Hindi Kahani: नहीं बचे आंसू – सुधा ने कैसे उठाया जवानी का फायदा

Hindi Kahani: सुधा का पति राम सजीवन दूरसंचार महकमे में लाइनमैन था. एक दिन काम के दौरान वह खंभे से गिर गया. उसे गहरी चोट लगी. अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उस ने दम तोड़ दिया.

सुधा की जिंदगी में अंधेरा छा गया. वह कम पढ़ीलिखी देहाती औरत थी. उस के 2 मासूम बच्चे थे. बड़ा बेटा पहली क्लास में पढ़ता था और छोटा 2 साल का था.

पति का क्रियाकर्म हो गया, तो सुधा ससुराल से मायके चली आई. वहां उस के बड़े भाई सुखनंदन ने कहा, ‘‘बहन, जो होना था, वह तो हो ही गया. गम भुलाओ और आगे की सोचो. बताओ कि नौकरी करोगी? बहनोई की जगह तुम्हें नौकरी मिल जाएगी. एक नेता मेरे जानने वाले हैं. उन से कहूंगा तो वे जल्दी ही तुम्हें नौकरी पर रखवा देंगे.’’

‘‘कुछ तो करना ही होगा भैया, वरना इन बच्चों का क्या होगा? लेकिन, मैं 8वीं जमात तक ही तो पढ़ी हूं. क्या मुझे नौकरी मिल जाएगी?’’ सुधा ने पूछा.

‘‘चपरासी की नौकरी तो मिल ही जाएगी. मैं आज ही नेता से मिलता हूं,’’ सुखनंदन बोला.

सुखनंदन की दौड़धूप काम आई और सुधा को जल्दी ही नौकरी मिल गई. ‘‘बहन, तुम बच्चों को ले कर शहर में रहो. मैं वहां आताजाता रहूंगा. कोई चिंता की बात नहीं है. तुम्हारी तरह बहुत सी औरतें हैं दुनिया में, जो हिम्मत से काम ले कर अपनी और बच्चों की जिंदगी संवार रही हैं,’’ सुखनंदन ने बहन का हौसला बढ़ाया.

सुधा शहर आ गई और किराए के मकान में रह कर चपरासी की नौकरी करने लगी. उस ने पास के स्कूल में बड़े बेटे का दाखिला करा दिया.

सुखनंदन सुधा का पूरा खयाल रखता था. वह बीचबीच में गांव से राशन वगैरह ले कर आया करता था. फोन पर तो रोज ही बात कर लिया करता था.

सुधा खूबसूरत और जवान थी. महकमे के कई अफसर और बाबू उसे देख कर लार टपकाते रहते थे. उस से नजदीकी बनाने के लिए भी कोई उस के प्रति हमदर्दी जताता, तो कोई रुपएपैसे का लालच देता.

सुधा का मकान मालिक भी रसिया किस्म का था. वह नशेड़ी भी था. सुधा पर उस की नीयत खराब थी. कभीकभी शराब के नशे में वह आधी रात में उस का दरवाजा खटखटाया करता था. आतेजाते कई मनचले भी सुधा को छेड़ा करते थे. किसी तरह दिन कटते रहे और सुधा खुद को बचाती रही. उस के साथ राजू नाम का एक चपरासी काम करता था. वह उस का दीवाना था, लेकिन दिल की बात जबान पर नहीं ला पा रहा था.

राजू बदमाश किस्म का आदमी था और शराब का नशा भी करता था. वह अकसर लोगों के साथ मारपीट किया करता था, लेकिन सुधा से बेहद अच्छी बातें किया करता था.

राजू उसे भरोसा दिलाता था, ‘‘मेरे रहते चिंता बिलकुल मत करना. कोई आंख उठा कर देखे तो बताना… मैं उस की आंख निकाल लूंगा.’’

सुधा को राजू अकसर घर भी छोड़ दिया करता था. कुछ दिनों बाद राजू सुधा को घुमानेफिराने भी लगा. सुधा को भी उस का साथ भाने लगा. वह राजू से खुल कर हंसनेबोलने लगी.

जल्दी ही दोनों के बीच प्यार हो गया. अब तो राजू उस के घर आ कर उठनेबैठने लगा. सुधा के बच्चे उसे ‘अंकल’ कहने लगे. वह बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें भी लाया करता था.

सुधा के पड़ोस में एक और किराएदार रहता था. राजू ने उस से दोस्ती कर ली.

एक दिन वह किराएदार अपने गांव जाने लगा, तो राजू ने उस से मकान की चाबी मांग ली. दिन में उस ने सुधा से कहा, ‘‘आज रात मैं तुम्हारे साथ गुजारूंगा.’’

‘‘लेकिन, कैसे? बच्चे भी तो हैं,’’ सुधा ने समस्या रखी.

‘‘उस की चिंता तुम बिलकुल न करो…’’ यह कह कर उस ने जेब से चाबी निकाली और कहा, ‘‘यह देखो, मैं ने सुबह ही इंतजाम कर लिया है. आज तुम्हारा पड़ोसी गांव चला गया है. रात को मैं आऊंगा और उसी के कमरे में…’’

सुधा मुसकराई और फिर शरमा कर उस ने सिर झुका लिया. उस की भी इच्छा हो रही थी और वह राजू की बांहों में समा जाना चाहती थी.

राजू देर रात शराब के नशे में आया. उस ने सुधा के पड़ोसी के मकान का दरवाजा खोला. आहट मिली तो सुधा जाग गई. उस के दोनों बेटे सो रहे थे. उस ने आहिस्ता से अपना दरवाजा बंद किया और पड़ोसी के कमरे में चली गई.

राजू ने फौरन दरवाजा बंद कर लिया. उस के बाद जो होना था, वह देर रात तक होता रहा. लंबे अरसे बाद उस रात सुधा को जिस्मानी सुख मिला था. वह राजू की बांहों में खो गई थी. तड़के राजू चला गया और सुधा अपने कमरे में आ गई.

सुधा और पड़ोसी के मकान के बीच जो दीवार थी, उस में दरवाजा लगा था. पहले जो किराएदार रहता था, उस ने दोनों कमरे ले रखे थे. वह जब मकान छोड़ कर गया, तो मालिक ने दोनों कमरों के बीच का दरवाजा बंद कर दिया और ज्यादा किराए के लालच में 2 किराएदार रख लिए. अब उसे एक हजार की जगह 2 हजार रुपए मिलने लगे.

उस रात के बाद राजू अकसर सुधा के घर देर रात आने लगा. कई बार सुधा का भाई सुबहसुबह ही आ जाता और राजू अंदर. ऐसी हालत में बीच का दरवाजा काम आता था. राजू उस दरवाजे से पड़ोसी के मकान में दाखिल हो जाता था.

सुधा के भाई को कभी शक ही नहीं हुआ कि बहन क्या गुल खिला रही है. वह तो उसे सीधीसादी, गांव की भोलीभाली औरत मानता था. राजू का अपना भी परिवार था. बीवी थी, 4 बच्चे थे. परिवार के साथ वह किसी झुग्गी बस्ती में रहता था. बीवी उस से बेहद परेशान थी, क्योंकि वह पगार का काफी हिस्सा शराबखोरी में उड़ा दिया करता था.

बीवी मना करती, तो राजू उस के साथ मारपीट भी करता था. पैसों के बिना न तो ठीक से घर चल रहा था और न ही बच्चे पढ़लिख पा रहे थे.

पहले तो राजू कुछ रुपए घर में दे दिया करता था, लेकिन जब से उस की सुधा से नजदीकी बढ़ी, तब से पूरी तनख्वाह ला कर उसे ही थमा दिया करता था.

सुधा उस के पैसों से अपना शहर का खर्च चलाती और अपनी तनख्वाह बैंक में जमा कर देती. वह काफी चालाक हो गई थी. राजू डालडाल तो सुधा पातपात थी.

उधर राजू की बीवी घर चलाने के लिए कई बड़े लोगों के घरों में नौकरानी का काम करने लगी थी. वह खून के आंसू रो रही थी. लेकिन उस ने कोई गलत रास्ता नहीं चुना, मेहनत कर के किसी तरह बच्चों को पालती रही.

कुछ साल बाद रकम जुड़ गई, तो सुधा ने ससुराल में अपना मकान बनवा लिया. ससुराल वालों ने हालांकि उस का विरोध किया कि वह गांव में न रहे, वे उस का हिस्सा हड़प कर जाना चाहते थे, लेकिन पैसा मुट्ठी में होने से सुधा में ताकत आ गई थी. उस ने जेठ को धमकाया, तो वह डर गया. सुधा का बढि़या मकान बन गया.

‘‘भैया, तुम मेरा पास के टैलीफोन के दफ्तर में ट्रांसफर करा दो नेता से कह कर. इस से मैं घर और खेतीबारी भी देख सकूंगी,’’ एक दिन सुधा ने भाईर् से कहा.

‘‘मैं कोशिश करता हूं,’’  सुखनंदन ने उसे भरोसा दिलाया.

कुछ महीने बाद सुधा का तबादला उस के गांव के पास के कसबे में हो गया. यह जानकारी जब राजू को हुई, तो वह बेहद गुस्सा हुआ और बोला, ‘‘मेरे साथ इतनी बड़ी गद्दारी? तुम्हारे चलते मैं ने अपने बालबच्चे छोड़ दिए और तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी? ऐसा कतई नहीं होगा. या तो मैं तुम्हें मार डालूंगा या खुद ही जान दे दूंगा. तुम्हारी जुदाई मैं बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘राजू, तुम मरो या जीओ, इस से मेरा कोई मतलब नहीं. यह मेरी मजबूरी थी कि मैं ने तुम से संबंध बनाया. तमाम लोगों से बचने के लिए मैं ने तुम्हारा हाथ पकड़ा. अब मेरा सारा काम बन चुका है. मुझे हाथ उठाने के बारे में सोचना भी नहीं, वरना जेल की हवा खाओगे. आज के बाद मुझ से मिलना भी नहीं,’’ सुधा ने धमकाया.

राजू डर गया. वह सुधा के सामने रोनेगिड़गिड़ाने लगा, लेकिन सुधा का दिल नहीं पसीजा. अगले ही दिन वह मकान खाली कर गांव चली गई.

