगाली में आटा गीला. पापा का उपहार भी तू ने तोड़ दिया. मु?ो तो पहले से ही यह वजनी लग रहा था.’’

हमीदा उपहार को जल्दी से खोलने लगी. राजन बड़ी जिज्ञासा से उपहार को खुलते देख रहा था. उपहार के खुलते ही दोनों की आंखें खुली की खुली रह गईं.

500-500 रुपए की 20 गड्डियां उस पैकेट में थीं. एक छोटी सी चिट्ठी में लिखा था ‘पापा की ओर से शादी के उपहार की पहली किस्त’. Story in Hindi

Funny Family Story : सही पकड़े हैं

Funny Family Story-‘‘अदिति, हम कह रहे थे न, तेरी मेड ठीक नहीं लगती, थोड़ी नजर रखा कर उस पर, मगर तू है एकदम बेपरवाह. किसी दिन हाथ की बड़ी सफाई दिखा दी उस ने तो बड़ा पछताएगी तू. हम सही पकड़े हैं.’’ 4 दिनों से बेटी के घर आईं सुशीला उसे दस बार सचेत कर चुकी थीं. ‘‘अरे मां, रिलैक्स, आप फिर शुरू हो गईं, सही पकड़े हैं. कुछ नहीं कोई ले जाता, ले भी जाएगा तो ऐसा क्या है, खानेपीने का सामान ही तो है. हर वक्त उस पर नजर रखना अपना टाइम बरबाद करना है. आप भी न, अच्छा, मैं जाती हूं. 1 घंटा लग जाएगा मुझे. प्लीज, रत्ना (मेड) को अपना काम करने देना. वह चाय बना लाए तो मम्मीजीपापाजी के साथ बैठ कर आराम से पीना. आज छुट्टी है, बंटू, मिंकू और आप के दामाद तरुण की भी. वे देर तक सोते हैं, जगाना नहीं.’’

अदिति चली गई तो सुशीला ने गोलगोल आंखें नचाईं, ‘हमें क्या करना है जैसी भी आदत डालो, हम तो कुछ भी सब के भले के लिए ही कहते हैं.’ मेड थोड़ी देर बाद चाय टेबल पर रख गई. सुशीला भी अदिति के सासससुर तारा और तेजप्रकाश संग बैठ चाय की चुस्कियां लेने लगीं, पर शंकित आंखें मेड की गतिविधियों पर ही चिपकी थीं.

‘‘आजकल लड़कियां काम के लिए बाहर क्या जाने लगीं, घर के नौकरनौकरानी कब, क्या कर डालें, कुछ कहा नहीं जा सकता. हमें तो जरा भी विश्वास नहीं होता इन पर. निगाह न रखो तो चालू काम कर के चलते बनते हैं,’’ सुशीला बोल पड़ीं. ‘‘ठीक कह रही हैं समधनजी. लेकिन मैं पैरों से मजबूर हूं. क्या करूं, पीछेपीछे लग कर काम नहीं करा पाती और इन्हें तो अपने अखबार पढ़नेसुनने से ही फुरसत नहीं,’’ तारा ने पेपर में आंखें गड़ाए तेजप्रकाश की ओर मुसकराते हुए इशारा किया. तेजप्रकाश ने पेपर और चश्मा हटा कर एक ओर रख दिया और सुशीला की ओर रखे बिस्कुट अपनी चाय में डुबोडुबो कर खाने लगे.

‘‘आप तो बस भाईसाहब. भाभीजी तो पांव से परेशान हैं पर आप को तो देखना चाहिए. मगर आप तो बैठे रहते हो जैसे कोई घर का बंदा अंदर काम कर रहा हो. हम आप को एकदम सही पकड़े हैं,’’ सुशीला कुछ उलाहना के अंदाज में बोलीं. उन की आंखें चकरपकर चारों ओर रत्ना को आतेजाते देख रही थीं. रत्ना कपप्लेट ले जा चुकी थी. ‘काफी देर हो चुकी, पता नहीं क्या कर रही होगी,’ उन्हें और बैठना बरदाश्त नहीं हुआ. वे उठ खड़ी हुईं और उसे किचन में पोंछा लगाते देख यहांवहां दिखादिखा कर साफ करवाने लगीं. ‘‘ढंग से किया कर न, कोई देखता नहीं तो क्या मतलब है, पैसे तो पूरे ही लेती हो न?’’ उन का बारबार इस तरह से बोलना रत्ना को कुछ अच्छा नहीं लगता.

