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विकास दुबे एनकाउंटर : कई राज हुए दफन

आखिरकार एक तथाकथित ऐनकाउंटर में उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा गैंगस्टर विकास दुबे के साथ ही एक गहरे सच की भी हत्या कर दी गई. अपराध, राजनीति, कारोबार और पुलिस के नैक्सस के भंडाफोड़ का जो खतरा विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से लगातार कई सफेदपोशों और खाकीधारियों के सिर पर मंडरा रहा था, वह विकास दुबे की हत्या के साथ ही खत्म हो गया है.

विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से ही न जाने कितने सफेदपोशों का ब्लडप्रैशर बढ़ गया था. ऐनकाउंटर से पहले ही अपने बयान में उस ने कई नेताओं, कारोबारियों और पुलिस वालों के नाम बताए थे, जिन्होंने उस की बिठूर से उज्जैन तक पहुंचने में मदद की थी.

अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में विजय दुबे का इस्तेमाल करने वाले नेताओं, कारोबारियों, पुलिस वालों का नाम खुलता तो राजनीति, कारोबार और प्रशासन की दुनिया में भूचाल आ जाता.

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हमें पता है कि सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति का इस्तेमाल किस तरह से हरेन पंड्या समेत कितने लोगों को ठिकाने लगाने में किया गया था और जब सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति गिरफ्तार होने के बाद सत्ताधारी सफेदपोशों के लिए खतरा बन गए तो उन्हें नकली ऐनकाउंटर में ढेर कर दिया गया.

विकास दुबे उत्तर प्रदेश का सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति था, जिस का इस्तेमाल तमाम सत्ताधारी दल करते आए हैं. बस, फर्क इतना था कि विकास दुबे के पास ब्राह्मण का ऐक्स फैक्टर था, जो वंचित तबके से होने के नाते सोहराबुद्दीन शेख और तुलसीराम प्रजापति के पास नहीं था.

पर सवाल उठता है कि जो गैंगस्टर लगातार कई राज्यों की पुलिस को छकाता हुआ उज्जैन के महाकाल मंदिर में सरैंडर करता है, ताकि उस का ऐनकाउंटर न हो सके, वह भला पुलिस कस्टडी से भाग कर अपने ऐनकाउंटर को न्योता क्यों देगा?

पुलिस की ऐनकाउंटर थ्योरी इतनी हास्यास्पद और लचर है कि इस पर रत्तीभर भी यकीन नहीं किया जा सकता. उत्तर प्रदेश एसटीएफ गाड़ी पलटने की बात कह रही है. गाड़ी पलटने पर बुरी तरह घायल आदमी कैसे भाग सकता है? लेकिन पुलिस की थ्योरी है तो कुछ भी हो सकता है.

पुलिस कह रही है कि गाड़ी पलटी और वही गाड़ी पलटी, जिस में गैंगस्टर विकास दुबे बैठा हुआ था. गाड़ी पलटने के बाद बुरी तरह जख्मी गैंगस्टर ने पुलिस की रिवाल्वर छीन कर भागने की कोशिश की, सरैंडर करने के लिए कहने पर पुलिस पर फायरिंग की और जवाबी कार्यवाही में मारा गया. पुलिस के मुताबिक गोली उस के पेट में लगी थी.

लेकिन, किसी भागते आदमी के पेट में गोली कैसे लग सकती है? वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस कह रही है तो हो भी सकता है. सवाल तो यह भी उठ रहा है कि गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने इतने शातिर अपराधी को हथकड़ी क्यों नहीं पहनाई थी?

गाड़ी का भी गजब कनैक्शन था. फरीदाबाद से गिरफ्तार गैंगस्टर विकास दुबे के गुरगे प्रभात मिश्रा का ऐनकाउंटर जब उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने किया था, तब भी पुलिस की गाड़ी पंचर हो गई थी और जब पुलिस ने गैंगस्टर विकास दुबे का ऐनकाउंटर किया तो ऐनकाउंटर से पहले उस की गाड़ी पलट गई. उत्तर प्रदेश पुलिस की यह कहानी हिंदी फिल्मों से नकल कर के गढ़ी गई लगती है.

