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Short Story : कसक

Short Story : चांदनी रात में मैं छत पर लेटा हुआ था. आंखें आसमान में झिलमिलाते तारों को टटोल रही थीं और दिमाग में भूली यादें खलबली मचाए हुए थीं.

इन यादों में उन जवान लड़कियों और औरतों की यादें भी शामिल थीं, जिन के जिस्मों से मैं गहराई से जुड़ा रहा और जो अब जिंदगी में कभी देखने को भी नहीं मिल सकेंगी. उन के जिस्मों ने मेरे दिल को भी कहीं अधिक गहराई से छुआ था.

कैंप नंबर 2 की डिस्पैंसरी में मेरा तबादला हुआ था. उन दिनों, रहने के लिए मुझे जगह की बड़ी किल्लत थी. कितने ही लोग रायपुर और दुर्ग से रोजाना भिलाई आतेजाते थे. कुछ दिन तो मुझे भी दुर्ग से भिलाई आना पड़ा, उस के बाद महकमे की तरफ से हम 2 क्लर्कों को एक क्वार्टर मिल गया था. मेरा डिस्पैंसरी में क्लर्क का काम था, दवा की परची बनाना और उस में लिखी दवाओं का लेखाजोखा रखना.

मैं कई दिनों से देख रहा था कि एक लड़की जल्दी आ कर भी औरतों की कतार में पीछे लगती और अपनी परची को ज्यादातर गुम कर देती. हर बार मुझे नई परची बनानी पड़ती. झुंझला कर मैं कभी डांट भी देता, तो वह मुसकरा देती. तब अचानक मैं छोटा पड़ जाता और इस तरह गुस्सा भी मिट जाता.

तब मैं यह सब हंसीठिठोली, चुहलबाजी या छिछोरापन, कुछ भी नहीं जानता था. न मन में कोई ज्वार उठता था, न किसी तरह के खयाल ही जागते थे. तब तक औरत के जिस्म के लिए मेरे मन में कोई मोह या खिंचाव नहीं था. जिस्म या दिल के किसी तरह के स्वाद की परख या पहचान भी नहीं थी. इस तरह मुसकराने, हंसने, इठलाने और चाहने का मतलब भी मैं नहीं जानतासमझता था.

पर एक दिन दिल में यह खयाल उठा कि आखिर देखूं तो सही कि उसे कौन सी बीमारी है? परची देखी तो ताज्जुब करता रह गया. आज जुकामखांसी की दवा तो कल बुखार की, तो शाम को पेटदर्द की.

‘‘क्या देख रहे हैं बाबूजी?’’ पहली बार उस ने मुंह में धोती का पल्लू दबाते हुए मुझ से पूछा था.

उस की यह अदा मेरे दिल में बुरी तरह गड़ सी गई. अचानक मैं अजीब सी मस्ती से भर उठा. शरारती मुसकान इस तरह देखने का मेरा पहला तजरबा था.

वह थी भी बला की खूबसूरत. गोल चेहरा, बड़ी आंखें, उठे उभार और गठा हुआ जिस्म. साड़ी में भी वह बड़ी मादक लग रही थी. एकदम कमसिन कली. मन किया कि यहीं भींच दूं, पर कसमसा कर रह गया.

मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘यही देख रहा हूं कि तुम्हें कौन सी बीमारी है?’’

‘‘बीमारी की कुछ न पूछो बाबूजी, कुछ न कुछ हो ही जाता है, ‘‘कह कर वह शरमा गई.

उस से ज्यादा हैरानी मुझे तब हुई, जब एक दिन उस ने किसी डाक्टर से उस परची पर दवा नहीं लिखाई और उसे वैसे ही फेंक गई, तब मैं कुछ उलझन में फंस गया.

इस के बाद वह फिर कई दिनों तक नहीं दिखी. एक दिन आई भी तो पकी उंगली ले कर. डाक्टर ने बड़े अस्पताल में चीरा लगाने को लिख दिया. ऐसे जितने भी मरीज बड़े अस्पताल भेजने होते थे, उन्हें एक एंबुलैंस ले जाती थी.

मुझे भी वहीं कुछ काम था और डाक्टर इंदु भी वहीं जा रही थीं. डाक्टर ने मुझे अपने साथ अगली सीट पर बैठने को भी कहा, मगर मैं मना कर के पीछे ही बैठा, जहां वह लड़की अकेली बैठी थी. मुझे देख कर वह हौले से मुसकराई, तो मैं भी मुसकरा दिया.

गाड़ी के धक्कों से कई बार वह मेरे ऊपर गिरतेगिरते बची. उस के बदन की छुअन से मैं अजीब सी मस्ती में डूबने लगा.

वह बोली, ‘‘तुम चल रहे हो न बाबूजी, अपने सामने ठीक से चीरा लगवा दोगे तो मुझे संतोष होगा. अकेले मुझे बहुत डर लग रहा था. तुम्हें देख कर चली आई, नहीं तो लौट जाती.’’

‘‘हांहां, तुम बेफिक्र रहो, सब ठीक होगा,’’ मैं ने उसे दिलासा दिया.

‘‘तुम रहते कहां हो बाबूजी? कभी अपना घर दिखाओ न?’’ अचानक वह बोल उठी.

‘‘जरूर दिखाऊंगा, यही कैंप नंबर 2 में ही टिन वाला क्वार्टर है,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

मैं ने अपने सामने उस का चीरा लगवाया. उस ने कराह कर अपना सिर मेरी छाती से लगा दिया, तो मुझे बड़ा सुख मिला. हम दोनों साथसाथ ही वापस लौट आए.

इस के बाद तीसरे दिन जब वह दोबारा पट्टी कराने आई, तो उस के साथ उस का लोहार बाप भी था. दूर से ही दोनों ने हाथ जोड़ दिए. उस के बाप ने मेरा शुक्रिया अदा किया कि लड़की की उंगली मेरी वजह से जल्दी ठीक हो रही है.

मैं बड़ा खुश हुआ. पीछे खड़ी वह भी मुसकराती रही शर्म से, प्यार से और न जाने क्याक्या सोच कर.

इस के कुछ दिन बाद एक दोपहर को मैं ने उस से कहा, ‘‘चलो, आज तुम्हें अपना घर दिखा दूं.’’

‘‘आज नहीं, फिर कभी चलूंगी. पर हां, कैंप नंबर 2 के लिए तो तुम्हारा रास्ता हमारे क्वार्टर के सामने से हो कर जाता है न बाबूजी?’’

‘‘किधर से हो कर?’’

‘‘नाले पर से हो कर पहली लाइन में पहला ही क्वार्टर तो है सिरे पर,’’ इतना कह कर वह चली गई, क्योंकि कुछ मरीज आ गए थे.

शाम को जब मैं उधर से गुजरने लगा, तो उस ने हौले से कहा, ‘‘काका काम पर गए हैं. अम्मां देर से लौटेंगी. घर आ सकते हैं थोड़ी देर के लिए. मेरे सिवा और कोई नहीं है.’’

बिना झिझक खुला बुलावा पा कर मैं बहुत खुश हुआ, मानो उस के बुलावे का इंतजार ही कर रहा था. मैं बेखटके भीतर घुस कर सामने बिछे पलंग पर जा बैठा.

‘‘चाय पीएंगे?’’ वह बोली.

‘‘अरे नेकी और पूछपूछ… पर इस तरह मुझे डर लगता है. घर में कोई नहीं है. मैं तुम्हारा कुछ लगता नहीं और सब जानते हैं कि मैं यहीं अस्पताल में काम करता हूं.’’

‘‘मेरे बापूअम्मां बड़े ही सीधे हैं. बस, भाई जब शराब पी लेता है, तो घर में झगड़ा करता है. पर, तुम बेफिक्र रहो, कोई आ भी जाएगा, तो वह पूरी इज्जत करेगा.’’

‘‘मैं कुछ भी करूं, तब भी इज्जत करेगा? न जाने किस मस्ती की झोंक में यह कह कर मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और चूम लिया.

वह छटपटा कर एकदम अलग हट गई, ‘‘अरे, यह क्या करते हो?’’

मैं एक झटके से उस के क्वार्टर से बाहर निकल आया. चाय तो पीनी नहीं थी, लेकिन बातें की जा सकती थीं. पर अपने मन का डर ही मुझे भगा लाया.

फिर एक दोपहर उस ने खुद मेरे घर आने को कहा. उसे साथ ले कर मैं फौरन अपने क्वार्टर पर पहुंचा.

मेरे साथ के गांव से 3 मजदूर नौकरी की गरज से आ कर हफ्तों से वहीं जमे थे. हालांकि, मैं ने सुबह ही कह दिया था कि दोपहर को मेरे मेहमानों के आने के वक्त वे लोग कहीं बाहर चले जाएं. मगर वे तब तक वहीं ताश खेल रहे थे और दांत फाड़ रहे थे. बड़ा अजीब नजारा था. एक पल के लिए मुझ से न आगे बढ़ा गया, न पीछे हटा गया.

मुझे बहुत गुस्सा आया, जो जज्ब करतेकरते भी छलक ही गया, ‘‘रामू, मैं ने तुम से कल और आज सुबह भी क्या कहा था?’’

वे सब के सब हड़बड़ा कर चारपाइयों से उठ कर खड़े हो गए. ताश के पत्ते समेट कर एक तरफ फेंके और बाहर निकल गए.

तब वह भी गुमसुम भीतर घुस आई. लेकिन उसे भी यह सब अच्छा नहीं लगा. वह बोली, ‘‘मैं चली जाती हूं. मैं ने शायद ठीक नहीं किया, इस तरह यहां आ कर.’’

‘‘नहींनहीं, बैठो तुम. पता नहीं कहां से आ मरे ये बेवकूफ, जाहिल…’’ मैं गुस्से में बोला.

फिर मैं ने जबरन उसे कंधों से पकड़ कर बैठाया और भाग कर मिठाई ले आया. वह इनकार करती रही और जल्दी घर जाने की कहती रही. बड़ी मनुहार से उसे मिठाई खिलाई, पानी पिलाया, फिर दरवाजा बंद कर सांकल लगाई.

वह डर से सकपकाई. उस की नजर एक पल में मुझ से ले कर कमरे के सारे सामान पर डोल गई. मैं खाट पर उस से सट कर बैठ गया और उसे अपनी बाजुओं में भींच लिया.

मैं उसे चूमने लगा, तो वह छटपटाने लगी. मैं ने किसी जवान लड़की का नंगा जिस्म कभी देखा नहीं था. देखने की चाह में मैं पागल सा हुआ जा रहा था. मेरे हाथ उस की पिंडलियों पर फिसलने लगे, पर मैं खुद को बेहद ‘ठंडा’ महसूस कर रहा था. डर था कि कहीं कोई आ न जाए.

धीरेधीरे मैं उस की धोती को ऊपर सरकाने लगा था. पर, वह मना कर रही थी. उस की आंखों का रंग बदल रहा था, चेहरा अजीब सी गरमी से भर रहा था. वह बोली, ‘‘नहींनहीं, यह सब मत करो. यह सब शादी के बाद…’’

‘ओह, तो क्या यह मुझ से शादी करने का सपना देख रही है?’ मैं ने सोचा.

मैं अचानक कुछ समझ नहीं पा रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक की आवाज सुन कर होश उड़ गए और सोचा, ‘कौन आ मरा इस वक्त?’

दरवाजे की तरफ बढ़ता हुआ मैं उस से बोला कि वह पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाए. पर वह इस बात पर अड़ गई कि अकेली बाहर नहीं जाएगी.

मैं जब दरवाजे पर उसे ले कर पहुंचा, तो मेरे 3 साथी बाहर खड़े थे. बिना कुछ किए मौके पर रंगे हाथों पकड़े जाने की शर्मिंदगी और दुख लिए उन का सामना किया.

वे तीनों भीतर घुसे. उस लड़की ने घर तक पहुंचा देने की जिद की, तो मैं ने अपना माथा पकड़ लिया. उन्हें भीतर बैठने को कह कर उसे थोड़ी दूर तक पहुंचा कर लौटा.

आते ही कई सवाल, लानतमजामत और धमकियां भी सुननी पड़ीं, ‘‘तुम्हें इस तरह किसी लड़की को क्वार्टर में नहीं लाना चाहिए था… पड़ोस में परिवार हैं, कोई क्या सोचेगा. लोगों पर क्या असर पड़ेगा… हम शिकायत करेंगे. हमारे आदमियों को भगा दिया, रंगरलियां मनाने के लिए…’’ एक ने कहा.

अचानक मैं फट पड़ा, ‘‘वह मेरी दोस्त है. घर ले आया तो कौन सा आसमान फट पड़ा. 3 आदमी यहां कितने दिनों से रह रहे हैं. मैं ने तो कभी अपनी परेशानी की शिकायत नहीं की…’’

लेकिन मेरे साथी ने शिकायत कर ही दी. महकमे ने क्वार्टर और उस अस्पताल दोनों से ही मेरा तबादला कर दिया.

बाद में मैं उस से फिर कभी नहीं मिल सका. मगर अकसर वह मेरी यादों में तारे सी झिलमिला उठती है. जबतब अपनी उस पहली महबूबा से सुख और मजा न पाने का अफसोस दिल पर हावी हो उठता है.

उस गम को मिटाना मुमकिन नहीं था, क्योंकि उस की कसक बड़ी मीठी थी. हां, कहीं न कहीं यह संतोष जरूर था कि उसे बिगाड़ा नहीं, छला नहीं, रुलाया नहीं.

लेखक – जेएस वर्मा

Best Hindi Story : 5 प्रेमियों वाली प्रेमिका

Best Hindi Story : जानकी को मैं इसलिए भी ‘जानकीजी’ कह कर संबोधित करता था, क्योंकि वे मुझ से उम्र में 20 साल बड़ी थीं यानी मैं 35 साल का था और वे 55 साल की थीं. प्यार की पहल भी जानकीजी ने खुद की थी. उन्होंने ही मुझ से कहा था कि वे मुझे पसंद करती हैं और मैं जानकीजी के प्रेमजाल में फंस गया.

जानकीजी से मेरी पहली मुलाकात शहर के एक अस्पताल में तब हुई थी, जब मेरे पापा वहां कुछ दिनों के लिए भरती हुए थे. पापा की हालत काफी सीरियस थी, इसलिए मेरा मन बहुत अशांत था. मन को शांत करने की गरज से मैं वार्ड से बाहर वेटिंगरूम में आ कर बैठ गया.

वेटिंगरूम में पहले से बहुत सारे लोग मौजूद थे, जिन के मरीज वहां भरती थे. वेटिंगरूम के शोरशराबे के बीच मैं भी एक सीट पर जा कर बैठ गया. मन बहुत परेशान था, इतना परेशान कि कोई भी चेहरा देख कर मेरी परेशानी को पढ़ सकता था.

जानकीजी मेरे बगल वाली सीट पर बैठी थीं, इस का मुझे कोई अंदाजा नहीं था. मेरी बेचैनी को उन्होंने अच्छी तरह मेरे चेहरे से पढ़ लिया था.

‘‘आप का कोई भरती है यहां क्या?’’ जानकीजी ने मुझ से बात करने का सिलसिला शुरू किया.

‘‘जीहां, मेरे पापा भरती हैं. वे वार्ड नंबर 4 में हैं,’’ मैं ने पहली बार जानकीजी को नजर भर के देखा था.

‘‘घर से और कोई नहीं आया?’’

‘‘जी नहीं, घर में ज्यादा लोग नहीं हैं. जो हैं, उन के पास फुरसत नहीं है.’’

‘‘कोई नहीं, आजकल सभी का यही हाल है. मेरा पेशेंट वार्ड नंबर 5 में है. अगर आप को मेरी कैसी भी कोई हैल्प चाहिए, तो प्लीज बेझिझक मुझ से कह दीजिएगा,’’ जानकीजी ने मुझ से हमदर्दी जताई.

‘‘जी शुक्रिया.’’

‘‘शुक्रिया की कोई बात नहीं है. इनसान ही इनसान के काम आता है.’’

‘‘जी हां, यह तो है,’’ मेरे और जानकीजी के बीच बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता, इस से पहले वार्डबौय ने आ कर जानकीजी को बताया कि उन्हें डाक्टर बुला रहे हैं.

जानकीजी वार्डबौय के साथ वहां से चली गईं. 10-15 मिनट बाद वे फिर वेटिंगरूम में आईं और मुझ से बोलीं कि उन का मन चाय पीने का है.

इतना कह कर जानकीजी मुझे भी अपने साथ अस्पताल की कैंटीन में ले गईं.

हम दोनों ने एकएक चाय पी और साथ में एकएक समोसा भी खाया. चाय पीने के बाद मैं चाय का पेमेंट करने लगा, तो जानकीजी बोलीं, ‘‘यहां टोकन से चाय मिलती है और टोकन की पेमेंट मैं कर चुकी हूं.’’

मैं जानकीजी को ऐसे देखने लगा, जैसे मुझे उन का चाय पिलाना अच्छा नहीं लगा. उन्होंने जैसे मेरे मन को पढ़ा और मुसकरा कर बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं, अगली बार चाय का बिल तुम चुका देना.’’

मैं फिर कुछ नहीं बोला और चुपचाप जानकीजी के साथ कैंटीन से बाहर आ गया. उस के बाद हम दोनों अकसर साथ ही कैंटीन जाते और जोकुछ खानापीना होता, साथ ही खातेपीते.

मेरे पापा एक हफ्ते तक अस्पताल में रहे और जानकीजी का पेशेंट 5 दिनों में ही ठीक हो गया था.

जानकीजी ने मुझे कभी यह नहीं बताया कि उन का उन के मरीज से क्या रिश्ता है और मरीज औरत है या मर्द. मैं ने भी उन से इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा. वे मुझ से 2 दिन पहले अपने घर चली गईं. जाते समय मैं उन से नहीं मिल पाया था, क्योंकि उस समय मैं अस्पताल में नहीं था.

इन बीते 5 दिनों में मेरे और जानकीजी के बीच औपचारिक बातों के अलावा कोई दूसरी बात नहीं हुई. न हम ने अपने मोबाइल नंबर आपस में बदले और न ही एकदूसरे से यह जानने की कोशिश की कि कौन कहां रहता है या कौन क्या करता है.

जानकीजी का बरताव तो बढि़या था ही, रंगरूप, कदकाठी से भी वे सब को अपनी तरफ खींच लेती थीं. कुदरत ने उन्हें दरमियाने कद, गोरेचिट्टे और छरहरे बदन, काली कजरारीनशीली आंखें, होंठों तक पहुंचती पतलीलंबी नाक और गुलाब की पंखुडि़यों जैसे खूबसूरत होंठों के अलावा मधुर आवाज से भी नवाजा था.

अस्पताल से पापा को घर ले आने के बाद भी मैं जानकीजी को कभीकभी मन में याद कर लेता था.

समय अपनी रफ्तार से दौड़ रहा था और जानकीजी धीरेधीरे मेरे दिलोदिमाग और खयालों से ओझल हो रही थीं कि अचानक एक दिन उन से मेरा दोबारा आमनासामना हो गया.

मैं शहर के एक मौल से खरीदारी कर के अपनी बाइक लेने के लिए मौल की पार्किंग की तरफ आया कि सामने से आती जानकीजी ने अपनी चिरपरिचित मुसकान से मेरा स्वागत किया.

उस दिन वे बला की खूबसूरत लग रही थीं. जवान लड़कियों की तरह उन के चेहरे पर चमक थी. मुझे पहचानने में उन्होंने एक मिनट का भी समय नहीं लगाया.

‘‘हैलो, पहचाना मुझे?’’ चिडि़यों की तरह चहकती हुई आवाज में जानकीजी बोलीं.

‘‘क्यों नहीं, आप को कैसे भूल सकता हूं,’’ मेरा जवाब सुन कर वे जवान लड़कियों की तरह खिलखिला कर हंस पड़ीं और बोलीं, ‘‘हम ऐसे ही हैं. हम से जो एक बार मिल लेता है, वह हमेशा हमें याद रखता है. खैर, छोड़ो और यह बताओ कि कैसे हो?’’

‘‘मैं अच्छा हूं और आप…?’’

‘‘मैं भी अच्छी हूं. आप को देख कर और अच्छी हो गई,’’ जानकीजी के बात करने का लहजा मुझे अच्छा लगा.

‘‘खरीदारी करने निकले हो, वह भी अकेले ही?’’

‘‘आप भी तो अकेली हैं,’’ इस बार मैं ने भी मजाक कर दिया.

‘‘अकेले तुम, अकेले हम,’’ जानकीजी ने फिल्मी डायलौग बोल कर फिर मजाक किया, तो मेरी हंसी छूट गई.

वे बात बदल कर बोलीं, ‘‘अभी मेरे पास तकरीबन 45 मिनट हैं. उस के बाद मेरी किसी से मीटिंग है.

चलिए, तब तक साथ बैठ कर एकएक कप कौफी पीते हैं. इसी बहाने हमारी पहचान कुछ और गहरी हो जाएगी.’’

जानकीजी ने जितने अपनेपन से मुझे कौफी औफर की, उतनी ही शिद्दत से मैं ने उन के औफर को स्वीकार भी कर लिया.

म दोनों मौल की दूसरी मंजिल पर बने कौफीहाउस में आ गए. सीट पर बैठने से पहले ही जानकीजी ने मुझ से कहा, ‘‘यह कौफी मेरी तरफ से होगी, इस की पेमेंट मैं करूंगी.’’

जानकीजी की बात पर मैं कुछ न बोल कर बस मुसकरा दिया. वे सामने काउंटर पर चली गईं. उन्होंने 2 कौफी और स्नैक्स का और्डर दे कर गूगल पे से पेमेंट कर दी.

जानकीजी जब तक काउंटर पर रहीं, तब तक मैं उन्हें पीछे से देखता रहा. वे बहुत ही खूबसूरत दिखाई दे रही थीं. पतलेदुबले सुडौल जिस्म पर उन्होंने लाइट ग्रीन कुरता और डार्क ग्रीन प्लाजो पहना हुआ था, जो उन की खूबसूरती को और निखार रहा था.

