Crime Story: पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश पर लगाया गोबर

Crime Story: आ नेमुल्लमाशब्द तो सुना ही होगा. किसी धातु पर सोने या चांदी की पतली परत चढ़ाना, जिस से वह चमकने लगे और कीमती दिखे, जैसेकलईयागिलट’. पर क्या आप ने यह सुना है कि एक मांबाप ने अपनी ही बेटी को मार कर उस की लाश को वहां रखा, जहां वे अपने पालतू पशु बांधते थे और पकड़े जाने की सूरत में पुलिस को गुमराह करने के लिए उस लाश पर जानवरों का गोबर लगा दिया गया था?


इज्जत की खातिर अपनी औलाद को मारने का यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके का है. औनर किलिंग की भेंट चढ़ी उस लड़की का नाम ज्योति था, जिस की लाश 20 जनवरी, 2023 को गांव के चौकीदार मनोज कठेरिया ने बरामद की थी. उस का परिवार भोगांव के मौजेपुर गांव में अपने घर से गायब था.


दरअसल, अशोक यादव नाम के एक शख्स की 24 साल की बेटी ज्योति के पास ही के एक गांव के रहने वाले नौजवान से प्रेम संबंध थे और वह उसी से शादी करना चाहती थी, पर परिवार वाले इस बात पर राजी नहीं थे. इसी तनातनी के चलते अशोक यादव ने अपनी पत्नी और बेटों की मदद से 19 जनवरी, 2023 की रात के 12 बजे ज्योति की गला दबा कर हत्या कर दी और पास ही बने अहाते में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया था.


इस घटना के दूसरे दिन अशोक यादव के घर में ताला लगा देख कर गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी. घटना की एफआईआर गांव के ही चौकीदार मनोज कठेरिया ने अशोक यादव, उन की पत्नी रामा देवी, बेटे अमित, अनुज और अवनीश के खिलाफ दर्ज कराई थी. लेकिन ट्रायल के दौरान ज्योति के मांबाप ने दावा किया था कि उस ने खुदकुशी की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि मनोज कठेरिया ने सिंचाई को ले कर हुए एक झगड़े के चलते एफआईआर दर्ज कराई थी, क्योंकि उस की खेती की जमीन उन की जमीन से सटी हुई थी.


पर सुबूतों और गवाहियों के बाद अब उत्तर प्रदेश की मैनपुरी कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जहेंद्र पाल सिंह ने ज्योति के मांबाप को उस की गला घोंट कर हत्या करने और लाश को खेत में दफनाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुना दी. इतना ही नहीं, कोर्ट ने सुबूतों की कमी के चलते ज्योति के तीनों भाइयों को बरी कर दिया और हर कुसूरवार पर 60,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया. Crime Story   

Hindi Story: सच्चे प्यार की पहचान

Hindi Story: बनसारी नदी उफान पर थी. परसेहरा गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. ऊंची जाति की विधवा सरिता ने अपना सामान बांध लिया था. पर वह बाढ़ में फंस गई. इतने में जोखू मछुआरा नाव ले कर आया. क्या वह सरिता को बचा पाया?

पूरे इलाके में हल्ला मचा हुआ था कि बनसारी नदी बढ़ी चली रही है. ननका बांध से और भी ज्यादा पानी छोड़ दिया गया है. इस के बाद अभी और भी पानी छोड़ा जाने वाला है. परसेहरा गांव के लोगों में एक अजीब सी बेचैनी और दहशत फैल रही थी, क्योंकि बाढ़ का पानी तो कर चला जाता है, पर अपने पीछे तबाही और भुखमरी के निशान छोड़ जाता है, जिस का असर महीनों तक देखने को मिलता रहता है और बाढ़ में जाने कितनों की जानें भी चली जाती हैं.
इस गांव के लोगों को आज भी याद है कि 3 साल पहले भी बाढ़ आई थी और अपने साथ सबकुछ बहा ले गई थी.

तब लोगों के घरों और फसलों का नामोनिशान तक नहीं मिला था.
सरकार द्वारा मुआवजा देने का ऐलान तो कर दिया गया था, पर सरकारी काम में घालमेल के चलते वह मुआवजा किस को मिला, यह आज तक कोई नहीं जान सका. गांव में बाढ़ के आने पर लोग अगर समय रहते ऊंची जगह पर पहुच जाते तो जान बच सकती थी, पर इस गांव में एक ही ऊंची जगह थी, जहां पर बाढ़ का पानी नहीं जा सकता था और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की तीमंजिला हवेली, पर पिछली बार बाढ़ आने पर जब गांव के लोगों ने नाथ सिंह से शरण मांगी थी, तो ठाकुर ने अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोला था.


ठाकुर गांव के गरीब और छोटी जाति के लोगों को अपनी हवेली में घुसने नहीं देना चाहता था, क्योंकि छोटी जाति के लोगों के अंदर जाने से उस की हवेली गंदी हो जाती और वैसे भी नीची जाति के लोगों का हवेली में आना ठाकुर नाथ सिंह की शान के खिलाफ था. गांव के बहुत से लोग हवेली के ऊंचे दरवाजे को बड़ी उम्मीद के साथ पकड़े रहे थे और फिर अचानक से आई पानी की तेज धार उन्हें अपने साथ बहा ले
गई थी.


3 साल पहले के जख्म अभी भर भी नहीं पाए थे कि अब फिर से गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. सभी लोग खौफजदा थे और अपने घरों का सामान बांध कर उसे ऊंची दीवारों पर या किसी और महफूज जगह रखने की कोशिश कर रहे थे. इस अफरातफरी में सरिता नाम की एक औरत भी थी, जो बिलकुल भी नहीं घबरा रही थी. ‘‘मैं ने इतने उतारचढ़ाव और दुख देख लिए हैं कि अब किसी बाढ़ या तूफान से मुझे डर नहीं लगता,’’ अपनेआप में ही बुदबुदा रही थी सरिता, जो 35 साल की एक विधवा थी और गांव के स्कूल में टीचर थी. उस का पति भी इसी गांव में ठाकुर के यहां काम करता था, पर एक सड़क हादसे में उस की जान चली गई थी.


सरिता अकेली रह गई थी, पर उस ने साहस नहीं छोड़ा था और खुद नौकरी कर के अपनी गुजरबसर शुरू कर दी थी. भले ही सरिता ने अपनेआप को बिजी कर लिया था, पर उस का शरीर तो अभी भरपूर जवान ही था और जवानी की अपनी कुछ मांगें होती हैं. सरिता का शरीर भी ऐसी ही मांग करता था. सरिता जब रात में बिस्तर पर लेटती थी तो उस का मन करता था कि कोई उसे अपनी बांहों में भींच ले और उस के पूरे शरीर को तब तक सहलाए जब तक कि वह मदहोश हो जाए. पर एक विधवा होने के नाते वह लोकलाज के डर से ऐसे खयाल आते ही अपने विचारों को  देती थी और ठंडे पानी से हाथमुंह धो कर सोने की कोशिश करती थी.


ऐसा नहीं था कि विधवा सरिता से कोई शादी करने को तैयार नहीं था, कई रिश्ते भी आए पर सरिता इन आए रिश्तों के पीछे लोगों की मंशा और कमाऊ पत्नी के पैसे पर मजे करने की नीयत को सम? गई थी और हर आए रिश्ते को वह ठुकरा देती थी. गांव में ही जोखू नाम का गरीब मछुआरा था, जो सरिता को दूर से खूब घूरघूर कर देखता था. ‘‘क्या जोखू, काहे मास्टरनी को इतना घूरे जाते हो…’’ सत्तू ने पूछा तो सकुचाते हुए जोखू ने बताया था कि सरिता उसे बहुत अच्छी लगती है. ‘‘पर वह तो एक विधवा है,’’ सत्तू
ने कहा.


‘‘तो क्या हुआ, विधवा भी औरत ही होती है. उस के भी जी होता है,’’ जोखू ने कहा पर साथ ही साथ वह अच्छी तरह से जानता था कि गोरे रंग की सरिता कभी भी एक मछली पकड़ने वाले और शक्ल से काले से दिखने वाले आदमी से शादी नहीं करेगी. वैसे भी सरिता एक ऊंची जाति की औरत थी और जोखू एक मछुआरा, इसीलिए तो जोखू ने कभी सरिता से अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वह तो सरिता को दूर से ही आतेजाते देखता और खुश हो लेता था.


गांव में स्थानीय नेता राजेश कुमार के गुरगे जीप दौड़ा कर ऐलान कर रहे थे कि लोग घबराए नहीं, नेताजी की तरफ से आप लोगों को महफूज रखने की पूरी कोशिश की जाएगी और आप लोगों को इस बार बाढ़ आने पर बिलकुल भी परेशानी नहीं होगी. इस के लिए गांव के स्कूल की छत पर ही एक राहत शिविर लगाया जा रहा है, जहां पर आप लोगों को जरूरत की सारी चीजें मिलेंगी. राजेश कुमार बाढ़ जैसी आपदा के समय इस तरह के हथकंडों से अपना वोटबैंक पक्का करना चाहता था.


सरिता ने अपना कुछ सामान 2 बक्सों में समेट कर चारपाई पर रख दिया और फिर पाए के नीचे 4-4 ईंटें लगा कर चारपाई को ऊंचा कर दिया. हालांकि, इतने से वह सामान महफूज नहीं रहने वाला था, क्योंकि बाढ़ के पानी का लैवल काफी ऊंचा रहता था. फिर भी सरिता ने राहत की सांस ली थी. पानी अभी गांव में नहीं घुसा था और रात हो चली थी. सरिता ने दाल और चावल  बनाए और खा लिए. बाकी का खाना एक बरतन में रख दिया, फिर चारपाई के किनारे बैठ गई.


सभी को डर था कि बाढ़ का पानी रातबिरात गांव में घुस सकता है, इसलिए सब लोग सावधान रहे.
दिनभर के काम से थकीहारी सरिता की आंख लग जाती थी. वह बारबार आंख खोल कर देख लेती थी कि पानी गांव में तो नहीं गया, पर देर रात तक तो पानी गांव की सरहद के बाहर ही था. सरिता अचानक से हड़बड़ा कर जागी थी. उस ने देखा कि पानी उस के कमरे के अंदर गया था. चारपाई के पाए के निचले हिस्सों को पानी छूने लगा था. गांव में अलग तरह का शोर फैला हुआ था. लोगों के पानी में निकलने की आवाजें रही थीं और जानवर रंभा रहे थे. सरिता समझ गई थी कि उस ने देर कर दी है.

समय रहते उसे राहत शिविर में चले जाना चाहिए था, पर मन में यकीन था कि हो सकता है इस बार बाढ़ गांव के अंदर कर बाहर से ही चली जाए, तभी तो वह अपनी चारपाई पर ही बैठी रही थी, लेकिन अब तो खतरा सामने ही गया था. अब उसे इसी गंदे पानी में से निकल कर राहत शिविर या और किसी महफूज जगह जाना होगा. सरिता ने अपनी साड़ी को घुटनों तक किया और पानी में पहला कदम रखा, फिर धीरेधीरे कमरे के बाहर तक आई. बाहर का सीन डरावना था. चारों ओर पानी ही पानी था. सरिता का मन पानी देख कर घबरा उठा था. इतने पानी में वह कैसे चल पाएगी? पर हौसला कर के वह तकरीबन 500 मीटर ही चल पाई थी कि उस की हिम्मत जवाब दे गई थी.