विकास दुबे की गिरफ्तारी के बाद से ही समाज के कई तबकों में नाखुशी थी. लोगों को ‘इंसाफ’ नहीं ‘बदला’ चाहिए था. ऐनकाउंटर का बदला ऐनकाउंटर. और सोशल मीडिया पर लगातार इस को ले कर लिखा जा रहा था.

इस से पहले हैदराबाद में पशु डाक्टर के साथ गैंगरेप के तथाकथित 4 आरोपियों को पुलिस ने क्राइम सीन क्रिएट करने के दौरान ही नकली ऐनकाउंटर में मार डाला था और सोशल मीडिया पर उस ऐनकाउंटर के समर्थन में साधारण जन से ले कर बुद्धिजीवी लोग तक न सिर्फ खड़े थे, बल्कि इस के लिए पुलिस की पीठ थपथपा रहे थे.

यह सीधेसीधे न्याय व्यवस्था का नकारापन है. हो सकता है, न्याय व्यवस्था में कुछ खामियां हों, लेकिन भ्रष्टाचारी पुलिस तंत्र द्वारा ऐनकाउंटर में हत्या करने को तो सही नहीं ठहराया जा सकता है न.

ये वही पुलिस वाले थे, जिन की आंखों के सामने गैंगस्टर विकास दुबे ने साल 2001 में राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या की थी और सभी पुलिस वाले कोर्ट में बयान से मुकर गए थे.

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ये वही पुलिस वाले थे, जो 2 जुलाई को 8 पुलिस वालों द्वारा गैंगस्टर के हाथों ऐनकाउंटर कराने के लिए विकास दुबे के मुखबिर बने हुए थे.

ये वही पुलिस वाले थे, जिन्होंने पावर हाउस फोन कर के बिठूर गांव और आसपास के इलाके की लाइट कटवाई थी.

इन पुलिस वालों ने अपराधी विकास दुबे का ऐनकाउंटर नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और सच का ऐनकाउंटर किया है.

सुबह साढ़े 6 बजे ‘आज तक’ चैनल बताता है कि विकास दुबे कानपुर के पास टोल तक पहुंच गया है, साथ ही ‘आज तक’ ने यह भी बताया कि यहां पर मीडिया वालों की गाडि़यां रोक दी गई हैं. इस के बावजूद ‘आज तक’ की गाड़ी आगे निकली.

विकास दुबे वाली गाड़ी ने उसे ओवरटेक किया. उस के एक घंटे बाद खबर आई कि आगे विकास की गाड़ी पलट गई. स्पीड से चलती गाड़ी ने एक ही पलटा खाया. उस में सवार पुलिस वालों और विकास ने थोड़ीबहुत चोट खाई और डेढ़ घंटे बाद फिर खबर आई कि विकास पुलिस वालों का हथियार छीन कर भागा. ऐसे में जो होता है, वही हुआ. विकास मारा गया.

विकास दुबे मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक वकील घनश्याम उपाध्याय ने याचिका दायर की है. उस में कहा गया है कि मीडिया रिपोर्ट से लग रहा है कि विकास दुबे ने महाकाल मंदिर में गार्ड को खुद ही जानकारी दी.

मध्य प्रदेश पुलिस को विकास दूबे ने खुद ही गिरफ्तारी दी, ताकि मुठभेड़ से बच सके. याचिका में आशंका जताई गई थी कि उत्तर प्रदेश पुलिस विकास का ऐनकाउंटर कर सकती है.

याचिका में मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने की मांग की गई है. इस में कहा गया है कि  विकास दुबे का घर, शौपिंग माल व गाडि़यां तोड़ने पर उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो. मामले की जांच के लिए समय सीमा तय की जाए. यह तय किया जाए कि पुलिस विकास दुबे का ऐनकाउंटर न कर सके और उस की जान बचाई जा सके.

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अनजाने पल: सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

अनजाने पल : भाग 4- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

एक दिन जब मैं फैक्टरी से कार में लौट रही थी तो एक शराबी मेरी गाड़ी से टकरा कर गिर पड़ा. मैं ने गाड़ी रोकी और उसे अस्पताल ले गई. उस का इलाज करवाया. बाद में परिचय पूछने पर उस ने अपना नाम विकास बताया. उस ने बताया कि उस की पत्नी किरण कुछ दिनों पहले मर गई है. शादी हुए 2 साल ही हुए थे कि वह गुजर गई. उस के वियोग को सहन न कर पाने के कारण विकास ने शराब पीना शुरू कर दिया था.

