Pushpa 2: अल्लू अर्जुन की टीम का हुआ एक्सिडेंट, कई लोग हुए घायल

बॉलीवुड की फिल्म के अलावा कई साउथ की ऐसी फिल्म है जो कि बॉक्सऑफिस पर अच्छी कमाई कर चुकी है ऐसी ही अल्लू अर्जुन और रशमिका मंदाना की फिल्म पुष्पा है जिसका पहला पार्ट ही काफी हिट हुआ था, अब लोगों को दूसरे पार्ट का इंतजार है लेकिन ऐसे में टीम को लेकर एक बुरी खबर सामने आई है जी हां, खबर है कि अल्लू अर्जुन और उनकी टीम पुष्पा 2 का रोड़ एक्सिडेंट हो गया है जिसमें कई लोग घायल हो गए है.

 

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अल्लू अर्जुन और रश्मिका मंदाना की लीड रोल वाली फिल्म ‘पुष्पा 2’ एक बार फिर चर्चा में आ गई है. लेकिन इस बार फैंस को दुखी करने वाली खबर सामने आई है. फिल्म की टीम के साथ एक हादसा हो गया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म पुष्पा 2 की टीम का रोड एक्सीडेंट हो गया है.ये घटना तेलंगाना के नालगोंडा जिले के नारकेतपल्ली इलाके की है. खबर के मुताबिक इस दौरान टीम की बस दूसरी बस से टकरा गई. इस दौरान कुछ लोगों को गंभीर चोटें आई हैं. तो कुछ मामूली रूप से घायल हुए है. आपको बताते चले की अभी तक फिल्म के मेकर्स ने इस घटना के बारे में अभी तक कुछ नहीं बताया है. इस दुखद खबर सामने के बाद फैंस का चेहरा उतर गया है. फिल्म का इंतजार कर रहे फैंस को इस खबर ने अंदर से तोड़ दिया.

कब रिलीज होनी है फिल्म

अल्लू अर्जुन, रश्मिका मंदाना और फहाद फासिल की फिल्म पुष्पा 2 को मेकर्स साल 2023 में रिलीज करने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन अभी तक इसको लेकर कोई डेट फाइनल नहीं हो पाई है. मेकर्स ने कुछ समय पहले फिल्म से अल्लू अर्जुन का लुक जारी किया था, जो आते ही सोशल मीडिया पर छा गया था.

 

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Father’s Day Special: जिंदगी जीने का हक- भाग 1

प्रणव तो प्रिया को पसंद था ही लेकिन उस से भी ज्यादा उसे अपनी ससुराल पसंद आई थी. हालांकि संयुक्त परिवार था पर परिवार के नाम पर एक विधुर ससुर और 2 हमउम्र जेठानियां थीं. बड़ी जेठानी जूही तो उस की ममेरी बहन थी और उसी की शादी में प्रणव के साथ उस की नोकझोक हुई थी. प्रणव ने चलते हुए कहा था, ‘‘2-3 साल सब्र से इंतजार करना.’’

‘‘किस का? आप का?’’

‘‘जी नहीं, जूही भाभी का. घर की बड़ी तो वही हैं, सो वही शादी का प्रस्ताव ले कर आएंगी,’’ प्रणव मुसकराया, ‘‘अगर उन्होंने ठीक समझा तो.’’

‘‘यह बात तो है,’’ प्रिया ने गंभीरता से कहा, ‘‘जूही दीदी, मुझे बहुत प्यार करती हैं और मेरे लिए तो सबकुछ ही ठीक चाहेंगी.’’

प्रणव ने कहना तो चाहा कि प्यार तो वह अब हम से भी बहुत करेंगी और हमारे लिए किसे ठीक समझती हैं यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन चुप रहा. क्या मालूम बचपन से बगैर औरत के घर में रहने की आदत है, भाभी के साथ तालमेल बैठेगा भी या नहीं.

अभिनव के लिए लड़की देखने से पहले ही केशव ने कहा था, ‘‘इतने बरस तक यह मकान एक रैन बसेरा था लेकिन अभिनव की शादी के बाद यह घर बनेगा और इस में हम सब को सलीके से रहना होगा, ढंग के कपड़े पहन कर. मैं भी लुंगीबनियान में नहीं घूमूंगा और अभिनव, प्रभव, प्रणव, तुम सब भी चड्डी के बजाय स्लीपिंग सूट या कुरतेपाजामे खरीदो.’’

‘‘जी, पापा,’’ सब ने कह तो दिया था लेकिन मन ही मन डर भी रहे थे कि पापा का एक भरेपूरे घर का सपना वह पूरा कर सकेंगे कि नहीं.

केशव मात्र 30 वर्ष के थे जब उन की पत्नी क्रमश: 6 से 2 वर्ष की आयु के 3 बेटों को छोड़ कर चल बसी थी. सब के बहुत कहने के बावजूद उन्होंने दूसरी शादी के लिए दृढ़ता से मना कर दिया था.

वह चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. उन्होंने घर में ही आफिस खोल लिया ताकि हरदम बच्चों के साथ रहें और नौकरों पर नजर रख सकें. बच्चों को कभी उन्होंने अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. आवश्यक काम वह उन के सोने के बाद देर रात को निबटाया करते थे. उन की मेहनत और तपस्या रंग लाई. बच्चे भी बड़े सुशील और मेधावी निकले और उन की प्रैक्टिस भी बढ़ती रही. सब से अच्छा यह हुआ कि तीनों बच्चों ने पापा की तरह सीए बनने का फैसला किया. अभिनव के फाइनल परीक्षा पास करते ही केशव ने ‘केशव नारायण एंड संस’ के नाम से शहर के व्यावसायिक क्षेत्र में आफिस खोल लिया. अभिनव के लिए रिश्ते आने लगे थे. केशव की एक ही शर्त थी कि उन्हें नौकरीपेशा नहीं पढ़ीलिखी मगर घर संभालने वाली बहू चाहिए और वह भी संयुक्त परिवार की लड़की, जिसे देवरों और ससुर से घबराहट न हो.

जूही के आते ही मानो घर में बहार आ गई. सभी बहुत खुश और संतुष्ट नजर आते थे लेकिन केशव अब प्रभव की शादी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे. प्रभव ने कहा भी कि उसे इत्मीनान से परीक्षा दे लेने दें और वैसे भी जल्दी क्या है, घर में भाभी तो आ ही गई हैं.

‘‘तभी तो जल्दी है, जूही सारा दिन घर में अकेली रहती है. लड़की हमें तलाश करनी है और तैयारी भी हमें ही करनी है. तुम इत्मीनान से अपनी परीक्षा की तैयारी करते रहो. शादी परीक्षा के बाद करेंगे. पास तो तुम हो ही जाओगे.’’

अपने पास होने में तो प्रभव को कोई शक था ही नहीं सो वह बगैर हीलहुज्जत किए सपना से शादी के लिए तैयार हो गया. लेकिन हनीमून से लौटते ही यह सुन कर वह सकते में आ गया कि पापा प्रणव की शादी की बात कर रहे हैं.

‘‘अभी इसे फाइनल की पढ़ाई इत्मीनान से करने दीजिए, पापा. शादीब्याह की चर्चा से इस का ध्यान मत बटाइए,’’ प्रभव ने कहा, ‘‘भाभी की कंपनी के लिए सपना आ ही गई है तो इस की शादी की क्या जल्दी है?’’

‘‘यही तो जल्दी है कि अब इस की कोई कंपनी नहीं रही घर में,’’ केशव ने कहा.

‘‘क्या बात कर रहे हैं पापा?’’ प्रभव हंसा, ‘‘जब देखिए तब मैरी के लिटिल लैंब की तरह भाभी से चिपका रहता है और अब तो सपना भी आ गई है बैंड वैगन में शामिल होने को.’’

सपना हंसने लगी.

‘‘लेकिन देवरजी, भाभी के पीछे क्यों लगे रहते हैं यह तो पूछिए उन से.’’

‘‘जूही मुझे बता चुकी है सपना, प्रणव को इस की ममेरी बहन प्रिया पसंद है, सो मैं ने इस से कह दिया है कि अपने ननिहाल जा कर बात करे,’’ कह कर केशव चले गए.

‘‘जब बापबेटा राजी तो तुम क्या करोगे प्रभव पाजी?’’ अभिनव हंसा, ‘‘काम तो इस ने पापा के साथ ही करना है. पहली बार में पास न भी हुआ तो चलेगा लेकिन जूही, तुम्हारे मामाजी तैयार हो जाएंगे अधकचरी पढ़ाई वाले लड़के को लड़की देने को?’’

‘‘आप ने स्वयं तो कहा है कि देवरजी को काम तो पापा के साथ ही करना है सो यही बात मामाजी को समझा देंगे. प्रिया का दिल पढ़ाई में तो लगता नहीं है सो करनी तो उस की शादी ही है इसलिए जितनी जल्दी हो जाए उतना ही अच्छा है मामाजी के लिए.’’

जल्दी ही प्रिया और प्रणव की शादी भी हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि केशव जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए और कुछ लोगों की यह शंका जाहिर करने पर कि बच्चों के तो अपनेअपने घरसंसार बस गए, केशव के लिए अब किस के पास समय होगा और वह अकेले पड़ जाएंगे, अभिनव बोला, ‘‘ऐसा हम कभी होने नहीं देंगे और होने का सवाल भी नहीं उठता क्योंकि रोज सुबह नाश्ता कर के सब इकट्ठे ही आफिस के लिए निकलते हैं और रात को इकट्ठे आ कर खाना खाते हैं, उस के बाद पापा तो टहलने जाते हैं और हम लोग टीवी देखते हैं, कभीकभी पापा भी हमारे साथ बैठ जाते हैं. रविवार को सब देर से सो कर उठते हैं, इकट्ठे नाश्ता करते हैं…’’

Father’s Day Special – हमारी अमृता- भाग 1: क्या अमृता को पापा का प्यार मिला?

हमेशा की तरह आज भी बंगले के लान में पार्टी का आयोजन किया गया था. वीना सुबह से व्यस्त थीं. उन के घर की हर पार्टी यादगार होती है. दोनों बेटियां, कविता और वनिता भी तैयार हो कर आ गई थीं. वीना के पति अमरनाथ विशिष्ट मेहमानों को लाने होटल गए थे. मद्धिम रोशनी, लान में लगाई गई खूबसूरत कुरसियां और गरमागरम पकवानों से आती खुशबू, कहीं कुछ भी कम न था.

अमर मेहमानों को ले कर लान में दाखिल हुए. उन के स्वागत के बाद वीना सूप सर्व कर रही थीं कि अंदर से जोरजोर से चीखने की आवाज आने लगी, ‘मम्मी…मम्मी, मुझे बाहर निकालो.’ वीना हाथ का सामान छोड़ कर अंदर भागीं. इधर पार्टी में कानाफूसी होने लगी. कविता और वनिता चकित रह गईं. अमरनाथ के चेहरे पर अजीब हावभाव आजा रहे थे. लोग भी कुतूहल से अंदर की ओर देखने लगे. वीना ने फुरती से अमृता को संभाल लिया और पार्टी फिर शुरू हो गई.

यह अमृता कौन है? अमृता, वीना की तीसरी बेटी है. वह मानसिक रूप से अपंग है, पर यह बात बहुत कम लोग ही जानते हैं. ज्यादातर लोग उन की दोनों बड़ी बेटियों के बारे में ही जानते हैं.

अमृता की अपंगता को ले कर इस परिवार में एक तरह की हीनभावना है. हर कोई अमृता के बारे में चर्चा करने से कतराता है. वीना तो मां है और मां का हृदय संतान के लिए, भले ही वह कैसी भी हो, तड़पता है. किंतु परिवार के अन्य सदस्यों के आगे वह भी मजबूर हो जाती है.

वीना ने तीसरा चांस बेटे के लिए लिया था. कविता और वनिता जैसी सुंदर बच्चियों से घर की बगिया खिली हुई थी. इस बगिया में यदि प्यार से एक बेटे का समावेश हो जाए तो कितना अच्छा रहे, यही पतिपत्नी दोनों की इच्छा थी, पर बेटा नहीं हुआ. उन की आशाओं पर तुषारापात करने के लिए फिर बेटी हुई, वह भी मानसिक रूप से अपंग. शुरू में वह जान ही न पाए कि उन की बेटी में कोई कमी है, पर ज्योंज्यों समय गुजरता गया, उस की एकएक कमी सामने आने लगी.