प्यार में पागल राजू सुधा का गम बरदाश्त नहीं कर सका. कुछ दिन बाद उस ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. जब राजू की पत्नी को उस के मरने की खबर मिली, तो वह बोली, ‘‘मेरे लिए तो वह बहुत पहले ही मर गया था. उस ने मुझे इतना रुलाया कि आज उस की मिट्टी के सामने रोने के लिए मेरी आंखों में आंसू नहीं बचे हैं,’’ यह कह कर वह बेहोश हो कर गिर पड़ी.

राजू के घर के सामने लोगों की भीड़ लग गई. लोग पानी के छींटे मार कर उस की पत्नी को होश में लाने की कोशिश कर रहे थे. Hindi Kahani

Hindi Story: बहू – कैसे बुझी शाहिदा की प्यास

Hindi Story: शाहिदा शेख प्रोफैसर महमूद शौकत की छात्रा रह चुकी थी. 3 साल पहले बीए की डिगरी ले कर वह घर बैठ गई थी. कुछ दिनों पहले न जाने कैसे और कब वह प्रोफैसर से आ मिली, कब दिलोदिमाग पर छाई, कब हवस बन कर रोमरोम में समा गई, उन्हें कुछ नहीं याद. यह भी याद नहीं कि पहले किस ने किस को बेपरदा किया था.

अगर याददाश्त में कुछ महफूज रखा था तो बस शाहिदा शेख की चंचलता, अल्हड़ता और उस का मादक शरीर जो उन की खाली जिंदगी और ढलती उम्र के लिए खास तोहफे की तरह था.

यही हाल शाहिदा शेख का भी था, क्योंकि दोनों ही एकदूसरे के बिना अधूरापन महसूस करते थे.

शाहिदा शेख अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी, इसलिए एक प्रोफैसर का उन के घर आनाजाना किसी इज्जत से कम न था. उन्हें अपनी बेटी पर फख्र भी होता था कि यह इज्जत उन्हें उसी के चलते मिल रही थी. वे समझते थे कि प्रोफैसर उन की बेटी को अपनी बेटी की तरह मानते हैं.

प्रोफैसर महमूद शौकत को दिलफेंक, आशिकमिजाज या हवस का पुजारी कहा जाए, ऐसा कतई न था, बल्कि वे तो ऐसे लोगों में से थे जो हर समय गंभीरता ओढ़े रहते हैं. अलबत्ता, वे सठिया जरूर गए थे यानी उन की उम्र 60वें साल में घुस चुकी थी.

प्रोफैसर महमूद शौकत की पत्नी 10 साल पहले ही इस दुनिया से जा चुकी थीं. पत्नी की इस अचानक जुदाई से प्रोफैसर महमूद शौकत ऐसे बिखरे थे कि उन का सिमटना मुहाल हो गया था. कालेज जाना तो दूर खानेपीने तक की सुध न रहती थी. हां, कुछ होश था तो बस उन्हें अपनी बेटी का, जो जवानी की दहलीज पर थी. अब तो वह भी अपने घरबार की हो गई थी और 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और एक निजी कंपनी में मुलाजिम था. प्रोफैसर महमूद शौकत समय से पहले रिटायरमैंट ले कर खुद आराम से सुख भोग रहे थे.

इधर लगातार कई दिनों से प्रोफैसर महमूद शौकत शाहिदा शेख का दीदार न कर सके थे. इंतजार जब आंख का कांटा बन गया तो वे सीधे उस के घर जा पहुंचे. पता चला कि वह पिछले 10 दिनों से मलेरिया से पीडि़त थी. खैर, अब कुछ राहत थी लेकिन कमजोरी ऐसी कि उठनाबैठना मुहाल हो गया था.

प्रोफैसर महमूद शौकत जैसे ही शाहिदा शेख के बैडरूम में गए, उन्हें देखते ही शाहिदा की निराश आंखें चमक उठीं और बीमार मुरझाया चेहरा खिल गया.

इस बीच प्रोफैसर महमूद शौकत शाहिदा की नब्ज देखने के लिए उस पर झुके थे कि उस ने झट उन पर गलबहियां डाल दीं और अपने तपतेसुलगते होंठों को उन के होंठों में धंसा दिया.

शाहिदा शेख के ऐसे बरताव से प्रोफैसर महमूद शौकत शर्मिंदा हो उठे और खुद को उस की पकड़ से छुड़ाते हुए बोले, ‘‘प्लीज, मौके की नजाकत को समझो.’’

‘‘समझ रही हूं सर कि मम्मी हमारे बीच दीवार बनी हुई हैं. मैं तो उम्मीद कर रही हूं कि वे थोड़ी देर के लिए ही सही, किसी काम से बाहर चली जाएं और हम एकदूसरे में…’’

शाहिदा की पकड़ से छूट कर प्रोफैसर महमूद शौकत सोफे पर बैठे ही थे कि शाहिदा की मम्मी चायनमकीन लिए कमरे में आ धमकीं.

यह देख प्रोफैसर का जी धक से हो गया और चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वे सोचने लगे कि अगर वे कुछ समय पहले आ जातीं तो…

बहरहाल, चाय की चुसकियों के दौरान उन में बातें होने लगीं. फिर शाहिदा की मम्मी अपने घराने और शाहिदा से संबंधित बातों की गठरी खोल बैठीं. बातों ही बातों में उस के ब्याह की चर्चा छेड़ दी. वे कहने लगीं, ‘‘प्रोफैसर साहब, हम पिछले 3 महीनों से शाहिदा के लिए लड़का खोज रहे हैं, पर अच्छे लड़कों का तो जैसे अकाल पड़ा है. देखिए न कोई मुनासिब लड़का हमारी शाहिदा के लिए.’’

इस से पहले कि प्रोफैसर कुछ कहते, शाहिदा झट से बोल पड़ी, ‘‘सर, अपनी ही कालोनी में देखिएगा, ताकि शादी के बाद भी मैं आप के करीब रहूं.’’

उस रात प्रोफैसर सो नहीं सके थे. शाहिदा का कहा उन के दिमाग में गूंजने लगता और वे चौंक कर उठ बैठते.

इसी उधेड़बुन में वे धीरेधीरे फ्लैशबैक में चले गए.

होटल मेघदूत के आलीशान कमरे में नरम बिस्तर पर शाहिदा शेख बिना कपड़ों के प्रोफैसर महमूद शौकत की बांहों में सिमटी कह रही थी, ‘जी तो चाहता है सर, मैं जवानी की सभी घडि़यां आप की बांहों में बिताऊं. आप ऐसे ही मेरे बदन के तारों को छेड़ते रहें और मैं आप की मर्दानगी से मस्त होती रहूं.’

इतना सुनने के बाद प्रोफैसर ने उस के रेशमी बालों से खेलते हुए पूछा था, ‘तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम जो कर रहे हैं, वह गुनाह है?’

शाहिदा ने न में सिर हिला दिया.

‘क्यों?’

‘क्योंकि, सैक्स कुदरत की देन है. इस को गुनाह कैसे कह सकते हैं. वैसे भी सर, मैं तो मानती हूं कि यह केवल हमारी शारीरिक जरूरत है. आप मर्द हैं और आप को मेरी जवानी चाहिए. मैं औरत हूं और मुझे आप की मर्दानगी की तलब है.’

‘ओह मेरी जान,’ शाहिदा की इस बात पर प्रोफैसर महमूद शौकत चहक उठे थे. साथ ही, उन के होंठ उस के होंठों पर झुकते चले गए.

शाहिदा इस अचानक हल्ले के लिए तैयार न थी, फिर भी उन की छुअन ने उस के शरीर को झनझना दिया था और उस का कोमल शरीर उन की बांहों के घेरे में फड़फड़ाने लगा था.

प्रोफैसर का यह कामुक हल्ला इतना तेज… इतना वहशियाना था कि शाहिदा का पोरपोर उधेड़े दे रहा था. शाहिदा भी अपने शरीर को ऐसे ढीला छोड़ रही थी मानो खुद को हारा हुआ मान लिया हो.

कुछ मिनट तक दोनों ऐसे ही बिस्तर पर उधड़ेउधड़े बिखरेबिखरे से रहे, फिर किसी तरह शाहिदा खुद को अपने में बटोरतेसमेटते फुसफुसाई, ‘सर…’

‘क्या…’

‘इस उम्र में भी आप में नौजवानों से कहीं ज्यादा मर्दानगी का जोश है.’

यह सुन कर प्रोफैसर महमूद शौकत हैरानी से उसे देखने लगे.

‘हां सर, मुझे तो अपने साथी लड़कों से कहीं ज्यादा सुख आप से मिलता है.’

‘लेकिन, तुम यह कैसे कह सकती हो?’ प्रोफैसर की आवाज में बौखलाहट आ गई थी.

‘आजमाया है मैं ने… 1-2 को नहीं, दसियों को.’

‘यानी तुम उन के साथ…’

‘बिलकुल, शायद पहले भी आप से कह चुकी हूं कि मेरे लिए जिंदगी मौत का नजरअंदाज किया हुआ एक पल है, तो क्यों न मैं हर पल को ज्यादा से ज्यादा भोगूं…’

यह सुन कर प्रोफैसर चौंक उठते हैं और फ्लैशबैक से वापस आ जाते हैं. वे फटीफटी आंखों से शून्य में घूरने लगते हैं और धीरेधीरे वह शून्य सिनेमा के परदे में बदल जाता है. उस में 2 धुंधली छाया निकाह कर रही होती हैं. जैसेजैसे दूल्हे के मुंह से ‘कबूल है’ की गिनती बढ़ती है, दुलहन शाहिदा का और दूल्हा प्रोफैसर का रूप धर लेता है.

उसी पल प्रोफैसर की बेटी अपने दोनों बच्चों की उंगली थामे शाहिदा के सामने आ खड़ी होती है और उन का यह सुंदर सपना इस तरह गायब हो जाता है जैसे बिजली गुल होने पर टैलीविजन स्क्रीन से चित्र.