पानी के हलके वेग की लहरों से सरिता के पैर टक्कर नहीं ले पा रहे थे और सरिता को लगा कि अब वह गिर जाएगी, पर ठीक तभी जोखू एक नाव ले कर गया. उस नाव पर गांव के छोटे बच्चे, 2-4 औरतें और कुछ बुजुर्ग पहले से ही बैठे हुए थे. जोखू ने सरिता को इशारे से नाव में बैठ जाने को कहा. सरिता जैसेतैसे कर के नाव में बैठ गई थी. जोखू ने नाव को स्कूल की तरफ मोड़ दिया, जहां पर राहत शिविर लगाया गया था. स्कूल पहुंच कर जोखू ने नेता राजेश कुमार के गुरगों और सरकार के लोगों से उन्हें शरण देने की बात कही, पर उन में से एक आदमी ने जोखू को धक्का देते हुए कहा, ‘‘यह राहत शिविर गांव के ऊंची जाति के लोगों के लिए है, छोटी जाति के लोग कहीं दूसरी जगह जा कर अपना जुगाड़ करें.’’ जोखू को बहुत गुस्सा आया, पर वह कुछ  नहीं कर सका.


जोखू ने सरिता से कहा, ‘‘मास्टरनीजी, आप यहां उतर जाओ, क्योंकि आप ऊंची जाति की हो. आप
को ये लोग रख लेंगे. हम लोग देखते हैं कि हमें क्या करना है.’’ सरिता ने भी सरकारी लोगों का बरताव देखा था और उसे भी अच्छा नहीं लगा था. उस ने जोखू की आंखों में देखा और कुछ सोच कर नाव से उतरने से मना कर दिया. सरिता नाव से नहीं उतरी तो जोखू को भी अच्छा महसूस हुआ और उस का जोश दोगुना हो गया. वह तेजी से नाव खेने लगा. नाव गांव में भरे पानी में इधरउधर जा रही थी, पर उन लोगों को अब एक ऐसी जगह की तलाश थी, जहां पर वे खानापीना बना कर खा सकें और आने वाले कुछ दिन वहां पर रह भी सकें.


नाव पर बैठे लोग अपनीअपनी राय दे रहे थे, पर जोखू को पता था कि ऐसी जगह तो पूरे गांव में एक ही है और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की हवेली. जोखू ने बिना कुछ कहे हवेली की तरफ नाव मोड़ दी थी और हवेली के गेट के बाहर पहुंच कर ही दम लिया था. नाव पर बैठे लोगों की आंखों में कोई चमक नहीं उभरी थी, क्योंकि वे सब जानते थे कि ठाकुर नाथ सिंह अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोलेगा और ही किसी तरह की कोई मदद करेगा. ‘‘यह हिम्मत और एकता दिखाने का समय है. जैसा हम कहते हैं वैसा ही करना, नहीं तो बाढ़ में हम सब मारे जाएंगे,’’ यह कहने के साथ ही जोखू ने अपनी योजना सब को बता दी थी.


नाव पर बैठे लोग पानी में उतर कर हवेली के गेट तक गए और फिर उसे खटखटाने लगे. शोर सुन कर हवेली के गार्ड गांव वालों को डांटने लगे. इसी बीच ठाकुर नाथ सिंह भी अपनी छत पर पानी का जायजा लेने पहुंच गया था. इधर, जोखू अपना मछली पकड़ने का जाल ले कर पानी में तैरते हुए हवेली के पीछे छोटे गेट के पास पहुंच गया. उस ने मछली पकड़ने के जाल को दीवार पर फंसाया और उस के सहारे दीवार पर चढ़ गया, फिर आसानी से हवेली के अंदर उतर गया. जोखू एक योजना के तहत काम कर रहा था. हवेली के एक कमरे में उस ने देखा कि ठाकुर की 14 साल की बेटी मोबाइल चला रही है.


कालेकलूटे जोखू को देख कर वह घबरा उठी थी, पर जोखू ने उसे चुप रहने का इशारा किया और उस के मुंह पर हाथ रख कर उस के कान में कहा कि वह उन लोगों की मदद करे, नहीं तो गांव के सारे लोग मारे जाएंगे. लड़की को कुछ सम? नहीं आया. जोखू तकरीबन धकेलते हुए उस लड़की को ले कर छत पर ठाकुर के सामने पहुंच गया और ठाकुर से हवेली का गेट खोल कर गांव वालों को हवेली के अंदर पनाह देने की बात कही और ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को भी कहा. ठाकुर नाथ सिंह अपनी बेटी की हिफाजत के प्रति संजीदा था.

वह जानता था कि मछुआरा जोखू आज पूरी तैयारी कर के आया है. हो सकता है कि उस के पास कुछ हथियार भी हो और वह आज कुछ भी कर सकता है. नाथ सिंह ने मौके की नजाकत  समझकर फैसला कर लिया था. ठाकुर इस इस समय निहत्था और लाचार था, इसलिए उस ने हवेली का गेट खोल कर सिर्फ 15-20 गांव वालों को अंदर आने की छूट दे दी, पर साथ में यह शर्त भी रख दी कि ये लोग हवेली की छत के एक कोने में रहेंगे और शोरशराबा भी नही करेंगे. जोखू ने तुरंत ही ठाकुर की हर बात मान ली थी.
लोग हवेली के अंदर रहे थे. बुजुर्गों को तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने ठाकुर की हवेली के अंदर पैर रखा है. वे डरेसहमे हुए से बढ़े चले जा रहे थे.


बुजुर्गों और औरतों को छत पर छोड़ने के बाद जोखू फिर से बाहर की ओर जाने लगा, तो सरिता अनायास ही बोल पड़ी, ‘‘अरे जोखू, अब कहां जा रहे हो. थोड़ा दम तो ले लो, पानी तो पीते जाओ.’’ जोखू से पहली बार किसी औरत ने इतने प्यार से कुछ पूछा था. उसके मन में सरिता के प्रति दबा हुआ प्यार दस गुना हो चला था. जोखू कुछ देर तक सरिता द्वारा खुद का नाम पुकारे जाने के रस में डूबा रहा, फिर कुछ देर बाद जोखू ने उसे बताया कि वह नाव ले कर गांव के और लोगों की मदद और उन्हें महफूज जगह पर ले कर जाने के लिए जा रहा है. जाखू की यह बात सुन कर सरिता भी जबरन उस के साथ हो ली.


सरिता के कपड़े भीगे हुए थे. वह नाव पर जोखू के पास ही सिमट कर बैठ गई थी. सरिता ने देखा कि कैसे जोखू लोगों के घरघर जा कर उन की मदद करने में लगा हुआ था. 3 साल पहले आई बाढ़ के बाद गांव वालों ने बालू और मिट्टी से कुछ टीले बना लिए थे, ताकि फिर से कभी बाढ़ के आने पर काम सकें. आज वही समय गया था. कुछ लोगों को जोखू ने उन ऊंचे टीलों पर पहुंचाया, तो कुछ को पंचायत भवन की छत पर. शाम तक जोखू भले ही थक कर चूर हो गया था, पर उसे संतोष था कि कम से कम गांव के लोग बाढ़ के पानी से महफूज तो हैं.


शाम ढली तो हवेली की छत पर बैठे गांव के लोगों ने छत पर ही अलगअलग हिस्सों में खाना बनाना शुरू कर दिया. आज किसी का हिस्सा बंटा नहीं था. कोई किसी से तेल मांग रहा था, तो कोई किसी से नमक और लोग एकदूसरे के पास जाजा कर खाने का मजा भी ले रहे थे. आज हवेली की छत पर बैठे गांव के अलगअलग घरों के लोग एक परिवार जैसे बन गए थे. सरिता ने भी खाना बना कर जोखू को खिलाया और खुद उस के बाद खाया. सरिता और जोखू के लिए छत पर लेटने के लिए जगह नहीं थी, तो सरिता नीचे के बरामदे के एक कोने में चादर डाल कर लेट गई, जबकि जोखू पास में ही बैठ गया. शायद उसे लेटने में ?ि?ाक लग रही थी. बाढ़ के चलते बिजली तो पहले ही जा चुकी थी और अब ठाकुर की हवेली भी अंधेरे में नहा रही थी.


सरिता को रात में ठंड लगने लगी, तो उस की आंख खुली और उस ने घोर अंधेरे में कोशिश कर के देखा कि जोखू भी नंगी फर्श पर सिकुड़ा हुआ लेटा है. सरिता को जोखू पर दया भी आई और प्यार भी उमड़ पड़ा. वह रात के अंधेरे में भूल गई थी कि वह एक विधवा है. इस समय वह केवल एक औरत थी. उसे जाने क्या सू? कि वह भी जोखू के पास लेट गई और अपना एक हाथ जोखू के मजबूत सीने पर रख दिया. इस समय भी जोखू के बदन से मछलियों जैसी महक रही थी, पर जोखू के प्यार में पगी हुई सरिता को आज यह सब अच्छा लग रहा था.


अचानक जोखू ने करवट ली और सरिता को अपनी मजबूत बांहों में कस  लिया था. सरिता ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह भी हर एक छुअन से और भी मचल जाती थी. वे दोनों एकदूसरे के बदन को सहलाते और चूमते रहे थे. जब जोखू को लगा कि सरिता ने पूरी तरह समर्पण कर दिया है, तो वह उस के शरीर में प्रवेश कर गया और सरिता के मुलायम अंगों पर अपनी हथेली घुमाता रहा. तपती धरती पर जाने कितने सालों के बाद आज पानी बरसा था और यह बरसात पूरी रात में कई बार होती रही थी.
सुबह हो चुकी थी. सरिता और जोखू एकदूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. ‘‘हम तुम से ब्याह करना चाहते हैं. क्या तुम भी हम से ब्याह करोगी?’’ जोखू ने सकुचाते हुए पूछा, तो सरिता कुछ नहीं बोल सकी. उस की चुप्पी में ही उस की हां छिपी हुई थी.