विकास का भी कपड़े का व्यापार था. पर उस ने किरण के गुजर जाने के बाद उस की तरफ ध्यान नहीं दिया था. दुखी ही दुखियारे का दुख समझ सकता है. मैं ने विकास को सहारा दिया, उस के अंदर प्रेरणा जगाई. धीरेधीरे विकास मुझ से प्रेम करने लगा. उस ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं झिझकी. तब उस ने कहा, ‘मुझे अपने पर विश्वास नहीं है. अगर तुम ने मुझे ठुकरा दिया तो मैं फिर से कहीं शराबी न बन जाऊं.’

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मैं ने सोचा, दिशाहीन चलती अपनी जीवननैया को अगर खेवैया मिल रहा हो तो इनकार नहीं करना चाहिए. हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत भी थी ही.

पर मन ने सचेत किया, ‘आज इसे मेरी जरूरत है, कल जरूरत न पड़े तो आनंद की तरह ही दूध की मक्खी के समान फेंक दे तो…’

मैं ने उस के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

हम दोनों का व्यापार एकजैसा होने के कारण हम अकसर मिलते. परंतु विकास ने दोबारा मुझ से इस बारे में चर्चा नहीं की. हम दोनों होटल में व्यापार के सिलसिले में ही एक गोष्ठी में भाग लेने गए थे. विकास ने मुझे विचारों के घेरे से बाहर निकाला, ‘‘सावित्री, तुम ने कुछ भी नहीं खाया है. सारे लोग खा कर जा चुके हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘ओह, मुझे माफ कर दो, विकास. पुरानी यादों में मैं खो गई थी.’’

‘‘मैं समझ गया था. मैं ने उन लोगों से कह दिया है कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है. चलो, हम यहां से सीधे आनंद के पास चलते हैं.’’

‘‘अभी वे लोग हमें आनंद से मिलने देंगे?’’

‘‘कम से कम नीलिमा से तो मिल लोगी.’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती, स्वयं ही चली जाऊंगी. तुम गोष्ठी में जाओ.’’

उस ने मेरी बात न मानी. अपने सहायक को सारी बातें समझा कर वह मेरे साथ चल पड़ा. उस ने अपने ड्राइवर से गाड़ी घर भेज देने को कह दिया.

जब हम अस्पताल पहुंचे तो नीलिमा बाहर ही खड़ी मिली. वह रो पड़ी थी. अश्रुपूरित नेत्रों से उस ने हम से जुदा होने के बाद की कहानी सुनाई. जब माया ने आनंद से विवाह किया तो नीलू बहुत खुश थी. माया उस से बहुत प्यार करती थी. आनंद भी बहुत खुश था.

परंतु नीलू को माया का धीरेधीरे आंनद के करीब आना अच्छा न लगा. वह थी भी जिद्दी. आनंद का प्यार उस के लिए कम होने पर वह सह नहीं पाई. माया को वह कभी आनंद के साथ कहीं न जाने देती और उस के करीब भी न जाने देती. इस बात को ले कर हर रोज झगड़ा होता, तकरार होती, परंतु अंत में जीत नीलू की ही होती.

जब माया का बेटा हुआ तो नीलू को बहुत अच्छा लगा, लेकिन माया गुड्डू को सदा नीलू से दूरदूर ही रखती. एक दिन गुड्डू पालने में सो रहा था. माया रसोई में खाना बना रही थी. अचानक वह जाग गया और रोने लगा.

नीलू अपने कमरे से भाग कर आई और गुड्डू को गोद में उठाना चाहा. वह नीचे गिरने को हुआ तो माया ने उसे उठा लिया. माया ने सोचा कि वह गुड्डू को पालने से नीचे गिराना चाह रही थी. नीलू ने कितना समझाने की कोशिश की, परंतु न तो वह समझी, न ही उस ने आनंद को समझाने का मौका दिया. आनंद के ऐसे कान भरे कि रात में उस ने नीलू को मारा भी.

