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Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

Exam Cheating : मिशन छिपकली- कोई पेपर में फेल नहीं हो सकता

Exam Cheating.45 साल की ढलती उम्र में हमारी जुड़वां संतानें हुई थीं. मुझे नन्हींमुन्नी गुडि़या का मनचाहा उपहार मिला था और वाइफ को उन का दुलारा गुड्डा, लेकिन वाइफ को बिटिया की भी चाहत थी. वे बिटिया को साइंटिस्ट बनाना चाहती थीं. मुझे बेटे के साथ नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलने की तमन्ना थी. हम ने महल्ले में मिठाई बंटवाई. अनाथालय के बच्चों के लिए मिठाईनमकीन के पैकेट और कपड़ों के उपहार भिजवाए. हमारी खुशी का ठिकाना न था.

हम ने अपने बच्चों को भरपूर प्यार दिया. उन की सभी इच्छाएं पूरी कीं. कभी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया. मोबाइल, लैपटौप, स्कूटी, बाइक, कार, ब्रैंडेड ड्रैसेज, ट्यूटर सबकुछ उन के पास थे. दोनों अब बड़े हो चुके थे. 9वीं कक्षा की परीक्षा दे चुके थे.

‘‘पापा, एडवांस बुकिंग करानी है,’’ बिटिया ने मुझ से रिक्वैस्ट की.

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‘‘हांहां, क्यों नहीं, ‘संजू’ लगी है. यह फिल्म काफी पसंद की जा रही है,’’ मैं ने बिटिया का हौसला बढ़ाया. मैं खुद फिल्म देखने के मामले में आगे रहता हूं.

‘‘पापा, अगले साल हम दोनों 10वीं बोर्ड की परीक्षा देंगे. परीक्षा में हैल्प के लिए मिशन की बुकिंग चल रही है,’’ बिटिया ने मुझे बताया.

‘‘बोर्ड की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है. सेहत पर बुरा असर पड़ता है. सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी में एडवांस बुकिंग कराना सही होगा. अभी औफर चल रहा है,’’ साहबजादे ने मुझे समझाया.

अपनी समझदानी थोड़ी छोटी है. पूरी बात समझ आने में थोड़ी देर लगी. अपनी संतान को 10वीं में नकल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई स्पैशल चिटों की जरूरत होगी. मुझे इस संबंध में जानकारी कम थी.

‘‘वैज्ञानिक बनाने के लिए अच्छे कालेज में दाखिला दिलाना होगा. 10वीं कक्षा में अच्छे मार्क्स की जरूरत होगी,’’ वाइफ ने चिंता जताई. बच्चों को उन से झिझक नहीं थी. उन को सबकुछ पता था.

औलाद के भविष्य की चिंता मुझे भी थी. वैज्ञानिक बनने के लिए अच्छे कालेज में दाखिले की जरूरत भी थी. अच्छे कालेज में दाखिले के लिए कक्षा 10 में 90 प्रतिशत मार्क्स आने भी जरूरी थे.

परिवार के साथ मैं सर्विस प्रोवाइडर एजेंसी से मिला. उन से रेट्स और औफर्स की जानकारी ली.

‘‘साइंस के एक पेपर और मैथ्स के लिए 8 हजार रुपए तथा दूसरे पेपरों के लिए 5 हजार रुपए. हमारी एजेंसी प्रीमियर एजेंसी है. एडवांस बुकिंग में 25 प्रतिशत की छूट दी जा रही है. ये रेट केवल प्रश्नोत्तर चिट के लिए हैं. और हां, मिशन छिपकली के लिए डबल रेट से रुपए देने होंगे. इस के अलावा दूसरी सेवाएं तथा कौम्बो औफर भी हैं,’’ प्रीमियर एजेंसी के रिसैप्शन पर तैनात मैडम ने जानकारी दी.

‘‘यह मिशन छिपकली क्या बला है?’’ मैं ने पूछ ही लिया. वैसे कुछकुछ अंदाजा हो रहा था.

पिछले महीने मैं ने पाटलीपुत्र सुसंवाद समाचारपत्र में खबर पढ़ी थी कि ईस्टर्न इंडिया के महानगरों के चिडि़याघरों से बहुत ही खास प्रजाति की कुछ छिपकलियों की चोरी हो गई थी. ये प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर थीं. इस इमारत की दीवार पर कई मानव आकृतियां चिपकी थीं. मैं ने बाद में इस न्यूज को चश्मा लगा कर पढ़ा था.

‘‘मिशन छिपकली के अंतर्गत एजेंसी बहुमंजिली इमारतों में परीक्षार्थियों को स्पैशल चिट उपलब्ध कराती है. पुलिस, केंद्र अधीक्षक, न्यूजपेपर रिपोर्टर सब को मैनेज करना मुश्किल जौब है. मिशन छिपकली के लिए औनजौब ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती है. भगदड़ में दुर्घटना भी हो जाती है. परीक्षा केंद्र ग्राउंडफ्लोर पर होने की हालत में भुगतान की गई रकम का 50 प्रतिशत लौटा दिया जाता है. अप्रत्याशित और कठिन परिस्थितियों के लिए 2 साल की वारंटी का प्रावधान रखा गया है,’’ रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मिशन छिपकली के टैरिफ वाउचर्स का बखान किया.

हम ने शहर की दूसरी सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों से भी संपर्क किया. गोल्डन सर्विस एजेंसी में बालिकाओं के लिए फीस में 30 प्रतिशत की छूट का औफर था. लेकिन एजेंसी की बहुमंजिली सर्विस काफी महंगी थी.

बैस्ट सर्विस प्रोवाइडर ने रजिस्टर्ड परीक्षार्थियों के लिए शहरी इलाकों से परीक्षा केंद्रों तक ले जाने के लिए वीडियो सुविधायुक्त फ्री बस का औफर दिया था.

इन सभी एजेंसियों की शाखाएं राज्य के सभी छोटेबड़े शहरों में होने की भी जानकारी मिली. एजेंसीज ने प्रश्नोत्तर के लिए राजधानी व राज्य के दूसरे शहरों के नामीगिरामी स्कूलों के शिक्षकों व खास कोचिंग संस्थानों के विशेषज्ञों से भी अपने जुड़े होने की बात कही.

इस संपर्क मुहिम के दौरान कई दूसरी सर्विसेज की मौजूदगी के बारे में जाननेसमझने का मौका मिला. उन की सेवाओं की जानकारी मिली. कई खुलासे हुए. ये सुविधाएं परीक्षार्थियों, अभिभावकों के व्यापक हित में हैं, इस का भी ज्ञान हुआ.

मुझे इस उद्योग की पूरी जानकारी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि कभी शिक्षा का केंद्र रहे अपने पुराने शहर में कक्षा-10 स्पैशल चिट सप्लाई के धंधे ने बड़े कारोबार का दर्जा हासिल कर लिया है और इस कारोबार से बड़े घराने भी आकर्षित हो रहे हैं.

परीक्षाएं लंबे समय तक चलती हैं. इस दौरान खेलकूद, मूवी, मौजमस्ती, गेम्स, फेसबुक, चैटिंग, यारदोस्तों से गपें और सभी खिलंदड़ी व मनोरंजक गतिविधियां बंद हो जाती हैं. महीनों किताबों, नोट्स में घुसे रहने से बोरियत होती है. टैंशन से सेहत खराब हो जाती है. ऐसे में परीक्षाओं से जुड़ी सर्विसेज एजेंसियां हमारी आम दिनचर्या के साथसाथ ही कैरियर विकल्पों को आगे बढ़ाने में सहायक होती हैं.

इन सुविधाओं से गुप्तरूप से जुड़े शिक्षकों व सहायक कर्मियों को होने वाली कमाई, उन को कठिन हालात से उबारने में सहायक होती है. राज्य में शिक्षकों व कर्मचारियों के वेतन भुगतान की समस्या हमेशा बनी रहती है. त्योहार के महीनों में भी वेतन भुगतान नहीं हो पाता है. इस तरह सर्विस एजेंसीज उन की वित्तीय समस्याओं का समाधान भी करती हैं.

अभिभावक सर्विस एजेंसीज की बुकिंग के बाद बेफिक्र हो जाते हैं. उन्हें बहुमंजिली इमारतों पर छिपकली बन कर चिपकने से मुक्ति मिल जाती है. अच्छे कालेजों में दाखिले की राह आसान हो जाती है. शिक्षक उत्तरपुस्तिका पर, अपने द्वारा तैयार उत्तर पा कर, मार्क्स लुटाते हैं. एजेंसी विभिन्न कोलेजों व तकनीकी संस्थानों में ऐडमिशन भी दिलवाती है.

‘‘विशिष्ट संस्थानों में ऐडमिशन के लिए आप हमारी एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं,’’ ब्राइट सर्विस एजेंसी की सुंदर रिसैप्शनिस्ट ने मुसकरा कर मुझे बताया.

कई स्रोतों से जानकारी मिली कि सर्विस एजेंसीज अपनी सीक्रेट सर्विस के तहत राष्ट्रीय स्तर व राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रश्नपत्र, उत्तर के साथ उपलब्ध कराती हैं. प्रश्नपत्र लीक कराने के लिए कई वैज्ञानिक राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है. एडवांस बुकिंग कराने से पहले ठोकबजा कर पूरी तसल्ली करने की अपनी पुरानी आदत रही है. सो, मैं ने छानबीन की, कई एजेंसियों से जानकारी ली-

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‘‘हमारी एजेंसी एक सर्विस एजेंसी है. यह जनसुविधाएं मुहैया कराती है.’’

‘‘अभिभावकों के हितों की सुरक्षा का काम कर रहे हैं. उन के सपने पूरे हों, इस के लिए कोशिश जारी है.’’

‘‘हमारी इंडस्ट्री बेरोजगारों को रोजगार देती है.’’

‘‘लंबे समय तक पूरी रात किताबों से चिपके रहने से गरदन अकड़ जाती है. ओनली बुक्स ऐंड नो प्ले मेक्स पप्पू ए डल बौय इस का हमारे पास कारगर इलाज है.’’

‘‘नाकामी से जूझते हुए बच्चे कई बार गलत फैसले भी ले लेते हैं. हमारी एजेंसी उन्हें कामयाबी दिलाने का काम करती है.’’

अब मुझे पूरी तसल्ली हो चुकी थी. स्पैशल चिट बनाना, बहुमंजिली इमारतों की दीवार से चिपकना मेरे बूते से बाहर की बात थी. लंबी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा से लंबी जुदाई बच्चों के लिए तकरीबन नामुमकिन था. मिशन छिपकली मुझे जंच रही थी. Exam Cheating

Story in Hindi : अपने पराए, पराए अपने

Story in Hindi . पार्किंग में कार खड़ी कर के मैं दफ्तर की ओर बढ़ ही रहा था कि इतने में तेजी से चलते हुए वह आई और ‘भाई साहब’ कहते हुए मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो गई. उस की गोद में दोढ़ाई साल की एक बच्ची भी थी. एक पल को तो मैं सकपका गया कि कौन है यह? यहां तो दूरदराज के रिश्ते की भी मेरी कोई बहन नहीं रहती. मैं अपने दिमाग पर जोर डालने लगा.

मुझे उलझन में देख कर वह बोली, ‘‘क्या आप मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं? मैं लाजवंती हूं. आप की बहन लाजो. मैं तो आप को देखते ही पहचान गई थी.’’ मैं ने खुशी के मारे उस औरत की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘अरी, तू है चुड़ैल.’’

मैं बचपन में उसे लाड़ से इसी नाम से पुकारता था. सो बोला, ‘‘भला पहचानूंगा कैसे? कहां तू बित्ती भर की थी, फ्रौक पहनती थी और अब तो तू एक बेटी की मां बन गई है.’’

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मेरी बातों से उस की आंखें भर आईं. मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी, इस के बावजूद मैं ने उसे घर ले चलना ही ठीक समझा. वह कार में मेरी साथ वाली सीट पर आ बैठी. रास्ते में मैं ने गौर किया कि वह साधारण थी. सूती साड़ी पहने हुए थी. मामूली से गहने भी उस के शरीर पर नहीं थे. सैंडल भी कई जगह से मरम्मत किए हुए थे.

बातचीत का सिलसिला जारी रखने के लिए मैं सब का हालचाल पूछता रहा, मगर उस के पति और ससुराल के बारे में कुछ न पूछ सका. लाजवंती को मैं बचपन से जानता था. वह मेरे पिताजी के एक खास दोस्त की सब से छोटी बेटी थी. दोनों परिवारों में बहुत मेलजोल था.

हम सब भाईबहन उस के पिताजी को चाचाजी कहते थे और वे सब मेरे पिताजी को ताऊजी. अम्मां व चाची में खूब बनती थी. दोनों घरों के मर्द जब दफ्तर चले जाते तब अम्मां व चाची अपनी सिलाईबुनाई ले कर बैठ जातीं और घंटों बतियाती रहतीं.