मैं ने महसूस किया कि जानकीजी को पीछे से देख कर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वे अपनी उम्र के 55 साल पूरे कर चुकी होंगी. उन के चेहरे का गुलाबीपन, उन की चंचल शोख अदाएं, झील सी गहरी आंखें और चेहरे के हावभाव से वे अपनी उम्र को 1-2 नहीं, तकरीबन 12 से 15 साल कम कर चुकी थीं.

कुलमिला कर उन की चंचलता और फुरतीलापन मुझे बरबस ही उन की तरफ खींच रहा था और उन की सादगी दूसरे लोगों को अपनी तरफ मुड़ कर देखने के लिए मजबूर कर रही थी.

मैं देख रहा था, जो भी उन के करीब से गुजर रहा था, वह उन्हें एक बार नजर भर के जरूर देख रहा था. मैं तो पहले से ही उन की सादगी का कायल था, क्योंकि मुझे औरत का जरूरत से ज्यादा सजनासंवरना और क्रीमपाउडर लगाना बिलकुल भी पसंद नहीं था.

जानकीजी खुद ही छोटी ट्रे में 2 कप कौफी और स्नैक्स ले कर आईं और मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गईं. वे मुझे देख कर मुसकरा रही थीं. बदले में मैं भी मुसकरा रहा था.

अस्पताल के बजाय मौल में मिलने का जानकीजी का अंदाज और तौरतरीका एकदम जुदा था. अस्पताल में वे जितनी शालीन और सरल नजर आ रही थीं, मौल में उतनी ही चंचल और शोख दिख रही थीं. उन के बात करने का अंदाज भी जुदा था.

‘‘कितना अजीब इत्तिफाक है कि हम दोनों की यह दूसरी मुलाकात है, पर अभी तक हम एकदूसरे का नाम भी नहीं जान पाए. मेरा नाम जानकी है, जानकी माथुर. मैं दीपांशा हाइट में रहती हूं. समाजसेवा का शौक है, कविताएं भी लिख लेती हूं. एक बेटी और एक बेटा है. दोनों की शादी कर दी है. दोनों विदेश में रहते हैं,’’ जानकीजी ने एक सांस में ही अपने बारे में मुझे सबकुछ बता दिया.

‘‘और आप के हसबैंड….?’’

हसबैंड का नाम सुनते ही जानकीजी का चेहरा एकदम फक्क पड़ गया. जैसे उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं उन से उन के हसबैंड के बारे में पूछ लूंगा.

इस से पहले कि उन के मन के भाव उभर कर उन के चेहरे पर ठहरते, उन्होंने खुद को संभाल लिया और मुसकरा कर बोलीं, ‘‘हसबैंड का होना या न होना मेरे लिए कोई माने नहीं रखता है. कहने के लिए मेरे हसबैंड बिजनैसमैन हैं, पर मैं ने खुद अपनेआप को बनाया है.’’

जानकीजी के मन को पढ़ना या समझना इतना मुश्किल नहीं था. मैं समझ गया कि वे अपने हसबैंड के बारे में कोई बात नहीं करना चाहती हैं, इसलिए मैं ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम गणेश है. मैं एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टैंट हूं. पत्नी ने 5 साल पहले मुझ से तलाक ले लिया है. 4 साल का एक बेटा है, जो अपनी मां के साथ ही रहता है.’’

मेरे बारे में जान कर जानकीजी के चेहरे पर अफसोस की क्षणिक लकीरें खिंची हुई दिखाई दीं. उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, ‘‘बीवी ने तलाक ले लिया, पर क्यों?’’

‘‘क्योंकि, मैं निहायत ही सरल और सादगीपसंद हूं, इसलिए मैं उन के फ्रेम में कहीं फिट नहीं हुआ. उन्हें आजकल के लड़कों की तरह तड़कभड़क से रहने वाला इनसान चाहिए था.

‘‘इसी बात को ले कर हमारे बीच आएदिन कहासुनी होती थी. इस बीच उन्होंने मुझ से तलाक मांगा. मैं भी रोजरोज की किचकिच से तंग आ गया था, इसलिए मैं ने भी उन्हें तलाक दे दिया.’’

‘‘पत्नी ने आप से तलाक ले लिया, फिर आप अपनी जरूरतों को कैसे मैनेज करते हैं?’’ अपनी बात कह कर जानकीजी हंसने लगीं. जरूरतों से जानकीजी का मतलब फिजिकल रिलेशन से था, जो मैं अच्छी तरह समझा रहा था.

मैं जानकीजी के इस सवाल का जवाब देने ही वाला था कि उन का फोन आ गया और वे फोन पर कुछ पल के लिए बिजी हो गईं.

जानकीजी की बातों से समझ में आ रहा था कि फोन उसी शख्स का है, जिस के साथ उन की मीटिंग थी. जानकीजी की बात खत्म होते ही मैं भी उठ कर खड़ा हो गया.

‘‘अच्छा जानकीजी, आप अपनी मीटिंग कीजिए, मैं चलता हूं.’’

जानकीजी ने एक बार भी मुझे रुकने को नहीं कहा. बस, इतना कहा, ‘‘ठीक है, मैं ने अपना नंबर आप को दे दिया है. आप मुझे कभी भी फोन कर सकते हैं.’’

‘‘ओके,’’ इतना कह कर मैं वहां से चला आया.

नीचे आ कर मेरी मुलाकात राघव से हो गई. वह मेरा पुराना परिचित था.

‘‘यहां कैसे राघव…?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किसी के साथ मीटिंग है.’’

‘‘ओके,’’ मैं ने राघव को ज्यादा कुरेदना नहीं चाहा, इसलिए हम दोनों अपनेअपने रास्ते चले गए.

पार्किंग से बाइक निकाल कर मैं अपने घर की तरफ चल दिया. बाइक पर चलते हुए मेरे जेहन में फिर से राघव का चेहरा घूम गया. दिमाग में एक ही सवाल गूंजने लगा कि मौल में राघव की मीटिंग किस से हो सकती है? कहीं उस की मीटिंग जानकीजी से ही तो नहीं है?

अगर राघव की मीटिंग जानकीजी से है, तो फिर जानकीजी राघव को कैसे जानती हैं और उन दोनों के बीच किस बात को ले कर मीटिंग होगी?

मेरे मन में यह भी खयाल आया, लेकिन अगले ही पल मैं ने उस खयाल को मन से छिटक दिया और अपना ध्यान बाइक चलाने में लगा दिया.

अगली सुबह एक खूबसूरत इमोजी के साथ जानकीजी का ‘गुड मौर्निंग’ लिखा मैसेज मेरे ह्वाट्सएप पर तैरने लगा. बदले में मैं ने भी उन्हें ‘वैरी गुड मौर्निंग’ का मैसेज भेज दिया. दिनभर हमारे बीच कोई बात नहीं हुई, लेकिन रात को तकरीबन 9 बजे जानकीजी का ‘गुड नाइट’ लिखा मैसेज मुझे मिला. तो मैं ने भी उन्हें ‘वैरी गुड नाइट’ का मैसेज लिख कर भेज दिया.

‘गुड मौर्निंग’ और ‘गुड नाइट’ के मैसेज के साथ धीरेधीरे जानकीजी अपनी निजी बातें भी मेरे साथ शेयर करने लगीं, जैसे उन्होंने आज नाश्ते में, लंच में और डिनर में क्या बनाया और क्या खाया. वे आज कहां गई थीं, किस के साथ गई थीं. आज उन्होंने कौन सी और किस रंग की ड्रैस पहनी है या उन के हसबैंड से उन की किस बात पर कहासुनी हुई.

धीरेधीरे मुझे भी जानकीजी की आदत लगने लगी. मैं भी उन्हें दिन में 1-2 बार किसी न किसी बहाने फोन कर लेता था. जिस दिन मैं उन्हें फोन नहीं कर पाता, उस दिन वे खुद मुझे फोन कर लेतीं.

फिर एक दिन जानकीजी का मन टटोलने के लिए कि उन के मन में मेरे लिए क्या है, मैं ने उन को फोन कर के कहा, ‘‘कल मेरा आप के घर की तरफ आना होगा. अगर आप की इजाजत हो तो…’’

मेरी बात पूरी होने से पहले ही जानकीजी बोल पड़ीं, ‘ओह, तो हमारे घर आने के लिए तुम्हें हमारी इजाजत चाहिए. अरे, यह आप का घर है जनाब, आप शौक से आइए,’ उन्होंने शायराना अंदाज में कहा.

अगले दिन मैं जानकीजी के घर उन से मिलने पहुंच गया. इतना बड़ा घर और जानकीजी घर में बिलकुल अकेली थीं. उन्हें अकेला देख कर मुझे हैरानी इसलिए नहीं हुई, क्योंकि वे पहले ही मुझे बता चुकी थीं कि उन के दोनों बच्चे विदेश में रहते हैं और पति बिजनैस के सिलसिले में ज्यादातर शहर से बाहर
रहते हैं.

उस दिन जानकीजी बला की खूबसूरत लग रही थीं. धानी रंग की सूती साड़ी में लिपटा उन का छरहरा सुडौल जिस्म और उस में से झांकता गोरा रंग मानो ऐसा लग रहा था, जैसे हरियाली की ओट से उगते सूरज की लालिमा झांक रही हो.

‘‘गणेशजी, क्या पीना पसंद करोगे? चाय या फिर कौफी?’’ जानकीजी ने मेरे ध्यान को अपनी तरफ से भटकाते हुए मुझ से पूछा.

‘‘कुछ भी, जो आप को पसंद हो.’’

उन्होंने 2 कप कौफी बनाई और मेज पर रख कर वे मेरे बराबर में बैठ गईं.

‘‘आप इतने बड़े घर में अकेली कैसे रह लेती हैं? आप को अकेलापन कचोटता नहीं है?’’ मैं ने ऐसे ही पूछ लिया.

‘‘जैसे आप अकेले रह लेते हैं, वैसे ही हम भी अकेले रह लेते हैं,’’ मेरे सवाल के जवाब में जानकीजी ने कहा.

हमारे बीच कुछ पल के लिए चुप्पी छाई रही, जिसे तोड़ते हुए जानकीजी बोलीं, ‘‘आप 5 साल से अकेले हैं. आप ने दूसरी शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘बस, ऐसे ही. कोई पसंद ही नहीं आया.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ कि तुम्हें कैसी लेडी पसंद है?’’

जानकीजी के इस सवाल पर मैं कुछ पल के लिए चुप रहा, फिर बोला, ‘‘मुझे सादगी में लिपटी हुई औरत पसंद है.’’

जानकीजी खिलखिला कर हंस पड़ीं और बोलीं, ‘‘अच्छा… कहीं तुम्हें हम से प्यार तो नहीं हो गया ?’’

‘‘मतलब…?’’

‘‘मतलब यही कि हम भी तो तुम्हारी पसंद की तरह साधारण, सहज और शालीन हैं. हमें भी तो ज्यादा सजनेसंवरने का शौक नहीं है.’’

जानकीजी के इस जवाब के सामने मेरे मन का प्रेमी चोर बस मुसकरा कर रह गया. यही उन के लिए मेरे प्यार की मानो रजामंदी थी.

हमारी कौफी खत्म हो चुकी थी. बस, मैं वहां से जाने की सोच ही रहा था कि अचानक जानकीजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और भावुक हो कर मेरी आंखों में आंखें डाल कर बोलीं, ‘‘तुम अच्छे लगते हो. हमें तुम से प्यार हो गया है,’’ कहते हुए जानकीजी ने बच्चों की तरह मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया, जो मुझे अच्छा लगा.

वे अपने हाथों की उंगलियों से कंघे की तरह मेरे सिर के बालों को सहलाने लगीं, फिर उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए. फिर क्या था, मैं ने भी अपना प्यार जानकीजी पर लुटा दिया.

मुझे याद नहीं कि हम कितने मिनट तक एकदूसरे के आगोश में सिमटे रहे. प्यार की कहानियां और किस्से सुने और पढ़े जरूर थे, लेकिन प्यार का मतलब क्या होता है, यह मैं पहली बार महसूस कर रहा था.

हालांकि, मेरी शादी हो चुकी थी, पर वह एक सामाजिक बंधन था, जिस में बिना कोशिश, बिना जोरजबरदस्ती और बिना शर्त सबकुछ अपना होता है. लेकिन किसी से प्यार कर के उसे पा लेने का अलग ही मजा होता है.

प्यारमुहब्बत के नाम पर जानकीजी मेरा पहला प्यार थीं. खुशी के मारे मैं फूला नहीं समा रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे जानकीजी के रूप में दुनिया की सब से नायाब चीज मुझे मिल गई हो.

मैं जानकीजी के प्यार की गहराई में डूबता चला गया. उन के सिवा मुझे अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. मेरे खयालों में सिर्फ और सिर्फ वे ही रहने लगी थीं.

हमारे प्यार की दुनिया अभी पूरी तरह से बस भी नहीं पाई थी कि एक दिन अचानक राघव से मुलाकात हो गई.

राघव ने मुझ से लंबीचौड़ी बातें न कर के सीधेसीधे कहा, ‘‘गणेश, आप जानकीजी को कितना जानते हैं?’’

मैं ने राघव के सवाल का जवाब देने के बजाय उलटा उस से ही सवाल कर दिया कि वह किस जानकीजी की बात कर रहा है?

इस पर राघव ने कहा, ‘‘मैं उन्हीं जानकीजी की बात कर रहा हूं, जिन जानकीजी से तुम कुछ दिन पहले मौल में मिले थे. उस के बाद तुम उन के घर भी गए थे.’’

‘‘यह बात तुम से किस ने कही कि मैं जानकीजी से मिला था?’’

‘‘जानकीजी ने मुझे खुद बताया है कि आप की उन से बातचीत और मुलाकात होती रहती है.’’

राघव की बात सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया.

मुझे खामोश देख कर राघव ने कहा, ‘‘गणेशजी, अगर जानकीजी के साथ आप का प्यारव्यार का कोई चक्कर चल रहा है, तो सावधान हो जाइए, क्योंकि जानकीजी अच्छी औरत नहीं हैं. वे किसी एक की नहीं हैं. उन्होंने हमारे जैसे कइयों को अपने प्रेमजाल में फंसा रखा है.’’

‘‘कइयों का मतलब…?’’

‘‘मतलब यही कि जानकीजी जितनी सीधी, सहज और सरल लगती हैं, उतनी सीधी वे हैं नहीं. वे दिलफेंक और आशिकमिजाज औरत हैं.

‘‘मैं भी उन की मीठीमीठी बातों में आ कर उन्हें दिल दे बैठा था. लेकिन जब मेरी मुलाकात जानकीजी के एक और प्रेमी आशुतोष से हुई, तो पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ था.

‘‘मुझे लगा कि आशुतोष झूठ बोल कर जानकीजी को बदनाम कर रहा है, लेकिन जब उस ने मुझे जानकीजी के साथ अपने प्यार के कुछ सुबूत दिखाए, तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

‘‘फिर मैं ने एक दिन खुद जानकीजी को एक दूसरे लड़के के साथ एक रैस्टोरैंट में देखा, तो मेरा दिमाग खराब हो गया. मैं ने जानकीजी से कहा, ‘इस उम्र में यह सब क्या चल रहा है? यह लड़का कौन है? क्या रिश्ता है इस से आप का?’

‘‘तब उन्होंने कहा कि वह उन का दोस्त है. मैं ने उन से फिर पूछा कि ऐसे उन के और कितने दोस्त हैं?

‘‘मेरी इस बात पर वह लड़का मेरे ऊपर भड़क गया और मुझे उलटासीधा बोलने लगा. हम दोनों के बीच जब कहासुनी बढ़ गई, तब जानकीजी मुझ से बोलीं कि मुझे इस तरह उन से नहीं बोलना चाहिए था. बस, उसी दिन से मुझे जानकीजी से नफरत हो गई और मैं ने उन से किनारा कर लिया.’’

‘‘लेकिन, जानकीजी तो पढ़ीलिखी सभ्य, सुशील और शादीशुदा औरत हैं, फिर वे ऐसा क्यों करेंगी?’’ मैं ने पूछा, तो राघव बोला, ‘‘यह तो मैं भी नहीं समझ पाया, क्योंकि कोई भी इनसान प्यार करता भी है, तो किसी एक से करता है. लेकिन जानकीजी के तो 2-3 प्रेमियों से मैं खुद मिल चुका हूं. और उन के अगले प्रेमी शायद आप होंगे.’’

राघव की बातें सुन कर मेरा दिमाग चकरा गया. जानकीजी को ले कर मैं जो भी सपने देख रहा था, वे सब टूट कर चकनाचूर हो गए. मैं ने 2 दिनों तक जानकीजी को फोन ही नहीं किया.

इन 2 दिनों में जानकीजी ने मुझे कई मैसेज भेजे और 2-3 बार फोन भी किया, पर मैं ने उन के किसी मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया और न ही उन का फोन रिसीव किया, क्योंकि उन के लिए मेरे अंदर नाराजगी भरी हुई थी.

तीसरे दिन जानकीजी ने जब मुझे लगातार 3-4 बार फोन किया, तो मैं ने उन का फोन रिसीव कर लिया.

‘लगता है कि आप हम से नाराज हो?’ जानकीजी ने फोन पर कहा, पर मैं चुपचाप उन का फोन सुनता रहा. जवाब में कुछ नहीं बोला.

‘लगता है कि तुम्हें राघव ने हमारे खिलाफ भड़काया है, क्योंकि हम ने राघव से तुम्हारा जिक्र किया था. क्या कहा राघव ने तुम से?’

‘‘यही कि आप उस से प्यार करती हो,’’ जो मेरे मन में भरा हुआ था, मैं ने बिना भूमिका बनाए जानकीजी से बोल दिया.

जानकीजी बनावटी हंसी हंस कर बोलीं, ‘राघव ने जो कहा, उसे तुम ने सच मान लिया.’

‘‘जानकीजी, प्लीज… आप बात को घुमाइए मत. बस, बता दीजिए कि सच क्या है?’’

‘गणेशजी, हमें अफसोस है कि तुम्हें हमारे प्यार पर भरोसा नहीं है. रही बात राघव की, तो राघव ने हमारे बारे में तुम से क्या कहा, उस के लिए तुम कुछ भी सोचने के लिए आजाद हो, हमारे बारे में तुम्हें जो सोचना है सोच लो, जो भी राय बनानी हो बना लो, पर हम आप को अपनी सफाई नहीं देंगे,’ इतना कह कर जानकीजी ने फोन काट दिया.

पहली बार जानकीजी ने मेरे साथ ऐसा गलत बरताव किया कि उन्होंने दोटूक बात कह कर फोन काट दिया, जो मुझे अच्छा नहीं लगा, इसलिए मैं ने भी उन्हें वापस फोन नहीं किया.

मुझे उम्मीद थी कि जानकीजी का गुस्सा जब शांत हो जाएगा, तब वे मुझे फोन कर के अपनी गलती की माफी मांगेंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं.

एक हफ्ते बाद जब मेरा मन नहीं माना, तो मैं ने जानकीजी को फोन किया. उन्होंने मेरा फोन तो रिसीव कर लिया, पर उन्होंने कोई खुशी जाहिर नहीं की. मैं ने उन से कहा कि मैं उन से मिलना चाहता हूं, वह भी उन के घर पर.

पर जानकीजी ने यह कह कर कि वे अभी मुझ से मिल नहीं पाएंगी, क्योंकि वे कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर आई हुई हैं, फोन काट दिया.

मैं भी अपना फोन काटने ही वाला था कि जानकीजी की आवाज सुन कर चौंक गया.

‘और बताओ, रितेश कैसे हो?’

रितेश नाम सुन कर मैं समझ गया कि भूलवश उन का फोन कट नहीं पाया है. मैं जानकीजी की बातें सुनने लगा. वे किसी रितेश नाम के लड़के से बात कर रही थीं.

मुझे एक और झटका लगा. मैं समझ गया कि जानकीजी ने मुझ से झूठ बोला है. वे कहीं बाहर नहीं गई हैं, बल्कि अपने घर पर ही हैं.

मैं उन की और रितेश की सचाई जानने के लिए उन के घर चला गया. अचानक ही मुझे अपने घर में देख कर जानकीजी के हाथ के तोते उड़ गए.

‘‘क्या हुआ…? आप मुझे ऐसे क्यों देख रही हैं? और यह कौन है? इस का नाम रितेश है न?’’

जानकीजी की बगल में बैठे एक लड़के को देख कर मैं ने पूछा, तो वे नाराजगी जताते हुए बोलीं, ‘‘गणेशजी, आप बिना फोन किए आ गए. यहां आने से पहले फोन तो करना चाहिए था न.’’

‘‘फोन करता तो आप की हकीकत का पता कैसे चलता.’’

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’ जानकीजी मेरे ऊपर एकदम भड़क गईं.

‘‘जानकीजी, चोर कितना भी शातिर क्यों न हो, पर वह अपनी चोरी का एक न एक सुबूत छोड़ ही देता है. आप ने एक गलती कर दी. मुझ से फोन पर बात करने के बाद आप अपना फोन काटना भूल गईं, जिस से आप का शहर से बाहर जाने वाला झूठ पकड़ा गया. आप के फोन ने बता दिया कि आप अपने नए दोस्त रितेश के साथ अपने ही घर में रोमांस कर रही हैं.

‘‘जानकीजी, नफरत हो गई है आप से और आप की इस घिनौनी हकीकत से. आखिर आप के इस मासूम चेहरे के पीछे प्यार के नाम पर और कितने लोगों को बेवकूफ बनाने का सच छिपा हुआ है? क्यों कर रही हैं इस उम्र में यह सब? आखिर क्या चाहिए आप को? किस चीज की कमी है आप के पास?’’

मेरे किसी भी सवाल का जानकीजी के पास कोई जवाब नहीं था. हां, उन के चेहरे की हवाइयां जरूर उड़ गई थीं. पर, मुझे नहीं लगता कि उन के ऊपर मेरी किसी बात का कोई असर हुआ होगा, क्योंकि प्यार करना उन की आदत नहीं फितरत थी.

Hindi Crime Story : हत्या

Hindi Crime Story : ‘‘हाय नंदू, यह तू ने क्या कर दिया?’’ हरकली रोते हुए चिल्लाई.

नंदप्रकाश, जिसे उस की मां हरकली नंदू कह कर पुकारती थी, बिलकुल हैरान खड़ा था. भौंचक्का. नासमझ सा. लाल खून से सना गंडासा अभी भी उस के हाथ में था. उस के पिता सोमप्रकाश की लाश टुकड़ेटुकड़े में उस की मां हरकली के सामने कच्चे फर्श पर पड़ी थी.