गांव से पानी उतर कर निकल जाने में पूरे 2 दिन लग गए थे. बाढ़ का पानी अपने साथ सबकुछ बहा ले गया था. बाढ़ के जाने के बाद फसल का काफी नुकसान तो हुआ ही था, पर इस बार की बाढ़ ने ठाकुर की अकड़ खत्म कर दी थी. बाढ़ ने ठाकुर नाथ सिंह को यह संदेश भी दिया था कि ऊंट चाहे जितना भी ऊंचा क्यों हो एक दिन तो पहाड़ के नीचे आता ही है. अगर गांव के लोगों ने एकता नहीं दिखाई होती, तो इस बार भी लोग बाढ़ में बह गए होते. हालांकि, इस बाढ़ ने भी लोगों से फिर से काफीकुछ छीन लिया था, पर बाढ़ खत्म होने के बाद सरिता और जोखू ने शादी कर ली थी और दोनों खुशी से रहने लगे थे. सच्चे प्यार की यही तो पहचान होती है. Hindi Story

Film: ओ रोमियो – क्या गुस्सैल ‘कबीर सिंह’ को भी मात देगा शाहिद कपूर का नया किरदार ‘हुसैन उस्तरा’

Film: शाहिद कपूर एक बार फिर अपने इंटेंस अवतार में नजर आने वाले हैं. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ओ रोमियो’ का पहला लुक टीजर रिलीज होते ही चर्चा में आ गया है. टीजर में शाहिद का उग्र और रॉ अंदाज दर्शकों को उनके किरदार ‘कबीर सिंह’ की याद दिला रहा है. इस दमदार टीजर ने फिल्म को लेकर फैंस की उत्सुकता और भी बढ़ा दी है.

फिल्म मेकर्स का कहना है कि यह फिल्म ‘वास्तविक घटनाओं पर आधारित है. इस दावे के सामने आते ही इंटरनेट मीडिया पर अटकलें शुरू हो गई हैं. दर्शक कयास लगा रहे हैं कि फिल्म की कहानी मुंबई के गैंगस्टर हुसैन उस्तरा, बदले की आग में जलती सपना दीदी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की असल गैंगवार से जुड़ी हो सकती है. टीजर देखने के बाद से ही लोग हुसैन उस्तरा की असली कहानी जानने को बेताब हैं.

हुसैन उस्तरा (फिल्म में शाहिद कपूर) : यह मुंबई का कुख्यात गैंगस्टर था जो अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम गैंग से जुड़ा था. वह कॉन्ट्रैक्ट किलर था. कई हत्याओं में उसका नाम भी आया था. हुसैन बेहद बेरहम और हिंसक अपराधी था. अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसका नाम डर का पर्याय बन गया था.

मशहूर क्राइम जर्नलिस्ट एस. हुसैन जैदी की किताबों ‘डोंगरी टू दुबई’ और ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ में बताया गया है कि हुसैन उस्तरा पहले दाऊद गैंग के लिए काम करता था, बाद में मतभेद और सत्ता की लड़ाई के चलते अलग हो गया.

हुसैन उस्तरा की हत्या दाऊद के गुर्गों द्वारा ही की गई थी. वे दाऊद को सीधी चुनौती दे रहे थे और सपना दीदी की मदद कर रहे थे, इसलिए दाऊद की डी कंपनी ने उन्हें रास्ते से हटा दिया. हुसैन उस्तरा की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड इतिहास का चर्चित अध्याय मानी जाती है.

सपना दीदी (फिल्म में तृप्ति डिमरी) : अशरफ खान उर्फ ‘सपना दीदी’ के पति, महमूद कालिया, की हत्या दाऊद इब्राहिम ने मुंबई एयरपोर्ट पर पुलिस एनकाउंटर (कथिततौर पर सेटअप) के जरिए करवाई थी. पति की मौत का बदला लेने के लिए अशरफ खान ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और ‘सपना दीदी’ बनीं.

‘उस्तरा’ नाम की वजह : हिंसक लड़ाई करने और अपने दुश्मन के शरीर पर उस्तरे से एक लंबा घाव करने की वजह से उसे ‘उस्तरा’ नाम दिया गया था.

रिलीज और बॉक्स ऑफिस क्लैश

विशाल भारद्वाज की यह रोमांटिकथ्रिलर फिल्म 13 फरवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. बॉक्स ऑफिस पर इसकी सीधी टक्कर शनाया कपूर और आदर्श गौरव की रोमांटिक और एडवेंचर मूवी ‘तू या मैं’ से होगी. Film

Geo Politics: गहरी पैठ

Geo Politics. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार की गैरकानूनी घुसपैठियों की धरपकड़ और कानूनी ढंग से आए छोटे से गुनाहगारों को वापस भेजने की पौलिसी ने अब देश के बेरोजगार युवाओं का अमेरिकी ड्रीम खत्म कर दिया है. खेत और मकान बेच कर लाखों रुपए लगा कर असलीनकली वीजा ले कर अमेरिका या कई देशों में घूमनेघामने के लिए घुसना अब बेकार है. हालांकि अभी भी लाखों भारतीय लड़के वहां हैं और कम से कम भारत से ज्यादा कमा रहे हैं.


अमेरिका में कमाई इसलिए हो रही है क्योंकि गोरे अमेरिका ने अपना कुछ खास सामान जैम मोबाइल की तकनीक, इंटरनैट, यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप, एक्स दुनियाभर को खरीदने की लत डाल दी है. कुछ अमेरिकी युवाओं की देन जिस पर बाहर के अक्लमंद लोगों ने दिमाग लगाया, ने अमेरिका को मालामाल कर दिया है और वहां के गोरे समझ रहे हैं कि उन के पास दुनिया की चाबी है.


अमेरिकी ड्रीम अभी फिलहाल ठंडा हुआ है पर बंद नहीं हुआ है क्योंकि अब गोरे अमेरिकी उसी तरह मौजमस्ती के आदी हो गए हैं जैसे हमारे यहां के पंडेपुजारी और उन के पौलिटिकल सरकारी नौकर बिजनैसमैन भक्त. अमेरिकियों से अब काम नहीं हो पाएगा. अमेरिका में सैकड़ों पंजाबी युवा बड़ेबड़े ट्रक चला रहे हैं क्योंकि गोरे हट्टेकट्टे भी उस तरह की मुसीबत वाला मेहनती काम नहीं करना चाहते. खेतों में ट्रैक्टरों, थ्रैशरों को चलाना, लोडिंगअनलोडिंग करना, टैक्सियां चलाना, सफाई करना जैसा काम या तो वहां के कालों के हाथों में है या भारत जैसे देशों से गए लोगों के हाथों में.

पंजाब से गए लड़कों को  कर के भी इतनी अंगरेजी जाती है कि वे दूसरे देशों के भगोड़ों से ज्यादा अच्छा काम पा लेते हैं. इस के बावजूद डंकी रूट अब ठंडा तो रहेगा. दूसरे देशों में भाषा की दिक्कत रहेगी. यूरोप के देशों में अब भारतीय मूल के लोग दिख जाएंगे पर उन्हें यूरोप में सैटल होने में वक्त लगता है. यूरोप के देश छोटेछोटे हैं, लोग छोटेसंकरे मकानों में रहते हैं, जहां छिपने की जगहें कम हैं. यूरोपीय दूसरे लोगों को आसानी से मिलाते भी नहीं हैं.


जरमनी, नार्वे, स्वीडन, फ्रांस सब देशों में अब बाहरी लोगों को आने से रोकने की मांग बढ़ने लगी है. जब से मुसलिम कट्टरपंथी गोलियों की बरसात करने लगे हैं और हिंदू कट्टरपंथी हर गोल पत्थर को पूजने लगे हैं हर पेड़ की जड़ को पानदान समझने लगे हैं, साफसुधरा, डिसिप्लिन वाले यूरोपीयन बाहरी लोगों को सिरदर्द समझने लगे हैं.


भारत के युवा वर्ग के पास अब एक ही काम है, किसी मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे से चिपक जाओ और मुफ्त की खाओ. जब तक इस देश में बेवकूफ भक्त हैं, बहुत से अपनी मेहनत का एकचौथाई तक निठल्लों के खिला देंगे. डोनाल्ड ट्रंप की पुलिस के डर में रहने से यहां रहो और दूसरों को डरा कर रहो. हाथ में एक लाठी और अपने जैसे 6-7 का साथ होना वसूली के लिए काफी है.

कांग्रेस को केरल में कौर्पोरेशनों, नगर निकायों, जिला पंचायतों के चुनावों में अपनी ही तरह के भाजपा विरोधी लैफ्ट फ्रंट के मुकाबले अच्छी बढ़त मिली है. हालांकि भाजपा को भी कुछ फायदा हुआ है पर यदि भाजपा की अलगाववादी हिंदूमुसलिम पौलिसियां चलती रहीं और वहां भी हर चर्च और मसजिद के नीचे हिंदू मंदिर निकलने लगे तो वह लैफ्ट और कांग्रेस दोनों को हरा देगी.


भाजपा की खासीयत है कि उस की पुरोहितों की जमात पिछले 50 सालों से रातदिन एक कर के लोगों को पौराणिक हिंदू धर्म का पाठ बड़ी तेजी से पढ़ा रही है. चूंकि पौराणिक हिंदू धर्म के शिकार के लोगों के पास लिखने की कलम है, पढ़ने की समझने वे बहकावे में कर अपनी रोजीरोटी की जगह राम, शिव और किसी और देवीदेवता को बचाने में जुट जाते हैं.


अगर एक को सिर्फ 5 लोग 500 लोगों  को हर रोज बारबार सुनाते रहें तो कुछ दिनों में 500 में से
200-250 उस को सच मानने लगते हैं. भाजपा ने ऐसे लोगों की फौज तैयार कर ली है जो ?ाठ को फैलाने की ही नौकरी करते हैं. उन्हें पैसे भी मिलते हैं, साधन भी मिलते हैं और चूंकि उन के पास केंद्र सरकार है, वे सैकड़ों के फंसे काम भी करवा सकते हैं.


जब अपना काम निकलवाना होता है तो  सच मानने में हर्ज नहीं होता. हर राज्य हमेशा यही करता रहा है. आखिर यह देश यों ही 2,000 साल उन लोगों का गुलाम नहीं बना जो यहां सिर्फ व्यापार करने या इसे लूट कर लौट जाना चाहते थे. इन लुटेरों और व्यापारियों को जल्दी ही पता चल गया था कि यहां के लोग आसानी से ?ाठ का शिकार बन जाते हैं. उन्होंने पहले यहीं के  बोलने को साथ मिला लिया, उन को उन का हिस्सा दिया पर खुद बड़ा हिस्सा खाने लगे, यहीं रह कर.


1947 में हम आजाद हुए पर नाकाम करने वाले  से छुटकारा मिला. वे अलगअलग शक्ल में आते रहे हैं. कभी एक पार्टी और ?ांडे के नाम पर तो कभी दूसरी के नाम पर. जो सुधार दिखता है वह साइंस की बदौलत है. यह सुधार अफ्रीका में भी हुआ, तिब्बत में भी हुआ, सहारा के रेगिस्तान में भी हुआ. आज देश में फिर मंदिर ज्यादा बन रहे हैं, फैक्टरियां कम. धर्म की दुकानें ज्यादा बन रही हैं, स्कूलकालेज कम.
लोगों को बहकाने और बरगलाने की कीमत देश ने पहले भी दी है, आज भी दे रहा है और आगे भी देगा. केरल एक कोना बचा था जहां लोग समझदार, पढ़ेलिखे थे. अब वह भी अनपढ़ों का राज्य बनता जा रहा है, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की तरह का. Geo Politics                                  

Girlfriend के प्‍यार में पगलाए बेटे ने मैरिज एनीवर्सरी के दिन किया मांबाप का कत्‍ल

आएदिन ऐसी दिल दहला देने वाली खबरें सुनने को मिलती हैं कि रिश्ते तारतार होते नजर आते हैं. आज अपने ही अपनों के दुश्मन बन रहे हैं. ऐसी ही खौफनाक वारदात दिल्ली के नेब सराय में हुई, जिस में कुल का दीपक कहलाए जाने वाला बेटा ही कातिल बन गया और अपने मातापिता व बड़ी बहन को मौत के घाट उतार दिया.

