Romantic Story: आधा सच – किरण की किस बात से परेशान हो गई थी रश्मि?

Romantic Story: बहुत दिनों से सोच रही हूं. आज भी जब हवा का एक हलका सा झोंका बदन को छू कर निकलता है तो उस खुशबू का एहसास करा देता है, पर यह खुशबू तो लगातार आ रही है. कुछ देर बैठे रहने के बाद भी उस खुशबू का एहसास रहा. रश्मि ने आसपास झांका, फिर अपने कमरे की खिड़की से झांक कर देखा.

नीचे वाले घर में नए किराएदार अपना सामान रख रहे थे. कुछ मजदूर बाहर खड़े ट्रक से सामान अंदर ला रहे थे. उस ट्रक के पास एक सजीला नौजवान सफेद कमीज और काली पैंट पहने मजदूरों को सामान यथास्थान रखने का निर्देश दे रहा था. ‘इस का मतलब मेरे सपनों का राजकुमार हमारे नीचे वाले घर में किराएदार के रूप में रहने आया है,’ यह सोचते हुए रश्मि के मन में गुदगुदी होने लगी और वह वापस अपने पलंग पर आ गई.

कालेज जाते समय जब रश्मि रास्ता पार कर रही थी तब उस ने उस नौजवान को पहली बार देखा था. उसे देखते ही रश्मि का दिल जोर से धड़कने लगा. फिर तो पिछले 15 दिन में उस ने 3-4 बार उसे अपनी सोसायटी में देखा. जब भी वह आसपास होता तो एक भीनीभीनी सी खुशबू का झोंका रश्मि के मन को सराबोर कर देता.

2-3 दिन से ज्वर के कारण रश्मि कालेज नहीं जा पाई थी, तो उस का हालचाल जानने उस की सहेली कमल उस से मिलने आ गई. रश्मि ने जब कमल को उस युवक के बारे में बताया तो वह भी उसे छेड़ने लगी कि अब तो रोज ऊपरनीचे करते समय सपनों के राजकुमार के दर्शन होते होंगे. बातों ही बातों में कमल ने बताया कि कालेज में अंगरेजी की नई प्रोफैसर आई हैं. इतने में मां जूस के 2 गिलास ले कर आईं और बोलीं, ‘‘इसे पी कर तैयार हो जाओ. दोपहर का खाना हम लोग बाहर खाएंगे, क्योंकि रसोइए ने 3-4 दिन की छुट्टी ली है.’’

सुनते ही रश्मि के होश उड़ गए कि अब तो खाना बाहर खाना पड़ेगा, उसे खुद ही चायनाश्ता अपने व मां के लिए बनाना पड़ेगा, क्योंकि उस की आधुनिक मां को किचन के काम से ऐलर्जी थी. वे तो एक भी बार चाय नहीं बनाती थीं. किचन में काम करना उन्हें बिलकुल भी पसंद नहीं था. किचन में काम करना उन्हें गुलामी जैसा लगता था.

मम्मीपापा और रश्मि तैयार हो कर नीचे आए तो देखा कि एक 25-26 साल की महिला साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे बालों का बेतरतीब ढंग से जूड़ा बांधे सामान इधर से उधर रख रही है, पर वह युवक कहीं नजर नहीं आ रहा है. उस महिला की नजर जैसे ही रश्मि के परिवार पर पड़ी तो उस ने बड़ी शालीनता से नमस्ते किया.

तभी पापा ने हमारा परिचय कराते हुए कहा कि यह मिसेज किरण सूरज हैं. सूरज व किरण हमारे नए किराएदार हैं. मिसेज शब्द रश्मि के दिमाग पर हथौड़े की तरह बजने लगा यानी उस के सपनों का राजकुमार सूरज शादीशुदा है, उस का दिल बैठ गया. हालात पर काबू पाने के लिए वह जल्दीजल्दी कार में जा कर बैठ गई. घर वापस आते ही वह अपने कमरे का दरवाजा बंद कर के लेट गई. काफी देर सोचने के बाद वह सो गई. जब सो कर उठी तो अपनेआप को उस ने समझा लिया था कि चलो, बात आगे बढ़ने से पहले ही खत्म हो गई.

शाम को उस ने मुंह धोया फिर अपने तथा मम्मी के लिए चाय बनाई. चाय पी कर मम्मी ने कहा, ‘‘थोड़ा नीचे जा कर नए किराएदारों से मिल लो, मैं तो नहीं जा सकती, क्योंकि मेरे सिर में दर्द है. आ कर फिर रात का खाना भी बाहर से और्डर कर देना.’’

मन न होते हुए भी रश्मि नीचे आई तो देखा कि किरण अभी भी उसी साड़ी में वैसे ही सामान कमरे में सजा रही है और उस के रसोईघर से बहुत अच्छी खुशबू आ रही है. खुशबू से रश्मि की भूख जाग गई. उस से दोपहर को भी खाना सही से नहीं खाया गया था.

रश्मि को देखते ही किरण ने दौड़ कर उस का स्वागत किया और उसे ड्राइंगरूम में बैठाया. कुछ ही देर में किरण ने ड्राइंगरूम को बहुत अच्छे ढंग से सजा दिया था. रश्मि को बैठा कर किरण रसोईघर से उस के लिए चाय व नाश्ता ले आई. प्लेट में तले हुए पकौड़े देख कर रश्मि ने मुंह सिकोड़ लिया.

रश्मि नाश्ते के लिए मना करने वाली थी कि किरण ने प्लेट से एक पकौड़ा उठा कर रश्मि के मुंह में यह कह कर डाल दिया कि आप हमारे घर पहली बार आई हैं, कुछ तो खाना ही पड़ेगा.

पकौड़े इतने स्वादिष्ठ थे कि पहला पकौड़ा खाने के बाद रश्मि अपनेआप को रोक नहीं पाई और 5 मिनट में ही उस ने प्लेट खाली कर दी. अपनी व्यस्तता देख कर उसे खुद पर ग्लानि होने लगी. फिर उस ने किरण से कहा कि अगर आप लोगों को किसी चीज की जरूरत हो तो बताइएगा. जल्दीजल्दी सीढ़ी चढ़ कर वह अपने कमरे में आ गई.

शाम को रसोइए के न आने के कारण डिनर का प्रोग्राम बाहर ही था. रेस्तरां में मम्मीपापा के साथ खाना खाते हुए उस ने देखा कि सामने वाली टेबल पर वही युवक यानी सूरज एक स्मार्ट युवती के साथ बैठ कर डिनर कर रहा है.

अपनी तरफ पीठ होने के कारण रश्मि उस युवती का चेहरा तो नहीं देख पाई, लेकिन उस के बालों का जूड़ा बांधने का ढंग तथा उस का स्टाइल देख कर साफ पता चल रहा था कि यह महिला एक आधुनिका है.

अपनी टेबल पर अंधेरा होने के कारण सूरज उस के मम्मीपापा को नहीं देख पाया. अचानक उसे किरण पर बहुत दया आने लगी. रात को वह सूरज के चरित्र के बारे में सोचने लगी. उसे लगा कि उस ने तो अपनेआप को सही समय पर संभाल लिया लेकिन बेचारी किरण का क्या होगा, उसे तो पता भी नहीं कि उस का पति बाहर किस के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है.

अगले दिन रश्मि कालेज जाने के लिए सीढि़यां उतर रही थी तो उस ने देखा कि किरण अपने पति के लिए किचन में नाश्ता व खाना तैयार कर रही है. उस ने सीढि़यों से ही किरण को सुप्रभात कहा और तेजी से कालेज के लिए निकल गई.

कालेज जा कर पता चला कि अंगरेजी की जो नई टीचर आने वाली थीं, वे 2 दिन बाद जौइन करेंगी. क्लास खाली देख कर सभी दोस्तों ने मिल कर शाहरुख खान की नई पिक्चर देखने का प्रोग्राम बनाया.

फिल्म समाप्त होने के बाद जैसे ही रश्मि व उस की सहेलियां बाहर निकलीं तो उस ने देखा कि सूरज भी अपनी उस आधुनिका के साथ फिल्म देखने आया है. हाईहील पहने उस आधुनिका का चेहरा भीड़ के कारण रश्मि नहीं देख पाई, लेकिन इस बार उस ने अपने दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डाला.

घर आ कर उस ने देखा कि नीचे ताला लगा हुआ है. ‘लगता है किरण कहीं बाहर गई है,’ सोचते हुए रश्मि अपने कमरे में आ गई. किरण से अब उस को सहानुभूति हो गई थी. बेचारी अपने पति के लिए कितना काम करती है. अच्छा खाना पकाती है, लेकिन उस का पति किसी आधुनिका के साथ बाहर घूमता रहता है.

आज रसोइया आ गया था, इसलिए उन्हें खाना खाने बाहर नहीं जाना पड़ा. अगले दिन रश्मि तबीयत खराब होने के कारण कालेज नहीं जा पाई. किरण ने जब उस की तबीयत के बारे में सुना तो वह उस के लिए टमाटर का स्वादिष्ठ सूप बना कर उस का हालचाल पूछने घर आई.

सूप पी कर रश्मि को बहुत अच्छा लगा. साथ ही रश्मि ने सोचा कि वह किरण को सूरज की असलियत बता दे ताकि वह किचन की चारदीवारी से बाहर निकल कर खुद को सजाएसंवारे तथा कुछ पढ़लिख ले ताकि सूरज उस आधुनिका के बजाय किरण को साथ ले कर घूमे.

अगले दिन सवेरेसवेरे खटरपटर की आवाज से रश्मि की आंख खुल गई. ‘शायद किरण किचन में अपने पति के लिए खाना बना रही है,’ रश्मि ने सोचा. अब वह स्वस्थ थी. उठ कर वह भी कालेज के लिए तैयार हो गई.

जब वह कालेज के लिए निकली तो देखा कि मां अभी सो कर उठी हैं. उस ने मां को बाय किया और कालेज के लिए निकल गई. नीचे देखा तो ताला लगा हुआ था. सोचा कालेज से आ कर वह किरण से बात करेगी.

आज कालेज में अंगरेजी की नई लैक्चरर की क्लास थी. रश्मि की सीट खिड़की के पास थी, जो कोरिडोर में खुलती थी. खिड़की से उस ने देखा कि मैडम आ रही हैं, ‘‘अरे, यह तो वही हाईहील, जूड़ा बांधने का वही ढंग, वही स्टाइल. अरे, यह तो सूरज की गर्लफ्रैंड है यानी कि हमारी अंगरेजी की नई टीचर.’’

उसे बड़ा गुस्सा आया. उस ने सोचा, ‘चलो, आज इस का चेहरा भी देख लेते हैं,’ लेकिन जैसे ही मैडम ने कक्षा में प्रवेश किया और रश्मि की नजर उस के चेहरे पर पड़ी तो उस के होश उड़ गए… ‘अरे, यह तो किरण है,’ वही आधुनिका जिसे उस ने कई बार सूरज के साथ घूमते देखा, लेकिन उस का चेहरा नहीं देख पाई. फिर उसे ध्यान आया कि किचन में खाना बनाते हुए किरण का चेहरा जो हाथ धो कर अपने पल्लू से पोंछती है, आज वही किरण उस के सामने खड़ी लगातार अंगरेजी में लैक्चर दे रही है. उस के शब्द रश्मि के सिर के ऊपर से निकलते जा रहे थे, लेकिन कानों ने सुनना बंद कर दिया था.

Family Story: निराधार डर – माया क्यों शक करती थी

Family Story: ‘‘शादी हुई नहीं कि बेटा पराया हो जाता है,’’ माया किसी से फोन पर कह रही थीं, ‘‘दीप की शादी हुए अभी तो केवल 15 दिन ही हुए हैं और अभी से उस में इतना बदलाव आ गया है. पलक के सिवा उसे न कोई दिखाई देता है, न ही कुछ सूझता है. ठीक है कि पत्नी के साथ वह ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना चाहता है, पर मां की उपेक्षा करना क्या ठीक है.’’ यह सुन कर दीप हैरान रह गया. उस ने अनुमान लगाया कि फोन के दूसरी तरफ सोमा बूआ ही होंगी. वही हैं जो इस तरह की बातों को शह देती हैं. वह भी तो हमेशा अपने बेटेबहू को ले कर नाराज रहती हैं. सब जानते हैं कि सोमा बूआ की किसी से नहीं बनती. वे तो सभी से परेशान रहती हैं और दूरपास का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो उन के व्यंग्यबाणों का शिकार न हुआ हो. अपने बेटे को तो वे सब के सामने जोरू का गुलाम तक कहने से नहीं चूकती हैं. पर मां, उस के बारे में ऐसा सोचती हैं, यह बात उसे भीतर तक झकझोर गई. घर में और तो किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, तो मां को ऐसा क्यों लग रहा है. पापा, उस की बहन दीपा, किसी ने भी तो ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया है जिस से लगे कि वह शादी के बाद बदल गया है. फिर मां को ही क्यों लग रहा है कि वह बदल गया है.

पलक को इस समय नए घर में एडजस्ट होने में उस का सहयोग और साथ चाहिए और वही वह उसे दे रहा है तो इस से क्या वह मां के लिए पराया हो गया है. पलक के लिए यह घर नया है, यहां के तौरतरीके, रहनसहन सीखनेसमझने में उसे समय तो लगेगा ही और अगर वह यहां के अनुरूप नहीं ढलेगी तो क्या मां नाराज नहीं होंगी. आखिर मां क्यों नहीं समझ पा रही हैं कि पलक के लिए नए माहौल में ढल पाना सहज नहीं है. इस के लिए उसे पूरी तरह से अपने को बदलना होगा और वह चाहती है कि इस घर को जल्दी से जल्दी अपना बना लें ताकि सारी असहजता खत्म हो जाए. वह पूरी कोशिश कर रही है, पर मां का असहयोग उसे विचलित कर देता है. दीप खुद हैरान था मां के व्यवहार को देख कर. मां तो ऐसी नहीं हैं, फिर पलक के प्रति वे कटु कैसे हो गई हैं.

‘‘मां, ये कैसी बातें कर रही हैं आप? मैं पराया कहां हुआ हूं? बताइए न मुझ से कहां चूक हो गई या आप की कौन सी बात की अवहेलना की है मैं ने? हां, इतना अवश्य हुआ है कि मेरा समय अब बंट गया है. मुझे अब पलक को भी समय देना है ताकि वह अकेलापन महसूस न करे.

‘‘अभी मायके की यादें, मांबाप, भाईबहन से बिछुड़ने का दुख उस पर हावी है. हम सब को उसे सहयोग देना चाहिए ताकि वह खुल कर अपनी बात सब से कह सके. उसे थोड़ा वक्त तो हमें देना ही होगा, मां छुट्टियां खत्म हो जाने से पहले वह भी सब कुछ समझ लेना चाहती है, जिस से औफिस और घर के काम में उसे तालमेल बिठाने में दिक्कत न हो.’’

‘‘मुझे तुझ से बहस नहीं करनी है, चार दिन हुए हैं उसे आए और लगा है उस की तरफदारी करने.’’ पलक अपने कमरे में बैठी मांबेटे की बातें सुन रही थी. उसे हैरानी के साथसाथ दुख भी हो रहा था कि आखिर मां, इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. वह तो उन के तौरतरीके अपनाने को पूरे मन से तैयार है, फिर मां की यह सोच कैसे बन गई कि उस ने दीप को अपनी मुट्ठी में कर लिया है. कमरे में दीप के आते ही उस ने पूछा, ‘‘मुझ से कहां चूक हो गई, दीप, जो मां इस तरह की बात कर रही हैं. मैं ने कब कहा कि तुम हमेशा मेरे पल्लू से बंधे रहो. इतना अवश्य है कि मां से मुझे किसी तरह भी सहयोग नहीं मिल रहा है, इसलिए मुझे तुम्हारे ऊपर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है. फिर चाहे वह घरगृहस्थी से जुड़ी बात हो या रसोई के काम की या फिर मेरे दायित्वों की. इसी कारण तो हम हनीमून के लिए भी नहीं गए ताकि मुझे इस माहौल में एडजस्ट होने के लिए समय मिल जाए. जानते ही हो कि छुट्टी भी मुश्किल से एक महीने की ही मिली है.’’

‘‘मैं खुद हैरान हूं, पलक कि मां इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही हैं. जबकि उन्हें ही मेरी शादी की जल्दी थी. हमारी लव मैरिज उन की स्वीकृति के बाद ही हुई है. शादी से पहले तो वे तुम्हारी तारीफ करते नहीं थकती थीं, फिर अब अचानक क्या हो गया. कितने चाव से उन्होंने शादी की एकएक रस्म निभाई थी. सोमा बूआ टोकती थीं तो मां उन की बातों को नजरअंदाज कर देती थीं. सब से यही कहतीं, मेरा तो एक ही बेटा है, उस की शादी में अपने सारे चाव पूरे करूंगी. आज वे सोमा बूआ की बातों को सुन रही हैं, उन से ही हमारी शिकायत कर रही हैं. ‘‘आज उन्हें अपने ही बेटे की खुशी खल रही है. उन्हें तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि हम दोनों खुश हैं और एकदूसरे से प्यार करते हैं. डरता हूं सोमा बूआ कहीं हमारे बीच भी तनाव न पैदा कर दें. मां ने उन की बातें सुनीं तो अवश्य ही उन के बेटेबहू की तरह हमारे बीच भी झगड़े होने लगेंगे.’’

