Social Story : पाखंडी तांत्रिक

Social Story : अचानक रिम्मी को पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर नाम की बीमारी के कुछ दौरे ही पड़े होंगे कि मां झट से गईं और चप्पल से रिम्मी पर अनगिनत वार करती चली गईं.

हालांकि उन्हें यह बहुत बाद में पता चला कि यह कोई बीमारी है, जिसे मैडिकल साइंस में पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर कहा जाता है. वरना उस दिन रिम्मी की मां ने तो किसी ऊपरी साए का चक्कर समझ कर उस साए पर चप्पलों की बरसात कर दी थी, जबकि दर्द रिम्मी को सहना पड़ रहा था.

रिम्मी की मां ने रिम्मी को दौरे पड़ने वाली बात को समाज से छिपाए रखी, शायद इसलिए क्योेंकि रिम्मी की शादी एक साल पहले ही विजय से तय हो चुकी थी.

विजय एक अच्छे परिवार और पढ़ेलिखे घर का सुशील और गुणवान लड़का था और पेशे से सीबीआई अफसर भी. रिम्मी और विजय दोनों ही एकदूसरे को कालेज से पसंद भी करते आए थे. ऐसे में मां नहीं चाहती थीं कि महल्ले वालों को रिम्मी की इस बीमारी के बारे में पता चले और इतनी अच्छी ससुराल हाथ से निकल जाए.

रिम्मी को जब कभी भी ऐसे दौरे पड़ते, उस के थोड़ी देर बाद ही वह अपनेआप शांत हो जाती. उसे बिलकुल भी याद नहीं रहता कि उस के साथ क्या हुआ और उस ने कैसीकैसी हरकतें कीं.

पर हुआ वही, जो रिम्मी की मां नहीं चाहती थीं. अब भला रिम्मी के घर से उस के चिल्लाने की अजीबोगरीब आवाज आना, रोनाबिलखना भला कोई कैसे अनसुना कर सकता था.

एक दिन ठेले पर सब्जी लेते समय सुनीता आंटी ने पूछ ही लिया, ‘‘अरे रिम्मी की मां, सुनो तो जरा. यह रिम्मी को क्या हो गया है? अगर कोई बात है तो बताओ?’’

सुनीता आंटी पड़ोस में ही रहती थीं और इसीलिए बाकियों से ज्यादा उन के साथ रिम्मी की मां के अच्छे संबंध थे.

मां ने अभी तक अपना यह दुख किसी के साथ नहीं बांटा था, शायद इसी वजह से सुनीता आंटी के जरा से पूछ लेने पर उन से रहा नहीं गया और दिल खोल कर सारी बात बता दी. उन्हें लगा कि शायद इन के पास इस मुसीबत का कोई हल हो.

‘‘अरे इतनी सी बात के लिए इतना घबरा रही थीं आप. एक बार मुझे पहले ही बता तो दिया होता, अब भला रिम्मी हमारी बेटी नहीं है क्या,’’ सुनीता आंटी के इतना कहने पर रिम्मी की मां को आशा की एक किरण दिखने लगी. मां को लगा कि शायद सुनीता आंटी के पास इस समस्या का कोई समाधान जरूर है.

‘‘अरे, मैं ने ऐसी कई लड़कियों को देखा है, जिन पर ऊपरी चक्कर या अन्य कोई दोष होता है और उस के चलते वे अजीबअजीब सी हरकतें करने लगती हैं.

‘‘डरो मत, मैं एक ऐसे तांत्रिक बाबा को जानती हूं, जो सिर्फ माथा छू कर सारी समस्याओं की जड़ बता देते हैं,’’ सुनीता आंटी ने रिम्मी की मां से कहा.

मां ने बिना कुछ सोचेसमझे सुनीता आंटी से तांत्रिक के यहां चलने की बात पक्की भी कर ली.

‘‘चलो रिम्मी उठो, जल्दी उठो और तैयार हो जाओ. हमें कहीं जाना है,’’ मां ने सुबहसुबह ही रिम्मी को नींद से जबरदस्ती उठा लिया.

‘‘क्या हुआ मां, कहां जाना है? बताओ पहले…’’ रिम्मी ने लेटेलेटे ही मां से पूछा.

‘‘वे सुनीता आंटी एक तांत्रिक बाबा को जानती हैं. वे बड़े ही पहुंचे हुए बाबा हैं. वे तुझे देखते ही बता देंगे कि क्या परेशानी है और फिर तेरा इलाज भी कर देंगे,’’ मां ने रिम्मी को समझाया.

‘‘मां, आप भी कैसेकैसे लोगों की बातों में आ जाती?हैं और वह भी आज के जमाने में. आप ने यह कैसे सोच लिया कि मैं आप के साथ चलने को तैयार हो जाऊंगी.’’

‘‘बेटी, एक बार चल कर देखने में क्या हर्ज है. और क्या पता, किस का तुक्का ठीक बैठ जाए. हमें तो बस तेरे ठीक होने से मतलब है. अभी तेरी शादी होने में सिर्फ 6 महीने ही बचे हैं न? उस से पहले ही ठीक होना है न तुझे?’’ पिताजी ने भी मां की तुक में तुक मिला कर रिम्मी को समझाया.

रिम्मी भी न नानुकुर करतेकरते मान ही गई और तांत्रिक के पास चलने के लिए राजी हो गई.

तांत्रिक का ठिकाना बड़ा ही घनचक्कर कर देने वाला था. पता नहीं कितनी पतलीपतली संकरी गलियों के अंदर उस ने अपना घर बना रखा था. सुनीता आंटी ने मां और रिम्मी को दरवाजे पर ही समझा दिया था कि जाते ही उन बाबा के पैर पकड़ कर आशीर्वाद ले लेना.

तांत्रिक के घर पर पहले से ही 4-5 लोग बैठे हुए थे. रिम्मी को बड़ी हैरत हुई कि आज भी इतने लोग डाक्टरों को छोड़ कर इन पाखंडियों के पास आते हैं. फिर सोचा कि अगर इतने लोग अपना इलाज कराने आए हैं, तो जरूर इस तांत्रिक में कोई तो बात होगी.

तकरीबन 2 घंटे के इंतजार के बाद रिम्मी का नंबर भी आ ही गया. रिम्मी ने इस से पहले कभी किसी तांत्रिक को रूबरू नहीं देखा था, सिर्फ टैलीविजन पर ही देखा था. उस को लगा था कि कोई काला कुरतापाजामा पहने खोपडि़यों की माला और ढेर सारी अंगूठियां पहने, काला टीका लगाए, आग जलाए बैठा होगा, पर अंदर जाते ही उस ने देखा कि तकरीबन 40-45 साल का एक आदमी फौर्मल कपड़ों में अपने सोफे पर बैठा हुआ था. हां, अंगूठियां तो उस ने भी पहनी थीं, पर इतनी नहीं. और माथे पर काला टीका भी लगाया हुआ था.

तांत्रिक सुनीता आंटी को जानता था, शायद इसलिए उस ने सब लोगों के लिए चाय और बिसकुट का भी इंतजाम किया.

रिम्मी से तांत्रिक ने उस की बीमारी के बारे में पूछा और अंदर बने एक कमरे में ले जा कर कुछ जादूटोना कर के कई तरह के प्रपंच करने लगा, जिन का रिम्मी पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

फिर रिम्मी को बाहर ले जा कर उस ढोंगी तांत्रिक ने मां को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘देखो, किसी भटकती आत्मा ने रिम्मी के शरीर को अपना वास बना लिया है, पर घबराने वाली कोई बात नहीं है…

‘‘ऐसे केस मेरे पास आएदिन आते रहते हैं. मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं,’’ तांत्रिक अपनी बड़ाई करते थक नहीं रहा था कि अगले ही पल असली मुद्दे पर आ गया.

‘‘देखिए, इस तरह की आत्माओं से निबटने के लिए अकसर खास तरह की पूजा कराने की जरूरत पड़ती है और एक बकरे की बलि भी देनी ही पड़ती है.

‘‘इस सब पर कम से कम 40,000 से 50,000 रुपए का खर्चा तो मान कर ही चलिए, लेकिन आप लोग चिंता मत कीजिए, सारी सामग्री का इंतजाम हम खुद ही कर लेंगे. अगर आप को ठीक लगे तो बताना. आगे की विधि मैं आप को उस के बाद ही बताऊंगा.’’

रिम्मी चालाकी दिखाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, आप बस अपना खर्च बता दीजिए, सामग्री का इंतजाम हम खुद कर लेंगे.’’

‘‘नहीं बेटी, यह कोई ऐसीवैसी सामग्री नहीं है, जो कहीं पर भी मिल जाए. यह सारी सामग्री हमारे सिद्ध गुरुजी की आज्ञा से विशेष विधि से लाई जाती है, इसलिए यह काम तुम हम पर ही छोड़ दो.’’

तांत्रिक अपना उल्लू सीधा करने के मकसद से बोल रहा था. सब ने तांत्रिक से अलविदा ली और जैसे ही जाने के लिए मुड़े, वैसे ही तांत्रिक ने टोकते हुए फीस के नाम पर पहली ही मुलाकात में रिम्मी की मां से 5,000 रुपए ऐंठ लिए.

रिम्मी को तांत्रिक द्वारा 5,000 रुपए मांगने वाली बात पर कुछ शक हुआ. वे समझ चुकी थीं कि यह तांत्रिक के नाम पर पाखंडी है, पर उस की मां तांत्रिक की बातें आंख बंद कर मानने लगी थीं.

घर पहुंचते ही रिम्मी के फोन पर विजय का फोन आया, तो वह चुपचाप अपने कमरे की ओर निकल गई और तांत्रिक की बात बताने लगी.

मां और पिताजी ने रिम्मी से कहा कि वे तांत्रिक बाबा से विशेष क्रियाकर्म करवाएंगे.

रिम्मी ने भी इस बात का कोई विरोध नहीं किया और बड़ी आसानी से मान गई.

मां ने तुरंत तांत्रिक को फोन लगाया और आगे की सारी विधि समझ ली.

तांत्रिक ने उन्हें बताया, ‘अमावस्या की रात को मैं जो पता बताने जा रहा हूं, वहां पहुंच जाना. हम रिम्मी के अंदर बैठी उस दुष्ट आत्मा को बोतल में कैद कर अपने साथ ले जाएंगे और रिम्मी को उस दुष्ट आत्मा से हमेशा के लिए मुक्त कर देंगे.’

अमावस्या की रात भी आ चुकी थी और रिम्मी की मां और पिताजी उसे ले कर तांत्रिक के बताए उस पते पर पहुंच गए थे.

तांत्रिक पहले ही रिम्मी के पिताजी से पूरे 50,000 रुपए की दक्षिणा मांग लेता है और रिम्मी को अपने साथ खुफिया कमरे में ले जा कर उस से कहता है, ‘‘रिम्मी, अब अपने सारे कपड़े उतार कर इस आसन पर बैठ जाओ. इस विशेष पूजा में तन पर कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए, वरना वह आत्मा कभी तुम्हारे अंदर से नहीं निकल पाएगी.’’

इतना कहते ही रिम्मी ने एक जोरदार तमाचा तांत्रिक के गाल पर जड़ दिया, उतने में ही विजय अपने कई साथियों के साथ दौड़ता हुआ उस कमरे का गेट तोड़ कर अंदर जा घुसा.

रिम्मी के मां और पिताजी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है और जमाई राजा यहां कैसे आ गए, वह भी इतने आदमी ले कर.

विजय ने अंदर पहुंचते ही उस तांत्रिक के हाथों में हथकड़ी डाली, तो पिताजी ने विजय से पूछा, ‘‘बेटा, यह सब क्या है?’’

‘‘पापाजी, शायद आप लोगों को यह नहीं मालूम कि यह तांत्रिक नहीं, बल्कि डकैत?है. इस ने लोगों को ठगने का नया तरीका ढूंढ़ लिया है. पिछले कई महीनों से हमारे डिपार्टमैंट को इस की तलाश थी. यह अब लोगों को लूटने उन के घर नहीं जाता, बल्कि लोग इस के पास खुद आते हैं अपनेआप को लुटवाने के लिए.

‘‘यह पाखंडी लोगों को ठीक करने का झूठा वादा कर के उन से हजारोंलाखों रुपए तक वसूल लेता है और फिर किसी दूसरे शहर में अपना शिकार ढूंढ़ने के लिए निकल जाता है.’’

विजय ने उस पाखंडी बाबा की सचाई रिम्मी के पिताजी को बताई, जिसे रिम्मी की मां भी सुन रही थीं.

‘‘पर बेटा, तुम्हें कैसे पता चला कि हम लोग रिम्मी को ले कर इस तांत्रिक के पास आए हुए हैं?’’ मां ने हैरान होते हुए विजय से पूछा.

‘‘मांजी, जिस दिन आप रिम्मी को पहली बार इस डकैत के पास ले कर गई थीं, उस दिन मैं ने रिम्मी से बात करने के लिए उसे फोन लगाया था. तब रिम्मी ने मुझ सारी बात बताई.

‘‘रिम्मी ने मुझे इस के बारे में जोकुछ बताया और वह फीस के 5,000 रुपए के बारे में बताया, तो मेरे दिमाग की बत्ती जली. मुझे याद आया कि कहीं यह वही तांत्रिक तो नहीं जिस की तलाश मैं और मेरे साथी कई महीनों से कर रहे हैं.

‘‘मैं ने तुरंत इस तांत्रिक का स्टिंग आपरेशन करने का प्लान बनाया और फोन पर ही सारी योजना रिम्मी को समझा दी.

‘‘और आज जब आप लोग अपने घर से निकले, तब हम ने आप लोगों का पीछा किया था, क्योंकि इस के अड्डे तक हमें सिर्फ आप ही पहुंचा सकते थे.

‘‘अपनी योजना के मुताबिक हम सारे अफसर अपना हुलिया बदल कर गाड़ी में बैठेबैठे रिम्मी की माला पर लगे स्पाई कैमरे से सबकुछ लाइव देख रहे थे और जैसे ही रिम्मी ने इसे तमाचा मारा, हम समझ गए कि कोई बात जरूर है और अंदर इसे दबोचने चले आए.’’

इतना कह कर रिम्मी की ओर देखते हुए विजय ने बताया, ‘‘मांजी, मैं ने रिम्मी की बीमारी के बारे में कुछ दिनों पहले ही अपने दोस्त से फोन पर पूछा था, जो लंदन में एक मनोचिकित्सक है.

‘‘उस ने बताया कि रिम्मी के अंदर किसी आत्मा का वास नहीं, बल्कि पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर की बीमारी है. इस की वजह से अकसर मरीज अजीबअजीब सी हरकतें करने लगता है, जैसे बहुत गुस्सा आने के चलते अपना आपा खो देना, किसी पर विश्वास न करना, अकेले रहना, पर यह बीमारी डाक्टर के इलाज से जल्दी ठीक भी हो जाती है.’’

विजय यह सब बातें बताते समय तांत्रिक को गुस्से भरी आंखों से घूरे जा रहा था.

इस के बाद विजय ने उस तांत्रिक से रिम्मी के 50,000 और उस दिन की फीस के 5,000 रुपए भी वसूल कर रिम्मी के पिताजी को दे दिए.

लेखक – हेमंत कुमार

Family Story : न्याय अन्याय

Family Story : कुंडी खड़कने की आवाज सुन कर निम्मी ने दरवाजा खोला, ‘‘जी कहिए…’’ निम्मी ने बाहर खड़े 2 लड़कों को नमस्ते करते हुए कहा.

‘‘जी, हम आप के महल्ले से ही हैं. आप को राशन की जरूरत तो नहीं…’’ उन में से एक ने निम्मी से कहा.

‘‘जी शुक्रिया, अभी घर में राशन है…’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है… जब भी जरूरत होगी, तो इस मोबाइल नंबर पर फोन करना…’’ उन में से एक बड़ी मूंछों वाले लड़के ने निम्मी को एक कागज पर मोबाइल नंबर लिख कर देते हुए कहा.

लौकडाउन का तीसरा दिन था. पूरा शहर एक उदासी और सन्नाटे की ओर बढ़ रहा था. किसी को नहीं पता था कि कब बाजार खुलेगा, कब घर से बाहर निकल सकेंगे और कब हालात सही होंगे.

निम्मी का पति अमर किसी काम से दूसरे शहर गया हुआ था कि अचानक से ये कर्फ्यू से हालात हो गए.

निम्मी की शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ था. निम्मी बहुत खूबसूरत थी. न जाने कितने नौजवान निम्मी को किसी न किसी तरह पाना चाहते थे.

यह तालाबंदी भी निम्मी की जिंदगी में घोर अंधेरा ले कर आई थी. उसे अमर से मिलने की उम्मीद दिखने लगी थी कि लौकडाउन को आगे बढ़ा दिया गया. एक ओर राशन खत्म हो रहा था, तो वहीं दूसरी ओर अमर के खेत में गेहूं की खड़ी फसल. अब कौन फसल को काटे और कौन मंडी ले जाए.

निम्मी सोच ही रही थी कि अमर का फोन आया, ‘निम्मी, मु झे तो अभी वहां आना मुमकिन नहीं जान पड़ता… खेत का क्या हाल है… तुम गई क्या किसी दिन?’

‘‘बस एक दिन गई थी… फसल पक चुकी है, पर अमर अब यह कटेगी कैसे… मजदूर भी नहीं मिल रहे इस वक्त यहां,’’ निम्मी ने बताया.

कुछ देर इधरउधर की बात कर के निम्मी ने फोन रख दिया.

तभी उस के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी, ‘‘अमर… बाहर आना.’’

महल्ले के धनी सेठ की आवाज सुन कर निम्मी बाहर आई.

‘‘अमर को बुलाओ तो बाहर. उस से कहो, अगर गेहूं की फसल जल्दी नहीं काटी तो सारी खराब हो जाएगी.’’

‘‘जी, वे तो शहर से बाहर गए थे किसी काम से और तालाबंदी के चलते वहीं फंस गए,’’ निम्मी ने बताया.

हालांकि धनी सेठ अच्छी तरह से जानता था कि अमर घर पर नहीं है, फिर भी अनजान बनने की अदाकारी बखूबी कर रहा था, ‘‘ओह, लेकिन अगर फसल नहीं कटेगी, तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा…’’

‘‘जी जरूर… जरूरत हुई तो आप के पास आ कर कह दूंगी. वैसे, इतनी खेती तो है नहीं कि मंडी तक पहुंचाई जाए. हमारा ही गुजर होने लायक अनाज होता है,’’ निम्मी ने हाथ जोड़ कर कहा.