इस घटना के बाद उस परिवार में एक दरार उत्पन्न हो गई, जो बढ़ती ही गई. ऐसे ही वातावरण में दुखी, तिरस्कृत, उपेक्षित, प्यार के लिए तरसतीबिलखती नीलू बड़ी होती गई. मुझे सोच कर हैरानी होती है कि आनंद ने अपने ही खून को इस तरह लाचार, विवश और दुखी क्यों बनाया?

इस घटना के बाद जब से आनंद का तबादला चेन्नई हुआ, तब से नीलू हर रोज यही सोचती कि उस की मां उसे दोबारा मिल जाए.

मैं ने अश्रुपूरित नेत्रों से बेटी को देखा. 9 साल की उम्र में उस ने क्याकुछ नहीं देखा और सहा था. आनंद और माया हर जगह गुड्डू को ले जाते और नीलिमा को घर पर छोड़ जाते. इस बार भी डिजनीलैंड से लौटते समय कार दुर्घटना में यह हादसा हो गया था. माया की मौत हो गई थी और आनंद भी बुरी तरह जख्मी हो जीवन व मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था. गुड्डू को तनिक भी चोट नहीं आई थी.

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नीलिमा जब यह सब बता रही थी, उसी दौरान आनंद भी गुजर गया. उस से कुछ कहनेसुनने का मौका भी न मिला. मैं दोनों बच्चों को घर ले आई. विकास ने आनंद के अंतिम संस्कार में मेरी काफी मदद की. पूछताछ के दौरान पता चला कि माया का कोई रिश्तेदार नहीं था. मैं किस रिश्ते से बच्चे को यहां रखती. स्कूल में उस का क्या नाम देती. सोच में डूबी हुई थी कि नीलू अंदर आई. उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या तुम गुड्डू की भी मां बनोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं गुड्डू की मां ही तो हूं.’’

‘‘मैं ने आप को कितना गलत समझा था मां,’’ नीलू आत्मग्लानि से भर कर बोली.

‘‘मेरी भी तो कुछ गलती थी.’’

‘‘मैं ने आप से मिलने की बहुत कोशिश की, पर पिताजी और माया आंटी ने मौका ही नहीं दिया.’’

‘‘बेटी, जो गुजर गए, उन के बारे में अपशब्द नहीं कहते.’’

गुड्डू रोता हुआ वहां आया. 3 बरस का गोलमटोल गुड्डू बहुत प्यारा लगता था. तोतली जबान में जब उस ने पुकारा ‘दीदी’, तो नीलू ने उसे अपनी बांहों में समेटते हुए कहा, ‘‘गुड्डू, ये हमारी मां हैं.’’

मैं ने उसे गोद में ले कर पुचकारा. वह बहुत देर तक ‘मम्मीमम्मी’ कह कर रोता रहा. मैं सोचने लगी, जिस पति ने मुझे मेरी बेटी से इसलिए अलग किया था, क्योंकि उस के अनुसार, मुझ में ममता नहीं थी, स्नेह नहीं था, और अब समय का खेल देखिए उस के बच्चे मेरी गोद में आ गए.

इतने में विकास भीतर आया और बोला, ‘‘आज इन बच्चों की परवरिश के लिए पिता का स्थान मुझे दे सकोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे होंगे तो क्या होगा?’’

‘‘सरकार के परिवार नियोजन का बोर्ड नहीं देखा. 2 बच्चे बस, 2 से अधिक नहीं. मैं ने औपरेशन करवा लिया है,’’ वह बोला.

‘‘अगर मैं विवाह से इनकार कर देती तो…तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

‘‘तुम इनकार कर दो, तब भी ये बच्चे हमारे ही रहेंगे. इन बच्चों को हम ने साथसाथ ही पाया है. इसलिए मैं ने इन का संरक्षक बन कर जीवन गुजारने का निश्चिय कर लिया है.’’

इस से आगे मुझ में इनकार करने की शक्ति नहीं थी. परंतु मैं ने नीलिमा को बुला कर पूछा, ‘‘विकास अंकल को पापा कह सकोगी?’’