हरकली बैठेबैठे रो रही थी. उस का सुहाग उजड़ चुका था. नंदू को अपनी करतूत पर अब पछतावा हो रहा था. उस के हाथ से गंडासा छूट कर नीचे गिर गया. वह भी अपनी मां के पास बैठ गया और पछताते हुए बोला, ‘‘मां, मुझ से यह कांड हो गया. अब क्या होगा मां?’’

हरकली ने सुबकते हुए कहा, ‘‘बेटा, तू ने इतना बड़ा कांड कर दिया है, इस की सजा जेल तो है ही, मौत की सजा भी हो सकती है.’’

‘‘नहीं मां, मैं जेल नहीं जाना चाहता, मुझे पुलिस से बचा ले मां.’’

अपने पल्लू से आंसू पोंछते हुए मां हरकली ने कहा, ‘‘नंदू, तू ने अपराध ही ऐसा किया है, इस से तू कैसे बच सकता है? सुबह होते ही पुलिस आएगी और तुझे हथकड़ी पहना कर ले जाएगी. हम तो बरबाद हो गए.’’

‘‘नहीं मां, कुछ भी कर, मुझे बचा ले. पुलिस बहुत बेरहमी से मारती है. रूह कांप जाती है.’’

‘‘यह तो बेटा तुझे पहले ही सोचना चाहिए था,’’ मां ने गुस्से में कहा.

‘‘मां, बहुत बड़ी गलती हो गई. अब किसी तरह से बचा ले,’’ इतना कह कर नंदू रोता हुआ अपनी मां के पैरों में बैठ गया. नंदू के तीनों छोटेछोटे बच्चे पहले ही सो चुके थे.

नंदू की पत्नी सुरेखा घबराई हुई सी उन के पीछे आ कर खड़ी हो गई थी. यह भयानक सीन देख कर उस के भी होश उड़े हुए थे.

नंदू का पिता सोमप्रकाश भांग के नशे का आदी हो गया था. भांग के पौधे जटपुर गांव में बहुतायत में मिलते थे. गोबर के ढेर के पास वे खुद ही उग आते थे. गांव के ज्यादातर लोग इस का नशा करते थे.

सोमप्रकाश को तो इस की लत बचपन से ही पड़ गई थी. वह भांग के पौधों की फुंगियों और मुलायम पत्तों को अपने दोनों हाथों से रगड़ता और हाथों पर लगे उस के मैल को तंबाकू में मिलाता. फिर सुल्फिया में भर कर उस के सुट्टे खींचता.

वाह, क्या नशा था भांग का. आह, क्या सुरूर चढ़ता था और फिर क्या ख्वाब आते थे. भांग के नशेड़ी कहते
थे कि और तो मरने के बाद स्वर्ग देखते हैं, वे तो जिंदा ही भांग के नशे में स्वर्ग देख लेते हैं. यह नशा ऐसा था, जिस में किसी की एक पाई खर्च नहीं होती थी.

शादी के बाद जब हरकली को सोमप्रकाश के इस शौक का पता चला, तो उस ने उसे लाख समझाया, पर सोमप्रकाश के कान पर जूं तक न रेंगी. सच है, नशा करने वाला किसी की सुन ले, तो फिर वह नशा ही क्यों करे?

भांग के नशे में सोमप्रकाश अपनी अंधेरी कोठरी में पड़ा रहता. धीरेधीरे हरकली को घर, घेर और जंगल का ज्यादातर काम अपने हाथ में लेना पड़ा. वह ट्रैक्टर से किराए पर खेतों को जुतवा लेती. खुद ही भैंसाबुग्गी जोड़ कर मवेशियों के लिए चारा भी ले आती.

ऐसा नहीं था कि सोमप्रकाश कुछ करता ही नहीं था. बिना नशे के वह बहुत काम करता था. फिर तो वह खेत के किसी काम में हरकली को हाथ भी न लगाने देता. शहर के काम भी निबटा आता और हरकली को खूब प्यार भी करता. हरकली को भी अब उस से कोई शिकायत नहीं थी. गृहस्थी का पहिया सही लुढ़क रहा था.

इसी बीच हरकली 5 बच्चों की मां बन गई थी. 4 बेटियां और एक बेटा नंदप्रकाश उर्फ नंदू. नंदू अकेला लड़का था, इसलिए सब का लाड़ला बन गया. लाड़ला इतना बना कि आवारा और निकम्मा बन गया.

हरकली ने अपनी चारों बेटियों की शादी की और नंदप्रकाश भी जब 21-22 साल का हुआ, तो उस के भी फेरे फिरवा दिए. नंदप्रकाश खेतीबारी खुद संभालने लगा. हरकली को लगा कि अब वह सब जिम्मेदारियों से छुटकारा पा गई है.

नंदप्रकाश भी जल्दी ही 3 बच्चों का बाप बन गया और हरकली इन बच्चों को संभालने में लग गई. बहू सुरेखा घर का कामधाम देखती.

एक दिन नंदप्रकाश शराब पी कर देर से घर लौटा. घर में घुसते ही सोमप्रकाश ने उसे टोक दिया, ‘‘कहां से आ रहे हैं लाट साहब?’’

नंदप्रकाश का मूड उस समय ठीक नहीं था. उस को यह टोकाटोकी अच्छी न लगी. उस ने उलटा तंज कस दिया, ‘‘भंगडि़यों में से, जहां तुम ने अपनी सारी जिंदगी गुजार दी.’’

यह तंज सोमप्रकाश की सहनशक्ति से बाहर था. वह उठा और नंदप्रकाश के गाल पर झापड़ रसीद करते हुए कहा, ‘‘बड़ों से बात करने की तमीज भी भूल गया क्या?’’

नंदप्रकाश के लिए यह काफी था. नशे में तो वह पहले से ही था, अब उस के गुस्से का ज्वालामुखी फट पड़ा. इस से पहले कि हरकली और सुरेखा उस को संभालतीं या कुछ समझा पातीं, नंदप्रकाश ने वहीं पड़ा गंडासा उठाया और उस के कितने ही वार सोमप्रकाश पर कर डाले. अब उस के खुद के बाप की लाश के टुकड़े उस के सामने पड़े थे.

हरकली सोच रही थी कि उस का सुहाग तो उजड़ ही गया है, किसी तरह बेटे को बचा कर घर बचाया जाए. न जाने उस में कहां से हिम्मत आई. उस ने रोना बंद किया और नंदप्रकाश से कहा, ‘‘बेटा, अब तो जो होना था सो हो गया. अब सब से पहले लाश ठिकाने लगाने की सोच.’’

नंदप्रकाश का अब तक नशा उतर चुका था. उस ने कहा, ‘‘मां, मेरी तो मति मारी गई. मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा. तू ही बता कि क्या करूं?’’

‘‘देख बेटा, अभी रात का समय है. तुझे मेरे सिवा और किसी ने हत्या करते देखा नहीं,’’ मां ने दिलासा देते हुए कहा.

‘‘इस का क्या मतलब है मां?’’

‘‘मतलब बाद में समझाऊंगी, पहले लाश को ठिकाने लगाने की सोच. देर मत कर. किसी को पता चल गया, तो कहीं के नहीं रहेंगे.’’

‘‘तो क्या करूं मां?’’

‘‘जा, जल्दी से टिन की छत के नीचे से 3-4 खाद के खाली कट्टे उठा ला.’’

‘‘उन का क्या करेगी मां?’’

‘‘तू उठा कर तो ला. तुम बापबेटे को नशा करने के सिवा कुछ दुनियादारी करना आया है क्या?’’

नंदू ने वैसा ही किया, जैसा मां ने कहा. वह खाद के 3 खाली कट्टे उठा लाया.

हरकली अपने बेटे और घर को बचाने के लिए कुछ देर के लिए पिशाचनी बन गई. सही है, एक औरत अपने परिवार को बचाने के लिए कुछ भी कर सकती है. हरकली कोई जुदा न थी. आखिरकार वह भी एक औरत थी.

वह अपने सुहाग के खून टपकते लोथड़ों को खाली कट्टों में भरने लगी. हाथपैर, हड्डी समेत लोथड़े को एक कट्टे में भर दिया. दूसरे कट्टे में धड़ रख दिया. तीसरे कट्टे में सिर और बचेखुचे लोथड़े रख दिए, फिर खून से सनी मिट्टी खुरपे से खुरचखुरच कर तीनों कट्टों में डाल दी. उस के बाद कच्चे फर्श को राख से ढक दिया.

जब हरकली दोनों हाथों को भरभर कर सोमप्रकाश के शरीर के खून टपकते लोथड़ों को उठा रही थी, तो नंदू ने इस भयंकर सीन से बचने के लिए दूसरी तरफ मुंह कर लिया. सुरेखा तो उलटी करने के लिए रसोई की ओर भाग गई.

फिर हरकली ने तीनों कट्टों के मुंह सूए से सिल दिए. उन तीनों कट्टों को एक खाली पड़े धान के बोरे में भर दिया और बोरे का मुंह सन की मजबूत रस्सी से बांध दिया.

जिस गंडासे से नंदू ने अपने बाप की हत्या की थी, उस गंडासे पर सब जगह अपने खून से सने हाथ पोंछ दिए, जिस से नंदू के हाथ का कोई निशान गंडासे पर न रह जाए, फिर उस ने उस खून सने गंडासे को ऐसे ही लकडि़यों के एक ढेर में छिपा दिया. वह आगे की सोच कर चल रही थी. आधी रात को जब पूरा गांव
सोया हुआ था, तब हरकली ने नंदू से मोटरसाइकिल स्टार्ट कराई. नंदू के पीछे लाश वाले बोरे को रखा.

फिर 2 फावड़े ले कर उस के पीछे बैठ गई.

हरकली ने नंदू से कहा, ‘‘बेटा, मोटरसाइकिल को सुक्खा नदी के किनारे ले चल और कोई कितना भी रोके, मोटरसाइकिल को रोकना मत.’’

कुछ ही देर में वे मोटरसाइकिल ले कर नदी के किनारे पहुंच गए. एक महफूज जगह देख कर मांबेटे गड्ढा खोदने में जुट गए, लेकिन हरकली पहले से ही थकी हुई थी, वह फावड़ा चलाते ही हांफ गई. नंदू ने अकेले ही गड्ढा खोदा.

मिट्टी रेतीली और नमीदार थी. लिहाजा, जल्दी ही गहरा गड्ढा खुद गया. फिर दोनों ने उन बोरे को उस गड्ढे में दफन कर दिया.

गड्ढे का मुंह बंद कर उस के ऊपर नंदू ने नदी किनारे उगी एक झाड़ी उखाड़ कर रख दी, जिस से कोई आसानी से गड्ढे को पहचान न सके.

सब काम हरकली ने बड़ी सफाई से किया. घर आ कर खून से सने सभी कपडों को पैट्रोल छिड़क कर जला दिया. नहाधो कर दोनों ने साफ कपड़े पहन लिए.

सुबह के 4 बज चुके थे. हरकली काफी थकान महसूस कर रही थी. उस ने सुरेखा से चाय बनवाई.

नंदू अब भी घबरा रहा था, जबकि हरकली के लिए घर में कोई मौत जैसी चीज नहीं रह गई थी.

‘‘मां, मुझे तो अब भी डर लग रहा है,’’ नंदू बोला.

‘‘बेटा, जब मैं नहीं घबरा रही हूं, तो तू क्यों घबरा रहा है? तू तो वैसे भी मरद है. तू चिंता मत कर. जब तक तेरी मां जिंदा है, तेरा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.’’

कोई कितना भी शातिर क्यों न हो, कोई न कोई सुबूत तो जानेअनजाने में छोड़ ही देता है. खून की कुछ बूंदें बोरे से रास्ते में टपकती चली गई थीं.

गांव के आवारा कुत्ते उन खून की बूंदों को सूंघते हुए लाश दबे गड्ढे तक पहुंच गए. उन्होंने पंजों से गड्ढे को खोद कर बोरा बाहर खींच लिया.

अभी वे बोरे को दांतों से खींच ही रहे थे, तभी सुबह के वक्त नदी किनारे शौच के लिए आए लोगों ने कुछ शक होने पर कुत्तों को वहां से भगा दिया और मंडावली थाने को सूचना दी.

पुलिस ने आते ही अपनी कार्यवाही शुरू की. तीनों कट्टों के मुंह खोले गए. यह पक्का हो गया था कि यह इनसानी शरीर है, लेकिन किस का…? एक कट्टे से खोपड़ी निकली, तो सब हैरान रह गए. सोमप्रकाश के चेहरे को पहचानने में गांव वालों से कोई गलती नहीं हुई.

पुलिस हरकली के घर पर आ धमकी. सब को यही शक था कि नंदप्रकाश ने ही अपने बाप की हत्या की होगी.

जैसे ही पुलिस ने नंदप्रकाश को पकड़ना चाहा, हरकली दहाड़ी, ‘‘खबरदार दारोगा, जो नंदू को हाथ भी लगाया. अपने आदमी को मैं ने मारा है, मुझे पकड़ो.’’

‘‘इस का क्या सुबूत है कि तुम ने ही अपने आदमी को मारा है?’’ दारोगा ने पूछा.

तभी वह लकडि़यों के ढेर में से खून से सना गंडासा ले कर आई और बोली, ‘‘लो दारोगा, यह रहा सुबूत. अभी तो इस पर लगा खून सूखा भी नहीं है. सबकुछ ताजाताजा है. जांच करने वालों को भी आसानी होगी.’’

यह सुन कर दारोगा सत्यवीर और गांव वाले दंग रह गए. सब के मन में एक ही सवाल था कि आखिर हरकली ने अपने आदमी को क्यों मारा? वह भी इतनी बेरहमी से, गंडासे से काट कर?

दारोगा सत्यवीर ने गंडासे को सीलबंद कराया और कानूनी कार्यवाही करते हुए थाने से 2 महिला कांस्टेबल बुलवाईं. हरकली को गिरफ्तार कर थाने लाया गया.

पूछताछ के लिए पुलिस नंदप्रकाश को भी थाने ले आई. फिर हरकली को बिजनौर जिला जेल भेज दिया गया. नंदप्रकाश को फिलहाल वकील ने जमानत पर छुड़वा लिया.

अदालत में पेशी वाले दिन वकील ने नंदप्रकाश को अच्छे से समझा दिया था कि उसे क्या बोलना है. सुरेखा को तो एकएक शब्द रटा दिया गया था.

हरकली ने अदालत में बयान दिया, ‘‘जज साहब, मेरा पति सोमप्रकाश नशेड़ी था. बहू सुरेखा उसे खाना देने गई थी. उस ने बहू की इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश की. हरकत तो उस नशेड़ी की पहले से ही ऐसी थी, लेकिन उस रात तो उस ने सारी हदें पार कर दीं और बहू की धोती खींच ली.

‘‘मैं यह सब देख रही थी. मैं भी एक औरत हूं. औरत कुछ भी बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अपनी इज्जत पर हाथ डालना नहीं, फिर वह चाहे कोई भी हो.

‘‘इस से पहले कि बहू कुछ करती, मैं ने वहीं पड़ा गंडासा उठाया और उस कलयुगी राक्षस पर गंडासे के कई वार कर दिए. उस का वहीं काम तमाम हो गया. बहू ने तो मुझे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं तो जैसे गुस्से से पागल हो गई थी.’’

‘‘क्या नंदप्रकाश उर्फ नंदू ने कुछ नहीं किया?’’ जज ने पूछा.

‘‘जज साहब, वह तो तब कुछ करता, जब वहां होता. वह तो इस घटना के तकरीबन आधे घंटे बाद नशे में चूर हो कर घर आया था.’’

बहू सुरेखा ने भी वही दोहरा दिया, जो वकील ने उसे रटाया था. नंदप्रकाश भी वकील की ही भाषा बोला. पुलिस ने भी सुबूत के तौर पर गंडासे पर हरकली के ही हाथों के निशान की रिपोर्ट पेश कर दी.

वकील और हरकली के हिसाब से सुनवाई सही दिशा में जा रही थी. सभी सोच रहे थे कि हरकली को सजा दे दी जाएगी और बात खत्म.

जज ने अपना फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘गवाहों के बयानों और सुबूतों के आधार पर हरकली…’’

‘‘रुकिए जज साहब, रुकिए. यह सच नहीं है.’’

सब की निगाहें चिल्लाने वाले शख्स की तरफ गईं. यह नंदप्रकाश था.

‘‘जज साहब, मेरी मां बेकुसूर है. यह हत्या मैं ने की है.’’

‘‘लेकिन, सुबूत और गवाह तो ऐसा नहीं कहते.’’

‘‘ जज साहब, मेरी मां मुझे बचाने के लिए ऐसा कर रही है. लेकिन जज साहब, मेरा दिल गवारा नहीं कर रहा है कि मेरी जगह मेरी मां जेल जाए.’’

‘‘जज साहब, मेरे बेटे की मत सुनिए. वह जज्बातों में बह रहा है. अदालत की कार्यवाही पूरी हो चुकी है. आप अपना फैसला सुना दीजिए जज साहब,’’ हरकली ने कठघरे से कहा.

‘‘नहीं जज साहब, सारे सुबूत और गवाह झूठे हैं. मैं आप को सब से बड़ा सुबूत देता हूं.’’

सब हैरान से नंदप्रकाश की ओर देखने लगे.

‘‘जज साहब, हत्या की बात तो छोडि़ए, इस उम्र में अगर मेरी मां इस गंडासे से 4 वार ही कर दे, तो मैं जानूं.’’

गंडासा मंगवाया गया, जो काफी वजनी था. उस गंडासे को देख कर कोई भी कह सकता था कि हरकली इस गंडासे से इतने ज्यादा भयंकर वार नहीं कर सकती.

अब तो जज भी उलझन में पड़ गया. वह भी समझ रहा था कि मांबेटे एकदूसरे को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. अब मुकदमे में एक नया मोड़ आ गया था. उस ने अपना फैसला टाल दिया और पुलिस को फिर से जांच करने के आदेश दिए. तब तक के लिए हरकली को भी जमानत मिल गई.

‘‘वाह नंदप्रकाश, तुम ने तो कमाल ही कर दिया,’’ वकील ने अदालत से बाहर आ कर कहा.

‘‘बस वकील साहब, आप की ही होशियारी है. आप ने हम दोनों को फिलहाल तो बचा लिया है,’’ नंदू
ने कहा.

‘‘फिलहाल ही नहीं नंदप्रकाशजी, अब आप दोनों समझ लेना जेल जाने से बच ही गए हो. इस मामले में अब पुलिस के हाथ हत्या का कोई सुबूत लगने वाला नहीं. बस, तुम पुलिस को खुश रखना.

‘‘बाकी भारतीय कानून व्यवस्था की लचरता को मैं अच्छी तरह समझाता हूं. यह प्याज के छिलके की तरह है, तारीख पर तारीख लगती चली जाती है, जिन का कोई अंत नहीं होता. अपराधी दुनिया से चला जाता है, लेकिन तारीखें खत्म नहीं होती हैं.

‘‘जहां तक सुबूत की बात है, बिना सुबूत के तो यहां कसाब को भी फांसी नहीं लगती, जो 26/11 के हमले में मुंबई के ताज होटल से रंगे हाथ पकड़ा गया था.’’

‘‘तो अब क्या करना है?’’

‘‘नंदप्रकाशजी, आप जरा भी चिंता मत करो. तारीख पर तारीख लगवाना मेरा काम है. अभी तो मामला निचली अदालत में है. अभी तो ऊपरी अदालतें अपील के लिए बची हुई हैं. मुझे इन अदालतों पर पूरा भरोसा है, आप बेफिक्र हो कर जिएं,’’ वकील ने मुसकराते हुए कहा.

हरकली जब जमानत पर बाहर आई, तो उस ने नंदप्रकाश को खूब डांटा. तब नंदप्रकाश ने हरकली की गोद में सिर रखते हुए कहा, ‘‘मां, मेरे रहते तू जेल जाए, ऐसा नहीं हो सकता. आखिर मेरी रगों में भी तो तेरा ही खून दौड़ रहा है, इसीलिए तो मैं ने तुझे बचाने के लिए जिले का सब से बढि़या वकील किया. उस ने हम दोनों को ही बचा लिया.’’

यह सुन कर हरकली मानो निहाल हो गई थी.

Social Story : करे कोई भरे कोई

Social Story : ‘जो लोग सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए औलाद पैदा करते हैं, उन की औलाद में भी अपने मातापिता के ये गुण आते ही आते हैं और वह बच्चा आगे उसी रास्ते पर खुद ही चलने लगता है. उस बच्चे को यह पता ही नहीं चल पाता कि आखिर वह ऐसा क्यों बन गया, जबकि उस का टारगेट तो कुछ और था.

‘ठीक उसी तरह जो लोग मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र आदि देखते हुए औलाद को जन्म देने का विचार रखते हैं, उन की औलाद में भी अपने मातापिता के अच्छे गुण साथ चलते हैं और ऐसी औलाद बुद्धिमान और संस्कारी होती है… संस्कारी होती है… संस्कारी होती है…’

ऐसी ही आवाजों की गूंज के साथ चौंक कर रमेश की नींद खुल गई वह घबराहट के मारे पसीनापसीना हो गया.

रमेश की नजर बगल में सो रहे अपने भाई नरेश पर पड़ी. उसे चैन से सोया देख कर रमेश के मन में यह विचार आया कि उसे कभी अपने भाई के जैसे चैन की नींद क्यों नहीं आती? वह क्यों हमेशा इतना बेचैन रहता है कि रातों को ठीक से सो भी नहीं पाता है?

रमेश ने अपने सिरहाने रखी पानी की बोतल खोल कर पानी पिया, पर कम पानी होने की वजह से उस की प्यास नहीं बुझी और वह पानी की बोतल लिए रसोईघर की ओर बढ़ गया.

पानी भरते हुए रमेश के दिमाग में कई बार रहरह कर यह खयाल आ रहा था कि क्या वह भी पहली श्रेणी वाले मांबाप की औलाद है और नरेश दूसरी श्रेणी वाले… कहीं इसलिए तो ऐसा नहीं है कि नरेश गुणी है और वह…

यही सब सोचतेसोचते रमेश वापस अपनी जगह पर आ कर अपने भाई को देखते हुए दोबारा सोने की नाकाम कोशिश करने लगा.