‘‘और कोई तो ऐसे नहीं बोलता इस घर में, अम्माजी आप तो…’’ रत्ना हाथ जोड़ कर माथे से लगा लिया करती. कभी अकेले में अन्य सदस्यों से शिकायत भी करती. 10 बज गए, मिंकी और बंटू का दूध और सब का नाश्ता बना मेज पर रख कर रत्ना चली गई तो सुशीला ढक्कन खोलखोल कर सब चैक करने लगीं.

‘‘अरे, दूध तो बिलकुल छान कर रख दिया पगलेट ने, जरा भी मलाई नहीं डाली बच्चों के लिए. ऐसे भला बढ़ेंगे बच्चे.’’ वे दोनों गिलास उठा कर किचन में चली आईं. दूध के भगौने में तो बिलकुल भी मलाई नहीं थी. ‘जरूर अपने बच्चों के लिए चुरा कर ले जाती होगी, कोई देखने वाला भी तो नहीं, बच्चों का क्या, वैसे ही पी जाते होंगे,’ सुशीला मन ही मन बोलीं. तभी प्लेटफौर्म पर वाटर डिस्पोजर की आड़ में से झांक रहे मलाई के कटोरे पर उन की नजर पड़ी. वे भुनभुनाईं, ‘सही पकड़े हैं, महारानीजी हड़बड़ी में ले जाना भूल गई.’ उन्होंने गोलगोल आंखें घुमाईं और एक चम्मच मलाई मुंह में डाल कर बाकी मलाई दूध के गिलासों में बांटने जा रही थीं कि तेजप्रकाश आ पहुंचे, कटोरा हाथ में लेते हुए बोले, ‘‘अरे, क्या करने जा रही थीं बहनजी. बच्चे तो मलाई डला दूध मुंह भी नहीं लगाएंगे, थूथू करते रहेंगे. मौडर्न बच्चे हैं.’’

‘‘तभी तो रत्ना की ऐश है. मलाई का कटोरा छिपा कर अपने घर ले जा रही थी, पर भूल गई. हम सही पकड़े हैं.’’ ‘‘अरे, नहीं बहनजी, मैं ने ही उस से कह रखा है, हफ्तेभर बाद तारा सारी इकट्ठी मलाई का घी बनाती है. घर के घी का स्वाद ही और है. आप तारा के पास बैठिए, मैं इसे डब्बे में डाल कर आता हूं.’’

‘‘यह भी ठीक है,’’ वे बालकनी में तारा के पास आ बैठीं. ‘‘हम से तो यह खटराग कभी न हुआ.’’

‘‘कैसा खटराग?’’ ‘‘यह देशी घी बनाने का खटराग, भाईसाहब बता रहे हैं, हफ्ते में एक बार आप बना लेती हैं.’’

‘‘हां, इस बार ज्यादा दिन हो गए. दूध वाला अब सही दूध नहीं ला रहा, इतनी मलाई ही नहीं आती.’’ ‘‘अरे नहीं, आज भी मलाई से तो पूरा कटोरा भरा हुआ था. हमें तो लगता है आप की रत्ना ही पार कर देती होगी, कल से चौकसी रखते हैं, रंगेहाथ पकड़ेंगे.’’

बंटू, मिंकी और तरुण भी ब्रश कर के आ गए थे. ‘गुडमौर्निंग दादू, दादी, नानी, सही पकड़े हैं,’ कहते हुए बंटू, मिंकी उन से लिपट कर खिलखिला उठे.

‘‘गुडमौर्निंग टू औल औफ यू. आइए, चलिए सभी नाश्ता करते हैं, अदिति पहुंच ही रही होगी. चलोचलो बच्चो…’’ तरुण ने मां को सहारा दिया और डायनिंग टेबल तक ले आया. ‘‘भाईसाहब तो फीकी चाय पीते होंगे?’’ सुशीला ने केतली से टिकोजी हटाते हुए पूछा.