अमृता अभी 14 साल की है किंतु मस्तिष्क 5-6 साल के बच्चे के समान ही है. घर की व्यवस्था, पति और बच्चे, इन सब के साथ अमृता को संभालना, वीना के लिए अच्छी कसरत हो जाती है. कहने को तो घर में कई नौकरचाकर थे पर अमृता, उसे तो मां चाहिए, मां का पल्लू थामे वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करती है.

पार्टी समाप्त होने पर अमर ने जूते उतारते हुए वीना से कहा, ‘‘तुम पार्टी के समय अमृता की ठीक से व्यवस्था क्यों नहीं करतीं, चाहो तो मैं आफिस से सर्वेंटस भेज देता हूं. मगर मैं कोई व्यवधान नहीं चाहता.’’

थकी हुई वीना की आंखों में आंसू आ गए. वह धीरे से बोलीं, ‘‘आप के आफिस की फौज अमृता के लिए कुछ नहीं कर सकती, अमृता मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकती.’’

‘‘अमृता…अमृता…’’ अमर ने चिल्ला कर कहा, ‘‘न जाने तुम ने इस विषवेल का नाम अमृता क्यों रखा है. कई बार कहा कि कई मिशनरियां ऐसे बच्चों की अच्छी तरह देखभाल करती हैं. इसे तुम वहां क्यों नहीं छोड़ देतीं.’’

‘‘अमृता इस घर से कहीं नहीं जाएगी,’’ वीना ने सख्ती से कहा, ‘‘यदि वह गई तो मैं भी चली जाऊंगी.’’

कविता और वनिता ने मम्मीपापा की बहस सुनी तो वे चुपचाप अपने कमरे में चली गईं. इस घर में ऐसी बहस अकसर होती है. कविता के हृदय में अमृता के प्रति असीम प्रेम है किंतु वनिता को वह फूटी आंख नहीं भाती क्योंकि मम्मी अमृता के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि उस का जरा भी ध्यान नहीं रखतीं.

16 साल की वनिता 11वीं की छात्रा है. अमृता के जन्म के बाद उसे मां की ओर से कम ही समय मिलता था इसलिए अभी भी वह स्वयं को अतृप्त महसूस करती है.

18 वर्षीय कविता बी.ए. द्वितीय वर्ष की छात्रा है. वह बेहद खूबसूरत और भावुक स्वभाव की है. किसी का भी दुख देख कर उस की आंखों में आंसू आ जाते हैं. अमृता को संभालने में वह मां की पूरी मदद करती है.

पति की बहस के बाद वीना अमृता के कमरे में चली गईं. उसे संभालने वाली बाई वहां थी. अमृता खिलौनों से खेल रही थी. कभीकभी उन्हें उठा कर फेंक भी देती. वीना को देख कर वह उन से लिपट गई. आंखों से आंसू और मुंह से लार बहने लगी. वीना ने पहले तो रूमाल से उस का चेहरा पोंछा, फिर बाई को वहां से जाने को कहा. उन्होंने अपने हाथों से अमृता को खाना खिलाया और उसे साथ ले कर सुलाने लगीं.

अमृता के साथ वीना इतनी जुड़ी हुई हैं कि वह अकसर घर के कई जरूरी काम भूल जातीं. उन्हें अमृता जब भी नजर नहीं आती है तो वह घबरा जाती हैं.

अमृता ने किशोरावस्था में प्रवेश कर लिया था. शरीर की वृद्धि बराबर हो रही थी किंतु मस्तिष्क अभी भी छोटे बच्चे की तरह ही था. कई बार वह बिछौना भी गीला कर देती. आंखों में दवा डाल कर वीना को उस की देखभाल करनी पड़ती थी. ज्यादा काम से वह कई बार चिड़चिड़ी भी हो जाती थीं.

परसों ही जब वनिता की सहेलियां आई थीं और वीना किचन में व्यस्त थीं, बाई को चकमा दे कर अमृता वहां आ पहुंची और टेबल पर रखी पेस्ट्री इस तरह खाने लगी कि पूरा मुंह गंदा हो गया. वनिता को ज्यादा शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. वह सहेलियों को ले कर अपने कमरे में चली गई. सहेलियों के बारबार पूछने पर भी वनिता ने नहीं बताया कि ऐसी हरकत करने वाली लड़की और कोई नहीं उस की बहन है.

सहेलियों के जाने के बाद उस ने अमृता को 2 थप्पड़ लगा दिए. अचानक पड़ी इस मार से अमृता का चेहरा लाल हो गया. वह सिर पटकपटक कर रोने लगी. वीना को सारा काम छोड़ कर आना पड़ा. जब उन्हें वनिता के दुर्व्यवहार के बारे में पता चला तब उन्होंने वनिता को खूब लताड़ा. वनिता गुस्से से बिफर पड़ी, ‘‘मम्मी, आप सुन लीजिए, इस घर में मैं रहूंगी या यह आप की लाड़ली रहेगी,’’ और पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गई. वीना के हृदय पर क्या वज्रघात हुआ, यह वनिता जान न सकी.

इतना बड़ा घर, नौकरचाकर, सुखसुविधाओं का हर सामान होने पर भी इस घर में मानसिक शांति नहीं है. अमर के अहंकार के आगे वीना को हर बार झुकना पड़ता है. एक अमृता की बात पर ही वह अड़ जाती हैं, बाकी हर बातें वह अमर की मानती हैं.

कभी वीना के मन में विचार आता है कि सभी के बच्चे पूर्णत्व ले कर आते हैं, एक मेरी अमृता ही क्यों अपूर्ण रह गई. पल भर के लिए ऐसे विचार आने पर वह तुरंत उन्हें झटक देतीं और फिर नए उत्साह से अमृता की सेवा में जुट जातीं, पर पति का असहयोग उन्हें पलपल खलता.

ऐसा नहीं था कि अमर के मन में अमृता के प्रति बिलकुल प्रेम न था किंतु जहां सोसायटी के सामने आने की बात आती वह अमृता का परिचय देने से कतराते थे. कल सुबह ही जब अमर चाय पी रहे थे, अमृता छोटी सी गुडि़या ले कर उन के पास आ गई. हर दम चीख कर बोलने वाली अमृता आज धीरे से अस्पष्ट शब्दों में बोली, ‘‘पापा, मेरी गुडि़या के लिए नई फ्राक लाइए न.’’ तब पापा को भी उस पर प्यार उमड़ आया था. उस के गाल थपथपा कर बोले, ‘‘जरूर ला देंगे.’’

शेष चिह्न: भाग 1 – कैसा था निधि का ससुराल

निधि की शादी तय हो गई थी पर उस को ऐसा लग रहा था मानो मरघट पर जाना है…लाश के साथ नहीं, खुद लाश बन कर. उस का और मेरा परिचय एक प्राइवेट स्कूल में हुआ था जिस में मैं अंगरेजी की अध्यापिका थी और वह साइंस की अध्यापिका हो कर आई थी.

उस का अप्रतिम रूप, कमल पंखड़ी सा गुलाबी रंग, पतला छरहरा बदन, सौम्य नाकनक्श थे पर घर की गरीबी के कारण विवाह न हो पा रहा था.

निधि का छोटा सा कच्चा पुश्तैनी मकान था. परिवार में 4 बहनों पर एकमात्र छोटा भाई अविनाश था. बस, सस्ते कपड़ों को ओढ़तेपहनते, गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह खिंच रही थी.

बड़ी बहन आरती के ग्रेजुएट होते ही एक क्लर्क से बात पक्की कर दी गई तो पिता ने कुछ जी.पी.एफ. से रुपए निकाल कर विवाह की रस्में पूरी कीं. किसी प्रकार आरती घर से विदा हो गई. सब ने चैन की सांस ली. कुछ महीने आराम से निकल गए.

आरती को दान- दहेज के नाम पर साधारण सामान ही दे पाए थे. न टेलीविजन न अन्य सामान, न सोना न चांदी. ससुराल में उस पर जुल्मों के पहाड़ टूटने लगे पर वह सब सहती रही.

फिर एक दिन उस ने अपनी कोख से बेटे के बजाय बेटी जनी तो उस पर जुल्म और बढ़ते ही गए. और एक रात अत्याचारों से घबरा कर वह पड़ोसियों की मदद से रोतीकलपती अपने साथ एक नन्ही सी जान को ले कर पिता की देहरी पर लौट आई. उस का यह हाल देख कर पूरे परिवार की चीत्कार पड़ोस तक जा पहुंची. फिर क्याकुछ नहीं भुगता पूरे घर ने. आरती ने तो कसम खा ली थी कि वह जीवन भर वहां नहीं जाएगी जहां ऐसे नराधम रहते हैं.

इस तरह मय ब्याज के बेटी वापस आ गई. अत्याचारों की गाथा, चोटों के निशान देख कर फिर उसी घर में बहन को भेजने का सब से ज्यादा विरोध निधि ने ही किया. 3-4 वर्ष के भीतर  ही तलाक हो गया तो मातापिता की छाती पर फिर से 4 बेटियों का भार बढ़ गया.

मुसीबत जैसे चारों ओर से काले बादलों की तरह घिर आई थी. उस पर महंगाई की मार ने सब कुछ अस्तव्यस्त कर दिया. जो सब की कमाई के पैसे मिलते वह गरम तवे पर पानी की बूंद से छन्न हो जाते. तीजत्योहार सूखेसूखे बीतते. अच्छा खाना उन्हें तब ही नसीब होता जब पासपड़ोस में शादी- विवाह होते. अच्छे सूटसाड़ी पहनने को उन का मन ललक उठता, पर सब लड़कियां मन मार कर रह जातीं.

निधि तो बेहद क्षुब्ध हो उठती. जहां उस के विवाह की बात होती, उस का रूप देख कर लड़के मुग्ध हो जाते  पर दानदहेज के लोभी उस के गुणशील को अनदेखा कर मुंह मोड़ लेते.

निधि मुझ से कहती, ‘‘सच कहती हूं मीनू, लगता है कहीं से इतना पैसा पा जाऊं कि अपने घर की दशा सुधार दूं. इस के लिए यदि कोई रईस बूढ़ा भी मिलेगा तो मैं शादी के लिए तैयार हो जाऊंगी. बहुत दुख, अभाव झेले हैं मेरे पूरे परिवार ने.’’

‘‘तू पागल हो गई है क्या? अपना पद्मिनी सा रूप देखा है आईने में? मेरे सामने ऐसी बात मत करना वरना दोस्ती छोड़ दूंगी. परिवार के लिए बूढ़े से ब्याह करेगी? क्या तू ने ही पूरे घर का ठेका लिया है? और भी कोई सोचता है ऐसा क्या?’’

मेरी आंखें नम हो गईं तो देखा वह भी अपनी पलकें पोंछ रही थी.

‘‘सच मीनू, तू ने गरीबी की परछाईं नहीं देखी पर हम बचपन से ही इसे भोग रहे हैं. अरे, अपनों के लिए इनसान बड़े से बड़ा त्याग करता है. मैं मर जाऊं तो मेरी आत्मा धन्य हो जाएगी. बीमार अम्मां व बाबूजी कैसे जी पाएंगे अपनी प्यारी बेटियों को दुखी देख कर. पता है, मैं पूरे 28 वर्ष की हो गई हूं, नीतिप्रीति भी विवाह की आयु तक पहुंच गई हैं. मुझे कई लड़के देख चुके हैं. लड़की पसंद, शिक्षा पसंद, नहीं पसंद है तो कम दहेज. यही तो हम सब के साथ होगा. धन के आगे हमारे रूपगुण सब फीके पड़ गए हैं.’’

उस की बातों पर मैं हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘अरे, तू तो किसी घर की राजरानी बनेगी. देख लेना तेरा दूल्हा सिरआंखों पर बैठाएगा तुझे. धनदौलत पर लोटेगी तू्.’’

‘‘रहने दे, ऐसे ऊंचे सपने मत दिखा, जो आगे चल कर मेरी छाती में टीस दें. हां, तुझे अवश्य ऐसा ही वरघर मिलेगा. अकेली बेटी, 2 बड़े भाई, सब ऊंचे पदों पर.’’

