Short Story : आया विदेशी यार

Short Story : अपने शहर में पुराने यार के आने, बुलाने की खुशी में शहर को बूढ़ी दुलहन की तरह सजाया जा रहा था. ‘सात समंदर पार से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो…’ वाला गाना छोटे बच्चों को स्कूल बंद करा कर उन के स्वागत के लिए सिखाया जा रहा था.

शहर में दिनरात विकास का काम चालू था. सरकारी ठेकेदार मजदूरों को हड़का कर उन का खून पानी समझ उसे बहा कर सरकार के यार के स्वागत के लिए कदमकदम पर तोरणद्वार बनवा रहे थे. सड़कों के साथ लगती गरीबों की बस्तियों को छिपाने के लिए उन के आगे उन से दोगुनी ऊंची ईंट की दीवारें चिनवा कर उन्हें छिपवा रहे थे.

…और सरकार ने हर अपने मातहत को आदेश दिया कि सरकार के यार के स्वागत में जंगल को मंगल की तरह सजाया जाए. हर गरीब की झुग्गी के आगे दीवार लगाई जाए, ताकि यार को पता चले कि हमारे राज में कोई गरीब नहीं है. हमें पता ही नहीं है कि गरीबी क्या होती है. हमें पता ही नहीं है कि गरीब कैसा होता है.

सब से बड़े सरकार ने अपने से नीचे वाले सरकार को यह हुक्म पोस्ट किया तो देखते ही देखते हुक्म बिन पैर सरपट दौड़ने लगा. उस से निचले वाले सरकार ने अपने से नीचे वाले सरकार को हुक्म सौंपा.

ज्यों ही उस से नीचे वाले सरकार को हुक्म मिला तो उस ने आव देखा न ताव, हुक्म पर घुग्घी मार कर हुक्म अपने से निचले सरकार के सिर पर डंडे की तरह चला दिया. आखिर में जब सब से निचले सरकार के पास सरकार का हुक्म आया, तो उस ने आंखें फाड़फाड़ कर हुक्म देखा.

उस के बाद अपने आगे देखा, अपने पीछे देखा, अपने दाएं देखा, अपने बाएं देखा, जब उसे लगा कि अपने आगे भी वही है, अपने पीछे भी वही है. अपने दाएं भी वही है, और अपने बाएं भी वही है तो उस ने पहले तो खुद को जीभर कर कोसा, फिर सरकार के हुक्म को. उस से नीचे कोई सरकार क्यों न हुआ, जो उस का हुक्म बजाता?

जब सब से निचले सरकार को पता चल गया कि अब सरकार का आया हुक्म उसे ही बजाना है, तो उस ने हुक्म बजाने के लिए खुद को सजाना शुरू किया.

मुनादी वाले से 1,000 रुपए की रसीद ले कर 500 रुपए दे कर अपने अंडर के सबडिवीजन में सब से निचले सरकार ने तत्काल मुनादी पिटवा दी, ‘मेरे अंडर के सबडिवीजन के हर आम और खास गरीब को ये सख्त हिदायत देते हुए सूचित किया जाता है कि शहर के दर्शन करने सात समंदर पार से सरकार के यार आ रहे हैं, इसलिए सरकार के यार को अपना सच न बताने के मकसद से हर किस्म के गरीब को यह सख्त आदेश दिए जाते हैं कि जब तक सरकार के यार शहर में रहें, शहर में घूमें, सरकार के हाथ चूमें, तब तक कोई भी किसी भी तरह का गरीब गलती से भी मेरे अंडर सबडिवीजन की सड़कों पर न उतरे.

‘रैड लाइटों पर इस बीच जो भी गरीब देखा जाएगा, उसे… मेरे अंडर सबडिवीजन के हर गरीब पर यह बैन तब तक जारी रहेगा, जब तक कि सरकार के यार देश घूम कर गरीबों की झुग्गियों के आगे लगी ईंट की दीवारों के आगे से हमारी अमीरी की तसवीरें साथ नहीं ले जाते. मुझ सब से निचली सरकार का यह आदेश मेरे अंडर के सबडिवीजन में अभी से लागू माना जाए.’

आखिर सब से निचले सरकार खुद को गालियां देते हुए हाथ में कानून का डंडा लिए अपने अंडर वाले सबडिवीजन की मेन सड़क पर सरकार के यार को रोतेपीटते खड़े हो गए, ताकि जब तक शहर में सरकार के यार रहें, सरकार के यार उन के अंडर वाले सबडिवीजन से गुजरें, तो उन को गरीबों से भरे उन के सबडिवीजन में कोई भी गरीब न दिखे.

सरकार अपने सबडिवीजन की मेन सड़क पर गरीबों पर कड़ी नजर रखे हुए थे. सरकार का काफिला सरकार के यार के पुतले को बख्तरबंद गाड़ी में बैठाए उसे अपना चमत्कारी शहर दिखा रहा था. सड़क के दोनों ओर अमीर ही अमीर मुसकराते खड़े हुए थे.

जिधर भी सरकार के यार के पुतले की नजर जाती, उसे न पेड़ दिखते, न पौधे, बस, अमीर ही अमीर दिखते. वाह, यह शहर तो उस के शहर से भी ज्यादा अमीर है.

सड़क के दोनों ओर 4 दिन पहले ही लगाए 100 साल पुराने बरगदों से ऊंचे हवा में झूमते नकली पेड़. मौक ड्रिल में सरकार के यार का पुतला यह सब देख कर खुश था.

…कि तभी सामने एक गरीब आ गया. ड्यूटी पर सोएसोए तैनात सब से निचले सरकार के उस गरीब के सड़क पर आते ही हाथपैर फूले. उसे लगा, अब गए हराम की खाने के दिन. इस से पहले कि सरकार के पुतले यार का काफिला वहां पहुंचता, उस ने गरीब को हड़काते हुए पूछा, ‘‘कहां से आया सड़क पर…?’’

‘‘हुजूर सामने से?’’ कह कर उस ने हाथ में टूटी बालटी वाले दोनों हाथ जोड़े.

‘‘कैसे?’’

‘‘हुजूर इन टांगों से,’’ कह कर उस ने अपनी नंगी टांगों की ओर इशारा किया.

‘‘कैसे…?’’

‘‘अपनी झुग्गी के आगे लगी दीवार फांद कर साहब.’’

‘‘हद है यार, इन मरियल टांगों में अभी भी इतना दम? सुना नहीं था कि जब तक सरकार के यार शहर में रहेंगे, तुम्हारा सड़कों पर आना बंद है?’’

‘‘सुना तो है साहब, पर…’’

‘‘पर क्या…? शहर की असली तसवीर दिखाना चाहता है. चल, अभी तेरी चमड़ी उधेड़ता हूं,’’ कह कर सब से निचले सरकार ने उस गरीब की बांह पकड़ी, तो वह टूट कर उस के हाथ में आ गई तो सब से निचले सरकार उसे डांटते हुए बोले, ‘‘शर्म नहीं आती, इतनी कमजोर बाजुएं ले कर कानून तोड़ते हो? बाजुएं देखो तो अखबार के पुराने कागज जैसी और… जबान देखो तो… मतलब तुम…’’

‘‘बीवी को प्यास लगी थी, सो सड़क पर पानी भरने आ गया साहब. इस में मेरा क्या कुसूर?’’

‘सरकार से जबान लड़ाता है? अपनी चालाकी के बीच में बीवी को लाता है? सरकार हवा में पुरजोर डंडा लहराता हुआ दहाड़ा, तो उस गरीब ने कांपते हुए कहा, ‘‘साहब, बस एक बालटी पानी भर लेने दो. फिर जब तक आप खुद नहीं कहेंगे, तब तक अपनी झुग्गी से बाहर नहीं निकलेंगे.’’

दूरदूर तक सरकार के यार के काफिले की कोई आवाज न थी. तब सब से निचले सरकार ने उस गरीब की बीवी पर रहम करते हुए उसे झट से बालटी भरने की हिदायत देते हुए कहा, ‘‘देख, तेरी बीवी पर तरस खा कर तुझे छोड़े दे रहा हूं. मैं किसी भी किस्म के शौहरों पर रहम नहीं करता, पर हर किस्म के शौहरों की बीवियों पर बहुत रहम करता हूं.

‘‘और हां, अपनी बस्ती के तमाम गरीबों को मेरी तरफ से डरा देना कि

5 दिन तक जो कोई सड़क पर रात को दिखा तो देख लेना कि मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

‘‘ठीक है हुजूर, आप का आदेश सिरमाथे. आप कहो तो मरने तक अपनी झुग्गियों से बाहर न आएं,’’ उस गरीब ने पानी की बालटी सड़क पर सजे नल से ठूंसठूंस कर भरी और ताजाताजा ईंट लगी दीवार के पीछे अपनी झुग्गी बस्ती में जा कर दुबक गया.

Hindi Story: कायर-क्या घना को मिल पाया श्यामा का प्यार

Hindi Story: घना जानता था कि श्यामा निचली जाति की लड़की है, पर उस के अच्छे बरताव की वजह से वह उस के प्रति खिंचता चला गया था. यहां तक कि वह श्यामा से शादी करने को भी तैयार था.

वैसे, घना जाति प्रथा को भारतीय समाज के लिए अभिशाप मानता था और अकसर अपने दोस्तों के साथ अंधविश्वास, जाति प्रथा जैसी बुराइयों पर बड़ीबड़ी बातें भी करता था.

घना कई बार अपने मन की बात श्यामा तक पहुंचाने की कोशिश कर चुका था, पर श्यामा ने उसे कभी भी आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया था.

आज घना को श्यामा से अकेले में बात करने का मौका मिल गया था और वह इस मौके को खोना नहीं चाहता था.

श्यामा आ रही थी. घना ने अपने गांव के दोस्तों को पहले ही चले जाने के लिए कह दिया था और खुद श्यामा का इंतजार कर रहा था.

जैसे ही श्यामा उस के करीब से गुजरी, घना ने उसे रुकने को कहा.

‘‘श्यामा,’’ घना ने अपना गला साफ करते हुए कहा.

‘‘जी,’’ श्यामा ने एक पल के लिए घना की ओर देखा और आगे बढ़ गई.

‘‘आज मौसम बहुत खराब है,’’ घना बोला.

श्यामा ने कुछ नहीं कहा.

‘‘श्यामा, मैं तुम से कुछ बात कहना चाहता हूं.’’

श्यामा फिर भी चुप रही. घना श्यामा के बहुत करीब आ गया.

श्यामा घना की बात को अच्छी तरह से सम?ा रही थी. उस ने गुस्से से घना की तरफ देखा.

घना थोड़ा सा सहम गया था, पर वह सोचने लगा कि अगर आज नहीं कहेगा, तो वह अपनी बात कभी नहीं कह पाएगा.

‘‘श्यामा… मैं…मैं… तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ जैसे कि श्यामा घना की बात का मतलब न सम?ा हो.

‘‘श्यामा, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं.’’

‘‘यह जानते हुए भी कि मैं निचली जाति की हूं और आप ऊंची जाति वाले.’’

‘‘हां.’’

‘‘मैं इस तरह की किसी भी बहस

में नहीं उल?ाना चाहती. अगर किसी ने यह सब सुन लिया, तो आप की बहुत बदनामी होगी.’’

‘‘श्यामा, मैं तुम से बहुत प्यार

करता हूं और तुम्हीं से शादी भी करना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम्हारे गांव के सब बराती निचली जाति वालों के हाथ का पका खाना खाएंगे? जो लोग निचली जाति वालों की छाया से भी दूर रहते हैं, क्या वे एक अछूत लड़की को अपने घर की बहू बनाएंगे?

‘‘घना, मु?ा गरीब पर दया करो. मैं किसी किस्सेकहानी का पात्र नहीं

बनना चाहती हूं. आप ऊंची जाति वालों की नजर में भले ही हमारी कोई इज्जत नहीं है, पर अपनी नजर में हमारी बहुत इज्जत है.

‘‘मेरे पिता एक स्कूल में मास्टर हैं. समाज में उन की भी कुछ इज्जत है. मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूं कि मेरे साथ आगे से ऐसी हरकत कभी मत करना.’’

श्यामा का ऐसा चेहरा देख कर घना सकते में आ गया. वह कुछ न बोल सका और चुपचाप वहीं खड़ा रह गया. श्यामा तेज कदमों से आगे बढ़ गई.

श्यामा जा चुकी थी, पर उस के कहे गए शब्द घना के कानों मेें बारबार गूंज रहे थे.

घना ने आसमान की ओर देखा. आसमान में घने बादल छाए हुए थे. वह सोचने लगा कि आज की रात फिर बर्फबारी होने वाली है. वह बहुत निराश था. क्या करे? कहां जाए? खुदकुशी कर ले? समाज की रूढि़यों, जाति प्रथा के चलते ही तो श्यामा ने उस के प्यार

को ठुकरा दिया था, वरना उस में क्या कमी थी.

घना को लगा कि यह जिंदगी ही बेकार है. वह बदहवास सा रास्ते से हट कर ऊपर पहाड़ी पर चढ़ने लगा. चारों तरफ अंधेरा बढ़ने लगा था. जब वह चलतेचलते थक गया, तो सुस्ताने के लिए एक बड़े पत्थर पर बैठ गया.

रात अब काफी हो चुकी थी. काफला और खड़कोट, दोनों गांवों के बीच, जहां पर खेत खत्म हो जाते हैं, वहां पर एक बेसिक स्कूल था. इस के बाद जंगल शुरू हो जाता था. बस्ती से दूर होने के चलते रात में स्कूल में कोई नहीं रहता था.

घना सोचने लगा कि आज की रात वह इसी स्कूल में बिता देगा. कल देखा जाएगा. अंधेरे में चलते, गिरतेपड़ते, ?ाडि़यों से गुजरते हुए उस का बदन बुरी तरह से छिल गया था. कई खरोंचें भी लग गई थीं.

जब घना स्कूल में पहुंचा, तब वहां भयंकर सन्नाटा पसरा हुआ था. वह स्कूल के बरामदे के एक कोने में सिकुड़ कर बैठ गया. ठंड से उस की हड्डियां तक कांप रही थीं. श्यामा का एहसास उस के दिलोदिमाग से हटने का नाम नहीं ले रहा था.

घना सोचने लगा कि श्यामा का गांव यहां से थोड़ी ही दूर पर है. क्यों न एक बार फिर कोशिश की जाए. आज उसे किसी बात का डर नहीं था. न मरने का डर, न जंगली जानवरों का डर. लिहाजा, वह श्यामा के घर की तरफ चल पड़ा.

घना मास्टर बिछन दास के घर के सामने रुक गया.

खड़कोट गांव के एक हिस्से में ब्राह्मण और एक हिस्से में दलित रहते हैं. इसी गांव के दलित टोले के बिछन दास मास्टर की बेटी श्यामा सेंदुल कालेज में बीए के आखिरी साल में पढ़ रही थी.

मास्टर बिछन दास नजदीक के ही एक गांव में मिडिल स्कूल के हैडमास्टर थे. खेतीबारी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पत्नी भी अकसर उन के साथ ही

रहती थी.

बिछन दास का स्कूल बहुत ज्यादा दूर न होने के चलते वे हर 15 दिन बाद घर आ जाते थे. श्यामा अपनी बूढ़ी दादी मां के साथ गांव में रहती थी.

करीब के गांव का होने की वजह से और श्यामा में घना की खास दिलचस्पी होने के चलते उसे श्यामा और उस के घर के बारे में बहुतकुछ पता था.

घना जानता था कि श्यामा की मां अकसर उस के पिता के साथ ही रहती हैं. घर में उस की बूढ़ी दादी मां न साफ देखती हैं और न साफ सुनती हैं. उसे यह भी पता था कि श्यामा घर की अलग कोठरी में पढ़ाई करती है. हो सकता है कि वह अभी भी पढ़ रही हो.

घना जब श्यामा के घर के चौक में पहुंचा, तब उस ने देखा कि ऊपरी मंजिल की एक कोठरी में अभी भी रोशनी थी. वह जानता था कि श्यामा इसी कोठरी में पढ़ रही होगी.

घना ने दरवाजा खटखटाया. कमरे में कोई भी हलचल नहीं हुई. उस ने फिर दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ कोठरी से श्यामा की आवाज आई.

‘‘मैं… घना.’’

‘‘घना?’’

‘‘हां, घना.’’

‘‘इतनी रात में…’’

‘‘हां, दरवाजा खोल दो. अपनी बात कर के मैं यहां से चला जाऊंगा.’’

श्यामा ने घड़ी की ओर देखा. रात के 2 बज रहे थे. वह सोचने लगी, ‘क्या करूं? दरवाजा खोलूं, तो कहीं यह कोई ?ां?ाट न खड़ा कर दे. अपनी बात कहने के अलावा यह और क्या कर सकता है? यह मेरा घर है. एक दलित लड़की के घर में इतनी रात को… इसे भी तो अपनी इज्जत का खयाल होगा.’

श्यामा ने दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर घना खड़ा था. कपड़े फटे हुए, चेहरे पर खरोंचों के निशान, जिन से खून निकल रहा था.

श्यामा को उस पर तरस आ गया. उस ने उसे अंदर आने दिया. वह ठंड से बुरी तरह कांप रहा था. उस के चेहरे पर पीड़ा साफ ?ालक रही थी.

‘‘यह सब क्या है?’’ श्यामा ने हैरान होते हुए पूछा.

घना ने श्यामा के साथ कालेज से घर आते समय रास्ते में जो बातचीत हुई थी, उस के बाद की सारी घटना बता दी.

‘‘मैं क्या करूं श्यामा? मैं अपने को संभाल नहीं पा रहा हूं. तुम्हारे बिना मैं अब जी नहीं सकूंगा.’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? यह तो जबरदस्ती है. मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती. ऐसा कभी नहीं हो सकता. मैं ने आप से पहले भी कहा था.’’

‘‘ठीक है, तब फिर चलता हूं. मैं तुम्हारा नुकसान नहीं करना चाहता. ज्यादा क्या कहूं… शायद यह मेरी जिंदगी की आखिरी रात है,’’ कह कर घना उठने को हुआ.

‘‘इतनी रात को तुम कहां जाओगे?’’ श्यामा ने डर कर पूछा.

‘‘कहां जाऊंगा? जहां एक दिन सभी को जाना है. क्यों न मैं आज ही भिलंगना नदी में डूब जाऊं. मैं जी कर क्या करूंगा, खुद भी नहीं जानता. पर मैं तुम से माफी मांगता हूं. मैं ने तुम्हें बहुत तकलीफ दी है, मु?ो माफ कर देना.’’

घना ने दरवाजे की तरफ कदम रखा ही था कि श्यामा ने उस की बांह थाम कर उसे कुरसी पर बैठा दिया.

श्यामा सोचने लगी, ‘इसे अगर मैं आज ठुकरा दूं, तो हो सकता है कि यह सचमुच भिलंगना नदी में छलांग मार दे. जो शख्स इस बर्फीली रात में घने जंगल से हो कर मेरे घर आने की हिम्मत कर सकता है, वह खुदकुशी कर ले, तो इस में क्या हैरानी है. और खुदकुशी क्या, इसे तो कोई जंगली जानवर रास्ते में ही अपना निवाला बना सकता है. तब शायद किसी को कुछ पता न चले, पर मैं तो सबकुछ जानती हूं. तब मैं क्या खुद को कभी माफ कर पाऊंगी?

‘नहीं, मैं जिंदगीभर अपने को अपराधी सम?ाती रहूंगी और यह तो मु?ा से प्यार करता है और शादी भी करने को तैयार है. क्या हमारा समाज यह सब होने देगा? नहीं, समाज तो ऐसा कभी नहीं होने देगा. पर हम कहीं दूर दिल्लीमुंबई चले जाएंगे. वहां हमारी जातपांत से किसी को क्या मतलब होगा?’

श्यामा बहुत दूर की बात सोचने लग गई थी.

‘‘श्यामा, तुम डरो मत. मैं तुम्हारा कोई नुकसान करने नहीं आया हूं. मैं तो केवल तुम्हें अपने मन की बात बताने आया था, तुम पर खुद को थोपने नहीं. तुम चिंता मत करो. अब मु?ो जाना ही चाहिए,’’ इतना कह कर घना दोबारा उठ कर जाने लगा.

