अपने बच्चे को बेबी एलीफैंट न बनाएं

उस दिन माया बाजार में मोमोज वाले के ठेले पर अपनी दोनों नन्हीं बेटियों के साथ चिकेन मोमोेज खा रही थी. तभी उसकी आठ साल की बेटी मानवी उसके हाथ से कोल्ड ड्रिंक की बोतल छीनते हुए पीजा खाने की जिद करने लगी. माया ने समझाया कि नहीं, अभी घर जाकर खाना भी खाना है, पर मानवी ने जिद्द पकड़ ली कि उसे तो पीजा भी खाना है. माया के मना करने पर मानवी मचल गयी और सड़क पर ही मां के ऊपर चीखने-चिल्लाने व हाथ चलाने लगी. ठेले के आसपास खड़े लोग भी बच्ची की हरकतों को मजे लेकर देखने लगे. मानवी तब तक प्रलाप करती रही जब तक उसकी मां उसको बगल के ठेले से पीजा खिलाने के लिए राजी नहीं हो गयी. माया की बेटियों की उम्र आठ साल और पांच साल है. दोनों गोरी-चिट्टी हैं मगर दोनों के थुलथुल शरीर और जरूरत से ज्यादा चबी चीक्स उन्हें न तो क्यूट बच्चा बनाते हैं, और न ही खूबसूरत. उन्हें देखकर मुंह से निकल ही जाता है – बेबी एलीफैंट.

मानवी और उसकी छोटी बहन सोनवी को उनके स्कूल के दोस्त भी बेबी एलीफैंट के नाम से चिढ़ाते हैं. कभी हिप्पो तो कभी छोटा भीम भी कहते हैं. दोनों के मन-मस्तिष्क पर इन बातों का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. उन्हें न तो कोई खेल में अपने साथ रखना चाहता है और न ही कोई उनके साथ अपना टिफिन बॉक्स शेयर करता है क्योंकि एक तो मोटापे के कारण दोनों से दौड़ा-भागा नहीं जाता, वहीं कोई बच्चा उनसे अपना टिफिन शेयर करे तो दोनों दूसरे का टिफिन तो चट से साफ कर जाती हैं, मगर अपने टिफिन में से उन्हें कुछ खाने को नहीं देतीं. इसकी वजह है कि दोनों को सामान्य से कहीं ज्यादा भूख लगती है. इन्हीं कारणों से वह स्कूल में अलग-थलग पड़ गयी हैं. दूसरे बच्चे जहां अपनी पॉकेटमनी से छोटे-छोटे गेम्स, कॉमिक्स या पतंग-कंचे वगैरह खरीदते हैं, वहीं मानवी और सोनवी बस खाने की चीजें ही खरीदती हैं. चाट, कोल्ड ड्रिंक, बर्गर, मोमोज जैसे फास्ट फूड उनको रोज चाहिए. इसके चलते ही दोनों के शरीर थुलथुल हो गये हैं. वे पढ़ाई में भी लगातार पिछड़ती जा रही हैं क्योंकि मोटापे के कारण आलस्य और नींद हर वक्त उन पर हावी रहती है. शाम के वक्त जहां कॉलोनी के सारे बच्चे पार्क में खेलते-कूदते हैं, वहीं मानवी और सोनवी अपने ड्राइंगरूम के सोफे पर पसर कर कुछ न कुछ खाते हुए कार्टून चैनल्स देखती रहती हैं.

माया को शिकायत है कि उसकी दोनों बेटियां हाथ से निकली जा रही हैं. दोनों बेहद जिद्दी, चिड़चिड़ी और बदतमीज हो गयी हैं. मन की चीज पूरी न हो तो चीख-चीख रोती हैं और पूरा घर सिर पर उठा लेती हैं. न पढ़ाई में दिल लगता है न खेलकूद में. दाल, सब्जी, फल, दूध के नाम पर दोनों को बुखार चढ़ जाता है, बस हर वक्त चट्टू-पट्टू चीजें खाने को मांगती हैं. मानवी तो मां की नजर बचा कर फोन से फास्ट फूड का आर्डर भी प्लेस कर देती है. अब डिलीवरी ब्यॉय दरवाजे पर आ खड़ा हो तो माया को आर्डर की हुई चीज लेनी ही पड़ती है. दोनों बेटियों की परवरिश में माया को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. मगर इसकी दोषी वह खुद है. छोटे शहर से महानगर आयी माया के पति की जब एक इंटरनेशनल कम्पनी में नौकरी लगी तो उसकी आय तिगुनी हो गयी. माया के हाथ में पैसा आने लगा तो बाहर के खाने का चस्का भी लग गया.  इस चस्के में उसकी खाना पकाने की खूबी खत्म होती चली गयी. मायके में जहां आये-दिन नई-नई रेसेपीज सीखती और पकाती थी, वहीं पति के घर के ऐशो-आराम में उसके सारे शौक बदल गये. अब न वह सिलाई-कढ़ाई करती है, न घर सजाने-संवारने में उसे कोई रुचि है और न ही वह किचेन में स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना बनाने की इच्छा होती है. सब काम के लिए नौकर है. बच्चों को भी उसने बचपन से ही बाहर के खाने की लत लगा दी थी. अब उनका और अपना मोटापा देखकर पछता रही है.

फास्ट फूड की तरफ बढ़ता बच्चों का तीव्र आकर्षण और उसकी वजह से बढ़ती परेशानियों का सामना आज महानगरों में ज्यादातर मां-बाप कर रहे हैं. मगर इसके जिम्मेदार भी मां-बाप ही हैं, जो अपने बच्चों में सही खानपान की आदतें नहीं डाल पाते हैं. कभी मजबूरी में तो कभी लापरवाही के कारण. स्नेहा और उसके पति दोनों मल्टीनैशनल कम्पनी में काम करते हैं. उनका एक ग्यारह साल का बेटा है – हर्ष. हर्ष छठी कक्षा का विद्यार्थी है, मगर उसका डील-डौल देखें तो दसवीं क्लास का छात्र लगता है. अपनी कक्षा में वह अन्य बच्चों से बहुत बड़ा नजर आता है. जिसके कारण कुछ बच्चे उसे चिढ़ाते हैं, तो कुछ उससे डरते भी हैं. उसके अंग्रेजी के टीचर तो उसको ‘ही-मैन’ कह कर बुलाते हैं. हर्ष के मोटापे का कारण है फास्ट फूड. काम की अधिकता की वजह से उसकी मां स्नेहा सुबह के नाश्ते में अंडा, ब्रेड, जूस, नट्स आदि तो डायनिंग टेबल पर सजा देती है, मगर दोपहर का खाना पति-पत्नी जहां अपने-अपने ऑफिस की कैंटीन में खाते हैं, वहीं हर्ष को भी स्कूल की कैंटीन से खाने के लिए पैसे देते हैं. स्कूल से घर लौटने पर फ्रिज में सॉफ्ट ड्रिंक्स, केक, पैटीज, आइस्क्रीम, पेस्ट्री आदि भी मिल जाती है. उसके माता-पिता ऑफिस से देर रात लौटते हैं. ऐसा कभी-कभी ही होता है कि स्नेहा ऑफिस से लौटकर रात का खाना बनाये, वरना महीने में बीस-बाइस दिन तो तीनों रात का खाना भी बाहर ही खाते हैं. बर्गर, पीजा, चिकेन रोल्स, कोल्ड ड्रिंक, चिकेन टिक्का, बिरयानी खा-खाकर तीनों का मोटापा बढ़ रहा है.