धनी सेठ कई सवाल ले कर जा रहा था कि निम्मी मु झे बुलाएगी या नहीं, क्या कभी निम्मी के साथ गुफ्तगू मुमकिन है. वह खुद से ही बोलते जा रहा था कि पुजारी से सामना हो गया.

‘‘प्रणाम पुजारीजी… कैसे हैं आप?’’ धनी सेठ पुजारी से बोला.

‘‘चिरंजीवी रहो धनी सेठ… तरक्की तुम्हारे कदम चूमे,’’ दोनों हाथों से आशीष देते हुए पुजारी ने कहा.

‘‘इस दोपहरी में कहां से आ रहे हैं और कहां जा रहे हैं?’’ धनी सेठ ने पुजारी से पूछा.

पुजारी ने सकपकाते हुए जवाब दिया, ‘‘बस, एक यजमान के घर से आ रहा हूं… तो सोचा, थोड़ा नदी किनारे टहल आऊं.’’

‘‘अच्छा… नमस्ते,’’ कह कर धनी सेठ आगे बढ़ गया. इधर निम्मी ने अमर को फोन पर धनी सेठ के प्रस्ताव के बारे में बताया, तो अमर ने साफ इनकार करने को कहा, क्योंकि वह उसे अच्छी तरह जानता था और इस सहयोग के पीछे की मंशा पर भी उसे शक था.

निम्मी ने फोन रखा ही था कि किसी ने घर का दरवाजा खटखटाया. निम्मी ने दरवाजा खोल कर सामने खड़े पुजारी को प्रणाम किया.

पुजारी ने भी धनी सेठ की तरह हमदर्दी और सहयोग का प्रस्ताव दिया. इसी तरह हैडमास्टर किशोर कश्यप ने भी सहयोग का प्रस्ताव निम्मी के सामने रखा.

निम्मी असमंजस में थी. एक ओर उस की शुगर की दवा खत्म हो रही थी, वहीं दूसरी ओर राशन भी खत्म होने को था.

अगले दिन मुंह पर चुन्नी लपेटे निम्मी महल्ले की दुकान तक गई. वहां से जरूरी सामान ले कर वह वापस आ रही थी कि सामने से उसी मूंछ वाले लड़के ने उसे पहचान लिया. उस का नाम अनूप शुक्ला था. उस ने निम्मी से कहा, ‘‘अरे निम्मीजी, आप को किसी चीज की जरूरत थी, तो मु झ से कहती… आप क्यों इस धूप में बाहर निकलीं…’’

‘‘जी, इस में परेशानी की कोई बात नहीं… बस टहल भी ली और सामान भी ले लिया,’’ इतना कह कर निम्मी तेजी से घर की ओर बढ़ गई. पर एक परेशानी उस के सामने खड़ी हो गई कि उस की शुगर की दवा खत्म हो गई और मैडिकल स्टोर बहुत दूर था.

तभी निम्मी को अनूप के मोबाइल नंबर वाला कागज भी दिख गया, तो उस ने उसे फोन कर ही दिया. अनूप ने भी उसे दवा ला कर दे दी.

इसी तरह कुछ दिन बीत गए, पर गेहूं की फसल का कुछ तो करना था, निम्मी यह सोच ही रही थी कि धनी सेठ और पुजारी कुछ मजदूरों के साथ उस के घर पर आ गए.

‘‘आप तो संकोच करेंगी निम्मीजी, पर हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नहीं?’’

‘‘मैं कुछ सम झी नहीं,’’ निम्मी बोली.

‘‘इस में न सम झने जैसा क्या है. बस तुम हां कह दो, तो खेत से गेहूं ले आएं.’’

निम्मी कुछ सम झती, इस से पहले ही उन दोनों ने मजदूरों को खेत में जाने का आदेश दे दिया. निम्मी ने उन को चाय पीने को कह दिया.

दोनों चाय पी कर चले गए. उसी शाम धनी सेठ फिर निम्मी के घर आया.

‘‘तुम ठीक हो न निम्मी… मेरा मतलब, खुश तो हो न?’’

‘‘जी, मैं ठीक हूं.’’

धीरेधीरे सेठ निम्मी की ओर बढ़ने लगा और पास आ कर बोला, ‘‘तुम इतनी खूबसूरत और कमसिन हो…’’ इतना कह कर उस ने निम्मी की कमर को अपने आगोश में ले लिया.

निम्मी कुछ रोकती या कहती, उस ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और उसे बेहिसाब चूमने लगा.

निम्मी रोती, कभी मिन्नत करती, पर जिस्म के भूखे सेठ को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने उसे हर तरीके से भोगा और वहां से चला गया.

निम्मी जोरजोर से रो रही थी, पर उस की चीख सुनने वाला कोई न था. अचानक उसे याद आया कि उस के महल्ले का देवेंद्र सिंह पुलिस में नौकरी करता है. किसी तरह निम्मी ने उस का पता लगाया और फोन किया.

‘हैलो, कौन बोल रहा है?’ देवेंद्र सिंह ने फोन रिसीव कर के पूछा.

‘‘जी, मैं आप के ही महल्ले से बोल रही हूं… मु झे आप की मदद चाहिए,’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘आप को अगर कोई भी परेशानी है, तो आप थाने में आ कर रिपोर्ट लिखा सकती हैं,’ देवेंद्र सिंह ने यह कह कर फोन रख दिया.

निम्मी ने फिर से फोन किया, ‘‘हैलो… प्लीज, फोन मत काटना… मैं निम्मी बोल रही हूं. आप के ही महल्ले में रहती हूं. मेरे पति अमर इस वक्त यहां नहीं हैं और मैं मुसीबत में हूं.’’

अमर का नाम सुनते ही वह निम्मी को पहचान गया, ‘अच्छाअच्छा, मैं सम झ गया. आप चिंता न करें. मैं शाम को आप के पास आता हूं.’

निम्मी अब निश्चिंत थी कि उसे मदद मिल जाएगी और वह धनी सेठ की रिपोर्ट लिखा सकेगी.

शाम को देवेंद्र सिंह उस के पास आया. निम्मी ने सारी बात बताई और मदद मांगी.

‘‘तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा,’’ देवेंद्र सिंह ने कहा.

चाय पी कर जब वह जाने लगा, तो अचानक तेज आंधी और बारिश होने लगी. अब तो देवेंद्र को वहीं रुकना पड़ा.

छत पर सूख रहे कपड़े उतारने के लिए निम्मी भागी, तो उस की साड़ी ही उड़ने लगी.
देवेंद्र सिंह ने उस से कहा, ‘‘मैं ले आता हूं कपड़े. आप बैठ जाइए.’’

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, इधर देवेंद्र सिंह अपने पर काबू नहीं कर पाया और जो उस की शिकायत सुनने आया था, उसी निम्मी को दबोच बैठा और एक लाचार को अपनी जिस्म की भूख मिटाने को मसलता रहा.

उस के जाने के बाद निम्मी मर जाना चाहती थी, पर जहर भी कहां से लाए इस तालाबंदी में.

थोड़ी देर में निम्मी को याद आया कि बीती सुबह एक ट्रेन यहां से गुजरी थी और उस ने सुना था कि श्रमिक ट्रेन इन दिनों चल रही है. उसे अब यही एक रास्ता दिखा.

निम्मी ने किसी तरह वह रात काटी और तड़के उठ कर घर से चल दी, पास ही पटरियों की ओर.
पौ फटने का समय था और निम्मी बदहवास जा रही थी. सामने से आते पुजारी ने उसे देख लिया. निम्मी पटरी पर लेट गई और ट्रेन की आवाज सुनाई दी. पुजारी ने भाग कर उसे पटरी से खींच लिया और सम झाबु झा कर घर ले आया. उस ने निम्मी की मजबूरी और अकेलेपन का फायदा उठाया और दबोच लिया.

निम्मी कुछ समझ पाती. इस से पहले ही उसे लूट लिया गया था. तालाबंदी खत्म होने का आदेश भी जारी हो गया. अब अमर के आने की भी उम्मीद होने लगी.

इधर निम्मी अमर की राह देख रही थी, उधर निम्मी के दीवाने दुखी हो रहे थे. निम्मी की मजबूरी का खूब फायदा उठा चुके ये लोग अभी संतुष्ट नहीं हुए थे. अनूप तो सोचने लगा कि अमर घर आता ही नहीं तो अच्छा था, क्योंकि उसे निम्मी के शरीर की मादक खुशबू से अभी तक मन नहीं भरा था. उस के साथ बिताया हर पल उसे याद आ रहा था.

एक शाम जब निम्मी चीनी लेने घर से बाहर निकली, तो वह जबरन उस के साथ अंदर आ गया. निम्मी ने उस से घर से बाहर जाने को कहा, तो उस ने मना कर दिया.

निम्मी मदद के लिए चिल्लाने लगी, तो उस ने उस का मुंह बंद कर दरवाजे की अंदर से कुंडी लगा दी.

निम्मी रोती रही, पर उस की मदद को भला कौन आता. पुलिस पर भरोसा भी कैसे करे. अनूप उसे अपनी हवस की आग में जला रहा था और वह रोए जा रही थी.

तभी वहां से कश्यप मास्टर गुजर रहे थे, तो उन्होंने उस की चीख सुनी तो फौरन घर की ओर मुड़े.

‘क्या हुआ बेटी… क्यों चीख रही हो. दरवाजा खोलो बेटी,’ बेटी सुनते ही निम्मी को न जाने कैसी ताकत आ गई और उस ने अनूप के बालों को खींच कर उस के अंग पर वार कर दिया.

अनूप दर्द से चीखने लगा और मौका पा कर निम्मी ने दरवाजा खोल दिया.

सामने कश्यप मास्टर खड़े थे. उन्होंने अपना अंगोछा निम्मी को ओढ़ा दिया. इस बीच अनूप भाग गया.

‘‘रो मत बेटी,’’ मास्टर साहब उसे दिलासा दे रहे थे. निम्मी रोतेरोते मास्टर साहब की गोद में ही सो गई.

मास्टर साहब ने अपनी बेटी को बुला कर निम्मी की देखभाल करने को कहा और चले गए.

अगले दिन अमर घर आ गया, तो वह बहुत खुश थी. अमर ने देखा कि गेहूं गोदाम में भरे हुए हैं, तो उस ने पूछा, ‘‘निम्मी, ये गेहूं किस ने काटे?’’

निम्मी ने उत्तर देते हुए कहा, ‘‘पुजारी और धनी सेठ ने.’’

अमर सम झ रहा था कि निम्मी कुछ कहने की कोशिश कर रही है, पर कुछ कह नहीं पा रही.

कुछ दिन बीते ही थे कि अमर की तबीयत खराब हो गई. उसे लोगों की मदद से अस्पताल ले जाया गया, जहां उस के टैस्ट चल रहे थे…

इधर निम्मी भी एक रोज चक्कर खा कर गिर पड़ी. पड़ोस की सुधा उसे अस्पताल ले गई. डाक्टर ने तुरंत उसे दवा दे कर कहा कि घबराने की बात नहीं है… कुछ कमजोरी है.

उधर, अमर के टैस्ट की रिपोर्ट आ चुकी थी. उसे डाक्टर ने एचआईवी पौजिटिव की पुष्टि की, तो उस के पैरों के तले से जमीन ही निकल गई. उसे याद नहीं आ रहा था कि उस ने ऐसा क्या किया. वह सोचसोच कर परेशान था.

वह जैसेतैसे घर आया, तो निम्मी की तबीयत और ज्यादा खराब हो रही थी. उस की शुगर भी बढ़ रही थी.

अमर ने उसे तुरंत दवा दी, तो थोड़ा आराम हुआ. इस तरह दिन बीत रहे थे. अमर निम्मी को कैसे बताए, यह सोच रहा था. उधर निम्मी परेशान थी कि कैसे बताए कि कैसे उस के जिस्म के टुकड़ेटुकड़े हुए.

अमर ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘निम्मी, तुम मु झ पर भरोसा करती हो न?’’

‘‘यह पूछने की जरूरत है अमर?’’

‘‘तो सुनो… मेरी एचआईवी पौजिटिव की रिपोर्ट आई है,’’ अमर ने एक ही सांस में कह दिया, ‘‘पर, यकीन मानो कि मेरा किसी से कोई संबंध नहीं है. मु झे याद आ रहा है, जब पिछली बार मैं शहर काम से गया था, तो एक सैलून में मैं ने अपनी दाढ़ी बनवाई थी, क्योंकि मु झे मीटिंग के लिए देर हो रही थी, इसलिए मैं ने ही नाई को जल्दी शेव करने को कहा था… शायद उस ने ब्लेड बदला नहीं था,’’ गहरी सांस लेते हुए अमर ने कहा.

निम्मी चुप थी, बस आंखों से आंसू बहाए जा रही थी. कुछ देर बाद अचानक उस के चेहरे पर एक जीत की जैसी मुसकान दौड़ गई.

अमर अपनी बीमारी के चलते ही अधमरा हुआ जा रहा था और निम्मी मुसकरा रही थी.

निम्मी बोली, ‘‘अभी चलो, मु झे भी यह टैस्ट करवाना है.’’

‘‘कल बुलाया है तुम को डाक्टर ने,’’ अमर ने कहा. दोनों के लिए पूरी रात काटनी मुश्किल हो रही थी. निम्मी ने अमर को सब बता दिया था. दोनों बस रोए जा रहे थे.

अगले दिन निम्मी का भी टैस्ट किया गया, तो वह भी एचआईवी पौजिटिव निकली.

निम्मी दुखी होने के बजाय खुश थी. पर दोनों के लिए जीना आसान न था. दोनों अपनी मजबूरियों पर रो रहे थे. जैसेतैसे संभलते हुए दोनों घर आए और एकदूसरे को दिलासा दे ही रहे थे कि अनूप, धनी सेठ, पुजारी सब निम्मी के घर आए और अमर का हालचाल पूछने लगे. इन सब को निम्मी ने ही फोन कर के बुलाया था.

पहले तो अमर को बहुत गुस्सा आ रहा था, पर जैसेतैसे संभल कर उस ने सब को निम्मी का साथ देने के लिए धन्यवाद दिया और निम्मी से चाय बनाने को कहा.

अमर और निम्मी को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर दोनों ने खुद को संभाल लिया.

‘‘आप लोगों का मैं जितना भी धन्यवाद करूं कम ही होगा,’’ अमर ने कहा, तो धनी सेठ ने कहा, ‘‘इस में धन्यवाद कैसा अमर साहब… हम अगर एकदूसरे के काम नहीं आएंगे तो और कौन आएगा.’’

‘‘जी, कह तो आप सही रहे हैं… पर आप तो हमारे दुखसुख के सचमुच भागीदार हैं और इतना ही नहीं हमारी बीमारी के भी…’’ एक कुटिल हंसी के साथ अमर ने कहा.

‘‘हम कुछ सम झे नहीं… बीमारी के भागीदार कैसे?’’ पुजारी ने चौंकते हुए पूछा. वह घबरा गया था.

अमर ने राज खोला, तो सब के सब सकपका कर रह गए और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे.

उधर निम्मी और अमर चैन की सांस ले रहे थे, एकदूसरे को हिम्मत दे रहे थे और कुदरत के इस न्यायअन्याय को सम झने की कोशिश कर रहे थे.

लेखिका – आरती लोहनी

Family Story : चंपा लौट आई – एहसान और बदले की कहानी

Family Story : ‘‘चंपा, मैं तुम से मिलने कल फिर आऊंगा,’’ नरेश अपने कपड़े समेटते हुए बोला.

‘‘नहीं, कल से मत आना. कल मेरा आदमी घर आने वाला है. मैं किसी भी तरह के लफड़े या बदनामी में नहीं पड़ना चाहती,’’ चंपा नरेश से बोली.

‘‘अरे नहीं, सूरत इतना नजदीक नहीं है. उस के आने में कम से कम 2-3 दिन तो लग ही जाएंगे,’’ नरेश चंपा को अपनी बांहों में कसते हुए बोला.

चंपा बांह छुड़ा कर बोली, ‘‘2 दिन पहले ही बता चुका है कि वह गाड़ी पकड़ चुका है. कल वह घर भी पहुंच जाएगा.’’

नरेश मायूस होता हुआ बोला, ‘‘जैसी तेरी मरजी. दिन में एक बार तुझे देखने जरूर आ जाया करूंगा.’’

‘‘ठीक है, आ जाना,’’ चंपा हंस कर उस से बोली.

नरेश पीछे के दरवाजे से बाहर हो गया. अपने घर जाते समय नरेश चंपा के बारे में वह सब सोचने लगा, जो चंपा ने उसे बताया था.

चंपा के घर में सासससुर और पति के अलावा और कोई नहीं था. चंपा का पति संजय अकसर काम के सिलसिले में गुजरात की कपड़ा मिल में जाया करता था. वह वहां तब से काम कर रहा है, जब उस की चंपा से शादी भी नहीं हुई थी.

संजय को गुजरात गए 2 महीने बीत गए थे. कसबे में मेला लगने वाला था.

चंपा संजय को फोन पर बोली, ‘तुम घर पर नहीं हो. इस बार का मेला मैं किस के साथ देखने जाऊंगी  मांपिताजी तो जा नहीं सकते.’

संजय ने चंपा को गांव की औरतों के साथ मेला देखने को कहा. यह सुन कर चंपा का चेहरा खुशी से खिल उठा.

एक रात गांव की कुछ औरतें समूह बना कर मेला देखने जा रही थीं. चंपा भी उन के साथ हो ली. घर पर रखवाली के लिए सासससुर तो थे ही.

मेले में रंगबिरंगी सजावट, सर्कस, झूले और न जाने मनोरंजन के कितने साजोसामान थे. उन सब को निहारती चंपा गांव की औरतों से बिछड़ गई.

अब चंपा घर कैसे जाएगी  वह डर गई थी. मेले से उस का मन उचटने लगा था. उसे घर की चिंता सताने लगी थी. उस ने उन औरतों की बहुत खोजबीन की, पर उन का पता नहीं चल पाया.

रात गहराती जा रही थी. लोग धीरेधीरे अपने घरों को जाने लगे थे. चंपा भी डरतेडरते घर की ओर जाने वाले रास्ते पर चल दी.