राजेश कुमार (51) सेवानिवृत्त सेना अधिकारी थे. उन की पत्नी कोमल (46) और बेटी कविता (23) को बेटे अर्जुन (20) ने मौत के घाट उतार दिया व खुद को निर्दोष साबित करने के लिए सुबह टहलने चला गया, जिस से किसी को भी उस पर शक न हो, लेकिन अपराध छिपाए नहीं छिपता.

पुलिस को अर्जुन पर शक होने पर हिरासत में लिया. पूछताछ में अर्जुन ने अपने बयान में पुलिस को बताया कि उस के पिता नें अर्जुन व उस की प्रेमिका को जलील किया था, जिस के बदले की आग में उस ने अपने पिता समेत मां और बहन को भी मार दिया.

वारदात को दिया ऐसे अंजाम

अर्जुन का अपने मातापिता से अच्छा रिश्ता नहीं था. वह दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्र है, साथ में एक प्रशिक्षित मुक्केबाज भी है और उस ने कई पदक भी जीते हैं. उस के पिता उस की पढ़ाई व व्यवहार को ले कर चिंतित थे, जिस कारण वह अधिकतर डांट खाता, लेकिन कुछ समय पहले ही उस के पिता ने अर्जुन को एक लड़की के साथ बाजार में देखा, जो कि अर्जुन की गर्लफ्रैंड थी.

उस ने अपने पिता से शादी का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन उस के पिता ने पड़ोसियों व उस की गर्लफ्रैंड के सामने ही उस की पिटाई कर दी, जिस बात से उस के मन में अपने पिता के प्रति घृणा बढ़ गई और वह परिवार से अलगथलग महसूस करने लगा और उसी दौरान उसे पता चला की उस के पिता अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति उस की बहन के नाम छोड़ना चाहते हैं, तो उस ने पितामाता व बहन तीनों की हत्या करने की ठान ली और मातापिता की शादी की सालगिरह (4 दिसंबर) के दिन अपनी योजना को अंजाम दे दिया.

 

कानून के टप्पेबाजी…

लेखक- सुरेशचंद्र मिश्र  

पैट्रोलपंप मालिक संजय पाल जब कानपुर के थाना किदवईनगर पहुंचे, तब दोपहर के 12 बज रहे
थे. थानाप्रभारी अनुराग मिश्रा थाने में मौजूद थे और क्षेत्र में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए अपने अधीनस्थ अफसरों से विचारविमर्श कर रहे थे.
संजय पाल ने उठतीगिरती सांसों के बीच उन्हें बताया, ‘‘सर, मेरे साथ टप्पेबाजी हो गई. 2 टप्पेबाज युवकों ने मेरी कार से नोटों से भरा बैग पार कर दिया. बैग में 10 लाख 69 हजार रुपए थे, जिसे मैं अपने ड्राइवर अरुण पाल के साथ भारतीय स्टेट बैंक की गौशाला शाखा में जमा करने जा रहा था.’’
संजय पाल की बात सुन कर थानाप्रभारी अनुराग मिश्रा चौंके. उन्होंने तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. जब यह सूचना पुलिस कंट्रोल रूम से प्रसारित हुई तो पूरा पुलिस महकमा अलर्ट हो गया.

बेवफाई की लाश
पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर जाने के लिए रवाना हो गए. टप्पेबाजी की यह बड़ी वारदात संजय वन वाली मेनरोड पर हुई थी. कुछ ही देर में किदवईनगर थानाप्रभारी अनुराग मिश्रा, नौबस्ता थानाप्रभारी संतोष कुमार, अनवर गंज थानाप्रभारी मंसूर अहमद, चकेरी थानाप्रभारी अजय सेठ, सीओ (गोविंद नगर) आर.के. चतुर्वेदी, सीओ (नजीराबाद) अजीत कुमार सिंह, सीओ (बाबूपुरवा) अजीत कुमार रजक, एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल, एसपी (पश्चिम) संजीव सुमन, एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी तथा एसएसपी अनंत देव तिवारी घटनास्थल पर पहुंच गए.
पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और पूरे कानपुर शहर में वाहन चैकिंग शुरू करा दी. टूव्हीलरों और फोर व्हीलरों की सघन तलाशी होने लगी. यह बात 19 दिसंबर, 2018 की है.

बदले पे बदला
टप्पेबाजी का शिकार हुए संजय पाल घटनास्थल पर मौजूद थे. एसएसपी अनंत देव ने उन से घटना के संबंध में पूछताछ की. संजय पाल ने बताया कि वह चकेरी थाने के श्याम नगर मोहल्ले में रहते हैं. नौबस्ता के कोयला नगर, मंगला विहार में उन का श्री बालाजी फिलिंग स्टेशन नाम से पैट्रोल पंप है. पैट्रोल बिक्री की रकम वह गौशाला स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में जमा करते हैं.
हर रोज की तरह वह आज भी पैट्रोल बिक्री का 10.69 लाख रुपए अपनी निजी कार से जमा करने जा रहे थे. कार को उन का ड्राइवर अरुण पाल चला रहा था.
संजय पाल ने बताया कि करीब साढ़े 11 बजे जब वह संजय वन चौकी से 80 मीटर पहले एक निर्माणाधीन बिल्डिंग के सामने पहुंचे ही थे कि पीछे से बाइक पर सवार 2 युवकों ने कार के आगे की ओर इशारा किया. ड्राइवर अरुण ने कार रोक कर देखा तो बोनट के पास मोबिल औयल गिरता नजर आया.

अशिकी मे गई जान
अरुण ने बोनट खोल कर चैक किया और कार मिस्त्री को फोन कर के जानकारी दी. मिस्त्री ने कहा कि कोई खास दिक्कत नहीं है. इस पर वे दोनों कार में बैठ गए. संजय ने बताया कि कार में बैठते ही आंखों में तेज जलन हुई. वह आंखें मलते हुए ड्राइवर के साथ बाहर निकले. इसी बीच बाइक सवार युवकों ने कार की पीछे वाली सीट पर रखा रुपयों से भरा बैग उड़ा दिया.
जब उन्हें इस बात की जानकारी हुई तो वे तत्काल संजय वन चौकी गए. लेकिन चौकी पर ताला लटक रहा था. उस के बाद वह थाना किदवईनगर गए और पुलिस को सूचना दी.

अजय विजय के बीच शिववती
संजय पाल की बातों से स्पष्ट था कि किसी बड़े टप्पेबाज गिरोह ने टप्पेबाजी की है. गैंग के अन्य सदस्य भी रहे होंगे जो वारदात के समय आसपास ही होंगे. एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी को शक हुआ कि इस वारदात में कहीं ड्राइवर तो शामिल नहीं.
उन्होंने कार ड्राइवर अरुण पाल को बातों में उलझा कर पूछताछ की लेकिन उस ने वही सब बताया जो संजय पाल ने बताया था. संजय पाल ने भी अरुण पाल को क्लीनचिट दे दी. उन्होंने कहा कि वह उन का विश्वासपात्र ड्राइवर है. घटनास्थल पर एक नाबालिग चश्मदीद था, जो पोस्टर बैनर बना रहा था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की, लेकिन कुछ हासिल नहीं हो सका.
जिस जगह सड़क पर टप्पेबाजी हुई थी, उस के दूसरी ओर एक मकान के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. एसएसपी अनंत देव तिवारी तथा एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी ने इस सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो उस में पूरी वारदात कैद थी. सीसीटीवी में साफ दिख रहा था कि जब पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल और उन का ड्राइवर अरुण पाल कार का बोनट खोल कर जांच करने लगी, तभी बाइकर्स आगे जा कर डिवाइडर कट से मुड़े.
पीछे बैठा युवक बाइक से नीचे उतरा. वह काली शर्ट व नीली जींस पहने था. डिवाइडर फांद कर उस ने कार की पीछे वाली सीट से रुपयों से भरा बैग उठाया और फिर वापस साथी के पास आया. बाइक चलाने वाला युवक नीली शर्ट, जींस, लाल जूते पहने था और हेलमेट लगाए था. इस के बाद बाइकर्स यशोदानगर की ओर भागते दिखे.

सुंदरी की साजिश

इधर देर रात तक पुलिस शहर भर में वाहन चैकिंग करती रही लेकिन वारदात को अंजाम देने वालों का पता नहीं चल सका. उधर दूसरे दिन पैट्रोल और एचएसडी डीलर्स एसोसिएशन ने आपात बैठक बुलाई और पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल से 10.69 लाख की टप्पेबाजी की घटना को ले कर रोष व्यक्त किया.
बैठक के बाद अध्यक्ष ओमशंकर मिश्रा, महासचिव सुनील शरन गर्ग, कोषाध्यक्ष संजय गुप्ता, सुखदेव पाल, बसंत माहेश्वरी तथा पवन गर्ग ने पुलिस के आला अधिकारियों एडीजी अविनाश चंद्र तथा आईजी आलोक सिंह से मुलाकात की. उन्होंने पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल से टप्पेबाजी की घटना का जल्दी खुलासा करने का अनुरोध किया.

नशे और ग्लैमर का चक्रव्यूह
पैट्रोल और एचएसडी डीलर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि पुलिस प्रशासन को पैट्रोल मालिकों को समुचित सुरक्षा देनी चाहिए. असलहों के लाइसैंस शीघ्र निर्गत किए जाएं. अगर ऐसा नहीं होता है तो पैट्रोल पंप मालिक हड़ताल पर चले जाएंगे.
एडीजी अविनाश चंद्र तथा आईजी आलोक सिंह ने पैट्रोल पंप एसोसिएशन के पदाधिकारियों की बात गौर से सुनी और उन्हें आश्वासन दिया कि संजय पाल के साथ हुई टप्पेबाजी की घटना का जल्दी ही खुलासा हो जाएगा. उन की मांगों का भी निस्तारण होगा.
पदाधिकारियों को आश्वासन देने के बाद एडीजी अविनाश चंद्र ने पुलिस अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. इस में एसपी, सीओ, इंसपेक्टर तथा तेजतर्रार दरोगाओं ने भाग लिया. मीटिंग में शहर में आए दिन हो रही टप्पेबाजी की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई.
मीटिंग के बाद एडीजी अविनाश चंद्र व आईजी आलोक सिंह ने टप्पेबाजी गैंग को पकड़ने के लिए 4 टीमें बनाईं. इन टीमों की कमान एसएसपी अनंत देव तिवारी, एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी, एसपी (पश्चिम) संजीव सुमन तथा एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को सौंपी गई.
टीम में सीओ (गोविंद नगर) आर.के. चतुर्वेदी, सीओ (नजीराबाद) अजीत कुमार सिंह, सीओ (बाबूपुरवा) अजीत कुमार रजक, इंसपेक्टर अनुराग मिश्रा, संतोष कुमार, मंसूर अहमद, अजय सेठ, राजीव सिंह, एडीजीजी की क्राइम ब्रांच से अजय अवस्थी, कुलभूषण सिंह, वंश बहादुर, सीमांत और अखिलेश व एक दरजन तेजतर्रार तथा सुरागसी में दक्ष दरोगा वगैरह के साथसाथ सर्विलांस टीम को शामिल किया गया.

