सर्दियों की हलकी धूप उस छोटे से कसबे की गलियों में बिखरी हुई थी. सुबह के 8 बजे थे. सड़क किनारे चाय की टपरी पर भाप उड़ाती चाय की चुसकियों के साथ अखबार की हैडलाइंस पर एक गहरी चर्चा चल रही थी.

उसी कसबे में एक 2 कमरों के छोटे से घर में रहने वाली 19 साल की नेहा स्कूल की यूनिफौर्म पहन कर आईने के सामने खड़ी थी. एक हाथ से अपने बाल संवार रही थी और दूसरी ओर उस की नजर बारबार मेज पर करीने से रखी किताबों पर दौड़ रही थी.

चूंकि आज उसे इम्तिहान देने जाना था, बाहर आंगन में उस के पिता साइकिल तैयार कर रहे थे ताकि समय पर उसे इम्तिहान सैंटर पहुंचा सकें, जबकि रसोई में उस की मां टिफिन बनाते हुए आवाज लगा रही थीं, ‘‘नेहा, बेटा नाश्ता कर लो, नाश्ता तैयार है.’’

नेहा बिना कुछ बोले अपनी तैयारी में जुटी रही. आखिर वह उस परिवार का एकमात्र उम्मीद थी और उस पर उस के पिता को हद से ज्यादा भरोसा था. उस के पिता अनंत एक सरकारी दफ्तर में चपरासी थे. महीने की सीमित तनख्वाह से किसी तरह घर चलता था.

कई बार महीने के आखिरी दिनों में मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बेटी की पढ़ाई पर आंच नहीं आने दी. उन का एक ही सपना था कि उन की बेटी पढ़लिख कर अफसर बने और वह जिंदगी जी सके जो वे खुद कभी नहीं जी पाए.

नेहा पढ़ाई में बहुत तेज थी. स्कूल में हमेशा फर्स्ट आती थी. महल्ले के लोग अकसर उस की मिसाल दिया करते थे. उस के पिता जब भी किसी से मिलते तो गर्व से कहते कि ‘मु झे नेहा को अफसर बनाना है’ और यह कहते ही उन की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी.

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