चंपा की शादी को अभी 2 साल हुए थे. अभी तक उसे कोई बच्चा भी नहीं हुआ था. तीखे नाकनक्श, होंठ लाल रसभरे, गठीला बदन, रस की गगरी की तरह उभार, सब मिला कर वह खिला चांद लगती थी, इसलिए तो संजय मरमिटा था चंपा पर और उस को खुश रखने के लिए हर ख्वाहिश पूरी करता था.

चंपा के गदराए बदन को देख कर 2 मनचले मेले में ही लार टपका रहे थे. अकेले ही घर की ओर जाते देख वे भी अंधेरे का फायदा उठाना चाहते थे.

चंपा भी उन की मंशा भांप गई थी. घर की ओर जाने वाली पगडंडी पर वह तेज कदमों से चली जा रही थी. वे पीछा तो नहीं कर रहे, इसलिए पीछे मुड़ कर देख भी लेती.

मनचले भी तेज कदमों से चंपा की ओर बढ़ रहे थे. वह बदहवास सी तेजी से चली जा रही थी कि अचानक ठोकर खा कर गिर पड़ी.

तभी एक नौजवान ने सहारा दे कर चंपा को उठाया और पूछा, ‘आप बहुत डरी हुई हैं. क्या बात है ’

‘कुछ नहीं,’ चंपा उठते हुए बोली.

‘शायद मेला देख कर आ रही हैं  कहां तक जाना है ’ नौजवान ने पूछा.

‘पास के सूरतपुर गांव में मेरा घर है. 2 मनचले मेरा पीछा कर रहे हैं. जिन औरतों के साथ मैं आई थी, वे पता नहीं कब घर चली गईं. मुझे मालूम नहीं चला,’ बदहवास चंपा ने एक ही सांस में सारी बातें उस नौजवान से बोल दीं.

जिस नौजवान ने चंपा को सहारा दिया, उस का नाम नरेश था. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो वहां कोई नहीं था.

‘डरने की कोई बात नहीं है. मैं भी उसी गांव का हूं. मैं आप को घर तक छोड़ दूंगा.’

चंपा डर गई थी. डर के मारे वह नरेश का हाथ पकड़ कर चल रही थी. कभीकभार दोनों के शरीर भी एकदूसरे से टकरा जाते.

कुछ देर बाद नरेश ने चंपा को उस के घर पहुंचा दिया. चंपा ने शुक्रिया कहा और अगले दिन नरेश से घर आने को बोली.

नरेश उसी दिन से चंपा के घर आया करता था, उस से ढेर सारी बातें करता, मजाकमजाक में चंपा को छूता भी था. चंपा को भी अच्छा लगता था.

एक दिन नरेश चंपा के गाल चूमते हुए बोला, ‘आप बहुत सुंदर हैं. मेरा बस चले तो…’ चंपा मुसकरा कर पीछे हट गई.

इस के बाद नरेश ने चंपा को बांहों में जकड़ कर एक बार और गालों को चूम लिया.

चंपा कसमसाते हुए बोली, ‘यह अच्छा नहीं है. क्या कर रहे हो ’

संजय अकसर घर से बाहर ही रहता था, इसलिए चंपा की जवानी भी प्यासी मछली की तरह तड़पती रहती. छुड़ाने की नाकाम कोशिश कर नरेश के आगे वह समर्पित हो गई और वे दोनों एक हो गए. दोनों ने जम कर गदराई जवानी का मजा उठाया. चंपा खुश थी.

उस दिन के बाद से ही यह सिलसिला चल पड़ा. दोनों एकदूसरे के साथ मिल कर बहुत खुश होते.

एक दिन नरेश ने चंपा से पूछा, ‘तुम सारी जिंदगी मुझ से इसी तरह प्यार करती रहोगी न ’

‘नहीं,’ चंपा बोली.

‘क्यों  लेकिन, मैं तो तुम से बहुत प्यार करता हूं.’

‘यह प्यार नहीं हवस है नरेश.’

‘आजमा कर देख लो,’ नरेश बोला.

‘नरेश, तुम अपने एहसानों का बदला चुकता कर रहे हो. जिस दिन मुझे लगेगा, तुम्हारा एहसान पूरा हो चुका है, मैं तुम से अलग हो जाऊंगी. और तुम भी अपनी अलग ही दुनिया बसा लेना,’ चंपा उसे समझाते हुए बोली.

आज नरेश को चंपा की कही हुई हर बात जेहन में ताजा होने लगी थी कि कल संजय के घर पहुंचते ही उस एहसान का कर्ज चुकता होने वाला है.

Family Story : पतझड़ का अंत – सुषमा ने संभाली जिम्मेदारी

Family Story : सुहाग सेज पर बैठी सुषमा कितनी  सुंदर लग रही थी. लाल जोड़े में  सजी हुई वह बड़ी बेताबी से अपने पति समीर का इंतजार कर रही थी.

एकाएक दरवाजा खुला और समीर मुसकराता हुआ कमरे में दाखिल हुआ. सुषमा समीर को देखते ही रोमांचित हो उठी. समीर ने अंदर आ कर धीरे से दरवाजा बंद किया. पलंग पर बिलकुल पास आ कर वह बैठ गया. फिर सुषमा का घूंघट उठा कर उसे आत्मविभोर हो देखने लगा.

सुषमा उसे इस तरह गौर से देखने पर बोली, ‘‘क्या देख रहे हो?’’

‘‘तुम्हें, जो आज के पहले मेरी नहीं थी. पता है सुसु, पहली बार मैं ने जब तुम्हें देखा था तभी मुझे लगा कि तुम्हीं मेरे जीवन की पतवार हो और अगर तुम मुझे नहीं मिलतीं तो शायद मेरा जीवन अधूरा ही रहता,’’ फिर समीर ने अपने दोनों हाथ फैला दिए और सुषमा पता  नहीं कब उस के आगोश में समा गई.

उस रात सुषमा के जीवन के पतझड़ का अंत हो गया था. शायद  40 साल के कठिन संघर्ष का अंत हुआ था.

सुषमा और समीर दोनों खुश थे, बहुत खुश. एकदूसरे को पा  कर उन्हें दुनिया की तमाम खुशियां नसीब हो गई थीं.

प्यार और खुशी में दिन कितनी जल्दी बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते 1 साल बीत गया और आज सुषमा की शादी की पहली सालगिरह थी. दोनों के दोस्तों के साथ उन के घर वाले भी शादी की सालगिरह पर आए थे.

घर में अच्छीखासी रौनक थी. घरआंगन बिजली की रोशनी से ऐसा सजा था जैसे  घर में शादी हो.

सुषमा के घर वालों ने जब यह साजोसिंगार देखा तो उन का मुंह खुला का खुला रह गया और छोटी बहन जया अपनी मां से बोली, ‘‘मां, दीदी को इतना सबकुछ करने की क्या जरूरत थी. अरे, शादी की सालगिरह है, कोई दीदी की  शादी तो नहीं.’’

सुषमा की मां बोलीं, ‘‘हमें क्या, पैसा उन दोनों का है, जैसे चाहें खर्च करें.’’

शादी की पहली सालगिरह बड़ी धूमधाम से मनी. जब सभी लोग चले गए तब सुषमा ने अपनी मां से आ कर पूछा, ‘‘मां, तुम खुश तो हो न, अपनी बेटी का यह सुख देख कर?’’

‘‘हां, खुश तो हूं बेटी. तेरा जीवन तो सुखमय हो गया, पर प्रिया और सचिन के बारे में सोच कर रोना आता है. उन दोनों बिन बाप के बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘मां, तुम ऐसा क्यों सोचती हो. मैं हूं न, उन दोनों को देखने वाली. तुम्हारे दामादजी भी बहुत अच्छे हैं. मैं जैसा कहती हूं वह वैसा ही करते हैं. जब मैं ने एक बहन की शादी कर दी तो दूसरी की भी कर दूंगी. और हां, सचिन की भी तो अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गई है.’’

‘‘हां, पूरी हो तो गई है, लेकिन कहीं नौकरी लगे तब न.’’

‘‘मां, तुम घबराओ नहीं, हम कोशिश करेंगे कि उस की नौकरी जल्दी लग जाए.’’

‘‘सुषमा, हमें तो बस, एक तेरा ही सहारा है बेटी. जब तू हमें छोड़ कर चली आई तो हम अपने को अनाथ समझने लगे हैं.’’

अभी सुषमा और मां बातें कर ही रहे थे कि समीर आ गया. वह हंसते हुए बोला, ‘‘क्यों सुसु, आज मां आ गईं तो मुझे भूल गईं. मैं कब से तुम्हारा खाने पर इंतजार कर रहा हूं.’’

मां की ओर देख कर सुषमा बोली, ‘‘मां, अब तुम सो जाओ. रात काफी बीत गई है. हम भी खाना खा कर सोएंगे. सुबह हमें कालिज जाना है.’’

सुषमा जब कमरे में आई तो समीर थाली सजाए उस का इंतजार कर रहा था, ‘‘सुसु, कितनी देर लगा दी आने में. यहां मैं तुम्हारे इंतजार में बैठा पागल हो रहा था. थोड़ी देर तुम और नहीं आतीं तो मेरा तो दम ही निकल जाता.’’

‘‘समीर, आज के दिन ऐसी अशुभ बातें तो न कहो.’’

‘‘ठीक है, अब हम शुभशुभ ही बातें करेंगे. पहले तुम आओ तो मेरे पास.’’

‘‘समीर, हमारी शादी को 1 साल बीत गया है लेकिन तुम्हारा प्यार थोड़ा भी कम नहीं हुआ, बल्कि पहले से और बढ़ गया है.’’

‘‘फिर तुम मेरे इस बढ़े हुए प्यार का आज के दिन कुछ तो इनाम दोगी.’’

‘‘बिलकुल नहीं, अब आप सो जाइए. सुबह मुझे कालिज जल्दी जाना है.’’

‘‘सुसु, अभी मैं सोने के मूड में नहीं हूं. अभी तो पूरी रात बाकी है,’’ वह मुसकराता हुआ बोला.

सुबह सुषमा जल्दी तैयार हो गई और कालिज जाते समय मां से बोली, ‘‘मां, मैं दोपहर में आऊंगी, तब तुम जाना.’’

‘‘नहीं, सुषमा, मैं भी अभी निकलूंगी. पर तुझ से एक बात कहनी थी.’’

‘‘हां मां, बोलो.’’

‘‘प्रिया का एम.ए. में दाखिला करवाना है. अगर 5 हजार रुपए दे देतीं तो बेटी, उस का दाखिला हो जाता.’’

‘‘ठीक है मां, मैं किसी से पैसे भिजवा दूंगी.’’

‘‘सुषमा, एक तेरा ही सहारा है बेटी, मैं  तुझ से एक बात और कहना चाहती हूं कि ज्यादा  फुजूलखर्ची मत किया कर.’’

‘‘मां, तुम्हें तो पता है कि मैं ने बचपन से ले कर 1 साल पहले तक कितना संघर्ष किया है. जब पिताजी का साया हमारे सिर से उठ गया था तब से ही मैं ने घर चलाने, खुद पढ़ने और भाईबहनों को पढ़ाने के लिए क्याक्या नहीं किया. अब क्या मैं अपनी खुशी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?’’

‘‘मैं ऐसा तो नहीं कह रही हूं. फिर भी पैसे बचा कर चल. हमें भी तो देखने वाला कोई नहीं है.’’

आज सुबह ही जया का फोन आया कि दीदी, आज मंटू का जन्मदिन है. तुम और जीजाजी जरूर आना.

‘‘ हां, आऊंगी.’’

‘‘और हां, दीदी, एक बात तुम से कहनी थी. तुम ने अपनी फें्रड की शादी में जो साड़ी पहनी थी वह बहुत सुंदर लग रही थी. दीदी, मेरे लिए भी एक वैसी ही साड़ी लेती आना, प्लीज.’’

‘‘ठीक है, बाजार जाऊंगी तो देखूंगी.’’

‘‘दीदी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां, बोलो.’’

‘‘तुम अपनी वाली साड़ी ही मुझे दे दो.’’

‘‘जया, वह तुम्हारे जीजाजी की पसंद की साड़ी है.’’

‘‘तो क्या हुआ. अब तुम्हारी उम्र तो वैसी चमकदमक वाली साड़ी पहनने की नहीं है.’’

‘‘जया, मेरी उम्र को क्या हुआ है. मैं तुम से 5 साल ही तो बड़ी हूं.’’

यह सुनते ही जया ने गुस्से में फोन रख दिया और सुषमा फोन का रिसीवर हाथ में लिए सोचने लगी थी.

दुनिया कितनी स्वार्थी है. सब अपने बारे में ही सोचते हैं. चाहे वह मेरी अपनी मां, भाईबहन ही क्यों न हों. मैं ने सभी के लिए कितना कुछ किया है और आज भी जिसे जो जरूरत होती है पूरी कर रही हूं. फिर भी किसी को मेरी खुशी सुहाती नहीं. जब मैं ने शादी का फैसला किया था तब भी घर वालों ने कितना विरोध किया था. कोई नहीं चाहता था कि मैं अपना घर बसाऊं. वह तो बस, समीर थे जिन्होंने मुझे अपने प्यार में इतना बांध लिया कि मैंउन के बगैर रहने की सोच भी नहीं सकती थी.

सुषमा की आंखों में आंसू झिल- मिलाने लगे थे. समीर पीछे से आ कर बोले, ‘‘जानेमन, इतनी देर से आखिर किस से बातें हो रही थीं.’’

‘‘जया का फोन था. समीर, आज उस के बेटे का जन्मदिन है.’’

‘‘तो ठीक है, शाम को चलेंगे दावत खाने…और हां, तुम वह नीली वाली साड़ी शाम को पार्टी में  पहनना. उस दिन जब तुम ने वह साड़ी पहनी थी तो बहुत सुंदर लग रही थीं. बिलकुल फिल्म की हीरोइन की तरह.’’

‘‘समीर, लेकिन वह साड़ी तो जया मांग रही है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, वैसे मैं ने उस से कहा है कि वह आप की पसंद की साड़ी है.’’

‘‘तुम पार्टी में जाने के लिए कोई दूसरी साड़ी पहन लेना और वह साड़ी उसे दे देना, आखिर वह तुम्हारी बहन है.’’

‘‘समीर, तुम कितने अच्छे हो.’’

‘‘हां, वह तो मैं हूं, लेकिन इतना भी अच्छा नहीं कि नाश्ते के बगैर कालिज जाने की सोचूं.’’

सुषमा और समीर एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. दोनों के विचार एक थे. भावनाएं एक थीं.

एक दिन सुषमा का भाई सचिन आया और बोला, ‘‘दीदी, मुझे कुछ रुपए चाहिए.’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘शहर से बाहर एकदो जगह नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना है.’’

‘‘कितने रुपए  लगेंगे?’’

‘‘10 हजार रुपए दे दो.’’

‘‘इतने रुपए का क्या करोगे सचिन?’’

‘‘दीदी,  इंटरव्यू देने के लिए अच्छे कपड़े, जूते भी तो चाहिए. मेरे पास अच्छे कपड़े नहीं हैं.’’

‘‘सचिन, अभी मैं इतने रुपए तुम्हें नहीं दे सकती. तुम्हारे जीजाजी की बहुत इच्छा है कि हम शिमला जाएं. शादी के बाद हम कहीं गए नहीं थे न.’’

‘‘दीदी,  तुम्हारी  शादी हो गई वही बहुत है. अब इस उम्र में घूमना, टहलना ये सब बेकार के चोचले हैं. मुझे पैसे की जरूरत है, वह तो तुम दे नहीं सकतीं और यह फालतू का खर्च करने को तैयार हो.’’

‘‘सचिन, क्या हम अपनी खुशी के लिए कुछ नहीं कर सकते. अरे, इतने दिनों से तो मैं तुम लोगों के लिए ही करती आई हूं और जब अपनी खुशी के लिए अब करना चाहती हूं तो बातबात पर तुम लोग मुझे मेरी उम्र का एहसास दिलाते हो.

‘‘सचिन, प्यार की कोई उम्र नहीं होती. वह तो हर उम्र में हो सकता है. जब मैं खुश हूं, समीर खुश हैं तो तुम लोग क्यों दुखी हो?’’

समीर उस दिन अचानक जिद कर बैठे कि सुसु, आज मैं अपने ससुराल जाना चाहता हूं.

‘‘क्यों जी, क्या बात है?’’

‘‘अरे, आज छुट्टी है. तुम्हारे घर के सभी लोग घर पर ही होंगे. फिर जया भी तो आई होगी. और हां, नए मेहमान के आने की खुशखबरी अपने घर वालों को नहीं सुनाओगी?’’

‘‘ठीक है, अगर तुम्हारी इच्छा है तो चलते हैं, तुम्हारे ससुराल,’’ सुषमा मुसकरा दी थी.

सुषमा आज काफी सजधज कर मायके आई थी. लाल रंग की साड़ी से मेल खाता ब्लाउज और उसी रंग की बड़ी सी बिंदी अपने माथे पर  लगा रखी थी. उस ने सोने के गहनों से अपने को सजा लिया था.

मां उसे देख कर मुसकरा दीं, ‘‘क्या बात है, आज तू बड़ी सज कर आई है.’’

अभी सुषमा कुछ कहना चाह रही थी कि प्रिया बोली, ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.’’

प्रिया की बातें सुन कर सुषमा का खून खौल उठा पर वह कुछ बोली नहीं.

मां ने आदर के साथ बेटी को बिठाया और दामादजी से हाल समाचार पूछे.

सुषमा बोली, ‘‘मां, खुशखबरी है. तुम नानी बनने वाली हो.’’

मां यह सुन कर बोलीं, ‘‘चलो, ठीक है. एक बच्चा हो जाए. फिर अपना दुखड़ा रोने लगीं कि सचिन की नौकरी के लिए 50 हजार रुपए चाहिए. बेटी, अगर तुम दे देतीं तो…’’

सुषमा बौखला उठी. मां की बात बीच में काट कर बोली, ‘‘मां, अब और नहीं, अब बहुत हो गया. मुझे जितना करना था कर दिया. अब सब बड़े हो गए हैं और वे अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं. मैं आखिर कब तक इस घर को देखती रहूंगी.

‘‘मैं  जब 12 साल की थी तब से ही तुम लोगों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ढो रही हूं. रातरात भर जाग कर मैं एकएक पैसे के लिए काम करती थी. फिर सभी को इस योग्य बना दिया कि वे अपनी जिम्मेदारियां खुद उठा सकें.