‘‘मुझ पर विश्वास रखो दीप, ऐसा कुछ नहीं होगा,’’ पलक के स्वर में दृढ़ता थी. ‘‘हमें मां के भीतर चल रही उथलपुथल को समझ कर उन से व्यवहार करना होगा. उन के मनोविज्ञान को समझना होगा. दीप, मनोविज्ञान की छात्र रहने के कारण मैं उन की मानसिक स्थिति बखूबी समझ सकती हूं. जब बेटे की शादी होती है तो कई बार एक डर मां के मन में समा जाता है कि अब तो उस का बेटा हाथ से निकल गया. उस में सब से खराब स्थिति बेटे की ही होती है, क्योंकि वह ‘किस की सुने’ के चक्रव्यूह में फंस जाता है. त्रिशंकु जैसी स्थिति हो जाती है उस की. पत्नी जो दूसरे घर से आती है वह पूरी तरह से नए परिवेश में ढलने के लिए उस पर ही निर्भर होती है, और मां को लगता है कि बेटा जो आज तक हर काम उन से पूछ कर करता था, अब बीवी को हर बात बताने लगा है. बस, यही वजह है जब मां को लगता है कि उन की सत्ता में सेंध लगाने वाली आ गई है और वह बहू के खिलाफ मोरचा संभाल लेती है. लेकिन हमें मां को उस डर से बाहर निकालना ही होगा.’’

‘‘पर यह कैसे होगा?’’ दीप पलक की बात सुन थोड़ा असमंजस में था. वह किसी भी तरह से मां को दुखी नहीं देख सकता था और न ही चाहता था कि पलक और मां के संबंधों में कटुता आए.

‘‘यह तुम मुझ पर छोड़ दो, दीप. बस यह खयाल रखना कि मां चाहे मुझ से जो भी कहें, तुम हमारे बीच में नहीं बोलोगे. इस तरह बात और बिगड़ जाएगी और मां को लगेगा कि मेरी वजह से मांबेटे के रिश्ते में दरार आ रही है या बेटा मां से बहस कर रहा है. हालांकि उन की जगह कोई नहीं ले सकता पर फिर भी हमें उन्हें बारबार यह एहसास कराना होगा कि उन की सत्ता में सेंध लगाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ‘‘हर सदस्य की परिवार में अपनी तरह से अहमियत होती है. बस, यही उन्हें समझाना होगा. उस के बाद उन के मन से सारे भय निकल जाएंगे तब वे तुम्हें ले कर शंकित नहीं होंगी कि तुम उन के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनोगे, न ही वे इस बात से चिंतित रहेंगी कि मैं उन के बेटे को उन से छीन लूंगी.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, पलक. मैं ने भी कई घरों में यही बात देखी है. इसी की वजह से न चाहते हुए मेरे दोस्त वैभव को शादी के बाद अलग होने को मजबूर होना पड़ा था. सासबहू की लड़ाई में वह पिस रहा था. यह देख उस के पापा ने ही उस से अलग हो जाने को कहा था. बेटा हाथ से न निकल जाए का डर, यह अनिश्चतता कि बुढ़ापे में कहीं वे अकेले न रह जाएं, बहू घर पर अधिकार न कर ले, बहू की बातों में आ कर कहीं बेटा बुरा व्यवहार न करे या घर से न निकाल दे, ये बातें जब मन में पलने लगती हैं तो निराधार होने के बावजूद संबंधों में कड़वाहट ले आती हैं. मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में ऐसा कुछ हो. मैं अपने मांबाप को किसी हाल में नहीं छोड़ सकता,’’ दीप भावुक हो गया था.

‘‘दीप, अब अंदर ही बैठा रहेगा या बाहर भी आएगा. देखो, तुम्हारे मामामामी आए हैं,’’ मां के स्वर में झल्लाहट साफ झलक रही थी. दीप को बुरा लगा पर पलक ने उसे शांत रहने का इशारा किया. बाहर आ कर दोनों ने मामामामी के पैर छुए. फिर पलक किचन में उन के लिए चायनाश्ता लेने चली गई. ‘‘दीदी, अब तो आप का मन खूब लग रहा होगा. पलक काफी मिलनसार और खुशमिजाज लड़की है. बड़ों का आदर भी करती है. जब कुछ दिन पहले दीप और पलक घर आए थे तभी पता लग गया था. बहुत प्यारी बच्ची है.’’ अपनी भाभी के मुंह से पलक की तारीफ सुन माया ने सिर्फ सिर हिलाया. यह सच था कि पलक उन्हें भी अच्छी लगती थी, पर उस की तारीफ करने से वे डरती थीं कि कहीं इस से उन का दिमाग खराब न हो जाए. पलक उस की हर बात को मानती थी, पर वे थीं कि एक दूरी बनाए हुए थीं, पता नहीं पढ़ीलिखी, नौकरी वाली बहू बाद में कैसे रंग दिखाए. वैसे ही बेटा उस के आगेपीछे घूमता रहता है, न जाने क्यों उन के अंदर एक खीझ भर गई थी जिस के कारण वे पलक से खिंचीखिंची रहती थी. और इस वजह से उन के पति और बेटी भी उन से नाराज थे.

‘‘मां, आप एक मिनट के लिए यहां आएंगी,’’ पलक ने 5 मिनट बाद आवाज लगाई, ‘‘मां, प्लीज मुझे बता दीजिए कि मामामामी को क्या पसंद है. आप तो सब जानती हैं.’’ माया को यह सुन अच्छा लगा. पलक जब नाश्ता ले कर आ रही थी तो उस ने मामी को कहते सुना, ‘‘मानना पड़ेगा दीदी, इतनी पढ़ीलिखी होने पर भी पलक में घमंड बिलकुल नहीं है, वरना कमाने वाली लड़कियां तो आजकल रसोई में जाने से ही परहेज करती हैं. ‘‘उस दिन जब हमारे घर आई थी तभी परख लिया था मैं ने कि इस में नखरे तो बिलकुल नहीं हैं. मेरी भाभी की बहू को ही देख लो. उस ने शादी के बाद ही साफ कह दिया था कि घर का कोई काम नहीं करेगी. नौकर रखो या और कोई व्यवस्था करो, उसे कोई मतलब नहीं है. भाभी की तो उस के सामने एक नहीं चलती. आप को तो खुश होना चाहिए बेटाबहू दोनों ही आप को इतना मान देते हैं.’’

‘‘अरे, अभी उसे आए दिन ही कितने हुए हैं. औफिस जाना एक बार शुरू करने दो, सारे रंग सामने आ जाएंगे,’’ पलक को आते देख माया एकदम चुप हो गईं. पलक को बुरा तो बहुत लगा पर वह हंसते हुए नाश्ता परोसने लगी. दीप अंदर ही अंदर कुढ़ कर रहा गया था. वह कुछ कहना ही चाहता था कि पलक ने उसे इशारे से मना कर दिया. मामी ने महसूस किया कि माया पलक के प्रति कुछ ज्यादा ही कटु हो रही हैं और दीप को अच्छा न लगना स्वाभाविक ही था. जातेजाते वे बोलीं, ‘‘दीदी, हो सकता है आप को मेरा कुछ कहना अच्छा न लगे, पर आप पलक के बारे में कुछ ज्यादा ही गलत सोच रही हैं. हो सकता है उस में कुछ कमियां हों, तो क्या हुआ. वे तो सभी में होती हैं. बच्ची को प्यार देंगी तो वह भी आप का सम्मान करेगी. मुझे तो लगता है कि वह आप के जितना निकट आना चाहती है, आप उस से उतनी ही दूरियां बनाती जा रही हैं. ‘‘दीप की खुशी के बारे में सोचें. पलक की वजह से ही वह चुप है, पर कब तक चुप रहेगा. बेटा चाहे वैसे दूर न हो, पर आप की सोच की वजह से दूर हो जाएगा. बहू बेटे को छीन लेगी, यह डर ही आप को रिश्ते में दरार डालने के लिए मजबूर कर रहा है. पलक को खुलेदिल से अपना लीजिए, वरना बेटा सचमुच छिन जाएगा.’’

‘‘सही तो कह रही थीं तुम्हारी भाभी,’’ रात को मौका पाते ही उन के पति ने उन्हें समझाना चाहा, ‘‘इतनी अच्छी बहू मिली है, पर तुम ने दूसरों के बेटेबहू के किस्से सुन एक धारणा बना ली है जो निराधार है. आज वह हर बात तुम से पूछ रही है, लेकिन अगर तुम्हारा यही रवैया रहा तो दीप ही सब से पहले तुम्हारा विरोध करेगा. ‘‘सोचो, अगर पलक उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काने लगे तो क्या होगा. सोमा की बातों पर मत जाओ. बहू को दिनरात ताने दे कर उस ने संबंध खराब किए हैं. नए घर में जब एक लड़की आती है तो उस के कुछ सपने होते हैं, वह नए रिश्तों से जुड़ने की कोशिश करती है. पर तुम हो कि उस की गलतियां ही ढूंढ़ती रहती हो. इस तरह तुम दीप को दुखी कर रही हो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि तुम्हारा बेटा खुश रहे.

‘‘कल हमारी दीपा के साथ भी उस की सास ऐसा ही व्यवहार करेगी तो क्या वह सुखी रह पाएगी या तुम बरदाश्त कर पाओगी? अपने डर से बाहर निकलो माया, और पलक व दीप पर विश्वास करो.’’ पूरी रात माया कशमकश से जूझती रहीं. सच में बेटे के छिन जाने का डर ही उन्हें पलक के साथ कठोर व्यवहार करने को मजबूर कर रहा है. आखिर जितना प्यार वे दीप और दीपा पर उड़ेलती हैं, पलक को दें तो क्या वह भी उन की बेटी नहीं बन जाएगी. जरूरी है कि उसे बहू के खांचे में जकड़ कर ही रखा जाए? वह भी तो माया में मां को ही तलाश रही होगी? माया जब सुबह उठीं तो उन के चेहरे पर कठोरता और खीझ के भाव की जगह एक कोमलता व नजरों में प्यार देख पलक बोली, ‘‘मां, आइए न, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. आज संडे है तो दीप तो देर तक ही सोने वाले हैं.’’

‘‘तुम क्यों इतनी जल्दी उठ गईं? जाओ आराम करो. नाश्ता मैं बना लूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, हम मिल कर नाश्ता बनाएंगे और इस बहाने मैं आप से नईनई चीजें भी सीख लूंगी.’’ डाइनिंग टेबल पर मां को पलक से बात करते और खिलखिलाते देख दीप हैरान था. पलक ने आंखों ही आंखों में जैसे उसे बताया कि उसे यहां भी मां मिल गई हैं.

Hindi Story: चिड़िया का बच्चा

Hindi Story: ‘टिंग टांग…टिंग टांग’…घंटी बजते ही मैं बोली, ‘‘आई दीपू.’’

मगर जब तक दरवाजा न खुल जाए, दीपू की आदत है कि घंटी बजाता ही रहता है. बड़ा ही शैतान है. दरवाजा खुलते ही वह चहकने लगा, ‘‘मौसी, आप को कैसे पता चलता है कि बाहर कौन है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘पता कैसे नहीं चलेगा.’’

तभी अचानक मेरे मुंह से चीख निकल गई, मैं ने फौरन दीपू को उस जगह से सावधानी से परे कर दिया. वह हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या हुआ, मौसी?’’

मैं आंगन में वहीं बैठ गई जहां अभीअभी एक चिडि़या का बच्चा गिरा था. मैं ने ध्यान से उसे देखा. वह जिंदा था. मैं फौरन ठंडा पानी ले आई और उसे चिडि़या के बच्चे की चोंच में डाला. पानी मिलते ही उसे कुछ आराम मिला. मैं ने फर्श से उठा कर उसे एक डब्बे पर रख दिया. फिर सोच में पड़ गई कि अगर दीपू का पांव इस के ऊपर पड़ गया होता तो? कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठी.

मैं ने ऊपर देखा. पड़ोसियों का वृक्ष हमारे आंगन की ओर झुका हुआ था. शायद उस में कोई घोंसला होगा. बहुत सारी चिडि़यां चूंचूं कर रही थीं. मुझे लगा, जैसे वे अपनी भाषा में रो रही हैं. पशुपक्षी बेचारे कितने मजबूर होते हैं. उन का बच्चा उन से जुदा हो गया पर वह कुछ नहीं कर पा रहे थे.

‘‘करुणा…’’ कमला दीदी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं ने फौरन चिडि़या के बच्चे को उठाया और नल के पास ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षित जगह पर रख दिया.

छुट्टियों में हमारे घर बड़ी रौनक रहती है. इस बार तो मेरी दीदी और उस के बच्चे भी अहमदाबाद से आए थे. इत्तफाक से विदेश से फूफाजी भी आए हुए थे. फूफाजी को सब लोग ‘दादाजी’ कहते थे. यह विदेशी दादाजी हमारे छोटे शहर के लिए बहुत बड़ी चीज थे. सुबह से शाम तक लोग उन्हें घेरे ही रहते. कभी लोग मेहमानों से मिलने आते तो कभी मेहमान लोग घूमनेफिरने निकल जाते.

मेहमानों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर के मैं फिर चिडि़या के बच्चे के पास चली आई. वह अपना छोटा सा मुंह पूरा खोले हुए था. ऐसा लगता था जैसे वह पानी पीना चाहता है. पर नहीं, पानी तो बहुत पिलाया था. मुझे अच्छी तरह पता भी तो नहीं था कि यह क्या खाएगा?

‘‘ओ करुणा मौसी, चिडि़या को पानी में डाल दो,’’ दीपू ने मेरे पास रखी गेंद उठाते हुए कहा.

मैं ने उसे पकड़ा, ‘‘अरे दीपू, सामने जो सफेद प्याला पड़ा है, उसे ले आ. मैं ने उस में दूधचीनी घोल कर रखी है. इसे भूख लगी होगी.’’

मेरी बात सुन कर दीपू जोर से हंसा, ‘‘मौसी, इसे उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कहते हुए वह गेंद नचाते हुए बाहर चला गया.

मैं दूध ले आई, चिडि़या का बच्चा बारबार मुंह खोल रहा था. मैं अपनी उंगली दूध में डुबो कर दूध की बूंदें उस की चोंच में डालने लगी.

‘‘बूआ…’’ मेरी भतीजी उर्मिला की आवाज थी, ‘‘अरे बूआ, यहां क्या कर रही हो?’’ वह करीब आ कर बोली.

मैं ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया. मैं चाहती थी कि मेरी गैरमौजूदगी में उर्मिला जरा उस का खयाल रखे.

‘‘वाह बूआ, वाह, भला चिडि़या के बच्चे के पास बैठने से क्या फायदा?’’ कह कर वह अंदर चली गई. नल के पास बैठे हुए जो भी मुझे देखता वह खिलखिला कर हंस पड़ता. सब के लिए चिडि़या का बच्चा मजाक का विषय बन गया था.

मैं फिर रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद मैं ने बाहर झांका तो देखा कि मेरी भतीजी जूली, उर्मिला और कुछ अन्य लड़कियां नल के पास आ कर खड़ी हो गई थीं. मैं एकदम चिल्लाई, ‘‘अरे, रुको.’’

मैं उन के पास आई तो वे बोलीं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘वहां एक चिडि़या का बच्चा है.’’

‘‘चिडि़या का बच्चा? अरे हम ने सोचा, पता नहीं क्या बात है जो आप इतनी घबराई हुई हैं,’’ वे भी जोरदार ठहाके मारती हुई चली गईं.

मैं खीज उठी और शीघ्र ही ऊपर चली गई. वहां आले में रखे एक घोंसले को देखा,जो इत्तफाक से खाली था. मैं ने उस में चिडि़या के बच्चे को रख कर घोंसले को ऊपर एक कोने में रख दिया.

मैं रसोई में आ गई और सब्जी काटने लगी. तभी पड़ोसन सुषमा बोली, ‘‘आज तो पता नहीं, करुणा का ध्यान कहां है? मैं रसोई में आ गई और इसे पता नहीं चला.’’

‘‘इस का ध्यान चिडि़या के बच्चे में है,’’ नमिता ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया.

‘‘अरे, पक्षी बिना घोंसले के बड़ा नहीं होगा. उसे किसी घोंसले में रखो,’’ सुषमा सलाह देती हुई बोली.

‘‘मैं उसे घोंसले में ही रख कर आई हूं,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

रात को सब लोग खाना खाने के बाद घूमने गए. शायद किशनचंद के यहां से भी हो कर आए थे, ‘‘भई, हद हो गई, किशनचंद की औरत इतनी बीमार है. इतनी छटपटाहट घर के लोग कैसे देख रहे थे?’’ यह दादाजी की आवाज थी.

सब लोग आंगन में बैठे बातचीत कर रहे थे. दादाजी विदेश की बातें सुना रहे थे, ‘‘भई, हमारे अमेरिका में तो कोई इस कदर छटपटाए तो उसे ऐसा इंजेक्शन दे देते हैं कि वह फौरन शांत हो जाए. भारत न तो कभी बदला है और न ही बदलेगा. अभी मैं मुंबई से हो कर ही राजस्थान आया हूं. वहां मूलचंद की दादी की मृत्यु हो गई. अजीब बात है, अभी तक यहां लोग अग्निसंस्कार करते हैं.’’