‘‘रुको…’’ श्यामा ने कहा. घना जैसा था, वैसे ही बैठ गया.

‘‘अच्छा सुनो, आप ने कहा कि आप मु?ा से बहुत प्यार करते हो. क्या आप मु?ा से शादी कर के समाज का सामना कर पाओगे?’’

‘‘हां, जरूर करूंगा. मैं जानता हूं कि यह समाज ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होने देगा, पर हम यहां से कहीं दूर अपनी दुनिया बसाएंगे.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘एक साल बाद मैं कालेज पास कर लूंगा, फिर देखना मु?ो कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी और फिर हम किसी मंदिर में शादी कर लेंगे.’’

‘‘ठीक है, जब आप इतना खतरा मोल ले कर इस बर्फीली रात में मेरे

घर तक आए हो, तब मैं आप पर पूरा

भरोसा करती हूं कि आप अपने वचनों को जरूर निभाओगे…’’ फिर कुछ सोच कर श्यामा ने पूछा, ‘‘आप ने कुछ खाया तो होगा नहीं?’’

‘‘नहीं, कुछ भी नहीं खाया. सुबह कालेज जाते समय खाया था, उस के बाद मुरली की दुकान पर एक कप चाय पी थी. मु?ो बहुत भूख लगी है,’’ भूख और ठंड का असर घना के चेहरे से साफ ?ालक रहा था.

‘‘क्या करूं? रोटी और आलू की सब्जी बची हुई है, पर मैं आप को खाने को दे भी नहीं सकती.’’

‘‘अरे, लाओ न फिर.’’

‘‘यह ठीक नहीं होगा. एक अछूत के घर में ब्राह्मण भोजन करेगा, यह नामुमकिन है. ऐसा नहीं हो सकता.’’

‘‘मैं तो भूख से मरा जा रहा हूं और तुम्हें छुआछूत की पड़ी है.’’

‘‘तुम्हारा धर्म बिगड़ जाएगा. अगर ब्राह्मणों को पता चल गया, तो गजब हो जाएगा.’’

‘‘तुम्हारे साथ जीनेमरने के लिए मैं ने आज इतना बड़ा जोखिम उठाया है. अब जबकि तुम्हारे हाथ का बनाया ही जिंदगीभर खाना है, तब आज की रात परहेज क्यों? और तुम तो जानती हो कि मैं जातपांत, छुआछूत में जरा भी यकीन नहीं करता हूं.’’

‘‘खाओगे?’’ श्यामा ने डरे मन

से पूछा.

‘‘हां, जरूर खाऊंगा. तुम लाओ तो सही.’’

‘‘चलो फिर, रसोईघर में चलो, वहीं गरमागरम खिलाऊंगी…’’ फिर कुछ सोच कर वह बोली, ‘‘अच्छा, मैं यहीं पर लाती हूं. बाहर बहुत ठंड है.’’

श्यामा रसोईघर से खाना लाने चली गई. घना भविष्य के तानेबाने बुनने में खो गया. श्यामा थोड़ी ही देर में सब्जीरोटी ले कर आ गई. घना रोटी खाने लगा.

श्यामा को घना की इस हालत पर तरस आ रहा था. वह घना को देख रही थी और सोच रही थी, ‘यह मु?ो कितना चाहता है? एक ब्राह्मण का बेटा हो कर किस तरह अपने पुरखों के बनाए उसूलों को ताक पर रख कर एक अछूत के घर पर अपने पेट की भूख मिटा रहा है. इस बर्फीली रात में किस तरह भयानक जंगल से हो कर मेरे दरवाजे पर प्यार की भीख मांगने आया है,’ उस का सहज और सरल मन पिघल गया.

सुबह होने से पहले ही घना श्यामा के घर से निकल गया था. लेकिन अब उस के मन में एक उमंग थी, एक जोश था. वह सोचने लगा, ‘घर में कोई भी बहाना बना दूंगा.’

गांव के बीचोंबीच एक छोटी नदी बहती थी. घना ने उस नदी में हाथमुंह धोए और अपने घर की ओर चल पड़ा.

अब घना अकसर रात में बहुत ही सावधानी के साथ श्यामा के घर जाने लगा. दोनों अपनी भावी जिंदगी के बारे में खूब बातें करते, योजनाएं बनाते. इस बीच जब रिजल्ट निकला, तो घना फर्स्ट डिविजन के साथ अपने कालेज में अव्वल आया था. श्यामा की भी फर्स्ट डिविजन आई थी. दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था.

अपने मामा की सलाह पर घना ने दिल्ली में एक साल के कंप्यूटर कोर्स में दाखिला ले लिया. इस बीच घना जब भी गांव आता, दोनों सावधानी से मिलते रहे.

श्यामा ने एमए का पहला साल भी अच्छे नंबरों से पास कर लिया. घना का कंप्यूटर का कोर्स भी पूरा हो गया था. एक कंपनी में उसे अच्छी नौकरी मिल गई. नईनई नौकरी थी, इसलिए वह दिल्ली में बहुत मसरूफ हो गया.

श्यामा ने अब की बार भी बहुत मेहनत की थी, इसलिए उस ने एमए भी फर्स्ट डिविजन से पास किया थी.

श्यामा को लगा कि अब उस के सपने सच होने वाले हैं. वह बहुत

खुश थी. उस के पिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ने के लिए जल्दबाजी करने लगे, जबकि श्यामा इस बात से बहुत बेचैन थी.

काफला गांव का शिवप्रसाद उर्फ शिबी घना का दोस्त था. वह श्यामा और घना की प्रेम कहानी का एकमात्र गवाह भी था.

शिबी कई बार घना और श्यामा का संदेशवाहक भी रह चुका था, इसलिए श्यामा ने शिबी से अपनी चिंता घना तक पहुंचाने को कहा और घना को तुरंत गांव आने के लिए कहलवाया.

ऋषिकेश और घनसाली के रास्ते पर घनसाली से 5 किलोमीटर पहले भिलंगना नदी के तट पर पिलखी के पिलखेश्वर महादेव के मंदिर में बैसाखी के दिन एक विशाल मेला लगता है. घना इस मेले में श्यामा से मिलने के लिए आया था. वे दोनों इधरउधर की बातें करते हुए मेले से दूर सीढ़ीनुमा खेतों के किनारे जंगल में एक बुरांस के पेड़ के नीचे बैठ गए.

जंगल में सन्नाटा था. दूर नीचे सड़क पर कभीकभार किसी गाड़ी के गूंजने की आवाज आ जाती थी. चीड़ के पेड़ों से हवा छन कर सनसन की आवाज करती हुई बह रही थी और घाटी में बह रही भिलंगना नदी की आवाज से अपनी आवाज मिला रही थी.

धूप अभी भी सुहावनी थी, पर माहौल में बेखुदी का सा आलम था. घना बहुत ही उदास और खोएखोए मन से श्यामा को देख रहा था.

‘‘तुम कैसी हो श्यामा?’’ घना ने बात शुरू की, लेकिन उस के चेहरे पर निराशा झलक रही थी.

आज घना के चेहरे पर श्यामा से मिलने की कोई चमक नजर नहीं आ रही थी. वह पहले की तरह चंचल नहीं लग रहा था.

‘‘ठीक हूं, आप सुनाओ. जब से आप की नौकरी लगी है, आप तो हमारे लिए दुर्लभ जीव हो गए हैं,’’ श्यामा ने शिकायत भरे लहजे में कहा था, पर वह आज बहुत खुश थी, क्योंकि घना को देखते ही वह मानो सारी चिंताओं से छुटकारा पा गई थी.

‘‘अच्छा हुआ, आप ठीक समय पर आ गए. आप को पता है कि पिताजी मेरा रिश्ता एक जगह पक्का कर रहे हैं. मुझे और लड़के को मिलाने भर की देर है. मैं कई दिनों से टाल रही हूं. मैं आप का ही इंतजार कर रही थी. अब आगे का प्लान आज ही तैयार करना है,’’ कह कर उस ने घना की ओर देखा. घना दूर कहीं अपने में ही खोया हुआ था.

‘‘सुन रहे हो… कहां खो गए हो?’’

‘‘काश, खो पाता,’’ घना ने बहुत ही दुखी मन से कहा. ‘‘यह भावुक होने का समय नहीं है. सामने हमारी मंजिल है, बस आगे बढ़ने की देरी है. अब हमारे सपने सच होने वाले हैं,’’ श्यामा ने चुलबुले मन से कहा.

‘‘काश, सच हो पाते.’’

‘‘अब आप ऐन मौके पर ऐसा क्यों बोले जा रहे हैं? आप अब अपने पैरों पर खड़े हो और हम ने जो ख्वाब देखे थे, वे सच होने के लिए हमें देख रहे हैं,’’ श्यामा ने हैरान हो कर कहा.

‘‘अपने पैरों पर तो मैं जरूर खड़ा हूं, पर… पर जिन्होंने इन पैरों पर खड़ा होने के लायक बनाया है, मैं उन का क्या करूं?’’

‘‘क्या मतलब है आप का?’’

‘‘मेरे घर वालों ने भी मेरे लिए एक रिश्ता पक्का कर दिया है.’’

‘‘आप ने मना नहीं किया?’’ श्यामा ने घबराहट में पूछा.

‘‘मैं ने कहा था कि मैं ने अपने लिए एक दलित लड़की पसंद कर ली है और मैं उसी से शादी करूंगा. पर यह सुनते ही घर में भूचाल आ गया था, जैसे घर में कोई मर गया हो. वे गांवबिरादरी की बात करने लगे. मां अपने दूध की कसम देने लगीं. हम कहीं के नहीं रहेंगे और दहाड़ें मारमार कर रोने लगीं.’’

‘‘लेकिन यह सब तो होना ही था. इस की तो हमें पहले से ही जानकारी थी. हम इस ऊंचनीच की दुनिया से दूर अपना घर बसाएंगे. हम ने यही ख्वाब तो देखे थे. और अब तो आप अपने पैरों पर खड़े भी हो गए हो. मुझे भी कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘श्यामा, आज तो हम चले जाएंगे, पर अपनी जड़ों से कट कर हम कब तक अलग रह पाएंगे. कभी न कभी तो हमें यहां वापस आना ही पड़ेगा, और तब… क्या ये लोग हमें भूल जाएंगे? क्या हमें चैन से जीने देंगे?

‘‘मैं भी चाहता था कि हमारे सपने सच हों, पर नदी में रह कर मगर से बैर भी तो नहीं कर सकते. अब भलाई इसी में है कि हम एकदूसरे को भूल जाएं और…’’

‘‘और क्या? आप को यह सब पहले नहीं सूझा था. घना, आप उस रात जिस बहादुरी से मेरे घर प्यार की भीख मांगने आए थे, मैं आप की उस बहादुरी की कायल थी. मैं मरमिटी थी आप पर उस दिन. उस दिन मुझे लगा था कि आप जरूर समाज की इन सड़ीगली रीतियों के खिलाफ लड़ोगे. मुझे क्या पता था कि वह आप की बहादुरी नहीं, बल्कि पागलपन था.

‘‘अच्छा हुआ कि समय से पहले ही आप की औकात का पता चल गया. कितना भरोसा किया था मैं ने आप पर. मैं आप को सामाजिक बुराइयों से लड़ने वाला एक शेर समझती थी, पर आप तो कायर हो. आप ने मेरे साथ विश्वासघात किया है.’’

घना अपराधी की तरह जमीन पर नजरें गड़ाए सुनता रहा. श्यामा के लिए अब वहां पर ठहरना मुश्किल हो गया था. उस ने नफरत से घना की ओर देखा और तेज कदमों से वहां से चली गई.

श्यामा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी. वह मेले के बजाय सीधे अपने घर चली गई. उस ने दरवाजा बंद किया. वह आज खूब रोना चाहती थी.

शाम को श्यामा की मां ने उसे रोटी खाने के लिए उठाया, ‘‘श्यामा उठ, रोटी खा ले.’’

‘‘नहीं मां, मन नहीं कर रहा है.’’

‘‘अरे बेटी, एक रोटी तो खा ले. भूखे पेट सोना अच्छा नहीं होता. कल लड़के वाले भी तुझे देखने आ रहे हैं,’’ मां ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

श्यामा न चाहते हुए भी उठी. उस ने मां का दिल रखने के लिए आधी रोटी खाई और फिर बिस्तर पर पड़ गई. नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. घना के शब्दों से उसे इतनी पीड़ा हो रही थी, मानो उस के कानों में घना के शब्द नहीं, बल्कि गरमगरम सीसा पिघला कर डाला गया हो. उस का मन घना के लिए नफरत से  भर गया.

सुबह जब श्यामा की नींद खुली, तो धूप खिड़की के अंदर आ चुकी थी. उस ने एक अंगड़ाई ली और झटके के साथ पिछली बातों को भुला कर अपनी जिंदगी से दूर फेंकते हुए नए दिन का स्वागत करने के लिए अपने कमरे से बाहर निकल गई.

लड़के वाले दोपहर से पहले ही आ गए थे. उन का स्वागतसत्कार होने लगा. श्यामा मिठाई और चाय ले कर आई. उस ने सभी मेहमानों का स्वागत किया और मां के इशारे से वहीं पर बैठ गई.

श्यामा देखने में खूबसूरत तो थी ही, कदकाठी भी ठीक थी और सब से

बड़ी बात तो यह कि वह पढ़ीलिखी भी खूब थी.

बाद में लड़के के पिता ने कहा, ‘‘भाई, नया जमाना है. पढ़ेलिखे बच्चे हैं. उन्हें भी एकदूसरे के बारे में जानने का हक है.’’

वे सब बाहर चले गए. ‘‘मेरा नाम माधव है. सुना है, आप ने एमए किया है?’’ लड़के ने सन्नाटा तोड़ा.

‘‘जी हां, और मेरा नाम श्यामा है,’’ श्यामा ने सकुचाते हुए जवाब दिया.

‘‘एमए किस विषय में किया है

आप ने?’’

‘‘जी, समाजशास्त्र में.’’

‘‘मैं ने एमफार्मा किया है और मैं एक दवा कंपनी में सर्विस करता हूं,’’ कुछ देर रुक कर और श्यामा की आंखों में झांकते हुए वह हलके से मुसकराते हुए फिर बोला, ‘‘तो क्या विचार है? मेरा मतलब है कि आप मुझे अपने काबिल समझती हैं या नहीं?’’

‘‘जी, जैसा मेरे मांबाप उचित समझेंगे.’’

‘‘जी नहीं, मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं. आप के मांबाप को जब ठीक लगा, तभी तो उन्होंने हमें घर पर बुलाया है, आप की पसंदनापसंद जानने के लिए.’’

‘‘जी, पसंदनापसंद…? इस गांव में यह पहली बार हो रहा है कि लड़के और लड़की को उन की पसंदनापसंद जानने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है, वरना आज तक तो लड़का ही लड़की देख कर चला जाता था और अपनी पसंद बता देता था.’’

‘‘कुछ बातें समाज में तेजी से बदल रही हैं. हां, तो बताइए कि आप ने मुझे पसंद किया या नहीं?’’

‘‘जी, मुझे तो आप पसंद हैं…’’ श्यामा ने शरमाते हुए कहा था, ‘‘पर आगे जैसा मेरे पिताजी कहेंगे.’’

‘‘हां, यह हुई न बात. अब ठीक है.’’

उस दिन बात पक्की हो गई और फिर चट मंगनी और पट ब्याह भी हो गया. श्यामा सबकुछ भूल कर अपनी नई जिंदगी में मसरूफ हो गई. इस तरह एक साल कब बीता, पता ही नहीं चला.

श्यामा एक सामाजिक संस्था से जुड़ गई थी. इस बीच माधव को 2 महीने की ट्रेनिंग के लिए विदेश जाना पड़ा. श्यामा बहुत दिनों से मायके नहीं गई थी, इसलिए वह मायके जाने की तैयारी करने लगी.

श्यामा अपने गांव आ गई. इस बीच उसे शिबी से पता चला कि घना पागल हो गया है. दिल्ली में उस के मामा ने उस की शादी किसी अमीर घर की लड़की से करवा दी थी.

बाद में पता चला कि उस की पत्नी का कालेज के दिनों में किसी ईसाई लड़के से चक्कर था. लड़की के घर वालों ने जबरदस्ती उस की शादी घना से करवा दी थी, लेकिन कुछ ही दिन बाद उन में अनबन शुरू हो गई और एक दिन वह घर से गहनेपैसे ले कर उसी लड़के के साथ भाग गई.

घना यह सदमा सहन न कर सका और दिमागी संतुलन खो बैठा. उस के पिता उसे गांव ले आए. गांव में उस को ठीक करने के लिए कई देवीदेवताओं की पूजा होने लगी.

पागलपन के दौरे में घना लोगों को कभी जाति की खोखली बातों पर और कभी अंधविश्वास पर भाषण देता है, इसलिए लोग समझते हैं कि उस पर भूत का साया है. घना के बारे में सुन कर श्यामा को बहुत दुख हुआ, पर वह कर भी क्या सकती थी?

श्यामा को मायके में 2 महीने से भी ज्यादा समय हो गया था. उस का पति उसे लेने के लिए आ गया था. 1-2 दिन रहने के बाद जब वे लोग जा रहे थे, तो रास्ते में कुछ लोग घना को पकड़ कर अस्पताल ले जा रहे थे. शायद पागलखाने…

अचानक घना की नजर श्यामा पर पड़ी. उस ने गौर से श्यामा को देखा, वह श्यामा को पहचानने की कोशिश कर रह था. उस के साथ के लोग घना को खींच कर ले जा रहे थे. उस ने श्यामा की तरफ हाथ जोड़े, मानो वह श्यामा से माफी मांग रहा हो.

श्यामा फफक कर रो पड़ी. माधव ने उसे रोने दिया. वह जानता था कि श्यामा बहुत ही कोमल मन की है. वह किसी का बुरा नहीं देख सकती.

उन की बस का समय हो रहा था. थोड़ी देर बाद वह उठी और उस ने अपने पति से चलने को कहा.

दिल्ली पहुंच कर एक दिन माधव ने उस से घना के बारे में पूछा. श्यामा ने सच छिपाते हुए बस उस के शादी वाले किस्से को बता दिया.

माधव ने एक लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ.’’

‘‘हां, एक कायर के साथ इस से ज्यादा और क्या हो सकता था?’’ श्यामा ने बहुत ही लापरवाही से कहा.

माधव को श्यामा का यह जवाब अच्छा नहीं लगा.

‘‘हां, कायर नहीं तो और क्या? जो समस्याओं का सामना मजबूती से न कर सके, वह कायर नहीं तो और क्या है? कभी कालेज के दिनों में बड़ीबड़ी बातें करता था, जब समस्याओं का सामना करने का समय आया, तो हिम्मत ही जवाब दे गई.’’

‘‘परंतु अगर कभी तुम मुझे छोड़ कर चली गई, तो मैं भी पागल हो जाऊंगा,’’ माधव ने मजाक किया.

‘‘मुझ पर इतना ही विश्वास करते हो,’’ फिर एक पल के लिए शरारत भरी नजरों से माधव की ओर देख कर उस ने घुड़की दी, ‘‘कायर कहीं के.’’

इतना कह कर उस ने माधव की छाती पर सिर टिका दिया. माधव ने उसे अपनी बांहों में कस लिया. Hindi Story

Hindi Story: इश्कबाज को सबक-क्या मोड़ लाई वर्तिका और गजाला की दोस्ती

Hindi Story: ग्रेजुएशन करने के बाद वर्तिका बैंक में प्रोबेशनरी अफसर बनने की तैयारी में लगी हुई थी. इस के लिए उस ने एक जानेमाने कोचिंग सैंटर में दाखिला ले लिया था. वहीं उस की मुलाकात गजाला से हुई थी. वह भी उसी कोचिंग सैंटर में प्रोबेशनरी अफसर की तैयारी कर रही थी. जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई थी.

एक दिन गजाला ने वर्तिका को अपने भाई के दोस्त विक्रम से मिलवाया, ‘‘वर्तिका, इन से मिलो. ये हैं मेरे भाई के दोस्त विक्रम. काफी हैंडसम हैं न… क्यों?’’ यह कह कर गजाला मुसकराई.