‘‘अब मेरा भी अपना परिवार है. पति हैं, और अब घर में एक और सदस्य भी आने वाला है. मैं अब तुम सब के लिए करतेकरते थक गई हूं मां. अब मैं जीना चाहती हूं, अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी खुशी के लिए.

‘‘जिंदगी की  खूबसूरत 40 बहारें मैं ने यों ही गंवा दीं, अब और नहीं. मेरे जीवन के पतझड़ का अंत हो गया है. अब मैं खुश हूं, बहुत खुश.’’

Family Story : रिटायरमेंट – आखिर क्या चाहते थे शर्मा जी के लालची रिश्तेदार

Family Story : मेरी नौकरी का अंतिम सप्ताह था, क्योंकि मैं सेवानिवृत्त होने वाला था. कारखाने के नियमानुसार 60 साल पूरे होते ही घर बैठने का हुक्म होना था.

मेरा जन्मदिन भी 2 अक्तूबर ही था. संयोगवश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन पर.

विभागीय सहयोगियों व कर्मचारियों ने कहा, ‘‘शर्माजी, 60 साल की उम्र तक ठीकठाक काम कर के रिटायर होने के बदले में हमें जायकेदार भोज देना होगा.’’

मैं ने भरोसा दिया, ‘‘आप सब निश्ंिचत रहें. मुंह अवश्य मीठा कराऊंगा.’’

इस पर कुछ ने विरोध प्रकट किया, ‘‘शर्माजी, बात स्पष्ट कीजिए, गोलमोल नहीं. हम ‘जायकेदार भोज’ की बात कर रहे हैं और आप मुंह मीठा कराने की. आप मांसाहारी भोज देंगे या नहीं? यानी गोश्त, पुलाव…’’

मैं ने मुकरना चाहा, ‘‘आप जानते हैं कि गांधीजी सत्य व अहिंसा के पुजारी थे, और हिंसा के खिलाफ मैं भी हूं. मांसाहार तो एकदम नहीं,’’ एक पल रुक कर मैं ने फिर कहा, ‘‘पिछले साल झारखंड के कुछ मंत्रियों ने 2 अक्तूबर के दिन बकरे का मांस खाया था तो उस पर बहुत बवाल हुआ था.’’

‘‘आप मंत्री तो नहीं हैं न. कारखाने में मात्र सीनियर चार्जमैन हैं,’’ एक सहकर्मी ने कहा.

‘‘पर सत्यअहिंसा का समर्थक तो हूं मैं.’’

फिर कुछ सहयोगी बौखलाए, ‘‘शर्माजी, हम भोज के  नाम पर ‘सागपात’ नहीं खा सकते. आप के घर ‘आलूबैगन’ खाने नहीं जाएंगे,’’ इस के बाद तो गीदड़ों के झुंड की तरह सब एकसाथ बोलने लगे, ‘‘शर्माजी, हम चंदा जमा कर आप के शानदार विदाई समारोह का आयोजन करेंगे.’’

प्रवीण ने हमें झटका देना चाहा, ‘‘हम सब आप को भेंट दे कर संतुष्ट करना चाहेंगे. भले ही आप हमें संतुष्ट करें या न करें.’’

मैं दबाव में आ कर सोचने लगा कि क्या कहूं? क्या खिलाऊं? क्या वादा करूं? प्रत्यक्ष में उन्हें भरोसा दिलाना चाहा कि आप सब मेरे घर आएं, महंगी मिठाइयां खिलाऊंगा. आधाआधा किलो का पैकेट सब को दे कर विदा करूंगा.

सीनियर अफसर गुप्ता ने रास्ता सुझाना चाहा, ‘‘मुरगा न खिलाइए शर्माजी पर शराब तो पिला ही सकते हैं. इस में हिंसा कहां है?’’

‘‘हां, हां, यह चलेगा,’’ सब ने एक स्वर से समर्थन किया.

‘‘मैं शराब नहीं पीता.’’

‘‘हम सब पीते हैं न, आप अपनी इच्छा हम पर क्यों लादना चाहते हैं?’’

‘‘भाई लोगों, मैं ने कहा न कि 2 अक्तूबर हो या नवरात्रे, दीवाली हो या नववर्ष…मुरगा व शराब न मैं खातापीता हूं, न दूसरों को खिलातापिलाता हूं.’’

सुखविंदर ने मायूस हो कर कहा, ‘‘तो क्या 35-40 साल का साथ सूखा ही निबटेगा?’’

कुछ ने रोष जताया, ‘‘क्या इसीलिए इतने सालों तक आप के मातहत काम किया? आप के प्रोत्साहन से ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया? कैसे चार्जमैन हैं आप कि हमारी अदनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते?’’

एक ने व्यंग्य किया, ‘‘तो कोई मुजरे वाली ही बुला लीजिए, उसी से मन बहला लेंगे.’’

नटवर ने विचार रखा, ‘‘शर्माजी, जितने रुपए आप हम पर खर्च करना चाह रहे हैं उतने हमें दे दीजिए, हम किसी होटल में अपनी व्यवस्था कर लेंगे.’’

इस सारी चर्चा से कुछ नतीजा न निकलना था न निकला.

यह बात मेरे इकलौते बेटे बलबीर के पास भी पहुंची. वह बगल वाले विभाग में बतौर प्रशिक्षु काम कर रहा था.

कुछ ने बलबीर को बहकाया, ‘‘क्या कमी है तुम्हारे पिताजी को जो खर्च के नाम से भाग रहे हैं. रिटायर हो रहे हैं. फंड के लाखों मिलेंगे… पी.एफ. ‘तगड़ा’ कटता है. वेतन भी 5 अंकों में है. हम उन्हें विदाई देंगे तो उन की ओर से हमारी शानदार पार्टी होनी चाहिए. घास छील कर तो रिटायर नहीं हो रहे. बुढ़ापे के साथ ‘साठा से पाठा’ होना चाहिए. वे तो ‘गुड़ का लाठा’ हो रहे हैं…तुम कैसे बेटे हो?’’

बलबीर तमतमाया हुआ घर आया. मैं लौट कर स्नान कर रहा था. बेटा मुझे समझाने के मूड में बोला, ‘‘बाबूजी, विभाग वाले 50-50 रुपए प्रति व्यक्ति चंदा जमा कर के ‘विदाई समारोह’ का आयोजन करेंगे तो वे चाहेंगे कि उन्हें 75-100 रुपए का जायकेदार भोज मिले. आप सिर्फ मिठाइयां और समोसे खिला कर उन्हें टरकाना चाहते हैं. इस तरह आप की तो बदनामी होगी ही, वे मुझे भी बदनाम करेंगे.

‘‘आप तो रिटायर हो कर घर में बैठ जाएंगे पर मुझे वहीं काम करना है. सोचिए, मैं कैसे उन्हें हर रोज मुंह दिखाऊंगा? मुझे 10 हजार रुपए दीजिए, खिलापिला कर उन्हें संतुष्ट कर दूंगा.’’

‘‘उन की संतुष्टि के लिए क्या मुझे अपनी आत्मा के खिलाफ जाना होगा? मैं मुरगे, बकरे नहीं कटवा सकता,’’ बेटे पर बिगड़ते हुए मैं ने कहा.

‘‘बाबूजी, आप मांसाहार के खिलाफ हैं, मैं नहीं.’’

‘‘तो क्या तुम उन की खुशी के लिए मद्यपान करोगे?’’

‘‘नहीं, पर मुरगा तो खा ही सकता हूं.’’

अपना विरोध जताते हुए मैं बोला, ‘‘बलबीर, अधिक खर्च करने के पक्ष में मैं नहीं हूं. सब खाएंगेपीएंगे, बाद में कोई पूछने भी नहीं आएगा. मैं जब 4 महीने बीमारी से अनफिट था तो 1-2 के अलावा कौन आया था मेरा हाल पूछने? मानवता और श्रद्धा तो लोगों में खत्म हो गई है.’’

पत्नी कमला वहीं थी. झुंझलाई, ‘‘आप दिल खोल कर और जम कर कुछ नहीं कर पाते. मन मार कर खुश रहने से भी पीछे रह जाते हैं.’’

कमला का समर्थन न पा कर मैं झुंझलाया, ‘‘श्रीमतीजी, मैं ने आप को कब खुश नहीं किया है?’’

वे मौका पाते ही उलाहना ठोक बैठीं, ‘‘कई बार कह चुकी हूं कि  मेरा गला मंगलसूत्र के बिना सूना पड़ा है. रिटायरमेंट के बाद फंड के रुपए मिलते ही 5 तोले का मंगलसूत्र और 10 तोले की 4-4 चूडि़यां खरीद देना.’’

‘‘श्रीमतीजी, सोने का भाव बाढ़ के पानी की तरह हर दिन बढ़ता जा रहा है. आप की इच्छा पूरी करूं तो लाखों अंटी से निकल जाएंगे, फिर घर चलाना मुश्किल होगा.’’

श्रीमतीजी बिगड़ कर बोलीं, ‘‘तो बताइए, मैं कैसे आप से खुश रहूंगी?’’

बलबीर को अवसर मिल गया. वह बोला, ‘‘बाबूजी, अब आप जीवनस्तर ऊंचा करने की सोचिए. कुछ दिन लूना चलाते रहे. मेरी जिद पर स्कूटी खरीद लाए. अब एक बड़ी कार ले ही लीजिए. संयोग से आप देश की नामी कार कंपनी से अवकाश प्राप्त कर रहे हैं.’’

बेटे और पत्नी की मांग से मैं हतप्रभ रह गया.

मैं सोने का उपक्रम कर रहा था कि बलबीर ने अपनी रागनी शुरू कर दी, ‘‘बाबूजी, खर्च के बारे में क्या सोच रहे हैं?’’

मैं ने अपने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम अभी स्थायी नौकरी में नहीं हो. प्रशिक्षण के बाद तुम्हें प्रबंधन की कृपा से अस्थायी नौकरी मिल सकेगी. पता नहीं तुम कब तक स्थायी होगे. तब तक मुझे ही घर का और तुम्हारा भी खर्च उठाना होगा. इसलिए भविष्यनिधि से जो रुपए मिलेंगे उसे ‘ब्याज’ के लिए बैंक में जमा कर दूंगा, क्योंकि आगे ब्याज से ही मुझे अपना ‘खर्च’ चलाना होगा. अत: मैं ने अपनी भविष्यनिधि के पैसों को सुरक्षित रखने की सोची है.’’

श्रीमतीजी संभावना जाहिर कर गईं कि 20 लाख रुपए तक तो आप को मिल ही जाएंगे. अच्छाखासा ब्याज मिलेगा बैंक से.

उन के इस मुगालते को तोड़ने के लिए मैं ने कहा, ‘‘भूल गई हो, 3 बेटियों के ब्याह में भविष्यनिधि से ऋण लिया था. कुछ दूसरे ऋण काट कर 12 लाख रुपए ही मिलेंगे. वैसे भी अब दुनिया भर में आर्थिक संकट पैदा हो चुका है, इसलिए ब्याज घट भी सकता है.’’

बलबीर ने टोका, ‘‘बाबूजी, आप को रुपए की कमी तो है नहीं. आप ने 10 लाख रुपए अलगअलग म्यूचुअल फं डों में लगाए हुए हैं.’’

मैं आवेशित हुआ, ‘‘अखबार नहीं पढ़ते क्या? सब शेयरों के भाव लुढ़कते जा रहे हैं. उस पर म्यूचुअल फंडों का बुराहाल है. निवेश किए हुए रुपए वापस मिलेंगे भी या नहीं? उस संशय से मैं भयभीत हूं. रिटायर होने के बाद मैं रुपए कमाने योग्य नहीं रहूंगा. बैठ कर क्या करूंगा? कैसे समय बीतेगा. चिंता, भय से नींद भी नहीं आती…’’

श्रीमतीजी ने मेरे दर्द और चिंता को महसूस किया, ‘‘चिंतित मत होइए. हर आदमी को रिटायर होना पड़ता है. चिंताओं के फन को दबोचिए. उस के डंक से बचिए.’’

‘‘देखो, मैं स्वयं को संभाल पाता हूं या नहीं?’’

तभी फोन की घंटी बजी, ‘‘हैलो, मैं विजय बोल रहा हूं.’’

‘‘नमस्कार, विजय बाबू.’’

‘‘शर्माजी, सुना है, आप रिटायर होने जा रहे हैं.’’

‘‘हां.’’

‘‘कुछ करने का विचार है या बैठे रहने का?’’ विजय ने पूछा.

‘‘कुछ सोचा नहीं है.’’

‘‘मेरी तरह कुछ करने की सोचो. बेकार बैठ कर ऊब जाओगे.’’

‘‘मेरे पिता ने भी सेवामुक्त हो कर ‘बिजनेस’ का मन बनाया था, पर नहीं कर सके. शायद मैं भी नहीं कर सकूंगा, क्यों जहां भी हाथ डाला, खाली हो गया.’’

विजय की हंसी गूंजी, ‘‘हिम्मत रखो. टाटा मोटर्स में ठेका पाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराओ. एकाध लाख लगेंगे.’’

बलबीर उत्साहित स्वर में बोला, ‘‘ठेका ले कर देखिए, बाबूजी.’’

‘‘बेटा, मैं भविष्यनिधि की रकम को डुबाने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता.’’

बलबीर जिद पर उतर आया तो मैं बोला, ‘‘तुम्हारे कहने पर मैं ने ट्रांसपोर्ट का कारोबार किया था न? 7 लाख रुपए डूब गए थे. तब मैं तंगी, परेशानी और खालीहाथ से गुजरने लगा था. फ ांके की नौबत आ गई थी.’’

बलबीर शांत पड़ गया, मानो उस की हवा निकल गई हो.

तभी मोबाइल बजने लगा. पटना से रंजन का फोन था. आवाज कानों में पड़ी तो मुंह का स्वाद कसैला हो गया. रंजन मेरा चचेरा भाई था. उस ने गांव का पुश्तैनी मकान पड़ोसी पंडितजी के हाथ गिरवी रख छोड़ा था. उस की एवज में 50 हजार रुपए ले रखे थे.

पहले मैं रंजन को अपना भाई मानता था पर जब उस ने धोखा किया, मेरा मन टूट गया था.

‘‘रंजन बोल रहा हूं भैया, प्रणाम.’’

‘‘खुश रहो.’’

‘‘सुना है आप रिटायर होने वाले हैं? एक प्रार्थना है. पंडितजी के रुपए चुका कर मकान छुड़ा लीजिए न. 20 हजार रुपए ब्याज भी चढ़ चुका है. न चुकाने से मकान हाथ से निकल जाएगा. मेरे पास रुपए नहीं हैं. पटना में मकान बनाने से मैं कर्जदार हो चुका हूं. कुछ सहायता कीजिएगा तो आभारी रहूंगा.’’

मैं क्रोध से तिलमिलाया, ‘‘कुछ करने से पहले मुझ से पूछा था क्या? सलाह भी नहीं ली. पंडितजी का कर्ज तुम भरो. मुझे क्यों कह रहे हो?’’

मोबाइल बंद हो गया. इच्छा हुई कि उसे और खरीखोटी सुनाऊं. गुस्से में बड़बड़ाता रहा, ‘‘स्वार्थी…हमारे हिस्से को भी गिरवी रख दिया और रुपए ले गया. अब चाहता है कि मैं फंड के रुपए लगा दूं? मुझे सुख से जीने नहीं देना चाहता?’’

‘‘शांत हो जाइए, नहीं तो ब्लडप्रेशर बढे़गा,’’ कमला ने मुझे शांत करना चाहा.

सुबह कारखाने पहुंचा तो जवारी- भाई रामलोचन मिल गए, बोले, ‘‘रिटायरमेंट के बाद गांव जाने की तो नहीं सोच रहे हो न? बड़ा गंदा माहौल हो गया है गांव का. खूब राजनीति होती है. तुम्हारा खाना चाहेंगे और तुम्हें ही बेवकूफ बनाएंगे. रामबाबू रिटायरमेंट के बाद गांव गए थे, भाग कर उन्हें वापस आना पड़ा. अपहरण होतेहोते बचा. लाख रुपए की मांग कर रहे थे रणबीर दल वाले.’’

सीनियर अफसर गुप्ताजी मिल गए. बोले, ‘‘कल आप की नौकरी का आखिरी दिन है. सब को लड्डू खिला दीजिएगा. आप के विदाई समारोह का आयोजन शायद विभाग वाले दशहरे के बाद करेंगे.’’

कमला ने भी घर से निकलते समय कहा था, ‘‘लड्डू बांट दीजिएगा.’’

बलबीर भी जिद पर आया, ‘‘मैं भी अपने विभाग वालों को लड्डू खिलाऊंगा.’’

‘‘तुम क्यों? रिटायर तो मैं होने वाला हूं.’’

वह हंसते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, रिटायरमेंट को खुशी से लीजिए. खुशियां बांटिए और बटोरिए. कुछ मुझे और कुछ बहनबेटियों को दीजिए.’’

मुझे क्रोध आया, ‘‘तो क्या पैसे बांट कर अपना हाथ खाली कर लूं? मुझे कम पड़ेगा तो कोई देने नहीं आएगा. हां, मैं बहनबेटियों को जरूर कुछ गिफ्ट दूंगा. ऐसा नहीं कि मैं वरिष्ठ नागरिक होते ही ‘अशिष्ट’ सिद्ध होऊं. पर शिष्ट होने के लिए अपने को नष्ट नहीं करूंगा.’’

मैं सोचने लगा कि अपने ही विभाग का वेणुगोपाल पैसों के अभाव का रोना रो कर 5 हजार रुपए ले गया था, अब वापस करने की स्थिति में नहीं है. उस के बेटीदामाद ने मुकदमा ठोका हुआ है कि उन्हें उस की भविष्यनिधि से हिस्सा चाहिए.

रामलाल भी एक अवकाश प्राप्त व्यक्ति थे. एक दिन आए और गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘शर्माजी, रिटायर होने के बाद मैं कंगाल हो गया हूं. बेटों के लिए मकान बनाया. अब उन्होंने घर से बाहर कर दिया है. 15 हजार रुपए दे दीजिए. गायभैंस का धंधा करूंगा. दूध बेच कर वापस कर दूंगा.’’