वहीं, आशीष की पत्नी रेनू दिन भर घर में रहने के बावजूद अपने बच्चों को पौष्टिक खाना नहीं खिलाती, बल्कि अपने आलसीपन के कारण बच्चों  के स्वास्थ्य से लगातार खिलवाड़ कर रही है. सुबह का नाश्ता ब्रेड-बटर और दोपहर में चाट-पकौड़ी, चाट-पापड़ी, भल्ले, गोलगप्पे, जो घर के सामने बैठे रेहड़ीवाले के पास से लगभग रोजाना पैक होकर आता है. दिन भर सोफे पर पसर कर टीवी देखना रेनू का शौक है. रात में बस एक बार ही वह घंटे भर के लिए रसोई में जाती है, ताकि बच्चों के पापा उसको ताने न मारें, मगर रोटी, सब्जी, दाल बनाने में उसको पसीना आ जाता है. वहीं हड़बड़ी और बेमन से बना ये खाना न तो स्वादिष्ट होता है और न ही किसी को पसन्द आता है. रेनू वही सब्जी बनाती है जिसे काटने-धोने में वक्त न लगे और फटाफट बन जाए. बाजार से सूखे प्याज के पैकेट और टमाटर की प्यूरी खरीद कर रख रखी है, जिनसे वह चटपट पनीर बना लेती है. अंडे की भुर्जी, उबले आलू की सब्जी, सोयाक्रम या फिर ऐसी चीज जो चटपट बन जाए. हरा साग या दूसरी सब्जियां जिन्हें साफ करने, काटने, बनाने में वक्त लगता है, रेनू न खरीदती है न बनाती है. उसके बच्चों को कभी करेला, मेथी, पालक, घिया, कद्दू, भिण्डी खाने को नहीं मिलता क्योंकि इन सब्जियों को बनाने में थोड़ा वक्त लगता है. फिर खाने के साथ न सलाद, न दही, न रायता और न ही कोई मीठी चीज जैसे खीर या हलवा. खाने की मेज पर बच्चे बमुश्किल एकाध रोटी ही गले से उतार कर उठ जाते हैं और फिर बिस्तर पर  चिप्स, चॉकलेट और कोल्ड ड्रिंक से बाकी की भूख शान्त करते हैं. रेनू का आलसी और लापरवाह व्यवहार खुद उसको ही नहीं, उसके बच्चों को भी बीमारी की राह पर ढकेल रहा है, मगर यह बात उसे समझ में ही नहीं आती है. खाना बनाने, खिलाने का उसे कोई शौक नहीं है.

महानगरों में वक्त की कमी के कारण मां-बाप अपने बच्चों को हरी सब्जियों, फल, दूध, अनाज का भोजन देने के बजाये फास्ट फूड की ओर ढकेल रहे हैं, जिसके चलते उनके शरीर में न सिर्फ अतिरिक्त चर्बी जमा हो रही है, बल्कि वे कई तरह की बीमारियों की चपेट में भी हैं. अपौष्टिक खाना उनके अन्दर जहां आलस्य को बढ़ा रहा है, वहीं वे उम्र से पहले ही परिपक्व भी हो रहे हैं. मोटापे या स्थूलता से ग्रस्त बच्चों में पहली समस्या यही है कि वे भावुक और मनोवैज्ञानिक रूप से समस्याग्रस्त हो जाते हैं. उनकी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण होती है. वे बहुत ज्यादा कन्फ्यूज रहते हैं. बच्चों में मोटापा जीवन भर के लिए खतरनाक विकार भी उत्पन्न कर सकता है जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अनिद्रा रोग, कैंसर और अन्य समस्याएं. कुछ अन्य विकारों में यकृत रोग, यौवन आरम्भ का जल्दी होना, या लड़कियों में मासिक धर्म का जल्दी शुरू होना, आहार विकार जैसे एनोरेक्सिया और बुलिमिया, त्वचा में संक्रमण और अस्थमा तथा श्वसन से सम्बन्धित अन्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं. अध्ययनों से पता चला है कि अधिक वजन वाले बच्चों में व्यस्क होने पर भी अधिक वजन बने रहने की सम्भावना अधिक होती है. ऐसा भी पाया गया है कि किशोरावस्था के दौरान स्थूलता व्यस्क अवस्था में मृत्यु दर को बढ़ाती है. मोटे बच्चों को अक्सर उनके साथी चिढ़ाते हैं. ऐसे कुछ बच्चों के साथ तो खुद उनके परिवार के लोगों के द्वारा भेदभाव किया जाता है. इससे उनके आत्मविश्वास में कमी आती है और वे अपने आत्मसम्मान को कम महसूस करते हैं और अवसाद से भी ग्रस्त हो जाते हैं.

वर्ष 2008 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि स्थूलता से पीड़ित बच्चों में कैरोटिड धमनियां समय से पहले इतनी विकसित हो जाती हैं जितनी कि तीस वर्ष की उम्र में विकसित होनी चाहिए, साथ ही उनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी असामान्य होता है. यह हृदय सम्बन्धि रोगों के कारक हैं. कैलोरी युक्त पेय और खाद्य पदार्थ बच्चों को आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. चीनी से भरी हुई सॉफ्ट-ड्रिंक्स का उपभोग बच्चों में मोटापे में बहुत अधिक योगदान देता है. 19 महीने तक 548 बच्चों पर किये गये एक अध्ययन में पाया गया है कि प्रतिदिन 600 मिलीग्राम सॉफ्ट ड्रिंक पीने से स्थूलता की सम्भावना 1.6 गुना तक बढ़ जाती है.

बाजार के लिए बच्चे सबसे बड़े उपभोक्ता हैं. फास्ट फूड मार्केट का पहला लक्ष्य ही बच्चे हैं. इस बाजार को बच्चों की सेहत से कोई लेना-देना नहीं है. उन्हें सिर्फ अपने उत्पाद की बिक्री से मतलब है. अत्यधिक कैलोरी युक्त स्नैक्स आज बच्चों को हर जगह आसानी से उपलब्ध है. युवा फास्ट फूड रेस्तरां में खाना बहुत पसंद करते हैं. अध्ययन में पाया गया है कि 7वीं से 12वीं कक्षा के 75 प्रतिशत छात्र फास्ट फूड खाते हैं. फास्ट फूड उद्योग बच्चों में मोटापे को बढ़ाने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है. अकेले मैकडॉनल्ड्स की तेरह वेबसाइटें हैं जिन्हें हर महीने 365,000 बच्चे और 294,000 किशोर देखते हैं. यह उद्योग लगभग 42 बिलियन डॉलर सालाना विज्ञापन पर खर्च करता है, जिसमें छोटे बच्चों को मुख्य रूप से लक्ष्य बनाया जाता है. इसके अतिरिक्त, फास्ट फूड रेस्तरां बच्चों को भोजन के साथ खिलौने देते हैं, जो बच्चों को लुभाने में मदद करता है. चालीस प्रतिशत बच्चे लगभग रोज अपने माता पिता को फास्ट फूड रेस्तरां ले जाने के लिए कहते हैं. फास्ट फूड रेस्तरां में मिलने वाले 3000 लोकप्रिय व्यंजनों में से केवल 13 ऐसे व्यंजन हैं जो छोटे बच्चों के लिए पोषण सम्बन्धी दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हैं, यह स्थिति को बदतर बनाने के लिए काफी है. फास्ट फूड के उपभोग और मोटापे के बीच सीधा सम्बन्ध है. ऐसे ही एक अध्ययन में पाया गया कि स्कूल के पास फास्ट फूड रेस्तरां का होना बच्चों में स्थूलता के जोखिम को बढ़ाता है. बाल्यकाल स्थूलता एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में उपस्थित अतिरिक्त वसा बच्चे के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है.