‘‘अरे, हम हैंडसम हैं, तो क्या आप की सहेली कम खूबसूरत हैं? हमें तो आप की सहेली किसी ‘ब्यूटी क्वीन’ से कम नहीं लगतीं,’’ विक्रम ने वर्तिका की खूबसूरती की तारीफ करते हुए कहा.

पहली मुलाकात में ही अपनी खूबसूरती की ऐसी तारीफ सुन कर वर्तिका झोंप गई. विक्रम अब हर रोज ही वर्तिका और गजाला से कोचिंग के बाद मिलने लगा.

एक दिन गजाला जानबूझ कर कोचिंग सैंटर नहीं आई. कोचिंग के छूटने के बाद विक्रम वर्तिका को रास्तेमें मिला.

वर्तिका उस से बचना चाहती थी, फिर भी उस ने वर्तिका का रास्ता रोकते हुए कहा, ‘‘वर्तिकाजी, आज गजाला नहीं आई क्या?’’

‘‘नहीं, वे तो आज नहीं आईं.’’

‘‘तो क्या आज आप हम से बात भी नहीं करेंगी? क्या हम इतने बुरे हैं?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. आप तो काफी हैंडसम हैं.’’

आखिरी शब्द वर्तिका के मुंह से अचानक ही निकल पड़े थे. अब तो विक्रम पर जैसे हैंडसम होने का नशा ही चढ़ गया, जबकि वर्तिका सोचने लगी कि उस की जीभ कैसे फिसल गई.

मौके का फायदा उठाते हुए विक्रम ने कहा, ‘‘वर्तिकाजी, मेरा दिल तो कहता है कि आप इस जहां की सब से हसीन लड़की हो. मेरा दिल तो आप से दोस्ती करने को चाहता है,’’ इतना कह कर वह मोटरसाइकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया.

विक्रम के जाने के बाद वर्तिका सोचने लगी, ‘विक्रम हैंडसम है. वह मुझ से दोस्ती भी करना चाहता है. अगर उस से दोस्ती कर ली जाए, तो इस में हर्ज ही क्या है?’

अगले दिन वर्तिका ने बातोंबातों में गजाला से लड़कों से दोस्ती करने की बात कही. गजाला समझ गई कि वर्तिका के मन में क्या चल रहा है. उस ने वर्तिका की बातों पर रजामंदी

का ठप्पा लगाते हुए कहा, ‘‘वर्तिका, लड़कों से दोस्ती करने में आखिर बुराई ही क्या है?’’

फिर गजाला ने वर्तिका के चेहरे को पढ़ते हुए कहा, ‘‘लेकिन वर्तिका, तू यह सब क्यों पूछ रही है? कहीं तेरा मन भी किसी लड़के से दोस्ती करने को तो नहीं चाह रहा है? कहे तो विक्रम से तेरी दोस्ती करा दूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘अरे झठी, तेरे चेहरे की मुसकराहट बता रही है कि तेरे मन में विक्रम को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’

‘‘चल हट, मैं तुझ से बात नहीं करती,’’ वर्तिका ने वहां से चलते हुए कहा.

अब गजाला सब समझ गई थी. उस ने विक्रम और वर्तिका की आपस में दोस्ती करा दी. फिर उन्होंने एकदूसरे से मोबाइल फोन नंबर भी ले लिए.

वर्तिका विक्रम के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उस ने विक्रम के बारे में कोई जानकारी जुटाना भी ठीक नहीं समझ.

इस के बाद वर्तिका और विक्रम एकदूसरे को प्यार भरे एसएमएस भेजने लगे. गजाला इश्क की इस आग में घी डालने का काम कर रही थी.

वर्तिका के जन्मदिन पर विक्रम ने उसे एक महंगा मोबाइल फोन गिफ्ट में दिया. जब विक्रम का जन्मदिन आया, तो वर्तिका ने उसे एक महंगी टीशर्ट गिफ्ट में दी.

विक्रम ने एक दिन मौका देख कर वर्तिका से डेटिंग पर चलने को कहा. वर्तिका तो जैसे तैयार ही बैठी थी. उस ने तुरंत हामी भर दी.

अगले दिन वर्तिका सहेली से मिलने का बहाना बना कर विक्रम के साथ डेटिंग पर चली गई.

विक्रम वर्तिका को मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से दूर झल के किनारे पिकनिक स्पौट पर ले गया.

अभी वर्तिका और विक्रम एक पेड़ की छांव में बैठे ही थे कि तभी विक्रम का मोबाइल फोन बज उठा, लेकिन उस ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद फिर उस का मोबाइल फोन बज उठा.

वह वहां से उठ कर जाना चाहता था, लेकिन वर्तिका ने रोक लिया. अब विक्रम की मजबूरी हो गई थी कि वहीं पर फोन सुने.

उस ने जल्दबाजी में झठ बोला, ‘‘हैलो, मैं मोटरसाइकिल चला रहा हूं. बाद में बात करूंगा,’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया.

वर्तिका समझ गई थी कि यह किसी लड़की का फोन था. इसी वजह से विक्रम उस के सामने मोबाइल फोन पर बातें करने से बच रहा था. बस, यहीं से उस के मन में विक्रम के प्रति शक पैदा हो गया.

बातों ही बातों में उस ने असलियत जानने की एक तरकीब सोच ली. उसे कुछ दूरी पर एक आइसक्रीम वाला दिखाई दिया. उस ने विक्रम से कहा, ‘‘मेरा मन तो आइसक्रीम खाने को कर रहा है.’’

‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है. मैं अभी अपने और तुम्हारे लिए आइसक्रीम ले कर आता हूं.’’

इतना कह कर विक्रम जल्दी से वहां से उठा, पर उसे अपना मोबाइल फोन का ध्यान ही नहीं रहा.

जैसे ही विक्रम वहां से गया, वर्तिका ने उस का मोबाइल फोन खंगालना शुरू कर दिया. उस ने जल्दी से दीपा, कंगना और रूबीना के फोन नंबर ले लिए.

अब वर्तिका को पूरा यकीन हो गया था कि दाल में जरूर कुछ काला है. विक्रम के आने पर सिरदर्द का बहाना बना कर वापस चलने को कहा.

विक्रम अभी घर नहीं जाना चाहता था, लेकिन वह वर्तिका को नाराज भी नहीं करना चाहता था. लिहाजा, वह बुझे मन से घर चलने को तैयार हुआ.

अब वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना से मिल कर उन से दोस्ती कर ली. लेकिन विक्रम के बारे में उस ने किसी से कोई जिक्र नहीं किया.

एक दिन दीपा ने खुश हो कर वर्तिका को बताया कि अगले दिन वह अपने बौयफ्रैंड के साथ डेटिंग पर जा रही है. वर्तिका तुरंत समझ गई कि वह किस के साथ डेटिंग पर जा रही है.

तब वर्तिका ने दीपा और विक्रम की डेटिंग कन्फर्म करने के लिए विक्रम को फोन लगाया. उस ने विक्रम से डेटिंग पर चलने को कहा, लेकिन उस ने एक जरूरी काम बता कर टाल दिया.

अगले दिन वर्तिका ने विक्रम का पीछा करना शुरू किया. विक्रम मोटरसाइकिल पर था, जबकि वर्तिका अपनी स्कूटी पर. वह जानती थी कि विक्रम दीपा को डेटिंग के लिए झल पर ही ले जाएगा, क्योंकि प्रेमी जोड़ों की डेटिंग के लिए इस से बढि़या जगह कोई दूसरी न थी.

विक्रम दीपा को लेकर झल की ओर चल पड़ा. जब झल पर पहुंच कर दीपा और विक्रम मटरगश्ती करने लगे, तभी दीपा ने वहां पहुंच कर चुपके से अपने मोबाइल फोन में लगे कैमरे से उन की वीडियो फिल्म बना ली और घर चली आई.

वर्तिका ने ऐसी ही वीडियो फिल्में कंगना और रूबीना के साथ भी इश्कबाज विक्रम की बना डालीं.

एक दिन वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना को अपने घर बुलाया, फिर उस ने उन वीडियो फिल्मों को कंप्यूटर में डाउनलोड कर के उन तीनों को दिखलाया.

अब विक्रम की इश्कबाजी का कच्चा चिट्ठा खुल चुका था. अब चारों ने विक्रम को सबक सिखाने की ठानी. साथ ही, उन्होंने फैसला किया कि लड़कियों को पे्रमजाल में फंसाने वाली गजाला का भी दिमाग ठिकाने लगाना चाहिए.

वर्तिका ने अपने मम्मीपापा से सब बातें साफसाफ बता दीं और उन से अपनी गलती की माफी भी मांग ली.

पहले वर्तिका के मम्मीपापा उस की बात पर राजी नहीं हुए, लेकिन जब उस ने उन्हें अपनी योजना समझ , तो वे भी ऐसे मक्कार इश्कबाजों को सबक सिखाने के लिए तैयार हो गए.

तब योजना के मुताबिक, वर्तिका ने एक दिन विक्रम और गजाला को अपने घर बुलाया और उन्हें अपने कमरे में ले गई. वहां उस ने उन्हें कंप्यूटर पर दीपा, कंगना और रूबीना वाली वीडियो फिल्में दिखाईं. विक्रम और गजाला की काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई.

वे चुपचाप वहां से खिसकना चाहते थे, लेकिन वर्तिका उन्हें ऐसे कैसे जाने देती. उस ने 3 तालियां बजाईं, जिन्हें सुन कर पास के कमरे में छिपी बैठी दीपा, कंगना और रूबीना भी वहां आ गईं.

कंगना ने विक्रम से पूछा, ‘‘कहिए मियां मजनू, क्या हाल है? और कितनी लड़कियां चाहिए तुम्हें इश्क फरमाने के लिए?’’

विक्रम ने अचानक चाकू निकाल लिया और कंगना की गरदन पर रखते हुए बोला, ‘‘तुम सब कमरे के एक कोने में जाओ, नहीं तो चाकू से कंगना की गरदन हलाल कर दूंगा.’’

इस के बाद गजाला ने वर्तिका, दीपा और रूबीना के मोबाइल फोन अपने कब्जे में कर लिए और विक्रम के कहने पर गजाला ने उन के मुंह व हाथपैरों को कस कर बांधने के बाद सब को बाथरूम में बंद कर दिया.

विक्रम और गजाला घर से निकल कर बाहर की ओर भागे, लेकिन सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े. सामने दरवाजे पर इंस्पैक्टर शोभित रिवाल्वर ताने खड़ा था. उस के ‘हैंड्सअप’ कहते ही विक्रम और गजाला ने अपने हाथ ऊपर कर लिए.

तब इंस्पैक्टर शोभित ने अपने साथ आए पुलिस वालों को आदेश देते हुए कहा, ‘‘रामदीन, इस लड़के की तलाशी लो. और अर्चना, तुम इस लड़की की तलाशी लो.’’

पुलिस को देख कर विक्रम और गजाला चौंक गए. उन की हैरानी को दूर करते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘तुम दोनों को जरा भी हैरान होने की जरूरत नहीं है. तुम दोनों जब से इस घर में घुसे हो, तभी से हमारी गिरफ्त में हो.

‘‘वर्तिका के मम्मीपापा के साथ हम यहां पहले से ही मौजूद थे. हम सामने वाले पड़ोसी के घर में छिपे थे.

‘‘हम जानते थे कि तुम जैसे मक्कार लोग कोई न कोई गुस्ताखी जरूर करते हैं, इसलिए घर में घुसने से ले कर बाहर आने तक की तुम्हारी वीडियोग्राफी हम ने तैयार करा ली.

‘‘पड़ोसी की छत से आ कर हमारे फोटोग्राफर ने सारा काम बखूबी अंजाम दिया. अब यह वीडियोग्राफी तुम दोनों को अदालत में सजा दिलवाने में बड़ी काम आएगी.’’

यह सुन कर गजाला और विक्रम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वे इंस्पैक्टर शोभित के सामने गिड़गिड़ाने लगे, लेकिन इंस्पैक्टर शोभित ने कानून के अनुसार अपना काम किया.

बाथरूम में बंद वर्तिका, दीपा, कंगना व रूबीना के हाथपैरों और मुंह को खोला गया और उन के बयान लिए गए.

वर्तिका की बढि़या योजना और हिम्मत पर शाबाशी देते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘अगर हमारे देश की सारी लड़कियां वर्तिका की तरह हिम्मत और होशियारी से काम लें, तो वे ऐसे मक्कार इश्कबाजों से धोखा खाने से बच जाएं.’’

इस के बाद इंस्पैक्टर शोभित गजाला और विक्रम को जीप में बैठा कर अपने साथ आगे की कार्यवाही के लिए थाने ले गया. Hindi Story

Hindi Story: विकराल शून्य : निशा की कौनसी बीमारी से बेखबर था सोम?

Hindi Story: ‘‘कैसी विडंबना है, हम पराए लोगों को तो धन्यवाद कहते हैं लेकिन उन को नहीं, जो करीब होते हैं, मांबाप, भाईबहन, पत्नी या पति,’’ अजय ने कहा.

‘‘उस की जरूरत भी क्या है? अपनों में इन औपचारिक शब्दों का क्या मतलब? अपनों में धन्यवाद की तलवार अपनत्व को काटती है, पराया बना देती है,’’ मैं ने अजय को जवाब दिया.

‘‘यहीं तो हम भूल कर जाते हैं, सोम. अपनों के बीच भी एक बारीक सी रेखा होती है, जिस के पार नहीं जाना चाहिए, न किसी को आने देना चाहिए. माना अपना इनसान जो भी हमारे लिए करता है वह हमारे अधिकार या उस के कर्तव्य की श्रेणी में आता है, फिर भी उस ने किया तो है न. जो मांबाप ने कर दिया उसी को अगर वे न करते या न कर पाते तो सोचो हमारा क्या होता?’’ अजय बोला.

अजय की गहरी बातें वास्तव में अपने में बहुत कुछ समाए रखती हैं. जब भी उस के पास बैठता हूं, बहुत कुछ नया ही सीख कर जाता हूं.

बड़े गौर से मैं अजय की बातें सुनता था जो अजय कहता था, गलत या फिजूल उस में तो कुछ भी नहीं होता था. सत्य है हमारा तो रोमरोम किसी न किसी का आभारी है. अकेला इनसान संपूर्ण कहां है? क्या पहचान है एक अकेले इनसान की? जन्म से ले कर बुढ़ापे तक मनुष्य किसी न किसी पर आश्रित ही तो रहता है न.

‘‘मेरी पत्नी सुबह से शाम तक बहुत कुछ करती है मेरे लिए, सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक, मेरे कपड़े, मेरा कमरा, मेरी व्यक्तिगत चीजों का खयाल, यहां तक कि मेरा मूड जरा सा भी खराब हो तो बारबार मनाना या किसी तरह मुझे हंसाना,’’ मैं अजय से बोला.

‘‘वही सब अगर वह न करे तो जीवन कैसा हो जाए, समझ सकते हो न. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन की बीवियां तिनका भी उठा कर इधरउधर नहीं करतीं. पति ही घर भी संभालता है और दफ्तर भी. पत्नी को धन्यवाद कहने में कैसी शर्म, यदि उस से कुछ मिला है तुम्हें? इस से आपस का स्नेह, आपस की ऊष्मा बढ़ती है, घटती नहीं,’’ अजय ने कहा.

सच ही कहा अजय ने. इनसान इतना तो समझदार है ही कि बेमन से किया कोई भी प्रयास झट से पहचान जाता है. हम भी तो पहचान जाते हैं न, जब कोई भावहीन शब्द हम पर बरसाता है.

उस दिन देर तक हम साथसाथ बैठे रहे. अपनी जीवनशैली और उस के तामझाम को निभाने के लिए ही मैं इस पार्टी में आया था, जहां सहसा अजय से मुलाकात हो गई थी. हमारी कंपनी के ही एक डाइरेक्टर ने पार्टी दी थी, जिस में मैं हाजिर हुए बिना नहीं रह सकता था. इसे व्यावसायिक मजबूरी कह लो या तहजीब का तकाजा, निभाना जरूरी था.

12 घंटे की नौकरी और छुट्टी पर भी कोई न कोई आयोजन, कैसे घर के लिए जरा सा समय निकालूं? निशा पहले तो शिकायत करती रही लेकिन अब उस ने कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया है. समूल सुखसुविधाओं के बावजूद वह खुश नजर नहीं आती. सुबह की चाय और रात की रोटी बस यही उस की जिम्मेदारी है. मेरा नाश्ता और दोपहर का खाना कंपनी के मैस में ही होता है. आखिर क्या कमी है हमारे घर में जो वह खुश नजर नहीं आती? दिन भर वह अकेली होती है, न कोई रोकटोक, न सासससुर का मुंह देखना, पूरी आजादी है निशा को. फिर भी हमारे बीच कुछ है, जो कम होता जा रहा है. कुछ ऐसा है जो पहले था अब नहीं है.

सुबह की चाय और अखबार वह मेरे पास छोड़ जाती है. जब नहा कर आता हूं, मेरे कपड़े पलंग पर मिलते हैं. उस के बाद यंत्रवत सा मेरा तैयार होना और चले जाना. जातेजाते एक मशीनी सा हाथ हिला कर बायबाय कर देना.

मैं पिछले कुछ समय से महसूस कर रहा हूं, अब निशा चुप रहती है. हां, कभी माथे पर शिकन हो तो पूछ लेती है, ‘‘क्या हुआ? क्या आफिस में कोई समस्या है?’’

‘‘नहीं,’’ जरा सा उत्तर होता है मेरा.

आज शनिवार की छुट्टी थी लेकिन पार्टी थी, सो यहां आना पड़ा. निशा साथ नहीं आती, उसे पसंद नहीं. एक छत के नीचे रहते हैं हम, फिर भी लगता है कोसों की दूरी है.

मैं पार्टी से लौट कर घर आया, चाबी लगा कर घर खोला. चुप्पी थी घर में. शायद निशा कहीं गई होगी. पानी अपने हाथ से पीना खला. चाय की इच्छा नहीं थी. बीच वाले कमरे में टीवी देखने बैठ गया. नजर बारबार मुख्य

द्वार की ओर उठने लगी. कहां रह गई यह लड़की? चिंता होने लगी मुझे. उठ कर बैडरूम में आया और निशा की अलमारी खोली. ऊपर वाले खाने में कुछ उपहार पड़े थे. जिज्ञासावश उठा लिए. समयसमय पर मैं ने ही उसे दिए थे. मेरा ही नाम लिखा था उन पर. स्तब्ध रह गया मैं. निशा ने उन्हें खोला तक नहीं था. महंगी साडि़यां, कुछ गहने. हजारों का सामान अनछुआ पड़ा था. क्षण भर को तो अपना अपमान लगा यह मुझे, लेकिन दूसरे ही क्षण लगा मेरी बेरुखी का इस से बड़ा प्रमाण और क्या होगा?

उपहार देने के बाद मैं ने उन्हें कब याद रखा. साड़ी सिर्फ दुकान में देखी थी, उसे निशा के तन पर देखना याद ही नहीं रहा. कान के बुंदे और गले का जड़ाऊ हार मैं ने निशा के तन पर सजा देखने की इच्छा कब जाहिर की? वक्त ही नहीं दे पाता हूं पत्नी को, जिस की भरपाई गहनों और कपड़ों से करता रहा था. जरा भी प्यार समाया होता इस सामान में तो मेरे मन में भी सजीसंवरी निशा देखने की इच्छा होती. मेरा प्यार और स्नेह ऊष्मारहित है. तभी तो न मुझे याद रहा और न ही निशा ने इन्हें खोल कर देखने की इच्छा महसूस की होगी. सब से पुराना तोहफा 4 महीनों पुराना है, जो निशा के जन्मदिन का उपहार था. मतलब यह कि पिछले 4 महीनों से यह सामान लावारिस की तरह उस की अलमारी में पड़ा है, जिसे खोल कर देखने तक की जरूरत निशा ने नहीं समझी.

यह तो मुझे समझ में आ गया कि निशा को गहनों और कपड़ों की भूख नहीं है और न ही वह मुझ से कोई उम्मीद करती है.

2 साल का वैवाहिक जीवन और साथ बिताया समय इतना कम, इतना गिनाचुना कि कुछ भी संजो नहीं पा रहा हूं, जिसे याद कर मैं यह विश्वास कर पाऊं कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय है.