हम बच्चों के लिए कोई बंधन नहीं था. हम सब बेरोकटोक एकदूसरे के घरों में धमाचौकड़ी मचाते हुए खोतेपीते रहते. पिताजी ने हाई ब्लडप्रैशर की वजह से मांस खाना व शराब पीना बिलकुल छोड़ दिया था. वैसे भी वे इन चीजों के ज्यादा शौकीन नहीं थे, लेकिन चाचाजी खानेपीने के बेहद शौकीन थे.

अकसर उन की फरमाइश पर हमारे यहां दावत हुआ करती. इस पर अम्मां कभीकभी पिताजी पर झल्ला भी जाती थीं कि जब खुद नहीं खाते तो दूसरों के लिए क्यों इतना झंझट कराते हो. तब पिताजी उन्हें समझा देते, ‘क्या करें बेचारे पंडित हैं न. अपने घर में तो दाल गलती नहीं, हमारे यहां ही खा लेते हैं. तुम्हें भी तो वे अपनी सगी भाभी की तरह ही मानते हैं.’

मेरे पिताजी ऐक्साइज इंस्पैक्टर थे और चाचाजी ऐजूकेशन इंस्पैक्टर. चाचाजी मजाक में पिताजी से कहते, ‘यार, कैसे कायस्थ हो तुम… अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो पानी की जगह शराब ही पीता.’ तब पिताजी हंसते हुए जवाब देते, ‘लेकिन गंजे को खुदा नाखून देता ही कहां है…’

इसी तरह दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे कि अचानक न जाने क्या हुआ कि चाचाजी नौकरी से सस्पैंड हो गए. कई महीनों तक जांच होती रही. उन पर बेईमानी करने का आरोप लगा था. एक दिन वे बरखास्त कर दिए गए. बेचारी चाची पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा. 2 बड़ी लड़कियों की तो शादी हो चुकी थी, पर 3 बच्चे अभी भी छोटे थे. सुरेंद्र 8वीं, वीरेंद्र 5वीं व लाजो चौथी जमात में पढ़ रही थी.

चाचाजी ने जोकुछ कमाया था, वह जी खोल कर मौजमस्ती में खर्च कर दिया था. आड़े समय के लिए चाचाजी ने कुछ भी नहीं जोड़ा था. चाचाजी को बहुत मुश्किल से नगरनिगम में एक छोटी सी नौकरी मिली. जैसेतैसे पेट भरने का जुगाड़ तो हुआ, लेकिन दिन मुश्किल से बीत रहे थे. वे लोग बढि़या क्वार्टर के बजाय अब छोटे से किराए के मकान में रहने लगे. चाची को चौकाबरतन से ले कर घर का सारा काम करना पड़ता था.

लाड़प्यार में पले हुए बच्चे अब जराजरा सी चीजों के लिए तरसते थे. दोस्ती के नाते पिताजी उस परिवार की ज्यादा से ज्यादा माली मदद करते रहते थे.

समय बीतता गया. चाचाजी के दोनों लड़के पढ़ने में तेज थे. बड़े लड़के को बीए करने के बाद बैंक में नौकरी मिल गई और छोटे बेटे का मैडिकल कालेज में दाखिला हो गया. मगर लाजो का मन पढ़ाई में नहीं लगा. वह अकसर बीमार रहती थी. वह बेहद चिड़चिड़ी और जिद्दी भी हो गई थी और मुश्किल से 8वीं जमात ही पास कर पाई.

फिर पिताजी का तबादला बिलासपुर हो गया. मैं भी फोरैस्ट अफसर की ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया. कुछ अरसे के लिए हमारा उन से संपर्क टूट सा गया. फिर न पिताजी रहे और न चाचाजी. हम लोग अपनीअपनी दुनिया में मशगूल हो गए. कई सालों के बाद ही इंदौर वापस आना हुआ था.

शाम को जब मैं दफ्तर से घर पहुंचा तो देखा कि लाजो सब से घुलमिल चुकी थी. मेरे दोनों बच्चे ‘बूआबूआ’ कह कर उसे घेरे बैठे थे और उस की बेटी को गोद में लेने के लिए उन में होड़ मची थी. मेरी एकलौती बहन 2 साल पहले एक हादसे में मर गई थी, इसलिए मेरी बीवी उमा भी ननद पा कर खुश हुई.

खाना खाने के बाद हम लोग उसे छोड़ने गए. नंदानगर में एक चालनुमा मकान के आगे उस ने कार रुकवाई. मैं ने चाचीजी के पैर छुए, पर वे मुझे पहचान न पाईं. तब लाजो ने मुझे ढूंढ़ निकालने की कहानी बड़े जोश से सुनाई. चाचीजी मुझे छाती से लगा कर खुश हो गईं और रुंधे गले से बोलीं, ‘‘अच्छा हुआ बेटा, जो तुम मिल गए. मुझे तो रातदिन लाजो की फिक्र खाए जाती है. दामाद नालायक निकला वरना इस की यह हालत क्यों होती.

क सहन करते बना, यह वहीं रही. फिर यहां चली आई. दोनों भाइयों को तो यह फूटी आंख नहीं सुहाती. अब मैं करूं तो क्या करूं? जवान लड़की को बेसहारा छोड़ते भी तो नहीं बनता. ‘‘बेटा, इसे कहीं नौकरी पर लगवा दो तो मुझे चैन मिले.’’

सुरेंद्र भी इसी शहर में रहता था. अब वह बैंक मैनेजर था. एक दिन मैं उस के घर गया. उस ने मेरी बहुत खातिरदारी की, लेकिन वह लाजो की मदद के नाम पर टस से मस नहीं हुआ. लाजवंती का जिक्र आते ही वह बोला, ‘‘उस का नाम मत लीजिए भाई साहब. वह बहुत तेज जबान की है. वह अपने पति को छोड़ आई है.

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‘‘हम ने तो सबकुछ देख कर ही उस की शादी की थी. उस में ससुराल वालों के साथ निभाने का ढंग नहीं है. माना कि दामाद को शराब पीने की लत है, पर घर में और लोग भी तो हैं. उन के सहारे भी तो रह सकती थी वह… घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?’’ सुरेंद्र की बातें सुन कर मैं अपना सा मुंह ले कर लौट आया.

मैं बड़ी मुश्किल से लाजो को एक गांव में ग्रामसेविका की नौकरी दिला सका था. चाचीजी कुछ दिन उस के पास रह कर वापस आ गईं और अपने बेटों के साथ रहने लगीं.

मेरा जगहजगह तबादला होता रहा और तकरीबन 15 साल बाद ही अपने शहर वापस आना हुआ. एक दिन रास्ते में लाजो के छोटे भाई वीरेंद्र ने मुझे पहचान लिया. वह जोर दे कर मुझे अपने घर ले गया. उस ने शहर में क्लिनिक खोल लिया था और उस की प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही थी.

लाजो का जिक्र आने पर उस ने बताया कि उस की तो काफी पहले मौत हो गई. यह सुनते ही मुझे धक्का लगा. उस का बचपन और पिछली घटनाएं मेरे दिमाग में घूमने लगीं. लेकिन एक बात बड़ी अजीब लग रही थी कि मौत की खबर सुनाते हुए वीरेंद्र के चेहरे पर गम का कहीं कोई निशान नहीं था. मैं चाचीजी से मिलने के लिए बेताब हो उठा. वे एक कमरे में मैलेकुचैले बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. अब वे बहुत कमजोर हो गई थीं और मुश्किल से ही उठ पाती थीं. आंखों की रोशनी भी तकरीबन खत्म हो चुकी थी.

मैं ने अपना नाम बताया तभी वे पहचान सकीं. मैं लाजो की मौत पर दुख जाहिर करने के लिए कुछ बोलने ही वाला था कि उन्होंने हाथ पकड़ कर मुझे अपने नजदीक बैठा लिया. वे मेरे कान में मुंह लगा कर धीरे से बोलीं, ‘‘लाजो मरी नहीं है बेटा. वह तो इसी शहर में है. ये लोग उस के मरने की झूठी खबर फैला रहे हैं. तुम ने जिस गांव में उस की नौकरी लगवा दी थी, वहीं एक ठाकुर साहब भी रहते थे. उन की बीवी 2 छोटेछोटे बच्चे छोड़ कर मर गई. गांव वालों ने लाजो की शादी उन से करा दी.

‘‘लाजो के अब 2 बेटे भी हैं. वैसे, अब वह बहुत सुखी है, लेकिन एक बार उसे अपनी आंखों से देख लेती तो चैन से मरती. ‘‘एक दिन लाजो आई थी तो वीरेंद्र की बीवी ने उसे घर में घुसने तक नहीं दिया. वह दरवाजे पर खड़ी रोती रही. जातेजाते वीरेंद्र से बोली थी कि भैया, मुझे अम्मां से तो मिल लेने दो. लेकिन ये लोग बिलकुल नहीं माने.’’

लाजो की यादों में डूब कर चाचीजी की आंखों से आंसू बहने लगे थे. वे रोतेरोते आगे बोलीं, ‘‘बताओ बेटा, उस ने क्या गलत किया? उसे भी तो कोई सहारा चाहिए था. सगे भाई हो कर इन दोनों ने उस की कोई मदद नहीं की बल्कि दरदर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. तुम्हीं ने उस की नौकरी लगवाई थी…’’

तभी मैं ने महसूस किया कि सब की नजरें हम पर लगी हुई हैं. मैं उस जगह से फौरन हट जाना चाहता था, जहां अपने भी परायों से बदतर हो गए थे. मैं ने मन ही मन तय कर लिया था कि लाजो को ढूंढ़ निकालना है और उसे एक भाई जरूर देना है. Story in Hindi

Romantic Story : नो बौल विद फ्री हिट : प्यार की सच्ची कहानी

Romantic Story. कोलकाता से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समीर ने कुछ  ही दिन पहले नौकरी जौइन की थी. वह वहां के गार्डन रीच वर्कशौप में ट्रेनिंग ले रहा था जो रक्षा मंत्रालय के अधीन भारत सरकार का एक उद्यम है. वहां जहाज निर्माण से ले कर उन के रखरखाव की भी सुविधा है.

कोलकाता के मटियाबुर्ज महल्ला में स्थित गार्डन रीच वर्कशौप देश का जहाज बनाने का प्रमुख कारखाना है. यह मुख्य शहर से दूर है. समीर झारखंड के धनबाद शहर का रहने वाला है, जिसे कोल कैपिटल औफ इंडिया भी कहा जाता है. यही उस की एक साल की ट्रेनिंग थी. कोलकाता में वह धर्मतल्ला में एक कमरे के फ्लैट में एक अन्य युवक के साथ शेयर कर के रहता था.

मटियाबुर्ज धर्मतल्ला से लगभग 13 किलोमीटर दूर है. इस का भी एक इतिहास है, अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने अंगरेजों के चंगुल से भाग कर यहीं आ कर शरण ली थी. मटियाबुर्ज बहुत गंदा इलाका था और वहां मुख्यता: अनस्किल्ड लेबर ही रहते थे. ज्यादातर मजदूर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आते हैं.

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समीर वर्कशौप जाने के लिए फ्लैट से थोड़ी दूर पैदल चल कर धर्मतल्ला बस स्टौप से सुबह 8 बजे की बस पकड़ता था. 9 बजे तक उसे औफिस पहुंचना होता था. उस के फ्लैट से कुछ दूरी पर स्थित एक फ्लैट से एक युवती भी रोज उसी बस को पकड़ती थी.

शुरू में तो समीर को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन लगातार एक ही स्टैंड से रोज बस पकड़ने, एक ही बस में आनेजाने से समीर का उस युवती के प्रति खासा आकर्षण हो गया था.

वैसे, दोनों में कभी कोई बातचीत नहीं हुई थी, पर कभीकभी नजरें चुरा कर समीर उसे देख लेता था. वह गेहुएं रंग के चेहरे वाली भोलीभाली युवती थी. कभीकभी भीड़ के कारण यदि उसे सीट नहीं मिलती तो वह उस युवती के बगल वाली लेडीज सीट पर जा बैठता था. तब वह युवती थोड़ा और सिमट कर खिड़की से बाहर देखने लगती थी. कभी वह उसे देखती तो समीर झट से अपनी आंखें दूसरी ओर फेर लेता.

समीर उस से बातचीत करना चाहता था पर खुद पहल न कर पाया. उस युवती ने भी उस से आगे बढ़ कर कभी हायहैलो तक न की.

एक दिन अचानक बसों की हड़ताल हो गई. सुबह तो समीर और उस युवती को बस मिल गई थी, पर लौटते वक्त बसें नहीं चल रही थीं. तो समीर अपने बौस की कार से घर आ रहा था. कंपनी की गाड़ी थी, ड्राइवर चला रहा था. कार में पीछे की सीट पर समीर अपने बौस और कंपनी के एक और अफसर के साथ बैठा था तभी समीर ने खिद्दीरपुर बस स्टौप पर उस युवती को देखा. पहले तो उसे संकोच हुआ पर उस ने साहस कर बौस से उस युवती को लिफ्ट देने की विनती की.

