Family Story: मोहरा

Family Story: ‘काम का न काज का दुश्मन अनाज का. दूसरों के घरों की जूठन उठा कर, ?ाड़ूपोंछा कर के इस निकम्मे को पढ़ानालिखाना चाहा… सोचा कि अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, चार पैसे कमाने लगेगा तो बुढ़ापा थोड़ा आराम से कटेगा, लेकिन नहीं, मेरी ऐसी किस्मत कहां…

‘जवानीभर इस के शराबी बाप के लिए कमाती रही, मरती, खटती, खपती रही और अब इस उम्र में इस निठल्ले, नालायक बेटे के लिए अपनी हड्डियां तोड़नी पड़ रही हैं. जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो किसी को क्या दोष देना…’

शक्कू बाई अपनी झोपड़ी के सामने बह रहे गंदे नाले से कुछ ही दूर पर बैठी अपने घर के बरतन मांजते हुए, बरतनों पर अपनी बेबसी व भड़ास निकालते हुए बड़बड़ा रही थी और शायद अपने एकलौते बेटे, जो 3 बेटियों के बाद जनमा था… जगेश्वर, जिसे बस्ती में जग्गू के नाम से जाना जाता है, को सुना रही थी.

शक्कू बाई जहां बैठी थी, वहां से कुछ ही दूर नगरपालिका के नल पर भारी भीड़ लगी हुई थी, चिल्लपों मची हुई थी. वैसे तो इस बस्ती का यह सीन कोई नया नहीं था, हर सुबह यह देखने को मिलता ही है.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि तकरीबन 1,000 घरों और तकरीबन 6,000 लोगों की आबादी वाली इस बस्ती में केवल यही एकलौता नल है, जिस में हर रोज सुबह महज 2 घंटे के लिए ही पानी आता है. उस के बाद अगर किसी को पानी चाहिए, तो वह अगली सुबह तक का इंतजार करे या फिर बस्ती से तकरीबन
5 किलोमीटर दूर जा कर पानी लाए.

इस बस्ती में केवल पानी की ही किल्लत है, ऐसा नहीं है और भी कई छोटीबड़ी समस्याएं किसी दानव की तरह इस बस्ती में तब से हैं, जब से यह बस्ती वजूद में आई है.

चमचमाते हाईटैक महानगर में यह गंदी बस्ती कब से है, किसी को कुछ पता नहीं. कितनी सरकारें बदल गई हैं, पर इस बस्ती के हालात में कोई सुधार नहीं आया है. यहां रहने वाले कुछ बड़ेबूढ़े कहते हैं कि उन का जन्म ही इस बस्ती में हुआ है.

बुनियादी सहूलियतों की कमी में यहां जिंदगी हर सुबह कुरुक्षेत्र बन जाती है और यहां के रहवासी योद्धा. पेट की आग बुझाने के लिए, दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए बस्ती के लोग सुबह होते ही अपनेअपने घरों से मेहनतमजदूरी के लिए निकल पड़ते हैं.

घर से निकलते समय बस्ती के ज्यादातर मर्दों को इस बात की कोई चिंता नहीं होती है कि उन के पीछे घर में जो बूढ़ेबुजुर्ग, बीमार, लाचार व छोटे बच्चे छूट जाते हैं, उन के लिए दिनभर के खानेपीने का क्या इंतजाम होगा… उन्हें तो बस इस बात की फिक्र होती है कि शाम को दारू की बोतल का जुगाड़ कैसे होगा…

लेकिन औरतें रूखेसूखे बासी खाने के इंतजाम के साथ बड़ी जद्दोजेहद के बाद पानी भर कर ही घर से बाहर अपने काम के लिए निकलती हैं.

बस्ती के ज्यादातर लोगों के पास पक्का रोजगार नहीं है. रोज कमाना, रोज खाना. जिस दिन काम न मिला, उस दिन भूखे ही सो जाना, यही उन की नियति बन चुकी है.

इतने उलट हालात में भी शक्कू बाई अपने बेटे जग्गू को पढ़ालिखा कर कुछ बनाना चाहती थी, उसे इस नरक से निकाल कर एक अच्छी जिंदगी देने का सपना अपनी आंखों में संजोए हुए थी.

जब तक जग्गू छोटा था, तब तक उसे भी स्कूल जाना अच्छा लगता था, क्योंकि वहां उसे मिड डे मील मिलता था, पर जैसेजैसे वह बड़ा होने लगा, वैसेवैसे हर दिन उस का सामना जिंदगी की कड़वी हकीकत के साथ होने लगा.

जग्गू जिस सरकारी स्कूल में पढ़ता था, वहां उस के साथ स्कूल में कुछ ऐसे ओबीसी बच्चे भी पढ़ते थे, जिन के मातापिता के पास थोड़े रुपएपैसे ज्यादा थे या यों समझ लें कि उन बच्चों के हालात जग्गू के हालात से थोड़े बेहतर थे. वे बच्चे जग्गू को परेशान करते थे. उसे उस की जाति के नाम से चिढ़ाते थे, उसे शर्मिंदा करते थे. उस के साथ न तो खेलते थे और न ही खाना खाते थे.

जग्गू अपने स्कूल व अपनी क्लास में खुद को अलगथलग पा कर अनदेखा महसूस करने लगा, उस के कोमल बाल मन में विद्रोह की भावना और कुंठा पनपने लगी. जग्गू को यह सम?ाने में ज्यादा समय भी नहीं लगा कि जिंदगी की राहें चुनौती से भरी हुई हैं, जहां रुपया ही सबकुछ है. रुपयों के बगैर न तो दो वक्त की रोटी मिलती है और न ही इज्जत.

जग्गू अपनी पढ़ाई छोड़ कर किसी कामधंधे में लग जाना चाहता था, लेकिन शक्कू बाई अपने बेटे को मेहनतमजदूरी के दलदल में धकेलना नहीं चाहती थी.

वह चाहती थी कि जग्गू पढ़लिख कर छोटीमोटी नौकरी कर ले, ताकि उस की आगे की जिंदगी बेहतर हो जाए और वह गरीबी, भुखमरी, बेइज्जती जैसे दानव के मुंह में जाने से बच जाए, लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था.

जग्गू हर दिन अपना, अपनी जाति और अपने हालात का एक नए रूप में मजाक झेलता था. उस का मन लहूलुहान होने लगा था और फिर एक दिन उन बदमाश लड़कों ने मिल कर जग्गू से जबरदस्ती अपनी जूठन साफ करने के लिए मजबूर कर दिया. उस दिन के बाद से जग्गू ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया.

स्कूल छोड़ने के बाद जग्गू काम की तलाश में सारा दिन यहांवहां भटकता रहता. नौकरी तो मिली नहीं, पर वर्तमान सरकार व कुछ जाति विशेष लोगों के प्रति गुस्से और विद्रोह की भावना जग्गू के भीतर जो सुलग रही थी, उस ने प्रचंड रूप ले लिया, जिस पर राजनीतिक दल व विपक्ष पार्टी के एक ओबीसी नेता ने जम कर घी डालने का काम किया. जग्गू गुमराह हो कर बरबाद होने की राह पर निकल पड़ा.

अब नौकरी तलाशना और कामधंधा ढूंढ़ने का विचार छोड़ कर जग्गू उन नेताजी के कहने पर अपने हक के लिए लड़नेमरने और मरनेमारने को तैयार था. जहां नेताजी कहते, चल पड़ता. कभी रैली, कभी धरना और कभी आम सभा. कभी चक्का जाम तो कभी शहर बंद कराने की मुहिम में.

जग्गू अपना कीमती समय और योगदान अपनी तरक्की में देने के बजाय इन्हीं सब कामों में देने लगा.

नेताजी भी अपना फायदा देखने और साधने में लगे रहे. कभी जग्गू से खुश हो कर नेताजी उसे कुछ रुपए दे देते, तो कभी शराब की बोतल थमा देते, जिसे पा कर जग्गू का सीना यह सोच कर चौड़ा हो जाता कि उस पर नेताजी का हाथ है.

ऊर्जावान नौजवानों को राह से भटकाना व उन की ऊर्जा का गलत इस्तेमाल अपनी पार्टी के फायदे के लिए कैसे करना है, यह हर पार्टी का नेता बखूबी जानता है. कभी आरक्षण, तो कभी जाति, कभी धर्म तो कभी बेरोजगारी के नाम पर जग्गू जैसे भोलेभाले नौजवानों को छला जाता है, उन्हें आसानी से निशाना बना लिया जाता है.

अब जग्गू भी एक राजनीतिक पार्टी के नेता के शिकंजे में था. जब से जग्गू ने यह रास्ता चुना है, शक्कू बाई उखड़ीउखड़ी व जग्गू से नाराज रहती है, क्योंकि यह उस का सपना नहीं है. वह तो अपने बेटे को इज्जत से छोटीमोटी नौकरी करते हुए देखना चाहती है, न कि किसी राजनीतिक पार्टी का मोहरा बने हुए.

आज सुबह जब से शक्कू बाई ने जग्गू को फोन पर यह कहते सुना है कि सरकार के प्रति विरोध प्रदर्शन करने के लिए शहर के मध्य नगरी चौक पर चक्का जाम करना है, तब से शक्कू बाई का पारा चढ़ा हुआ है और वह सुबह से ही जग्गू पर अपना गुस्सा दिखाते हुए बड़बड़ा रही है.

शक्कू बाई को बरतन साफ करते हुए यों बड़बड़ाता सुन कर जग्गू बोला, ‘‘अरे अम्मां, क्या तू सुबह से ही चिकचिक शुरू कर देती है. आज पढ़लिख कर भी हर नौजवान बेरोजगार, निठल्ला बैठा है.

‘‘मेरे पास कोई कामधंधा नहीं है, इस के लिए मैं नहीं, बल्कि यह सरकार जिम्मेदार है. वह चाहती है कि हमें नौकरी न मिले और हम यों ही सड़ते रहें. सरकार हमें अपने वोट बैंक के अलावा कुछ नहीं समझती.’’

इतना कह कर जग्गू गुस्से में वहां से चला गया. शक्कू बाई उसे समझाना चाहती थी कि धरना देने, चक्का जाम करने, दंगा करने या प्रदर्शन करने से उसे नौकरी नहीं मिलेगी, बल्कि उस के लिए कड़ी मेहनत व सब्र की जरूरत पड़ती है. इतनी साधारण सी बात अनपढ़ शक्कू बाई समझ रही थी, लेकिन जग्गू नहीं, क्योंकि उस की आंखों में विरोधी पार्टी के नेताजी ने काला चश्मा पहना रखा था.

आज शहर के सब से ज्यादा भीड़भाड़ वाले चौक में चक्का जाम व प्रदर्शन जग्गू की अगुआई में होने वाला था. जग्गू अपने दोस्तों, बस्ती व शहर के बेरोजगार नौजवानों के साथ और नेताजी द्वारा बहकाए गए सभी लड़कों को इकट्ठा कर शहर के मध्य नगरी चौक पर पहुंच गया. ?

नारेबाजी के साथ चक्का जाम व प्रदर्शन शुरू हुआ. इस दौरान वहां पुलिस का जत्था आ पहुंचा और उन्हें रोकने की कोशिश करने लगा. देखते ही देखते प्रदर्शन विकराल व विनाशक रूप में बदल गया. आगजनी, लूटपाट व तोड़फोड़ तेजी से बढ़ने लगी और फिर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हो गया.

जग्गू के माथे पर चोट लग गई और वह घायल हो गया. पुलिस ने उसे शहर की शांति भंग करने, दंगा करने और बिना इजाजत प्रदर्शन करने के आरोप में हिरासत में ले लिया.

जब यह खबर शक्कू बाई तक पहुंची, तो वह दौड़ती हुई पहले अस्पताल, फिर पुलिस स्टेशन और आखिर में उन नेताजी के पास पहुंची, जिन के इशारे पर जग्गू यह सब कर रहा था.

शक्कू बाई जब मदद की गुहार ले कर नेताजी के बंगले पर पहुंची, तो नेताजी ने शक्कू बाई से मिलने से साफ इनकार कर दिया और अपने नौकर से यह कहलवा भेजा कि वह किसी जग्गू या जगेश्वर को नहीं जानते और न ही उन्होंने चक्का जाम या कोई प्रदर्शन के लिए किसी को कहा है.

शक्कू बाई यहांवहां मदद के लिए भटकती रही, लेकिन कोई सामने नहीं आया और जग्गू को जेल हो गई.

जग्गू के जेल जाने के साथ ही शक्कू बाई का अपने बेटे को कुछ अच्छा करते हुए, नौकरी करते हुए देखने का सपना भी आंखों से पानी बन कर बह गया.

एक राजनीतिक पार्टी का मोहरा बन चुका जग्गू जेल जाने और शक्कू बाई के द्वारा उसे सारी हकीकत से रूबरू कराने के बावजूद इसी उम्मीद में है कि नेताजी उसे बहुत जल्दी इस मुसीबत से बाहर निकल लेंगे.

Hindi Story: प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर

Hindi Story: वह शहर का सब से मशहूर और काफी महंगा प्राइवेट अस्पताल था, जिस की सीढि़यों पर चमचमाते हुए संगमरमर के पत्थर लगे थे.

उसी अस्पताल के अंदर एक औरत मौजूद थी. वह पहनावे से काफी गरीब लग रही थी. वह अपने बीमार बच्चे को ले कर वहां के मुलाजिमों के सामने गिड़गिड़ा रही थी.

वह औरत चाहती थी कि उस अस्पताल का डाक्टर केवल एक बार उस के बच्चे को देख ले, लेकिन उन सभी के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही थी.

वह औरत उन लोगों के इस घटिया बरताव को नजरअंदाज कर के उन से मानो भीख मांग रही थी, ‘‘एक बार डाक्टर साहब को बुला लीजिए. आप सब की मुझ गरीब पर बड़ी मेहरबानी होगी.’’

उस औरत के कई बार ऐसा कहने पर उन में से एक मुलाजिम बोला, ‘‘अभी डाक्टर साहब के आने में समय है.’’