सुबह होते ही प्रोफैसर शौकत बिना सोचेसमझे शाहिदा के घर जा पहुंचे. डोर बैल की आवाज पर शाहिदा की मम्मी ने दरवाजा खोला और अपने सामने प्रोफैसर को देख वे हैरत में डूब गईं, ‘‘प्रोफैसर साहब, आप…’’

प्रोफैसर महमूद शौकत चुपचाप निढाल कदमों से अंदर गए और खुद को सोफे पर गिराते हुए पूछा, ‘‘शेख साहब कहां हैं?’’

‘‘वे तो सो रहे हैं…’’ कहते हुए शाहिदा की मम्मी ने उन की आंखों में झांका, ‘‘अरे, आप की आंखें… लगता है, सारी रात आप जागते रहे हैं.’’

‘‘हां… मैं रातभर शाहिदा के निकाह को ले कर उलझा रहा… आप ने कहा था न कि मैं उस के लिए लड़का देखूं?’’

‘‘तो देखा आप ने?’’ मम्मी जानने के लिए उत्सुक हो गईं, ‘‘कौन है? क्या करता है? मतलब काम… फैमिली बैकग्राउंड क्या है?

‘‘अजी सुनते हो, उठो जल्दी… देखो, प्रोफैसर साहब आए हैं. हमारी शाहिदा के लिए लड़का देख रखा है इन्होंने. कितना ध्यान रखते हैं हमारी शाहिदा का.’’

‘‘महान नहीं, खुदा हैं खुदा,’’ शेख साहब ने आते हुए कहा.

‘‘खुदा तो आप हैं, एक हूर जैसी लड़की के पिता जो हैं. मगर आप दोनों मियांबीवी को एतराज न हो तो मैं शाहिदा को अपने घर… मतलब… मेरे बेटे को तो आप लोग जानते ही हैं, और…’’

‘‘बसबस, इस से बढ़ कर खुशी और क्या हो सकती है हमारे लिए,’’ मिस्टर शेख ने कहा, ‘‘हमारी शाहिदा आप के घर जाएगी तो हमें ऐसा लगेगा जैसे अपने ही घर में है, हमारे साथ.’’

फिर क्या था, आननफानन बड़े ही धूमधाम से शाहिदा प्रोफैसर के बेटे से ब्याह दी गई. वह प्रोफैसर के घर आ कर बहुत खुश थी. बेटा भी शाहिदा जैसी जीवनसाथी पा कर फूला न समाता था. दुलहनिया को ले कर हनीमून मनाने वह महाबलेश्वर चला गया.

प्रोफैसर चाहते हुए भी उसे रोक न सके और भीतर ही भीतर ऐंठ कर रह गए. खैर, दिन तो जैसेतैसे कट गया, पर रात काटे न कटती थी. वे जैसे ही आंखें मूंदते, उन्हें बेटे और बहू का वजूद आपस में ऐसे लिपटा दिखाई देता मानो दोनों एकदूसरे में समा जाना चाहते हों. ऐसे में उन्हें बेवफा महबूबा और बेटा अपना दुश्मन मालूम होने लगते. रहरह कर उन्हें ऐसा भी महसूस होता कि बेटे की मर्दानगी का जोश शाहिदा की जवानी की दीवानगी से हार रहा है.

बेटे और बहू को हनीमून पर गए 3 दिन बीत चुके थे. इस बीच प्रोफैसर की हालत पतली हो गई थी. घर में होते तो दिमाग पर शाहिदा का मादक यौवन छाया रहता या अपने ही बेटे की दुश्मनी में चुपकेचुपके सुलगते रहते. उन्हें यह तक खयाल न आता कि अब उन के और शाहिदा के बीच रिश्ते की दीवार खड़ी कर दी गई है. बेटे के संग गठबंधन ने उसे प्रेमिका से बहू बना दिया है. बहू यानी बेटी. वे अपनी इस चूक पर बस हाथ मलते थे.

इन्हीं दिनों उन का एक छात्र किसी काम के चलते उन से मिलने आया. इधरउधर की बातों के दौरान उस ने बताया कि बीकौम के बाद वह एक मैन पावर कंसलटैंसी में अकाउंटैंट के तौर पर काम कर रहा है. फिर उस ने प्रोफैसर के पूछने पर उस फर्म के काम करने के तरीके के बारे में बताया.

उस रात उन्हें काफी सुकून व बहके खयालात में ठहराव का अहसास हुआ. ऐसा महसूस होने लगा जैसे उस छात्र की मुलाकात ने उन्हें सांप के काटे का मंत्र सिखा दिया हो.

बेटा और बहू यानी प्रेमिका पूरे 20 दिन बाद हनीमून से लौटे थे. बेटा शाहिदा का साथ पा कर बेहद खुश दिखाई दे रहा था. देखने में तो शाहिदा भी खुश थी, पर उस की आंखों से खुशियों की चमक गायब थी.

प्रोफैसर की नजर ने सबकुछ पलक झपकते ही ताड़ लिया था और वे चिंता की गहराइयों में डूब गए थे.

अगले दिन चायनाश्ते के बाद प्रोफैसर महमूद शौकत ने अपने बेटे को कमरे में बुलाया और दुनियादारी, जमाने की ऊंचनीच का पाठ पढ़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा, अब तक तुम केवल अपनी जिंदगी के जिम्मेदार थे, पर अब एक और जिंदगी तुम से जुड़ चुकी है यानी तुम एक से 2 हो चुके हो. आने वाले दिनों में 3, फिर 4 हो जाओगे.

‘‘जरूरतों और खर्चों में बढ़ोतरी लाजिमी है, जबकि आमदनी वही होगी जो तुम तनख्वाह पाते हो, इसलिए मैं ने तुम्हारे सुनहरे भविष्य के लिए, तुम्हारी मरजी जाने बिना मौजूदा नौकरी से बढि़या और 4 गुना ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरी का जुगाड़ कर दिया है.’’

इस बीच प्रोफैसर महमूद शौकत की नजर के पीछे खड़ी शाहिदा पर जमी थी. उस की आंखों में खुशी की लहरें और होंठों पर कामुक मुसकान रेंग रही थी. उस के इस भाव से खुश होते हुए उन्होंने मेज की दराज से एक लिफाफा निकाला और उसे शहिदा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘शाहिदा, यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए एक छोटा सा तोहफा है.’’

‘‘शुक्रिया,’’ शाहिदा धीरे से बोली.

‘‘अगर अब तुम इस तोहफे को अपने हाथों से मेरे बेटे को दे दो तो यकीनन यह तोहफा बेशकीमती हो जाएगा.’’

वह उन की इच्छा भांप गई और एक अदा से लजाते, इठलाते हुए उस ने लिफाफा शौहर की ओर बढ़ा दिया.

बेटे को शाहिदा की इस अदा पर प्यार उमड़ आया. वह उसे चाहत भरी नजर से देखते हुए लिफाफा थाम कर ‘शुक्रिया डार्लिंग’ बोला.

लिफाफे में मोटे शब्दों में लिखा था, ‘पिता की तरफ से बेटे को अनमोल तोहफा’. उस में जो कागज था, वह

बेटे की दुबई में नौकरी का अपौंइटमैंट लैटर था. साथ में वीजा, पासपोर्ट और हवाईजहाज की टिकट भी थी. यह पढ़ते ही बेटे के हाथ कांपने लगे. Hindi Story

Story In Hindi: कलंक – आखिर किसने किया रधिया की बेटी गंगा को मैला

Story In Hindi: अपनी बेटी गंगा की लाश के पास रधिया पत्थर सी बुत बनी बैठी थी. लोग आते, बैठते और चले जाते. कोई दिलासा दे रहा था तो कोई उलाहना दे रहा था कि पहले ही उस के चालचलन पर नजर रखी होती तो यह दिन तो न देखना पड़ता.

लोगों के यहां झाड़ूबरतन करने वाली रधिया चाहती थी कि गंगा पढ़ेलिखे ताकि उसे अपनी मां की तरह नरक सी जिंदगी न जीनी पड़े, इसीलिए पास के सरकारी स्कूल में उस का दाखिला करवाया था, पर एक दिन भी स्कूल न गई गंगा. मजबूरन उसे अपने साथ ही काम पर ले जाती. सारा दिन नशे में चूर रहने वाले शराबी पति गंगू के सहारे कैसे छोड़ देती नन्ही सी जान को?

गंगू सारा दिन नशे में चूर रहता, फिर शाम को रधिया से पैसे छीन कर ठेके पर जाता, वापस आ कर मारपीट करता और नन्ही गंगा के सामने ही रधिया को अपनी वासना का शिकार बनाता.

यही सब देखदेख कर गंगा बड़ी हो रही थी. अब उसे अपनी मां के साथ काम पर जाना अच्छा नहीं लगता था. बस, गलियों में इधरउधर घूमनाफिरना… काजलबिंदी लगा कर मतवाली चाल चलती गंगा को जब लड़के छेड़ते, तो उसे बहुत मजा आता.

रधिया लाख कहती, ‘अब तू बड़ी हो गई है… मेरे साथ काम पर चलेगी तो मुझे भी थोड़ा सहारा हो जाएगा.’

गंगा तुनक कर कहती, ‘मां, मुझे सारी जिंदगी यही सब करना है. थोड़े दिन तो मुझे मजे करने दे.’

‘अरी कलमुंही, मजे के चक्कर में कहीं मुंह काला मत करवा आना. मुझे तो तेरे रंगढंग ठीक नहीं लगते. यह क्या… अभी से बनसंवर कर घूमतीफिरती रहती है?

इस पर गंगा बड़े लाड़ से रधिया के गले में बांहें डाल कर कहती, ‘मां, मेरी सब सहेलियां तो ऐसे ही सजधज कर घूमतीफिरती हैं, फिर मैं ने थोड़ी काजलबिंदी लगा ली, तो कौन सा गुनाह कर दिया? तू चिंता न कर मां, मैं ऐसा कुछ न करूंगी.’

पर सच तो यही था कि गंगा भटक रही थी. एक दिन गली के मोड़ पर अचानक पड़ोस में ही रहने वाले 2 बच्चों के बाप नंदू से टकराई, तो उस के तनबदन में सिहरन सी दौड़ गई. इस के बाद तो वह जानबूझ कर उसी रास्ते से गुजरती और नंदू से टकराने की पूरी कोशिश करती.

नंदू भी उस की नजरों के तीर से खुद को न बचा सका और यह भूल बैठा कि उस की पत्नी और बच्चे भी हैं. अब तो दोनों छिपछिप कर मिलते और उन्होंने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं.