‘‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली? बड़े परिवार की समस्या पर ही तो सोचती हूं ऐसा, अपनी कुरबानी देने की.’’

फिर आएदिन मैं यही सुनती थी कि निधि को देखने वाले आए और गए. धन के अभाव में सब मुंह चुरा गए. इतनी तगड़ी मांगें कि घर भर के सिर फिर जाते. यहां तो शादी का खर्च उठाना मुश्किल था. उस पर लाखों की मांग.

एक दिन गरमी की दोपहर में आ कर निधि ने विस्फोट किया, ‘‘मीनू, तुझे याद है एक बार मैं ने तुझ से कहा था कि अगर कोई मालदार धनी बूढ़ा वर ही मिल जाएगा तो मैं उस से शादी करने को तैयार हो जाऊंगी. लगता है वही हो रहा है.’’

मैं ने घबरा कर अपनी छाती थाम ली फिर गुस्से से भर कर बोली, ‘‘तो क्या किसी बूढ़े खूसट का संदेशा आया है और तू तैयार हो गई है?’’ इतना कह कर तब मैं ने उस के दोनों कंधे झकझोर दिए थे.

वह बच्चों सी हंसी हंस दी. फिर पसीना पोंछती हुई बोली, ‘‘तू तो ऐसी घबरा रही है जैसे मेरे बजाय तेरी शादी होने जा रही है. देख, मैं बूढ़े खूसट की फोटो लाई हूं. उस की उम्र 40 के आसपास है और वह दुहेजा है. 4 साल पहले पत्नी मर गई थी.’’

उस ने फोटो मेरे हाथ पर रख दिया. ‘‘अरे वाह, यह तो बूढ़ा नहीं जवान, सुंदर है. तू मजाक कर रही है मुझ से?’’

‘‘नहीं रे, मजाक नहीं कर रही… दुहेजा है.’’

‘‘कहीं दहेज के चक्कर में पहली को मार तो नहीं डाला. क्या चक्कर है?’’ मैं बोली.

‘‘यह मेरी मौसी की ननद का देवर है,’’ निधि ने बताया.

‘‘सेल्स टेक्स कमिश्नर है. तीसरी बार बेटे को जन्म देते समय पत्नी की मौत हो गई थी.’’

‘‘तो क्या 2 संतान और हैं?’’

‘‘हां, 1 बेटी 10 साल की, दूसरी 8 साल की.’’

‘‘तो तुझे सौतेली मां का दर्जा देने आया है?’’

‘‘यह तो है पर पत्नी की मृत्यु के 4 साल बाद बड़ी मुश्किल से दूसरी शादी को तैयार हुआ है. घर पर बूढ़ी मां हैं. एक बड़ी बहन है जो कहीं दूर ब्याही गई है, बढ़ती बच्चियों को कौन संभाले. वह ठहरे नौकरीपेशा वाले. समय खराब है. इस से उन्हें तैयार होना पड़ा.’’

‘‘तो तू जाते ही मां बनने को तैयार हो गई, मदर इंडिया.’’

‘‘हां रे. अम्मांबाबूजी तो तैयार नहीं थे. मौसी प्रस्ताव ले कर आई थीं. मुझ से पूछा तो मैं क्या करती. जन्म भर अम्मांबाबूजी की छाती पर मूंग तो न दलती. दीदी व उन की बेटी बोझ बन कर ही तो रह रही हैं. फिर 2 बहनें और भी शूल सी गड़ती होंगी उन की आंखों में. कब तक बैठाए रहेंगे बेटियों को छाती पर?

‘‘मैं अगर इस रिश्ते को हां कर दूंगी तो सब संभल जाएगा. धन की उन के यहां कमी नहीं है, लखनऊ में अपनी कोठी है. ढेरों आम व कटहल के बगीचे हैं. नौकरचाकर सब हैं.

‘‘मैं सब को ऊपर उठा दूंगी, मीनू,’’ निधि ने जैसे अपने दर्द को पीते हुए कहा, ‘‘मेरे मातापिता की कुछ उम्र बच जाएगी नहीं तो उन के बाद हम सब कहां जाएंगे. बाबूजी 2 वर्ष बाद ही तो रिटायर हो रहे हैं, फिर पेंशन से क्या होगा इतने बड़े परिवार का? बता तो तू?’’

मैं ने निधि को खींच कर छाती से लगा लिया. लगा, एक इतनी खूबसूरत हस्ती जानबूझ कर अपने को परिवार के लिए कुरबान कर रही है. मेरे साथ वह भी फूटफूट कर रो पड़ी.

निधि शाम को आने का मुझ से वचन ले कर वापस लौट गई. फिर शाम को भारी मन लिए मैं उस के घर पहुंची. उस की मौसी आ चुकी थीं और वर के रूप में भूपेंद्र बैठक में आराम कर रहे थे. निधि को अभी देखा नहीं था. मैं मौसी के पास बैठ कर वर के घर की धनदौलत का गुणगान सुनती रही.

‘‘बेटी, तुम निधि की सहेली हो न,’’ मौसी ने पूछा, ‘‘वह खुश तो है इस शादी से, तुम से कुछ बात हुई?’’

‘‘मौसी? यह आप स्वयं निधि से पूछ लो. पास ही तो बैठी है वह.’’

‘‘वह तो कुछ बोलती ही नहीं है, चुप बैठी है.’’

‘‘इसी में उस की भलाई है,’’ मैं जैसे बगावत पर उतर आई थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Father’s Day Special:अपनाअपना क्षितिज- भाग 1: एक बच्चे के लिए तड़पते सत्यव्रत

प्रशांत को देखते ही प्रभावती की जान में जान आ गई. प्रशांत ने भी जैसे ही मां को देखा दौड़ कर उन के गले लग गया, ‘‘मां, यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी.’’

प्रभावती के गले से आवाज ही न निकली. बहुत जोर से हिचकी ले कर वह फूटफूट कर रो पड़ीं. प्रशांत ने उन्हें रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. इस रोने में प्रभावती को विशेष आनंद मिल रहा था. बरसों से इकट्ठे दुख का अंबार जैसे किसी ने धो कर बहा दिया हो.

थोड़ी देर बाद धीरे से  प्रशांत स्वयं हटा और उन्हें बैठाते हुए पूछा, ‘‘मां, पिताजी कहां हैं?’’

‘‘अंदर,’’ वह बड़ी कठिनाई  से बोलीं. एक क्षण को मन हुआ कि कह दें, पिताजी हैं ही कहां. पर जीभ को दांतों से दबा कर खुद को बोलने से रोक लिया. सच बात तो यह थी कि वह अपने जिस पिता के बारे में पूछ रहा था वह तो कब के विदा हो चुके थे. अवकाश ग्रहण के 2 माह बाद ही या एक तरह से सुशांत के पैरों पर खड़ा होते ही उन की देह भर रह गई थी और जैसे सबकुछ उड़ गया था.

अपनी आवाज की एक कड़क से, अपनी भौंहों के एक इशारे से पिताजी का जो व्यक्तित्व इस्पात की तरह सब के सामने  बिना आए ही खड़ा हो जाता था, वह पिताजी अब उसे कहां मिलेंगे.

प्रशांत दूसरे कमरे की ओर बढ़ा तो तुरंत प्रभावती के पैरों पर रजनी आ कर झुक गई और साथ ही 7 बरस का नन्हा प्रकाश. उन्होंने पोते को भींच कर छाती से लगा लिया. मेले में बिछुड़ गए परिवार की तरह वह सब से मिल रही थीं. पूरे 7 साल बाद प्रशांत और रजनी से भेंट हो रही थी. वह प्रकाश को तो चलते हुए पहली बार देख रही थीं. उस की डगमग चाल, तुतलाती बोली, कच्ची दूधिया हंसी, यह सब वह देखसुन नहीं सकी थीं. साल दर साल केवल उस के जन्मदिन पर उन के पास प्रकाश का एक सुंदर सा फोटो आ जाता था औैर उन्हें इतने से ही संतोष कर लेना पड़ता था कि अब मेरा प्रकाश ऐसे दिखाई देने लगा है.

7 साल पहले जब वह कुल 9 माह का था, तभी प्रशांत घर छोड़ कर अपने परिवार को ले कर वहां से दूर बंगलौर चला गया था. इस अलगाव  के पीछे मुख्य कारण था प्रशांत और सुशांत की आपसी नासमझी और उन के पिता द्वारा बोया गया विषैला बीज. सुशांत डाक्टर था और प्रशांत कालिज में शिक्षक. बस, यही अंतर दोनों के मध्य उन के पिता के कारण बड़ा होता चला गया और इतना बड़ा कि फिर पाटा न जा सका.

उन के पिता सत्यव्रत शुरू से ही चाहते थे कि दोनों बच्चे डाक्टर बनें. इस के लिए उन्होंने अपनी सीमित आय की कभी परवा नहीं की. उन का बराबर यही प्रयत्न रहा कि उन के बच्चों को कभी किसी चीज का अभाव न खटके.

सत्यव्रत दफ्तर से लौटने के बाद बच्चों की पढ़ाई  पर ध्यान देते. उन का पाठ सुनते, उन्हें समझाते, उन की गलतियां सुधारते, उन्हें स्वयं नाश्ता परोसते, उन के कपड़े बदलते, बत्ती जलाते, मसहरी लगाते पुस्तकें खोल कर रखते. बच्चे पढ़तेपढ़ते सोने लगते तो पंखा चला देते. दूध का गिलास थमाते. कभी अपने हिस्से का दूध भी दोनों के गिलास में उडे़ल देते. सोचते, ‘बहुत पढ़ते हैं दोनों. गिलास भर दूध से इन का क्या होगा.’

भविष्य के दर्पण में उन्हें 2 डाक्टर बेटों का अक्स दिखाई पड़ता और वह दोगुनेचौगुने गर्व से झूम उठते. अपने इस सपने को बुनने में बस, इसी बात का कोई ध्यान नहीं रखा कि असल में उन के बेटे क्या चाहते हैं. उन की रुचि किस बात में है, डाक्टर बनने में या इंजीनियर अथवा कुछ और बनने में.

सत्यव्रत इस मामले में एक तानाशाह की तरह थे. जो सोच लिया वह बच्चों को पूरा करना ही है. वह सदा यही सोच कर चलते थे, पर ऐसा हो कहां सका. बड़े लड़के प्रशांत को डाक्टर बनने में कोई रुचि  नहीं थी. उस का कविताओं, कहानियों, पेंटिंग, साहित्य में खूब मन लगता था. कई बार वह पढ़ाई  के ही मध्य में आड़ीतिरछी लकीरें खींचता पकड़ा जाता था. कभी रेखागणित की आकृतियां बनातेबनाते पन्ने पर कविता लिखने लगता था.

सत्यव्रत की नजर उस पर पड़ जाती तो जैसे आग में घी पड़ जाता. खूब कस कर धुनाई होती उस की. खाना बंद कर दिया जाता. उसे सोने नहीं दिया जाता. यहां तक कि प्यास से उस का कंठ सूखने लगता, पर वह नल में मुंह नहीं लगा सकता था.

वह अकसर कहा करते, ‘साहित्य, पेंटिंग, कविता भी कोई विषय हैं?’

प्रभावती सन्न रह जातीं. हाथ जोड़ कर कहतीं, ‘मेरे बेटे को इतना मत सताओ.  उस की तो तारीफ होनी चाहिए कि वह इतनी बढि़या कहानियां लिखता है. तुम्हें कब अक्ल आएगी पता नहीं.’

‘कविता, कहानी से पेट नहीं भरता,’ वह चीख कर कहते, ‘जानती हो न कि कितने कवि और लेखक भूखों मरते हैं?’

वह इतने से ही बस न करते. कहते, ‘मैं जानता हूं, तुम्हीं प्रशांत का दिमाग बिगाड़ रही हो. पर अच्छी तरह समझ लो इसे कवि या शिक्षक नहीं, डाक्टर बनना है. इस का भोजन अभी तो एक दिन ही बंद हुआ है, कभी हफ्ते भर भी बंद किया जा सकता है.’

डर से प्रभावती के हाथ फूल जाते, क्या कहें बेटे को. हर व्यक्ति एक ही बात को आसानी से नहीं सीख सकता. किसी के लिए हिसाब आसान है तो किसी के लिए इतिहास. प्रकृति ने सब की समझ का पैमाना एक कहां रखा है? पर वह यह भेद अपने पति को न समझा पातीं. उन्हें  तमाशाई  बन कर चुपचाप सबकुछ देखना, सहना पड़ता.