एक दिन रमेश के दोस्त देव ने अपने जन्मदिन पर एक पार्टी रखने का प्रस्ताव रखा, जिस में रमेश, अली, जस्सी, टीटू, टोनी के अलावा 4-6 लड़कियों को भी बुलाने का प्लान था.

रमेश ने कहा भी था, ‘‘यार, लड़कों की पार्टी में भला लड़कियों का क्या काम है?’’

लेकिन, बाकी सब ने कहा कि उन के बिना मजा भी तो नहीं आएगा. कैसी रूखीसूखी सी लगेगी पार्टी.

तभी अली ने कहा, ‘‘यार, वैसे भी रंग तो लड़कियों के जाने के बाद भी जमा रहेगा…’’ और सभी लड़के ठहाका लगा कर हंसने लगे.

टोनी ने कहा, ‘‘अगर वह वाला प्लान है, तो फिर पार्टी दिन में ही रखेंगे, ताकि लड़कियां जल्दी आएं और जल्दी ही चली जाएं और फिर हम सब अपनी रातें नीली कर सकें…’’ इतना सुनते ही वे सब जोरजोर से हंसने लगे.

एक देव का ही घर ऐसा था, जहां यह पार्टी बिना किसी रोकटोक के हो सकती थी, क्योंकि देव अकेला रहता था और उस के मातापिता विदेश में रहते थे.

पार्टी का होना देव के घर पर तय हुआ. किसी ने शराब का जिम्मा लिया, तो किसी ने खाने का, किसी ने सजावट और केक का, तो किसी ने संगीत और रोशनी का.

पार्टी में तेज संगीत और रंगबिरंगी गहरी रोशनी के साथ शराब बह रही थी. आने वाली लड़कियों में सिर्फ 4 ही लड़कियां दिखाई दे रही थीं. दिव्या, वंदना, कामिनी और रितु.

दिव्या ने बहुत ही कम कपड़े पहने हुए थे और वह नशे में चूर होने के साथसाथ सिगरेट के कश पर कश भी लगा रही थी.

दिव्या को देख कर अली का दिल मचल रहा था. उस ने उस के पास जा कर उसे ऊपर से नीचे तक कमीनों की नजर से देखते हुए कहा, ‘‘क्या कातिल जवानी है तेरी, मेरी जान… बस आज की रात मेरे नाम कर दे जानी… तो मजा ही आ जाएगा.’’

दिव्या ने भी टोनी को ऊपर से नीचे तक देखते हुए शराब का एक घूंट पिया और बोली, ‘‘अगर मैं ऐसा कर भी लूं, तो मुझे क्या मिलेगा छिछोरे…’’

‘‘कितना लेगी बोल…?’’

‘‘कितना नहीं, क्या लेगी पूछ…’’

‘‘अच्छा…’’ एक कुटिल मुसकान के साथ टोनी ने कहा, ‘‘तो चल, यही बता दे, क्या लेगी…?’’

दिव्या ने कहा, ‘‘शादी करेगा क्या मुझ से…?’’

टोनी कुछ कह पाता, उस के पहले ही अली ने आ कर कहा, ‘‘अबे जा… सड़क पर पड़े सामान से कोई घर नहीं सजाया करता…’’

इतना सुनने की देर थी कि दिव्या पीछे पलटी, उस ने अपनी सिगरेट का एक गहरा कश लिया और अली के गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया.

तमाचा इतना जोरदार था कि एक ही झटके में अली का सारा नशा उतर गया और उस के गाल पर दिव्या की उंगलियों के निशान छप गए.

अली की ऐसी दशा देख कर वहां मौजूद बाकी सभी लोग हंस दिए. सब के सामने हुई अपनी बेइज्जती ने उस वक्त अली के अहम को एक ऐसी चोट पहुंचाई कि गुस्से में उस का सिर भन्ना गया और वह भी दिव्या के साथ हाथापाई करने को हुआ कि तभी रमेश ने बीच में आ कर किसी तरह समझाबुझा कर उस का गुस्सा शांत किया और दिव्या को भी वहां से जाने के लिए कहा.

दिव्या बाकी लड़कियों के साथ संगीत पर थिरकने लगी, तभी रितु ने वहां आ कर कोल्डड्रिंक की एक बोतल मांगी और पास ही खड़े लड़कों के इस समूह को देखते हुए ‘चीयर्स’ बोल कर संगीत पर थिरकने लगी.

यों तो रितु ने पूरे कपड़े पहने हुए थे, लेकिन उस के चुस्त कपड़ों में से उस के नाजुक अंगों के उतारचढ़ाव को देखते हुए फिर एक बार सब के दिल मचलने लगे.

जैसेजैसे शाम गहरा रही थी, वैसेवैसे नशे का माहौल भी बढ़ रहा था. अब वह समय आ चुका था, जब वहां मौजूद हर कोई नशे में चूर हो चुका था.

लड़कियां अब धीरेधीरे अपने घर जाने लगी थीं. दिव्या के साथ वंदना और कामिनी भी घर जा चुकी थीं, लेकिन एक रितु ही थी, जो अब तक पार्टी में रुकी हुई थी.

रमेश ने रितु के पास जा कर कहा, ‘‘पार्टी खत्म हो चुकी है, अब तुम भी अपने घर जाओ.’’

‘‘अरे, अगर ऐसा है, तो तुम लोग क्यों नहीं गए? तुम सब भी जाओ न…’’

‘‘हद हो गई… हम होस्ट हैं, हम ने कहा कि पार्टी इज ओवर, तो ओवर. तुम जाओ न अपने घर.’’

उस वक्त तो रितु ने कुछ नहीं कहा और जाने लगी. लेकिन जैसे ही रमेश पलटा, तो वह चुपके से जा कर छिप गई, क्योंकि उसे यह जानने की उत्सुकता हो रही थी कि आखिर ये लड़के पार्टी के बाद ऐसा क्या करने वाले हैं, जो लड़कियों के जाने के बाद ही हो सकता है.

लड़कों का प्लान तो पहले से ही तय था. सभी देव के कमरे में जा कर उस के लैपटौप को टीवी से जोड़ कर ब्लू फिल्म लगा कर बैठ गए. बात अगर ब्लू फिल्म तक होती तब भी ठीक था, लेकिन यह तो ऐसी ब्लू फिल्म थी, जिस में हैवानियत वाला सैक्स दिखाया जा रहा था.

फिल्म के दौरान जैसेजैसे हैवानियत बढ़ रही थी, वैसेवैसे लड़कों का जोश भी बढ़ता जा रहा था. किसीकिसी को तो जोश के साथसाथ गुस्सा भी भरपूर आ रहा था.

तभी अली को अपने गाल पर पड़ा दिव्या का तमाचा याद आ गया था. उस ने गुस्से में रमेश से कहा, ‘‘भाई, अगर तू बीच में नहीं आया होता न, तो मैं ने उसे वहीं का वहीं मजा चखा दिया होता. पहले ये लड़कियां खुद ही कम से कम कपड़े पहन कर हम लड़कों के आसपास मंडराती हैं और हमें उकसाती हैं और फिर जरा सा छू क्या लो, तुरंत ज्वालामुखी बन जाती हैं…

‘‘और इतना ही नहीं, मेरे ही घर पर, मेरी ही पार्टी में सब के सामने मेरी बेइज्जती कर के चली गई…’’

तभी देव ने कहा, ‘‘एक मिनट, एक मिनट, घर तो मेरा है न…? फिर तेरी पार्टी, तेरा घर…’’

‘‘भाई, क्या कह रहा है यार…? हम सब तो तेरे घर को अपना ही घर समझते हैं और अपना ही घर कहते हैं… यार, पहले ही बहुत बेइज्जती हो चुकी है, अब तू तो कम से कम दिल मत तोड़ यार…’’

‘‘ओह अच्छा, ऐसा है क्या…? चल, फिर ठीक है… कोई नहीं, जाने दे यार… लड़कियां होती ही ऐसी हैं.’’

इस सब में अली यह नहीं जानता था कि उस को तमाचा मारने वाली लड़की का नाम दिव्या है. यह सब देख कर और उन सब की बातें सुन कर रितु ने यह अंदाजा लगा लिया कि वह किस लड़की के बारे में बात कर रहा है.

रितु को लगा कि उसे जा कर दिव्या को आगाह करना चाहिए, क्योंकि कहीं न कहीं दिव्या ने अली के अहम को गहरी चोट पहुंचा दी है और अब अली उस से बदला ले कर ही रहेगा.

ऐसा सोच कर रितु डर गई और उस के मुंह से अनायास ही आवाज निकल गई.

लड़कों ने उसे देख लिया, तो रितु वहां से भागी, लेकिन सभी लड़कों ने जा कर उसे घेर लिया.

रमेश ने उसे देखते ही कहा, ‘‘तुम…? तुम से मैं ने कहा था न घर जाने के लिए. तुम को एक बार में बात समझ में नहीं आती है क्या?’’

रितु सभी लड़कों को नशे में चूर देख कर डर गई थी. उस ने कहा, ‘‘गलती हो गई. मैं जा रही हूं.’’

तभी टोनी ने कहा, ‘‘अब तो चिडि़या फंस गई जाल में. तुम ने हमारी बात न मान कर बहुत बड़ी गलती कर दी है. अब इस की सजा तो तुम्हें मिल कर ही रहेगी.’’

यह कहते ही पार्टी की बत्तियां और धीमी हो गईं. सभी लड़के रितु के आसपास गोलगोल घूमने लगे.

रितु को घबराहट होने लगी. वह सब से हाथ जोड़ कर कहने लगी, ‘‘मुझे जाने दो प्लीज… मुझे जाने दो…’’

लेकिन उस की किसी ने एक न सुनी और सभी लड़के बस एक अजीब सी हंसी में गोलगोल घूमे जा रहे थे.

रितु की घबराहट बढ़ती जा रही थी, तभी उन्हीं में से किसी ने उस के शर्ट की बांह फाड़ दी. अब तो वह बुरी तरह डर गई और घबराहट के मारेमारे थरथर कांपने लगी.

अंधेरा इतना गहरा चुका था कि हाथ को हाथ दिखाई न दे, ऊपर से अब रितु पर डर इतना हावी हो चुका था कि अब उसे न तो किसी की आवाज समझ में आ रही थी, न चेहरा ही समझ आ रहा था.

तभी उन्हीं लड़कों में से किसी ने उस की पूरी शर्ट फाड़ डाली. अपने दोनों हाथों से अपने बदन को छिपाने की नाकाम कोशिश करते हुए रितु जोरजोर से रोने लगी और बारबार यही कहने लगी, ‘‘मुझे माफ कर दो. यहां से मुझे जाने दो प्लीज.’’

तभी सभी लड़कों ने मिल कर रितु को एक पलंग के पाए से बांध दिया और उसे पूरा नंगा कर दिया. वह रोती रही, बिलखती रही, पर किसी को उस पर दया न आई.

फिर उन्हीं में से किसी एक ने रितु की आंखों पर पट्टी बांध दी और अपनेअपने मोबाइल की रोशनी से उस के बदन को गिद्धों की तरह आंखें फाड़फाड़ कर ताड़ने लगे.

अली ने रितु को चांटे ही चांटे मारे, फिर उस के होंठों से खून निकाल दिया, फिर उस की गरदन पर दांतों के निशान छोड़े, उस के सीने को अपने हाथों के नाखूनों से छील दिया और फिर उस के साथ रेप किया.

बाकी दोनों लड़कों ने भी यही किया. सब से आखिर में रमेश की बारी आई. बहुत देर तक तो वह उसे देखता ही रहा, फिर उस ने लड़की के बदन को जैसे ही छुआ, लड़की पीड़ा से कांप उठी… उस के कराहने की आवाज सुन कर रमेश भी खुद को उस पाप का भागीदार बनाने से रोक न सका.

खैर, सभी नशे में चूर होने की वजह से अपनीअपनी हवस को शांत कर के वहीं पड़ेपड़े सो गए.

अगली सुबह जब देव की नींद खुली और उस ने रितु को ऐसी हालत में देखा, तो उस के पैरों तले जमीन निकल गई.

यह देख कर देव बुरी तरह घबरा गया. उस ने सब से पहले रितु को एक चादर से ढक दिया और उस के गालों को थपथपाते हुए कहने लगा, ‘‘उठो… जागो, प्लीज…’’

लेकिन, रितु तो मर चुकी थी. डर के मारे देव ने अपने सभी दोस्तों को जगाया. सभी रितु को देख कर डर गए. किसी ने पानी के छींटे मार कर उसे उठाना चाहा, तो किसी ने उस के हाथों और पैरों को मल कर उसे होश में लाना चाहा. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी थी. ज्यादा खून बह जाने के चलते रितु अब इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी थी.

तब रमेश ने देव से कहा, ‘‘भाई, जो होना था हो चुका. अब यह सोचो कि आगे क्या करना है.’’

देव ने कहा, ‘‘करना क्या है, चलो, चल कर खुद को पुलिस के हवाले कर देते हैं, शायद हमारी सजा कुछ कम हो जाए.’’

‘‘पागल जैसी बातें मत करो देव…’’

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सभी के चेहरे पर पसीना आ गया.

‘‘इस वक्त कौन हो सकता है?’’ रमेश ने देव से पूछा.

‘‘पता नहीं.’’

‘‘तो जा न, तुरंत जा कर देख कि कौन है.’’

‘‘मैं जा कर देखूं…? नहींनहीं, मैं नहीं जाऊंगा… तू जा.’’

‘‘पागल मत बन… घर तेरा है, तो तुझे ही जाना पड़ेगा न… हम में से अगर कोई गया, तो किसी पर कोई भी शक हो सकता है.’’

‘‘वाह… पार्टी करनी है, ऐयाशी करनी है, तो यह मेरा घर है, हमारा घर है और अब जब मुसीबत आन पड़ी, तो तेरा घर हो गया…’’

कोई कुछ कह पाता, तब तक दरवाजे पर दस्तक बढ़ने लगी. सभी ने किसी तरह समझाबुझा कर देव को दरवाजा खोलने के लिए कहा.

किसी तरह खुद को ठीक करते हुए सामान्य दिखने की नाकाम कोशिश करते हुए देव डरासहमा सा दरवाजे के पास पहुंचा. उस ने देखा कि बाहर कामवाली गंगूबाई आई है.

देव ने चैन की सांस लेते हुए दरवाजा खोल दिया.

गंगूबाई ने देव को ऊपर से नीचे तक देखते हुए पूछा, ‘‘साहब, आप… सब ठीक तो है न?’’

‘‘हां, मैं तो ठीक हूं. पर, तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?’’ देव ने खुद को एक नजर नीचे से ऊपर की ओर देख कर पूछा.

‘‘नहीं, आप थकेथके से लग रहे हो न साहब, इसलिए पूछा. चलो, कोई बात नहीं, मैं आप के लिए गरमागरम कौफी बनाती हूं,’’ कहते हुए गंगूबाई ने अंदर आने की कोशिश की, तो देव ने उसे दरवाजे पर ही रोकते हुए कहा, ‘‘अरे नहीं, मुझे अभी कौफी पीने का मन नहीं है.’’

‘‘अच्छा तो कोई बात नहीं, आप जा कर आराम करो न. मैं तब तक घर की साफसफाई कर देती हूं. देखो न कल रात की पार्टी के बाद सब कितना गंदा पड़ा है.’’

‘‘आज तुम्हारी छुट्टी है. तुम अभी अपने घर जा सकती हो,’’ देव बोला.

‘‘क्यों…? अब जब मैं यहां आ ही गई हूं, तो काम कर ही लेती हूं न साहब.’’

गंगूबाई ने दोबारा अंदर आने की कोशिश की, तो इस बार देव की आवाज घबराहट की वजह से ऊंची हो गई, ‘‘तुम को एक बार में बात समझ नहीं आती है क्या? मुझे कुछ नहीं चाहिए. आज मैं आराम करना चाहता हूं.’’

‘‘अरे साहब, मैं तो आप के भले के लिए ही कह रही थी,’’ कहते हुए गंगूबाई की नजर रितु की फटी शर्ट पर पड़ी और फिर वह मुंह पर पल्लू रख कर हंसते हुए वहां से चली गई.

देव को कुछ समझ में नहीं आया. वह जल्दी से दरवाजा बंद कर वापस अपने दोस्तों के पास पहुंचा.

रमेश ने कहा, ‘‘इस से पहले कि कोई और आ जाए, हमें जल्द से जल्द इस की लाश को ठिकाने लगाना होगा.

‘‘देव, तू अपनी एक शर्ट निकाल और इसे पहना दे और इस के बाकी कपड़े कहां हैं?’’

सभी हड़बड़ाहट में कपड़े ढूंढ़ने लगे, तभी देव को बहुत सारा खून दिखाई दिया, तो वह बोला, ‘‘इतना सारा खून कैसे साफ होगा?’’

रमेश बोला, ‘‘सब हो जाएगा. हमें सारे सुबूत मिटाने होंगे, इसलिए हमें अभी पूरे घर को चमकाना होगा.’’

कुछ ही देर में सारा घर आईने की तरह चमक उठा जैसे मानो गई रात यहां कुछ हुआ ही नहीं था.

फिर वे लोग किसी तरह उस लाश को अपनी गाड़ी में डाल कर हाईवे की ओर निकल गए. पर वे यह नहीं जानते थे कि उन के खिलाफ पुलिस थाने में पहले ही शिकायत दर्ज हो चुकी है.

कुछ ही देर बाद पुलिस देव के मकान पर पहुंची. बहुत देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो पुलिस दरवाजा तोड़ कर अंदर घुस गई. घर इतना साफसुथरा देख कर पुलिस को भी यही लगा कि यहां कुछ हुआ ही नहीं है.

तभी इंस्पैक्टर के दिमाग में अचानक एक खयाल आया और उस ने अपने सभी सिपाहियों को घर के सारे कूड़ेदान चैक करने को कहा, मगर सभी कूड़ेदान एकदम खाली और साफसुथरे थे.

तभी पुलिस का ध्यान घर के फर्श पर गया. फर्श अभी भी गीला था और रूम फ्रैशनर की बहुत तेज खुशबू आ रही थी. इंस्पैक्टर समझ गया कि दाल में जरूर कुछ काला है.

पुलिस आसपास पूछताछ करने लगी और अपने कुछ खबरियों को काम पर लगा दिया, ताकि जैसे ही देव आए, उसे तुरंत पुलिस थाने बुला लिया जाए.

उधर देव अपने बाकी दोस्तों के साथ हाईवे पर तेज रफ्तार में गाड़ी भगा रहा था और एक खाई के पास पुलिया को देखते ही उस ने कुछ इस तरह से गाड़ी को पुलिया से ठोका, ताकि यह हादसा लगे. फिर उन्होंने एक नए सिमकार्ड से पुलिस को फोन कर के सड़क हादसे की जानकारी दी और वह सिमकार्ड वहीं तोड़ कर फेंक दिया.

पुलिस मौका ए वारदात पर पहुंची और गाड़ी को किसी तरह सावधानी से क्रेन की मदद से निकाल लिया गया. गाड़ी में रितु की लाश मिली, जिसे पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और इंस्पैक्टर ने रितु के घर वालों को इस बारे में जानकारी देने को कहा.

देव के घर आ कर उन चारों ने सोचा कि चलो जान छूटी, पर तभी एक बार फिर दरवाजे पर दस्तक हुई. उन सभी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

इस बार रमेश ने दरवाजा खोला. पुलिस को सामने देख कर उन सभी की हवा खिसक गई.

एक सिपाही ने रमेश से पूछा, ‘‘देव तुम्हारा ही नाम है?’’

रमेश ने न में सिर हिलाया. पुलिस अंदर घुस गई और सिपाही ने दोबारा पूछा, ‘‘तुम में से देव कौन है?’’

देव ने घबराते हुए कहा, ‘‘जी, मैं ही हूं.’’

‘‘तुम्हें थाने बुलाया है.’’

यह सुन कर देव डर के मारे फूटफूट कर रोने लगा और एक ही एक बात दोहराने लगा, ‘‘मैं ने कुछ नहीं किया… मैं ने कुछ नहीं किया.’’

पर, सिपाही ने एक न सुनी और वे चारों थाने ले जाए गए.

थाने में कदम रखते ही रमेश ने अपने भाई नरेश को वहां बैठा हुआ पाया.

नरेश को वहां बैठा देख रमेश की आंखें हैरानी से चौड़ी हो गईं.

‘‘अरे नरेश, तू यहां कैसे?’’

नरेश रोता हुआ रमेश के गले लग गया और बोला, ‘‘भैया…’’

‘‘क्या हुआ? क्या बात है? सब ठीक तो है न?’’

‘‘भैया, रितु…’’

‘‘रितु क्या?

‘‘रितु अब इस दुनिया में नहीं रही भैया.’’

‘‘क्या… कैसे…’’

‘‘हां भैया, रितु की मौत की जांच के लिए उस के मांबाबा को यहां बुलाया गया है. मैं ने सोचा कि अगर यह सच हुआ, तो वे बेचारे यह सदमा कैसे सह पाएंगे, इसलिए मैं भी उन के साथ यहां चला आया.’’

‘‘पर, यह सब अचानक हुआ कैसे?’’

‘‘एक सड़क हादसे में हाईवे वाली पुलिया के पास. उस की मां का कहना है कि वह कल रात अपनी किसी सहेली के साथ एक पार्टी में गई थी, लेकिन रात को वापस आई ही नहीं.’’

पुलिया और हाईवे की बात सुनते ही रमेश के कान खड़े हो गए. नरेश कुछ कह पाता, उस के पहले ही पुलिस इंस्पैक्टर ने उसे लाश की पहचान करने के लिए अंदर भेज दिया और साथ ही, इन सब से पार्टी के बारे में पूछताछ होने लगी.

तभी रितु के पिताजी रोते हुए आए और हाथ जोड़ कर इंस्पैक्टर से कहने लगे, ‘‘मेरी बच्ची ने भला किसी का क्या बिगाड़ा था साहब… वह तो हमेशा सब से प्यार करने वाली लड़की थी. फिर उस के साथ ही यह दरिंदगी क्यों?’’