सुनते ही अम्मां बोलीं, ‘‘आप लोग मृत व्यक्ति का क्या करते हैं?’’

‘‘अरे, बस एक बटन दबाते हैं और सारा झंझट खत्म. अमेरिका में तो…’’ दादाजी पता नहीं कैसी विचित्र बातें सुना रहे थे.

मैं ने सोने से पहले चिडि़या के बच्चे की देखभाल की और फिर सो गई. सुबह उठते ही देखा, चिडि़या का बच्चा बड़ा ही खुश हो कर फुदक रहा था. दीपू ने उस की ओर पांव बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मौसी, रख दूं पैर इस के ऊपर?’’

‘‘अरे, नहीं…’’ मैं उस का पैर हटाते हुए चीख पड़ी. अचानक मैं ने सामने देखा, ‘‘अरे, यह तो वही आदमी है…’’

शायद जीजाजी ने मेरी बात सुन ली थी. वह बाहर ‘विजय स्टोर’ की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘तुम जानती हो क्या उस आदमी को?’’

मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य ताजा हो उठा, ‘‘हां,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह वही आदमी है. एक प्यारा सा कुत्ता लगभग मेरे ही पास पलता था, क्योंकि मैं उसे कुछ न कुछ खिलाती रहती थी. एक दिन वह सामने भाभी के घर से दीदी के घर की तरफ आ रहा था कि इस आदमी का स्कूटर उसे तेजी से कुचलता हुआ निकल गया. कुत्ता बुरी तरह तड़प कर शांत हो गया. हैरत की बात यह थी कि इस आदमी ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा था.’’

जीजाजी पहले तो ठहाका मार कर हंसे फिर जरा क्र्रोधित होते हुए बोले, ‘‘अब कहीं वह फिर तुम्हें नजर आ जाए तो उसे कुछ कह मत देना. हम कुत्ते वाली फालतू बात के लिए किसी से कहासुनी करेंगे क्या?’’

कुछ दिन पहले की ही तो बात है. पड़ोस में शोर उठा, ‘अरे पास वाली झाडि़यों से सांप निकला है,’ सुनते ही मेरा बड़ा भतीजा फौरन एक लाठी ले कर गया और कुछ ही पलों में खुश होते हुए उस ने बताया कि सांप को मार कर उस ने तालाब में फेंक दिया है.

‘‘क्या?…तुम ने उसे जान से मार दिया है?’’ मैं ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मारता नहीं तो क्या उसे घर ले आता? अगर किसी को काट लेता तो?’’

एक दिन दादाजी बालकनी में कुछ लोगों के साथ बैठे कौफी पी रहे थे, बाहर का दृश्य देखते हुए बोले, ‘‘अफ्रीका में सूअर को घंटों खौलते हुए पानी में डालते हैं और फिर उसे पकाने के लिए…’’ दादाजी बोले जा रहे थे और मैं सूअर की दशा की कल्पना मात्र से ही तड़प उठी थी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं चिडि़या के बच्चे को कोई बाहर न फेंक दे.

घोंसले में झांका तो देखा कि बच्चा उलटा पड़ा था. मैं ने डरतेडरते हाथों में कपड़ा ले कर उसे सीधा किया. बिना कपड़ा लिए मेरे नाखून उसे चुभ जाते.

‘‘करुणा मौसी, आप ने चिडि़या के बच्चे को हाथ लगाया?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’ मैं ने उसे आश्चर्य से देखा.

‘‘अब देखना मौसी, चिडि़या के बच्चे को उस की मां अपनाएगी नहीं. मनुष्य के हाथ लगाने के बाद दूसरे पक्षी उस की ओर देखते भी नहीं.’’

‘‘अरे, उठाती कैसे नहीं, आंगन के बीचोबीच पड़ा था. किसी का पांव आ जाता तो?’’ मैं ने कहा और अपने काम में लग गई.

3 दिन गुजर गए. जराजरा सी देर में मैं चिडि़या के बच्चे की देखभाल करती. चौथे दिन बहुत सवेरे ही चिडि़यों के झुंड के झुंड घोंसले के पास आ कर जोरजोर से चींचीं, चूंचूं करने लगे. मुझे लगा जैसे वे रो रहे हों. मैं ने घोंसले के अंदर देखा. चिडि़या का बच्चा बिलकुल शांत पड़ा था. मेरा दिल भर आया. तरहतरह के खयाल मन में उठे. रात को वह बिलकुल ठीक था. कहीं सच में दीपू ने उस के ऊपर पांव तो नहीं रख दिया?

चिडि़या के बच्चे पर किसी तरह के हमले का कोई निशान नहीं था. मगर फिर भी मैं ने दीपू से पूछा, ‘‘सच बता दीपू, तू ने चिडि़या के बच्चे को कुछ किया तो नहीं?’’

पर दीपू ने तो जैसे सोच ही रखा था कि मौसी को दुखी करना है. वह बोला, ‘‘मौसी, मैं ने सुबह उठते ही पहले उस का गला दबाया और फिर सैर करने चला गया.’’

मैं सरला दीदी से बोली, ‘‘दीदी, ऐसा नहीं लगता कि यह आराम से सो रहा है?’’

दीपू ने मुझे दुखी देख कर फिर कहा, ‘‘मौसी, मैं ने इसे मारा ही ऐसे है कि जैसे हत्या न लग कर स्वाभाविक मौत लगे.’’

पता नहीं क्यों, मुझ से उस दिन कुछ खायापिया नहीं गया. संगीतशाला भी नहीं गई. दिल भर आया था. कागजकलम ले कर दिल के दर्द को रचना के जरिए कागज की जमीन पर उतारने लगी. रचना भेजने के बाद लगा कि जैसे मैं ने उस चिडि़या के बच्चे को अपनी श्रद्धांजलि दे दी है.

Romantic Story: एक और कोशिश – रचिता और मोहित का क्या रिश्ता था?

Romantic Story: ‘‘किसे बारबार फोन कर रहे हो मोहित, कोई परेशानी है?’’

‘‘कब से फोन कर रहा हूं मां को, उठा ही नहीं रही हैं.’’

‘‘तो पापा को लगाओ न.’’

‘‘वे भी कहां उठा रहे हैं. कैसे हैं ये लोग, उफ्फ.’’

‘‘हो सकता है दोनों कहीं बाहर घूमने या फिर किसी काम से निकले होंगे और शोरगुल में फोन की आवाज सुन नहीं पा रहे होंगे. आप चिंता मत कीजिए, मिस्ड कौल देखेंगे तो खुद ही फोन करेंगे.’’

‘‘तुम्हें तो पता है न, रचिता, कि दोनों कैसे हैं. एकदूसरे से ठीक से बात तो करते नहीं हैं, घूमने क्या जाएंगे साथ में?’’

‘‘जब से औफिस से आए हो, परेशान दिख रहे हो. कोई बात हो गई, क्या? मेरा मतलब है कि क्या कोई जरूरी बात करनी है आप को मां से? थोड़ी देर में फिर से कोशिश करना, तब तक खाना खा लो.’’

‘‘देखो, अब तो दोनों का फोन स्विच औफ जा रहा है, क्या करूं?’’

‘‘हो सकता है फोन की बैटरी चार्ज न हो. वैसे भी, पटना में बिजली की हालत अच्छी नहीं है.’’ मेरी बातों पर तो मोहित का जरा भी ध्यान नहीं था. बस, बारबार फोन लगाए जा रहे थे. ‘‘दीदी को फोन करो, मोहित.’’

जैसे ही वे दीदी को फोन करने जा रहे थे वैसे ही दीदी का फोन आ गया.

‘‘दीदी, मैं आप को ही फोन कर रहा था. देखो न, कब से मांपापा को फोन कर रहा हूं, लग नहीं रहा है. कुछ पता है आप को?’’ मोहित बकबक किए जा रहे थे और दीदी कुछ बोल ही नहीं रही थीं, ‘‘दीदी सुन रही हो?’’

‘‘तू चुप होगा तब बोलूंगी न, मैं भी कब से फोन कर रही हूं. वैसे, तुम चिंता मत करो, मोहित. तुम्हें पता तो है कि मांपापा कैसे हैं. खुद तो मस्त रहते हैं, दूसरों को टैंशन देते हैं और शुरू से तेरी आदत है बेवजह चिंता करने की, अभी सो जा, सुबह बात हो जाएगी.’’

मोहित ने सोचा शायद दीदी ठीक ही कह रही हैं. पर मम्मीपापा फोन तो उठा ही सकते थे. एक बार और लगा कर देखता हूं, सोचते हुए उस ने फिर फोन लगाया पर अब भी उन्होंने फोन नहीं उठाया.

‘‘ऐसे मत देखो, रचिता, चिंता तो होती है न,’’ लेटी हुई रचिता उसे देख रही थी तो वह झुंझला कर बोला.

‘‘मैं समझती हूं, मोहित.’’

रातभर मोहित ठीक से नहीं सोए. जब भी रात को जाग कर देखा तो जाग ही रहे थे और सुबह भी जल्दी जाग गए. मैं ने कहा, ‘‘अभी तो 4:30 ही बजे हैं, मांपापा सो रहे होंगे’’

‘‘फिर भी फोन कर के देखता हूं, रचिता.’’

मोहित का चेहरा बता रहा था कि अभी भी फोन नहीं उठा रहे थे मांपापा. ‘‘आप मौसीजी को फोन लगाओ फिर से, शायद लग जाए,’’ रचिता ने सुझाया.

‘‘हां, वही करता हूं…क्या, कब हुआ, अभी मां कहां हैं मौसी? आप मां का खयाल रखो, मैं जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करता हूं.

‘‘रचिता, देखो वही हुआ जिस का मुझे डर था, हमें कल ही निकलना पड़ेगा,’’ मोहित सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘मौसी ने क्या बोला, यह तो बताओ.’’ मोहित की बेचैनी बता रही थी कि कुछ तो हुआ है, ‘‘मोहित क्या हुआ?’’

‘‘मां मौसी के घर पर हैं. बहुत झगड़ा हुआ है मांपापा में. मां के सिर पर चोट आई है. डाक्टर को दिखा दिया है मौसी ने, अब मां ठीक हैं. ट्रेन का तत्काल का टिकट करवाते हैं, तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी न?’’

‘‘हां, मिल जाएगी, आप चिंता मत कीजिए.’’

मोहित ट्रेन में भी चुपचाप बैठे रहे. ‘‘मोहित क्या सोच रहे हो? मांपापा इतना लड़ते हैं आपस में तो कभी भी आप ने, दीदी ने, नानानानी ने या फिर मौसी ने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की? बोलो मोहित, मैं कोई बाहर की नहीं हूं. क्या मैं समझा सकती हूं उन दोनों को, मैं कोशिश कर के देखूं?’’

‘‘सब हार गए दोनों को समझासमझा कर, तुम पापा को नहीं जानती. जब कोई कुछ नहीं कर सका तो तुम क्या करोगी? जब से हम भाईबहन ने होश संभाला है तब से दोनों को लड़तेझगड़ते ही देखा है.’’

लगता है रचिता सो गई. मोहित विचारों में खो गया. रचिता क्या सोचती होगी कि कैसे घर में उस की शादी हो गई. हमारा बचपन तो जैसेतैसे ही बीता. याद है मुझे, छोटीछोटी बातों पर झगड़ा करते रहते थे मांपापा दोनों और धीरेधीरे वह झगड़ा विकराल रूप धारण कर लेता था. डर के मारे हम नानी को फोन कर देते थे और जब वे सब आते, मांपापा को समझाते तो पापा उन की भी बेइज्जती कर देते थे. सो, सब ने हमारे घर आना छोड़ दिया. पापा के परिवार वालों ने भी दोनों के खराब आचरण के चलते आना छोड़ दिया. इन के झगड़ों से पड़ोसी भी परेशान रहने लगे. एक बार पेरैंटटीचर मीटिंग में दोनों का स्कूल जाना अनिवार्य था.

मेरी क्लासटीचर ने कहा, ‘मोहित पढ़ने में तो ठीक है पर स्कूल की किसी भी गतिविधि में भाग नहीं लेना चाहता. क्लास में पीछे की बैंच पर ही बैठता है. कुछ पूछती हूं तो डर जाता है. आप दोनों को जरा ज्यादा ध्यान देना होगा.’

टीचर के इतना कहते ही दोनों एकदूसरे पर आरोप मढ़ने लगे और वहीं शुरू हो गए. मैं शर्म से गड़ा जा रहा था. मैं अपनी टीचर को देख रहा था कि वे क्या सोच रही होंगी. वही दोनों को शांत करने लगीं. वे समझ गई होंगी कि मैं ऐसा क्यों हूं. रास्तेभर लड़ते रहे दोनों. एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

अपर्णा दीदी सही थीं अपनी जगह. 10वीं पास करने के बाद होस्टल चली गईं. मांपापा ने भी जिम्मेदारी से बचने के लिए होस्टल में डाल दिया. काश, मैं भी दीदी की तरह होस्टल जा पाता लेकिन डरता था कि पापा, मां को मार देंगे.

जब नानानानी का आना बंद हो गया तो मां अकसर वहां चली जाया करती थीं और कितनी बार नानाजी कहते थे कि कुछ दिन वहीं रहो. इस बात को ले कर पापा ने नाना के नाम का परचा छपवा दिया और पूरे शहर में बंटवा दिया कि नाना अपनी बेटी को मेरे प्रति भड़काते हैं और हमारा तलाक करवाना चाहते हैं.

मामा और पापा में इस बात को ले कर बहुत लड़ाई हुई थी. जब भी मैं मौसामौसी को हंसते, बातें करते देखता तो लगता था कि काश, मेरे मांपापा भी ऐसे ही होते. दीदी तो ज्यादा नहीं रहीं हमारे साथ, पढ़ाई के बाद नौकरी और फिर अपने ही पसंद के लड़के के साथ शादी कर के चली गईं. इस बात के लिए भी बहुत बवाल हुआ घर में पर दीदी ने तो शुरू से वही किया जो वे चाहती थीं. अब सोचता हूं कि दीदी अपनी जगह सही थीं. शादी तो मैं ने भी अपनी पसंद की लड़की से की पर मांपापा की मरजी से.

याद है मुझे जब फूफाजी बढ़ैया के मशहूर रसगुल्ले ले कर आए थे. मैं यही मनाता रहा कि इन के सामने ये लोग शुरू न हो जाएं. जैसे ही फूफाजी गए, पापा रसगुल्ले गिनने लगे कि कितने पीस हैं और सख्त हिदायत दी कि कोई भी उन से बिना पूछे रसगुल्ला नहीं खाएगा. तब मैं बच्चा ही था करीब 10-11 साल का, बारबार फ्रिज खोलता पर खाता नहीं था, डर जो था. पर मां तो मां होती है. उन्होंने एक कटोरे में 4 रसगुल्ले निकाल कर मुझे खाने को दे दिए. उस दिन की बातें आज भी मुझे रुलाती हैं. झगड़ा तो बहुत हुआ ही, और मां को मार भी पड़ी थी.

मां भी कहां चुप बैठने वाली थीं. उन्होंने रसगुल्ले का मटका ही तोड़ दिया और गुस्से के मारे सारे रसगुल्लों को अपने पैरों से कुचल दिया और बोला, ‘लो, अब खाओ जितने खाने हैं रसगुल्ले.’ और तब पापा मां के बाल खींचते हुए कमरे में ले गए. मैं रोए जा रहा था. महल्ले वालों ने आ कर बीचबचाव किया और फिर मौसी हमें कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गई थीं. ऐसी कितनी बातें हैं जो मेरे मन में हमेशा के लिए घर कर गई हैं.

‘‘उठ गई रचिता?’’ मैं खयालों से बाहर निकल आया था.

‘‘आप सोए नहीं, तब से क्या सोच रहे हैं? सब ठीक हो जाएगा, मोहित.’’

‘‘अब क्या ठीक होगा, यही सोचता हूं कि कोई भी ऐसी सुखद याद नहीं है बचपन की जिसे सोच कर हम मुसकराएं या किसी के साथ बांटे.’’

जैसे ही हम मौसी के घर पहुंचे, मुझे देखते ही मां रो पड़ीं. सिर पर पट्टी बंधी थी. थोड़ी देर रुक कर, मां को ले कर हम अपने घर चले आए.

‘‘प्रणाम, पापा.’’

‘‘हूं.’’

ठीक से जवाब भी नहीं दिया पापा ने. एक दिन की चुप्पी के बाद मोहित ही बोले, ‘‘पापा, मैं मां को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जा रहा हूं.’’

‘‘हां, हां, ले जाओ, मेरे खिलाफ भड़का रही है मेरे ही बच्चों को, फौज बुलाई है मुझे मरवाने के लिए.’’

मोहित को पापा पर गुस्सा आया, ‘‘चुप रहिए, कब से सुन रहा हूं आप की बकबक. पता भी है कि क्या बोले जा रहे हैं आप? अपने जैसा ही समझ रखा है मुझे. पता नहीं किस भ्रम में जीते आया मैं कि एक न एक दिन आप दोनों सुधर जाओगे. पर नहीं, मैं ही गलत था. शर्म नहीं आती आप दोनों को. उम्र देखी है 70 के होने वाले हो. मुझे शर्म आती है. मेरा भी घर नहीं बसने देंगे आप लोग. वहां हम जीतोड़ मेहनत करते हैं. कभी कुछ मांगा है आप से? बस, शांति दे दीजिए हमें. तभी मैं ने मोहित का हाथ पकड़ लिया और मांपापा दोनों चुप हो कर मुझे ही देख रहे थे.’’