सब से बुरी हालत तो प्रशांत की हो गईर्र्  थी. अपनी और पिता की इच्छाओं के मध्य वह झूलता रहता था. न वह कविता लिखना छोड़ सकता था न पिता की तमन्ना पूरी करने से पीछे हटना चाहता था. दिनरात किताब उस की आंखों के आगे लगी रहती थी. इस चक्कर में आंखों पर मोटे फे्रम का चश्मा चढ़ गया था. चेहरे की चमक खो गई थी. वह किसी से कुछ कहता नहीं था. बस, भीतर ही भीतर छटपटाता रहता था.

इस के विपरीत सुशांत की आंखोंं के आगे बस, एक ही सपना तैरता रहता था, डाक्टर बनने का. उस के लिए उसे न पिता से मदद लेने की जरूरत थी न मां से. प्रशांत को बड़ी तेजी से पीछे छोड़ता हुआ सुशांत अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था.

शक की सूई – भाग 1: जब पति ने किया पत्नी का पीछा

” पता नहीं, इन मर्दों की अक्ल कब ठिकाने आएगी. कब तक वे अपनी पत्नियों को गुलाम समझते रहेंगे. जमाना बदलता रहा, लोगों की जरूरतें बदलती रहीं, लोग धरती से चांद तक पहुंच गए, धरती पर जगह कम पड़ने लगी तो चांद पर घर बनाने की सोचने लगे, पर मर्द समाज की सोच नहीं बदली. वही आदिम सोच, वही गलत हरकतें और वही दबदबा.

‘‘खुद तो 10-10 औरतों के साथ कनैक्ट रहेंगे, संबंध रखेंगे, हाटबाजार, सिनेमाघर में घूमेंगे, लेकिन खुद की पत्नी गांव के देशी घी की तरह शुद्ध और पवित्र चाहिए…’’

‘‘क्या हुआ, यह सुबहसुबह किसे कोसे जा रही हो?’’

‘‘तुम्हें कोस रही हूं और किसे कोसूंगी. दूसरे को कोसने की क्या जरूरत पड़ी है मुझे. पत्नी की जासूसी करना, उस का पीछा करना यही तो काम रह गया है तुम मर्दों का. खुद तो काम करेंगे नहीं, पर कमाऊ पत्नियों का पीछा जरूर करेंगे,’’ आंगन में झाड़ू लगा रही जयंती ने अपने पति प्रमोद की ओर देखते हुए व्यंग्यबाण चला दिया.

पेट हलका करने वाशरूम जा रहे प्रमोद का मानो पैर भारी हो गया. वह ठिठक कर रुक गया. उस का प्रैशर रुक गया और उस का चेहरा सफेद पड़ गया.

‘‘क्या हुआ? मेरी बात सुनते ही सुबह की बेला में तुम्हारे चेहरे पर ये बारह क्यों बज गए? जल्दी जाओ,’’ झाड़ू लगा रही जयंती की नजरें प्रमोद पर चिपक गईं और प्रमोद पसीनापसीना हो गया. एकदम से उस के दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

‘‘अरे, मैं तुम्हारी बात नहीं, बल्कि मीरा के पति की बात कर रही हूं. तुम टैंशन मत लो, जाओ वरना तुम्हारा बीपी भी हाई हो जाएगा…’’

‘‘अब तो पूरी बात सुने बिना मेरा पेट भी हलका नहीं होगा,’’ प्रमोद ने छाती पर हाथ रखा, धड़कनों की रफ्तार थोड़ी कम महसूस हुई.

‘‘अरे, वह मीरा है न, शेखर की पत्नी, सरहुल में जिन से तुम्हें मिलवाया भी था…’’ जयंती ने प्रमोद को बताया, ‘‘बैंक की नौकरी छोड़ दी कल उस ने. कल ही शाम को फोन कर के इस की सूचना देते हुए मुझे बता रही थी. देर तक हिचकहिचक कर रोती रही थी बेचारी…’’

‘‘क्यों…? ऐसा क्या हो गया, जो अच्छीभली सरकारी नौकरी छोड़ दी उस ने?’’ प्रमोद ने धीरे से पूछा.

‘‘शक…’’ कहते हुए जयंती ने पति पर नजरें गड़ा दीं.

‘‘कैसा शक…?’’ प्रमोद घबरा उठा.

‘‘पत्नी के चालचलन पर शक…’’ जयंती ने जोड़ा.

‘‘इस वजह से कोई नौकरी छोड़ देगा… जरूर कोई खास बात होगी.’’

‘‘हांहां, खास बात ही थी…’’ जयंती इस बार चीख पड़ी थी, ‘‘6 महीने पहले वह फोन पर मुझे बता रही थी कि उस का पति पीठ पीछे उस की जासूसी कर रहा है, छिपछिप कर उस का पीछा कर रहा है. बैंक आ कर किसी कोने में छिप कर बैठ जाता है. वह किधर जाती है, कहां और किस के पास ज्यादा देर बैठती है, किस के साथ चाय पीती है और किस के साथ लंच… वह सब देखता रहेगा और घर आने पर शाम को शराब के नशे में खूब बकने लगेगा.

‘‘एक रात तो उस ने हद कर दी और मीरा से पूछने लगा कि मैनेजर के केबिन में घुस कर आधे घंटे तक क्या कर रही थी? मर्दों के बीच बैठ कर हंसहंस कर चाय पीने में बहुत मजा आता है? तुम अपने केबिन में चाय नहीं पी सकती… और उसे गाली बकने लगा.

‘‘वह इतने पर ही नहीं रुका. मीरा के बाल पकड़ कर उसे जमीन पर पटक कर उस पर चढ़ गया. यह सबकुछ इतनी जल्दी हो गया कि वह संभल भी नहीं पाई और उस की गिरफ्त में आ गई. उस रात वह सो नहीं पाई. सारी रात रोती रही और सोचती रही कि वह अब नौकरी नहीं करेगी. इस जिल्लत भरी जिंदगी जीने से अच्छा है कि नौकरी ही छोड़ दे. नौकरी करो, कमा कर पैसे लाओ और मर्द की मार भी खाओ, यह सब उस से नहीं होगा.

‘‘पड़ोसन को देख कर पति लार टपकाए और पत्नी घूंघट से बाहर नहीं निकले. इस मानसिक विकलांग मर्द के साथ रहना नामुमकिन है. मीरा ने रात को ही 2 बार रिजाइन लैटर लिखा, पर दोनों बार फाड़ देना पड़ा. सामने सो रहे 2 साल के मासूम बेटे का चेहरा घूमे जा रहा था. नौकरी छोड़ देगी तो इस के भविष्य का क्या होगा.

‘‘मीरा के मुंह से यह सुन कर ही मेरा खून खौल उठा था. ऐसे पतियों के ऊपर गरम तेल उड़ेल देना चाहिए…’’ जयंती ने कहा और फिर झाड़ू लगाने लगी.

प्रमोद का प्रैशर काफी बढ़ गया था. कुकर की तरह पेट में बारबार सीटी बजने लगी, तो वह वाशरूम की तरफ दौड़ पड़ा. जयंती का यह रूप वह पहली बार देख रहा था.

प्रमोद सोचने लगा, ‘कहीं इस को शक तो नहीं हो गया? कहीं यह जान तो नहीं गई कि इस का भी पीछा किया जा रहा है? मेरी मति मारी गई थी, जो उस रघु की बातों में आ गया. कमबख्त ने मुझे आग में कुदवा दिया. ‘भाभी पर नजर रखो. बड़े बाबू और उस के संबंधों को ले कर औफिस में बड़े गरमागरम चर्चे हैं,’ रघु ने यह बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा था.

‘न मैं उस की बातों में आता और न आज वाशरूम में इस तरह मुंह छिपा कर बैठना पड़ता मुझे…’ प्रमोद वाशरूम में सोच रहा था.

प्रमोद रघु की बातों में आ कर पिछले एक महीने से जयंती का पीछा कर रहा था. जयंती को इस की खबर न थी. वह हर दिन समय पर औफिस पहुंचती और अपने काम पर लग जाती थी. राजेश बाबू, जो उस के बौस थे, वे उसे जो भी काम सौंपते, वह खुशीखुशी पूरा करने में लग जाती थी. आखिर औफिस में आज उस की जो हैसियत है, सब राजेश बाबू की ही तो देन है.

अपनी 5 फुट की चंचल काया और गजगामिनी सी चाल चल कर जब जयंती औफिस पहुंचती तो बहुतों की आह निकल आती. उसे देख कर राजेश बाबू मंदमंद मुसकरा उठते थे. उस मुसकराहट के पीछे छिपे प्यार को सिर्फ जयंती ही समझती थी. बाकी अपने सिर के बाल खुजलाते रहते थे.

उधर जयंती को प्रमोद हर रोज औफिस गेट के अंदर छोड़ कर वापस घर लौट जाता, फिर दोपहर में छुट्टी के समय लेने चला आता था.

अपहरण का ऊंचा खेल

डा. श्रीकांत गौड़ पूर्वी दिल्ली के प्रीत विहार स्थित मैट्रो अस्पताल में नौकरी करते थे. 6 जुलाई, 2017 को वह ड्यूटी पूरी कर प्रीत विहार मैट्रो स्टेशन पर पहुंचे. वहीं से मैट्रो पकड़ कर वह दक्षिणी दिल्ली के गौतमनगर स्थित अपने घर जाते थे. लेकिन उस दिन रात के साढ़े 11 बज चुके थे और आखिरी मैट्रो ट्रेन भी जा चुकी थी. अब घर जाने के लिए औटोरिक्शा या टैक्सी थी. सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने टैक्सी से जाना उचित समझा.

उन्होंने गौतमनगर जाने के लिए फोन से ओला कैब बुक की तो कुछ ही देर में ओला कैब प्रीत विहार मैट्रो स्टेशन के पास आ कर खड़ी हो गई. कैब में बैठ कर डा. श्रीकांत ने अपने साथ काम करने वाले डा. राकेश कुमार को फोन कर के बता दिया कि वह ओला कैब से अपने घर जा रहे हैं. डा. राकेश ही उन्हें अपनी कार से प्रीत विहार मैट्रो स्टेशन छोड़ कर गए थे.

अगले दिन 7 जुलाई को डा. श्रीकांत गौड़ अपनी ड्यूटी नहीं पहुंचे तो डा. राकेश ने उन्हें फोन किया. उन का फोन स्विच्ड औफ था. दिन में उन का फोन कभी बंद नहीं रहता था. श्रीकांत को हैल्थ प्रौब्लम या कोई काम होता तो वह अस्पताल में फोन कर देते. लेकिन उस दिन उन का अस्पताल में कोई फोन भी नहीं आया था. डा. राकेश ने उन्हें कई बार फोन मिलाया, लेकिन हर बार फोन बंद मिला.

डा. राकेश को डा. श्रीकांत की चिंता हो रही थी. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर से फोन किया. इस बार उन के फोन पर घंटी बजी तो फोन रिसीव होते ही राकेश ने कहा, ‘‘श्रीकांत भाई, कहां हो, फोन भी बंद कर रखा है. मैं कब से परेशान हो रहा हूं.’’

दूसरी ओर से जो आवाज आई, उसे सुन कर वह चौंके. आवाज उन के दोस्त श्रीकांत के बजाय किसी और की थी. उस ने उन से सीधे बात करने के बजाय गालियों की बौछार कर दी. राकेश ने उस से पूछना चाहा कि कौन बोल रहे हैं और इस तरह बात क्यों कर रहे हैं तो उस ने फोन काट दिया.

उस आदमी की टपोरी जैसी बातों से डा. राकेश को लगा कि श्रीकांत कहीं गलत लोगों के चंगुल में तो नहीं फंस गए हैं? उन्होंने यह बात अपने साथियों को बताई तो उन्हें भी लगा कि डा. श्रीकांत किसी मुसीबत में फंस गए हैं. उन सब की सलाह पर डा. राकेश ने थाना प्रीत विहार जा कर थानाप्रभारी मनिंदर सिंह को सारी बात बताई तो थानाप्रभारी ने 29 वर्षीय डा. श्रीकांत गौड़ की गुमशुदगी दर्ज कर इस की जांच एएसआई तेजवीर सिंह को सौंप दी.