पर इश्क और मुश्क कब छिपाए छिपते हैं. एक दिन नंदू की पत्नी जमना के कानों तक यह बात पहुंच ही गई, तो उस ने रधिया की खोली के सामने खड़े हो कर गंगा को खूब खरीखोटी सुनाई, ‘अरी गंगा, बाहर निकल. अरी कलमुंही, तू ने मेरी गृहस्थी क्यों उजाड़ी? इतनी ही आग लगी थी, तो चकला खोल कर बैठ जाती. जरा मेरे बच्चों के बारे में तो सोचा होता. नाम गंगा और काम देखो करमजली के…’

3 दिन के बाद गंगा और नंदू बदनामी के डर से कहीं भाग गए. रोतीपीटती जमना रोज गंगा को कोसती और बद्दुआएं देती रहती. तकरीबन 2 महीने तक तो नंदू और गंगा इधरउधर भटकते रहे, फिर एक दिन मंदिर में दोनों ने फेरे ले लिए और नंदू ने जमना से कह दिया कि अब गंगा भी उस की पत्नी है और अगर उसे पति का साथ चाहिए, तो उसे गंगा को अपनी सौतन के रूप में अपनाना ही होगा.

मरती क्या न करती जमना, उसे गंगा को अपनाना ही पड़ा. पर आखिर तो जमना उस के बच्चों की मां थी और उस के साथ उस ने शादी की थी, इसलिए नंदू पर पहला हक तो उसी का था.

शादी के 3 साल बाद भी गंगा मां नहीं बन सकी, क्योंकि नंदू की पहले ही नसबंदी हो चुकी थी. यह बात पता चलते ही गंगा खूब रोई और खूब झगड़ा भी किया, ‘क्यों रे नंदू, जब तू ने पहले ही नसबंदी करवा रखी थी तो मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की?’

नंदू के कुछ कहने से पहले ही जमना बोल पड़ी, ‘आग तो तेरे ही तनबदन में लगी थी. अरी, जिसे खुद ही बरबाद होने का शौक हो उसे कौन बचा सकता है?’

उस दिन के बाद गंगा बौखलाई सी रहती. बारबार नंदू से जमना को छोड़ देने के लिए कहती, ‘नंदू, चल न हम कहीं और चलते हैं. जमना को छोड़ दे. हम दूसरी खोली ले लेंगे.’

इस पर नंदू उसे झिड़क देता, ‘और खोली के पैसे क्या तेरा शराबी बाप देगा? और फिर जमना मेरी पत्नी है. मेरे बच्चों की मां है. मैं उसे नहीं छोड़ सकता.’

इस पर गंगा दांत पीसते हुए कहती, ‘उसे नहीं छोड़ सकता तो मुझे छोड़ दे.’

इस पर गंगू कोई जवाब नहीं देता. आखिर उसे 2-2 औरतों का साथ जो मिल रहा था. यह सुख वह कैसे छोड़ देता. पर गंगा रोज इस बात को ले कर नंदू से झगड़ा करती और मार खाती. जमना के सामने उसे अपना ओहदा बिलकुल अदना सा लगता. आखिर क्या लगती है वह नंदू की… सिर्फ एक रखैल.

जब वह खोली से बाहर निकलती तो लोग ताने मारते और खोली के अंदर जमना की जलती निगाहों का सामना करती. जमना ने बच्चों को भी सिखा रखा था, इसलिए वे भी गंगा की इज्जत नहीं करते थे. बस्ती के सारे मर्द उसे गंदी नजर से देखते थे.

मांबाप ने भी उस से सभी संबंध खत्म कर दिए थे. ऐसे में गंगा का जीना दूभर हो गया और आखिर एक दिन उस ने रेल के आगे छलांग लगा दी और रधिया की बेटी गंगा मैली होने का कलंक लिए दुनिया से चली गई. Story In Hindi

Hindi Story: वक्त का दोहराव – शशांक को आखिर कौन सी बात याद आई

Hindi Story: शशांक दबे पांव छत पर पहुंचा. पूरे महल्ले में निस्तब्धता छाई हुई थी. कहीं आग से झुलसे मकान, टूटी दुकानें, सड़कों पर टूटी लाठियां, ईंटपत्थर और कहींकहीं तो खून के धब्बे भी नजर आ रहे थे. कितना खौफनाक मंजर था. हिंदू-मुसलिम दंगे ने नफरत की ऐसी आग लगाई है कि इंसान सभ्यता की सभी हदों को लांघ कर दरिंदगी पर उतर आता है.

राजनीतिबाज न जाने कब बाज आएंगे अपनी रोटियां सेंकने से. शशांक के अंतर में अपने दादाजी के कहे वो शब्द याद आ रहे थे कि नेता लोग राजनीति खेल जाते हैं और कितने ही लोग अपनी जान से खेल जाते हैं…

भारत-पाकिस्तान का बंटवारा. मानो एक हंसतेखेलते परिवार का दोफाड़ कर दिया गया. कौन अपना, कौन पराया. हिंदू-मुसलमानों के मन में ऐसा जहर घोला कि देखते ही देखते कल तक एक ही थाली में साथसाथ खाते दोस्त एकदूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे. अपने पिताजी के मुंह से सुनी थी उस ने उस वक्त की दास्तान. आज वही कहानी फिर से उस की आंखों के सामने पसरने लगी थी…

हवेलीनुमा दोमंजिला घर और बहुत बड़ा चौक, चौक को पार कर के एक बहुत बड़ा दरवाजा, दरवाजा क्या था, पूरा किले का दरवाजा था, बड़ीबड़ी सांकल, सेफ पोल, बड़ेबड़े ताले उस दरवाजे को खोलना व बंद करना हर एक के बस की बात नहीं थी. मास्टर जीवन लाल ही उसे अपने मुलाजिमों के साथ मिल कर खोलते व बंद करते थे.

लेकिन आज यह क्या, वही दरवाजा, ऐसे लगता था कि बस अब गिरा तब गिरा. लगता भी क्यों न, आज एक बहुत बड़ा झुंड उस दरवाजे को धकेल रहा था, पीट रहा था, यह कैसा झुंड था?

मास्टर जीवनलाल जिन का इस पूरे शहर में नाम था, इज्जत थी, रुतबा था, आज वही मास्टरजी अपने पूरे परिवार के साथ इस हवेली में सांस रोके बैठे हैं.

परिवार में पत्नी, 3 बेटे, 3 बेटियां, बहू, सालभर का एक पोता सभी तो हैं, हंसता खेलता परिवार है.

कुछ समय से चल रही हिंदू मुसलमानों की आपस की दूरियां दिख तो रही थीं पर हालात ऐसे हो जाएंगे, किसी ने सोचा भी न था.

मुसलमान और हिंदू एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे, आपस में इतनी नफरत होगी, कभी किसी ने सोचा भी न था. यह क्या हो गया भाइयो, जन्मजन्म से एकदूसरे के साथ रहते आए परिवार एकदूसरे से इतनी नफरत क्यों करने लगे.

हालात ऐसे हो गए थे कि जवान लड़कियों को उठा कर ले जाया जा रहा था.  बूढ़ों को मार दिया जा रहा था. मास्टर जीवन लाल अपनी तीनों जवान लड़कियों और बहू को हवेली की ऊपर वाली मंजिल पर पलंग के नीचे छिपाए हुए थे और दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देख रहे थे. कभी भी दरवाजा टूट सकता था.

मास्टर जीवन लाल का बड़ा बेटा, कटार लिए खड़ा था कि दरवाजा खुलते ही वह अपनी तीनों बहनों व पत्नी को इसलिए मार डालेगा कि कोई उन्हें उठा कर नहीं ले जा पाए. बहनें व पत्नी सामने मौत खड़ी देख ऐसे कांप रही थीं जैसे आंधी में डाल पर लगा पत्ता फड़फड़ा रहा हो.

पर यह क्या, दरवाजे के पीटने और धकेलते रहने के बीच एक आवाज उभरी. वह आवाज थी मास्टर जीवन लाल के किसी विद्यार्थी की. वह कह रहा था कि अरे, क्या कर रहे हो. यह तो मेरे मास्टरजी का घर है. इस घर को छोड़ दो. आगे चलो, और देखते ही देखते बाहर कुछ शांति हो गई.

रात का यह तूफान जब गुजर गया तो मास्टर जीवन लाल ने सोचा कि यहां से अपने पूरे परिवार को सहीसलामत कैसे बाहर निकाला जाए. इस सोच में वे दरवाजा खोल कर बाहर निकले तो बाहर का भयानक दृश्य देख कर रो पड़े. लाशें पड़ी हैं, कोई तड़प रहा है, कोई पानी मांग रहा है. जिस गली में वे और उन का परिवार बड़ी शान से होली, दीवाली, ईद मनाते थे, पड़ोसियों के साथ हंसीमजाक, मौजमस्ती होती थी, वही गली आज खून से नहाई हुई है. सभी आज कितने बेबस व लाचार हैं, किस को पानी पिलाएं, किस को अस्पताल पहुंचाएं. रात आए तूफान से घबराए, आगे आने वाले तूफान से अपने परिवार को बचाने के लिए वे क्या करें. अपनी तीनों जवान बेटियों को आगे आने वाले तूफान से बचाने की गरज से सबकुछ अनदेखा कर के वे आगे बढ़ गए.

मास्टर जीवन लाल जब बाहर का जायजा लेने निकले तो उन्हें पता चला कि हिंदुओं से यह जगह खाली कराई जा रही है. हिंदुओं को किसी तरह लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है और वहां से आगे.

मास्टर जीवन लाल ने यह सुना तो वे जल्दी ही अपने परिवार की हिफाजत के लिए वापस मुड़े और घर पहुंच कर उन्होंने बीवी व बच्चों से कहा कि घर खाली करने की तैयारी करो. अब यहां से सबकुछ छोड़छाड़ कर जाना होगा.

इतना सुनते ही पूरा परिवार शोक में डूब गया. ऐसा होना लाजिमी भी है. सालों से यहां रह रहे थे. यहीं पैदा हुए, यहीं बड़े हुए, यहीं पढ़े और फिर उन से कहा जाए कि यहां तुम्हारा कुछ नहीं है, तुम यहां से जाओ, कैसा लगेगा. खैर, मास्टर जीवन लाल ने हिम्मत दिखाते हुए सब को तैयार किया और जरूरी कागजात व कुछ पैसे लिए. फिर उस आलीशान हवेली को हमेशा के लिए आंसुओं से अलविदा किया.