बौस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई चक्कर चल रहा है क्या?’’

समीर बोला, ‘‘नो सर, मैं तो उस का नाम भी नहीं जानता. बस, काफी दिनों से हम दोनों एक ही बस पकड़ते हैं. आज तो उसे बस मिलने से रही और टैक्सी की भी डिमांड इतनी ज्यादा है कि वह भी उसे शायद न मिले.’’

ड्राइवर ने कार रोक कर हौर्न बजाया पर युवती ने उन की ओर देखा ही नहीं. तभी समीर ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर आवाज दी. ‘‘हैलो मैडम, आप ही को बोल रहा हूं. आज कोई बस नहीं मिलने वाली और टैक्सी की भी किल्लत है. हमारी कार में बैठ जाएं, बौस हमें धर्मतल्ला स्टौप पर ड्रौप कर देंगे.’’

पहले तो वह संकोच कर रही थी, पर बाद में समीर के कहने पर वह आ कर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर थैंक्स कह कर बैठ गई. पिछली सीट पर तो 3 लोग पहले से ही बैठे थे.

धर्मतल्ला स्टौप पर उतर कर समीर और उस युवती ने बौस को थैंक्स कहा. समीर का भी थैंक्स करते हुए वह अपने घर की ओर चल दी. समीर सोच रहा था कि आज वह थैंक्स के अलावा और कुछ भी बात करेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. समीर मन ही मन चिढ़ गया और उस ने भी आगे कुछ नहीं कहा. दोनों अपनेअपने घर की ओर चल दिए.

लेकिन अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने उस युवती से गुडमौर्निंग कहा तो उस ने होंठों ही होंठों में कुछ कहा और मुसकरा कर सिर झुका कर बस का इंतजार करने लगी. इसी तरह कुछ दिनों तक समीर गुडमौर्निंग कहता और वह होंठ फड़फड़ा कर धीरे से गुडमौर्निंग का जवाब दे देती.

एक बार 2 दिनों से वह युवती बस स्टौप पर नहीं मिली तो समीर का मन बेताब हो गया. तीसरे दिन जब वह मिली तो समीर ने अपने पुराने अंदाज में गुडमौर्निंग कहा. युवती आज खुल कर मुसकराई और उस ने धीरे से गुडमौर्निंग कहा. बस आई और दोनों बस में चढ़े, लेकिन युवती से कोई बात नहीं हो पाई.

अगले दिन जब समीर को युवती की बगल वाली सीट पर बैठने का मौका मिला तो वह उस से पूछ बैठा, ‘‘आप की तबीयत तो ठीक है? आप इधर बीच में 2 दिन नहीं आई थीं.’’

‘‘ऐसे ही, घर में कुछ काम था,’’ युवती ने जवाब दिया.

समीर बोला, ‘‘अच्छा, अपना नाम तो बताएं. मेरा नाम समीर है.’’

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फिर दोनों हंस पड़े. दरअसल, समीर की शर्ट की जेब पर उस का आईडी कार्ड टंगा था, जिसे युवती ने पहले ही देख लिया था. अगले दिन बस स्टौप पर समीर ने फिर उस का नाम पूछा तो वह बोली, ‘‘समझ लें, जिस का कोई नाम नहीं होता उसे क्या कहते हैं…’’

‘‘उसे तो अनामिका कहते हैं,’’ समीर बोला. इस बीच कोई लेडी पैसेंजर आ गई और समीर को सीट छोड़नी पड़ी. उस ने खड़ा होते हुए कहा, ‘‘तब तो तुम्हारा नाम अनामिका होना चाहिए.’’

अब दोनों में थोड़ीबहुत बातचीत होने लगी थी और कुछ मेलजोल भी बढ़ गया था. कुछ हफ्ते बाद एक दिन औफिस से समीर को जल्दी छुट्टी मिली तो वह बस से लौट रहा था कि रास्ते से अनामिका भी उसी बस में चढ़ी. दोपहर में बस में उतनी भीड़ नहीं थी तो वह भी समीर के बगल वाली सीट पर बैठ गई और पूछा, ‘‘आज का दिन वर्कशौप में कैसा रहा? इस समय तो कभी तुम्हें लौटते देखा नहीं है.’’

समीर बोला, ‘‘आज तो बौस ने मुझे सरप्राइज दिया है. उन्होंने कहा कि बाकी 2 महीने की ट्रेनिंग रांची के मैरिन इंजन प्लांट में लेनी है. कंपनी की एक फैक्टरी वहां भी है और टे्रनिंग के बाद मेरी पोस्टिंग भी उसी फैक्टरी में होगी. 3-4 दिनों में जाना होगा.’’

अनामिका बोली, ‘‘चलो, अच्छी बात है. तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी होने जा रही है. यहां मेरे औफिस में भी मेरे ट्रांसफर की बात चल रही है.’’

अगले दिन समीर को वर्कशौप नहीं जाना था, फिर भी वह रोज की तरह बस स्टौप पर अनामिका से मिलने पहुंच गया. पर आज वह नहीं आई थी. दूसरे दिन वह समीर को उसी स्टौप पर मिली तो उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, मैं कल भी यहां आया था पर तुम नहीं मिलीं?’’

अनामिका बोली, ‘‘कल लड़के वाले मुझे देखने आए थे, इसलिए औफिस नहीं जा सकी थी.’’

समीर ने निराश होते हुए बस ‘ओह’ कहा और चुप हो गया.

अनामिका ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

समीर के ‘कुछ नहीं’ कहते ही बस आ गई और अनामिका चढ़ते हुए बोली, ‘‘शाम को 4 बजे वाली बस से लौटूंगी.’’

हालांकि अनामिका ने उसे शाम को स्टौप पर मिलने को नहीं कहा था, पर समीर वहां मौजूद था. शायद अनामिका की भी यही इच्छा रही होगी. उस के बस से उतरते ही समीर बोला, ‘‘चलो, आज बगल वाले कौफी हाउस में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

अनामिका सहर्ष तैयार हो गई. दोनों ने साथ बैठ कर कौफी पी. वहां समीर ने पूछा, ‘‘कल तुम्हें लड़के वाले देखने आए थे न? तो मेरा विकेट तो डाउन हो गया न. मैं क्लीन बोल्ड हो गया.’’

अनामिका बोली, ‘‘नहीं. वह नो बौल थी. तुम आउट होने से बच गए.’’

‘‘क्या मतलब?’’ कहते हुए समीर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘उन्होंने मुझे रिजैक्ट कर दिया,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर ऐसा क्यों किया. जो भी हो, मेरे लिए तो अच्छा ही है. मुझे नो बौल पर एक और चांस तो मिला.’’

अनामिका बोली, ‘‘एक और चांस नहीं, फ्री हिट का मौका भी मिला है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ समीर ने पूछा तो वह बैग से एक लिफाफा निकाल कर समीर की ओर बढ़ाती हुई बोली,

‘‘यह देखो, आज मुझे भी ट्रांसफर और्डर मिला है. मेरी पोस्टिंग भी रांची में हुई है, हुआ न नो बौल विद फ्री हिट.’’ और दोनों हंसते हुए कौफी हाउस से निकल पड़े. Romantic Story

Romantic Story : अनकहा प्यार- बिनब्याहे मिली सासूमां

Romantic Story. कालेकाले बादलों ने आसमान में डेरा डाल दिया था. मुक्ता सूखे कपड़े उतारने के लिए तेजी से आंगन की तरफ दौड़ी. बूंदों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया था.

कपड़े उतारतेउतारते मुक्ता काफी भीग चुकी थी. अंदर आते ही उस ने छींकना शुरू कर दिया.

मां बड़बड़ाते हुए बोलीं, ‘‘मुक्ता, मैं ने तुझ से कितनी बार कहा है कि भीगा मत कर, लेकिन तू मानती ही नहीं. मुझे आवाज दे देती, तो मैं उतार लाती कपड़े.’’

मुक्ता ने शांत भाव से कहा, ‘‘मां, आप सो रही थीं, इसलिए मैं खुद ही चली गई. अगर आप जातीं, तो आप भी तो भीग जातीं न.’’

मां उसे दुलारते हुए बोलीं, ‘‘मेरी बेटी अपनी मां को इतना प्यार करती है…’’

‘‘हां,’’ मुक्ता ने सिर हिलाते हुए कहा और मां के कांधे से लिपट गई.

‘‘तू पूरी तरह से भीग गई है… जा, जा कर पहले तौलिए से बाल सुखा ले और कपड़े बदल ले. मैं तेरे लिए तुलसीअदरक वाली चाय बना कर लाती हूं,’’ कहतेकहते मां चाय बनाने चली गईं.

मुक्ता कपड़े बदल कर सिर पर तौलिया लपेटे हुए सोफे पर आ कर बैठ गई.

‘‘ले, गरमागरम चाय पी ले और चाय पी कर आराम कर,’’ मां चाय दे कर दूसरे काम के लिए किचन में चली गईं.

मुक्ता खिड़की से बारिश की बूंदों को गिरते हुए देख रही थी और देखतेदेखते पुरानी यादों में खो गई.

औफिस जाने के लिए मुक्ता बस स्टौप पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी कि तभी एक नौजवान उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया. सुंदर कदकाठी का महत्त्व नाम का वह नौजवान औफिस के लिए लेट हो रहा था. आज उस की बाइक खराब हो गई थी.

महत्त्व रहरह कर कभी अपने हाथ की घड़ी, तो कभी बस को देख रहा था. तभी एक बस आ कर खड़ी हो गई. सब लोग उस बस में जल्दीजल्दी चढ़ने लगे. मुक्ता और महत्त्व ने भी बस में चढ़ने के लिए बस के दरवाजे को पकड़ा. गलती से महत्त्व का हाथ मुक्ता के हाथ पर रखा गया. वह सहम गई और बस से दूर जा कर खड़ी हो गई.

महत्त्व जल्दी से बस में चढ़ गया. पर जब बस में चारों तरफ नजरें दौड़ाने पर उसे मुक्ता नहीं दिखाई दी, तो वह बस से उतर गया और बस स्टौप की तरफ चलने लगा. मुक्ता वहीं पर खड़ी दूसरी बस का इंतजार कर रही थी.

महत्त्व ने पास आ कर मुक्ता से पूछा, ‘‘आप बस में क्यों नहीं चढ़ीं?’’ ‘‘जी, बस यों ही… भीड़ बहुत ज्यादा थी, इसलिए…’’

तभी दूसरी बस आ कर खड़ी हो गई. मुक्ता बस में चढ़ गई. महत्त्व भी बस में चढ़ गया. थोड़ी देर में मुक्ता का औफिस आ गया… वह बस से उतर गई. कुछ देर बाद महत्त्व का भी औफिस आ गया था.

शाम को औफिस छूटने के बाद दोनों इत्तिफाक से एक ही बस में चढ़े और दोनों ने एकदूसरे को हलकी सी स्माइल दी.

अब दोनों का एक ही बस से आनाजाना शुरू हो गया. ये मुलाकातें एकदूसरे से बोले बिना ही कब प्यार में बदल गईं, पता ही नहीं चला.

एक दिन वे दोनों बस स्टौप पर खड़े थे. काले बादलों ने घुमड़घुमड़ कर शोर मचाना शुरू कर दिया. महत्त्व ने मुक्ता से कहा, ‘‘मौसम कितना सुहाना है… क्यों न कहीं घूमने चलें?’’

मुक्ता ने धीरे से कहा, ‘‘लेकिन, औफिस भी तो जाना है…’’

‘‘आज औफिस को गोली मारो… मैं बाइक ले कर आता हूं… बाइक से घूमने चलेंगे. तुम मेरा यहीं इंतजार करना… मैं बस 2 मिनट में आया,’’ कह कर महत्त्व बाइक लेने चला गया.

थोड़ी देर में महत्त्व बाइक ले कर आ गया. उस ने अपना हाथ मुक्ता की तरफ बढ़ाया. मुक्ता ने अपना हाथ महत्त्व के हाथ पर रख दिया और बाइक पर बैठ गई. दोनों घूमतेघूमते बहुत दूर निकल गए.

जब बहुत देर हो गई, तब मुक्ता ने कहा, ‘‘काले बादल घने होते जा रहे हैं और अंधेरा भी बढ़ रहा है. अब हमें चलना चाहिए. बारिश कभी भी शुरू हो सकती है.’’

महत्त्व ने बाइक स्टार्ट की. मुक्ता पीछे बैठ गई. दोनों चहकते हुए चले जा रहे थे. काले बादलों ने झमाझम बरसना शुरू कर दिया. मुक्ता ने दोनों हाथों से महत्व को कस के पकड़ लिया. महत्त्व भी प्यार की मीठी धुन में गुनगुनाता हुआ बाइक चला रहा था.

आगे गड्ढा था, जिस में पानी भरा हुआ था. महत्त्व ने ध्यान नहीं दिया. बाइक गड्ढे में जा गिरी, जिस से महत्त्व और मुक्ता बुरी तरह जख्मी हो गए. कुछ लोग उन्हें अस्पताल ले कर पहुंचे.