‘‘हफ्तेभर से परेशान हैं मोहित आप दोनों के लिए. रातरातभर ठीक से सो नहीं पा रहे हैं. जहां इन के साथीदोस्त प्रोमोशन के लिए क्याकुछ नहीं कर रहे हैं वहां आप के बेटे आप दोनों की चिंता में घुले जा रहे हैं. मैं ने देखी है इन के आंखों में वह बेचैनी आप दोनों के लिए, बहुत प्यार करते हैं मोहित आप दोनों से. मुंबई में लाखों की भीड़ में रोज ट्रेन पकड़ कर औफिस जानाआना, अगर इन्हें कुछ हो गया तो…हाथ जोड़ती हूं मत कीजिए झगड़ा, कुछ नहीं रखा है प्यार के सिवा जिंदगी में. आप को खुश होना चाहिए कि आप दोनों साथ हैं, तंदुरुस्त हैं और आप के बच्चे समझदार हैं. कभी दूसरों के घरों में झांक कर देखिए, कितनी जद्दोजेहद से अपनी जिंदगी जी रहे हैं लोग. प्लीज, आप दोनों प्यार से रहिए और कुछ नहीं चाहिए हमें.’’

अब बारी मोहित की थी, ‘‘इन्हें मत समझाओ प्यार की भाषा, मैं कहता हूं जब एकदूसरे से बनती ही नहीं है तो अलग हो जाइए न, क्या जरूरत है समाज के सामने पतिपत्नी का ढकोसला करने की. मैं वकील को फोन लगाऊं बोलिए तो.’’

‘‘मोहित, क्या कर रहे हैं आप? पापा, मेरी बात का बुरा मत मानिएगा पर इस उम्र में आ कर तो पतिपत्नी का एकदूसरे के लिए प्यार और बढ़ जाता है. आप को पता है मेरे पापा मेरी मां से बहुत प्यार करते थे. जब मेरी मां को एक लाइलाज बीमारी हो गई तो कहांकहां नहीं इलाज करवाया पापा ने. हालांकि मां फिर भी नहीं बच पाईं. आज मेरे पापा मां की यादों के सहारे ही जिंदा हैं, मां की हर वे चीजें संभाल कर रखे हैं जो मां को बहुत प्रिय थीं. काश, आज मेरी मां जिंदा होतीं तो मेरे पापा दुनिया के सब से खुश इंसान होते. आप दोनों में भी प्यार है, अगर नहीं होता तो इतने सालों तक एकसाथ नहीं रहते. बोलिए मांपापा, क्या जी पाएंगे एकदूसरे के बगैर? नहीं आएगी एकदूसरे की याद? अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिए खुद से.’’

रचिता की बातें सुन कर दोनों चुप थे. रचिता ने मां के सिर पर हाथ रखा तो उन्होंने दोनों हाथों से पकड़ लिया पर बोलीं कुछ नहीं. पिताजी न जाने कहां चले गए. थोड़ी देर में वे आए तो देखा उन के हाथ में 2 गजरे थे, उन्होंने मां के सिरहाने रख दिए और कमरे की खिड़की के पास बाहर खड़े हो कर देखने लगे. आंखों से आंसू बह रहे थे, मानो अहं पिघल कर बह रहा हो.

भावविभोर हो कर रचिता को मोहित ने मातापिता के सामने ही बांहों में भर कर चूम लिया. उसे अपना वह संसार मिल गया जिसे बचपन से ढूंढ़ रहा था. 

Romantic Story: कायापलट – रोहित को खुद पर क्यों होने लगा पछतावा

Romantic Story: ‘बैस्टकपल’ की घोषणा होते ही अजय ने हर्षा को अपनी बांहों में उठा लिया. हर्षा भी छुईमुई सी उस की बांहों में समा गई. स्टेज का पूरा चक्कर लगा कर अजय ने धीरे से उसे नीचे उतारा और फिर बेहद नजाकत से झुकते हुए उस ने सभी का शुक्रिया अदा किया. पिछले साल की तरह इस बार भी इंदौर के लायंस क्लब में थीम पार्टी ‘मेड फौर ईचअदर’ में वे दोनों बैस्ट कपल चुने गए थे. लोगों की तारीफ भरी नजरें बहुत देर तक दोनों का पीछा करती रहीं.

क्लब से बाहर आ कर अजय गाड़ी निकालने पार्किंग में चला गया. बाहर खड़ी हर्षा उस का इंतजार करने लगी. तभी अचानक किसी ने धीरे से उसे पुकारा. हर्षा मुड़ी पर सामने खड़े इंसान को यकायक पहचान नहीं पाई. लेकिन जब पहचाना तो चीख पड़ी, ‘‘रोहित… तुम यहां कैसे और यह क्या हालत बना ली है तुम ने?’’

‘‘तुम भी तो बिलकुल बदल गई हो… पहचान में ही नहीं आ रही,’’ रोहित की हंसी में कुछ खिन्नता थी, ‘‘यह है मेरी पत्नी प्रीति,’’ कुछ झिझक और सकुचाहट से उस ने पीछे खड़ी पत्नी का परिचय कराया.

सामने खड़ी थुलथुल काया में हर्षा को कुछ अपना सा नजर आया. उस ने आगे बढ़ कर प्रीति को गले लगा लिया, ‘‘नाइस टू मीट यू डियर.’’

तभी अजय गाड़ी ले कर आ गया. हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति से मिलवाया. कुछ देर औपचारिक बातों के बाद अजय ने उन्हें अगले दिन अपने यहां रात के खाने पर आमंत्रित किया.

अजय और हर्षा के घर में घुसते ही डेढ़ वर्षीय आदी दौड़ कर मां की गोदी में आ चढ़ा. हर्षा भी उसे प्यार से दुलारने लगी. 2 घंटे से आदी अपनी दादी के पास था. हर्षा अजय के साथ क्लब गई हुई थी.

हर्षा और अजय की शादी 4 साल पहले हुई थी. खूबसूरत शख्सीयत की मालकिन हर्षा बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थी. इस समय वह पति अजय और अपने डेढ़ साल के बच्चे आदी के साथ खुशहाल और सफल दांपत्य जीवन जी रही थी. लेकिन कुछ साल पहले उस की स्थिति ऐसी न थी. हालांकि तब भी उस की जिंदादिली लोगों के लिए एक मिसाल थी.

90 किलोग्राम वजनी हर्षा अपनी भारीभरकम काया के कारण अकसर लोगों की निगाहों का निशाना बनती थी. लेकिन अपने जानने वालों के लिए वह एक सफल किरदार थी, जो अपनी मेहनत और हौसले के बल पर बड़ी से बड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने की हिम्मत रखती थी. अपने कालेज में वह हर दिल अजीज और हर फंक्शन की जान थी. उस के बगैर कोई भी प्रोग्राम पूरा नहीं होता था.

हर्षा दिखने में भले मोटी थी, पर इस से उस की फुरती व आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आई थी. वह और उस का बौयफ्रैंड रोहित एकदूसरे की कंपनी बहुत पसंद करते थे. बिजनैसमैन पिता ने अपनी इकलौती बेटी हर्षा को बड़े नाजों से पाला था. वह अपने मातापिता की जान थी.

बिस्तर पर लेटी हर्षा रोहित से हुई आज अचानक मुलाकात के बारे में सोच रही थी. थका अजय बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में जा चुका था. हर्षा विचारों के भंवर में गोते खातेखाते 4 साल पहले अपने अतीत से जा टकराई…

‘‘रोहित क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है? क्या तुम मुझ से शादी नहीं करना चाहते?’’ फाइनल ईयर में वेलैंटाइन डे की कालेज पार्टी

में उस ने रोहित को झंझोड़ते हुए पूछा था. दरअसल, उस ने उसी शाम रोहित से बाकायदा अपने प्यार का इजहार कर शादी के बारे में पूछा था. मगर रोहित की नानुकुर से उसे बड़ी हताशा हाथ लगी थी.

‘‘देखो हर्षा, यारीदोस्ती की बात अलग है, क्योंकि दोस्ती कइयों से की जा सकती है, पर शादी तो एक से ही करनी है. मैं शादी एक लड़की से करना चाहता हूं, किसी हथिनी से नहीं. हां, अगर तुम 2-4 महीनों में अपना वजन कम कर सको तो मैं तुम्हारे बारे में सोच सकता हूं,’’ रोहित बेपरवाही से बोला.

हर्षा को रोहित से ऐसे जवाब की बिलकुल उम्मीद नहीं थी. बोली, ‘‘तो ठीक है रोहित, मैं अपना वजन कम करने को कतई तैयार नहीं… कम से कम तुम्हारी इस शर्त पर तो हरगिज नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी दया की मुहताज नहीं हूं, तुम शायद भूल गए कि मेरा अपना भी कोई वजूद है. तुम किसी भी स्लिमट्रिम लड़की से शादी के

लिए आजाद हो,’’ कह बड़ी सहजता से बात को वहीं समाप्त कर उस ने गाड़ी घर की दिशा में मोड़ ली थी.

मगर रोहित को भुलाना हर्षा के लिए आसान न था. आकर्षक कदकाठी और मीठीमीठी बातों के जादूगर रोहित को वह बहुत प्यार करती थी. लोगों की नजरों में भले ही यह एक आदर्श पेयर नहीं था, लेकिन ऐसा नहीं था कि यह चाहत एकतरफा थी. कई मौकों पर रोहित ने भी उस से अपने प्यार का इजहार किया था.

वह जब भी किसी मुश्किल में होता तो हर्षा उस के साथ खड़ी रहती. कई बार उस ने रुपएपैसे से भी रोहित की मदद की थी. यहां तक कि अपने पापा की पहुंच और रुतबे से उस ने कई बार उस के बेहद जरूरी काम भी करवाए थे. तो क्या रोहित के प्यार में स्वार्थ की मिलावट थी? हर्षा बेहद उदास थी, पर उस ने अपनेआप को टूटने नहीं दिया.

अगर रोहित को उस की परवाह नहीं तो वह क्यों उस के प्यार में टूट कर बिखर जाए? क्या हुआ जो वह मोटी है… क्या मोटे लोग इंसान नहीं होते? और फिर वह तो बिलकुल फिट है. इस तरह की सोच से अपनेआप को सांत्वना दे रही हर्षा ने आखिरकार पापा की पसंद के लड़के अजय से शादी कर ली, जो उसी की तरह काफी हैल्दी था.

स्टेज पर उन दोनों की जोड़ी देख किसी ने पीठपीछे उन का मजाक उड़ाया तो किसी ने उन्हें यह कह कर दिली मुबारकबाद दी कि उन की जोड़ी बहुत जम रही है. बहरहाल, अजय से शादी कर हर्षा अपनी ससुराल इंदौर आ गई.

शादी के बाद अजय के साथ हर्षा बहुत खुश थी. अजय उसे बहुत प्यार करता था और साथ ही उस का सम्मान भी. रोहित को वह एक तरह से भूल चुकी थी.

एक दिन अजय को खुशखबरी देते हुए हर्षा ने बताया कि उन के यहां एक नन्हा मेहमान आने वाला है. अजय इस बात से बहुत खुश हुआ. अब वह हर्षा का और भी ध्यान रखने लगा. 10-15 दिन ही बीते थे कि अचानक एक शाम हर्षा को पेट में भयंकर दर्द उठा. अजय उस वक्त औफिस में था. फोन पर हर्षा से बात होते ही वह घर रवाना हो गया.

लेकिन अजय के पहुंचने तक हर्षा का बच्चा अबौर्ट हो चुका था. असीम दर्द से हर्षा वाशरूम में ही बेहोश हो चुकी थी और वहीं पास मुट्ठी भर भू्रण निष्प्राण पड़ा था. अजय के दुख का कोई ठिकाना न था. बड़ी मुश्किल से बेहोश हर्षा हौस्पिटल पहुंचाई गई.

हर्षा के होश में आने के बाद डा. संध्या ने उन्हें अपने कैबिन में बुलाया, ‘‘अजय और हर्षा मुझे बेहद दुख है कि आप का पहला बच्चा इस तरह से अबौर्ट हो गया. दरअसल, हर्षा यह वह वक्त है जब आप दोनों को अपनी फिटनैस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि अभी आप की उम्र कम है. यह उम्र आप के वजन को आप की शारीरिक फिटनैस पर हावी नहीं होने देगी, पर आगे चल कर आप को इस वजह से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए सही यह होगा कि नए मेहमान को अपने घर लाने से पहले आप अपने वजन को न सिर्फ नियंत्रित करें, बल्कि कम भी करें.’’

डा. संध्या ने उन्हें एक फिटनैस ट्रेनर का नंबर दिया. शुरुआत में हर्षा को यह बेहद मुश्किल लगा. वह अपनी पसंद की चीजें खाने का मोह नहीं छोड़ पा रही थी और न ही ज्यादा ऐक्सरसाइज कर पाती थी. थोड़ा सा वर्कआउट करते ही थक जाती. पर अजय के साथ और प्यार ने उसे बढ़ने का हौसला दिया.

कहना न होगा कि संयमित खानपान और नियमित ऐक्सरसाइज ने चंद महीनों में ही अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया. करीब 6 महीनों में दोनों पतिपत्नी का कायापलट हो गया. अजय जहां 75 किलोग्राम का रह गया वहीं हर्षा का वजन 60 किलोग्राम पर आ गया.

हर्षा की खुशी का ठिकाना न था. प्यारी तो वह पहले भी बहुत लगती थी, पर अब उस का आत्मविश्वास और सुंदरता दोगुनी हो उठी. अपनी ड्रैसिंगसैंस और हेयरस्टाइल में चेंज कर वह और भी दमक उठी. डेढ़ साल पहले नन्हे आदी ने उस की कोख में आ कर उस के मातृत्व को भी महका दिया. संपूर्ण स्त्री की गरिमा ने उस के व्यक्तित्व में चार चांद लगा दिए. पर यह रोहित को क्या हुआ, उस की पत्नी प्रीति भी इतनी हैल्दी कैसे हो गई… हर्षा सोचती जा रही थी. नींद अभी भी उस की आंखों से कोसों दूर थी.

सुबह 9 बजे आंख खुलने पर हर्षा हड़बड़ा कर उठी. उफ कितनी देर हो गई, अजय औफिस चले गए होंगे. रोहित और उस की वाइफ शाम को खाने पर आएंगे. अभी वह इसी सोचविचार में थी कि चाय की ट्रे ले कर अजय ने रूम में प्रवेश किया.

‘‘गुड मौर्निंग बेगम, पेश है बंदे के हाथों की गरमगरम चाय.’’

‘‘अरे, तुम आज औफिस नहीं गए और आदी कहां है? तुम ने मुझे जगाया क्यों नहीं?’’ हर्षा ने सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘अरे आराम से भई… एकसाथ इतने सवाल… मैं ने आज अपनी प्यारी सी बीवी की मदद करने के लिए औफिस से छुट्टी ले ली है. आदी दूध पी कर दादी के साथ बाहर खेलने में मस्त है… मैं ने आप को इसलिए नहीं उठाया, क्योंकि मुझे लगा आप देर रात सोई होंगी.’’

सच में कितनी अच्छी हैं अजय की मां, जब भी वह व्यस्त होती है या उसे अधिक काम होता है वे आदी को संभाल लेती हैं. उसे अजय पर भी बहुत प्यार आया कि उस ने उस की मदद के लिए औफिस से छुट्टी ले ली. लेकिन भावनाओं को काबू करती वह उठ खड़ी हुई, शाम के मेहमानों की खातिरदारी की तैयारी के लिए.

सुबह के सभी काम फुरती से निबटा कर मां के साथ उस ने रात के खाने की सूची बनाई. मेड के काम कर के जाने के बाद हौल के परदे, सोफे के कवर वगैरह सब अजय ने बदल दिए. गार्डन से ताजे फूल ला कर सैंटर टेबल पर सजा दिए.

शाम को करीब 7 बजे रोहित और प्रीति आ गए. हर्षा और अजय ने बहुत आत्मीयता से उन का स्वागत किया. दोनों मां और आदी से मिल कर बहुत खुश हुए. खासकर प्रीति तो आदी को छोड़ ही नहीं रही थी. आदी भी बहुत जल्दी उस से घुलमिल गया. हर्षा ने उन दोनों को अपना घर दिखाया. प्रीति ने खुल कर हर्षा और उस के घर की तारीफ की. खाना वगैरह हो जाने के बाद वे सभी बाहर दालान में आ कर बैठ गए. देर तक मस्ती, मजाक चलता रहा. पर बीचबीच में हर्षा को लग रहा था कि रोहित उस से कुछ कहना चाह रहा है.

अजय की मां अपने वक्त पर ही सोती थीं. अत: वे उन सभी से विदा ले कर सोने चली गईं. इधर आदी भी खेलतेखेलते थक गया था. प्रीति की गोद में सोने लगा.

‘‘क्या मैं इसे तुम्हारे कमरे में सुला दूं? प्रीति ने पूछा.

हर्षा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘श्योर.’’

तभी अजय अपनी किसी जरूरी फोनकौल पर ऐक्सक्यूज मी कहते हुए बाहर निकल गया.

