Story. पिता का खेत बेच कर अमेरिका जाने वाले गगनदीप ने वहां जो देखा, वह रंगीन अमेरिका तो बिलकुल नहीं था. क्या अपनी मिट्टी बेच कर वह डौलर कमा पाया?
खन्ना के उस छोटे से गांव में उस दिन लड्डू बंट रहे थे. गुरबचन सिंह का सब से छोटा बेटा गगनदीप अमेरिका जा रहा था.
सुबह से ही लोग बधाई देने आ रहे थे, ‘‘वाह भाई गुरबचन, अब तो तेरे भी डौलर आएंगे.’’
गुरबचन सिंह बस मुसकरा देते. भीतर खुशी भी थी और एक ऐसी बेचैनी भी, जिसे वे कह नहीं पा रहे थे.
आंगन में गगनदीप की मां बारबार बैग खोल कर देख रही थीं, ‘‘ऊन का स्वेटर रख लिया? दवाएं?’’ ‘‘हां मां, रख लीं,’’ गगनदीप की आंखों में केवल अमेरिका था. उसे लगता था, कुछ घंटों बाद जिंदगी बदल जाएगी.
चारपाई पर बैठा गगनदीप का सब से करीबी दोस्त परमजीत चुपचाप सब देख रहा था. दोनों बचपन से साथ पढ़े, कबड्डी खेले थे, लेकिन पिछले 2 सालों में गगनदीप बदल गया था. जहां पहले वह फसल देख कर खुश होता था, अब वही खेत उसे पिछड़ापन लगते थे.
एक दिन गगनदीप ने परमजीत से कहा था, ‘‘यार, सच बताऊं... इस देश में रखा ही क्या है? रोजगार नहीं, सिस्टम नहीं... यहां तो बस मिट्टी में मिट्टी होना है. जिंदगी बनानी है तो अमेरिका जाना पड़ेगा.’’
परमजीत ने कहा था, ‘‘देश छोड़ना बुरा नहीं है गगन, लेकिन अपने देश को छोटा समझना ठीक नहीं.’’
गगनदीप हंस पड़ा था, ‘‘ये बातें वही करते हैं जिन्हें कभी मौका नहीं मिला.’’ उस दिन परमजीत ने बहस नहीं की. बस इतना कहा, ‘‘ठीक है. लौट कर मिलना, फिर बात करेंगे.’’ ‘‘लौटना? मैं? कभी नहीं,’’ गगनदीप ने जवाब दिया था.
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