‘‘बहनजी, बस 2 चम्मच चीनी,’’ स्फुट स्वरों में बोल कर कप में डालने का इशारा किया तेजप्रकाश ने. ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं मम्मीजी, पापा को शुगर बरसों से है, कंट्रोल कर के रखा है, तब भी बौर्डर पर ही है. एक बार इन्हें दिल में बहुत जोर का दर्द उठा, डाक्टर के पास गए नहीं, पर प्रौमिस किया कि अब से मक्खन, चीनी नहीं खाएंगे. बस, तब से मक्खन वगैरा भी बंद. मां को तो शुगर नहीं है पर वे एहतियात के तौर पर अपनेआप ही नहीं लेतीं. आप बैठिए मम्मीजी, मैं निकालता हूं,’’ तरुण ने कहा.

‘‘अरे गैस थी, खाली पेट में वही चढ़ गई थी. खामखां लोगों ने एनजाइना समझ लिया और जबरदस्ती प्रौमिस ले लिया,’’ तेजप्रकाश ने सफाई दी. ‘‘ऐसे कैसे? शुक्र मनाइए कि खयाल रखने वाला परिवार मिला है, भाईसाहब. इतना लालच ठीक नहीं. जबान पर तो कंट्रोल होना ही चाहिए एक उम्र के बाद. वैसे भी, हमें इस उम्र में खुद भी अपना ध्यान रखना चाहिए,’’ सुशीला ने शुगरपौट तरुण की ओर बढ़ा दिया. तेजप्रकाश ने चीनी की ओर बढ़ता हुआ अपना हाथ मन मसोस कर पीछे खींच लिया. ‘‘तब तो चीनी का बहुत कम ही खर्चा आता होगा यहां. मिंकू, बंटू को देख रही हूं दूध में चीनी नहीं लेते पर सुबह से कई सारी चौकलेट खाने से उन का शुगर का कोटा पूरा हो जाता होगा, दामादजी भी बस आधा चम्मच, अदिति तो पहले ही वेट लौस की ऐक्सरसाइज व डाइट पर रहती है,’’ सुशीला सस्मित हो उठीं.

जिम से लौटी अदिति ने भी हाथ धो कर टेबल जौइन कर लिया, ‘‘अरे मम्मी, कहां हिसाबकिताब ले कर बैठ गईं. चीनी हो या चावल, अपनी रत्ना बड़ी परफैक्ट है, सब हिसाब से ही लाती, खर्च करती है. हम तो कभीकभी ही दुकान जा पाते हैं, उसी ने सब संभाला हुआ है.’’ वह चेयर खींच कर आराम से बैठ गई और कप में अपने लिए चाय डाल कर चीनी मिलाने लगी. तभी तेजप्रकाश ने उस से इशारे से रिक्वैस्ट की तो उस ने चुपके से आधा चम्मच चीनी तेजप्रकाश के कप में मिला दी.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, सिर पर बिठा कर रखो महारानीजी को. एक दिन वही ऐसा गच्चा देगी तब समझ में आएगा. और भाईसाहब ने 2 शुगरफ्री डाले हैं. तू ने उन के कप में चीनी क्यों मिलाई अदिति?’’ सुशीला बोली थीं. ‘‘अरे मम्मी, अभी पापाजी का सबकुछ नियंत्रण में है, बिलकुल फिट हैं. काफी वक्त से कोई दर्द भी उन्हें दोबारा नहीं हुआ. बैलेंस के लिए सबकुछ थोड़ाथोड़ा खाना सही है. लाल और हरीमिर्च भी तो आप मानती नहीं, बहुत सारी खाती रही हैं खाने में ऐक्स्ट्रा नमक के साथ, वह क्या है? खाने के बाद एक चम्मच मलाईचीनी, रबड़ीचीनी या मक्खनचीनी के बिना आप का पेट साफ नहीं होता, वह क्या है? जबकि डाक्टर की रिपोर्ट है आप के पास. आप को सब मना है. बीपी भी है और आप को हार्ट प्रौब्लम भी. अच्छा है कि आप मेरे पास हैं, सब बंद है.’’