रिटायर होने के बाद मैं घर बैठ गया. 10 दिन बीत गए. न विदाई समारोह का आयोजन हुआ, न विभाग से कोई मिलने आया. मैं ने गेटपास जमा कर दिया था. कारखाने के अंदर जाना भी मुश्किल था. समय के साथ विभाग वाले भूल गए कि विदाई की रस्म भी पूरी करनी है.

एक दिन विजय आया. उलाहने भरे स्वर में बोला, ‘‘यार, तुम ने मुझे किसी आयोजन में नहीं बुलाया?’’

मैं दुखी स्वर में बोला, ‘‘क्षमा करना मित्र, रिटायर होने के बाद कोई मुझे पूछने नहीं आया. विभाग वाले भी विभाग के काम में लग कर भूल गए…जैसे सारे नाते टूट गए हों.’’

कमला ताने दे बैठी, ‘‘बड़े लालायित थे आधाआधा किलो के पैकेट देने के लिए…’’

बलबीर को अवसर मिला. बोला, ‘‘मांसाहारी भोज से इनकार कर गए, अत: सब का मोहभंग हो गया. अब आशा भी मत रखिए…आप को पता है, मंदी का दौर पूरी दुनिया में है. उस का असर भारत के कारखानों पर भी पड़ा है. कुछ अनस्किल्ड मजदूरों की छंटनी कर दी गई है. मजदूरों को चंदा देना भारी पड़ रहा है. वैसे भी जिस विभाग का प्रतिनिधि चंदा उगाहने में माहिर न हो, काम से भागने वाला हो और विभागीय आयोजनों पर ध्यान न दे, वह कुछ नहीं कर सकता.’’

विजय ने कहा, ‘‘यार, शर्मा, घर में बैठने के बाद कौन पूछता है? वह जमाना बीत गया कि लोगों के अंदर प्यार होता था, हमदर्दी होती थी. रिटायर व्यक्ति को हाथी पर बैठा कर, फूलमाला पहना कर घर तक लाया जाता था. अब लोग यह सोचते हैं कि उन का कितना खर्च हुआ और बदले में उन्हें कितना मिला. मुरगाशराब खिलातेपिलाते तो भी एकदो माह के बाद कोई पूछने नहीं आता. सचाई यह है कि रिटायर व्यक्ति को सब बेकार समझ लेते हैं और भाव नहीं देते.’’

मैं कसमसा कर शांत हो गया…घर में बैठने का दंश सहने लगा.

Family Story : काश – क्या मालती प्रायश्चित्त कर सकी?

Family Story, लेखक- कमल कपूर

‘‘यह लीजिए, ताई मम्मा, आज की आखिरी खुराक और ध्यान से सुनिए, नो अचार, नो चटनी और नो ठंडा पानी, तभी ठीक होगी आप की खांसी. अब आप सो जाइए,’’ बल्ब बंद कर श्रेया ने ‘गुड नाइट’ कहा और कमरे से बाहर निकल गई.

‘‘बहुत लंबी उम्र पाओ, सदा सुखी रहो बेटा,’’ ये ताई मम्मा के दिल से निकले शब्द थे. आंखें मूंद कर वह सोने की कोशिश करने लगीं लेकिन न जाने क्यों आज नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी. मन बेलगाम घोड़े सा सरपट अतीत की ओर भागा जा रहा था और ठहरा तो उस पड़ाव पर जहां से वर्षों पहले उन का सुखद गृहस्थ जीवन शुरू हुआ था.

मालती इस घर की बहू बन कर जब आई थी तो बस, 3 सदस्यों का परिवार था और चौथी वह आ गई थी, जिसे घरभर ने स्नेहसम्मान के साथ स्वीकारा था. सास यों लाड़ लड़ातीं जैसे वह बहू नहीं इकलौती दुलारी बेटी हो. छोटे भाई सा उस का देवर अक्षय भाभीभाभी कहता उस के आगेपीछे डोलता और पति अभय के दिल की तो मानो वह महारानी ही थी.

मालती की एक मांग उठती तो घर के तीनों सदस्य जीजान से उसे पूरा करने में जुट जाते और फिर स्वयं अपने ही पर वह इतरा उठती. सोने पर सुहागे की तरह 4 सालों में 2 प्यारे बेटों अनुज और अमन को जन्म दे कर तो मानो मालती ने किला ही फतह कर लिया.

दोनों बेटों के जन्म के उत्सव किसी शादीब्याह के जैसे ही मनाए गए थे. राज कर रही थी मालती, घर पर भी और घर वालों के दिलों में भी. ‘स्वर्ग किसे कहते हैं? यही तो है मेरी धरती का स्वर्ग’ मालती अकसर सोचती.

अक्षय ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही लड़की पसंद कर ली थी और नौकरी लगते ही उसे ला कर मां और भाईभाभी के सामने खड़ा कर दिया. जब इन दोनों ने कोई एतराज नहीं किया तो भला वह कौन होती थी विरोध करने वाली. इस तरह शगुन देवरानी बन कर इस घर में आई तो मालती को पहली बार लगा कि उस का एकछत्र ऊंचा सिंहासन डोलने लगा है.

शगुन देखने में जितनी खूबसूरत थी उतना ही खूबसूरत उस का विनम्र स्वभाव भी था. ऊपर से वह कमाऊ भी थी. अक्षय के साथ ही काम करती थी और उस के बराबर ही कमाती थी. इतने गुणों के बावजूद अभिमान से वह एकदम अछूती थी. देवरानी के यह तमाम गुण मालती के सीने में कांटे बन कर चुभते थे और उस के मन में हीनगं्रथियां पनपाते थे.

मालती के निरंकुश शासन को चुनौती देने शगुन आ पहुंची थी जो उसे ‘खलनायिका’ की तरह लगती थी. ‘शगुन…’ मां की इस पुकार पर जब वह काम छोड़ कर भागी आती तो मालती जल कर खाक हो जाती. अक्षय जो बच्चों की तरह हरदम ‘भाभी ये दो, भाभी वो दो,’ के गीत गाता उस के आगेपीछे घूमता और अपनी हर छोटीबड़ी जरूरत के लिए उसे ही पुकारता था, अब शगुन पर निर्भर हो गया था. हां, पति अब भी उस के ‘अपने’ ही थे, लेकिन जब मालती शगुन के साथ मुकाबला करती या उसे नीचा दिखाने की कोशिश करती तो अभय समझाते, ‘मालू, शगुन के साथ छोटी बहन की तरह आचरण करो तभी इज्जत पाओगी.’ तब वह कितना भड़कती थी और शगुन का सारा गुस्सा अभय पर निकालती थी. शगुन के प्रति मालती का कटु व्यवहार मां को भी बेहद अखरता था, मगर वह खामोश रह कर अपनी  नाराजगी जताती थीं क्योंकि लड़ना- झगड़ना या तेज बोलना मांजी के स्वभाव में शामिल नहीं था.

शगुन, अनुज और अमन को भी बहुत प्यार करती थी. वे दोनों भी ‘चाचीचाची’ की रट लगाए उस के इर्दगिर्द मंडराते. लेकिन यह सबकुछ भी मालती को कब भाया था? कभी झिड़क कर तो कभी थप्पड़ मार कर वह बच्चों को जता ही देती कि उसे चाची से उन का मेलजोल बढ़ाना पसंद नहीं. बच्चे भी धीरेधीरे पीछे हट गए.

फिर साल भर बाद ही शगुन भी मां बन गई, एक प्यारी सी गोलमटोल बेटी को जन्म दे कर. पहली बार मालती ने चैन की सांस ली. उसे लगा कि बेटी को जन्म दे कर शगुन उस से एक कदम पीछे और एक पद नीचे हो गई है. लेकिन यह मालती का बड़ा भारी भ्रम था. 3 पीढि़यों के बाद इस घर में बेटी आई थी, जिसे मांजी ने पलकों पर सजाया और शगुन को दुलार कर ‘धन्यवाद’ भी दिया. मां और अक्षय ही नहीं अभय भी बहुत खुश थे. उतना ही भव्य नामकरण हुआ जितना अनुज और अमन का हुआ था और उसे नाम दिया गया ‘श्रुति’, फिर 2 साल के बाद दूसरी बेटी श्रेया आ गई.

अक्षय की गुडि़या सी बेटियों में मांजी के प्राण बसते थे. लगभग यही हाल अभय का भी था. मालती से यह बरदाश्त नहीं होता था. वह अकसर चिढ़ कर बड़बड़ाती, ‘वंश तो बेटों से ही चलता है न. बेटियां तो पराया धन हैं, इन्हें इस तरह सिर पर धरोगे तो बिगडे़ंगी कि नहीं?’

उधर मालती के कटु वचनों का सिलसिला बढ़ता जा रहा था, इधर बच्चों में भी अनबन रहती. अकसर अनुजअमन के हाथों पिट कर श्रुति और श्रेया रोती हुईं दादी के पास आतीं तो शगुन बिना किसी को कोई दोष दिए बच्चियों को बहला लेती कि कोई बात नहीं बेटा, बड़े भैया लोग हैं न? लेकिन दादीमां से सहन नहीं होता. आखिर एक दिन तंग आ कर उन्होंने स्पष्ट घोषणा कर दी, ‘बस, अब समय आ गया है कि तुम दोनों भाइयों को अपने जीतेजी अलग कर दूं, नहीं तो किसी दिन किसी एक बच्ची का सिर फूटा होगा यहां.’

मां का फैसला मानो पत्थर की लकीर था और घर 2 बराबर हिस्सों में बंट गया. मां ने साफ शब्दों में मालती से कह दिया, ‘बड़ी बहू, तुम अपनी गृहस्थी संभालो. मैं अक्षय के पास रहूंगी. शगुन नौकरी पर जाती है और उस की बच्चियां बहुत छोटी हैं. अभी, उन्हें मेरी सख्त जरूरत है. हां, तुम्हें भी अगर कभी मेरी कोई खास जरूरत पड़े तो पुकार लेना, शौक से आऊंगी.’

मालती स्वतंत्र गृहस्थी पा कर बहुत खुश थी. लेकिन हर समय बड़बड़ाना उस की आदत में शुमार हो चुका था. अत: जबतब उच्च स्वर में सुनाती, ‘अरे, कर लो अपनी बेटियों पर नाज. उन के ब्याह के समय तो भाइयों के नेग पूरे करवाने के लिए मेरे बेटों को ही बुलाने आओगी न?’ या ‘बेटे के बिना तो ‘गति’ भी नहीं होती. बेटा ही तो चिता को आग देता है. खुश हो लो अभी…’

मालती की इन हरकतों की वजह से मांजी ने तो उस के साथ बातचीत ही बंद कर दी. शगुन ने भी पलट कर न तो कभी जेठानी को जवाब दिया और न ही झगड़ा किया. अपनी इसी विनम्रता के कारण तो वह सास और पति के मन में बसी थी. अभय भी उस की सराहना करते न थकते थे.

जीवन के बहीखाते से एकएक साल घटता गया और एकएक जुड़ता गया. एक घर के 2 हिस्सों में बच्चे पलबढ़ रहे थे. अनुज पढ़ाई और खेल में अच्छाखासा था जबकि अमन का ध्यान पढ़नेलिखने में था ही नहीं. उस के लिए एक क्लास में 2 साल लगाना आम बात थी. इधर श्रुति और श्रेया दोनों ही बेहद जहीन थीं. पढ़ाई में और व्यवहार में अति शालीन और शिष्ट. अक्षय, शगुन और मां ने उन्हें बेटों की तरह पाला था. वैसे भी यह तो सर्वविदित है कि ‘यथा मां तथा संतान’ कुछ इसी तरह के थे दोनों घरों के बच्चे. कब उन का बचपन बीता और कब यौवन की दहलीज पर उन्होंने कदम रखा, पता ही न चला.

फिर आए अप्रिय घटनाओं के साल जिन्होंने नएनए इतिहास लिखे. एक साल वह आया जब अनुज अपनी योग्यता के बलबूते पर ऊंचे पद पर नियुक्त हुआ और दूसरे साल बिना किसी की राय लिए उस ने एक एन.आर.आई. लड़की से ‘कोर्ट मैरिज’ कर ली. जरूरी औपचारिकताएं पूरी होते ही उस ने चंद महीने बाद ही सब को ‘गुडबाय’ कह कर कनाडा की ओर उड़ान भर ली.

तीसरे साल अमन अपने दोस्तों के साथ घूमने के लिए गोआ गया तो वहां से वापस ही नहीं आया. बाद में एक दोस्त ने घर आ कर मालती को अमन द्वारा एक क्रिश्चियन लड़की से प्रेम विवाह किए जाने के बारे में बताया, ‘आंटी, उस का नाम डेजी है. उस की आंखें नीलम जैसी नीली हैं, बाल सुनहले हैं और रंग दूध सा गोरा…पूरी अंगरेज लगती है वह. उस के पिता का पणजी में एक शानदार बियर बार है.’

इन तमाम बातों को सच साबित करने के लिए अमन का खत चला आया, ‘मां, मुझे डेजी पसंद थी, वह भी मुझे पसंद करती थी. हम शादी करना चाहते थे, मगर उस के डैड की 2 शर्तें थीं. एक तो मैं धर्म बदल कर ईसाई बन जाऊं और दूसरी मुझे वहीं रह कर उन का काम संभालना होगा. मां, मेरे लिए यह सुनहरा मौका था. अत: मैं ने डेजी के डैड की दोनों शर्तें मान लीं और कल चर्च में उस के साथ शादी कर ली. आप लोगों से इजाजत लेना बेकार था क्योंकि आप कभी इस के लिए तैयार न होते. इसीलिए बस, सूचित कर रहा

हूं और आप का आशीर्वाद मांग रहा

हूं-अमन.’

मालती और अभय को लगा जैसे सारे कहर एकसाथ टूट कर उन पर आ गिरे. बस, एक धरती ही नहीं फटी जिस में दोनों समा जाते.

‘धर्म बदल लिया? अपने अस्तित्व को ही बेच डाला? ऐसा अधम और अवसरवादी इनसान मेरा बेटा कैसे हो सकता है? उस लड़की से बेशक ब्याह करता मगर धर्म तो न बदलता, तब शायद मैं उस को माफ भी कर देता और लड़की को बहू भी मान लेता, लेकिन अब कभी नाम भी न लेना उस का मालू मेरे सामने,’ अभय ने एक लंबी खामोशी के बाद ये शब्द कहे थे.

मालती भी जाने किस रौ में एक ठंडी सांस ले कर बोल गई, ‘काश, बेटों की जगह हमारी भी 2 बेटियां होतीं तो सिमट कर, इज्जत से घर तो बैठी होतीं.’

‘बेटियां हैं हमारी भी, आंखों पर अपनेपन का चश्मा चढ़ा कर देखो मालू, नजर आ जाएंगी,’ तल्ख स्वर में अभय ने कहा था.

इस घटना के एक माह बाद ही मांजी चल बसीं एकदम अचानक. शायद अमन और अभय की तरफ से मिला दुख ही इस मौत की वजह रहा हो.

मालती का अभिमान अब चूरचूर हो कर बिखर गया था. अब न तो वह चिड़चिड़ाती थी और न ही चिल्लाती थी. खुद अपने से ही वह बेहद शर्मिंदा थी. एकदम खामोश रहती और जब दर्द सहनशक्ति की सीमा को लांघ जाता तो रो लेती.

श्रेया और श्रुति को अब मालती अपने पास बुलाना चाहती, दुलराना चाहती मगर वह हिम्मत नहीं जुटा पाती. उन बच्चियों के साथ किया अपना कपटपूर्ण दुर्व्यवहार उसे याद आता तो शरम से सिर नीचा हो जाता.

एम.बी.ए. के बाद श्रुति को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर की पोस्ट मिल गई तो मालती के दिल की गहराई से आवाज आई कि काश, 2 बेटों की जगह सिर्फ एक बेटी होती तो आज मैं गर्व से भर उठती.

श्रेया एम.बी.बी.एस. कर डाक्टर बन चुकी थी और अब एम.डी. की तैयारी कर रही थी. श्रुति का रिश्ता उस के ही स्तर के एक सुयोग्य युवक शिखर से हो गया था. श्रुति की शर्त थी कि वह बिना दानदहेज के ब्याह करेगी और शिखर को यह शर्त मंजूर थी. ब्याह हो गया और कन्यादान मालती और अभय के हाथों कराया गया. मालती कृतज्ञ थी शगुन की, कम से कम एक संतान को ब्याह का सुखसौभाग्य तो शगुन ने उस के सूने आंचल में डाल दिया.

श्रुति की बिदाई के बाद तो अभय बिलकुल ही खामोश हो गए. बोलते तो वह पहले भी ज्यादा नहीं थे लेकिन अब तो बस, जरूरत भर बात के लिए ही मुंह खोलते. उम्र के साथसाथ शायद उन का गम भी बढ़ता जा रहा था. गम बेटों के विछोह का नहीं उन की कपटपूर्ण चालाकियों का था. उन के दिल का सब से बड़ा दर्द था अमन का धर्म परिवर्तन. कई बार वह सपने में बड़बड़ाते, ‘कभी माफ नहीं करूंगा नीच को. मेरी चिता को भी हाथ न लगाने देना उस को मालू.’

कहते हैं न इनसान 2 तरह से मरता है. एक तो सांसें थम जाने पर और दूसरा जीते जी पलपल मर कर. यह दूसरी मौत पहली मौत से ज्यादा तकलीफदेह होती है क्योंकि जिंदगी की हसरतें और जीने की इच्छा मरती है लेकिन एहसास तो जीवित रहते हैं न. ऐसी ही मौत जी रहे थे अभय और एक रात वह सदा के लिए खामोश और मुक्त हो गए.

पति के मौत की वह भयानक रात याद आते ही मालती अतीत के घरौंदे से निकल कर वर्तमान के धरातल पर आ गई. उसे अच्छी तरह से वह रात याद है जब दोनों एकसाथ ही एक ही पलंग पर सोए थे लेकिन सुबह वह अकेली उठी और वह हमेशा के लिए सो गए. कैसी अजीब बात थी उस शांत निंद्रा में कि रात खुद चल कर गए बिस्तर तक और सुबह किसी और ने उतार कर नीचे धरती पर लिटाया. इस तरह काल का प्रवाह अपने साथ उस के जीवन के उस आखिरी तिनके को भी बहा ले गया जिस के सहारे उसे इस संसारसागर से पार उतरना था.