बच्चों में मोटापा एक महामारी की तरह आज दुनिया के बहुत-से देशों में फैलता जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया-भर में करीब 2 करोड़ 20 लाख बच्चों का वजन बहुत ज्यादा है, जिनकी उम्र 5 साल से भी कम है. अमरीका में पिछले तीन दशकों में 6 से 11 साल के मोटे बच्चों की गिनती तीन गुना बढ़ी है. विकासशील देशों में भी यह समस्या जोर पकड़ रही है. अंतर्राष्ट्रीय मोटापा कार्य समिति (इंटरनेशनल ओबेसिटी टास्क फोर्स) के मुताबिक, अफ्रीका के कुछ इलाकों में बच्चे कुपोषण से ज्यादा, मोटापे का शिकार हैं. सन् 2007 के बाद से मेक्सिको में मोटे बच्चों की गिनती इतनी बढ़ गयी है कि इस मामले में यह देश अमरीका के बाद विश्व में दूसरे नम्बर पर पहुंच गया है. मेक्सिको शहर में 70 प्रतिशत बच्चों और जवानों का या तो वजन ज्यादा है या वे मोटापे से जूझ रहे हैं. बाल शल्यचिकित्सक फ्रॉन्सिस्को गॉन्सॉलेस खबरदार करते हैं कि – ‘यह ऐसी पहली पीढ़ी होगी, जो मोटापे से होनेवाली बीमारियों की वजह से अपने मां-बाप से पहले मौत के मुंह में जा सकती है.’

दरअसल मोटापे के कारण बच्चों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियां हो रही हैं. यह बीमारियां पहले बुजुर्गों को होती थीं. यह बच्चों के लिए खतरे की घंटी है. मोटापे के कारण बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर जोर पकड़ रहा है. अगर इसे काबू नहीं किया जा सका तो दिल की खतरनाक बीमारियां उनको जकड़ लेंगी. बचपन में मोटापे के शिकार लोगों के लिए युवावस्था में डायबिटीज का खतरा कई गुना ज्यादा बढ़ ज्यादा है. इसके अलावा इन बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है यानी उनमें मानसिक बीमारियों का जोखिम कहीं अधिक होता है.

इंडियन जर्नल ऑफ़ एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबोलिज्म के मुताबिक भारतीय बच्चों में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है. भारत में 20 प्रतिशत स्कूली बच्चे मोटापाग्रस्त हैं. मोटापा बढ़ने के पीछे जाने-अनजाने में हमारी ही लापरवाहियां और सुस्ती जिम्मेदार है. हम चाहे तो एक्सरसाइज और पौष्टिक खाने को तवज्जो देकर अपनी और अपने बच्चों की फूड हैबिट्स को सुधार सकते हैं.

इतना मोटापा क्यों?

–  दुनिया भर में बच्चे जिस तरह मोटापे का शिकार हो रहे हैं, उसमें एक कारण उनके जींस और हार्मोंस भी हो सकते हैं, यानी मोटापा उन्हें आनुवांशिक रूप से प्राप्त हो रहा है. लेकिन इस कारण का प्रतिशत बहुत कम है.

–  मोटापे की खास वजह बच्चों में खानपान की गलत आदतें हैं. बच्चे खाते बहुत हैं और कसरत न के बराबर करते हैं.

–  नौकरीपेशा माता-पिता के पास खाना पकाने के लिए न तो समय होता है और न ही ताकत. नतीजा, वे फास्ट-फूड यानी झटपट तैयार खाने पर निर्भर होते जा रहे हैं.

– आज दुनिया-भर में जहां देखो वहां फास्ट-फूड रेस्तरां खुलते जा रहे हैं. एक अध्ययन से पता चला है कि अमरीका में 4 से 19 साल के एक तिहाई बच्चे हर दिन फास्ट-फूड पर ही जीते हैं. इस तरह के खाने में शक्कर और चिकनाई बहुत ज्यादा होती है. साथ ही, इन्हें इतनी बड़ी मात्रा में परोसा जाता है कि देखनेवालों की लार टपकने लगती है.

–  आज लोग दूध और पानी के बजाय सॉफ्ट-ड्रिंक पीना ज्यादा पसंद करते हैं. मिसाल के लिए, मेक्सिको में हर साल लोग उतना पैसा दस तरह के व्यंजनों पर भी खर्च नहीं करते, जितना वे सिर्फ सॉफ्ट-ड्रिंक पर खर्च कर देते हैं. हर दिन सिर्फ 600 मिलीलीटर सॉफ्ट-ड्रिंक पीने से साल-भर में एक व्यक्ति का वजन करीब 11 किलो तक बढ़ सकता है.

–  अध्ययन के अनुसार औसतन तीन साल के बच्चे हर दिन सिर्फ 20 मिनट ही खेल-कूद या किसी तरह की शारीरिक हरकत में बिताते हैं. बच्चों में बैठे-बैठे काम करते रहने की आदत आम होती जा रही है. जिसके कारण मोटापा शरीर में घर कर रहा है.

मोटापे से छुटकारा पाने के लिए क्या करें

  1. बच्चों को फास्ट फूड खिलाने के बजाय, फल, सलाद और सब्जियां ज्यादा खरीदें और खिलाएं.
  2. सॉफ्ट-ड्रिंक, शरबत और ज्यादा मीठे और चिकनाईयुक्त नाश्ते पर रोक लगाइए. इसके बजाय, बच्चों को पानी या बिना मलाईवाला दूध और पौष्टिक नाश्ता दीजिए.
  3. खाना पकाने के ऐसे तरीके अपनाइए, जिनमें घी-तेल का ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता, जैसे सेंकना, भूनना या भाप में पकाना. खाना मन से बनाएं और स्वादिष्ट बनाएं. नई-नई रेसिपीज सीखें और खाने में ज्यादा स्वाद पैदा करें. एक जैसी सब्जी खाते-खाते बच्चे बोर हो जाते हैं.
  4. खाना कम परोसिए. खाना चबा-चबा कर धीरे-धीरे खाने और भूख से दो निवाले कम खाने का निर्देश बच्चों को दीजिए.
  5. कोई काम कराने और इनाम देने के नाम पर बच्चों को खाने की चीजें मत दीजिए.
  6. बिना नागा बच्चे को सुबह का नाश्ता जरूर कराइए. क्योंकि अगर वह नाश्ते से चूक गया है तो बाद में दुगना खाना खा सकता है.
  7. साथ बैठकर खाना खाइए. टीवी या कम्प्यूटर के सामने खाने से एक व्यक्ति को इसका अंदाजा नहीं लगता कि उसने कितना खा लिया है.
  8. कसरत करने को बढ़ावा दीजिए, जैसे साइकिल चलाना, गेंद से खेलना और रस्सी कूदना.
  9. ज्यादा देर तक टीवी देखने, कम्प्यूटर का इस्तेमाल करने या वीडियो गेम खेलने की इजाजत मत दीजिए.
  10. पूरा परिवार मिलकर कहीं बाहर घूमने की योजना बनाइए. जैसे कि चिड़ियाघर देखना, पार्क में खेलना या तैराकी के लिए जाना.
  11. बच्चे से कुछ मेहनत का काम करवाइए. घर की साफ-सफाई में उनकी मदद लीजिए. उनसे अपने कपड़े धोने को कहिए.
  12. बढ़िया खाना खाने और कसरत करने की अच्छी मिसाल बच्चों के सामने रखिए.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia 

घर के हालात बहुत अच्छे नहीं है, नौकरी करने में मन नहीं लगता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं ने 5 साल तक नौकरी करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. मजबूरन घर वालों पर दबाव डाल कर 30 हजार रुपए ले कर एक दलाल को दे दिए, फिर भी काम नहीं बना. घर की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?