महत्त्व की अस्पताल पहुंचते ही मौत हो गई. उस की मौत से मुक्ता अंदर से टूट गई और सोचने लगी, ‘अनकहा प्यार अनकहा ही रह गया…’

अपनी यादों में खोई मुक्ता की आंखों से आंसू गिरने लगे.

‘‘मुक्ता… ओ मुक्ता, किन यादों में खो गई… देख, तेरी चाय ठंडी हो गई. चल छोड़, मैं दूसरी बना कर लाती हूं. मां और मुक्ता दोनों साथ चाय पीते हैं.’’

चाय पीते हुए मां ने मुक्ता से पूछा, ‘‘महत्त्व को याद कर रही थी?’’

मुक्ता लंबी गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘हां, मां… मां, बस आप ही समझ सकती हो कि महत्त्व का मेरी जिंदगी में क्या महत्त्व था. मम्मीपापा के चले जाने के बाद मैं बिलकुल अकेली हो गई थी. फिर महत्त्व मेरी जिंदगी में आया और मेरी दुनिया ही बदल गई. लेकिन, वह भी मुझे छोड़ कर चला गया. मैं बिलकुल टूट कर बिखर गई.

‘‘महत्त्व के चले जाने के बाद आप ने मुझे संभाला. आप सिर्फ महत्त्व की ही मां नहीं हो… आप मेरी भी मां हो. अब आप मेरी जिम्मेदारी हो. मैं आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’Romantic Story

Romantic Story in Hindi: उसका घर- खामोश और वीरान क्यों थी प्रेरणा की जिंदगी

Romantic Story in Hindi : बहुत अजीब थी वह सुबह. आवाजरहित सुबह. सबकुछ खामोश. भयानक सन्नाटा. किसी तरह ही आवाज का नामोनिशान न था. उस ने हथेलियां रगड़ीं, सर्दी के लिए नहीं, सरसराहट की आवाज के लिए. खिड़की खोली, सोचा, हवा के झोंके से ही कोई आवाज हो सकती है. लकड़ी के फर्श पर भी थपथपाया कि आवाज तो हो. कुछ भी, कहीं से सुनाई तो पड़े. पेड़ भी सुन्न खड़े थे, आवाजरहित. उस ने अपनी घंटी बजाई, थोड़ी आवाज हुई…आवाज होती थी, मर जाती थी, कोई अनुगूंज नहीं बचती थी. ये कैसे पेड़ थे. कैसी हवा थी, हरकतरहित जिस में न सुर, न ताल. उस ने खांस कर देखा. खांसी भी मर गई थी जैसे प्रेरणा, उस की दोस्त…अब उस की कभी आवाज नहीं आएगी. वह क्या गई, मानो सबकुछ अचानक मर गया हो. यह सोच कर उस के हाथपैर ठंडे पड़ने लगे. शायद वह प्रेरणा की मौत की खबर को सहन नहीं कर पा रहा था. पिछले सप्ताह ही तो मिली थी उसे वह.

अब तक तो अंतिम संस्कार भी हो गया होगा. हैरान था वह खुद पर. अब तक हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाया उस के घर जाने की. शायद लोगों को उस की मौत का मातम मनाते देख नहीं सकता था, या फिर प्रेरणा की छवि जो उस के जेहन में थी उसे संजो कर रखना चाहता था. अंतिम संस्कार हुए 4 दिन हो चुके थे. तैयार हो कर उस ने गैराज से कार निकाली और भारी मन से चल दिया. रास्तेभर यही सोचता रहा, वहां जा कर क्या कहेगा. आज तक वह किसी शोकाकुल माहौल में गया नहीं. वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या कहना चाहिए, क्या करना चाहिए. यही सोचतेसोचते प्रेरणा के घर की सड़क भी आ गई.

उस का दिल धड़कने लगा. दोनों ओर कतारों में पेड़ थे. उस का मन तो धुंधला था ही, धुंध ने वातावरण को भी धुंधला कर दिया था. उस ने अपना चश्मा साफ किया, बड़ी मुश्किल से उस के घर का नंबर दिखाई दिया. घर बहुत अंदर की तरफ था. उस ने कार बाहर ही पार्क कर दी. कार से पांव बाहर रखते ही उस के पांव साथ देने से इनकार करने लगे. बाहर लगे लोहे के गेट की कुंडी हटाते ही, लोहे के टकराव से, कुछ क्षणों के लिए वातावरण में एक आवाज गूंजी. वह भी धीरेधीरे मरती गई. पलभर को उसे लगा, मानो प्रेरणा सिसकियां भर रही हो…

वहां 3 कारें खड़ी थीं. घर के चारों ओर इतने पेड़ लगे थे कि उस के मन के अंधेरे और बढ़ने लगे. एक भयानक नीरवता चारों ओर घिरी थी. लगता था हमेशा की तरह ब्रिटेन की मरियल धूप कहीं दुबक कर बैठ गई थी. बादल बरसने को तैयार थे. मन के भंवर में धंसताधंसता न जाने कब और कैसे उस के दरवाजे पर पहुंचा. दिल की धड़कन बढ़ने लगी. एक पायदान दरवाजे के बाहर पड़ा था. उस ने जूते साफ किए और गहरी सांस ली. उस ने घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि दरवाजा खुला. शायद लोहे के गेट की गुंजन ने इत्तला दे दी होगी. प्रेरणा के पति ने उस के आगे बढ़े हाथ को अनदेखा कर, रूखेपन से कहा, ‘‘अंदर आओ.’’

उस ने अपना हाथ पीछे करते कहा, ‘‘आई एम राहुल. प्रेरणा और मैं एक ही कंपनी में काम करते थे.’’ ‘‘आई एम सुरेश, बैठो,’’ उस ने सोफे की ओर इशारा करते कहा.

सोफे पर बैठने से पहले राहुल ने नजरें इधरउधर दौड़ाईं और कुछ बिखरी चीजें सोफे से हटा कर बैठ गया. राहुल को विश्वास नहीं हुआ, हैरान था वह, क्या सचमुच यह प्रेरणा का घर है. यहां तो उस के व्यक्तित्व से कुछ भी तालमेल नहीं खाता. दीवारें भी सूनीसहमी खड़ी थीं. उन पर न कोई पेंटिंग, न ही कोई तसवीर. अखबारों के पन्ने, कुशन यहांवहां बिखरे पड़े थे. टैलीविजन व फर्नीचर पर धूल चमक रही थी. बीच की मेज पर पड़े चाय के खाली प्यालों में से चाय के सूखे दाग झांकझांक कर अपनी मौजूदगी का एहसास करा रहे थे. हर तरफ वीरानगी थी. लगता था मानो घर की दीवारें तक मातम मना रही हों. दिलों के विभाजन की गंध सारे घर में फैली थी. अचानक उस की नजर एक कोने में बैठे 2 उदास कुत्तों पर पड़ी जो सिर झुकाए बैठे थे. शायद वे भी प्रेरणा की मौत का मातम मना रहे थे.

‘‘राहुल, चाय?’’ ‘‘नहींनहीं, चाय की आवश्यकता नहीं, आ तो मैं पहले ही जाता, सोचा, अंतिम संस्कार के बाद ही जाऊंगा, तब तक लोगों का आनाजाना कुछ कम हो जाएगा.

‘‘वैसे, प्रेरणा ने आप का जिक्र तो कभी किया नहीं. हां, अगर आप पहले आ जाते तो अच्छा ही रहता, आप का नाम भी उस के चाहने वालों की सूची में आ जाता. सच पूछो तो मैं नहीं जानता था कि हिंदी में कविता और कहानियों की इतनी मांग है. क्या आज के युग में भी सभ्य इंसान हिंदी बोलता या पढ़ता है?’’ प्रेरणा के पति ने बड़े पस्त और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा. ‘‘प्रेरणा तो बहुत अच्छा लिखती थी. उस की एकएक कविता मन को छू लेने वाली है. व्यक्तिगत दुखसुख व प्रेम के रंगों की सुगंध है. ऐसी संवदेनाएं हैं जो पाठकों व श्रोताओं को आपबीती लगती हैं. आप ने तो पढ़ी होंगी,’’ राहुल ने कहा.

इतना सुनते ही एक कुटिल छिपी मुसकराहट उस के चेहरे पर फैल गई. उस ने राहुल की बात को तूल न देते हुए संदर्भ बदल कर कहना शुरू किया, ‘‘अच्छा हुआ, आप वहां नहीं थे. कैसे बेवकूफ बना गई वह मुझे, मैं जान ही नहीं पाया कि मेरी पार्टनर कितनी फ्लर्ट थी. कितने दोस्त आए थे अंतिम संस्कार के मौके पर. उस वक्त हमारे परिवार का समाज के सामने नजरें उठाना दूभर हो गया था. उम्रभर मना करता रहा, ऐसी प्रेमभरी कविताएं मत लिखो, बदनामी होगी, लोग क्या कहेंगे. वही हुआ जिस का डर था. लोग कानाफूसी कर रहे थे, बुदबुदा रहे थे, ‘पति हैं, बच्चे हैं…’ किस के लिए लिखती थी?’’ इतना कह कर कुछ क्षण वह चुप रहा, फिर बिफरता सा बोला, ‘‘राहुल, कहीं वह तुम्हारे लिए तो…’’ उस की जबान बेलगाम चलती रही.

राहुल हैरान था, क्या यह वही दरिंदा है जिस से वह एक बार कंपनी के सालाना डिनर पर मिला था. राहुल कसमसाता रहा, तय नहीं कर पा रहा था कि उस की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए. पलभर को उस का मन किया कि उठ कर चला जाए, फिर मन को समझाते बुदबुदाया, ‘मैं उस के स्तर पर नहीं गिर सकता.’ वक्त की नजाकत को देखते वह गुस्से को पी गया. मन में तो उस के आया कि इस पत्थरदिल से साफसाफ कह दे, हां, हां, था रिश्ता. मानवता के रिश्ते को जो नाम देना चाहो, दे दो. जीवन का सच तो यह है कि प्रेरणा मेरे जीवन में रोशनी बन कर आई थी और आंसू बन कर चली गई.

वहां बैठेबैठे राहुल को एक घंटा हो चुका था. अभी तक घर में अक्षुब्ध शांति थी. चुप्पी को भंग करते राहुल ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, बच्चे दिखाई नहीं दे रहे?’’ ‘‘श्रुति तो कालेज गई है, रुचि सहेलियों के साथ बाहर गई है. सारा दिन घर में बैठ कर करेगी भी क्या. मैं उस की मां की मौत को बड़ा मुद्दा बना कर उन की पढ़ाई में विघ्न नहीं डालना चाहता. घर को बिखरते नहीं देख सकता. मेरा घर मेरे लिए सबकुछ है, इसे बनाने में मैं ने बहुत पैसा और जान लगाई है. प्रेरणा ने तो पीछा छुड़ा लिया है सभी जिम्मेदारियों से. बच्चों की पढ़ाई, विवाह, घर का लोन सब मुझे ही तो चुकाना है. इस के लिए पैसा भी तो चाहिए,’’ वह भावहीन बोलता गया.

राहुल ने सबकुछ जानते हुए भी विरोध का नहीं, मौन के हथियार को अपनाना सही समझा. सोचने लगा, जो तुम नहीं जानते, मैं वह जानता हूं. मैं ने ही तो करवाया था प्रेरणा के मकान के लिए इतना बड़ा लोन सैंक्शन. फिर लोन का इंश्योरैंस कराने के लिए उसे बाध्य भी किया. इस सुरेश पाखंडी ने प्रेरणा को बदले में क्या दिया? आंसू, यातनाएं, उम्रभर आजादी से कलम न उठा पाने की बंदिशें? एक मैं ही था जिसे वह पति के नुकीले शब्दों के कंकड़ों से पड़े दाग दिखा सकती थी. उस की हंसी तक खोखली हो चुकी थी. अकसर वह कहती थी कि उसे अपना घर कभी अपना नहीं लगा.

वह सीखती रही अशांति में भी शांति से जीने की कला. वह खुद पर मुखौटा चढ़ा कर उम्रभर खुद को धोखा देती रही. राहुल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह प्रेरणा की लिखनेपढ़ने की जगह देखने को उतावला हो रहा था. अभी तक उसे कोई सुराग नहीं मिला था. कभी बाथरूम इस्तेमाल करने का बहाना कर के दूसरे कमरों में झांक कर देखा, कहीं भी स्टडी टेबल दिखाई नहीं दी. राहुल टटोलता रहा. चाय पीतेपीते जब राहुल से रहा नहीं गया, तो हिम्मत बटोर कर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘सर, क्या मैं प्रेरणा का अध्ययन करने का स्थान देख सकता हूं. आई मीन, जहां बैठ कर वह पढ़ालिखा करती थी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ वह व्यंग्यात्मक लहजे में बोला, ‘‘आओ मेरे साथ, वह देखो, सामने,’’ उस ने गार्डन में एक खोके की ओर इशारा किया और फिर बोला, ‘‘वह जो आखिर में कमरा है वही था उस का स्टडीरूम.’’ राहुल भलीभांति जानता था कि जिसे वह कमरा कह रहा है वह कमरा नहीं, 5×8 फुट का लकड़ी का शैड है. मुरगीखाने से भी छोटा. शैड को खोलते ही राहुल का दिमाग चकरी की तरह घूमने लगा. शैड के चारों और मकड़ी के जाले लगे थे. सीलन की गंध पसरी थी. शैड फालतू सामान से भरा था. उस की दीवारों पर फावड़ा, खुरपी, कैंची, फौर्क वगैरह टंगे थे.