‘‘अरे तू हमारी कहां ले बैठी, वह तो 4-5 साल पहले की बात है. मुंह बंद कर, चुपचाप अपना नाश्ता कर,’’ सुशीला ने आंखें नचाते हुए अदिति को कुछ ऐसे डांटा कि सभी मुसकरा उठे. ब्रेकफास्ट के बाद, तरुण और अदिति स्टोर जा कर महीनेभर का कुछ राशन और हफ्तेभर की सब्जी व फल ले आए. सुशीला डायनिंग टेबल पर फैले विविध सामानों को किचन में ले जा कर सहेजती रत्ना को बड़े गौर से देख रही थीं. रत्ना दोबारा लंच बनाने आ चुकी थी.

सुशीला की तेज नजरें सप्ताह बाद ही तेजी से खत्म हो रहे सामनों का लेखाजोखा किए जा रही थीं. खास चीनी, मक्खनमलाई, देशी घी, चाय, कौफी, मिठाई, बिस्कुट्स, नमकीन की खपत पर उस का शक 15 दिनों के भीतर यकीन में बदलने लगा.

एक दिन रंगेहाथ पकड़ेंगे रत्ना महारानी को. अदिति तो उस के खिलाफ सुनने वाली नहीं, तरुण को झमेले में पड़ना नहीं, भाभीजी को तो धर्मकर्म से फुरसत नहीं और भाईसाहब के तो कहने ही क्या. वे कहते हैं, ‘रत्ना के सिवा कौन ऐसा करेगा, वह काम समझ चुकी है, उस के बिना घर कैसे चलेगा, इसलिए उसे बरदाश्त तो करना ही होगा, कोई चारा नहीं. नजरअंदाज करें, बस.’ यह भी कोई बात हुई भला? बच्चों को पकड़ती हूं अपने साथ इस चोर को धरपकड़ने के मिशन में. अगले हफ्ते से ही बच्चों की गरमी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं. वे चोरसिपाही के खेल में खुशीखुशी साथ देंगे. तब तक हम अकेले ही कोशिश करते हैं, सुशीला ने दिमाग दौड़ाया.

रत्ना दिन में 3 बार काम करने आती थी. सुबह सफाई करती, बरतन मांजती और फिर नाश्ता बनाती. फिर 12 बजे आ कर लंच बनाती. और फिर शाम को आ कर बरतन साफ करती. शाम का चायनाश्ता, डिनर बना जाती. रत्ना के आने से पहले सुशीला तैयार हो जाती और उस के आते ही दमसाधे उस पर निगाह रखने में जुट जाती. हूं, सही पकड़े हैं, जाते समय तो बड़ा पल्ला झाड़ कर दिखा जाती है कि देख लो, जा रहे हैं, कुछ भी नहीं ले जा रहे, पर असल में वह अपना डब्बाथैला बाहर ऊपर जंगले में छिपा जाती है. काम करते समय मौका मिलते ही इधर से उधर कुछ उसी में सरका जाती है. सुशीला ने जाते वक्त उसे थैलाडब्बा जंगले से उठाते देख लिया था. कल चैक करेंगे, थैले में क्या लाती है और क्या ले जाती है,’ वह स्फुट स्वरों में बुदबुदा रही थी.

दूसरे दिन रत्ना जैसे ही आई, सुशीला मौका पाते ही बाहर हो ली. जंगले पर हाथ डाला और सामान उतार कर चैक करने लगी. ‘यह तो पहले ही इतना भरा है. दूध, कुछ आलूबैगन, 2-4 केले, आटा, थोड़ी चीनी उस ने फटाफट सामान का थैला फिर से ऊपर रख दिया और अंदर हो ली. पिछले घर से लाई होगी, आज ले जाए तो सही,’ सुशीला सोच रही थीं. रत्ना झाड़ू ले कर बाहर निकल रही थी, उस से टकरातेटकराते बची.