एएसआई तेजवीर सिंह ने इस मामले में वह सारी काररवाई की, जो गुमशुदगी के मामले में की जाती है. 7 जुलाई को ओला कैब के कस्टमर केयर पर सुबह 4 बजे के करीब किसी ने फोन कर के कहा, ‘‘मैं ने आप के एक कस्टमर का अपहरण कर लिया है, आप अपने मालिक से बात कराइए.’’

कस्टमर केयर की जिस युवती ने काल रिसीव की थी, एक बार तो वह असमंजस में पड़ गई कि पता नहीं यह कौन है, जो सुबहसुबह इस तरह की बात कर रहा है. उस ने सोचा कि फोन करने वाला नशे में होगा, जो इस तरह की बात कर रहा है. इसलिए उस ने भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया.

उसी दिन ओला के कस्टमर केयर सैंटर पर उसी व्यक्ति ने एक बार फिर फोन किया, ‘‘मैडम, मैं ओला कैब का ड्राइवर रामवीर बोल रहा हूं. मेरी कैब नंबर डीएल 1आर टीसी 1611 कंपनी में लगी हुई. यह कैब कल रात दिल्ली के डाक्टर ने प्रीत विहार से गौतम नगर के लिए बुक की थी. मैं ने इन का अपहरण कर लिया है. आप का कस्टमर अब मेरे कब्जे में है, अगर इस की सुरक्षित रिहाई चाहती हैं तो मुझे 5 करोड़ रुपए चाहिए.’’

उस व्यक्ति ने अपनी कैब का जो नंबर बताया था, कस्टमर केयर सैंटर कर्मी ने जब उसे चैक किया तो वास्तव में कैब रामवीर कुमार के नाम से ओला कंपनी में लगी थी. कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव ने यह जानकारी अपने अधिकारियों को दे दी. इस के बाद खबर कंपनी की लीगल सेल को दे दी गई. लीगल सेल ने जांच की तो पाया कि 6 जुलाई की रात 11 बज कर 38 मिनट पर रामवीर की कैब डा. श्रीकांत को प्रीत विहार से ले कर चली तो थी, पर डिफेंस एनक्लेव, स्वास्थ्य विहार के पास से उस का जीपीएस डिसकनेक्ट हो गया था.

रामवीर ने कंपनी में अपना मोबाइल नंबर लिखवा रखा था. लीगल सेल के अधिकारियों ने उस का वह नंबर मिलाया तो वह बंद मिला. उस ने कस्टमर केयर सैंटर में जिस नंबर से बात की थी, वह डा. श्रीकांत का था. उन्होंने अपने उसी नंबर से कैब बुक कराई थी. मामला गंभीर था, इसलिए लीगल सेल द्वारा यह जानकारी थाना प्रीत विहार पुलिस को दे दी गई.

थाने में डा. राकेश ने श्रीकांत की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. ओला कंपनी के अधिकारियों से मिली जानकारी के बाद थानाप्रभारी मनिंदर सिंह ने डा. श्रीकांत की गुमशुदगी लिखवाने वाले उन के दोस्त डा. राकेश को थाने बुला लिया. अपने दोस्त के अपहरण की जानकारी पा कर वह सन्न रह गए. पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 365 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया और सूचना डीसीपी ओमबीर सिंह विश्नोई को दे दी.

डीसीपी ओमबीर सिंह विश्नोई ने इस केस को खुलासे के लिए एसीपी हेमंत तिवारी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी मनिंदर सिंह, इंसपेक्टर रूपेश खत्री के अलावा थाने के कई एसआई, हैडकांस्टेबल और कांस्टेबलों को शामिल किया गया.

टीम ने सब से पहले यह पता लगाया कि फिरौती के लिए फोन किन जगहों से किए गए थे? उन की लोकेशन खतौली और मेरठ की मिल रही थी. 2 पुलिस टीमें इन जगहों पर भेज दी गईं. फोन डा. श्रीकांत गौड़ के मोबाइल से किए गए थे और फोन करने के बाद मोबाइल बंद कर दिया जाता था. इसलिए वह मोबाइल फोन कहां है, इस का पता लगाना आसान नहीं था.

रामवीर नाम के जिस ड्राइवर ने डा. श्रीकांत का अपहरण किया था, पता चला कि उस की कैब 2 दिन पहले ही ओला कंपनी में लगी थी और डा. श्रीकांत गौड़ उस की पहली सवारी थे. पुलिस ने ओला कंपनी से उस कैब के सभी कागजात निकलवा कर उन की जांच की. वह वैगनआर कार नंबर डीएल 1 आर टीसी 1611 उत्तरपश्चिमी दिल्ली के शालीमार बाग की रहने वाली विनीता देवी के नाम से खरीदी गई थी.

पुलिस शालीमार बाग के उस पते पर पहुंची तो पता चला कि वहां इस नाम की कोई महिला नहीं रहती थी. यानी कार की मालिक का नामपता फरजी था. कंपनी में विनीता के नाम का पैन कार्ड और महाराष्ट्रा बैंक, इंदिरापुरम (गाजियाबाद) में खुले खाते की पासबुक की फोटोकौपी और चैक भी जमा किए गए थे.

विनीता का पैन कार्ड फरजी पाया गया. बैंक से संपर्क किया गया तो पता चला कि विनीता के नाम से वहां बचत खाता तो था, पर वह कोई दूसरी विनीता थी. उस के पिता का नाम भी दूसरा था. खाताधारी असली विनीता अनपढ़ थी, इसलिए उस के नाम से चैकबुक भी जारी नहीं हुई थी. यानी पहले से ही योजना बना कर सब कुछ फरजी तरीके से किया गया था.

ड्राइवर रामवीर ने अपने जो डाक्यूमेंट्स जमा किए थे, पुलिस ने उन की जांच की. उस के आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसैंस पर मयूर विहार का पता लिखा था. वे दोनों भी फरजी पाए गए.

कागजों में जो फोटो लगे थे, बीट कांस्टेबल उन्हें ले कर मयूर विहार में घूमते रहे, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं सका. इतना ही नहीं, गाड़ी का परमिट, फिटनेस सर्टिफिकेट, इंश्योरेंस सारी चीजें फरजी पाई गईं. ड्राइवर रामवीर ने कंपनी को अपना जो फोन नंबर दिया था, पुलिस ने उस की भी काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि वह नंबर भी हाल ही में लिया गया था और उस से उस ने 1-2 लोगों से ही बात की थी. जिन लोगों से उस ने बात की थी, उन से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वे रामवीर को नहीं जानते. न ही उस से कभी उन की मुलाकात हुई. वहां से भी पुलिस खाली हाथ लौट आई.

इतनी माथापच्ची के बाद पुलिस की जांच जहां से शुरू हुई थी, वहीं रुक गई. कागजों की जांच के बाद पुलिस इतना तो जान गई कि अपहर्त्ता बेहद शातिर हैं, उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से वारदात को अंजाम दिया है.

उधर अपहर्त्ता ओला कंपनी के कस्टमर केयर सैंटर में बारबार फोन कर के फिरौती की मांग कर रहे थे. इतना ही नहीं, उन्होंने डा. श्रीकांत की 3 वीडियो भी ओला कंपनी में भेज दीं, जिन में वह खुद को छुड़ाने की विनती कर रहे थे. अपनी साख को देखते हुए ओला कंपनी के अधिकारियों ने फैसला ले लिया कि वह अपने कस्टमर को अपहर्त्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के लिए 5 करोड़ रुपए दे देंगे.

जबकि पुलिस इस बात को ले कर परेशान थी कि अपहर्त्ता कहीं डा. श्रीकांत को नुकसान न पहुंचा दें, इसलिए पुलिस ने ओला कंपनी के अधिकारियों से कह दिया कि जब भी अपहर्त्ताओं का फोन आए, वह उन से प्यार से बातें करें.

मामले की गंभीरता को देखते हुए डीसीपी ओमबीर सिंह विश्नोई ने इस मामले में एसीपी अंकित सिंह, राहुल अलवल, इंसपेक्टर संजीव वर्मा, डी.पी. सिंह, विदेश सिंघल, प्रशांत यादव, अजय कुमार डंगवाल, मनीष जोशी और कुछ तेजतर्रार सबइंसपेक्टरों को भी लगा दिया.

एडिशनल डीसीपी साथिया सुंदरम और एन. के. मीणा टीम का नेतृत्व कर रहे थे. डीसीपी के निर्देश पर समस्त पुलिस अधिकारी अलगअलग तरीके से अपहर्त्ताओं का पता लगाने में जुट गए.

पुलिस को यह तक पता नहीं लग पा रहा था कि अपहर्त्ताओं ने डा. श्रीकांत को कहां बंधक बना कर रखा है. क्योंकि वे कभी मुरादनगर से फोन कर रहे थे तो कभी मेरठ से. उन की मूवमेंट हरिद्वार और मुजफ्फरनगर की भी पाई गई. बागपत, बड़ौत, बिजनौर, खतौली आदि जगहों से भी उन्होंने फोन किया था. लिहाजा इन सभी जगहों पर दिल्ली पुलिस की टीमें पहुंच गईं.

डा. श्रीकांत का अपहरण हुए कई दिन हो चुके थे. तेलंगाना में डा. गौड़ के घर वालों को भी अपहर्त्ताओं ने उन के वीडियो भेज दिए थे. उन के रिश्तेदार और परिवार वाले भी दिल्ली पहुंच गए थे. मैट्रो अस्पताल के डाक्टरों के साथ वे भी थाना प्रीत विहार पहुंच गए थे.

डीसीपी मामले की अपडेट पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को दे रहे थे. अपहर्त्ताओं की काल डिटेल्स आदि से यही लग रहा था कि बदमाश मेरठ रेंज में ही कहीं हैं, इसलिए पुलिस कमिश्नर ने मेरठ रेंज के आईजी से बात की. आईजी ने डाक्टर को रिहा कराने में हर तरह का सहयोग देने का आश्वासन दिया. उन्होंने मेरठ की एसएसपी मंजिल सैनी और एसटीएफ के एसपी आलोक प्रियदर्शी को दिल्ली पुलिस की मदद के लिए लगा दिया.

पुलिस कमिश्नर के आदेश पर स्पैशल सेल के इंसपेक्टर भूषण, उत्तरपूर्वी दिल्ली के वाहन चोर निरोधी दस्ते के इंसपेक्टर विनय यादव, ऐशवीर सिंह, शाहदरा क्षेत्र के एसीपी मनोज पंत भी अपनीअपनी टीम के साथ इस मामले की जांच में लग गए थे. करीब 100 पुलिसकर्मियों की अलगअलग टीमें केस को सुलझाने में लग गईं.

जिस ओला कैब से डाक्टर का अपहरण किया गया था, उस की फोटो गाड़ी के पेपरों के साथ ओला कंपनी के औफिस में जमा थी. उस फोटो को ध्यान से देखा गया तो उस पर तान्या मोटर्स, मेरठ का स्टीकर लगा था.

पुलिस की एक टीम मेरठ स्थित मारुति के डीलर तान्या मोटर्स पर पहुंची. स्टीकर देख कर यही लग रहा था कि वह वैगनआर उसी शोरूम से खरीदी गई होगी. पुलिस टीम ने उस शोरूम से पता किया कि पिछले एकडेढ़ साल में सफेद रंग की कितनी वैगनआर बेची गईं. पता चला कि करीब 700 कारें सफेद रंग की बेची गई थीं. पुलिस ने उन सभी कारों के रजिस्ट्रेशन नंबर हसिल कर लिए. इस बात की पुष्टि हो चुकी थी कि जिस ओला कैब से डाक्टर का अपहरण हुआ था, उस पर फरजी नंबर लगा था. पुलिस को तान्या मोटर्स से जिन सफेद रंग की वैगनआर कारों की डिटेल्स मिली थी, उन में से यह पता लगाना आसान नहीं था कि उन में अपहर्त्ता की कार थी या नहीं?

पुलिस टीम ने सफेद रंग की सभी कारों की लिस्ट ओला कंपनी को देते हुए यह जानकारी मांगी कि पिछले 2 सालों के अंदर इन कारों में से कोई कार ओला में कैब के रूप में लगी थी या नहीं, साथ ही यह भी जानकारी निकलवाई कि इन 700 कारों में से किसी कार को किसी भी वजह से ओला कंपनी से हटाया तो नहीं गया था.