एकदो पुराने सूटकेस और पेंट के खाली डब्बे पड़े थे. आधा हिस्सा तो घास काटने वाली मशीन ने ले लिया था, बाकी थोड़ी सी जगह में पुराना लोहे का बुकशैल्फ था, जिस पर शायद प्रेरणा किताबें, पैन, पेपर रखती रही होगी. कुछ मोमबत्तियां और बैट्री वाली हैलोजन की बत्तियां पड़ी थीं. दीवार से टिकी 2 फुट की फोल्डिंग मेज और फोल्डिंग गार्डनकुरसी पड़ी थीं.

एक छोटा सा पोर्टेबल हीटर भी पड़ा था. फर्श पर चूहे व कीड़ेमकोडे़ दौड़ रहे थे. बिजली का वहां कोई प्रबंध नहीं था. हां, एक छोटी सी प्लास्टिक की खिड़की जरूर थी जहां से दिन की रोशनी झांक रही थी. अविश्वसनीय था कि कैसे एक इंसान दूसरे से किस हद तक क्रूर हो सकता है. डरतेडरते राहुल ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘भला बिना बिजली के कैसे लिखती होगी? डर भी तो लगता होगा?’’

‘‘डर, वह सामने 2 कुत्ते देख रहे हो, प्रेरणा के वफादार कुत्ते. उस की किसी चीज को हाथ लगा कर तो देखो, खाने को दौड़ पड़ेंगे.

‘‘प्रेरणा के अंगरक्षक या बौडीगार्ड, जो चाहे कह लो. यह कहावत तो सुनी होगी तुम ने, ‘जहां चाह वहां राह? मेरे सामने उसे लिखने की इजाजत ही कहां थी. मुझे तो बच्चों की मां और मेरी पत्नी चाहिए थी, लेखिका नहीं. मैं नहीं चाहता था मेरे घर में कविताओं के माध्यम से प्रेम का इजहार हो. देखो न, अब बेकार हैं उस की सब किताबें. कौन पढ़ना चाहेगा इन्हें? बच्चे तो पढ़ेंगे नहीं. नौकर से कह कर बक्से में रखना ही है. तुम चाहो तो ले जा सकते हो वरना रद्दी वाला ले जाएगा या फिर मैं गार्डन में लोहड़ी जला दूंगा,’’ उस ने क्रूरता से कहा.

राहुल को लगा उस के कानों में किसी ने किरचियां डाल दी हों. राहुल उसे कह भी क्या सकता था, वह प्रेरणा का पति था. बस, बड़बड़ाता रहा, ‘जा, थोड़ा सा दिल खरीद कर ला, कैसा मर्द है समानता का दर्जा तो क्या, उसे उस के हिसाब से जीने का हक तक न दे सका. तुम क्या जानो कुबेर का खजाना. लेखन का भी एक अनूठा नशा होता है. पत्रिका या किताबों पर अपना नाम देख कर अपने लिखे शब्दों को देख कर जो शब्द धुएं की तरह मन में उठते हैं और हमेशा के लिए कागज पर अंकित हो जाते हैं, दुनिया में कोई और चीज उन से अधिक स्थायी नहीं हो सकती.’

‘‘सर, कुछ किताबें तो रख लेते यादगार के लिए.’’ ‘‘यादगार, बेकार की बातें क्यों करते हो. औरत भी कोई याद रखने की चीज है क्या. हां, प्रेरणा ने 2 बच्चियां जरूर दी हैं, उन के लिए मैं आभारी हूं. जानवर भी घर में रहता है तो उस से मोह हो ही जाता है.’’

राहुल अब वहां पलभर भी रुकना नहीं चाहता था. सोचने लगा, इतनी तौहीन, कठोर शब्दों के बाण. शाबाशी है प्रेरणा को, जो ऐसी बंदिशों व घुटनभरी जिंदगी की रेलपेल से पिस्तेपिस्ते भी अपना काम करती रही. भारी मन से गार्डन से अंदर आतेआते राहुल का पांव हाल में पड़े एक खुले गत्ते के डब्बे से टकराया, जिस में से प्रेरणा का सभी सामान और ट्रौफियां उचकउचक कर झांक रहे थे.

‘‘लगी तो नहीं तुम्हें? मैं तो इन्हें देख कर आपे से बाहर हो जाता हूं. नौकर से कह कर इन्हें बक्से में रखवा दिया है. इन्हें कबाड़ी वाले को धातु के भाव दे दूंगा.’’ उस की हृदयहीन बातें राहुल के हृदय को बींधती रहीं. कितनी आसानी से समेट लिया था सुरेश ने सबकुछ. प्रेरणा की 25 वर्षों की मेहनत के अध्याय को चार दिन में अपने जीवन से निकाल कर फेंक दिया था उस ने. अभी तो उस की राख भी ठंडी नहीं हुई थी, उस का तो नामोनिशान तक मिटा दिया इस बेदर्द ने.

इतनी नफरत, आखिर क्यों? फिर वह मन ही मन ही बड़बड़ाने लगा, ‘हो सकता है प्रेरणा की तरक्की से जलता हो. इस का क्या गया, खोया तो मैं ने है अपना सोलमेट. अब किस से करूंगा मन की बातें. कौन सुनेगा एकदूसरे की कविताएं,’ बहुत रोकतेरोकते भी राहुल की आंखें भर्रा गईं. राहुल की भराई आंखें देख कर सुरेश का चेहरा तमतमा उठा, भौंहों पर बल पड़ गए, माथे की रेखाएं गहरा गईं. उस के स्वर में कसैलापन झलका, वह बोला, ‘‘आई सी, राहुल, कहीं तुम वह तो नहीं हो जिस के साथ वह रात को देरदेर तक बातें करती रहती थी, आई मीन उस के बौयफ्रैंड?’’

इतना सुनते ही राहुल की सांस रुक गई. निगाह ठहर गई. उसे लगा जैसे किसी ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया हो या फिर पंजा डाल कर उस का दिल चाकचाक कर दिया हो. प्रेरणा तो उस की दोस्त थी, केवल दोस्त जिस में न कोई शर्त, न आडंबर, खालिस अपनेपन की गहनता. प्रेरणा के पास नई राह पर चलने का हौसला नहीं था. उस की खामोशी शब्दों में परिभाषित रहती थी. ऐसी थी वह.

राहुल वहां से भाग जाना चाहता था. वह अपनी खामोश गीली आंखों में चुपचाप प्रेरणा की असहनीय पीड़ा को गले लगाए, उस की कुर्बानियों पर कुर्बान महसूस करता अपने घर को निकलने की तैयारी करने लगा. उसे संतुष्टि थी कि अब प्रेरणा आजाद है. उसे याद आया प्रेरणा अकसर कहा करती थी, ‘भविष्य क्या है, मैं नहीं जानती. इतना जरूर जानती हूं कि सीतासावित्री का जीवन भी इस देश में गायभैंस के जीवन जैसा है, जिन के गले की रस्सी पर उस का कोई अधिकार नहीं.’’ जैसे ही राहुल अपना पैर चौखट के बाहर रखने लगा, उस ने दोनों बक्सों की ओर देखा और सोचा, ‘प्रेरणा की 25 वर्षों की अमूल्य कमाई मैं इस विषैले वातावरण में दोबारा मरने के लिए नहीं छोड़ सकता.’’

राहुल ने प्रेरणा के पति की ओर देखते इशारे से पूछा, ‘‘सर, क्या मैं इन्हें ले जा सकता हूं?’’ ‘‘शौक से, लेकिन इन कुत्तों से इजाजत ले लेना?’’

राहुल ने दोनों बक्सों को छूते हुए, कुत्तों की ओर देखा. कुत्ते पूंछ हिला रहे थे. उस ने बक्से कार में रखे. कुत्ते उस के पीछेपीछे कार तक गए, मानो, कह रहे हों प्रेरणा का घर तो कभी उस का था ही नहीं.

Story in Hindi. फर्ज : उस्मान ने मां बाप के साथ क्या किया

story in hindi. जयपुर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए थे लेकिन उस की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा था.

आईसीयू वार्ड के सामने परेशान सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. बेचैनी में कभी डाक्टरों से अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगते तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते.

उधर, अस्पताल के एक कोने में खड़ी उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए नर्सों की खुशामद कर रही थी. तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर बाहर निकले तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘डाक्टर साहब, मेरे उस्मान को बचा लो. कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए.’’

डाक्टर ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है. औपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’

‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो, डाक्टर साहब. मैं 1-2 दिनों में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.

काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका तो निराश हो कर उस ने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई.

‘‘हैलो अब्बू, क्या हुआ, कैसे फोन किया?’’

‘‘बेटा अनवर, उस्मान की हालत ज्यादा ही खराब है. उस के औपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपयों की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया.

इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘‘अब्बू, आप बिलकुल फिक्र न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन नजमा कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’’

दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई.

आखिरकार सफल औपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान कोे बचा लिया. धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई और मुंबई एअरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणु से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा.

इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया. ईद, बकरीद तक पर भी वह फोन पर भी मुबारकबाद नहीं देता.

एक दिन सुबह टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठाया उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है. मैं 1-2 दिनों में पैसे लेने आ जाता हूं.’’

‘‘बेटा, तेरे औपरेशन के वक्त नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाने ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा.

इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, उस्मान गुस्से से भड़क उठा, ‘‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहोगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’’ और उस ने फोन काट दिया.

अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. घर में पड़े बड़बड़ाते रहते.

एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद वे लड़खड़ा कर गिर पड़े तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद आए डाक्टर ने जांच की और कहा, ‘‘चाचाजी की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हें बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की अपील करते हुए आखिरी वक्त होने की दुहाई भी दी.

जवाब में उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’’

यह सुन कर फरजाना पसीने से लथपथ हो गई. वो चकरा कर जमीन पर बैठ गई. कुछ देर बाद अपनेआप को संभाल कर उस ने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा, बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा. तेरे अब्बा तुझे बारबार याद कर रहे हैं.’’

नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘‘अम्मी आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक अनवर के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’’

शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब  घर पर पहुंचे तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.

‘‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप को बढि़या इलाज करवाएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा.

आंखें खोलने की कोशिश करते सरफराज बड़ी देर तक नजमा के सिर पर हाथ फेरते रहे. आंखों से टपकते आंसुओं को पोंछ कर बुझी आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’

‘‘ऐसा मत बोलो, अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा,’’ यह कह कर नजमा ने अब्बा का सिर अपनी गोद में रख लिया. अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’

उस के बाद तो नजमा ने अब्बा सरफराज की खिदमत में दिनरात एक कर दिए. टाइम पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया.

कई बार सरफराज ने नजमा से ये सब करने से मना भी किया पर नजमा यही कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधों पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको, अब्बा.’’

बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए. इधर, सरफराज की हालत दिनपरदिन गिरती चली गई. उन का खानापीना तक बंद हो गया.

एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से पानी पिला रही थी. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी.

कुछ देर बाद उस्मान एक वकील को साथ ले कर अंदर आया. उस के हाथ में टाइप किए हुए कुछ कागजात थे. अचानक बरसों बाद बिना इत्तला दिए उस को घर आया देख कर सभी खुश हो रहे थे.

दरवाजे से घुसते ही वह लपक कर सरफराज के नजदीक जा कर आवाज देने लगा, ‘‘अब्बा, उठो, आंखे खोलो, इन कागजात पर दस्तखत करना है. उठो, उठो,’’ यह कह कर उस ने हाथ पकड़ कर उन्हें पैन देना चाहा.

नजमा ने रोक कर पूछा, ‘‘भाईजान, ये कैसे कागजात हैं?’’

लेकिन वह किसी की बिना सुने अब्बा को आवाजें देता रहा. सरफराज ने आंखें खोलीं. उस्मान की तरफ एक नजर देखा. और अचानक उन के हाथ में दिए कागजात और पैन नीचे गिर पड़े. उन का हाथ बेदम हो कर लटक गया. यह देख नजमा चिल्लाई, ‘‘अब्बा, अब्बा, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’ और घर में कुहराम मच गया. नजमा बोली, ‘‘भाईजान जो मकान आप अपने नाम कराना चाहते थे वह तो 10 साल पहले अब्बू ने आप के नाम कर दिया था. आप अब फिक्र न करो.’’