अस्पताल के मुलाजिम उस औरत को किसी तरह उस अस्पताल से टरकाना चाहते थे, क्योंकि वे जान गए थे कि इस औरत के पास अपने बच्चे को दिखाने के लिए एक फूटी कौड़ी तक नहीं है. लेकिन जिस मां का बच्चा बीमार हो, वह उसे बचाने की कोशिश करना कैसे छोड़ सकती?है.

उस औरत ने फिर भी कोशिश और उम्मीद नहीं छोड़ी. लेकिन शायद उस की इस बार की कोशिश से अस्पताल का सारा स्टाफ झुंझला गया और उस औरत को जबरदस्ती अस्पताल के बाहर कुछ इस तरह धकेला कि वह अपने बीमार बच्चे के साथ गिरतेगिरते बची.

इस के बाद वह औरत कुछ देर उस अस्पताल के चमचमाते पत्थर लगी सीढि़यों के एक किनारे अपने बीमार बच्चे को ले कर ऐसे बैठ गई, जैसे वह डाक्टर के आने का इंतजार कर  रही हो.

इसी उम्मीद में वह बीचबीच में अपने बीमार बच्चे को देखती और धीरेधीरे थपकती, जैसे वह उसे समझा रही हो कि बस बेटा थोड़ी देर और रुक जा, फिर तू एकदम भलाचंगा हो जाएगा.

तभी उस औरत के कानों में ‘डाक्टर साहब आ गए’ की आवाज सुनाई पड़ी. इतना सुनते ही उस की बुझी आंखों में जैसे अचानक कोई चमक आ गई.

वह झट से उठी और अपने बच्चे को उठाने की कोशिश करने लगी, पर उस के बच्चे के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई. वह औरत घबरा कर बहुत जोर से चीखी और अपने बच्चे को उठातेउठाते एक तरफ लुढ़क गई.

उस अस्पताल का स्टाफ उस औरत की तरफ दौड़ा. उन लोगों में अब डाक्टर भी शामिल था. पर उन सभी ने वहां पहुंचने में बहुत देर कर दी.

डाक्टर ने उस औरत और उस के बच्चे की नब्ज देखते हुए कहा, ‘‘ये दोनों तो मर चुके हैं. इन की डैड बौडी जल्दी से अस्पताल के सामने से हटवाओ,’’ इतना कह कर वह अपने केबिन की तरफ चला गया.

लेखक- रंगनाथ द्विवेदी

Hindi Story: मेहनत का फल

Hindi Story: घर आते ही सलीम सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया. उस के चेहरे की हालत देख कर सईदा का माथा ठनका. उस की हालत बता रही थी कि कोई ऐसी बात जरूर हुई है, जिस ने उसे परेशान कर दिया है.

‘‘क्या बात है, बहुत परेशान दिखाई दे रहे हो?’’ सईदा सलीम की बगल में जा बैठी और धीरे से बोली.

बीवी की आवाज सुन कर सलीम चौंका. उस ने उसे देखा और बोला, ‘‘ऐसा लगता है, परेशानियां हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगी.’’

‘‘क्या मतलब? बात क्या है? आप बताते क्यों नहीं?’’ यह सुन कर सईदा भी परेशान हो गई.

‘‘और क्या हो सकता है… काम से निकाल दिया गया हूं,’’ सलीम ने कहा, तो निकाले जाने की वजह पूछने की सईदा की हिम्मत ही नहीं हुई.

साल में यह तीसरा मौका था, जब सलीम काम से निकाला गया था. दरअसल, सईदा को लगता था कि अगर सलीम ऐसे ही नौकरी में रहा तो उम्रभर उस के साथ यही होता रहेगा.

सलीम शादी से पहले ही छोटीबड़ी दुकानों में काम करता था. वह अपने काम में होशियार था. मालिक भी उस के काम से बहुत खुश रहता था, पर इस के बावजूद किसी भी छोटीमोटी भूल पर कभीकभी बिना वजह ही उसे काम से निकाल दिया जाता था. इस में सलीम का कोई कुसूर नहीं होता था, कुसूर होता था मालिक की नीयत का.

मालिकों को यह डर रहता था कि एक खास मुद्दत तक काम करने के बाद सलीम पक्का मुलाजिम बन जाएगा और फिर उसे पक्की नौकरी की सारी सहूलियतें देनी पड़ेंगी, इसलिए इस मुसीबत को गले बांधने से पहले ही उसे काम से निकाल दिया जाता था.

मालिकों के दिल में यह डर सलीम की लियाकत और पढ़ाई को देख कर पैदा होता था. उन्हें लगता था कि कम पढ़ेलिखे आदमी को अगर वे 10 साल तक अपने यहां नौकर रखें और सारी सहूलियतें न भी दें, तब भी वह उन का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. पर सलीम के मामले में ऐसा मुमकिन नहीं था, यह सोच कर वे उसे पक्का होने से पहले ही निकाल देते थे.

‘‘ठीक है…’’ सईदा ने प्यार से सलीम के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘अब चिंता छोडि़ए… जो होना है, वही होगा. हर बार जो हुआ, इस बार भी वही होगा, इसलिए चिंता करने की क्या जरूरत है. चलिए, खाना खा लीजिए.’’

बीवी सईदा की बात सुन कर सलीम उठा और हाथ धोने के लिए चला गया.

हर बार कोई अलग बात नहीं होती थी. हफ्ता 10 दिन या कभीकभी एकाध महीना सलीम को बेकार रहना पड़ता था, फिर नया काम ढूंढ़ना पड़ता था. काम मिल ही जाता था.

इस बात को एक हफ्ता हो गया था. रोज सवेरे नौकरी की तलाश में सलीम बाहर जाता और शाम को थकहार कर वापस आ जाता.

‘‘एक बात कहूं,’’ एक दिन सईदा सलीम से बोली.

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘ऐसा कब तक चलता रहेगा? जोकुछ आप के साथ होता है, लगता है कि उम्रभर होता रहेगा. आखिर इस नौकरीनुमा गुलामी से क्या फायदा, जिस में हर पल नौकरी जाने का डर बना रहता है. आप ऐसा कोई काम क्यों नहीं करते, जो गुलामी की जंजीरों को हमेशा के लिए तोड़ दे और हमारे मन से ऐसा डर भी निकाल दे?’’

‘‘ऐसा क्या काम हो सकता है?’’

‘‘आप अपना ही कोई छोटामोटा कारोबार शुरू कर दो.’’

‘‘कारोबार शुरू करने के लिए हमारे पास पैसे कहां हैं?’’ सलीम सईदा की आंखों में झांकने लगा.

‘‘पैसे तो नहीं हैं, पर 15-20 हजार रुपए में भी तो काम शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘ऐसा कौन सा धंधा हो सकता है?’’

‘‘आप कपड़ों की दुकानों पर काम कर चुके हैं. आप को तो यह अच्छी तरह मालूम है.’’

‘‘हां,’’ सलीम ने कुछ सोचते हुए सईदा से कहा.

‘‘अगर आप कटपीस कपड़े ला कर बेचें, तो उस में हमें इतने पैसे मिल जाया करेंगे कि हमारी गुजरबसर हो जाए…’’

‘‘खयाल बुरा नहीं है. पर कपड़े बेचेंगे कहां? कोई दुकान तो नहीं है…’’

‘‘धंधा फुटपाथ से भी शुरू किया जा सकता है.’’

सईदा की बात सुन कर सलीम सोच में डूब गया.

दूसरे दिन सलीम एक ऐसी दुकान पर पहुंचा, जहां कमीजों के कटपीस मिलते थे. 10,000 रुपयों में अच्छाखासा कपड़ा आ गया. उसे 60 रुपया प्रति टुकड़ा पड़ा था. शाम को एक भीड़ भरे रास्ते के किनारे वह दुकान लगा कर बैठ गया.

‘‘100 रुपए में कमीज का कपड़ा है भाई, 100 रुपए में,’’ सलीम आवाज लगाता रहा.

सलीम की आवाज सुन कर आनेजाने वाले रुकते और कपड़े देखते. पसंद नहीं आता तो आगे बढ़ जाते. पसंद आता तो मोलभाव करने लगते. पर वह अपनी कीमत पर अड़ा रहता, तो ग्राहक पैसा दे कर कपड़ा ले लेते.

रात को जब सलीम कपड़ों की गठरी उठा कर आया, तो सईदा उसे देख कर हैरान रह गई, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम ने जो रास्ता बताया था, उसी पर चल रहा हूं. अपना छोटा सा धंधा शुरू कर दिया है… और यह आज की कमाई,’’ कहते हुए उस ने 500 रुपए सईदा के हाथ में रख दिए.

‘‘500 रुपए,’’ सईदा हैरानी से बोली.

‘‘जी हां…’’ सलीम हंस कर बोला, ‘‘शुरुआत तो अच्छी है, आगे देखो…’’

दूसरे दिन जब सलीम उसी जगह पर दुकान लगाने लगा, तो एक आदमी ने रोक दिया, ‘‘तू इधर दुकान नहीं लगा सकता.’’

‘‘क्यों?’’ सलीम ने पूछा.

‘‘इधर मेरी दुकान लगती है.’’

‘‘तुम्हारी दुकान यहां नहीं, सामने लगती है.’’

‘‘मतलब वही है. एक जगह 2 दुकानें नहीं लग सकतीं.’’

‘‘एक जगह 10 दुकानें भी लग सकती हैं… ग्राहक माल उसी दुकान से खरीदेगा, जहां उसे पसंद आएगा या सस्ता मिलेगा.’’

‘‘तू जाता है यहां से या मजा चखाऊं,’’ वह आदमी हाथापाई पर उतर आया. सलीम को भी गुस्सा आ गया. मारपीट में दोनों को चोंटें लगीं. राह चलते लोगों ने बीचबचाव किया. सामने वाला कमजोर पड़ रहा था, इसलिए यह कहता हुआ चला गया, ‘‘मैं तुझे देख लूंगा.’’

उस दिन भी सलीम ने 400 रुपए कमाए. पर उसे यह अच्छा नहीं लगा कि उसे इस काम के लिए किसी से झगड़ा करना पड़ा.

दूसरे दिन जब सलीम दुकान लगाने लगा, तो एक दादा किस्म के आदमी ने उसे रोक दिया, ‘‘तू यहां दुकान नहीं लगाएगा.’’

‘‘क्यों, आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘बोल दिया न… यहां दुकान नहीं लगाएगा का मतलब है… नहीं लगाएगा. यह मंगल दादा का हुक्म है. यहां पहले से अपना एक आदमी दुकान लगाता है. तू बहुत दादा बनता है क्या? हमारे आदमी को धमकी देता है… इस शहर में रहना है या नहीं?’’

‘‘लेकिन मंगल दादा, मेरी दुकान लगाने से उस के धंधे पर कोई…’’

‘‘फिर होशियारी बताई,’’ कहते हुए मंगल ने उसे एक घूंसा लगाया, तो उसे भी गुस्सा आ गया. उस ने भी मंगल दादा को घूंसा लगा दिया. मार खा कर मंगल दादा को गुस्सा आ गया. वह उस पर टूट पड़ा.

सलीम ने भी बराबरी का जवाब दिया. मंगल दादा कमजोर पड़ जाता, लेकिन उस के 4-5 साथी आ गए और वे सब उस से उलझ गए.

सलीम को बुरी तरह चोटें आईं.

‘‘जा, आज तुझे माफ कर दिया… अब जिंदगी में मंगल के मुंह नहीं लगना,’’ कहता हुआ वह चला गया.
सलीम कराहता हुआ घर आया. उस की हालत देख कर सईदा रोने लगी, ‘‘इस सब की जिम्मेदार मैं ही हूं. मैं ने ही आप को यह धंधा शुरू करने की सलाह दी थी.’’

2 दिन तक सलीम घर से बाहर नहीं निकल सका. दोस्त, रिश्तेदार मिलने आते तो सलीम को सारी कहानी सुनानी पड़ती.

‘‘क्या मंगल दादा और उस के साथियों ने आप को मारा?’’ सलीम के साले फारुख ने सुना, तो गुस्से से बोला,’’ मैं उसे देखता हूं… जो हुआ, भूल जाइए. आप फिर दुकान लगाइए. कोई भी आप को नहीं रोकेगा.’’

तीसरे दिन सलीम फिर वहां पहुंच गया और दुकान लगा दी.

थोड़ी देर बाद मंगल दादा आया और बोला, ‘‘अरे सलीम भाई, आप ने पहले क्यों नहीं बताया कि आप फारुख के जीजा हैं, वरना बात यहां तक पहुंचती ही नहीं. मैं ने जोकुछ किया, उस की माफी चाहता हूं.

‘‘फारुख मेरा बचपन का दोस्त है. मेरी वजह से फारुख के जीजा को दुख हुआ, मेरे लिए यह बड़े शर्म की बात है. आज के बाद कोई भी आप की ओर आंख उठा कर नहीं देखेगा. मैं ने उस आदमी को भी भगा दिया है, जो पहले वहां दुकान लगाता था.’’

‘‘नहीं दादा, उसे मत भगाइए… उसे भी धंधा करने दीजिए.’’ सलीम बोला.

अब सलीम का धंधा खूब चलने लगा. उसे अच्छी आमदनी होने लगी. जितनी तनख्वाह उसे नौकरी से मिलती थी, उतनी तो वह कभीकभी 7-8 दिन में ही कमा लेता था.

एक दिन नगरपालिका की गाड़ी आई और सलीम का सामान उठा कर ले गई.

फुटपाथ पर दुकान लगाने का जुर्माना भी अदा करना पड़ा और उस का आधा माल ही वापस मिल सका.

उस के बाद तो हफ्ते में एकाध बार नगरपालिका की गाड़ी जरूर आती और सड़क के किनारे लगी दुकानों को उठा ले जाती. गाड़ी के आते ही जो दुकानदार अपनी दुकानें ले कर भाग जाते, वे बच जाते, वरना सारा माल नगरपालिका वाले उठा ले जाते.

कभी सलीम गाड़ी के आते ही अपनी दुकान का माल उठा कर भाग जाता और कभी उस का माल पकड़ा जाता, जिस से उसे काफी नुकसान उठाना पड़ता.