ओला अधिकारियों ने सभी 700 नंबरों को वेरिफाई किया. इस से पता चला कि 12 मार्च, 2017 को एक ड्राइवर सुशील को कस्टमर्स के साथ अभद्र व्यवहार करने, कंपनी के हिसाब में हेराफेरी करने जैसी शिकायतों के चलते कार सहित ओला से हटाया गया था.

पुलिस ने सुशील कुमार का पता मालूम किया तो जानकारी मिली कि वह खतौली मेरठ रोड पर स्थित गांव दादरी का रहने वाला था. एक पुलिस टीम उस के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. पुलिस को जानकारी मिली कि वह वसुंधरा में रहता है. दिल्ली पुलिस की एक टीम तुरंत वसुंधरा में उस का पता लगाने पहुंच गई.

पर वह वहां भी नहीं मिला. मुखबिर द्वारा सुशील के छोटे भाई अनुज का फोन नंबर मिल गया. अब तक दिल्ली पुलिस की टीमें खतौली, हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मीरापुर, बिजनौर, बागपत, बड़ौत आदि जगहों पर पहुंच चुकी थीं. हापुड़ में सुशील की ससुराल थी तो एक टीम हापुड़ में भी तैनात हो गई. पुलिस ने सुशील के भाई अनुज का मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा रखा था. पुलिस उस के औन होने का इंतजार कर रही थी.

अपहर्त्ता अभी भी ओला कंपनी के कस्टमर केयर सैंटर पर फोन कर के 5 करोड़ रुपए की फिरौती मांग रहे थे. ओला कंपनी के कारपोरेट प्रेसीडेंट जौय बांदेकर ने 5 करोड़ रुपए पुलिस को दे कर अपने कस्टमर को छुड़ाने की मांग की. अपहर्त्ता वाट्सऐप के अलावा एसएमएस भी कर रहे थे. उन्होंने 5 करोड़ रुपयों के फोटो वाट्सऐप से भेजने को कहा तो पुलिस ने 500-500 रुपए के नोटों के बंडलों की फोटो खींच कर उन्हें भेज दी.

अपहर्त्ताओं ने कहा कि वे यह चिल्लर नहीं लेंगे. उन्होंने 2-2 हजार के नोटों की मांग की. ओला कंपनी के पास उस समय 2-2 हजार के इतने नोट नहीं थे, लिहाजा उन्होंने किसी तरह उन की व्यवस्था की.

15 जुलाई को अपहर्त्ताओं ने कहा कि पैसे कहां पहुंचाने हैं, यह बाद में बताएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि रकम मिल जाने के 4-5 घंटे बाद डाक्टर को छोड़ दिया जाएगा. ओला कंपनी के अधिकारी ने इतनी देर बाद रिहा करने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि फिरौती की रकम को पहले गिनेंगे. इस पर ओला के अधिकरी ने कहा कि भले ही आप डाक्टर को 4 घंटे बाद छोड़ें, पर जब हम रकम पूरी दे रहे हैं तो हमें डाक्टर सुरक्षित चाहिए.

‘‘पैसे पूरे हुए तो डाक्टर भी सुरक्षित मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

इस फोन की लोकेशन बागपत के पास की ही थी. पुलिस आयुक्त के निर्देश पर पूर्वी जिले के डीसीपी ओमबीर सिंह विश्नोई टीम के साथ बागपत पहुंच गए. डाक्टर की जान को कोई खतरा न हो, इस के लिए पुलिस फूंकफूंक कर कदम रख रही थी.

16 जुलाई को दोपहर के समय अनुज का फोन औन हुआ तो उस की लोकेशन खतौली की मिली. दिल्ली पुलिस की सूचना पर वहां की लोकल पुलिस और एसटीएफ भी वहां पहुंच गई. तभी दौराला के पास वैगनआर कार दिखाई दी. पुलिस ने उस कार का पीछा किया तो वह कार को दौड़ाते हुए सकौती बाजार की तरफ ले गया.

सादे कपड़ों में पुलिस प्राइवेट गाडि़यों में थी. पुलिस ने उस कार का पीछा किया तो वह तेजी से रेलवे फाटक पार कर गई, जबकि पुलिस भीड़ में फंस गई. रास्ते में कई लोगों को टक्कर लगतेलगते बची. इसी बीच पीरपुर गांव के पास वैगनआर का टायर पंक्चर हो गया तो चालक कार को वहीं छोड़ कर गन्ने के खेत में घुस गया.

कुछ ही देर में वहां भारी तादाद में पीएसी पहुंच गई. पुलिस ने कई घंटे तक वहां कौंबिंग की, लेकिन कार का ड्राइवर पुलिस के हाथ नहीं लगा. पुलिस ने वह कार बरामद कर ली. उस समय उस पर वही नंबर लिखा था, जो ओला के कागजों में दर्ज था. इस के बाद पुलिस ने सुशील के घर वालों और रिश्तेदारों पर दबाव बनाया.

16 जुलाई की रात को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि सुशील का एक साथी है प्रमोद, जो मुजफ्फरनगर के मीरापुर गांव में रहता है. उस के पास दिल्ली के नंबर की एक अल्टो कार है. किसी तरह प्रमोद को भनक लग गई थी कि दिल्ली पुलिस इलाके में डेरा डाले हुए है. इसलिए पुलिस के मीरापुर पहुंचने से पहले ही वह घर से फरार हो गया.

17 जुलाई को पुलिस को सुशील के साथी गौरव के बारे में जानकारी मिली, जो मेरठ शहर में सुभारती अस्पताल के पास रहता है. करीब 2 घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस ने उस का कमरा ढूंढ लिया. पर वह भी कमरे पर नहीं मिला. लोगों ने बताया कि वह यहां किराए पर रहता था और 2 दिन पहले जा चुका है.

दिल्ली पुलिस की टीमें वहां डेरा जमाए हुए थीं. 19 जुलाई को मुखबिर से पता चला कि प्रमोद मीरापुर के रहने वाले अमित के साथ 3-4 दिनों से घूम रहा है. किसी तरह से अमित पुलिस के हत्थे चढ़ गया. पुलिस ने जब उस से डा. श्रीकांत के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि डाक्टर अभी ठीक है. प्रमोद ही डाक्टर को अलगअलग जगहों पर रख रहा है. इस समय वह परतापुर के शताब्दीनगर में है.

पुलिस उसे ले कर शताब्दीनगर पहुंची तो पता चला कि वे सोहनवीर के मकान में हैं. पुलिस ने उस घर को चारों ओर से घेर लिया. भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस को देख कर इलाके के लोग हैरान रह गए. पुलिस ने लोगों को हिदायत दी कि काररवाई चलने तक कोई भी अपने घर से बाहर न निकले.

इस के बाद पुलिस ने औपरेशन डाक्टर शुरू किया. सोहनवीर के घर में मौजूद बदमाशों को जब पता चला कि पुलिस ने उन्हें घेर लिया है तो उन्होंने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. काफी देर तक दोनों ओर से फायरिंग होती रही.

पुलिस की गोली से प्रमोद घायल हो गया. किसी तरह पुलिस उस मकान में घुस गई, जहां डा. श्रीकांत को बंधक बना कर रखा गया था. पुलिस ने डाक्टर को सुरक्षित अपने कब्जे में ले लिया. मौके से पुलिस ने नेपाल, विवेक उर्फ मोदी और प्रमोद को गिरफ्तार कर लिया. प्रमोद ने कांवडि़यों जैसे कपड़े पहन रखे थे. पुलिस ने उसे पास के अस्पताल में भरती करा दिया. मकान मालिक सोहनवीर को भी हिरासत में ले लिया गया.

डा. गौड़ की सुरक्षित बरामदगी से पुलिस ने राहत की सांस ली. डाक्टर के घर वालों और मैट्रो अस्पताल में डा. श्रीकांत गौड़ के सुरक्षित रिहा कराने की जानकारी मिली तो सभी खुश हुए. गिरफ्तार बदमाशों से पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि किडनैपिंग की पूरी वारदात को सुशील, उस के भाई अनुज, गौरव पंडित और विवेक उर्फ मोदी ने अंजाम दिया था. सुशील और अनुज दादरी के रहने वाले थे, जबकि अन्य सभी दौराला के.

पुलिस ने डाक्टर को तो सुरक्षित बरामद कर लिया था, लेकिन योजना को अंजाम देने वाले मुख्य अभियुक्तों सुशील और अनुज का गिरफ्तार होना जरूरी था. पुलिस टीमें इन दोनों अभियुक्तों की तलाश में जुट गईं, पर उन का कहीं पता नहीं चल रहा था. तब दिल्ली पुलिस ने इन दोनों भाइयों की गिरफ्तारी पर 50-50 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.

दिल्ली पुलिस मुख्य अभियुक्तों को तलाश रही थी तो मेरठ पुलिस भी इन्हें तत्परता से खोज रही थी. इस में सफलता मिली मेरठ की एसटीएफ को. एक सूचना के आधार पर एसटीएफ ने 4 अगस्त, 2017 को सुशील और अनुज को मेरठ में एक मुठभेड़ के बाद नगली गेट के पास से गिरफ्तार कर लिया. प्रीत विहार के थानाप्रभारी मनिंदर सिंह को जब उन की गिरफ्तारी की सूचना मिली तो वह 10 अगस्त को पूछताछ के लिए उन्हें दिल्ली ले आए.

दिल्ली पुलिस ने सुशील और अनुज से पूछताछ की तो उन्होंने डा. श्रीकांत के अपहरण की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

सुशील कुमार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के दौराला थाने के दादरी गांव के रहने वाले सतबीर का बेटा था. वह पेशे से ड्राइवर था. किसी दोस्त ने उसे बताया कि ओला कंपनी में टैक्सी के रूप में गाड़ी लगा देने पर महीने में अच्छीखासी कमाई हो जाती है. दोस्त की सलाह उसे पसंद आ गई. उस ने मेरठ की तान्या मोटर्स से एक वैगनआर कार खरीदी और ओला कंपनी में कैब के रूप में लगा दी.

यह सन 2014 की बात है. दिल्ली से रोजाना गांव जाना आसान नहीं था, इसलिए वह वसुंधरा में किराए का फ्लैट ले कर रहने लगा. ओला कंपनी से सुशील को हर महीने अच्छी कमाई होने लगी तो उस ने अपने छोटे भाई अनुज के नाम से भी एक और कार ओला में लगवा दी. दोनों भाई वहां काम कर के खुश थे.

कंपनी ने ड्राइवरों को प्रोत्साहन देने के लिए बोनस देने की योजना चला रखी थी. यह बोनस निर्धारित राइड से ज्यादा राइड पर था.  इसलिए दोनों भाई ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगाने की कोशिश करते. इसी दौरान सुशील के दिमाग में लालच आ गया. उस ने फरजी आईडी पर रोजाना 20 बुकिंग करनी शुरू कर दीं. इस से उसे रोजाना 20 हजार रुपए की आमदनी होने लगी.

सुशील मोटी कमाई करने लगा तो उसे घमंड भी गया, जिस से वह ग्राहकों से भी दुर्व्यवहार करने लगा. ये शिकायतें ओला कंपनी तक पहुंची तो उन्होंने जांच कराई. जांच में फरजी आईडी पर बुकिंग करने की बात सामने आ गई.

इस के बाद उस की दोनों गाडि़यां ओला कंपनी से हटा दी गईं. ओला कंपनी से गाडि़यां हटने के बाद दोनों को बहुत बड़ा झटका लगा. उन्होंने तय कर लिया कि वे ओला कंपनी को सबक सिखाएंगे.

दोनों भाई दबंग प्रवृत्ति के तो थे ही, बताया जाता है कि उन्होंने सन 2011 में नोएडा के एक बिजनैसमैन का अपहरण कर के उस के घर वालों से 5 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी थी. फिरौती के 5 करोड़ तो नहीं मिले थे, पर एक करोड़ रुपए में बात फाइनल हो गई थी और रुपए ले कर ही उसे छोड़ा था.