रोहित ने हर्षा की ओर बेचारगी भरी नजर डाली, ‘‘हर्षा मैं तुम्हारा गुनहगार हूं, तुम्हारा मजाक उड़ाया, दिल दुखाया. शायद उसी का सिला है कि आज तुम दोनों हमारी तरह हो और हम तुम्हारी तरह. बहुत गुरूर था मुझे अपनी डैशिंग पर्सनैलिटी पर. लेकिन अब देखो मुझे, कहीं का नहीं रह गया. शादी के वक्त प्रीति भी स्लिमट्रिम थी, पर वह भी बाद में ऐसी बेडौल हुई कि अब हम सोशली अपने यारदोस्तों और रिश्तेदारों से कम ही मिलते हैं.’’

कुछ देर रुक कर रोहित ने गहरी सांस ली, ‘‘सब से बड़ा दुख मुझे प्रीति की तकलीफ देख कर होता है. 2 मिस कैरेज हो चुके हैं उस के. डाक्टर ने वजन कम करने की सलाह दी है, मगर हम दोनों की हिम्मत नहीं होती कि कहां से शुरुआत करें. बहुत इतराते थे अपनी शादी के बाद हम, पर वह इतराना ऐसा निकला कि अच्छीखासी हैल्थ को मस्तीमजाक में ही खराब कर लिया और अब… जानती हो घर से दूर जैसे ही इंदौर आने का चांस मिला तो मैं ने झट से हां कह दी ताकि लोगों के प्रश्नों और तानों से कुछ तो राहत मिले.

पर जानते नहीं थे कि यहां इतनी जल्दी तुम से टकरा जाएंगे. कल पार्टी में तुम्हें देख काफी देर तक तो पहचान ही नहीं पाया. लेकिन जब नाम सुना तब श्योर हो गया और फिर बड़ी हिम्मत जुटा कर तुम से बात करने की कोशिश की,’’ रोहित के चेहरे पर दुख की कोई थाह नहीं थी.

रोहित और प्रीति की परेशानी जान हर्षा की उस के प्रति सारी नाराजगी दूर हो गई. बोली, ‘‘रोहित, यह सच है कि तुम्हारे इनकार ने मुझे बेहताशा दुख पहुंचाया था, पर अजय के प्यार ने तुम्हें भूलने पर मुझे मजबूर कर दिया. आज मेरे मन में तुम्हारे लिए तनिक भी गुस्सा बाकी नहीं है.’’

तभी सामने से आ रहे अजय ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘भई कौन किस से गुस्सा है?’’

‘‘कुछ नहीं अजय,’’ कह कर हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति की परेशानी के बारे में बताया.

‘‘अरे तुम दोनों हर्षा के साथ जा कर डा. संध्या से मिल लो. जरूर तुम्हें सही सलाह देंगी,’’ अजय ने कहा. तब तक प्रीति भी आदी को सुला कर आ गई थी.

‘‘हां रोहित, तुम बिलकुल चिंता न करो, मैं कल ही प्रीति और तुम्हें अपनी डाक्टर के पास ले चलूंगी… बहुत जल्दी प्रीति की गोद में भी एक नन्हा आदी खेलेगा,’’ कहते हुए हर्षा ने प्रीति को गले लगा लिया.

उन दोनों के जाने के बाद हर्षा देर तक रोहित और प्रीति के बारे में सोचती रही. वह प्रीति की तकलीफ समझ सकती थी, क्योंकि वह खुद भी कभी इस तकलीफ से गुजर चुकी थी. उस ने तय किया कि वह उन दोनों की मदद जरूर करेगी.

हर्षा इसी सोच में गुम थी कि पीछे से आ कर अजय ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस ने भी हंसते हुए रात भर के लिए अपनेआप को उन बांहों की गिरफ्त के हवाले कर दिया.

Romantic Story: आवारा बादल – क्या हो पाया इला और व्योम का मिलन

Romantic Story: फाल्गुन अपने रंग धरती पर बिखेरता हुआ, चपलता से गुलाल से गालों को आरक्त करता हुआ, चंचलता से पानी की फुहारों से लोगों के दिलों और उमंगों को भिगोता हुआ चला गया. सेमल के लालनारंगी फूलों से लदे पेड़ और अलगअलग रंगों में यहांवहां से झांकते बोगेनवेलिया के झाड़, हर ओर मानो रंग ही रंग बिखरे हुए थे.

फाल्गुन जातेजाते गरमियों के आने का संकेत भी कर गया. हालांकि उस समय भी धूप के तीखेपन में कोई कमी नहीं थी, पर सुबहशाम तो प्लेजेंट ही रहते थे, लेकिन जातेजाते वह अपने साथ रंगों की मस्ती तो ले ही गया, साथ ही मौसम की गुनगुनाहट भी.

‘‘उफ, यह गरमी, आई सिंपली हेट इट,’’ माथे पर आए पसीने को दुपट्टे से पोंछते हुए इला ने अपने गौगल्स आंखों पर सटा दिए, ‘‘लगता है हर समय या तो छतरी ले कर निकलना होगा या फिर एसी कार में जाना पड़ेगा,’’ कहतेकहते वह खुद ही हंस पड़ी.

‘‘तो मैडम, यह काम क्या इस बंदे को करना होगा कि रोज सुबह आप के घर से निकलने से पहले फोन कर के आप को छतरी रखने के लिए याद दिलाए या फिर खुद ही छतरी ले कर आप की सेवा में हाजिर होना पड़ेगा,’’ व्योम चलतेचलते ठहर गया था.

उस की बात सुन इला को भी हंसी आ गई.

‘‘ज्यादा स्टाइल मारने के बजाय कुछ ठंडा पिला दो तो बेहतर होगा.’’

‘‘क्या लोगी? कोल्ड कौफी या कोल्ड ड्रिंक?’’

‘‘कोल्ड कौफी मिल जाए तो मजा आ जाए,’’ इला चहकी.

‘‘आजकल पहले जैसा तो रहा नहीं कि कोल्ड कौफी कुछ सलैक्टेड आउटलेट्स पर ही मिले. अब तो किसी भी फूड कोर्ट में मिल जाती है. यहीं किसी फूड कोर्ट में बैठते हैं,’’ व्योम बोला.

अब तक दोनों राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर पहुंच चुके थे. भीड़भाड़ और धक्कामुक्की यहां रोज की बात हो गई है. चाहे सुबह हो, दोपहर, शाम या रात, लोगों की आवाजाही में कोई कमी नजर नहीं आती है.

‘‘जहां जाओ हर तरफ शोर और भीड़ ही नजर आती है. पहले ही क्या कम पौल्यूशन था जो अब नौयज पौल्यूशन भी झेलना पड़ता है,’’ इला ने कुरसी पर बैठते हुए कहा.

‘‘अच्छा है यहां एसी है,’’ व्योम मासूम सा चेहरा बना कर बोला, जिसे देख इला जोर से हंस पड़ी, ‘‘उड़ा लो मजाक मेरा, जैसे कि मुझे ही गरमी लगती है.’’

‘‘मैडम गरमी का मौसम है तो गरमी ही लगेगी. अब बिन मौसम बरसात तो आने से रही,’’ व्योम ने कोल्ड कौफी का सिप लेते हुए कहा. उसे इला को छेड़ने में बहुत मजा आ रहा था.

‘‘छेड़ लो बच्चू, कभी तो मेरी बारी भी आएगी,’’ इला ने बनावटी गुस्सा दिखाया.

‘‘बंदे को छेड़ने का पूरा अधिकार है. आखिर प्यार जो करता है और वह भी जीजान से.’’

व्योम की बात से सहमत इला ने सहमति में सिर हिलाया. 2 साल पहले हुई उन की मुलाकात उन के जीवन में प्यार के इतने सतरंगी रंग भर देगी, तब कहां सोचा था उन्होंने. बस, अब तो दोनों को इंतजार है तो एक अच्छी सी नौकरी का. फिर तो तुरंत शादी के बंधन में बंध जाएंगे. व्योेम एमबीए कर चुका था और इला मार्केटिंग के फील्ड में जाना चाहती थी.

‘‘चलो, अब जल्दी करो, पहले ही बहुत देर हो गई है. मां डांटेंगीं कि रोजरोज आखिर व्योम से मिलने क्यों जाना है,’’ इला उठते हुए बोली.

दोनों ग्रीन पार्क स्टेशन से निकल कर बाहर आए ही थे कि वहां बारिश हो रही थी.

‘‘अरे, यह क्या, पीछे तो कहीं भी बारिश नहीं थी. फिर यहां कैसे हो गई? लगता है मौसम भी आज हम पर मेहरबान है, जो बिन मौसम की बारिश से एकदम सुहावना हो गया है,’’ इला हैरान थी.

‘‘मुझे तो लगता है कि दो आवारा बादल के टुकड़े होंगे जो प्यार के नशे की खुमारी में आसमान में टकराए होंगे और बारिश की कुछ बूंदें आ गई होंगी, वरना केवल तुम्हारे ही इलाके में बारिश न हुई होती. जैसे ही उन के नशे की खुमारी उतरेगी, दोनों कहीं दूर छिटक जाएंगे और बस, बारिश भी गायब हो जाएगी,’’ आसमान को देखता हुआ व्योम कुछ शायराना अंदाज में बोला.

‘‘तुम भी किसी आवारा बादल की तरह मुझे छोड़ कर तो नहीं चले जाओगे. कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे प्यार की खुमारी भी एक दिन उतर जाए और तुम भी मुझ से छिटक कर कहीं दूर चले जाओ,’’ इला की गंभीर आवाज में एक दर्द छिपा था. शायद उस अनजाने भय की निशानी था जो हर प्यार करने वाले के दिल में कहीं न कहीं छिपा होता है.

‘‘कैसी बातें कर रही हो? आखिर तुम सोच भी कैसे लेती हो ऐसा? मैं क्यों जाऊंगा तुम्हें छोड़ कर,’’ व्योम भी भावुक हो गया था, ‘‘मेरा प्यार इतना खोखला नहीं है. मैं खुद इसे साबित नहीं करना चाहता, पर कभी मन में शक आए तो आजमा लेना.’’

‘‘मैं तो मजाक कर रही थी,’’ इला ने व्योम का हाथ कस कर थामते हुए कहा. जब से वह उस की जिंदगी में आया था, उसे लगने लगा था कि हर चीज बहुत खूबसूरत हो गई है. कितना परफैक्ट इंसान है वह. प्यार, सम्मान देने के साथसाथ उसे बखूबी समझता भी है. बिना कुछ कहे भी जब कोई आप की बात समझ जाए तो वही प्यार कहलाता है.

इला को एक कंपनी में मार्केटिंग ऐग्जीक्यूटिव का जौब मिल गया और व्योम का विदेश से औफर आया, लेकिन वह इला से दूर नहीं जाना चाहता था. इला के बहुत समझाने पर वह मान गया और सिंगापुर चला गया. दोनों ने तय किया था कि 6 महीने बाद जब दोनों अपनीअपनी नौकरी में सैट हो जाएंगे, तभी शादी करेंगे. फोन, मैसेज और वैबकैम पर रोज उन की बात होती और अपने दिल का सारा हाल एकदूसरे से कहने के बाद ही उन्हें चैन आता.

इला कंपनी के एक नए प्रोडक्ट की पब्लिसिटी के लिए जयपुर गई थी, क्योंकि उसी मार्केट में उन्हें उस प्रोडक्ट को प्रमोट करना था. वहां से वापस आते हुए वह बहुत उत्साहित थी, क्योंकि उसे बहुत अच्छा रिस्पौंस मिला था और उस ने फोन पर यह बात व्योम को बता भी दी थी. अब एक प्रमोशन उस का ड्यू हो गया था. लेकिन उसे नहीं पता था कि नियति उस की खुशियों के चटकीले रंगों में काले, स्याह रंग उड़ेलने वाली है.

रात का समय था, न जाने कैसे ड्राइवर का बैलेंस बिगड़ा और उन की कार एक ट्रक से टकरा गई. ड्राइवर की तो तभी मौत हो गई. लेकिन हफ्ते बाद जब उसे होश आया तो पता चला कि उसे सिर पर गहरी चोट आई थी और उस की आवाज ही चली गई थी.

धुंधला सा कुछ याद आ रहा था कि वह व्योम से बात कर रही थी कि तभी सामने आते ट्रक को देख उसे लगा था कि शायद वह व्योम से आखिरी बार बात कर रही है और वह चिल्ला कर ड्राइवर को सचेत करना ही चाहती थी कि आवाज ही नहीं निकली थी. सबकुछ खत्म हो चुका था उस के लिए.

परिवार के लोग इसी बात से खुश थे कि इला सकुशल थी. उस की जान बच गई थी, पर वह जो हर पल व्योम से बात करने को लालायित रहती थी, नियति से खफा थी, जिस ने उस की आवाज छीन कर व्योम को भी उस से छीन लिया था.

‘‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि व्योम अब तुम्हें नहीं अपनाएगा? वह तुम से प्यार करता है, बहुत प्यार करता है, बेटी. उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ेगा,’’ मां ने लाख समझाया पर इला का दर्द उस की आंखों से लगातार बहता रहता. वह केवल लिख कर ही सब से बात करती. उस ने सब से कह दिया था कि व्योम को इस बारे में कुछ न बताया जाए और न ही वह अब उस से कौंटैक्ट रखना चाहती थी.

‘‘अपने प्यार पर इतना ही भरोसा है तुझे?’’ उस की फ्रैंड रमा ने जब सवाल किया तो इला ने लिखा, ‘अपने प्यार पर तो मुझे बहुत भरोसा है, पर मैं आधीअधूरी इला जो अपनी बात तक किसी को कह न सके, उसे सौंपना नहीं चाहती. वह एक परफैक्ट इंसान है, उसे परफैक्ट ही मिलना चाहिए सबकुछ.’

व्योम ने बहुत बार उस से मिलने की कोशिश की, फोन किया, मैसेज भेजे, चैट पर इन्वाइट किया, पर इला की तो जैसे आवाज के साथसाथ भावनाएं भी मौन हो गई थीं. अपने सपनों को उस ने चुप्पी के तालों के पीछे कैद कर दिया था. उस की आवाज पर कितना फिदा था व्योम. कैसी अजीब विडंबना है न जीवन की, जो चीज सब से प्यारी थी उस से वही छिन गई थी.

3-4 महीने बाद व्योम के साथ उस का संपर्क बिलकुल ही टूट गया. व्योम ने फोन करने बंद कर दिए थे. ऐसा ही तो चाहती थी वह, फिर क्यों उसे बुरा लगता था. कई बार सोचती कि आखिर व्योम भी किसी आवारा बादल की तरह ही निकला जिस के प्यार के नशे की खुमारी उस के एक ऐक्सिडैंट के साथ उतर गई.

वक्त गुजरने के साथ इला ने अपने को संभाल लिया. उस ने साइन लैंग्वेज सीख ली और मूकबधिरों के एक संस्थान में नौकरी कर ली. वक्त तो गुजर जाता था उस का, पर व्योम का प्यार जबतब टीस बन कर उभर आता था. उसे समझ ही नहीं आता था कि उस ने व्योम को बिना कुछ कहनेसुनने का मौका दिए उस के प्यार का अपमान किया था या व्योम ने उसे छला था. जब भी बारिश आती तो आवारा बादल का खयाल उसे आ जाता.

वह मौल में शौपिंग कर रही थी, लगा कोई उस का पीछा कर रहा है. कोई जानीपहचानी आहट, एक परिचित सी खुशबू और दिल के तारों को छूता कोई संगीत सा उसे अपने कानों में बजता महसूस हुआ.

ऐस्केलेटर पर ही पीछे मुड़ कर देखा. चटकीले रंगों में मानो फूल ही फूल हर ओर बिखरते महसूस हुए. जल्दीजल्दी वहां से कदम बढ़ाने लगी, मानो उस परिचय के बंधन से छूट कर भाग जाना चाहती हो. अचानक उस का हाथ कस कर पकड़ लिया उस ने.

ओह, इस छुअन के लिए पूरे एक बरस से तरस रही है वह. मन में असंख्य प्रश्न और तरंगें बहने लगीं. पर कहे तो कैसे कहे वह? लब हिले भी तो वह सच जान जाएगा तब…हाथ छुड़ाना चाहा, पर नाकामयाब रही.

भरपूर नजरों से व्योम ने इला को देखा. प्यार था उस की आंखों में…वही प्यार जो पहले इला को उस की आंखों में दिखता था.

‘‘कैसी हो,’’ व्योम ने हाथों के इशारे से पूछा, ‘‘मुझे बस इतना ही समझा. एक बार भी मेरे प्यार पर भरोसा करने का मन नहीं हुआ तुम्हारा?’’ अनगिनत प्रश्न व्योम पूछ रहा था, पर यह क्या, वह तो साइन लैंग्वेज का इस्तेमाल कर रहा था.

अवाक थी इला, ‘‘तुम बोल क्यों नहीं रहे हो,’’ उस ने इशारे से पूछा.

‘‘क्योंकि तुम नहीं बोल सकती. तुम ने कैसे सोच लिया कि तुम्हारी आवाज चली गई तो मैं तुम्हें प्यार करना छोड़ दूंगा. मैं कोई आवारा बादल नहीं. जब तुम्हारे मुझ से कौंटैक्ट न रखने की वजह पता चली तो मैं ने ठान लिया कि मैं भी अपना प्यार साबित कर के ही रहूंगा. बस, तब से साइन लैंग्वेज सीख रहा था. अब जब मुझे आ गई तो तुम्हारे सामने आ गया.’’