अक्षय ने बाद में बहुत जोर दिया कि अनुज तो विदेश में है, अमन को ही बुला लिया जाए लेकिन पति की इच्छाओं का मान रखते हुए मालती ने किसी भी बेटे को खबर तक नहीं करने दी. अक्षय ने ही भाई का दाह संस्कार किया.

‘कैसी सोने सी अयोध्या नगरी थी, जिस में वह ब्याह कर आई थी और अपने ईर्ष्या व द्वेष की आग में जल कर उसे लंका बना डाला.’

बेटे बाद में बारीबारी से आए पर उन का आना और जाना एकदम औपचारिक था. मालती भी बेटों के लिए वीतरागी ही बनी रहीं. फिर तो यह अध्याय भी सदा के लिए बंद हो गया.

श्रुति, शिखर, श्रेया, शगुन चारों एक दिन एकसाथ आए और जिद पकड़ कर बैठ गए, ‘ताई मम्मा, आप यह भूल जाएं कि हम आप को यहां अकेला छोड़ेंगे. आप को अब हमारे साथ रहना होगा. उठिए ताई मम्मा.’

बच्चों के प्यार के आगे मालती हार गई और वह एक आंगन से दूसरे आंगन में चली आई. उसे याद आया, श्रुति के ब्याह के लिए जब शगुन उस के लिए अपनी ही जैसी सुंदर और महंगी साड़ी लाई थी और श्रेया ने उसे खूबसूरती से तैयार किया था. तब वह हुलस कर उठी थी, ‘देखा, अभय, कितनी प्यारी बच्चियां हैं और एक हमारे पूत हैं… काश…और’ एक निश्वास ले कर मालती ने फिर यादों का सूत्र थाम लिया.

यह क्षतिपूर्ति थी अपने दुष्कर्मों की, बच्चियों के प्रति प्यार था या उन के मधुर व्यवहार का पुरस्कार कि एक दिन मालती ने अपने वकील को बुलवाया और अपने हिस्से की तमाम चलअचल संपत्ति श्रुतिश्रेया के नाम करने की इच्छा जाहिर की लेकिन अक्षय और शगुन ने वकील को यह कह कर लौटा दिया, ‘भाभी, आप मानें या न मानें यह अमनअनुज की धरोहर है और हम इस अमानत में आप को खयानत नहीं करने देंगे.’

श्रुतिशिखर छुट्टियों में आते तो शगुन की तरह ही मालती को भी स्नेहसम्मान देते. शिखर दामाद की तरह नहीं बेटे की तरह खुल कर मिलता और उन्हें ‘ताई मम्मा’ नहीं ‘बड़ी मम्मा’ कह कर बुलाता. कहता कि आप ने ही तो श्रुति का हाथ मेरे हाथ में दिया है, फिर आप मेरी बड़ी मम्मा हुईं कि नहीं?

घर की मीठी चहलपहल पहले मन में कसक जगाती थी अब उमंग भरती है कि काश, ये मेरे बेटीदामाद होते तो मैं दुनिया की सब से सुखी मां होती. तभी अचानक उसे अभय की तिरस्कारपूर्ण निगाहें याद आ गईं तो अपनी ओछी मानसिकता पर उसे अफसोस हुआ.

‘मेरे ही तो बच्चे हैं ये, और सुखी ही तो हूं मैं और कैसा होता है सुख? चौथेपन की लाठी बनाने के लिए ही तो मांबाप पुत्र की कामना करते हैं और वह पुत्र तो कब के मेरा साथ छोड़ गए, मेरे पति की मृत्यु का कारण भी बने और यह फूल सी बच्चियां कैसे मेरे आगेपीछे डोलती हैं. यह सुख नहीं तो और क्या है? यहीं सुख भी है और स्वर्ग भी.’

सहसा मालती के मन में यह खयाल खलबली मचा गया कि बेईमान सांसों का क्या भरोसा, न जाने कब थम जाए और हो सकता है उस की इसी रात का कोई सवेरा न हो. अभय के साथ भी तो ऐसा ही हुआ था. इसीलिए अपनी एक खास इच्छा को आकार देने के लिए कागजकलम ले कर मालती ने लिखना शुरू किया.

‘मेरी संतान, मेरी 2 बेटियां श्रुति और श्रेया ही हैं. और यह मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे शरीर को आग मेरी बड़ी बेटी श्रुति और दामाद शिखर दें. यदि किसी वजह से वह मौजूद न हों तो यह हक मेरी छोटी बेटी श्रेया भारद्वाज को दिया जाए. मेरे घर, जेवर, बैंक के पैसे और शेष संपत्ति पर शगुन, श्रुति और श्रेया का बराबर अधिकार होगा. मैं मालती भारद्वाज पूरे होशोहवास में बिना किसी दबाव के यह घोषणा कर रही हूं ताकि सनद रहे.

‘मालती भारद्वाज.’

अब ‘काश’ शब्द को वह अपनी बाकी की बची जिंदगी में कभी जबान पर नहीं लाएगी, यह निश्चय कर मालती ने चैन की सांस ली और पत्र को लिफाफे में यह सोच कर बंद करने लगी कि सुबह यह पत्र मैं अक्षय के हवाले कर दूंगी.

पत्र को तकिए के नीचे रख कर मालती सोने की कोशिश करने लगी. अब उस का मन शांत था और फूलों सा हलका भी.

Funny Story : एक अंधसमर्थक से मुलाकात

Funny Story : आज सौभाग्य या कहें दुर्भाग्य से, सत्ता के एक “अंध समर्थक” से मुलाकात हो गई.

हमने छुटते ही कहा,- आपके “आलाकमान” और पार्टी नेताओं को  सोशल मीडिया ने बड़ी बुरी तरह घेरा है .

उन्होंने कहा- यह सब षड्यंत्र है .

हमने कहा- षड्यंत्र ? क्या विदेशी….

अंध समर्थक- नहीं, सत्ता की लालच में विपक्षी दल .

हमने कहा- मगर हमने सुना है, वे तो विपक्षियों की पोल भी खोल  रहे हैं .

अंध समर्थक- अरे! आप नहीं समझेंगे . बड़ी ऊंची राजनीति और खेल चल रहा है .

हमने कहा- खैर! छोड़िए हम आपकी प्रतिक्रिया चाहते हैं, आप क्या कहेंगे .

अंध समर्थक- मैं सोशल मीडिया के बारे में यही कहूंगा की पहले अपना गिरेबां झाके . यह लोग खुद करप्ट हैं और सम्मानीय नेताओं पर आक्षेप लगाते हैं.

हमने कहा- मगर उनकी बात में दम तो है . सारा देश चर्चा करने लगा है, यह उनकी विश्वसनीयता का परिचायक नहीं है क्या ?

अंघ समर्थक- अरे! आप बहुत भोले हैं . यह स्वयं पार्टी बनाकर, सत्ता का उपभोग करने की रणनीति के तहत काम कर रहे हैं . यह लोग, कोई महान देशभक्त पैदा नहीं हुए हैं .

हमने कहा- मगर यह तो देखिए उनकी बात में,सबूतों में कितना दमखम है . उनकी बात, आप काट नहीं सकते.

अंध समर्थक- मेरी निगाह में उनके पास कोई खास साक्ष्य नहीं है .

हमने कहा- क्या बात करते हो, आपकी पार्टी के दांए जी के सुपुत्र  50 लाख से 500 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक बन गए और कहते हो कोई साक्ष्य नहीं है .इस देश में दूसरा कोई है जो रातों-रात इस तरह करोड़पति हो गया….

अंध समर्थक- आप हमारे आलाकमान के बारे में कहिए, नाते रिश्तेदार अगर कमा रहे हैं तो पार्टी दोषी नहीं है, यह उनका व्यक्तिगत मामला है .

हमने कहा- मगर यह भी सत्य है कि अगर वे “सुपुत्र” नहीं होते तो अरबों रुपए कतई नहीं कमा सकते थे. उन्हें निःसंदेह सत्ता का लाभ मिला है.

अंध समर्थक- नो कॉमेंट्स . मै आप की सोची हुई अवधारणा कल्पना पर, कोई टिप्पणी नहीं कर सकता.

हमने कहा- सच को नकारने से, सच झूठ नहीं हो जाता . आप जानते हैं पार्टी की कितनी साख गिरी है .यही हाल रहा तो आपके नेता और आप जमीन पर होंगे .

अंध समर्थक- हमने देश सेवा का व्रत लिया है. जनता जिस भूमिका में रखेगी, हम रहेंगे.हम तो जनता के सेवक हैं .सेवा करते रहेंगे .

हमने कहा- अर्थात देश का पिंड नहीं छोड़िएगा .

अंध समर्थक- भाई क्या कहते हो .बापू जी ने कहा था -नि:स्वार्थ सेवा करते रहो, सो हम करते रहेंगे…

हमने कहा- मगर नि:स्वार्थ भावना कहां है, आपकी प्रत्येक सेवा का कर्ज, देश की जनता को बेतरह उतारना पड़ता है.

अंध समर्थक- ही ही ही ( हंसते हुए ) क्या बात कर रहे हो . अगर हम पर कोई उंगली भी उठाए तो हम सर झुका कर विनम्रता पूर्वक प्रतिउत्तर करते हैं .हमारे खून में ईमानदारी और सच्ची भावना समाई हुई है .

हमने कहा- अर्थात भ्रष्टाचार को आपने ईमानदारी का समनार्थी बना  दिया है .कोई गंभीर आरोप लगता है तो आप तब भी सहज रहते हैं .

अंध समर्थक- तो क्या करें ? हाथ तो चला नहीं सकते, सरे राह तो उठवा नहीं सकते, पिटवा नहीं सकते, इसलिए हमने सहजता को अंगीकार कर लिया है .हमारे आलाकमान और वरिष्ठ नेताओं का यही प्रेम भरा संदेश है. किसी भी हालत में आपा नहीं खोना है .

हमने कहा- मगर हमारी बात तो वहीं की वहीं रह गई. हम जानना चाहते हैं  निजी करण की आड़ में देश को लूटने का संगीन आरोप आप के नेताओं और पर लग रहे हैं . आप दो टूक शब्दों में बताइए आरोप सही मानते हैं या गलत .

अंध समर्थक- गलत! में हमेशा गलत ही कहूंगा. अगर मुझे पार्टी में रहना है तो गलत ही कहूंगा . क्योंकि यह पार्टी लाइन है.

हमने अंध समर्थक को हाथ जोड़े और दीर्ध नि:श्वास लेकर यह कहते आगे बढ़ गए-” इस “देश” को भगवान ही बचा सकता है.”

Love Story : शब्बो

Love Story : मजहब की दीवारें कितनी भी ऊंची और मजबूत क्यों न हों, प्यार का बुलडोजर उन्हें आसानी से गिरा ही देता है. प्यार अंधा नहीं होता, बल्कि वह सबकुछ देखता है और यकीन की पटरी पर अपनी रफ्तार पकड़ता है.

जटपुर का बाशिंदा लाखन जाट 42 साल का हट्टाकट्टा किसान था. उस का हंसताखेलता परिवार था. 2 जवान होते बेटे नरेंद्र और सुरेंद्र और एक 15 साल की बेटी थी, जिस का नाम माधवी था.

लाखन दूध पीने का बड़ा शौकीन था. इस के लिए उस ने मुर्रा नस्ल की एक नई भैंस खरीदी थी. लाखन की पत्नी सुलोचना उस भैंस की खूब सेवा किया करती थी.

एक दिन सुलोचना उस भैंस को नहला रही थी, तभी उस भैंस का पैर पानी से भरी बालटी से टकराया और वह हड़बड़ा गई. इसी हड़बड़ाहट में सुलोचना भैंस से टकरा कर फिसल गई और उस के कूल्हे में गंभीर चोट लग गई.

लाखन ने सुलोचना का खूब इलाज कराया, लेकिन केस बिगड़ने के चलते उसे बचाया न जा सका.

सुलोचना के गुजरने पर लाखन के सामने बड़ी समस्या पैदा हो गई. जब तक सुलोचना थी, लाखन को घर की कोई चिंता न थी, पर अब घर कौन संभाले?

माधवी ने रसोई संभालने की कोशिश की, लेकिन अभी वह इस काम में इतनी कुशल नहीं थी. अभी उस की पढ़नेलिखने की उम्र थी और लाखन माधवी को और आगे पढ़ाना चाहता था.

लाखन ने बड़े बेटे नरेंद्र का ब्याह करने का फैसला किया, पर घर में नईनवेली बहू के आने पर लाखन का
घर के अंदर आनाजाना तकरीबन बंद सा हो गया. वह अपनी बैठक तक सिमट कर रह गया. वहीं उस का भोजनपानी आ जाता. इस से वह अपनेआप को अलगथलग और अकेला महसूस करने लगा.

लाखन के गांव का ही शकील धोबी के घर उस का उठनाबैठना था. वह अपने कपड़े वहीं धुलवाता था.

शकील से उस की पुरानी जानपहचान थी. शकील पहले से ही गांवभर के कपड़े धोता आ रहा था.

नए जमाने में वाशिंग मशीन आने पर भी शकील अब भी गांव की जरूरत बना हुआ था. भारी कपड़े अभी भी उस के पास धुलने के लिए लाए जाते थे. उस ने घर में ही कपड़े इस्तरी करने की दुकान भी खोल ली थी.

शकील के इस काम में उस की बेटी शबनूर भी हाथ बंटाती थी. शबनूर से बड़ी 3 बेटियों की शादी शकील पहले ही कर चुका था. शबनूर को सब ‘शब्बो’ कह कर पुकारते थे. वह भी शादी के लायक हो चुकी थी.

शकील की बेटियां लाखन को चाचा कहती थीं. जब से सुलोचना नहीं रही थी, तब से लाखन का अकेलापन उस को भीतर ही भीतर कचोटता था.

हालांकि, लाखन का अपना परिवार था, लेकिन इस उम्र में पत्नी के गुजर जाने का अहसास और उस की कमी वही जानता है, जिस ने यह दर्द झेला हो.

इस उम्र में विधुर होने पर आदमी न इधर का रहता है और न उधर का. शादी की उम्र निकल चुकी होती है और पत्नी के बिना काम भी नहीं चलता. पका आम या तो गिरता है या फिर सड़ता है.

शब्बो भी जानती थी कि लाखन चाचा अब अपनेआप को अकेला सा महसूस करते हैं. उस की उम्र भी किसी साथी की चाहत में थी. दोनों ही कुदरत की मांग के मुताबिक जरूरतमंद थे. दोनों की आंखें कब लड़ गईं, कब दोनों के दिलों में प्यार का बीज फूट गया, पता ही नहीं चला.

अब लाखन और शबनूर को एकदूसरे का इंतजार रहता था. एकदूसरे से मिले बिना उन्हें चैन नहीं मिलता था.

लाखन उम्रदराज होने के चलते समुद्र सा शांत था, लेकिन शब्बो का मन तो चंचल था. वह अपने प्यार को ले कर नदी की तरह मचलती, उस का भावुक मन लहरों की तरह ऊंची उछाल मारता. वह चाहती थी कि लाखन उसे अपनी मजबूत बांहों में जकड़ कर खूब प्यार करे. दिन तो किसी तरह से कट जाता, लेकिन रातभर शब्बो लाखन की याद में करवटें बदलती रहती.

लाखन को अपनी इज्जत का डर था, इसलिए वह चाह कर भी शब्बो से संबंध नहीं बना पा रहा था.

आखिरकार शब्बो की शादी का भी समय आ गया. उस की शादी जलालाबाद के दानिश से तय हुई.
दानिश की एक टांग पोलियो से खराब हो गई थी.

शब्बो को जब यह पता चला तो वह बहुत रोई, लेकिन शब्बो को समझा दिया गया कि दानिश जरा सा लंगड़ाता है और एक प्राइवेट फर्म में कोई छोटीमोटी नौकरी करता है.

शब्बो ने लाखन से भी कहा, ‘‘आप तो अब्बू को समझ सकते हैं कि वह लंगड़े आदमी से मेरा निकाह न पढ़वाएं.’’

लाखन शब्बो को दिल से बहुत चाहता था और वह भी इस बात से दुखी था कि शब्बो की शादी किसी लंगड़े से की जा रही है, लेकिन वह शब्बो के घर की माली हालत जानता था और किसी के घर के मामले में दखलअंदाजी नहीं करना चाहता था.

लाखन ने शब्बो से कहा, ‘‘शब्बो, जो तुम्हारे अब्बू कर रहे हैं, सोचसमझ कर ही कर रहे होंगे. क्या पता, दानिश तुम्हारी ?ाली खुशियों से भर दे? वह तुम्हें बेइंतहा चाहेगा.’’

‘‘लेकिन, इस का उलटा हुआ, तो क्या आप मुझे संभालोगे? ’’ शब्बो ने आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

शब्बो के दिल की बात होंठों तक आ गई थी. लाखन कहना तो बहुतकुछ चाहता था, लेकिन अपनी उम्र का लिहाज कर उस ने चुप्पी साध ली. उस का दिल कह रहा था कि शब्बो कहीं न जाए. वहीं रहे, उसी के पास.
शब्बो लाखन के कंधे से लग कर खूब रोई. आंसू तो लाखन की आंखों में भी आए. शब्बो लाखन की मजबूरी समझ कर शांत हो गई.

हर बार की तरह लाखन ने इस बार भी शकील की बेटी शब्बो की शादी में खूब मदद की, बल्कि इस बार तो कुछ ज्यादा ही की. वह शब्बो को खुश देखना चाहता था.

शब्बो अपनी ससुराल चली गई. लाखन को लगा जैसे उस की दुनिया उजड़ गई, लेकिन लाखन की तो केवल भावनाओं का संसार ही उजड़ा था, शब्बो की तो पूरी जिंदगी ही तबाह हो गई थी.

शब्बो को ससुराल जा कर पता चला कि दानिश लंगड़ा ही नहीं है, शराब पीने का टैंकर भी है. सुहागरात को भी वह बिस्तर पर नशे में चूर पड़ा रहा और शब्बो ने रात रोरो कर गुजारी. उस के बाद जो उस पर बीती, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.

शब्बो ने अपनी आपबीती अब्बू और अम्मी को बताई, लेकिन वे शब्बो को हालात से समझौता करने की बात कह कर चुप हो गए.

लेकिन शब्बो के लिए एक आस बची थी और वह आस थी लाखन. एक दिन मौका पा कर शब्बो ने लाखन से फोन पर बात की.

‘‘कैसी हो शब्बो?’’