जवाब

नौकरी के लिए डिगरियों के साथसाथ काम करने के जज्बे और काबिलीयत की भी जरूरत होती है. घर की जमापूंजी दलालों पर लुटाने से नौकरी नहीं मिला करती. आप अखबारों में छपने वाले नौकरी संबंधी इश्तिहार देखते रहें और अपनी काबिलीयत के हिसाब से सही नौकरी के लिए कोशिश करें. नौकरी के साथसाथ अपनी काबिलीयत बढ़ाने की कोशिश भी करते रहें, ताकि आने वाले वक्त में बेहतर नौकरी मिल सके.

हत्यारा प्रेमी : प्यार की आड़ में कर डाला ऐसा काम

राजस्थान के जिला नागौर में एक कस्बा है. मेड़ता सिटी. इसी कस्बे में कभी मीराबाई जन्मी थीं. मीरा का मंदिर भी यहां बना हुआ है. मेड़ता सिटी की गांधी कालोनी में दीपक उर्फ दीपू रहता था. दीपक के पिता बंशीलाल डिस्काम कंपनी में नौकरी करते थे. उन की पोस्टिंग सातलावास जीएसएस पर थी. पिता की सरकारी नौकरी होने की वजह से घर में किसी तरह का अभाव नहीं था. जिस से दीपक भी खूब बनठन कर रहता था.

मेड़ता सिटी में नायकों की ढाणी की रहने वाली इंद्रा नाम की युवती से उसे प्यार हो गया था. दीपक चाहता था कि वह अपनी प्रेमिका पर दिल खोल कर पैसे खर्च करे पर उसे घर से जेब खर्च के जो पैसे मिलते थे उस से उस का ही खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता था. चाह कर भी वह प्रेमिका इंद्रा को उस की पसंद का सामान नहीं दिलवा पाता था.

तब दीपक ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और वह पिता के साथ डिस्काम में ही काम करने लगा. वहां काम करने से उसे अच्छी आय होने लगी. अपनी कमाई के दम पर वह इंद्रा को अपनी मोटरसाइकिल पर घुमाताफिराता. अपनी कमाई का अधिकांश भाग वह प्रेमिका इंद्रा पर ही खर्च करने लगा.

इंद्रा एक विधवा युवती थी. दरअसल इंद्रा की शादी करीब 3 साल पहले बीकानेर में हुई थी पर शादी के कुछ दिन बाद ही उस के पति की अचानक मौत हो गई. पति की मौत का उसे बड़ा सदमा लगा.

ऊपर से ससुराल वाले उसे ताने देने लगे कि वह डायन है. घर में आते ही उस ने पति को डस लिया. ससुराल में दिए जाने वाले तानों से वह और ज्यादा दुखी हो गई और फिर एक दिन अपने मायके आ गई.

मायके में रह कर वह पति की यादों को भुलाने की कोशिश करने लगी. धीरेधीरे उस का जीवन सामान्य होता गया. वह बाजार आदि भी आनेजाने लगी. उसी दौरान उस की मुलाकात दीपक उर्फ दीपू से हुई. बाद उन की फोन पर भी बात होने लगी. बातों मुलाकातों से बात आगे बढ़ते हुए प्यार तक पहुंच गई. इस के बाद तो वह दीपक के साथ मोटरसाइकिल पर घूमनेफिरने लगी.

यह काम इंद्रा के घर वालों को पता नहीं थी. उन्हें तो इस बात की चिंता होने लगी कि विधवा होने के कारण बेटी का पहाड़ सा जीवन कैसे कटेगा. वह उस के लिए लड़का तलाशने लगे.

आसोप कस्बे में एक रिश्तेदार के माध्यम से पंचाराम नाम के युवक से शादी की बात बन गई. फिर नाताप्रथा के तहत इंद्रा की पंचाराम से शादी कर दी. यह करीब 8 माह पहले की बात है.

दूसरी शादी के बाद इंद्रा ससुराल चली गई तो दीपक बुझा सा रहने लगा. उस के बिना उस का मन नहीं लग रहा था. वह कभीकभी इंद्रा से फोन पर बात कर लेता था. कुछ दिनों बाद इंद्रा आसोप से मायके आई तो वह दीपक से पहले की तरह मिलने लगी. दूसरे पति पंचाराम से ज्यादा वह दीपक को चाहती थी. क्योंकि वह उसे हर तरह से खुश रखता था.

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मार्च 2017 में दीपक के घर वालों ने अपने ही समाज की लड़की से दीपक की शादी कर दी. दीपक ने अपनी शादी की बात इंद्रा से काफी दिनों तक छिपाए रखी पर इंद्रा को किसी तरह अपने प्रेमी की शादी की बात पता चल गई. यह बात इंद्रा को ठीक नहीं लगी. तब इंद्रा ने दीपक से बातचीत कम कर दी.

जब दीपक उसे मिलने के लिए बुलाता तो वह बेमन से उस से मिलने जाती थी. अक्तूबर, 2017 के तीसरे हफ्ते में दीपक और इंद्रा की मुलाकात हुई तो इंद्रा ने कहा, ‘‘दीपू, ससुराल से पति का बुलावा आ रहा है. मैं 2-4 दिनों में ही चली जाऊंगी.’’

‘‘इंद्रा प्लीज, ऐसा मत करो. तुम चली जाओगी तो मैं तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊंगा. याद है जब तुम शादी के बाद यहां से चली गई थी तो मेरा मन नहीं लग रहा था.’’ दीपक बोला.

‘‘मेरी दूसरी शादी हुई है. मैं पति को खोना नहीं चाहती. मुझे माफ करना. मुझे ससुराल जाना ही होगा.’’ इंद्रा ने कहा.

दीपक उसे बारबार ससुराल जाने को मना करता रहा. पर वह जाने की जिद करती रही. इसी बात पर दोनों में काफी देर तक बहस होती रही. इस के बाद दोनों ही मुंह फुला कर अपनेअपने घर चले गए.

उस रोज 27 अक्तूबर, 2017 का दिन था. मेड़ता सिटी थाने में किसी व्यक्ति ने सूचना दी कि एक युवती की अधजली लाश जोधपुर रोड पर स्थित जय गुरुदेव नगर कालोनी के सुनसान इलाके में पड़ी है. सुबहसुबह लाश मिलने की खबर से थाने में हलचल मच गई.

थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई पुलिस टीम के साथ सूचना में बताए पते पर पहुंच गए. घटनास्थल के आसपास भीड़ जमा थी. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, मगर अधजले शव के पास ऐसी कोई चीज नहीं मिली जिस से मृतका की पहचान हो पाती.

थानाप्रभारी की सूचना पर सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर भी मौके पर पहुंच गए थे. उन्होंने भी मौके का निरीक्षण कर वहां खड़े लोगों से पूछताछ की. कोई भी उस शव की शिनाख्त नहीं कर सका.