यह कहते हुए सदमे से उन के पैर लड़खड़ा गए, तभी नरेश और पुलिस इंस्पैक्टर ने मिल कर उन्हें संभाला और एक कुरसी पर बैठा दिया.

पुलिस ने उन चारों से पूछताछ कर के छोड़ दिया.

रितु के पिताजी हार मानने वालों में से नहीं थे. उन्होंने अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल मार्च निकाला, सोशल मीडिया पर जा कर लोगों को अपनी मुहिम से जुड़ने की अपील की, ताकि वे अपनी बच्ची के लिए इंसाफ मिलने की मांग को और तेज कर सकें.

रितु के पिताजी की मेहनत बेकार नहीं गई. धीरेधीरे रितु को इंसाफ दिलाने के लिए सब से पहले उन का शहर, फिर उन का प्रदेश और फिर सारे देश में रितु के लिए इंसाफ की आवाजें उठने लगीं. जनता के दबाव में आ कर प्रदेश की सरकार ने केस सीबीआई के हवाले कर दिया.

फिर से केस की फाइल खुली और पूछताछ का सिलसिला फिर से शुरू हुआ. इस बार देव के घर काम करने वाली गंगूबाई से ले कर पार्टी में आई दूसरी सभी लड़कियों से गहराई से पूछताछ की गई. तब दिव्या ने अपना सच बताया कि उस ने अली को सब के सामने तमाचा मारा था.

देव के घर के आसपास के सभी लोगों और सीसीटीवी कैमरे वगैरह की पड़ताल बड़ी गहराई के साथ की गई, जिस में सीबीआई ने भी यही पाया कि सुबूतों को मिटाने की भरपूर कोशिश की गई थी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया कि उस मासूम के साथ रेप किया गया था, जिस के चलते यह पक्का हो गया कि इन्हीं लड़कों ने मिल कर यह कांड किया था, जिस के बाद उन चारों को पुलिस हिरासत में ले लिया गया.

लेखिका – पल्लवी सक्सेना

Short Story : निम्मो

Short Story : नैशनल हाईवे की उस सुनसान सड़क पर ट्रक ड्राइवर ने जब विजय को उस के गांव से 8 किलोमीटर पहले उतारा, तो विजय को इस बात की तसल्ली थी कि गांव न सही, लेकिन गांव के करीब तो पहुंच ही गया. लेकिन इस बात का मलाल भी था कि जहां किराएभाड़े के तौर पर पहले 400-500 रुपए लगा करते थे, वहीं आज उसे 4,000 रुपए देने पर भी अपने गांव पहुंचने के लिए 8 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ेगा.

अब विजय सुनसान दोपहर में गरम हवाओं के थपेड़े सहता हुआ नैशनल हाईवे से तेजी से अपने गांव की तरफ बढ़ रहा था. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. सामान के नाम पर साथ में बस एक बैग था, जिसे अपने कंधे पर लटकाए पसीने से तरबतर वह लगातार चल रहा था.

अभी गांव कुछ ही दूरी पर था कि एक ठंडी हवा के झोंके से उस का धूप से झुलस कर मुरझाया चेहरा खिल उठा.

गांव से पहले पड़ने वाले अपने खेत में लहलहाती फसल देख कर विजय के तेजी से चल रहे कदमों ने दौड़ना शुरू कर दिया. वह दौड़ते हुए ही अपने खेत में दाखिल हुआ और वहां काम कर रहे अपने बाबा से लिपट गया.

‘‘अरे, देखो तो कौन आया है…’’ विजय के बाबा ने खेत में बनी झोपड़ी में काम कर रही उस की मां को आवाज लगाई.

‘‘अरे विजय बेटा, कैसा है तू? और यह क्या हालत बना ली… देख, कितना दुबलापतला हो गया है,’’ कहते हुए विजय की मां झोपड़ी से भाग कर के पास आई.

‘‘इतने दिनों के बाद देखा है न मां, इसीलिए ऐसा लग रहा है तुम्हें. और वैसे भी अब तो गांव में तुम्हारे हाथों का ही बना खाना मिलेगा, खिलापिला कर कर मुझे कर देना मोटाताजा,’’ कहते हुए विजय ने मां को गले से लगा लिया.

‘‘धूप में चल कर आया है, देख कितना गरम हो गया है. यहां ज्यादा मत रुक, घर जा कर आराम कर ले… और हां, निम्मो को भी लेता जा साथ में, वह तुझे खाना बना कर खिला देगी.’’

‘‘निम्मो.. निम्मो यहां क्या कर रही है?’’ विजय ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘अरे, तुझे तो मालूम है कि निम्मो के मांबाबा हमारे गांव में बाहर से आ कर बसे हैं. उन का खुद का खेत तो है नहीं, इसलिए वे लोग काम करने किसी दूसरे के खेत में जाते हैं. निम्मो उन के साथ नहीं जाती.

‘‘निम्मो का भाई अपने मामा के यहां बिजली का काम सीखने शहर चला गया. यह बेचारी घर में बैठी बोर हो जाती है…’’

मां ने आगे कहा, ‘‘एक दिन मैं और तेरे बाबा खेत के लिए निकल रहे थे तो यह मुझ से बोली, ‘काकी, आते वक्त अपने खेत से बेर लेती आना, मुझे बेरी के बेर बहुत भाते हैं…’

‘‘तो मैं बोली, ‘खुद ही आ कर तोड़ ले और जितने मरजी ले जा…’

‘‘तब से जब भी मन करता है, यह हमारे खेत चली आती है,’’ कह कर मां ने निम्मो को आवाज लगाई.

बेर की गुठली थूकते हुए जैसे ही निम्मो झोपड़ी से बाहर आई, विजय हैरान रह गया. गांव के सरकारी स्कूल में उसी की क्लास में पढ़ने वाली निम्मो अब काफी बदल चुकी थी. पहले तो न कपड़ों का कोई अतापता था, न बालों की कोई सुधबुध होती थी.

लेकिन आज निम्मो की खूबसूरती देख कर विजय को यकीन नहीं हुआ. खुले बाल, गोरा रंग, भरापूरा बदन और बिना किसी मेकअप के चेहरे पर लाली दमक रही थी.

विजय भी यह सोच कर हैरान था कि इतने कम समय में इतना बदलाव कैसे आ सकता है. हालांकि पिछले 3 सालों में वह 2 बार गांव आया था, लेकिन दोनों बार ही निम्मो अपने मामा के यहां गई हुई थी.

‘‘हां काकी…’’ पास आ कर निम्मो विजय की मां से बोली.

‘‘तू विजय के साथ घर जा और इसे खाना बना कर खिला देना, फिर भले ही अपने घर चली जाना. हम लोग भी थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करेंगे,’’ मां ने निम्मो से कहा, तो निम्मो ने हां में सिर हिलाया और इकट्ठा किए हुए बेरों से भरी अपनी थैली लेने झोपड़ी की ओर चली गई.

जब वह वापस आई तो विजय की ओर देख कर बोली, ‘‘चलिए.’’

मांबाबा को जल्दी घर आने की कह कर विजय निम्मो के साथ घर के लिए निकल पड़ा.

रास्ते में निम्मो बेर निकाल कर विजय की तरफ बढ़ाते हुए बोली, ‘‘ये लो बेर खाओ, रास्ते में अच्छा टाइमपास हो जाएगा.’’

विजय ने उस के हाथों से बेर ले लिए और चलते हुए उस की नजरों से बच कर उसे देखने लगा.

निम्मो थैली से बेर निकालती और उसे तब तक चूसती, जब तक उस का सारा रस न निकल जाता और फिर फीका पड़ने पर थूक देती.

विजय भी निम्मो के अंदाज में बेर खाते हुए उस के साथ चल रहा था. चलते वक्त निम्मो के सीने पर होने वाली हलचल बारबार उस का ध्यान खींच रही थी.

निम्मो की जब इस पर नजर पड़ी तो उस ने दुपट्टे से ढक लिया. लेकिन दुपट्टा भी विजय की नीयत की तरह बारबार फिसल रहा था.

‘‘लौकडाउन हुआ तो गांव की याद आ गई, वरना तुम्हारे तो दर्शन ही दुर्लभ थे,’’ बेर की गुठली थूकते हुए निम्मो बोली.

‘‘इस से पहले भी 2 बार आया था, लेकिन तू नहीं मिली. काकी से पूछा तो बोली मामा के यहां गई हुई है,’’ विजय ने भी शिकायती लहजे में कहा.

‘‘और जिस दिन मैं आई तो काकी बोली कि विजय आज सुबह ही शहर के लिए निकला है. मतलब, इस थोड़े से फासले की वजह से तुम्हारे दर्शन नहीं हो पाए,’’ निम्मो ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां, ऐसा ही समझ,’’ विजय ने कहा.

पूरे रास्ते निम्मो तीखे सवाल करती तो विजय उन का मीठा सा जवाब दे देता और विजय कोई मीठा सवाल करता तो निम्मो उस का खट्टामीठा जवाब दे देती.

बातों का यही स्वाद चलतेचलते एकदूसरे के दिलों में झांकने का जरीया बना और इसी की बदौलत दोनों एकदूसरे के दिल का हाल जान पाए.

बेरों से भरी थैली भी तकरीबन आधी हो चुकी थी और अब घर भी आ गया था.

घर पहुंच कर विजय नहाने चला गया और निम्मो रसोई में खाने की तैयारी करने लगी.

विजय नहाधो कर आया, तब तक खाना भी तैयार था. निम्मो ने उसे खाना खिलाया, फिर विजय ने उसे चाय बनाने को कह दिया और खुद कमरे में अपना बैग खोल कर उस में नीचे दबा कर लाए हुए कुछ रुपए अलमारी में रख कर निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़ा. थकावट की वजह से कब उस की आंख लग गई और उसे पता ही नहीं चला.

निम्मो जब तक चाय ले कर आई, तब तक विजय को नींद आ चुकी थी. निम्मो ने उसे उठाना मुनासिब नहीं समझ और वापस रसोई की ओर मुड़ी. तभी उस की नजर विजय के बैग के पास बिखरे सामान पर पड़ी तो वह हैरान रह गई. उस के सामान के साथ कुछ गरमागरम पत्रिकाएं भी पड़ी थीं.

यह देख एक बार तो निम्मो को बहुत गुस्सा आया, लेकिन बाद में उस ने धीरे से चाय की ट्रे नीचे रखी और उन पत्रिकाओं को उठा कर देखने लगी.

उस ने बैग के अंदर हाथ डाला तो 2-4 पत्रिकाएं और निकलीं, जो कुछ हिंदी में तो कुछ इंगलिश में थीं.

निम्मो ने एक के बाद एक उन के पन्ने पलटने शुरू किए. हर पलटते पन्ने के साथ उस के सांसों की रफ्तार भी बढ़ने लगी. सांसों में गरमाहट महसूस करते हुए वह कभी बिस्तर पर लेटे विजय की ओर देखती, तो कभी मैगजीन में छपी बोल्ड तसवीरें.

कुछ तसवीरें देख कर तो वह ऐसे ठहर जाती मानो यह सब उसी के साथ हो रहा हो, जबकि कुछ तसवीरों ने तो उस के दिलोदिमाग में घर कर लिया था.

तभी अचानक विजय ने करवट बदली तो वह सहम गई, जिस से उस के हाथ से मैगजीन छूट कर चाय की ट्रे पर जा गिरी.

इस आवाज से विजय की आंख खुली और निम्मो के हाथ में मैगजीन देख वह चौंक कर खड़ा हो गया.

एक बार तो निम्मो भी शर्म से पानीपानी हो गई थी. विजय अपनी सफाई में कुछ कहता, उस से पहले निम्मो ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘कमबख्त शहर में यही सब करते हो क्या तुम?’’ निम्मो ने पूछा.

खुद को निम्मो की बांहों में पा कर विजय हैरान तो था, साथ ही वह उस की मंशा जान चुका था.

विजय ने अपनी सफाई में कहा, ‘‘ये सब मेरी नहीं हैं, उस ट्रक ड्राइवर की हैं, जिस ने मुझे सड़क तक छोड़ा था. ट्रक में रखी इन पत्रिकाओं को देख कर मैं ने लौकडाउन में टाइमपास के लिए पढ़ने के लिए मांगी तो उस ने दे दीं.’’

‘‘जरा भी शर्म है तुम में? मेरे होते हुए इन से टाइमपास करोगे तुम? पता है, कितनी तरसी हूं मैं तुम्हारे लिए… हर दूसरे दिन काकी से तुम्हारे बारे में पूछती रहती थी. यह तो अच्छा हुआ कि मुझे मांबाबा ने फोन नहीं दिलाया वरना मैं फोन कर के रोज तुम्हें परेशान करती,’’ विजय को अपनी बांहों में जकड़ते हुए निम्मो ने कहा, तो विजय ने उसे बिस्तर पर धकेल दिया.

निम्मो के अंगों को प्यार से सहलाते हुए विजय ने कहा, ‘‘मैं भी तुझे बहुत चाहता हूं पगली, पर अब तक यह सोच कर चुप रहा कि न जाने तेरे मन में क्या होगा.’’

‘‘अब तो पता चल गया न कि मेरे मन में क्या है?’’ निम्मो ने पूछा, तो विजय पागलों की तरह उसे चूमने लगा और इस प्यार की सारी हदें पार करने के बाद विजय के साथ चादर में लिपटी निम्मो बोली, ‘‘विजय… आज तुम्हारा प्यार पा कर निम्मो विजयी हुई.’’

विजय ने निम्मो के माथे को चूमते हुए फिर से उसे अपनी बांहों में भर लिया.

लेखक – पुखराज सोलंकी

Social Story : पाखंडी तांत्रिक

Social Story : अचानक रिम्मी को पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर नाम की बीमारी के कुछ दौरे ही पड़े होंगे कि मां झट से गईं और चप्पल से रिम्मी पर अनगिनत वार करती चली गईं.

हालांकि उन्हें यह बहुत बाद में पता चला कि यह कोई बीमारी है, जिसे मैडिकल साइंस में पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर कहा जाता है. वरना उस दिन रिम्मी की मां ने तो किसी ऊपरी साए का चक्कर समझ कर उस साए पर चप्पलों की बरसात कर दी थी, जबकि दर्द रिम्मी को सहना पड़ रहा था.

रिम्मी की मां ने रिम्मी को दौरे पड़ने वाली बात को समाज से छिपाए रखी, शायद इसलिए क्योेंकि रिम्मी की शादी एक साल पहले ही विजय से तय हो चुकी थी.

विजय एक अच्छे परिवार और पढ़ेलिखे घर का सुशील और गुणवान लड़का था और पेशे से सीबीआई अफसर भी. रिम्मी और विजय दोनों ही एकदूसरे को कालेज से पसंद भी करते आए थे. ऐसे में मां नहीं चाहती थीं कि महल्ले वालों को रिम्मी की इस बीमारी के बारे में पता चले और इतनी अच्छी ससुराल हाथ से निकल जाए.

रिम्मी को जब कभी भी ऐसे दौरे पड़ते, उस के थोड़ी देर बाद ही वह अपनेआप शांत हो जाती. उसे बिलकुल भी याद नहीं रहता कि उस के साथ क्या हुआ और उस ने कैसीकैसी हरकतें कीं.

पर हुआ वही, जो रिम्मी की मां नहीं चाहती थीं. अब भला रिम्मी के घर से उस के चिल्लाने की अजीबोगरीब आवाज आना, रोनाबिलखना भला कोई कैसे अनसुना कर सकता था.

एक दिन ठेले पर सब्जी लेते समय सुनीता आंटी ने पूछ ही लिया, ‘‘अरे रिम्मी की मां, सुनो तो जरा. यह रिम्मी को क्या हो गया है? अगर कोई बात है तो बताओ?’’

सुनीता आंटी पड़ोस में ही रहती थीं और इसीलिए बाकियों से ज्यादा उन के साथ रिम्मी की मां के अच्छे संबंध थे.

मां ने अभी तक अपना यह दुख किसी के साथ नहीं बांटा था, शायद इसी वजह से सुनीता आंटी के जरा से पूछ लेने पर उन से रहा नहीं गया और दिल खोल कर सारी बात बता दी. उन्हें लगा कि शायद इन के पास इस मुसीबत का कोई हल हो.

‘‘अरे इतनी सी बात के लिए इतना घबरा रही थीं आप. एक बार मुझे पहले ही बता तो दिया होता, अब भला रिम्मी हमारी बेटी नहीं है क्या,’’ सुनीता आंटी के इतना कहने पर रिम्मी की मां को आशा की एक किरण दिखने लगी. मां को लगा कि शायद सुनीता आंटी के पास इस समस्या का कोई समाधान जरूर है.

‘‘अरे, मैं ने ऐसी कई लड़कियों को देखा है, जिन पर ऊपरी चक्कर या अन्य कोई दोष होता है और उस के चलते वे अजीबअजीब सी हरकतें करने लगती हैं.

‘‘डरो मत, मैं एक ऐसे तांत्रिक बाबा को जानती हूं, जो सिर्फ माथा छू कर सारी समस्याओं की जड़ बता देते हैं,’’ सुनीता आंटी ने रिम्मी की मां से कहा.

मां ने बिना कुछ सोचेसमझे सुनीता आंटी से तांत्रिक के यहां चलने की बात पक्की भी कर ली.

‘‘चलो रिम्मी उठो, जल्दी उठो और तैयार हो जाओ. हमें कहीं जाना है,’’ मां ने सुबहसुबह ही रिम्मी को नींद से जबरदस्ती उठा लिया.

‘‘क्या हुआ मां, कहां जाना है? बताओ पहले…’’ रिम्मी ने लेटेलेटे ही मां से पूछा.

‘‘वे सुनीता आंटी एक तांत्रिक बाबा को जानती हैं. वे बड़े ही पहुंचे हुए बाबा हैं. वे तुझे देखते ही बता देंगे कि क्या परेशानी है और फिर तेरा इलाज भी कर देंगे,’’ मां ने रिम्मी को समझाया.

‘‘मां, आप भी कैसेकैसे लोगों की बातों में आ जाती?हैं और वह भी आज के जमाने में. आप ने यह कैसे सोच लिया कि मैं आप के साथ चलने को तैयार हो जाऊंगी.’’

‘‘बेटी, एक बार चल कर देखने में क्या हर्ज है. और क्या पता, किस का तुक्का ठीक बैठ जाए. हमें तो बस तेरे ठीक होने से मतलब है. अभी तेरी शादी होने में सिर्फ 6 महीने ही बचे हैं न? उस से पहले ही ठीक होना है न तुझे?’’ पिताजी ने भी मां की तुक में तुक मिला कर रिम्मी को समझाया.

रिम्मी भी न नानुकुर करतेकरते मान ही गई और तांत्रिक के पास चलने के लिए राजी हो गई.

तांत्रिक का ठिकाना बड़ा ही घनचक्कर कर देने वाला था. पता नहीं कितनी पतलीपतली संकरी गलियों के अंदर उस ने अपना घर बना रखा था. सुनीता आंटी ने मां और रिम्मी को दरवाजे पर ही समझा दिया था कि जाते ही उन बाबा के पैर पकड़ कर आशीर्वाद ले लेना.

तांत्रिक के घर पर पहले से ही 4-5 लोग बैठे हुए थे. रिम्मी को बड़ी हैरत हुई कि आज भी इतने लोग डाक्टरों को छोड़ कर इन पाखंडियों के पास आते हैं. फिर सोचा कि अगर इतने लोग अपना इलाज कराने आए हैं, तो जरूर इस तांत्रिक में कोई तो बात होगी.

तकरीबन 2 घंटे के इंतजार के बाद रिम्मी का नंबर भी आ ही गया. रिम्मी ने इस से पहले कभी किसी तांत्रिक को रूबरू नहीं देखा था, सिर्फ टैलीविजन पर ही देखा था. उस को लगा था कि कोई काला कुरतापाजामा पहने खोपडि़यों की माला और ढेर सारी अंगूठियां पहने, काला टीका लगाए, आग जलाए बैठा होगा, पर अंदर जाते ही उस ने देखा कि तकरीबन 40-45 साल का एक आदमी फौर्मल कपड़ों में अपने सोफे पर बैठा हुआ था. हां, अंगूठियां तो उस ने भी पहनी थीं, पर इतनी नहीं. और माथे पर काला टीका भी लगाया हुआ था.

तांत्रिक सुनीता आंटी को जानता था, शायद इसलिए उस ने सब लोगों के लिए चाय और बिसकुट का भी इंतजाम किया.

रिम्मी से तांत्रिक ने उस की बीमारी के बारे में पूछा और अंदर बने एक कमरे में ले जा कर कुछ जादूटोना कर के कई तरह के प्रपंच करने लगा, जिन का रिम्मी पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

फिर रिम्मी को बाहर ले जा कर उस ढोंगी तांत्रिक ने मां को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘देखो, किसी भटकती आत्मा ने रिम्मी के शरीर को अपना वास बना लिया है, पर घबराने वाली कोई बात नहीं है…

‘‘ऐसे केस मेरे पास आएदिन आते रहते हैं. मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं,’’ तांत्रिक अपनी बड़ाई करते थक नहीं रहा था कि अगले ही पल असली मुद्दे पर आ गया.

‘‘देखिए, इस तरह की आत्माओं से निबटने के लिए अकसर खास तरह की पूजा कराने की जरूरत पड़ती है और एक बकरे की बलि भी देनी ही पड़ती है.

‘‘इस सब पर कम से कम 40,000 से 50,000 रुपए का खर्चा तो मान कर ही चलिए, लेकिन आप लोग चिंता मत कीजिए, सारी सामग्री का इंतजाम हम खुद ही कर लेंगे. अगर आप को ठीक लगे तो बताना. आगे की विधि मैं आप को उस के बाद ही बताऊंगा.’’

रिम्मी चालाकी दिखाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, आप बस अपना खर्च बता दीजिए, सामग्री का इंतजाम हम खुद कर लेंगे.’’

‘‘नहीं बेटी, यह कोई ऐसीवैसी सामग्री नहीं है, जो कहीं पर भी मिल जाए. यह सारी सामग्री हमारे सिद्ध गुरुजी की आज्ञा से विशेष विधि से लाई जाती है, इसलिए यह काम तुम हम पर ही छोड़ दो.’’