इस नई मुसीबत से वह काफी परेशान हो गया था. डर यहां भी बना हुआ था. पूरी हिफाजत तो उसे दुकान ही दे सकती थी और दुकान किराए पर लेने और पगड़ी वगैरह देने के लिए उस के पास 40-50 हजार रुपए नहीं थे.

सलीम जहां दुकान लगाता था, उस के पास ही एक पान की दुकान थी, जो अशोक नामक एक आदमी की थी. आसपास और भी पान की दुकानें थीं, इसलिए उस का धंधा नहीं होता था.

अशोक अकसर ही सलीम से कहता था, ‘‘बस, अब बहुत हो गया सलीम भाई, मैं यह दुकान किसी और को किराए पर दे देता हूं और कोई धंधा शुरू करता हूं… यह तो चलती ही नहीं.’’

अशोक की बात सुन कर एक बात सलीम के दिमाग में आई. अगर वह इस दुकान को किराए कर ले ले, तो छोटी सी ही सही, वह यहां भी कपड़े की दुकान डाल सकता है. इस तरह नगरपालिका वालों की ओर से जो डर बना रहता है, उस से भी छुटकारा मिल जाएगा.

सलीम ने अशोक से बात की, तो वह 20,000 रुपए पगड़ी और 1,000 रुपए महीना किराए पर दुकान देने को तैयार हो गया.

सलीम के पास इतने पैसे तो नहीं थे, पर जब यह बात सईदा को मालूम हुई, तो उस ने अपने जेवर उसे दे दिए, ‘‘आप इन्हें बैंक में रख कर कर्ज उठा लीजिए और किसी भी तरह उस दुकान को किराए पर ले लीजिए.’’

आखिर सलीम ने वह दुकान किराए पर ले ही ली. थोड़ी सी रद्दोबदल के बाद उस ने कपड़े की अपनी छोटी सी दुकान शुरू कर दी.

दुकान के बाहर सलीम कटपीस रखता था और अंदर थान. वह वाजिब दाम लेता था. जब लोगों को मालूम हुआ कि उस के पास दूसरी दुकानों से काफी सस्ते कपड़े मिलते हैं, तो लोग उसी से कपड़े खरीदने लगे. इस तरह उस का धंधा खूब चल निकला. दुकान पर हमेशा भीड़ सी लगी रहती.

शहर में कपड़े सस्ते दामों पर कहां मिलते हैं, सलीम को यह बखूबी पता था. पर साथ ही साथ वह सीधे मिलों से भी कपड़ा मंगवाने लगा.

थोक दुकानदारों से भी सलीम की अच्छीखासी जानपहचान हो गई थी, इसलिए कभीकभी वे उसे उधारी पर भी माल दे देते थे. धंधा अच्छा होता था, इसलिए उसे पैसों की कमी भी महसूस नहीं होती थी. जितने का धंधा होता था, वह उतने ही पैसों का और माल ले आता था.

सलीम का धंधा बढ़ता जा रहा था. मिलने वाला मुनाफा भी धंधे में लग रहा था, इसलिए पैसा भी बढ़ता जा रहा था. अब उसे इस बात का अहसास हो रहा था कि अब उसे बड़ी दुकान ले लेनी चाहिए. उस का नाम भी हो गया था और लोग उस पर इतना यकीन भी करने लगे थे.

सलीम की दुकान के पास ही एक दुकान खाली हुई थी, पर मालिक 50,000 रुपए पगड़ी के मांग रहा था. सलीम के पास इतने पैसे नहीं थे. पर उतने पैसों से ज्यादा का माल उस के पास था. वह सोचने लगा कि अगर वह माल बेच कर उन पैसों से पगड़ी दे दे, तो दुकान में माल नहीं रहेगा, वह खालीखाली दिखाई देगी.

आखिर में सलीम ने यही फैसला किया कि माल तो बाद में भी भरा जा सकता है. पर इस वक्त जो दुकान मिल रही है, वह बाद में नहीं मिल सकती. उस ने नया माल खरीदना बंद कर दिया और पैसे जमा करने शुरू कर दिए. जब 50,000 रुपए जमा हो गए, तो उस ने दुकान किराए पर ले ली.

दुकान को सजाने में भी 10,000 रुपए लग गए, पर उस का धंधा पहले की तरह चल रहा था, इसलिए उसे पैसों की कमी महसूस नहीं हो रही थी.

नई दुकान इतनी बड़ी थी कि कई लाख रुपए का माल भरने के बाद वह खालीखाली दिखाई दे, जबकि सलीम चाहता था कि जब वह यह दुकान शुरू करे तो वह भरी हुई हो, इसलिए वह दुकान शुरू करने में हिचकिचा रहा था. पर ऐसे मौके पर थोक दुकानदारों ने उस का साथ दिया, उस की खूब मदद की.
अब सलीम अकेले नहीं संभाल सकता था, इसलिए उस ने 2 नौकर भी रख लिए.

आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिस दिन सलीम की दुकान का उद्घाटन था. उस के पुराने ग्राहकों ने भी साथ दिया. उन्हें सलीम पर यकीन था कि वह सस्ता और अच्छा कपड़ा ही बेचेगा, इसलिए उसी की दुकान से कपड़ा खरीदने लगे.

सलीम ने भी उन के यकीन को कायम रखा था. उस की दुकान उसी तरह से चलने लगी, जैसे शहर की दूसरी बड़ीबड़ी दुकानें चलती थीं.

काउंटर पर बैठा सलीम कभी ग्राहकों को देखता तो कभी अपने नौकरों को, जो ग्राहकों को कपड़े दिखा रहे होते थे. तब उसे बीते दिन याद आते थे, जब वह भी उन्हीं की तरह एक नौकर था और हर 3-4 महीनों के बाद काम से निकाल दिया जाता था.

पर सईदा ने सलीम को एक राह दिखाई. उस ने भी उस राह पर चलने की ठानी और उस के लिए मेहनत करनी शुरू कर दी. उस की मेहनत का ही यह फल था कि वह मालिक के रूप में उस दुकान में बैठा था.

लेखक – एम. मुबीन

Short Story: कर्तव्य – आदिल के मन में उस औरत के लिए क्यों जागी संवेदना

Short Story: आदिल के अब्बू की तबीयत आज कुछ ज्यादा ही खराब लग रही थी, इसलिए उस ने आज खबरों के लिए फील्ड पर न जा कर सरकारी अस्पताल के डाक्टर वर्माजी से मिलने अपने अब्बू को ले कर अस्पताल पहुंच गया था.

आदिल के अब्बू को दमे की दिक्कत थी, जिस की वजह से वे बहुत ही परेशान रहते थे. डाक्टर वर्मा की दवा से उन को फायदा था, इसलिए वह अब्बू का इलाज उन से ही करा रहा था.

जब आदिल अस्पताल पहुंचा, तो डाक्टर साहब अभी अपने कमरे में नहीं बैठे थे. पड़ोस में अधीक्षक साहब के औफिस से हंसीमजाक की आवाजें आ रही थीं. उस ने अंदाजा लगा लिया कि डाक्टर साहब अधीक्षक साहब के साथ बैठे होंगे.

आदिल अब्बू को एक बैंच पर लिटा कर खुद भी वहीं एक बैंच पर बैठ गया. तभी उस की नजर एक औरत पर पड़ी, जो अपने बीमार बच्चे को गोद में ले कर इधरउधर भटक रही थी, लेकिन काफी वक्त बीत जाने के बाद भी उस के बच्चे को अभी तक किसी डाक्टर ने नहीं  देखा था.

वह औरत अस्पताल में मौजूद स्टाफ से अपने बच्चे के इलाज के लिए गुहार लगा रही थी कि डाक्टर साहब को बुला दो, लेकिन कोई उस की बात सुनने को तैयार नहीं था. शायद उस का बच्चा काफी बीमार था, लेकिन कोई भी उस की मदद के लिए सामने नहीं आया था.

आदिल उस औरत को देख कर इतना तो समझ गया था कि वह काफी गरीब है, वरना वह इस कदर परेशान नहीं हो रही होती. अगर वह पैसे वाली होती, तो अभी तक बाहर के किसी प्राइवेट अस्पताल में जा कर अपने बच्चे को दिखा देती.

जानते हैं, सरकारी अस्पतालों की हालत. सरकार सरकारी अस्पताल इसीलिए खुलवा रही है कि गरीबों और बेबसों का मुफ्त इलाज हो सके, लेकिन इन भ्रष्ट डाक्टरों के चलते सरकारी अस्पताल इन की कमाई का अड्डा बन गए हैं, क्योंकि इन की इनसानियत मर चुकी है और वे गरीबों का खून चूसने से भी बाज नहीं आते.

आदिल ने एक नजर सामने लगी दीवार घड़ी पर डाली, जो सुबह के  11 बजने का संकेत दे रही थी. अस्पताल में मरीजों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी, लेकिन अभी तक किसी कमरे में कोई डाक्टर नहीं बैठा था, जिस से उस औरत के साथसाथ बाकी मरीज भी परेशान हो रहे थे.

आदिल को आज तक सरकारी महकमे का काम करने का तरीका समझ नहीं आया कि जनता के रुपयों से वे लोग तनख्वाह पाते हैं, लेकिन इस के बावजूद कभी कोई जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते.

आदिल एक टैलीविजन चैनल का पत्रकार होने के चलते कई बार सरकारी अस्पतालों की इस तरह की खबरें चला चुका है, लेकिन फिर भी हाल नहीं बदले, क्योंकि कमीशनबाजी के चलते ऊपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट बैठे थे, जिन का हिस्सा पहले ही पहुंच जाता था.

लेकिन बारबार खबरें चलाने के चलते उन लोगों ने आदिल के लिए जरूर परेशानी खड़ी कर दी थी. एक बार उस ने इसी अस्पताल की एक खबर डाक्टरों के द्वारा कमीशनबाजी के चलते बाहर के मेडिकल दुकानों की लिखी जाने वाली दवाओं पर चला दी थी, उसी दौरान उस को कुछ दवाओं की जरूरत पड़ गई थी, जो साधारण सी दवाएं थीं, लेकिन फिर भी उस की खबर चैनल पर चलने से नाराज किसी मैडिकल वाले ने उसे वे दवाएं नहीं दी थीं. इस के बाद उस ने किसी दूसरे पत्रकार साथी को भेज कर वे दवाएं मंगवाई थीं.

उस वक्त उसी पत्रकार ने आदिल को समझाया था कि ज्यादा बड़े पत्रकार मत बनो, पूरा सिस्टम भ्रष्ट है. तुम इन को नहीं सुधार सकते, लेकिन तुम जरूर किसी दिन इन के चक्कर में आ कर बहुतकुछ गंवा दोगे.

उस हादसे के बाद अब आदिल अस्पताल की कोई भी नैगेटिव खबर जल्दी नहीं चलाता था कि दोबारा वह इस तरह की मुसीबत में पड़े.

‘‘बाबूजी, हमारे बच्चे को बचा लो. इसे बहुत तेज बुखार हो गया है. इस के सिवा हमारा कोई भी नहीं है.’’

तभी किसी की आवाज सुन कर आदिल की तंद्रा टूटी. उस ने देखा कि वही औरत अपने बच्चे को ले कर उस के पास आ गई थी और रोरो कर वह उस से मदद की गुहार लगा रही थी.

उस औरत को अपने पास देख आदिल जरूर समझ गया था कि अस्पताल में मौजूद किसी शख्स ने उसे बता दिया था कि वह एक पत्रकार है.

उस औरत के आंसू और बच्चे के लिए तड़प उस से अब देखी नहीं जा रही थी. उस का चेहरा गुस्से से लाल होता जा रहा था, लेकिन वह यह भी अच्छी तरह जानता था कि अगर उस ने किसी तरह का कोई कदम उठाया, तो उस के लिए बहुत ही घातक साबित होगा, क्योंकि वह जानता था कि ये डाक्टर रूपी गिरगिट हैं, जो रंग बदलते देर नहीं करेंगे, जिस का नतीजा भी उस को भुगतना पड़ सकता है.

आदिल ने एक नजर बैंच पर लेटे अपने अब्बू पर डाली, जो उस की ओर ही देख रहे थे. उस की मनोदशा को वे अच्छी तरह से समझ रहे थे.

‘‘जो होगा देखा जाएगा,’’ आदिल ने मन ही मन तय किया. वह बैंच से उठा और मोबाइल का कैमरा चालू कर उस बेबस मां और उस के बीमार बच्चे के साथसाथ अस्पताल में मौजूद मरीजों की लगी भीड़ की एक वीडियो क्लिप बना ली. यही नहीं, उस ने एक बयान भी उस औरत का कैमरे में ले लिया कि वह कब से अपने बीमार बच्चे को ले कर भटक रही है वगैरह. फिर आदिल ने अधीक्षक के औफिस के पास पहुंच कर एक वीडियो अधीक्षक और डाक्टरों की पार्टी करते बना ली और चैनल पर खबर भेज कर खबर ब्रेक करा कर ट्वीट भी करा दी.

खबर चैनल पर चलने के बाद  5 मिनट भी नहीं गुजरे कि अस्पताल में हड़कंप मच गया.

औफिस के अंदर बैठे अधीक्षक व डाक्टर हड़बड़ाते हुए बाहर निकले और उस औरत के बच्चे को दाखिल कर उस के इलाज में जुट गए. यह देख कर आदिल को सुकून मिला कि अब वह बच्चा बच जाएगा.

‘‘बाबूजी, मैं आप का यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी,’’ कह कर वह औरत आदिल के पैर छूने लगी.

‘‘अरे, यह आप क्या कर रही हैं? उठिए, मैं ने कोई आप पर एहसान नहीं किया है. मैं ने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है,’’ आदिल ने उस औरत को उठाते हुए कहा.

तभी आदिल के अब्बू को दमे का अटैक पड़ गया और वे तड़पने लगे. यह देख कर उस ने तुरंत अब्बू का इन्हेलर निकाल कर उस में कैप्सूल लगा कर अब्बू के मुंह पर लगा दिया. अब्बू ने जोर से सांस खींचनी चाही, पर वे ऐसा नहीं कर सके.

