नन्हा मेहमान: क्या दोबारा मिला खोया डौगी

‘‘मम्मी… मम्मी,’’ चिल्लाता 10 वर्षीय ऋषभ तेजी से मकान की दूसरी मंजिल में पहुंच गया. उस के पीछेपीछे 8 वर्षीय छोटी बहन मान्या भी खुशीखुशी अपनी स्कर्ट को संभालती चली आ रही थी.

अल्मोड़ा शहर की ऊंचीनीची, घुमावदार सड़कों से बच्चे रोज ही लगभग 2 किलोमीटर पैदल चल कर अपने मित्रों के संग कौंवैंट स्कूल आतेजाते हैं. सभी बच्चे हंसतेबोलते कब स्कूल से घर और घर से स्कूल पहुंच जाते, उन्हें इस का एहसास ही नहीं होता, जबकि पीठ में बस्ते का भार भी रहता. रितिका भी दोपहर तक बच्चों के घर पहुंचने के दौरान अपने सारे काम निबटा लेती. बच्चों को खिलापिला कर होमवर्क करने को बैठा देती. तभी दो घड़ी अपनी आंख   झपका पाती.

आज ऋ षभ की आवाज सुन कर कमरे से निकल बरामदे में आ गईं. मन में अनेक आशंकाओं ने इतनी देर में जन्म भी ले लिया. सड़क दुर्घटना, हादसा और भी तमाम खयालात दिमाग में दौड़ गए.

‘‘यह देखो मैं क्या लाया?’’ शरारती ऋ षभ ने अपने हाथों में थामे हुए लगभग 2 महीने के पिल्ले को   झुलाते हुए कहा.

मान्या अपनी मम्मी के मनोभावों को पढ़ने में लगी हुई थी. उसे मम्मी खुश दिखती तो वह अपना योगदान भी जाहिर करती, नहीं तो सारा ठीकरा ऋ षभ के सिर फोड़ देती.

‘‘सड़क से पिल्ला क्यों उठा कर लाए? अभी इस की मां आती होगी, जब तुम्हें काटेगी तभी तुम सुधरोगे,’’ रितिका गुस्से से बोली.

‘‘सड़क का नहीं है मम्मी, हमारे स्कूल में जो आया हैं, उन्होंने दिया है. ये स्कूल में पैदा हुए हैं. आयाजी ने कहा है जिन्हें पालने हैं वे ले जाएं. स्कूल में तो पहले ही 4 भोटिया डौग हैं,’’ ऋ षभ ने सफाई देते हुए उसे फर्श पर रख दिया. पिल्ला सहम कर कोने में बैठ गया और अपने भविष्य के फैसले का इंतजार करने लगा.

‘‘चलो हाथमुंह धोलो, खाना खाओ. इसे कल स्कूल वापस ले जाना. हम नहीं रखेंगे. तुम्हारे पापा को कुत्तेबिल्ले बिलकुल पसंद नहीं हैं.’’

‘‘पर पापा के घर में गाय तो है न, दादी गाय पालती हैं,’’ मान्या बीच में बोली.

‘‘गाय दूध देती है,’’ रितिका ने तर्क दिया.

‘‘कुत्ता भौंक कर चौकीदारी करता है,’’ मान्या का तर्क सुन कर ऋ षभ की आंखों में चमक आ गई.

‘‘मु  झे इस पिल्ले पर कोई एतराज नहीं है, मगर तुम्हारे पापा डांटेंगे तो मेरे पास मत आना.’’

मम्मी की बात सुन कर दोनों के मुंह उतर गए.

रितिका पुराने प्लास्टिक के कटोरे में दूध में ब्रैड के टुकड़े डाल कर ले आई, जिसे देख कर पिल्ला लपक कर कटोरी के बगल में खड़ा हो गया. ऋ षभ और मान्या की तरफ ऐसे देखने लगा मानो उन से इजाजत ले रहा हो और अगले ही पल कटोरे पर टूट पड़ा. कटोरे को पूरा चाट कर खुशी से अपनी दुम हिलाने लगा.

‘‘आंटी, आंटी…’ की तेज आवाज नीचे आंगन से आ रही थी. रितिका ने ऊपर बरामदे से नीचे   झांका. नीचे आगन से ऋ षभ की उम्र की 2 लड़कियां स्कूल ड्रैस पहने खड़ी थी.

‘‘क्या हुआ बेटा?’’ रितिका ने उन दोनों को पहले कभी नहीं देखा था.

‘‘आंटी ऋ षभ हमारा पिल्ला ले कर भाग आया,’’ उन दोनों में से एक ने कहा.

‘‘  झूठ… इसे आयाजी ने मु  झे दिया था,’’ ऋषभ ने सफाई दी.

‘‘मम्मी यह पिल्ला स्कूल से ही लाया गया है. रास्ते में हम चारों ने इसे बारीबारी गोद में पकड़ा था. जब घर पास आने लगा तो तृप्ति इसे अपने घर ले जाने लगी तो भैया इसे अपनी गोद में ले कर भागता हुआ घर आ गया,’’ मान्या ने स्पष्टीकरण दिया.

‘‘आंटी ऋ षभ ने पहले कहा था कि तुम चाहो तो अपने घर ले जा सकती हो, लेकिन वह बाद में भाग गया,’’ वह फिर बोली.

रितिका को कुछ सम  झ ही नहीं आया कि वह किसे क्या सम  झाए.

‘‘मैं तो अब इसे किसी को भी नहीं दूंगा. मैं ने इस पर बहुत खर्चा कर दिया है,’’ ऋ षभ ने फैसला सुनाया.

‘‘क्या खर्चा किया?’’ उस ने नीचे से पूछा.

‘‘एक कटोरा दूध और ब्रैड मैं इसे खिला चुका हूं. अब यह मेरा है,’’ ऋषभ ने जिद पकड़ ली.

‘‘सुनो बेटा, आज तुम इसे यही रहने दो. घर जा कर अपनी मम्मी से पूछ लेना कि वे पिल्ले को घर में रख लेंगी. वे अगर सहमत होंगी तो मैं यह पिल्ला तुम्हें दे दूंगी. यहां तो ऋषभ के पापा इसे नहीं रखने देंगे. कल तुम्हें लेना होगा तो बता देना वरना वापस स्कूल चला जाएगा,’’ रितिका ने सम  झाया तो दोनों लड़कियों ने सहमति में सिर हिला दिया और वापस चली गईं.

‘‘खबरदार यह पिल्ला घर के अंदर नहीं आना चाहिए. इसे यही बरामदे में गद्दी डाल कर रख दो. तुम दोनों अंदर आ जाओ.’’

रितिका की बात सुन कर ऋषभ ने उसे पतली डोरी से दरवाजे से बांध दिया. उस के पास गद्दी बिछा कर कटोरे में पानी भर दिया. भोजन के बाद दोनों अपना होमवर्क करने लगे. बाहर पिल्ला लगातार कूंकूं करने लगा. दोनों बच्चे अपनी मम्मी का मुंह ताकते कि शायद वे रहम खा कर उसे अंदर आने दें, मगर रितिका ने उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा. कुछ देर बाद पिल्ले ने कूंकूं करना बंद कर दिया.

होमवर्क खत्म होते ही दोनों लपक कर बरामदे में आ गए, ‘मम्मीमम्मी’ इस बार मान्या और ऋ षभ दोनों एकसाथ पुकार रहे थे.

रितिका को   झपकी सी आ गई थी. शोर सुन कर वह तुरंत बाहर को लपकी.

‘‘मम्मी हमारा पिल्ला खो गया,’’ दोनों रोआंसे स्वर में एकसाथ बोले. पिल्ले के गले से बंधी डोरी की गांठ खुली पड़ी थी. डोरी की गांठ ढीली थी, जो पिल्ले की जोरआजमाइश करने के कारण खुल गई थी.

‘‘यहीं कहीं होगा, मेजकुरसी के नीचे देखो.’’

‘‘सीढि़यों से नीचे तो नहीं गया?’’ ऋ षभ ने शंका जताई.

रितिका ने सीढि़यों की तरफ देखा. सीढि़यां नीचे सड़क को जाती हैं.

‘‘मम्मी कहीं वह किसी गाड़ी के नीचे न आ जाए,’’ मान्या को चिंता हुई.

‘‘मु  झे नहीं लगता कि वह सीढि़यां उतर पायेगा, लेकिन अगर बरामदे में नहीं है तो नीचे आंगन में देखो.

वह अखरोट और नारंगी के पौधे के नीचे जो   झाडि़यां हैं हो सकता है उन में छिपा हो.’’

रितिका के ऐसा कहते ही वे दोनों सीढि़यों से नीचे को दौड़ पड़े. उन के पीछे रितिका भी उतर कर आ गई.

उसे भी मन ही मन अफसोस हो रहा था कि काश वह उसे कमरे के अंदर अपनी आंखों के सामने ही रखती.

नीचे की मंजिल में रहने वाले किराएदार के बच्चे भी पिल्ला खोजो अभियान में  शामिल हो गए 2 घंटे बीत गए. सूर्य के ढलने के साथ ही अंधेरा छाने लगा तो रितिका बच्चों को ऊपर ले आई. बच्चों के चेहरे पर छाई उदासी से उस का मन दुखी हो गया. बच्चों को बहलाते हुए बोली, ‘‘अब तुम्हारे पापा के घर लौटने का समय हो गया है. पिल्ले की बात मत करना. अच्छा हुआ वह खुद चला गया.’’

दोनों बच्चे टीवी के आगे बैठ कर कार्टून देखने लगे. मन ही मन वे बेहद दुखी हो रहे थे.

पापा ने घर आने के कुछ देर बाद उन से पूछा, ‘‘होमवर्क कंप्लीट कर लिया?’’

‘‘हां पापा,’’ मान्या ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘आज क्या मिला होमवर्क में?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘पापा आज केवल मैथ्स और इंग्लिश में रिटेन होमवर्क मिला था. ओरल भी सब याद कर लिया है,’’ मान्या अपनी कौपी निकाल कर पापा को दिखाने लगी.

‘‘पापा इंग्लिश में ऐस्से लिखना था- माई पैट एनिमल’’ मान्या रोआंसी हो कर बोली.

‘‘तो क्या नहीं लिखा अभी तक?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘लिख लिया माई पैट डौग,’’ मान्या का गला रुंध गया. उसे पिल्ला याद आ गया.

‘‘पापा मेरा भी होमवक चैक कर लीजिए,’’ ऋषभ भी अपनी कौपी उठा लाया. उस ने मान्या को वहां से चले जाने का इशारा किया. मान्या अपनी कौपी उठा कर रसोई में अपनी मम्मी के पास आ गई.

मम्मी रात के भोजन की तैयारी में व्यस्त थी. मान्या को देख कर बोली, ‘‘भूख लगी है मान्या? बस 5 मिनट रुको.’’

‘‘नहीं मेरा कुछ भी खाने का मन नहीं है. वह पिल्ला अंधेरे में कितना डर रहा होगा न. मम्मी आज आप ने डौग के ऊपर निबंध लिखवाया. मु  झे पूरा याद भी हो गया पिल्ले की वजह से. उस की लैग्स, उस की टेल, उस की आईज.’’

रितिका ने पलट कर मान्या के बालों को प्यार से सहला दिया. रात को  सोते समय दोनों बच्चे रितिका के पास आ गए.

‘‘जाओ तुम दोनों अपनेअपने कमरे में,’’ रितिका ने कहा.

आज दोनों बच्चों को नींद नहीं आ रही थी. उन को उदास देख कर रितिका ने कहा, ‘‘आज मैं तुम्हें एक सच्ची कहानी सुनाती हूं.’’

‘‘किस की कहानी है?’’ ऋ षभ ने पूछा.

‘‘कुत्ते और बिल्ली की,’’ रितिका ने कहा.

‘‘हां मैं सम  झ गया आप अपनी बिल्ली और मामाजी के कुत्ते की कहानी सुनाएंगी. मैं ने उन दोनों के साथ में बैठे हुए फोटो देखा है,’’ ऋ षभ ने कहा.

‘‘हां मैं ने भी देखा है. दोनों एक ही पोज में कालीन पर बैठे हुए हैं,’’ मान्या बोली.

‘‘सुनो कुत्ते और बिल्ली के हमारे घर में आने की कहानी,’’ रितिका हंस कर बोली.

जुलाई का महीना था. बाहर बारिश हो रही थी. सड़कों के गड्ढे भी पानी से भर गए थे. तभी म्याऊंम्याऊं करती आवाज ने सब का ध्यान आकर्षित कर लिया. नन्हे से भीगे हुए बिल्ली के बच्चे को देख कर मैं अपने को रोक न सकी. उसे कपड़े से पकड़ कर अंदर ले आई. सब ने सोचा बारिश बंद हो जाएगी तो चला जाएगा. मगर वह नहीं गया. हमारे ही घर में रहने लगा. हां कभीकभी घर से घंटों गायब भी रहता, मगर शाम तक लौट आता.’’

‘‘मम्मी मामाजी के डौग शेरू से उस की लड़ाई नहीं हुई?’’ मान्या बोली.

‘‘नहीं जब मेरी पूसी 1 साल की हो गई उन्हीं दिनों हम शेरू को रोड से उठा कर घर लाए थे. वह तो पूसी से डरता था. पूसी अपना अधिकार सम  झती थी. उस के ऊपर खूब गुर्राती. बाद में उस के साथ खेलने लगी. दोनों में दोस्ती हो गई. जब शेरू का आकार पूसी से बड़ा भी हो गया वह तब भी पूसी से डरता था. अब उस बेचारे को क्या मालूम कि वह कुत्ता है और बिल्ली को उस से डरना चाहिए. वह अपनी पूरी जिंदगी बिल्ली से डरता रहा,’’ रितिका बोली.

यह सुन कर दोनों बच्चे हंसने लगे.

‘‘चलो बच्चों देर हो गई जा कर सो जाओ,’’ पापा अपना लैपटौप बंद कर बोले. बच्चे तुरंत उठ कर चले गए.

आधी रात को खटरपटर सुन कर प्रकाश की नींद खुल गई. उस ने कमरे की बत्ती जलाई और इधरउधर देखने लगा.

रितिका ने पूछा, ‘‘क्या हो गया?’’

‘‘मु  झे बहुत देर से कुछ आवाजें सुनाई दे रही हैं.’’

‘‘कैसी आवाजें? वह चोर के छिपे होने की आशंका से घबराई और उठ कर बैठ गई.’’

तभी बैड के नीचे से पिल्ला निकल कर  कूंकूं करने लगा. उसे देख कर प्रकाश को   झटका लगा.

‘‘यह पिल्ला कहां से अंदर आ गया?’’ वह आश्चर्य से चीख पड़ा.

बच्चे पापा की आवाज सुन कर भागते हुए आ गए. पिल्ले ने उन्हें देख कर दुम हिलानी शुरू कर दी.

‘‘पापा इसे हम स्कूल से ले कर आए थे. मगर यह हमें शाम को नहीं मिला. हम ने सोचा यह खो गया है,’’ ऋषभ ने बताया.

‘‘पापा लगता है यह शैतान तो चुपके से अंदर आ गया और आप के बैड के नीचे सो गया मान्या ने कहा,’’ मान्या ने कहा.

‘‘हां बेचारा चिल्लाचिल्ला के थक गया होगा,’’ ऋषभ ने कहा.

‘‘कल बच्चे इसे स्कूल छोड़ आएंगे,’’ रितिका ने सफाई दी.

‘‘पापा क्या हम इसे पाल नहीं सकते?’’ मान्या ने पूछा.

प्रकाश ने एक पल अपने बच्चों के आशंकित चेहरों को देखा फिर हामी भर दी.

‘‘थैंक्स पापा. मैं इस का नाम ब्रूनो रखूंगी,’’ मान्या बोली.

‘‘नहीं इस का नाम शेरू होगा,’’ ऋ षभ ने कहा.

जो पिल्ले को घुमाने ले जाएगा, उस की पौटी साफ करेगा उसी को नाम रखने का अधिकार होगा,’

’ रितिका की बात सुन कर ऋ षभ और मान्या एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

निर्णय आपका: सास से परेशान दामाद की कहानी

संसार में शायद मुझ से अधिक कोई बदनसीब नहीं होगा. विवाह में सब को दहेज में गाड़ी, सोफा, फ्रिज मिलता है, सुंदर पत्नी घर आती है, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ. हमारा विवाह हुआ, पत्नी भी आई और दहेज में सास मिल गई.

हम ने सोचा 1-2 दिन की परेशानी होगी सो भोग लो, किंतु हमारी सोच एकदम गलत साबित हुई. हमें पत्नीजी ने बताया कि आप की सास को यहां का हवापानी काफी जम गया है सो वह अब यहीं रहेंगी. यहां की जलवायु से उन का ब्लड प्रेशर भी सामान्य हो गया है.

हम ने सुना तो हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ गया, लेकिन यदि विरोध करते तो तलाक की नौबत आ जाती. हो सकता है ससुराल पक्ष के व्यक्ति दहेज लेने का, प्रताड़ना का मुकदमा ठोंक देते. इसलिए मन मार कर हम ने यह सोच कर कि आज का दौर एक पर एक फ्री का है, सास को भी स्वीकार कर लिया.