तांत्रिक अपना उल्लू सीधा करने के मकसद से बोल रहा था. सब ने तांत्रिक से अलविदा ली और जैसे ही जाने के लिए मुड़े, वैसे ही तांत्रिक ने टोकते हुए फीस के नाम पर पहली ही मुलाकात में रिम्मी की मां से 5,000 रुपए ऐंठ लिए.

रिम्मी को तांत्रिक द्वारा 5,000 रुपए मांगने वाली बात पर कुछ शक हुआ. वे समझ चुकी थीं कि यह तांत्रिक के नाम पर पाखंडी है, पर उस की मां तांत्रिक की बातें आंख बंद कर मानने लगी थीं.

घर पहुंचते ही रिम्मी के फोन पर विजय का फोन आया, तो वह चुपचाप अपने कमरे की ओर निकल गई और तांत्रिक की बात बताने लगी.

मां और पिताजी ने रिम्मी से कहा कि वे तांत्रिक बाबा से विशेष क्रियाकर्म करवाएंगे.

रिम्मी ने भी इस बात का कोई विरोध नहीं किया और बड़ी आसानी से मान गई.

मां ने तुरंत तांत्रिक को फोन लगाया और आगे की सारी विधि समझ ली.

तांत्रिक ने उन्हें बताया, ‘अमावस्या की रात को मैं जो पता बताने जा रहा हूं, वहां पहुंच जाना. हम रिम्मी के अंदर बैठी उस दुष्ट आत्मा को बोतल में कैद कर अपने साथ ले जाएंगे और रिम्मी को उस दुष्ट आत्मा से हमेशा के लिए मुक्त कर देंगे.’

अमावस्या की रात भी आ चुकी थी और रिम्मी की मां और पिताजी उसे ले कर तांत्रिक के बताए उस पते पर पहुंच गए थे.

तांत्रिक पहले ही रिम्मी के पिताजी से पूरे 50,000 रुपए की दक्षिणा मांग लेता है और रिम्मी को अपने साथ खुफिया कमरे में ले जा कर उस से कहता है, ‘‘रिम्मी, अब अपने सारे कपड़े उतार कर इस आसन पर बैठ जाओ. इस विशेष पूजा में तन पर कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए, वरना वह आत्मा कभी तुम्हारे अंदर से नहीं निकल पाएगी.’’

इतना कहते ही रिम्मी ने एक जोरदार तमाचा तांत्रिक के गाल पर जड़ दिया, उतने में ही विजय अपने कई साथियों के साथ दौड़ता हुआ उस कमरे का गेट तोड़ कर अंदर जा घुसा.

रिम्मी के मां और पिताजी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है और जमाई राजा यहां कैसे आ गए, वह भी इतने आदमी ले कर.

विजय ने अंदर पहुंचते ही उस तांत्रिक के हाथों में हथकड़ी डाली, तो पिताजी ने विजय से पूछा, ‘‘बेटा, यह सब क्या है?’’

‘‘पापाजी, शायद आप लोगों को यह नहीं मालूम कि यह तांत्रिक नहीं, बल्कि डकैत?है. इस ने लोगों को ठगने का नया तरीका ढूंढ़ लिया है. पिछले कई महीनों से हमारे डिपार्टमैंट को इस की तलाश थी. यह अब लोगों को लूटने उन के घर नहीं जाता, बल्कि लोग इस के पास खुद आते हैं अपनेआप को लुटवाने के लिए.

‘‘यह पाखंडी लोगों को ठीक करने का झूठा वादा कर के उन से हजारोंलाखों रुपए तक वसूल लेता है और फिर किसी दूसरे शहर में अपना शिकार ढूंढ़ने के लिए निकल जाता है.’’

विजय ने उस पाखंडी बाबा की सचाई रिम्मी के पिताजी को बताई, जिसे रिम्मी की मां भी सुन रही थीं.

‘‘पर बेटा, तुम्हें कैसे पता चला कि हम लोग रिम्मी को ले कर इस तांत्रिक के पास आए हुए हैं?’’ मां ने हैरान होते हुए विजय से पूछा.

‘‘मांजी, जिस दिन आप रिम्मी को पहली बार इस डकैत के पास ले कर गई थीं, उस दिन मैं ने रिम्मी से बात करने के लिए उसे फोन लगाया था. तब रिम्मी ने मुझ सारी बात बताई.

‘‘रिम्मी ने मुझे इस के बारे में जोकुछ बताया और वह फीस के 5,000 रुपए के बारे में बताया, तो मेरे दिमाग की बत्ती जली. मुझे याद आया कि कहीं यह वही तांत्रिक तो नहीं जिस की तलाश मैं और मेरे साथी कई महीनों से कर रहे हैं.

‘‘मैं ने तुरंत इस तांत्रिक का स्टिंग आपरेशन करने का प्लान बनाया और फोन पर ही सारी योजना रिम्मी को समझा दी.

‘‘और आज जब आप लोग अपने घर से निकले, तब हम ने आप लोगों का पीछा किया था, क्योंकि इस के अड्डे तक हमें सिर्फ आप ही पहुंचा सकते थे.

‘‘अपनी योजना के मुताबिक हम सारे अफसर अपना हुलिया बदल कर गाड़ी में बैठेबैठे रिम्मी की माला पर लगे स्पाई कैमरे से सबकुछ लाइव देख रहे थे और जैसे ही रिम्मी ने इसे तमाचा मारा, हम समझ गए कि कोई बात जरूर है और अंदर इसे दबोचने चले आए.’’

इतना कह कर रिम्मी की ओर देखते हुए विजय ने बताया, ‘‘मांजी, मैं ने रिम्मी की बीमारी के बारे में कुछ दिनों पहले ही अपने दोस्त से फोन पर पूछा था, जो लंदन में एक मनोचिकित्सक है.

‘‘उस ने बताया कि रिम्मी के अंदर किसी आत्मा का वास नहीं, बल्कि पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर की बीमारी है. इस की वजह से अकसर मरीज अजीबअजीब सी हरकतें करने लगता है, जैसे बहुत गुस्सा आने के चलते अपना आपा खो देना, किसी पर विश्वास न करना, अकेले रहना, पर यह बीमारी डाक्टर के इलाज से जल्दी ठीक भी हो जाती है.’’

विजय यह सब बातें बताते समय तांत्रिक को गुस्से भरी आंखों से घूरे जा रहा था.

इस के बाद विजय ने उस तांत्रिक से रिम्मी के 50,000 और उस दिन की फीस के 5,000 रुपए भी वसूल कर रिम्मी के पिताजी को दे दिए.

लेखक – हेमंत कुमार

Family Story : न्याय अन्याय

Family Story : कुंडी खड़कने की आवाज सुन कर निम्मी ने दरवाजा खोला, ‘‘जी कहिए…’’ निम्मी ने बाहर खड़े 2 लड़कों को नमस्ते करते हुए कहा.

‘‘जी, हम आप के महल्ले से ही हैं. आप को राशन की जरूरत तो नहीं…’’ उन में से एक ने निम्मी से कहा.

‘‘जी शुक्रिया, अभी घर में राशन है…’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है… जब भी जरूरत होगी, तो इस मोबाइल नंबर पर फोन करना…’’ उन में से एक बड़ी मूंछों वाले लड़के ने निम्मी को एक कागज पर मोबाइल नंबर लिख कर देते हुए कहा.

लौकडाउन का तीसरा दिन था. पूरा शहर एक उदासी और सन्नाटे की ओर बढ़ रहा था. किसी को नहीं पता था कि कब बाजार खुलेगा, कब घर से बाहर निकल सकेंगे और कब हालात सही होंगे.

निम्मी का पति अमर किसी काम से दूसरे शहर गया हुआ था कि अचानक से ये कर्फ्यू से हालात हो गए.

निम्मी की शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ था. निम्मी बहुत खूबसूरत थी. न जाने कितने नौजवान निम्मी को किसी न किसी तरह पाना चाहते थे.

यह तालाबंदी भी निम्मी की जिंदगी में घोर अंधेरा ले कर आई थी. उसे अमर से मिलने की उम्मीद दिखने लगी थी कि लौकडाउन को आगे बढ़ा दिया गया. एक ओर राशन खत्म हो रहा था, तो वहीं दूसरी ओर अमर के खेत में गेहूं की खड़ी फसल. अब कौन फसल को काटे और कौन मंडी ले जाए.

निम्मी सोच ही रही थी कि अमर का फोन आया, ‘निम्मी, मु झे तो अभी वहां आना मुमकिन नहीं जान पड़ता… खेत का क्या हाल है… तुम गई क्या किसी दिन?’

‘‘बस एक दिन गई थी… फसल पक चुकी है, पर अमर अब यह कटेगी कैसे… मजदूर भी नहीं मिल रहे इस वक्त यहां,’’ निम्मी ने बताया.

कुछ देर इधरउधर की बात कर के निम्मी ने फोन रख दिया.

तभी उस के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी, ‘‘अमर… बाहर आना.’’

महल्ले के धनी सेठ की आवाज सुन कर निम्मी बाहर आई.

‘‘अमर को बुलाओ तो बाहर. उस से कहो, अगर गेहूं की फसल जल्दी नहीं काटी तो सारी खराब हो जाएगी.’’

‘‘जी, वे तो शहर से बाहर गए थे किसी काम से और तालाबंदी के चलते वहीं फंस गए,’’ निम्मी ने बताया.

हालांकि धनी सेठ अच्छी तरह से जानता था कि अमर घर पर नहीं है, फिर भी अनजान बनने की अदाकारी बखूबी कर रहा था, ‘‘ओह, लेकिन अगर फसल नहीं कटेगी, तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा…’’

‘‘जी जरूर… जरूरत हुई तो आप के पास आ कर कह दूंगी. वैसे, इतनी खेती तो है नहीं कि मंडी तक पहुंचाई जाए. हमारा ही गुजर होने लायक अनाज होता है,’’ निम्मी ने हाथ जोड़ कर कहा.

धनी सेठ कई सवाल ले कर जा रहा था कि निम्मी मु झे बुलाएगी या नहीं, क्या कभी निम्मी के साथ गुफ्तगू मुमकिन है. वह खुद से ही बोलते जा रहा था कि पुजारी से सामना हो गया.

‘‘प्रणाम पुजारीजी… कैसे हैं आप?’’ धनी सेठ पुजारी से बोला.

‘‘चिरंजीवी रहो धनी सेठ… तरक्की तुम्हारे कदम चूमे,’’ दोनों हाथों से आशीष देते हुए पुजारी ने कहा.

‘‘इस दोपहरी में कहां से आ रहे हैं और कहां जा रहे हैं?’’ धनी सेठ ने पुजारी से पूछा.

पुजारी ने सकपकाते हुए जवाब दिया, ‘‘बस, एक यजमान के घर से आ रहा हूं… तो सोचा, थोड़ा नदी किनारे टहल आऊं.’’

‘‘अच्छा… नमस्ते,’’ कह कर धनी सेठ आगे बढ़ गया. इधर निम्मी ने अमर को फोन पर धनी सेठ के प्रस्ताव के बारे में बताया, तो अमर ने साफ इनकार करने को कहा, क्योंकि वह उसे अच्छी तरह जानता था और इस सहयोग के पीछे की मंशा पर भी उसे शक था.

निम्मी ने फोन रखा ही था कि किसी ने घर का दरवाजा खटखटाया. निम्मी ने दरवाजा खोल कर सामने खड़े पुजारी को प्रणाम किया.

पुजारी ने भी धनी सेठ की तरह हमदर्दी और सहयोग का प्रस्ताव दिया. इसी तरह हैडमास्टर किशोर कश्यप ने भी सहयोग का प्रस्ताव निम्मी के सामने रखा.

निम्मी असमंजस में थी. एक ओर उस की शुगर की दवा खत्म हो रही थी, वहीं दूसरी ओर राशन भी खत्म होने को था.

अगले दिन मुंह पर चुन्नी लपेटे निम्मी महल्ले की दुकान तक गई. वहां से जरूरी सामान ले कर वह वापस आ रही थी कि सामने से उसी मूंछ वाले लड़के ने उसे पहचान लिया. उस का नाम अनूप शुक्ला था. उस ने निम्मी से कहा, ‘‘अरे निम्मीजी, आप को किसी चीज की जरूरत थी, तो मु झ से कहती… आप क्यों इस धूप में बाहर निकलीं…’’

‘‘जी, इस में परेशानी की कोई बात नहीं… बस टहल भी ली और सामान भी ले लिया,’’ इतना कह कर निम्मी तेजी से घर की ओर बढ़ गई. पर एक परेशानी उस के सामने खड़ी हो गई कि उस की शुगर की दवा खत्म हो गई और मैडिकल स्टोर बहुत दूर था.

तभी निम्मी को अनूप के मोबाइल नंबर वाला कागज भी दिख गया, तो उस ने उसे फोन कर ही दिया. अनूप ने भी उसे दवा ला कर दे दी.

इसी तरह कुछ दिन बीत गए, पर गेहूं की फसल का कुछ तो करना था, निम्मी यह सोच ही रही थी कि धनी सेठ और पुजारी कुछ मजदूरों के साथ उस के घर पर आ गए.

‘‘आप तो संकोच करेंगी निम्मीजी, पर हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नहीं?’’

‘‘मैं कुछ सम झी नहीं,’’ निम्मी बोली.

‘‘इस में न सम झने जैसा क्या है. बस तुम हां कह दो, तो खेत से गेहूं ले आएं.’’

निम्मी कुछ सम झती, इस से पहले ही उन दोनों ने मजदूरों को खेत में जाने का आदेश दे दिया. निम्मी ने उन को चाय पीने को कह दिया.

दोनों चाय पी कर चले गए. उसी शाम धनी सेठ फिर निम्मी के घर आया.

‘‘तुम ठीक हो न निम्मी… मेरा मतलब, खुश तो हो न?’’

‘‘जी, मैं ठीक हूं.’’

धीरेधीरे सेठ निम्मी की ओर बढ़ने लगा और पास आ कर बोला, ‘‘तुम इतनी खूबसूरत और कमसिन हो…’’ इतना कह कर उस ने निम्मी की कमर को अपने आगोश में ले लिया.

निम्मी कुछ रोकती या कहती, उस ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और उसे बेहिसाब चूमने लगा.

निम्मी रोती, कभी मिन्नत करती, पर जिस्म के भूखे सेठ को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने उसे हर तरीके से भोगा और वहां से चला गया.

निम्मी जोरजोर से रो रही थी, पर उस की चीख सुनने वाला कोई न था. अचानक उसे याद आया कि उस के महल्ले का देवेंद्र सिंह पुलिस में नौकरी करता है. किसी तरह निम्मी ने उस का पता लगाया और फोन किया.

‘हैलो, कौन बोल रहा है?’ देवेंद्र सिंह ने फोन रिसीव कर के पूछा.

‘‘जी, मैं आप के ही महल्ले से बोल रही हूं… मु झे आप की मदद चाहिए,’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘आप को अगर कोई भी परेशानी है, तो आप थाने में आ कर रिपोर्ट लिखा सकती हैं,’ देवेंद्र सिंह ने यह कह कर फोन रख दिया.

निम्मी ने फिर से फोन किया, ‘‘हैलो… प्लीज, फोन मत काटना… मैं निम्मी बोल रही हूं. आप के ही महल्ले में रहती हूं. मेरे पति अमर इस वक्त यहां नहीं हैं और मैं मुसीबत में हूं.’’

अमर का नाम सुनते ही वह निम्मी को पहचान गया, ‘अच्छाअच्छा, मैं सम झ गया. आप चिंता न करें. मैं शाम को आप के पास आता हूं.’

निम्मी अब निश्चिंत थी कि उसे मदद मिल जाएगी और वह धनी सेठ की रिपोर्ट लिखा सकेगी.

शाम को देवेंद्र सिंह उस के पास आया. निम्मी ने सारी बात बताई और मदद मांगी.

‘‘तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा,’’ देवेंद्र सिंह ने कहा.

चाय पी कर जब वह जाने लगा, तो अचानक तेज आंधी और बारिश होने लगी. अब तो देवेंद्र को वहीं रुकना पड़ा.

छत पर सूख रहे कपड़े उतारने के लिए निम्मी भागी, तो उस की साड़ी ही उड़ने लगी.
देवेंद्र सिंह ने उस से कहा, ‘‘मैं ले आता हूं कपड़े. आप बैठ जाइए.’’

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, इधर देवेंद्र सिंह अपने पर काबू नहीं कर पाया और जो उस की शिकायत सुनने आया था, उसी निम्मी को दबोच बैठा और एक लाचार को अपनी जिस्म की भूख मिटाने को मसलता रहा.

उस के जाने के बाद निम्मी मर जाना चाहती थी, पर जहर भी कहां से लाए इस तालाबंदी में.

थोड़ी देर में निम्मी को याद आया कि बीती सुबह एक ट्रेन यहां से गुजरी थी और उस ने सुना था कि श्रमिक ट्रेन इन दिनों चल रही है. उसे अब यही एक रास्ता दिखा.

निम्मी ने किसी तरह वह रात काटी और तड़के उठ कर घर से चल दी, पास ही पटरियों की ओर.
पौ फटने का समय था और निम्मी बदहवास जा रही थी. सामने से आते पुजारी ने उसे देख लिया. निम्मी पटरी पर लेट गई और ट्रेन की आवाज सुनाई दी. पुजारी ने भाग कर उसे पटरी से खींच लिया और सम झाबु झा कर घर ले आया. उस ने निम्मी की मजबूरी और अकेलेपन का फायदा उठाया और दबोच लिया.

निम्मी कुछ समझ पाती. इस से पहले ही उसे लूट लिया गया था. तालाबंदी खत्म होने का आदेश भी जारी हो गया. अब अमर के आने की भी उम्मीद होने लगी.

इधर निम्मी अमर की राह देख रही थी, उधर निम्मी के दीवाने दुखी हो रहे थे. निम्मी की मजबूरी का खूब फायदा उठा चुके ये लोग अभी संतुष्ट नहीं हुए थे. अनूप तो सोचने लगा कि अमर घर आता ही नहीं तो अच्छा था, क्योंकि उसे निम्मी के शरीर की मादक खुशबू से अभी तक मन नहीं भरा था. उस के साथ बिताया हर पल उसे याद आ रहा था.

एक शाम जब निम्मी चीनी लेने घर से बाहर निकली, तो वह जबरन उस के साथ अंदर आ गया. निम्मी ने उस से घर से बाहर जाने को कहा, तो उस ने मना कर दिया.

निम्मी मदद के लिए चिल्लाने लगी, तो उस ने उस का मुंह बंद कर दरवाजे की अंदर से कुंडी लगा दी.

निम्मी रोती रही, पर उस की मदद को भला कौन आता. पुलिस पर भरोसा भी कैसे करे. अनूप उसे अपनी हवस की आग में जला रहा था और वह रोए जा रही थी.

तभी वहां से कश्यप मास्टर गुजर रहे थे, तो उन्होंने उस की चीख सुनी तो फौरन घर की ओर मुड़े.

‘क्या हुआ बेटी… क्यों चीख रही हो. दरवाजा खोलो बेटी,’ बेटी सुनते ही निम्मी को न जाने कैसी ताकत आ गई और उस ने अनूप के बालों को खींच कर उस के अंग पर वार कर दिया.

अनूप दर्द से चीखने लगा और मौका पा कर निम्मी ने दरवाजा खोल दिया.

सामने कश्यप मास्टर खड़े थे. उन्होंने अपना अंगोछा निम्मी को ओढ़ा दिया. इस बीच अनूप भाग गया.

‘‘रो मत बेटी,’’ मास्टर साहब उसे दिलासा दे रहे थे. निम्मी रोतेरोते मास्टर साहब की गोद में ही सो गई.

मास्टर साहब ने अपनी बेटी को बुला कर निम्मी की देखभाल करने को कहा और चले गए.

अगले दिन अमर घर आ गया, तो वह बहुत खुश थी. अमर ने देखा कि गेहूं गोदाम में भरे हुए हैं, तो उस ने पूछा, ‘‘निम्मी, ये गेहूं किस ने काटे?’’

निम्मी ने उत्तर देते हुए कहा, ‘‘पुजारी और धनी सेठ ने.’’

अमर सम झ रहा था कि निम्मी कुछ कहने की कोशिश कर रही है, पर कुछ कह नहीं पा रही.

कुछ दिन बीते ही थे कि अमर की तबीयत खराब हो गई. उसे लोगों की मदद से अस्पताल ले जाया गया, जहां उस के टैस्ट चल रहे थे…

इधर निम्मी भी एक रोज चक्कर खा कर गिर पड़ी. पड़ोस की सुधा उसे अस्पताल ले गई. डाक्टर ने तुरंत उसे दवा दे कर कहा कि घबराने की बात नहीं है… कुछ कमजोरी है.

उधर, अमर के टैस्ट की रिपोर्ट आ चुकी थी. उसे डाक्टर ने एचआईवी पौजिटिव की पुष्टि की, तो उस के पैरों के तले से जमीन ही निकल गई. उसे याद नहीं आ रहा था कि उस ने ऐसा क्या किया. वह सोचसोच कर परेशान था.

वह जैसेतैसे घर आया, तो निम्मी की तबीयत और ज्यादा खराब हो रही थी. उस की शुगर भी बढ़ रही थी.

अमर ने उसे तुरंत दवा दी, तो थोड़ा आराम हुआ. इस तरह दिन बीत रहे थे. अमर निम्मी को कैसे बताए, यह सोच रहा था. उधर निम्मी परेशान थी कि कैसे बताए कि कैसे उस के जिस्म के टुकड़ेटुकड़े हुए.

अमर ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘निम्मी, तुम मु झ पर भरोसा करती हो न?’’

‘‘यह पूछने की जरूरत है अमर?’’

‘‘तो सुनो… मेरी एचआईवी पौजिटिव की रिपोर्ट आई है,’’ अमर ने एक ही सांस में कह दिया, ‘‘पर, यकीन मानो कि मेरा किसी से कोई संबंध नहीं है. मु झे याद आ रहा है, जब पिछली बार मैं शहर काम से गया था, तो एक सैलून में मैं ने अपनी दाढ़ी बनवाई थी, क्योंकि मु झे मीटिंग के लिए देर हो रही थी, इसलिए मैं ने ही नाई को जल्दी शेव करने को कहा था… शायद उस ने ब्लेड बदला नहीं था,’’ गहरी सांस लेते हुए अमर ने कहा.