उस के बाद इशारों में ही दोनों घंटों शिकवेशिकायतें करते रहे. इला के आंसू बहे जा रहे थे. उस के आंसू पोंछते हुए व्योम बोला, ‘‘लगता है दो आवारा बादल इस बार तुम्हारी आंखों से बरस रहे हैं.’’

व्योम के सीने से लगते हुए इला को लगा कि व्योम वह बादल है जो जब आसमान में उड़ता है तो बारिश को तरसती धरती उस की बूंदों से भीग जी उठती है.

Funny Hindi Story: दूल्हे का घोड़ा रस्म अदायगी का रोड़ा

Funny Story, लेखक – राकेश सोहम

मुझे बचपन से ब्याहबरातों में जाने का शौक है. गुड्डेगुडि़यों की शादी से ले कर अपनी बरात भी हंस कर ‘अटैंड’ की है. पर हाय, बचपन के दिनों की वह शादी जो कभी नहीं भूलती.

टिल्लू के बड़े भाई की बरात 2 ट्रैक्टर में लद कर एक छोटे से गांव में पहुंची थी. पूरे 2 घंटे धूल भरी पगडंडियों से हिचकोले खाते हुए जब गांव पहुंचे, तो पहचानना मुश्किल था कि कौन दूल्हा है और कौन बराती. सभी धूल में सने एक से दिखाई पड़ते थे.

दूल्हे के गले में खींचतान कर लटकाई हुई टाई गले में झूलते सांप सी जान पड़ती थी. औरतों की गोद में
खेलते नदान बराती उसे देख कर भाग खड़े होते.

गांव में बरातियों का स्वागत मीठे पानी में खाने वाले रंग को घोल कर किया गया.

बरातियों के स्वागत के बाद जब रस्म अदायगी का समय आया तो घोड़ा भी मौजूद न था. वहां के एकलौते घोड़ा मालिक ने बताया कि उस के पास एक ही घोड़ा है, जो शाम से लापता है. कहीं खेत में घास चरने निकल गया है.

सवाल था कि उसे खोजेगा कौन? गांव में लाइट नहीं थी. घुप अंधेरे में चलना दूभर था, उधर पंडितजी जोर डाल रहे थे कि दूल्हे का घोड़े पर बैठना शुभ होता है. दूल्हा घोड़े पर नहीं चढ़ेगा तो अशुभ हो जाएगा.

हमारी मित्र मंडली बड़े जोश में थी. एक मित्र कहने लगे कि शादी में हमारे रहते अशुभ कैसे हो सकता है, इसलिए हम घोड़ा मालिक के घर गए औए उसे खूब धमकाया, पर वह बेचारा मजबूर था.

आखिर जवानी के जोश से भरे हम मित्रों ने पांडवों की तरह स्वर्ग से एरावत उतारने की ठानी. लालटेन के सहारे अंधेरे खेतों में निकल पड़े घोड़े को ढूंढ़ने. एक घंटे की कड़ी मेहनत के बाद हम सब ने उसे धर दबोचा.

घोड़े को खींचतान कर उस के मालिक के घर तक ले गए. सभी ने उसे फिर धमकाया. वह घबरा गया. उस ने डर के मारे एक बड़ा सा कांच की कढ़ाई वाला दुशाला घोड़े की पीठ पर चढ़ा दिया और हाथ जोड़ कर नतमस्तक हो गया. हम ने उस की टिमटिमाती लालटेन लौटा दी.

हमारी मित्र मंडली सजेधजे घोड़े को ले कर रस्म अदायगी के लिए पहुंची, तो सभी खुश हो गए. गैस बत्ती की रोशनी में दूल्हा घोड़ी चढ़ा.

दूल्हा 6 फुट से भी लंबा गबरू जवान था. घोड़े पर बैठने से उस के दोनों पैर जमीन को छूते थे. हालात यों थे कि दूल्हा अपने दोनों पैर जमीन पर ठीक से टिका ले तो घोड़ा नीचे से निकल भागे. देखने वालों का समझना मुश्किल था कि घोड़ा सामान्य कद से ज्यादा छोटा है या दूल्हा ज्यादा लंबा.

बरात लगी और रस्म अदायगी के बाद मित्र मंडली घोड़े को ले कर उस के मालिक के घर तक आई, लेकिन उस के आंगन में लंबेतगड़े घोड़े को देख कर सभी चौंक गए.

तभी घोड़े के मालिक की पत्नी उलाहना देते हुए बाहर आई और चिल्ला कर बोली, ‘‘कहां चले गए थे? रमुआ कब से आ कर खड़ा है. बरात में नहीं जाना है क्या? पेशगी लिए हो. रमुआ को ले जाओ, वरना शादी का मुहूर्त निकल जाएगा.’’

घोड़े का मालिक पोल खुल जाने के डर से हाथपैर जोड़ने लगा.

दरअसल, हमारी मित्र मंडली जिसे घोड़ा समझ कर पकड़ कर लाई थी, वह एक खच्चर था. अंधेरा होने और हमारी मित्र मंडली के डर से घोड़े के मालिक ने चुप्पी साध ली थी और असलियत नहीं बताई.

News Story: नक्सली सफाया और चांदी का दर्द

News Story: ‘आपरेशन सिंदूर’ के नाम पर भगवाधारी गैंग के मार्किट में मचाए गए उत्पात को अब अनामिका भुला चुकी थी. उस चांदनी रात में विजय और अनामिका ने छत पर खूब प्यार बरसाया था. तब बातोंबातों में अनामिका ने विजय से पूछा था, ‘‘तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?’’

‘‘अचानक से यह सवाल क्यों? तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं,’’ विजय ने अनामिका के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘कहने में और करने में बड़ा फर्क होता है जनाब. क्या मेरे लिए सरकार से भी पंगा सकते हो?’’ अनामिका बोली.

‘‘अब हम दोनों के बीच में सरकार कहां से आ गई?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘जैसे उस दिन मंजू आंटी और उन लफंगों के बीच मैं आ गई थी, जो देशभक्ति के नाम पर मार्किट में लूट मचा रहे थे,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘तुम पहेलियां मत बुझाओ. जो बात है साफसाफ कहो,’’ विजय थोड़ा चिढ़ गया था.

‘‘समय आने पर सब पता चल जाएगा. ‘तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं’… अपनी इस बात पर कायम
रहना बस,’’ अनामिका थोड़ा सीरियस हो कर बोली.

इस बात को कुछ दिन बीत गए थे. एक शाम को अनामिका ने विजय को फोन किया, ‘‘अभी कहां हो?’’

‘घर पर. क्या हुआ? सब ठीक?’ विजय ने पूछा.

‘‘मेरे लिए कुछ भी करने का वक्त आ गया है. मैं थोड़ी देर में तुम्हारे घर आ रही हूं,’’ इतना कह कर अनामिका ने फोन काट दिया.

विजय को कुछ समझ नहीं आया. वह अनामिका के आने का इंतजार करने लगा.

‘‘किस का फोन था?’’ विजय की मम्मी ने पूछा.

विजय का ध्यान टूटा, तो वह बोला, ‘‘अनामिका का. बड़ी अजीब सी बात कर रही थी.’’

‘‘अजीब सी… क्या मतलब?’’ पापा ने विजय से पूछा.

‘‘बोल रही थी कि थोड़ी देर में घर आ रही है. पर पूरी बात नहीं बताई,’’ विजय ने कहा.

‘‘अरे, ऐसे ही बोल दिया होगा. काफी दिनों से आई नहीं है. शरारत कर रही होगी,’’ विजय की बहन सुधा
ने कहा.

‘‘दीदी, आप तो अनामिका को जानती हो न. अभी तो उस के मन में कुछ और ही चल रहा है,’’ विजय ने चिंतित हो कर कहा.

2 घंटे बाद अनामिका विजय के घर पर थी. उस के साथ एक लड़की थी, जिस के पास एक पुराना सा पिट्ठू बैग था.

सांवले रंग की उस लड़की के नैननक्श बड़े तीखे थे. उम्र होगी तकरीबन 20 साल. देह की मजबूत और दरमियाने कद की.

सब लोग ड्राइंगरूम में बैठे थे. बिना कुछ बोले. टेबल पर रखी चाय भी ठंडी हो रही थी. विजय अनामिका की ओर देख रहा था, मानो पूछ रहा हो कि यह लड़की कौन है और तुम ने इस का पहले कभी जिक्र क्यों नहीं किया?

इतने में विजय के पापा ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘अरे भई, चाय ठंडी हो रही है. पीनी भी है या सिर्फ देख कर ही स्वाद लेना है… अनामिका बेटा, तुम कैसी हो? इस बच्ची से तो हमारा परिचय कराओ…’’

अनामिका मुसकराई और चाय का कप उठाते हुए बोली, ‘‘अंकल, यह चांदी है. छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा इलाके के एक आदिवासी गांव में रहती है. मेरी एक सहेली की छोटी बहन है… मुझे आप सब की मदद चाहिए.’’

विजय और उस के परिवार वालों को सम?ा नहीं आ रहा था कि अनामिका क्या कहना चाहती है.
थोड़ी देर के बाद विजय ने पूछ ही लिया, ‘‘किस तरह की मदद?’’

‘‘आप लोगों को कुछ दिन के लिए चांदी को अपने घर पनाह देनी होगी. यह मेरे पास नहीं रह सकती. पर यहां एकदम महफूज रहेगी,’’ अनामिका बोली.

यह सुन कर सब को लगा कि मामला कुछ गड़बड़ है. विजय के पापा ने माहौल को हलका करते हुए कहा, ‘‘बिलकुल पनाह मिलेगी. पर यह मामला क्या है, वह तो हमें बताओ?’’

‘‘अंकल, चांदी नक्सली इलाके से है. आजकल सरकार नक्सलियों का सफाया कर रही है. यह भी सुरक्षाबलों की हिटलिस्ट में है. यह किसी तरह पहले रायपुर पहुंची और वहां से यहां दिल्ली आ गई. मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती,’’ अनामिका ने कहा.

विजय समझ गया कि अनामिका उस रात को चांदी का ही जिक्र करना चाह रही थी. पर यह फैसला वह अकेला नहीं ले सकता था. उस ने अपने मम्मीपापा की तरफ देखा.

‘‘देखो अनामिका, हमें तुम पर पूरा भरोसा है. चांदी जितने दिन चाहे यहां रह सकती है. हम इस की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं,’’ विजय की मम्मी ने कहा.

‘‘पर आंटी, यह जिस जगह से आई है, इस पर खुफिया विभाग की नजर भी हो सकती है. फिर आप पासपड़ोस में क्या कहोगे कि यह कौन है?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘यहां इस का नाम बिंदिया होगा. जब भी कोई बाहर वाला इस से पूछेगा तो यह सिर्फ इतना कहेगी कि हमारे यहां मेड है. 24 घंटे हमारे साथ रहती है. बाकी हम संभाल लेंगे. इसे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई इस का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा,’’ विजय की बहन सुधा ने कहा.

इतना सुन कर चांदी के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई. उस ने अनामिका की तरफ देखा. अनामिका भी हंसने लगी.

‘‘हंस क्यों रही हो? हम ने कुछ गलत कह दिया क्या?’’ विजय के पापा बोले.

अनामिका से पहले चांदी ने कहा, ‘‘अंकल, आप लोगों ने जो फैसला लिया है, उस से मुझे बड़ी राहत मिली है. मैं जितने दिन यहां रहूंगी, आप सब की सेवा करूंगी. आप ने मुझे बिंदिया नाम दिया है, जो बहुत अच्छा है.

‘‘जहां तक मेरा बाल बांका होने की बात है, तो आप चिंता मत कीजिए. जब तक मैं यहां हूं, कोई आप का बाल बांका नहीं कर पाएगा. मैं ने कराटे की ट्रेनिंग ली हुई है और मुझे चाकू चलाने से ले कर बंदूक चलाना भी आता है,’’ चांदी ने कहा.

‘‘फिर तो तुम हम सब की बौडीगार्ड हो,’’ विजय ने इतना कहा, तो सब हंसने लगे.

‘‘अच्छा अंकल, अब मैं चलती हूं. बीचबीच में यहां आती रहूंगी. चांदी, इसे अपना ही घर समझो. बाहर वालों
से थोड़ा सतर्क रहना. ज्यादातर घर पर ही रहना,’’ अनामिका बोली.

‘‘ठीक है दीदी. मैं आप को कभी भी शर्मिंदा होने का मौका नहीं दूंगी,’’ चांदी ने कहा.

इस बात को एक हफ्ता बीत गया था. टैलीविजन पर नक्सलियों से जुड़ी खूब खबरें आ रही थीं. रात का खाना खा कर सब बातें कर रहे थे.

विजय के पापा ने चांदी से सवाल किया, ‘‘क्या वाकई सरकार नक्सलियों का सफाया कर देगी?’’

चांदी कुछ देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘यह पूरा सच नहीं है. मामला बहुत ज्यादा पेचीदा है.’’

‘‘पर 21 मई को तो सरकार ने कई नक्सलियों का सफाया किया था और उन में से एक तो डेढ़ करोड़ के इनाम वाला खतरनाक नक्सली था. यह सब क्या मामला था?’’ विजय ने चांदी को कुरेदते हुए पूछा.

चांदी एक फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘अच्छा तो तुम छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले वाले कांड की बात कर रहे हो…’’

‘‘हां, बताओ वहां क्या हुआ था?’’ विजय ने कहा.

‘‘खबरों के मुताबिक, अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षाबलों ने तथाकथित 27 नक्सलियों को मार गिराया था. मारे गए नक्सलियों में डेढ़ करोड़ का इनामी नक्सली बसवा राजू भी शामिल था. यह मुठभेड़ दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर जिले की सरहद पर हुई थी.

‘‘पुलिस को सूचना मिली थी कि अबूझमाड़ के बोटेर इलाके में नक्सलियों का पोलित ब्यूरो सदस्य और नक्सल संगठन का महासचिव बसवा राजू मौजूद था. इसी आधार पर फोर्स को रवाना किया गया था. वहां पहुंचते ही जवानों पर नक्सलियों ने फायरिंग कर दी. सुरक्षाबलों के इस आपरेशन को प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा ने बड़ी कामयाबी बताया है.

‘‘इस के पहले पुलिस ने 7 दिन पहले ही प्रैस कौंफ्रैंस कर कर्रेगुट्टा आपरेशन की जानकारी दी थी. छत्तीसगढ़तेलंगाना बौर्डर पर कर्रेगुट्टा के पहाड़ों पर सुरक्षाबलों ने 24 दिनों तक चले एक आपरेशन में 31 नक्सलियों को मार गिराया था.

‘‘नक्सल सूत्रों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में तकरीबन 40 सालों में हिडमा ही एकलौता ऐसा नक्सली है, जिसे संगठन की टौप-2 टीम (सैंट्रल कमेटी) में जगह मिली है. वह भी तब जब नक्सल संगठन में अंदरूनी
कलह चली और नक्सलियों को सिर्फ ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की बात उठने लगी.

‘‘वहीं, डिविजनल कमेटी मैंबर के पद से देवा बारसे का प्रमोशन कर उसे दंडकारण्य स्पैशल जोनल कमेटी मैंबर के कैडर में शामिल कर कमांडर बनाया गया.

‘‘केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अगस्त, 2024 और दिसंबर, 2024 में छत्तीसगढ़ के रायपुर और जगदलपुर आए थे. वे यहां अलगअलग कार्यक्रमों में शामिल हुए थे. इस दौरान उन्होंने अलगअलग मंचों से नक्सलियों को चेताते हुए कहा था कि हथियार डाल दें. हिंसा करोगे तो हमारे जवान निबटेंगे.

‘‘वहीं उन्होंने एक डैडलाइन भी जारी की थी कि 31 मार्च, 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद का खात्मा कर दिया जाएगा. उन के डैडलाइन जारी करने के बाद से बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन काफी तेज हो गए हैं,’’ चांदी ने पूरी खबर सुनाई.

‘‘गृह मंत्री अमित शाह ने तो 21 मई के हमले के बाद मिली कामयाबी को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया है कहा है कि जल्दी ही हम देश से नक्सलवाद खत्म कर देंगे,’’ विजय ने चांदी से कहा.

इस पर चांदी बोली, ‘‘मु?ो पता है कि इस मामले के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि नक्सलवाद को खत्म करने की लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है.

‘‘छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में एक आपरेशन में हमारे सुरक्षाबलों ने 27 खतरनाक माओवादियों को मार गिराया है, जिन में सीपीआई (माओवादी) के महासचिव, शीर्ष नेता और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशव राव उर्फ बसवा राजू भी शामिल है.

‘‘अमित शाह ने आगे कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई के 3 दशकों में यह पहली बार है कि हमारे सुरक्षाबलों द्वारा एक महासचिव स्तर के नेता को मार गिराया गया है. मैं इस बड़ी सफलता के लिए हमारे बहादुर सुरक्षाबलों और एजेंसियों की सराहना करता हूं. यह बताते हुए भी खुशी हो रही है कि आपरेशन ब्लैक फौरैस्ट के पूरा होने के बाद, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. मोदी सरकार 31 मार्च, 2026 से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए संकल्पित है.’’