निशा की पूरी अलमारी देखी मैं ने. लाकर में वे सभी रुपए भी वैसे के वैसे ही पड़े थे. उस ने उन्हें भी हाथ नहीं लगाया था.

शाम के 6 बज गए. निशा लौटी नहीं थी. 3 घंटे से मैं घर पर बैठा उस का इंतजार कर रहा हूं. कहां ढूंढू उसे? इस अजनबी शहर में उस की जानपहचान भी तो कहीं नहीं है. कुछ समय पहले ही तो इस शहर में ट्रांसफर हुआ है.

करीब 7 बजे बाहर का दरवाजा खुला. बैडरूम के दरवाजे की ओट से ही मैं ने देखा, निशा ही थी. साथ था कोई पुरुष, जो सहारा दे रहा था निशा को.

‘‘बस, अब आप आराम कीजिए,’’

सोफे पर बैठा कर उस ने कुछ दवाइयां मेज पर रख दी थीं. वह दरवाजा बंद कर के चला गया और मैं जड़वत सा वहीं खड़ा रह गया. तो क्या निशा बीमार है? इतनी बीमार कि कोई पड़ोसी उस की सहायता कर रहा है और मुझे पता तक नहीं. शर्म आने लगी मुझे.

आंखें बंद कर चुपचाप सोफे से टेक लगाए बैठी थी निशा. उस की सांस बहुत तेज चल रही थी. मानो कहीं से भाग कर आई हो. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी पास जाने की. शब्द कहां हैं मेरे पास जिन से बात शुरू करूंगा. पैसों का ढेर लगाता रहा निशा के सामने, लेकिन यह नहीं समझ पाया, रुपयापैसा किसी रिश्ते की जगह नहीं ले सकता.

‘‘क्या हुआ निशा?’’ पास आ कर मैं ने उस के माथे पर हाथ रखा. तेज बुखार था, जिस वजह से उस की आंखों से पानी भी बह रहा था. जबान खिंच गई मेरी. आत्मग्लानि का बोझ इतना था कि लग रहा था कि आजीवन आंखें न उठा पाऊंगा.

किसी गहरी खाई में जैसे मेरी चेतना धंसने लगी. अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह के साथ मेरा घर, मेरी गृहस्थी कहीं उजड़ने तो नहीं लगी? हंसतीखेलती यह लड़की ऐसी कब थी, जब मेरे साथ नहीं जुड़ी थी. मेरी ही इच्छा थी कि मुझे नौकरी वाली लड़की नहीं चाहिए. वैसी हो जो घर संभाले और मुझे संभाले. इस ने तो मुझे संभाला लेकिन क्या मैं इसे संभाल पाया?

‘‘आप कब आए?’’ कमजोर स्वर ने मुझे चौंकाया. अधखुली आंखों से मुझे देख रही थी निशा.

निशा का हाथ कस कर अपने हाथ में पकड़ लिया मैं ने. क्या उत्तर दूं, मैं कब आया.

‘‘चाय पिएंगे?’’ उठने का प्रयास किया निशा ने.

‘‘कब से बीमार हो?’’ मैं ने उठने से उसे रोक लिया.

‘‘कुछ दिन हो गए.’’

‘‘तुम्हारी सांस क्यों फूल रही है?’’

‘‘ऐसी हालत में कुछ औरतों को सांस की तकलीफ हो जाती है.’’

‘‘कैसी हालत?’’ मेरा प्रश्न विचित्र सा भाव ले आया निशा के चेहरे पर. वह मुसकराने लगी. ऐसी मुसकराहट, जो मुझे आरपार तक चीरती गई.

फिर रो पड़ी निशा. रोना और मुसकराना साथसाथ ऐसा दयनीय चित्र प्रस्तुत करने लगा मानो निशा पूर्णत: हार गई हो. जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा. डर लगने लगा मुझे. हांफतेहांफते निशा का रोना और हंसना ऐसा चित्र उभार रहा था मानो उसे अब मुझ से

कोई भी आशा नहीं रही. अपना हाथ खींच लिया निशा ने.

तभी द्वार घंटी बजी और विषय वहीं थम गया. मैं ही दरवाजा खोलने गया. सामने वही पुरुष खड़ा था, मेरी तरफ कुछ कागज बढ़ाता हुआ.

‘‘अच्छा हुआ, आप आ गए. आप की पत्नी की रिपोर्ट्स मेरी गाड़ी में ही छूट गई थीं. दवा समय से देते रहिए. इन की सांस बहुत फूल रही थी इसलिए मैं ही छोड़ने चला आया था.’’

अवाक था मैं. निशा को 4 महीने का गर्भ था और मुझे पता तक नहीं. कुछ घर छोड़ कर एक क्लीनिक था, जिस के डाक्टर साहब मेरे सामने खड़े थे. उन्होंने 1-2 कुशल स्त्री विशेषज्ञ डाक्टरों का पता मुझे दिया और जल्दी ही जरूरी टैस्ट करवा लेने को कह कर चले गए. जमीन निकल गई मेरे पैरों तले से. कैसा नाता है मेरा निशा से? वह कुछ सुनाना चाहती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं. तो फिर शादी क्यों की मैं ने, अगर पत्नी का सुखदुख भी नहीं पूछ सकता मैं.

चुपचाप आ कर बैठ गया मैं निशा के पास. मैं पिता बनने जा रहा हूं, यह सत्य अभीअभी पता चला है मुझे और मैं खुश भी नहीं हो पा रहा. कैसे आंखें मिलाऊं मैं निशा से? पिछले कुछ महीनों से कंपनी में इतना ज्यादा काम है कि सांस भी लेने की फुरसत नहीं है मुझे. निशा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और मैं ने एक बार भी पूछा नहीं, उसे क्या तकलीफ है.

निशा के विरोध के बावजूद मैं उसे उठा कर बिस्तर पर ले आया. देर तक ठंडे पानी की पट्टियां रखता रहा. करीब आधी रात को उस का बुखार उतरा. दूध और डबलरोटी ही खा कर गुजारा करना पड़ा उस रात, जबकि यह सत्य है, 2 साल के साथ में निशा ने कभी मुझे अच्छा खाना खिलाए बिना नहीं सुलाया.

सुबह मैं उठा तो निशा रसोई में व्यस्त थी. मैं लपक कर उस के पास गया. कुछ कह पाता, तब तक तटस्थ सी निशा ने सामने इशारा किया. चाय ट्रे में सजी थी.

‘‘यह क्या कर रही हो तुम? तुम तो बीमार हो,’’ मैं ने कहा.

‘‘बीमार तो मैं पिछले कई दिनों से हूं. आज नई बात क्या है?’’

‘‘देखो निशा, तुम ने एक बार भी मुझे नहीं बताया,’’ मैं ने कहा.

‘‘बताया था मैं ने लेकिन आप ने सुना ही नहीं. सोम, आप ने कहा था, मुझे इस घर में रोटीकपड़ा मिलता है न, क्या कमी है, जो बहाने बना कर आप को घर पर रोकना चाहती हूं. आप इतनी बड़ी कंपनी में काम करते हैं. क्या आप को और कोई काम नहीं है, जो हर पल पत्नी के बिस्तर में घुसे रहें? क्या मुझे आप की जरूरत सिर्फ बिस्तर में होती है? क्या मेरी वासना इतनी तीव्र है कि मैं चाहती हूं, आप दिनरात मेरे साथ वही सब करते रहें?’’ निशा बोलती चली गई.

काटो तो खून नहीं रहा मेरे शरीर में.

‘‘आप मुझे रोटीकपड़ा देते हैं, यह सच

है. लेकिन बदले में इतना बड़ा अपमान भी करें, क्या जरूरी है? सोम, आप भूल गए, पत्नी का भी मानसम्मान होता है. रोटीकपड़ा तो मेरे पिता के घर पर भी मिलता था मुझे. 2 रोटी तो कमा भी सकती हूं. क्या शादी का मतलब यह होता है कि पति को पत्नी का अपमान करने का अधिकार मिल जाता है?’’ निशा बिफर पड़ी.

याद आया, ऐसा ही हुआ था एक दिन. मैं ने ऐसा ही कहा था. इतनी ओछी बात पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गई थी. सच है, उस के बाद निशा ने मुझ से कुछ भी कहना छोड़ दिया था. जिस खबर पर मुझे खुश होना चाहिए था उसे बिना सुने ही मैं ने इतना सब कह दिया था, जो एक पत्नी की गरिमा पर प्रहार का ही काम करता.

निशा को बांहों में ले कर मैं रो पड़ा. कितनी कमजोर हो गई है निशा, मैं देख ही नहीं पाया. कैसे माफी मांगूं अपने कहे की. लाखों रुपए हर महीने कमाने वाला मैं इतना कंगाल हूं कि न अपने बच्चे के आने की खबर का स्वागत कर पाया और न ही शब्द ही जुटा पा रहा हूं कि पत्नी से माफी मांग सकूं.

पत्नी के मन में पति के लिए एक सम्मानजनक स्थान होता है, जिसे शायद मैं खो चुका हूं. लाख हवा में उड़ता रहूं, आना तो जमीन पर ही था मुझे, जहां निशा ने सदा शीतल छाया सा सुख दिया है मुझे.

मेरे हाथ हटा दिए निशा ने. उस के होंठों पर एक कड़वी सी मुसकराहट थी.

‘‘ऐसा क्या हुआ है मुझे, जो आप को रोना आ गया. आप रोटीकपड़ा देते हैं मुझे, बदले में संतान पाना तो आप का अधिकार है न. डाक्टर ने कहा है, कुछ औरतों को गर्भावस्था में सांस की तकलीफ हो जाती है. ठीक हो जाऊंगी मैं. आप की और घर की देखभाल में कोई कमी नहीं आएगी,’’ निशा ने कहा.

‘‘निशा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो. पता नहीं क्यों मेरे मुंह से

वह सब निकल गया,’’ मैं निशा के आगे गिड़गिड़ाया.

‘‘सच ही आया होगा न जबान पर, इस में माफी मांगने की क्या जरूरत है? मैं जैसी हूं वैसी ही बताया आप ने.’’

‘‘तुम वैसी नहीं हो, निशा. तुम तो संसार की सब से अच्छी पत्नी हो. तुम्हारे बिना मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा. अगर मैं अपनी कंपनी का सब से अच्छा अधिकारी हूं तो उस के पीछे तुम्हारी ही मेहनत और देखभाल है. यह सच है, मैं तुम्हें समय नहीं दे पाता लेकिन यह सच नहीं कि मैं तुम से प्यार नहीं करता. तुम्हें गहनों, कपड़ों की चाह होती तो मेरे दिए तोहफे यों ही नहीं पड़े होते अलमारी में. तुम मुझ से सिर्फ जरा सा समय, जरा सा प्यार चाहती हो, जो मैं नहीं दे पाता. मैं क्या करूं, निशा, शायद आज संसार का सब से बड़ा कंगाल भी मैं ही हूं, जिस की पत्नी खाली हाथ है, कुछ नहीं है जिस के पास. क्षमा कर दो मुझे. मैं तुम्हारी देखभाल नहीं कर पाया.’’ मैं रोने लगा था.

मुझे रोते देख कर निशा भी रोने लगी थी. रोने से उस की सांस फूलने लगी थी. निशा को कस कर छाती से लगा लिया मैं ने. इस पल निशा ने विरोध नहीं किया. मैं जानता हूं, मेरी निशा मुझ से ज्यादा नाराज नहीं रह पाएगी. मुझे अपना घर बचाने के लिए कुछ करना होगा. घर और बाहर में एक उचित तालमेल बनाना होगा, हर रिश्ते को उचित सम्मान देना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं जब मेरे बैंक खातों में तो हर पल शून्य का इजाफा होगा ही, वहीं शून्य अपने विकराल रूप में मेरे जीवन में भी स्थापित हो जाएगा. Hindi Story

Hindi Story: कोई लौटा दे मेरे: कैसे उजड़ी अशफाक की दुनिया

Hindi Story: ‘अशफाक अंसारी, वल्द एसआर अंसारी, ऐशबाग, भोपाल, आप को रिहा किया जाता है और पुलिस की गलती के लिए अदालत आप से खेद जाहिर करती है,’ जज साहब का लिखा यह वाक्य पढ़ कर जेलर ने अशफाक को सुना दिया और शाम के 4 बजे उसे रिहा कर दिया गया.

पुलिस द्वारा दिए गए 15 सौ रुपए के साथ जब अशफाक भोपाल लौटा, तो वहां की दुनिया देख कर दंग रह गया. महज 4 सालों में ही उस की दुनिया उजड़ गई थी.

पुलिस की एक छोटी सी भूल ने अशफाक को सड़क पर ला कर पटक दिया था. वह खो गया यादों में…

आज से 4 साल पहले 45 साला अशफाक मंडी में आलू का कारोबार करता था और अपनी बीवी व 4 बच्चों के साथ सुख की जिंदगी गुजार रहा था.

अशफाक की बड़ी बेटी तकरीबन 18 साल की थी, जिस का निकाह उस ने सलमान भाई के बेटे के साथ ठीकठाक किया था. दोनों परिवारों में हंसीखुशी का माहौल था.

उस दिन मंगनी की रस्म अदा होनी थी कि अचानक अशफाक पर मानो तूफान आ गया. वह मंडी से आलू का कारोबार कर दोपहर के एक बजे नमाज अदा कर के उठा ही था कि एक पुलिस वाले ने उसे झट से पकड़ लिया और बोला, ‘अशफाक मियां, तुम्हें थाने में बुलाया गया है.’

अशफाक घर पर सब को बताता हुआ थाने पहुंचा, पर वहां उस से नाम पूछ कर हवालात में डाल दिया गया.

‘थानेदार साहब, मैं ने किया क्या है?’ अशफाक ने मासूमियत से पूछा. ‘ज्यादा भोला मत बन. लड़कियों को छेड़ना, उन की सोने की चेनें छीनना तुम्हारा काम है,’ इंस्पैक्टर उसे धमकाते हुए बोला.

‘साहब, वह अशफाक दूसरा है. वह गुंडा हमारे साथ वाली गली में रहता है. मैं तो आलू वाला हूं,’ अशफाक अपने बारे में सफाई देते हुए बोला.

‘अबे चुप, मैं तेरी नसनस से वाकिफ हूं. भोला बन कर लूटता है,’ यह कहते हुए इंस्पैक्टर ने अशफाक को मजिस्ट्रेट के पास भेजा, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

उस के बाद तारीख पर तारीख और महीनों गुजरते गए. अशफाक को पहले भोपाल और फिर जबलपुर की जेल में भेज दिया गया. इसी बीच एक दिन उसे पता चला कि उस की बेटी की मंगनी टूट गई है.

‘हमें किसी अपराधी की बेटी ब्याह कर नहीं लानी,’ यह बात खुद सलमान ने उसे जेल में मिल कर बताई.

‘आप को तो पता है कि मैं अपराधी नहीं हूं. मुझे दूसरे शख्स की जगह जेल में डाला गया है,’ यह सफाई देते हुए अशफाक थक गया.

‘कुछ भी कह लो भाई. मुझे माफ करना, लेकिन एक अपराधी की बेटी घर में ला कर मुझे अपनी इज्जत का जनाजा नहीं निकलवाना. आप हमें तो माफ ही करना,’ इतना कह कर बगैर उस की बात सुने सलमान लौट गया.

अब तो अशफाक को दोहरी मार झेलनी पड़ी. बीवी और बच्चे जैसेतैसे कर के घर की गाड़ी खींच रहे हैं और वह जेल में सड़ रहा है.

अशफाक ने मुश्किल से अपनी बात जज साहब को बता डाली, ‘साहब, मेरा नाम अशफाक अंसारी, मेरे पिता का नाम एसआर अंसारी है, जबकि दूसरा अशफाक फइमुद्दीन अंसारी का बेटा है. वह ऐशबाग की गली नंबर 412 में रहता है, जबकि मैं 214 में रहता हूं.

मेरा 20 सालों से सब्जी मंडी में आलू का कारोबार है, जबकि वह गुंडागर्दी करता है.’ अशफाक ने जब इतनी बातें बताईं, तो जज साहब ने पूछा, ‘तुम्हारे पास इस बात का कोई सुबूत है?’

‘जज साहब, आप के रिकौर्ड की सारी बातें उस गुंडे से मेल खाती हैं, जबकि मेरा वोटर आईडी कार्ड, राशनकार्ड वगैरह तमाम कागजात घर से मंगवा कर सचाई पता की जा सकती है,’ अशफाक रोते हुए अपनी बात रख रहा था.

‘देखो मियां, हमें तुम से पूरी हमदर्दी है. अगर तुम सही हो, तो हम तुम्हें यकीनन रिहा कर देंगे,’ जज साहब ने उसे हौसला देते हुए कहा.

अब उसे बाइज्जत वापस जेल भेज दिया गया. इस से जेलर और सभी मुलाजिम इज्जत से पेश आने लगे. फिर तो 3-4 तारीख में मामला साफ हो गया. कोर्ट में वकील की दलीलों ने उसे बेकुसूर और इंस्पैक्टर की गलती साबित कर दी.

इंस्पैक्टर को जब पता चला, तो वह असली मुजरिम की खोज में जुट गया, पर इस सब में 4 साल बीत गए.

अशफाक बीती यादों से बाहर निकल आया. अब उस के बीवीबच्चे झुग्गी में बड़ी मुश्किल से दिन गुजार रहे थे. मां तो पागल सी हो गई थी.

‘‘घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा. मैं काजी साहब से मिल कर सबकुछ सुधार दूंगा. धंधा भी ठीक हो जाएगा.’’ वह सब को दिलासा दे रहा था, पर खुद इंस्पैक्टर पर झंझला रहा था.

जब अशफाक ऐशबाग थाने के सामने से गुजर रहा था, तो वहां उस ने लिखा देखा, ‘पुलिस आप की सुरक्षा में’. हकीकत में पुलिस ने उसे इतनी सुरक्षा दी, जिस की हद नहीं.

यहां नाम ने उसे बदनाम कर दिया. कौन कहता है कि नाम कुछ नहीं है. बस, एकजैसे नाम ने उसे जेल और दूसरे को मौका दिया.

‘बेटीबेटा एकसमान’. इस नारे को पढ़ कर अशफाक टूट गया. उस की बेटी तो बिना गलती के ही पिस गई.

बेटी नहीं होती है, तो सबकुछ ठीक होता है. इस तरह ये सारे फूल उसे शूल की तरह चुभने लगे और वह बिस्तर पर लेट कर फूटफूट कर रोने लगा.Hindi Story

Romantic Story: लौन्ग डिस्टेंस रिश्ते – अभय को बेईमान मानने को रीवा क्यों तैयार न थी?

Romantic Story: ‘‘हैलो,कैसी हो? तबीयत तो ठीक रहती है न? किसी बात की टैंशन मत लेना. यहां सब ठीक है,’’ फोन पर अभय की आवाज सुनते ही रीवा का चेहरा खिल उठा. अगर सुबहशाम दोनों वक्त अभय का फोन न आए तो उसे बेचैनी होने लगती है.

‘‘मैं बिलकुल ठीक हूं, तुम कैसे हो? काम कैसा चल रहा है? सिंगापुर में तो इस समय दोपहर होगी. तुम ने लंच ले लिया? अच्छा इंडिया आने का कब प्लान है? करीब 10 महीने हो गए हैं तुम्हें यहां आए. देखो अब मुझे तुम्हारे बिना रहना अच्छा नहीं लगता है. मुझे यह लौंग डिस्टैंस मैरिज पसंद नहीं है,’’ एक ही सांस में रीवा सब कुछ कह गई.

बेशक उन दोनों की रोज बातें होती हैं, फिर भी रीवा के पास कहने को इतना कुछ होता है कि फोन आने के बाद वह जैसे चुप ही नहीं होना चाहती है. वह भी क्या करे, उन की शादी हुए अभी 2 साल ही तो हुए हैं और शादी के 2 महीने बाद ही सिंगापुर की एक कंपनी में अभय की नौकरी लग गई थी. वह पहले वहां सैटल हो कर ही रीवा को बुलाना चाहता था, पर अभी भी वह इतना सक्षम नहीं हुआ था कि अपना फ्लैट खरीद सके. ऊपर से वहां के लाइफस्टाइल को मैंटेन करना भी आसान नहीं था. कुछ पैसा उसे इंडिया भी भेजना पड़ता था, इसलिए वह न चाहते हुए भी रीवा से दूर रहने को मजबूर था.