‘‘क्या है, थोड़ा देख कर चला कर, कोई घर का बाहर भी आ सकता है,’’ कह कर सुशीला अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराई, जैसे अब तो जल्द ही उस की करनी पकड़ी जाने वाली है. ‘‘जी अम्माजी,’’ वह अचकचा गई, उस अर्थपूर्ण मुसकराहट का अर्थ न समझते हुए वह मन ही मन बुदबुदा उठी, ‘अजीब ही हैं अम्माजी.’

तेजप्रकाश आधा कटोरा मलाई खा कर प्रसन्न थे कि चलो, अच्छा है कि बहनजी का रत्ना पर शक यों ही बना रहे. जब सब सो रहे होते, वे अपनी जिह्वा और उदर वर्जित मनपसंद चीजों से तृप्त कर लिया करते. हालांकि, सुशीला की जासूसी से उन के इस क्रियाकलाप में थोड़ी खलल पैदा हो रही थी.

‘गनीमत यही हुई कि मैं ने सुशीला बहनजी और बच्चों की प्लानिंग सुन ली,’ तेजप्रकाश सतर्क हो मन ही मन मुसकरा रहे थे. ‘बच्चों की छुट्टियां क्या शुरू हुईं, जासूसी और तगड़ी हो गई. मक्खनमलाई, मीठा खाना दुश्वार हो गया. अभी तक तो एक ही से उन्हें सावधान रहना था, अब तीनतीन से,’ तेजप्रकाश के दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे. सोचा, क्यों न बच्चों को अपनी ओर कर लिया जाए. और जो सब से छिपा कर सुशीला बहनजी अपने बैग से लालमिर्च का अचार और हरीमिर्च, नमक, खटाई अलग से खाती हैं, उस तरफ लगा देता हूं. अभी तक तो मैं ने नजरअंदाज किया था पर ये तो रत्नारत्ना करतेकरते अब मुझ तक ही न पहुंच जाएं, इसलिए जरूरी है कि मैं बच्चा पार्टी को इन की ओर ही मोड़ दूं. यह ठीक है. यह सब सोचते हुए तेजप्रकाश के चेहरे पर मुसकान फैल गई. वे शरारती योजना बुनने में लग गए.

‘‘बंटू, मिंकू इधर आओ,’’ तेज प्रकाश ने उन्हें धीरे से बुलाया. सुशीला कमरे में बैठी थीं. तारा के पैरों की मालिश वाली मालिश कर रही थी. तरुण, अदिति और रत्ना जा चुके थे. ‘‘मामा वाली चौकलेट खानी है?’’ बच्चों ने उतावले हो कर हां में सिर हिलाया.

‘‘यह जो नानी का बैग देख रहे हो, जिस में नंबर वाला लौक पड़ा है. इस में से नानी रोज निकाल कर कुछकुछ खाती रहती हैं, मुझे तो लगता है बहुत सारी इंपौर्टेड चौकलेट अभी भी हैं, जो आते ही इन्होंने तुम्हें दी थीं. तुम्हारे मामा ने तुम लोगों के लिए दी थीं इन्हें. पहले खाते हुए पकड़ लेना, फिर मांगना.’’ वे जानते थे कि बहनजी को स्वयं कहना कतई श्रेयस्कर नहीं होगा, अतएव खुद नहीं कहा. ‘‘सही में दादू, पर उन्होंने तो कहा था खत्म हो गई हैं,’’ दोनों एकसाथ बोले.

‘‘वही तो पकड़ना है. अब से जरा आतेजाते नजर रखना.’’ ‘‘ओए मिंकू, मजा आएगा. अब तो दोदो मिशन हो गए. अपनीअपनी टौयगन निकाल लेते हैं, चल…’’ दोनों उछलतेकूदते भाग जाते हैं. तेजप्रकाश मुसकराने लगे.

सुबह से दोनों बच्चों की धमाचौकड़ी होने लगती. दोनों छिपछिप कर जासूस बने फिरते. सुशीला अलग छानबीन में हैरानपरेशान थीं. आखिर मक्खनमलाई डब्बे से, कनस्तर से चीनी, मिठाई फ्रिज से, सब कैसे गायब हुए जा रहे हैं. रत्ना है बड़ी चालाक चोरनी.