खूनी नशा: ज्यादा होशियारी ऐसे पड़ गई भारी
इन टीमों ने टप्पेबाजों की तलाश शुरू की और एक दरजन से अधिक लोगों को उठा कर उन से कड़ाई से पूछताछ की. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. टीमों ने पैट्रोल पंप पर काम करने वाले कर्मचारियों तथा घटना के चश्मदीद नाबालिग किशोर से भी पूछताछ की, लेकिन कोई क्लू नहीं मिला.
पुलिस टीमों ने शहर के बाहर शिवली, घाटमपुर, महाराजपुर, जहानाबाद आदि कस्बों में टप्पेबाजी करने वालों की तलाश की. जेल से छूटे पुराने टप्पेबाजों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की गई, लेकिन कोई ऐसी जानकारी नहीं मिल सकी, जिस से संजय पाल से की गई टप्पेबाजी का खुलासा हो पाता.
पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल के साथ हुई टप्पेबाजी की वारदात एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी के क्षेत्र में हुई थी, इसलिए वह इस वारदात को ले कर कुछ ज्यादा प्रयासरत थीं. उन के दिशानिर्देश में काम कर रही टीम रातदिन एक किए हुए थी. सर्विलांस टीम भी उन के साथ काम कर रही थी.
सर्विलांस टीम ने पुलिस टीम के साथ संजय पाल के घर से घटनास्थल तक मोबाइल टावर डेटा फिल्टरेशन की मदद ली. इस में एक नंबर ऐसा निकला जो वारदात के वक्त घटनास्थल पर एक्टिव था. उस नंबर की लोकेशन यशोदा नगर हाइवे से उन्नाव की ओर मिली थी, इसलिए सर्विलांस टीम ने उस नंबर को लिसनिंग पर लगा दिया.

दिल्ली के लव कमांडो: हीरो नहीं विलेन
29 दिसंबर को उस नंबर धारक ने लखनऊ में रहने वाले एक साथी से बात की, जिसे पुलिस ने सुन लिया. इस के बाद एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी की टीम ने मोबाइल लोकेशन के जरिए आलमबाग, लखनऊ से 2 युवकों को धर दबोचा.
रवीना त्यागी ने जब इन युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने अपना नाम विनेश और विकास बताया. इन दोनों से रवीना त्यागी ने संजय वन रोड पर हुई 10.69 लाख की टप्पेबाजी के बारे में पूछा तो दोनों साफ मुकर गए. लेकिन जब उन्हें थाना किदवई नगर लाया गया और पुलिसिया अंदाज में पूछताछ हुई तो दोनों टूट गए. उन्होंने 10.69 लाख रुपए की टप्पेबाजी स्वीकार कर ली. उन दोनों ने बताया कि उन का टप्पेबाजी का गैंग है. गैंग के अन्य सदस्य झकरकटी बसअड्डा स्थित गणेश होटल में ठहरे हुए हैं.
इस के बाद पुलिस की चारों संयुक्त टीमों ने झकरकटी स्थित गणेश होटल पर छापा मारा और 3 बैड वाले एक रूम से 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इन में एक महिला और एक नाबालिग भी था.

अतीक जेल में भी बाहुबली
इन के पास से पुलिस ने टप्पेबाजी कर के उड़ाया गया बैग बरामद कर लिया. बैग से 10.69 लाख रुपए सहीसलामत मिले. इस के अलावा पुलिस ने गैंग के पास से एक कार, एक वैन, एक बाइक, पेपर स्प्रे, चिली स्प्रे, गुलेल, लोहे के छर्रे, जले हुए मोबिल औयल की बोतल तथा सूजा बरामद किया.

पुलिस की संयुक्त टीम ने टप्पेबाज गैंग के 11 सदस्यों को पकड़ा. इन सभी को बरामद रुपए और अन्य सामान के साथ थाना किदवई नगर लाया गया. पूछताछ में गैंग के सदस्यों ने अपना नाम आकाश, राहुल, प्रेम, राजेश, रामू, अनिकली, विनेश, विकास, नरेश निवासी मदनगीर, दिल्ली तथा वरदराज और नाबालिग एस. विजय निवासन निवासी इंद्रपुरी दिल्ली बताया.
एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी ने संजय वन रोड पर हुई टप्पेबाजी का खुलासा करने, पूरे गैंग को पकड़ने और टप्पेबाजी का 10.69 लाख रुपए बरामद करने की जानकारी एडीजी अविनाश चंद्र, आईजी आलोक सिंह तथा एसएसपी अनंत देव तिवारी को दी.
इस के बाद एसएसपी अनंत देव तिवारी व एसपी (दक्षिण) रवीना त्यागी ने पुलिस लाइन में प्रैसवार्ता की, जिस में आरोपियों को पेश किया गया. प्रैसवार्ता के दौरान एडीजी अविनाश चंद्र ने टप्पेबाज गैंग को पकड़ने वाली टीम को एक लाख रुपए तथा आईजी आलोक सिंह ने 50 हजार रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा की.

राजनीति की अंधी गली में खोई लड़की
प्रैसवार्ता में टप्पेबाजी के शिकार पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल तथा पैट्रोल और एचएसडी डीलर्स के पदाधिकारियों को बुलाया गया. संजय पाल ने नोटों से भरे अपने बैग की पहचान की तथा खुलासे के लिए पुलिस की सराहना की.

चूंकि गैंग के सदस्यों ने अपना जुर्म कबूल कर के रुपया भी बरामद करा दिया था. इसलिए किदवईनगर थानाप्रभारी अनुराग मिश्रा ने टप्पेबाजी के शिकार हुए संजय पाल को वादी बता कर भादंसं की धारा 406, 419, 420 के तहत राहुल, प्रेम, राजेश रामू, विकास, विनेश, अनिकली, आकाश, वरदराज, नरेश तथा एस. विजय निवासन (नाबालिग) के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली और सभी को गिरफ्तार कर लिया. बंदी बनाए गए आरोपियों से की गई पूछताछ में जो घटना सामने आई, उस का विवरण इस तरह है—

डाक्टर नहीं जल्लाद
कानपुर में पकड़े गए टप्पेबाज विनेश, विकास, आकाश, राहुल व उन के गैंग के अन्य सदस्य मूलरूप से तमिलनाडु के चेन्नै व त्रिची के रहने वाले थे. सालों पहले ये लोग दिल्ली आए और मदनगीर जेजे कालोनी तथा इंद्रपुरी के क्षेत्रों में बस गए. इन क्षेत्रों में इन के 25 डेरे हैं, जो आपस में जुड़े हुए हैं. एक डेरे में 12-13 सदस्य होते हैं.
इन सदस्यों के समूह को डेरा नाम दिया जाता है. डेरा स्वामी समूह का सरगना होता है. इन की पीढि़यां कई दशकों से अपराध को जीविकोपार्जन का साधन बनाए हुए हैं. इन्हें बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है. इन के गिरोह में पुरुष, महिला व बच्चे सभी होते हैं.
इन के समुदाय के जो लोग अपराध की ट्रेनिंग नहीं लेते और अपराध नहीं करते, उन्हें डेरे के लोग नकारा मानते हैं. उन्हें हीनभावना से देखते हैं. ऐसे निठल्लों की शादी भी नहीं होती.
दिल्ली का डेरा टप्पेबाज गैंग, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली व राजस्थान के विभिन्न शहरों में वारदातें करता था. वह राज्य के जिस जिले में जाता, वहां के बसअड्डों या रेलवे स्टेशनों के आसपास के होटलों में ठहरता. होटल में वैध आईडी दिखा कर ये लोग कमरा बुक कराते थे. चूंकि इन के साथ महिलाएं व बच्चे होते, इसलिए पुलिस भी इन पर शक नहीं करती. ये लोग किराए का वाहन प्रयोग नहीं करते. अपनी कार, वैन या मोटरसाइकिल ही इस्तेमाल करते हैं.

गैंग के शातिर टप्पेबाज बाइक से वारदात को अंजाम देने के लिए निकलते हैं. उन के पीछे कार होती है, जिस में महिला और एक बच्चा भी रहता है. घटना को अंजाम देने के बाद शातिर टप्पेबाज कार में नकदी व जेवरात ले कर बैठ जाते हैं.
पुलिस को चकमा देने के लिए दूसरे साथी नकदी ले कर बाइक से निकल जाते हैं. ज्यादातर वाहन गैंग की महिलाओं के नाम खरीदे हुए होते हैं. वाहन सही नामपते पर रजिस्टर्ड होते हैं, जिस से पुलिस चैकिंग में कभी नहीं पकड़े जाते.
गैंग के शातिर लोग रेलवे क्रौसिंग, जेब्रा क्रौसिंग, रेड लाइट तथा जाम वाली जगहों पर रेकी करते हैं. वहां घटना को अंजाम दे कर ये लोग दूसरे जिले की ओर कूच कर जाते हैं. ये लोग चलती गाड़ी के बोनट पर जला हुआ मोबिल औयल डाल कर शिकार बनाते हैं या फिर चलती गाड़ी रुकवा कर चिली स्प्रे के सहारे टप्पेबाजी करते हैं.
कभीकभी ये गाड़ी का शीशा तोड़ कर नोटों से भरा बैग या अन्य सामान पार कर लेते हैं. कार के टायर में सूजा चुभो कर ये लोग पंक्चर कर के भी गाड़ी से सामान गायब कर देते हैं. कभीकभी ये लोग खुद को क्राइम ब्रांच का अधिकारी या आयकर विभाग का अधिकारी बता कर भी टप्पेबाजी कर लेते हैं.