‘‘तो इस में बुराई क्या है… देश के दुश्मनों का तो सफाया होना ही चाहिए,’’ विजय ने खुल कर बोला.

‘‘तुम्हें नक्सलवाद के बारे में कुछ नहीं पता. जो लोग सरकार की गलत नीतियों के शिकार होते हैं, तब बंदूक उठा लेते हैं. अपनी जान बचाने की खातिर गांव का एक 15 साल का बच्चा भी बंदूक चलाना सीख जाता है.

‘‘छत्तीसगढ़ राज्य घने जंगलों और पहाडि़यों से घिरा हुआ है. यहां के आदिवासी समाज में सरकार की नीतियों के खिलाफ नाराजगी है.

‘‘विजय बाबू, आप तो जानते ही होंगे कि इस राज्य में बड़ी तादाद में आदिवासी रहते हैं, जिन के साथ अकसर भेदभाव से भरा बरताव किया जाना है. आदिवासियों की जमीनें कोयले की खदानों में बदल दी जाती हैं और विकास परियोजनाओं के लिए ले ली जाती हैं, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा या रहने के लिए दूसरी जगह नहीं मिलती है, जबकि उन की पारंपरिक आजीविका के साधन छीन लिए जाते हैं और वे अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने लगते हैं.

‘‘कोढ़ पर खाज यह है कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी जरूरतों की भारी कमी है. पढ़ाईलिखाई, सेहत, पीने का पानी और रोजगार जैसी जरूरी सेवाएं यहां के लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं. कई गांवों में स्कूल और अस्पतालों की हालत खराब है और टीचरों व डाक्टरों की भारी कमी है.

‘‘बेरोजगारी और गरीबी के चलते लोग अपने परिवारों को पालने में नाकाम रहते हैं. उन्हें लगता है कि सरकार उन की समस्याओं को हल करने में नाकाम रही है.’’

‘‘समस्याएं तो हर जगह हैं, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि लोग बंदूक उठा कर देश के ही खिलाफ हो जाएं?’’ विजय की बहन सुधा ने सवाल किया.

‘‘दीदी, यहां देश की राजधानी में बैठ कर ऐसे सवाल करना बड़ा आसान है, पर जमीनी हकीकत बड़ी ही भयावह है. गांव में हमारे साथ जो बीतती है, उस पर तो कभी खबर ही नहीं बन पाती है.

‘‘यह खबर तो बाहर आ जाती है कि नक्सली औरतों और लड़कियों के साथ सैक्स संबंध बनाते हैं और उन्हें अपने ग्रुप में शामिल कर लेते हैं, पर जब प्रशासन के लोग हमारा शोषण करते हैं, तो उस का हिसाब कौन रखेगा. सुरक्षाबलों की बुरी नजर से हम नहीं बच पाती हैं.

‘‘मैं हूं नक्सली विचारधारा की और मुझे पता है कि आज नहीं तो कल मुझ पर गाज गिरेगी ही, पर मेरे बाद और कोई हथियार नहीं उठाएगा, इस की गारंटी कौन लेगा? क्या सरकार नक्सलियों को खत्म कर के इस सोच को भी मार देगी कि अब किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होगी?’’ इतना कह कर चांदी खामोश हो गई. उस की आंखें मानो पथरा गई थीं. उसे उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी.

कमरे में अब सन्नाटा पसरा हुआ था. विजय, उस के मातापिता और बहन सब चुप थे. उन के पास चांदी के किसी सवाल का कोई जवाब नहीं था.

Family Story: दूसरा विवाह – विकास शादी क्यों नहीं करना चाहता था?

Family Story: अपने दूसरे विवाह के बाद, विकास पहली बार जब मेरे घर आया तो मैं उसे देखती रह गई थी. उस का व्यक्तित्व ही बदल गया था. उस के गालों के गड्ढे भर गए थे. आंखों पर मोटा चश्मा, जो किसी चश्मे वाले मास्टरजी के कार्टून वाले चेहरे पर लगा होता है वैसे ही उस की नाक पर टिका रहता था लेकिन अब वही चश्मा व्यवस्थित तरीके से लगा होने के कारण उस के चेहरे की शोभा बढ़ा रहा था. कपड़ों की तरफ भी जो उस का लापरवाही भरा दृष्टिकोण रहता था उस में भी बहुत परिवर्तन दिखा. पहले के विपरीत उस ने कपड़े और सलीके से पहने हुए थे. लग रहा था जैसे किसी के सधे हाथों ने उस के पूरे व्यक्तित्व को ही संवार दिया हो. उस के चेहरे से खुशी छलकी पड़ रही थी.

मैं उसे देखते ही अपने पास बैठाते हुए खुशी से बोली, ‘‘वाह, विकास, तुम तो बिलकुल बदल गए. बड़ा अच्छा लग रहा है तुम्हें देख कर. शादी कर के तुम ने बहुत अच्छा किया. तुम्हारा घर बस गया. आखिर कितने दिन तुम ममता का इंतजार करते. अच्छा हुआ तुम्हें उस से छुटकारा मिल गया.’’

उस के लिए चाय बनातेबनाते, मैं मन ही मन सोचने लगी कि इस लड़के ने कितना झेला है. पूरे 8 साल अपनी पहली पत्नी ममता का मायके से लौटने का इंतजार करता रहा. लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही कि वह नहीं आएगी. विकास को ही अपना परिवार, जिस में उस की मां और एक कुंआरी बहन थी, को छोड़ कर उस के साथ रहना होगा.

विकास के छोटे से घर में उन सब के साथ रहना उस को अच्छा नहीं लगता था. ममता की अपनी मां का घर बहुत बड़ा था. विकास ने उसे बहुत समझाया कि बहन का विवाह करने के बाद वह बड़ा घर ले लेगा. लेकिन ममता को अपने सुख के सामने कुछ भी दिखाई ही नहीं पड़ता था. उस के मायके वालों ने भी उसे कभी समझाने की कोशिश नहीं की. विकास ने ममता की अनुचित मांग को मानने से साफ इनकार कर दिया. लेकिन ससुराल में जा कर ममता को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अंत में वही हुआ, दोनों का तलाक हो गया. उन 8 सालों में हम ने विकास को तिलतिल मरते देखा था. वह मेरे बेटे रवि का सहकर्मी था. अकसर वह हमारे घर आ जाता था. मैं ने उस को कई बार समझाया कि वह अब पत्नी ममता का इंतजार न करे और तलाक ले ले. लेकिन वह कहता कि वह ममता को तलाक नहीं देगा, ममता को पहल करनी है तो करे. ममता को जब यह विश्वास हो गया कि विकास उस की शर्त कदापि पूरी नहीं करेगा तो उस ने विकास से अलग होने का फैसला ले लिया.

चाय पीते हुए मैं ने विकास से उस की नई पत्नी के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आंटी, मैं तो शादी करना ही नहीं चाहता था, लेकिन मां और बहन की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. आप को पता है कि उमा जिस से मैं ने शादी की है, वह एक स्कूल में टीचर है. उस के 2 बच्चे, एक लड़का और एक लड़की हैं. लड़का 12 साल का और लड़की 16 साल की है. उमा भी शादी नहीं करना चाहती थी. उमा के मांबाप तो उसे समझा कर थक गए थे, लेकिन अपने बच्चों की जिद के आगे उस ने शादी करना स्वीकार किया. जब उन बच्चों ने मुझे अपने पापा के रूप में पसंद किया, तभी हमारा विवाह हुआ. ‘‘मेरी होने वाली बेटी ने विवाह से पहले, मुझ से कई सवाल किए, पहला कि मैं उस के पहले पापा की तरह उन से मारपीट तो नहीं करूंगा. दूसरा, मुझे शराब पीने की आदत तो नहीं है? जब उसे तसल्ली हो गई तब उस ने मुझे पापा के रूप में स्वीकार करने की घोषणा की. मैं ने भी उन को बताया कि मेरे ऊपर जिम्मेदारी है, मैं उन को उतनी सुखसुविधाएं तो नहीं दे पाऊंगा, जो वर्तमान समय में उन्हें अपने नाना के घर में मिल रही हैं. मैं ने अभी बात भी पूरी नहीं की कि मेरी बेटी बोली कि उसे कुछ नहीं चाहिए, बस, पापा चाहिए. मुझे पलेपलाए बच्चे मिल गए और उन्हें पापा मिल गए.

‘‘मेरा तो कोई बच्चा है नहीं, अब इस उम्र में ऐसा सुख मिल जाए तो और क्या चाहिए. उमा भी यह सोच कर धन्य है कि उस को एक जीवनसाथी मिल गया और उस के बच्चों को पापा मिल गए. अब घर, घर लगता है. बच्चे जब मुझे पापा कहते हैं तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता है. एक बार मेरी बेटी ने मेरे जन्मदिन पर एक नोट लिख कर मेरे तकिए के नीचे रख दिया. उस में लिखा था, ‘दुनिया के बैस्ट पापा’. उसे पढ़ कर मुझे लगा कि मेरा जीवन ही सार्थक हो गया है.’’

उस ने एक ही सांस में अपने मन के उद्गार मेरे सामने व्यक्त कर दिए. ऐसा करते हुए उस के चेहरे की चमक देखने लायक थी. बातबात में जब वह बड़े आत्मविश्वास के साथ ‘मेरी बेटी’ शब्द इस्तेमाल कर रहा था, उस समय मैं सोच रही थी कि कितनी खुश होगी वह लड़की, लोग तो अपनी पैदा की हुई बेटी को भी इतना प्यार नहीं करते. मैं ने कहा, ‘‘सच में, तुम ने एक औरत और उस के बच्चों को अपना नाम दे कर उन का जीवन खुशियों से भर दिया. एक तरह से उन का नया जन्म हो गया है. तुम ने इतना बड़ा काम किया है कि जिस की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है. तुम्हें घर बसाने वाली पत्नी के साथ पापा कहने वाले बच्चे भी मिल गए. मुझे तुम पर गर्व है. कभी परिवार सहित जरूर आना.’’ उस ने मोबाइल पर सब की फोटो दिखाई और दिखाते समय उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कोई नैशनल लैवल का मैडल जीत कर आया है और दिखा रहा है.

‘‘चलता हूं, आंटीजी, बेटी को स्कूल से लेने जाना है. वह मेरा इंतजार कर रही होगी. अगली बार सब को ले कर आऊंगा…’’ और झुकते हुए मेरे पांव छू कर दरवाजे की ओर वह चल दिया. मैं उसे विदा कर के सोच में पड़ गई कि समय के साथ लोगों की सोच में कितना सकारात्मक परिवर्तन आ गया है. पहले परित्यक्ता और विधवा औरतों को कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता था, जैसे उन्होंने ही कोई अपराध किया हो. पहली बात तो उन के पुनर्विवाह के लिए समाज आज्ञा ही नहीं देता था और किसी तरह हो भी जाता तो, विवाह के बाद भी ससुराल वाले उन को मन से स्वीकार नहीं करते थे. अच्छी बात यह है कि अब बच्चे ही अपनी मां को उन के जीवन के खालीपन को भरने के लिए उन्हें दूसरे विवाह के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जैसा कि विकास के साथ घटित हुआ है. यह सब देख कर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई और आज की युवा पीढ़ी की सोच को मैं ने मन ही मन नमन करते हुए आत्मसंतुष्टि का अनुभव किया.

Hindi Family Story: महुआ

Hindi Family Story, लेखिका – प्रगति त्रिपाठी

‘‘अम्मां, तुम दादी और बड़ी मां की तरह बिंदी, सिंदूर और महावर क्यों नहीं लगातीं? चूड़ी और पायल क्यों नहीं पहनतीं?’’ 7 साल की रानी ने अपनी मां महुआ से सवाल किया.

महुआ भला उसे क्या जवाब देती. वह टालती रही और वहीं खड़ी सास और जेठानी को मनिहारिन से चूड़ी पहनते हुए देखती रही.

महुआ यह कैसे कहे कि वह विधवा है. समाज के नियमकानून विधवा औरत को साजसिंगार करने का हक नहीं देते. विधवा… यह नाम उस औरत को देते हैं, जिस का पति मर जाता है और अपने साथ ही उस की जिंदगी से साजसिंगार के साथसाथ सारे रंग भी हमेशा के लिए ले कर चला जाता है.

वह औरत न तो खुल कर हंस सकती है, न ही पर्वत्योहार का हिस्सा बन सकती है. ऐसी औरत अपनी ख्वाहिशों की पुडि़या बना कर मन के संदूक में बंद कर के बड़ा सा ताला लगा देती है और चाबी कहीं दूर सागर की गहराइयों में फेंक देती है, जिस का कभी भी पता नहीं चलता.

लेकिन है तो वह भी इनसान, तिस पर औरत. कभी उस का भी मन करता होगा कि वह मांग में सिंदूर न सही माथे पर एक छोटी बिंदी ही लगा ले, दर्जनभर चूडि़यां न सही, पर हाथों में 2-2 चूडि़यां ही पहन ले.
मांजी महुआ का दर्द जानती थीं, लेकिन समाज के नियमों के खिलाफ जाना भी ठीक नहीं समझती थीं.

परंपरा और नियमों को आगे बढ़ाने का ठेका घर की औरतों ने ही ले रखा है न. मर्दों के दबदबे वाले समाज का पोषण वही तो करती आई हैं, आगे भी करती रहेंगी.

एक जमुना ही थी, महुआ की जेठानी, जिस से महुआ का दुख देखा नहीं जाता था. वह मांजी से छिप कर महुआ का साथ देती और कहती, ‘‘छोटी, तू बिंदी लगाया कर. बिना बिंदी तेरा चेहरा बड़ा सूना लगता है.’’

इस पर महुआ कहती, ‘‘दीदी, काश, यह बात मांजी मुझ से कहतीं, तो मैं बिंदी जरूर लगाती.’’

जमुना के अपनी मांजी से बहुत लड़नेझगड़ने के बाद महुआ को रंगीन साड़ी पहनने की इजाजत मिली थी. उतने में ही महुआ संतुष्ट थी, लेकिन जमुना ने बहुत दूर की सोच रखी थी, जो न मांजी जानती थीं, न महुआ ही.

दरअसल, जमुना तो महुआ की दूसरी शादी करवाने की सोच रही थी.

तीज का त्योहार करीब था. उसी के लिए आज मनिहारिन मांजी और जमुना को चूड़ी पहनाने आई थी. यह देख कर रानी भी खुश थी, तो उसे भी प्यारीप्यारी लाल चूडि़यां पहना दी गईं, जिन्हें पहन कर वह दालान के एक कोने में खड़ी अपनी मां को दिखाने चली आई और मन में उठे सवाल भी पूछे लिए, लेकिन मां के टालने के बाद वह दौड़ कर मनिहारिन के पास जा कर बोली, ‘‘काकी, मेरी मां को भी तो चूड़ी पहना दो.’’

मासूम बच्ची की इस बात पर मनिहारिन आह भर कर रह गई. वह तो खुद यह दर्द सालों से झेल रही थी. उस के जवाब न देने पर रानी हार कर अपनी दादी से सवाल करने लगी, जिस पर दादी बिफर कर बोलीं, ‘‘सुहाग का सामान नहीं पहन सकती तेरी मां.’’

‘‘पर क्यों दादी?’’

‘‘तू नहीं समझेगी.’’

‘‘सब यही कहते हैं कि तू नहीं समझेगी, लेकिन स्कूल के मास्टर साहब तो कहते हैं कि मैं पढ़ाई में बहुत होशियार हूं. मैं हर बात जल्दी समझ जाती हूं.’’

‘‘इधर आ बिटिया, मैं बताती हूं तुझे. यह सवाल तेरे सिलेबस के बाहर का है. यह तो बड़ी क्लास के बच्चे ही समझ सकेंगे. तू अभी बहुत छोटी है बिटिया. जैसेजैसे तू बड़ी होगी, खुद ब खुद समझ जाएगी,’’ जमुना ने रानी को बहलाते हुए कहा.

‘‘बड़ी मां, आप कह रही हैं तो ठीक ही कह रही होंगी.’’

‘‘जा बिटिया, तू अपनी सहेलियों के साथ खेल,’’ जमुना ने रानी को पुचकारते हुए कहा.

रानी अपनी चूडि़यों के साथ खेलतीकूदती बाहर चली गई, लेकिन महुआ अपने कमरे में जा कर फूटफूट कर रोने लगी.

मानो कल की बात हो जब सहेलियों ने आ कर महुआ को बताया था कि बरात आ गई है. इतना सुनते ही उस के रोमरोम में बिजली सी कौंध गई थी.

‘‘महुआ, तेरा दूल्हा राजेश देखने में बहुत सजीला और रोबदार है. उस के आगे हमारे गांव के सभी लड़के पानी भरते नजर आ रहे हैं. ऐसा लड़का तुझे सचमुच कहीं नहीं मिलता,’’ महुआ की सहेलियां दूल्हे की तारीफ करते नहीं थक रही थीं और महुआ शर्म से लाल हुई जा रही थी.