रत्ना पर बेमतलब शक किए जाने से, उस की खुंदस बढ़ती ही जा रही थी. वह चिढ़ीचिढ़ी सी रहती. लगता, बस, किसी दिन ही फट पड़ेगी कि काम छोड़ कर जा रही है. कई बार अम्माजी डब्बे खोलखोल कर दिखा चुकी हैं कि ताजी निकाली सुबह की कटोराभर मलाई आधी से ज्यादा साफ, मक्खन पिछले हफ्ते आया था, कहां गया? परसों ही 2 पैकेट मिठाई के रखे थे, कहां गए? महीनेभर की चीनी 15 दिनों में ही खत्म. कितनी जरा सी बची है? मैं तो नहीं खाती, ले जाती नहीं, पर सही में ये चीजें जाती कहां हैं? वह भी सोचने लगी. कैसे पकड़ूं असली चोर, और रोजरोज के शक से जान छूटे. वह भी संदिग्ध नजरों से हर सदस्य को टटोलने लगी.

उस दिन रत्ना घर की चाबी प्लेटफौर्म पर छोड़ आई, आधे रास्ते जा कर लौटी तो तेजप्रकाश को फ्रिज में मुंह डाले पाया. वे मजे से एक, फिर दो, फिर तीन गपागप मिठाइयां उड़ाए जा रहे थे. उस का मुंह खुला रह गया. वह एक ओट में छिप कर देखने लगी. जब वह मिठाइयों से तृप्त हुए तो मलाई के कटोरे को जल्दीजल्दी आधा साफ कर, बाकी पहले की इकट्ठी मलाई के डब्बे में उलट कर अगलबगल देखने लगे. मूंछों पर लगी मलाई को देख कर रत्ना को हंसी आने लगी. जिसे एक झटके में उन्होंने हाथों से साफ करना चाहा.

‘‘सही पकड़े हैं…बाबूजी आप हैं और अम्माजी तो हमें…’’ वह हैरान हो कर मुसकराई. तेजप्रकाश दयनीय स्थिति में हो गए, चोरी पकड़ी गई. याचना करने लगे थे. ‘‘सुन, बताना मत री किसी को. सब की डांट मिलेगी सो अलग, चैन से कभी खाने को नहीं मिलेगा. यदि बीमार होऊं तो परहेज भी कर लूं, पहले से क्या, इतनी सी बात किसी के पल्ले नहीं पड़ती,’’ उन्होंने बड़ी आजिजी से कहा.

रत्ना उन की हालत देख कर हंसने लगी, ‘‘ठीक है, नहीं कहूंगी बाबूजी, पर एक शर्त है, अम्माजी को तो आप समझाओ कैसे भी कर के, हर वक्त वे मेरे पीछे पड़ी रहती हैं.’’ ‘‘तू चिंता मत कर उस का बंदोबस्त हो जाएगा.’’

उन के दिमाग में शरारती योजना घूम ही रही थी पर अब बच्चों को नहीं शामिल कर सकते, बच्चे तो सब को ही बता देंगे. फिर मैं सुशीला बहन को ब्लैकमेल कैसे कर पाऊंगा कि रत्ना को इन से बचा सकूं और रत्ना से अपने को. वरना तरुण, अदिति, तारा सब तक मेरी बात पहुंच गई तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा. सिर्फ परहेजी खाना, उफ्फ… क्यों बढि़याबढि़या मिठाईरबड़ी न खाऊं, मरे हुए सा सौ साल जियूं इसलिए… तो जीने का फायदा क्या?’ मनपसंद चीजों का दिमाग में खुला इंसायक्लोपीडिया देशी घी के बेसन के लड्डू, चमचम, रसमलाई… उन्हें बेचैन किए जा रहा था.