नायकों की ढाणी का रहने वाला रामलाल नायक भी लाश मिलने की खबर पा कर जय गुरुदेव नगर कालोनी पहुंच गया. उस की बेटी  इंद्रा भी 26 अक्तूबर से लापता थी. झुलसी हुई लाश को वह भी नहीं पहचान सका. लाश की शिनाख्त न होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

मरने वाली युवती की शिनाख्त हुए बिना जांच आगे बढ़नी संभव नहीं थी. सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर और थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई इस बात पर विचारविमर्श करने लगे कि लाश की शिनाख्त कैसे हो. उसी समय उन के दिमाग में आइडिया आया कि यदि मृतका के अंगूठे के निशान ले कर उन की जांच कराई जाए तो उस की पहचान हो सकती है क्योंकि आधार कार्ड बनवाते समय भी फिंगर प्रिंट लिए जाते हैं. हो सकता है कि इस युवती का आधार कार्ड बना हुआ हो.

पुलिस ने आधार कार्ड मशीन में मृतका के अंगूठे का निशान लिया तो पता चला कि मृतका का आधार कार्ड बना हुआ है. इस जांच से यह पता चल गया कि मृतका का नाम इंद्रा पुत्री रामलाल नायक है. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने रामलाल नायक को सिटी थाने बुलाया और उस की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

पुलिस ने रामलाल नायक से पूछताछ की तो उस ने बताया कि इंद्रा करीब डेढ़ महीने पहले गांधी कालोनी निवासी अपने दोस्त दीपक के साथ बिना कुछ बताए कहीं चली गई थी. उन दिनों गणपति उत्सव चल रहा था. वह 7-8 दिन बाद वापस घर लौट आई थी. इस बार भी सोचा था कि उसी के साथ कहीं चली गई होगी. मगर उस का मोबाइल बंद होने के कारण उन्हें शंका हुई.

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रामलाल ने शक जताया कि इंद्रा की हत्या दीपक ने ही की होगी. रामलाल से पुलिस को पता चला कि इंद्रा के पास मोबाइल फोन रहता था जो लाश के पास नहीं मिला था. अब दीपक के मिलने पर ही मृतका के फोन के बारे में पता चल सकता था.

28 अक्तूबर को डा. बलदेव सिहाग, डा. अल्पना गुप्ता और डा. भूपेंद्र कुड़ी के 3 सदस्यीय मैडिकल बोर्ड ने इंद्रा के शव का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम के बाद शव उस के परिजनों को सौंप दिया गया.

केस को सुलझाने के लिए सीओ राजेंद्र प्रसाद दिवाकर के नेतृत्व में एक पुलिस टीम  बनाई गई. टीम में थानाप्रभारी (मेड़ता) अमराराम बिश्नोई, थानाप्रभारी (कुचेरा) महावीर प्रसाद, हैडकांस्टेबल भंवराराम, कांस्टेबल हरदीन, सूखाराम, अकरम, अनीस, हरीश, साबिर खान और महिला कांस्टेबल लक्ष्मी को शामिल किया गया. दीपक की तलाश में पुलिस ने इधरउधर छापेमारी की. तब कहीं 5 दिन बाद पहली नवंबर, 2017 को दीपक उर्फ दीपू पुलिस के हत्थे चढ़ पाया.

पुलिस ने थाने ला कर जब उस से इंद्रा की हत्या के बारे में पूछा तो वह थोड़ी देर इधरउधर की बातें करता रहा लेकिन थोड़ी सख्ती के बाद उस ने इंद्रा की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

पुलिस ने उसी रोज दीपक को मेड़ता सिटी कोर्ट में पेश कर के 5 दिन के रिमांड पर ले लिया और कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में इंद्रा मर्डर की जो कहानी प्रकाश में आई वह इस प्रकार निकली.

दीपक और इंद्रा एकदूजे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. लेकिन उन के संबंधों में दरार तब आई जब इंद्रा को दीपक की शादी होने की जानकारी मिली. इंद्रा को दीपक की यह बात बहुत बुरी लगी कि उस ने शादी करने की बात उस से छिपाए क्यों रखी. इंद्रा को यह महसूस हुआ कि दीपक उसे छल रहा है. इसलिए उस ने दीपक से संबंध खत्म कर पति के पास जाने का फैसला कर लिया. यही बात उस ने दीपक को साफसाफ बता दी.

दीपक ने उसी रोज तय कर लिया था कि अगर इंद्रा ने ससुराल जाने का कार्यक्रम नहीं बदला तो वह उसे जान से मार डालेगा. इंद्रा को यह खबर नहीं थी कि दीपक उस की जान लेने पर आमादा है. जब 26 अक्तूबर को दीपक ने इंद्रा को फोन कर के बुलाया तो उसे पता नहीं था कि प्रेमी के रूप में उसे मौत बुला रही है.

उसे 27 अक्तूबर को ससुराल जाना था इसलिए सोचा कि जाने से पहले एक बार दीपक से मिल ले. इसलिए उस के बुलावे पर वह उस से मिलने पहुंच गई. इंद्रा ने जब उसे बताया कि वह कल ससुराल जाएगी तो दीपक ने ससुराल जाने से उसे फिर मना किया. वह नहीं मानी तो वह उसे बहलाफुसला कर मोटरसाइकिल से सातलावास डिस्काम जीएसएस पर बने कमरे में ले गया.

ससुराल जाने के मुद्दे पर फिर इंद्रा से बहस हुई. दीपक को गुस्सा आ गया. उस ने पहले से बनाई योजनानुसार इंद्रा की चुन्नी उसी के गले में लपेट कर उस की हत्या कर दी. गला घोंटने से इंद्रा की आंखें बाहर निकल गईं और कुछ ही देर में उस की मौत हो गई.

इस के बाद उस की लाश को एक बोरे में डाला और बाइक पर रख कर उसे मेड़ता सिटी से बाहर जोधपुर रोड पर जय गुरुदेव कालोनी में सुनसान जगह पर ले गया.

इस के बाद अपनी मोटरसाइकिल से पैट्रोल निकाल कर रात के अंधेरे में लाश को आग लगा दी. उस ने सोचा कि अब शव की शिनाख्त नहीं हो पाएगी और वह बच जाएगा. लेकिन आधार मशीन पर मृतका के अंगूठे का निशान लेते ही लाश की शिनाख्त हो गई और फिर पुलिस दीपक तक पहुंच गई.

पुलिस ने दीपक की निशानदेही पर उस की बाइक भी जब्त कर ली, जो इंद्रा की लाश ठिकाने लगाने में प्रयुक्त की गई थी. पूछताछ पूरी होने पर दीपक उर्फ दीपू को 5 नवंबर, 2017 को पुन: कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की जांच थानाप्रभारी अमराराम बिश्नोई कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक दीपक की जमानत नहीं हुई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फायदें के साथ-साथ नुकसान भी देता है अमरूद, जानिए कैसे

अमरूद तो आपने खाया ही होगा, लेकिन क्या आप उसके फायदों के बारे में जानते हैं? जुलाई-अगस्त महीने में भरपूर मात्रा में मिलने वाला अमरूद अनेक पोषक तत्वों का भंडार होता है और इस वजह से यह कई बीमारियों से शरीर की रक्षा करता है. यानी कुल मिलाकर अमरूद किसी चमत्कारी फल से कम नहीं है. सिर्फ यही नहीं, अमरूद के पत्ते भी सेहत के लिए लाभदायक होते हैं. ये भी कई बीमारियों से शरीर को बचाने में सक्षम हैं, क्योंकि इन पत्तों में एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी जैसे गुण पाए जाते हैं. अमरूद के पत्ते जहां कोलेस्ट्रॉल के नियंत्रण और जोड़ों के दर्द को दूर करने में उपयोगी हैं, तो वही अमरूद खाने के भी कई फायदे हैं. अमरूद को उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) में तो फायदेमंद माना ही जाता है, साथ ही इसके सेवन से पाचन तंत्र भी सही रहता है. हालांकि कभी-कभी कई लोगों को अमरूद का सेवन नुकसान भी पहुंचा सकता है.