यह देख कर आदिल तुरंत डाक्टर वर्मा को बुलाने पहुंच गया, जो किसी मरीज को देख रहे थे. उस ने अब्बू का हाल बता कर चलने के लिए कहा. लेकिन उन्होंने थोड़ा वक्त लगने की बात कह कर बाद में आने के लिए बोल दिया.

आदिल वापस अब्बू के पास आ गया, जो सांस न ले पाने के चलते काफी परेशान हो गए थे. वह थोड़ी देर तक बैठा उन के सीने को सहलाता रहा. उस के बाद फिर वह डाक्टर वर्मा को बुलाने पहुंच गया.

‘‘अरे, सौरी आदिल भाई, मैं तो भूल ही गया था. चलो, चलता हूं. कहां हैं तुम्हारे बाबूजी?’’ उसे देख कर डाक्टर वर्मा ने कहा और उस के साथ चल दिए.

‘‘आप के बाबूजी की तबीयत तो काफी ज्यादा खराब है. आप को इन  को जिला अस्पताल ले कर जाना पड़ेगा,’’ आदिल के अब्बू की हालत  देख कर डाक्टर वर्मा ने मानो ताना मार कर कहा.

डाक्टर की बात सुन कर आदिल समझ गया कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं. वह जानता था कि खबर चलने के बाद वे उस को परेशान जरूर करेंगे, क्योंकि अब्बू का यह अटैक तो कुछ भी नहीं था. इस से पहले जो अब्बू को  अटैक आए थे, वे भी ज्यादा तेज थे, तब तो उन्होंने महज एक इंजैक्शन लगा कर ही कंट्रोल कर लिया था, लेकिन अब वे उस से चिढ़ कर ही ऐसा कर  रहे हैं.

आदिल को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, क्योंकि अब्बू की हालत वहां ले जाने वाली नहीं थी, अगर वह उन्हें यहां से ले जाता है तो भी वहां तक पहुंचतेपहुंचते काफी देर हो जाएगी.

‘‘बाबूजी, हमारी वजह से ही आप को परेशानी हो रही है. अगर आप हमारी मदद न करते तो ये डाक्टर साहब अब्बू को जरूर ठीक कर देते,’’ उसे परेशान देख कर उस औरत ने हाथ जोड़ते हुए उस से कहा.

तभी एक बार फिर आदिल के बाबूजी तड़पने लगे, लेकिन सामने खड़ा कोई भी डाक्टर या फिर कोई स्टाफ उन को देखने तक नहीं आया. तभी उस के अब्बू को जोर से खांसी आने लगी  और फिर वे शांत हो गए. उस के अब्बू हमेशा के लिए उसे छोड़ कर जा चुके थे, बहुत दूर.

Hindi Story: महावर की लीला

Hindi Story, लेखक- नीरजा द्विवेदी

पुराने समय से भारतीय ललनाओं के सौंदर्य उपादानों में जो सोलह शृंगार प्रचलित हैं उन में महावर का खास महत्त्व है. कहावत है कि महावर लगे कोमल चरणों से सुंदरियां जब अशोक के वृक्ष पर चरणप्रहार करती थीं तब उस पर कलियां खिलने से वसंत का आगमन होता था. सौंदर्य उपादानों में महत्त्वपूर्ण ‘महावर’ नई पीढ़ी के लिए सिंधु घाटी की सभ्यता के समान अजायबघर की वस्तु बन गई है.

सादा जीवन और उच्च विचार भारतीय संस्कृति की परंपरा समझी जाती थी परंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम में वह परिभाषा कब बदल गई, मैं नहीं जानती.

आज ब्यूटीपार्लर में किया गया सौंदर्योपचार, नुची हुई तराशी भौंहें, वस्त्रों से मेल खाती अधरों की लिपिस्टिक व नेलपालिश, कटे लहराते बाल, जीन्सटौप या अन्य आधुनिक वस्त्राभूषण, नाभिकटिदर्शना साड़ी एवं पीठप्रदर्शना या सर्वांग प्रदर्शना ब्लाउज, वस्त्रों से मेल खाते पर्स एवं ऊंची एड़ी की चप्पलें, फर्राटे से अंगरेजी में वार्त्तालाप या बन कर बोलते हुए मातृभाषा हिंदी का टांगतोड़ प्रदर्शन अब सुशिक्षित, संभ्रांत स्त्री की परिभाषा बन गया है.

भारतीय वेशभूषा बिंदी, चूड़ी, लंबी चोटी, जूड़ा, महावर, बिछुआ एवं सलीके से साड़ी पहनना आदि, जिन्हें कभी संभ्रांत घर की गृहिणी की गरिमा माना जाता था, अब अपनी ऊंचाई से गिर कर अशिक्षा एवं निम्न वर्ग तथा निम्न स्तर का पर्याय समझे जाने लगे हैं. ऐसी भारतीय वेशभूषा में सज्जित युवतियां ‘बहिनजी’ कहला कर उपहास की पात्र बन जाती हैं. उस पर हिंदी में बातचीत करना, यह तो आधुनिक समाज में ठेठ देहातीपन की निशानी है.

मुझे इस बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव तब हुआ जब नवंबर में दिल्ली में ‘एस्कोर्ट्स हार्ट सेंटर’ में एंजियोग्राफी के लिए भरती होना पड़ा. उस के पहले ही मैं दीवाली मनाने अपनी सास के पास गांव मानीकोठी गई थी. गांव की परंपरा के अनुसार त्योहार पर जब सब सुहागिनें महावर लगवा रही थीं तो मुझे भी बुलाया गया. मन ही मन मैं आशंकित थी कि अस्पताल जाने के पहले महावर लगवाऊं या नहीं.

अपनी सास की इच्छा का आदर करने के लिए मैं ने महावर लगवा लिया. एंजियोग्राफी से पहले अस्पताल का ही पायजामा एवं गाउन पहनना पड़ा. मैं ने बाल खोल कर केवल चोटी बना ली एवं मेकअप करने की आवश्यकता नहीं समझी. जब मैं मेज पर लेटी थी तो वहां का डाक्टर मेरे पैरों में लगे महावर को देख कर चौंक पड़ा. पैरों के समीप पहुंच कर उस ने रंग को छू कर देखा. उंगलियों से कुरेद कर बोला, ‘‘यह क्या लगा है?’’

‘‘महावर है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों लगाया है?’’ उस ने प्रश्न किया.

‘‘मेरी सास गांव में रहती हैं. दीवाली पर उन के आग्रह पर मैं ने लगवाया था.’’

पैरों में लगा महावर, सर में चोटी, मेकअपविहीन चेहरा और हिंदी में मेरा बातचीत करना…अब क्या कहूं, उक्त डाक्टर को मैं नितांत अशिक्षित गंवार महिला प्रतीत हुई. क्षणभर में ही उस का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया.

‘‘माई, कहां से आई हो?’’

मैं ने चौंक कर इधरउधर देखा… यह संबोधन मेरे लिए ही था.

‘‘माई, सीधी लेटी रहो. तुम कहां से आई हो?’’ मेरे पैरों को उंगली से कुरेदते हुए उस ने दोबारा प्रश्न किया.

अनमने स्वर से मैं ने उत्तर दिया, ‘‘लखनऊ से.’’

‘‘माई, लखनऊ तो गांव नहीं है,’’ वह पुन: बोला.

‘‘जी हां, लखनऊ गांव नहीं है, पर मेरी सास गांव में रहती हैं,’’ मैं ने डाक्टर को बताया.

कहना न होगा कि पैरों में महावर लगाना, बाल कटे न रखना, मेकअप न करना और मातृभाषा के प्रति प्रेम के कारण हिंदी में वार्त्तालाप करना उस दिन उस अंगरेजीपसंद डाक्टर के सामने मुझे अशिक्षित एवं ठेठ गंवार महिला की श्रेणी में पेश कर गया, जिस का दुष्परिणाम यह हुआ कि डाक्टर ने मुझे इतना जाहिल, गंवार मान लिया कि मुझे मेरी रिपोर्ट बताने के योग्य भी नहीं समझा.

कुछ साल पहले भी मुझे एक बार एस्कोर्ट्स में ही एंजियोग्राफी करानी पड़ी थी पर तब के वातावरण एवं व्यवहार में आज से धरतीआकाश का अंतर था.

अगले दिन जब मैं अपनी रिपोर्ट लेने गई तो कायदे से साड़ी पहने और लिपिस्टिक आदि से सजी हुई थी. डाक्टर साहब व्यस्त थे, अत: मैं पास की मेज पर रखा अंगरेजी का अखबार पढ़ने लगी. जब डाक्टर ने मुझे बुलाने के लिए मेरी ओर दृष्टि उठाई तो मेरे हाथ में अखबार देख कर उन का चौंकना मेरी नजरों से छिपा नहीं रहा. उन्होंने ध्यान से मेरी ओर देखा और बोले, ‘‘यस, प्लीज.’’

‘‘मेरी एंजियोग्राफी कल हुई थी, मेरी रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है,’’ मैं ने भी अंगरेजी में उन से प्रश्न किया.

आश्वस्त होने के लिए मेरे पेपर्स को डाक्टर ने एक बार फिर ध्यान से देखा और प्रश्न किया, ‘‘क्या नाम है आप का?’’

‘‘नीरजा द्विवेदी,’’ उत्तर देने पर उन्होंने पुन: प्रश्न किया, ‘‘आप कहां से आई हैं?’’

डाक्टर ने इस बार ‘माई’ का संबोधन इस्तेमाल न करते हुए मुझे ‘मैडम’ कहते हुए न सिर्फ रिपोर्ट मुझे सौंप दी बल्कि निकटता बढ़ाते हुए रिपोर्ट की बारीकियां बड़े मनोयोग से समझाईं.

अब मैं इसी ऊहापोह में हूं कि ‘महावर’ से ‘माई’ कहलाने में भलाई है या लिपिस्टिक और नेलपालिश से ‘मैडम’ कहलाने में.

Hindi Story: पहली तारीख – रेखा अपने पति के सरप्राइज से क्यों हैरान हो गई?

Hindi Story: डोरबैल बजी तो रेखा ने दरवाजा खोला. न्यूजपेपर वाला हाथ में पेपर लिए किसी से फोन पर बात कर रहा था. रेखा ने उस के हाथ से अखबार ले दरवाजा बंद किया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. जैसे ही रेखा ने दरवाजा खोला तो अखबार वाला बोला, ‘‘मैडम, यह हिंदी का अखबार. आप के घर हिंदी और अंगरेजी 2 पेपर आते हैं.’’

‘‘अरे, फिर तभी क्यों नहीं दे दिया?’’

‘‘जब तक देता, आप ने दरवाजा ही बंद कर दिया,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है,’’ कह रेखा ने अखबार ले कर दरवाजा बंद कर दिया. तभी विपुल यानी रेखा के पति का शोर सुनाई दिया.

‘‘अरे भई कहां हो?’’ रेखा के पति विपुल की आवाज आई.

तभी डोरबैल भी बजती है. रेखा परेशान सी दरवाजा खोलने चल दी. दरवाजा खोला तो सामने वही अखबार वाला खड़ा था. अब रेखा ने गुस्से से पूछा, ‘‘अब क्या है?’’

‘‘मैडम, वह अखबार का बिल,’’ अखबार वाला बोला.

‘‘पहले नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से से कह रेखा ने दरवाजा बंद कर दिया.

उधर विपुल आवाज पर आवाज लगाए जा रहा था, ‘‘रेखा, तौलिया तो दे दो, मैं नहा चुका हूं. कब से आवाजें लगा रहा हूं.’’

रेखा ने तौलिया पकड़ाया ही था कि फिर से डोरबैल बजी. दरवाजा खोलते ही रेखा गुस्से में चीखी, ‘‘क्यों बारबार बैल बजा रहे हो?’’

‘‘मैडम, यह गृहशोभा.’’

‘‘नहीं चाहिए,’’ कह रेखा दरवाजा बंद करने लगी.

तभी अखबार वाला बोला, ‘‘अरे, आप ने ही तो कल मैगजीन लाने को बोला था.’’

‘‘क्या ये सब काम एक बार में नहीं कर सकते?’’ कह रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया.

‘‘इतनी देर लगती है क्या तौलिया देने में?’’ विपुल बोला.

‘‘मैं क्या करती, घंटी पर घंटी बजाए जा रहा था, तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘लगता है तुम्हें पसंद करता है,’’ विपुल हंसते हुए बोला.

‘‘विपुल, मैं मजाक के मूड में नहीं हूं.’’

तभी फिर डोरबैल बजती है. रेखा गुस्से से दरवाजा खोल कर बोली, ‘‘अब क्या है?’’

सामने दूध वाला था. बोला, ‘‘मैडम दूध.’’

रेखा ने थोड़ा शांत हो दूध ले लिया.

‘‘अरे भई नाश्ता लगाओ. देर हो रही है. औफिस जाना है,’’ विपुल की आवाज आई.

रेखा आंखें तरेरते हुए विपुल को देख किचन में चली गई. विपुल किसी से फोन पर बात कर रहा था.

फिर डोरबैल बजी. रेखा ने झल्लाते हुए दरवाजा खोला.

‘‘मैडम, दूध का बिल,’’ दूध वाला बोला.

‘‘क्या परेशानी है तुम सब को? क्या यह बिल दूध के साथ नहीं दे सकते थे?’’ गुस्से में बोल रेखा ने बिल ले लिया.

‘‘क्या खिला रही हो नाश्ते में?’’ विपुल बोला.

रेखा बोली, ‘‘अपना सिर… घंटी पर घंटी बज रही… ऐसे में क्या बन सकता है? ब्रैडबटर से काम चला लो.’’

‘‘अरे, तुम्हारे हाथों से तो हम जहर भी खा लेंगे,’’ विपुल ने कहा.

‘‘देखो, मैं इतनी भी बुरी नहीं हूं,’’ रेखा बोली.

तभी फिर से डोरबैल बज उठी. रेखा गुस्से से बोली, ‘‘विपुल, दरवाजा खोलो… फिर मत कहना मुझे औफिस को देर हो रही है.’’