दिल्ली के डेरा टप्पेबाज गैंग ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों आगरा, मथुरा, लखनऊ, फर्रुखाबाद, शाहजहांपुर आदि शहरों में दरजनों वारदातें कर के काफी धन एकत्र किया. दिसंबर माह के पहले सप्ताह में टप्पेबाज गैंग के डेरा मुखिया विनेश, विकास, आकाश व राहुल अपने डेरे के 2-2 सदस्य ले कर कानपुर शहर आ गए.
कानपुर में इन लोगों ने रेलवे स्टेशन स्थित एक होटल में अपनी वैध आईडी दिखा कर 3 रूम बुक कराए और साथियों के साथ ठहर गए. इस होटल में रुक कर इन लोगों ने कई लोगों को टप्पेबाजी का शिकार बनाया.
इस के बाद इन लोगों ने क्राइम ब्रांच का सिपाही बता कर प्रमोद वर्मा को शिकार बनाया. प्रमोद की बिरहाना रोड पर ज्वैलरी शौप है. प्रमोद दोपहर में घर में रखे 250 ग्राम सोने के आभूषण ले कर अपनी दुकान पर जा रहे थे. जब वह खत्री धर्मशाला के पास पहुंचे, तभी 2 युवकों ने उन्हें रोक लिया और खुद को क्राइम ब्रांच का सिपाही बताते हुए बैग की तलाशी देने को कहा.
इस पर उन्होंने दुकान पर चल कर तलाशी लेने की बात कही तो उन्होंने हड़काते हुए क्राइम ब्रांच औफिस चलने को कहा. इस से घबरा कर उन्होंने बैग खोल दिया. एक ने बैग की तलाशी शुरू कर दी. दूसरे ने उन्हें नामपता नोट करने में उलझा लिया.
कुछ देर बाद इन लोगों ने बैग लौटाते हुए कहा दुकान जाओ. प्रमोद ने दुकान जा कर बैग खोल कर देखा तो उस में पत्थर के टुकड़े थे. टप्पेबाज उन को शिकार बना कर फरार हो गए. प्रमोद ने थाना कलक्टरगंज में रिपोर्ट दर्ज कराई.

19 दिसंबर को टप्पेबाज विनेश और आकाश मोटरसाइकिल से झकरकटी स्थित गणेश होटल से शिकार की तलाश में निकले. मोटरसाइकिल विकास चला रहा था. जबकि पीछे की सीट पर विनेश बैठा था.
जब ये लोग यशोदानगर बाईपास पहुंचे तो वहां जाम लगा था. पैट्रोल पंप मालिक संजय पाल की कार भी इसी जाम में फंसी थी. संजय पाल पीछे की सीट पर बैठे थे और नोटों से भरा बैग उन के पास रखा था. गाड़ी उन का ड्राइवर अरुण पाल चला रहा था.
जाम में फंसी संजय की गाड़ी पर टप्पेबाज विनेश व आकाश की नजर पड़ी. सीट पर रखा बैग देख कर उन दोनों की बांछें खिल उठीं. उन्होंने सहज ही अंदाजा लगा लिया कि बैग में मोटी रकम हो सकती है. उन्होंने संजय पाल को शिकार बनाने की ठान ली.
योजना के तहत उन्होंने कार का पीछा किया और विनेश ने जाम के चलते धीमी चल रही कार के बोनट पर मोबिल औयल गिरा दिया. संजय वन रोड पहुंचने पर विनेश ने ड्राइवर अरुण पाल को इंजन से औयल टपकने का इशारा किया. अरुण ने कार रोक दी. संजय पाल व ड्राइवर अरुण जब कार से उतरे, तभी टप्पेबाज आकाश व विनेश आ गए. उन्होंने चिली स्प्रे कार में छिड़क दिया.

गाड़ी चैक कर के संजय पाल व अरुण पाल आ कर गाड़ी में बैठे तो उन की आंखों में जलन होने लगी. दोनों आंखें मलते हुए गाड़ी के बाहर आए. इसी बीच विनेश ने नोटों से भरा बैग सीट से उठाया और बाइक की पिछली सीट पर जा बैठा. वहां से ये यशोदा नगर की ओर भाग गए.
यशोदा नगर बाईपास के पहले वृंदावन गार्डन के पास टप्पेबाज राहुल कार लिए खड़ा था. वह उन्हीं दोनों का इंतजार कर रहा था. कार में प्रेम, राजेश, नरेश, अनिकली व नाबालिग एस. विजय निवासन बैठे थे. आकाश व विनेश ने आते ही रुपयों से भरा बैग कार में बैठे लोगों को थमा दिया और खुद उन्नाव की ओर चले गए. राहुल कार ले कर वापस गणेश होटल लौट आया.
इधर टप्पेबाजों का शिकार हुए संजय पाल थाना किदवई नगर पहुंचे और थानाप्रभारी अनुराग मिश्रा को टप्पेबाजों द्वारा नोटों से भरा बैग पार करने की जानकारी दी.

पकड़े गए टप्पेबाज गैंग के प्रमुख आकाश, राहुल, विनेश, विकास से जब कड़ी पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि इन के अलावा शहर में एक और गैंग है, जो टप्पेबाजी कर पुलिस की नींद हराम किए हुए है. यह गैंग महाराष्ट्र का है.
इस गैंग में तमिलनाडु के सदस्य भी हैं. इस गैंग ने अनवरगंज क्षेत्र में कई वारदातें की थीं. इंसपेक्टर (अनवरगंज) मंसूर अहमद पुलिस टीम में शामिल थे. उन से पता चला कि टप्पेबाजों ने उन के थाना क्षेत्र में बांसमंडी के पास बिंदकी (फतेहपुर) निवासी आढ़ती जयकुमार साहू के साथ टप्पेबाजी की थी.
टप्पेबाजों ने उन से कहा कि उन की कार के पहिए से हवा निकल गई है. वह पहिया चैक करने उतरे. इसी बीच टप्पेबाजों ने उन की गाड़ी में रखा बैग पार कर दिया. बैग में ढाई लाख रुपए थे.

इस के बाद टप्पेबाजों ने लालगंज निवासी रेलवे ठेकेदार विजेंद्र सिंह तथा फर्रुखाबाद निवासी अतुल को शिकार बनाया. दोनों की कार से बैग उड़ाया गया था. विजेंद्र सिंह के बैग में लाइसेंसी पिस्टल, रुपए व जरूरी कागजात थे, जबकि अतुल के बैग में नकदी व कागजात थे. तीनों ने थाना अनवरगंज में टप्पेबाजों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.
इंसपेक्टर मंसूर अहमद इन टप्पेबाजों को पकड़ने के लिए प्रयासरत थे, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही थी.

पकड़े गए गैंग से मंसूर अहमद को कुछ क्लू मिला तो उन्होंने टप्पेबाजी करने वाले गैंग की टोह में मुखबिर लगा दिए. वह स्वयं भी प्रयास करते रहे. उन्होंने क्षेत्र के होटलों, विश्राम गृहों तथा रेलवे स्टेशन अनवरगंज में विशेष निगरानी शुरू कर दी.

4 जनवरी शुक्रवार की रात इंसपेक्टर मंसूर अहमद को खास मुखबिर से सूचना मिली कि टप्पेबाज गिरोह बांसमंडी तिराहे पर मौजूद है और किसी बड़ी वारदात की फिराक में है.
मुखबिर की इस सूचना पर विश्वास कर मंसूर अहमद बांसमंडी तिराहा पहुंचे और मुखबिर की निशानदेही पर एक महिला सहित 4 लोगों को हिरासत में ले लिया. सभी को थाना अनवरगंज लाया गया.

एक हत्या ऐसी भी

थाने पर जब उन से नामपता पूछा गया तो एक ने अपना नाम गणेश नायडू, दूसरे ने बाबू नायडू तथा महिला ने अपना नाम पार्वती नायडू बताया. पार्वती नायडू, गणेश नायडू की बहन थी जबकि बाबू नायडू उस का बेटा था. ये तीनों महाराष्ट्र के नदुरवार जिले के नवापुर के रहने वाले थे. चौथा व्यक्ति गणेश का रिश्तेदार चंद्रुक तेली था. वह तमिलनाडु के तिरुपुर जिले के उठकली का रहने वाला था.

सपनों के पीछे भागने का नतीजा
पुलिस ने चारों की जामातलाशी ली तो उन के पास से करीब सवा लाख रुपए नकद, टायर कटर, गुलेल, छर्रे, मोबाइल तथा एटीएम कार्ड बरामद हुए. पूछताछ में टप्पेबाजों ने तीनों घटनाओं का खुलासा किया और कार से बैग उड़ाने की बात कबूली.
पुलिस ने इन टप्पेबाजों से करीब आधी रकम तो बरामद कर ली, लेकिन रेलवे ठेकेदार विजेंद्र सिंह की पिस्टल का पता नहीं चला. संभावना है कि गैंग का कोई अन्य सदस्य आधी रकम व पिस्टल ले कर किसी दूसरे जिले की ओर निकल गया हो.

30 दिसंबर, 2018 को थाना किदवईनगर पुलिस ने टप्पेबाज गिरोह के 11 सदस्यों विनेश, विकास, आकाश, राहुल, प्रेम, नरेश, रामू, वरदराज, राजेश, अनिकली तथा नाबालिग को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से नाबालिग को छोड़ कर सभी को जेल भेज दिया गया. नाबालिग को बाल सुधार गृह भेजा गया.

कातिल बहन की आशिकी
दूसरे टप्पेबाज गैंग को अनवरगंज पुलिस ने 5 जनवरी को रिमांड मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से गणेश, बाबू, पार्वती, चंदुक तेली को जिला जेल भेज दिया गया.

अजय विजय के बीच शिववती

लेखक – सुरेशचंद्र मिश्र  

कानपुर नगर से करीब 30 किलोमीटर दूर बेला विधूना रोड पर एक गांव है

अंगदपुर. राजबली अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनीता के अलावा 2 बेटे थे राजू व भीम. साथ ही 2 बेटियां शिववती व रामवती भी थीं. राजबली की कहिंजरी बस स्टाप पर मिठाई की दुकान थी, उसी से उस के परिवार का भरणपोषण होता था. उस के दोनों बेटे भी काम में उस का हाथ बंटाते थे.

दुकान बस स्टाप पर होने की वजह से अच्छी चलती थी. जैसेजैसे उस के बच्चे जवान होते गए, वह उन की शादी करता गया. छोटी बेटी शिववती की शादी उस ने थाना शिवली के अंतर्गत आने वाले गांव लुधौरा बाघपुर निवासी विजय लाल से करदी थी. विजय लाल खेतीकिसानी में अपने पिता गोपीचंद के हाथ बंटाता था.

शिववती से शादी कर के वह बहुत खुश था, लेकिन सुहागरात को वह पत्नी को खुश नहीं कर सका. पति की यह हालत देख कर शिववती के सारे सपने बिखर गए. पति को ले कर उस ने जो अरमान सजाए थे, आंसुओं में बह गए.

विजय ने पत्नी को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन शिववती की सुहागरात आंसुओं के साथ गुजरी. बहरहाल, शिववती ने संयम और समझदारी से काम लिया. चूंकि उसे विजय लाल के साथ ही रहना था, इसलिए उस ने पति को किसी डाक्टर से मिलने की सलाह दी. विजय ने अपना इलाज कराया और वह ठीक हो गया. बहरहाल, उस की गृहस्थी ठीक से चलने लगी.

सुंदरी की साजिश

समय अपनी गति से गुजरता रहा और करीब 4 साल बाद विजय एक बच्चे का बाप बन गया. बच्चा हो जाने के बाद पत्नी का खर्च बढ़ गया.

अब शिववती के खर्च के लिए घर में रोजरोज तो पैसे मांगे नहीं जा सकते थे, लिहाजा वह कोई दूसरा काम करने की सोचने लगा. उस के पास इतना पैसा तो था नहीं, जिस से वह कोई ढंग की दुकान वगैरह खोल लेता. लिहाजा वह कहीं नौकरी पाने की कोशिश करने लगा.