‘‘बस कुछ दिन और सब्र कर लो, फिर यह दूरी नहीं सहनी पड़ेगी. जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. मैं ने काफी तरक्की कर ली है और थोड़ाबहुत पैसा भी जमा कर लिया है. मैं बहुत जल्दी तुम्हें यहां बुला लूंगा.’’

अभय से फोन पर बात कर कुछ पल तो रीवा को तसल्ली हो जाती कि अब वह जल्दी अभय के साथ होगी. पर फिर मायूस हो जाती. इंतजार करतेकरते ही तो इतना समय बीत गया था. बस यही सोच कर खुश रहती कि चलो अभय उस से रोज फोन पर बात तो करता है. बातें भी बहुत लंबीलंबी होती थीं वरना एक अनजाना भय उसे घेरे रहता था कि कहीं वह वहां एक अलग गृहस्थी न बसा ले. इसीलिए वह उस के साथ रहने को बेचैन थी. वैसे भी जब लोग उस से पूछते कि अभय उसे साथ क्यों नहीं ले गया, तो वह उदास हो जाती. दूर रहने के लिए तो शादी नहीं की जाती. उस की फ्रैंड्स अकसर उसे लौंग डिस्टैंस कपल कह कर छेड़तीं तो उस की आंखें नम हो जातीं.

‘‘रीवा, तुम्हारे लिए खुशी की बात है. मेरे पास अब इतने पैसे हो गए हैं कि मैं तुम्हें यहां बुला सकूं. तुम आने की तैयारी करना शुरू कर दो. जल्द ही मैं औनलाइन टिकट बुक करा दूंगा. फिर हम घूमने चलेंगे. बोलो कहां जाना चाहती हो? मलयेशिया चलोगी?’’

यह सुनते ही रीवा रो पड़ी, ‘‘जहां तुम ले जाना चाहोगे, चल दूंगी. मुझे तो सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए.’’

‘‘तो फिर हम आस्ट्रेलिया चलेंगे, बहुत ही खूबसूरत देश है.’’

अभय से बात करने के बाद रीवा का मन कई सपने संजोने लगा. अब जा कर उस का सही मानों में वैवाहिक जीवन शुरू होगा. वह खरीदारी और पैकिंग करने में जुट गई. रात को भी अभय से बात हुई तो उस ने फिर बात दोहराई. अभय के फोन आने का एक निश्चित समय था, इसलिए रीवा फोन के पास आ कर बैठ जाती थी. लैंडलाइन पर ही वह फोन करता था.

उस दिन भी सुबह से रीवा अभय के फोन का इंतजार कर रही थी. लेकिन समय बीतता गया और फोन नहीं आया. ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि फोन न आए. सोचा कि बिजी होगा, शायद बाद में फोन करे. पर उस दिन क्या, उस के बाद तो 1 दिन बीता, 2 दिन बीते और धीरेधीरे

10 दिन बीत गए, पर अभय की न तो कोई खबर आई और न ही फोन. पहले तो उसे लगा कि शायद अभय का सरप्राइज देने का यह कोई तरीका हो, पर वक्त गुजरने के साथ उस के मन में बुरेबुरे खयाल आने लगे कि कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं घट गई. उस के मोबाइल पर फोन किया तो स्विचऔफ मिला. कंपनी के नंबर पर किया तो किसी ने ठीक से जवाब नहीं दिया.

सिंगापुर में अभय एक फ्रौड के केस में फंस गया था. 10 दिनों से वह जेल में बंद था. उसे लगा कि अगर रीवा को यह बात पता चलेगी तो न जाने वह कैसे रिऐक्ट करे. कहीं वह उसे गलत न समझे और यह सच मान ले कि उस ने फ्रौड किया है. कंपनी ने भी उसे आश्वासन दिया था कि वह उसे जेल से बाहर निकाल कर केस क्लोज करा देगी. इसलिए अभय ने सोचा कि बेकार रीवा को क्यों बताए. जब केस क्लोज हो जाएगा तो वह इस बात को यहीं दफन कर देगा. इस से रीवा के मन में किसी तरह की शंका पैदा नहीं होगी कि उस का पति बेईमान है.

असल में अभय जिस कंपनी में फाइनैंशियल ऐडवाइजर था, उस के एक क्लाइंट ने उस पर 30 हजार डौलर की गड़बड़ी करने का आरोप लगाया था. क्लाइंट का कहना था कि उस ने सैंट्रल प्रौविडैंट फंड में अच्छा रिटर्न देने का लालच दे कर उस का विश्वास जीता और बाद में उस के अकाउंट में गड़बड़ी कर यह फ्रौड किया. असल में यह अकाउंट में हुई गलती थी. डेटा खो जाने यानी गलती से डिलीट हो जाने की वजह से यह सारी परेशानी खड़ी हुई थी. लेकिन पुलिस ने अभय को ही इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए फ्रौड करने के लिए कंपनी के हिसाबकिताब में गड़बड़ी और कंपनी के डौक्यूमैंट्स के साथ छेड़छाड़ करने के जुर्म में जेल में डाल दिया था और फाइन भी लगाया था. उसे अपनी बात कहने या प्रमाण पेश करने तक का अवसर नहीं दिया गया. वहां पर एक इंडियन पुलिस अफसर ही उस का केस हैंडल कर रहा था और वह इस बात से नाराज था कि भारतीय हर जगह बेईमानी करते हैं.

‘‘आप यकीन मानिए सर, मैं ने कोई अपराध नहीं किया है,’’ अभय की बात सुन पुलिस अफसर करण बोला, ‘‘यहां का कानून बहुत सख्त है, पकड़े गए हो तो अपने को बेगुनाह साबित करने में बरसों भी लग सकते हैं और यह भी हो सकता है कि 2-3 दिन में छूट जाओ.’’

‘‘करण साहब, अभय बेगुनाह हैं यह बात तो उन की कंपनी भी कह रही है. केवल क्लाइंट का आरोप है कि उन्होंने 30 हजार डौलर का फ्रौड किया है. कंपनी तो सारी डिटेल चैक कर क्लाइंट को एक निश्चित समय पर पैसा भी देने को तैयार है, हालांकि उस के लिए अभय को भी पैसे भरने पड़ेंगे. बस 1-2 दिन में मैं इन्हें यहां से निकाल लूंगा,’’ अभय के वकील ने कहा.

‘‘अगर ऐसा है तो अच्छा ही है. मैं भी चाहता हूं कि हमारे देशवासी बदनाम न हों.’’

‘‘लेकिन तुम्हारी वाइफ को हम क्या उत्तर दें? वह बारबार हमें फोन कर रही है. उस ने तो पुलिस को इन्फौर्म करने को भी कहा है,’’ अपनी टूटीफूटी हिंदी में कंपनी के मालिक जोन ने पूछा.

‘‘सर, आप प्लीज उसे कुछ न बताएं. मैं नहीं चाहता कि मेरी वाइफ मुझे बेईमान समझे. वह मुझे छोड़ कर चली जाएगी. हो सकता है वह मेरे जेल में होने की बात सुन डाइवोर्स ही ले ले. नो, नो, सर, डौंट टैल हर ऐनीथिंग ऐंड ट्राई टू अवौइड हर फोन काल्स. मैं उस की नजरों में गिरना नहीं चाहता हूं.’’

‘‘पर वह तो यहां आने की बात कर रही थी. हम उसे कैसे रोक सकते हैं?’’

जोन की बात सुन कर अभय के चेहरे पर पसीने की बूंदें झिलमिला उठीं. वह जानता था कि अपने को निर्दोष साबित करने के लिए पहले उसे डिलीट हुए डेटा को कैसे भी दोबारा जैनरेट करना होगा और वह करना इतना आसान नहीं था. 30 हजार डौलर उस के पास नहीं थे, जो वह चुका पाता. कंपनी भी इसी शर्त पर चुकाने वाली थी कि हर महीने उस की सैलरी से अमाउंट काटा जाएगा. वह जानता था कि वह इस समय चारों ओर से घिर चुका है. कंपनी वाले बेशक उस के साथ थे और वकील भी पूरी कोशिश कर रहा था, पर उसे रीवा की बहुत फिक्र हो रही थी. इतने दिनों से उस ने कोई फोन नहीं किया था, इसलिए वह तो अवश्य घबरा रही होगी. हालांकि अभय की कुलीग का कहना था कि उसे रीवा को सब कुछ बता देना चाहिए. इस से उसे कम से कम अभय के ठीकठाक होने की खबर तो मिल जाएगी. हो सकता है वही कोई रास्ता निकाल ले.

मगर अभय इसी बात को ले कर भयभीत था कि कहीं रीवा उसे गलत न समझ बैठे. जितना आदरसम्मान और प्यार वह उसे करती है, वह कहीं खत्म न हो जाए. वह भी रीवा से इतना प्यार करता है कि किसी भी हालत में उसे खोना नहीं चाहता. इंडिया में बैठी रीवा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. अभय की खोजखबर कैसे ले. इस बारे में उस ने अपने मौसा से बात की. वे आईएफएस में थे और इस समय अमेरिका में पोस्टेड थे. उन्होंने सलाह दी कि रीवा को सिंगापुर जाना चाहिए.

सिंगापुर पहुंच कर रीवा ने जब कंपनी में कौंटैक्ट किया तो सच का पता चला. बहुत बार चक्कर लगाने और जोन से मिलने पर ही वह इस सच को जान पाई. सचाई जानने के बाद उस के पांव तले की जैसे जमीन खिसक गई. अभय को बेईमान मानने को उस का दिल तैयार नहीं था, पर पल भर को तो उसे भी लगा कि जैसे अभय ने उसे धोखा दिया है. अपने मौसा को उस ने सारी जानकारी दी और कहा कि वही इंडियन हाई कमीशन को इस मामले में डाल कर अभय को छुड़वाएं.

रीवा को अपने सामने खड़ा देख अभय सकपका गया, ‘‘तुम यहां कैसे…? कब आईं… मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था, इसलिए कुछ नहीं बताया… मेरा यकीन मानो रीवा मैं बेईमान नहीं हूं… तुम नहीं जानतीं कि मैं यहां कितना अकेला पड़ गया था…’’ घबराहट में अभय से ठीक से बोला तक नहीं जा रहा था.

‘‘मुझे तुम पर यकीन है अभय. चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा.’’

रीवा के मौसा के इन्फ्लुअंस और इंडियन हाई कमीशन के दखल से अगले 2 दिनों में अभय जेल से बाहर आ गया.

‘‘रीवा, आई ऐम रियली सौरी. पर मैं डर गया था कि कहीं तुम मुझे छोड़ कर न चली जाओ.’’

‘‘सब भूल जाओ अभय… मैं ने तुम्हारा हाथ छोड़ने के लिए नहीं थामा है. लेकिन अब तुम सिंगापुर में नहीं रहोगे. इंडिया चलो, वहीं कोई नौकरी ढूंढ़ लेना. हम कम में गुजारा कर लेंगे, पर रहेंगे साथ. कंपनी के पैसे कंपनी से हिसाब लेने पर चुका देंगे. कम पड़ेंगे तो कहीं और से प्रबंध कर लेंगे. लेकिन अब मैं तुम्हें यहां अकेले नहीं रहने दूंगी. दूसरे देश में पैसा कमाने से तो अच्छा है कि अपने देश में 2 सूखी रोटियां खा कर रहना. कम से कम वहां अपने तो होते हैं. इस पराए देश में तुम कितने अकेले पड़ गए थे. जितनी जल्दी हो यहां से चलने की तैयारी करो.’’

रीवा के हाथ को मजबूती से थामते हुए अभय ने जैसे अपनी सहमति दे दी. वह खुद भी इस लौंग डिस्टैंस रिश्ते से निकल रीवा के साथ रहना चाहता था.

Romantic Story: रंग और रोशनी – शादी की बात सुन प्रिया सकपका क्यों गई?

Romantic Story: मनीष अपनी पत्नी मुक्ता के साथ बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दफ्तर में बीते दिन के  कुछ रोचक पल मुक्ता को सुना रहा था. मुक्ता भी उस के साथ अपने दिन भर के अनुभव बांट रही थी. अरेंज्ड मैरिज और नईनई गृहस्थी के अनुभव. बहुत कुछ था दोनों के बीच साझा करने को.

‘‘वाह, एक तो तुम्हारे हाथ के बने समोसे और वे भी एअर फ्रायर में. स्वाद भी और सेहत भी. एक अच्छी पत्नी का फर्ज तुम बढि़या ढंग से निभा रही हो.’’

मनीष के कथन पर मुक्ता शरमाते हुए हंसी ही थी कि तभी मनीष का दोस्त गोपाल आ गया.

‘‘आओ गोपाल, बैठो. मुक्ता 1 कप चाय गोपाल के लिए भी हो जाए.’’

मनीष के कहते ही मुक्ता फुरती से रसोई की ओर चल दी.

‘‘क्या दोस्त, मेरे आते ही भाभी को भगा दिया? खैर, अच्छा ही किया. आज मैं तुझे एक समाचार देने आया हूं. तेरी प्रिया अपनी मां के घर वापस आ गई है. मुझे आज बाजार में मिली थी. मैं ने जैसे ही तेरे बारे में खबर दी तो, वह तेरा फोन नंबर मांगने लगी… कहने लगी उस का फोन चोरी हो गया था, इसलिए तेरा नंबर खो गया.’’

आगे गोपाल ने क्या कहा, वह मनीष को सुनाई नहीं दिया. वह तो प्रिया का नाम सुनते ही अतीत की गहरी खाई में गिरता चला गया. 6 माह पहले तक इस नाम के इर्दगिर्द ही उस का पूरा जीवन सिमटा था. उस की प्रिया, उस की जान, उस का प्यार…

कमल की पार्टी में प्रिया अलग ही चमक रही थी. कौन था ऐसा पार्टी में जिस की नजर उस पर न पड़ी हो. मनीष अपने शरमीले स्वभाव के कारण बस दूर से ही उसे निहार कर खुश था. पर पार्टी के बाद जब पता चला कि प्रिया का घर मनीष के रास्ते में आता है, तो उसे घर छोड़ने का काम उस ने सहर्ष स्वीकार लिया. प्रिया की आंखों और मुसकराहट में भी तो कुछ महसूस किया था उस ने. रास्ते में पता चला कि प्रिया कालेज में पढ़ती है. मनीष कालेज की पढ़ाई के बाद प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहा था.

‘‘तब तो तुम बहुत मेधावी होगे. मुझे जो समझ न आया करे उसे क्या तुम से समझने आ जाया करूं?’’

‘‘जब तुम्हारा मन करे,’’ मनीष ने बिना देर किए कहा. आखिर अंधा क्या चाहे 2 आंखें.

मनीष अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उस के पिताजी नौकरी के सिलसिले में अकसर दौरे पर रहते थे और मां इतनी सीधी थीं कि प्रिया का घंटों मनीष के कमरे में रहना उन्हें जरा भी नहीं अखरता था. प्रिया के घर जाने में मनीष को किसी बहाने की जरूरत न थी. प्रिया की मां अकसर घर से बाहर रहती थीं. पति से उन का तलाक हो चुका था.

धीरे-धीरे मनीष और प्रिया के संबंधों में प्रगाढ़ता आने लगी. कुछ दोष उम्र का भी था. कच्ची उम्र, सतरंगी सपने. बिना आई लव यू कहे भी दोनों एकदूसरे को अपने दिल का हाल सुनाने में सक्षम थे. दोनों को एकदूसरे का साथ बहुत भाता. जब साथ न

होते तब व्हाट्सऐप पर हरपल की खबर रहती. प्रिया मनीष की हर बात में अपनी हां मिलाती. मनीष उसे नित नए कपड़े, नेलपौलिश, लिपस्टिक, परफ्यूम इत्यादि देता रहता. यहां तक कि प्रिया की औनलाइन शौपिंग के लिए उसे क्रैडिट कार्ड भी मनीष ने ही दिया था. इस के बदले में प्रिया ने मनीष की हर कमी को पूरा कर दिया था. उस ने कभी मनीष को स्वयं को हाथ लगाने से नहीं रोका था. शायद मनीष का शरमीला स्वभाव उसे आगे बढ़ने की स्वीकृति नहीं देता यदि प्रिया ने उस दोपहर अपने अकेले घर में स्वयं को मनीष को न सौंप दिया होता. उस अनुभव के बाद मनीष का मन प्रिया के बिना कहीं लगता ही नहीं था. दोनों एकदूसरे के घर, कमरे में एकांत तलाशते. एकदूसरे के बिना स्वयं को अकेला पाते.

‘‘प्रिया, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम्हारे मेरी जिंदगी में आने से पहले मेरा जीवन कितना सूना था. तुम ने उस में रंग और रोशनी भर दी.’’

मनीष प्रिया के प्रेम की लहर में बह जाता-

‘‘जीना हराम कर रखा है मेरी इन आंखों ने,

खुली हों तो तलाश तेरी और बंद हों तो ख्वाब तेरे.’’

इस प्रेम का असर मनीष की निजी जिंदगी में तो हो ही रहा था, उस की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा था. उस की प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में न तो वह लगन थी और न ही मेहनत, जिस की जरूरत होती है. प्रिया की सूरत और उस के सपने कभी उसे अकेला न छोड़ते. इस का नतीजा यह रहा कि वह परीक्षा में असफल रहा. अब चूंकि घर पिताजी की पेंशन पर चल रहा था, इसलिए मनीष को जेबखर्ची, क्रैडिट कार्ड इत्यादि सब बंद करने पड़े.

मनीष को आज भी अच्छी तरह याद है जब उस के मित्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण रह जाने पर अफसोस करने आए थे. सब के साथ प्रिया भी आई थी पर उस के चेहरे पर अफसोस का कोई भाव न था, बल्कि जब उस के एक मित्र ने यह कहा कि मनीष प्रिया के कारण परीक्षा में पूरी मेहनत न कर सका तो कितनी बेहयाई से हंसते हुए उस ने कहा था कि वाह, एक तो फेल हो गए, उस पर तुर्रा यह कि इलजाम किसी और के सिर मढ़ दो. यह अच्छा है यानी उस के स्वर में हमदर्दी की जगह व्यंग्य था.

मनीष को प्रिया की यह बात बुरी अवश्य लगी थी, पर वह इसे प्रिया का अल्हड़पन समझ कर टाल गया था. अभी तक उस ने प्रिया से अपने जीवन का हिस्सा बनने की बात भी कहां छेड़ी थी. जब वह उस के जीवन में शामिल हो जाएगी, तभी तो एक की स्थिति की जिम्मेदारी दूसरे की भी होगी. उसे विश्वास था कि प्रिया के साथ से वह जीवन में अवश्य सफल होगा. इसीलिए जल्द ही बिना देर किए मनीष ने प्रिया के समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया.

प्रिया स्तब्ध सी उसे देखती रह गई. फिर उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो मनीष? माना कि तुम मुझे अच्छे लगते हो,

पर शादी? शादी की क्या जरूरत है, मैं तो तुम्हारी हूं ही.’’

‘‘पर प्रिया ऐसे कब तक चलेगा? मेरे मातापिता मेरी शादी की सोचेंगे और आखिर तुम्हारी मां भी कब तक इंतजार करेंगी. उन्हें भी तो तुम्हारी शादी की चिंता होगी. मैं ने सोचा है कि कोई छोटीमोटी नौकरी तो मुझे मिल ही जाएगी. पिताजी ने एक जगह बात चलाई है, छोटी ही सही पर गृहस्थी का बोझ मैं उठा लूंगा.’’

‘‘छोटीमोटी नौकरी? समझने की कोशिश करो मनीष… पैसे के बिना जीवन क्या है? देखो, आजकल तुम न तो मुझे कोई उपहार दे पाते हो और न ही मेरी खरीदारी करा पाते हो. ऐसे में भला शादी की कैसे सोच सकते हो? वैसे भी शादी का मतलब है खाना पकाना, घर संभालना, बच्चे पैदा करना और फिर उन का पालनपोषण और भविष्य की चिंता में घुलते रहना. बदले में एक ढर्रे की जिंदगी. मुझे इन सब से चिढ़ है. मैं एक स्वतंत्र विचारों की लड़की हूं. मेरी मां को ही देख लो. आज अकेले कितनी प्रसन्न और मस्त हैं. मैं भी वैसा ही जीवन चाहती हूं.’’