ये सब देख कर उस्मान ने फुरती से अब्बा के बिना दस्तखत रह गए कागजात उठाए और वकील के साथ बिना पीछे देखे बाहर निकल गया.

फरजाना, नजमा और अनवर भाग कर पीछेपीछे आए लेकिन तब तक कार रवाना हो गई.

तीनों दरवाजे में खड़े कार की पीछे उड़ी धूल के गुबार में चकाचौंधभरी शहरी मतलबपरस्त दुनिया की आंधी में फर्ज और रिश्तों की मजबूत दीवार को भरभरा कर गिरते हुए देखते रह गए.

Hindi Story:अब पछताए क्या होत- बाबागीरी में बनते ब्रैंड

Hindi Story.उस दिन कई दिनों बाद थोड़ी गुनगुनी धूप निकली हुई थी. सर्दी के मौसम में गुनगुनी धूप और वह भी शनिवार को जब आस्ट्रेलिया में सभी व्यापारिक संस्थान बंद होते हैं, सोने पर सुहागा वाली बात थी.

मैं अवकाश का आनंद लेने किलडा बीच पर चला आया था. काफी देर तक वहां प्राकृतिक दृश्यों का लुत्फ लेता रहा. कुछ ऐसे नजारे भी देखे जो विदेशों में ही देखे जा सकते थे. उस के बाद मैं लूणा पार्क चला आया था. दोपहर के बाद फलिंडर स्ट्रीट स्टेशन के निकट भारतीय रैस्टोरैंट फलोरा में खाना खाने के पश्चात सराइन आप रिमैंबरेंस चला गया और वहां काफी देर बैठा रहा.

जब घर लौटा तो आंसरिंग मशीन और मेरे मोबाइल पर भी एक मित्र के कई संदेश आए हुए थे.

मैं ने तुरंत उस का नंबर डायल किया. उस ने फोन उठाते ही गुस्से से कहा, ‘‘कहां गायब हो गया था सुबह से? मैं तो फोन करकर के थक गया. तुम तो मोबाइल भी नहीं उठा रहे थे.’’

‘‘सौरी यार,’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं मोबाइल घर पर ही भूल गया था.’’ उस से मैं ने कह तो दिया लेकिन वास्तव में मैं स्वयं ही जानबूझ कर मोबाइल घर छोड़ गया था. वास्तव में मैं शांति से दिन गुजारना चाहता था.

मेरे यह पूछने पर कि कैसे याद किया, उस ने अत्यंत प्रसन्नता से बताया, ‘‘ओह यार, आजकल इंडिया से अपने गुरु महाराज आस्ट्रेलिया आए हुए हैं. कल वे हमारे घर पर प्रवचन करेंगे. तुम अवश्य आना.’’

‘‘यार, मुझ से कहां आया जाएगा?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे क्या पैर भारी हैं?’’

‘‘तुम जानते तो हो, मेरी धार्मिक कार्यों में…’’

‘‘दिलचस्पी नहीं,’’ उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘‘वाइन की तो पूरी बोतल डकार जाता है मगर धार्मिक कार्यों के नाम पर तुम्हारे पेट में मरोड़ उठने लगती है.’’ उस ने अपनत्व की भावना से आगे कहा, ‘‘ज्यादा इधरउधर की मत हांक… और हां, आते हुए बेबी तथा उस के बच्चों को भी साथ ले आना. जीजाजी तो सिडनी गए हुए हैं.’’

लो, एक और मुसीबत गले पड़ गई. मेरे घर से मैलटन, जहां उस की बहन बेबी रहती है, कम से कम 45 किलोमीटर दूर होगा. पहले तो शायद न जाता, मगर अब तो उस की बहन और बच्चों को भी साथ ले कर जाना पड़ेगा. फोन पर मेरी ओर से कोई जवाब न मिलने पर वह बोला, ‘‘क्या हुआ, मेरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है?’’

‘‘अरे, सुन रहा हूं भई, निश्ंिचत रह, मैं बेबी तथा बच्चों को साथ ले आऊंगा.’’

‘‘यार, तुम से एक और रिक्वैस्ट है,’’ उस की आवाज अत्यंत हलीमीभरी थी, ‘‘गुरु महाराज को 100 डौलर से कम दक्षिणा मत देना.’’

‘‘अरे, यह भी कोई कहने वाली बात है,’’ मैं ने तुरंत कह तो दिया, लेकिन मन ही मन यह अवश्य सोचा था कि यहां डौलर छापने की मशीन तो नहीं लगी हुई है. इसे क्या मालूम कि ट्रेन के किराए

के 5-6 डौलर बचाने के लिए मैं 5 किलोमीटर की दूरी पर अपने इंस्टिट्यूट तक प्रतिदिन पैदल आताजाता हूं.

खैर, मैं उस के घर चला गया, वहां उस के कई रिश्तेदार तथा परिचित आए हुए थे.

मैं ने धीरे से 50 डौलर महाराज के सिंहासन के सामने पड़ी थाली में डाल कर माथा टेक दिया, लेकिन अगले ही पल हिसाब भी लगा लिया कि भारतीय करैंसी में कितने रुपए बन गए तथा मन ही मन अपनेआप को कोसते हुए तथा मित्र को भी एक भद्दी सी गाली निकालते हुए कहा, ‘ससुरे ने अढ़ाईतीन हजार रुपए का नुकसान करवा दिया.’

गुरु महाराज प्रवचन देने लगे. उन का एकएक बोल मनमंदिर के किवाड़ खोल रहा था. चांदी जैसे उज्ज्वल वस्त्रों से सुशोभित वे किसी देवर्षि की तरह लग रहे थे. सचमुच ही ऊपर वाले ने इन महापुरुषों को कोई विशेष गुण दिया होता है. मगर गुरु महाराज की ओर देखते हुए यों प्रतीत हो रहा था मानो वे मेरे परिचित हों, लेकिन यह मेरे मन का वहम हो सकता था, क्योंकि मैं तो इंडिया में रहते हुए भी कभी किसी धार्मिक सम्मेलन में नहीं गया था.

महाराज को चढ़ावा भी काफी चढ़ गया था. घर वालों ने भी सोने की मोटी चेन, हाथ का कड़ा तथा डौलरों से भरा लिफाफा उन के चरणों में रख दिया था. तदोपरांत लंगर छक कर संगत चली गई थी.

महाराजजी से परिचय करवाने के लिए मेरा मित्र मुझे उन के निकट ले गया. मगर उस की बात पूरी होने से पहले ही महाराज बोल पड़े थे, ‘‘मैं जानता हूं इन्हें, डा. शुक्ला हैं. समाचारपत्रों में अकसर मैं इन के बारे में पढ़ता रहता हूं.’’ और उन्होंने मुझ से पूछा, ‘‘तू ने पहचाना नहीं मुझे? मैं रमेश हूं, मेछी?’’ और उन्होंने मुसकराते हुए मेरे मित्र से परदाफाश कर दिया, ‘‘यह तो मेरे साथ ही गांव के स्कूल में पढ़ा करता था.’’

पलभर में ही चलचित्र की रील की तरह सबकुछ मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था. तभी तो महाराज का चेहरा मुझे इतना जानापहचाना लग रहा था.

हम दोनों गांव के राजकीय स्कूल में एकसाथ पढ़ते थे. वह पढ़ाई में नालायक विद्यार्थियों जैसा था, लेकिन बातचीत में इस कदर शातिर था कि आसमान को भी पैबंद लगा देता था. वह इस प्रकार की दलीलें देता कि झूठ भी सच साबित हो जाता था. हमारे अध्यापक अकसर उस से कहा करते थे कि तू इतना चालाक है कि बड़ा हो कर लीडर बनेगा. स्कूल में पढ़ते समय ही वह देसी शराब और सिगरेट भी पीता था.

मुझे अभी तक याद है कि कैसे उस ने एक बार मुझे पीटा था और मुख्य अध्यापक से भी मेरी पिटाई करवाई थी. स्कूल के निकट ही साइकिल पर तिनके वाली कुल्फी बेचने वाला आया करता था. एक टके (2 पैसे) की एक कुल्फी. मेछी (रमेश) ने मुझ से कुल्फी ले कर देने को कहा था. मैं ने मना कर दिया तो उस ने मुझे 3-4 थप्पड़ रसीद कर दिए. मैं ने उसी समय मुख्य अध्यापक से उस की शिकायत कर दी. उन्होंने झटपट उसे बुला लिया. लेकिन मेछी ने सरासर झूठ बोलते हुए पासा ही पलट दिया, ‘सर, यह बिना किसी बात के मुझे गालियां दे रहा था. मुझे क्रोध आ गया और तब मैं ने इस के 2-4 चांटे लगा दिए.’’ मुख्य अध्यापक ने उस की बात पर विश्वास करते हुए

2-3 थप्पड़ मारते हुए मुझे डांटा, ‘‘एक तो गालियां बकता है और फिर शिकायत भी करता है.’’

और तभी उन्होंने झट से मेछी को आदेश दे डाला, ‘‘लगा इस के दोचार थप्पड़ और.’’ मेछी ने फिर मेरे चांटे मार दिए. मैं स्तब्ध सा मुख्य अध्यापक के कार्यालय से जब बाहर आया तो मेछी ने पहले से भी ज्यादा अकड़ कर कहा, ‘‘अब कुल्फी ले कर देगा या तेरी और करवाऊं पिटाई.’’

….और आज वही मेछी मेरे सम्मुख सिंहासन पर विराजमान है.

गुरु महाराज से बहुत सारी बातें हुईं. उन के अमेरिका, कनाडा, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में आश्रम भी थे और उपासक भी. मेरे आकलन के अनुसार, उन के पास करोड़ों की संपत्ति तो अवश्य होगी.

घरपरिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने मुसकराते हुए कहा था, ‘साधुसंतों का परिवार तो उन के शिष्य होते हैं. यही लोग हमारा परिवार हैं तथा समाज भी.’

गुरु महाराज तो शाम की फ्लाइट से अपने भक्तों से मिलने के लिए ब्रिसबेन चले गए थे मगर मेरे मन की यादों की पिटारी खोल गए थे.

मैं बचपन से ही संगीतप्रेमी था और नाटकों में अभिनय भी किया करता था. गाना गाने के लिए स्कूल की ओर से हमेशा मुझे ही भेजा जाता था. और मैं हर बार कोई न कोई पुरस्कार प्राप्त करता था.

कहीं भी ढोल बजने लगता तो स्वयं ही मेरे पैर थिरकने लग जाते.

हमारे गांव से 4-5 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव में मजार है. कुछ लोग अपने कष्ट दूर करने के बहाने वहां जाते थे. जिन लोगों में पीर की ‘हवा’ आती थी, वे वहां ‘खेलने’ (झूमने) लगते थे. वहां यह मान्यता भी थी कि लगातार 5 बार वहां जाने से मनोकामना पूरी हो जाती है.

मैं भी प्रत्येक वीरवार ऊबड़खाबड़ और कंकड़ोंभरे रास्ते पैदल चल कर वहां जाता था. मगर शायद मेरी भावना में स्वार्थीपन अधिक तथा श्रद्धा कम थी. लेकिन लगातार 5 बार जाने के बावजूद मेरी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी. आप यह भी जानना चाहोगे कि मैं वहां क्या मांगता था. वास्तव में मैं वहां जा कर हर बार यही प्रार्थना किया करता था कि पीर मुझे भी ‘खेलने’ में लगा दे.

लेकिन मेरी ख्वाहिश मन में ही रह गई थी.

गांव में एक कुम्हारों यानी मुसलमानों का घर था. अब तो पूरी तरह याद नहीं कि  वे लोग कुम्हार थे या मुसलमान. वर्षों पुरानी बात है. उन के परिवार के सदस्यों में पीर की ‘हवा’ आती थी. वे लोग वीरवार वाले दिन शाम को ढोल बजाने लगते तथा कुछ समय बाद उन के परिवार का कोई सदस्य ‘खेलने’ लग जाता और अपने शरीर पर ‘छेंटे’ मारने लगता.

मैं कभीकभी उन के घर चला जाता था. वे लोग खुले आंगन में ढोल बजा कर ‘खेलते’ थे. लेकिन एक बार न जाने क्या हुआ. कुछ पता ही न चल पाया कि  कब ढोल की थाप मुझ पर हावी हो गई थी और मैं भी ढोल की थाप के साथसाथ झूमने लगा था. उन्होंने मुझे ‘छेंटा’ पकड़ा दिया और मैं ‘छेंटे’ से अपने शरीर पर वार करने लगा था तथा जैसे वे बोलते गए वैसे ही हक, हक… कहता रहा.

मगर शीघ्र ही यह खबर मेरे घर खबर पहुंच गई थी. मेरे घर वाले कुम्हारों को भलाबुरा कहते हुए मुझे घसीटते हुए ले गए थे. घर वालों ने मेरी धुनाई भी कर डाली थी और स्वयं भी बहुत परेशान हुए थे.