निम्मी चुप थी, बस आंखों से आंसू बहाए जा रही थी. कुछ देर बाद अचानक उस के चेहरे पर एक जीत की जैसी मुसकान दौड़ गई.

अमर अपनी बीमारी के चलते ही अधमरा हुआ जा रहा था और निम्मी मुसकरा रही थी.

निम्मी बोली, ‘‘अभी चलो, मु झे भी यह टैस्ट करवाना है.’’

‘‘कल बुलाया है तुम को डाक्टर ने,’’ अमर ने कहा. दोनों के लिए पूरी रात काटनी मुश्किल हो रही थी. निम्मी ने अमर को सब बता दिया था. दोनों बस रोए जा रहे थे.

अगले दिन निम्मी का भी टैस्ट किया गया, तो वह भी एचआईवी पौजिटिव निकली.

निम्मी दुखी होने के बजाय खुश थी. पर दोनों के लिए जीना आसान न था. दोनों अपनी मजबूरियों पर रो रहे थे. जैसेतैसे संभलते हुए दोनों घर आए और एकदूसरे को दिलासा दे ही रहे थे कि अनूप, धनी सेठ, पुजारी सब निम्मी के घर आए और अमर का हालचाल पूछने लगे. इन सब को निम्मी ने ही फोन कर के बुलाया था.

पहले तो अमर को बहुत गुस्सा आ रहा था, पर जैसेतैसे संभल कर उस ने सब को निम्मी का साथ देने के लिए धन्यवाद दिया और निम्मी से चाय बनाने को कहा.

अमर और निम्मी को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर दोनों ने खुद को संभाल लिया.

‘‘आप लोगों का मैं जितना भी धन्यवाद करूं कम ही होगा,’’ अमर ने कहा, तो धनी सेठ ने कहा, ‘‘इस में धन्यवाद कैसा अमर साहब… हम अगर एकदूसरे के काम नहीं आएंगे तो और कौन आएगा.’’

‘‘जी, कह तो आप सही रहे हैं… पर आप तो हमारे दुखसुख के सचमुच भागीदार हैं और इतना ही नहीं हमारी बीमारी के भी…’’ एक कुटिल हंसी के साथ अमर ने कहा.

‘‘हम कुछ सम झे नहीं… बीमारी के भागीदार कैसे?’’ पुजारी ने चौंकते हुए पूछा. वह घबरा गया था.

अमर ने राज खोला, तो सब के सब सकपका कर रह गए और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे.

उधर निम्मी और अमर चैन की सांस ले रहे थे, एकदूसरे को हिम्मत दे रहे थे और कुदरत के इस न्यायअन्याय को सम झने की कोशिश कर रहे थे.

लेखिका – आरती लोहनी

Family Story : चंपा लौट आई – एहसान और बदले की कहानी

Family Story : ‘‘चंपा, मैं तुम से मिलने कल फिर आऊंगा,’’ नरेश अपने कपड़े समेटते हुए बोला.

‘‘नहीं, कल से मत आना. कल मेरा आदमी घर आने वाला है. मैं किसी भी तरह के लफड़े या बदनामी में नहीं पड़ना चाहती,’’ चंपा नरेश से बोली.

‘‘अरे नहीं, सूरत इतना नजदीक नहीं है. उस के आने में कम से कम 2-3 दिन तो लग ही जाएंगे,’’ नरेश चंपा को अपनी बांहों में कसते हुए बोला.

चंपा बांह छुड़ा कर बोली, ‘‘2 दिन पहले ही बता चुका है कि वह गाड़ी पकड़ चुका है. कल वह घर भी पहुंच जाएगा.’’

नरेश मायूस होता हुआ बोला, ‘‘जैसी तेरी मरजी. दिन में एक बार तुझे देखने जरूर आ जाया करूंगा.’’

‘‘ठीक है, आ जाना,’’ चंपा हंस कर उस से बोली.

नरेश पीछे के दरवाजे से बाहर हो गया. अपने घर जाते समय नरेश चंपा के बारे में वह सब सोचने लगा, जो चंपा ने उसे बताया था.

चंपा के घर में सासससुर और पति के अलावा और कोई नहीं था. चंपा का पति संजय अकसर काम के सिलसिले में गुजरात की कपड़ा मिल में जाया करता था. वह वहां तब से काम कर रहा है, जब उस की चंपा से शादी भी नहीं हुई थी.

संजय को गुजरात गए 2 महीने बीत गए थे. कसबे में मेला लगने वाला था.

चंपा संजय को फोन पर बोली, ‘तुम घर पर नहीं हो. इस बार का मेला मैं किस के साथ देखने जाऊंगी  मांपिताजी तो जा नहीं सकते.’

संजय ने चंपा को गांव की औरतों के साथ मेला देखने को कहा. यह सुन कर चंपा का चेहरा खुशी से खिल उठा.

एक रात गांव की कुछ औरतें समूह बना कर मेला देखने जा रही थीं. चंपा भी उन के साथ हो ली. घर पर रखवाली के लिए सासससुर तो थे ही.

मेले में रंगबिरंगी सजावट, सर्कस, झूले और न जाने मनोरंजन के कितने साजोसामान थे. उन सब को निहारती चंपा गांव की औरतों से बिछड़ गई.

अब चंपा घर कैसे जाएगी  वह डर गई थी. मेले से उस का मन उचटने लगा था. उसे घर की चिंता सताने लगी थी. उस ने उन औरतों की बहुत खोजबीन की, पर उन का पता नहीं चल पाया.

रात गहराती जा रही थी. लोग धीरेधीरे अपने घरों को जाने लगे थे. चंपा भी डरतेडरते घर की ओर जाने वाले रास्ते पर चल दी.

चंपा की शादी को अभी 2 साल हुए थे. अभी तक उसे कोई बच्चा भी नहीं हुआ था. तीखे नाकनक्श, होंठ लाल रसभरे, गठीला बदन, रस की गगरी की तरह उभार, सब मिला कर वह खिला चांद लगती थी, इसलिए तो संजय मरमिटा था चंपा पर और उस को खुश रखने के लिए हर ख्वाहिश पूरी करता था.

चंपा के गदराए बदन को देख कर 2 मनचले मेले में ही लार टपका रहे थे. अकेले ही घर की ओर जाते देख वे भी अंधेरे का फायदा उठाना चाहते थे.

चंपा भी उन की मंशा भांप गई थी. घर की ओर जाने वाली पगडंडी पर वह तेज कदमों से चली जा रही थी. वे पीछा तो नहीं कर रहे, इसलिए पीछे मुड़ कर देख भी लेती.

मनचले भी तेज कदमों से चंपा की ओर बढ़ रहे थे. वह बदहवास सी तेजी से चली जा रही थी कि अचानक ठोकर खा कर गिर पड़ी.

तभी एक नौजवान ने सहारा दे कर चंपा को उठाया और पूछा, ‘आप बहुत डरी हुई हैं. क्या बात है ’

‘कुछ नहीं,’ चंपा उठते हुए बोली.

‘शायद मेला देख कर आ रही हैं  कहां तक जाना है ’ नौजवान ने पूछा.

‘पास के सूरतपुर गांव में मेरा घर है. 2 मनचले मेरा पीछा कर रहे हैं. जिन औरतों के साथ मैं आई थी, वे पता नहीं कब घर चली गईं. मुझे मालूम नहीं चला,’ बदहवास चंपा ने एक ही सांस में सारी बातें उस नौजवान से बोल दीं.

जिस नौजवान ने चंपा को सहारा दिया, उस का नाम नरेश था. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो वहां कोई नहीं था.

‘डरने की कोई बात नहीं है. मैं भी उसी गांव का हूं. मैं आप को घर तक छोड़ दूंगा.’

चंपा डर गई थी. डर के मारे वह नरेश का हाथ पकड़ कर चल रही थी. कभीकभार दोनों के शरीर भी एकदूसरे से टकरा जाते.

कुछ देर बाद नरेश ने चंपा को उस के घर पहुंचा दिया. चंपा ने शुक्रिया कहा और अगले दिन नरेश से घर आने को बोली.

नरेश उसी दिन से चंपा के घर आया करता था, उस से ढेर सारी बातें करता, मजाकमजाक में चंपा को छूता भी था. चंपा को भी अच्छा लगता था.

एक दिन नरेश चंपा के गाल चूमते हुए बोला, ‘आप बहुत सुंदर हैं. मेरा बस चले तो…’ चंपा मुसकरा कर पीछे हट गई.

इस के बाद नरेश ने चंपा को बांहों में जकड़ कर एक बार और गालों को चूम लिया.

चंपा कसमसाते हुए बोली, ‘यह अच्छा नहीं है. क्या कर रहे हो ’

संजय अकसर घर से बाहर ही रहता था, इसलिए चंपा की जवानी भी प्यासी मछली की तरह तड़पती रहती. छुड़ाने की नाकाम कोशिश कर नरेश के आगे वह समर्पित हो गई और वे दोनों एक हो गए. दोनों ने जम कर गदराई जवानी का मजा उठाया. चंपा खुश थी.

उस दिन के बाद से ही यह सिलसिला चल पड़ा. दोनों एकदूसरे के साथ मिल कर बहुत खुश होते.

एक दिन नरेश ने चंपा से पूछा, ‘तुम सारी जिंदगी मुझ से इसी तरह प्यार करती रहोगी न ’

‘नहीं,’ चंपा बोली.

‘क्यों  लेकिन, मैं तो तुम से बहुत प्यार करता हूं.’

‘यह प्यार नहीं हवस है नरेश.’

‘आजमा कर देख लो,’ नरेश बोला.

‘नरेश, तुम अपने एहसानों का बदला चुकता कर रहे हो. जिस दिन मुझे लगेगा, तुम्हारा एहसान पूरा हो चुका है, मैं तुम से अलग हो जाऊंगी. और तुम भी अपनी अलग ही दुनिया बसा लेना,’ चंपा उसे समझाते हुए बोली.

आज नरेश को चंपा की कही हुई हर बात जेहन में ताजा होने लगी थी कि कल संजय के घर पहुंचते ही उस एहसान का कर्ज चुकता होने वाला है.

Family Story : पतझड़ का अंत – सुषमा ने संभाली जिम्मेदारी

Family Story : सुहाग सेज पर बैठी सुषमा कितनी  सुंदर लग रही थी. लाल जोड़े में  सजी हुई वह बड़ी बेताबी से अपने पति समीर का इंतजार कर रही थी.

एकाएक दरवाजा खुला और समीर मुसकराता हुआ कमरे में दाखिल हुआ. सुषमा समीर को देखते ही रोमांचित हो उठी. समीर ने अंदर आ कर धीरे से दरवाजा बंद किया. पलंग पर बिलकुल पास आ कर वह बैठ गया. फिर सुषमा का घूंघट उठा कर उसे आत्मविभोर हो देखने लगा.

सुषमा उसे इस तरह गौर से देखने पर बोली, ‘‘क्या देख रहे हो?’’

‘‘तुम्हें, जो आज के पहले मेरी नहीं थी. पता है सुसु, पहली बार मैं ने जब तुम्हें देखा था तभी मुझे लगा कि तुम्हीं मेरे जीवन की पतवार हो और अगर तुम मुझे नहीं मिलतीं तो शायद मेरा जीवन अधूरा ही रहता,’’ फिर समीर ने अपने दोनों हाथ फैला दिए और सुषमा पता  नहीं कब उस के आगोश में समा गई.

उस रात सुषमा के जीवन के पतझड़ का अंत हो गया था. शायद  40 साल के कठिन संघर्ष का अंत हुआ था.

सुषमा और समीर दोनों खुश थे, बहुत खुश. एकदूसरे को पा  कर उन्हें दुनिया की तमाम खुशियां नसीब हो गई थीं.

प्यार और खुशी में दिन कितनी जल्दी बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते 1 साल बीत गया और आज सुषमा की शादी की पहली सालगिरह थी. दोनों के दोस्तों के साथ उन के घर वाले भी शादी की सालगिरह पर आए थे.

घर में अच्छीखासी रौनक थी. घरआंगन बिजली की रोशनी से ऐसा सजा था जैसे  घर में शादी हो.

सुषमा के घर वालों ने जब यह साजोसिंगार देखा तो उन का मुंह खुला का खुला रह गया और छोटी बहन जया अपनी मां से बोली, ‘‘मां, दीदी को इतना सबकुछ करने की क्या जरूरत थी. अरे, शादी की सालगिरह है, कोई दीदी की  शादी तो नहीं.’’

सुषमा की मां बोलीं, ‘‘हमें क्या, पैसा उन दोनों का है, जैसे चाहें खर्च करें.’’

शादी की पहली सालगिरह बड़ी धूमधाम से मनी. जब सभी लोग चले गए तब सुषमा ने अपनी मां से आ कर पूछा, ‘‘मां, तुम खुश तो हो न, अपनी बेटी का यह सुख देख कर?’’

‘‘हां, खुश तो हूं बेटी. तेरा जीवन तो सुखमय हो गया, पर प्रिया और सचिन के बारे में सोच कर रोना आता है. उन दोनों बिन बाप के बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘मां, तुम ऐसा क्यों सोचती हो. मैं हूं न, उन दोनों को देखने वाली. तुम्हारे दामादजी भी बहुत अच्छे हैं. मैं जैसा कहती हूं वह वैसा ही करते हैं. जब मैं ने एक बहन की शादी कर दी तो दूसरी की भी कर दूंगी. और हां, सचिन की भी तो अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गई है.’’

‘‘हां, पूरी हो तो गई है, लेकिन कहीं नौकरी लगे तब न.’’

‘‘मां, तुम घबराओ नहीं, हम कोशिश करेंगे कि उस की नौकरी जल्दी लग जाए.’’

‘‘सुषमा, हमें तो बस, एक तेरा ही सहारा है बेटी. जब तू हमें छोड़ कर चली आई तो हम अपने को अनाथ समझने लगे हैं.’’

अभी सुषमा और मां बातें कर ही रहे थे कि समीर आ गया. वह हंसते हुए बोला, ‘‘क्यों सुसु, आज मां आ गईं तो मुझे भूल गईं. मैं कब से तुम्हारा खाने पर इंतजार कर रहा हूं.’’

मां की ओर देख कर सुषमा बोली, ‘‘मां, अब तुम सो जाओ. रात काफी बीत गई है. हम भी खाना खा कर सोएंगे. सुबह हमें कालिज जाना है.’’

सुषमा जब कमरे में आई तो समीर थाली सजाए उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘सुसु, कितनी देर लगा दी आने में. यहां मैं तुम्हारे इंतजार में बैठा पागल हो रहा था. थोड़ी देर तुम और नहीं आतीं तो मेरा तो दम ही निकल जाता.’’

‘‘समीर, आज के दिन ऐसी अशुभ बातें तो न कहो.’’

‘‘ठीक है, अब हम शुभशुभ ही बातें करेंगे. पहले तुम आओ तो मेरे पास.’’

‘‘समीर, हमारी शादी को 1 साल बीत गया है लेकिन तुम्हारा प्यार थोड़ा भी कम नहीं हुआ, बल्कि पहले से और बढ़ गया है.’’

‘‘फिर तुम मेरे इस बढ़े हुए प्यार का आज के दिन कुछ तो इनाम दोगी.’’

‘‘बिलकुल नहीं, अब आप सो जाइए. सुबह मुझे कालिज जल्दी जाना है.’’

‘‘सुसु, अभी मैं सोने के मूड में नहीं हूं. अभी तो पूरी रात बाकी है,’’ वह मुसकराता हुआ बोला.

सुबह सुषमा जल्दी तैयार हो गई और कालिज जाते समय मां से बोली, ‘‘मां, मैं दोपहर में आऊंगी, तब तुम जाना.’’

‘‘नहीं, सुषमा, मैं भी अभी निकलूंगी. पर तुझ से एक बात कहनी थी.’’

‘‘हां मां, बोलो.’’

‘‘प्रिया का एम.ए. में दाखिला करवाना है. अगर 5 हजार रुपए दे देतीं तो बेटी, उस का दाखिला हो जाता.’’

‘‘ठीक है मां, मैं किसी से पैसे भिजवा दूंगी.’’

‘‘सुषमा, एक तेरा ही सहारा है बेटी, मैं  तुझ से एक बात और कहना चाहती हूं कि ज्यादा  फुजूलखर्ची मत किया कर.’’

‘‘मां, तुम्हें तो पता है कि मैं ने बचपन से ले कर 1 साल पहले तक कितना संघर्ष किया है. जब पिताजी का साया हमारे सिर से उठ गया था तब से ही मैं ने घर चलाने, खुद पढ़ने और भाईबहनों को पढ़ाने के लिए क्याक्या नहीं किया. अब क्या मैं अपनी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?’’

‘‘मैं ऐसा तो नहीं कह रही हूं. फिर भी पैसे बचा कर चल. हमें भी तो देखने वाला कोई नहीं है.’’

आज सुबह ही जया का फोन आया कि दीदी, आज मंटू का जन्मदिन है. तुम और जीजाजी जरूर आना.

‘‘ हां, आऊंगी.’’

‘‘और हां, दीदी, एक बात तुम से कहनी थी. तुम ने अपनी फें्रड की शादी में जो साड़ी पहनी थी वह बहुत सुंदर लग रही थी. दीदी, मेरे लिए भी एक वैसी ही साड़ी लेती आना, प्लीज.’’

‘‘ठीक है, बाजार जाऊंगी तो देखूंगी.’’

‘‘दीदी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘तुम अपनी वाली साड़ी ही मुझे दे दो.’’

‘‘जया, वह तुम्हारे जीजाजी की पसंद की साड़ी है.’’

‘‘तो क्या हुआ. अब तुम्हारी उम्र तो वैसी चमकदमक वाली साड़ी पहनने की नहीं है.’’

‘‘जया, मेरी उम्र को क्या हुआ है. मैं तुम से 5 साल ही तो बड़ी हूं.’’

यह सुनते ही जया ने गुस्से में फोन रख दिया और सुषमा फोन का रिसीवर हाथ में लिए सोचने लगी थी.

दुनिया कितनी स्वार्थी है. सब अपने बारे में ही सोचते हैं. चाहे वह मेरी अपनी मां, भाईबहन ही क्यों न हों. मैं ने सभी के लिए कितना कुछ किया है और आज भी जिसे जो जरूरत होती है पूरी कर रही हूं. फिर भी किसी को मेरी खुशी सुहाती नहीं. जब मैं ने शादी का फैसला किया था तब भी घर वालों ने कितना विरोध किया था. कोई नहीं चाहता था कि मैं अपना घर बसाऊं. वह तो बस, समीर थे जिन्होंने मुझे अपने प्यार में इतना बांध लिया कि मैंउन के बगैर रहने की सोच भी नहीं सकती थी.

सुषमा की आंखों में आंसू झिल- मिलाने लगे थे. समीर पीछे से आ कर बोले, ‘‘जानेमन, इतनी देर से आखिर किस से बातें हो रही थीं.’’

‘‘जया का फोन था. समीर, आज उस के बेटे का जन्मदिन है.’’

‘‘तो ठीक है, शाम को चलेंगे दावत खाने…और हां, तुम वह नीली वाली साड़ी शाम को पार्टी में  पहनना. उस दिन जब तुम ने वह साड़ी पहनी थी तो बहुत सुंदर लग रही थीं. बिलकुल फिल्म की हीरोइन की तरह.’’

‘‘समीर, लेकिन वह साड़ी तो जया मांग रही है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, वैसे मैं ने उस से कहा है कि वह आप की पसंद की साड़ी है.’’

‘‘तुम पार्टी में जाने के लिए कोई दूसरी साड़ी पहन लेना और वह साड़ी उसे दे देना, आखिर वह तुम्हारी बहन है.’’

‘‘समीर, तुम कितने अच्छे हो.’’

‘‘हां, वह तो मैं हूं, लेकिन इतना भी अच्छा नहीं कि नाश्ते के बगैर कालिज जाने की सोचूं.’’

सुषमा और समीर एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. दोनों के विचार एक थे. भावनाएं एक थीं.

एक दिन सुषमा का भाई सचिन आया और बोला, ‘‘दीदी, मुझे कुछ रुपए चाहिए.’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘शहर से बाहर एकदो जगह नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना है.’’

‘‘कितने रुपए  लगेंगे?’’

‘‘10 हजार रुपए दे दो.’’

‘‘इतने रुपए का क्या करोगे सचिन?’’

‘‘दीदी,  इंटरव्यू देने के लिए अच्छे कपड़े, जूते भी तो चाहिए. मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं हैं.’’

‘‘सचिन, अभी मैं इतने रुपए तुम्हें नहीं दे सकती. तुम्हारे जीजाजी की बहुत इच्छा है कि हम शिमला जाएं. शादी के बाद हम कहीं गए नहीं थे न.’’

‘‘दीदी,  तुम्हारी  शादी हो गई वही बहुत है. अब इस उम्र में घूमना, टहलना ये सब बेकार के चोचले हैं. मुझे पैसे की जरूरत है, वह तो तुम दे नहीं सकतीं और यह फालतू का खर्च करने को तैयार हो.’’

‘‘सचिन, क्या हम अपनी खुशी के लिए कुछ नहीं कर सकते. अरे, इतने दिनों से तो मैं तुम लोगों के लिए ही करती आई हूं और जब अपनी खुशी के लिए अब करना चाहती हूं तो बातबात पर तुम लोग मुझे मेरी उम्र का एहसास दिलाते हो.

‘‘सचिन, प्यार की कोई उम्र नहीं होती. वह तो हर उम्र में हो सकता है. जब मैं खुश हूं, समीर खुश हैं तो तुम लोग क्यों दुखी हो?’’

समीर उस दिन अचानक जिद कर बैठे कि सुसु, आज मैं अपने ससुराल जाना चाहता हूं.

‘‘क्यों जी, क्या बात है?’’

‘‘अरे, आज छुट्टी है. तुम्हारे घर के सभी लोग घर पर ही होंगे. फिर जया भी तो आई होगी. और हां, नए मेहमान के आने की खुशखबरी अपने घर वालों को नहीं सुनाओगी?’’

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी इच्छा है तो चलते हैं, तुम्हारे ससुराल,’’ सुषमा मुसकरा दी थी.