2-3 माह तक दिल पर पत्थर रख कर हम अपनी सास को सहन करते रहे, लेकिन सोचा कि आखिर यह छाती पर पत्थर रख कर हम कब तक जीवित रह पाएंगे? सो हम ने पत्नीजी से सास की पसंद एवं नापसंद वस्तुओं को जान लिया. हमारी सास को कुत्ते, बिल्ली से सख्त नफरत थी. बचपन में उन की मां का स्वर्गवास कुतिया के काटने से हुआ था. पिताजी का नरकवास बिल्ली के पंजा मारने से हुआ था. हम ने भी मन ही मन ठान लिया कि कुत्ता, बिल्ली जल्दी से लाएंगे ताकि सासूजी प्रस्थान कर जाएं और हम अपनी जिंदगी को सुचारु रूप से चला सकें.

हम ने अपने अभिन्न मित्र मटरू से अपनी समस्या बताई और वह महल्ले से एक खजिया कुत्ते का पिल्ला और एक मरियल बिल्ली को ले आए. हम उन्हें खुशीखुशी झोले में डाल कर अपने घर ले आए. हमारी पत्नी ने देखा तो दहाड़ मार कर पीछे हट गई. सासूमां ने बेटी की दहाड़ सुनी तो दौड़ती आईं. हमारे झोले से खजिया कुत्ता एवं बिल्ली को देखा. हम खुश हो गए कि अब तो हमारी सास आधे घंटे बाद घर छोड़ कर प्रस्थान कर जाएंगी लेकिन मनुष्य जो सोचता है वह कब पूरा होता है?

सास ने उन 2 निरीह प्राणियों को देखा तो चच्चच् कर के वहीं जमीन पर बैठ गईं और हमारी ओर बड़ी दया की नजरों से देख कर कहा, ‘‘सच में दामाद हो तो तुम जैसा.’’

‘‘क्यों, ऐसा हम ने क्या कर दिया सासूमां?’’ हम ने प्रसन्नता को मन में छिपाते हुए पूछा.

‘‘अरे, दामादजी, तुम इन निरीह प्राणियों को ऐसी स्थिति में उठा लाए, ये काम बिरले व्यक्ति ही कर सकते हैं. मैं पहले जानवरों से बहुत नफरत करती थी, लेकिन जब से जानवरों की रक्षा करने वाली संस्था की सदस्य बनी हूं तब से  मेरा दृष्टिकोण ही बदल गया. तुम खड़े क्यों हो…आटोरिकशा लाओ?’’ सासूजी ने आदेश दिया.

‘‘आटोरिकशा किसलिए?’’

‘‘अस्पताल चलना है.’’

‘‘क्यों? यह (पत्नीजी उठ बैठी थीं) तो ठीकठाक हैं?’’ हम ने भोलेपन से कहा.

‘‘दामादजी, इन कुत्तेबिल्ली के बच्चों को ले कर चलना है, जल्दी करो,’’ सासूमां ने आर्डर दिया. हम दिल पर पत्थर रख कर चले गए. आगे की घटना बड़ी छोटी है.

आटोरिकशा आया, उस के रुपए हम ने दिए. वेटनरी डाक्टर को दिखाया उस के रुपए हम ने दिए. जानवरों के लिए 1 हजार रुपए की दवा खरीदी वह रुपए देतेदेते हमें चक्कर आने लगे थे. कुल जमा 1,500 रुपयों पर हमें हमारे दोस्त मटरू ने उतार दिया था. घर ला कर उन जानवरों के लिए दूध, ब्रेड की व्यवस्था भी की, और जब ओवर बजट होने लगा तो एक रात चुपके से हम ने दोनों को थैली में बंद कर के मटरू के?घर में छोड़ दिया.

हमारी सास जब सुबह उठीं तो बड़ी दुखी थीं कि पालतू जानवर कहां चले गए? हमारा दुर्भाग्य देखो कि मटरू स्कूटर से सुबह ही आ धमका, ‘‘अरे, गोपाल, ये दोनों मेरे घर आ गए थे. मैं इन्हें ले आया हूं,’’ कह कर उस ने मुझे शादी के तोहफे की तरह कुत्ते का पिल्ला और बिल्ली दी. सासूमां खुशी से झूम उठीं. हम मन ही मन कुढ़ कर रह गए. आखिर किस से अपने मन की व्यथा कहते?

कुत्ते का पिल्ला ठीक हो गया था. उस की खुराक भी हमारी सास की खुराक की तरह बढ़ रही थी. हम खून के आंसू रो रहे थे. सास को जमे 6 माह हो चुके थे. पत्नी थीं कि उन्हें घर भेजने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

हम अपने दोस्त मटरू के पास गए. उस के सामने खूब रोएधोए. उसे हमारी दशा पर दया आ गई. उस ने मुझे एक प्लान बताया जिसे सुन कर हम खुश हो गए. उस प्लान में एक ही गड़बड़ी थी कि श्रीमती को ले कर मुझे बाहर जाना था, लेकिन वह सास के बिना माफ करना, अपनी मां के बिना जाने को तैयार ही नहीं होती थीं.

हम ने अपने मित्र मटरू को वचन दिया कि उस की दी गई तारीख को केवल सास ही घर में रहेंगी. मैं और पत्नी सिनेमा देखने जाएंगे. इन 3-4 घंटों में वह काम निबटा कर सब ठीक कर लेगा.

हम ने मौका देख कर पत्नी की प्रशंसा की, उस के साथ कुछ पल तन्हातन्हा गुजारने की मनोकामना प्रकट की. वह थोड़ा लजाई, थोड़ा घबराई, मां की याद भी आई, लेकिन हमारे प्यार ने जोर मारा और वह तैयार हो गई कि मैं और वह शाम को फिल्म देखने चलेंगे.

हालांकि सासूमां को अकेला छोड़ कर जाने पर उन्होंने आपत्ति प्रकट की लेकिन पत्नी ने उन्हें समझाया कि टिक्कू कुत्ता, दीयापक बिल्ली है इसलिए अकेलापन खलेगा नहीं. बुझे मन से उन्होंने भी जाने की इजाजत दे दी.

हम ने खट से मटरू को मोबाइल से यह खबर दे दी कि हम शाम को निकल रहे हैं, देर से लौटेंगे. रात 10 से 1 के बीच सासूमां का काम निबटा ले. मटरू भी तैयार हो गया?था. हम भी खुश थे कि चलो, बला टलेगी, लेकिन पति हमेशा से ही बदकिस्मत पैदा होता है.

प्लान यह था कि मटरू रात में साढ़े 10 बजे के बीच घर में प्रवेश करेगा और मुंह पर कपड़ा बांध कर सासूमां को डरा कर चोरी कर लेगा. सासूमां डर के मारे या तो भाग जाएंगी या हमारे घर से हमेशा के लिए बायबाय कर लेंगी.

हम पत्नी को 4 घंटे की एक फिल्म दिखलाने शहर से बाहर ले गए. रात 10 बजे फिल्म छूटी. हम ने भोजन किया. फोन से मटरू को खबर भी कर दी कि जल्दी से अपने आपरेशन को अंजाम दे. हमारी पत्नी अपनी मां को ले कर काफी चिंतित थी. हम ने आटोरिकशा वाले को पटा कर 50 रुपए अधिक दिए ताकि वह घर पर लंबे रास्ते से धीमी गति से पहुंचे.

रात साढ़े 12 बजे जब हम अपने घर पहुंचे तो घर के बाहर भीड़ जमा थी. पुलिस की एक वैन खड़ी थी. चंद पुलिस वाले भी थे. हमारा माथा ठनका कि मटरू ने कहीं जल्दबाजी में सासूमां का मर्डर तो नहीं कर दिया?

हम जब आटोरिकशा से उतरे तो महल्ले के निवासी काफी घबराए थे. पत्नी अपनी मां की याद में रोने  लगी तभी अंदर से सासूमां पुलिस इंस्पेक्टर के साथ बाहर हंसतीखिलखिलाती निकलीं. उन्हें हंसते देख हमारा माथा ठनका कि भैया आज मटरू पकड़ा गया और हमारा प्लान ओपन हुआ. बस, तलाक के साथसाथ पूरा महल्ला थूथू करेगा सो अलग. सब कहेंगे, ‘‘ऐसे टुच्चे दोस्त हैं जो ऐसी सलाह देते हैं.’’

हम शर्म से जमीन में गड़ गए. मन ही मन विचार किया, कभी ऐसा गंदा प्लान नहीं बनाएंगे. अचानक हमारे कान में मटरू की आवाज सुनाई पड़ी. देखा कि वह तो भीड़ में खड़ा तमाशा देख रहा है. अब हमारी बारी चक्कर खा कर गिरने की आ गई थी.

हम हिम्मत कर के आगे बढ़े तो देखते हैं कि पुलिस एक चोर को पकड़ कर बाहर आ रही थी. हमें देख कर सासूमां ने कहा, ‘‘लो दामादजी, इसे पकड़ ही लिया, पूरा शहर इस की चोरियों से परेशान था.’’

पुलिस इंस्पेक्टर ने हमें बधाई दी और कहा, ‘‘आप की सास वाकई बड़ी हिम्मती हैं. इन्होंने एक शातिर चोर को पकड़वाया है. इन्हें सरकार से इनाम तो मिलेगा ही लेकिन हमें आज आप के भाग्य पर ईर्ष्या हो रही है कि ऐसी सास हमारे भाग्य में क्यों नहीं थी?’’ हम ने सुना तो गद्गद हो गए. हमारी पत्नी ने लपक कर अपनी मां को गले से लगा लिया.

किस्सा यों हुआ कि हमारे मटरू दोस्त को आने में देर हो गई थी. उस की जगह उस रात अचानक असली चोर घुस आया. सासूमां ने पुराना घी खाया था, सो बिना घबराए अपने कुत्ते के साथ उसे धोबी पछाड़ दे दी. महल्ले वालों को आवाज दे कर बुलाया, पुलिस आ गई. इस तरह सासूमां ने एक शातिर चोर को पकड़ लिया. अगले दिन समाचारपत्रों में फोटो सहित सासूमां का समाचार छपा हुआ था.

अब आप ही विचार करें, ऐसी प्रसिद्ध सासूमां को कौन घर से जाने को कहेगा? आप ही निर्णय करें कि हम भाग्यशाली हैं या दुर्भाग्यशाली? आप जो भी निर्णय लें लेकिन हमारी सासूमां जरूर सौभाग्यशाली हैं जिन्हें ऐसा दामाद मिला…

ध्रुवा: क्या आकाश के माता-पिता को वापस मिला बेटा

हर मातापिता की तरह आकाश के मातापिता ने भी अपने 25 वर्षीय बेटे की शादी के ढेर सारे सपने संजो रखे थे जिन्हें आकाश के एक फैसले ने मिट्टी में मिला दिया था.

“बेटा आकाश, मिश्रा जी हमारे जवाब के इंतज़ार में हैं, उन की बेटी सुकन्या एमबीए कर के,” मां इंद्रा देवी ने बात शुरू ही की थी कि “मां, आप ने सोच भी कैसे लिया कि मैं ध्रुवा को भूल जाऊंगा, उस का और मेरा साथ आज का नहीं, जन्मजन्मांतर का है. कभी तभी तो सोचिए न मां, कि इतनी भीड़भरी दुनिया में वही क्यों मिली मुझे,” आकाश ने मां की बात को बीच में ही काटा.

“इस में सोचने वाली तो कोई बात ही नहीं. तुम पैसे वाले हो, देखने में स्मार्ट हो. इस से ज्यादा एक लड़की को और क्या चाहिए. उस ने सोचसमझ कर तुम पर डोरा डाला है,” मां इंद्रा देवी ने क्रोधित होते हुए कहा.

“मां, मैं गया था उस के पीछे. उस ने तो महीनों तक मुड़ कर भी नहीं देखा था मेरी ओर,” आकाश हारना नहीं चाहता था, उसे हर हाल में अपने प्यार की जीत चाहिए थी.

“हां, तो तुम्हें कोई अपनी बिरादरी की नहीं मिली. वही एक हूर की परी है दुनिया में,” मां अब भी अपनी संस्कृति, रीतिरिवाज का मोरचा संभाले बोली.”

“जो होना था वह हो चुका. कल उस के मातापिता आ रहे हैं आप लोगों से मिलने के लिए और मैं नहीं चाहता आने वाले समय की बुनियाद में थोड़ी सी भी खटास शामिल हो,” आकाश ने दृढ़ निश्चय लेते हुए कहा.

“कल क्लाइंट के साथ मेरी इंपौर्टेंट मीटिंग है,” आकाश के पिता ने अपनी नाराजगी को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की.

“और मेरी महिला समिति की किटी पार्टी है,” मां ने मोबाइल में आंखें गड़ाए कहा.

“समझ गया, आप लोग किसी भी हाल में ध्रुवा को नहीं अपनाने वाले. लेकिन मैं भी कह देता हूं आने वाली परिस्थिति के जिम्मेदार आप लोग ही होंगे,” आकाश का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. अपनी बात कह कर आकाश कमरे से निकल गया.

मातापिता की रजामंदी न मिलने से खीझा हुआ तो वह पहले से ही था, रहीसही कसर दोस्त मनीष के कोरोना पौजिटिव होने की खबर ने पूरी कर दी जिस के संसर्ग में वह भी पिछले कई दिनों से रह रहा था. लेकिन फिलहाल समस्या यह थी कि वह ध्रुवा से क्या कहेगा… रोज उस के सामने अपने मातापिता के खुले विचारों वाले होने के सौ किस्से सुनाया करता था और आज जब सही में खुले विचार से बेटे की खुशियां समेटने की बारी आई तो वे मुकर गए थे.

यही सब सोचता उन कड़ियों को जोड़ने लगा जहां से इस सारे अफसाने की शुरुआत हुई थी. असम राज्य के शिवसागर जिला अपनी खूबसूरती के साथसाथ कई और संस्कृतियों को भी अपनी गोद में उसी प्रकार बढ़नेपनपने देता है जैसे कि वे वहीं की हों. वहीं के एक कौन्वैंट स्कूल में आकाश पढ़ता था. हिंदी फिल्मों के शौकीन आकाश ने गर्लफ्रैंड बनाने के कई प्रयास किए पर हर बार नाकामयाब रहा. उसी समय ध्रुवा ने उसी स्कूल में दाखिला लिया. वैसे तो ध्रुवा के मातापिता की कहीं से औकात न थीं इतने बड़े स्कूल में पढ़ाने की लेकिन ध्रुवा इतनी अच्छी पेंटिंग करती थी कि उसे उस स्कूल के लिए स्कौलरशिप मिली थी और यहीं से शुरुआत हुई थी उन दोनों के प्रेम कहानी की. हुआ यों था कि एक दिन ध्रुवा को कक्षा में डांट पड़ रही थी. ‘ओहो, ध्रुवा, तुम ने फिर होमवर्क नहीं किया,’ राधिका मैम ने उस की कौपी डैस्क पर पटकते हुए कहा. 10वीं कक्षा के सभी विद्यार्थियों की नजर ध्रुवा पर गई- गोरा सा मुखड़ा, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें, हलके गुलाबी रंग के होंठ.

‘बोलो, बोलती क्यों नहीं,’ राधिका मैम ने फिर धमकाया.

‘मैडम, मुझे मैथ्स अच्छी नहीं लगती. वैसे भी ए प्लस बी होलस्कवैर का इस्तेमाल जीवन के किस मोड़ पर होता है, मुझे बताएं जरा,’ ध्रुवा ने मासूमियत से उत्तर दिया.

‘बस ध्रुवा, एक तो तुम ने होमवर्क नहीं किया, ऊपर से बड़ीबड़ी बातें…’

‘मैडम, आप ने कभी रंगों के साथ खेला है. उन्हें कागज या कपड़ों पर उकेरा है…’ ध्रुवा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि छुट्टी की घंटी बज गई और सभी कक्षा से बाहर निकल गए.

ध्रुवा का मासूम, सुंदर सा चेहरा, बेबाक हो कर बोलना और नुमाइश में लगी ध्रुवा की पेंटिंग जिस की खूब तारीफ हो रही थी. इन सारी बातों ने आकाश के मन को मोह लिया था.

आकाश चौधरी ध्रुवा की कक्षा का हैड बौय था. कसरती बदन, ऊंचा मस्तक, घुंघराले बालों वाला यह लड़का लड़कियों के बीच हमेशा चर्चा का विषय बना रहता. दरअसल, आकाश हमेशा से स्कूल टौपर भी था.

‘आप को मैथ्स अच्छी नहीं लगती?’ एक दिन ध्रुवा को लाइब्रेरी में अकेला पा कर आकाश ने पूछा.

‘क्या आप रंगों की भाषा जानते हैं? ध्रुवा ने चिढ़ कर जवाब दिया जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो.

उसी का तो मैं दीवाना हो गया हूं, आकाश के मन की आवाज थी जो उस के मन में ही दब कर रह गई. पहली मुलाकात में भला कैसे कह सकता है इतनी सारी बातें.

‘आप की पेंटिंग देखी हैं मैं ने, बहुत अच्छा बनाती हैं आप,’ संयोग से मिले अंतरंग पलों को भला कैसे जाने दे सकता था आकाश.