जंगल की आग की तरह यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी कि मुझे भी असर हो गया है और मुझ में भी हवा आने लगी है.

एक दिन शाम को मैं बंजर जमीन की ओर जा रहा था. गांव की एक महिला ने मुझे रोक कर मेरे पांव छुए और गोद में उठाए हुए बालक की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘जी, कहते हैं इस पर किसी प्रेत का साया है. दिनभर रोता रहता है. आप कोई उपाय बताइएगा.’

और मैं ने भी झट से यों कह दिया जैसे मैं तंत्रविद्या में निपुण था. ‘इस के सिर के ऊपर से कलौंजी घुमा कर पक्षियों को डाल देना, शीघ्र ही ठीक हो जाएगा.’

वास्तव में उस महिला के पूछने पर तुरंत ही मुझे कुछ याद आ गया था. एक बार मेरी माताजी ने किसी साधु से मेरे बारे में पूछा था तो उस ने यह उपचार बताया था.

मुझ में हवा आने की खबर हमारे गांव से शीघ्र ही निकटवर्ती गांवों में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी. उस महिला की तरह और भी कई लोग अपने दुखों के समाधान के लिए मेरे पास आने लगे थे. दिमाग तो मेरा पहले से ही तेज था. मैं घरपरिवार में सुने टोटके और साथ ही अंधविश्वास से जुड़े ढंग भी बता देता था.

एक बार मैं कुबैहड़ी गांव जा रहा था. एक महिला अपने पोते को मेरे पास ला कर बोली, ‘महाराज, यह कुछ भी खातापीता नहीं है. दूध तो बिलकुल भी नहीं पीता. पहले तो पूरी बोतल पी जाता था. मुझे शक है कि मेरी बड़ी बहू ने इस के लिए टोना कर दिया है.’

मैं ने मस्तिष्क पर बल डाला तो मुझे शीघ्र ही याद आ गया कि जब मेरे छोटे भाई को भूख नहीं लगती थी तो एक हकीम ने बताया था कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डुबो कर उस दूध को पिलाना  चाहिए. मैं ने भी वही नुस्खा उसे बता दिया. और साथ में यह भी बोल दिया कि इस के गले में सुराख वाला तांबे का सिक्का काले धागे में डाल कर बांध देना.

संभवतया मेरी ख्याति और फैल जाती, अगर भेद न खुलता. दरअसल, उस औरत के बच्चे को भूख लगने लगी थी और वह खुश हो कर दूध की गड़वी तथा गुड़ का बड़ा सा ढेला मेरे घर दे गई थी, क्योंकि मेरे बतलाए उपाय से उस का पोता ठीक हो गया था.

एक वैज्ञानिक होने के नाते अब मैं स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि लोहे के चाकू को गरम कर के दूध में डालने से उस दूध में खनिज पदार्थ लोहे की मात्रा बढ़ गई होगी और बच्चे की रक्ताल्पता (अनीमिया) में सुधार आ गया होगा. बाकी सब तो अंधविश्वास की बातें थीं जिन के बिना लोगों की संतुष्टि नहीं होती.

घरपरिवार में पता चलते ही मेरी खूब पिटाई हुई थी. पिताजी चीखचीख कर पूछ रहे थे, ‘तू कब से सयाना बन कर लोगों को उपाय बताने लगा है.’ उन्होंने मुझे गांव से निकाल दिया और लुधियाना पढ़ने भेज दिया. मैं बस डिगरियां ही प्राप्त करता रहा और एक वैज्ञानिक बन गया. अब तो सेवानिवृत्त भी हो चुका हूं.

….और आज गुरु महाराज से मिल कर सबकुछ याद आने लगा था, लेकिन मेरे मन में यह विचार भी बारबार कौंधता रहा कि इतनी उपाधियां प्राप्त कर के और अंतराष्ट्रीय स्तर का वैज्ञानिक बन कर मुझे क्या मिला. 34-35 वर्ष की नौकरी के उपरांत सेवानिवृत्त होने पर जितनी राशि मुझे मिली थी उतनी तो गुरु महाराज ने आस्ट्रेलिया के एक फेरे में ही बना ली होगी. फिर उन की और भी कई प्रकार की सेवाएं होती होंगी.

मुझे पछतावा होने लगा था. इस से तो अच्छा होता गांव में ही रहता. मेरी तो उन दिनों भी काफी ख्याति हो गई थी. अब तक मेरे भी कई बंगले व आश्रम बन जाते तथा करोड़ों में बैंक बैलेंस होता. मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है. अब तो मेरा मन भी बारबार यही कह रहा है, अब पछताए क्या होत. Hindi Story

Social Humor : दो लाख की डकैती – शर्माजी को नहीं हुआ विश्वास

Social Humor . जैसे ही घर पहुंचा, पत्नी ने बताया कि अपनी कालोनी में मिस्टर गुलाटी के यहां चोरी हो गई है. मैं ने पूछा, ‘‘चोरों का कोई पता चला?’’

‘‘अभी तक तो मुझे कोई जानकारी नहीं मिली है,’’ पत्नी बोली, ‘‘आप आ गए हो तो सारी जानकारी मिल जाएगी. कोई कह रहा था कि चोरी हो गई और कोई बता रहा था डकैती पड़ी है. मुझे तो दोनों में अंतर ही पता नहीं चलता.’’

पत्नी के साथ यही दिक्कत है. अंतर करने से चूक जाती है. मुझे सीआईडी का आदमी समझती है. अखबारों में पढ़े समाचारों को कभी मनोरंजक और कभी खौफनाक ढंग से मिर्चमसाला लगा कर बता देता हूं. इसलिए पत्नी को ऐसा भ्रम हो जाता है कि मैं जासूसी भी करने लगा हूं.

मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम हालचाल जानने के लिए उन के घर गई थीं?’’ उस ने वर्षों पुराना घिसापिटा रिकार्ड दोहरा दिया, ‘‘घर के काम से फुर्सत नहीं मिली. बच्चे धींगामस्ती कर रहे थे. पड़ोसिन बैठने आ गई थीं.’’

मैं ने कहा, ‘‘क्या पड़ोसिन सुबह से शाम तक बैठी रही थीं. रही बात बच्चों की तो तुम्हीं बताओ, किस के घर के बच्चे धींगामस्ती नहीं करते. यह तो गनीमत है कि अपने बच्चे बाहर लड़तेझगड़ते नहीं. वरना दिनभर शिकायतों का ही तांता लगा रहता. तुम जानती नहीं, अपने पड़ोसी वर्माजी कितने परेशान रहते हैं बच्चों की कंपलेंट से.’’

चोरी और किसी के घर होती तो जाने, न जाने की बात अलग थी. गुलाटी का पारा तो इसी बात को ले कर 108 डिगरी तक पहुंच गया होगा कि न शर्माजी आए न उन की श्रीमतीजी. पिछली बार गुलाटी को फ्लू हो गया था. समाचार कुछ देर से मिला. हम दोनोें घर गए तो ठीक हो चुका था. देखते ही बरस पड़ा, ‘‘अब फुर्सत मिली है. अच्छा होने के बाद देखने आए हो. आधी कालोनी आ कर चली गई. अब कोई बहाना मत बनाना और मेरी अगली बीमारी का ध्यान रखना.’’

चोरी तो हो चुकी थी लेकिन चोरों की तरह डरतेसहमते गुलाटी के घर पहुंचा. वह 4-5 अतिथियों से घिरे बैठे थे. उन के सामने की मेज पर अखबारों का ढेर पड़ा था. रसोईघर से कुछ बनने की महक कमरे में आ रही थी. मेरी ओर देख कर भी वह बिलकुल चुप थे. नाराज हो जाने  पर यह गुलाटी की खास किस्म की आदत थी यानी जिस से नाराज हो जाओ, उस की ओर देखो जरूर लेकिन बातों का सिलसिला शुरू न करो.

गुलाटी ने पड़ोसियों को विस्तार से डकैती का हाल बताया कि किधर से डकैत आए, किधर गए होंगे, संख्या कितनी रही होगी. डकैती के अभिनय से ले कर पुलिस की भूमिका तक सरगर्म चर्चा हो गई. इतने में नाश्ता आ गया. उस का तामझाम देख कर मुझे तो ऐसा लगा नहीं कि गुलाटी के यहां चोरी हुई है. नाश्ते की सजी हुई प्लेटों और उस के चेहरे के हावभाव से लग रहा था डैकती का माल बरामद हो चुका है. उसी के उपलक्ष्य में स्वल्पाहार का आयोजन है.

पड़ोसियों ने वही किया जो ऐसे मौके पर किया जाता है. नाश्ता ठूंसते हुए प्रशासन की जम कर आलोचना हुई. गुलाटी को सांत्वना और डकैतों के पकड़े जाने का आश्वासन देते हुए वे एकएक कर विदा हो गए. हालांकि उन्हें इशारा मिल जाता तो इसी विषय पर बहस करते हुए कम से कम 1 घंटा और जम सकते थे. पड़ोसियों के जाते ही गुलाटी ने खबरों का ढेर मेरी ओर पटक दिया और कहा, ‘‘कल चोरी हुई है और आज दर्शन दे रहे हो. अच्छी दोस्ती निभाते हो.’’

अखबार पलटते हुए मैं ने कहा, ‘‘भाई, शहर के बाहर था. पहुंचते ही पत्नी ने डकैती का समाचार बताया और तुरंत यहां आया हूं. पूरा समाचार तो अभी अखबार पढ़ कर ही जान पाया.’’

‘‘देख लिया न तुम ने अखबार वालों का हाल. पूरे 2 लाख की डकैती हुई है. पूरी कालोनी में सनसनी है. आनेजाने वालों का तांता लगा है और समाचार इतना छोटा. न्यूज देख कर तो ऐसा लगता है कि जैसे 100-50 मुरगियों की चोरी का हलकाफुलका समाचार हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक कह रहे हो यार. सारा अखबार तो पी.एम. के समाचारों और तसवीरों से भरा है. कहीं उद्घाटन है, कहीं शिलान्यास. पूरे फ्रंट पेज पर उन के भाषण, स्वागत और झलकियों की झलक है. इसी वजह से डकैती के समाचार को स्थान ठीक से नहीं मिल सका.’’

मेरी बातें सुन कर गुलाटी हां में हां मिलाते हुए बोला, ‘‘मेरे साथ यही दिक्कत है. अखबारों ने कभी मेरे साथ न्याय नहीं किया. पिछली बार जब मैं मेयर पद का उम्मीदवार बना था तो अखबारों ने सतही ढंग से लिया. मेरी उम्मीदवारी का समाचार भी नहीं बना और जब 15 पार्षदों ने मेरे पक्ष में वातावरण बनाया, हस्ताक्षर अभियान चलाया तो अखबारों में भी हरकत बढ़ी तब कहीं फोटो सहित समाचार आया,’’ इतना कह कर उस ने राहत की सांस ली और 2 लाख की डकैती के दुख को कुछ कम किया.

मैं ने झिड़कते हुए कहा, ‘‘गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा, अतीत को छोड़ कर अपने वर्तमान में आजा और डकैती का सार संक्षेप में बता.’’

‘‘देख लो दुर्भाग्य, डकैतों ने भी कैसा दिन चुना. दिन भर पी.एम. नगर में रहे, रात में डकैत आए. 1-2 दिन आगेपीछे आ जाते तो अपने को इतना अफसोस नहीं होता,’’ इतना कह कर उस ने आज का अखबार दिखाया.

अखबार में पुलिस दल के निरीक्षण और डाकुआें का कोई सुराग न मिलने का समाचार छपा था. मैं ने कहा, ‘‘आज के अखबार में भी डकैती को विशेष स्थान नहीं मिला. सी.एम. की खबर से अखबार भरा पड़ा है.’’

अपने घर की डकैती का समाचार तो पी.एम. और सी.एम. के दौरे के बीच दब कर दम तोड़ चुका है. पुलिस वाले भी देर से आए. 2 दिन के थकेहारे खानापूर्ति कर के चले गए. 2 पुलिस के नौसिखिए भी आए. एक तो पूछ रहा था कि डकैती का सही समय बताइए. उस की बात सुन किसी को भी गुस्सा आ सकता है. फिर भी अपने को संयत कर मैं ने कहा, ‘‘ठीक समय मालूम होता तो जान पर खेल कर पकड़ नहीं लेता डकैत को, डाकुओं के आने के लिए अलार्म लगा कर तो सोए नहीं थे. ठीक समय क्या बताएंगे. सो कर उठे तो मालूम हुआ, सुबह के 5 बज चुके थे.’’

दूसरे ने पूछा, ‘‘सुना है, कालोनी के कुछ लोगों ने डकैतों को भागते भी देखा है. क्या डकैत सशस्त्र थे?’’ मैं ने कह दिया, ‘‘यह आप उन्हीं से पूछ लीजिए, जिन्होंने देखा है. अब भला यह भी कोई पूछने की बात है कि डकैत सशस्त्र थे? सशस्त्र नहीं होंगे तो क्या चकलाबेलन ले कर रोटी बेलने आएंगे. यह हाल है अपने नए अफसरों का. फिल्मों में कामेडियन कम हो गए हैं पुलिस विभाग में ज्यादा.’’