एक बार उन्होंने अखबार में एक खबर पढ़ी थी, ‘दुष्कर्म पीडि़ता ने ऊबर पर ठोका केस’. यह खबर पढ़ने के बाद सुशील के दिमाग में आइडिया आया कि अगर ओला के किसी कस्टमर का अपहरण कर लिया जाए तो उस की फिरौती ओला से मांगी जा सकती है. क्योंकि सवारी की सुरक्षा की जिम्मेदारी कंपनी की हो जाती है. ओला को सबक सिखाने का यह तरीका सुशील को पसंद आया. यह 5 महीने पहले की बात है.

इस के बाद सुशील अपने भाई अनुज के साथ योजना बनाने लगा. चूंकि उन की गाडि़यां ओला से निकाली जा चुकी थीं, इसलिए गाडि़यां उन के नाम से फिर से कंपनी में नहीं लग सकती थीं. यह काम फरजी कागजों द्वारा ही संभव था. एक दिन सुशील को इंदिरापुरम इलाके में महाराष्ट्रा बैंक की एक पासबुक सड़क किनारे मिल गई. वह विनीता देवी की थी. अब सुशील ने अपने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए.

उस ने विनीता के नाम से अपनी वैगनआर कार के फरजी कागज बनवा लिए, जिस में उस ने गाड़ी का रजिस्ट्रेशन नंबर भी बदल दिया. विनीता के नाम से एक पैन कार्ड और आधार कार्ड भी बनवा लिया. गाड़ी के कागजों के साथ ड्राइवर के कागज भी ओला कंपनी में जमा होने थे.

लिहाजा रामवीर के नाम एक फरजी ड्राइविंग लाइसैंस, आधार कार्ड आदि बनवा लिया. इतना ही नहीं, उस ने एक निजी कंपनी के नाम से गाड़ी के इंश्योरेंस के कागज भी तैयार करा लिए. जिस तरह से फरजी कागज तैयार हुए, उसी तरह से गाड़ी के फिटनेस पेपर भी तैयार हो गए.

सारे कागज तैयार करा कर वसुंधरा में ओला के एक वेंडर को 1500 रुपए दे कर वे फरजी कागज वैरिफाई करा लिए. इस तरह 4 जुलाई, 2017 को वह अपनी कार ओला कंपनी में टैक्सी के रूप में लगाने में सफल हो गया. दोनों भाइयों ने पहले ही तय कर रखा था कि जो भी पहली अकेली सवारी उन की गाड़ी में बैठगी, वह उसी का अपहरण कर ओला कंपनी से 5 करोड़ की फिरौती मांगेंगे.

सवारी को किडनैप कर के कहां ले जाना है, यह योजना उस ने मेरठ के रहने वाले अपने दोस्त प्रमोद कुमार, मुजफ्फरनगर के गांव खादी के अमित कुमार, सहारनपुर के गांव शब्बीरपुर के नेपाल उर्फ गोवर्द्धन, विवेक उर्फ मोदी और गौरव के साथ मिल कर पहले ही बना ली थी.

अब उन्हें पहली सवारी या कहिए शिकार का इंतजार था. इत्तफाक से 4 जुलाई को सुशील को बुकिंग मिल गई. सुशील ने कस्टमर से पूछा कि कितनी सवारी हैं. जब कस्टमर ने बताया कि 3 सवारियां हैं तो उस ने बहाना बना कर जाने से मना कर दिया.

5 जुलाई को उसे कोई बुकिंग नहीं मिली. फिर 6 जुलाई को उसे डा. श्रीकांत गौड़ की बुकिंग मिली. सुशील ने डा. गौड़ से पूछा कि साथ में कितनी सवारियां हैं. जब पता चला कि वह अकेले हैं तो सुशील ने अपने साथियों को अलर्ट कर दिया.

डा. गौड़ को प्रीत विहार मैट्रो स्टेशन के पास से ले कर चलने के बाद कुछ दूरी चलने पर उस ने गाड़ी में लगा जीपीएस डिसकनेक्ट कर दिया. वह लक्ष्मीनगर की ओर बढ़ा. आगे सैंट्रो कार मिली, जिस में उस का भाई अनुज अपने साथियों गौरव और विवेक उर्फ मोदी के साथ बैठा था.

सैंट्रो कार के पास सुशील ने कैब रोक दी. उस में से अनुज और गौरव उतर कर सुशील की कैब में बैठ गए.

डा. गौड़ ने पूछा कि ये लोग कौन हैं और इन्हें गाड़ी में क्यों बिठाया तो उन बदमाशों ने उन्हें डराधमका कर चुप रहने को कहा. उन का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले कर उन्हें नशे का इंजेक्शन लगा दिया. इस के बाद वे डाक्टर को वसुंधरा ले गए, जहां उन्होंने सैंट्रो कार छोड़ दी. इस के बाद वे डाक्टर को दौराला ले गए.

सुबह 4 बजे के करीब सुशील ने ओला कंपनी के कस्टमर केयर नंबर पर फोन कर के कस्टमर डा. श्रीकांत का अपहरण करने की सूचना दे दी. इस के बाद सुशील का साथी प्रमोद अपहृत डाक्टर को अलगअलग जगहों पर रखने की व्यवस्था करता रहा. एक जगह पर उन्हें केवल 2-3 दिन ही रखा जाता था. प्रमोद कांवडि़यों की तरह गेरुए रंग के कपड़े पहने रहता था, ताकि उस पर कोई शक न करे.

सुशील अलगअलग जगहों पर जा कर डाक्टर के घर वालों और ओला कंपनी में फोन कर के फिरौती की 5 करोड़ की रकम की डिमांड करता रहा. इतना ही नहीं, डाक्टर के 3 वीडियो भी बना कर भेजे. सुशील ने ओला कंपनी के अधिकारियों को इतना डरा दिया था कि वे 5 करोड़ रुपए देने को तैयार हो गए थे.

सादे कपड़ों में दिल्ली पुलिस 5 करोड़ रुपए ले कर बागपत के पास पहुंची भी थी. पैसे लेने अनुज वैगनआर कार से आया भी था, पर पुलिस की शंका होने पर वह कार छोड़ कर गन्ने के खेत में घुस गया. इस के बाद सुशील को जब पता चला कि उस के कुछ साथी पकड़े जा चुके हैं तो वह खुद अंडरग्राउंड हो गया.

पुलिस ने सुशील और अनुज की पत्नी सहित परिवार के अन्य लोगों को हिरासत में लिया तो वे परेशान हो गए. बाद में मुखबिर की सूचना पर मेरठ के नगली गेट इलाके से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. सुशील और अनुज से पूछताछ कर पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अब मामले की जांच इंसपेक्टर रूपेश खत्री कर रहे हैं.

मेरे ट्यूशन के सर मेरे साथ छेड़छाड़ करते है, मैं घर वालों को ये कैसे कहूं?

सवाल

मैं 10वीं जमात में पढ़ती हूं. मेरे ट्यूशन के सर हमेशा मेरे अंगों को छूने की कोशिश करते हैं और अकसर वे इस में कामयाब हो जाते हैं. वे मुझ से ‘आई लव यू’ भी कहते हैं. यह बात मैं अपने घर वालों से कैसे कहूं?

जवाब

आप को यह बात फौरन अपनी मम्मी को खुल कर बतानी चाहिए. वे आप के पापा से सलाह कर के उस टीचर की खबर ले लेंगी. मम्मी से कह दें कि आप उस टीचर से कतई नहीं पढ़ेंगी.

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बिहार की राजधानी पटना के तकरीबन हर इलाके में जैंट्स पार्लरों की भरमार सी है. चमचमाते और रंगबिरंगे पार्लर मनचले नौजवानों और मर्दों को खुलेआम न्योता देते रहते हैं. इन पार्लरों के आसपास गहरा मेकअप किए इठलातीबलखाती और मचलती लड़कियां मोबाइल फोन पर बातें करती दिख जाती हैं. अपने परमानैंट ग्राहकों को सैक्सी बातों से रिझातीपटाती नजर आ ही जाती हैं. वैसे, इन पार्लरों में हर तरह की ‘सेवा’ दी जाती है. कुरसी के हैडरैस्ट के बजाय लड़कियों के सीने पर सिर रख कर शेव बनवाने और फेस मसाज का मजा लीजिए या फिर लड़कियों के गालों पर चिकोटियां काटते हुए मसाज का मजा लीजिए.

फेस मसाज, हाफ बौडी मसाज से ले कर फुल बौडी मसाज की सर्विस हाजिर है. जैसा काम, वैसी फीस यानी पैसा फेंकिए और केवल तमाशा मत देखिए, बल्कि खुद भी तमाशे में शामिल हो कर जिस्मानी सुख का भरपूर मजा उठाइए.

जैंट्स पार्लरों में ग्राहकों से मनमाने दाम वसूले जाते हैं. शेव बनवाने की फीस 5 सौ से एक हजार रुपए तक है. फेस मसाज कराना है, तो एक हजार से 2 हजार रुपए तक ढीले करने होंगे. हाफ बौडी मसाज के लिए 3 हजार से 5 हजार रुपए देने पड़ेंगे और फुल बौडी मसाज के तो कोई फिक्स दाम नहीं हैं.

पटना के बोरिंग रोड, फ्रेजर रोड, ऐक्जिबिशन रोड, डाकबंगला रोड, कदमकुआं, पीरबहोर, मौर्यलोक कौंप्लैक्स, स्टेशन रोड, राजा बाजार, कंकड़बाग, एसके नगर वगैरह इलाकों में जैंट्स मसाज पार्लरों की भरमार है.

पिछले कुछ महीनों में पुलिस की छापामारी से जैंट्स पार्लरों का धंधा कुछ मंदा तो हुआ?है, पर पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है. थानों की मिलीभगत से जैंट्स पार्लरों का खेल चल रहा है.

कुछ साल पहले तक मसाज पार्लरों में नेपाली और बंगलादेशी लड़कियों की भरमार थी, पर अब उन की तादाद कम हुई है. बिहार और उत्तर प्रदेश की  लड़कियां अब उन में काम कर रही हैं. इन में ज्यादातर गरीब घरों की लड़कियां ही होती हैं, जो पेट की आग बुझाने के लिए यह धंधा करने को मजबूर हैं.

फ्रेजर रोड के एक पार्लर में काम करने वाली सलमा बताती है कि उस का शौहर उसे छोड़ कर मुंबई भाग गया. अपनी 7 साल की बेटी को पालने के लिए उसे मजबूरी में मसाज पार्लर में काम करना पड़ा.

इसी तरह पति की मौत हो जाने के बाद ससुराल वालों की मारपीट की वजह से रोहतास से भाग कर पटना पहुंची सोनी काम की खोज में बहुत भटकी, पर उसे कोई काम नहीं मिला. बाद में उस की सहेली ने उसे जैंट्स पार्लर में काम दिलाया.

सोनी बताती है कि पहले तो उसे मर्दों की सैक्सी निगाहों और हरकतों से काफी शर्म आती थी. कई बार यह काम छोड़ने का मन किया, पर अब इन सब की आदत हो गई है.

समाजसेवी प्रवीण सिन्हा कहते हैं कि ऐसे पार्लरों में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियों और औरतों के पीछे बेबसी और मजबूरी की कहानी होती है. कुछ लड़कियां ही ऐसी होती हैं, जो ऐशमौज करने और महंगे शौक पूरा करने के लिए मसाज करने और जिस्म बेचने का काम करती हैं.

वहां आसपास रहने वाले लोगों की कई शिकायतों के बाद कभीकभार पुलिस जागती है और एकसाथ कई मसाज पार्लरों पर छापामारी कर कई लड़कियों, पार्लर चलाने वालों और दर्जनों ग्राहकों को पकड़ कर ले जाती है.

पुलिस देह धंधा करने के आरोप में लड़कियों और ग्राहकों की धरपकड़ करती है. 2-3 दिनों तक तो पार्लर पर ताला दिखता है और फिर पुलिस, कानून और समाज के ठेकेदारों को ठेंगा दिखाते हुए धंधा चालू हो जाता है और बेधड़क चलता रहता है.