‘‘अगर गुड्डू के लिए तुम मां हो तो अंकल हम दोनों के पापा हुए न…’’

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हम उस अनजाने पल में एकदूसरे से पूरी तरह बंध चुके थे. मैं ने कृतज्ञताभरी दृष्टि से विकास की ओर देखा. मेरी नजरों में छिपी सहमति विकास की नजरों से छिप न सकी.

अनजाने पल : भाग 3- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

मैंने फिर विनम्रता और स्नेह से कहा, ‘बेटी, मैं तबादले की कोशिश करूंगी. तब तक तुम मेरे साथ रहो. एक साल के भीतर हम यहीं आ जाएंगे.’

नीलिमा ने पलट कर पिता की ओर देखा, ‘क्यों, मंजूर है?’

आनंद बोला, ‘सोच लो. मैं वहां नहीं रहूंगा. तुम्हें घर में अकेले दीवारों से बातें करते हुए रहना पड़ेगा. फिर तुम्हारी मां के कथन में न जाने कितनी सचाई. बाद में मुकर जाए तो…’

मुझे आनंद पर बहुत क्रोध आया कि न जाने भाईबहन ने नीलिमा से मेरे विरुद्ध  क्या कुछ कह दिया था. वह बेचारी अपने नन्हे से मस्तिष्क में विचारों का बवंडर लिए चुप रह गई.

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मेरी ननद ने कहा, ‘अभी बच्ची को ले जाने की क्या जरूरत है. जब तबादला हो जाए तब देख लेंगे. अभी तो वह यहां बहुत खुश है.’ मुझे यह सलाह ठीक लगी. मैं अगली ट्रेन से ही दिल्ली लौट आई. मेरे मन में भी आगे के कार्यक्रमों के बारे में योजनाएं बनने लगी थीं. मैं ने लौटते ही अपने तबादले के बारे में सैक्रेटरी से अनुरोध किया तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी प्रिंसिपल की नौकरी के लिए सिफारिश आई है. क्या यह सबकुछ छोड़ कर जयपुर जाना चाहोगी?’

मैं ने कहा, ‘परिवार की खुशी के लिए नारी को थोड़ा सा त्याग करना ही पड़ता है. तभी तो वह नारी होने का दायित्व निभा पाती है.’

मुझे लोगों ने बहुत समझाया, पर मैं टस से मस न हुई. लेकिन तबादले की अर्जी देते ही तो तबादला नहीं हो जाता. सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षकों का आदानप्रदान हो सकता है. यूनिवर्सिटी में उत्तरपुस्तिकाओं की जांच के दौरान मेरी रजनी से मुलाकात हुई. उस के पति का दिल्ली तबादला हो गया था और वह भी यहां आना चाहती थी. जयपुर कालेज से दिल्ली आने की उस की उत्सुकता देख मैं भी अत्यंत प्रसन्न हुई. हम दोनों ने ही आदानप्रदान के सारे कागजात जमा करवा दिए.

फिर मैं 4 दिनों की छुट्टी ले जयपुर गई. जयपुर से मेरे पति के पत्र नियमित रूप से नहीं आते थे. ननद तो कभी लिखती ही नहीं थी. मैं अपने खयालों में खोई हुई यह सोच भी नहीं पाई कि शायद वे लोग मुझ से कन्नी काट रहे हैं.

जयपुर पहुंचने पर पता चला कि ननद को कैंसर था. जब तक पता चला, काफी देर हो चुकी थी. उन की देखभाल के लिए माया नाम की 20-21 वर्षीय नर्स रख ली गई थी. मैं ने पति से पूछा, ‘मुझे सूचना क्यों नहीं दी, क्या मैं इतनी गैर हो गई थी?’

आनंद ने कहा, ‘पता नहीं, तुम छुट्टी ले कर आतीं या नहीं. और इस बीमारी में इलाज भी काफी दिनों तक चलता रहता है.’

मैं ने उस समय भी यही सोचा कि शायद उस ने मेरे बारे में ठीक ही निर्णय लिया होगा. मैं ने अपने तबादले के बारे में उस से जिक्र किया तो वह बोला, ‘इस समय तुम्हारा तबादला कराना ठीक नहीं होगा. दीदी बहुत बीमार हैं. माया उन की देखभाल अच्छी तरह कर ही लेती है. वह इलाज के बारे में सबकुछ जानती भी है. नीलू भी उस से काफी हिलमिल गई है.’