अमरूद से होने वाले फायदें

अमरूद में उच्च मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो न केवल पाचन क्रिया में सुधार लाता है और कब्ज से राहत प्रदान करता है, बल्कि आंत की सफाई करने में भी मदद करता है. इसके अलावा अमरूद को थायरॉयड में भी उपयोगी माना जाता है, साथ ही यह विटामिन-ए का बहुत अच्छा स्रोत है, ऐसे में यह आंखों के स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है.

अमरूद से होने वाले नुकसान

अमरूद में उच्च मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो न केवल पाचन क्रिया में सुधार लाता है और कब्ज से राहत प्रदान करता है, बल्कि आंत की सफाई करने में भी मदद करता है.इसके अलावा अमरूद को थायरॉयड में भी उपयोगी माना जाता है, साथ ही यह विटामिन-ए का बहुत अच्छा स्रोत है, ऐसे में यह आंखों के स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है.

  • शुगर लो रहता है तो अमरूद से दूर रहें
  • सर्दी और बुखार मे अमरूद से दूर रहें
  • सर्जरी हुई है या किसी प्रकार का घाव है तो अमरूद से परहेज करें
  • डायरिया,उल्टी और दस्त में अमरूद से दूर रहें
  • किडनी की परेशानी को बढ़ा सकता है अमरूद

Raksha Bandhan: कड़वा फल- क्या अपनी बहन के भविष्य को संवार पाया रवि?

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सोशल मीडिया पर छाई ऋतिक रोशन की हॉट फोटोज, लोगों ने दिए ऐसे रिएक्शन

इन दिनों बॉलीवुड एक्टर ऋतिक रोशन मीडिया की लाइमलाइट में बने हुए है हाल में उनके वैकेशन की तस्वीरे वायरल हो रही है. इससे पहले ऋतिक को उनकी गर्लफ्रेंड के साथ सबा आजाद के साथ मुबंई एयरपोर्ट पर स्पॉट किया गया था. जहां कि तस्वीरे देख फैंस खुश हो रहे थे, वही अब वैकेशन से कुछ फोटो वायरल हुई है जिसमें एक्टर अपनी बॉडी फ्लॉन्ट करते नजर आ रहे है.

 

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आपको बता दें, कि ऋतिक रोशन अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ट्रिप पर गए थे. जहां की फोटो उन्होने सोशल मीडिया पर पोस्ट की है. इन फोटोज में ऋतिक का ट्रांसफोमेशन साफ देखा जा सकता है. ऋतिक अपनी मस्कुलर बॉडी फ्लॉन्ट कर रहे है. यह फोटो जिम की और पूल की दोनों नजर आ रही है. इन फोटो में ऋतिक काफी हैंडसम नजर आ रहे है लोग इनकी फोटो पर तरह तरह के कमेंट करते दिख रहे है वही, ये फोटो सबा आजाद ने क्लिक की है.इसी के साथ ऋतिक  ने कैप्शन दिया है कि ‘वैकेशन खत्म हो गई है पेश पहले और बाद की तस्वीरें’.

 

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ऋतिक की इन तस्वीरों और कैप्शन को देख लोग कमेंट बरसा रहे है. एक यूजर ने लिखा है कि तुम अपनी पहली तस्वीरे से हम लोगों की बाद की तस्वीर से भी कही ज्यादा बेहतर दिख रहे हो. वही, दूसरे शख्स ने लिखा है कि भारतीय सिनेमा में अब तक का सबसे हैंडसम इंसान. वही तीसरे ने लिखा है कि भाई आपको जिम की ज़रुरत नही हैं, जिम को आपकी ज़रुरत है. बताते चले की जल्द ही ऋतिक फिल्म फाइटर में नजर आएंगे.

 

 

KRK और SS Rajamouli के बीच हुई तकरार, ट्विटर पर किए पोस्ट

आमिर खान की लाल सिंह चड्ढा को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है दरअसल, ये फिल्म 2002 में रिलीज हुई थी, जो कि पर्दे पर फ्लॉप साबित हुई थी, लेकिन आमिर खान के खास कजन मंसूर ने एक खुलासा किया है कि एसएस ऱाजामोली ने इस फिल्म में आमिर की एक्टिंग को ओवर एक्टिंग बता दिया. मंसूर खान ने कहा कि राजामौली ने ‘लाल सिंह चड्ढा’ देखी और कहा कि आमिर क्या ओवरएक्टिंग किया है. इस कमेंट के बाद आमिर वाकई अपनी एक्टिंग को लेकर सोच में पड़ गए थे. केआरके को जब इस बारे में पता चला, तो वह एसएस राजामौली पर भड़क गए. उन्होंने RRR के डायरेक्टर को ‘डबल स्टैंडर्ड वाला’ और झूठा’ कहा.

KRK का कहना है कि पहले तो SS Rajamouli ने आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ को मास्टरपीस बताया था, और अब ओवरएक्टिंग बता रहे हैं. केआरके ने राजामौली को सोशल मीडिया पर लपेटे में ले लिया. उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर एक ट्वीट किया, जिसमें एसएस राजामौली को टैग किया.

 

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केआरके ने राजामौली और Aamir Khan की ‘लाल सिंह चड्ढा’ वाले आर्टिकल पर जवाब देते हुए लिखा, ‘यह सबूत है कि कॉपी मास्टर एसएस राजामौली कितने बड़े झूठे हैं. जब उन्होंने आमिर खान के साथ फिल्म (Laal Singh Chaddha) देखी थी, तो इसे मास्टरपीस बताया था. और अब वह कह रहे हैं कि आमिर ने ओवरएक्टिंग की है. मैं ऐसे धोखेबाज और झूठे फिल्ममेकर्स को बख्शता नहीं हूं.’ बताते चले कि आमिर ने अभी तक अपनी कोई नई फिल्म अनाउंस नहीं की है.

कम उम्र में क्यों होता है पुरुषो में हेयर लॉस, क्या है इसके कारण?

किसी इंसान के बाल 13 से 30 साल की उम्र के बीच झड़ जाएं तो ये वाकई परेशान करने वाला हो सकता है. सौभाग्य से, किशोरों में बालों के झड़ने के अधिकांश मामलों को मूल कारण समझने के बाद सफलतापूर्वक रोका जा सकता है. इसलिए, इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि, कम उम्र में हेयर लॉस क्यों होता है? इसके अलावा, छोटी उम्र में बाल झड़ने के कारण के बारे में भी जानकारी देंगे. इन कारणों को जानकर और उनका इलाज करके इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं.