पुलिस के एक आला अफसर कहते हैं कि जिस्मानी धंधे की शिकायत मिलने के बाद ही पुलिस छापामारी करती है. प्रिवैंशन औफ इम्मोरल ट्रैफिक ऐक्ट के तहत शिकायतों के बाद छापामारी की जाती है. पार्लर से पकड़ी गई लड़कियां या औरतें यह नहीं बताती हैं कि उन्हें जबरदस्ती या लालच दे कर काम कराया जा रहा है. वे तो पुलिस को यही बयान देती हैं कि वे अपनी मरजी से काम कर रही हैं. अगर वे देह बेचने को मजबूर नहीं की गई हैं, तो प्रिवैंशन औफ इम्मोरल ट्रैफिक ऐक्ट बेमानी हो जाता है. इस से कानून कुछ नहीं कर पाता है.

पुलिस के एक रिटायर्ड अफसर की मानें, तो ऐसे पार्लरों पर छापामारी पुलिस के लिए पैसा उगाही का जरीया भर है. पुलिस को पता है कि ऐसे मसाज पार्लरों पर कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती है, वह महज रोबधौंस दिखा कर ‘वसूली’ कर लड़कियों और संचालकों को छोड़ देती है. जो पार्लर सही समय पर थानों में चढ़ावा नहीं चढ़ाते हैं, वहीं छापामारी की जाती है.

पटना हाईकोर्ट के वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि जिस्म के धंधे और यौन शोषण की शिकायत पर कानूनी कार्यवाही तभी हो सकती है, जब वह दबाव बना कर कराया जा रहा हो. जब किसी औरत का जबरन या खरीदफरोख्त के लिए यौन शोषण नहीं किया जा रहा है, तो वह कानूनन देह धंधा नहीं माना जाएगा.

मसाज पार्लरों से पकड़ी गई लड़कियां कभी यह नहीं कहती हैं कि उन से जबरन कोई काम कराया जा रहा है, फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी जैंट्स पार्लर में जिस्मफरोशी का धंधा चलता है?

अगर आप भी हैं पोर्न देखने के शौकीन, तो हो जाइए सावधान

पोर्न आज के दौर में एक बड़ी इंडस्ट्री बन गया है, जिस का सालाना टर्नओवर अरबों डौलर का है. विश्व के अधिकतर लोगों ने कभी न कभी पोर्न फिल्में देखी होंगी. भारत में युवाओं में पोर्न देखने का चलन बढ़ता जा रहा है. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत पिछले 2-3 वर्षों में सब से ज्यादा पोर्न देखने वाले देशों में 10वें से तीसरे स्थान पर आ गया है.

अति तो किसी भी चीज की बुरी होती है. पोर्न की लत किसी नशे की तरह है, जो आसानी से पीछा नहीं छोड़ती. पोर्न देखने में उतनी बुराई नहीं पर पोर्न का एडिक्शन होना बुरा होता है. यह सामाजिक, शारीरिक और मानसिक हर रूप में जीवन पर बुरा प्रभाव डालता है. एक रिसर्च में पाया गया कि जो व्यक्ति ज्यादा पोर्न फिल्में देखते हैं, उन का दिमाग सिकुड़ जाता है.

यदि व्यक्ति के दिमाग का स्ट्रेटम छोटा है तो उसे ज्यादा नुकसान हो सकता है. इसी अध्ययन में यह भी पता चला है कि पोर्न फिल्में देखने वाला व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी में भी उसी तरह सेक्स करना चाहता है, लेकिन अकसर ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि पोर्न फिल्मों को जानबूझ कर ज्यादा भड़काऊ और आकर्षक बनाया जाता है. वैसा करना आम आदमी के बस की बात नहीं. इस का नुकसान यह होता है कि व्यक्ति को कभी संतुष्टि नहीं मिल पाती. व्यक्ति के स्वभाव में क्रूरता और उग्रता आ जाती है जिस से वह चिड़चिड़ा हो जाता है.

सेहत और पढ़ाई पर प्रभाव      

युवावस्था कैरियर बनाने के लिहाज से सब से अहम होती है. इस दौरान युवाओं का पोर्न की तरफ आकर्षित होना कैरियर पर बुरा प्रभाव डालता है. मनोविज्ञानी बताते हैं कि इसे देखने वाले युवाओं का मन भटक  जाता है. वे हमेशा इस के प्रभाव में रहते हैं. ऐसे में उन का कैरियर खराब हो जाता है. आमिर खान की फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में यह दिखाया गया है कि साथी अपने ही दोस्तों का ध्यान पढ़ाई से हटाने के लिए होस्टल में उन्हें पोर्न किताबें दे देते थे जिस से साथी के नंबर कम आएं या वह फेल हो जाए.

पोर्न देखने वाले ज्यादातर युवा अप्राकृतिक सेक्स के आदीहो जाते हैं. वैसे मैडिकली यह बुरा नहीं है पर अगर सही तरह और हाईजीन का ध्यान रख कर नहीं किया जाएगा तो यह हैल्थ की नजर से खराब होता है.

सेक्स जीवन पर असर

लगातार पोर्न देखने से व्यक्ति अपने पार्टनर से वैसी ही उम्मीद रखने लगता है जैसा पोर्न फिल्मों में दिखाया जाता है लेकिन इसे हकीकत में उतारना मुमकिन नहीं होता. इस का नुकसान यह होता है कि व्यक्ति का अपने पार्टनर के प्रति अलगाव पैदा होने लगता है. जब लड़कियां ऐसे पोर्न देखती हैं और शादी के बाद उन्हें ऐसे हालात नहीं मिलते तो उन का वैवाहिक जीवन खराब होने लगता है.

पोर्न देखने से सेक्स को ले कर विकृत नजरिया बन जाता है. शादी के बाद तमाम लड़कियों को यह शिकायत होती है कि उन के पति ने अप्राकृतिक सेक्स की डिमांड की या जोरजबरदस्ती की. औक्सिटौसिन दिमाग में पाया जाने वाला एक शक्तिशाली हार्मोन है जिसे ‘लव हार्मोन’ भी कहा जाता है. यह हार्मोन पुरुष और महिलाओं दोनों को बंधन में बांधने में मदद करता है. अगर सेक्स पोर्न फिल्मों की तरह किया जाए तो यह हार्मोन काम नहीं करता जिस का असर रिश्तों पर पड़ता है.

सेक्स को पोर्न फिल्मों की तरह करने वाले व्यक्ति फोरप्ले ठीक ढंग से नहीं कर पाते. फोरप्ले के दौरान जोड़े चरम सुख लेते हैं जिस से उन में काफ ी निकटता आती है पर पोर्न वाली मानसिकता के कारण यह कहीं खो जाती है.

कुछ लोग उत्तेजित होने के लिए पोर्न का सहारा लेने लगते हैं और धीरेधीरे यह उन की आदत बन जाती है. इस का नुकसान यह होता है कि व्यक्ति प्राकृतिक तौर पर उत्तेजित होने में नाकाम होने लगता है जिस का आगे चल कर नुकसान होता है. अवैध संबंधों के लिए पोर्न काफी हद तक जिम्मेदार है. ज्यादा पोर्न देखने वाले लोग अकसर किसी के साथ अवैध संबंध बनाने के बारे में सोचते रहते हैं जो समाज के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो रहा है और कई बार मर्यादा तारतार होने की भी आशंका रहती है. पोर्न देखने का यह सब से बड़ा नुकसान है.

बच्चों के खाने में कैसे रखें न्यूट्रिएंट्स का भरपूर ख्याल, जानने के लिए पढ़ें ये खबर

यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चों को हर न्यूट्रिएंट्स की सही मात्रा मिले. न्यूट्रिएंट्स के मामले में विभिन्न आयु-वर्ग के बच्चों की जरूरत भिन्न होती है और हमें दोनों बातों का ख्याल रखना पड़ता है यानी न तो इनकी कमी होने पाये और न ही अधिकत छोटे बच्चे के लिए यह बिल्कुल सामान्य बात है कि वह अचानक तय कर ले कि उसे कौन सी पसंदीदा चीजें खानी है. ऐसे में, बच्चे भले ही एक ही किस्म की चीज बार- बार खाते रहें लेकिन वे दूसरी चीजों को छूने से भी मना कर देते है.

भले ही, वे उनकी सेहत के लिए कितनी भी अच्छी क्यों न हों. इस व्यवहार के पीछे कई कारण है, जिनमें से कुछ कि उनके विकास की अवस्था से जुड़े होते है. ऐसे कारणों से खुलासा होता है कि 1 से 3 साल की उम्र में बच्चे खाने के मामले में इतने चूजी क्यों होते है? ये तथ्य इन बच्चों के खानपान के पैटर्न पर असर डालते है.

बच्चे इस उम्र में किसी काम के लिए आराम से नहीं बैठते. यहां तक कि खाने के लिए भी नहीं. फिर इस उम्र से आगे 4 से 6 साल में बच्चे अपनी पढ़ाई और खेल में व्यस्त हो जाते है और उनके पोषण का मुद्दा कमजोर पड़ जाता है. इसके अलावा इस उम्र में बच्चे अपने मन की करने की जिद्द भी बहुत करते है. माता को इस बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उम्र के इस दौर में खाने में आनाकानी करते ही है.

ऐसे कई तरीके है, जिनका प्रयोग करके बच्चों को पूरा पोषण दिया जा सकता है.

इसके लिए बने-बनाये पूरक आहार एक आदर्श समाधान सिद्ध होते है. नवजीवन ज्योति हास्पिटल एवं रिसर्च सेंटर में एचओडी पैडियाट्रिक्स डा. स्वाति बताती है कि  कद बढ़ने, वजन सही रखने और दिमाग के विकास में सही पोषण की अहम भूमिका होती है. इन्हें हासिल करने के लिए संतुलित आहार का चुनाव करना चाहिए, जो जरूरी विटामिनों, खनिजों व अन्य पोषाहारों से भरपूर हो.

यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चों को हर न्यूट्रिएंट की सही मात्रा मिले. न्यूट्रिएंट्स के मामले में विभिन्न आयु-वर्ग के बच्चों की जरूरत भिन्न होती है और हमें दोनों बातों का ख्याल रखना पड़ता है यानी न तो इनकी कमी होने पाये और न ही अधिकता, क्योंकि जिस तरह अपर्याप्त पोषण के नुकसान होते है, वैसे ही ओवरडोज से भी बच्चे को नुकसान पहुंचता है .

डायटीशियन डा. विनीत कहती है, ‘ माताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चों को बी-12 विटामिन, आयरन व कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में मिले. ये चीजें फोर्टिफाइड फूड में पाए जाते है. बच्चे अपनी जीभ को पसंद आने वाली चीज ही खाते है. इस वजह से उनमें कई पोषाहारों की कमी हो जाती है, जैसे पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम, विटामिन-ई, विटामिन डी और रेशेदार खाद्य पदार्थ.

बच्चे पर्याप्त फल, सब्जियां व साबुत अन्न नहीं खाते. विभिन्न उम्र के बच्चों को खास किस्म के न्यूट्रिएंट्स की अलग-अलग मात्रा जरूरी होती है, इसलिए बच्चों के शरीर में पोषाहारों की कमी न रह जाए, इसके लिए उनकी आवश्यकतानुसार टेलरमेड हेल्थ सप्लिमेंट देने चाहिए. यह सप्लिमेंट ऐसा होना चाहिए, जो दिमागी विकास के साथ-साथ कद व वजन की आदर्श स्थिति भी सुनिश्चित करे.‘

न्यूट्रिएंट्स की ज्यादा मात्रा होने पर बच्चों में विषाक्तता पैदा होने की बातें सामने आ चुकी है. इस स्थिति पर काबू पाया जा सकता है. इसके लिए करना यह होगा कि विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं की सही व पूरी जानकारी प्राप्त की जाए. एक खास आयु वर्ग के बच्चों को अगर आवश्यकता से अधिक न्यूट्रिएंट्स मिलते है तो उन्हें ओवरडोज व उससे संबंधित विषाक्तता जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है.

इस समस्या से निजात पाने का सबसे आसान तरीका है कि बने- बनाये पूरक आहार लिये जाएं, जिन्हें आमतौर पर टेलरमेड सप्लिमेंट कहा जाता है. इनसे एक विशिष्ट आयु वर्ग के बच्चों को सही पोषण प्राप्त होता है. बढ़ते बच्चे को आवश्यक ऊर्जा एवं पोषाहार की सही आपूर्ति करने के लिए उन्हें संतुलित व सटीक खुराक देनी चाहिए. बच्चों को कितना पोषण चाहिए, यह उनकी उम्र पर निर्भर होता है.

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