विपुल ने फोन पर बात करते हुए ही दरवाजा खोला. दूध वाला ही खड़ा था.

दूध वाला बोला, ‘‘साहब, हम कल दूध देने नहीं आएंगे.’’

‘‘जब दूध दिया था तब नहीं बता सकते थे?’’ विपुल ने डांटा.

‘‘सर, भूल गया था.’’

विपुल औफिस चला गया. औफिस पहुंच कर उस ने रेखा को फोन किया. तभी फिर घंटी बज उठी. रेखा जब दरवाजा खोलने पर पेपर वाले को देखती है, तो उस का गुस्सा 7वें आसमान को छू जाता है. विपुल फोन लाइन पर ही था. अत: बोला, ‘‘अरे, रेखा अब कौन है?’’

‘‘वही तुम्हारा पेपर वाला.’’

‘‘यह क्या बना रखा है… क्या सारा दिन दरवाजे पर ही बैठे रहें एक चौकीदार की तरह?’’

‘‘अब क्या लेने आए हो?’’ रेखा तमतमाते हुए बोली.

‘‘सुबह के 50 दे दो… फिर से नहीं आऊंगा,’’ पेपर वाला बोला.

‘‘कोई 50 नहीं मिलेंगे. चले जाओ यहां से,’’ रेखा ने कहा.

इस बीच फोन कट गया था. वह नहाने जा ही रही थी कि फिर से डोरबैल की आवाज पर भिन्ना गई. दरवाजा खोला तो सामने केबल वाला खड़ा था.

‘‘मैडम, केबल का बिल,’’ वह बोला.

‘‘कुछ और देना है तो वह भी दे दो.’’

‘‘मैडम, समझा नहीं,’’ वह बोला.

‘‘कुछ नहीं,’’ रेखा ने जोर से दरवाजा बंद कर दिया और फिर नहाने चली गई.

तभी उसे कुछ शोर सुनाई देता है. ध्यान से सुनने पर, ‘मैडमजी, मैडमजी,’ एक लड़की की आवाज सुनाई दी.

नहा कर दरवाजा खोला तो सामने नौकरानी की लड़की खड़ी थी.

रेखा ने पूछा, ‘‘क्या चाहिए?’’

‘‘मैडमजी, मम्मी आज काम पर नहीं आएंगी. शाम को जिस औफिस में सफाई करती हैं, वहां पगार लेने गई हैं… वहां लंबी लाइन लगी है.’’

रेखा गुस्से में बोली, ‘‘अच्छाअच्छा, ठीक है.’’

‘इसे भी आज ही…’ रेखा मन ही मन बड़बड़ाई और फिर सोचने लगी कि आज खाने में बनेगा क्या… इतनी देर हो गई है… घड़ी की तरफ देखा 1 बज चुका था. अभी सोच ही रही थी कि फिर घंटी बजी. वह चुपचाप यह सोच बैठी रही कि अब दरवाजा नहीं खोलेगी. 2… 3… 4… बार घंटी बजी पर वह नहीं उठी.

तभी फोन बजा. विपुल बोला, ‘‘अरे भई, क्या हम यहीं खड़े रहेंगे… दरवाजा तो खोलो.’’

रेखा मन ही मन सोचती कि इतनी जल्दी कैसे आ गए? क्या बात है? फिर जल्दी से दरवाजा खोला.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ विपुल बोला.

‘‘अरे, आप इतनी जल्दी कैसे आ गए?’’

‘‘कैसे आ गए. तुम सुबह से परेशान थीं. सोचा, चलो आज लंच बाहर ही करते हैं.’’

रेखा सवाल भरी निगाहों से विपुल की तरफ देखने लगी तो वह बोला, ‘‘अरे बावली, आज पहली तारीख है.’’

Short Story: रहने दो रिपोर्टर

अतीत के काले पन्नों को भूल कर विमल और गंगा ने नई गृहस्थी की शुरुआत की. दोनों अपने जीवन से संतुष्ट थे लेकिन रिपोर्टर द्वारा दुनिया वालों के सामने उसी अतीत की जो धूल फिर उड़ी उस ने सबकुछ मटियामेट कर दिया.

वह आज पूरी तरह छुट्टी मनाने के मूड में था. सुबह देर से उठा, फिर धीरेधीरे चाय पीते हुए अखबार पढ़ता रहा था. अखबार पूरी तरह से चाटने के बाद उस का ध्यान घर में छाए सन्नाटे की तरफ गया. आज न पानी गिरने की आवाज, न बरतनों की खटरपटर, न झाड़ूपोंछे की सरसराहट, जबकि घर में कुल 2 छोटेछोटे कमरे हैं. वह एकाएक ही किसी आशंका से पीडि़त हो उठा. गंगा इतनी शांति से क्या कर रही है, वह उसे चौंकाने के विचार से ही नहीं उठा था.

बरामदे में पैर रखते ही वह सहम सा गया. गंगा वाशबेसिन के पास चुपचाप बैठी हुई थी और सामने रखी बोतल को ध्यान से देख रही थी.

‘‘गंगा, वह तेजाब की बोतल है,’’  उस ने आशंकित स्वर में कहा, ‘‘मैं बाथरूम साफ करने के लिए लाया था. काई जमी हुई है न, रोज तुम रगड़ती रहती हो. देखना, इसे जरा सा डाल कर रगड़ने से एकदम साफ हो जाएगा…किंतु तुम उसे नहीं छूना.’’

‘‘अच्छा,’’ उस ने कहा लेकिन अभी भी जैसे वह सोच में डूबी हुई थी.

‘‘क्या सोच रही हो, गंगा?’’ उस ने कंधा पकड़ कर उसे झकझोर दिया.

‘‘सोच रही हूं कि इस के लगाने से चेहरा बदल जाएगा, तब कोई

मुझे पहचान नहीं पाएगा, पहचान भी

ले तो…लेकिन तुम्हारी भावनाएं क्या होंगी?’’

‘‘मेरी भावनाओं का आदर करती हो तो अब से कभी यह विचार मन में न लाना.’’

‘‘पता नहीं क्यों, भय लगता है.’’

‘‘तुम भयभीत क्यों होती हो? मैं ने सबकुछ जानने के बाद ही तुम से विवाह किया है, हमारा विवाह कानूनसम्मत है, कोई हमें अलग नहीं कर सकता, समझीं.’’

तभी दरवाजे पर आहट हुई. विमल ने द्वार खोला. पड़ोसी जोशीजी की छोटी बेटी लतिका थी. बाहर से ही बोली, ‘‘काकी, आज हमारे घर में हलदी- कुमकुम होना है. मां ने  तुम को बुलाया है.  दिन में 2 से 5 बजे तक जरूर आ जाना. अच्छा, मैं जाती हूं. मुझे बहुत घरों में बोलने जाना है.’’

गंगा ने प्रश्न भरी आंखों से पति की ओर देखा, जैसे पूछ रही हो कि आज जोशीजी के घर क्या है?

‘‘सुहागिन महिलाओं को घर बुलाते हैं. टीका करने के बाद नाश्तापानी, गानाबजाना होता है. मेरे घर तो आज पहली बार इस तरह का बुलावा आया है और पहले आता भी कैसे, सुहागिन तो अभी आई है.’’

गंगा मुसकराई फिर गंभीर हो उठी. विमल ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘‘सोचा था दिनभर साथसाथ घूमते रहेंगे… जोशीजी को भी आज का ही दिन मिला.’’

‘‘मैं अपनी हाजिरी लगा कर शीघ्र ही आ जाऊंगी.’’

‘‘नहींनहीं, जब सब उठें तभी तुम भी उठना. पहली बार बुलाया है उन्होंने, मेरी चिंता न करो, तुम्हारे वापस आने तक मैं सोता रहूंगा.’’

‘‘कैसा रहा आज,’’ जोशी के घर से वापस आने पर विमल ने गंगा से पूछा.

‘‘बहुत अच्छा. बड़े अच्छे लोग हैं, मैं तो अभी किसी से मिली ही नहीं थी. आसपास की सभी महिलाएं आई थीं और सभी ने मुझ से खूब प्यार से बातें कीं..’’

‘‘अच्छा, सब की बोली समझ में आई?’’

‘‘हां, थोड़ीबहुत तो समझ में आ ही जाती है. वैसे मुझ से तो हिंदी में ही बोल रही थीं.’’

मेलमुलाकात का सिलसिला चल निकला तो बढ़ता ही रहा. विमल खुश था कि गंगा का मन बहल गया है.

अब वह पहले जैसी सहमीसहमी नहीं रहती बल्कि अब तो वह अपनी नईनई गृहस्थी की सुखद कल्पनाओं में खोई रहती है.

एक दिन बेहद खुश हो कर गंगा ने  विमल से कहा, ‘‘सुनो, मैं भी सब को हलदीकुमकुम का बुलावा दे रही हूं. जोशी काकी ने कहा है कि वह सब तैयारी करवा देंगी. मैं ने सामान की सूची बना ली है.’’

‘‘ठीक है, हम कल शाम को बाजार चल कर सब सामान ले आएंगे.’’

बाजार में जाते हुए विमल फूलों की वेणी वाले को देख कर रुक गया. गंगा वेणी लगाने में सकुचाती थी. विमल ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम अपनी सहेलियों की तरह वेणी लगाया करो. हलदीकुमकुम करोगी, वेणी नहीं लगाओगी?’’

तभी विमल को  किसी ने टोकते हुए कहा, ‘‘नमस्ते, साहब. ऐसा लगता है, आप को कहीं देखा है…’’

‘‘मुझे…जी, मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘आप वही विमल साहब हैं न जिन्होंने अपना नाम समाचारपत्र में देने से मना किया था.’’

‘‘जी, जी…मैं आप को नहीं पहचानता,’’ और गंगा का हाथ पकड़ कर सामने से आते रिकशे को रोक कर उस पर बैठते हुए विमल ने कहा, ‘‘चलो गंगा, घर चलते हैं.’’

दूसरे दिन सुबह चाय का प्याला लिए विमल अपनी बालकनी में बैठा धूप की गरमाहट महसूस कर ही रहा था कि द्वार पर आहट हुई.

‘‘नमस्कार, मैं जयंत हूं.. आप जो समाचारपत्र पढ़ रहे हैं, मैं उसी का एक अदना सा रिपोर्टर हूं.’’

विमल का चेहरा बुझ गया. अनमने मन से स्वागत कर उन के लिए चाय मंगाई.

जयंत कहे जा रहा था, ‘‘कहते हैं कि बड़े लोग विनम्र होते हैं, आप तो साक्षात विनम्रता के अवतार लगते हैं. इतने उदार, समाज सुधारक, अभिमान तो नाम को नहीं…’’

विमल ने प्रतिवाद किया, ‘‘ऐसा लगता है आप किसी भ्रम में हैं. मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूं जो आप समझ रहे हैं.’’

‘‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि आप जैसा महान व्यक्ति प्रचार से दूर रहना चाहता है पर आप ने जो कुछ किया उसे जान कर मुझे गर्व का अनुभव हुआ.’’

‘‘मैं ने क्या किया…मैं तो किसी प्रशंसा के लायक नहीं…’’

‘‘आप संकोच न करें, गुप्ताजी ने मुझे सब बता दिया है. अरे, वही गुप्ताजी जो कल आप से मिले थे. आप ने उन्हें नहीं पहचाना हो पर वह तो आप को पहचान गए हैं. आप की पत्नी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की हैं न?’’

विमल मना न कर सका. रसोई के दरवाजे पर खड़ी गंगा का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘देखिए, मेरा कोई स्वार्थ नहीं,’’ रिपोर्टर जयंत ने कहा, ‘‘कोई लांछन का उद्देश्य नहीं, आप की इज्जत जितनी है वह आप को नहीं मिल रही है. मैं तो केवल इसलिए आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से सबक मिले. ऐसा समाज सुधारक छिप कर नहीं बैठता है. इसलिए मैं आप को प्रकाश में लाना चाहता हूं कि लोगों को आप से प्रेरणा मिले. लोग जानेंगे कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं, प्यार आदमी को बदल देता है.

‘‘यह चित्र विवाह के बाद का है न,’’ कमरे में कोने की मेज पर गंगा का चित्र रखा हुआ देख कर उस ने उठा लिया, ‘‘मैं अभी आप को दे जाऊंगा, यह सिगरेट लीजिए न, विदेशी है…मेरा पेशा ही ऐसा है भाई, लोग बहुत आवभगत करते हैं समाचारपत्र में अपना नाम देखने के लिए. मेरा रुतबा ही

इतना है…भाभी, आप का एक चित्र

लेना है, रसोई में काम करते हुए…लोग देखेंगे. वह, कैसी सुघड़ गृहिणी हैं,

कैसी सुंदर गृहस्थी है…हां, तो आप ने जानकी को गंगा नाम दिया. बहुत

ठीक, गंगा तो पवित्र है, गंगा मैली थोड़े होती है.

‘‘अच्छा, धन्यवाद, मैं चलता हूं,’’ वह कागजकलम समेट कर उठ गया. विमल नीचे तक पहुंचा कर आया तो गंगा वैसे ही दीवार से सटी खड़ी थी. मौन,  चिंतित, भयाक्रांत, प्रशंसा के मद से मस्त. विमल को देर हो रही थी, ध्यान नहीं दिया.

शाम को उस ने हलदीकुमकुम के लिए सामान लाने को कहा तो गंगा ने मना कर दिया, ‘‘अभी ठहर कर लाऊंगी.’’

तीसरे दिन समाचारपत्र के तीसरे पेज पर वही चित्र था जो उन के घर की मेज पर रखा था. दूसरा चित्र गंगा का रसोई में काम करते हुए. साथ में संक्षेप से उस की यातना की कहानी के साथ ही विमल की महानता की कहानी छपी थी.

विमल को उठने में देर हो गई थी. समाचारपत्र ऊपरऊपर से देख कर वह काम पर जाने के लिए तैयार होने लगा कि उस से मिलने वाले एकएक कर आने लगे. फ्लैट के सभी लोग आए और उस के उदार नजरिए पर बधाई दी.