‘क्या फायदा मैथ्स में तो फिसड्डी हूं न,’ ध्रुवा ने होंठों को टेढ़ा करते हुए कहा.

‘आप कहें तो मैं आप की मदद कर सकता हूं,’ आकाश ने अपनी ओर से पहल करते हुए कहा.

‘सच्ची, फिर ठीक है,’ ध्रुवा लगभग उछल पड़ी थी.

स्कूल का टौपर लड़का उस की मदद करना चाह रहा था. इस से अच्छी बात क्या हो सकती थी भला.

इस तरह अपनीअपनी ख्वाहिशों को जरूरतों का नाम दे कर दोनों जीवन के उस राह पर चलने लगे जिसे ज्ञानी लोग बकवास और साधारण लोग पवित्र प्रेम का दर्जा देते हैं. और इस तरह धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा.

शुरुआत में तो मुलाकातें छोटी होती थीं पर सपने बड़े होते थे. फिर एक शाम की सिंदूरी बेला में अपने प्यार को सचाई का जामा पहनाने की कोशिश में आकाश का पुरुषत्व हावी हो बैठा जिसे ध्रुवा ने भी नादानी में स्वीकार कर लिया और नदी का अस्तित्व सागर में विलीन हो गया.

इस समर्पण के सिलसिले को रोकने की कोशिश दोनों में से किसी ने न की. नतीजा यह निकला कि ध्रुवा अपनी पढ़ाई भी संपन्न न कर पाई. उसे अपने गर्भवती होने का पता लग चुका. उस ने आकाश को बताने में तनिक भी देरी न की. साधारणतया ऐसी परिस्थितियों में लड़का चिल्लाता है, मुकर जाता है या भागने की कोशिश करता है लेकिन आकाश चौधरी ने इस खुशी को उतने ही प्रसन्नता से स्वीकार किया जितना शायद वह विवाह के बाद स्वीकार करता.

कमी इतनी ही थी की ध्रुवा के मांग में उस के नाम का सिंदूर नहीं था. लोक, समाज की तो जैसे आकाश को परवा ही न थी. उसे, बस, इतना लग रहा था वह पिता बनने वाला है और वह उस जिम्मेदारी को निभाने के लिए पूर्णरूप से तैयार है. ध्रुवा से वह सचमुच प्यार करता था.

आकाश के पिता महेश चौधरी कंप्यूटर कंपनी के मालिक थे जिस का इकलौता वारिस आकाश ही था. अपने पिता के व्यवसाय को उसे आगे ले जाना है, यह बात उसे बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाई गई थी और उस ने भी उसे स्वीकार कर लिया था और व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए मेहनत भी करता था. आज जब उस ने अपने मातापिता के सामने ध्रुवा से विवाह करने का प्रस्ताव रखा तो मातापिता ने जातिवाद को ऊपर रखते हुए इस विवाह से साफ इनकार कर दिया.

अब चिंता की लकीरें आकाश के माथे पर खिंचने लगी थीं क्योंकि इकलौता बेटा होने की वजह से उसे लगता था वह जो चाहेगा मातापिता उस के लिए सहर्ष इजाजत दे देंगे लेकिन मातापिता ने साफ इनकार कर दिया. फिर भी उस ने कदम पीछे नहीं किया. देरसवेर मातापिता मान जाएंगे, यह सोच कर कुछ दोस्तों की मदद से शादी करने का फैसला ले लिया और मन ही मन ध्रुवा को दुलहन के जोड़े में देख मुसकराने लगा.

24 मार्च की शाम को आकाश ने ध्रुवा को फोन किया, ‘बस, कल भर की देरी है, फिर हम दोनों और हमारा मुन्ना…’

ध्रुवा ने बीच में टोका, ‘मुन्ना क्यों, मुन्नी…’

‘चलो ठीक है मुन्नी, फिर हम तीनों एकसाथ होंगे. मैं तुम्हें हर वह खुशी देने की कोशिश करूंगा जिस की चाहत तुम ने सपने में भी की होगी,’ आकाश बोला.

मुझे यकीन है तुम पर, आकाश,’ ध्रुव तो निहाल हुई जा रही थी.

‘ध्रुवा, तुम्हें मुझ पर यकीन तो है न,’ कहतेकहते आकाश एकदो बार खांसने लगा.

‘अपनेआप से ज्यादा,’ ध्रुवा ने मोबाइल को चूमते हुए कहा जैसे वह मोबाइल को नहीं, अपने उस विश्वास को चूम रही थी जो नैटवर्क के दूसरे छोर पर खांस रहा था.

अचानक से आकाश की खांसी बढ़ने लगी, वह बोला, ‘अभी रखता हूं, फिर बाद में बात करते हैं.’

‘ठीक है, थोड़ा पानी पी लो, खांसी ठीक हो जाएगी,’ ध्रुवा ने कहा.

एक सप्ताह पहले से ही 25 मार्च, 2020 का दिन शादी के लिए तय किया गया. शिवसागर का औडिटोरियम बड़ा ही भव्य और विशालकाय है जिस में दोनों सात फेरे लेने वाले थे. सबकुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. लेकिन नियति ने अपनी अलग नीति बनाई थी जिस के बारे में किसी को कुछ पता न था.

रात होतेहोते आकाश की खांसी बढ़ने लगी और शरीर तपने लगा. रात के 12 बजतेबजते आकाश को अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई. ऐसे में ध्रुवा को खबर देने की जरूरत किसी ने महसूस न की.

अस्पताल पहुंच कर पता चला आकाश कोरोना पौजीटिव है और उसे औक्सीजन की सख्त जरूरत है. मातापिता का रोरो कर बुरा हाल था. उन्होंने इलाज में कोई कसर न छोड़ी. वैंटिलेटर पर भी रखा गया लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. अगले दिन शाम के 4 बजतेबजते आकाश ने आखिरी सांस ले ली और मातापिता के सामने उन की दुनिया उजड़ गई. सबकुछ इतनी जल्दी हो गया कि किसी को यकीन नहीं हो रहा था.

जिस वक्त सात फेरे लेने का समय था उस वक्त उस के पिता उसे मुखाग्नि दे रहे थे.

आखिर एक दोस्त की मदद से ध्रुवा तक खबर पहुंची जो सुबह से औडिटोरियम में इंतजार कर रही थी. आकाश के मोबाइल पर कई बार कौल की जो आकाश के घर में बैड के साइड की टेबल पर रखा था. अब ध्रुवा को काटो तो खून नहीं, अब क्या होगा उस का. चारों तरफ सबकुछ बंद. घर जाने तक की गुंजाइश न थी. शादी के बाद जिस घर जाने की बात थी, अब वह रहा नहीं. पेट में 3 महीने का बच्चा लिए अंधेरे रास्ते से गुजर रही थी. दहाड़े मार कर आकाश का नाम लेले कर रोए जा रही थी. पर कोई सुनने वाला न था. पागलों की तरह अपने शरीर से कपड़े, गहने नोचनोच कर फेंक रही थी.

सवाल था, जाए तो कहां जाए? इसी कशमकश में चली जा रही थी. रात अपने घर के सीढ़ियों पर गुजारी. मातापिता अलग नाराज थे. सुबह हुई तो मां ने स्थिति जान कर थोड़ी सहानुभूति दिखाई. लौकडाउन की वजह से सबकुछ बंद हो चुका था. गर्भपात कराने की भी गुंजाइश नहीं रह गई थी. ऐसे में अब उसे एक ही रास्ता सूझ रहा था जिस रास्ते से गुजर कर वह आकाश के पास पहुंच सकती थी. उस ने दिल पर पत्थर रख कर वही रास्ता चुन लिया. बस, सही तरीका अपना कर अंजाम देना चाहती थी.

कहते हैं, मृत्यु जब तक बांहें न फैलाए तब तक कोई अपनी मरजी से उस की आगोश में नहीं जा सकता और वही हुआ. हर कोशिश नाकाम रही. अकेली जान होती, तो रोचिल्ला कर रह लेती. लेकिन उस की कोख में आकाश की निशानी पल रही थी और उस के साथ वह कोई नाइंसाफी नहीं होने देना चाहती थी. अगली सुबह उस ने थोड़ी हिम्मत जुटाई. दृढ़ निश्चय किया और मातापिता को साथ ले कर आकाश के घर पहुंची. निकलते समय बैग में जीवन को

खत्म करने की सामग्री रखना न भूली. वाचमैन ने गेट पर ही रोक दिया. ध्रुवा जो ठान कर आई थी, उसे अंजाम दिए बगैर वापस जाना नहीं चाहती थी.

उस ने एक कागज़ के टुकड़े पर लिखा, ‘मां, आप अपना इकलौता बेटा खो चुकी हैं, कम से कम उस की आखिरी निशानी को तो बचा लीजिए.’

आकाश के मातापिता, जो बेटे को खो कर अपने लिए जीने की वजह खो चुके थे, उस कागज के टुकड़े को पढ़ते ही दौड़ कर बाहर आए. कहने के लिए शब्द नहीं थे. सभी के आंसुओं ने अपनीअपनी बात कही. इंदिरा देवी का जातिवाद बेटे को खो कर खामोश हो चुका था. ध्रुवा को घर के अंदर लेते वक्त सभी ने आकाश को अपने आसपास महसूस किया जैसे उन का बेटा लौट आया हो.

खुल गई आंखें : कैसी थी रवि की पत्नी गुंजा

दफ्तर से अपने बड़े सरकारी बंगले पर जाते हुए उस दिन अचानक एक ट्रक ने रवि की कार को जोरदार टक्कर मार दी थी. कार का अगला हिस्सा बुरी तरह से टूटफूट गया था.

खून से लथपथ रवि कार के अंदर ही फंसा रह गया था. वह काफी समय तक बेहोशी की हालत में कार के अंदर ही रहा, पर उस की जान बचाने वाला कोई भी नहीं था.

हां, उस के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जरूर लग गई थी. सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे थे, पर किसी में उसे अस्पताल ले जाने या पुलिस को बुलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

भला हो रवि के दफ्तर के चपरासी रामदीन का, जो भीड़ को देख कर उसे चीरता हुआ रवि के पास तक पहुंच गया था. बाद में उसी ने पास के एसटीडी बूथ से 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुला लिया था.

जब तक पुलिस रवि को ले कर पास के नर्सिंगहोम में पहुंची तब तक उस के शरीर से काफी खून बह चुका था. रामदीन काफी समय तक अस्पताल में ही रहा था. उस ने फोन कर के दफ्तर से सुपरिंटैंडैंट राकेश को भी बुला लिया था जो वहीं पास में रहते थे.

रवि के एक रिश्तेदार भी सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए थे. गांव दूर होने व बूढ़े मांबाप की हालत को ध्यान में रखते हुए किसी ने उस के घर सूचना भेजना उचित नहीं सम  झा था. वैसे भी उस के गांव में संचार का कोई खास साधन नहीं था. इमर्जैंसी में तार भेजने के अलावा और कोई चारा नहीं होता था.

रवि की पत्नी गुंजा अपने सासससुर व देवर रघु के साथ गांव में ही रहती थी. वह 2 साल पहले ही गौना करा कर अपनी ससुराल आई थी. रवि के साथ उस की शादी बचपन में तभी हो गई थी, जब वे दोनों 10 साल की उम्र भी पार नहीं कर पाए थे.

गांव में रहने के चलते गुंजा की पढ़ाई 8वीं जमात के बाद ही छूट गई थी पर रवि 5वीं जमात पास कर के अपने चाचा के पास शहर में ही पढ़ने आ गया था. उस ने अच्छीखासी पढ़ाई कर ली थी. शहर में पढ़ाई करने के चलते उस का मन चंचल हो गया था. वैसे भी वह गुंजा से हर मामले में बेहतर था.

शादी के समय तो रवि को कोई सम  झ नहीं थी, पर जब गौने के बाद विदा हो कर गुंजा उस के घर आई थी और पहली बार जवान और भरपूर नजरों से उस ने उसे देखा था तभी से उस का मन उस से उचट गया था.

गुंजा कामकाज में भी उतनी माहिर नहीं थी जितनी रवि ने अपनी पत्नी से उम्मीद की थी. यहां तक कि सुहागरात के दिन भी वह गुंजा से दूर ही रहा था.

गुंजा गांव की पलीबढ़ी लड़की थी. शक्लसूरत और पढ़ाईलिखाई में कम होने के बावजूद मांबाप से उसे अच्छे संस्कार मिले थे. उस ने रवि की अनदेखी के बावजूद उस के बूढ़े मांबाप और रवि के छोटे भाई रघु का साथ कभी नहीं छोड़ा.

मांबाप के लाख कहने के बावजूद रवि जब उसे अपने साथ शहर ले जाने को राजी नहीं हुआ तब भी उस ने उस से कोई खास जिद नहीं की, न ही अकेले शहर जाने का उस ने कोई विरोध किया.

शहर में आ कर रवि अपने दफ्तर और रोजमर्रा के कामों में ऐसा बिजी हुआ कि गांव जाना ही भूल गया. उसे अपने मांबाप से भी कुछ खास लगाव नहीं रह गया था क्योंकि वह अपनी बेढंगी शादी के लिए काफी हद तक उन्हीं को कुसूरवार मानता था.

तनख्वाह मिलने पर घर पर पैसा भेजने के अलावा रवि कभीकभार चिट्ठी लिख कर मांबाप व भाई का हालचाल जरूर पूछ लेता था, पर इस से ज्यादा वह अपने घर वालों के लिए कुछ भी नहीं कर पाता था.

3-4 दिन आईसीयू में रहने के बाद अब रवि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया था. दफ्तर के अनेक साथी तन, मन और धन से उस की सेवा में लगे हुए थे. बड़े साहब भी लगातार उस की सेहत पर नजर रखे हुए थे.

नर्सिंगहोम में जहां सीनियर सर्जन डाक्टर अशोक लाल उस के इलाज पर ध्यान दे रहे थे, वहीं वह वहां की सब से काबिल नर्स सुधा चौहान की चौबीसों घंटे की निगरानी में था.

सुधा चौहान जितना नर्सिंगहोम के कामों में माहिर थी, उतना ही सरल उस का स्वभाव भी था. शक्लसूरत से भी वह किसी फिल्मी नर्स से कम नहीं थी. उस की रातदिन की सेवा और बेहतर इलाज के चलते रवि को जल्दी ही होश आ गया था.

उस समय सुधा ही उस के पास थी. उसे बेचैन देख कर सुधा ने सहारा दिया और उस के सिरहाने तकिया रख दिया. अगले ही पल नर्स सुधा ने शीशी से एक चम्मच दवा निकाल कर आहिस्ता से उस के मुंह में डाल दी.

रवि कुछ कहने के लिए मुंह खोलना चाहता था, पर पूरे चेहरे पर पट्टी बंधी होने के चलते वह कुछ भी कह पाने में नाकाम था. सुधा ने हलकी मुसकान के साथ उसे इशारेइशारे में चुप रहने को कहा.

सुधा की निजी जिंदगी भी बहुत खुशहाल नहीं थी. उस का पति मनीष इस दुनिया में नहीं था. उस की रिया नाम की 5 साल की एक बेटी थी जो उस के साथ ही रहती थी.

मनीष सेना में कैप्टन था. जब रिया मां के पेट में थी उन्हीं दिनों बौर्डर पर सिक्योरिटी का जायजा लेते समय आतंकियों के एक हमले में उस की जान चली गई थी. इस के बाद सुधा टूट कर रह गई थी. पर मनीष की निशानी की खातिर वह जिंदा रही. अब उस ने लोगों की सेवा को ही अपने जीने का मकसद बना लिया था.

थोड़ी देर तक शांत रहने के बाद रवि कुछ बुदबुदाया. शायद उसे प्यास लग रही थी. सुधा उस के बुदबुदाने का मतलब सम  झ गई थी. उस ने 8-10 चम्मच पानी उस को पिला दिया. पानी पिला कर उस ने रूमाल से रवि के होंठों को पोंछ दिया था. फिर वह पास ही रखे स्टूल पर बैठ कर आहिस्ताआहिस्ता उस का सिर सहलाने लगी थी. यह देख कर रवि की आंखें नम हो गई थीं.

सुधा को रवि के बारे में मालूम था. डाक्टर अशोक लाल ने उसे रवि के बारे में पहले से ही सबकुछ बता दिया था. नर्सिंगहोम में रवि के दफ्तर से आनेजाने वालों का जिस तरह से तांता लगा रहता, उसे देख कर उस के रुतबे का अंदाजा लग जाता था.

कुछ दिनों के इलाज के बाद बेशक अभी भी रवि कुछ बोल पाने में नाकाम था, पर उस के हाथपैर हिलनेडुलने लगे थे. अब वह किसी चिट पर लिख कर अपनी कोई बात सुधा या डाक्टर के सामने आसानी से रख पा रहा था. कभी जब सुधा की रात की ड्यूटी होती तब भी वह पूरी मुस्तैदी से उस की सेवा में लगी रहती.

एक दिन सुबह जब सुधा अपनी ड्यूटी पर आई तो रवि बहुत खुश नजर आ रहा था. सुधा के आते ही रवि ने उसे एक चिट दी, जिस पर लिखा था, ‘आप बहुत अच्छी हैं, थैंक्स.’

चिट के जवाब में सुधा ने जब उस के सिर पर हाथ फेरते हुए मुसकरा कर ‘वैलकम’ कहा तो उस की आंखें भर आई थीं. उस दिन रवि के धीरे से ‘आई लव यू’ कहने पर सुधा शरमा कर रह गई थी.

सुधा का साथ पा कर रवि के मन में जिंदगी को एक नए सिरे से जीने की इच्छा बलवती हो उठी थी. जब तक सुधा उस के पास रहती, उस के दिल को बड़ा ही सुकून मिलता था.

एक दिन सुधा की गैरहाजिरी में जब रवि ने वार्ड बौय से उस के बारे में कुछ जानना चाहा था तो वार्ड बौय ने सुधा की जिंदगी की एकएक परतें उस के सामने खोल कर रख दी थीं.

सुधा की कहानी सुन कर रवि भावुक हो गया था. उस ने उसी पल सुधा को अपनाने और एक नई जिंदगी देने का मन बना लिया था. उस ने तय कर लिया था कि वह कैसे भी हो, सुधा को अपनी पत्नी बना कर ही दम लेगा. पर सवाल यह उठता था कि एक पत्नी के होते हुए वह दूसरी शादी कैसे करता?

उस दिन अस्पताल से छुट्टी मिलते ही रवि दफ्तर के कुछ काम निबटा कर सीधा अपने गांव चला गया था. जब वह सुबह अपने गांव पहुंचा तब घर वाले हैरान रह गए थे. बूढे़ मांबाप की आंखों में तो आंसू आतेआते रह गए थे.

पूरे घर में अजीब सा भावुक माहौल बन गया था. आसपास के लोग रवि के घर के दरवाजे पर इकट्ठा हो कर घर के अंदर का नजारा देखे जा रहे थे.

रवि बहुत कम दिनों के लिए गांव आया था. वह जल्दी से जल्दी गुंजा को तलाक के लिए तैयार कर शहर लौट जाना चाहता था. पर घर का माहौल एकदम से बदल जाने के चलते वह असमंजस में पड़ गया था. उस दिन पूरे समय गुंजा उस की खातिरदारी में लगी रही. वह उसे कभी कोई पकवान बना कर खिलाती तो कभी कोई. पर रवि पर उस की इस मेहमाननवाजी का कोई असर नहीं हो रहा था.

दिनभर की भीड़भाड़ से जू  झतेजू  झते और सफर की रातभर की थकान के चलते उस रात रवि को जल्दी ही नींद आ गई थी. गुंजा ने अपना व उस का बिस्तर एकसाथ ही लगा रखा था, पर इस की परवाह किए बगैर वह दालान में पड़े तख्त पर ही सो गया था. पर थोड़ी ही देर में उस की नींद खुल गई थी. उसे नींद आती भी तो कहां से. एक तो मच्छरमक्खियों ने उसे परेशान कर रखा था, उस पर से भविष्य की योजनाओं ने थकान के बावजूद उसे जगा दिया था.

रवि देर रात तक सुधा और अपनी जिंदगी के तानेबाने बुनने में ही लगा रहा. रात के डेढ़ बजे उस पर दोबारा नींद की खुमारी चढ़ी कि उसे अपने पैरों के पास कुछ सरसराहट सी महसूस हुई. उसे ऐसा लगा मानो किसी ने उस के पैरों को गरम पानी में डुबो कर रख दिया हो.

रवि हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने देखा, गुंजा उस के पैरों पर अपना सिर रखे सुबक रही थी. पास में ही मच्छर भगाने वाली बत्ती चारों ओर धुआं छोड़ रही थी. उस के उठते ही गुंजा उस से लिपट गई और फिर बिलखबिलख कर रोने लगी.

गुंजा रोते हुए बोले जा रही थी, ‘‘इस बार मु  झे भी शहर ले चलो. मैं अब अकेली गांव में नहीं रह सकती. भले ही मु  झे अपनी दासी बना कर रखना, पर अब अकेली छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मैं कुएं में कूद कर मर जाऊंगी.’’

गुंजा की यह दशा देख कर अचानक रवि उस के प्रति कुछ नरम होते हुए भावुक हो उठा. वह अपने दिलोदिमाग में हाल में बने गए सपनों को भूल कर अचानक गुंजा की ओर मुखातिब हो चला था.

गुंजा ने जब बातों ही बातों में रवि को बताया कि उस ने शहर चलने के लिए एबीसीडी समेत अंगरेजी की कई कविताएं भी मुंहजबानी याद कर रखी हैं तो रवि उस के भोलेपन पर मुसकरा उठा.

आज पहली बार उसे गुंजा का चेहरा बहुत अच्छा लगा था और उस के मन में गुंजा के प्रति प्यार का ज्वार उमड़ पड़ा था. वह उस की कमियों को भूल कर पलभर में ही उस के आगोश में समाता चला गया था.

रवि गुंजा के बदन से खेलता रहा और वह आंखों में आंसुओं का समंदर लिए उस के प्यार का जवाब देती रही.

एक ही रात और कुछ समय के प्यार ने ही रवि के कई सपनों को जहां तोड़ दिया था वहीं उस के दिलोदिमाग में कई नए सपने भी बुनते चले गए थे. वह गुंजा को तन, मन व धन से अपनाने को तैयार हो गया था, पर सवाल यह था कि शहर जा कर वह सुधा को क्या जवाब देगा. जब सुधा को यह पता चलेगा कि वह पहले से ही शादीशुदा है और जब उस को अब तक का उस का प्यार महज नाटक लगेगा तो उस के दिल पर क्या बीतेगी.

इसी उधेड़बुन के साथ रवि अगली सुबह शहर को रवाना हो चला था. गुंजा को उस ने कह दिया था कि वह अगले हफ्ते उसे लेने गांव आएगा.

शहर पहुंचते ही रवि किसी तरह से सुधा से मिल कर उस से अपनी गलतियों व किए की माफी मांगना चाहता था. अपने बंगले पर पहुंच कर वह नहाधो कर सीधा नर्सिंगहोम पहुंचा, पर वहां सुधा से उस की मुलाकात नहीं हो पाई.

पता चला कि आज वह नाइट ड्यूटी पर थी. वह वहां से किसी तरह से पूछतापूछता सुधा के घर जा पहुंचा, पर वहां दरवाजे पर ताला लटका मिला. किसी पड़ोसी ने बताया कि वह अपनी बेटी के स्कूल गई हुई है.

मायूस हो कर रात को नर्सिंगहोम में सुधा से मिलने की सोच कर रवि सीधा अपने दफ्तर चला गया. आज उस का दिन बड़ी मुश्किल से कट रहा था. वह चाहता था कि किसी तरह से जल्दी से रात हो और वह सुधा से मिल कर उस से माफी मांग ले.

रात के 8 बजने वाले थे. सुधा के नर्सिंगहोम आने का समय हो चुका था, इसलिए तैयार हो कर रवि भी नर्सिंगहोम की ओर बढ़ चला था. मन में अपनी व सुधा की ओर से आतेजाते सवालों का जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते वह कब नर्सिंगहोम के गेट पर जा पहुंचा था, उसे पता ही नहीं चला.

रिसैप्शन पर पता चला कि सुधा प्राइवेट वार्ड के 4 नंबर कमरे में किसी मरीज की सेवा में लगी है. किसी तरह से इजाजत ले कर वह सीधा 4 नंबर कमरे में घुस गया, पर वहां का नजारा देख कर वह पलभर को ठिठक गया. सुधा एक नौजवान मरीज के अधनंगे शरीर को गीले तौलिए से पोंछ रही थी.

रवि को आगे बढ़ता देख उस ने उसे दरवाजे पर ही रुक जाने का इशारा किया. रवि दरवाजे पर ही ठिठक गया था.

मरीज का बदन पोंछने के बाद सुधा ने उसे दूसरे धुले हुए कपड़े पहनाए. उसे अपने हाथों से एक कप दूध पिलाया और कुछ बिसकुट भी तोड़तोड़ कर खिलाए. फिर वह उसे अपनी बांहों के सहारे से बिस्तर पर सुलाने की कोशिश करने लगी.

मरीज को नींद नहीं आते देख सुधा उस के सिर पर हाथ फेरते हुए व थपकी दे कर उसे सुलाने की कोशिश करने लगी थी. उस के ममता भरे बरताव से मरीज को थोड़ी ही देर में नींद आ गई थी.

जैसे ही मरीज को नींद आई, रवि लपक कर सुधा के करीब आ गया था. उस ने सुधा को अपनी बांहों में भरने की कोशिश की, पर सुधा छिटक कर उस से दूर हो गई.

‘‘अरे, यह आप क्या कर रहे हैं. आप वही हैं न, जो कुछ दिन पहले यहां एक सड़क हादसे के बाद दाखिल हुए थे. अब आप को क्या दिक्कत है?’ सुधा ने उस से पूछा.

‘‘अरे, यह क्या कह रही हो तुम? ऐसे अजनबियों जैसी बातें क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारा वही रवि हूं जिस ने तुम्हारे प्यार के बदले में तुम से भी उतना ही प्यार किया था और हम जल्दी ही शादी करने वाले थे,’’ कहता हुआ रवि उस के करीब आ गया.

रवि की बातों के जवाब में सुधा ने कहा, ‘‘मिस्टर आप रवि हैं या कवि, आप की बातें मेरी सम  झ से परे हैं. आप किस प्यार और किस शादी की बात कर रहे हैं, मैं सम  झ नहीं पा रही हूं.

‘‘देखिए, मैं एक नर्स हूं. मेरा काम यहां मरीजों की सेवा करना है. भला इस में प्यार और शादी कहां से आ गई.’’

‘‘तो क्या आप ने मुझे भी महज एक मरीज के अलावा कुछ नहीं सम  झा?’’ रवि बौखलाते हुए बोला.

सुधा ने अपने मरीज की ओर देखते हुए रवि को धीरेधीरे बोलने का इशारा किया और उसे खींचते हुए दरवाजे तक ले गई. वह उस को सम  झाते हुए बोली, ‘‘आप को गलतफहमी हुई है. हम यहां प्यार करने नहीं बल्कि अपने मरीजों की सेवा करने आते हैं.

‘‘अगर हम भी प्यारव्यार और शादीवादी के चक्कर में पड़ने लगे तो हमारे घर में हर दिन एक नया पति दिखाई देगा.

‘‘प्लीज, आप यहां से जाइए और मेरे मरीज को चैन से सोने दीजिए.’’

इस बीच मरीज ने अपनी आंखें खोल लीं. उस ने सुधा से पानी पीने का इशारा किया. सुधा तुरंत जग में से पानी निकाल कर चम्मच से उसे पिलाने बैठ गई. पानी पिलातेपिलाते वह मरीज के सिर को भी सहलाए जा रही थी.

रवि सुधा से अपनी जिस बात के लिए माफी मांगने आया था, वह बात उस के दिल में ही रह गई. उसे तसल्ली हुई कि सुधा के मन में उस के प्रति ऐसी कोई बात कभी आई ही नहीं थी, जिसे सोच कर उस ने दूर तक के सपने देख लिए थे.

सुधा रवि से ‘सौरी’ कहते हुए अपने मरीज की तीमारदारी में लग गई. रवि ने कमरे से बाहर निकलते हुए एक नजर सुधा व उस के मरीज पर डाली. मरीज को लगी हुई पेशाब की नली शायद निकल गई थी, इसलिए वह कराह रहा था. सुधा उसे प्यार से पुचकारते हुए फिर से नली को ठीक करने में लग गई थी.

सुधा की बातों और आज के उस के बरताव ने रवि के मन का सारा बो  झ हलका कर दिया था.

आज रात रवि को जम कर नींद आई थी. एक हफ्ते तक दफ्तर के कामों में बिजी रहने के बाद रवि दोबारा अपने गांव जाने वाली रेल में सवार था. उस की रेल भी उसे गुंजा तक जल्दी पहुंचाने के लिए पटरियों पर सरपट दौड़ लगाती हुई आगे बढ़ी चली जा रही थी. जो गांव उसे कल तक काटता था और जिस की ओर वह मुड़ कर भी नहीं देखना चाहता था, आज उस के आगोश में समाने को बेताब था.

तृप्ति : क्या था काली डायरी का राज

मैं सुकु बाई, आज 4 महीने की छुट्टी के बाद काम पर वापस गई, तो दीदी ने दरवाजा खोला. उन्होंने मुझे अंदर बुलाया और हालचाल पूछा. मेरे घर वालों की खैरखबर ली.

मैं इस घर में 15 साल से काम कर रही हूं. पिछले दिनों मैं अपने गांव चली गई थी. बेटे को बड़े स्कूल में दाखिल कराना था.

जब से मेरे पति की मौत हुई है, तब से मेरे बेटे को देखने वाला मेरे अलावा और कोई नहीं है. एक दूर की बूढ़ी ताई हैं, जिन के पास उसे छोड़ा हुआ है. ताई को खर्चापानी भेजती रहती हूं.

पर इस बार मुझे गांव जाना पड़ा, क्योंकि बेटे का स्कूल बदली कराना ताई के बस की बात नहीं थी. रोजीरोटी का सवाल है, जिस की वजह से मुझे गांव से कोसों दूर यहां दिल्ली में रहना पड़ता है, वरना किस का मन नहीं करता अपने बच्चों के बीच रहने का.

दीदी और भैया बहुत अच्छे लोग हैं खासतौर पर भैया. बहुत बड़ा दिल है भैया का. मुझे जब कभी जरूरत पड़ती है, तो मैं भैया से ही पैसे मांगती हूं. कभी मना नहीं करते और न ही कभी पैसे लौटाने की बात करते हैं.

भैया हंस कर कहते हैं, ‘दे देना सुकु बाई, जब तुम्हारा बेटा बड़ा हो जाए और कमाने लगे तब लौटा देना.’

दीदी ने बताया कि मेरे पीछे जो काम वाली रखी थी, वह बहुत ही चालू काम करती थी. फिर वे मुझे काम बता कर किसी जरूरी मीटिंग के लिए बाहर चली गईं. फिलहाल मेरे सिवा घर में कोई और नहीं था. दीदी का एकलौता बेटा बाहर पढ़ता है.

मैं ने घर में झाड़ूपोंछा किया, रसोई साफ की, रात के लिए खाना बनाया और फिर कमरों की झाड़पोंछ शुरू कर दी. घर वाकई बहुत गंदा पड़ा था.

काम करतेकरते मैं थक गई. सोचा कि थोड़ा सुस्ता लिया जाए. अपने घर में वैसे भी कौन मेरा इंतजार कर रहा था. खाली पड़ा था.

मगर फिर आसपास देखा तो मन हुआ कि बैठेबैठे क्या करना, थोड़ी और धूलमिट्टी झाड़ ली जाए. मैं झाड़न लेकर बैडरूम में घुसी. बिस्तर पर बहुत सी किताबें बिखरी पड़ी थीं. न जाने कौन से दफ्तर में दीदी काम करती थीं कि जब देखो लिखती ही रहती थीं. मैं बिखरी किताबें समेटने लगी.

मैं ने देखा कि बिस्तर के बीचोंबीच कंबल के नीचे नंगी औरतों की तसवीरों वाली एक मैगजीन पड़ी थी. जाने दीदी और भैया में से कौन इसे देखता होगा. मैं ने उसे उठा कर तकिए के नीचे रख दिया.

एक काली डायरी भी मिली, जिस पर दीदी का नाम था. उस के पन्ने पलटे तो पाया कि उस में बहुत से किस्सेकहानियां लिखे हुए हैं.

मैं 8वीं पास हूं. हिंदी पढ़ लेती हूं. दीदी की डायरी पढ़ना नहीं चाहती थी, मगर उस में कुछ ऐसा लिखा था, जिस ने मुझे उन की डायरी पढ़ने पर मजबूर कर दिया :

मैं और मेरे पति प्रताप बहुत अच्छे दोस्त बन चुके हैं. हमारी उम्र 50 को टापने वाली है. मुझे सैक्स में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, मगर प्रताप को है. इन की तो यह हालत है कि इस उम्र में भी अगर किसी कमसिन लड़की को देख लें, तो इन की नजर बदल जाती है. मुझ से भी 3 दिन से ज्यादा दूर नहीं रह पाते. और जब कभी मूड में आते हैं, तो देर रात तक सोने नहीं देते और फिर उस के बाद 2 दिन तक शरीर में दर्द रहता है…

मुझे ऐसी निजी बातें पढ़ कर अजीब सा लगा. क्या एक विधवा को यह सब करना ठीक था? हरगिज नहीं. मैं उठ कर दरवाजे की तरफ गई, मगर वहां कोई नहीं था. मैं वापस बैडरूम में आ कर बैठ गई और डायरी खोल ली :

पिछली दफा जब मेरा दिल किया कि इन के साथ बैठ कर प्यारभरी बातें की जाएं, इन के दिल में कोई नया ही खयाल घूम रहा था. कहने लगे कि चलो इस बार कुछ अलग करते हैं.

‘क्या?’

‘किसी लड़की को बुलाते हैं.’

‘कहां से आएगी लड़की?’

‘अरे, इस की फिक्र तुम मत करो. यह लो उस का नंबर और मिलाओ.’

मुझे हलकी सी जलन हुई कि भला यह क्या बात हुई. मेरे पल किसी और को? गलत बात है यह. फिर मैं ने सोचा कि चलो छोड़ो. इन को सैक्स की तलब रहती है और मेरी डायरी को कहानियों की. किसी को बदला नहीं जा सकता. पति जैसा है उसे वैसे ही स्वीकारने में गृहस्थ जीवन की खुशी है.

जब मुझे पहली बार शक हुआ था कि प्रताप शादी के बाद भी बाहर मुंह मारते हैं, मुझे बहुत बुरा लगा था. फिर मैं ने सोचा था, बहुत सोचा और इस निचोड़ पर पहुंची कि इन का अगर एक यह ऐब नजरअंदाज कर दिया जाए, तो इन में और कोई कमी नहीं. दरियादिल हैं, पैसा कमाना खूब जानते हैं, एक अच्छे बेटे, बाप और भाई हैं. बस, एक अच्छे पति नहीं हैं. अगर मैं इन्हें ऐसे ही स्वीकार लूं, तो मेरे अहम को दबना सीखना होगा और बाकी का निजाम जैसा है वैसा ही दिखेगा और चलता रहेगा.

मुझे यह फायदा होगा कि मैं जान पाऊंगी कि अपना अहम खत्म करने के बाद जो सुनहरा मंजर है, जिस के बारे में धर्मग्रंथों में बारबार बोला गया है, आखिर क्या चीज है. फिर आखिर में तो हर औरत एक मां ही है, तो अपने पति के लिए क्यों नहीं.

हर 4-6 महीनों में दोस्तों के साथ घूमने जाना. कभी जकार्ता, कभी चीन, कभी मलयेशिया, कभी सिंगापुर… और कुछ नहीं इन के औरतबाजी करने के रास्ते थे. एक बार तो अपने दोस्तों के साथ भारत में ही किसी शहर में घूमने निकल गए, यह कह कर कि इन का दोस्त और उस के 2 रिश्तेदार ही साथ में होंगे.

सफर के दौरान जब मैं ने हालचाल पूछने के लिए फोन किया, तो पीछे से किसी लड़की के हंसने की आवाजें आ रही थीं. जब सफर से वापस आए तो 2 दिन तक रंगीले मिजाज में रहे. बिस्तर में भी नईनई हरकतें आजमाते रहे.

बीवी हूं, समझ गई, इन के बिना कुछ कहे. बहुत सोचविचार किया और हार कर इस नतीजे पर पहुंची कि मुझे इन का दोस्त बन कर जीना सीखना होगा. तलाक मुझ अनाथ के बस की बात नहीं और न ही कलहक्लेश करना. ये जैसे थे, इन्हें वैसे ही स्वीकारना पड़ा.

जब इन्होंने मुझे लड़की को फोन कर के बुलाने को कहा, तो मैं ने सोचा कि चलो देखते हैं, अपने पति को किसी दूसरी औरत से प्यार करते अपनी आंखों से देखना कैसा लगता है. और कुछ नहीं तो एक नया अनुभव ही सही. मेरी डायरी की भूख भी तो बेअंत है. अपना पेट भरवाने के लिए मुझे कुछ भी दिखाने को तैयार हो गई.

मैं ने फोन कर के लड़की को बुला लिया. थोड़ी देर में घर की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो एक 20-22 बरस की जवान लड़की को सामने खड़ा पाया. उस ने फूलों वाला लंबा सा फ्रौक पहना था, जिस में उस की उभरी हुई छाती मुश्किल से छिप रही थी. तीखे नैननक्श और गोरा रंग, पर्स कंधे पर लटका हुआ.

मैं ने उसे अंदर बुला लिया और उसे ले कर बैडरूम में आ गई. प्रताप तब बैडरूम में बैठे किसी से फोन पर बात कर रहे थे. हमें देखते ही वे फोन उठा कर घर से बाहर निकल गए. शायद कोई जरूरी बात करनी थी.

प्रताप कारोबार के आगे सैक्स को कुछ नहीं समझाते. सही भी है. पैसा उड़ाने से पहले कमाना जरूरी है.

मैं लड़की को ले कर पीछे आंगन में चली गई और वक्त बिताने के लिए उसे बातों में लगा लिया. मुझे सुनने का शौक था और उसे बोलने का. वह बहुत बोली. अपने किस्से सुनाने लगी. एक से एक बेहूदा और फूहड़. सारा समय बोलती रही.

उस की बातें बंद ही नहीं हो रही थीं. ग्राहकों की लंबीलंबी गाडि़यों में घूमना, मर्दों का उस के साथ वह सब करना जो वे अपनी बीवियों के साथ नहीं कर सकते, पार्टियों में जाम से जाम टकराना, महफिलों में नंगे नाचना उस के लिए आम बातें थीं.

उस ने बताया था, ‘अरे, एक पार्टी में तो मुझे 3-4 आदमियों ने इकट्ठा पकड़ लिया, एक यहां से शुरू हो गया और दूसरा वहां से. आप मानोगे नहीं कि 60-70 साल के बूढ़े भी मलाई लगा कर चाटते हैं.’

मैं ने पूछा कि कभी पुलिस से पाला नहीं पड़ता, तो वह बोली, ‘पड़ता है न. एक पुलिस ही है, जिस से बिना नागा पाला पड़ता रहता है. हफ्ता भी लेती है और रोब भी जमाती है. कई बार तो मुफ्त में ले कर चलती बनती है.’

एक बार पुलिस ने उसे और उस की 2 सहेलियों को पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा. तीनों की साड़ियां एकदूसरे की साड़ी से बांध दीं. भागें तो कपड़े उतरें और न भागें तो डंडे पड़ें. बड़ी मुश्किल से वह समय कटा और आज तक जेहन से उस का खौफ नहीं निकला. बड़ा ही दर्दनाक हादसा था.

‘कभी कोई वहशी भी मिला है? तुम्हें तो कई तरह के लोग मिलते होंगे?’

उस ने बताया कि एक दफा उसे 2 आदमी ले गए थे. दोनों के दोनों लंबेचौड़े मुस्टंडे जिन्हें देख कर वह घबरा गई. फिर उस ने अपनेआप को संभाला और कहा कि 1-1 कर के आएं. मगर वे नहीं माने.

दोनों एकसाथ ही उस पर टूट पड़े और ऐसे लूटा कि उस की सुधबुध खो गई. तृप्ति होने के बाद उन्होंने उसे उस की बस्ती में छोड़ दिया.

‘कैसी बस्ती?’

‘हिजड़ों की बस्ती. वहीं तो रहती हूं मैं. मैं हिजड़ा हूं.’

‘पर, तुम्हारा शरीर?’

‘यह तो सर्जरी का कमाल है.’

मैं ने मन ही मन सोचा कि यह सही रही. प्रताप का यह शौक भी मुझे सहना होगा.

थोड़ी देर बाद हम घर के अंदर वापस आ गए. प्रताप की फोन पर हो रही बात खत्म हो चुकी थी और वे बेसब्री से हमारा इंतजार कर रहे थे. एकदम तैयार बैठे थे.

हमें देखते ही वे हमें बैडरूम के अंदर ले गए और दरवाजा बंद कर लिया. मैं पास ही में बैठ गई.

प्रताप ने एक बड़ा जाम बना कर लड़की को दिया और फिर अपने लिए भी ठीक वैसा ही पैग बनाया. मुझे देने लगे तो मैं ने मना कर दिया कि मेरा मूड नहीं है.

शराब का सुरूर चढ़ते ही प्रताप उस लड़की से चिपट गए और एक घंटा वे उस के जिस्म से खेलते रहे. मैं चुपचाप लिखती रही. फारिग हो कर उन्होंने लड़की को पैसे दे कर भेज दिया और मेरे पास आ कर एक बच्चे की तरह बेफिक्र सो गए.

अगले दिन मैं ने प्रताप को चाय का प्याला देते हुए उठाया और लड़की का सच बताया.

‘मुझे क्या बता रही हो शारदा, मैं ने ही तो उस की सर्जरी करवाई थी…’

तभी घर के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई. लगता था दीदी वापस आ गई थीं. मैं ने जल्द ही डायरी वापस रखी और उठ कर अपनी आंखें धोईं.

‘इन बड़े लोगों में क्याक्या चलता रहता है,’ सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने चल दी.

औलाद की चाहत : कैसे भरी सायरा की कोख

उस्मान की शादी को 5 साल हो गए थे, मगर अभी भी उसे बाप होने का सुख नहीं मिला था. उस्मान की बीवी सायरा की गोद नहीं भरी तो उस्मान के अब्बा बेचैन रहने लगे. उन्हें यह चिंता सताने लगी कि वे पोते या पोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से चले जाएंगे.

तभी किसी ने उन्हें बताया कि पास वाले गांव में एक पहुंचे हुए मुल्लाजी आए हुए हैं. वे जिस किसी को भी तावीज देते हैं, उस की हर मुराद पूरी हो जाती है.

इतना सुनना था कि उस्मान के अब्बा अगले ही दिन उन मुल्लाजी के पास पहुंच गए.

मुल्लाजी ने कहा, ‘‘मैं घर आ कर पहले आप की बहू को देखूंगा कि उस पर किस का साया है. और हां, साए को दूर करने में खर्चा भी आएगा.’’

‘‘आप पैसे की परवाह मत करो, बस मेरे बेटे और बहू को औलाद का सुख दे दो.’’

उस्मान के अब्बा उसी वक्त मुल्लाजी को अपने साथ ले आए और उन्हें बैठक में बिठा कर उन्होंने उस्मान व सायरा को बताया, ‘‘इन मुल्लाजी के तावीज से तुम्हारी औलाद की चाहत जरूर पूरी होगी, बस तुम दोनों को इन की हर बात माननी पड़ेगी.’’

थोड़ी देर के बाद उस्मान की बीवी सायरा को बैठक में बुलाया गया. जैसे ही मुल्लाजी की नजर सायरा पर पड़ी, वे उसे पाने के लिए बेताब हो गए. हों भी क्यों न, सायरा थी ही इतनी खूबसूरत. सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ, गदराया बदन जिसे देखते ही कोई भी मदहोश हो जाए.

मुल्लाजी किसी भी कीमत पर सायरा को अपनी बांहों में भरना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपनी चाल चली और उस के मखमली पेट पर हाथ रखते हुए उस्मान के अब्बा से कहा, ‘‘तुम्हारे एक दुश्मन ने जादूटोने से इस की

गोद बांध रखी है. जब तक इस को खोला नहीं जाएगा, तब तक यह मां नहीं बन पाएगी.

‘‘इस काम में 3 दिन लगेंगे और यह काम रात को 12 बजे अकेले में बंद कमरे में करना पड़ेगा और इस में काफी पैसा भी लगेगा, क्योंकि जाफरान से 3 तावीज बनाने पड़ेंगे.’’

उस्मान और सायरा को तो औलाद की इतनी ज्यादा चाहत थी कि उन्होंने फौरन हां कर दी. उस्मान के अब्बा ने 50,000 रुपए उस ढोंगी मुल्लाजी को दे दिए. उन्होंने उन के घर में से एक कमरा ले लिया और कहा, ‘‘जब तक पूरा इलाज न हो, तब तक कोई भी कमरे में मेरी बिना इजाजत के अंदर न आए.’’

मुल्लाजी शाम ढलते ही कमरे के अंदर लुबान जला कर कुछ बुदबुदाने लगे. कभी उन की आवाज तेज हो जाती, तो कभी शांत.

मुल्लाजी कभी किसी से बात करने का नाटक करते और चिल्लाते, ‘‘तू इसे छोड़ कर चला जा, वरना तु?ो यहीं भस्म कर दूंगा. क्यों इस बच्ची की कोख पर बैठा है? क्यों इसे मां नहीं बनने दे रहा है? इस मासूम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?’’

इस तरह मुल्लाजी ने कई घंटे तक यह नाटक जारी रखा और रात ढलते ही उन्होंने सायरा को अपने कमरे में बुलाया और उसे एक तावीज देते हुए बोले, ‘‘इसे अपनी शर्मगाह में रख लो और चुपचाप लेट जाओ. एक घंटे तक बिलकुल भी हिलनाडुलना नहीं.

‘‘और हां, इस एक घंटे के लिए अपने बदन पर कोई भी सिला हुआ कपड़ा मत पहनना. बिना सिला हुआ कपड़ा जैसे चादर वगैरह से अपना बदन ढक लो.’’

सायरा तो औलाद की चाहत में अंधी हो चुकी थी. वह उस पाखंडी मुल्लाजी की हवस भरी नजरों को भांप नहीं पा रही थी. सायरा ही क्या, उस का शौहर और ससुर भी औलाद की चाहत में कुछ नहीं सम?ा पा रहे थे, इसलिए उन्होंने सायरा को उस पाखंडी मुल्लाजी के पास अकेले बंद कमरे में भेज दिया था. उन की आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी जो बंधी हुई थी.

उधर बंद कमरे में सायरा ने अपने बदन से सारे कपड़े अलग किए और चादर ओढ़ कर एक चटाई पर लेट गई.

उस पाखंडी मुल्लाजी ने सायरा के पास आ कर अगरबत्ती जलाई, पूरे कमरे को खुशबू से महकाया और कुछ बुदबुदाने लगे. फिर वे सायरा से बोले, ‘‘अपनी आंखें बंद कर के चुपचाप लेटी रहो और कुछ भी बोलने की कोशिश

मत करना, वरना सारा कियाधरा बेकार हो जाएगा, फिर तुम कभी भी मां नहीं बन पाओगी.’’

सायरा चुपचाप लेटी थी और पाखंडी मुल्लाजी तावीज ले कर उस के होंठों से रगड़ते हुए कुछ बुदबुदाने का नाटक करते हुए धीरेधीरे उस के बदन को सहलाने लगे. उन की इस हरकत पर सायरा हैरान थी, पर औलाद पाने की चाहत में वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, जिस का वे पाखंडी मुल्लाजी फायदा उठा रहे थे.

मुल्लाजी सायरा का बदन सहलाते रहे और उस तावीज को उस की शर्मगाह के पास ले जा कर छेड़छाड़ करने लगे. जल्द ही सायरा की जवानी उफान पर आ गई और वह मुल्लाजी की इस हरकत से मदहोश होने लगी.

सायरा की हवस जाग उठी थी. पाखंडी मुल्लाजी की इस हरकत ने उस के अंदर जोश भर दिया और इस का फायदा उठा कर उस मुल्लाजी ने उस के साथ खूब मजा किया. औलाद पाने की चाहत में सायरा उन के सामने पूरी तरह से बिछ चुकी थी.

इसी तरह उन पाखंडी मुल्लाजी ने 3 दिन तक सायरा की देह के मजे लिए और उस के जिस्म से खूब खेला. 3 दिन बाद उन्होंने उस्मान और उस के अब्बू से कहा, ‘‘जल्दी ही तुम्हें खुशखबरी मिल जाएगी,’’ और वहां से चले गए.

एक हफ्ता गुजर गया, पर सायरा को उम्मीद की कोई किरण नजर न आई. वह सम?ा चुकी थी कि उन पाखंडी मुल्लाजी ने दौलत के साथसाथ उस की इज्जत भी लूट ली है.

उस्मान और उस के अब्बू हैरान थे कि उन की बहू अभी भी पेट से नहीं हुई. उन्होंने पास के गांव जा कर उन मुल्लाजी से मिलना चाहा, तो पता चला कि वे तो यहां एक परिवार से लाखों रुपए ले कर भाग गए हैं.

अब उस्मान और उस के अब्बा को अपने ऊपर पछतावा हो रहा था कि वे क्यों पाखंडी मुल्लाजी की बातों में आ गए. बाद में उन्होंने एक अस्पताल में जा कर एक लेडी डाक्टर से सायरा का चैकअप कराया, तो उन्होंने बताया कि सायरा की बच्चेदानी में सूजन है,

जिस की वजह से वह मां नहीं बन पा रही है. 2-3 महीने के इलाज से सब ठीक हो जाएगा.

और हुआ भी यही. 3 महीने के इलाज के बाद सायरा को बच्चा ठहर गया और वक्त पूरा होने के बाद उस ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया.

इस तरह न जाने कितनी सायरा औलाद की चाहत में अपनी इज्जत गंवा बैठती हैं और न जाने कितने उस्मान दौलत के साथसाथ अपने घर की आबरू भी पाखंडी मुल्लाओं को सौंप देते हैं.

पढ़ाई सुधर गई : क्या जीत पाया दीपक

जैसे ही दोपहर के खाने की घंटी बजी, सारे बच्चे दौड़ते हुए खाने की तरफ भागे. दीपक सर, जो गणित के टीचर थे और हाल ही में इस स्कूल में आए थे, स्कूल के इन तौरतरीकों को देख कर हैरान थे.

आज बच्चों का खाना देख कर तो और भी हैरान हो गए. दाल बिलकुल पानी जैसी, भात और सब्जी के नाम पर उबले हुए चने. कैसे किसी के गले से उतरेंगे?

स्टाफ रूम में सारे टीचर अपनेअपने खाने का डब्बा खोल कर खाने बैठ गए थे. दीपक सर ने जैसे ही अपने खाने का डब्बा खोला, मिश्रा सर, जो हिंदी के टीचर थे, कहने लगे, ‘‘दीपक सर, क्या बात है… आज तो आप के खाने के डब्बे से बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है?’’

‘‘जी,’’ मुसकराते हुए दीपक सर ने कहा और अपने खाने का डब्बा उन के आगे बढ़ा दिया.

थोडी़ देर बाद दीपक ने वहां बैठे दूसरे टीचरों से पूछा, ‘‘चलिए, मैं तो चलता हूं, अगली क्लास लेने. आप सब को नहीं चलना है?’’

‘‘अरे भैया, क्यों इतने उतावले हो रहे हो? बैठो जरा. बच्चे कहां भागे जा रहे हैं,’’  संस्कृत के पांडे सर ने कहा.

विज्ञान की टीचर वंदना मैडम बोल पड़ीं, ‘‘बच्चे अगर 1-2 सब्जैक्ट नहीं भी पढ़ेंगे, तो कौन सा आईएएस बनना है उन्हें, जो नहीं बन पाएंगे?’’

‘‘वंदना मैडम, बच्चों को पढ़ाना हमारी ड्यूटी है और अगर हम ईमानदारी से बच्चों पढ़ाएंगे न, तो बच्चे एक दिन जरूर आईएएस बनेंगे. हम यहां इसलिए तो आए हैं. तनख्वाह भी तो हमें बच्चों को पढ़ाने की ही मिलती है,’’ दीपक सर ने कहा.

‘‘मैं ने तो कुछ ज्यादा ही खा लिया. अब क्या करें? पत्नीजी खाना ही इतना दे देती हैं. और खाते ही मुझे जोरों की नींद आने लगती है,’’ कह कर सिन्हा सर वहीं पड़ी कुरसी पर अपने पैर पसार कर सो गए.

दीपक ने जब मिश्रा सर की तरफ देखा, तो वे भी अपने मुंह में पान दबाते हुए बोले, ‘‘देखिए दीपक सर, आप भी नएनए आए हैं, तो आप को यहां के नियमकानून का कुछ पता नहीं है.’’

‘‘कैसे नियमकानून हैं सर?’’ दीपक ने हैरान होते हुए पूछा.

मिश्रा सर भी वहीं लगी दूसरी कुरसी पर आराम से अपने पैर पसारते हुए कहने लगे, ‘‘दीपक सर, मैं कोचिंग सैंटर भी चलाता हूं. अब पूरे दिन इसी स्कूल में बैठा रह गया, तो वहां के बच्चे को कौन पढ़ाएगा?

‘‘अब ऐसे मत देखिए दीपक सर. अब अगर कोचिंग सैंटर नहीं चलाएंगे, तो दालरोटी पर मक्खन कहां से मिलेगा.’’

‘‘मिश्रा सर, वह सब तो ठीक है, पर जब प्रिंसिपल मैडम को आप सब की हरकतों का पता चलेगा तो…?’’

दीपक सर की बात को बीच में ही काटते हुए श्रीवास्तव सर कहने लगे, ‘‘अरे छोडि़ए मैडम की बातें. उन को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम क्या करें और क्या न करें. उन के हाथों में हर महीने हरेहरे नोट सरका दीजिए बस. और वे कौन सी दूध की धुली हैं, जो हमें कुछ कहेंगी.’’

तभी मिश्राजी हंसते हुए कहने लगे, ‘‘लगता है दीपक बाबू को प्रिंसिपल मैडम की कहानी नहीं पता?’’

दीपक सर ने हैरानी से सब का मुंह देखते हुए पूछा, ‘‘कौन सी कहानी सर?’’

‘‘लो भैया, अब इन्हें भी बतानी पड़ेगी मैडम की कहानी कि कैसे वे एक अदना सी टीचर से प्रिंसिपल बन बैठीं,’’ अपने मुंह से पान की पीक दीवार पर ही फेंकते हुए मिश्राजी ने कहा.

‘‘दीपक सर, ये बबीता मैडम जो हैं न, पहले अपने ही गांव के एक प्राइमरी स्कूल में टीचर थीं. आप समझ रहे हैं न?’’ एक बार फिर उन्होंने पान की पीक दीवार पर मारते हुए कहा.

दीपक सर ने उन्हें बड़ी अजीब नजरों से देखा.

‘‘बबीता मैडम जिस गांव से थीं, उसी गांव से एमएलए प्रवीण यादव चुनाव के लिए खड़े हुए थे. बबीताजी के पति चुनाव महकमे में ही एक छोटेमोटे मुलाजिम थे.

‘‘प्रवीण यादव की तरफ से बबीता मैडम और उन के पति ने खूब चुनाव प्रचार किया था. प्रवीण यादव ने बबीताजी से यह वादा किया था कि अगर वे जीत गए, तो उन्हें खुश कर देंगे और उन्होंने ऐसा किया भी.

‘‘बबीताजी कितनी पढ़ीलिखी हैं, यह तो आज तक हम में से कोई नहीं जानता है. उस के बावजूद उन्हें इस स्कूल में मिडिल तक की टीचर बना दिया गया. बबीता मैडम गांव के स्कूल से सीधा शहर में आ गईं.

‘‘प्रवीण यादव और बबीता मैडम अब किसी न किसी बहाने एकदूसरे से मिलने लगे. लोगों की नजरों में तो वे अच्छे दोस्त थे, पर सचाई कुछ और ही थी. धीरेधीरे सब को पता चल ही गया कि नेता प्रवीण यादव और बबीताजी के रिश्ते कितने गहरे हैं.

‘‘बबीता मैडम स्कूल में तो जब मन करता तब ही आती थीं, पर तनख्वाह पूरे महीने की उठाती थीं. वे अब ज्यादातर नेताजी की सेवा में ही लगी रहती थीं.

‘‘दीपक सर, आप समझ रहे हैं न. मैडम कहां बिजी रहने लगी थीं और नेताजी उन पर इतने मेहरबान क्यों थे?’’ एक खलनायक वाली हंसी हंसते हुए मिश्रा सर  ने कहा, तो दीपक सर ने भी अपना सिर हां में हिला दिया. मिश्रा सर ने पूरा किस्सा बताया.

‘‘नेताजी की पत्नी को जब उन दोनों के नाजायज रिश्तों के बारे में पता चला, तो एक दिन वे सीधे अपने फार्महाउस पहुंच गईं, जहां पहले से बबीता मैडम मौजूद थीं.

‘‘पहले तो उन्होंने बबीताजी के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया, फिर कहने लगीं, ‘नीच औरत, तुझे शर्म नहीं आती किसी पराए मर्द के साथ गुलछर्रे उड़ाते हुए. अपने पति से मन भर गया, तो मेरे पति का बिस्तर गरम कर रही है. आगे से कभी भी मैं ने तुझे इन के इर्दगिर्द भी देखा ना, तो समझ लेना…’

‘‘नेताजी को भी उन्होंने खूब खरीखोटी सुनाई, ‘आप को यह जो एमएलए की पोस्ट मिली है न, वह मैं मिनटों में छिनवा लूंगी… समझे नेताजी?’

‘‘नेताजी के ससुर खुद ही मुख्यमंत्री रह चुके थे. उन्होंने ही अपने दामाद को टिकट दिलवाया था.

‘‘बबीताजी की हरकतों से परेशान हो कर उन के पति ने भी उन्हें अपनी जिंदगी से निकाल दिया.

‘‘बबीताजी के सिर पर अब शिक्षा मंत्रीजी का हाथ है. अरे, एक ने घर से निकाल दिया, तो दूसरे ने अपनी पत्नी के डर से उन्हें छोड़ दिया तो क्या हुआ. आप ने सुना है दीपक सर, एक नहीं तो और सही,’’ चुटकी लेते हुए मिश्रा सर ने कहा.

मिश्रा सर ने आगे कहा, ‘‘शिक्षा मंत्रीजी, जो अकसर स्कूल की शिक्षा व्यवस्था देखने आते रहते हैं, बबीताजी ने अब उन को फंसा रखा है. उन के साथ भी बबीता मैडम के बहुत गहरे संबंध बन गए हैं. देखिए, एक मामूली टीचर से आज वे प्रिंसिपल बन बैठी हैं.’’

दीपक को ये सब बातें सुन कर बहुत हैरानी हुई. कैसा अंधा कानून चल रहा है इस स्कूल में. एक प्रिंसिपल कितनी पढ़ीलिखी हैं, यह भी किसी को नहीं पता है. वे कैसे इतनी बड़ी कुरसी पर बैठ सकती हैं? और ये सारे निकम्मे टीचर अपनी कामचोरी, रिश्वतखोरी, आलसीपन का सुबूत खुद अपने मुंह से दे रहे हैं.

ऐसे ही कुछ टीचरों की वजह से आज सारे टीचरों को गलत समझा जा रहा है. क्लास में बच्चे तो आते हैं, पर पढ़ाने के लिए टीचर ही नहीं आते हैं. सब अपनाअपना कोचिंग सैंटर चलाते हैं और तनख्वाह इस स्कूल से लेते हैं. यह सरासर गलत है.

उस दिन अंगरेजी की टीचर ममता मैडम बच्चों को 8 की अंगरेजी में स्पैलिंग ईआईजीटी समझा रही थीं.

दीपक ने ही उन्हें टोका था, ‘‘मैडम, आप गलत स्पैलिंग बता रही हैं बच्चों को. ईआईजीटी नहीं, ईआईजीएचटी होगा.’’

इस पर अंगरेजी की मैडम ममता बरस पड़ीं, ‘‘दीपक सर, आप अपनी क्लास के बच्चों को संभालिए.’’

अगले दिन दीपक जब स्कूल गया, तो स्कूल के चपरासी ने आ कर उस से कहा, ‘‘आप को प्रिंसिपल मैडम ने अपने औफिस में बुलाया है.’’

‘‘नमस्ते मैडम,’’ दीपक ने प्रिंसिपल मैडम से कहा. उस ने देखा कि पहले से ही वहां और भी कई टीचर बैठे थे.

‘‘दीपक सर, आइए बैठिए. मैं ने आप सब को यहां यह कहने के लिए बुलाया है कि कल हमारे स्कूल में स्कूल निरीक्षक आने वाले हैं. आप सब अपनीअपनी क्लास के बच्चों को ठीक से समझा दें कि क्या कहना है और क्या नहीं.

‘‘और हां, कल दोपहर का खाना बहुत ही स्वादिष्ठ बनना चाहिए और मिठाई तो जरूर होनी चाहिए.

‘‘मिश्रा सर, आप पूरे स्कूल की व्यवस्था ठीक से देख लीजिएगा. कुछ भी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए,’’ बबीता मैडम ने सब को अच्छी तरह से समझा दिया. अगले दिन बराबर बैठी वंदना मैडम ने कहा, ‘‘पांडेजी, जरा देखिए तो, कैसे प्रिंसिपल मैडम निरीक्षक महोदय के बगल में अपनी कुरसी चिपका कर बैठी हैं.

‘‘मैडम की इसी अदा पर तो मर्द फिदा हो जाते हैं,’’ पांडे सर की बातों पर वहां बैठे सारे टीचर हंस पड़े.

‘‘सर, आप को बच्चों से कुछ पूछना है, तो पूछ सकते हैं,’’ प्रिंसिपल मैडम ने निरीक्षक महोदय से कहा.

‘‘बच्चो, आप सब को कोई दिक्कत तो नहीं है न इस स्कूल में? किसी को कुछ कहना हो या कुछ पूछना हो तो पूछो. डरने की कोई बात नहीं है,’’ निरीक्षक महोदय ने कहा.

सारे बच्चों ने एकसाथ जवाब दिया, ‘‘नहीं सर, यहां सबकुछ ठीक है. हमें कोई दिक्कत नहीं है.’’ बच्चों ने वही कहा, जो उन्हें पहले से रटाया गया था.

‘‘आप टीचरों को कुछ कहना है?’’ निरीक्षक महोदय ने पूछा.

‘‘नहीं महोदय, हमें कुछ नहीं कहना है,’’ सारे टीचरों ने जवाब दिया. तभी अपना हाथ ऊपर करते हुए दीपक सर ने कहा, ‘‘महोदयजी, मुझे कुछ कहना है.’’

दीपक ने सोचा कि अगर आज हम चुप रहे तो फिर पता नहीं निरीक्षक सर कब आएं इस स्कूल में. दीपक के इतना कहते ही प्रिंसिपल मैडम समेत सारे टीचर उन का मुंह ताकने लगे कि भाई इन्हें क्या कहना है.

‘‘हांहां, कहिए, आप क्या कहना चाहते हैं?’’ निरीक्षक महोदय ने पूछा.

‘‘महोदय, बच्चे तो वही कह रहे हैं, जो उन्हें कहने को कहा गया है. दरअसल, यहां की स्कूली व्यवस्था बिलकुल अच्छी नहीं है.’’

‘‘आप मुझे जरा खुल कर बताइए,’’ निरीक्षक महोदय ने दीपक से कहा.

‘‘महोदय, पहली बात तो यह है कि कोई भी टीचर अपनी क्लास ठीक से नहीं लेते हैं. जब मन हुआ बच्चों को पढ़ाते हैं, नहीं मन हुआ तो नहीं पढ़ाते हैं.

‘‘दूसरी बात यह कि यहां खाने के नाम पर बच्चों को भात के साथ पानी जैसी दाल और उबली हुई सब्जी परोसी जाती है. हर क्लास में पंखे सिर्फ दिखाने के लिए हैं, चलता कोई नहीं है, जबकि प्रिंसिपल रूम और स्टाफ रूम में एयरकंडीशंड का इंतजाम है.’’

और भी जितनी बातें दीपक ने इस स्कूल में देखीं और सुनीं, वे सब उस ने निरीक्षक को बता दीं, बिना अंजाम की परवाह किए.

निरीक्षक ने सारी बातें अपनी डायरी में लिख लीं, पर रजिस्टर में कुछ नहीं लिखा और पेज खाली छोड़ दिया. बाद में प्रिंसिपल और दूसरे टीचर ने दीपक को बहुत फटकार लगाई और कहने लगे, ‘‘दीपक सर, जो भी बात थी, आप हमें आ कर बताते, निरीक्षक को बताने की क्या जरूरत थी.’’

मिश्रा सर कहने लगे, ‘‘दीपक सर, यह आप ने ठीक नहीं किया. अब आप को क्या होगा देख लेना,’’ जैसे उन्हें सब पता था कि क्या होगा.

‘‘माफ कीजिएगा मिश्रा सर, मैं यहां कोई रिश्वत दे कर या किसी की पैरवी से नहीं आया हूं, जो मैं डर जाऊंगा. अंजाम की परवाह तो वे लोग करते हैं, जो खुद गलत हैं.’’

हफ्तेभर बाद दीपक का तबादला हो गया, तो मिश्रा और सारे टीचर मुसकरा कर बोले, ‘‘देख लिया न अंजाम.’’

दीपक को यह समझते जरा भी देर नहीं लगी कि ये सब मिले हुए हैं, निरीक्षक भी. यहां तो पूरा घोटाला है, अकेला वह कुछ नहीं कर सकता है. यह तो चलता रहेगा.

आज टीचर की नौकरी उस की काबिलीयत को देख कर नहीं लगती है. नौकरी लगती है तो किसी बड़े नेता की पैरवी से. यहां टीचर 15 दिन की नौकरी करते हैं और पूरे महीने की तनख्वाह उठाते हैं. अपना खुद का कोचिंग सैंटर चलाते हैं. पैसे ले कर बच्चों को ज्यादा नंबर देते हैं. आज कोई भी मांबाप अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की कामना कैसे कर सकते हैं, जब वे ही इन नकारा टीचर को बढ़ावा दे रहे हैं.

प्रिंसिपल शिक्षा मंत्री की चमचागीरी करते हैं और टीचर प्रिंसिपल की, ताकि बिना मेहनत के उन्हें तरक्की मिलती रहे. मेहनती टीचर को या तो मैमो दिलवाते हैं या कोसों दूर तबादला कर देते हैं.

दीपक का तबादला एक पहाड़ी गांव में कर दिया गया था, जहां स्कूल की अधूरी बिल्डिंग बनी थी, पर 2 कमरों की छत ढह चुकी थी. बच्चे आते ही नहीं थे, क्योंकि टीचर ऊंची जातियों के थे और बच्चे दलितों के. उन को बहला दिया गया था कि उन्हें पास होने का सर्टिफिकेट मिल जाएगा.

छोटू की तलाश : क्या पूरी हो पाई छोटू की तलाश

सुबह का समय था. घड़ी में तकरीबन साढे़ 9 बजने जा रहे थे. रसोईघर में खटरपटर की आवाजें आ रही थीं. कुकर अपनी धुन में सीटी बजा रहा था. गैस चूल्हे के ऊपर लगी चिमनी चूल्हे पर टिके पतीलेकुकर वगैरह का धुआं समेटने में लगी थी. अफरातफरी का माहौल था.

शालिनी अपने घरेलू नौकर छोटू के साथ नाश्ता बनाने में लगी थीं. छोटू वैसे तो छोटा था, उम्र यही कोई 13-14 साल, लेकिन काम निबटाने में बड़ा उस्ताद था. न जाने कितने ब्यूरो, कितनी एजेंसियां और इस तरह का काम करने वाले लोगों के चक्कर काटने के बाद शालिनी ने छोटू को तलाशा था.