 

काफी कोशिश करने के बाद भी जब कोई नौकरी नहीं लगी तो विजय लाल शिवली कस्बा स्थित भगवती जनरल स्टोर पर नौकरी करने लगा. कस्बा शिवली उस के गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर था. वह सुबह 8 बजे साइकिल से अपने काम पर निकलता था और रात 8 बजे घर लौटता था. दिन भर दुकान पर काम कर के वह काफी थक जाता था, जिस से वह पत्नी की शारीरिक जरूरत को नहीं समझ पाता था.

पति की कमाई से शिववती के हाथ में पैसा आने लगा तो उस की घरगृहस्थी की गाड़ी चलने लगी. शिववती आर्थिक रूप से तो पति से संतुष्ट थी, लेकिन शारीरिक रूप से नहीं. उस का दिन तो किसी तरह कट जाता, लेकिन रात की गहरी खामोशी उसे खाने को दौड़ती थी.

विजय लाल के साथ दीपू और श्यामू नाम के 2 युवक काम करते थे. तीनों में खूब पटती थी. दोनों ही पियक्कड़ थे. उन्होंने विजय लाल को भी शराब का चस्का लगा दिया था. शिववती को पति का शराब पीना पसंद नहीं था. वह जब भी शराब पी कर घर पहुंचता तो उस की पत्नी घर में कलह शुरू कर देती थी.

शिववती कहती, ‘एक तो तुम वैसे भी किसी काम के नहीं हो, ऊपर से शराब पी कर आ जाते हो. तुम्हें न मेरी चिंता है और न बच्चे की.’

 

विजय लाल अपनी कमजोरी समझता था, इसलिए वह बीवी की जलीकटी बातें सुन लेता था. विजय लाल के घर अजय कुमार का आनाजाना था. अजय कुमार रसूलाबाद थाने के अंतर्गत आने वाले गांव संभरपुर का रहने वाला था. विजय लाल उस का ममेरा भाई था.

अजय कुमार जब भी शिवली कस्बे से बीजखाद लेने आता था, मामा के घर जरूर जाता था. अजय कुमार शादीशुदा था और 2 बच्चों का बाप भी. उस की पत्नी अनपढ़ और सामान्य सी महिला थी, इसलिए वह उसे मन से नहीं चाहता था. अपनी पत्नी से उस की बिलकुल नहीं पटती थी.

शिववती ने अजय के आने पर पहले तो ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वह कामना की आग में झुलसने लगी तो उस ने अजय पर नजरें गड़ानी शुरू कर दीं. अब अजय जब भी घर आता, शिववती उसे चाहत भरी नजरों से देखती. उस से हंसीमजाक करती.

नशे और ग्लैमर का चक्रव्यूह

 

अजय पहले तो सकुचाया, क्योंकि वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. लेकिन जब उस ने शिववती की आंखों में चाहत देखी तो उस ने भी कदम आगे बढ़ा दिए.

अजय का शिववती के घर कभीकभी ही आ पाता था. उस रोज वह कई दिनों बाद आया तो काफी रोमांटिक मूड में था. शिववती भाभी के लिए वह गिफ्ट में एक साड़ी ले कर आया था, लेकिन वह उसे घर में दिखाई नहीं दी. उस की बेचैन निगाहें शिववती को देखने को बेचैन थीं. अजय को घर में बैठे काफी देर हो गई थी. लेकिन उसे भाभी का दीदार नहीं हुआ था.

कुरसी पर बैठेबैठे वह पहलू बदलने लगा. तभी गुसलखाने की किवाड़ें खुलीं और शिववती बाहर निकली. भीगे तनबदन पर लपेटी हुई साड़ी शरीर से चिपकी पड़ी थी. ऐसे में देह के सारे कटाव और उभार साफ दिख रहे थे.

 

अजय हैरान नजरों से शिववती के हुस्न और शबाब को देखता रहा. अजय को देख शिववती अपनी हालत पर थोड़ी लजाई, फिर गीले बालों को पीछे झटकते हुए बोली, ‘‘अजय, तुम कब आए?’’

‘‘अभीअभी आया हूं भाभी.’’ अजय की निगाहें अनीता के बदन पर ही चिपकी हुई थीं. वह बोला, ‘‘विजय भैया नजर नहीं आ रहे, कहीं गए हैं?’’

‘‘हां, वह दुकान पर गए हैं. अब तो रात तक ही वापस लौटेंगे. तुम बैठो, मैं कपड़े बदल कर आती हूं.’’ शिववती ने कहा तो अजय बोल पड़ा, ‘‘भाभी, एक मिनट ठहरो.’’

उस ने अपने बैग से साड़ी का एक लिफाफा निकाला और उसे शिववती की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘लो भाभी, यह मैं तुम्हारे लिए ही लाया हूं. कपड़े बदलने जा ही रही हो तो इसे ही पहन लो. मैं भी तो देखूं कि इस साड़ी में कैसी लगोगी.’’

शिववती ने साड़ी ली और मादक निगाहों के तीर चलाती हुई दूसरे कमरे में चली गई. कुछ देर बाद शिववती साड़ी पहन कर आई तो उस के हाथ में पानी का गिलास था. अजय ने पानी लिया और एक ही सांस में पी गया.

‘‘क्या बात है अजय, बहुत प्यासे नजर आ रहे हो.’’ शिववती ने चुहल की.

‘‘प्यासा था नहीं, पर अब प्यास जाग गई है.’’ अजय ने शिववती को गौर से देखा, ‘‘तुम पर साड़ी खूब फब रही है. अच्छी है न?’’

‘‘बहुत अच्छी है, तुम लाओ और अच्छी न हो, भला ऐसा हो सकता है?’’ शिववती मुसकराई.

 

यह देख कर कुरसी पर बैठा अजय खड़ा हो गया. वह शिववती की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘जानती हो भाभी, मैं यहां बारबार क्यों आता हूं.’’

‘‘यह भी कोई पूछने की बात है, तुम हमारे रिश्तेदार हो, जब चाहे आ सकते हो.’’ शिववती मुसकराई.

‘‘सच कहा तुम ने. पर मुझे तुम्हारी चाहत खींच लाती है. मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं.’’ अजय ने एकाएक उस का हाथ पकड़ लिया. फिर उसे अपनी बांहों में भर लिया. इस से शिववती की सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं.

वह कसमसाई, ‘‘यह ठीक नहीं है अजय.’’

‘‘ठीक तब नहीं होगा भाभी, जब हम अपनी चाहतों को अधूरा छोड़ देंगे.’’ कह कर अजय ने अपने हाथों की हरकत बढ़ा दी.

आखिर शिववती ने अपनी आंखें बंद कर के खुद को अजय की बांहों में छोड़ दिया. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

उस रोज शिववती ने वह सुख पा लिया, जो उसे पति से कभी नहीं मिला था. वह अजय की दीवानी हो गई.

उस दिन के बाद शिववती व अजय को जब भी मौका मिलता, वह मिलन कर लेते. जब विजय घर पर नहीं होता, तब अजय उस के ही कमरे में घुसा रहता. चूंकि अजय व शिववती करीबी रिश्ते में थे, इसलिए काफी दिनों तक गांव में किसी को उन के संबंधों पर शक नहीं हुआ. सब की आंखों में धूल झोंक कर दोनों अपनी मन की मुराद पूरी करते रहे.

खूनी नशा: ज्यादा होशियारी ऐसे पड़ गई भारी

शिववती अब पति के बजाए अजय के लिए शृंगार करने लगी. शिववती के व्यवहार में भी अब काफी बदलाव आ गया था. उस की चंचलता बढ़ गई थी और चेहरे पर लुनाई छाने लगी थी. उस का पति विजय इस बदलाव को महसूस कर रहा था, लेकिन उसे इस की वजह पता नहीं थी.

लेकिन मोहल्ले वालों की नजरों से हकीकत छिपी न रह सकी. विजय की गैरमौजूदगी में अजय का बारबार उस के घर आना लोगों के मन में शक पैदा कर रहा था. एक रोज एक पड़ोसी ने विजय को टोक ही दिया. उसे सारी बात बताई तथा सलाह दी कि वह नौकरी के साथसाथ घरवाली का भी खयाल रखे.

पड़ोसी की बात सुन कर विजय का माथा ठनका. उस रोज उस का मन काम में नहीं लगा और शाम को जल्द घर आ गया. आते ही उस ने पत्नी से सीधा सवाल किया, ‘‘ये अजय यहां बारबार क्यों आता है?’’

‘‘तुम्हारा रिश्तेदार है. तुम ममेरे भाई हो, इसलिए आता है.’’ शिववती बोली.

‘‘लेकिन वह मेरी गैरमौजूदगी में क्यों आता है?’’

‘‘तुम सुबह काम पर चले जाते हो और रात को लौटते हो. यदि वह तुम्हारी गैरमौजूदगी में आता है तो क्या मैं उसे घर से निकाल दूं.’’

‘‘निकालो या कुछ भी करो, लेकिन वह मेरी गैरहाजिरी में घर नहीं आना चाहिए.’’ विजय ने गुस्से में कहा.

‘‘पर हुआ क्या है, यह तो बताओ. आप इतने खफा क्यों हो?’’ शिववती ने पूछा.

‘‘देखो शिववती, मोहल्ले वाले तुम्हारे बारे में तरहतरह की बातें कर रहे हैं. इस से हमारी बदनामी हो रही है. मैं नहीं चाहता कि आज के बाद अजय के मनहूस कदम इस घर में पड़ें.’’ विजय ने तेज आवाज में कहा.

तभी शिववती चीख कर बोली, ‘‘मैं कौन होती हूं उसे रोकने वाली. तुम खुद रोको.’’

पत्नी की इस बेहयाई पर विजय ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया, ‘‘बदचलन, अगर तू ही उसे मुंह नहीं लगाएगी तो वह कैसे आएगा?’’

 

पति का रौद्र रूप देख वह सकते में आ गई. अगले रोज जैसे ही विजय घर से काम पर जाने के लिए निकला, वैसे ही शिववती ने अजय को फोन मिलाया और उसे पूरी बात बता दी. अजय ने उसे दिलासा दी, ‘‘भाभी, तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. मैं हूं न.’’

‘‘नहीं अजय, मेरा दिल घबरा रहा है. हमारे रिश्तों की भनक विजय को लग गई है, इसलिए अब तुम यहां मत आना.’’

‘‘ऐसा मत कहो भाभी. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘अच्छा, ऐसी बात है तो कुछ दिन रह लो. फिर मैं कोई रास्ता निकालती हूं.’’

इस घटना के कुछ दिनों बाद तक अजय शिववती से मिलने नहीं आया. लेकिन जब शिववती को अजय की याद सताने लगी तो उस ने फोन कर के अजय को देर रात अपने यहां आने को कहा.