क्या होता है हेयर लॉस

अत्यधिक तनाव, नींद की कमी और क्रैश डाइट के कारण किशोरों में बालों के झड़ने की समस्या हो सकती है. पोषक तत्वों की कमी, हार्मोनल असंतुलन और बालों की खराब देखभाल के तरीके अन्य सामान्य कारण हैं. ऑटोइम्यून, आनुवांशिक और मनोवैज्ञानिक विकारों जैसी गंभीर चिकित्सा स्थितियां भी बालों के झड़ने का कारण हो सकती हैं. इन स्थितियों में तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता होती है.

कम उम्र में हेयर लॉस के क्या है कारण

1. हार्मोनल बदलाव

यौवन और किशोरावस्था के दौरान हार्मोनल परिवर्तन से बालों का झड़ना शुरू हो सकता है. थायराइड और प्रजनन हार्मोन बालों के विकास को नियंत्रित करते हैं, और उनके असंतुलन से बालों के झड़ने की समस्या हो सकती है. थायराइड समस्याओं के कारण बालों का झड़ना पुरुषों और महिलाओं दोनों में आम है. पीसीओएस से संबंधित महिलाओं में बालों का झड़ना प्रारंभिक किशोरावस्था में शुरू हो सकता है.

2. सही पोषण न मिलना

रिफाइंड आटे और चीनी से बनने वाले खाद्य पदार्थों के सेवन और खानपान की खराब आदतें पोषक तत्वों की कमी पैदा कर सकती हैं. एनीमिया (लोहे की कमी के कारण), बुलीमिया, एनोरेक्सिया और क्रैश डाइट किशोरावस्था में और कम उम्र में बाल झड़ने के सामान्य कारण हैं.

3. बहुत ज्यादा तनाव लेना

किशोरावस्था में इंसान शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरता है. ये इंसान में तनाव पैदा कर सकते हैं. शिक्षा, पारिवारिक दायित्व, सामाजिक और व्यक्तिगत संबंध, और साथ के लोगों का दबाव उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है. इससे बालों का झड़ना शुरू हो सकता है.

4. बहुत ज्यादा स्टाइल करना

हेयर स्टाइलिंग टूल्स (ब्लो ड्रायर, हेयर स्ट्रेटनर और कर्लिंग आयरन) का इस्तेमाल करना भी अक्सर बालों को नुकसान और टूटने का कारण बन सकता है. बालों को कलर करना, पर्मिंग, स्ट्रेटनिंग और बालों को बार-बार रिलैक्स करना भी बालों के झड़ने का कारण हो सकता है.

Raksha Bandhan : जिम्मेदारी बहन की सुरक्षा की

‘‘गुडि़या, अब तुम बड़ी हो गई हो. अब तुम्हारी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. तुम मेरी प्यारी बहन हो. तुम्हें कोई तकलीफ होगी तो मुझे दर्द होगा,’’ सुशांत ने अपनी बहन नेहा को समझाते हुए कहा.

‘‘भाई मैं अब बड़ी हो गई हूं. अपना खयाल रख सकती हूं. आप परेशान न हों, आप भी तो मेरे से केवल 2 साल ही बडे़ हैं,’’ नेहा ने अपना तर्क दिया.

‘‘बहन, मैं जानता हूं कि तुम बड़ी हो चुकी हो. अपना खयाल रख सकती हो. फिर भी मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा का वचन देता हूं. 2 साल ही सही पर हूं तो तुम से बड़ा न,’’ सुशांत ने बात को समझाने का प्रयास किया.

‘‘हां, मान गई भाई, तुम जीते और मैं हारी. अब चौकलेट मुझे दो और मुझे इस का स्वाद लेने दो,’’ भाई के तर्क के आगे हार मानते हुए नेहा ने कहा.

इस तरह की जिम्मेदारी भरी नोकझोंक हर घर में भाईबहन के बीच होती ही रहती है. यह नोकझोंक आज की नहीं है. हर पीढ़ी के बीच होती रही है. नई पीढ़ी की बहन को लगता है कि वह बहुत बड़ी, समझदार और जिम्मेदार हो गई है और उसे भाई की मदद की जरूरत नहीं रह गई है. इस के विपरीत भाई को यह लगता है कि उस की बहन अभी मासूम, छोटी सी गुडि़या है, जिसे समाज में अच्छेबुरे का पता नहीं है. ऐसे में वह परेशान हो सकती है.

कई बार बड़ी होती बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर भाई या परिवार के दूसरे लोग उस की आजादी में बाधक हैं. असल में यही वह सोच है जो बहन को समझनी चाहिए. भाई या परिवार का कोई सदस्य उस की आजादी में बाधक नहीं होता. वह यह जरूर चाहता है कि लड़की के दामन पर कोई दाग न लगे, जो जीवन भर उसे परेशान करता रहे.

भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी

जब हम बहन की सुरक्षा की बात करते हैं तो केवल शारीरिक सुरक्षा ही मुद्दा नहीं होता बल्कि बहन की शारीरिक सुरक्षा के साथ ही साथ उस की भावनात्मक सुरक्षा भी जरूरी होती है. बड़ी होती बहन के दोस्तों में केवल लड़कियां ही नहीं होतीं लड़के भी होते हैं. इन दोस्तों में कई मासूमियत का लाभ उठाने के प्रयास में रहते हैं. बहन को लगता है कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को रोका जा रहा है. ऐसे में कई बार वह ऐसी बातों को छिपा जाती है, जो उस की सुरक्षा के लिए जरूरी होती हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बहन के साथ भाई भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे. भाई और बहन के बीच उम्र का अंतर काफी कम होता है. इसलिए बहन और भाई की सोच एकजैसी होती है. कई बार बहन अपने मातापिता को कई बातें नहीं बताती पर अपने भाई को बता देती है.

मनोविज्ञानी डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘‘यहां पर भाई की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. वह बहन के साथ इमोशनली ऐसे व्यवहार रखे जिस से बहन हर बात उस को बताती रहे. ज्यादातर परेशानियां वहीं से शुरू होती हैं जब बच्चे अपनी बातें छिपाना शुरू करते हैं. यह केवल बहनें ही नहीं भाई भी करते हैं. जब भाई अपनी बातें बहन को बताएगा तो बहन भी उसे अपनी बातें बताने में संकोच नहीं करेगी. जरूरत इस बात की है कि बहन और भाई के बीच रिश्ता दोस्ताना भी बना रहे. अगर भाई पेरैंट्स की तरह बहन से व्यवहार करेगा तो वह बात को छिपा सकती है. दोस्त की तरह भाई संबंध रखेगा तो परेशानी नहीं आएगी. भाई को शारीरिक सुरक्षा के साथ बहन को भावनात्मक सुरक्षा भी देनी चाहिए.’’

सोच बदलने की जरूरत

लड़की और लड़के के बीच समाज एक तरह का फर्क करता है, जिस की वजह से कुछ बातें भाई के लिए उतनी बुरी नहीं समझी जातीं जितनी बहन के लिए समझी जाती हैं. इस बात को समझने के लिए देखें तो भाई की गर्लफ्रैंड को ले कर उतना हंगामा नहीं होता जितना बहन के बौयफ्रैंड को ले कर होता है.