प्रिया के इस उत्तर ने मनीष को निरुत्तर कर दिया. उस दिन के बाद से मनीष को न जाने ऐसा क्यों लगने लगा जैसे प्रिया उस से कतराने लगी है, जैसे उस का व्यवहार ठंडा पड़ने लगा है, वह उस से किनारा करने लगी है. वह कई दिनों तक उस से न मिलती, न ही फोन पर संपर्क करती. कहीं टकरा जाने पर बहानों की कतार लगा देती, ‘‘बस इतना ही जान पाए अपनी प्रिया को तुम मनीष? मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं? मैं स्वयं को भूल सकती हूं पर तुम मेरी हर सांस में बसते हो…’’

बात इमोशनल ब्लैकमेल तक पहुंच जाती. मनीष पूछना चाहता कि इतनी चाहत है, तो छलकती क्यों नहीं है तुम्हारे चेहरे पर? पर डरता था कि कहीं बात साफ करतेकरते वह प्रिया को खो न बैठे. उसे इंतजार मंजूर था पर अपने सुनहरे स्वप्नों की उड़ान में दरार नहीं.

‘प्रिया को पाने से पहले मुझे जीवन में कुछ और बुलंदियां भी हासिल करनी होंगी,’ सोच उस नेएक बार फिर प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. अब की बार उस ने शुरू से ही पूरा परिश्रम करने की ठानी थी. कभीकभार फोन पर प्रिया से बात कर वह स्वयं को हलका महसूस कर लेता था.

फिर एक दिन प्रिया ने बताया, ‘‘मैं अपने मामा के घर जा रही हूं… तुम यों परेशान हो रहे हो जैसे मेरी शादी हो रही है. तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारे बिना खुश रह सकूंगी? पर मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूं. मेरे यहां रहते तुम पढ़ाई में मन नहीं लगा पाओगे. यह हमारी परीक्षा की घड़ी है. मनीष इस में हमें पास हो कर दिखाना है.’’

बड़ी मुश्किल से मनीष का मन शांत हो पाया था.

प्रिया के जाने के बाद सुहावना मौसम भी बोझिल लगता. मानो अंदर का बुझापन बाहर की रौनक पर हावी हो गया हो. लेकिन समय अपनी गति कब छोड़ता है? परीक्षा की तारीख पास आ रही थी. किसी तरह मनीष ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया. पर प्रिया के पत्र का इंतजार उसे रोज रहता. अंतत: 3 महीने बाद उस का पत्र आया. पत्र में प्रिया की मजबूरियों का बखान था…. मनीष के बिना वह कितनी अधूरी थी, कितनी तनहा. प्रिया की तड़प पढ़ कर मनीष की आंखें भर आईं कि क्यों वह बारबार प्रिया के प्यार पर अविश्वास की परत चढ़ा देता है? हर किसी का प्यार करने और जताने का ढंग अलगअलग होता है और फिर प्रिया एक लड़की है. कुछ शर्म, कुछ हया उस के व्यक्तित्व का हिस्सा है. जरूरी तो नहीं हर बात कही जाए, कुछ महसूस भी की जाती है. एक सच्ची प्रेमिका पा कर वह स्वयं को धन्य मान रहा था.

परीक्षा समाप्त हो गई. कुछ ही समय बाद परिणाम भी आ गया. इस बार मांपिताजी की प्रसन्नता का ठिकाना न था. घर पर दोस्तों के लिए एक छोटी सी दावत रखी थी. उस शाम मनीष को प्रिया की कमी बहुत खली थी. वह प्रिया को यह खुशखबरी स्वयं सुनाना चाहता था. उस के चेहरे की खुशी को वह अपनी आंखों से देखना चाहता था. फोन पर खबर दे कर वह इस दृश्य को खोना नहीं चाहता था.

मनीष ने कमल से प्रिया का पता मांगते

हुए, जो उस के अलावा प्रिया का भी दोस्त था कहा, ‘‘यार, प्रिया को यह खुशखबरी दे दूं…

सच कहूं तो मैं उस से शादी करना चाहता हूं.

हम दोनों ने अलग रह कर बहुत कठिन परीक्षा दी है. यह त्याग उस ने मेरी सफलता के

लिए दिया और अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं तो…’’

‘‘अरे मनीष, तुम्हारे जैसा सुशील और लायक लड़का प्रिया जैसी तितली के जाल में फंस जाएगा यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था. प्रिया जैसी लड़की सैरसपाटे के लिए ठीक है

पर शादी के लिए नहीं. क्यों अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है?’’

कमल ने मनीष के मन की शांत झील में पहला पत्थर मारा था. उस ने प्रिया के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर मनीष स्तब्ध रह गया.

‘‘प्रिया के प्रियों की संख्या का भान है तुझे? आए दिन वह किसी न किसी से रासलीला रचा रही होती है… उस की मां भी तो वैसी ही,’’ और फिर आगे कुछ कहने के बजाय कमल हंसने लगा.

‘‘बदलता है रंग आसमान कैसेकैसे.’’

मनीष की नायिका अचानक खलनायिका बना दी गई थी. उस के मन में उथलपुथल मची थी कि क्या सच में वह बेवकूफ बन रहा था या प्रिया जैसी प्रेमिका के कारण कमल उस से जल रहा है? उस का मन बेचैन हो उठा था. यह उस के जीवन का अहम निर्णय था. इसलिए उस ने खुद छानबीन करने की ठानी. मनीष ने काफी पूछताछ की. जितनी जानकारी मिलती गई, उस का मन उतना ही खिन्न होता गया. वह कितना पागल था प्रिया के प्यार में. प्रिया की रस घुली बातों में आने में उसे जरा भी देर न लगती थी.

‘‘ख्वाहिशों के काफिले भी बड़े अजीब होते हैं, वे गुजरते वहीं से हैं जहां रास्ते नहीं होते हैं.’’

अब मनीष की सफलता का परिणाम सुन कर शायद प्रिया शादी के लिए फौरन हामी भर

दे. विरह में बीते दिनरातों की व्यथा सुनाए. पर आंखों देखी मक्खी किस से निगली जाती है भला? इसलिए मां के बारबार पूछने पर मनीष ने उन की पसंद की लड़की से शादी के लिए हां कह दी.

उसी सप्ताहांत मनीष अपने मांपिताजी के साथ लड़की देखने उन के घर पहुंचा. लड़की सुंदर थी. उन्हें भी मनीष पसंद आया. रिश्ता पक्का हो गया. किंतु मनीष अपनी जीवनसंगिनी से अपने जीवन का अतीत अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. अत: उस ने मुक्ता से अकेले में बात करने की इच्छा व्यक्त की. संकोचवश मुक्ता कुछ असहज थी.

मनीष ने ही शुरुआत की, ‘‘जब हम दोनों अपना पूरा जीवन साथ गुजारने का निर्णय लेने जा रहे हैं, तो हमें अपना अतीत भी साझा कर लेना चाहिए. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. पहले सुन लो, फिर जो तुम्हारा निर्णय होगा, मुझे मान्य होगा,’’ और फिर मनीष ने मुक्ता को प्रिया के बारे में पूरी ईमानदारी से सब बता दिया.

कुछ क्षण चुप रहने के बाद मुक्ता बोली, ‘‘चलिए, खट्टा ही सही पर आप को प्यार में अपना निर्णय लेने का मौका तो मिला… ताउम्र यह गिला तो नहीं रह जाएगा कि किसी से प्यार ही न कर सके. मेरा भी मन था कि मैं लव मैरिज करूं पर हमारे यहां तो लड़कियों का आंख उठाना भी वर्जित है.’’

‘‘तो तुम क्या इसलिए उदास लग रही हो?’’

मुक्ता चुप रही, लेकिन उस की आंखों ने हामी भर दी थी.

‘‘अच्छा किया तुम ने अपने दिल की बात मुझ से कही. हमारे बीच कोई संकोच नहीं होना चाहिए.’’

‘‘दरअसल, मैं भी चाहती थी कि जो खुशी प्यार में पड़े लोगों को महसूस होती है,

उसे मैं भी अनुभव कर पाती… प्यार में जिंदगी बदल देने वाले वे…’’ बोलते ही मुक्ता रुक गई. फिर जीभ काटते हुए कहने लगी, ‘‘माफ कीजिए, मैं भी पागल हूं, पता नहीं क्याक्या बोल रही हूं.’’

मगर उस की बातें सीधे मनीष के दिल तक पहुंचीं. कितनी साफगोई से मुक्ता ने अपनी ख्वाहिश उस पर जाहिर कर दी थी. ठीक ही तो है मनीष ने अपनी मरजी कर के देख ली और अब मातापिता की इच्छा से शादी कर रहा था. किंतु मुक्ता को अपनी मरजी का अवसर कहां मिला?

मनीष ने उसी दिन से मुक्ता के जीवन में प्यार का रंग और प्यार के  खुमार की रोशनी भरने की जिम्मेदारी उठा ली. उस ने हर प्रयास कर के मुक्ता को प्यार में मिलने वाली हर खुशी दी. यहां तक कि शादी होने तक मुक्ता को लगने लगा कि जैसे उस की लव मैरिज हो रही हो.

सच कहते हैं कि शादियां ऊपर तय होती हैं. यहां जमीन पर तो हम सिर्फ उन का मेल कराते हैं. मनीष और मुक्ता असल मानों में हमसफर बने.

आज गोपाल फिर उसी भूकंप की खबर लाया था, जिस से कभी मनीष का संसार डोल जाया करता था. पर आज वह शांत था. उस का संसार प्रसन्नता के झूले में झूल रहा था और इस की डोर थी मुक्ता के हाथों में. दोनों प्यार में जिंदगी बदल देने वाले रंग और रोशनी अनुभव कर रहे थे.

Romantic Story: नींव – अंजु ने ऐसा क्या किया कि संजीव खुश हो गया?

Romantic Story, लेखक – वैभव जैन

उस दिन करीब 8 साल के बाद मानसी को एक हेयर सैलून से बाहर आते देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. कालेज के दिनों में वह कभी मेरी बहुत अच्छी दोस्त हुआ करती थी. फिर वह एमबीए करने मुंबई चली गई और हमारे बीच संपर्क कम होतेहोते समाप्त हो गया था.

मैं मुसकराता उस के सामने पहुंचा तो उस ने भी मुझे फौरन पहचान लिया. हम ने बड़े अपनेपन के साथ हाथ मिलाया और हंसतेमुसकराते एकदूसरे के बारे में जानकारी का आदानप्रदान करने लगे.

‘‘तुम यहां दिल्ली में कैसे नजर आ रही हो?’’

‘‘मेरे पति को यहां नई जौब मिली है.’’

‘‘क्या पति को घर छोड़ कर केश कटवाने आई हो?’’

‘‘नहीं भई. वे मुझे यहां छोड़ कर किसी दोस्त से मिलने गए हैं. बस, अब लेने आते ही होंगे. तुम बताओ जिंदगी कैसी गुजर रही है?’’

‘‘ठीकठीक सी गुजर रही है.’’

‘‘तुम्हारी पत्नी क्या करती है?’’

‘‘अंजु नौकरी करती है.’’

‘‘तुम तो कहा करते थे कि पत्नी को सिर्फ घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालनी चाहिए. फिर अंजु को नौकरी कैसे करा रहे हो?’’ उस ने हंसते हुए पूछा.

‘‘मैं तो अभी भी यही चाहता हूं कि अंजु घर में रहे पर आज की महंगाई में डबल इनकम का होना जरूरी है.’’

‘‘बच्चे कितने बडे़ हो रहे हैं?’’

‘‘हमारा 1 बेटा है समीर, जो पिछले महीने 6 साल का हुआ है.’’

‘‘उस के लिए भाई या बहन अभी तक क्यों नहीं लाए हो?’’

‘‘अरे, दूसरे बच्चे की बात ही मत छेड़ो. आजकल 1 बच्चे को ही ढंग से पालना आसान नहीं है. तुम अपने बारे में बताओ.’’

‘‘मैं तो कोई जौब नहीं करती हूं. पति सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं. 3 साल अहमदाबाद में रहे. अब यहां दिल्ली की एक कंपनी में जौब शुरू करने के कारण 2 महीने पहले यहां आए हैं. अभी तक मन नहीं लग रहा था पर अब तुम मिल गए हो तो अकेलेपन का एहसास कम हो ही जाएगा. कब मिलवा रहे हो अंजु और समीर से, संजीव?’’

‘‘बहुत जल्दी मिलने का कार्यक्रम बना लेते हैं. तुम ने अपने बच्चों के बारे में तो कुछ बताया नहीं,’’ मैं ने जानबूझ कर विषय बदल दिया.

‘‘मेरी 2 बेटियां हैं – श्वेता और शिखा. श्वेता स्कूल जाती है और शिखा अभी 2 साल की है.’’

‘‘बहुत अच्छा मैंटेन किया हुआ है तुम ने खुद को. कोई देख कर कह नहीं सकता कि तुम 2 बेटियों की मम्मी हो.’’

‘‘थैंकयू, मैं नियम से डांस करती हूं. कोई टैंशन नहीं है, इसलिए स्वास्थ्य ठीक चल रहा है,’’ मेरे मुंह से अपनी प्रशंसा सुन वह खुश हो कर बोली, ‘‘वैसे तुम भी बहुत जंच रहे हो. तुम्हें देख कर कोई भी कह सकता है कि तुम ने जिंदगी में अच्छी तरक्की की है.’’

‘‘थैंकयू, ये शायद तुम्हारे पति ही हमारी तरफ आ रहे हैं,’’ अपनी तरफ एक ऊंचे कद व आकर्षक व्यक्तित्व वाले पुरुष को आते देख कर मैं ने कहा.

आत्मविश्वास से भरा वह व्यक्ति मानसी का पति रोहित ही निकला. उस ने रोहित से मेरा परिचय कालेज के बहुत अच्छे दोस्त के रूप में कराया.

रोहित ने बड़ी गर्मजोशी के साथ मुझ से हाथ मिलाया. फिर हम दोनों एकदूसरे के काम के विषय में बातें करने लगे.

मानसी अब चुप रह कर हमारी बातें सुन रही थी.

करीब 15 मिनट बातें करने के बाद रोहित ने विदा लेने को अपना हाथ आगे बढ़ा दिया और बोला, ‘‘संजीव, तुम्हें अपनी वाइफ और बेटे के साथ हमारे घर बहुत जल्दी आना ही है. मानसी को अपने शहर में बोर मत होने देना.’’

‘‘हम बहुत जल्दी मिलते हैं,’’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अपना मोबाइल नंबर तो दो, नहीं तो एकदूसरे के संपर्क में कैसे रहेेंगे?’’ मानसी को याद आया तो हम ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिया.

वे दोनों अपनी कार में बैठे और हाथ हिलाते हुए मेरी आंखों से ओझल हो गए.

मैं ने डिपार्टमैंटल स्टोर से घर का सामान खरीदा और अपनी 2 साल पुरानी कार से घर आ गया.

‘‘आप कहां अटक गए थे? मुझे मशीन लगानी थी पर बिना वाशिंग पाउडर के कैसे लगाती?’’ अंजु मुझे देखते ही नाराज हो उठी.

‘‘मशीन अब लगा लो. खाना देर से खा लेंगे,’’ मैं ने उसे शांत करने के लिए धीमी आवाज में जवाब दिया.

‘‘कितनी आसानी से कह दिया कि मशीन अब लगा लो. मैं नहा चुकी हूं और समीर को तो सही वक्त पर खाना चाहिए ही न. अब खाना बनाऊं या मशीन लगाऊं?’’ उस का गुस्सा कम नहीं हुआ था.

‘‘इतनी गुस्सा क्यों हो रही हो? तुम मशीन लगा लो, आज लंच करने बाहर चलते हैं.’’

‘‘अपना पेट खराब करने के लिए मुझे बाहर का खाना नहीं खाना है. आप यह बताओ कि अटक कहां गए थे?’’

‘‘अटका कहीं नहीं. ऐसे ही विंडो शौपिंग करते हुए समय का अंदाजा नहीं रहा,’’ न जाने क्यों उसे मानसी और रोहित से हुई मुलाकात के बारे में उस समय कुछ बताने को मेरा मन नहीं किया.

अंजु ड्राइंगरूम में समीर द्वारा फैलाई चीजें उठाने के काम में लग गई. अब उस का ध्यान मेरी तरफ न होने के कारण मैं उसे ध्यान से देख सकता था.

कितना फर्क था मानसी और अंजु के व्यक्तित्व में. शादी होने के समय वह आकर्षक फिगर की मालकिन होती थी, पर अब उस का शरीर काफी भारी हो चुका था. चेहरे पर तनाव की रेखाएं साफ पढ़ी जा सकती थीं. उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. समीर के होने के समय से उसे पेट और कमर दर्द ने एक बार घेरा तो अब तक छुटकारा नहीं मिला है.

अंजु की मानसी से तुलना करते हुए मेरा मन अजीब सी खिन्नता महसूस कर रहा था. रोहित और हमारे आर्थिक स्तर में खास अंतर नहीं था. पर हमारी पत्नियों के व्यक्तित्व कितने विपरीत थे.

मेरा चेहरा सारा दिन मुरझाया सा रहा. रात में भी ढंग से नींद नहीं आई. मानसी का रंगरूप आंखों के सामने आते ही बगल में लेटी अंजु से अजीब सी चिढ़ हो रही थी.

किसी से अपनी हालत की तुलना कर के दिमाग खराब करने का कोई फायदा नहीं होता है. खुद को बारबार ऐसा समझाने के बाद ही मैं ढंग से सो पाया था. मेरे पास मानसी का 2 दिन बाद ही औफिस में लंच के समय फोन आ गया.

‘‘अपने घर का पता बताओ. हम आज रात को अंजु और समीर से मिलने आ रहे हैं,’’ उस की यह बात सुन कर मैं बहुत बेचैन हो उठा.

‘‘आज मत आओ. अंजु को अपने भाई के यहां जाना है,’’ मैं ने झूठ बोल कर उन के आने को टाल दिया.

‘‘चलो, उन से मिलने फिर किसी और दिन आ जाएंगे पर तुम अपना पता तो लिखवा ही दो.’’

मैं उसे घर बुलाना नहीं चाहता था पर मजबूरन उसे अपना पता लिखवाना पड़ा. मैं ने उस से ज्यादा बातें नहीं कीं. कहीं मन ही मन मैं ने यह फैसला कर लिया कि मैं उन के साथ ज्यादा घुलनेमिलने से बचूंगा.

फिर मैं शनिवार की शाम को औफिस से घर पहुंचा तो वे दोनों मुझे ड्राइंगरूम में बैठे मिले. अंजु उन से बातें कर रही थी. मानसी के सामने वह बहुत साधारण सी नजर आ रही है, ऐसी तुलना करते ही मेरा मन उखड़ सा गया.

तभी मैं एकदम चुपचुप सा हो गया. मेरे मुकाबले अंजु उन दोनों से वार्त्तालाप करने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से निभा रही थी.

मानसी ने अचानक मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘इतने उदास क्यों दिख रहे हो, संजीव?’’

‘‘सिर में दर्द हो रहा है. आज औफिस में काम कुछ ज्यादा ही था,’’ मुझे यों झूठ बोलना पड़ा तो मेरा मन और बुझाबुझा सा हो गया.

रोहित ने मेरे बेटे समीर से बहुत अच्छी दोस्ती कर ली थी. मानसी अंजु के साथ खूब खुल कर हंसबोल रही थी. बस मैं ही खुद को उन के बीच अलगथलग सा महसूस कर रहा था.

उन दोनों को रोहित के किसी मित्र के घर भी जाना था, इसलिए वे ज्यादा देर नहीं बैठे और हमें जल्दी अपने घर आगामी रविवार को आने का निमंत्रण देने के बाद चले गए.

उन के जाने के बाद मैं बहुत चिड़चिड़ा हो गया. मैं ने उन से ज्यादा तअल्लुकात न रखने का फैसला करने में ज्यादा वक्त नहीं लिया.