पैर हवेली के बाहर निकले तो इतने भारी थे कि उठ ही नहीं रहे थे. दिल हाहाकार कर रहा था. परंतु फिर भी उन्होंने अपने परिवार को देखा हिम्मत की और चल पड़े.

अब मास्टर जीवन लाल बिना छत, बेसहारा अपने परिवार के साथ खुले आसमान के नीचे खड़े थे. अब उन के पास कुछ न था. हाय समय का फेर देखो, कुछ समय पहले तो खुशियों की लहरें उठ रही थीं और अब यह क्या हो गया. यह कैसा तूफान था. इस तूफानी बवंडर में कैसे फंस गए. कब बाहर निकलेंगे इस तूफान से, पता नहीं.

अब मास्टर जीवन लाल के पास एक ही मकसद था कि अपने परिवार को सहीसलामत हिंदुस्तान पहुंचाया जाए. मास्टर जीवन लाल को पता चला कि ट्रक भर कर लोगों को लाहौर तक पहुंचाया जा रहा है. बहुत कोशिश के बाद मास्टर जीवन लाल की बहू व पत्नी को एक ट्रक में जगह मिल गई. और पीछे रह गईं मास्टरजी की बेटियां व बेटे.

उफ्फ अब क्या करें अब जो रह गए उन्हें किस के सहारे छोड़ें और जो चले गए उन्हें आगे का कुछ पता नहीं. मास्टरजी इस कशमकश में खड़े थे कि फिर लोगों का जनून उभरा. मार डालो, काट डालो की आवाजें. मास्टरजी फिर से परेशान हो गए. अब वे बेटियों को कहां छिपाएं. मास्टरजी की आंखों से आंसू बह निकले.

इतने में मास्टरजी को एक फरिश्ते की आवाज सुनाई दी. सलाम अलैकम, भाईजान. मास्टरजी ने जब उस ओर देखा तो मास्टरजी के सामने चलचित्र की तरह पुरानी घटनाएं याद आ गईं. दो जिस्म एक जान हुआ करते थे. दोनों परिवार एकसाथ सारे तीजत्योहार एकसाथ मनाते थे. फिर अचानक सलीम भाई को विदेश जाना पड़ गया. और अब मिले तो इस हाल में. न हवेली अपनी थी, न ही देश अपना रह गया था. सबकुछ खत्म हो चुका था. मास्टरजी लुटेपिटे खड़े थे.

सलीम भाई ने मास्टरजी को गले लगा लिया. मास्टरजी का हाल देख कर सलीम भाई भी रो पड़े. सलीम भाई ने मास्टरजी को एक बहुत बड़ी तसल्ली दी, कहा कि भाईजान, आप की बेटियां मेरी बेटियां. अब तुम इन की फिक्र छोड़ो और लाहौर जा कर भाभीजी और बहू को खोजो. मास्टरजी के पास अब कोई चारा भी नहीं था. सलीम भाई का विश्वास ही था, और वे आगे बढ़ गए.

कितना सहा होगा उस वक्त लोगों ने जब अपनी जड़ों से उखड़ कर रिफ्यूजी बन गए होंगे. धर्म क्या यही सिखाता है हमें, तोड़ दो रिश्तों को, मानवीय संवेदनाओं का खून कर दो.

बरसों पुरानी हिंदू, मुसलमान की वह नफरत आज भी बरकरार है तो इन नेताओं की वजह से, धर्म के ठेकेदारों की वजह से, अंधविश्वास की गठरी उठाए लोगों की अंधभक्ति की वजह से.

काश, जल्दी ही हमें समझ में आ जाए कि धर्म तो दिलों को मिलाता है, चोट पर मरहम लगाता है. खून की नदियां नहीं बहाता, बच्चों को रुलाता नहीं, औरतों की इज्जत नहीं उतारता, बसेबसाए घरों को उजाड़ता नहीं. काश, यह बात आने वाली हमारी पीढ़ी जल्दी ही समझ जाए. Hindi Story

Relationship Problem: मेरी बहन का बौयफ्रैंड बदमाश है और वह मुझे धमकी दे रहा है

Relationship Problem: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं बुलंदशहर का रहने वाला हूं और मेरी उम्र 26 साल है. मेरी एक छोटी बहन है जो 24 साल की है. मेरे पिताजी की सरकारी नौकरी है. मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं. हाल ही में मुझे पता चला कि मेरी बहन का अफेयर किसी लड़के के साथ चल रहा है. हम लोग काफी खुले विचारों के हैं तो मैं ने अपनी बहन से कहा कि वह जिस से भी प्यार करती है उसे एक बार घर वालों से मिलवा दे तो वह उसे घर ले आई. जैसे ही मैं ने उस लड़के को देखा तो मैं काफी हैरान रह गया क्योंकि मैं उस लड़के को पहले से जानता था. मैं ने कई बार उसे सड़कों पर लड़तेझगड़ते देखा है और साथ ही खुलेआम सिगरेटशराब भी पीते देखा है. वह लड़का एक नंबर का बदमाश है और न ही कोई काम करता है. हमारी फैमिली काफी शरीफ है. मैं ने अपनी बहन को समझाया कि वह लड़का उस के लिए अच्छा नहीं है और वह उस के साथ खुश नहीं रह पाएगी, लेकिन इतना सुनते ही वह बेहद गुस्सा हो गई. और तो और उस लड़के ने मुझे धमकी तक दे दी कि मैं उन दोनों के रिश्ते के बीच में न आऊं. आप ही बताइए कि मैं अपनी बहन को ऐसे लड़के के साथ कैसे रहने दूं?

जवाब –

आप का चिंता करना स्वाभाविक है. आप की बहन प्यार में है तो वह उस लड़के की बुराई नहीं सुन पा रही है. आप अपनी बहन को अभी कुछ भी समझाएंगे तो उसे समझ नहीं आएगा. आप अपनी बहन से इतना कह दीजिए कि वह उस लड़के से कहे कि वह कोई अच्छी से नौकरी देख ले.

ऐसे लड़के कभी नौकरी नहीं कर सकते और न ही ऐसे लड़कों को कोई नौकरी देता है. इसी के साथ ही आप अपनी बहन को समझाइए कि शादी के बाद सब से जरूरी होता है पैसा और अगर वह लड़का कुछ कमाएगा नहीं तो उसे खुश कैसे रख पाएगा.

रही बात नशा करने की तो आप उस लड़के को जब भी कोई नशा करते देखो तो उस की वीडियो बना कर अपनी बहन को दिखा दो और उस से पूछो कि ऐसे नशेड़ी लड़के के साथ वह कैसे रह पाएगी. धीरेधीरे आप की बहन खुद समझ जाएगी कि वह लड़का उस के लिए सही नहीं है. इस के बाद भी आप की बहन न समझे तो आप उस के सामने शर्त रख दीजिए कि अगर वह उसी लड़के के साथ रहना चाहती है तो आप में से कोई भी उस से रिश्ता नहीं रखेगा.

फिर भी अगर वह लड़का आप को धमकी दे तो आप उस के खिलाफ पुलिस में शिकायत करा सकते हैं कि वह आप की बहन के साथसाथ आप को भी परेशान कर रहा है.

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Career Problem: मेरे पिताजी जिद पर अड़े हुए हैं कि मैं सरकारी नौकरी ही करूं

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सवाल –

मैं 24 साल की लड़की हूं और हरियाणा के एक गांव में रहती हूं. मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में हैं और वे चाहते हैं कि मैं भी सरकारी नौकरी में ही जाऊं. यह मेरे पिताजी की इच्छा नहीं, बल्कि जिद है. उन की सोच है कि प्राइवेट नौकरी तो गुलामी है और वहां जा कर लड़कियां बिगड़ जाती हैं. ऐसा नहीं है कि मुझे सरकारी नौकरी पसंद नहीं है, पर पिताजी की जिद के चक्कर में मुझ में एक तरह का डर बैठ गया है कि अगर मेरी सरकारी नौकरी नहीं लगी, तो क्या होगा? मैं ने कई बार अपने पिताजी को प्राइवेट नौकरी करने की बात कही है, पर वे एकदम आगबबूला हो जाते हैं. आप ही बताइए कि मैं अपने पिताजी को कैसे समझाऊं?

जवाब –

आप ने पिताजी को नहीं, बल्कि खुद को समझाना है कि भयंकर बेरोजगारी और गलाकाटू कंपीटिशन के इस दौर में जो भी नौकरी मिल जाए, वही अच्छी है. वैसे, सरकारी और प्राइवेट नौकरियों की अपनी अलगअलग खूबियां और खामियां होती हैं.

एक पिता होने के नाते आप के पिताजी की जिद अपनी जगह ठीक है, जो अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित देखना चाहते हैं. चूंकि वे खुद सरकारी नौकरी के एशोआराम और सुख भोग रहे हैं, इसलिए वे आप को ले कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं. लेकिन आखिरी फैसला खुद आप को करना है.

सरकारी नौकरी मिलना अब पहले की तरह आसान नहीं रह गया है, इसलिए वह न मिले तो आप के सामने एकलौता रास्ता प्राइवेट नौकरी का ही रह जाएगा. अब यह आप की पढ़ाईलिखाई, मेहनत, हुनर और स्मार्टनैस पर निर्भर है कि आप को 15,000 वाली नौकरी मिलती है या डेढ़दो लाख वाली मिलती है. जो भी हो तैयारी करती रहें. कहीं ऐसा न हो कि पिताजी को समझाने के चक्कर में कोई भी न मिले.