चारों तरफ चहलपहल मची हुई थी. सभी बरातियों के स्वागत में लगे हुए थे. महुआ के ससुर दीनानाथ ने दहेज में एक गाय और 10,000 रुपए की डिमांड की थी, जो महुआ के पिता शांतिलाल खुशीखुशी देने को राजी हो गए थे. आखिर एक ही तो लड़की थी उन की. उन्होंने बंसवारी की एक जमीन बेच दी थी, जो कई सालों से विवादों में घिरी थी.

शांतिलाल के बेटा नहीं था, इसलिए पट्टीदारों की नजर उन की जमीनजायदाद पर थी. शांतिलाल ने सोचा कि बाद में न जाने क्या हो, अभी तो बेटी की शादी में जीभर कर खर्च कर देता हूं. उन के मनमुताबिक रिश्ता भी मिल गया था.

दीनानाथ सेना में सिपाही रह चुके थे. उन के पास 5 बीघा खेत था. छोटा परिवार था. बड़ा बेटा अनूप भी सेना में था. राजेश भी बहुत मेहनती और सुशील लड़का था, जो शहर में खाद और बीज की दुकान चलाता था.

शांतिलाल को भरोसा था कि महुआ को अपनी ससुराल में खानेपीने और पहनने की कोई कमी नहीं होगी. महुआ को खुशीखुशी विदा कर पतिपत्नी चार धाम की यात्रा पर निकल गए.

इधर महुआ भी अपनी ससुराल में धीरेधीरे रचबस गई. सासससुर, जेठजेठानी सभी उसे बहुत प्यारदुलार दे रहे थे और वह भी सब को मानसम्मान देती थी.

एक साल बाद महुआ को प्यारी सी बेटी हुई. बिलकुल रानी की तरह लगती थी वह, इसलिए उस का नाम रानी रख दिया गया. सभी उसे बहुत प्यार करते थे. राजेश तो जान छिड़कता था उस पर.

सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन रिश्तों का जामा तब बदला, जब 3 साल बाद अचानक एक सड़क हादसे में राजेश की मौत हो गई. हंसताखेलता संसार शोक की आग में धधक उठा. अब रिश्तों में पहले की तरह गरमाहट न रही.

मांजी महुआ के प्रति सख्त हो चुकी थीं और दोनों के बीच संवाद तो न के बराबर रह गया था. बस, एक जमुना ही थी, जो महुआ की परछाईं बनी हुई थी.

महुआ के मातापिता भी इस सदमे से उबर न सके और साल, 2 साल में एकएक कर उसे बीच मझधार में छोड़ कर चले गए. शांतिलाल ने जो सोचा था, आखिर हुआ वही. उन की जमीनजायदाद पट्टीदारों ने हथिया ली. महुआ अपनी बेटी का चेहरा देख कर जिंदगी के दिन काट रही थी.

राजेश के जाने के बाद उसे समझ नहीं आ रहा था कि दिनरात इतने लंबे क्यों हो गए हैं. घरद्वार सब काटने को दौड़ता था, ऊपर से मांजी की जलीकटी बातें उस के जख्म को और हरा कर देती थीं. खैर, वह भी अपना दुख, गुस्सा किस पर निकालती, इसलिए उन की कही गई बातों का महुआ कोई जवाब नहीं देती, बस चुपचाप सुन लेती.

‘‘महुआ… महुआ, दरवाजा खोलो,’’ जमुना की आवाज से महुआ की तंद्रा भंग हुई और उस ने दरवाजा खोल दिया.

‘‘यह क्या, तू फिर रोने लगी? मैं ने कितनी बार कहा है न कि तेरी आंखों में आंसू बिलकुल नहीं आने चाहिए.’’

‘‘मैं क्या करूं दीदी? यादें पीछा नहीं छोड़ती हैं. आप को याद है न 3 साल पहले तीज के दिन राजेश मेरे लिए खुद साड़ी और सिंगार का सामान ले कर आए थे. मेरा सजनासंवरना कितना भाता था उन्हें,’’ इतना कह कर महुआ फिर रोने लगी.

‘‘मैं तेरा दुख समझ सकती हूं छोटी, लेकिन अब हालात वैसे नहीं रहे, राजेश लौट कर वापस नहीं आएगा. तू भी यह बात जानती है, बस मान नहीं पा रही. इस भंवर से बाहर निकल. अपने और रानी के लिए सोच. कब तक यों ही बोझ लिए जीती रहेगी.

‘‘एक बात याद रख, चाहे तेरे लिए कोई हो या न हो, पर तेरी यह दीदी मरते दम तक तेरा साथ देगी,’’ जमुना ने दिलासा देते हुए कहा.

‘‘बस, आप के सहारे ही जिंदा हूं दीदी. मेरे लिए तो आप मांबाप, भाईबहन सबकुछ हैं. आप नहीं होतीं, तो न जाने मैं क्या कर बैठती.’’

‘‘एकदम चुप. अब ऐसीवैसी कोई बात नहीं करेगी. चल, रसोई में मेरी मदद कर. आज मेरा भाई मधुकर तीज का सिंधारा ले कर आने वाला है और साथ ही मांजी का भतीजा रोशन भी आ रहा है,’’ जमुना ने महुआ को याद दिलाते हुए कहा.

‘‘आप चिंता मत करिए दीदी, मैं रसोई संभाल लूंगी,’’ इतना कह कर महुआ मेहमानों के लिए खाना तैयार करने लगी.

तय समय पर मधुकर और रोशन पहुंच गए. अभी वे लोग दालान में बैठ कर जमुना के सासससुर से बातें कर रहे थे. कुछ देर बाद खाना खाने आंगन में पहुंचे.

मधुकर जमुना के साथसाथ महुआ के लिए भी साड़ी लाया था. वह उसे भी अपनी बहन से कम नहीं मानता था.

महुआ जैसे ही खाना परोसने आई, रोशन की आंखें उस पर टिक गईं. उस ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह महुआ से ही शादी करेगा. हालांकि, महुआ पर उस की नजर बहुत पहले से ही थी. महुआ भी रोशन के इरादे भांप गई थी.

रोशन का चालचलन ठीक नहीं था. एक साल पहले ही उस की पत्नी की कैंसर से मौत हो गई थी. उस की
2 बेटियां और एक बेटा था, लेकिन उसे जिम्मेदारी का बिलकुल भी अहसास नहीं था.

खाना खाने के बाद रोशन सीधा दालान में गया और अपनी बूआ के पास बैठ गया.

‘‘बेटा, तुम्हारे बालबच्चे कैसे हैं?’’

‘‘ठीक ही हैं बूआ. गौरी के जाने के बाद जिंदगी वीरान सी हो गई है. अब तो दुखसुख बांटने वाला भी कोई नहीं है. मुझ से तो अकेले घरगृहस्थी नहीं संभाली जा रही है बूआ,’’ घडि़याली आंसू बहाते हुए रोशन अपना दुखड़ा रोने लगा.

‘‘मैं तुम्हारा दुख समझती हूं बेटा. एक बात कहूं, तुम दूसरा ब्याह क्यों नहीं कर लेते? इस से तुम्हारी गृहस्थी पटरी पर लौट आएगी.’’

‘‘उस के लिए लड़की भी तो मिलनी चाहिए न बूआ. मुझे तो कोई ऐसी समझदार लड़की चाहिए, जो मेरी घरगृहस्थी के साथसाथ बच्चों की भी जिम्मेदारी उठाए, उन्हें गौरी जैसा प्यार दे.’’

‘‘हां, यह बात तो सही कही तू ने. ऐसी कोई लड़की तेरी नजर में है तो बता?’’

‘‘मेरी नजर में एक ऐसी लड़की तो है,’’ रोशन बोला.

‘‘कौन है? बता मुझे, मैं तेरा रिश्ता ले कर उस के घर जाऊंगी.’’

‘‘तुम बुरा तो नहीं मानोगी न…?’’ रोशन ने सवाल किया.

‘‘मैं क्यों बुरा… कहीं तेरा मतलब महुआ से तो नहीं है? सोचना भी मत उस के बारे में,’’ महुआ की सास गुस्से से लाल हो गईं.

‘‘अरे बूआ, तुम तो नाराज हो गईं. पहले ठंडे दिमाग से मेरी बात तो सुनो. अगर तुम्हें मेरी बात गलत लगे, तो दस जूते मार कर भगा देना.’’

‘‘आज तुम हो, फूफाजी हैं, तो महुआ के सिर पर तुम दोनों का हाथ है, लेकिन कल को तुम दोनों के न रहने पर महुआ और रानी का क्या होगा? इस बारे में कभी सोचा है?

‘‘औरत को समाज में इज्जत से जीने के लिए पति की छत्रछाया की जरूरत होती है, यह बात तुम्हें भी पता है. अगर कल को कोई ऊंचनीच हो जाए, तो क्या करोगी तुम?

‘‘अगर महुआ मेरे घर की बहू बन कर आएगी तो रानी की भी जिंदगी संवर जाएगी और घर की इज्जत घर में ही रह जाएगी. बोलो, अगर मैं ने कोई गलत बात कही हो तो…?’’ रोशन अपनी बूआ को दुनियादारी की घुट्टी पिलाता गया और वे उसे गटकती गईं.

उस समय मांजी रोशन की बात का कोई जवाब नहीं दे पाईं. शाम को मधुकर और रोशन दोनों चले गए. जातेजाते रोशन अपनी बूआ से कह गया कि वे इस बारे में सोचें और आराम से बताएं.

‘मैं ने तो सोचा ही नहीं था कि मेरे बाद महुआ और रानी का क्या होगा? देवरानी और जेठानी में कब बनी है, आज नहीं तो कल अलग हो ही जाएंगी. फिर दूसरे घर तो मैं कभी ब्याह न करूं.

‘रोशन अपना है. उस ने जो भी बात कही, वह बिलकुल सही कही. मेरे दिमाग में पहले यह खयाल क्यों नहीं आया. आज रोशन ने मेरी आंखें खोल दी हैं…’ मांजी यही सोचती रहीं.

रोशन की बात सुन कर मांजी चिंता में पड़ गई थीं. नींद आंखों से कोसों दूर चली गई थी. वे रातभर करवट बदलती रहीं और महुआ के बारे में सोचती रहीं.

इधर महुआ रोशन की हवसभरी नजरों को पहचान चुकी थी. उस ने इस बारे में जमुना को बताया. जमुना रोशन को अच्छे से जानती थी. रोशन ने कई बार जमुना के साथ भी छेड़खानी की थी.

जब एक बार जमुना मांजी से इस बारे में बोली, तब मांजी ने डांट दिया था, उसे, क्योंकि उन की नजरों में रोशन ने अपनी छवि बहुत अच्छी बना रखी थी. मांजी का लाड़ला जो था.

जमुना ने फिर इस बात का जिक्र किसी से नहीं किया. यहां तक कि अपने पति से भी नहीं, लेकिन अब वह रोशन से बिलकुल नहीं डरती थी. एकदो बार मजाकमजाक में ही जमुना ने उस के कान बहुत जोरों से मसले थे. तब से वह जमुना से नहीं उलझता था.

जमुना ने कहा, ‘‘जब तक मैं हूं, तब तक तुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं तेरे साथ ढाल बन कर खड़ी रहूंगी.’’

अगले दिन मांजी ने इस बाबत अपने पति से बात की. उन्होंने भी इस प्रस्ताव के लिए हामी भर दी. अब बारी महुआ से इस बारे में बात करने की थी.

मांजी जानती थीं कि महुआ जमुना की कही कोई बात नहीं टालती, इसलिए वे पहले जमुना को अपने पाले में लेने लगीं, ‘‘जमुना, इधर आ बहू. तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

जमुना आटा गूंद रही थी. जल्दी से हाथ धो कर वह आई और बोली, ‘‘क्या बात है मांजी?’’

‘‘महुआ के बारे में तुझ से बात करनी है. बैठ यहां. देख, अब मेरी और तेरे ससुर की तबीयत ठीक नहीं रहती. अब हमारी उम्र हो रही है और न जाने कब सांसों की यह लड़ी टूट जाए, इसलिए हम अपने जीते ही महुआ का दूसरा ब्याह कर देना चाहते हैं.’’

जिस बात के लिए मांजी खिलाफ थीं, आज वही बात उन के मुंह से सुन कर जमुना दंग रह गई. एक बार उस ने इस बारे में मांजी से बात करनी चाही थी, तब उन्होंने उसे बहुत खरीखोटी सुनाई थी, लेकिन अब मांजी में आए इस बदलाव को देख कर जमुना बहुत खुश हुई और कहने लगी, ‘‘बहुत अच्छे विचार है मांजी, लेकिन कोई लड़का भी तो मिलना चाहिए न…’’

‘‘लड़का मिल गया है, तभी तो तुझ से इस बारे में बात कर रही हूं. अब बस महुआ तैयार हो जाए.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘अपना रोशन, भला उस से अच्छा लड़का महुआ को और कहां मिलेगा? और तो और, ब्याह हो कर कहीं दूर न जा कर अपने ही घर रहेगी.’’

रोशन का नाम सुनते ही जमुना के होश उड़ गए. वह समझ गई कि कल रोशन ने मांजी को जरूर बरगलाया है.

‘‘मांजी, अगर आप रोशन के बदले किसी और का नाम लेतीं, तो मैं एक बार सोचती, लेकिन रोशन से महुआ की शादी तो बिलकुल नहीं होने दूंगी.’’

‘‘ऐसी क्या बुराई है उस में?’’

‘‘मैं पहले भी आप को उस की करतूत बता चुकी हूं, लेकिन आप ने कभी मेरी बात नहीं सुनी.’’

‘‘अब वह बदल चुका है बहू. उस के भी बालबच्चे हैं. सब से बड़ी बात यह है कि महुआ अपने ही घर में रहेगी.’’

‘‘मुझे नहीं लगता. न ही मुझे उस पर रत्तीभर भरोसा है.’’

‘‘ठीक है, अगर तू महुआ से बात नहीं करेगी, तो मैं खुद कर लूंगी और वह मेरी बात कभी नहीं टालेगी.’’

‘‘महुआ… बहू…’’ महुआ अपने नाम के साथ बहू सुनते ही चौंक पड़ी, क्योंकि राजेश के जाने के बाद मांजी ने उसे कभी बहू कह कर नहीं बुलाया था.

‘‘जी मांजी,’’ महुआ ने कहा.

‘‘मुझे तुझ से बहुत जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हां, कहिए न…’’

‘‘मैं रोशन के साथ तेरा दूसरा ब्याह कराना चाहती हूं. आखिर कब तक जिंदा रहेंगे हम दोनों. तेरे बारे में भी तो सोचना होगा,’’ बिना कोई लागलपेट के मांजी ने अपनी बात कह डाली.

आखिर महुआ का डर सच में बदल गया. मगर, उस ने बड़ी मजबूती से कहा, ‘‘मुझे पता है कि आप को मेरी और रानी की चिंता लगी रहती है, लेकिन मैं रोशन तो क्या किसी से भी शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘दोबारा घर बसाना क्या इतना आसान होता है? किसी अनजान को पति के रूप में स्वीकार करना इतना आसान होता है, जबकि पति की छवि दिल में बसी हो? नहीं… मेरे लिए तो बिलकुल नहीं.

‘‘मैं ने सिर्फ राजेशजी से प्यार किया है और इस जन्म में मैं सिर्फ राजेशजी की पत्नी कहलाना पसंद करूंगी. आप लोग मेरा परिवार हैं. मैं आप लोगों को छोड़ कर भला कैसे जा सकती हूं. मेरा मकसद सिर्फ रानी को पढ़ालिखा कर उस का भविष्य संवारना है और मुझे कुछ नहीं चाहिए,’’ महुआ बोली.

‘‘माना मैं तुम्हारे प्रति हमेशा सख्त रही हूं, लेकिन तुम्हारे भले के लिए… यह दुनिया और यह समाज हमें जीने नहीं देते बहू. क्या भरोसा कल को जमुना भी तुम्हारा साथ न दे. समय बदलते देर नहीं लगती, इसलिए मैं जीतेजी तुम दोनों का भविष्य सुरक्षित कर देना चाहती हूं,’’ मांजी बोलीं.

‘‘दुनिया का क्या है मांजी, वह तो अच्छे को भी बुरा कह देती है. क्या पता कल को रोशन से मेरी न निभे या जितनी खुश और सुरक्षित मैं यहां महसूस करती हूं, वहां न कर सकूं. रही बात जमुना दीदी की, तो उन पर मुझे सब से ज्यादा भरोसा है.

‘‘मुझे सिर्फ आप का प्यार और साथ चाहिए. आप मुझ से बात कीजिए, पराया मत समझिए. मैं मानती हूं कि आप ने अपना बेटा खोया है, मैं ने भी तो अपना सबकुछ खो दिया है.

‘‘मेरे जैसी न जाने कितनी औरतें हैं, जो परिवार से मदद न मिलने के चलते जिंदगीभर तकलीफ उठाती हैं और जिन का फायदा रोशन जैसे लोग उठाते हैं,’’ महुआ बोली.

‘‘बस कर, बहुत बड़ी भूल हुई मुझ से, जो तेरे साथ परायों जैसा बरताव किया. आज से जमुना ही नहीं तेरी मांजी भी तेरे साथ हैं,’’ महुआ के दिल में अपने परिवार और बेटे के लिए इतना प्यार और सम्मान देख कर मांजी मोम की तरह पिघल गईं.

मांजी ने आज महुआ को बहू से बेटी बना लिया था. महुआ बच्चों की तरह उन से लिपट कर रोने लगी.

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