‘‘ये अच्छे लोग हैं. दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा है,’’ अंजु के मुंह से उन दोनों की तारीफ में निकले इन शब्दों को सुन कर मैं अपनी चिढ़ व नाराजगी को नियंत्रण में नहीं रख सका.

‘‘यार, इन लोगों की बात मुझ से मत करो. ये बनावटी लोग हैं. इन की सतही चमकदमक से प्रभावित न होओ. ऐसे लोगों के साथ मित्रता बढ़ा कर सिर्फ दुख और परेशानियां ही हासिल होती हैं,’’ मैं ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘क्या कालेज के दिनों में आप मानसी के बहुत अच्छे दोस्त नहीं थे?’’ मुझे यों अचानक उत्तेजित होता देख कर वह हैरान नजर आ रही थी.

‘‘मानसी मेरे एक अच्छे दोस्त नवीन की प्रेमिका थी. इस कारण मुझे उसे सहन करना पड़ता था. जब मानसी का उस के साथ चक्कर खत्म हो गया, तब मैं ने उस के साथ बोलना बिलकुल खत्म कर दिया था. वह न तब मुझे पसंद थी और न आज.’’

‘‘मुझे तो दोनों अच्छे इंसान लगे हैं. क्या अगले संडे हम उन के घर नहीं जाएंगे?’’

‘‘नहीं जाएंगे और अब कोई और बात करो. हमें नहीं रखना है इन के साथ ज्यादा संबंध,’’ रूखे से अंदाज में उसे टोक कर मैं ने मानसी और रोहित के बारे में चर्चा खत्म कर दी.

अंजु ने फिर उन दोनों के बारे में कोई बात नहीं की. सच तो यह है कि वह मुझे ज्यादा खुश नजर आ रही थी. उस ने बड़े प्यार से मुझे खाना खिलाया और सोने से पहले सिर की मालिश भी की.

अगले दिन अंजु ने मुझे सुबह उठा कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘उठिए, सरकार. आज से हम दोनों रोज नियमित रूप से घूमने जाया करेंगे.’’

‘‘यार, तुम्हें जाना हो तो जाओ पर मुझे सोने दो,’’ मैं ने फिर से रजाई में घुसने की कोशिश की.

‘‘नहीं जनाब, ऐसे नहीं चलेगा. अगर आप मेरा साथ नहीं देगे तो मैं और मोटी हो जाऊंगी. क्या आप मुझे मानसी की तरह सुंदर और स्मार्ट बनता नहीं देखना चाहते हो?’’

अंजु की बात सुन कर मैं उठ बैठा और फिर बोला, ‘‘तुम उस के जैसा नकली पीतल नहीं, बल्कि खरा सोना हो. बेकार में उस के साथ अपनी तुलना कर के टैंशन में मत आओ.’’

अंजु ने अपनी बांहों का हार मेरे गले में डाल कर कहा, ‘‘टैंशन में मैं नहीं, बल्कि आप नजर आ रहे हो.’’

‘‘मैं टैंशन में नहीं हूं,’’ मैं ने उस से नजरें चुराते हुए जवाब दिया.

‘‘मैं आप के हर मूड को पहचानती हूं, जनाब. मुझ से कुछ भी छिपाने की कोशिश बेकार जाएगी.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘मतलब यह कि मेरी मानसिक सुखशांति की खातिर आप की झूठ बोलने की आदत बहुत पुरानी है.’’

‘‘तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है. मैं ने कब तुम से झूठ बोला है?’’

अंजु ने हलकेफुलके अंदाज में जवाब दिया, ‘‘मैं बताती हूं. जब हमारे पास कार नहीं थी तो आप कार की कितनी बुराई करते थे. कार के पुरजे महंगे आते हैं, सर्विसिंग महंगी होती है, पैट्रोल का खर्चा बहुत बढ़ जाता है, मुझे ड्राइव करना अच्छा नहीं लगता और भी न जाने आप क्याक्या कहते थे.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रही हो?’’

‘‘पहले एक और बात सुनो और फिर मैं आप के सवाल का जवाब दूंगी.

जब समीर के ऐडमिशन का समय आया तो आप महंगे पब्लिक स्कूलों के कितने नुक्स गिनाते थे. वहां पढ़ने वाले अमीर मांबाप के बच्चे छोटी उम्र में बिगड़ जाते हैं, बच्चे को अच्छे संस्कार घर में मिलते हैं स्कूल में नहीं, जैसी दलीलें दे कर आप ने मेरे मन को शांत और खुश रखने की सदा कोशिश की थी.’’

‘‘मैं जो कहता था वह गलत नहीं था.’’

‘‘मैं यह नहीं कह रही हूं कि आप गलत कहते थे.’’

‘‘मैं वही कह रही हूं, जो मैं ने शुरू में कहा था. मेरे मन की सुखशांति के लिए आप दलीलें गढ़ सकते हो, लेकिन ऐसे मौकों पर आप की जबान जो कहती है वह आप की आंखों के भावों से जाहिर नहीं होता है.’’

‘‘तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं.’’

‘‘देखिए, जब आप कार की बुराई करते थे तब हम कार नहीं खरीद सकते थे. लेकिन जब कार घर में आई तो आप कितने खुश हुए थे.

फिर जब समीर को अच्छे स्कूल में ऐडमिशन मिल गया तो भी आप की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था.’’

‘‘अब यह भी समझा दो कि तुम ये पुरानी बातें आज क्यों उठा रही हो?’’

‘‘क्योंकि आज भी आप की जबान पर कुछ और है और दिल में कुछ और. आज भी मेरे मन के सुकून की खातिर आप मानसी जैसी सुंदर, स्मार्ट महिला की बुराई कर रहे हो. लेकिन कल रात मैं ने देखा था कि जब भी आप सहज हो कर उस से बातें करते थे तो आप की आंखें खुशी से चमक उठती थीं.’’

‘‘सचाई यह भी है कि मानसी के मुकाबले मैं मोटी और अनाकर्षक लगती हूं. तभी अपनी पुरानी आदत के अनुरूप आप ने अपना सुर बदल लिया है. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘लेकिन आप मुझे हीनभावना का शिकार बनने से बचाने के लिए न मानसी की बुराई करो और न ही उन के साथ परिचय गहरा करने से कतराओ. कार और समीर के ऐडमिशन का संबंध हमारी माली हालत से था पर यह मामला भिन्न है. मैं भली प्रकार समझती हूं कि अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रयास मुझे ही करना होगा. तभी मैं ने अपने में बदलाव लाने की कमर कस ली है.

‘‘आप बनावटी व्यवहार से मुझे झूठी तसल्ली दे कर मेरे मन की सुखशांति बनाए रखने की चिंता छोड़ दो. आप के सहज अंदाज में खुश रहने से ही हमारे बीच प्यार की नींव मजबूत होगी.

‘‘आप के सहयोग से मैं अपने लक्ष्य को बहुत जल्दी पा लूंगी. इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि कुछ देर और सोने का लालच त्याग कर मेरे साथ घूमने चलिए.’’

‘‘यार, तुम तो बहुत समझदार हो,’’ मैं ने दिल से उस की प्रशंसा की.

‘‘और प्यारी भी तो कहो,’’ अंजु इतरा उठी.

‘‘बहुतबहुत प्यारी भी हो… मेरे दिल की रानी हो.’’

‘‘थैंकयू. अगले संडे हम मानसी के घर चलेंगे न?’’

‘‘श्योर.’’

‘‘और अभी मेरे साथ पार्क में घूमने चल रहे हो न?’’

‘‘जरूर चल रहा हूं पर वैसे इस वक्त मैं तुम्हारे साथ कहीं और होना चाहता हूं,’’ मेरी आवाज नशीली हो उठी.

‘‘कहां?’’

‘‘इस रजाई की गरमाहट में.’’

‘‘अभी सारा दिन पड़ा है. पहले पार्क चलो,’’ मेरी आंखों में प्यार से झांकते हुए अंजु का चेहरा लाजशर्म से लाल हो उठा तो वह मेरी नजरों में संसार की सब से खूबसूरत औरत बन गई थी.

Romantic Story: चाय पे बुलाया है – क्या मनीष के हसीन ख्वाब पूरे हुए?

Romantic Story: यह मेरी नजरों का धोखा था या मैं वाकई निराश होता जा रहा था. क्या करूं, उम्र भी तो हो चली थी. 38 वर्ष की आयु तक पहुंचते हुए मैं ने अच्छीखासी प्रोफैशनल उन्नति प्राप्ति कर ली थी. कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हुए मैं ने बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर का पद प्राप्त कर लिया. अब एक प्रतिष्ठित सरकारी बैंक में ब्रांच प्रबंधक के तौर पर पदासीन था. अपना घर भी बना लिया और बड़ी गाड़ी भी ले ली थी. अच्छीखासी शक्लसूरत भी थी, घरपरिवार भी संपन्न था पर शादी नहीं हुई. सभी पूछते, कब सुना रहे हैं खुशखबरी, साहब? क्या कहता? कोई उत्तर नहीं, कोई कारण भी नजर नहीं आता था. पता नहीं बात क्यों नहीं बनी थी अब तक. हंस कर टाल जाता कि जब सलमान खान शादी करेगा, तब मैं भी खुशखबरी सुना दूंगा. पर अब लगने लगा था कि शायद मैं सलमान खान को पीछे छोड़ दूंगा.

कुछ दिनों से देख रहा था कि सामने वाली बिल्ंिडग में रहने वाली सुंदरसुकोमल लड़की मुझे देख मुसकराती थी. आखिर रोजरोज तो गलतफहमी नहीं हो सकती थी.

एक दिन दफ्तर जाने के लिए जब नीचे उतरा तब भी देखा था कि वह अपनी बालकनी में खड़ी मुझे देख रही थी. अगले दिन भी और उस के अगले दिन भी. हिरनी सी बड़ी, कजरारी आंखों में मृदुल सौम्यता, कोमल कपोलों पर छिटका गुलाबी रंग और रसभरे होंठों पर खेलती हलकी मुसकान, इतना लावण्य किसी की दृष्टि से छिप सकता था भला. जाहिर था, मैं ने भी देखा. एक और खास बात होती है दृष्टि में, चाहे कोई हमारी पीठ पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हो, हमें पता चल जाता है. हम घूम कर उस देखने वाले को देख लेते हैं. यह प्रकृति का कैसा अनूठा रहस्य है, इसे मैं आज तक समझ नहीं पाया. तभी तो तीसरी मंजिल से मुझे देखती उस सुंदरी तक मेरी दृष्टि खुद ही पहुंच गई थी.

मैं झिझकता रहा और उस की हलकी, अधूरी मुसकान का कोई प्रतिउत्तर नहीं दे पाया था. परंतु उस दिन तो हद हो गई. वह मेरे दफ्तर जाने वाले समय पर लिफ्ट में भी साथ ही आ गई.

‘‘हैलो,’’ अपनी जानलेवा मुसकान के साथ वह मुझ से बोल उठी. अभी तक सिर्फ सूरत देखी थी पर कहना पड़ेगा, जितनी मोहक सूरत उतनी ही कातिल शारीरिक संरचना भी थी. ऊंची आकर्षक कदकाठी, सुडौल बदन, कमर तक लंबे बाल.

मर्दों की एक विशेषता होती है कि वे एक ही नजर में औरत के सौंदर्य को नापने की क्षमता रखते हैं. मैं ने जल्दी उस पर टिकी अपनी दृष्टि हटा ली और अपनी विस्फारित आंखों को भी नियंत्रण में किया. कहीं मेरा गलत प्रभाव न पड़ जाए उस पर.

‘‘हैलो,’’ मैं ने हौले से कहा. मुझे डर था कि कहीं मेरा उतावलापन उसे डरा न दे. बस, एक हलकी सी मुसकराहट रखी चेहरे पर. फिर वह सब्जी लेने दुकान में चली गई और मैं गाड़ी में सवार हो अपने दफ्तर. पर सारे रास्ते आज सिर्फ मेरा रेडियो नहीं चला, पूरा गला खोल कर हर प्रेमभरा गीत मैं ने भी गाया रेडियो के साथ. एक अजीब सा रोमांच छा रहा था मेरे ऊपर. बैंक में भी लोगों ने पूछ डाला, ‘‘क्या बात है, साहब, आज आप बहुत प्रसन्न लग रहे हैं?’’ क्या बताऊं कि क्या बात थी. पर खुश तो था मैं.

देर शाम घर लौटते समय दिल हुआ कि आइसक्रीम लेता चलूं. घर पर मां भी हैरान हुई थीं, ‘‘आज आइसक्रीम?’’

‘‘यों ही, बस.’’

‘‘क्या बात है, बहुत खुश लग रहा है. काम बढ़ गया है इसलिए?’’ मां ने तंज किया था. मुझे घर वाले वर्कोहोलिक पुकारते. अब तक मेरी शादी न होने का जिम्मेदार भी वे मेरे काम, काम और बस काम करने को ही ठहराते थे.

‘‘कहा न, यों ही. मैं आइसक्रीम नहीं ला सकता क्या?’’ मेरे जोर देने पर अब मां चुप हो गई थीं.

‘‘तेरे लिए एक रिश्ता आया है,’’ उन्होंने बात बदलते हुए कहा था.

‘‘कहां से?’’

‘‘वह मन्नो मौसी हैं न, उन की रिश्तेदारी में है लड़की. नौकरी नहीं करती है. मैं ने कह दिया है कि वैसे तो मनीष को नौकरी वाली लड़की चाहिए पर फिर भी तसवीर भिजवा दो. तेरे ईमेल पर भेजी होगी. खुद भी देख ले और हमें भी दिखा दे जरा.’’

वह फोटो वाली लड़की उतनी सुंदर नहीं थी जितनी वह बालकनी वाली. पर यों हवा में, बस मुसकराहट के आदानप्रदान के बदले रिश्ता तो भिजवाया नहीं जा सकता. क्या बताता मां को? बस, मन्नो मौसी वाली लड़की की फोटो दिखला दी. मां को पसंद भी आ गई थी. ‘‘घर में तो ऐसी ही लड़कियां जंचती हैं,’’ मां अब मेरी शादी और टालने के मूड में नहीं थीं.

‘‘थोड़े दिन रुक सकती हो तो रुक जाओ.’’

‘‘क्या होगा थोड़े दिनों में?’’

मैं आशान्वित था कि शायद यहीं इसी सोसाइटी में बात बन जाए. ‘‘अभी काफी काम है दफ्तर में. फिर तुम कहोगी समय निकाल, मिलने चलना है वगैरा.’’ फिलहाल मैं ने बात टाल दी थी.

अगली सुबह फिर लिफ्ट में मिल गई थी वह. ‘‘हैलो,’’ वही कर्णप्रिय स्वर.

‘‘हैलो,’’ आज मेरी मुसकराहट कुछ और फैली हुई थी.

‘‘मेरा नाम सुलोचना है. हम हाल ही में सोसाइटी में शिफ्ट हुए हैं. आप यहां कब से रह रहे हैं?’’

‘‘मैं मनीष हूं. यहां कई वर्षों से रह रहा हूं. वहां छठवीं मंजिल पर, अपने मम्मीपापा के साथ. और आप?’’ मेरे लिए जानना आवश्यक था कि सुलोचना शादीशुदा है या नहीं. नए जमाने की लड़कियां कोई भी शादी का चिह्न नहीं धारण करती हैं, फिर गलतफहमी हो जाए तो किस की गलती.

‘‘मैं भी अपने मम्मीपापा के साथ रहती हूं. कभी घर पर चाय पीने आइए न. बाय,’’ सुकोमल हाथ हिलाती हुई  वह सब्जी लेने दुकान में चली गई थी और मैं गाड़ी में सवार हो, अपने दफ्तर की ओर चल दिया था.

सारे रास्ते मेरे कानों में उसी के सुर गूंजते रहे…कभी घर पर चाय पीने आइए न…मेरे मुंह से खुद ही गीत निकल पड़ा, ‘शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है…’ क्या सचमुच चला जाऊं उस के घर चाय के बहाने? सोचता रहा पर निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था.

अगली सुबह बैंक जाते समय जब सुलोचना फिर लिफ्ट में मुझ से टकराई थी तो कुछ शिकायती लहजे में बोली थी, ‘‘आप कल आए क्यों नहीं चाय पर? कितना इंतजार किया मैं ने?’’

मुझे कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. अब तक मैं शादी के लिए तरसता रहा था और अब यों अचानक एक सुंदरी मुझे चाय पे बुला रही थी, मेरे न आने पर मुझ से रूठ रही थी. उफ, मैं गदगद हो उठा था. ‘‘आज शाम मैं पक्का आऊंगा, यह वादा रहा,’’ कहते हुए मुझे लगा जरा ज्यादा फिल्मी हो गया है. पर अब तो तीर कमान से निकल चुका था. अपनी बात पर हंस कर मैं आगे बढ़ गया.

शाम को बैंक से जल्दी निकल कर, घर जा कर फ्रैश हो कर मैं सुलोचना के घर पहुंच गया. अच्छेभले लोग लगे. बातचीत में सभ्य, चाय के साथ जिद कर के पकौड़े भी परोसे. ‘‘सुलोचना ने बनाए हैं,’’ उस की मम्मी का कहना मुझे बहुत अच्छा लगा था. मम्मी और सुलोचना तो काफी हंसबोल रहे थे. बस, उस के पापा जरा गंभीर थे. मानो मेरे पूछने को प्रतीक्षारत थे, फौरन बिफर पड़े थे, ‘‘अरे जनाब, यह मोदी सरकार के फैसले ने जो डीमोनेटाइजेशन किया है उस ने जीना हराम कर दिया है. अब बताइए, पैसा होते हुए भी हम पैसेपैसे को मुहताज हो गए हैं. क्या फायदा नौकरी कर सारी उम्र बचत करने का? ‘‘आज जब जरूरत है तो हम अपना ही पैसा नहीं इस्तेमाल कर सकते. बैंकों की लंबीलंबी कतारों में खड़े होने की हिम्मत सब में तो है नहीं. और फिर इन कतारों में खड़े हो कर भी कितना पैसा निकाल पाएंगे? जरूरत ज्यादा की हो तो कोई क्या करे?’’

‘‘आप चिंता न करें. मुझे बताएं, मैं जो भी मदद कर सकता हूं, करूंगा. मैं बैंक से आप के लिए पैसे निकलवा दूंगा. हां, एक भारतीय नागरिक होने के नाते नियमकानून मेरे ऊपर भी वही लागू हैं जो आप के ऊपर, इसलिए निर्धारित सीमा से अधिक रुपए नहीं निकाल पाऊंगापर आप को कतार में खड़े होने की आवश्यकता नहीं. और हां, यदि अत्यधिक आवश्यकता हो तो मैं अपने पास से भी कुछ राशि आप को दे सकता हूं.’’ मेरी बात से वे पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे. चायपकौड़े की पार्टी कर मैं अपने घर लौट आया.

‘‘सोसाइटी में किस से इतनी जानपहचान हो गई रे तेरी?’’ मां अचंभित अवश्य थीं.

‘‘हैं एक. बताऊंगा,’’ बात टालते हुए मैं अपने कमरे में चला गया. सोचा, पहले बात कुछ आगे तो बढ़े.

उस दिन के बाद हफ्तेभर मैं ने सुलोचना के परिवार की भरसक सहायता की. वे लोग मुझ से बेहद खुश थे. आनाजाना काफी बढ़ गया था. मैं बेधड़क उन के घर जाने लगा था. सुलोचना के मम्मीपापा मुझ से बहुत घुलमिल गए थे. मैं मन ही मन मोदी सरकार के फैसले का धन्यवाद करते नहीं थकता था. मां बारबार मन्नो मौसी वाले रिश्ते के बारे में पूछतीं. मैं ने सोचा अब मां को सुलोचना के मम्मीपापा से मिलवा देने का समय आ गया है.  अगले ही दिन मैं सुलोचना के घर पहुंच गया था. थोड़ी देर हलकीफुलकी बातचीत करने के बाद मैं मुद्दे की बात पर आया, ‘‘आंटीजी, मैं सोच रहा था कि क्यों न आप को अपनी मम्मी से मिलवा दूं? मेरा मतलब है…’’

‘‘मैं तो खुद ही यह सोच रही थी, बेटा. हम दोनों तुम्हारे घर आने ही वाले हैं. बस, सुलोचना की शादी के कार्ड छप कर आ जाएं. फिर सब से पहला कार्ड तुम्हें ही देंगे. तुम मदद न करते तो इस की शादी की तैयारी के लिए राशि एकत्रित करना जटिल हो जाता,’’ सुलोचना की मम्मी ने मेरे ऊपर वज्रपात कर दिया था. सुलोचना की शादी? तो क्या इसीलिए मुझ से दोस्ती की थी? सोसाइटी में सभी जानते थे कि मैं बैंक में उच्चपदाधिकारी हूं. आज तक शादी न होने से मुझे इतनी पीड़ा नहीं हुई थी जितनी आज अपने स्वप्नमहल के टूटने से हुई.