पत्नी और बच्चे भी पहुंच चुके थे. वे लोग अंदर मिसेज गुलाटी के साथ नाश्ता करते हुए डकैतों के जाने के बाद का आंखोंदेखा हाल सुन रहे थे. बच्चों को मिस्टर गुलाटी का लड़का वह खिड़की दिखा रहा था जिधर से डकैत आए थे. मैं मिस्टर गुलाटी का साथ दे रहा था. कालोनी के अनेक परिचित अभी तक नहीं आ पाए थे. गुलाटी को इसी बात की चिंता सता रही थी. बारबार उस की नजर दरवाजे की ओर उठ जाती थी. वह स्वागत के लिए कमर कस कर बैठा था. तभी अचानक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई. मैं ने कहा, ‘‘यार गुलाटी, तुम्हारी पामेरियन नस्ल का कुत्ता क्या कर रहा था. तेज कुत्ता है जरूर भौंका होगा डकैतों की आहट सुन कर.’’

खीजते हुए गुलाटी बोला, ‘‘पामेरियन और अल्सेशियन बस, नाम के रह गए हैं. हमारा जानी तो दिन में आनेजाने वालों को भौंकता है और रात को खर्राटे भरता है. दरअसल, विदेशी नस्ल का भी भारतीयकरण हो गया है. रात को बिलकुल ही नहीं भौंकता. मुझे तो लगता है कि यह कुत्ता डकैतों से मिला हुआ है.’’

मैं ने अपनी हंसी दबाते हुए कहा, ‘‘पुलिस के कुत्ते तो आए होंगे. उन्होंने क्या डिटेक्ट किया?’’

‘‘अरे, यार, पी.एम. और सी.एम. के दौरे में कुत्ता ज्यादा व्यस्त और सक्रिय रहा. सुना है 2-3 दिन से बीमार चल रहा है. एक पशु चिकित्सक की सतत निगरानी मेें है. उस के लिए राजधानी से इंजेक्शन आ रहे हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी तो तकदीर ही खराब है. 2 लाख की डकैती हो गई, अभी तक पुलिस के जासूसी कुत्ते भी नहीं पहुंचे.’’

गुलाटी ने तैश में आ कर कहा, ‘‘शर्माजी, पैसा तो अपने हाथ में नाचता है. गहने और नकदी मिला कर 2 लाख के करीब गए हैं. ये तो ट्रांसफर के सीजन में फिर कमा लेंगे. मानसून के आनेजाने से मामले में धोखा हो सकता है. गरज के साथ सिर्फ छींटे पड़ सकते हैं लेकिन अपना सीजन ठीक समय में आता है. आंगन में अच्छी बारिश हो जाती है. इसलिए सवाल 2 लाख की डकैती का नहीं है. अपन तो अखबारों में ठीक कवरेज न आने से दुखी हैं.’’ Social Story

Humour : एक शाम थाने के नाम

Humour. एक लंबी सांस लेने के बाद प्रभु दयाल अपने घर की ओर जा रहा था कि उस ने देखा कि लालबत्ती के पास कुछ लोग जमा हो रहे हैं.

माजरा क्या है, यह जानने के लिए जब वह उन लोगों के पास पहुंचा तो पता चला कि जेब काटने के दौरान मिले माल के बंटवारे को ले कर 2 जेबकतरे आपस में झगड़ रहे थे.

तभी गश्त पर निकले 2 पुलिस वाले मोटरसाइकिल पर वहां आ धमके. होशियार लोग तो वहां से खिसक गए, लेकिन प्रभु दयाल पुलिस वालों के हत्थे चढ़ गया.

एक पुलिस वाला प्रभु दयाल की कलाई जोर से पकड़ कर बोला, ‘‘चल, थाने चल. चौकचौराहे पर झगड़ाफसाद करता है, दंगा करता है…’’

घबराया हुआ प्रभु दयाल घिघियाते हुए बोला, ‘‘अरे भाई साहब, मैं शरीफ आदमी हूं. मैं ने कुछ नहीं किया है. मुझे क्यों पकड़ रहे हैं? दंगा करने वाले बदमाश तो भाग गए.’’

दूसरा पुलिस वाला थोड़ा अकड़ कर बोला, ‘‘थाने चल, वहीं तुझे सब बताएंगे.’’

चौकचौराहे पर पुलिस के डंडे खाने के बजाय प्रभु दयाल ने थाने चलने में ही भलाई समझी.

थाने में प्रभु दयाल को जिस सबइंस्पैक्टर के सामने पेश किया गया, वह पहले से ही थाने लाए गए कुछ लोगों से निबटने में लगा था.

सबइंस्पैक्टर एक नौजवान को डांट रहा था, ‘‘देखो, तुम ने सरकारी जमीन को घेर कर रेहड़ी लगा रखी है. तुम्हारी अच्छी आमदनी होती है, तो फिर बीट कांस्टेबल से झगड़ा क्यों करते हो?

‘‘आपसी तालमेल से सब ठीकठाक चलता रहेगा. बीट कांस्टेबल जो कहता है मान लो, अकेले सब हजम करना तो ठीक नहीं है.’’

वह नौजवान घिघियाता हुआ बोला, ‘‘साहबजी, कोई नौकरी न मिलने पर ही यह काम शुरू किया था.

‘‘देखने से ही ऐसा लगता है कि हमें खूब कमाई हो रही है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है. पुलिस वाले हर महीने पैसे बढ़ा कर लेना चाहते हैं. बताइए, उन को हम कैसे खुश रखें? आप मालिक हैं, हमें इंसाफ दीजिए.’’

सबइंस्पैक्टर पानी के साथ दवा की गोली गटकते हुए बोला, ‘‘हम फुजूल में किसी को तंग नहीं करना चाहते. तुम थोड़े कहे को ही ज्यादा समझो. बीट अफसर को खुश रखो. अब भाग लो यहां से. आगे से कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए. पानी में रह कर मगर से बैर न पालो.’’

अब अगला नंबर एक एसटीडी बूथ चलाने वाले का था. सबइंस्पैक्टर उस आदमी से बोला, ‘‘लालाजी, तय रेट से ज्यादा पैसा वसूल रहे हो. बहुत बड़ा जुर्म है यह. जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी. तुम्हारे खिलाफ जो शिकायतें आई हैं, उन का निबटारा कर लो, नहीं तो तुम्हारे साथ बुरा हो सकता है. समझ गए न?’’

अब अगला नंबर प्रभु दयाल का था. सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल को घूरते हुए बोला, ‘‘आंखों पर चश्मा, जेब में पैन. तुम तो काफी पढ़ेलिखे लगते हो, फिर भी चौकचौराहे पर दंगा क्यों कर रहे थे? सबकुछ खुद ही बता दो. मेरा गुस्सा बहुत बुरा है. तुम मुझे गुस्सा मत दिलाना, नहीं तो बड़ी मार खाओगे.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘गुस्सा आप की सेहत के लिए अच्छा नहीं है साहब. हाई ब्लड प्रैशर के मरीज को तो गुस्से से हमेशा दूर ही रहना चाहिए.’’

सबइंस्पैक्टर हैरान हो कर बोला, ‘‘तुम्हें कैसे पता है कि मैं हाई ब्लड प्रैशर का मरीज हूं? यह तो कमाल है.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘साहबजी, यह तो छोटी सी बात है. मुझे तो यह भी मालूम है कि कुछ देर पहले आप कोर्ट में पेश होने वाले बदमाशों की फाइल की लिखापढ़ी में लगे थे. मैं ठीक कह रहा हूं न?’’

सबइंस्पैक्टर को लगा जैसे उस के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जो दीवारों के आरपार देख सकता है.

लोहा गरम देख प्रभु दयाल ने एक और चोट की, ‘‘साहबजी, मुझे तो यह भी पता?है कि आज आप ने चावल और रोटी के साथ कौन सी सब्जी खाई है. आज आप ने लंच में कद्दू की सब्जी खाई है. ठीक कहा न?’’

सबइंस्पैक्टर को ऐसा लग रहा था, जैसे उस की कुरसी के नीचे से जमीन खिसक रही है. ऐसे सच्चे भविष्य बताने वाले से तो उस का जिंदगी में कभी सामना ही नहीं हुआ था.

सबइंस्पैक्टर प्रभु दयाल के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आप तो सबकुछ जानते हैं. मैं और मेरे बीवीबच्चों के बारे में भी कुछ बताइए. मैं खुशकिस्मत हूं कि आप जैसे बड़े लोगों के दर्शन हो गए.

‘‘यहां पास ही में मेरा फ्लैट है. क्या आप मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता करेंगे? इसी बहाने ही सही, आप के साथ मिलनेबैठने का मौका मिल जाएगा.’’

प्रभु दयाल बोला, ‘‘फिर किसी दिन सही. आज बस इतना ही.’’

सबइंस्पैक्टर जैसे ही प्रभु दयाल के पैर छूने को आगे बढ़ा, प्रभु दयाल दूर हटते हुए बोला, ‘‘अजी साहब, ऐसा गजब मत कीजिए. अभी तो मैं अपने घर लौटना चाहूंगा, फिर किसी दिन फुरसत से आऊंगा.’’

सबइंस्पैक्टर गरजा, ‘‘मुबारक सिंह, भाई साहब को थाने की जीप में घर छोड़ कर आओ.

‘‘और हां, रास्ते में भोलू हलवाई की दुकान से साहब के बच्चों के लिए 5 किलो देशी घी के गुलाब जामुन दिलवा देना.’’

उधर महल्ले वाले प्रभु दयाल को थाने की जीप से उतरते व पुलिस द्वारा अदब से सलाम मारते देख हैरान थे. कुछ नौजवान भी वहां खड़े थे. उन में से एक ने कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘हमें तो पहले से ही शक था कि अपने में मस्त रहने वाला हमारा यह पड़ोसी प्रभु दयाल बड़ी ऊंची चीज है. थाने की जीप में आया है.’’

इधर, सारी बातें जानने के बाद प्रभु दयाल की बीवी हैरान हो कर पूछ रही थी, ‘‘शेर के मुंह में जाने के बाद भी आप सहीसलामत वापस कैसे आ गए? और साथ में देशी घी के गुलाब जामुन भी ले आए. कैसे हुआ यह चमत्कार? आप को तो ज्योतिष के बारे में कुछ भी नहीं आता, फिर वहां आप भविष्य बताने वाले कैसे बन गए?’’

प्रभु दयाल थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘अगर ज्योतिष के द्वारा कुछ बताया जा सकता, तो वाजपेयीजी समय से पहले चुनाव करा कर गद्दी नहीं खोते. ओसामा बिन लादेन कहां छिपा है, यह कब का पता लग गया होता. ज्योतिष के नाम पर जो बातें मैं ने सबइंस्पैक्टर को बताई थीं, वे तो कोई भी बता सकता था…’’

प्रभु दयाल ने राज खोला, ‘‘मैं ने देखा था कि पानी मंगा कर सबइंस्पैक्टर ने एनवास-10 की गोली गटकी थी. इस का मतलब यही था कि वह हाई ब्लड प्रैशर का मरीज है.

‘‘लिखते हुए शायद रिफिल लीक कर गई थी, जिस से उस की उंगली में स्याही लगी थी. इस से साफ जाहिर था कि उस ने थोड़ी देर पहले लिखाई का काम किया है.

‘‘उस की मूंछों में कद्दू की सब्जी का एक छोटा टुकड़ा फंसा हुआ था यानी दोपहर को उस ने कद्दू की सब्जी खाई थी.

‘‘मैं बेकुसूर था और बेमतलब ही फंसाया जा रहा था, सो बचने के लिए ही सबइंस्पैक्टर के सामने मैं ने कुछ बातें हवा में उछाल दी थीं. मेरे बुरे समय पर हाजिरजवाब होने की नीति काम कर गई थी.

‘‘मैं ने उन से एक बार भी नहीं कहा कि मैं कोई पहुंचा हुआ पीरपंडित या भविष्य बताने वाला हूं. अब वह अपनी समझ से खुद ही यह मानने लगा था कि मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी हूं, तो उस हालत में मैं क्या कर सकता था? अंधविश्वासी लोग अकसर अपने जाल में खुद ही फंस जाते हैं.’’

प्रभु दयाल की बीवी बोली, ‘‘आप ने तो कहीं भी कोई गलतबयानी नहीं की. दूसरों की मेहनत की कमाई और हक पर हिस्सापत्ती चाहने वाले ऐसे लोगों को तो सेर का कोई सवा सेर मिलते ही रहना चाहिए.’’

फिर पत्नी अपने बड़े बेटे को बुला कर बोली, ‘‘बेटा, गुलाब जामुन की यह हांड़ी गरीबों में दे आ. कहीं इस धौंसपट्टी की कमाई को खाने से हमारे बच्चों पर भी बुरा असर न पड़ जाए.’’ Humour

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