2 साल से छोटू टिका हुआ, ठीकठाक चल रहा था, वरना हर 6 महीने बाद नया छोटू तलाशना पड़ता था. न जाने कितने छोटू भागे होंगे. शालिनी को यह बात कभी समझ नहीं आती थी कि आखिर 6 महीने बाद ही ये छोटू घर से विदा क्यों हो जाते हैं?

शालिनी पूरी तरह से भारतीय नारी थी. उन्हें एक छोटू में बहुत सारे गुण चाहिए होते थे. मसलन, उम्र कम हो, खानापीना भी कम करे, जो कहे वह आधी रात को भी कर दे, वे मोबाइल फोन पर दोस्तों के साथ ऐसीवैसी बातें करें, तो उन की बातों पर कान न धरे, रात का बचाखुचा खाना सुबह और सुबह का शाम को खा ले.

कुछ खास बातें छोटू में वे जरूर देखतीं कि पति के साथ बैडरूम में रोमांटिक मूड में हों, तो डिस्टर्ब न करे. एक बात और कि हर महीने 15-20 किट्टी पार्टियों में जब वे जाएं और शाम को लौटें, तो डिनर की सारी तैयारी कर के रखे.

ये भी पढ़ें- पिंजरे का पंछी : कामिनी की कहानी

शालिनी के लिए एक अच्छी बात यह थी कि यह वाला छोटू बड़ा ही सुंदर था. गोराचिट्टा, अच्छे नैननक्श वाला. यह बात वे कभी जबान पर भले ही न ला पाई हों, लेकिन वे जानती थीं कि छोटू उन के खुद के बेटे अनमोल से भी ज्यादा सुंदर था. अनमोल भी इसी की उम्र का था, 14 साल का.

घर में एकलौता अनमोल, शालिनी और उन के पति, कुल जमा 3 सदस्य थे. ऐसे में अनमोल की शिकायतें रहती थीं कि उस का एक भाई या बहन क्यों नहीं है? वह किस के साथ खेले?

नया छोटू आने के बाद शालिनी की एक समस्या यह भी दूर हो गई कि अनमोल खुश रहने लग गया था. शालिनी ने छोटू को यह छूट दे दी कि वह जब काम से फ्री हो जाए, तो अनमोल से खेल लिया रे.

छोटू पर इतना विश्वास तो किया ही जा सकता था कि वह अनमोल को कुछ गलत नहीं सिखाएगा.

छोटू ने अपने अच्छे बरताव और कामकाज से शालिनी का दिल जीत लिया था, लेकिन वे यह कभी बरदाश्त नहीं कर पाती थीं कि छोटू कामकाज में थोड़ी सी भी लापरवाही बरते. वह बच्चा ही था, लेकिन यह बात अच्छी तरह समझता था कि भाभी यानी शालिनी अनमोल की आंखों में एक आंसू भी नहीं सहन कर पाती थीं.

अनमोल की इच्छानुसार सुबह नाश्ते में क्याक्या बनेगा, यह बात शालिनी रात को ही छोटू को बता देती थीं, ताकि कोई चूक न हो. छोटू सुबह उसी की तैयारी कर देता था.

छोटू की ड्यूटी थी कि भयंकर सर्दी हो या गरमी, वह सब से पहले उठेगा, तैयार होगा और रसोईघर में नाश्ते की तैयारी करेगा.

शालिनी भाभी जब तक नहाधो कर आएंगी, तब तक छोटू नाश्ते की तैयारी कर के रखेगा. छोटू के लिए यह दिनचर्या सी बन गई थी.

आज छोटू को सुबह उठने में देरी हो गई. वजह यह थी कि रात को शालिनी भाभी की 2 किट्टी फ्रैंड्स की फैमिली का घर में ही डिनर रखा गया था. गपशप, अंताक्षरी वगैरह के चलते डिनर और उन के रवाना होने तक रात के साढे़ 12 बज चुके थे. सभी खाना खा चुके थे. बस, एक छोटू ही रह गया था, जो अभी तक भूखा था.

शालिनी ने अपने बैडरूम में जाते हुए छोटू को आवाज दे कर कहा था, ‘छोटू, किचन में खाना रखा है, खा लेना और जल्दी सो जाना. सुबह नाश्ता भी तैयार करना है. अनमोल को स्कूल जाना है.’

‘जी भाभी,’ छोटू ने सहमति में सिर हिलाया. वह रसोईघर में गया. ठिठुरा देने वाली ठंड में बचीखुची सब्जियां, ठंडी पड़ चुकी चपातियां थीं. उस ने एक चपाती को छुआ, तो ऐसा लगा जैसे बर्फ जमी है. अनमने मन से सब्जियों को पतीले में देखा. 3 सब्जियों में सिर्फ दाल बची हुई थी. यह सब देख कर उस की बचीखुची भूख भी शांत हो गई थी. जब भूख होती है, तो खाने को मिलता नहीं. जब खाने को मिलता है, तब तक भूख रहती नहीं. यह भी कोई जिंदगी है.

छोटू ने मन ही मन मालकिन के बेटे और खुद में तुलना की, ‘क्या फर्क है उस में और मुझ में. एक ही उम्र, एकजैसे इनसान. उस के बोलने से पहले ही न जाने कितनी तरह का खाना मिलता है और इधर एक मैं. एक ही मांबाप के 5 बच्चे. सब काम करते हैं, लेकिन फिर भी खाना समय पर नहीं मिलता. जब जिस चीज की जरूरत हो तब न मिले तो कितना दर्द होता है,’ यह बात छोटू से ज्यादा अच्छी तरह कौन जानता होगा.

छोटू ने बड़ी मुश्किल से दाल के साथ एक चपाती खाई औैर अपने कमरे में सोने चला गया. लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. आज उस का दुख और दर्र्द जाग उठा. आंसू बह निकले. रोतेरोते सुबकने लगा वह और सुबकते हुए न जाने कब नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला.

ये भी पढ़ें- पढ़ाई सुधर गई : क्या जीत पाया दीपक

थकान, भूख और उदास मन से जब वह उठा, तो साढे़ 8 बज चुके थे. वह उठते ही बाथरूम की तरफ भागा. गरम पानी करने का समय नहीं था, तो ठंडा पानी ही उडे़ला. नहाना इसलिए जरूरी था कि भाभी को बिना नहाए किचन में आना पसंद नहीं था.

छोटू ने किचन में प्रवेश किया, तो देखा कि भाभी कमरे से निकल कर किचन की ओर आ रही थीं. शालिनी ने जैसे ही छोटू को पौने 9 बजे रसोईघर में घुसते देखा, तो उन की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘छोटू, इस समय रसोई में घुसा है? यह कोई टाइम है उठने का? रात को बोला था कि जल्दी उठ कर किचन में तैयारी कर लेना. जरा सी भी अक्ल है तुझ में,’’ शालिनी नाराजगी का भाव लिए बोलीं.

‘‘सौरी भाभी, रात को नींद नहीं आई. सोया तो लेट हो गया,’’ छोटू बोला.

‘‘तुम नौकर लोगों को तो बस छूट मिलनी चाहिए. एक मिनट में सिर पर चढ़ जाते हो. महीने के 5 हजार रुपए, खानापीना, कपड़े सब चाहिए तुम लोगों को. लेकिन काम के नाम पर तुम लोग ढीले पड़ जाते हो…’’ गुस्से में शालिनी बोलीं.

‘‘आगे से ऐसा नहीं होगा भाभी,’’ छोटू बोला.

‘‘अच्छाअच्छा, अब ज्यादा बातें मत बना. जल्दीजल्दी काम कर,’’ शालिनी ने कहा.

छोटू और शालिनी दोनों तेजी से रसोईघर में काम निबटा रहे थे, तभी बैडरूम से अनमोल की तेज आवाज आई, ‘‘मम्मी, आप कहां हो? मेरा नाश्ता तैयार हो गया क्या? मुझे स्कूल जाना है.’’

‘‘लो, वह उठ गया अनमोल. अब तूफान खड़ा कर देगा…’’ शालिनी किचन में काम करतेकरते बुदबुदाईं.

‘‘आई बेटा, तू फ्रैश हो ले. नाश्ता बन कर तैयार हो रहा है. अभी लाती हूं,’’ शालिनी ने किचन से ही अनमोल को कहा.

‘‘मम्मी, मैं फ्रैश हो लिया हूं. आप नाश्ता लाओ जल्दी से. जोरों की भूख लगी है. स्कूल को देर हो जाएगी,’’ अनमोल ने कहा.

‘‘अच्छी आफत है. छोटू, तू यह दूध का गिलास अनमोल को दे आ. ठंडा किया हुआ है. मैं नाश्ता ले कर आती हूं.’’

‘‘जी भाभी, अभी दे कर आता हूं,’’ छोटू बोला.

‘‘मम्मी…’’ अंदर से अनमोल के चीखने की आवाज आई, तो शालिनी भागीं. वे चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘क्या हुआ बेटा… क्या गड़बड़ हो गई…’’

‘‘मम्मी, दूध गिर गया,’’ अनमोल चिल्ला कर बोला.

‘‘ओह, कैसे हुआ यह सब?’’ शालिनी ने गुस्से में छोटू से पूछा.

‘‘भाभी…’’

छोटू कुछ बोल पाता, उस से पहले ही शालिनी का थप्पड़ छोटू के गाल पर पड़ा, ‘‘तू ने जरूर कुछ गड़बड़ की होगी.’’

‘‘नहीं भाभी, मैं ने कुछ नहीं किया… वह अनमोल भैया…’’

‘‘चुप कर बदतमीज, झूठ बोलता है,’’ शालिनी का गुस्सा फट पड़ा.

‘‘मम्मी, छोटू का कुसूर नहीं था. मुझ से ही गिलास छूट गया था,’’ अनमोल बोला.

‘‘चलो, कोई बात नहीं. तू ठीक तो है न. जलन तो नहीं हो रही न? ध्यान से काम किया कर बेटा.’’

छोटू सुबक पड़ा. बिना वजह उसे चांटा पड़ गया. उस के गोरे गालों पर शालिनी की उंगलियों के निशान छप चुके थे. जलन तो उस के गालोंपर हो रही थी, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था.

ये भी पढ़ें- जलन

‘‘अब रो क्यों रहा है? चल रसोईघर में. बहुत से काम करने हैं,’’ शालिनी छोटू के रोने और थप्पड़ को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही से बोलीं.

छोटू रसोईघर में गया. कुछ देर रोता रहा. उस ने तय कर लिया कि अब इस घर में और काम नहीं करेगा. किसी अच्छे घर की तलाश करेगा.

दोपहर को खेलते समय छोटू चुपचाप घर से निकल गया. महीने की 15 तारीख हो चुकी थी. उस को पता था कि 15 दिन की तनख्वाह उसे नहीं मिलेगी. वह सीधा ब्यूरो के पास गया, इस से अच्छे घर की तलाश में.

उधर शाम होने तक छोटू घर नहीं आया, तो शालिनी को एहसास हो गया कि छोटू भाग चुका है. उन्होंने ब्यूरो में फोन किया, ‘‘भैया, आप का भेजा हुआ छोटू तो भाग गया. इतना अच्छे से अपने बेटे की तरह रखती थी, फिर भी न जाने क्यों चला गया.’’ छोटू को नए घर और शालिनी को नए छोटू की तलाश आज भी है. दोनों की यह तलाश न जाने कब तक पूरी होगी.

दैहिक भूख : किस राह पर चल पड़ी थी उसकी बेटी

आज मनोज बहुत खुश था और पहुंच गया यादों में. 4 साल पहले वह नौकरी की तलाश में मुंबई आया था. पढ़लिख कर गांव में रहने का कोई फायदा नहीं था. वहां तो कोई छोटीमोटी नौकरी मिलती या अपनी छोटी सी दुकान खोल कर बैठना पड़ता. इस के अलावा वहां और कुछ था भी नहीं, जिस पर अपनी गुजरबसर की जा सके. यही सोच कर मनोज ने मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ ली थी.

पहले कुछ दिन तो मनोज को एक लौज में रहना पड़ा, फिर धीरेधीरे उसे उस के गांव के लोग मिल गए, जो 3-4 के समूह में साथसाथ रहते थे. मनोज भी उन्हीं के साथ चाल में रहने लगा था.

चाल का मतलब है आधे कच्चेपक्के घरों की वे बस्तियां, जहां संकरी गलियों में छोटेछोटे कमरे होते हैं. पानी के लिए एक सरकारी नल का इंतजाम होता है, जहां बच्चेऔरतें और मर्द सुबह से ही अपनेअपने बरतन ले कर लाइन लगा देते हैं, ताकि वे पूरे दिन के लिए पीने व नहानेधोने का पानी भर सकें.

अब मनोज बड़ी मेहनत से नौकरी कर के पैसा कमा रहा था और एकएक पैसा जोड़ रहा था, ताकि रहने के लिए अपना छोटा सा घर खरीद सके. आज मनोज इसीलिए खुश था, क्योंकि उस ने एक छोटा सा 8 बा 8 फुट का कमरा खरीद लिया था. इधर उस के मातापिता भी काफी समय से जोर दे रहे थे कि शादी कर लो. रहने का ठिकाना हो गया था, सो अब मनोज ने भी इस के लिए हामी भर दी थी.

मां ने गांव में अपने ही रिश्ते में एक लड़की पसंद कर रखी थी, जिस का नाम शिल्पा था. शिल्पा भी राह देख रही थी कि कब मनोज आए और उसे ब्याह कर मुंबई ले जाए.

मनोज गांव गया और फिर चट मंगनी पट ब्याह. वह एक महीने में शिल्पा को ले कर मुंबई आ गया.

शिल्पा मुंबई के तौरतरीके सीख रही थी. वह भी रोज सुबह पानी की लाइन में लग जाती और वहां की मराठी औरतों के साथ बातें कर के थोड़ीथोड़ी मराठी भी सीखने लगी थी.

जब शाम को मनोज दफ्तर से काम कर के खोली में लौटता और शिल्पा को अपनी बांहों में भर कर प्यार भरी बातें करता, तो वह कहती, ‘‘धीरे बोलिए, सब के कमरे आसपास हैं. खिड़की भी तो सड़क पर खुलती है. कोई सुन लेगा तो…’’ मनोज कहता, ‘‘सुन ले तो सुन ले, हम अपनी बीवी से बात कर रहे हैं, कोई चोरी थोड़े ही कर रहे हैं.’’

आसपास की जवान लड़कियां भी कभीकभार शिल्पा को छेड़ कर कहतीं, ‘भाभी, कल भैया से क्या बातें हो रही थीं? हम ने सुना था सबकुछ…’

शिल्पा जवाब में कहती, ‘‘कोई और काम नहीं है तुम्हारे पास, हमारी बातें सुनने के अलावा?’’

इस तरह 4 साल बीत गए और शिल्पा के 2 बच्चे भी हो गए. बड़ी बेटी संध्या और छोटा बेटा वीर. मनोज अपने परिवार में बहुत सुखी था. वह अब एक फ्लैट खरीदना चाहता था, ताकि जब उस के बच्चे बड़े हों तो थोड़े अच्छे माहौल में पलबढ़ सकें. इस के लिए वह एकएक पाई जोड़ रहा था.

शिल्पा और मनोज सोने से पहले रोज नए फ्लैट के बारे में ही बात करते थे. मनोज कहता, ‘‘एक वन बैडरूम का फ्लैट हो जाए बस.’’ शिल्पा कहती, ‘‘हां, तुम नया घर लेने की तैयारी करो. हम उसे सजा देंगे और बाहर नेम प्लेट पर मेरा भी नाम लिखना. घर के दरवाजे पर हम लिख देंगे ‘आशियाना’.’’

मनोज हर छुट्टी के दिन ब्रोकर से मिल कर फ्लैट देख कर आता. कोई बहुत अंदर गली में होता, जहां से मेन रोड पर आने में ही आधा घंटा लग जाए, तो कोई बच्चों के स्कूल से बहुत दूर होता. कोई बहुत पुरानी बिल्डिंग होती, जिस में लीकेज की समस्या होती, तो कोई बहुत अंधेरी सी बिल्डिंग होती और कीमत पूछते ही मकान मालिक भी बड़ा सा मुंह खोल देते. कीमत बड़ी और फ्लैट का साइज छोटा. लोग 30 लाख रुपए तक मांगते.

कहां से लाता मनोज इतने पैसे? सो, 20 लाख रुपए में अच्छी सी लोकेशन देख कर उस ने एक वन बैडरूम फ्लैट खरीद लिया, जिस के आसपास सारी सुविधाएं थीं और रेलवे स्टेशन भी नजदीक था. फ्लैट में रहने से शिल्पा और बच्चे भी मुंबई के रंग में रंगने लगे थे.

मनोज की बेटी संध्या 13वें साल में थी. उस का शरीर अब गोलाई लेने लगा था और वह अब थोड़ा सजधज कर भी रहने लगी थी. ऊपर से टैलीविजन और मीडिया. आजकल के बच्चे वक्त से पहले ही सबकुछ समझने लग जाते हैं. फिर घर में जगह व एकांत की कमी. अब घर छोटा पड़ने लगा था. मनोज अब बच्चों से नजरें बचा कर मौका ढूंढ़ता कि कब शिल्पा के करीब आए और उसे अपने आगोश में ले.