‘नरक भोग रही हूं, नरक. ऐसा सुलूक तो किसी के साथ जहन्नुम में भी नहीं होता होगा.’

‘‘यह क्या कह रही हो शब्बो?’’

‘जो कह रही हूं, सच कह रही हूं. याद करो, मैं ने शादी से पहले आप से कहा था कि इस का उलटा हो जाए, तो क्या आप मुझे संभालोगे? समझ लो, उलटे से भी उलटा हो गया. अब अपना वादा पूरा करो.’

‘‘हुआ क्या है, यह तो बताओ?’’

‘जो नहीं होना चाहिए था, वह सब हुआ है. एक ब्याहता के साथ इस से बुरा और क्या हो सकता है.’

‘‘शब्बो, पहेलियां मत बुझाओ, सब साफसाफ बताओ?’’

‘मेरा शौहर दानिश किसी काम का नहीं है. वह नकारा तो है ही, शराबी और बेवकूफ भी एक नंबर का है. उसे इस दुनिया में शराब के सिवा कुछ नहीं चाहिए.’

‘‘क्या दानिश तुम्हारा जरा भी खयाल नहीं रखता?’’

‘खयाल तो वह तब रखे, जब उसे जरा सा होश हो. हर समय नशे में चूर रहता है. उसे शौहर कहने में भी मुझे शर्म आती है.’

‘‘तुम्हारे तीनों देवर और सासससुर… क्या वे भी तुम्हारा खयाल नहीं रखते?’’

तभी लाखन ने फोन पर शब्बो के रोने की आवाज सुनी. शब्बो ने जोकुछ सिसकते हुए कहा, उस से लाखन पर बिजली सी गिरी.

शब्बो ने बताया, ‘खूब खयाल रखते हैं, पर मेरा नाड़ा खोलने का. न दिन देखते हैं, न रात और न ही सुबह या शाम. बस भेडि़ए बन कर नोचने को आ जाते हैं बारीबारी से.’

यह सुनते ही लाखन दहल गया. गुस्से से उस का पूरा शरीर कांप गया. वह बोला, ‘‘यह क्या कह रही हो तुम शब्बो? क्या वह सब से छोटा देवर भी? अभी तो उस की दाढ़ीमूंछ भी ठीक से नहीं आई.’’

‘पता है, क्या कहता है वह?’

‘‘क्या कहता है?’’ लाखन ने बड़े अचंभे से पूछा.

‘कहता है कि भाभी, कल बड़ा मजा आया था. आज और ज्यादा चाहिए.’

यह सुन कर लाखन का दिल मिचला गया. उस का मन हुआ कि अभी जा कर शब्बो के छोटे देवर का टेंटुआ दबा दे. उस ने बड़ी कड़वाहट से कहा, ‘‘क्या तुम ने अपने ससुर से इस की शिकायत नहीं की?’’

अब तो शब्बो फफकने लगी थी. वह रोते हुए बोली, ‘बताने में भी शर्म आती है. मैं उन से क्या शिकायत करूं. वे मेरे बाप की उम्र के और इस उम्र में भी इतने रंगीले और शैतान हैं कि मुझ से चाहते हैं कि मैं उन्हें भी…’

‘‘बस कर शब्बो, बस कर. किन जालिमों में फंस गई हो तुम. किसी को अगर यह सब बताओगी, तो कोई तुम्हारा यकीन भी नहीं करेगा.’’

‘जिस पर बीतती है, वही जानता है,’ शब्बो ने कहा.

‘‘तुम यह सब कैसे सहन कर रही हो? क्या तुम ने कभी इस का विरोध नहीं किया?’’

‘किया था. पहले मुझे कमरे में बंद कर सब ने मुझ पर लट्ठ तुड़ाई की और फिर सब ने जबरदस्ती… मैं तो इन सब को जहर दे कर मार डालना चाहती थी, लेकिन इन कंगलों के यहां तो गेहूं में रखने वाली सल्फास भी नहीं. रोज मजदूरी कर के शाम को राशनपानी ले कर आते हैं.’

लाखन शब्बो के दर्द की हद जान चुका था. मर्दों का जुल्म सुन चुका था. अब उस ने सोचा कि मुसीबत में एक औरत दूसरी औरत के लिए क्या करती है, यह भी जान ले.

लाखन ने कहा, ‘‘शब्बो, क्या तुम्हारी सास भी तुम्हारी कोई मदद नहीं करतीं, वे भी तो एक औरत हैं?’’

‘वह बहरी बस मुरगियों को दाना डालने और उन के दड़बे साफ करने का काम करती है. वह अपने बेटों और आदमी के साथ है. अच्छा है वह औरत है, नहीं तो मुझे एक और मर्द को झेलना पड़ता.’

लाखन को समझ में आ गया था कि नरक कहीं आसमान में नहीं होता, बल्कि धरती पर ही फैला है. शब्बो जो भोग रही है, वह नरक ही तो है.

तब कुछ सोच कर लाखन ने कहा, ‘‘शब्बो, तुम चिंता मत करो. अब चाहे कुछ भी हो जाए, मैं तुम्हें उस नरक से निकाल कर ही रहूंगा. मैं कुछ करता हूं. तुम मुझे कुछ दिन बाद फिर फोन करना. मेरा फोन करना ठीक नहीं रहेगा.’’

‘ठीक है, मैं वैसे ही करूंगी, जैसा आप कहते हैं. बस, मुझे अब न जाने क्यों आप पर ही भरोसा है? मैं तो मौका देख कर यहां से भाग जाती, लेकिन मुझे पनाह देने वाले तो मेरे मांबाप भी नहीं. मैं क्या करूं… आप को मैं अलग से मुश्किल में डाल रही हूं,’ कह कर शब्बो फिर से सिसकने लगी.

‘‘शब्बो, अब तुम्हें किसी बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है. तुम ने मुझे किसी मुश्किल में नहीं डाला है, बल्कि तू ने अपना समझ कर मुझ से अपने दिल की बात कही है. अपना ही अपनों के काम आता है. मैं तुम्हें पनाह भी दूंगा और अपनाऊंगा भी. अब फोन रखो और बेफिक्र हो जाओ.’’

यह सुन कर शब्बो को बड़ी तसल्ली हुई. उसे लाखन पर पूरा यकीन था. आखिर प्यार भरोसे का ही तो नाम है.

लाखन ने बहुत सोचविचार किया. उसे पता था कि शब्बो को बचाने के लिए उसे कई कुरबानियां देनी पड़ेंगी. उसे अपना घरपरिवार, गांव सब छोड़ना पड़ेगा. बिरादरी वाले उस पर थूथू करेंगे, लेकिन वह जानता था कि प्यार कुरबानी मांगता ही है और इस से भी बड़ी बात तो यह थी कि वह जालिमों के चंगुल से एक अबला को बचाने जा रहा था.

अगर शब्बो खुश रहती तो लाखन को यह सब करना ही क्यों पड़ता? उस ने तो खुशीखुशी शब्बो की शादी करा दी थी. वह यह भी जानता था कि कुछ कट्टरपंथी इसे सांप्रदायिक रंग देने की भी कोशिश करेंगे, लेकिन लाखन ने भी अब कठोर फैसला कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह शब्बो को उस नरक से निकाल कर ही दम लेगा. वह किसी भी कीमत पर शब्बो का भरोसा टूटने नहीं देगा.

इस के लिए लाखन ने एक काबिल वकील से बात की. वकील ने कहा, ‘‘लाखन साहब, यह बड़ा रिस्की मामला है. अगर शबनूर ने आप का साथ न दिया और उस ने अदालत में गलत बयानबाजी कर दी, तो आप को लेने के देने पड़ जाएंगे. आप को जेल भी हो सकती है.’’

‘‘वकील साहब, अब जो होगा देखा जाएगा. मैं ने शब्बो से जो वादा किया है, उस को निभा कर रहूंगा. उस ने मुझ पर भरोसा किया है, तो मैं उस भरोसे पर खरा उतर कर दिखाऊंगा.’’

‘‘देख लो, लाखन साहब. भावनाओं में मत बहो. इस मामले में आप जीत भी गए, तो आप को बहुतकुछ गंवाना पड़ेगा. परिवार, इज्जत, सबकुछ.’’

‘‘वकील साहब, आप तो बस अपनी कार्यवाही को अंजाम देना. और हां, इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील साहब से भी बात कर के रखना. बाकी मुझ पर छोड़ दो.’’

‘‘कानूनी कार्यवाही की चिंता मत करो. वह तो सब मैं संभाल लूंगा. बस, मैं तो आप को आगाह कर रहा था.’’

वकील और लाखन ने अपनीअपनी कमान संभाल ली थी. इस के बाद जैसे ही शब्बो का फोन लाखन के पास आया, तो लाखन ने कहा, ‘‘शब्बो, इस जुम्मे की दोपहर की नमाज के वक्त, जब तुम्हारे देवर मसजिद में नमाज पढ़ने जाएं, तब तुम बुरका पहन कर सरकारी स्कूल के पास मिलना. मैं वहीं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’

जुम्मे के दिन नमाज के बाद शब्बो के गायब होने की खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गई. शब्बो के देवरों और ससुर ने उस को खूब तलाशा, फिर जटपुर में उस के मायके फोन किया गया, लेकिन शब्बो का कहीं अतापता नहीं था. तब पुलिस को सूचना दी गई.

अगले दिन पता चला कि लाखन भी गायब है. कडि़यां से कडि़यां जुड़ती चली गईं. पुलिस को दोनों की लोकेशन प्रयागराज में मिली, फिर लोकेशन मिलनी बंद हो गई.

हफ्तेभर बाद दोनों को पुलिस ने बिजनौर बसस्टैंड से गिरफ्तार कर लिया. उन दोनों को मंडावली थाने लाया गया.

जैसे ही गांव वालों को इस की खबर मिली, माहौल गरमा गया. कुछ कट्टरपंथी मुल्लामौलवियों ने इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की. गांव में पंचायत करने की योजना बनाई गई, लेकिन पुलिस की सख्ती से ऐसा नहीं हो पाया.

तब भीड़ मंडावली थाने का घेराव करने पहुंच गई. मंशा यही थी कि किसी भी तरीके से शब्बो को थाने से छुड़ा लिया जाए, लेकिन थानेदार सत्यपाल होशियार निकला. वह जानता था कि ऐसे मामलों में क्या किया जाना चाहिए.

थानेदार सत्यपाल ने अपनी कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद शब्बो को बुरके में ही छिपा कर भीड़ के बीच से ही सादा वरदी में 2 महिला पुलिस कांस्टेबल की मदद से थाने से बाहर निकलवा दिया. पुलिस की गाड़ी शब्बो को ले कर मुरादाबाद नारी निकेतन पहुंच गई और कट्टरपंथी हाथ मलते रह गए.

शब्बो ने पहले ही पुलिस से बोल दिया था कि उसे किसी से नहीं मिलना है. शब्बो की मां तो उस से मिलने के लिए बहुत गिड़गिड़ाई थी.

लाखन का परिवार उसी के खिलाफ खड़ा हो गया था. सब यही कह रहे थे कि लाखन को इस मामले में नहीं पड़ना चाहिए था. लाखन उम्रदराज है और शब्बो अभी जवान है, कैसे निभेगी दोनों में?

लेकिन लाखन ने सबकुछ सोचसमझ कर किया था, इसलिए इन बातों की उसे कोई चिंता नहीं थी.

सब के मन में अभी भी यह बात थी कि शब्बो मजिस्ट्रेट के सामने बयान क्या देगी? कहीं वह पलट न जाए, फिर तो लाखन को पक्का जेल होगी.

लाखन की बिरादरी और मुसलिम कट्टरपंथी तो लाखन को जेल भिजवाने पर तुले हुए थे. वे यही सोच कर खुश हो रहे थे कि कुछ भी हो जाए, शब्बो उस के हक में बयान नहीं देगी और अपने परिवार के पास वापस आ जाएगी. लाखन को तो वह चाचा कहती है, फिर उस के साथ कैसे रहेगी? फिर वह कहां रहेगी? ऐसे कई सवाल लोगों के जेहन में उठ रहे थे.

कुछ दिन बाद मजिस्ट्रेट के सामने शब्बो के कलमबंद बयान होने थे. तहसील में सुबह से ही चहलपहल बढ़ गई थी. मामला अपनेआप ही 2 समुदायों का बन गया था.

कुछ हिंदू संगठन लाखन के हक में बिन बुलाए आ गए थे. उन्हें अपनी रोटी सेंकनी थी. गोल टोपी वाले तो पहले से ही बड़ी तादाद में भीड़ लगाए हुए थे. इन सब हालात को देखते हुए पुलिस बंदोबस्त भी चाकचौबंद था.

दोपहर के ठीक 12 बजे शब्बो को कड़ी पुलिस कस्टडी में मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया. गोल टोपी वालों ने आगे बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस ने डंडा फटकार दिया.

इधर मजिस्ट्रेट के सामने शब्बो के कलमबंद बयान हो रहे थे, उधर बाहर खड़े लोगों की धड़कनें बढ़ रही थीं.

शब्बो ने अपने बयान में खुद के बालिग होने और अपनी मरजी से लाखन के साथ जाने की इच्छा जताई. यह सुन कर कट्टरपंथियों के मुंह लटक गए.

मजिस्ट्रेट के आदेश से शब्बो को लाखन के साथ जाने की छूट दे दी गई.

पुलिस कस्टडी में दोनों को उन के द्वारा बताई गई जगह पर छोड़ दिया गया. प्यार की जीत हुई. लाखन और शब्बो साथसाथ रहने लगे.

लाखन ने बिजनौर में किराए का मकान ले लिया और एक पैट्रोलपंप पर नौकरी करने लगा. दोनों वहीं सुख से रहने लगे.

डेढ़ साल बाद शब्बो ने एक बेटी को जन्म दिया और उस का नाम लखनूर रखा गया, जिसे दोनों प्यार से ‘लक्खो’ बुलाते हैं.

Romantic Story : रसीली बेवफा

Romantic Story : आसिफ अपनी बीवी सना के साथ 10 साल से बड़े प्यारमुहब्बत से मुंबई में रह रहा था. उस के 4 बच्चे थे, 2 बेटियां और 2 बेटे, जिन की उम्र महज 9 साल, 7 साल, 3 साल और एक साल थी. घर में सभी तरह की खुशहाली थी. किसी बात की कोई कमी न थी. आसिफ की सास साजिदा भी अपनी बेटी सना के साथ मुंबई में ही रह रही थी.

आसिफ एक मेहनती इनसान था. यही वजह थी कि उस ने बहुत कम समय में मुंबई में अपना खुद का कारोबार और घर बना लिया था.

आसिफ की सास साजिदा एक खर्चीली औरत थी, जबकि आसिफ की बीवी सना एक घर संभालने वाली जिम्मेदार औरत थी. यही वजह थी कि आसिफ ने काफी तरक्की की, क्योंकि सना फालतू के खर्च से हमेशा बचती थी, जिस से आसिफ को काफी बचत होती थी और धीरेधीरे वह बचत एक मोटी रकम बन जाती थी.

इस के उलट आसिफ की सास साजिदा दिनरात अपनी बेटी सना के कान भरती रहती थी कि क्यों इतने साधारण कपड़े पहनती हो, क्यों सीधीसादी बन कर रहती हो, जेवर खरीदो, अच्छे महंगे कपड़े पहनो. शौहर को बस में करना है, तो अपनी खूबसूरती में हर वक्त चार चांद लगाए लगाए रखो.

अपनी मां साजिदा की यें बात सुन कर सना बोलती, ‘‘अम्मी, मैं ऐसे ही इतनी खूबसूरत हूं. मुझे और क्या बननेसंवरने की जरूरत है. आसिफ मुझे अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है. वह एक सीधासादा इनसान है और उसे खुद सीधीसादी बीवी पसंद है.’’इस पर साजिदा बोलती, ‘‘तू नहीं जानती मर्दों की असलियत. जहां खूबसूरत औरत देखी नहीं, बस उन के दीवाने हो जाते हैं. आजकल मौडर्न जमाना है. मौडर्न बन कर रहा कर सना. इसी में तेरी भलाई है.’’

वक्त गुजरता गया. साजिदा अपनी बेटी सना को भड़काती रही. सना आखिर कब तक अपनी मां की बातों में न आती. आखिर एक दिन सना ने मां साजिदा की बातों में आ कर उन के बताए रास्ते को अपना ही लिया.

आसिफ ने जब सना का यह बदला रूप देखा, तो उसे बहुत हैरानी हुई. वह सना से बोला, ‘‘क्या तुम ब्यूटीपार्लर भी जाने लगी हो?’’

सना बोली, ‘‘हां, अम्मी वहां जबरदस्ती ले गई थीं और उन्होंने मेरी आईब्रो बनवा दीं, फिर बाल स्ट्रेट करवाए. अब कैसी लग रही हूं मैं?’’

आसिफ ने कहा, ‘‘अच्छी लग रही हो. पर बुरा मत मानना कि तुम तो वैसे ही जन्नत की हूर लगती हो. तुम्हें यह सब करने की क्या जरूरत है?’’

सना ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझे देख कर खुश नहीं हो?’’

आसिफ बोला, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और मैं तुम से हमेशा खुश रहता हूं. मैं ने तो बस यही कहा कि तुम बिना ब्यूटीपार्लर जाए ही इतनी हसीन लगती हो कि मैं तुम्हारे हुस्न का दीवाना हो उठता हूं.’’

सना ने जब आसिफ से यह सुना, तो बड़े प्यार से उसे गले लगा कर एक प्यारा सा चुम्मा रसीद कर दिया.

आसिफ ने भी सना के प्यार का जवाब प्यार से दिया.

अगले दिन सना की अम्मी बोलीं, ‘‘सना, चलो बाजार चलते हैं. तुम्हारे लिए मैं ने कुछ कपड़े पसंद किए हैं. वहां तुम वे कपड़े पहनना, बिलकुल अंगरेजी मेम लगोगी.’’

सना ने बाजार जाने से मना कर दिया, ‘‘मुझे इन सब चीजों की कोई जरूरत नहीं है.’’

इस पर साजिदा बोली, ‘‘कल आसिफ ने तुम से कुछ कहा था क्या?’’

सना ने कहा, ‘‘उन्हें यह सब पसंद नहीं है. वे बोलते हैं कि तुम ऐसे ही बहुत खूबसूरत हो. तुम्हें इन सब चीजों की क्या जरूरत है?’’