‘कुछ भी हो, सुशीला बहन को मुझे जल्दी, अकेले ही रंगेहाथ पकड़ना होगा. वरना रत्ना, बहनजी से तंग आ कर सब को मेरा सच बता देगी और मैं सूक्ष्म फलाहारी, परहेजी बाबा बन कर कहीं का नहीं रहूंगा.’ दिन में खाने के बाद एक घंटे बच्चों का सोने का टाइम और रात के खाने के बाद 9 बजे के बाद का समय, जब सुशीला बहन सब से नजरें बचा, अपना मिर्चखटाईर् का शौक पूरा करती होंगी क्योंकि नाश्ता भले ही साथ कर लेती हैं पर आदत का बहाना बता कर रात के खाने का अपना अलग ही टाइम बना रखा है, तभी पकड़ता हूं. अपने को बचाने का यही एक चारा है,’ तेजप्रकाश दिमाग की धार तेज किए जा रहे थे. आखिरकार दूसरे दिन ही सुशीला जैसे ही अपना खाना परोस कर कमरे में ले गईं, तेजप्रकाश दबेपांव उन के पीछे हो लिए. सुशीला ने पास पड़े स्टूल पर अपना खाना, पानी रखा, दरवाजा भेड़ा और परदा खींच कर तसल्ली से बैग का लौक खोल कर पसंदीदा लालमिर्च का अचार बड़े प्रेम से निकाला और साथ में चटपटी पकी इमली भी. प्लेट में नमक के ऊपर सजी बड़ीबड़ी 2 हरीमिर्चें देख परदे के पीछे खड़े तेजप्रकाश के मुंह से सीसी निकल रही थी, उस पर से यह और कि कैसे खा पाती हैं ये सब.’

सुशीला के खाना शुरू करते ही तेजप्रकाश सामने आ गए, ‘‘सही पकड़े हैं बहनजी, इतना सारा मिर्चखटाई. अदिति सही कहती है इतना मना है आप को पर चुपकेचुपके… बहुत गलत बात है.’’ वे उन का तकियाकलाम बोल कर उन्हीं के अंदाज में आंखें नचा रहे थे. सुशीला उन्हें सामने पा घबरा कर कातर हो उठीं. लिहाजन, तेजप्रकाश उन के कमरे में कभी वैसे आते न थे.

‘‘अअआप भाईसाहब, यहां, कैसे, बब…बैठिए. प्लीज, अदिति को कुछ मत कहिएगा,’’ वे खिसियाई सी बोलीं. ‘‘सही तो नहीं, पर इस उम्र में मन का खाएगा नहीं, तो आदमी करे क्या?’’

इस बात पर सुशीला थोड़ी हैरान हुईं, फिर सहज हो कर मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘आप भी ऐसा ही मानते हैं. मैं तो घबरा ही गई थी. आप प्लीज, बताना नहीं किसी को.’’ ‘‘ठीक है, नहीं बोलूंगा, पर एक शर्त है. आप भी मेरे बारे में नहीं कहेंगी किसी से.’’

‘‘पर क्या?’’ वे सोच में पड़ गईं, ऐसा क्या है जो… ‘‘दरअसल, वह जो आप मलाई, मिठाई, चाय, चीनी सब के गायब होने के पीछे रत्ना को कारण समझती हैं, वह रत्ना नहीं, बल्कि मैं हूं.’’

‘‘क्या?’’ सुशीला का मुंह खुला रह गया. फिर वे मुंह दबा कर हंसने लगीं. ‘‘तारा, तरुण, अदिति सब मेरी जान खा जाएंगे, प्लीज.’’

‘‘फिर ठीक.’’ वे चटखारे ले कर अपना खाना खाने लगीं. ‘‘आप खाओगे?’’

‘‘नहीं बहनजी, आप मजे लो, मैं रसोई में जा कर अपनी तलब पूरी करता हूं, खौला कर स्ट्रौंग चाय बनाता हूं.’’ ‘‘इस समय?’’

‘‘आप पियोगी, बहुत बढि़या पकाने वाली मसालेदार मीठी कड़क?’’ उन के चेहरे पर राहत की मुसकान थी. ‘‘अरे नहीं, आप ही मजे लो,’’ कहती हुई उन्होंने लालमिर्च, अचार मुंह में भर लिया और हंसने लगीं.