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Boring Sex Life: मेरी पत्नी का सैक्स में कोई इंट्रस्ट नहीं रहा

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सवाल –

मेरी उम्र 34 साल है. मेरी शादी को 6 साल हो चुके हैं और हमारा एक बेटा भी है. वैसे तो मुझे अपनी पत्नी से कोई शिकायत नहीं है, पर वह अब बिस्तर पर एकदम ठंडी पड़ जाती है. वह भी मेरी तरह नौकरी करती है और रात को थके होने का बहाना बना कर मुंह फेर कर सो जाती है. यहां तक कि प्यार के दो मीठे बोल भी नहीं बोलती है. वह अभी 31 साल की है और बिस्तर पर ऐसा दिखाती है कि जैसे 51 साल की हो. इस बात से मेरी सैक्स लाइफ पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. मेरी औफिस लाइफ भी गड़बड़ा गई है. मैं ने कई बार उसे पटरी पर लाने की कोशिश की है, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात. मुझे इस बात से डिप्रैशन रहने लगा है और घर का माहौल भी बिगड़ रहा है. मैं अपनी पत्नी को कैसे समझाऊं?

जवाब –

सैक्स से ऊब निहायत ही कुदरती बात है, जिसे दूर किया जा सकता है. उस के लिए पहले कुछ बातों को समझें, मसलन यह कि थकान के चलते भी ऐसा होता है और मुमकिन है आप की परफौर्मैंस ही पहले जैसी हाहाकारी न रह गई हो.

कुछ दिन की छुट्टी ले कर आप दोनों बाहर कहीं घूम फिर आएं तो पत्नी का मूड कुछकुछ बदलेगा. दूसरा, सैक्स को भार न समझें, न ही पलंगतोड़ परफौर्मेंस की उम्मीद रखें. ठंडी पत्नी में गरमाहट लाने के लिए उस की दिलचस्पी सैक्स में बढ़ाएं, लेकिन लड़झगड़ कर या मुंह फेर लेने से नहीं, बल्कि यह मान लें कि वह आप की नईनई माशूका है जो खुलने में झिझक रही है. उसे बहलाफुसला कर तैयार करें. अगर कामयाबी हाथ न लगे तो किसी माहिर सैक्सोलौजिस्ट से सलाह लें.

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Sex Tips: कितना जरूरी सैक्स में अंगों को चूमना

Sex Tips: रेनू महीने में 26 दिन अपने पार्टनर के साथ सैक्स करती थी और शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा जब वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती थी. उसे अपनी सैक्स लाइफ बहुत शानदार लग रही थी.

‘‘डार्लिंग, जल्दी करो न… मैं अब और इंतजार नहीं कर सकती,’’ रेनू अपने पार्टनर को अपने प्राइवेट पार्ट पर अपना मुंह रख कर ओरल सैक्स के लिए जोश में लाती थी.

‘‘बस 2 मिनट और मेरी जान, नीचे भी पहुंच ही जाऊंगा, बस थोड़ा ऊपर से भी मजे लेने दो न,’’ कह कर रेनू का पार्टनर उस के स्तनों को चूमने और सहलाने में मस्त हो जाता था. इस सब में रेनू इतनी ज्यादा जोश में भर जाती थी कि वह जबरदस्ती अपने पार्टनर को नीचे धकेल कर उस के सिर को नीचे की तरफ झुका कर अपने अंग पर प्यार करने को कहने लगती.

‘‘बोलो मेरी जान, अब आ रहा है न मजा,’’ रेनू का पार्टनर जीभ अंदर डाल कर एक बार उस से पूछता.

रेनू बिना कोई शब्द कहे केवल ‘हम्म’ में जवाब देती. इस से उस का पार्टनर समझ जाता कि अब रेनू गहरे प्रेम सागर का मजा ले रही है और जब रेनू ऐसे शांत हो जाती थी, तो बस खेल एक मिनट का रह जाता था. इस शांति के बाद रेनू एक मिनट बाद ही अपने पार्टनर को बस करने को कहती. उस का पार्टनर समझ जाता था कि अब रेनू पूरी तरह संतुष्ट हो चुकी है.

सैक्स के इस पूरे खेल में रेनू को जिस घड़ी का इंतजार सब से ज्यादा रहता था, वह यही था कि कब उस का पार्टनर उस की छाती सहलाने के बाद उस के अंग पर अपनी जीभ चला कर उस की आग को शांत करे और उस का पार्टनर इस मामले में बिलकुल परफैक्ट था, जिसे रेनू की पलपल की टाइमिंग का पूरा अंदाजा रहता था कि कब वह किस लैवल तक जोश में आ रही है और कब उस के निजी अंगों में प्रीसैक्स लुब्रिकेशन (चिकनाहट आना) हो रहा है.

लेकिन अगर हम भारतीय माहौल में सैक्स संबंधों की बात करें, तो एक सवाल उठता है कि आखिर कितनी औरतें हैं जो रेनू की तरह अपनी सैक्स लाइफ में संतुष्ट होती हैं? कितने पार्टनर अपनी लव पार्टनर के निजी अंगों पर ओरल सैक्स ट्राई करते हैं?

अगर हम विज्ञान और कुदरत के सैक्स से जुड़े नियम देखें तो बहुत सी बातें चौंकाने वाली हैं. जिस प्रोसैस को को आम आदमी गंदा समझता है, असल में वह गंदा नहीं है.

अगर आप को लगता है कि सैक्स अंगों को होंठों से चूमा जाए या उन पर जीभ का इस्तेमाल किया जाए तो आप बीमार पड़ जाएंगे, तो आप गलत हैं. दरअसल, होता क्या है कि जब हम अपनी पार्टनर के स्तनों को सहलाना शुरू करते हैं और साथ ही साथ उस की कमर, जांघ और स्तनों के बीच के हिस्से को चूमते और चाटते हैं, तो उस के द्वारा औरत के शरीर में जो सैंसेशन बनता है, उस से उस के निजी अंगों में लुब्रिकेशन शुरू हो जाता है.

यूएस लाइब्रिकेशन में लैक्टबेसिलस नाम का बैक्टीरिया होता है जो उस के इर्दगिर्द पहले से जमा बैक्टीरिया को मारने की ताकत रखता है और साथ ही साथ इस की टाइमिंग देखें तो हम जब फोरप्ले के द्वारा अपनी पार्टनर को जोश में लाते हैं, तो उसी दौरान जैसे ही हम उस के निजी अंग की तरफ अपना
मुंह ले कर जाते हैं, हमारे मुंह में लार बनती है, जिस के चलते हम खुद इतना उत्सुक हो जाते हैं कि औरत के निजी अंग पर जीभ लगाने को उतावले हो जाते हैं.

यह वह कुदरती क्रिया है, जिस के द्वारा पार्टनर जैसे ही महसूस करती है कि उस के निजी अंग के अंदर उस के पार्टनर की जीभ ने प्रवेश किया है, तो वह इतनी उत्सुक हो जाती है कि सैक्सुअल इंटरकोर्स के किए इंतजार नहीं कर पाती. यह वह पल होता है जब वह सैक्स की शुरुआत के बाद केवल एक या 2 मिनट में संतुष्टि पा लेती है. Sex Tips

Hindi Family Story: व्यापार

Hindi Family Story: सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था और सारी कमाई गांजे में उड़ा देता था. उस की पत्नी तारा मजदूरी कर के जैसेतैसे परिवार का पेट पालती थी. एक बार सरजू एक पाड़ी खरीद लाया. जब वह हट्टीकट्टी भैंस हुई तो सरजू ने वह कर दिया, जो तारा ने सपने में भी नहीं सोचा था.

हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. पछुआ हवा के थपेड़ों को अपने नंगे बदन पर झेलते हुए कमर में अधटंगी धोती बांधे सरजू जब अपनी झोंपड़ी के नजदीक आया, तो उस के नथुनों में मांस भुनने की खुशबू आने लगी.

झोंपड़ी के बाहर जरा सी खुली जमीन की पट्टी पर एक तरफ बेटी मालती झोंटा बिखेरे आटा गूंद रही थी. दूसरी तरफ चूल्हे पर रखी देगची में उस की बीवी तारा कलछी से शायद मांस भून रही थी. लक्ष्मण और राधा मां से सटे बैठे लोभी निगाहों से देगची को देख रहे थे.

‘‘आज पैसा मिल गया?’’ सरजू की करारी आवाज से तारा चौंक गई. उस ने एक उचटती नजर उस पर डाली और दोबारा मांस भूनने में लग गई.

सरजू का जी जलभुन गया. वह सोचने लगा, ‘यही तो इस की सब से बुरी आदत है. कभी कुछ पूछो तो बोलेगी नहीं, जैसे बोलने में टका खर्च होता है. पैसा तो मिल ही गया होगा, तभी तो आज मांस बन रहा है.’

फिर इधरउधर देख कर सरजू ने बेटी मालती से पूछा, ‘‘क्यों री, अशोक कहां गया है?’’

मालती सुघड़ सयानी बन कर घर के काम में हाथ बंटा रही थी. वैसे तो रोज काम के नाम पर वह बहाना बनाती थी, पर अब महीनों बाद घर में सालन जो बन रहा था, तो उस के मुंह में पानी आ रहा था. गले में थूक गटक कर उस ने कहा, ‘‘क्या मालूम.’’

‘‘अच्छा, जा तू ही दुकान से पुडि़या लेती आना.’’

आटा अधगुंदा छोड़ कर मालती उठ खड़ी हुई. सरजू ने 20 रुपए का नोट दिया, ‘‘3 पुडि़या लाना, एक बंडल बीड़ी भी.’’

पुडि़या, यानी गांजा. 3 पुडि़यां सरजू की 24 घंटे की खुराक थीं. पहले तो बहुत पीता था, पर इधर महंगाई बढ़ गई थी, इसलिए 3 में ही संतोष करना पड़ता था.

‘‘छोटुआ कह रहा था कि यहीं 5 कोस पर एक गांव है… नाम नहीं याद पड़ रहा है. वहां मवेशी बिकने आते हैं. सोच रहा हूं एक पाड़ी ले आऊं. अशोक सारा दिन खेलता रहता है, तो वह पाड़ी को चराएगा. 2 साल में भैंस बन जाएगी तो दूध का सुभीता हो जाएगा और पैसा भी होगा.’’

तारा चुप रही. घर में सरजू की ही मरजी चलती थी. उस ने जो ठान लिया सो ठान लिया. कुछ कहने से पिटाई ही पल्ले पड़ती थी. वह समझ रही थी कि यह सब उस से रुपया मांगने की चाल है.

तारा सरकारी फार्म में मजदूरी करती थी. साढ़े 16 रुपए रोज के हिसाब से मजदूरी मिलती थी. इस बार 8 हफ्तों की मजदूरी मिली थी. ठंड पड़ने लगी थी. बच्चों के पास कपड़े नहीं थे. सोचा था, एकएक कपड़ा चारों के लिए बनवा देगी. लेकिन सूदखोर महाजन की तरह सरजू पैसा उगाहने आ गया था. वह पाईपाई का हिसाब रखता था. तारा ने कमर से सब रुपए खोल कर उस के आगे फेंक दिए.

सरजू ने बेहयाई से सब नोटों को उठा कर गिना. फिर बोला, ‘‘डेढ़ सौ रुपए कम हैं.’’

तारा खीज उठी. अपनी ही कमाई का हिसाब देना अखर गया. सरजू जानता था कि फार्म के पास वाली चाय की दुकान पर वह दोपहर की छुट्टी में चाय पीती है. बच्चों को भी कभीकभार बिसकुट दिला देती है.

पैसा मिलने पर उस की उधारी चुका कर एक वक्त के खाने के लिए कुछ अच्छी चीज ले आती है. बाकी पूरा महीना तो नमक और रोटी पर ही बीतता है.

‘‘हां, 70 रुपए चाय वाले को दिए, बाकी से मांस, तेल, मसाला और आटा आया है. मांस भी तो 55 रुपए किलो है,’’ तारा बोली.

‘‘क्या जरूरत थी, मांस लाने की… आलूगोभी नहीं ला सकती थी?’’ सरजू ने कहा.

तारा ने कुछ जवाब न दिया. झुक कर चूल्हे की लकड़ी ठीक करते हुए सोचने लगी, ‘अभी ऐसे कह रहा है, खाने बैठेगा तो यह नहीं सोचेगा कि दूसरे को भी खाना है.’

सरजू मन ही मन में हिसाब लगा रहा था, ‘पाड़ी खरीदने में 3-4 सौ तो लग ही जाएंगे. इधर 2-3 दिनों से उस की आमदनी भी कुछ कम हुई है. कहीं से कुछ रुपयों का जुगाड़ करना पड़ेगा.’

सरजू स्टेशन पर कुलीगीरी करता था. वह लाइसैंस वाला कुली नहीं था. लाइसैंस के लिए बहुत दौड़धूप करनी पड़ती थी और फीस भी लगती थी. साथ ही घूस भी देनी पड़ती थी.

उस के जैसे बिना लाइसैंस वाले कई कुली थे. स्टेशन के आउटर सिगनल के पास उन का जमाव रहता.

व्यापारी लोग सामान ले कर आते तो चुंगी से बचने के लिए ट्रेन की जंजीर खींच कर उतर पड़ते थे. उन का सामान जल्दी से उतरवा देने पर अच्छे पैसे बन जाते थे.

हां, पुलिस को जरूर मिला कर रखना पड़ता था. वैसे, हवलदार साहब उस से खुश ही रहते थे. गांजे के वे भी शौकीन थे. सरजू उन्हें भी पिला देता था.

दूसरे दिन शाम ढलने लगी थी. जब एक हाथ में रस्सी थामे आगेआगे सरजू और पीछेपीछे बड़ी बकरी से कुछ ऊंची पाड़ी गली में घुसी. अंधेरे में सरजू का काला रंग पाड़ी के रंग से बिलकुल मिल रहा था. छोटू भी साथ में था.

‘‘अरी, जल्दी से तेल, सिंदूर ले आ… घर में लक्ष्मी आई है,’’ सरजू की आवाज में खुशी झलक रही थी.

10 कोस की थकान भी उसे महसूस नहीं हो रही थी.

तारा ने एक निगाह पाड़ी पर डाली और उठ खड़ी हुई. पाड़ी के माथे पर तेल, सिंदूर लगाया और एक लोटा पानी सामने के दोनों पैरों के पास डाला.

उस का सख्त चेहरा देख कर सरजू को खीज आई. किंतु अभी उस की खुशी गुस्से पर हावी थी.

वह बोला, ‘‘अशोक, जल्दी से यहां एक खूंटा गाड़… इसे बांधना है. अभी देहरी नहीं पहचानती है न.

बच्चे भी खुश थे, पाड़ी की देखरेख में वे इतने मगन थे कि भूखप्यास भूल गए थे.

‘‘भौजी, अब कुछ चायपानी कराओ. देखो, तुम्हारे लिए आज सारा दिन दौड़े हैं,’’ छोटू ने कहा.

तारा को मौका मिल गया. घर में खाने को कुछ नहीं था, सारे पैसे सरजू ले गया था. उस ने सरजू से कहा, ‘‘रुपया दो, तो चायपानी ले आएं, आटा भी लाना है.’’

सरजू ने सुनीअनसुनी करते हुए कहा, ‘‘चल छोटू, हम दोनों स्टेशन पर ही चाय पी लेंगे.’’

उन दोनों को जाते हुए देख कर तारा ने दोबारा टोका, ‘‘आज घर में खर्च नहीं है. सरजू एक पल ठिठका, ‘‘जा कर उधारी आटा ले आओ. मेरा नाम ले देना, कल रुपए दे देंगे.’’

तारा चुपचाप उन दोनों को जाते हुए देखती रही. पाड़ी खरीदने से जो रुपया बचा होगा, उस से गांजा आएगा. चाय के साथ गांजे का दम लगा कर वह दूसरी दुनिया में खो जाएगा. जब घर लौटेगा, उस समय तक भूखे बच्चे पानी पी कर सो जाएंगे.

सरजू जानता है कि चक्की वाला आटा उधार कभी नहीं देता है. तारा को पछतावा हो रहा था कि कल क्यों गुस्से में सारे नोट फेंक दिए. कम से कम एक 20 का नोट बचा लिया होता.

रोज सवेरे बच्चे रात की बासी रोटी खा लेते थे. फिर उधरउधर भटकते हुए सरकारी क्वार्टरों में लगे फल चुरा कर खाते हुए उन का दिन कटता. पानी पीपी कर वे सांझ की बाट जोहते, जब मां चूल्हा जोड़ कर रोटी बनाती.

तारा के साथ की दूसरी मजदूरिनें भी थीं. पर उन की इतनी बुरी हालत नहीं थी. उन के मर्द कमा कर नोट उन के हाथ पर रखते. अपनी कमाई से वे अपने शौक पूरे करती थीं. सब के बदन पर ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे. एक वही थी, जो ठंड में एक फटी धोती से तन को ढक कर खेतों में काम करती थी.

बच्चे अभी तक पाड़ी में लगे हुए थे. लक्ष्मण छोटी बालटी में पानी ले कर उस के मुंह से लगा रहा था. 3 साल की राधा भी अपने नन्हें हाथों में घास लिए उसे खिलाने की कोशिश कर रही थी.

अशोक और मालती महल्ले के बच्चों को डांट कर भगा रहे थे, ‘पाड़ी को तंग मत करो, इतनी दूर से आई है.’

तारा ने हांड़ी में से धान निकाला. वह फार्म से थोड़ाथोड़ा धान उठा लाती थी, सभी मजदूरिनें ले जाती थीं. बाबू लोग हर समय चौकसी थोड़े ही करते थे.

3 पाव के लगभग धान था. उसे कूट कर सूखी कड़ाही में भूना. बच्चों ने और उस ने एकएक मुट्ठी फांक कर पानी पिया और सो गए.

रात काफी हो गई थी, जब सरजू ने उसे झंझोड़ कर जगाया और कहा, ‘‘ला, खाने को दे.’’

‘‘कहां से दूं? सब तो ऐसे ही सो रहे हैं,’’ तारा बोली.

गांजे के नशे में लाललाल आंखें किए सरजू ने उसे पीटने को हाथ उठाया और बोला, ‘‘तेरी यही आदत अच्छी नहीं लगती है. कहा था न कि आटा उधार ले आना.’’

‘‘उधार नहीं देता है.’’

‘‘नहीं देता है… अभी बताता हूं कि कैसे देता है.’’

तब तक पाड़ी रंभाई. सरजू के उठे हाथ थम गए. वह बोला, ‘‘अच्छाअच्छा, भूख लगी है न, तुझे भी थोड़े ही कुछ मिला होगा, मैं जानता था. इसीलिए तेरे खाने के लिए लाया हूं.’’

गमछे को खोल कर भूसी चूनी निकाली और बालटी में घोल कर पाड़ी के सामने रखी. जब तक वह पीती रही, प्रेम से वह उस का माथा, पीठ सहलाता रहा. मुसीबत टली देख तारा ने चैन की सांस ली और बच्चों के बीच आ कर लेट गई.

कुछ दिनों तक पाड़ी को चराने, नहलाने और खिलाने के लिए बच्चे आपस में झगड़ते थे, पर धीरेधीरे यह काम भी तारा के जिम्मे आ गया. फार्म से दोपहर की छुट्टी में आती तो भूखप्यास से टूटी देह से कुएं से पानी खींचखींच कर उसे नहलाती. सामने गांजे का सुट्टा खींचते हुए सरजू लाट साहब की तरह बैठा रहता.

पहले कभीकभार ही ऐसा वक्त आ पड़ता था, जब घर में रोटी नहीं बनती थी. किंतु अब तो अकसर ही ऐसा हो जाता था, परिवार भले ही आधा पेट खा कर रहे, पर पाड़ी भूखी नहीं रहनी चाहिए, यह उस घर का कायदा बन गया था, क्योंकि पाड़ी सरजू को बच्चों से भी ज्यादा प्यारी थी.

3 सालों में पाड़ी बढ़ कर खूब हट्टीकट्टी भैंस बन गई थी. उस की कालीचिकनी चमड़ी दूर से ही चमकती थी. अब तक उसे गाभिन हो जाना चाहिए था, पर नहीं हुई थी.

आखिर सरजू एक दिन उसे जानवरों के डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर ने बताया, ‘‘इसे खुराक जरूरत से ज्यादा दी गई है, इसी से पेट पर चरबी चढ़ गई है. दाना कम दिया करो.’’

जब तारा को यह बात मालूम हुई, तो उदासी में भी उसे हंसी आ गई और सोचने लगी, ‘भूखे बच्चे दुबले होते जा रहे हैं और भैंस पर चरबी चढ़ गई.’

शायद सरजू भी यही कुछ सोच रहा था. तारा की मुसकान से वह चिढ़ गया. वह उसे घुड़क कर बोला, ‘‘इस में हंसने की क्या बात है? औरतें मोटी नहीं हो जाती हैं?’’

भैंस जब गाभिन हुई तो सरजू की ममता भरी चिंता देखते ही बनती थी. तारा को याद नहीं पड़ता था कि कभी गर्भ ठहरने पर उस की इतनी संभाल हुई हो.

आखिरकार वह दिन आ ही गया. घर में खुशी का माहौल था. तारा भी खुश नजर आ रही थी. यह दिन भी उस की जिंदगी में आएगा, इस का उसे यकीन नहीं था.

वह सोचने लगी, ‘बच्चे अब जी भर कर दूध पिया करेंगे. अभी एकाध महीना वह दूध नहीं बेचेगी. सरजू की देह भी टूटती जा रही है, गांजा गरम होता है, दूध पीना उस के लिए भी जरूरी है.’

10 दिन इसी तरह की खुशियों, उम्मीदों में गुजर गए. वह भी एक उदास धुंधली सांझ थी, जब सरजू के साथ 4 लोग भैंस के पास आ खड़े हुए…

सरजू ने झटपट उन लोगों के सामने भैंस दुही. दूध देख कर मोलभाव शुरू हुआ और देखते ही देखते भैंस और पाड़ा सरजू ने उन लोगों के हवाले कर दिए.

तारा के रोटी पकाते हाथ थम चुके थे. बच्चों को भी खबर लग चुकी थी. सब उदास मुख से चुपचाप भैंस को जाते देख रहे थे. उस रात रोटी पकी रखी रह गई, किसी से खाई नहीं गई. तारा की आंखों के सामने भैंस के आने का दिन घूम गया. उस दिन कितनी खुशी थी कि सब भूख भूल गए थे और आज कितनी उदासी कि रोटी पकी रखी रह गई.

सरजू को तो भैंस प्राणों से भी प्यारी थी, पर फिर ऐसा क्यों हुआ?

रात गए गांजे के नशे में चूर बहकते हुए कदमों से सरजू घर लौटा. उस वक्त तक तारा दरवाजे पर ही बैठी थी, उस का भी दिल नहीं हो रहा था.

बड़ी हिम्मत बटोर कर तारा ने पूछा, ‘‘क्या बात हो गई जो भैंस को बेच दिया?’’

‘‘तुम्हें इस से मतलब? हमारी चीज थी, हम ने बेच दी, तू कौन होती है पूछने वाली?’’

गांजे के नशे में सरजू अपने को बादशाह से कम नहीं समझता था. वह बड़बड़ाता जा रहा था, ‘‘फिर एक पाड़ी लाएंगे. 300 की पाड़ी आ जाएगी…

4 हजार की भैंस बिकेगी. कितने फायदे का सौदा है. इसे कहते हैं, व्यापार… तू क्या समझेगी?’’

तारा की आंखों में आंसू आ गए.

300 को 4 हजार बनाने में उस का और बच्चों का कितना खून लगा, पिछले 3 सालों में कितनी रातें भूखे, पेट रह कर काटी थीं. बच्चे कितने दुबले हो गए थे और वह खुद? खेतों में काम करतेकरते आंखों के सामने अंधेरा छा जाता था और रुपया? क्या रुपया रहेगा? जब तक हाथ में रुपया रहेगा, सरजू कामधंधा छोड़ कर गांजे और जुए में मस्त रहेगा.

सरजू बोलता जा रहा था, ‘‘अरी, इस व्यापार से तुझे रानी बना दूंगा… रानी. हां, बस जरा हंस कर बोला कर, हर वक्त मनहूस सूरत बना कर घूमती है तो जी जलता है. हां, खुश रहा कर. देख, मेरे पास कितना रुपया है. अब तुझे क्या चाहिए बोल, मैं कल ही खरीद दूंगा.’’

सरजू अपनी आवाज को भरसक मुलायम बना रहा था. मुलायम स्वर किस मतलब के लिए है, इसे समझते हुए उस ने एक गहरी सांस ले कर उदासी के पुराने कवच से अपने को दोबारा ढक लिया. वह सोचने लगी, ‘अब कुछ भी हो, उस पर कुछ असर नहीं होगा.’ Hindi Family Story

Hindi Funny Story: प्रेमी और प्रेमिका ध्यान दें

Hindi Funny Story: इस इश्तिहार के जरीए मैं अ ब स पुत्र, श्री क ख ग, गांव, पंचायत, तहसील, जिला त थ द अपने आसपास के शादी करने के इच्छुक तमाम प्रेमियों को सूचना देते हुए प्राउड फील कर रहा हूं कि मैं इस इश्तिहार से ठीक 15 दिन बाद कुमारी ट ठ ड, पुत्री श्रीमान य र ल, गांव, पंचायत, तहसील, जिला च छ ज के साथ शादी के बंधन में बंधने की हिमाकत करने जा रहा हूं.

याद रहे, 4 महीने पहले हमारी सगाई हो चुकी है, पर यह कोई गंभीर इश्यू नहीं है. सगाई ही हुई है, तबाही तो नहीं.

हालांकि, सगाई के वक्त मैं ने अपनी मंगेतर से मिलने पर यह नहीं पूछा था कि उसे खाना बनाना आता है कि नहीं. खाना बनाना नहीं आता तो कोई बात नहीं, बाहर से मंगवा लिया करेंगे.

यह भी नहीं पूछा था कि शादी के बाद वह मेरे मातापिता को अपने साथ रखेगी कि नहीं. शादी के बाद कौन बहू अपने सासससुर को अपने साथ रख कर खुश होती है?

मैं ने यह भी नहीं पूछा था कि वह घर के काम में मेरा हाथ बंटाएगी या नहीं, क्योंकि मुझे पता है शादी के बाद घर के सारे काम मुझे ही करने हैं.

पर मैं ने उस से यह जरूर पूछा था कि उस का कोई प्रेमी वगैरह है या नहीं? मैं अपनी मंगेतर के सारे नखरे उठा सकता हूं, पर उस के प्रेमी को शादी के बाद बिलकुल भी नहीं उठा सकता. उसे उठाने का मतलब अपनेआप दुनिया से उठा जाना है.

ऐसा नहीं है कि मैं ही अपनी मंगेतर की ओर से एतराज दायर करने का इश्तिहार दे रहा हूं. इस से पहले मेरी मंगेतर ने भी मुझ से शादी करने से पहले एक इश्तिहार दे कर मेरी प्रेमिकाओं के एतराज मांगे थे कि अगर जिस किसी से मैं प्रेम करता होऊं, उसे मेरी मंगेतर को मुझ से शादी करने में एतराज हो तो वह अपना एतराज तय सीमा के भीतर दर्ज करे. बेकार में मेरी तरह वह भी पंगे में नहीं पड़ना चाहती.

पर मैं खुश हूं कि मेरी किसी भी प्रेमिका ने इस बारे कोई एतराज दर्ज नहीं किया और मुझे क्लीन चिट दे दी. वजह, मैं ही सब से प्रेम करता था, कोई मुझ से प्रेम नहीं करती थी.

मैं मानता हूं कि किसी और चीज को ले कर पतिपत्नी में क्लियैरिटी हो या न, पर कम से कम शादी के बारे में दोनों में क्लियैरिटी होनी चाहिए, ताकि बाद में उन्हें एकदूसरे के प्रेमियों से मंदिर में जा कर अपने हाथों से उन का ब्याह करा कर अपने पतिपत्नी होने की जिम्मेदारी से बाप की तरह सिसकतेसिसकते मुक्त न होना पड़े.

मेरे इस हिमाकत भरे कदम पर अगर मेरे सुश्री ट ठ ड से शादी करने पर अगर उस के किसी प्रेमी को एतराज हो तो वह अखबार में इश्तिहार छपने के 10 दिनों के भीतर इश्तिहार में दिए मोबाइल नंबर पर मुझे फोन कर के या मुझ से पर्सनली मिल कर अपना एतराज दर्ज करा सकता है, ताकि मैं शादी के बाद किसी भी तरह की मुसीबत में न पड़ूं.

मैं यकीन दिलाता हूं कि प्रेमी के हर एतराज को सिरमाथे लिया जाएगा. मेरा यकीन कीजिए, मैं अपनी मंगेतर के प्रेमी के फायदे में शादी करने से साफ इनकार कर दूंगा.

अपनी प्रेमिका की शादी हो जाने के बाद भी अपनी प्रेमिका के साथ रहने के लिए तैयार उस के पति को मारने वाले प्रेमियों, मैं इस दुनिया में जीने आया हूं अपनी मंगेतर के प्रेमी के हाथों मरने नहीं. मैं समय से पहले मरना नहीं चाहता. मैं अपने बूढ़े मातापिता के साथ कुंआरा ही रह लूंगा, पर अपनी मंगेतर के प्रेमी के हाथों मरने का पंगा बिलकुल न लूंगा.

अगर 10 दिनों के भीतर किसी ने एतराज दर्ज नहीं किया तो मैं मान लूंगा कि मेरी मंगेतर का कोई प्रेमी नहीं है. फिर भी अगर कोई हो तो उस के बाद प्लीज अपने को कंट्रोल में रखे, क्योंकि मैं उस के बाद सौ फीसदी यह मान कर चलूंगा कि मेरी मंगेतर का केवल मैं ही एकलौता मंगेतर हूं. उस के बाद प्लीज, मुझे मारने की किसी को सुपारी न दें.

इस सिलसिले में मैं अपनी मंगेतर से भी आखिरी बार दोनों हाथ जोड़ कर अर्ज करता हूं कि अगर उस का कहीं और शादी करने का मन हो और किसी वजह से वह वहां शादी नहीं कर पा रही हो तो प्लीज मुझे बेझिझक बताए.

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. मैं उस के परिवार जनों से बात कर इस बारे में उस की मदद करने को तैयार हूं. बाद में किसी भी तरह का विवाद शादी के हक में मैं कतई नहीं चाहता.

मैं शादी कर के स्वर्ग चाहता हूं, नरक नहीं. कोई बात नहीं, मैं कहीं और ट्राई कर लूंगा. Hindi Funny Story

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