वक्त तेजी से बीत रहा था. संध्या अब कालेज जाने लगी थी और रोजाना नए कपड़े, जूते, बैग वगैरह की मांग भी करने लगी थी. उस की ये सब जरूरतें पूरी करना मनोज के लिए मुश्किल होता जा रहा था.

एक दिन संध्या बोली, ‘‘पापा, मेरी सारी सहेलियां नई फिल्म देखने जा रही हैं, मुझे भी जाना है. मां से कहिए न कि मुझे कुछ रुपए देंगी.’’ मनोज ने कहा, ‘‘देखो संध्या बेटी, तुम्हारी बात बिलकुल सही है. तुम्हें भी घूमनेफिरने की आजादी होनी चाहिए. लेकिन बेटी, हम इतने पैसे वाले नहीं हैं. अभी तुम्हारी पढ़ाईलिखाई के तमाम खर्च हैं और बाद में तुम्हारी शादी के. फिर तुम्हारा छोटा भाई भी तो है. उस के बारे में भी तो सोचना है. आज तो मैं तुम्हें पैसे दे रहा हूं, लेकिन रोजरोज जिद मत करना.’’

संध्या खुशीखुशी पैसे ले कर कालेज चली गई.

शिल्पा मनोज से बोली, ‘‘कैसी बातें करते हैं आप. आज पैसे दिए तो क्या वह रोज नहीं मांगेगी? लड़की को इतनी छूट देना ठीक नहीं है.’’

मनोज बोला, ‘‘बच्चों के लिए करना पड़ता है शिल्पा. ये भी तो बाहर की दुनिया देखते हैं, तो इन का भी मन मचलता है. और अगर हम न दें, तो इन का हम पर से भरोसा उठ जाएगा.’’

अब संध्या तकरीबन हर रोज मनोज से पैसे मांगने लगी थी. कभीकभी मनोज मना कर देता, तो उस दिन संध्या मुंह फुला कर कालेज जाती.

कालेज के बाद या कभीकभी कालेज से छुट्टी कर के लड़केलड़कियां हाथ में हाथ डाले मुंबई के बीच पर घूमते नजर आते. कई बार थोड़े अमीर परिवार के लड़के लड़कियों को अच्छे रैस्टोरैंट में ले जाते, तो कभी फिल्म दिखा कर भी लाते.

मनोज तो संध्या की जरूरत पूरी करने में नाकाम था, सो अब संध्या भी उन लड़कों के साथ घूमने लगी थी. किसी लड़की को बांहों में बांहें डाल कर घुमानाफिराना इस उम्र के लड़कों के लिए बड़े गर्व की बात होती है और लड़कियां सोचती हैं कि यह प्यार है और वह लड़का उन की खूबसूरती का दीवाना है.

संध्या की दूसरी सहेलियां भी ऐसे ही लड़कों के साथ घूमती थीं. एक दिन सभी लड़केलड़कियां गोराई बीच चले गए. बोरीवली से छोटी नाव, जिसे ‘फेरी’ कहते हैं, चलती है, जो एक छोटी सी क्रीक को पार करा देती है और गोराई बीच आ जाता है. यह मछुआरों का गांव है. मछुआरे बहुत ही कम कीमत पर, यों समझिए 2 सौ, 3 सौ रुपयों में कमरे किराए पर दे देते हैं, ताकि लोग बीच से आ कर कपड़े बदल लें और आराम भी कर लें. सो, सारा गु्रप पूरा दिन सैरसपाटा कर के आता और अलगअलग कमरों में बंद हो जाता. यह सारा खर्चा लड़के ही करते थे.

अब यह सब संध्या व उस की सहेलियों व लड़कों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. कभीकभी वे लड़के अपने दूसरे दोस्तों को भी वहां ले जाते और संध्या व उस की सहेलियां उन लड़कों से भी हिलमिल गईं. यही तो खास बात है इस उम्र की कि कुछ बुरा तो नजर आता ही नहीं. सब अच्छा ही अच्छा लगता है और अगर मातापिता कुछ कहें, तो उन की बातें दकियानूसी लगती हैं.

लड़केलड़कियां एकदूसरे की सारी जरूरतें पूरी करते, दैहिक भूख व मौजमस्ती. कुछ महीनों तक ऐसा ही चलता रहा, लेकिन एक दिन वहां पर पुलिस की रेड पड़ गई, जिस में संध्या भी पकड़ी गई. फिर क्या था… सभी लड़केलड़कियों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और फोन कर के उन के मातापिता को भी वहां बुलाया गया. मनोज के पास भी पुलिस स्टेशन से फोन आया. वह तो फोन सुनते ही हक्काबक्का रह गया. जल्दी से वह दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ले कर पुलिस स्टेशन पहुंचा.

वहां संध्या को देखा और सारी बात मालूम होते ही उस की आंखों में खून उतर आया. खैर, पुलिस के हाथपैर जोड़ कर वह संध्या को वहां से ले कर घर आया. जब संध्या की मां ने सारी बात सुनी, तो उस ने संध्या को जोरदार तमाचा जड़ कर कहा, ‘‘शर्म नहीं आई तुझे उन लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ाते हुए?’’

संध्या कहां चुप रहने वाली थी. वह कहने लगी, ‘‘19 साल की हूं मैं और बालिग भी हूं. अगर आप और पापा सब कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? कितनी बार देखा है मैं ने आप और पापा को…’’

इतना सुनते ही शिल्पा ने संध्या के गाल पर दूसरा तमाचा जड़ दिया और गुस्से में बोली, ‘‘अरे, हम तो पतिपत्नी हैं, पर तुम इस पढ़नेलिखने की उम्र में बिन ब्याहे ही…’

संध्या ने सारी हदें पार कर दीं और बोली, ‘‘तो क्या हुआ जो शादी नहीं हुई तो. तुम लोगों को देख कर बदन में उमंग नहीं जागती? कैसे शांत करूं मैं उसे बिन ब्याहे? अगर वे लड़के मुझे घुमातेफिराते हैं, मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं, तो बुराई भी क्या है इस दैहिक संबंध में? पापा और आप भी तो शादी कर के यही कर रहे हो. सिर्फ एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करना. तो क्या इस पर शादी की मुहर लगाना जरूरी है?

‘‘आप लोग तो मेरी जरूरतें पूरी कर नहीं पाते. सिर्फ मैं ही नहीं, आजकल तो अकसर सभी लड़कियां करती हैं यह सब. ‘‘मां, अब तुम लोग पुराने जमाने के हो गए हो. आजकल सब चलता है. कुदरत ने देह दी है, तो उस को इस्तेमाल करने में क्या बुराई है?’’

संध्या की ये बेशर्मी भरी बातें सुनी नहीं जा रही थीं. मनोज तो अपने कानों पर हाथ रख मुंह नीचे किए बैठा था और संध्या लगातार बोले जा रही थी. उस ने तो मौजमस्ती की चाह और अपनी दैहिक भूख को शांत करने के लिए सारी हदें पार कर ली थीं. नएनए लड़कों से दैहिक संबंध बनाने में उसे कोई बुराई नजर न आई. इस का कोई दुख या गिला भी न था उसे.

शिल्पा कोने में दीवार पर सिर टिका कर आंसू बहाए जा रही थी. अब मनोज जुट गया था 2 कमरों का घर ढूंढ़ने में.

नो बौल विद फ्री हिट : प्यार की सच्ची कहानी

कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समीर ने कुछ  ही दिन पहले नौकरी जौइन की थी. वह वहां के गार्डन रीच वर्कशौप में ट्रेनिंग ले रहा था जो रक्षा मंत्रालय के अधीन भारत सरकार का एक उद्यम है. वहां जहाज निर्माण से ले कर उन के रखरखाव की भी सुविधा है.

कोलकाता के मटियाबुर्ज महल्ला में स्थित गार्डन रीच वर्कशौप देश का जहाज बनाने का प्रमुख कारखाना है. यह मुख्य शहर से दूर है. समीर झारखंड के धनबाद शहर का रहने वाला है, जिसे कोल कैपिटल औफ इंडिया भी कहा जाता है. यही उस की एक साल की ट्रेनिंग थी. कोलकाता में वह धर्मतल्ला में एक कमरे के फ्लैट में एक अन्य युवक के साथ शेयर कर के रहता था.

मटियाबुर्ज धर्मतल्ला से लगभग 13 किलोमीटर दूर है. इस का भी एक इतिहास है, अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने अंगरेजों के चंगुल से भाग कर यहीं आ कर शरण ली थी. मटियाबुर्ज बहुत गंदा इलाका था और वहां मुख्यता: अनस्किल्ड लेबर ही रहते थे. ज्यादातर मजदूर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आते हैं.

समीर वर्कशौप जाने के लिए फ्लैट से थोड़ी दूर पैदल चल कर धर्मतल्ला बस स्टौप से सुबह 8 बजे की बस पकड़ता था. 9 बजे तक उसे औफिस पहुंचना होता था. उस के फ्लैट से कुछ दूरी पर स्थित एक फ्लैट से एक युवती भी रोज उसी बस को पकड़ती थी.

शुरू में तो समीर को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन लगातार एक ही स्टैंड से रोज बस पकड़ने, एक ही बस में आनेजाने से समीर का उस युवती के प्रति खासा आकर्षण हो गया था.

वैसे, दोनों में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी, पर कभीकभी नजरें चुरा कर समीर उसे देख लेता था. वह गेहुएं रंग के चेहरे वाली भोलीभाली युवती थी. कभीकभी भीड़ के कारण यदि उसे सीट नहीं मिलती तो वह उस युवती के बगल वाली लेडीज सीट पर जा बैठता था. तब वह युवती थोड़ा और सिमट कर खिड़की से बाहर देखने लगती थी. कभी वह उसे देखती तो समीर झट से अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लेता.

समीर उस से बातचीत करना चाहता था पर खुद पहल न कर पाया. उस युवती ने भी उस से आगे बढ़ कर कभी हायहैलो तक न की.

एक दिन अचानक बसों की हड़ताल हो गई. सुबह तो समीर और उस युवती को बस मिल गई थी, पर लौटते वक्त बसें नहीं चल रही थीं. तो समीर अपने बौस की कार से घर आ रहा था. कंपनी की गाड़ी थी, ड्राइवर चला रहा था. कार में पीछे की सीट पर समीर अपने बौस और कंपनी के एक और अफसर के साथ बैठा था तभी समीर ने खिद्दीरपुर बस स्टौप पर उस युवती को देखा. पहले तो उसे संकोच हुआ पर उस ने साहस कर बौस से उस युवती को लिफ्ट देने की विनती की.

बौस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई चक्कर चल रहा है क्या?’’

समीर बोला, ‘‘नो सर, मैं तो उस का नाम भी नहीं जानता. बस, काफी दिनों से हम दोनों एक ही बस पकड़ते हैं. आज तो उसे बस मिलने से रही और टैक्सी की भी डिमांड इतनी ज्यादा है कि वह भी उसे शायद न मिले.’’

ड्राइवर ने कार रोक कर हौर्न बजाया पर युवती ने उन की ओर देखा ही नहीं. तभी समीर ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आवाज दी. ‘‘हैलो मैडम, आप ही को बोल रहा हूं. आज कोई बस नहीं मिलने वाली और टैक्सी की भी किल्लत है. हमारी कार में बैठ जाएं, बौस हमें धर्मतल्ला स्टौप पर ड्रौप कर देंगे.’’

पहले तो वह संकोच कर रही थी, पर बाद में समीर के कहने पर वह आ कर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर थैंक्स कह कर बैठ गई. पिछली सीट पर तो 3 लोग पहले से ही बैठे थे.

धर्मतल्ला स्टौप पर उतर कर समीर और उस युवती ने बौस को थैंक्स कहा. समीर का भी थैंक्स करते हुए वह अपने घर की ओर चल दी. समीर सोच रहा था कि आज वह थैंक्स के अलावा और कुछ भी बात करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. समीर मन ही मन चिढ़ गया और उस ने भी आगे कुछ नहीं कहा. दोनों अपनेअपने घर की ओर चल दिए.

लेकिन अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने उस युवती से गुडमौर्निंग कहा तो उस ने होंठों ही होंठों में कुछ कहा और मुसकरा कर सिर झुका कर बस का इंतजार करने लगी. इसी तरह कुछ दिनों तक समीर गुडमौर्निंग कहता और वह होंठ फड़फड़ा कर धीरे से गुडमौर्निंग का जवाब दे देती.

एक बार 2 दिनों से वह युवती बस स्टौप पर नहीं मिली तो समीर का मन बेताब हो गया. तीसरे दिन जब वह मिली तो समीर ने अपने पुराने अंदाज में गुडमौर्निंग कहा. युवती आज खुल कर मुसकराई और उस ने धीरे से गुडमौर्निंग कहा. बस आई और दोनों बस में चढ़े, लेकिन युवती से कोई बात नहीं हो पाई.

अगले दिन जब समीर को युवती की बगल वाली सीट पर बैठने का मौका मिला तो वह उस से पूछ बैठा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है? आप इधर बीच में 2 दिन नहीं आई थीं.’’

‘‘ऐसे ही, घर में कुछ काम था,’’ युवती ने जवाब दिया.

समीर बोला, ‘‘अच्छा, अपना नाम तो बताएं. मेरा नाम समीर है.’’

फिर दोनों हंस पड़े. दरअसल, समीर की शर्ट की जेब पर उस का आईडी कार्ड टंगा था, जिसे युवती ने पहले ही देख लिया था. अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने फिर उस का नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘समझ लें, जिस का कोई नाम नहीं होता उसे क्या कहते हैं…’’

‘‘उसे तो अनामिका कहते हैं,’’ समीर बोला. इस बीच कोई लेडी पैसेंजर आ गई और समीर को सीट छोड़नी पड़ी. उस ने खड़ा होते हुए कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा नाम अनामिका होना चाहिए.’’

अब दोनों में थोड़ीबहुत बातचीत होने लगी थी और कुछ मेलजोल भी बढ़ गया था. कुछ हफ्ते बाद एक दिन औफिस से समीर को जल्दी छुट्टी मिली तो वह बस से लौट रहा था कि रास्ते से अनामिका भी उसी बस में चढ़ी. दोपहर में बस में उतनी भीड़ नहीं थी तो वह भी समीर के बगल वाली सीट पर बैठ गई और पूछा, ‘‘आज का दिन वर्कशौप में कैसा रहा? इस समय तो कभी तुम्हें लौटते देखा नहीं है.’’

समीर बोला, ‘‘आज तो बौस ने मुझे सरप्राइज दिया है. उन्होंने कहा कि बाकी 2 महीने की ट्रेनिंग रांची के मैरिन इंजन प्लांट में लेनी है. कंपनी की एक फैक्टरी वहां भी है और टे्रनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग भी उसी फैक्टरी में होगी. 3-4 दिनों में जाना होगा.’’

अनामिका बोली, ‘‘चलो, अच्छी बात है. तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने जा रही है. यहां मेरे औफिस में भी मेरे ट्रांसफर की बात चल रही है.’’

अगले दिन समीर को वर्कशौप नहीं जाना था, फिर भी वह रोज की तरह बस स्टौप पर अनामिका से मिलने पहुंच गया. पर आज वह नहीं आई थी. दूसरे दिन वह समीर को उसी स्टौप पर मिली तो उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, मैं कल भी यहां आया था पर तुम नहीं मिलीं?’’

अनामिका बोली, ‘‘कल लड़के वाले मुझे देखने आए थे, इसलिए औफिस नहीं जा सकी थी.’’

समीर ने निराश होते हुए बस ‘ओह’ कहा और चुप हो गया.

अनामिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

समीर के ‘कुछ नहीं’ कहते ही बस आ गई और अनामिका चढ़ते हुए बोली, ‘‘शाम को 4 बजे वाली बस से लौटूंगी.’’

हालांकि अनामिका ने उसे शाम को स्टौप पर मिलने को नहीं कहा था, पर समीर वहां मौजूद था. शायद अनामिका की भी यही इच्छा रही होगी. उस के बस से उतरते ही समीर बोला, ‘‘चलो, आज बगल वाले कौफी हाउस में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

अनामिका सहर्ष तैयार हो गई. दोनों ने साथ बैठ कर कौफी पी. वहां समीर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हें लड़के वाले देखने आए थे न? तो मेरा विकेट तो डाउन हो गया न. मैं क्लीन बोल्ड हो गया.’’

अनामिका बोली, ‘‘नहीं. वह नो बौल थी. तुम आउट होने से बच गए.’’

‘‘क्या मतलब?’’ कहते हुए समीर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘उन्होंने मुझे रिजैक्ट कर दिया,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर ऐसा क्यों किया. जो भी हो, मेरे लिए तो अच्छा ही है. मुझे नो बौल पर एक और चांस तो मिला.’’

अनामिका बोली, ‘‘एक और चांस नहीं, फ्री हिट का मौका भी मिला है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ समीर ने पूछा तो वह बैग से एक लिफाफा निकाल कर समीर की ओर बढ़ाती हुई बोली,

‘‘यह देखो, आज मुझे भी ट्रांसफर और्डर मिला है. मेरी पोस्टिंग भी रांची में हुई है, हुआ न नो बौल विद फ्री हिट.’’ और दोनों हंसते हुए कौफी हाउस से निकल पड़े.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें