सौजन्य- सत्यकथा
न्यायाधीश ने इस तथ्य का भी जिक्र किया है कि वह अपने बयान पर अडिग रहा कि उस ने फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य व्यक्ति को टौर्च के साथ किचन के पास खड़े देखा था. जबकि बचाव पक्ष ने राजू की पृष्ठभूमि के आधार पर उस की गवाही पर ही सवाल खड़े किए.
लेकिन 2 वकीलों द्वारा जिरह करने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहा. फैसले में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि किस तरह से गवाह राजू को अपने बयान से मुकरने और सिस्टर अभया की हत्या कबूल करने के लिए धमकियां मिलीं, यातना दी गई और मोटी रकम देने का प्रलोभन दिया गया, पर वह अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ.
अदालत ने इस तथ्य को रिकौर्ड किया कि सिस्टर अभया की मौत वाली रात सिस्टर सेफी अकेली थीं. क्योंकि उन की साथिन रिट्रीट सेंटर गई थीं. उस रात और सवेरे रसोई घर में सामान्य स्थिति नहीं थी, जिस के बारे में अदालत को कौन्वेंट में रहने वाले अन्य लोगों ने, जो बाद में मुकर गए थे, की गवाही से पता चला था.
एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी कि सिस्टर सेफी ने अपने यौनाचार में लिप्त रहने के तथ्य को छिपाने के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से अपनी हाईमेनोप्लास्टी कराई थी. अदालत ने पाया कि सेफी ने यह प्रक्रिया सीबीआई द्वारा गिरफ्तार करने के बाद कराई थी.
अदालत ने इस मामले के गवाहों में से एक गवाह कलारकोडे वेणुगोपाल को दिए गए फादर थौमस कोट्टूर के बयान का संज्ञान लिया. इस मामले में वेणुगोपाल ने कोट्टूर का नारको टेस्ट कराए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिलने पर थौमस कोट्टूर से संपर्क किया था.
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तब उन्होंने भावावेश में वेणुगोपाल से कहा था कि वह लोहे या पत्थर से नहीं बने, वह भी मनुष्य हैं, जो एक समय पर सिस्टर सेफी के साथ पतिपत्नी की तरह रहे थे, अब उन्हें क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है.
बचाव पक्ष ने अदालत से वेणुगोपाल के बयान को भरोसेमंद न मानने का आग्रह किया था. पर अदालत ने कहा कि आरोपी का बर्ताव, उस की गवाही के दौरान उस की भावभंगिमाएं औैर अपनी गवाही के बुनियादी तथ्यों से टस से मस नहीं होने का तथ्य गवाह की विश्वसनीयता बता रहा था.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अचानक बगैर किसी वजह से पूरा कौन्वेंट सामूहिक रूप से मुकर गया, सबूत भी गायब हो गए और कौन्वेंट की रसोइया अचम्मा ने नारको टेस्ट को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी.
अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उस ने स्वीकार किया कि उच्चतम न्यायालय में देश के महानतम वकीलों में शामिल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उस की ओर से पेश हुए थे. अदालत ने फैसले में कहा कि उस ने यह भी स्वीकार किया कि उस के मुकदमे का खर्च कौन्वेंट ने उठाया था. जबकि उसे मुकदमे के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी.
अदालत ने कहा कि इस से यह साबित होता है कि इस मुकदमे को किस अंतिम नतीजे पर पहुंचने से रोकने तथा अभियोजन के मामले की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए प्रभावशाली लोगों ने व्यवस्थित और संगठित तरीके से प्रयास किए.
न्यायाधीश श्री के. सनिल कुमार ने इस मामले के जांच अधिकारियों, डीएसपी के. सैमुअल और तत्कालीन एसपी केटी माइकल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन की इस मामले में दिलचस्पी की वजह से साक्ष्य नष्ट हुए, मनगढ़ंत सबूत तैयार किए गए.
यहां तक कि मुख्य गवाह अदक्का राजू को सिखायापढ़ाया गया और अन्य गवाहों पर दबाव डाले गए. अदालत ने भविष्य में इस तरह से हस्तक्षेप के खिलाफ सख्त चेतावनी देते हुए इस फैसले की प्रति राज्य पुलिस के मुखिया को भी देने का आदेश दिया.
अंत में न्यायाधीश सनिल कुमार ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को सिस्टर अभया की हत्या, अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास यानी जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई. साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया.
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थौमस कोट्टूर पर घर में बिना अनुमति घुस जाने का भी आरोप लगा. सिस्टर सेफी अब नन वाले कपड़े नहीं पहन सकेंगी. सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों में अकेले जीवित बचे मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया.
यह इस बात का उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उस के पास पैसा और बाहुबल है तो वह न्याय से खिलवाड़ कर लेगा.
जिस चोर अदक्का राजा की गवाही पर दोनों को सजा हुई, फैसला आने के बाद उस ने कहा कि उसे मुकरने के लिए बहुत प्रताडि़त किया गया. उस पर दबाव डाला गया, 3 करोड़ रुपए का लालच दिया गया. पर वह अपनी बात पर अडिग रहा. आखिर उस की भी तो बेटियां हैं. इस मामले में कुल 167 गवाह थे, जिन में से लगभग सब मुकर गए थे.