सुषमा आज काफी सजधज कर मायके आई थी. लाल रंग की साड़ी से मेल खाता ब्लाउज और उसी रंग की बड़ी सी बिंदी अपने माथे पर  लगा रखी थी. उस ने सोने के गहनों से अपने को सजा लिया था.

मां उसे देख कर मुसकरा दीं, ‘‘क्या बात है, आज तू बड़ी सज कर आई है.’’

अभी सुषमा कुछ कहना चाह रही थी कि प्रिया बोली, ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.’’

प्रिया की बातें सुन कर सुषमा का खून खौल उठा पर वह कुछ बोली नहीं.

मां ने आदर के साथ बेटी को बिठाया और दामादजी से हाल समाचार पूछे.

सुषमा बोली, ‘‘मां, खुशखबरी है. तुम नानी बनने वाली हो.’’

मां यह सुन कर बोलीं, ‘‘चलो, ठीक है. एक बच्चा हो जाए. फिर अपना दुखड़ा रोने लगीं कि सचिन की नौकरी के लिए 50 हजार रुपए चाहिए. बेटी, अगर तुम दे देतीं तो…’’

सुषमा बौखला उठी. मां की बात बीच में काट कर बोली, ‘‘मां, अब और नहीं, अब बहुत हो गया. मुझे जितना करना था कर दिया. अब सब बड़े हो गए हैं और वे अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं. मैं आखिर कब तक इस घर को देखती रहूंगी.

‘‘मैं  जब 12 साल की थी तब से ही तुम लोगों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ढो रही हूं. रातरात भर जाग कर मैं एकएक पैसे के लिए काम करती थी. फिर सभी को इस योग्य बना दिया कि वे अपनी जिम्मेदारियां खुद उठा सकें.

‘‘अब मेरा भी अपना परिवार है. पति हैं, और अब घर में एक और सदस्य भी आने वाला है. मैं अब तुम सब के लिए करतेकरते थक गई हूं मां. अब मैं जीना चाहती हूं, अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी खुशी के लिए.

‘‘जिंदगी की  खूबसूरत 40 बहारें मैं ने यों ही गंवा दीं, अब और नहीं. मेरे जीवन के पतझड़ का अंत हो गया है. अब मैं खुश हूं, बहुत खुश.’’

Family Story : रिटायरमेंट – आखिर क्या चाहते थे शर्मा जी के लालची रिश्तेदार

Family Story : मेरी नौकरी का अंतिम सप्ताह था, क्योंकि मैं सेवानिवृत्त होने वाला था. कारखाने के नियमानुसार 60 साल पूरे होते ही घर बैठने का हुक्म होना था.

मेरा जन्मदिन भी 2 अक्तूबर ही था. संयोगवश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन पर.

विभागीय सहयोगियों व कर्मचारियों ने कहा, ‘‘शर्माजी, 60 साल की उम्र तक ठीकठाक काम कर के रिटायर होने के बदले में हमें जायकेदार भोज देना होगा.’’

मैं ने भरोसा दिया, ‘‘आप सब निश्ंिचत रहें. मुंह अवश्य मीठा कराऊंगा.’’

इस पर कुछ ने विरोध प्रकट किया, ‘‘शर्माजी, बात स्पष्ट कीजिए, गोलमोल नहीं. हम ‘जायकेदार भोज’ की बात कर रहे हैं और आप मुंह मीठा कराने की. आप मांसाहारी भोज देंगे या नहीं? यानी गोश्त, पुलाव…’’

मैं ने मुकरना चाहा, ‘‘आप जानते हैं कि गांधीजी सत्य व अहिंसा के पुजारी थे, और हिंसा के खिलाफ मैं भी हूं. मांसाहार तो एकदम नहीं,’’ एक पल रुक कर मैं ने फिर कहा, ‘‘पिछले साल झारखंड के कुछ मंत्रियों ने 2 अक्तूबर के दिन बकरे का मांस खाया था तो उस पर बहुत बवाल हुआ था.’’

‘‘आप मंत्री तो नहीं हैं न. कारखाने में मात्र सीनियर चार्जमैन हैं,’’ एक सहकर्मी ने कहा.

‘‘पर सत्यअहिंसा का समर्थक तो हूं मैं.’’

फिर कुछ सहयोगी बौखलाए, ‘‘शर्माजी, हम भोज के  नाम पर ‘सागपात’ नहीं खा सकते. आप के घर ‘आलूबैगन’ खाने नहीं जाएंगे,’’ इस के बाद तो गीदड़ों के झुंड की तरह सब एकसाथ बोलने लगे, ‘‘शर्माजी, हम चंदा जमा कर आप के शानदार विदाई समारोह का आयोजन करेंगे.’’

प्रवीण ने हमें झटका देना चाहा, ‘‘हम सब आप को भेंट दे कर संतुष्ट करना चाहेंगे. भले ही आप हमें संतुष्ट करें या न करें.’’

मैं दबाव में आ कर सोचने लगा कि क्या कहूं? क्या खिलाऊं? क्या वादा करूं? प्रत्यक्ष में उन्हें भरोसा दिलाना चाहा कि आप सब मेरे घर आएं, महंगी मिठाइयां खिलाऊंगा. आधाआधा किलो का पैकेट सब को दे कर विदा करूंगा.

सीनियर अफसर गुप्ता ने रास्ता सुझाना चाहा, ‘‘मुरगा न खिलाइए शर्माजी पर शराब तो पिला ही सकते हैं. इस में हिंसा कहां है?’’

‘‘हां, हां, यह चलेगा,’’ सब ने एक स्वर से समर्थन किया.

‘‘मैं शराब नहीं पीता.’’

‘‘हम सब पीते हैं न, आप अपनी इच्छा हम पर क्यों लादना चाहते हैं?’’

‘‘भाई लोगों, मैं ने कहा न कि 2 अक्तूबर हो या नवरात्रे, दीवाली हो या नववर्ष…मुरगा व शराब न मैं खातापीता हूं, न दूसरों को खिलातापिलाता हूं.’’

सुखविंदर ने मायूस हो कर कहा, ‘‘तो क्या 35-40 साल का साथ सूखा ही निबटेगा?’’

कुछ ने रोष जताया, ‘‘क्या इसीलिए इतने सालों तक आप के मातहत काम किया? आप के प्रोत्साहन से ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया? कैसे चार्जमैन हैं आप कि हमारी अदनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते?’’

एक ने व्यंग्य किया, ‘‘तो कोई मुजरे वाली ही बुला लीजिए, उसी से मन बहला लेंगे.’’

नटवर ने विचार रखा, ‘‘शर्माजी, जितने रुपए आप हम पर खर्च करना चाह रहे हैं उतने हमें दे दीजिए, हम किसी होटल में अपनी व्यवस्था कर लेंगे.’’

इस सारी चर्चा से कुछ नतीजा न निकलना था न निकला.

यह बात मेरे इकलौते बेटे बलबीर के पास भी पहुंची. वह बगल वाले विभाग में बतौर प्रशिक्षु काम कर रहा था.

कुछ ने बलबीर को बहकाया, ‘‘क्या कमी है तुम्हारे पिताजी को जो खर्च के नाम से भाग रहे हैं. रिटायर हो रहे हैं. फंड के लाखों मिलेंगे… पी.एफ. ‘तगड़ा’ कटता है. वेतन भी 5 अंकों में है. हम उन्हें विदाई देंगे तो उन की ओर से हमारी शानदार पार्टी होनी चाहिए. घास छील कर तो रिटायर नहीं हो रहे. बुढ़ापे के साथ ‘साठा से पाठा’ होना चाहिए. वे तो ‘गुड़ का लाठा’ हो रहे हैं…तुम कैसे बेटे हो?’’

बलबीर तमतमाया हुआ घर आया. मैं लौट कर स्नान कर रहा था. बेटा मुझे समझाने के मूड में बोला, ‘‘बाबूजी, विभाग वाले 50-50 रुपए प्रति व्यक्ति चंदा जमा कर के ‘विदाई समारोह’ का आयोजन करेंगे तो वे चाहेंगे कि उन्हें 75-100 रुपए का जायकेदार भोज मिले. आप सिर्फ मिठाइयां और समोसे खिला कर उन्हें टरकाना चाहते हैं. इस तरह आप की तो बदनामी होगी ही, वे मुझे भी बदनाम करेंगे.

‘‘आप तो रिटायर हो कर घर में बैठ जाएंगे पर मुझे वहीं काम करना है. सोचिए, मैं कैसे उन्हें हर रोज मुंह दिखाऊंगा? मुझे 10 हजार रुपए दीजिए, खिलापिला कर उन्हें संतुष्ट कर दूंगा.’’

‘‘उन की संतुष्टि के लिए क्या मुझे अपनी आत्मा के खिलाफ जाना होगा? मैं मुरगे, बकरे नहीं कटवा सकता,’’ बेटे पर बिगड़ते हुए मैं ने कहा.

‘‘बाबूजी, आप मांसाहार के खिलाफ हैं, मैं नहीं.’’

‘‘तो क्या तुम उन की खुशी के लिए मद्यपान करोगे?’’

‘‘नहीं, पर मुरगा तो खा ही सकता हूं.’’

अपना विरोध जताते हुए मैं बोला, ‘‘बलबीर, अधिक खर्च करने के पक्ष में मैं नहीं हूं. सब खाएंगेपीएंगे, बाद में कोई पूछने भी नहीं आएगा. मैं जब 4 महीने बीमारी से अनफिट था तो 1-2 के अलावा कौन आया था मेरा हाल पूछने? मानवता और श्रद्धा तो लोगों में खत्म हो गई है.’’

पत्नी कमला वहीं थी. झुंझलाई, ‘‘आप दिल खोल कर और जम कर कुछ नहीं कर पाते. मन मार कर खुश रहने से भी पीछे रह जाते हैं.’’

कमला का समर्थन न पा कर मैं झुंझलाया, ‘‘श्रीमतीजी, मैं ने आप को कब खुश नहीं किया है?’’

वे मौका पाते ही उलाहना ठोक बैठीं, ‘‘कई बार कह चुकी हूं कि  मेरा गला मंगलसूत्र के बिना सूना पड़ा है. रिटायरमेंट के बाद फंड के रुपए मिलते ही 5 तोले का मंगलसूत्र और 10 तोले की 4-4 चूडि़यां खरीद देना.’’

‘‘श्रीमतीजी, सोने का भाव बाढ़ के पानी की तरह हर दिन बढ़ता जा रहा है. आप की इच्छा पूरी करूं तो लाखों अंटी से निकल जाएंगे, फिर घर चलाना मुश्किल होगा.’’

श्रीमतीजी बिगड़ कर बोलीं, ‘‘तो बताइए, मैं कैसे आप से खुश रहूंगी?’’

बलबीर को अवसर मिल गया. वह बोला, ‘‘बाबूजी, अब आप जीवनस्तर ऊंचा करने की सोचिए. कुछ दिन लूना चलाते रहे. मेरी जिद पर स्कूटी खरीद लाए. अब एक बड़ी कार ले ही लीजिए. संयोग से आप देश की नामी कार कंपनी से अवकाश प्राप्त कर रहे हैं.’’

बेटे और पत्नी की मांग से मैं हतप्रभ रह गया.

मैं सोने का उपक्रम कर रहा था कि बलबीर ने अपनी रागनी शुरू कर दी, ‘‘बाबूजी, खर्च के बारे में क्या सोच रहे हैं?’’

मैं ने अपने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम अभी स्थायी नौकरी में नहीं हो. प्रशिक्षण के बाद तुम्हें प्रबंधन की कृपा से अस्थायी नौकरी मिल सकेगी. पता नहीं तुम कब तक स्थायी होगे. तब तक मुझे ही घर का और तुम्हारा भी खर्च उठाना होगा. इसलिए भविष्यनिधि से जो रुपए मिलेंगे उसे ‘ब्याज’ के लिए बैंक में जमा कर दूंगा, क्योंकि आगे ब्याज से ही मुझे अपना ‘खर्च’ चलाना होगा. अत: मैं ने अपनी भविष्यनिधि के पैसों को सुरक्षित रखने की सोची है.’’

श्रीमतीजी संभावना जाहिर कर गईं कि 20 लाख रुपए तक तो आप को मिल ही जाएंगे. अच्छाखासा ब्याज मिलेगा बैंक से.

उन के इस मुगालते को तोड़ने के लिए मैं ने कहा, ‘‘भूल गई हो, 3 बेटियों के ब्याह में भविष्यनिधि से ऋण लिया था. कुछ दूसरे ऋण काट कर 12 लाख रुपए ही मिलेंगे. वैसे भी अब दुनिया भर में आर्थिक संकट पैदा हो चुका है, इसलिए ब्याज घट भी सकता है.’’

बलबीर ने टोका, ‘‘बाबूजी, आप को रुपए की कमी तो है नहीं. आप ने 10 लाख रुपए अलगअलग म्यूचुअल फं डों में लगाए हुए हैं.’’

मैं आवेशित हुआ, ‘‘अखबार नहीं पढ़ते क्या? सब शेयरों के भाव लुढ़कते जा रहे हैं. उस पर म्यूचुअल फंडों का बुराहाल है. निवेश किए हुए रुपए वापस मिलेंगे भी या नहीं? उस संशय से मैं भयभीत हूं. रिटायर होने के बाद मैं रुपए कमाने योग्य नहीं रहूंगा. बैठ कर क्या करूंगा? कैसे समय बीतेगा. चिंता, भय से नींद भी नहीं आती…’’

श्रीमतीजी ने मेरे दर्द और चिंता को महसूस किया, ‘‘चिंतित मत होइए. हर आदमी को रिटायर होना पड़ता है. चिंताओं के फन को दबोचिए. उस के डंक से बचिए.’’

‘‘देखो, मैं स्वयं को संभाल पाता हूं या नहीं?’’

तभी फोन की घंटी बजी, ‘‘हैलो, मैं विजय बोल रहा हूं.’’

‘‘नमस्कार, विजय बाबू.’’

‘‘शर्माजी, सुना है, आप रिटायर होने जा रहे हैं.’’

‘‘हां.’’

‘‘कुछ करने का विचार है या बैठे रहने का?’’ विजय ने पूछा.

‘‘कुछ सोचा नहीं है.’’

‘‘मेरी तरह कुछ करने की सोचो. बेकार बैठ कर ऊब जाओगे.’’

‘‘मेरे पिता ने भी सेवामुक्त हो कर ‘बिजनेस’ का मन बनाया था, पर नहीं कर सके. शायद मैं भी नहीं कर सकूंगा, क्यों जहां भी हाथ डाला, खाली हो गया.’’

विजय की हंसी गूंजी, ‘‘हिम्मत रखो. टाटा मोटर्स में ठेका पाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराओ. एकाध लाख लगेंगे.’’

बलबीर उत्साहित स्वर में बोला, ‘‘ठेका ले कर देखिए, बाबूजी.’’

‘‘बेटा, मैं भविष्यनिधि की रकम को डुबाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता.’’

बलबीर जिद पर उतर आया तो मैं बोला, ‘‘तुम्हारे कहने पर मैं ने ट्रांसपोर्ट का कारोबार किया था न? 7 लाख रुपए डूब गए थे. तब मैं तंगी, परेशानी और खालीहाथ से गुजरने लगा था. फ ांके की नौबत आ गई थी.’’

बलबीर शांत पड़ गया, मानो उस की हवा निकल गई हो.

तभी मोबाइल बजने लगा. पटना से रंजन का फोन था. आवाज कानों में पड़ी तो मुंह का स्वाद कसैला हो गया. रंजन मेरा चचेरा भाई था. उस ने गांव का पुश्तैनी मकान पड़ोसी पंडितजी के हाथ गिरवी रख छोड़ा था. उस की एवज में 50 हजार रुपए ले रखे थे.

पहले मैं रंजन को अपना भाई मानता था पर जब उस ने धोखा किया, मेरा मन टूट गया था.

‘‘रंजन बोल रहा हूं भैया, प्रणाम.’’

‘‘खुश रहो.’’

‘‘सुना है आप रिटायर होने वाले हैं? एक प्रार्थना है. पंडितजी के रुपए चुका कर मकान छुड़ा लीजिए न. 20 हजार रुपए ब्याज भी चढ़ चुका है. न चुकाने से मकान हाथ से निकल जाएगा. मेरे पास रुपए नहीं हैं. पटना में मकान बनाने से मैं कर्जदार हो चुका हूं. कुछ सहायता कीजिएगा तो आभारी रहूंगा.’’

मैं क्रोध से तिलमिलाया, ‘‘कुछ करने से पहले मुझ से पूछा था क्या? सलाह भी नहीं ली. पंडितजी का कर्ज तुम भरो. मुझे क्यों कह रहे हो?’’

मोबाइल बंद हो गया. इच्छा हुई कि उसे और खरीखोटी सुनाऊं. गुस्से में बड़बड़ाता रहा, ‘‘स्वार्थी…हमारे हिस्से को भी गिरवी रख दिया और रुपए ले गया. अब चाहता है कि मैं फंड के रुपए लगा दूं? मुझे सुख से जीने नहीं देना चाहता?’’

‘‘शांत हो जाइए, नहीं तो ब्लडप्रेशर बढे़गा,’’ कमला ने मुझे शांत करना चाहा.

सुबह कारखाने पहुंचा तो जवारी- भाई रामलोचन मिल गए, बोले, ‘‘रिटायरमेंट के बाद गांव जाने की तो नहीं सोच रहे हो न? बड़ा गंदा माहौल हो गया है गांव का. खूब राजनीति होती है. तुम्हारा खाना चाहेंगे और तुम्हें ही बेवकूफ बनाएंगे. रामबाबू रिटायरमेंट के बाद गांव गए थे, भाग कर उन्हें वापस आना पड़ा. अपहरण होतेहोते बचा. लाख रुपए की मांग कर रहे थे रणबीर दल वाले.’’

सीनियर अफसर गुप्ताजी मिल गए. बोले, ‘‘कल आप की नौकरी का आखिरी दिन है. सब को लड्डू खिला दीजिएगा. आप के विदाई समारोह का आयोजन शायद विभाग वाले दशहरे के बाद करेंगे.’’

कमला ने भी घर से निकलते समय कहा था, ‘‘लड्डू बांट दीजिएगा.’’

बलबीर भी जिद पर आया, ‘‘मैं भी अपने विभाग वालों को लड्डू खिलाऊंगा.’’

‘‘तुम क्यों? रिटायर तो मैं होने वाला हूं.’’

वह हंसते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, रिटायरमेंट को खुशी से लीजिए. खुशियां बांटिए और बटोरिए. कुछ मुझे और कुछ बहनबेटियों को दीजिए.’’

मुझे क्रोध आया, ‘‘तो क्या पैसे बांट कर अपना हाथ खाली कर लूं? मुझे कम पड़ेगा तो कोई देने नहीं आएगा. हां, मैं बहनबेटियों को जरूर कुछ गिफ्ट दूंगा. ऐसा नहीं कि मैं वरिष्ठ नागरिक होते ही ‘अशिष्ट’ सिद्ध होऊं. पर शिष्ट होने के लिए अपने को नष्ट नहीं करूंगा.’’

मैं सोचने लगा कि अपने ही विभाग का वेणुगोपाल पैसों के अभाव का रोना रो कर 5 हजार रुपए ले गया था, अब वापस करने की स्थिति में नहीं है. उस के बेटीदामाद ने मुकदमा ठोका हुआ है कि उन्हें उस की भविष्यनिधि से हिस्सा चाहिए.

रामलाल भी एक अवकाश प्राप्त व्यक्ति थे. एक दिन आए और गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘शर्माजी, रिटायर होने के बाद मैं कंगाल हो गया हूं. बेटों के लिए मकान बनाया. अब उन्होंने घर से बाहर कर दिया है. 15 हजार रुपए दे दीजिए. गायभैंस का धंधा करूंगा. दूध बेच कर वापस कर दूंगा.’’

रिटायर होने के बाद मैं घर बैठ गया. 10 दिन बीत गए. न विदाई समारोह का आयोजन हुआ, न विभाग से कोई मिलने आया. मैं ने गेटपास जमा कर दिया था. कारखाने के अंदर जाना भी मुश्किल था. समय के साथ विभाग वाले भूल गए कि विदाई की रस्म भी पूरी करनी है.

एक दिन विजय आया. उलाहने भरे स्वर में बोला, ‘‘यार, तुम ने मुझे किसी आयोजन में नहीं बुलाया?’’

मैं दुखी स्वर में बोला, ‘‘क्षमा करना मित्र, रिटायर होने के बाद कोई मुझे पूछने नहीं आया. विभाग वाले भी विभाग के काम में लग कर भूल गए…जैसे सारे नाते टूट गए हों.’’

कमला ताने दे बैठी, ‘‘बड़े लालायित थे आधाआधा किलो के पैकेट देने के लिए…’’

बलबीर को अवसर मिला. बोला, ‘‘मांसाहारी भोज से इनकार कर गए, अत: सब का मोहभंग हो गया. अब आशा भी मत रखिए…आप को पता है, मंदी का दौर पूरी दुनिया में है. उस का असर भारत के कारखानों पर भी पड़ा है. कुछ अनस्किल्ड मजदूरों की छंटनी कर दी गई है. मजदूरों को चंदा देना भारी पड़ रहा है. वैसे भी जिस विभाग का प्रतिनिधि चंदा उगाहने में माहिर न हो, काम से भागने वाला हो और विभागीय आयोजनों पर ध्यान न दे, वह कुछ नहीं कर सकता.’’

विजय ने कहा, ‘‘यार, शर्मा, घर में बैठने के बाद कौन पूछता है? वह जमाना बीत गया कि लोगों के अंदर प्यार होता था, हमदर्दी होती थी. रिटायर व्यक्ति को हाथी पर बैठा कर, फूलमाला पहना कर घर तक लाया जाता था. अब लोग यह सोचते हैं कि उन का कितना खर्च हुआ और बदले में उन्हें कितना मिला. मुरगाशराब खिलातेपिलाते तो भी एकदो माह के बाद कोई पूछने नहीं आता. सचाई यह है कि रिटायर व्यक्ति को सब बेकार समझ लेते हैं और भाव नहीं देते.’’

मैं कसमसा कर शांत हो गया…घर में बैठने का दंश सहने लगा.

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