‘‘यह भी खूब रही. और हां, बच्चों को जो चोर पकड़ने के लिए लगाया है, मना कर देना.’’ मुसकराते हुए तेजप्रकाश राहत से रसोई की ओर बढ़ गए. सोचते जा रहे थे कि ‘मैं भी कल बच्चों को कोई कहानी बना कर बहनजी को पकड़ने से मना कर दूंगा.’

इधर आंखें बंद किए बंटू और मिंकू दादू की स्टोरी से आज सो नहीं पाए थे. दादू उन्हें सोया जान कर अपने रूम में चले गए. काफी देर तक यों ही पड़े रहे. खट से हलकी सी आवाज क्या हुई, आंखें खोल कर दोनों ने एकदूसरे को कोहनी मारी. ‘‘उठ न, नींद नहीं आ रही. कोई है, लगता है.’’

‘‘हां, दादू की कहानी आज बहुत शौर्ट थी.’’ ‘‘दादू तो सोने गए, अब क्या करें?’’

‘‘सब सो गए हैं लगता है, रसोई में छोटी लाइट जल रही है. चल चोर को पकड़ते हैं.’’ दोनों पलंग से उतर कर अपनीअपनी टौयगन थाम लीं और सधे कदमों से कहतेफुसफुसाते हुए नन्हे जासूस मिशन पर चल पड़े. ‘‘तू इधर से जा बंटू, मैं उधर से, अकेला डरेगा तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल भी नहीं.’’ ‘‘अच्छा, तो यह मम्मी का स्टौल पकड़, अगर चोरी करते कोई दिखे, पीठ पर गन लगाना और झट से स्टौल में फंसा कर चिल्लाना. सही पकड़े हैं नानी के जैसे. खूब मजा आएगा.’’

‘‘रात के एक बज रहे थे. ताली मार कर दोनों अलगअलग दिशाओं में चल पड़े.

तेजप्रकाश और सुशीला स्वाद व खुशबू का पूरा मजा ले भी न पाए कि बच्चों ने अलगअलग पर लगभग एकसाथ उन्हें धर पकड़ा और खुशी से चिल्लाए, ‘‘सही पकड़े हैं दादू…, पापा…, मम्मी…सही पकड़े हैं नानी…, मम्मी… पापा…, सब जल्दी आओ.’’

घबराए से तेजप्रकाश किचन में मलाई की चोरी बयान करती अपनी मूंछों के साथ खौलती मसालेदार कड़क चाय को देख रहे थे तो कभी सामने गुस्से में खड़े तरुण को और सुशीला अपने खुले हुए बैग से झांकती लालमिर्च, अचार और मसालेदार इमली की खुली शीशियों को, तो कभी आगबबूला हुई नजरों से उन्हें देखती अदिति को देख कर नजरें चुरा रही थीं. ‘‘अदिति, देखो अपने लाड़ले पापाजी क्या कर रहे हैं, बड़ा विश्वास है न तुम्हें इन पर?’’

‘‘शांत हो जाओ तरु, आगे से ऐसा नहीं होगा.’’ ‘‘और तुम अपनी चहेती मम्मीजी को देखो, डाक्टर ने सख्त मना किया है पर मानना ही नहीं, बच्ची बनी हुई हैं, मुझ से छिपा कर रखा था, छिपा कर, देखो ये…’’ वह एक हाथ में शीशी दूसरे से मम्मीजी को थामे रसोई में आ गई.

‘‘अदिति, सुन तो, अब ऐसा नहीं होगा.’’ तेजप्रकाश और सुशीला के हाथ बरबस अपनेअपने कानों तक चले गए, ‘‘देखो, इस बार हम सही पकड़े हैं… पर अपनेअपने कान…’’ सुशीला ने गोलगोल आंखें नचा कर कुछ यों कहा कि तरुण, अदिति की हंसी छूट गई.

‘‘कोई हमें भी तो बताए क्या हुआ,’’ दादी तारा की आवाज सुन बंटू, मिंकू भागे कि उन्हें कौन पहले बताएगा कि आज वे कैसे दादू, नानी की चोरी सही पकड़े हैं. Funny Family Story

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