‘‘हर औरत इस होड़ में लगी रहती है कि वह दूसरी औरत से ज्यादा खूबसूरत लगे. जब तुम खूबसूरत हो तो क्यों एक घरेलू औरत की तरह सादगी से जिंदगी गुजार रही हो?

‘‘आसिफ तो पागल है. न तो वह खुद बनसंवर कर रहता है और न ही स्मार्ट दिखता है. बस, पैसा कमाने के पीछे इतना पागल हो गया है कि उसे अपनेआप को फिट और स्मार्ट रखने का ध्यान ही नहीं. अभी से उस ने कैसी बूढ़ों वाली दाढ़ी रख ली है.

‘‘जब तुम उस के साथ कहीं बाहर जाती हो, तो तुम दोनों को देख कर ऐसा लगता है जैसे बापबेटी जा रहे हो.’’

सना ने कहा, ‘‘क्या अम्मी, तुम भी कुछ भी बोलती हो. मेरा वे कितना खयाल रखते हैं, मुझे कितना प्यार
करते हैं.’’

‘‘प्यार तो करेगा ही न. जब कोई और औरत उसे घास नहीं डालती तो वह तेरा ही दीवाना बनेगा न. पता नहीं, मेरी क्या मति मारी गई थी, जो ऐसे बूढ़े से तेरी शादी कर दी.’’

सना अपनी अम्मी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर सोच में पड़ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अम्मी ने ऐसा क्यों बोला.

सना को आज भी वह बात याद है, जब आसिफ का रिश्ता उस के लिए आया था. तब सना की अम्मी ने आसिफ को देखते ही इस रिश्ते के लिए मना कर दिया था, पर उस के अब्बू और भाई की जिद थी कि आसिफ एक मेहनती इनसान है, इसलिए अब्बू और भाई ने अम्मी की एक न चलने दी और सना की शादी आसिफ से हो गई.

हालांकि, साजिदा को आसिफ से सना की शादी करना अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि वे उस की शादी अपनी बहन के बेटे से करवाना चाहती थीं, जो कि बहुत ही खूबसूरत, स्मार्ट और कमउम्र था.

शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी सना आसिफ के साथ बहुत खुश थी, मगर साजिदा उसे ऐसी सीख दे रही थी, जिस से उस के घर में कभी भी बड़ा तूफान आ सकता था.

साजिदा ने अपनी चालाकियों से सना को उस रास्ते पर ले जाना शुरू कर दिया, जिस की वजह से आसिफ और सना के रिश्ते में दरार पड़ने लगी.

हुआ यों था कि साजिदा ने सना को मौडर्न कपड़े पहनने का शौक डाल दिया. अब वह जींसटौप पहनने लगी थी, जिस से आसिफ को बुरा लगने लगा. उस ने उसे समझाने की कोशिश की, तो फौरन साजिदा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तुम सना के मौडर्न बनने से जलते हो. उस के ब्यूटीपार्लर जाने से तुम्हें नफरत है.’’

आसिफ बोला, ‘‘अम्मी, मुझे कोई जलन नहीं है. हमारी शादी को इतने साल हो गए हैं. हमारे 4 बच्चे हैं.
2 बेटियां हैं. अगर सना इस तरह के कपड़े पहनेगी, तो उन सब पर क्या असर पड़ेगा.’’

‘‘आजकल कौन परदे में रहना पसंद करता है. तुम लोग तो औरत को चारदीवारी में कैद कर के रखना चाहते हो. औरत को भी जीने का हक है. पर तुम लोग तो औरत को घर की नौकरानी बना कर रखना चाहते हो.’’

अपनी सास साजिदा के मुंह से ये अल्फाज सुन कर आसिफ खामोश हो गया, पर सना को अपनी अम्मी की बातों में दम लगा और उस ने भी अपनी अम्मी का साथ दिया.

आसिफ चुप रहा. वह सोचता रहा कि सना नादान है. एक न एक दिन उसे अपनी गलती का अहसास होगा.

आसिफ का यह सोचना उस की भूल था. अब सना बिना परदे के बाहर घूमने जाने लगी और उस ने अपनेआप को पूरी तरह मौडर्न बना लिया था.

उधर साजिदा ने अपनी बहन के बेटे सनी को मुंबई बुला लिया था. वह मुंबई के एक इलाके में रहने लगा, जहां साजिदा सना को उस से मिलवाने ले जाने लगी.

सनी सना को घुमानेफिराने लगा, तो सना को एक नई खुशी मिलने लगी. अब वह कोई न कोई बहाना बना कर अपना ज्यादातर वक्त सनी के साथ गुजारने लगी.

दोनों का एकदूसरे से मिलनाजुलना शुरू हुआ, तो उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात भी जल्दी ही बन गए.

धीरेधीरे सना का लगाव सनी की तरफ बढ़ता गया और आसिफ से दूरियां बनने लगीं. वह बातबात पर आसिफ को नीचा दिखाने लगी, जिस से उन में ?ागड़ा होने लगा.

एक दिन मौका देख कर सना और उस की अम्मी साजिदा ने आसिफ के 7 लाख रुपए और जेवर घर से गायब कर दिए.

जब आसिफ को इस बात का पता चला, तो वह उन से इस बारे में पूछने लगा. पर उन्होंने साफ इनकार कर दिया कि उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं पता.

आसिफ चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया, क्योंकि वह सना से बहुत मुहब्बत करता था. वह नहीं चाहता था कि उस की किसी हरकत से सना नाराज हो जाए और उस का घर टूट जाए.

आसिफ का यह सोचना ही उस की सब से बड़ी भूल थी. अब सना के पास काफी पैसा हो गया था. उस ने सनी के साथ मिल कर उन पैसों से और ज्यादा घूमनाफिरना शुरू कर दिया. अब तो वह रातरातभर गायब रहने लगी थी.

आसिफ ने सना की इस हरकत का विरोध किया, तो उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘मुझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है. तुम अब मेरे काबिल नहीं हो.’’

आसिफ सना की यह बात सुन कर दंग रह गया. उस ने उसे सम?ाने की काफी कोशिश की, पर वह नहीं मानी.

आसिफ ने उसे अपने बच्चों का वास्ता दिया, तो सना की अम्मी साजिदा बोल पड़ी, ‘‘तेरे बच्चे हैं, तू पाल इन्हें.’’

आसिफ की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. उस ने इन सब बातों की जानकारी अपने ससुर को दी, तो वे अगले ही दिन मुंबई के लिए चल दिए.

यह खबर सुन कर सना और साजिदा घर छोड़ कर गायब हो गईं.

एक दिन इंतजार करने के बाद आसिफ और उस के ससुर ने उन दोनों के गायब होने की सुचना पुलिस को दी.

तकरीबन 3 दिन बाद पुलिस ने सना से बात कर के उसे पुलिस स्टेशन बुलाया. साथ ही, आसिफ और उस के ससुर को भी पुलिस स्टेशन आने को कहा.

अगले दिन आसिफ और उस के ससुर पुलिस स्टेशन पहुंचे, तो देखा कि सना और उस की अम्मी साजिदा पहले से ही वहां मौजूद थीं.

पुलिस के पूछने पर सना बोली, ‘‘मुझे इस आदमी के साथ बिलकुल नहीं रहना. यह मेरे साथ मारपीट करता है. मुझ पर शक करता है. मुझे जानवरों की तरह मारता है, इसलिए मैं अपनी अम्मी के साथ अपने एक रिश्तेदार के यहां चली गई थी.’’

पुलिस इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारे शौहर ने तुम पर जुल्म किया था, तो तुम्हें थाने में इस की रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए थी.’’

सना रोते हुए बोली, ‘‘इस के पास पैसा है, ताकत है. अगर मैं कुछ करती तो यह मुझे जान से भी मार सकता था, इसलिए मुझे जो अच्छा लगा, मैं ने वह किया.’’

पुलिस इंस्पैक्टर को उस पर तरस आया और वह आसिफ को डांटते हुए बोला, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती, जो एक लाचार औरत पर जुल्म करते हो. अगर चार डंडे पड़ेंगे, तो तुम्हारे होश ठिकाने आ जाएंगे.’’

जब पुलिस इंस्पैक्टर ने आसिफ को हड़काया, तो सना की मां साजिदा बोली, ‘‘हम कभी इस के साथ नहीं जाएंगे और न ही कोई शिकायत दर्ज करेंगे. कुछ दिनों अकेला रहने और बच्चों की देखभाल करने पर इसे खुद ही पता चल जाएगा कि बच्चे कैसे पलते हैं.’’

पुलिस ने उन दोनों मांबेटी को छोड़ दिया और आसिफ को सख्त हिदायत दी, ‘‘आइंदा कुछ ऐसावैसा किया, तो जेल में बंद कर दूंगा.’’

आसिफ का घर टूट चूका था. उस के ससुर कुछ दिन वहां रहे और बाद में अपने घर लौट गए.

आसिफ अपने बच्चों को ले कर मुंबई से अपने गांव आ गया. अब उस के ऊपर अकेले बच्चों को पालने की जिम्मेदारी थी.

आसिफ का घर देखते ही देखते एक कब्रिस्तान की तरह बन गया. आज उस की मदद करने वाला कोई न था, पर आसिफ अभी भी सना की याद में तड़पता रहता था. उसे उम्मीद थी कि एक न एक दिन सना लौट आएगी.

आसिफ ने नशा करना शुरू कर दिया. अपनी बीवी के गम में वह रातरातभर सो नहीं पाता था. उस ने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया था. उस के बच्चे भूखेप्यासे इधरउधर फिरते रहते थे. उन को देखने वाला अब कोई न था.

धीरेधीरे आसिफ को कई बीमारियों ने घेर लिया. वह शराब पीने के चक्कर में पहले से ही जिस्म से कमजोर था, फिर मन से भी कमजोर होता चला गया. सना के बिना उस की जिंदगी उजड़ गई थी.

आसिफ और उस के बच्चों की ऐसी बदहाली देख कर उस की बहन को उस पर तरस आया और उस के बच्चों को अपने साथ ले गई. इन सब के बावजूद आसिफ को कोई फर्क नहीं पड़ा.

आज इस घटना को पूरे 3 साल हो गए थे. न सना वापस आई और न ही आसिफ को होश रहा.

Family Story : सस्ते का चक्कर पड़ा महंगा

Family Story : गौतम की नासिक में नईनई नौकरी लगी थी. अब नासिक में घर जमाना था. दफ्तर की ओर से क्वार्टर तो मिलता था, पर इस के लिए इंतजार करना पड़ता था. हो सकता है कि 6 महीने लग जाएं क्वार्टर मिलने में, इसलिए गौतम ने किराए पर एक मकान ले लिया था.

पर, घर के लिए सामान तो चाहिए था. अपने घर में सुविधाओं के बीच रहा हुआ आदमी था गौतम, इसलिए बैड, सोफा, एसी, फ्रिज तो चाहिए ही उसे, पर इस के लिए तो उसे एक से डेढ़ लाख रुपए चाहिए. घर वाले एकसाथ सभी सुविधा नहीं देना चाहते थे. उन का कहना था कि हर महीने कुछकुछ सामान लेते रहना, पर उस का मन तो शुरू से ही सारी सुविधाओं के लिए उतावला था.

जौइन करने के बाद लगातार 3 दिनों की छुट्टियां थीं, इसलिए गौतम अपने घर मेरठ वापस आ गया था. उस के दिमाग में हमेशा यही बात चलती रहती थी कि कैसे सारी सुविधाएं जल्द से जल्द ले ले. उस ने औनलाइन मार्केट के बारे में सुना था, जहां सस्ते में सामान खरीदेबेचे जाते हैं.

गौतम ने एक अनुरोध डाल दिया सभी सामानों की लिस्ट के साथ. एक घंटे के अंदर उस के पास ह्वाट्सएप पर एक प्रस्ताव आ गया. सभी सामान के फोटो के साथ बताया गया था कि उस आदमी का ट्रांसफर मुंबई में हो गया है. उस की कंपनी जितना पैसे उसे सामान के परिवहन के लिए देगी, उस में वह जा नहीं पाएगा और जितना खर्च लगेगा उतने में नया सामान आ जाएगा, इसलिए वह औनेपौने दाम पर अपना सभी सामान बेच रहा है.

गौतम को सामान बहुत पसंद आया. इन सामानों को खरीदने में एक लाख रुपए खर्च होते, पर वह सिर्फ 30,000 रुपए में दे रहा था.

गौतम ने उस नंबर पर फोन किया.

‘हैलो…’ दूसरी तरफ से किसी आदमी की आवाज आई.

‘‘मैं गौतम बोल रहा हूं मेरठ से. आप का सामान मुझे पसंद है. मैं 1 तारीख को नासिक आ रहा हूं. वहां भुगतान कर के सामान ले लूंगा.’’

‘असल में मुझे 30 तारीख को ही मुंबई जाना है. मेरा ट्रांसफर हो गया है. आप अपना पता बता दें, मैं उस पते पर सामान भेज दूंगा. आप पेटीएम से भुगतान कर देना,’ बड़ी ही मीठी आवाज में उस ने जवाब दिया.

‘‘मैं चाहता था कि सामान मैं खुद देखूं, फिर बात करूं. फोटो में तो वैसे ठीक लग रहा है,’’ गौतम ने कहा.

‘सामान के लिए आप जरा भी चिंता मत करो. बिलकुल ब्रांड न्यू है. अगर मेरा ट्रांसफर नहीं हुआ होता या मुझे सामान ले जाने के पैसे सही मिलते, तो मैं ले जाता. अभी 6 महीने भी नहीं हुए हैं इन्हें खरीदे हुए,’ उस आदमी ने समझते हुए कहा.

‘‘अगर मुझे कोई सामान पसंद नहीं आएगा, तो फिर…?’’ गौतम ने शक जाहिर किया.

‘पसंद न आने का तो सवाल ही नहीं है भाई साहब. बिलकुल नया सामान है और इस्तेमाल भी न के बराबर हुआ है.’

‘‘फिर कैसे करें, बताइए? मेरा रिजर्वेशन पहली तारीख का है और आप कह रहे हैं कि आप को 30 तारीख को ही निकलना है,’’ गौतम चिंतित हो गया.

‘आप तो फिलहाल सिर्फ 5,000 रुपए पेटीएम कर दो, बाकी पैसा आप आने के बाद दे देना. मैं सामान अपने किसी दोस्त से कह कर आप के बताए पते पर भिजवा दूंगा. और कुछ…?’ उस ने प्रस्ताव रखा.

‘‘आजकल इतने फ्रौड होते हैं कि यकीन करना मुश्किल होता है,’’ गौतम के मन में अभी भी थोड़ा शक था.

‘मैं डिफैंस में हूं और डिफैंस वाले फ्रौड नहीं करते. हम किसी को अपना आईडी कार्ड नहीं देते. पर, आप के यकीन के लिए अपना आईडी कार्ड ह्वाट्सएप कर रहा हूं. अगर यकीन हो, तो फिर पेमेंट करना, वरना कोई बात नहीं,’ उस ने जवाब दिया.

थोड़ी ही देर में गौतम के मोबाइल फोन पर उस का आईडी कार्ड का फोटो भी आ गया. गोविंद शर्मा नाम था उस का. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. उस ने 5,000 रुपए उस के खाते में भेज दिए और अपना पता उसे बता दिया. जवाब में भी ‘ओके’ आ गया.

गौतम निश्चिंत हो गया. अब जरूरत की सारी चीजें उस के पास हो जाएंगी. जब दफ्तर से क्वार्टर मिलेगा, तो शिफ्ट करना ही एक काम रहेगा.

अगले दिन जब गौतम अपने दोस्तों के बीच बैठा गपें मार रहा था, तभी गोविंद का फोन आया. गौतम ने फोन उठा लिया और बोला, ‘‘हैलो.’’

‘अरे गौतमजी, एकाएक मुझे और्डर मिला है कि 29 तारीख को ही मुंबई जाना है. आप 5,000 रुपए और पेटीएम कर दो प्लीज,’ गोविंद ने कहा.

‘‘कैसी बातें कर रहे हैं, 5,000 रुपए तो मैं पहले ही आप को दे चुका हूं, बाकी पैसे जैसे ही सामान कब्जे में ले लूंगा, तब दे दूंगा,’’ गौतम बोला.

‘हम डिफैंस वाले आप लोगों की हिफाजत के लिए कितनी मुसीबतें झेलते हैं और आप हैं कि 5,000 रुपए के लिए मुझ पर यकीन नहीं कर रहे हैं,’ गोविंद ने कहा.

‘‘देखिए, मेरे पास अभी पैसे हैं भी नहीं. 1 तारीख को आ कर मैं आप को पूरे पैसे दे दूंगा,’’ गौतम ने कहा.
इस तरह गोविंद गौतम को पैसे भेजने के लिए कहता रहा और गौतम इस बात पर अड़ा रहा कि सामान मिलते ही वह पैसे दे देगा.

‘फिर, मैं ऐसा करता हूं कि सामान किसी और को बेच देता हूं और आप के पैसे वापस कर देता हूं,’ इतना कह कर गोविंद ने फोन काट दिया.

‘‘क्या बात है… किस से इतना उलझ रहे थे?’’ गौतम के दोस्त सिद्धार्थ ने पूछा.

गौतम ने उसे सारी बात बता दी.

‘‘तुम किसी ठग के चक्कर में पड़ चुके हो. चलो, उस का नंबर बताओ, मैं ट्रू कौलर पर देख कर बताता हूं,’’ सिद्धार्थ ने कहा.

गौतम ने उसे गोविंद का नंबर बताया, जिसे सिद्धार्थ ने ट्रू कौलर पर सर्च कर के देखा. ट्रू कौलर उस नंबर को फ्रौड बता रहा था.

गौतम ने उसी समय गोविंद को फोन लगाया और बोला, ‘‘मुझे तुम्हारी असलियत का पता चल चुका है. मैं पुलिस में शिकायत करने जा रहा हूं.’’

‘ठीक है, ऐसी कई शिकायतें हो चुकी हैं मेरे खिलाफ, एक और सही. चलो, फोन रखो, मुझे दूसरे लोगों को भी फंसाना है,’’ इतना कह कर गोविंद ने फोन काट दिया.

गौतम ने दोबारा फोन किया, तो नंबर स्विच औफ आ रहा था.

‘सस्ते का चक्कर बड़ा महंगा पड़ा,’ गौतम ने सोचा.

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