आज जब महिला अधिकारों की बात हो रही है तो बहन भी अपने लिए भाई जैसे अधिकार चाहती है. समाज भाई की गलतियों को उस तरह से नहीं लेता जिस तरह से बहन की गलतियों को लेता है. यह समाज की एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता है. यही वजह है कि केवल भाई ही नहीं पेरैंट्स भी बेटी को ले कर बेटे से अधिक सचेत रहते हैं. इस बात से ही लड़कियों का मतभेद होता है. वे इस सोच में भाईबहन के सामाजिक अधिकार के अंतर को ले कर विद्रोही हो जाती हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता विनीता ग्रेवाल कहती हैं, ‘‘लड़कियों के भोलेपन का लाभ उठाने वाला पुरुषवर्ग ही होता है. इस में कई बार करीबी रिश्तेदार तक शामिल होते हैं. जरूरत इस बात की है कि लड़कियों को भी यह समझाया जाए कि वे सही और गलत के फर्क को समझ सकें. हमारे समाज में सैक्स की चर्चा पूरी तरह से बेमानी मानी जाती है ़ऐसे में सैक्स को ले कर लड़कियां जागरूक नहीं होतीं, यह बात उन के लिए मुसीबत का सबब बनती है. सैक्स संबंधों को ले कर ज्यादातर लड़कियां इमोशनली ठगी जाती हैं, जिस का प्रभाव केवल उन के  जीवन पर ही नहीं पड़ता बल्कि परिवार पर भी पड़ता है. समाज सीधे सवाल करता है कि लड़की की सुरक्षा का परिवार वालों ने खयाल नहीं रखा. इस वजह से पेरैंट्स और भाई कुछ ज्यादा ही परेशान रहते हैं. अपनी आजादी के साथ लड़कियों को इस तर्क को सामने रख कर सोचना चाहिए, जिस से विद्रोह जैसे हालात से बचा जा सकता है.’’

खुद बनें मजबूत

समय बदल रहा है. आज लड़की को लड़के जैसे अधिकार हासिल हैं. वह भी पढ़ाई, कोचिंग, शौपिंग के लिए खुद ही जाना चाहती है. कई घरों में लड़कियों के भाई नहीं हैं, केवल पेरैंट्स ही हैं. ऐसे में हर जगह बहन की सुरक्षा में भाई नहीं मौजूद रह सकता. तब लड़कियों को खुद ही मजबूत बनना पडे़गा. केवल मानसिक  रूप से ही नहीं शारीरिक रूप से भी उसे मजबूत रहना है. यही नहीं कानून ने जो अधिकार उसे दिए हैं वे भी उसे पता होने चाहिए, जिस से पुलिस और प्रशासन से अपने लिए मदद हासिल कर सके. आज सैल्फ डिफैंस के तमाम कार्यक्रम चल रहे हैं, जिन से लड़कियां अपना बचाव कर सकें. ऐसे में जरूरी है कि लड़कियां शारीरिक मेहनत करें और खुद को मजबूत बनाएं. इस के बाद वे जरूरत पड़ने पर अपना बचाव करने में सक्षम हो सकेंगी, जिस पेरैंट्स और भाई को इस बात का यकीन होता है कि लड़की अपनी सुरक्षा खुद कर सकती है तो वह चिंतामुक्त होता है.

रैड बिग्रेड संस्था लड़कियों को आत्मरक्षा के तमाम गुण सिखाती है. संस्था की संचालक ऊषा विश्वकर्मा कहती हैं, ‘‘केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि लड़कियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से कमजोर बौडी वाली लड़कियां भी मजबूत से मजबूत विरोधी को मात दे कर अपना बचाव कर सकती हैं. स्कूल, पेरैंट्स, सरकार और समाज को सहयोग कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से लड़की मजबूत ही नहीं होगी, उस के अंदर का डर भी खत्म हो जाएगा.’’

ऊषा को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देने के लिए कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. वे अपने स्तर से कई तरह की वर्कशौप कर के सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हैं.

बढ़ाएं आपसी समझदारी

बहन की सुरक्षा भाई की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में जरूरी है कि भाईबहन के बीच आपसी समझदारी बढे़. जब दोनों के बीच आपसी समझदारी होगी तो उसे किसी भी तरह की परेशानी का अनुभव नहीं होगा. वह यह नहीं सोचेगी कि सुरक्षा के नाम पर उस की आजादी को प्रभावित किया जा रहा है. जब उस को समझाया जाएगा कि यह सुरक्षा क्यों जरूरी है, तो वह किसी बात को छिपाएगी नहीं. जब भाईबहन एकदूसरे से कुछ छिपाएंगे नहीं तो आपस में समझदारी बढ़ेगी, जिस से खुद ही सुरक्षा का एहसास होगा. सुरक्षा का यह एहसास खुद में आत्मविश्वास पैदा करेगा. आज के दौर में समाज और हालात बहुत बदल चुके हैं. ऐसे में बच्चों के बीच आपसी समझदारी जरूरी है.

अंश वैलफेयर की अध्यक्षा श्रद्धा सक्सेना कहती हैं, ‘‘बदलते दौर में भाई और बहन दोनों को समान अवसर मिले हैं. ऐेसे में जरूरी है कि वे आपसी समझदारी दिखाएं. केवल बहन पर ही नहीं अगर भाई पर भी कोई उंगली उठती है तो बहन को भी उतनी ही तकलीफ होती है. टीनएज में होने वाले क्रश का प्रभाव केवल बहन पर ही नहीं पड़ता भाई का जीवन और कैरियर भी उस से प्रभावित होता है. ऐसे में जब भाईबहन समझदारी भरा व्यवहार करते हैं आपस में बातें शेयर करते हैं तो मुसीबतों से बचे रहते हैं, कई घरपरिवार में बहन बड़ी होती है, ऐसे में वह भाई को पूरी सुरक्षा देती है. भाई केवल बहन को ही नहीं बहन भी भाई को खुश और सुरक्षित देखना चाहती है.’’

सैक्स के दौरान मुझे क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

सवाल

मैं एमएनसी में काम करती हूं. वहां का माहौल काफी ओपन है. जब जौब नहीं लगी थी तब मेरा एक बौयफ्रैंड था और अब जौब लगने के बाद औफिस में मेरा एक और बौयफ्रैंड बन गया है.
अब मेरे मल्टीपल सैक्सुअल पार्टनर हैं. मैं दोनों के साथ सैक्स करती हूं. मैं जानती हूं कि यह सब ठीक नहीं है लेकिन मैं ने दोनों में से किसी के साथ शादी करने का कोई वादा नहीं किया है. मुझे इसलिए कोई गिल्ट नहीं है. वैसे तो मैं प्रीकौशन लेती हूं, क्या करूं?

जवाब

आप की लाइफ है, आप के फैसले हैं. पढ़ीलिखी हैं, समझदार हैं, अपना अच्छाबुरा सम?ाती हैं तो आप पर हम अपनी राय नहीं थोपना चाहते. बस, इतना बता देते हैं कि एक से ज्यादा सैक्स पार्टनर का होना जोखिमभरा हो सकता है. मल्टीपल पार्टनर के साथ सैक्स करने से पहले अपने यौन स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है.
आप मल्टीपल पार्टनर के साथ संबंध बना रही हैं तो अपनी सैक्सुअल हैल्थ का आप को पूरा ध्यान रखना होगा. सैक्सुअल ऐक्टिविटी में शामिल होने पर प्रोटैक्शन लेना बहुत जरूरी है.
रैगुलर यौन संचारित रोग (एसटीआई) टैस्ट कराएं, भले ही कोई लक्षण महसूस न हो. सेफ साइड जरूरी है. सैक्स ट्रांसमिटिड डिजीज के खतरों और रोकथाम के तरीकों के बारे में पूरी जानकारी रखें. ऐसा कर के आप संभावित जोखिम को अपने और अपने पार्टनर के लिए बहुत हद तक कम कर सकती हैं.

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