‘‘प्रचारप्रसार से इतनी दूर कि आज का समाचार- पत्र तक नहीं देखा, जबकि अपने बारे में आप को छपने की आशा थी.’’

‘‘वाह, आप धन्य हैं. आप दोनों सुखी रहें, हमारी कामना है.’’

गंगा भोजन तैयार न कर सकी और न नाश्ते का डब्बा ही. वह अपने अंदर एक अज्ञात भय महसूस कर रही थी.

विमल तैयार हो कर आया तो बोला, ‘‘मैं वहीं कुछ खा लूंगा. तुम अपना ध्यान रखना.’’

पुरुषों के जाने के बाद महिलाओं की बारी आई. एकएक कर सब गंगा का हाल पूछने पहुंच गईं. सब में यह बताने की होड़ लगी थी कि सब से पहले किस ने समाचारपत्र देखा और कैसे एकदूसरे को जानकारी दी. फिर सभी ने एक स्वर से कहा कि हमें नहीं पता था कि आप का नाम जानकी है. वैसे नाम तो हम लोग भी पतिगृह का दूसरा रखते हैं. आप के गांव में ऐसा नहीं होता क्या?

‘‘जानकी तो पतिव्रता स्त्री का

नाम था,’’ एक के मुंह से निकला तो दूसरी ने कहा, ‘‘बेचारी औरत का क्या दोष.’’

इस तरह सभी ने गंगा से सहानुभूति दिखाई. खाली चौका देख कर कई घरों से खाना आ गया. जबरन कौरकौर खिलाया और आंसू पोंछे. अपने प्रति कोमल भावनाएं देख कर गंगा को लगा कि उस की आशंका निर्मूल थी, वह व्यर्थ ही इतनी भयभीत हो रही थी कि उस का अतीत जान कर कहीं लोग उस से घृणा न करने लगें, फिर भी वह आश्वस्त न हो पाई.

विमल ने सुबह कहा था कि शाम को तैयार रहना, डाक्टर को दिखाना है और बाजार भी जाना है. किंतु शाम को वह कहीं नहीं गई. 3 दिन हो गए वह घर से निकली ही नहीं.

काशी बाई 2 दिन बाद आई तो बाहर से ही बोली, ‘‘बाई, मेरी पगार जितनी बनती है दे दो.’’

गंगा चकित हो उस से काम न करने का कारण पूछने ही वाली थी कि तभी सुना, ‘‘जूठा साफ करते हैं तो क्या, हमारा धरमईमान तो बना है. छि:, ऐसी बाई के घर कौन काम करेगा.’’

कूड़ा फेंकने वाली मीनाबाई ने भी कहा, ‘‘गंदा साफ करते हैं तो क्या हुआ, हमारा भी धरम है, अपने मरद के लिए तो मैं सच्ची हूं.’’

भाजी वाला आया था. गंगा साहस कर के नीचे उतरी ताकि कुछ सब्जीभाजी खरीद ले. गोभी, मटर का भाव पूछते ही वह मुसकराया, ‘‘अजी, आप जो चाहे दे दें…’’

गंगा ने यथार्थ समझ लिया था. अंदर ही अंदर घुटती रही. एक घर से गीतों का बुलावा आया हुआ था. विमल ने कहा, ‘‘दिन में थोड़ी देर को चली जाना और शगुन दे देना.’’

गंगा कहीं जाने को तैयार नहीं थी. विमल समझाता रहा, ‘‘देखो, हमें कमजोर नहीं पड़ना है. हम ने कोई बुरा काम तो किया नहीं है. मजबूरी ने जो करा दिया उस के लिए लज्जित क्यों हों? तुम अवश्य जाओ और सब के बीच में मिलोजुलो अन्यथा लोग हमें गलत समझेंगे, दोषी समझेंगे, उन के घर लड़की का विवाह है. तुम को गीतों में बुलाया है. नहीं जाओगी तो कहीं वे लोग बुरा न मान जाएं कि पास में रह कर नहीं आई.

गंगा दुविधा में थी. जोशी काकी के मुख से सुन ही लिया था और लोग भी ऐसा ही कहें तब…उधर विमल का कहा भी मन में गूंजता रहा तो वह बड़ा साहस जुटा कर वहां गई थी.

गाना चल रहा था. कुछ महिलाएं नृत्य कर रही थीं. हंसीखुशी का वातावरण था, उसे देखते ही नृत्य थम गया, गाना बंद हो गया और सब की नजर उस की ओर थी. उसे याद आया जब पहले वह जोशी काकी के घर गई थी तो वहां भी गाना हो रहा था किंतु उस के जाते ही सब ने उस का स्वागत किया था और उन नजरों में कौतूहल था पहचान का, परिचय का किंतु स्नेह का भाव भी था.

आज पहले तो सब एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराईं, घर की मालकिन ने उसे बैठने का संकेत किया तो पास की महिलाएं इस तरह सरक कर बैठीं जैसे उस के स्पर्श से बच रही हों.

परस्पर फुसफुसाहट हुई, पर उस से न बोलने की चुप्पी  का प्रहार इतना मुखर था कि गंगा अधिक देर वहां बैठ न सकी. शगुन का लिफाफा हाथ में ही रह गया. वह उठी तब भी उस से किसी ने बैठने को न कहा, न जल्दी जाने का कारण पूछा.

कुहराम मचा हुआ था. गंगा ने स्नान घर में मिट्टी का तेल छिड़क कर अपने को जला लिया था. विमल के नाम एक पत्र रखा था जिस में लिखा था :

‘‘औरत पर कलंक लग जाए तो कलंक के साथ ही जीना होता है. आप पुरुष हैं दूसरा विवाह कर लेंगे किंतु मेरे साथ रह कर आप भी कलंकित ही रहेंगे. मैं इस लांछन को सह भी लेती पर मैं मां बनने वाली हूं. बेटा होगा तो वह भी कलंक का टीका ले कर, बेटी होगी तो और भी विडंबना होगी.

‘‘आत्महत्या कर के मैं पाप कर रही हूं पर आप को इन सब से मुक्ति दे रही हूं.

‘‘मुझे क्षमा करना. समाचारपत्र वाले फिर पूछने आएंगे. उन्हें यह पत्र दे देना, शायद मेरा चित्र लेना चाहें तो ले लेंगे.’’

विमल से पढ़ा नहीं जा रहा था. पत्र हाथ से छूट गया, क्या लिखा है…क्या कारण है, कई लोग पत्र पढ़ चुके थे. अब पत्र पकड़ते हुए जिसे देखा, विमल आक्रोश से फट पड़ा.

‘‘तसवीर भी ले लो न, वह भी…’’

रिपोर्टर ने सहम कर देखा…पत्र उस के हाथ से छूट गया.

Short Story, लेखक- नारायणी

Hindi Story: वही खुशबू – आखिर क्या थी उस की सच्चाई

Hindi Story: बहुत दिनों से सुनती आईर् थी कि भैरों सिंह अस्पताल के चक्कर बहुत लगाते हैं. किसी को भी कोई तकलीफ हो, किसी स्वयंसेवक की तरह उसे अस्पताल दिखाने ले जाते. एक्सरे करवाना हो या सोनोग्राफी, तारीख लेने से ले कर पूरा काम करवा कर देना जैसे उन की जिम्मेदारी बन जाती. मैं उन्हें बहुत सेवाभावी समझती थी. उन के लिए मन में श्रद्धा का भाव उपजता, क्योंकि हमें तो अकसर किसी की मिजाजपुरसी के लिए औपचारिक रूप से अस्पताल जाना भी भारी पड़ता है.

लोग यह भी कहते कि भैरों सिंह को पीने का शौक है. उन की बैठक डाक्टरों और कंपाउंडरों के साथ ही जमती है. इसीलिए अपना प्रोग्राम फिट करने के लिए अस्पताल के इर्दगिर्द भटकते रहते हैं. अस्पताल के जिक्र के साथ भैरों सिंह का नाम न आए, हमारे दफ्तर में यह नामुमकिन था.

पिछले वर्ष मेरे पति बीमार हुए तो उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा. तब मैं ने भैरों सिंह को उन की भरपूर सेवा करते देखा तो उन की इंसानियत से बहुत प्रभावित हो गई. ऐसा लगा लोग यों ही अच्छेखासे इंसान के लिए कुछ भी कह देते हैं. कोई भी बीमार हो, वह परिचित हो या नहीं, घंटों उस के पास बैठे रहना, दवाइयों व खून आदि की व्यवस्था करना उन का रोज का काम था. मानो उन्होंने मरीजों की सेवा का प्रण लिया हो.

उन्हीं दिनों बातोंबातों में पता चला कि उन की पत्नी भी बहुत बीमार रहती थी. उसे आर्थ्राइटिस था. उस का चलनाफिरना भी दूभर था. जब वह मेरे पति की सेवा में 4-5 घंटे का समय दे देते तो मैं उन्हें यह कहने पर मजबूर हो जाती, ‘आप घर जाइए, भाभीजी को आप की जरूरत होगी.’ पर वे कहते, ‘पहले आप घर हो आइए, चाहें तो थोड़ा आराम कर आएं, मैं यहां बैठा हूं.’

यों मेरा उन से इतनी आत्मीयता का संबंध कभी नहीं रहा. बाद में बहुत समय तक मन में यह कुतूहल बना रहा कि भैरों सिंह के इस आत्मीयतापूर्ण व्यवहार का कारण क्या रहा होगा? धीरेधीरे मैं ने उन में दिलचस्पी लेनी शुरू की. वे भी किसी न किसी बहाने गपशप करने आ जाते.

एक दिन बातचीत के दौरान वे काफी संकोच से बोले, ‘‘चूंकिआप लिखती हैं, सो मेरी कहानी भी लिखें.’’मैं उन की इस मासूम गुजारिश पर हैरान थी. कहानी ऐसे हीलिख दी जाती है क्या? कहानी लायक कोई बात भी तो हो. परंतु यह सब मैं उन से न कह सकी. मैं ने इतना ही कहा, ‘‘आप अपनी कहानी सुनाइए, फिर लिख दूंगी.’’

बहुत सकुचाते और लजाई सी मुसकान पर गंभीरता का अंकुश लगाते हुए उन्होंने बताया, ‘‘सलोनी नाम था उस का, हमारी दोस्ती अस्पताल में हुई थी.’’

मुझे मन ही मन हंसी आई कि प्यार भी किया तो अस्पताल में. भैरों सिंह ने गंभीरता से अपनी बात जारी रखी, ‘‘एक बार मेरा एक्सिडैंट हो गया था. दोस्तों ने मुझे अस्पताल में भरती करा दिया. मेरा जबड़ा, पैर और कूल्हे की हड्डियां सेट करनी थीं. लगभग 2 महीने मुझे अस्पताल में रहना पड़ा. सलोनी उसी वार्ड में नर्स थी, उस ने मेरी बहुत सेवा की. अपनी ड्यूटी के अलावा भी वह मेरा ध्यान रखती थी.

‘‘बस, उन्हीं दिनों हम में दोस्ती का बीज पनपा, जो धीरेधीरे प्यार में तबदील हो गया. मेरे सिरहाने रखे स्टील के कपबोर्ड में दवाइयां आदि रख कर ऊपर वह हमेशा फूल ला कर रख देती थी. सफेद फूल, सफेद परिधान में सलोनी की उजली मुसकान ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला. मैं ने महसूस किया कि सेवा और स्नेह भी मरीज के लिए बहुत जरूरी हैं. सलोनी मानो स्नेह का झरना थी. मैं उस का मुरीद बन गया.

‘‘अस्पताल से जब मुझे छुट्टी मिल गई, तब भी मैं ने उस की ड्यूटी के समय वहां जाना जारी रखा. लोगों को मेरे आने में एतराज न हो, इसीलिए मैं कुछ काम भी करता रहता. वह भी मेरे कमरे में आ जाती. मुझे खेलने का शौक था. मैं औफिस से आ कर शौर्ट्स, टीशर्ट या ब्लेजर पहन कर खेलने चला जाता और वह ड्यूटी के बाद सीधे मेरे कमरे में आ जाती. मेरी अनुपस्थिति में मेरा कमरा व्यवस्थित कर के कौफी पीने के लिए मेरा इंतजार करते हुए मिलती.

‘‘जब उस की नाइट ड्यूटी होती तो वह कुछ जल्दी आ जाती. हम एकसाथ कौफी पीते. मैं उसे अस्पताल छोड़ने जाता और वहां कईकई घंटे मरीजों की देखरेख में उस की मदद करता. सब के सो जाने पर हम धीरेधीरे बातें करते रहते. किसी मरीज को तकलीफ होती तो उस की तीमारदारी में जुट जाते.

‘‘कभी जब मैं उस से ड्यूटी छोड़ कर बाहर जाने की जिद करता तो वह मना कर देती. सलोनी अपनी ड्यूटी की बहुत पाबंद थी. उस की इस आदत पर मैं नाराज भी होता, कभी लड़ भी बैठता, तब भी वह मरीजों की अनदेखी नहीं करती थी. उस समय ये मरीज मुझे दुश्मन लगते और अस्पताल रकीब. पर यह मेरी मजबूरी थी क्योंकि मुझे सलोनी से प्यार था.’’

‘‘उस से शादी नहीं हुई? पूरी कहानी जानने की गरज से मैं ने पूछा.’’

भैरों सिंह का दमकता मुख कुछ फीका पड़ गया. वे बोले, ‘‘हम दोनों तो चाहते थे, उस के घर वाले भी राजी थे.’’

‘‘फिर बाधा क्या थी?’’ मैं ने पूछा तो भैरों सिंह ने बताया, ‘‘मैं अपने मांबाप का एकलौता बेटा हूं. मेरी 4 बहनें हैं. हम राजपूत हैं, जबकि सलोनी ईसाई थी. मैं ने अपनी मां से जिद की तो उन्होंने कहा कि तुम जो चाहे कर सकते हो, परंतु फिर तुम्हारी बहनों की शादी नहीं होगी. बिरादरी में कोई हमारे साथ रिश्ता करने को तैयार नहीं होगा.

‘‘मेरे कर्तव्य और प्यार में कशमकश शुरू हो गई. मैं किसी की भी अनदेखी करने की स्थिति में नहीं था. इस में भी सलोनी ने ही मेरी मदद की. उस ने मुझे मां, बहनों और परिवार के प्रति अपना फर्ज पूरा करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया.

‘‘मां ने मेरी शादी अपनी ही जाति में तय कर दी. बड़ी धूमधाम से शादी हुई. सलोनी भी आई थी. वह मेरी दुलहन को उपहार दे कर चली गई. उस के बाद मैं ने उसे कभी नहीं देखा. विवाह की औपचारिकताओं से निबट कर जब मैं अस्पताल गया तो सुना, वह नौकरी छोड़ कर कहीं और चली गई है. बाद में पता चला कि  वह दूसरे शहर के किसी अस्पताल में नौकरी करती है और वहीं उस ने शादी भी कर ली है.’’

‘‘आप ने उस से मिलने की कोशिश नहीं की?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं,’’ भैरों सिंह ने जवाब दिया, ‘‘पहले तो मैं पगला सा गया. मुझे ऐसा लगता था, न मैं घर के प्रति वफादार रह पाऊंगा और न ही इस समाज के प्रति, जिस ने जातपांत की ये दीवारें खड़ी कर रखी हैं. परंतु शांत हो कर सोचने पर मैं ने इस में भी सलोनी की समझदारी और ईमानदारी की झलक पाई. ऐसे में कौन सा मुंह ले कर उस से मिलने जाता. फिर अगर वह अपनी जिंदगी में खुश है और चाहती है कि मैं भी अपने वैवाहिक जीवन के प्रति एकनिष्ठ रहूं तो मैं उस के त्याग और वफा को धूमिल क्यों करूं? अब यदि वह अपनी जिंदगी और गृहस्थी में सुखी है तो मैं उस की जिंदगी में जहर क्यों घोलूं?’’

‘‘अब अस्पताल में इतना क्यों रहते हैं? और यह कहानी क्यों लिखवा रहे हैं?’’ मैं ने उत्सुकता दिखाई.

भैरों सिंह ने गहरी सांस ली और धीमी आवाज में कहा, ‘‘मैं ने आप को बताया था न कि मैं उस का अधिक से अधिक साथ पाने के लिए उस की ड्यूटी के दौरान उस की मदद करता था, पर दिल में उस की कर्मनिष्ठा और सेवाभाव से चिढ़ता था. अब मुझे वह सब याद आता है तो उस की निष्ठा पर श्रद्धा होती है, खुद के प्रति अपराधबोध होता है. अब मैं मरीजों की सेवा, प्यार की खुशबू मान कर करता हूं और मुझे अपने अपराधबोध से भी नजात मिलती है.’’

भैरों सिंह की आवाज और धीमी हो गई. वह फुसफुसाते हुए से बोले, ‘‘अब मैं सिर्फ एक बात आप को बता रहा हूं या कहिए कि राज की बात बता रहा हूं. इस अस्पताल के समूचे वातावरण में मुझे अब भी वही खुशबू महसूस होती है, सलोनी के प्यार की खुशबू. रही बात कहानी लिखने की, तो मेरे पास उस तक अपनी बात पहुंचाने का कोई जरिया भी तो नहीं है. अगर वह इसे पढ़ेगी तो समझ जाएगी कि मैं उसे कितना याद करता हूं. उस की भावनाओं की कितनी इज्जत करता हूं. यही प्यार अब मेरी जिंदगी है.’’

Short Story: जरूरत है एक कोपभवन की

Short Story: आजकल के इंजीनियर और ठेकेदार यह बात अपने दिमाग से बिलकुल ही बिसरा बैठे हैं कि घर में एक कोपभवन का होना कितना जरूरी है. इसीलिए तो आजकल मकान के नक्शों में बैठक, भोजन करने का कमरा, सोने का कमरा, रसोईघर, सोने के कमरे से लगा गुसलखाना, सभी कुछ रहता है, अगर नहीं रहता है तो बस, कोपभवन.

सोचने की बात है कि राजा दशरथ के राज्य में वास्तुकला ने कितनी उन्नति की थी कि हर महल में कोप के लिए अलग से एक भवन सुरक्षित रहता था. शायद इसीलिए वह काल इतिहास में ‘रामराज्य’ कहलाया, क्योंकि उस काल में महिलाएं बजाय राजनीति के अखाड़े में कूदने के अपना सारा गुबार कोपभवनों में जा कर निकाल लेती थीं और इसीलिए समाज में इतनी शांति और अमनचैन छाया रहता था.

ठीक ही तो था. राजा दशरथ के काल की यह व्यवस्था कितनी अच्छी थी. पति अपनी पत्नियों को समान अधिकार देते थे. वे जानते थे कि कोप सरेआम, हाटबाजार में या कोई कोर्टकचहरी में करने की चीज नहीं है. इस के  लिए तो घर में ही अलग से कोपभवन का होना बहुत जरूरी है.

भला यह भी कोई बात हुई कि कुपिता हो कर बीवी बेचारी दिन भर मुंह फुलाए अपने 2 कमरों के छोटे से घर में काम करती रहे, पति को खाना खिलाए, बच्चों को स्कूल भेजे, शाम को फिर सभी को खिलापिला कर, बच्चों को सुला कर खुद भी अपना तकिया ले कर मुंह फेर कर लेट जाए.

पति के पास तो व्यस्तता का बहाना रहता है जिस के कारण वह जान ही नहीं पाता कि आज पत्नी अवमानिनी बनी हुई, कोप मुद्रा में दर्शन दे रही है या फिर वह इतना चतुर होता है कि जब तक हो सके, जानबूझ कर पत्नी के रूठने से अनजान बने रहने की ही कोशिश करता रहता है. तब क्या पत्नी खुद आ कर कहे कि सुनोजी, मैं रूठी हुई हूं, आप मुझे आ कर मना लीजिए.

पति अगर मनाने आ भी जाए तो आप क्या समझते हैं कि पत्नी ने कोई कच्ची गोलियां खेली हैं जो अपना रूठना छोड़ कर इतनी आसानी से मान जाएगी? रूठी पत्नी को मनाना इतना आसान काम नहीं है जितना आप समझ रहे हैं. न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं उसे मनाने के लिए. यदि कोई कुंआरा व्यक्ति वह दृश्य देख ले तो शादी के नाम से ही तौबा कर ले. राजा दशरथ समझदार थे कि इस के लिए उन्होंने एक कोपभवन का निर्माण करा रखा था, ताकि जब भी उन की तीनों पत्नियों में से किसी को भी रूठना होता था वह कोपभवन में चली जाती थी और राजा दशरथ भी झट अपना राजपाट छोड़ कर रूठी पत्नी को मनाने दौड़ पड़ते थे.

यह स्वर्ण अवसर देखते ही पत्नी चटपट 2-4 वर मांग लेती थी, उस का कोप भंग हो जाता था और पतिपत्नी सारा मनमुटाव भूल कर हंसतेगाते कोपभवन से बाहर आ जाते थे और किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती थी. उन दिनों लोग पत्नी को तो सम्मान देते ही थे, साथ ही उस के कोप का भी भरपूर सम्मान करते थे.

अब तो हाल यह है कि तूफान के पहले की शांति देखते ही मेरे अबोध बच्चे कोप के आगमन की आशंका से ही सहम जाते हैं. सहमी हुई बबली मचल रहे गुड्डू को एक कोने में ले जा कर इशारे से समझाती है, ‘‘गुड्डू…मेरे भैया, देख, चुपचाप दूध गटक जा, आज मां का मूड ठीक नहीं है.’’ कोप के लक्षण देखते ही पतिदेव भी थाली में जो कुछ परोस दिया उसी को जल्दीजल्दी पेट में डाल कर भीगी बिल्ली की तरह दफ्तर भाग खड़े होते हैं और अतिरिक्त काम का बहाना बना कर रात को भी मेरे कोप के डर से देर से ही घर लौटते हैं.

मैं सांस रोके प्रतीक्षा करती हूं कि शायद अब वह मुझे मनाएंगे. यह जानते हुए भी कि मैं जाग रही हूं, मुझे सोई हुई समझने में अपनी खैरियत समझ कर वह खुद भी चुपचाप सो जाते हैं.

यह देख कर तो मुझे ही खिसिया कर रह जाना पड़ता है कि कौन सी कुघड़ी में रूठने का विचार मन में आया था. अलग से एक कोपभवन न होने के कारण ही तो कई बार कोप का कार्यक्रम स्थगित रखना पड़ता है. कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवनों का अस्तित्व होता. कल्पना कीजिए, पत्नी रूठ कर कोपभवन में जा बैठी है.

अब पतिदेव को सुबह बिस्तर से उठते ही चाय नहीं मिलेगी तो कड़कड़ाती ठंड में उनींदी आंखों से मुंहअंधेरे उठ कर दूध वाले से दूध लेने और स्टोव से मगजमारी करने में ही उन महाशय को नानी और दादी दोनों साथ ही याद आ जाएंगी. यही नहीं वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने, उन का टिफन जमाने और स्वयं नहाधो, खापी कर दफ्तर के लिए तैयार होने की कल्पना से ही सिहर कर झटपट अपनी पत्नी को कोपभवन में जा कर मना लेने में ही अपना भला समझेंगे. कोपभवनों के अभाव में ही पत्नियों को एक अटैची हमेशा तैयार रखनी पड़ती है ताकि कुपित होते ही उस में कपड़े ठूंस कर पति को गाहेबगाहे मायके जाने की धमकी दी जा सके.

कितना अच्छा होता अगर आज भी कोपभवन होते तो पति की गाढ़ी मेहनत की कमाई रेलभाड़े में खर्च कर के पत्नी को मायके जाने की नौबत ही क्यों आती? पत्नी को अपने रूठने का इतना मलाल नहीं होता जितना मलाल पति द्वारा न मनाए जाने से होता है. पति का न मनाना कोप की आग में घी का काम करता है.

वह तो चाहती है कि पति कोपभवन में आ कर उस के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाए, ‘‘हे प्रियतमे, तुम अब मान भी जाओ, तुम्हारा चौकाचूल्हा संभालना मेरे बस की बात नहीं है. अब कान पकड़ कर कह रहा हूं जब तुम दिन कहोगी तो मैं भी दिन ही कहूंगा, तुम रात कहोगी तो मेरे लिए भी रात हो जाएगी.’’

इस के बाद पहली तारीख को तनख्वाह मिलते ही साड़ी लाने का वादा होता, शाम को फिल्म देखने जाने का कार्यक्रम बनता, पत्नी के अलावा किसी दूसरी सुंदरी की ओर आंख भी उठा कर न देखने की कसम खाई जाती और इस तरह पत्नी किसी फटेपुराने वस्त्र की तरह अपना कोप वहीं त्याग कर प्रसन्नवदना हो कर कोपभवन से बाहर आ जाती.

राम राज्य से ले कर इस 20वीं शताब्दी तक विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब तो कोपभवन साउंड प्रूफ (जिस में बाहर की आवाज अंदर न आ सके और अंदर की आवाज बाहर न जा सके) भी बन सकते हैं. फिर चाहे पति कोपभवन में दरवाजा बंद कर के पत्नी के सामने कान पकड़े या दंडबैठक लगाए या पत्नी के कोमल चरणों में साष्टांग दंडवत कर के अपने आंसुओं से उस के चरण कमल क्यों न पखारे और बदले में पत्नी उस से नाकों चने ही क्यों न चबवा दे, वहां उन्हें देखने वाला कोई न होगा.

पत्नी चाहे जितनी गरजेगी, बरसेगी मंथरा टाइप महरी या घर के नौकरचाकर कान लगा कर नहीं सुन सकेंगे और न उन के अबोध बच्चों की मानसिकता पर कोई बुरा प्रभाव पड़ेगा. तलाक की दर निश्चित रूप से कम हो जाएगी. आखिर पतिपत्नी का मामला है. कोपभवन में जा कर सुलझ जाएगा. उस में कोर्टकचहरी की दखलंदाजी क्यों हो?

लेखक- डॉ. अरुना शास्त्री 

Short Story: कल्याण – मुख्यमंत्री को चांदनीजी की कौन-सी अदा पसंद थी

चांदनीजी से पूरा नगर परिचित था. लोग उन के दोनों बालगोपालों को भी जानते थे. हर कोई जानता था कि उन के एक अदद पति भी हैं. पर वह महाशय कैसे हैं, क्या करते हैं? यह कोई नहीं जानता था. कभी किसी ने जानने का प्रयत्न भी नहीं किया था.

जब पति चुनाव लड़ता है तो उस की पत्नी को उस से अधिक श्रम करना पड़ता है. चुनाव क्षेत्र में जा कर मतदाताओं से मत देने के लिए हाथ जोड़ने पड़ते हैं, घर में कार्यकर्ताओं आदि के भोजन का भी प्रबंध करना पड़ता है. पत्नी के चुनाव लड़ने पर पति महोदय दौड़धूप तो करते हैं, पर उन की ओर कोई ध्यान नहीं देता. लोग यही समझते हैं कि बेचारा कार्यकर्ता है.

अगर वह खादी के कपड़े पहने होता है तो उसे दल का कार्यकर्ता समझा जाता है. अगर आम कपड़ों में होता है तो फिर भाड़े का प्रचारक समझ लिया जाता है. न वह किसी से यह कह पाता है कि वह प्रत्याशी का पति है और न लोग उस से पूछते हैं कि आप हैं कौन. पत्नी तो शान से कह देती है कि वह प्रत्याशी की पत्नी है. यह जान कर लोग उसे भी आदरसम्मान दे देते हैं. जो रिश्ता बता ही नहीं पाता उसे कोई सम्मान दे भी कैसे?

पति महोदय जब किसी पद पर आसीन होते हैं तो पत्नी को भी विशेष सम्मान प्राप्त होता है. लोग उसे भी उतना ही मान देते हैं जितना कि उस के पति को. पत्नी जब कोई पद प्राप्त करती है तो उस के पति को कोई महत्त्व नहीं मिलता. किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष अथवा शासनाध्यक्ष की पत्नी उस देश की प्रथम महिला होती है. अगर नारी उस पद पर आसीन हो जाए तो उस का पति कुछ नहीं होता. उदाहरण के लिए ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ और प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर को ही लीजिए.

एलिजाबेथ के पति प्रिंस फिलिप माउंटबेटन को तो कुछ लोग जानते भी हैं पर मार्गरेट थैचर का पति कौन है, यह जानने वाला इक्कादुक्का ही होगा. पुरुष सत्तात्मक समाज भी खूब है. राजा की पत्नी रानी होती है पर रानी का पति राजा नहीं कहलाता. लगता है कि नारी के पद पर आसीन होते ही लोग मातृ सत्तात्मक समाज में आ जाते हैं. उस समाज में पुरुष का कोई मूल्य नहीं होता.

चांदनीजी के नाम निमंत्रणपत्र भी आते हैं. अधिकतर में माननीय चांदनीजी, उपमंत्री लिखा होता है. लेकिन उन के पुरुष सहयोगियों को निमंत्रणपत्र आते हैं तो उन पर श्रीमान एवं श्रीमती फलां लिखा होताहै.

चांदनीजी को शपथग्रहण समारोह में जाना था. बच्चों की उत्सुकता स्वाभाविक थी. दोनों बच्चे मां को सबकुछ खाते देख चुके थे पर शपथ खाते कभी नहीं देखाथा. वह इस लालच में गए कि अगर खाने में अच्छी वस्तु हुई तो मां उन्हें भी खिलाएगी. पतिदेव भी उत्सुक हो उठे. उन्हें ज्ञात था कि अन्य मंत्रियों की पत्नियां भी जाएंगी. वह उपमंत्री के पति हैं, इसलिए उन्हें भी जाना चाहिए. समारोह और खासकर पत्नी का शपथग्रहण देख कर छाती शीतल करनी चाहिए.

कार पर चले पतिदेव चंद्रवदन ने चालक का स्थान ग्रहण किया. बच्चे व चांदनीजी पीछे बैठीं. साथ में अगली सीट पर राजेश नाम का एक कार्यकर्ता भी, जो चांदनीजी के चुनाव का संचालक था, जम गया.

पतिदेव सफारी सूट में थे. राजेश टिनोपाल के पानी से खंगाली गई खादी की पोशाक में था. सिर पर नुकीली गांधी टोपी सुशोभित थी.

राजभवन के सामने कार रुकी. पिंकी को पेशाब आया. बच्चे आखिर बच्चे ही हैं. कहीं भी जाएं, सतर्क रहना ही पड़ता है. किसी भी क्षण पेशाब आ सकता है और किसी भी पल भूख लग सकती है.

चांदनीजी कार से उतरीं. राजेश उतर कर आगे हो लिया. लोगों ने उस के वस्त्रों का स्वागत किया. पुलिस वाले सलाम दागने लगे.

पिंकी ने मां का हाथ झकझोरा, ‘‘मां…’’

शपथग्रहण का समय अति निकट था, अत: चांदनीजी झुंझला पड़ीं, ‘‘क्या है?’’

पिंकी सहम उठी, ‘‘मां, बाथरूम…’’

चांदनीजी ने इधरउधर देखा. राजेश आगे खड़ा लोगों को माननीय उपमंत्री के आगमन की सूचना दे रहा था. कार निश्चित स्थान पर खड़ी कर के पतिदेव चंद्रवदन भी आ गए.

‘‘देखिए, शपथग्रहण में कुल 2 मिनट बाकी हैं. मेरा पहुंचना जरूरी है. आप जानते हैं कि राजनीति क्षणों में बदलती है. आप पिंकी को पेशाब करा दीजिए, उस के उपरांत आ जाइए,’’ चांदनीजी की निगाहों में कातरता थी.

पतिदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया. उत्तर के नाम पर उन के पास था भी क्या? पिंकी को ले कर पेशाब कराने का स्थान तलाशने लगे. चांदनीजी अंदर चली गईं. पीछेपीछे राजेश भी घुस गया.

एक पुलिस वाले ने राजेश की ओर इंगित किया, ‘‘लगता है चांदनीजी के पति भी बड़ी पहुंच वाले नेता हैं.’’

पिंकी को पेशाब कराने के स्थान को तलाशने में कुछ समय लगा. उस के बाद आए तो शपथग्रहण समारोह शुरू हो चुका था.

टे्रन में यात्रा करते वक्त भी बड़ी मुसीबत होती है. बच्चों के लिए हर स्टेशन पर पतिदेव को ही उतरना पड़ता है. उन की मां सीट से ही चिपकी रहती है. अकेली मां के साथ यात्रा करने में बालगोपालों को इतनी जरूरतें महसूस नहीं होतीं जितनी कि पिता के साथ यात्रा करने में होती हैं.

चंद्रवदन अंदर घुसे. फाटक पर ही खडे़ एक दारोगा ने टोका, ‘‘कहां घुसे चले आ रहे हो? आम लोगों के अंदर जाने पर मनाही है.’’

हकला उठे चंद्रवदन, ‘‘मैं…मैं… मैं…’’

‘‘मैं जानता हूं कि आप उपमंत्री चांदनीजी के ड्राइवर हैं. आप अंदर नहीं जा सकते. देखते नहीं, सब के ड्राइवर बाहर खड़े हैं,’’ उसी पुलिस वाले ने चेतावनी दी.

बौखला गए चंद्रवदन, ‘‘देखिए, यह मंत्रीजी की पुत्री है.’’

‘‘तो यहीं खिलाइए इसे. मंत्रीजी और उन के साहब अंदर जा चुके हैं,’’ दारोगा ने सूचित कर दिया.

साथ में खड़े भयंकर मूंछों वाले हवलदार ने मूंछों पर हाथ फेरा, ‘‘हुजूर दारोगाजी, मंत्रीजी का बड़ा मुंहलगा ड्राइवर मालूम होता है.’’

पिंकी ने चंद्रवदन की ओर देखा, ‘‘चाचा, मां कहां है?’’

चंद्रवदन के भतीजों की तरह पिंकी भी उन्हें बजाय पिता के चाचा शब्द से संबोधित करती थी. उन के भतीजे उम्र में बड़े थे. पुत्रपुत्री छोटे थे, इसलिए अपने चचेरे भाइयों की तरह उन्हें चाचा ही कहने लगे थे.

दारोगाजी मुसकरा पड़े, ‘‘जितनी शालीन चांदनीजी हैं उतने ही उन के बच्चे भी. देखो, बच्चे ड्राइवर तक को चाचा कहते हैं.’’

चंद्रवदन के काटो तो खून नहीं वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी. पिंकी को ले कर वह कार में जा कर बैठ गए.

चांदनीजी बाहर आईं तो उन पर उपमंत्रित्व लदा था, ‘‘आप यहां बैठे हैं? अंदर क्यों नहीं आए?’’

उत्तर मिला, ‘‘यों ही. अधिक भीड़ में मन घबरा जाता है.’’

चांदनीजी उपमंत्री के पद पर आसीन हो गईं. टेलीफोन मिला, सरकारी बंगला मिला, सरकारी कार मिली. इस के साथ ही ड्राइवर, चपरासी व व्यक्तिगत सहायक भी प्राप्त हो गए. सब से मजेदार विभाग सहकारिता प्राप्त हुआ.

विभाग से संबंधित लोगों ने चांदनीजी के स्वागत में समारोह आयोजित किया. साथ में रात्रिभोज भी रख दिया. माननीय सहकारिता मंत्री भी आमंत्रित थे.

चांदनीजी तैयार हो कर बाहर निकलीं तो पतिदेव को देख कर बोलीं, ‘‘आप अभी तैयार नहीं हुए? समय का ध्यान रखना चाहिए. भारतीयों की तरह लेटलतीफ होना ठीक नहीं है.’’

आज पतिदेव को यह ज्ञात हो गया कि चांदनीजी भारतीय तो हैं पर भारतीयों की तरह नहीं हैं. भारतीय हो कर गद्दी पर पहुंचने वाला स्वयं को भारतीयों की तरह नहीं मानता. किस की तरह मानता है, यह वही जाने.

उत्तर मिला, ‘‘मेरा मन नहीं है, तुम हो आओ,’’ लगा कि चंद्रवदनजी में पुराना अनुभव कसमसा रहा था.

तुनक पड़ीं चांदनीजी, ‘‘आप हमेशा नखरे करते हैं. मंत्रीजी आएंगे. उन की पत्नी भी आएंगी, पर आप हैं कि मेरे साथ नहीं जा सकते. पुरुष समाज नारी की प्रगति से अब भी जलता है. उसे आगे बढ़ते नहीं देख सकता.’’

चंद्रवदन को तैयार होना ही पड़ा. इस बार बच्चों को घर में ही रोक दिया गया.

कार अभिनंदनस्थल पर जा कर रुकी. चपरासी आननफानन पगड़ी संभालता हुआ दाहिनी ओर उतरा. गाड़ी के पीछे से घूम कर बाईं ओर का दरवाजा खोल दिया गया, क्योंकि चांदनीजी उधर ही बैठी थीं. बाद में दाईं ओर का दरवाजा खोलने बढ़ा, पर तब तक चंद्रवदन स्वयं दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. उन्हें चपरासी की उपेक्षा खली, पर कुछ कह न सके.

पंडाल के अंदर पहुंचे. मुख्य मंच पर 4 कुरसियां रखी थीं. एक मंत्रीजी की, दूसरी उन की पत्नी मंत्राणीजी की, तीसरी चांदनीजी की और चौथी समारोह के मेजबान की.

चंद्रवदन एक ओर अग्रिम पंक्ति में बैठने चले तो एक ने टोका, ‘‘ये कुरसियां महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं. आप पीछे जाइए.’’

पुरुषों वाली पंक्तियां भरी थीं. बड़ी कठिनाई से 10वीं कतार में जगह मिली. दुख तब हुआ जब देखा कि महिलाओं वाली जो अग्रिम पंक्ति सुरक्षित थी वहां आ कर मंत्रीजी के परिवार वाले डट गए. उन को आयोजकों ने बजाय रोकने के बड़े आदर से बैठा दिया. वे उन से यह न कह सके कि ये सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं. सच है, मंत्री के परिवार के सामने महिलाओं की क्या बिसात?

चंद्रवदन अनमने से देखतेसुनते रहे. भोजन के समय तक ड्रमों मक्खन उड़ेला गया. तारीफों के पुल बांधे गए. आगतों को यकीन दिलाया गया कि भविष्य में सहकारिता की पागल और बिगड़ैल हथिनी को यही माननीय अतिथिगण नियंत्रण में कर लेंगे, गाय सी सीधी हो जाएंगी.

भोजन के समय चांदनीजी ने एक कुरसी रोक ली. चपरासी को इंगित किया, ‘‘वह कहां हैं?’’

चपरासी तलाशने चल दिया. मंत्रीजी पूछ बैठे, ‘‘किन्हें पूछ रही हैं?’’

लाजभरी मुसकान उभर आई चांदनीजी के होंठों पर, ‘‘मेरे वह.’’

‘‘अच्छा…अच्छा, चंद्रवदनजी हैं,’’ कहते हुए मंत्रीजी का मुख कुछ उपेक्षायुक्त हो गया. ऐसा लग रहा था कि मानो कह रहे हों, कहां ले आईं उस उल्लू की दुम को, भला यहां उस की क्या जरूरत?

अचानक गहरा शृंगार प्रसाधन किए एक महिला आ कर खाली कुरसी पर डट गई, ‘‘कहो, चांदनी, कैसी हो? बहुत- बहुत बधाई हो.’’

मंत्रीजी के इशारे पर एक मेज और लगा दी गई. चंद्रवदन उस पर बैठे. अकेले न रहें, इसलिए मंत्रीजी एवं चांदनीजी के निजी सहायक भी वहीं बैठा दिए गए.

1-2 और बैठ गए.

अधिकतर परोसने वाले मंत्रीजी एवं उपमंत्री के ही आसपास मंडराते रहे. खाद्यसामग्री लाने में होड़ लगी थी. आग्रह कर के खिलाया जा रहा था.

चंद्रवदन वाली मेज पर कोई पूछने वाला न था. जो परोस गया बस, परोस गया. मुख्य मेजबान तो मंत्रीजी के साथ बैठे हर व्यंजन को उदरस्थ करने में लगे हुए थे.

एक ने एक कार्यकर्ता को इंगित किया, ‘‘उस मेज पर भी सामान पहुंचाते रहें.’’

‘‘उस पर कौन है?’’ उस ने जानना चाहा.

‘‘मंत्रीजी और उपमंत्रीजी के निजी सहायक हैं. काम के आदमी हैं.’’

उस कार्यकर्ता ने आदेश निभाया, पर ऐसी हिकारत से जैसे बरात में आए बैंड बाजे वालों को परोस रहा हो.

भोजन के उपरांत मंत्रीजी अपनी इंपाला के पास पहुंचे, ‘‘आइए, चांदनीजी, मैं आप को आप के बंगले पर छोड़ दूंगा.’’

चांदनीजी झिझकीं, ‘‘माननीय मंत्रीजी. हमारे वह…’’

‘‘तो क्या हुआ?’’ मंत्रीजी ने उन्हें अपनी इंपाला में घुसने का इशारा किया, ‘‘आप की एंबेसेडर तो है ही. वह उस में आ जाएंगे.’’

इंपाला जब चली तो पिछली सीट पर बाईं ओर मंत्राणीजी, बीच में मंत्रीजी और दाहिनी ओर चांदनीजी थीं. निजी सहायक एवं चपरासी ड्राइवर के साथ अगली सीट पर थे.

मंत्रीजी ने सलाह दी, ‘‘चांदनीजी, आप में अभी बहुत लड़कपन है. अब आप घरेलू नहीं बल्कि सार्वजनिक हैं. अगर राजनीति में आगे बढ़ना चाहती हैं तो हमारे वह के स्थान पर हर वाक्य में हमारे मुख्यमंत्री और हमारे प्रधानमंत्री कहना सीखिए, तभी कल्याण है.’’

 

Short Story, व्यंग्य- ‘मयंक’ सीतापुर

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें