Hindi Story: इमोशनल अत्याचार-खतरनाक मोड़ पर रक्षिता की जिंदगी

Hindi Story: रक्षिता का सामाजिक बहिष्कार तो मानो हो ही चुका था. रहीसही कसर उस के दोस्त वरुण ने पूरी कर दी थी. रक्षिता को ऐसा लग रहा था कि वह जैसे कोई सपना देख रही हो. 20 दिनों में उस की जिंदगी तहसनहस हो चुकी थी.

20 दिनों पहले रक्षिता के पापा की हार्टअटैक से मौत हो चुकी थी. पापा की मौत के बाद भाई ने अपना असली रंग दिखा दिया. कहते हैं सफलता मिलने के बाद इंसान अपना असली रंग दिखाता है, लेकिन यहां तो दुख की घड़ी में भाई ने रक्षिता को अपना असली चेहरा दिखा दिया था.

अब क्या किया जाए. मां पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थी. दादी की भी एक साल पहले मृत्यु हो गई थी. रक्षिता ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे.

रिश्तेदारों के सामने भाई ने हाथ नचा कर पुष्टि कर दी थी कि रक्षिता की वजह से ही पापा की मृत्यु हुई. बूआ, जो उसे बहुत मानती थीं, ने भी साफ कह दिया था, ‘ऐसी लड़की से वे कोई नाता नहीं रखना चाहतीं.’

उस के भाई ने उस से साफतौर पर कह दिया था, ‘अब घर वापस आने की जरूरत नहीं है. तुम्हारी शादी पर खर्च करने की मेरी कोई मंशा नहीं है.’ उस ने दिल्ली जाने का टिकट उस के हाथ में थमा दिया.

‘कोई बात नहीं, कम से कम वरुण तो साथ देगा ही. अब जब समस्या आ ही गई है तो समाधान भी ढूंढ़ना ही पड़ेगा,’ अपनी आंखें पोंछते हुए रक्षिता ने मन ही मन सोचा.

दिल्ली आ कर उस ने दोबारा औफिस जौइन कर लिया. रक्षिता ने वरुण से मिलने की काफी कोशिश की पर वरुण ने उस से दोबारा मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. रक्षिता ने सोचा कि हो सकता है वरुण औफिस के काम में बिजी हो.

एक दिन जब कैंटीन में रक्षिता की सपना से मुलाकात हुई तब उसे हकीकत मालूम हुई. सपना ने बताया, ‘‘रक्षिता, मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूं. उम्मीद है कि तुम इसे हलके में नहीं लोगी.’’

‘‘पर बताओ तो सही बात क्या है,’’ रक्षिता परेशान होते हुए बोली.

‘‘वरुण कह रहा था कि तुम्हारे रोनेधोने की कहानियां सुनने का स्टेमिना उस में नहीं है.’’

यह सुनते ही रक्षिता के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं. अब उसे मालूम हो गया था कि वरुण उस से कटाकटा सा क्यों रहता है. उस के प्यार ने ही तो उसे हिम्मत बंधाई थी. उसी के बलबूते उस ने अपने भाई की बातों का बहिष्कार किया था. उस से लड़ी थी, लेकिन अब तो सारी उम्मीदें चकनाचूर होती नजर आ रही थीं.

वरुण के प्यार में वह काफी आगे बढ़ चुकी थी.

पापा की मृत्यु ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था. उस के बाद भाई ने और अब वरुण की बेवफाई ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था.

उस के मन में अब तरहतरह के खयाल आ रहे थे. अब क्या होगा. कौन शादी करेगा उस से. पापा की मृत्यु के बाद उन की नौकरी उस के भाई को मिल चुकी थी. घर और थोड़ीबहुत प्रौपर्टी पर भाई ने पहले ही अपना कब्जा जमा लिया था. रिश्तेदारों ने भी भाई का ही साथ दिया था. अब रक्षिता को पता चल गया था कि वह दुनिया में अकेली है. उस का संघर्ष सही माने में अब शुरू हुआ है.

पहली बार पता चला कि लड़के सामाजिक सुरक्षा, भावनात्मक सुरक्षा, रिश्तों की सुरक्षा के साथ पैदा होते हैं. खाली हाथ तो सिर्फ लड़कियां ही पैदा होती हैं.

लोग रक्षिता को लैक्चर देते कि तुम खुद सफल हो कर दिखाओ ताकि वरुण तुम्हें छोड़ने के निर्णय को ले कर पछताए. पर वह किसकिस को समझाए. ऐसा तो फिल्मों में ही संभव है. और रिश्तों की सुरक्षा के बिना वह कितना व क्या कर लेगी.

धीरेधीरे समय बीतने लगा और रक्षिता ने अब किसी प्राइवेट इंस्टिट्यूट में इवनिंग क्लासेस ले कर एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी. उस ने सोचा कि एक डिगरी भी हो जाएगी और खाली समय भी आराम से कट जाएगा.

नीलेश से उस की वहीं मुलाकात हुई थी. लेकिन वह अब लड़कों से इतना उकता चुकी थी कि उन से बातें करने में भी कतराती थी. नीलेश एक अंगरेजी अखबार में काम करता था. एमबीए करने के बाद उस ने एक दैनिक न्यूजपेपर के विज्ञापन विभाग में नौकरी जौइन की थी. अब एलएलबी की पढ़ाई रक्षिता के साथ कर रहा था.

अब तक बेवकूफ बनी रक्षिता को इतनी समझ आ चुकी थी कि जिंदगी बिताने के लिए एक साथी की अहम जरूरत होती है और इस के लिए जरूरी नहीं कि उसे प्यार किया जाए. प्यार का दिखावा भी किया जा सकता है लेकिन फिर से दिल लगा बैठी तो पता नहीं कितनी तकलीफ होगी.

नीलेश से उस का मेलजोल इस कदर बढ़ा कि धीरेधीरे बात शादी तक पहुंच गई. दिखावा ही सही, पर रक्षिता ने शादी करने में देरी नहीं की. नीलेश की मां ने भी खुलेदिल से रक्षिता को स्वीकार किया. सब ने प्रेमविवाह होने के बावजूद उस का खूब स्वागत किया था और भरपूर प्यार दिया था. पर रक्षिता ने मन की गांठें नहीं खोलीं. उसे लगता था कि एक बार भावनात्मक रूप से जुड़ गई तो गई काम से.

उस के व्यवहार से ससुराल में सभी खुश थे. गलती से भी उस ने कोई कटु शब्द नहीं बोला था. उसे गुस्सा आता ही नहीं था. बातचीत वह बहुत ज्यादा नहीं करती थी. जब भी कोई किसी की बुराई शुरू करता तो वह वहां से खिसक जाती थी.

लेकिन उस की आंखें उस दिन खुलीं जब नीलेश की मां अपनी बहन को बता रही थी, ‘‘बड़ा शौक था मुझे अपनी बहू में बेटी ढूंढ़ने का. वह तो बिलकुल मशीन है. आज तक मैं उस की सास ही हूं, मां नहीं बन पाई.’’

यह सुन कर रक्षिता अपने इमोशंस रोक न सकी और उस पर हुए इमोशनल अत्याचार आंसू बन कर बहने लगे. आंसुओं के साथ बहुतकुछ बह रहा था.

Hindi Story: स्वयंसिद्धा – दादी ने कैसे चुनी नई राह

Hindi Story: रात 1 बजे नीलू के फोन की घंटी घनघना उठी. दिल अनजान आशंकाओं से घिर गया. बेटा विदेश में है. बेटी पुणे के एक होस्टल में रहती है. किस का फोन होगा, मैं सोच ही रही थी कि पति ने तेज कदमों से जा कर फोन उठा लिया. पापा का देहरादून से फोन था, मेरी दादी नहीं रही थीं. यह सुनते ही मैं रो पड़ी. इन्होंने मुझे चुप कराते हुए कहा, ‘‘देखो मधु, दादी अपनी उम्र के 84 साल जी चुकी थीं, आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था. तुम जानती ही हो कि जन्म और मृत्यु जीवन के 2 अकाट्य सत्य हैं.’’

उन्होंने मुझे पानी पिला कर कुछ देर सोने की हिदायत दी और कहा, ‘‘सवेरे 4 बजे निकलना होगा, तभी अंतिमयात्रा में शामिल हो पाएंगे.’’

मैं लेट गई पर मेरी अश्रुपूरित आंखों के सामने अतीत के पन्ने उलटने लगे…

मेरी दादी शांति 16 वर्ष की आयु में ही विधवा हो गई थीं. 2 महीने का बेटा गोद में दे कर उन का सुहाग घुड़सवारी करते समय अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो कर इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गया.

वैधव्य की काली घटाओं ने उन की खुशियों के सूरज को पूर्णतया ढक दिया. गोद में कुलदीपक होने के बावजूद उन पर मनहूस का लेबल लगा उन्हें ससुरालनिकाला दे दिया गया.

ससुराल से निर्वासित हो कर दादी ने मायके का दरवाजा खटखटाया. मायके के दरवाजे तो उन के लिए खुल गए पर सासससुर की लाचारी का फायदा उठा कर उन की भाभी ने उन्हें एक अवैतनिक नौकरानी से ज्यादा का दर्जा न दिया.

मायके में दिनरात सेवा कर उन्होंने अपने बेटे के 10 साल के होते ही मायके को भी अलविदा कह दिया.

देहरादून में बरसों पहले ब्याही बचपन की सहेली का पता उन के पास था. बस, सहेली के आसरे ही वे देहरादून आ पहुंचीं.

सहेली तो मिली ही, साथ ही वहां एक कमरे का आश्रय भी मिल गया. सहेली और उस के पति दोनों उदार व दयालु थे. उन्होंने उन के बेटे यानी हमारे पापा का दाखिला भी एक नजदीकी स्कूल में करवा दिया.

दादी स्वेटर बुनने और क्रोशिए व धागे से विभिन्न तरह की चीजें बनाने में सिद्धहस्त थीं. स्वेटर पर ऐसे सुंदर नमूने डालतीं कि राह चलने वाला एक बार तो गौर से अवश्य देखता. उन के  बुने स्वेटरों और क्रोशिए के काम की धूम पूरे महल्ले में फैल गई. देखते ही देखते उन्हें खूब काम मिलने लगा. दिनरात मेहनत कर के वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं. उन्होंने सहेली को तहेदिल से धन्यवाद दिया और उसी के घर के पास 2 कमरों का मकान ले कर रहने लगीं, पर सहेली का उपकार कभी नहीं भूलीं.

पापा भी 16-17 वर्ष के हो चुके थे. उन्हें भी किसी जानकार की दुकान पर काम सीखने भेजने लगीं. पापा होनहार थे, बड़ी मेहनत और लगन से वे काम सीखने लगे. मायका छोड़ते समय भाभी की नजर से बचा उन की मां ने एक गहने की छोटी सी पोटली उन्हें थमा दी थी. उन्होंने उसे लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया था पर उन की मां ने अपनी कसम दे दी थी. अपनी मां की बेबसी और डबडबाई आंखें देख उन्हें वह पोटली लेनी पड़ी. दादी अपनी मां की निशानी बड़ी जतन से संभाल कर रखती आई थीं. कठिनतम परिस्थितियों में भी कभी उसे नहीं छुआ पर आज अपने होनहार बेटे का कारोबार जमाने की खातिर उस निशानी का भी मोलभाव कर दिया.

आज मैं स्वयं को और इस नई पीढ़ी को देखती हूं तो चारों और असहिष्णुता व आक्रोश फैला देखती हूं. छोटीछोटी बातों में गुस्सा, तुनकमिजाजी देखने को मिलती है. सारी सुखसुविधाएं होते हुए भी असंतुष्टता दिखाई देती है, पर दादी के जीवन में तो 16 वर्ष के बाद ही पतझड़ ने स्थायी डेरा जमा लिया था. जीवन में कदमकदम पर अपमान, अभाव व धोखे खाए थे पर इन सब ने उन में गजब की सहनशीलता भर दी थी. हम ने कभी घर में उन्हें गुस्सा करते, चिल्लाते नहीं देखा. अपनी मौन मुसकान से ही वे सब के दिलों पर राज करती थीं. मम्मीपापा को उन से कोई शिकायत न थी. वे उन को मां बन कर सीख भी देतीं और दोस्त बना कर हंसीमजाक भी करतीं.

दादीजी के बारे में सोचतेसोचते कब सवेरा हो गया, पता ही नहीं चला. पति टैक्सी वाले को फोन करने लगे. मैं ने जल्दी से 2 कप चाय बना ली. हम चल दिए दादी की अंतिमयात्रा में शामिल होने.

टैक्सी में बैठते ही मैं ने आंखें मूंद लीं. दादी की यादों के चलचित्र की अगली रील चलने लगी…

दादी स्वयं पुराने जमाने की थीं लेकिन पासपड़ोस और महल्ले की औरतों की आजादी के लिए उन्होंने ही शंखनाद किया. ससुराल में घूंघट से त्रस्त कई महिलाओं को उन्होंने घूंघट से आजादी दिलवाई. घरों के बड़ेबुजुर्गों को समझाया कि सिर पर ओढ़नी, आंखों और दिल में बुजुर्गों के लिए आदरसेवा यही सबकुछ है. हाथभर का घूंघट निकाल कर बड़ेबूढ़ों का अपमान करना, उन की मजबूरी और लाचारी

में उन्हें कोसना गलत है. घूंघटों से बेजार महिलाओं को जीवन में बड़ी राहत मिल गई थी. दादी की बातें लोगों के दिलोजेहन में ऐसे उतरतीं जैसे धूप व प्यास से खुश्क गलों में मीठा शरबत उतरता.

दादी स्वयं पढ़ीलिखी न थीं. पर उन्होंने मम्मी के बीए की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने का बीड़ा उठाया. घरपरिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मम्मी को कालेज भेजा. मुख्य विषय संगीत था, इसलिए हारमोनियम मंगवाया. शाम के समय मां सुर लगातीं तो दादी मंत्रमुग्ध हो कर आंखें बंद कर बैठ जातीं और 2-3 गाने सुने बिना न उठती थीं.

हमारे भाई का जन्मदिन भी वे बड़े निराले तरीके से मनवातीं. न तो पार्टी न डांस, बस, मां का बनाया मिल्ककेक काटा जाता. दोपहर को बड़ेबड़े कड़ाहों और पतीलों में जाएकेदार कढ़ीचावल और शुद्ध देशी घी में हलवा बनवाया जाता. विशेष मेहमान होते अनाथाश्रम के प्यारेप्यारे बच्चे जो अपने आश्रय का सुरीला बैंड बजाते हुए पंक्तिबद्ध हो कर आते और बड़े ही चाव से कढ़ीचावल व हलवे के भोजन से तृप्त होते थे.

साथ ही, रिटर्नगिफ्ट के रूप में एकएक जोड़ी कपड़े ले कर जाते थे. उस के बाद होता था महल्ले के सभी लोगों का महाभोज. एक बड़े से दालान में बच्चेबड़े सभी भोजन करते थे. हम सब घर वाले तब तक पंगत से नहीं उठते थे जब तक सब तृप्त न हो जाते. हलकेफुलके हंसी के माहौल में भोज होता मानो एक विशाल पिकनिक चल रही हो.

मैं तब 10वीं कक्षा में थी. स्कूल से घर आई तो देखा दीदी रो रही हैं और मम्मी पास ही में रोंआसी सी खड़ी हैं. दीदी ने आगे पढ़ने के लिए जो विषय लिया था, उस के लिए उन्हें सहशिक्षा कालेज में दाखिला लेना था. पर पापा आज्ञा नहीं दे रहे थे. दादी उन दिनों हरिद्वार गई हुई थीं. दीदी ने चुपके से उन्हें फोन कर दिया.

दादी ने आते ही एक बार में ही पापा से हां करवा ली. उन्होंने पापा को सिर्फ एक बात कही, मीरा को हम सब ने मिल कर संस्कार दिए हैं. उन में क्या कुछ कमी रह गई है जो मीरा को उस कालेज में जाने से तू रोक रहा है. हमें अपनी मीरा पर पूरा भरोसा है. वह वहां पर लगन से पढ़ कर अच्छे अंक लाएगी और हमारा सिर ऊंचा करेगी. परोक्षरूप से उन्होंने मीरा दीदी को भी हिदायत दे दी थी और वास्तव में दीदी ने प्रथम रैंक ला कर घरपरिवार का नाम रोशन कर दिया. इसी क्षण टैक्सी के हौर्न की आवाज ने हमें यादों के झरोखों से बाहर निकाला.

टैक्सी रफ्तार पकड़े हुए थी. शीघ्र ही हम देहरादून पहुंच गए. घर में प्रवेश करते ही दादी के पार्थिव शरीर को देखते ही यत्न से दबाई हुई हिचकी तेज रुदन में बदल गई. सभी पहुंच चुके थे. बस, मेरा इंतजार हो रहा था. पापा ने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मधु बेटी, इस प्रकार रो कर तुम अपनी दादी को दुखी कर रही हो. वे तो संसार के मायाजाल से मुक्त हुई हैं. एक 16 साल की विधवा का, साथ में एक दूधमुंहे बच्चे के साथ, इस संसाररूपी सागर को पार करना बहुत ही कठिन था. मुझे अपनी मां पर गर्व है. उन्होंने अपने आत्मसम्मान व इज्जत को गिरवी रखे बिना इस सागर को पार किया. वे तो स्वयंसिद्धा थीं. उन्होंने समाज की खोखली रूढि़यों, पाखंडों से दूर रह कर अपने रास्ते खुद बनाए. जो उन्हें अच्छा और सही लगा उसे ग्रहण किया और व्यर्थ की मान्यताओं को उन्होंने अपने मार्ग से हटा दिया. उन के मुक्तिपर्व को शोक में मत बदलो.’’

कुछ देर बाद दादी की अंतिमयात्रा आरंभ हो गई. बहुत बड़ी संख्या में लोग साथ थे. दादी की मृत्यु प्रक्रिया उन की इच्छानुसार की गई. न तो ब्राह्मण भोज हुआ न पुजारीपंडों को दान दिया गया. लगभग 200 गरीबों को भरपेट भोजन कराया गया और 1-1 कंबल उन्हें दानस्वरूप दिए गए. पापा ने दादी की इच्छानुसार अनाथाश्रम, महिला कल्याण घर और अस्पताल में 2-2 कमरे बनवा दिए.

देखतेदेखते दादी हम से बहुत दूर चली गईं. वे अपने पीछे छोड़ गईं संघर्षों का ऐसा अनमोल खजाना जो सभी नारियों के लिए एक सबक है कि कैसे कठिन से कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने मानसम्मान व इज्जत को बचाते हुए आगे बढ़ें. वे इस युग की ऐसी महिला थीं जिस ने अपनी मृतप्राय जीवनबगिया को नवीन विचारों, दृढ़संकल्पों, कर्मठता व मेहनत के बलबूते फिर से हरीभरी बना दिया. वास्तव में वे स्वयंसिद्धा थीं.

Hindi Story: आत्मनिर्णय – आखिर आन्या ने अपनी मां की दूसरी शादी क्यों करवाई

Hindi Story, लेखक- मीरा जगनानी

मैंने आन्या के पापा को उस के पैदा होने के महीनेभर बाद ही खो दिया था. हरीश हमारे पड़ोसी थे. वे विधुर थे और हम एकदूसरे के दुखसुख में बहुत काम आते थे. हरीश से मेरा मन काफी मिलता था. एक बार हरीश ने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव मेरे सामने रखा तो मैं ने कहा, ‘यह मुमकिन नहीं है.

आप के और मेरे दोनों के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. पति को तो खो ही चुकी हूं, अब किसी भी कीमत पर आन्या को नहीं खोना चाहती. हम दोनों एकदूसरे के दोस्त हैं, यह काफी है.’ उस के बाद फिर कभी उन्होंने यह बात नहीं उठाई.

धीरेधीरे समय का पहिया घूमता रहा और आन्या अपनी पढ़ाई पूरी कर के नौकरी करने लगी. उसे बस से औफिस पहुंचने में करीब सवा घंटा लगता था. एक दिन अचानक आन्या ने आ कर मुझ से कहा, ‘‘मम्मी, बहुत दूर है. मैं बहुत थक जाती हूं. रास्ते में समय भी काफी निकल जाता है. मैं औफिस के पास ही पीजी में रहना चाहती हूं.’’

एक बार तो उस का प्रस्ताव सुन कर मैं सकते में आ गई, फिर मैं ने सोचा कि एक न एक दिन तो वह मुझ से दूर जाएगी ही. अकेले रह कर उस के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा और वह आत्मनिर्भर रह कर जीना सीखेगी, जोकि आज के जमाने में बहुत जरूरी है. मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है बेटा, जैसे तुम्हें समझ में आए, करो.’’

3-4 महीने बाद उस ने मुझे फोन कर के अपने पास आने के लिए कहा तो मैं मान गई, और जब उस के दिए ऐड्रैस पर पहुंच कर दरवाजे की घंटी बजाई तो दरवाजे पर एक सुदर्शन युवक को देख कर भौचक रह गई. इस से पहले मैं कुछ बोलूं, उस ने कहा, ‘‘आइए आंटी, आन्या यहीं रहती है.’’

यह सुन कर मैं थोड़ी सामान्य हो कर अंदर गई. आन्या सोफे पर बैठ कर लैपटौप पर कुछ लिख रही थी. मुझे देखते ही वह मुझ से लिपट गई और मुसकराते हुए बोली, ‘‘मम्मी, यह तनय है, मैं इस से प्यार करती हूं. इसी से मुझे शादी करनी है. पर अभी ससुराल, बच्चे, रीतिरिवाज किसी जिम्मेदारी के लिए हम मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से परिपक्व नहीं हैं.

अलग रह कर रोजरोज मिलने पर समय और पैसे की बरबादी होती है. इसलिए हम ने साथ रह कर समय का इंतजार करना बेहतर समझा है. मैं जानती हूं अचानक यह देख कर आप को बहुत बुरा लग रहा है, लेकिन आप मुझ पर विश्वास रखिए, आप को मेरे निर्णय से कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.

‘‘और मैं यह भी जानती हूं, आप पापा के जाने के बाद बहुत अकेला महसूस कर रही हैं. आप हरीश अंकल से बहुत प्यार करती हैं. आप भी उन के साथ लिवइन में रह कर अपने अकेलेपन को दूर करें. फिर मुझे भी आप की ज्यादा चिंता नहीं रहेगी.’’

यह सब सुनते ही एक बार तो मुझे बहुत झटका लगा, फिर मैं ने सोचा कि आज के बच्चे कितने मजबूत हैं. मैं तो कभी आत्मनिर्णय नहीं ले पाई, लेकिन जीवन का इतना बड़ा निर्णय लेने में उस को क्यों रोकूं. तनय बातों से अच्छे संस्कारी परिवार का लगा. अब समय के साथ युवा बदल रहे हैं, तो हमें भी उन की नई सोच के अनुसार उन की जीवनशैली का स्वागत करना चाहिए.

उन पर हमारा निर्णय थोपने का कोई अर्थ नहीं है. और यह मेरी परवरिश का ही परिणाम है कि वह मुझ से दूसरे बच्चों की तरह छिपा कर कुछ नहीं करती. मैं ने तनय को अपने गले से लगाया कि उस ने आन्या के भविष्य की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मुझे मुक्त कर दिया है. मैं संतुष्ट मन से घर लौट आई और आते ही मैं ने हरीश के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी.

Short Story: औरत का दर्द

Short Story, लेखक- सुधारानी श्रीवास्तव

‘‘मैडम, मेरा क्या कुसूर है जो मैं सजा भुगत रही हूं?’’ रूपा ने मुझ से पूछा. रूपा के पति ने तलाक का केस दायर कर दिया था. उसी का नोटिस ले कर वह मेरे पास केस की पैरवी करवाने आई थी.

उस के पति ने उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया था. रूपा की मां उस के साथ आई थी. उस ने कहा कि रूपा के ससुराल वालों ने बिना दहेज लिए विवाह किया था. उन्हें सुंदर बहू चाहिए थी.

रूपा नाम के अनुरूप सुंदर थी. जब रूपा छोटी थी तब उस की मां की एक सहेली ने रूपा के गोरे रंग को देख कर शर्त लगाई थी कि यदि तुम्हें इस से गोरा दामाद मिला तो मैं तुम्हें 1 हजार रुपए दूंगी. उस ने जब पांव पखराई के समय रूपेश के गुलाबी पांव देखे तो चुपचाप 1 हजार रुपए का नोट रूपा की मां को पकड़ा दिया.

रूपेश का परिवार संपन्न था. वे ढेर सारे कपड़े और गहने लाए थे. नेग भी बढ़चढ़ कर दिए थे. रूपा के घर से उन्होंने किसी भी तरह का सामान नहीं लिया था. रूपा के मायके वाले इस विवाह की भूरिभूरि प्र्रशंसा कर रहे थे. रूपा की सहेलियां रूपा के भाग्य की सराहना तो कर रही थीं पर अंदर ही अंदर जली जा रही थीं.

हंसीखुशी के वातावरण में रूपा ससुराल चली गई. रूपा अपने सुंदर पति को देखदेख कर उस से बात करने को आकुल हुई जा रही थी, पर रूपेश उस की ओर देख ही नहीं रहा था. ससुराल पहुंच कर ढेर सारे रीतिरिवाजों को निबटातेनिबटाते 2 दिन लग गए. रूपा अपनी सास, ननद व जिठानियों से घिरी रही. उस के खानेपीने का खूब ध्यान रखा गया. फिर सब ने घूमने का कार्यक्रम बनाया. 10-12 दिन इसी में लग गए. इस बीच रूपेश ने भी रूपा से बात करने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई.

घूमफिर कर पूरा काफिला लौट आया. रूपा की सास ने वहीं से रूपा के पिता को फोन कर दिया था कि चौथी की रस्म के अनुसार रूपा को मायके ले जाएं. जैसे ही ये लोग लौटे, रूपा के पिता आ कर रूपा को ले गए. रूपा कोरी की कोरी मायके लौट आई. सास ने उस के पिता को कह दिया था कि वे लोग पुरानी परंपरा में विश्वास रखते हैं, दूसरे ही दिन शुक्र अस्त हो रहा है इसलिए रूपा शुक्रास्त काल में मायके में ही रहेगी.

रूपा 4 माह मायके रही. उस की सास और ननद के लंबेलंबे फोन आते. उन्हीं के साथ रूपेश एकाध बात कर लेता.

4 महीने बाद रूपेश के साथ सासननद आईं और खूब लाड़ जता कर रूपा को बिदा करा कर ले गईं. ननद ने अपना घर छोड़ दिया था और उस का तलाक का केस चल रहा था. वह मायके में ही रहती थी. इस बार रूपेश के कमरे में एक और पलंग लग गया था. डबल बेड पर रूपा अपनी ननद के साथ सोती थी व रूपेश अलग पलंग पर सोता था. रूपेश को उस की मां व बहन अकेला छोड़ती ही नहीं थीं जो रूपा उस से बात कर सके.

1-2 माह तक तो ऐसा ही चला. फिर ननद के दोस्त प्रमोद का घर आनाजाना बढ़ने लगा. धीरेधीरे सासननद ने रूपा को प्रमोद के पास अकेला छोड़ना शुरू कर दिया. रूपेश का तो पहले जैसा ही हाल था.

एक दिन जब रूपा प्रमोद के लिए चाय लाई तो उस ने रूपा का हाथ पकड़ कर अपने पास यह कह कर बिठा लिया, ‘‘अरे, भाभी, देवर का तो भाभी पर अधिकार होता है. मेरे साथ बैठो. जो तुम्हें रूपेश नहीं दे सकता वह मैं तुम्हें दूंगा.’’

रूपा किसी प्रकार हाथ छुड़ा कर भागी और उस ने सास से शिकायत की. सास ने प्रमोद को तो कुछ नहीं कहा, रूपा से ही बोलीं, ‘‘तो इस में हर्ज ही क्या है. देवरभाभी का रिश्ता ही मजाक का होता है.’’

रूपा सन्न रह गई. वह आधुनिक जरूर थी पर उस का परिवार संस्कारी था. और यहां तो संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं थी. प्रमोद की छेड़खानी बढ़ने लगी. उसे सास व ननद का प्रोत्साहन जो था. एक दिन रूपा ने चुपके से पिता को फोन कर दिया. मां की बीमारी का बहाना बना कर वे रूपा को मायके ले आए. रूपा ने रोरो कर अपनी मां जैसी भाभी को सबकुछ बता दिया तो परिवार वालों को संपन्न परिवार के ‘सुदर्शन सुपुत्र’ की नपुंसकता का ज्ञान हुआ. चूंकि यह ऐसी बात थी जिस से दोनों परिवारों की बदनामी थी, इसलिए वे चुप रहे. 1 माह बाद सासननद रूपेश को ले कर रूपा को लेने आईं तो रूपा की मां व भाभी ने उन्हें आड़े हाथों लिया. सास तमतमा कर बोलीं, ‘‘तुम्हारी लड़की का ही चालचलन ठीक नहीं है, हमारे लड़के को दोष देती है.’’

रूपा की मां बोलीं, ‘‘यदि ऐसा ही है तो अपने लड़के की यहीं डाक्टरी जांच करवाओ.’’

इस पर सासननद ने अपना सामान उठाया और गाड़ी में बैठ कर चली गईं. इस बात को लगभग 8-10 माह गुजर गए. रूपा के विवाह को लगभग 2 वर्ष हो चुके थे कि रूपेश की ओर से तलाक का केस दायर कर दिया गया था. रूपा के प्रमोद के साथ संबंधों को आधार बनाया गया था और प्रमोद को भी पक्षकार बनाया था, ताकि प्रमोद रूपा के साथ अपने संबंधों को स्वीकार कर रूपा को बदचलन सिद्घ कर सके.

मेरे लिए रूपा का केस नया नहीं था. इस प्रकार के प्रकरण मैं ने अपने साथी वकीलों से सुने थे और कई मामले सामाजिक संगठनों के माध्यम से सुलझाए भी थे. इस प्रकार के मामलों में 2 ही हल हुआ करते हैं या तो चुपचाप एकपक्षीय तलाक ले लो या विरोध करो. दूसरी स्थिति में औरत को अदालत में विरोधी पक्ष के बेहूदा प्रश्नों को झेलना पड़ता है. मैं ने रूपा से नोटिस ले लिया और उसे दूसरे दिन आने को कहा.

मैं ने प्रत्येक कोण से रूपा के केस पर सोचविचार किया. रूपा का अब ससुराल में रहना संभव नहीं था. वह जाए भी तो कैसे जाए. पति से ही ससुराल होती है और पति का आकर्षण दैहिक सुख होता है. इसी से वह नई लड़की के प्रति आकृष्ट होता है. जब यह आकर्षण ही नहीं तो वह रूपा में क्यों दिलचस्पी दिखाएगा. इसलिए रूपा को तलाक तो दिलवाना है किंतु उस के दुराचरण के आधार पर नहीं. औरत हूं न इसीलिए औरत के दर्द को पहचानती हूं.

सोचविचार कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अलग से नपुंसकता के आधार पर केस लगाने के बजाय मैं इसी में प्रतिदावा लगा दूं. हिंदू विवाह अधिनियम में इस का प्रावधान भी है. दोनों पक्षकार हिंदू हैं और विवाह भी हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ है.

दूसरे दिन रूपा, उस की मां व भाभी आईं तो मैं ने उन्हें समझा दिया कि हम लोग उन के प्रकरण का विरोध करेंगे. साथ ही उसी प्रकरण में रूपेश की नपुंसकता के आधार पर तलाक लेंगे. इसलिए पहले रूपा की जांच करा कर डाक्टरी प्रमाणपत्र ले लिया जाए.

पूरी तैयारी के साथ मैं ने पेशी के दिन रूपा का प्रतिदावा न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया. साथ ही एक आवेदन कैमरा प्रोसिडिंग का भी लगा दिया, जिस में सुनवाई के समय मात्र जज और पक्षकार ही रहें और इस प्रक्रिया का निर्णय कहीं प्रकाशित न हो.

जब प्रतिदावा रूपा की सासननद को मिला तो वे बहुत बौखलाईं. उन्हें अपने लड़के की कमजोरी मालूम थी. प्रमोद को इसीलिए परिचित कराया गया था ताकि रूपा उस से गर्भवती हो जाए तो रूपेश की कमजोरी छिप जाए और परिवार को वारिस मिल जाए.

मैं ने न्यायालय से यह भी आदेश ले लिया कि रूपेश की जांच मेडिकल बोर्ड से कराई जाए. इधरउधर बहुत हाथपैर मारने पर जब रूपा की सासननद थक गईं तो समझौते की बात ले कर मेरे पास आईं. रूपा के पिता भी बदनामी नहीं चाहते थे इसलिए मैं ने विवाह का पूरा खर्च व अदालत का खर्च उन से रूपा को दिलवा कर राजीनामा से तलाक का आवेदन लगवा दिया. विवाह होने से मुकदमा चलने तक लगभग ढाई वर्ष हो गए थे. रूपा को भी मायके आए लगभग डेढ़ वर्ष हो गए थे. इसलिए राजीनामे से तलाक का आवेदन स्वीकार हो गया. दोनों पक्षों की मानमर्यादा भी कायम रही.

इस निर्णय के लगभग 5-6 माह बाद मैं कार्यालय में बैठी थी. तभी रूपा एक सांवले से युवक के साथ आई. उस ने बताया कि वह उस का पति है, स्थानीय कालिज में पढ़ाता है. 2 माह पूर्व उस ने कोर्ट मैरिज की है. उस की मां ने कहा कि हिंदू संस्कार में स्त्री एक बार ही लग्न वेदी के सामने बैठती है इसलिए दोनों परिवारों की सहमति से उन की कोर्ट मैरिज हो गई. रूपा मुझे रात्रि भोज का निमंत्रण देने आई थी.

उस के जाने के बाद मैं सोचने लगी कि यदि मैं ने औरत के दर्द को महसूस कर यह कानूनी रास्ता न अपनाया होता तो बेचारी रूपा की क्या हालत होती. अदालत में दूसरे पक्ष का वकील उस से गंदेगंदे प्रश्न पूछता. वह उत्तर न दे पाती तो रूपेश को उस के दुराचारिणी होने के आधार पर तलाक मिल जाता. फिर उसे जीवन भर के लिए बदनामी की चादर ओढ़नी पड़ती. सासननद की करनी का फल उसे जीवन भर भुगतना पड़ता. जब तक औरत अबला बनी रहेगी उसे दूसरों की करनी का फल भुगतना ही पड़ेगा. समाज में उसे जीना है तो सिर उठा कर जीना होगा.

Hindi Story: परीक्षा – ईश्वर क्यों लेता है भक्त की परीक्षा

Hindi Story, लेखक- सुनीत गोस्वामी

भव्य पंडाल लगा हुआ था जिस में हजारों की भीड़ जमा थी और सभी की एक ही इच्छा थी कि महात्माजी का चेहरा दिख जाए. सत्संग समिति ने भक्तों की इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए पूरे पंडाल में जगह-जगह टेलीविजन लगा रखे थे ताकि जो भक्त महात्मा को नजदीक से नहीं देख पा रहे हैं वे भी उन का चेहरा अच्छी तरह से देख लें.

कथावाचक महात्मा सुग्रीवानंद ने पहले तो ईश्वर शक्ति पर व्याख्यान दिया, फिर उन की कृपा के बारे में बताया और प्रवचन के अंत में गुरुमहिमा पर प्रकाश डाला कि हर गृहस्थी का एक गुरु जरूर होना चाहिए क्योंकि बिना गुरु के भगवान भी कृपा नहीं करते. वे स्त्री या पुरुष जो बिना गुरु बनाए शरीर त्यागते हैं, अगले जन्म में उन्हें पशु योनि मिलती है. जब आम आदमी किसी को गुरु बना लेता है, उन से दीक्षा ले लेता है और उसे गुरुमंत्र मिल जाता है, तब उस का जीवन ही बदल जाता है. गुरुमंत्र का जाप करने से उस के पापों का अंत होने के साथ ही भगवान भी उस के प्रति स्नेह की दृष्टि रखने लगते हैं.

गुरु के बिना तो भगवान के अवतारों को भी मुक्ति नहीं मिलती. आप सब जानते हैं कि राम के गुरु विश्वामित्र थे और कृष्ण के संदीपन. सुग्रीवानंद ने गुरु महिमा पर बहुत बड़ा व्याख्यान दिया.

डर और लालच से मिलाजुला यह व्याख्यान भक्तों को भरमा गया. सुग्रीवानंद का काम बस, यहीं तक था. आगे का काम उन के सेक्रेटरी को करना था.

सेक्रेटरी वीरभद्र ने माइक संभाला और बहुत विनम्र स्वर में भक्तों से कहा, ‘‘महाराजश्री से शहर के तमाम लोगों ने दीक्षा देने के लिए आग्रह किया था और उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वीकार कर लिया है. जो भक्त गुरु से दीक्षा लेना चाहते हैं वे रुके रहें.’’

इस के बाद पंडाल में दीक्षामंडी सी लग गई. इसे हम मंडी इसलिए कह रहे हैं कि जिस तरह मंडी में माल की बोली लगाई जाती है वैसे ही यहां दीक्षा बोलियों में बिक रही थी.

गरीबों की तो जिंदगी ही लाइन में खड़े हो कर बीत जाती है. यहां भी उन के लिए लाइन लगा कर दीक्षा लेने की व्यवस्था थी. 151 रुपए में गुरुमंत्र के साथ ही सुग्रीवानंद के चित्र वाला लाकेट दिया जा रहा था. गुरुमंत्र के नाम पर किसी को राम, किसी को कृष्ण, किसी को शिव का नाम दे कर उस का जाप करने की हिदायत दी जा रही थी. ये दीक्षा पाए लोग सामूहिक रूप से गुरुदर्शन के हकदार थे.

दूसरी दीक्षा 1,100 रुपए की थी. इन्हें चांदी में मढ़ा हुआ लाकेट दिया जा रहा था. गुरुमंत्र और सुग्रीवानंद की कथित लिखी हुई कुछ पुस्तकें देने के साथ उन्हें कभीकभी सुग्रीवानंद के मुख्यालय पर जा कर मिलने की हिदायत दी जा रही थी.

सब से महंगी दीक्षा 21 हजार रुपए की थी. कुछ खास पैसे वाले ही इस गुरुदीक्षा का लाभ उठा सके. ऐसे अमीर भक्त ही तो महात्माओं के खास प्रिय होते हैं. इन भक्तों को सोने की चेन में सुग्रीवानंद के चित्र वाला सोने का लाकेट दिया गया. पुस्तकें दी गईं और प्रवचनों, भजनों की सीडियां भी दी गईं. इन्हें हक दिया गया कि ये कहीं भी, कभी भी गुरु से मिल कर अपने मन की शंका का निवारण कर सकते हैं. इस विभाजित गुरुदीक्षा को देख कर लगा कि स्वर्ग की व्यवस्था भी किसी नर्सिंग होम की तरह होगी.

जिस ने महात्माजी से छोटी गुरुदीक्षा ली थी वह मरने के बाद स्वर्ग जाएगा तो उस के लिए खिड़की खुलेगी. ऐसे तमाम लोगों को सामूहिक रूप में जनरल वार्र्ड में रखा जाएगा. विशिष्ट दीक्षा वालों के लिए स्वर्ग का बड़ा दरवाजा खुलेगा और ये प्राइवेट रूम में रहेंगे.

आज से लगभग 10 साल पहले रमेश एक प्राइवेट हाउसिंग कंपनी में अधिकारी था. एक बार भ्रष्टाचार के मामले में वह पकड़ा गया और नौकरी से निकाल दिया गया. बेरोजगार शातिर दिमाग रमेश सोचता रहता कि काम ऐसा होना चाहिए जिस में मेहनत कम हो, इज्जत खूब हो और पैसा भी बहुत अधिक हो. वह कई दिन तक इस पर विचार करता रहा कि ये तीनों चीजें एकसाथ कैसे मिलें. तभी उसे सूझा कि धर्म के रास्ते यह सहज संभव है. धर्म की घुट्टी समाज को हजारों वर्षों से पिलाई गई है. यहां अपनेआप को धार्मिक होना लोग श्रेष्ठ मानते हैं. जो शोधक है वह भी दान दे कर अपने अपराधबोध को कम करना चाहता है. यह सब सोेचने के बाद रमेश ने पहले अपनी एक कीर्तन मंडली बनाई और अपना नाम बदल सुग्रीवानंद कर लिया. कीर्तन करतेकरते सुग्रीवानंद कथा करने लगा. धीरेधीरे वह बड़ा कथावाचक बन गया. लोगों को बातों में उलझा कर, भरमा कर, बहका कर धन वसूलने के बहुत से तरीके भी जान गया. उस ने बहुत बड़ा आश्रम बना लिया.

इस तरह दुकानदारी चल पड़ी और धनवर्षा होने लगी तो सरकार से अनुदान पाने के लिए सुग्रीवानंद ने गौशाला और स्कूल भी खोल लिए.

सुग्रीवानंद इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझता था कि जो पूंजीपति शोषक और बेईमान होता है उस के अंदर एक अपराधबोध होता है और वह दान दे कर इस बोध से मुक्त होना चाहता है. सुग्रीवानंद जब भी अपने अमीर शिष्यों से घिरा होता तो उन्हें दान की महिमा पर जरूर घुट्टी पिलाता था.

सुरेश एक उद्योगपति था. उस ने भी सुग्रीवानंद से गुरुदीक्षा ली थी. अब वह उस का शिष्य था और शिष्य होने के नाते गुरु के आदेश का पालन करना अपना धर्म समझता था. एक दिन सुग्रीवानंद ने सुरेश से कहा, ‘‘वत्स, मैं ने आश्रम की तरफ से कुछ गरीब कन्याओं के विवाह का संकल्प लिया है.’’

‘‘यह तो बड़ा शुभ कार्य है, गुरुजी. मेरे लिए कोई सेवा बताएं.’’

‘‘वत्स, धर्मशास्त्र कहते हैं कि दान देने में ही मनुष्य का कल्याण है. दान से यह लोक भी सुधरता है और परलोक भी.’’

‘‘आप आदेश करें, गुरुजी, मैं तैयार हूं.’’

‘‘लगभग 2 लाख रुपए का कार्यक्रम है.’’

सुरेश इतनी बड़ी रकम सुन कर मौन हो गया.

शिकार को फांसने की कला में माहिर शिकारी की तरह सुग्रीवानंद ने कहा, ‘‘देखो वत्स, सुरेश, तुम मेरे सब से प्रिय शिष्य हो. इस शुभ अवसर का पूरा पुण्य तुम्हें मिले, यह मेरी इच्छा है. वरना मैं किसी और से भी कह सकता हूं, मेरी बात कोई नहीं टालता.’’

गुरुजी उस पर इतने मेहरबान हैं, यह सोच कर उस ने दूसरे दिन 2 लाख रुपए ला कर गुरुजी को भेंट कर दिए.

रुपए लेने के बाद सुग्रीवानंद ने कहा, ‘‘यह बात किसी दूसरे शिष्य को मत बताना. अध्यात्म के रास्ते पर भी बड़ी ईर्ष्या होती है. भगवान को पाने के लिए दान बहुत बड़ी साधना है और यह साधना गुप्त ही होनी चाहिए.’’

गुरु की आज्ञा का उल्लंघन धर्मभीरु सुरेश कैसे कर सकता था.

सुग्रीवानंद ने अपने सभी अमीर शिष्यों को अलगअलग समय में इसी तरह पटाया. सभी से 2-2 लाख रुपए वसूले और इन्हें दान की महान साधना को गुप्त रखने के आदेश दिए. इस तरह एक तीर से दो शिकार करने वाले सुग्रीवानंद के आश्रम में गरीब कन्याओं के विवाह कराए गए. उस ने मीडिया द्वारा तारीफ भी बटोरी लेकिन यह कोई नहीं जान पाया कि इस खेल में वह कितना पैसा कमा गया.

सुग्रीवानंद ने जगहजगह अपने आश्रम खोले थे लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि इन आश्रमों को उस के परिवार व खानदान के लोग ही नहीं बल्कि रिश्तेदार भी चला रहे थे. धर्मभीरु जनता से धन ऐंठने के नएनए तरीके ढूंढ़ने वाले सुग्रीवानंद ने किसी पत्रिका में आदिवासियों पर एक लेख पढ़ लिया था. बस, लोगों से पैसा हड़पने का उसे एक और तरीका मिल गया, उस ने एक कथा में कहा कि आप के जो अशिक्षित बनवासी भाई हैं वे बहुत ही गरीबी में जी रहे हैं. हम सभी का धर्म है कि उन की सेवा करें. उन्हें शिक्षा के साधन उपलब्ध कराएं. मैं ने इस निमित्त जो संकल्प लिया है वह आप सभी के सहयोग से ही पूरा हो सकता है. सेवा ही धर्म है और सेवा ही भगवान की पूजा है. फिर दरिद्र तो नारायण होता है. इसलिए दरिद्र के लिए आप जितना अधिक दान देंगे, नारायण उतना ही खुश होगा.

सुग्रीवानंद ने आह्वान किया कि आइए, आगे आइए. इस शहर के धनकुबेर आगे आएं और आदिवासियों के लिए उदार दिल से दान की घोषणा करें. सुरेश ने पहली घोषणा की कि 1 लाख रुपए मेरी तरफ से. इस के बाद तो लोग बढ़चढ़ कर दान की घोषणाएं करने लगे. इस तरह सुग्रीवानंद के आश्रम के नाम लगभग 80 लाख रुपए की घोेषणा हो गई.

अभी तक सुरेश इस खुशफहमी में था कि गुरुजी की बातों को मान कर उसे अध्यात्म का लाभ प्राप्त होगा, परलोक का सुख मिलेगा मगर इस परलोक को सुधारने के चक्कर में वह मुसीबत में पड़ता जा रहा था. उस का सारा समय तो दीक्षा के बाद गुरुजी की बताई साधनाओं में ही व्यतीत हो जाता था और कमाई का अधिकांश धन गुरुजी को दान देने में.

परिणाम यह हुआ कि सुरेश का व्यापार डांवांडोल होने लगा. व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी सक्रिय हो गए. वह लाभ कमाने लगे और उस के हिस्से में घाटा आता गया. समय पर आर्डरों की सप्लाई न देने की वजह से बाजार में उस की साख गिरती गई. लाखों रुपए उधारी में फंस गए तब उसे हैरानी इस बात पर भी हुई कि दान का यह उलटा फल क्यों मिल रहा है जबकि गुरुजी कहते थे कि तुम जो भी दान दोगे, उस का कई गुना हो कर वापस मिलेगा. जैसे धरती में थोड़ा सा बीज डालते हैं तो वह कई गुना कर के फसल के रूप में लौटा देती है पर उस ने तो लाखों का दान दिया, फिर वह कंगाली के कगार पर क्यों?

सुरेश ने अपनी परेशानी गुरुजी के सामने रखी. सुग्रीवानंद ने तुरंत उत्तर दिया, ‘‘अरे बेटा, भगवान इसी तरह तो परीक्षा लेते हैं. भगवान अपने प्रिय भक्त को परेशानियों में डालते हैं और देखते हैं कि वह भक्त कितना सच्चा है.’’

सुरेश को यह जवाब उचित नहीं लगा. उस ने फिर पूछा, ‘‘गुरुजी भगवान तो अंतर्यामी हैं. वह जानते हैं कि भक्त कितना सच्चा है. फिर परीक्षा की उन्हें क्या जरूरत है?’’

सुग्रीवानंद को इस का कोई जवाब नहीं सूझा तो उस ने बात को टालते हुए कहा, ‘‘सुरेश, भगवान के विधान को कभी तर्कों से नहीं जाना जा सकता. यह तो विश्वास का मामला है. गुरु की बातों पर संदेह करोगे तो कुछ प्राप्त नहीं होगा.’’

सुरेश को उस के प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिला. सुरेश की जो जिज्ञासा थी, उस का उत्तर आज भी किसी महात्मा या कथावाचक के पास नहीं है. महात्माओं के अनुसार ईश्वर घटघटवासी है. वह त्रिकालदर्शी है. करुणा का सागर है. अंतर्यामी है. व्यक्ति के मन की हर बात जानता है. वह कितना सच्चा है, कितना कपटी है, ईश्वर को सब पता रहता है. फिर वह भक्त की परीक्षा क्यों लेता है? यह प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में है.

Hindi Story: हिंदुस्तान जिंदा है

Hindi Story: अब वह कहां जिंदा थी कि किसी का नाम बताती. बस, सड़क के किनारे एक नंगी लाश के रूप में पड़ी मिली थी. मीना के पति को बाजार में छुरा मारा गया था, मर्द को दंगाई नंगा नहीं करते क्योंकि दंगाई भी मर्द होते हैं.

मीना और मौलवी रशीद दोनों ने अपनीअपनी लाशें उठा कर उन का अंतिम संस्कार किया था. ये दोनों जिस शहर के थे वहां की फितरत में ही दंगा था और वह भी धर्म के नाम पर.

इस शहर के लोग पढ़ेलिखे जरूर थे पर नेताओं की भड़काऊ बातों को सुन कर सड़कों पर उतर आना, छतों से पत्थरों की वर्षा करना और फिर गोली चलाना इन की आदत हो गई थी. कोई तो था जो निरंतर इस दंगा कल्चर को बढ़ावा दे रहा था ताकि जनता बंटी रहे और उन का मकसद पूरा होता रहे.

मौलवी रशीद और मीना दोनों एकसाथ पढ़े थे. दोनों का बचपन भी साथसाथ ही गुजरा था. दोनों आपस में प्रेम भी करते थे, लेकिन इन की आपस में शादी इसलिए नहीं हुई कि दोनों का धर्म अलगअलग था और ऐसे कट्टर धार्मिक, सोच वाले शहर में एक हिंदू लड़की किसी मुसलमान लड़के से शादी कर ले तो शहर में हंगामा बरपा हो जाए.

मीना ने तो चाहा था कि वह रशीद से शादी कर ले लेकिन खुद रशीद ने यह कह कर मना कर दिया था कि यदि तुम चाहती हो कि 4-5 मुसलमान मरें तो मैं यह शादी करने के लिए तैयार हूं. और फिर मीना अपने दिल पर पत्थर रख कर बैठ गई थी.

इसी के बाद दोनों के जीवन की धारा बदल गई. रशीद ने अपने संप्रदाय में एक नेक लड़की से शादी कर अपनी गृहस्थी बसा ली तो मीना ने अपनी ही जाति के एक लड़के के साथ शादी कर ली. फिर तो दोनों एक ही शहर में रहते हुए एकदूसरे के लिए अजनबी बन गए.

इधर धर्म का बाजार सजता रहा, धर्म का व्यापार होता रहा और इस धर्म ने देश को 2 टुकड़ों में बांट दिया. इनसान के लिए धर्म एक ऐसा रास्ता है जिसे केवल मन में रखा जाए और खामोशी के साथ उस पर विश्वास करता चला जाए न कि उस के लिए बेबस औरतों को नंगा किया जाए, संपत्तियों को जलाया जाए और बेगुनाह लोगों की जानें ली जाएं.

मौलवी रशीद की कोई संतान नहीं थी पर मीना के 2 बच्चे थे. एक 3 साल का और दूसरा 3 मास का. पति के मरने के बाद मीना बिलकुल बेसहारा हो गई थी. अब उस शहर में उस का दर्द, उस की जरूरतों को समझने वाला मौलवी रशीद के अलावा दूसरा कोई भी नहीं था.

सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शहर से खत्म नहीं हो रहा था. कभी दिन का कर्फ्यू तो कभी रात का कर्फ्यू. इनसान तो क्या जानवर भी इस से तंग हो गए थे. मौलवी रशीद ने टेलीविजन खोला तो एक खबर आई कि प्रशासन ने शाम को कर्फ्यू में 2 घंटे की ढील दी है ताकि लोग घरों से बाहर निकल कर अपनी दैनिक जरूरतों की वस्तुओं को खरीद सकें. मौलवी रशीद को मीना के 3 माह के बच्चे की चिंता थी क्योंकि पति की मौत के बाद मीना की छाती का दूध सूख गया था. उस बच्चे के लिए उसे दूध लेना था और ले जा कर हिंदू इलाके में मीना के घर देना था.

रशीद जब घर से स्कूटर पर चला तो उसे थोड़ा डर सा लगा था. वह सआदत हसन मंटो (उर्दू का प्रसिद्ध कथाकार) तो था नहीं कि अपनी जेब में 2 टोपियां रखे और हिंदू महल्ले से गुजरते समय सिर पर गांधी टोपी तथा मुसलमान महल्ले से गुजरते समय गोल टोपी लगा ले.

खैर, रशीद किसी तरह हिम्मत कर के मीना के बच्चे के लिए दूध का पैकेट ले कर चला तो रास्ते भर लोगों की तरहतरह की बातें सुनता रहा.

किसी एक ने कहा, ‘‘इस का मीना के साथ चक्कर है. मीना को कोई हिंदू नहीं मिलता क्या?’’

दूसरे के मुंह से निकला, ‘‘लगता है इस का संपर्क अलकायदा से है. हिंदू इलाके में बम रखने जा रहा है. इस मौलवी का हिंदू महल्ले में आने का क्या मतलब?’’

दूसरे की कही बातें सुन कर तीसरे ने कहा, ‘‘यदि अलकायदा का नहीं तो इस का संबंध आई.एस.आई. से जरूर है. तभी तो इस की औरत को नंगा कर के गोली मारी गई.

रशीद ने मीना के घर पहुंच कर उसे आवाज लगाई और दूध का पैकेट दे कर वापस आ गया. एक सेना का अधिकारी, जो मीना के घर के सामने अपने जवानों के साथ ड्यूटी दे रहा था, उस ने रशीद को दूध देते देखा. मौलवी रशीद उसे देख कर डर के मारे थरथर कांपने लगा. वह आर्मी अफसर आगे बढ़ा और रशीद की पीठ को थपथपाते हुए बोला, ‘‘शाबाश.’’

रशीद जब अपने महल्ले में पहुंचा तो देखा कि लोग उस के घर को घेर कर खड़े थे. वह स्कूटर से उतरा तो महल्ले के मुसलमान लड़के उस की पिटाई करते हुए कहने लगे, ‘‘तू कौम का गद्दार है. एक हिंदू लड़की के घर गया था. तू देख नहीं रहा है कि वे हमें जिंदा जला रहे हैं? हमारी बहनबेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. क्या उस महल्ले के हिंदू मर गए थे जो तू उस के बच्चे को दूध पिलाने गया था.’’

एक बूढ़े मौलाना ने कहा, ‘‘रशीद, तू महल्ला खाली कर फौरन यहां से चला जा नहीं तो तेरी वजह से इस महल्ले पर हिंदू कभी भी हमला कर सकते हैं. तेरा मीना के साथ यह अनैतिक संबंध हम को बरबाद कर देगा.’’

इस बीच पुलिस की एक जीप वहां आई और पुलिस वाले यह कह कर चले गए कि यहां तो मुसलमानों ने ही मुसलमान को मारा है, खतरे की कोई बात नहीं है. लगता है कोई पुरानी रंजिश होगी.

मार खाने के बाद रशीद अपने घर चला गया और बिस्तर पर लेट कर कराहने लगा. कुछ देर के बाद फोन की घंटी बजी. फोन मीना का था. वह कह रही थी, ‘‘रशीद, तुम्हारे जाने के बाद महल्ले के कुछ हिंदू लड़के मेरे घर में घुस आए थे और उन्होेंने दूध के साथ घर का सारा सामान सड़क पर फेंक दिया. अब मैं क्या करूं. तुम जब तक माहौल सामान्य नहीं हो जाता मेरे घर मत आना. बच्चे तो जैसेतैसे जी ही लेंगे.’’

रशीद फोन पर हूं हां कर के चुप हो गया क्योंकि उसे चोट बहुत लगी थी. वह लेटेलेटे सोच रहा था कि हिंदूमुसलिम फसाद में एक तरफ से कुछ भी नहीं होता है. दोनों तरफ से लड़ाई होती है और कौम के नेता इस जलती हुई आग पर घी डालते हैं. यदि हिंदू मुसलमान को मारता है तो वही उस को सड़क से उठाता भी है. अस्पताल भी वही ले जाता है, वही पुलिस की वर्दी पहन कर उस का रक्षक भी बनता है और वही जज की कुरसी पर बैठ कर इंसाफ भी करता है, कहीं तो कुछ है जो टूटता नहीं.

4 दिन बाद कुछ हालात संभले थे. इस दौरान समाचारपत्रों ने बहुत सी घटनाओं को अपनी सुर्खियां बनाया था. इन्हीं में एक खबर रशीद और मीना को ले कर छपी थी कि ‘हिंदू इलाके में एक मुसलमान अपनी प्रेमिका से मिलने आता है.’

ऐसे माहौल में समाचारपत्रों का काम है खबर बेचना. अगर सच्ची खबर न हो तो झूठी खबर ही सही, उन के अखबार की बिक्री बढ़नी चाहिए. अब तो राजनीतिक पार्टियां भी अपना अखबार निकाल रही हैं ताकि पार्टी की पालिसी के अनुसार समाचार को प्रकाशित किया जाए. आजादी के बाद हम कितने बदल गए हैं. अब नेताओं को देश की जगह अपनी पार्टी से प्रेम अधिक है.

शहर में कर्फ्यू समाप्त हो गया था. रशीद भी अब पूरी तरह से ठीक हो गया था. उस ने फैसला किया कि अब यह शहर उस के रहने के लायक नहीं रहा पर शहर छोड़ने से पहले वह मीना से मिलना चाहता था.

वह घर से निकला और सीधा मीना के घर पहुंचा. उसे घर के दरवाजे पर बुलाया और हमेशाहमेशा के लिए उसे एक नजर देख कर मुड़ना ही चाहता था कि कुछ लोग उस को चारों ओर से घेर कर खड़े हो गए.

रशीद ने मीना से सब्जी काटने वाला चाकू मांगा और सब को संबोधित कर के बोला, ‘‘आप लोगों को मुझे मारने की आवश्यकता नहीं है. मैं अपने पेट में चाकू मार कर आत्महत्या करने जा रहा हूं. अब यह शहर जीने लायक नहीं रह गया.’’

उस भीड़ ने रशीद को पकड़ लिया और एक सम्मिलित स्वर में आवाज आई, ‘‘भाई साहब, हम आप को मारने नहीं बल्कि देखने आए हैं. आप की पत्नी को हिंदुओं ने नंगा कर के गोली मारी थी और आप एक हिंदू विधवा के बच्चों के लिए दूध लाते रहे. अब आप जैसे इनसान को देखने के बाद यकीन हो गया है कि हिंदुस्तान जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगा.

Hindi Story: खरोंचें – स्वर्ग में नरक भोगते लोग!

Hindi Story, लेखक- सरन घई

कितनी आरजू, कितनी उमंग थी मन में. लेकिन हकीकत में मिला क्या? सारे सपने चूरचूर हुए और रह गई सिर्फ आह.

‘‘आप इंडिया से कनाडा कब आए?’’

‘‘यही कोई 5 साल पहले.’’

‘‘यहां क्या करते हैं?’’

‘‘फैक्टरी में लगा हूं.’’

‘‘वहां क्या करते थे?’’

‘‘बिड़लाज कंसर्न में अकाउंट्स अधिकारी था.’’

इन सज्जन से मेरी यह पहली मुलाकात है. अब आप ही बताएं, भारत का एक अकाउंट्स अधिकारी कनाडा आ कर फैक्टरी में मजदूरी कर रहा है. उसे कनाडा आने की बधाई दूं या 2-4 खरीखोटी सुनाऊं, यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं.

‘‘अच्छा, तो वहां तो आप अपने विभाग के बौस होंगे?’’

‘‘हांहां,  वहां करीब 60 लोग मेरे मातहत थे. अकाउंट विभाग का इंचार्ज था न, 22 हजार रुपए तनख्वाह थी.’’

‘‘तो घर पर नौकरचाकर भी होंगे?’’

‘‘हां, मुझे तो आफिस की तरफ से एक अर्दली भी मिला हुआ था. कार और ड्राइवर तो उस पोस्ट के साथ जुडे़ ही थे.’’

‘‘अच्छा, फिर तो बडे़ ठाट की जिंदगी गुजार रहे थे आप वहां.’’

‘‘बस, ऊपर वाले की दया थी.’’

‘‘भाभीजी क्या करती थीं वहां?’’

‘‘एक स्कूल में अध्यापिका थीं. कोई नौकरी वाली बात थोड़ी थी, अपने छिटपुट खर्चों और किटी पार्टी की किश्तें निकालने के लिए काम करती थीं, वरना उन्हें वहां किस बात की कमी थी.’’

‘‘तो भाभीजी भी आप के साथ ही कनाडा आई होंगी? वह क्या करती हैं यहां?’’

‘‘शुरू में तो एक स्टोर में कैशियर का काम करती थीं. फिर नौकरी बदल कर किसी दूसरी जगह करने लगीं. अब पता नहीं क्या करती हैं.’’

‘‘पता नहीं से मतलब?’’

‘‘हां, 2 साल पहले हमारा तलाक हो गया.’’

लीजिए, कनाडा आ कर अफसरी तो खोई ही, पत्नी भी खो दी.

‘‘माफ कीजिए, आप के निजी जीवन में दखल दे रहा हूं, पर यह तो अच्छा नहीं हुआ.’’

‘‘अच्छा हुआ क्या, कुछ भी तो नहीं. यहां आ कर शानदार नौकरी गई, पत्नी गई और अब तो…’’

‘‘अब तो क्या?’’

‘‘मेरी बेटी भी पता नहीं कहां और किस के साथ रहती है.’’

‘‘आप की बेटी भी है. वह तलाक के बाद आप के पास थी या आप की पत्नी के पास?’’

‘‘मेरी बेटी 18 साल से बड़ी थी इसलिए उस ने न मेरे साथ रहना पसंद किया न अपनी मां के साथ, अलग रहने चली गई.  कहने लगी कि जो अपनी गृहस्थी नहीं संभाल सके वे मेरी जिंदगी क्या संभालेंगे. कहां चली गई किसी को पता नहीं. हां, कभीकभी फोन कर देती है, इसी से पता चलता है कि वह है, पर कहां है कभी नहीं बताती. फोन करती है तो ‘पे’ फोन से. आप ने सुना है किसी को स्वर्ग में नरक भोगते? मैं भोग रहा हूं.’’

मैं उन से क्या कहूं? क्या कह कर दिलासा दूं? स्वर्ग की चाह हम ने खुद की थी, हमारा फैसला था यह, हमारी महत्त्वाकांक्षा थी जो हमें उस आकाश के आंचल से इस आकाश के आंचल तले समेट लाई. जब जीवन वहां के अंदाज को छोड़ कर यहां के अंदाज में बदलने लगा तो हमें महसूस हुआ कि हम नरक के दरवाजे पर पहुंच गए. नरक भोगने जैसी बातें करने लगे.

मैं यह समझता हूं कि यह नरक भोगना नहीं है, यह बदल रही जीवन शैली की सचाइयों से मुझ जैसे प्रवासियों का परिचय है. यह पहला अनुभव है जो वहां की जीवन शैली से यहां की जीवन शैली में परिवर्तन के क्रम का पहला पड़ाव समान है. याद है जब भारत की भीड़ भरी बसों और ट्रेनों में धक्कामुक्की कर के चढ़ते थे और उस प्रयास में लग जाती थीं कुछ खरोंचें. वही खरोंचें हैं ये.

Hindi Story: अजमेर का सूबेदार

Hindi Story, लेखिका- डा. उषा अग्रवाल

बात सन 1581 के शुरुआती दिनों की है. अकबर के संरक्षक बैरम खां के बेटे अब्दुर्रहीम खानखाना के पास कवि का कोमल दिल ही नहीं शाही आनबानशान और मुगल साम्राज्य के लिए मरमिटने का जज्बा भी था. उस के बाजुओं में कितनी ताकत थी यह उन्होंने गुजरात विजय, मेवाड़ के कुंभलनेर और उदयपुर के किले पर अधिकार कर के साबित कर दिया था.

बादशाह अकबर ने अब्दुर्रहीम की बहादुरी, ईमानदारी और समर्पण के भाव को देख कर ही उसे ‘मीर अर्ज’ की पदवी से नवाजा तो इस में कोई पक्षपात नहीं था, बल्कि वे जानते थे कि कलम और तलवार के धनी रहीम खानखाना कूटनीति के भी अच्छे जानकार हैं, तभी तो बादशाह ने उन्हें मेवाड़ मामले और खास कर महाराणा प्रताप की चट्टानी आन को तोड़ने के लिए अजमेर की सूबेदारी सौंपी थी. जिस काम को मानसिंह जैसा सेनापति और खुद बादशाह अकबर नहीं कर सके उस काम को करने के लिए खानखाना को अजमेर भेजना और वह भी यह कह कर कि शेर को जिंदा पकड़ कर दरबार में पेश करना है, कुछ अजीब लगता है लेकिन इस में कहीं न कहीं एक नायक की काबिलीयत के प्रति एक बादशाह का विश्वास भी झलकता है.

अजमेर आ कर रहीम ने पहले बेगमों, बांदियों, बच्चों को अस्त्रशस्त्र, रसद समेत शेरपुर के किले में सुरक्षित रखा ताकि उन की गैरमौजूदगी में वे सब सुरक्षित रह सकें. अब बेगमें क्षत्राणियां तो हैं नहीं कि पति को लड़ाई में भेज कर खुद किले में तीर, भाले, तलवार चलाने का अभ्यास करती रहें. यह तो शाही फौज के साथ सुरक्षा के साए में रहने वाली हरम की औरतें हैं जिन्हें अपनी अस्मत की रक्षा के लिए मर्दों पर ही निर्भर रहना है क्योंकि इसलाम धर्म इस से आगे की उन्हें इजाजत नहीं देता.

अब्दुर्रहीम खानखाना किले के विश्रामगृह में बैठे पसोपेश में हैं, परेशान हैं, सोच रहे हैं पर समझ नहीं पा रहे कि कैसे इस अरावली के शेर को काबू में करें. राणाप्रताप सिर्फ मेवाड़ पर नहीं, लोगों के दिलों पर राज करता है. आन का पक्का, भीलों का राजा नहीं उन का साथी है. कोई तो उस की कमजोरी पकड़ में नहीं आ रही जिस के सहारे वह आगे बढ़े. सारे सियासी दांवपेच उन की बेखौफ दिलेरी के सामने फीके पड़ जाते हैं.

तनमन में मेवाड़ प्रेम और स्वदेश सम्मान की रक्षा का संकल्प लिए यह राणा बिना समुचित सेना और हथियारों के भी शाही सेना पर भारी पड़ जाता है. भीलों का रणकौशल गजब का है. उन की पत्थरों और तीरों की मार के आगे मुगलिया सेना के पांव उखड़ जाते हैं.

आखिर क्या हुआ हल्दी घाटी में. राजा मानसिंह युद्ध जीत गए, उदयपुर छीन लिया, लेकिन क्या वाकई यह मुगलिया फौज की जीत थी? सारी रसद लुट गई, न राणा बंधे न उन का कुंवर. खाली हाथ भूखीप्यासी सेना को ले कर मानसिंह वापस आगरा लौटे थे. तो क्या राजा मानसिंह का शाही स्वागत हुआ था? नहीं, किस तरह इस बेकाबू राणा को काबू में करें यह वह समझ नहीं पा रहे.

अचानक उन की बड़ी बेगम ने विश्राम घर में प्रवेश किया और बोलीं, ‘‘क्या बात है मेरे सरताज, बडे़ सोच में हैं. कोई परेशानी?’’

‘‘परेशानी ही परेशानी है बेगम, एक हो तो बताएं. आप को याद है न हल्दी घाटी से लौटने पर मानसिंह की कितनी बेइज्जती हुई थी. बादशाह की पेशानी पर बल थे और उन्होंने कहा था कि क्या मानसिंह उम्मीद करते हैं कि उन की इस शर्मनाक जीत पर हम जश्न मनाएंगे? माबदौलत तो उन की शक्ल भी देखना नहीं चाहते.’’

‘‘हां, मुझे याद है,’’ बड़ी बेगम ने कहा, ‘‘बादशाह ने बदायूनी को तो सोने की मोहरों से नवाजा था और मिर्जा राजा से नाराज ही रहे थे.

‘‘बादशाह तो इतने नाराज थे कि उस के 3 महीने बाद वे खुद ही मुहिम पर निकले थे और 1 नहीं 3 हमले  राणा पर किए थे.’’

‘‘तो राणा कौन से बादशाह के हाथ आ गए थे,’’ चिंता से छटपटा रहे रहीम ने कहा, ‘‘अरे बेगम, उस के बाद भी तो जगहजगह थाने बनाए गए, हमले किए गए, लेकिन राणा के छापामारों ने मुजाहिदखां जैसे हैवानी थानेदार को भी मार डाला. एक साल बाद 15 अक्तूबर, 1577 को शाहबाज खां को भेजा गया. उस का खौफ तो जरूर फैला लेकिन वह भी तो बेकाबू राणा को बांधने में नाकाम ही रहा. 3 साल उन्हीं अरावली की पहाडि़यों में झख मारने के बाद खाली हाथ ही तो लौटा था. फिर अजमेर के सूबेदार बने दस्तम खान. वह मेवाड़ क्या जाते जब आमेर में ही दम तोड़ना पड़ा.’’

‘‘लेकिन मेरे हुजूर, आप यह सोचिए कि इन सब के बाद जब यह तय हुआ कि किसी खास बंदे को इस बेहद संगीन मामले से निबटने को भेजा जाए तो बादशाह सलामत को सिर्फ आप सूझे. कितना विश्वास है उन को आप पर और आप की काबिलीयत पर. आप को तो खुश होना चाहिए.’’

‘‘बेगम, आलमपनाह का यही भरोसा तो मुझे खाए जा रहा है. सोचिए, क्या होगा अगर यह भरोसा टूट गया?’’ रहीम वाकई परेशान थे.

‘‘इस तरह हिम्मत हारना आप को शोभा नहीं देता, हुजूर. पूरे हौसले के साथ टूट पडि़ए दुश्मनों पर. आप के सामने वह है क्या भला? आप भूल गए गुजरात विजय को जब आप ने बिना मदद का इंतजार किए सिर्फ 10 हजार सिपाहियों को साथ ले कर सुलतान मुजफ्फर की 1 लाख पैदल और 40 हजार घुड़सवार सेना को परास्त कर दिया था.’’ बेगम अब्दुर्रहीम खानखाना को प्रोत्साहित तो कर रही थीं पर उन के मन में भी डर था. वह भी जानती थीं कि भरोसा टूटने पर बादशाह कैसा कहर बरपा करते हैं.

‘‘बेगम, आप ख्वाहमख्वाह मेरी झूठी हौसलाअफजाई मत कीजिए. क्या आप को पता नहीं कि मेरे पीछे उधर आगरा में साजिशों का दौर चल रहा होगा, बादशाह के कान भरे जा रहे होंगे. अब्बा हुजूर ने बादशाह को इस लायक बनाया, गद्दीनशीन कराया, राजकाज संभाला, उन्हें सियासत सिखाई. जब उन्हें बेइज्जत  करने में बादशाह को मिनट नहीं लगा तो भला मेरी बिसात क्या है? आप को शायद पता नहीं है कि हुमायूं की शिकस्त के बाद शहंशाह शेरशाह ने अब्बा की मिन्नतें की थीं कि वह उन के साथ ही रहें लेकिन अब्बा हुजूर ने हिंदुस्तान के शहंशाह का साथ छोड़ कर हुमायूं का साथ दिया था.’’

अपने पति को शायद ही कभी इतने भावावेश में देखा होगा बेगम ने. अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत और हिंदी भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले रहीम बड़े गंभीर व्यक्ति थे.

बेगम बोलीं, ‘‘हां, मेरे सरताज, मुझे तो यह भी पता है कि जब बादशाह अकबर गद्दी पर बैठे तो उन का सदर मुकाम सरहिंद था, क्योंकि दिल्ली और आगरा पर अफगानों की तलवार मंडरा रही थी. इस मुसीबतजदा बादशाह को हेमू से निजात अब्बा हुजूर ने ही दिलाई थी. यही नहीं अब्बा हुजूर ने बादशाह की हिचकिचाहट के बावजूद निहत्थे हेमू को मार कर और सिकंदर शूरी से समर्पण करवा कर इस बड़ी सल्तनत की नींव डाली थी.’’

अबुल फजल भी अकबरनामा में स्वीकारते हैं, ‘‘बैरमखां वास्तव में सज्जन था और उस में उत्कृष्ट गुण थे. वस्तुत: हुमायूं और अकबर दोनों ही सिंहासन प्राप्ति के लिए बैरमखां के ऋणी थे.’’

खानखाना के चेहरे पर फिर वही बेबस हंसी खेल गई, ‘‘क्या अब्बा उस दर्दनाक मौत के हकदार थे जो उन्हें पाटन में मुहम्मदखां के हाथों मिली? बोलिए बेगम, क्या मेरा डर नाजायज है?’’ उन्हें पिता की स्वामिभक्ति और बदले में मिला अपमान, धोखा, मौत आज बहुत विचलित कर रहा था. वह तो वैसे भी बड़े, नेक, ज्ञानी और नम्र थे. उन के बारे में मशहूर है कि वह दान करते समय अपनी नजरें नीचे रखते थे. कारण पूछने पर उत्तर देते-

‘‘देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन,

लोग भरम हम पर करें, ताते नीचे नैन.’’

ऐसे रहीम खानखाना आज महाराणा को कुचलने के अभियान पर हैं. अब जो भी हो, काम तो करना ही है यह सोच कर उन्होंने कहा, ‘‘बेगम, रात बहुत हो गई है. आप सो जाएं, कल सुबह मैं फौज के साथ मुहिम पर निकलूंगा. आप सब हिफाजत से रहें इस का मैं ने पक्का बंदोबस्त कर दिया है. आप किसी भी तरह की फिक्र न करें.’’

सुबह खानखाना मेवाड़ के भीतरी भाग की खाक छानने के लिए कूच कर गए. उन का मुख्य लक्ष्य था महाराणा को बांधना, विवश करना. दिन बीत चुके थे, लेकिन इस जंगली चीते का कुछ भी अतापता नहीं लग रहा था. थकेहारे तंबू  में बैठे दूसरे दिन की योजना बना रहे थे तभी एक विश्वस्त गुप्तचर भागता हुआ आया.

‘‘हुजूर, गजब हो गया. शेरपुर का किला राणा ने लूट लिया, सारी रसद, हथियार सबकुछ…’’ गुप्तचर हांफता हुआ बोला.

‘‘शेरपुर का किला? क्या? रसद, हथियार और उस में रह रहे लोग, बेगम, बांदियां बच्चे?’’ रहीम खानखाना यह कह कर बिलबिला उठे. उन की आत्मा कांप उठी, आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उन औरतों की करुण चीत्कार से उन के कान फटने लगे जिन्हें समयसमय पर मुगल सैनिकों ने रौंदा था. उन्हें याद आई 25 फरवरी, 1568 की बादशाह की चित्तौड़ विजय, जब किले में पहुंचने पर हजारों नारियों की धधकती हुई चिताग्नि ने उन का स्वागत किया था.

एक कमजोर इनसान की तरह अब्दुर्रहीम खानखाना भी मन ही मन प्रार्थना करने लगे कि प्रताप के निवास में पहुंचने से पहले उस की बेगमों को मौत आ जाए. तभी उन्हें ध्यान आया कि  जंगलों की खाक छानने वाला राणा भला हरम क्या रखता होगा. लेकिन फिर भी औरतें बरबाद तो हो ही सकती हैं.

‘‘कैसे बचाएं उन की अस्मत, यह सवाल जेहन में आते ही रहीम के मुंह से निकला, ‘‘हम तो न दीन के रहे न दुनिया के. अब करें तो क्या?’’

और तभी खानखाना गा उठे:

‘‘सुमिरों मन दृढ़ कर कै, नंदकुमार,

जो वृषभान कुंवारि के प्रान अधार.’’

वे सिसक उठे और अपने ही हाथों से चेहरा ढक कर निढाल पड़ गए कि  तभी कानों में स्वर गूंजा, ‘हुजूर, हुजूर, उठिए, आप से मिलने कोई दूत आया है. कहता है उसे महाराणा ने भेजा है.’

‘‘क्या महाराणा ने भेजा है? उसे बाइज्जत पेश करो. उस के साथ कोई भी बदसलूकी नहीं होनी चाहिए.’’

आगंतुक आया. अब्दुर्रहीम खानखाना उसे देखते रह गए. गोराचिट्टा रंग, ऊंचा कद, मजबूत काठी. चेहरे पर ऐसा रुआब जो राजाओं के चेहरे पर होता है. वह उसे देख कर हैरान रह गए और सोचने लगे, दूत ऐसा है तो राणा खुद कैसा होगा? लेकिन प्रकट में पूछा, ‘‘कहिए, क्या खिदमत करें आप की?’’

युवक की रोबीली आवाज गूंज उठी, ‘‘सूबेदार साहब, आप मेरी खिदमत क्या करेंगे. मैं अकेले में आप से कुछ बात करना चाहता हूं, अगर आप चाहें तो.’’

रहीम ने हाथ उठाया तो सिपाही बाहर चले गए. उन्होंने कहा, ‘अब आप कहिए?’

आगंतुक का गंभीर स्वर फूटा, ‘‘मैं एकलिंग महाराज के दीवान महाराणा प्रताप का एक सेवक हूं. उन्होंने ही मुझे आप के पास भेजा है.’’

‘‘हांहां कहिए, हमें उन की सभी शर्तें मंजूर होंगी,’’ अजमेर के सूबेदार अपने धड़कते दिल पर काबू रख कर बोले, ‘‘बस, एक बार राणा बादशाह सलामत के हुजूर में चल पड़ें और दरबार में उन्हें कोर्निश कर लें फिर मेवाड़ के जो हिस्से छीन लिए गए हैं वे सभी उन्हें वापस मिल जाएंगे.’’

‘‘कोर्निश, हांड़मांस के उस मामूली इनसान को. वह है क्या? एक आक्रमणकारी की अत्याचारी औलाद. सूबेदार साहब, वह आप का बादशाह होगा. हमारे राणा का तो वह बस, एक प्रतिद्वंद्वी है.’’

अब्दुर्रहीम खानखाना का हाथ म्यान पर गया तो उस युवक का खनकदार स्वर उभरा, ‘‘सूबेदार साहब, तैश मत खाइए. पहले पूरी बात सुनिए. राजनीति से ऊपर उठिए. मैं किसी और उद्देश्य से आया हूं.’’

खानखाना बोले, ‘‘कहिए, क्या चाहते हैं आप के राणा हम से?’’

‘‘कुछ देना चाहते हैं आप को. गलती से आप के बच्चे, बेगमें बंदी बना ली गई हैं, उन्हें हमारे राणा लौटाना चाहते हैं, बस.’’

ऐसे होते हैं राजपूत. वे हैरान थे. फिर मिर्जा राजा क्या राजपूत नहीं? उन का तो ऐसा किरदार नहीं. क्या वाकई उन्हें काफिर कहा जा सकता है? सोचतेसोचते भी खानखाना प्रकट में बोले, ‘‘तो भला इस में पूछना क्या? यह तो मेहरबानी है हम पर.’’

‘‘नहीं, यह तभी संभव हो सकता है जब आप हमारा साथ दें. पालकियां आएंगी लेकिन उन्हें रास्ते में कोई रोकेगा नहीं, टोकेगा नहीं. वे सीधे आप के पास आएंगी. मंजूर है तो बोलिए.’’

खानखाना सोच में पड़ गए. उन्हें अलाउद्दीन खिलजी का किस्सा याद आया. डोलियां चित्तौड़ की ही तो थीं. कहीं यह शातिर प्रताप की कोई चाल तो नहीं. समझ में नहीं आता क्या करें. दिमाग का कहना है इस नौजवान को अभी बांध लो, मन कहता है, ‘इस की बात मानो.’ तभी वह नौजवान हंस पड़ा.

‘‘सोच में पड़ गए सूबेदार साहब? यही न कि कहीं पद्मिणी बाइसा की डोलियों की तरह इन में से भी सिपाही न निकल पड़ें? तो वह धोखे के जवाब का धोखा था. यह तो अपनी इच्छा से महाराणा आप पर मेहरबानी करना चाहते हैं. इस में भला धोखा क्यों? देख लीजिए, हमारी सचाई पर भरोसा हो तो ठीक है, वरना…निकल तो मैं जाऊंगा.’’

‘‘ठहरो, मुझे मंजूर है,’’ दिमाग पर मन हावी हो गया और इस आत्मविश्वासी युवक पर भरोसा करने का मन कर आया खानखाना का.

नियत दिन डोलियां आईं. आगेआगे घोड़े पर वही युवक सवार था. खानखाना के सिपाहियों के हाथ म्यान पर, लेकिन सब चुप. युवक उन सभी डोलियों के साथ अंदर दाखिल हुआ. पहले बांदियां निकलीं, फिर उन्होंने पालकियों के परदे हटाए और बेगमों और बच्चों को बाहर निकाला. सब से अंत में बड़ी बेगम बाहर आईं. उन्हें देख कर खानखाना की सांस में सांस आई जो अब तक जाने कहां अटकी थी. यह सोच कर कि क्या पता किस डोली में से राणा निकल कर टूट पडे़ं, किस में से कुंवर अमर सिंह छलांग लगा दें.

युवक बाहर जाने को मुड़ा. रहीम ने टोका, ‘‘रुको नौजवान, तुम ने मुझ पर इतना बड़ा एहसान किया है कि मैं उस का बदला तो नहीं चुका सकता. लेकिन फिर भी…’’ यह कहते हुए खानखाना ने अपने गले से वह नौलखा हार निकाला जो बादशाह ने उन्हें सुलतान मुजफ्फर को परास्त करने पर दिया था.

बेगम हड़बड़ाई, ‘‘हांहां, क्या गजब कर रहे हैं आप. जानते हैं ये कौन हैं?’ ये हैं राजकुंवर अमरसिंह. इन की खातिर कीजिए. ये इनाम लेंगे भला आप से?’’

रहीम को काटो तो खून नहीं. वह कुंवर को बस, देखते ही रह गए.

बड़ी बेगम ने हाथ पकड़ कर अमर को तख्त पर बिठाया और शौहर से बोलीं, ‘‘ये सच्चे राजपूत हैं. ये किसी की बहूबेटी की इज्जत से नहीं खेलते. उन्हें दरिंदों से बचाते हैं. मेरी जिंदगी का तो बेड़ा पार हो गया हुजूर. मैं ने इन के अब्बा हुजूर के भी दर्शन कर लिए.’’

फिर कुछ सोचते हुए बड़ी बेगम बोली, ‘‘उस…आप के अकबर बादशाह के दुश्मन ने कहा कि हमारी दुश्मनी बादशाह से है उस के मातहतों से नहीं.

‘‘जानते हैं, एक दिन इन के अब्बा हुजूर हमारे तंबू के बाहर खडे़ हो कर अंदर आने की इजाजत मांग रहे थे. मैं हैरान, परेशान, बदहवास सी भागी और उन के कदमों पर गिर कर गिड़गिड़ाने लगी. बेखयाली में मैं बेपरदा हो चुकी थी, लेकिन उस इनसान ने हमारे कंधे पर अपना दुशाला डाला और बोले, ‘‘मां, आप का स्थान चरणों में नहीं, सिर माथे पर है. अमर, इन सभी माताबहनों को सम्मान से खानखाना के पास पहुंचा आओ. रास्ते में कोई कष्ट न हो.’’

बड़ी बेगम उठीं, लोहबान जलाया और अमर सिंह की आरती उतारते हुए बोलीं, ‘‘बेटा, आज से तुम मेरे बेटे हो. मुझे अब फतह और शिकस्त से कोई वास्ता नहीं. जब तक जिंदा हूं तुम्हारी सलामती की दुआ मांगती रहूंगी. कोई भी तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकेगा, अकबर बादशाह हों या खुद मेरे ये शौहर.’’

खानखाना की आंखें भर आईं, गला रुंध गया. रोकतेरोकते भी आंसू ढुलक ही पडे़. इस क्षण वे न एक सूबेदार थे, न बादशाह के 5 हजारी मनसबदार. वह थे एक आम आदमी, एक कोमल हृदय कवि. उन्हें लगा कि प्रताप ने उन्हें ही नहीं, अकबर बादशाह को भी करारी शिकस्त दी है और यह नौजवान, जो उन की बेगम को नमस्कार कर के, खेमे से बाहर निकल रहा है, क्या कोई इनसान है? फिर खुद… उन के मुंह से निकल पड़ा,

‘‘तै रहीम मन आपनो, कीन्हों चारु चकोर,

निसि वासर लागो रहे, कृष्णचंद्र की ओर.’’

Hindi Story: आखिर क्यों – स्वामीजी ने सुरभि की समस्या का समाधान किया

Hindi Story, लेखक- दया हीत

नवंबर मास की ठंडी शाम थी. मैं आफिस से घर लौटी तो घरों में बल्ब जगमगा उठे थे. सुरभि के घर से आती दूधिया रोशनी ने उस के वापस लौट आने की पुष्टि कर दी थी. एक बार मन किया, दौड़ कर उस का हालचाल पूछूं, पर तुरंत ही उस का यों चुपचाप लौट आना मुझे अनेक आशंकाओं से आतंकित कर गया.

घर के बाहरी द्वार पर खड़ी सासू मां को देखते ही मैं अपने पर काबू नहीं रख पाई और बेसाख्ता बोल उठी, ‘‘मांजी, आप को पता है, सुरभि लौट आई है.’’

‘‘लेकिन कब? तुम्हें कैसे पता लगा,’’ मांजी के हैरानी भरे प्रश्न ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें भी उस के लौट आने की कोई खबर नहीं है.

‘‘अभी लौटी, तो देखा उस के घर उजाला हो रहा है,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘अच्छा, तो जा, जल्दी से उस की खबर ले आ, बड़ी चिंता हो रही है मुझे.’’

फिर सचमुच मुझ से भी रहा न गया. आशाआशंका के भंवर में फंसे अपने उद्विग्न चित्त को ले, मैं उस के घर की ओर बढ़ गई. बरसों पुराना घटनाक्रम सहसा मेरी आंखों के  सामने चलचित्र की भांति क्रमबद्ध हो उठा. सुरभि से मेरा परिचय तब से है जब मैं यहां नईनवेली ब्याह कर आई थी. वह भी मेरी तरह कालोनी के गुप्ताजी की बहू और उन के सुपुत्र विपिन, जो फैक्टरी में सुपरवाइजर था, की दुलहन थी. मुझ से कोई 3 साल पहले ही ब्याह कर आई थी.

उस की सास कौशल्या देवी से ही पहलेपहल मुझे मालूम हुआ कि उस की गोद अब तक सूनी है. एक दिन जब उस की सास हमारे घर आई हुई थीं तब सासू मां के परिचय कराने के उपरांत मैं ने उन के चरण स्पर्श किए तो वह मुझे ‘दूधों नहाओ पूतों फलो’ के आशीर्वाद से नवाजना नहीं चूकीं. साथ ही उलाहना देते हुए मेरी सास से बोलीं, ‘मैं तो अपनी बहू को 3 साल से यही दुआ दे रही हूं पर लगता है बहन, निगोड़ी बांझ है.’

प्रत्युत्तर में मैं ने मांजी को सांत्वना देते हुए सुना, ‘अरे कौशल्या, तुम तो नाहक नाउम्मीद हो रही हो. अभी तो सिर्फ 3 साल हुए हैं, अरे, थोड़ा मौजमस्ती करने दो उन्हें. समय आने पर सब ठीक हो जाएगा.’

इस बीच मैं नेहा, नितिन की मां भी बन गई पर सुरभि की गोद सूनी ही रही. एक दिन मौका लगने पर एकांत में मैं ने उसे टटोला, ‘तुम ने किसी डाक्टर से अपनी जांच वगैरह कभी करवाई.’’

‘नीति, तुम तो जानती हो, मेरी सास को डाक्टरों से ज्यादा साधुसंतों, तांत्रिकों व ओझाओं पर विश्वास है,’ उस ने कहा.

मैं हतप्रभ सी रह गई. आज के इस चिकित्सा विज्ञान के क्रांतिकारी युग में कोई इस के चमत्कार से अछूता कैसे रह सकता है.

फिर तो आएदिन सुरभि मुझे बताती रहती. आज सासू मां के साथ फलांफलां साधु के दर्शनार्थ जाना है या अमुक-अमुक महात्मा शहर में पधारने वाले हैं, उन के सत्संग में जाना है, आदिआदि.

आज इस बात को लगभग 8 वर्ष होने को आए हैं. 1 माह के लिए मैं अपने मायके आगरा गई हुई थी. लौटी तो पता चला सुरभि नए मेहमान के आगमन की चिरप्रतीक्षित अभिलाषा से सराबोर थी. सुन कर बहुत अच्छा लगा. 9 माह के पूर्ण प्रसवकाल के पश्चात उस की झोली सुंदर सलोने बच्चे से भर गई. अनेकानेक प्रयासों के बाद उसे यह संतान नसीब हुई थी. अत: उस ने उस का नाम ‘सार्थक’ रखना चाहा. परंतु सासू मां का मानना था कि यह सब गुरु महाराज वत्सलानंद के आशीर्वाद से संभव हुआ है, अत: बच्चे को नाम दिया गया ‘वत्सल’.

हालांकि पहलेपहल वह सास के इस तर्क से आहत हो उठी थी पर फिर मैं ने ही उसे समझाबुझा कर शांत करने का प्रयास किया था, ‘वैसे तो सार्थक वास्तव में एकदम सटीक नाम है परंतु वत्सल भी कम सुंदर नाम नहीं है. और फिर नाम में क्या रखा है. वत्सल चाहे ईश्वर की सौगात हो या वत्सलानंद की कृपा का फल, तुम्हें क्या फर्क पड़ता है.’

‘नहींनहीं नीति. तुम गलत समझ रही हो, यह सच है कि वत्सल उन्हीं के प्रताप का फल है. जिस माह हम ने उन से दीक्षा ली थी उसी माह उन के आशीर्वाद से यह मेरे गर्भ में आ गया.’

संयोग मात्र को सास अपने गुरु की कृपा समझ बैठी थी. कौशल्या देवी के अंधविश्वासी रंगों में रंगे उस के विचार सुन कर पहली बार मुझे झटका सा लगा.

फिर तो यह आम बात हो गई. वत्सल का अन्नप्राशन हो या नामकरण, जन्मोत्सव हो या फिर स्कूल में उस के नामांकन का कार्य, सभी कार्यकलापों के लिए शुभमुहूर्त स्वामी वत्सलानंद की सुझाई गई तिथियों के हिसाब से क्रियान्वित होने लगे.

मैं ने एकआध बार अपनी सास से इस बात का जिक्र किया तो वह कहने लगीं, ‘अरे जाने दो बहू, अपनीअपनी सोच है, चाहे गुरु की कृपा रही हो या ईश्वर की इच्छा, यही क्या कम है कि कौशल्या का घरआंगन बच्चे की किलकारियों से गुंजायमान हो उठा है.’

सब कुछ निर्बाध गति से चल रहा था कि एक दिन सांझ को बच्चों ने बताया कि स्कूल में प्रार्थना सभा के दौरान वत्सल खड़ेखड़े गिर पड़ा और फिर उसे बहुत उल्टियां हुईं. अत: मैं ने मांजी को उस का हालचाल ले आने को कहा.

मांजी लौट कर आईं तो चिंतामग्न सी दिखीं. पूछने पर उन्होंने बताया कि कौशल्या बता रही थी कि वत्सल को इस तरह की शिकायत 2-4 बार पहले भी हो चुकी है परंतु बजाय किसी डाक्टर को दिखाने के वे स्वामीजी के चक्कर में पड़े हैं.

दूसरे दिन सुरभि को समझाने की गरज से मैं आफिस से लौटते हुए सीधे उस के घर गई. देखती क्या हूं कि बैठकखाने का सुसज्जित विशाल कक्ष धूप व अगरबत्ती की अनोखी सुगंध से सुशोभित है. कक्ष के एक ओर, एक बड़े से तख्त पर बिछे बेशकीमती पलंगपोश पर एक स्थूलकाय महात्मा भगवा वस्त्र धारण किए हुए विराजमान हैं जो संस्कृत के श्लोकों की स्तुति में विचारमग्न हैं. मैं असमंजस की स्थिति से उबरने का प्रयास कर ही रही थी कि सुरभि आई और कक्ष के एक कोने में मुझे बिठाते हुए स्वामीजी के बारे में बताने लगी, ‘यही गुरु वत्सलानंद जी हैं. वत्सल की बीमारी सुन कर महाराज घर आ कर उस के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए संजीवनी जाप कर रहे हैं. सच, वत्सल अपनेआप को काफी अच्छा महसूस कर रहा है.’

वस्तुत: स्वामीजी पर विश्वास से अभिप्रेरित उस परिवार के लोगों का निर्मल मन, बारबार यह झूठा आश्वासन दिला रहा था कि बच्चा स्वस्थ हो रहा है, पर क्या सुरभि भी बच्चे के गिरते स्वास्थ्य का मूल्यांकन नहीं कर पा रही थी. इस से अधिक मैं उसे सुन नहीं सकी. तभी तो लगभग घसीटते हुए मैं सुरभि को दूसरे कमरे में ले गई और बोली, ‘सुरभि तुम्हें ये क्या हो गया है, तुम तो इन थोथी बातों पर विश्वास नहीं करती थीं, फिर आज कैसे इन ढोंगी साधुओं की बातों में फंस गईं. वत्सल को इस समय इन के जपतप की नहीं बल्कि किसी अच्छे डाक्टर के परीक्षण की आवश्यकता है. देख नहीं रही हो, वह किस कदर कमजोर हो गया है.’

पर मेरी बात सुन कर वह जरा भी विचलित नहीं हुई, बल्कि कहने लगी, ‘नहीं नीति, पहले मैं भी इन की शक्तियों से अनभिज्ञ थी, पर अब मैं इन की दिव्य शक्तियों को जान चुकी हूं.’

मैं उसे कुछ और समझाने का प्रयत्न करती कि इस के पूर्व स्वामीजी, जिन्होंने कदाचित क्रोधाग्नि में धधकती मेरी मुखर वाणी सुन ली थी, क्रोध से गरज उठे, ‘ये कौन है जो मेरे ‘भैरव’ देव को ललकार रहा है. कुछ अनिष्ट हुआ तो हमें दोष मत देना. हम साधुसंन्यासी हैं, हमारा भी मानसम्मान है, पर जहां हमारा अपमान हो, हम पर अविश्वास हो, वहां एक पल और ठहरना असंभव.’

‘नहींनहीं गुरुदेव, क्षमा कीजिए,’ क्षमायाचना से भीगे उस की सासू मां के शब्द गूंजे और अगले ही पल उन्होंने स्वामीजी के चरण पकड़ लिए, ‘हमें नहीं पता था वरना मैं उसे आप के सामने आने की इजाजत कभी नहीं देती.’

उसी क्षण सुरभि की बदलती मुखमुद्रा व उस की आग्नेय दृष्टि देख कर मुझे यह आभास होने में क्षण भर भी नहीं लगा कि स्वामीजी के विरुद्ध बोल कर मैं यहां सर्वथा अवांछनीय हो गई हूं. अत: बाहर की ओर रुख करने में ही मैं ने भलाई समझी.

और फिर मेरे घर लौटने के पूर्व ही कौशल्या देवी ने मेरी सास को फोन पर हिदायत दे डाली, ‘अपनी बहू को इतनी ढील मत दो, शारदा. जो मन में आता है बोल देती है, बड़ेछोटे किसी का लिहाज नहीं. आज तो उस ने स्वामीजी का ही अपमान कर डाला. हमारा विपिन तो उन्हें इतना मानता है कि उस ने पूरे 50 हजार रुपए उन की संस्था को श्रद्धा से दान कर दिए.’

अभी वह न जाने और क्याक्या सुनातीं कि मुझे घर आया देख कर मांजी ने फोन काट दिया और मुझे संबोधित कर बोलीं, ‘बेटा, तुम क्यों इन लोगों से उलझती हो, वे गड्ढे में गिरना चाहते हैं तो उन्हें कौन रोक सकता है.’

‘मांजी, मैं तो वत्सल की हालत देख कर आपे में नहीं रह सकी थी, यदि चाचीजी को इतना बुरा लगा है तो मैं उन से माफी मांग लूंगी पर बेचारा वत्सल,’ मैं आह भर कर रह गई.

यों ही 4-5 माह बीत गए. उस दिन की घटना की कड़वाहट से दोनों परिवारों के मध्य एक शीतयुद्ध का मौन पसर गया था. पर कालोनी के अन्य लोगों से मांजी वत्सल की खोजखबर लेती रहतीं. सुना था कि उस की हालत दिन पर दिन गिरती जा रही है, स्कूल में भी वह हफ्तों अनुपस्थित रहने लगा है. इधर बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं आरंभ हो चुकी थीं. परीक्षा के दौरान एक दिन वत्सल चक्कर खा कर सीट से लुढ़क पड़ा, जिस से उसे सिर में गंभीर चोट लग गई. आननफानन में स्कूल वालों ने उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में भर्ती करा दिया. उसी दौरान उसे अनेक परीक्षणों से गुजरना पड़ा. सुन कर मैं भी अपने को रोक नहीं सकी और वत्सल से मिलने अस्पताल जा पहुंची. सुरभि मुझे देखते ही मुझ से लिपट कर रो पड़ी.

उस की सास भी मुझ से नजरें चुरा रही थी. पूछने पर पता चला कि वत्सल को ब्रेन ट्यूमर था जो घर वालों की लापरवाही की वजह से अधिक जटिल अवस्था में पहुंच गया था. मुझे देखते ही वह फफकफफक कर रो पड़ी और गले से लिपट कर बोली, ‘नीति, तुम ने मुझे समझाने का बहुत प्रयास किया था, पर मेरी ही मति भ्रष्ट हो गई थी जो उस पाखंडी के चक्कर में फंस गई,’

उस की आंखों से अंधविश्वास का परदा हट चुका था.

2 दिन पश्चात उसे डाक्टरों के निर्देशानुसार दिल्ली के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया. 12 दिनों तक एडमिट रहने के बाद उस का

ब्रेन ट्यूमर का आपरेशन हुआ फिर करीब 10 घंटे बाद उस के होश में आ जाने की खबर सुरभि ने मुझे फोन पर दी, ‘नीति, लगता है, ईश्वर ने मेरी सुन ली.

यही उस का अंतिम संदेश था.

जब कुछ दिनों तक कोई खबर नहीं मिली तो उस के देवर के यहां फोन किया तो पता चला कि दूसरे ही दिन वह कोमा में चला गया था, तब से सघन चिकित्सा परीक्षण से गुजर रहा है. उस के बाद लाख प्रयत्न करने पर भी कोई खबर नहीं मिल सकी. और आज उस का यों बिना किसी पूर्व सूचना के लौट आना मन को आशंकित कर रहा है. किसी अनिष्ट की कल्पना मात्र से मैं थरथरा उठी.

घर पहुंची तो उस का मुख्यद्वार उढ़का पड़ा था. उसे ठेल कर मैं भीतर बढ़ी तो सामने नजर पड़ी, सुरभि फटीफटी नजरों से शून्य में ताक रही है, उस के भाईभाभी ने किसी तरह उसे थाम रखा था. सास भी अपना सिर पकड़ कर गमगीन सी फर्श की ओर एकटक निहार रही थी. विपिन प्रस्तर की बुत बने एक कोने में बैठे थे. उन के बुझेबुझे चेहरों ने मेरे अनुमानित अनिष्ट की पुष्टि कर दी थी.

सुरभि की भाभी ने ही बताया कि कोमा में जाने के 5 दिन बाद उसे पुन: होश आ गया था, उस दिन उस ने मां के हाथों से दलिया भी खाया, तो हमारी खोई आस भी लौट आई. परंतु उस दिन वह शायद मां की ममता को तृप्त करने, उस जगी आस को झूठा साबित करने को ही जाग्रत हुआ था. उस रात वह जो सोया तो फिर कभी नहीं जगा. बताते-बताते वह स्वयं रो पड़ीं. मैं भी अपने आंसुओं को कहां रोक पाई थी.

एक नन्हामासूम सा बच्चा अंधविश्वासों की बलि चढ़ गया था. अंधविश्वास की इतनी बड़ी सजा आखिर उस मासूम को ही क्यों मिली. काश इन ढोंगी साधुसंन्यासियों के लिए भी कानून में मृत्युदंड का प्रावधान होता जो भोलेभाले लोगों को अपने झूठे जाल में फांस कर इन के जीवन तक से खेलने से नहीं हिचकिचाते.

सुरभि इस हादसे से उन्मादित हो उठी थी. कभी वह वीभत्स हंसी हंसती तो कभी उस की मर्मभेदी चीख हृदय पर शूल बन कर उतर जाती.

अंधविश्वास की धुंध छंटने में सचमुच बहुत देर लग चुकी थी और हकीकत की सुबह, काली अंधेरी रात से भी अधिक स्याह प्रतीत हो रही थी. मेरे कानों में मानो वत्सल का प्रश्न गूंज रहा था, आखिर क्यों हुआ यह सब मेरे साथ?

Hindi Story: क्या यही प्यार है – क्यों दीपाली की खुशहाल गृहस्थी हुई बर्बाद?

Hindi Story: दीपाली की शादी में कोई अड़चन नहीं हो सकती थी, क्योंकि वह बहुत सुंदर थी. किंतु उस के मातापिता को न जाने क्यों कोई लड़का जाति, समाज में जंचता नहीं था. खूबसूरत दीपाली की शादी की उम्र निकलती जा रही थी. पिता कालेज में प्रिंसिपल थे. किसी भी रिश्ते को स्वीकार नहीं कर रहे थे. अंतत: हार कर दीपाली ने एक गुजराती युवक अरुण के साथ अपने प्रेम की पींगें बढ़ानी शुरू कर दीं. दीपाली और अरुण का प्रेम 3-4 साल चला. मृत्युशैया पर पड़े प्रिंसिपल साहब ने मजबूरन अपनी सुंदर बेटी को प्रेम विवाह की इजाजत दे दी.

दीपाली के विवाह बाद उस के पिता की मौत हो गई. उधर अरुण एक सच्चे प्रेमी की तरह दीपाली को पत्नी का सम्मान देते हुए अपने परिवार में अपनी मां के पास ले गया. घर का व्यवसाय था. आर्थिक स्थिति मजबूत थी. अरुण दीपाली को जीजान से चाहता था. किंतु दीपाली को अरुण की मां कांतिबेन का स्वभाव नहीं सुहाता था.  कांतिबेन अपनी पारिवारिक परंपराओं का पालन करती थीं जैसे सिर पर पल्लू डालना आदि. वे दीपाली को जबतब टोक देतीं कि वह हाथपांव ढक कर रखे, सिर पर आंचल डाले आदि. यह सब गुजराती परिवार में बहू का सामान्य आचरण था. किंतु दीपाली को यह कतई पसंद नहीं था.

इसी वजह से इस अंतर्जातीय विवाह में दरार पड़ने लगी. शुरू में अरुण ने दीपाली को समझाबुझा कर शांत रखने की मनुहार की. किंतु अरुण की मानमनौअल तब बेकार हो गई जब दीपाली इस टोकाटाकी से बेहद चिढ़ गई और अरुण के बहुत समझाने पर भी मायके चली गई. दीपाली मायके गई तो उस की मां माया ने उसे समझाने के बदले अपनी दूसरी बेटियों संग भड़काना शुरू कर दिया.

दीपाली की बहन राजश्री ने तो आग में घी डालने का काम कर दिया. वैसे भी राजश्री की आदत सब के घर मीनमेख निकाल कर कलह कराने की थी. दीपाली के विवाह को भी उस ने नहीं छोड़ा. सभी बहनों को वह सास के प्रति कठोरता बरतने की शिक्षा देने लगी.  मां और बहन के बहकावे में आ कर दीपाली ने अपने पति अरुण के प्यार से मुख मोड़ लिया. बेचारा अरुण कितनी बार आता, रूठी पत्नी को मनाता पर न तो दीपाली टस से मस हुई, न उस की मां माया. मायके में भाभी सारा काम कर लेती, दीपाली मां के साथ घूमतीफिरती रहती. रात को खापी कर सो जाती.

घरेलू कामकाज न होने तथा खाने और बेफिक्री से सोने से दीपाली का शरीर  काफी भर गया. अब वह सुकोमल की जगह मोटी सी बन गई. हालांकि आकर्षक वह अब भी थी. पर पति के प्रेम को ठुकराने से उस के सौंदर्य में वह मासूमियत नहीं छलकती.  दीपाली अपने मायके में खानेसोने में दिन गुजारने में मस्त थी तो दूसरी तरफ अरुण अपनी पत्नी के लिए हमेशा उदास रहता. कांतिबेन भी चाहती थीं कि उन की बहू घर लौट आए तो बेटे का परिवार आगे बढ़े और वे भी बच्चों को खेलाएं.  मगर फिर दीपाली अपनी ससुराल नहीं गई. अरुण उस से पहले मिलने आता रहा, पर बाद में फोन तक ही शादी सिमट गई. अकेले रहते हुए भी अरुण ने न कहीं चक्कर चलाया और न ही दीपाली ने उसे तलाक दिया. वह अरुण की जिंदगी को अधर में लटकाए रही.

अरुण मनातेमनाते थक गया. दिल में दीपाली के लिए सच्ची चाहत थी. जिंदगी ऐसे ही खाली व अकेले कटने लगी. वह नहीं सोच सका कि दीपाली से अलग भी दुनिया हो सकती है. पत्नी से दूर रह कर वह खोयाखोया सा रहता था. एक दिन न जाने बाइक चलाते किन खयालों में गुम था कि एक ट्रक से टकरा गया. माथे पर गहरी चोट लगी.  कांतिबेन व उस के पति ने दीपाली को खबर भेजी. मगर न दीपाली ने और न ही उसकी मां ने अस्पताल जा कर अरुण को देखना उचित समझा. उलटे इस नाजुक मौके पर दीपाली की मां ने अरुण के पिता से सौदेबाजी शुरू कर दी.  उधर अरुण अस्पताल में इलाज करा रहा था, इधर दीपाली की मां ने कहला भेजा कि दीपाली अब उस की सास के संग हरगिज नहीं रहेगी. उसे एक नई जगह, नए क्वार्टर में बसाया जाए.

अपने घायल बेटे के सुख के लिए उस के पिता नारायण ने यह शर्त भी कबूल कर ली. किंतु जख्मी बेटे की तीमारदारी में वे ऐसे व्यस्त रहे कि अलग से घरगृहस्थी से मुक्त सजासजाया कमरा बेटे के लिए अरेंज नहीं कर सके.  इसी तरह कुछ दिन और निकल गए, पर अपने कमजोर हो चुके जख्मी पति को देखने दीपाली अस्पताल नहीं आई. वह बस नए कमरे की मांग पर अड़ी रही. मानो उसे अपने पति से ज्यादा परवाह अपने लिए अलग कमरे की थी.  अरुण को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर उस के पिता घर ले आए. फिर बेटे की नई गृहस्थी बसाने के लिए नए कमरे की व्यवस्था में जुट गए.  किंतु घायल अरुण के दिल पर दीपाली की इस स्वार्थी शर्त का और बुरा प्रभाव पड़ा. वह अब और ज्यादा गुमसुम रहने लगा. पहले की भांति वह रूठी पत्नी को मनाने के लिए अब फोन भी नहीं करता. न ही दीपाली अपनी अकड़ छोड़ कर पति से बात करती.

इसी निराशा ने अरुण को भीतर से तोड़ दिया. वह जैसे समझ गया कि जिसे उस ने इतना जीजान से चाहा, वह गर ब्याहता हो कर भी उसे जख्मी हालत में देखने नहीं आई, तो उस के संग आगे की जिंदगी व्यतीत करने की क्या अपेक्षा करनी. अरुण के सारे स्वप्न झुलस गए. जो प्रेम का भाव उसे जीवन जीने की ऊर्जा देता था, वह अब लुप्त हो गया था. वह खाली सा महसूस करता.  इसी हालत में एक रात अरुण उठा. सिर पर अभी भी पट्टी बंधी थी. मां दूसरे कमरे में सोई थीं. पत्नी से फोन पर बात होती नहीं थी. दीपाली से अब उसे प्रेम की आशा नहीं थी. उस ने देख लिया था कि जिसे वह अभी तक चाह रहा था, वह तो पत्थर की एक मूर्त भर थी.  बेखयाली में, बेचैनी में अरुण उठा और जीने की तरफ बढ़ा और फिर चंद सैकंडों में सीढि़यां लुढ़कता चला गया. सीढि़यों के नीचे पहुंचने तक उस के प्राणपखेरू उड़ चुके थे. जिस जख्मी पति को दीपाली देखने नहीं आई थी, वही पति की मौत पर उस के मांबाप से पति का हिस्सा मांगने अपनी मां, बहन, भाई व जीजा को ले कर आ गई.

जिस ने भी दीपाली को देखा वह समझ गया कि इस मतलबपरस्त लड़की ने एक विजातीय लड़के को झूठे प्रेमजाल में फंसा उस का जीवन बरबाद कर उसे मरने को मजबूर कर दिया. वही अब सासससुर से अपने पति का हिस्सा मांग रही है. तो क्या यही है प्यार? क्या यही विवाह का हश्र है?

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