मैं उदासीन हो घर लौट आया था. धम्म से सोफे पर बैठ समाचार सुनने लगा. देखने वालों को लग रहा था कि मैं समाचार सुनने में खोया हूं परंतु उस समय मेरी कोई भी इंद्रिय जागरूक अवस्था में नहीं थी. न तो मेरे कान कुछ सुन रहे थे और न ही मेरी आंखें कुछ देख पा रही थीं. मन दहाड़ें मार रहा था. शुक्र है मन की दहाड़ किसी को सुनाई नहीं दे सकती. उस दिन मां भी अलग ही रूप में थीं. बड़बड़ाती जा रही थीं, ‘‘जब देखो तब काम. शादी कब करेगा यह लड़का. वैसे ही रिश्ते आने कम होते जा रहे हैं, ऐसे ही चलता रहा तो कहां से लाऊंगी इस के लिए लड़की…अब मैं तेरी एक नहीं सुनूंगी. मैं ने फैसला कर लिया है कि मन्नो मौसी वाले रिश्ते को हां कर दूंगी. तेरी नजर में कोई है तो बता दे, वरना मैं इस सर्दी में तेरी शादी करवा दूंगी.’’ मेरे चुप रहने में ही मेरी भलाई थी.

Romantic Story: रुक गई प्राची – क्या प्राची को उसका प्यार मिल पाया

Romantic Story: चंद्रभागाके तट पर खड़ी प्राची आंखों में असीम आनंद लिए विशाल समुद्र में नदियों का मिलन देख रही थी. तभी बालुई तट पर खड़ी प्राची के पैर सागर ने पखार लिए. असीम आनंद की अनुभूति गजब का आकर्षण होता है समुद्र का. प्राची का मन किया कि वह समुद्र का किनारा छोड़ कर उतरती जाए, समाती जाए, ठीक समुद्र के बीचोंबीच जहां नीला सागर शांत स्थिर है. शायद उस के अपने मन की तरह. फिर मन ही मन सोचने लगी कि क्यों आई सब छोड़ कर, सब को छोड़ कर या फिर भाग कर… सागर देखने की उत्कंठा तो कब से थी. वह पुरी पहुंचने से पहले कुछ देर के लिए कोर्णाक गई थी, पर उस का मन तो सागर में बसा था. उसे पुरी पहुंचने की जल्दी थी.

मगर कल ऐसा क्या हुआ कि बौस के सामने छुट्टी का आवेदन दिया कि कल ही जाना जरूरी है. मां को ओडिसा घुमाने ले जाने के लिए. कल ही से छुट्टी चाहिए और वह भी कम से कम 5 दिनों की. बौस के चेहरे से लग रहा था कि उन्हें प्राची की बात पर यकीन नहीं हुआ. मगर प्राची का चेहरा कह रहा था कि अगर छुट्टी नहीं मिली तो भी चली जाएगी विदआउट पे लीव पर या फिर नौकरी से इस्तीफा देना पड़े तब भी.

बौस ने छुट्टी सैंक्शन कर दी. प्राची के चेहरे पर सुकून आया. मगर उस ने यह बात सिर्फ अपनी सहेली निकिता से शेयर की, इस ताकीद के साथ कि औफिस के किसी भी सहयोगी को पता न चले कि वह कहां जा रही है. प्राची घर चल दी. कोलकाता शहर नियोन लाइट में जगमगा रहा था. प्राची की आंखों में भी आंसू झिलमिला गए. अचानक मानो नियोन लाइट से होड़ लगी हो.

कई सारे सवाल प्राची के मन में उमड़ रहे थे. वह जानती थी कि इन के जवाब उसे खुद ही देने हैं. वह पूछना चाहती थी खुद से कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है? उसे पता था निखिल के सामने होने से यह संभव नहीं. वह सब भूल जाती है बस लगता है निखिल सामने रहे उस के बाद उसे दुनिया में किसी भी चीज की जरूरत नहीं.

सुबह के 4 बजे ही बिस्तर छोड़ दिया प्राची ने. एक एअरबैग में कुछ कपड़े रखे, मेकअप का जरूरी सामान लिया और जरूरत भर के पैसे ले कर वह बसस्टैंड की तरफ चल पड़ी. वह चाहती थी कि रात होने से पहले पुरी पहुंच जाए. इस के पीछे 2 वजहें थीं. एक तो वह अंधेरा होने से पहले पहुंचना चाहती थी ताकि उसे होटल में कमरा मिलने में कोई परेशानी न हो और दूसरा अगर उसे होटल नहीं मिला तो उस के अंकल रेलवे में काम करते हैं. वहां रेलवे का गैस्टहाउस भी था. वहां कुछ इंतजाम हो जाता.

दूसरी अहम बात उस ने यह सुन रखी थी कि पूनम की रात समुद्र की लहरें काफी तेज उछलती हैं मानो चांद को छूना चाहती हों. उसे यह शानदार दृश्य देखना था और संयोग से उस दिन पूनम की रात भी थी. जब वह समुद्र के तट पर पहुंची शाम ढल रही थी. समुद्र के दूसरी छोर से चांद निकल रहा था सफेद चमकीला. प्राची के कदम थम से गए. एक तरफ रेत के किनारे से बुलाता सागर तो दूसरी तरफ होटलों की कतार, जहां उसे कुछ दिन रहना था. वह सोचने लगी कि पहले होटल ले या समुद्र को छू ले. अगले ही पल अपने एअरबैग को रेत पर पटका उस ने और दौड़ गई समुद्र किनारे.

सूरज के ढलते ही अंधेरा हो गया. रात में समुद्र की आवाज एक भय पैदा कर रही थी. सिहरन सी होने लगी. अपने दोनों हाथों को सीने में बांध वह जाने लगी पास और पास हाहाकार करते समुद्र के. उसे लगा जैसे यह उस के ही दिल की आवाज हो. दूर समुद्र के दूसरे छोर पर चांद रोशन था. गहन समुद्र… दूर तक पानी ही पानी. बस लहरें उठने के शोर से पता चलता था कि समय सरक रहा है. जी चाहा कि दूर समुद्र में उतरती जाए… चलती ही जाए जब तक कि पानी उस की सांसों की डोर न थामने लगे. मगर इस खयाल को परे झटका प्राची ने. सोचा यह तो आत्महत्या करने वाली बात होगी. उस ने ऐसा तो कभी नहीं चाहा. बहुत जीवट है उस में. जमाने से लड़ कर अपना मुकाम बना सकती है. प्राची लौट चली. पुकारते समुद्र की आवाज को अनसुना कर के. बैग को एक झटके से कंधे पर लटकाया और चल पड़ी.

उसे होटल का कमरा भी लेना था. देर हो रही थी. अब सोचविचार का वक्त नहीं था.

अंधकार अपनी पूरी शिद्दत से पसर चुका था. वह चलतेचलते भीड़भाड़ वाले इलाके से दूर आ चुकी थी. सामने जो होटल आया उस ने रिसैप्शन पर जा कर सीधे पूछा कि कोई रूम खाली है? हां में जवाब मिलने पर वह कमरा देखने चली गई. सोचा जैसा भी हो आज रात रुक जाएगी. पसंद नहीं आएगा तो कल बदल लेगी. मगर कमरा खूबसूरत था. सब से अच्छी बात यह कि उस की फेसिंग समुद्र की तरफ थी. वह अब पास जाए बिना भी समुद्र देख सकती है, जिस के लिए वह आई है. खुश हो कर प्राची ने कमरा ले लिया और खाने का और्डर दे कर फ्रैश होने चली गई. उस के आने तक डिनर भी आ गया. वह खाना खा कर बाहर बालकनी में बैठ गई, हाथ में कौफी का मग थामे. अब उस के पास तनहाई थी, समुद्र था और थी निखिल की यादें. वह इसी के लिए तो आई थी. खुद से बातें करने… जीवन की दिशा तय करने. वहां उस के आगे वह कुछ सोच पाने में असमर्थ जैसे कुछ सोच पाना उस के इख्तियार में नहीं.

हां, वह प्यार करती है निखिल को बेहद. उस के बिना जीने की कल्पना भी उसे पागल बना देती है. मगर निखिल का कुछ पता नहीं चलता. उस की आंखें तो कहती हैं वह भी आकर्षित है, मगर जबान कुछ कहना नहीं चाहती. वह चाहती है निखिल एक बार कहे. बहुत असमंजस में है प्राची. उस के सामने कैरियर है, प्यार है, वह क्या करे. डरती है, कहीं आगे बढ़ कर यह बात निखिल को बताई तो कहीं इनकार से दिल न टूट जाए. उस के बाद उस के साथ एक औफिस में काम करना संभव नहीं होगा. प्यार मिला, तो खजाना मिलेगा और न मिला तो जैसे सब छूट जाएगा, दिल टूटेगा, कैरियर भी समाप्त. फिर क्या करेगी वह इस बड़े से शहर में. वापस घर जा कर सब लोगों को, दोस्तों को गांव के परिचितों को क्या बताएगी? बड़े दंभ के साथ वह घर छोड़ कर आई गांव से यहां तक. फिर 1 ही साल में अपने मांबाबूजी को भी शहर ले आई अपने साथ रखने के लिए गोया जता रही हो वह कि आज के दौर में वह किसी बेटे से कम नहीं उन के लिए. फिर उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मुकाम हासिल करना है. प्यार करने तो नहीं आई इस कोलकाता जैसे शहर में. तो फिर निखिल उस का रहनुमां कैसे बन बैठा? क्यों वह चकोर की तरह बिहेव करती है? क्यों तकती है उस का रास्ता? इन्हीं सवालों के जवाब खोजने हैं आज उसे यहां. अब उसे फैसला लेना होगा. खुद को मजबूत बनाने ही तो यहां आई है.

प्राची जानती है कि निखिल को उस की केयर है. वह परेशान होगा. फिर भी उसे बता कर नहीं आई कि वह कहां जा रही है. उस ने अपना मोबाइल भी स्विचऔफ कर दिया ताकि कोई उसे डिस्टर्ब न कर सके. उसे फैसला लेना है जीवन का, प्यार का, कैरियर का.

अब रात ढल रही है. एकांत कमरे में प्राची सोने की कोशिश में है. पूरे चांद को और समुद्र की लहरों को देख उन का उछाल बारबार आंखों के सामने आ रहा है प्राची के… काश वह निखिल के साथ यहां आ पाती. उस के साथ जिंदगी बिताना कितना सुखद होता. यह सोच कर उसे रोमांच हो आया.

प्राची को याद है, वह रात को 10 बजे अपनी डैस्क का काम खत्म कर के घर आती है. उस के ऐडिटोरियल हैड उस के कार्यव्यवहार से बहुत संतुष्ट हैं. रात अपनी न्यूज स्टोरी की आखिरी कौपी उन को दे कर वह कैब से घर चली जाती है. जहां रोज की तरह छत वाले कमरे का अकेलापन उस का इंतजार कर रहा होता है. मां पहले अकसर उस के लिए गरम खाना बनाती थी उस के आने के बाद, मगर बाद में उस ने जिद कर के मां को मना कर दिया. इस के 2 कारण थे- एक तो मां की बढ़ती उम्र की वजह से उन के घुटनों का दर्द और दूसरी वह खुद इतनी थकी होती कि खाने की हिम्मत नहीं होती. चाहती, बस कुछ ऐसा मिल जाए जिसे सीधे गटक लिया जाए हलक में दलिए की तरह. सो अब उसे खाना भी वहीं कमरे में रखा मिल जाता है जिसे नहाने के बाद प्राची जैसेतैसे निगलती है और फिर कुछ देर टीवी के बाद सीधे बिस्तर में.

वह कभी रात को किसी से भी फोन पर बात नहीं करती. मगर आज क्यों बारबार उसे लग रहा है कि बस एक बार निखिल की भारी आवाज सुन ले. बस एक बार फोन कर उस पार से आती उस की सांसें महसूस करे बस एक बार. इसी असमंजस में उस ने हाथ बढ़ा कर पर्स में पड़ा अपना मोबाइल निकालने का उपक्रम किया. बस इतने में ही उस का दिल जोरों से धड़क उठा. जैसेतैसे उस ने उसे औन किया. इस के साथ ही उस के मन में हजारों खयाल एकसाथ उमड़ पड़े.

निखिल का उस के साथ ऐक्स्ट्रा अटैंटिव बरताव करना, उस की बातों में प्राची ने हमेशा एक सम्मान मिश्रित प्रेम अनुभव किया. प्राची ने कभी कोई हलकी बात उस के मुंह से नहीं सुनी किसी के लिए भी.

अपने कालेज के दिनों से ही प्राची अपने व्यक्तित्व के चलते हर जगह छाई रहती थी. पढ़ाई, संगीत, वादविवाद प्रतियोगिता हो या फिर फैशन डिजाइनिंग अथवा कालेज की छमाही पत्रिका में लेखन, संपादन हर जगह प्राची आगे… कालेज के लड़कों की ही नहीं लड़कियों की भी जैसे स्टार रही है वह.

उसे याद है कितने ही लड़के उस के आतेजाते रास्ते में खड़े उस की राह ताकते रहते. कुछ करीब आ कर बातें करने की कोशिश करते. कई बार उसे अब सोच कर हंसी आती है कि कैसे किसी भी साल रोज डे के दिन उस के कालेज पहुंचने से पहले ही उस की डैस्क गुलाबों से भरी होती, लाल, पीले, मैरून, पिंक… सब को पता था उसे गुलाबों से बेइंतहा लगाव है. हर बुके के साथ उस के लिए विश लिखी होती, साथ ही लिखा होता उस लड़के का नाम और एक दबा सा अस्पष्ट प्रीत निवेदन. प्राची उन सब प्रीत निवेदन की परचियों को फाड़ कर फेंक देती और गुलाब रख लेती. उस का इतना प्रभावी व्यक्तित्व था कि लड़के उस के साथ रहते, मगर जो किला उस ने अपने चारों ओर बना रखा था उसे भेद कर भीतर आने की हिमाकत कोई नहीं कर पाया. और आज जैसे लग रहा है, उन दिनों में मजबूत रही प्राची खुद ही अपने बनाए किले की प्राचीरें तोड़ने को मजबूर है.

औफिस में भी एक निखिल को छोड़ कर उस ने लगभग सभी की आंखों में अपने लिए एक सवाल देखा. कभी वह ‘हम भी खड़े हैं राहों में’ वाले स्टाइल में होता, कभी केवल टाइमपास जैसा कहीं किसी सौदेबाजी की तरह. मगर वह कभी नहीं डगमगाई. नहीं झुकी किसी प्रलोभन के आगे. उस का काम बोलता था. उस की खबरों की रिपोर्टिंग में उस का नाम बोलता था. मगर आज इस आधी रात को क्यों टूट रही है वह और वह भी एक ऐसे सहकर्मी के लिए जिस ने सामने से कभी कुछ कहा नहीं… उसे कोई इशारा भर भी नहीं किया. बस वह रोज उस का लंच टाइम में वेट करता. साथ चाय पीती उस के साथ. वहीं बहुत सी बातें होतीं. प्राची अब सोचती है बातें भी क्या. वह बस उसे सुनती मंत्रमुग्ध सी हो जाती उस की आवाज में. कुछ ही पलों में लगता जैसे समुद्र तट पर खड़ी है वह. अंधकार में स्वर की लहरों पर सवार है. बहा लिए जा रहा कोई उस के अनछुए मन को. सिहरन सी भर रहा है कोई उस अनछुए तन में.

अचानक तंद्रा भंग हुई उस की. उस ने देखा मोबाइल में पता नहीं कब उस की उंगलियां निखिल का नंबर ढूंढ़ लाईं जिसे उस ने ‘ऐ बेबी’ के नाम से सेव किया था. सर्दी की यह रात तेजी से ढल रही थी. फोन हाथ में लिए प्राची उठी. दिल जोर से धड़क रहा था. खिड़की से समुद्र की ओर झांका जो इस वक्त हिलोरें ले रहा था. लहरों की आवाजें किनारों की चट्टानों से टकराने की… लग रहा था जैसे हजारों लहरों पर निखिल का नाम लिखा है और वह नाम उस की मन की कठोर चट्टानों को भिगो रहा है… तोड़ने की, भेदने की कोशिश कर रहा है… अचानक उसे खयाल आया निखिल सोते हुए कैसा लगता होगा और फिर यह सोचती सी प्राची एक षोडसी सी लजा उठी.

मगर इस खयाल से वह बेहद खुशी से भर उठी. उस ने फोन वापस औफ कर दिया. सोचा अगली सुबह निखिल से जरूर बात करेगी. अभी नहीं. इस निर्णय के बाद उसे लगा कि अब सो पाएगी वह. हालांकि सुबह होने को है, मगर कुछ घंटे चैन की नींद फ्रैश कर देती है उसे, यह वह जानती है. उस ने अब तय किया कि सुबह उठ कर समुद्र के किनारे जब लहरें हौले से उस के पैरों को भिगो रही होंगी और समुद्र के ऊपर आसमान में निखिल को ले कर उस की कल्पनाओं की तरह असंख्य पंछी उड़ रहे होंगे तब ऐसे में वह निखिल को फोन से अपने मन की बात बता देगी. प्राची को ये सब सोचते हुए बेहद सुकून मिला और फिर पता ही नहीं चला कि वह कब अपने होंठों पर एक मुसकान लिए नींद के आगोश में चली गई.

करीब 2 घंटे की गहरी नींद के बाद प्राची जागी. खिड़की से बाहर झांका. सूर्य एक नारंगी रंग के गोले की तरह निकलने के उपक्रम में था. शांत समुद्र में बहुत हलकी सी चमकीली लहरें जैसे बुला रही थीं उसे. प्राची जल्दी से अपना कैमरा उठा कर दौड़ पड़ी समुद्र की ओर… यही पल उसे कैद करने हैं… अपने जेहन में भी, अपने जीवन में भी. इन्हीं की साक्षी बन उसे निखिल को अपना फैसला बताना है.

नंगे पैरों को लहरें चूम रही थीं. प्राची ने वक्त के इस बेहद खास लमहे को पहले अपने कैमरे में कैद किया. फिर कांपते हाथों से पर्स से मोबाइल निकाल कर निखिल का नंबर मिलाया. धड़कते दिल से उस की रिंगटोन सुनती रही, ‘‘सुनो न, संगेमरमर की ये मीनारें.’’ यह सुनते हुए उसे लग रहा था जैसे दिल की धड़कनें कानों से कनपटियों के निचले हिस्से तक जमा हो रहीं… वह खोई थी लहरों में, गीत में… उस बेहद रोमानी आलम में अचानक फोन कनैक्ट हुआ.

‘‘हैलो… निखिल….’’ वह जोर से लगभग चिल्लाते हुए बोली पर दूसरी ओर से कोई रिप्लाई नहीं आया.

‘‘निखिल…’’ वह फिर से बोली. ‘‘हैलो, वे सोए हैं अभी… आप कौन?’’ आवाज निश्चित किसी लड़की की थी.

‘‘जी मैं उनके औफिस से बोल रही हूं,’’ किसी तरह रुकरुक कर प्राची ने बताया. दूसरी तरह चुप्पी छाई रही.

‘‘आप कौन?’’ अटकते हुए किसी तरह प्राची ने पूछ ही लिया. ‘‘मैं निखिल की पत्नी और आप?’’

प्राची के हाथ से फोन छूट कर गीले बालू पर गिर गया. हैरान खड़ी थी वह… लहरें अब भी प्राची के पैरों को, फोन को भिगो रही थीं… समुद्र की आवाज गूंज रही थी… लहरें आ रही थीं… जा रही थीं.

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