अजय की लुधौरा गांव के पश्चिमी छोर पर रहने वाले रमेश सरस से दोस्ती थी. दोनों हमउम्र थे. अजय और शिववती के नाजायज रिश्ते की जानकारी उसे भी थी. शराब के लालच में रमेश अजय को रात में अपने यहां ठहरा लेता था. शिववती ने जब उसे बुलाया तो वह देर शाम लुधौरा बाघपुर गांव पहुंच गया. उस ने अपनी साइकिल दोस्त रमेश के घर खड़ी कर दी फिर शिववती से मिलने उस के घर जा पहुंचा.

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शिववती उसी का इंतजार कर रही थी. उस का पति थकाहारा आ कर खाना खाने के बाद कब का सो चुका था. अजय के आते ही शिववती उसे छत पर बने कमरे में ले गई. वहां दोनों मौजमस्ती में जुट गए.

इस के बाद अजय दोस्त के घर चला गया. विजय के सोने के बाद उस के घर में कौन आया, कौन गया, उसे पता नहीं चला. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अजय सप्ताह में 1-2 बार शिववती से मिलने पहुंच जाता था.

गलत काम चाहे कितनी भी चालाकी से किया जाए, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रात विजय दोस्तों के साथ शराब पी कर नशे में धुत हो कर घर आया. ज्यादा नशे में होने की वजह से वह बिस्तर पर गिरा और सो गया.

संयोग से उस शाम अजय भी गांव में अपने दोस्त रमेश के यहां आया हुआ था. शिववती ने अजय को फोन कर के घर बुला लिया. नशे में धुत विजय को खर्राटे लेते देख कर अजय का मन मचल उठा. उस ने शिववती से कहा, ‘‘भाभी, आज तो भैया इतने नशे में हैं कि इन की आंखें सुबह होने से पहले नहीं खुलने वालीं.’’

‘‘तभी तो मैं ने तुम्हें बुलाया है.’’ शिववती बोली.

इस के बाद दोनों इत्मीनान से कामलीला में मग्न हो गए.

संयोग से तभी विजय को प्यास लगी तो उस की नींद टूट गई. उस ने देखा कि शिववती चारपाई पर नहीं है. वह पानी पीना भूल गया और पत्नी को ढूंढने लगा, वह नहीं मिली. दबेपांव विजय सीढि़यों से छत पर जा पहुंचा. वहां कमरे में शिववती को अजय की बांहों में समाया देखा तो विजय के तनबदन में आग लग गई. उस दिन उसे पत्नी की सच्चाई का प्रमाण मिल गया था.

 

तेज कदमों से वह उन दोनों के करीब पहुंचा. लेकिन दोनों कामक्रीड़ा में इतने तल्लीन थे कि उन्हें विजय के आने का आभास तक नहीं हुआ. विजय ने अजय के बाल पकड़ कर उसे झिंझोड़ा. अचानक हुए इस हमले से अजय सकते में आ गया. उस ने खुद को संभालते हुए अपने कपड़े उठाए और फटाफट पहन कर वहां से भाग खड़ा हुआ. पति के रौद्र रूप को देख कर एक कोने में सिमटी शिववती समझ चुकी थी कि आज उस की खैर नहीं.

उस रात विजय ने शिववती को रुई की तरह धुना. उस के बाद उस ने पत्नी पर तमाम पाबंदियां लगा दीं. शिववती का प्रेमी से मिलन बंद हुआ तो वह घुटघुट कर जीने लगी. अजय भी परेशान था. लेकिन दोनों को मिलन की कोई राह नहीं सूझ रही थी.

 

आखिर जब शिववती से रहा नहीं गया तो उस ने एक रोज हिम्मत जुटा कर फोन कर अजय को घर बुला लिया. अजय घर आया तो शिववती उस के सीने से लग कर सुबकने लगी, ‘‘अजय, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती. मुझे कहीं भगा कर ले चलो.’’

‘‘पागल तो नहीं हो गई हो. विजय भैया का क्या होगा, पता है?’’ वह बोला.

‘‘तुम्हारी खातिर मैं उसे भी छोड़ दूंगी.’’

‘‘पर वह तो तुम्हें नहीं छोड़ेंगे.’’

‘‘हां, तुम्हारी यह बात सच है.’’ शिववती कुछ देर गहन सोच में डूबी रही फिर बोली, ‘‘तो फिर ऐसा करो कि किसी बदमाश से सौदा कर के विजय को जान से मरवा दो. कम से कम रोजरोज की कलह से तो मुक्ति मिलेगी.’’

शिववती के इरादे जान कर अजय हक्काबक्का रह गया कि यह औरत है या डायन, जो अपने ही पति की हत्या कराने की बात कर रही है.

वह सोचने लगा कि जो औरत आज अपने पति को कत्ल कराने पर आमादा है, कल वह उसे भी मरवा सकती है. यानी यह वफादार और भरोसेमंद नहीं है. इसलिए उस ने शिववती का साथ छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझी.

एक हत्या ऐसी भी

अजय ने किसी तरह शिववती को समझाया कि वह बावली न बने. वह कोई न कोई रास्ता जरूर निकाल लेगा. समझाबुझा कर अजय चला गया. अजय न तो ममेरे भाई का कत्ल करना चाहता था और न ही अपनी पत्नीबच्चों से दूर जाना चाहता था. वह तो बस शिववती से शारीरिक सुख चाहता था. शिववती ने समस्या खड़ी कर दी तो वह इस समस्या से निजात पाने की सोचने लगा.

3 जनवरी, 2019 की रात 8 बजे विजय घर आया तो घर में उसे पत्नी नहीं दिखी. पड़ोसी के घर उस का बेटा मनीष बच्चों के साथ खेल रहा था. उस ने मनीष से पूछा तो उस ने बताया कि मम्मी जंगल गई है. विजय लाल का माथा ठनका. उस ने पत्नी की खोज शुरू की लेकिन शिववती का पता नहीं चला. सवेरा होतेहोते पूरे गांव में बात फैल गई कि शिववती घर से गायब है.

लुधौरा बाघपुर गांव के बाहर छिद्दू यादव का खेत था. इस में उस ने अरहर की फसल बोई थी. छिद्दू सुबह 10 बजे के करीब अपने खेत पर पहुंचा तो उस ने खेत में एक महिला की लाश देखी. वह लाश के पास गया तो उस ने शिववती को पहचान लिया. छिद्दू ने यह जानकारी गांव में दी तो लोग दौड़ पड़े.

विजय लाल भी वहां पहुंचा. लाश देखते ही विजय लाल फफक कर रो पड़ा. क्योंकि लाश उस की पत्नी शिववती की थी. गांव वालों ने पुलिस को सूचना दी.

हत्या की सूचना पाते ही शिवली कोतवाली निरीक्षक चंद्रशेखर दूबे ने एसआई ए.के. सिंह, आर.पी. राजपूत, कांस्टेबल राजेश, उमाशंकर तथा महिला सिपाही पूनम को साथ लिया और घटनास्थल की ओर रवाना हो लिए. इसी बीच उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी सूचना दे दी.

 

घटनास्थल कोतवाली से करीब 5 किलोमीटर दूर था. पुलिस फोर्स को वहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा. घटनास्थल पर लोगों की भीड़ जुटी थी. पुलिस को देखते ही भीड़ छंट गई. तब इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने लाश का निरीक्षण किया. मृतका गुलाबी रंग की साड़ी और उसी की मैचिंग का ब्लाउज पहने थी.

वह खूब शृंगार किए थी. उस के शरीर पर कोई जख्म नहीं था. ऐसा लग रहा था जैसे उस की हत्या गला घोंट कर की गई हो. जोरजबरदस्ती किए जाने का कोई सबूत नहीं मिला.

इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी (देहात) राधेश्याम विश्वकर्मा तथा सीओ अर्पित कपूर भी आ गए. पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतका के पति विजय लाल से हत्या के संबंध में पूछताछ की.

 

जरूरी काररवाई कर के पुलिस ने शिववती की लाश को पोस्टमार्टम हाउस माती भेज दिया. इस के बाद इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने विजय लाल की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू कर दी. उन्होंने सब से पहले विजय लाल से ही पूछताछ की. उस ने बताया, ‘‘साहब, शिववती की हत्या संभरपुर गांव के रहने वाले अजय कुमार ने की है. वह हमारा रिश्तेदार है.’’

‘‘उस से तुम्हारी क्या दुश्मनी थी?’’ दूबे ने विजय को कुरेदा.

‘‘साहब, दुश्मनी नहीं है. अजय कुमार के मेरी पत्नी से नाजायज संबंध थे. मैं ने उसे रंगेहाथों पकड़ा था. इस के बाद उस के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी थी.’’ उस ने बताया.

विजय से बात करने के बाद इंसपेक्टर दूबे को शिववती की हत्या का कारण समझने में देर नहीं लगी. उन्होंने अजय के गांव संभरपुर में छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. अजय कुमार को पकड़ने के लिए पुलिस ने झींझक, रसूलाबाद, मैथा, भाऊपुर में उस के रिश्तेदारों के घरों पर दबिश दी, लेकिन वह हाथ नहीं लगा.

फिर 7 जनवरी, 2019 को इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे को खास मुखबिर से जानकारी मिली कि हत्यारोपी अजय कुमार मैथा नहर पुल पर मौजूद है. इस सूचना पर दूबे अपनी पुलिस टीम के साथ मैथा नहर पुल पर पहुंचे. पुलिस जीप देखते ही अजय नहर की पटरी पर सरपट भागने लगा. पुलिस ने पीछा कर के उसे दबोच लिया. उसे थाना शिवली लाया गया.

सपनों के पीछे भागने का नतीजा

इंसपेक्टर चंद्रशेखर दूबे ने जब अजय कुमार से शिववती की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया. हत्या का जुर्म कबूलते हुए उस ने बताया कि विजय लाल उस के मामा का बेटा है. उस के घर आनेजाने पर विजय की पत्नी शिववती से उस के अवैध संबंध बन गए थे.

कुछ समय से शिववती उस पर शादी करने तथा घर से भाग जाने का दबाव बना रही थी. वह अपने पति विजय की हत्या भी कराना चाहती थी. लेकिन वह शादीशुदा तथा 2 बच्चों का बाप है, इसलिए यह सब करने के लिए तैयार नहीं हुआ.

जब शिववती ने उस पर दबाव बढ़ाया तो उस ने शिववती से छुटकारा पाने की योजना बना ली. घटना वाली शाम उस ने उसे गांव के बाहर मिलने को कहा. वह वहां पहुंचा तो शिववती उसे अरहर के खेत में ले गई. वह सजधज कर आई थी. उस ने उस पर दबाव बनाया कि वह उसे आज ही अपने साथ भगा कर ले चले.

उस ने शिववती को समझाना चाहा तो वह भड़क उठी. गुस्से में उस ने शिववती को दबोच लिया और उसी के शाल से उस का गला घोंट दिया. इस के बाद फरार हो गया. जुर्म कबूलने के बाद अजय ने वह शाल भी बरामद करा दिया, जिस से उस ने शिववती का गला घोंटा था.

8 जनवरी, 2019 को पुलिस ने अभियुक्त अजय कुमार को कानपुर देहात की कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल माती भेज दिया गया.  द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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