‘मेरे आने से इस में क्या रुकावट आ सकती है?’

‘डाक्टरों का कहना है कि दीदी महीने, 2 महीने से ज्यादा रहेंगी नहीं. फिर मैं भी जयपुर में रहना नहीं चाहता. मेरा अगला तबादला जहां होगा, तुम वहीं आ जाना. यही ठीक रहेगा.’

मैं समझ ही नहीं पाई कि वह मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रहा है या मेरी भलाई चाहता है. मैं नीलू से जब भी कुछ बोलना चाहती, वह  ‘मां, मुझे परेशान मत करो’, कह कर भाग जाती.

माया दिल की अच्छी लगती थी, देखने में भी सुंदर थी. नीलू से वह बहुत प्यार करती थी. परंतु मैं ने पाया कि वह मेरे पति और बेटी के कुछ ज्यादा ही करीब है. वातावरण कुछ बोझिल सा लगने लगा. ननद मुझ से ठीक तरह से बोलती ही नहीं थी. वह बोलने की स्थिति में थी भी नहीं, क्योंकि काफी कमजोर और बीमार थी.

मैं वहां 2 दिनों से ज्यादा रुक न पाई. जाने से पहले मैं ने रजनी को अपनी मजबूरी बताते हुए फोन कर दिया था.

जब दिल्ली लौटी तो मन में दुविधा थी, ‘क्या मुझे जबरदस्ती वहां रुक जाना चाहिए था. पर किस के लिए रुकती? सब तो मुझे अजनबी समझते थे.’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

मुश्किल से 10 दिन बीते होंगे कि आनंद का पत्र आया. ‘दीदी की मृत्यु उसी दिन हो गई थी, जिस दिन तुम दिल्ली लौटी. मैं ने यहां से तबादले के लिए अर्जी भेजी है. आगे कुछ नहीं लिखा था. मैं ने संवेदना प्रकट करते हुए जवाब भेज दिया. इस के बाद एक महीना बीत गया. आनंद ने मेरे किसी भी पत्र का जवाब नहीं दिया.

मैं ने चिंतातुर जब बैंक मुख्यालय को फोन किया तो पता चला कि आनंद 15 दिन पहले ही तबादला ले कर मुंबई जा चुका है. उस ने जाने की मुझे कोई खबर नहीं दी थी.

मेरा मन आनंद की तरफ से उचट गया. मुझे मर्दों से नफरत सी होने लगी. इस प्रकार मुझ से दूरी बनाए रखने का क्या कारण हो सकता है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

मैं ने अभी तक अपनी घर की स्थिति के बारे में पिताजी को कुछ नहीं बताया था. सोचा, उन्हें क्यों परेशानी में डालूं. मां तो थी नहीं. पिताजी वैसे भी व्यापार के सिलसिले में हमेशा ही दौरे पर रहते थे. अभी मैं सोच ही रही थी कि पिताजी से मिल आऊं कि आनंद का पत्र आ गया. पत्र देख कर मेरा मन आनंदित हो गया.

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बड़े ही उत्साह से मैं ने पत्र खोला. अब तो मैं नौकरी छोड़ कर भी अपनी बच्ची और पति के पास लौटने के लिए बेताब हो रही थी. कितनी अजीब होती है नारी, अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए परिवार से अलग हुई थी. अब उसी प्रकार परिवार से जुड़ने के लिए सबकुछ छोड़ने को उद्यत हो गई. लेकिन पत्र पढ़ते ही मेरा चेहरा फक पड़ गया. ऐसा लगा, मानो हजारों बरछियां शरीर को छलनी कर रही हों. बड़े ही अनुनयविनय से कड़वी दवा पर मीठी टिकिया का लेप चढ़ा कर पत्र भेजा था. सारांश यही था कि वह माया से विवाह करना चाहता है. माया के गर्भ में उस का बच्चा है. वह मुझ से तलाक चाहता है.

मेरी समझ में सारी बातें आ गईं. मुझ से अलगाव रखना, चिट्ठी न लिखना और खिंचेखिंचे रहने के पीछे क्या कारण था. यह मैं समझ गई. उस कायर की दुर्बलता पर मुझे हंसी आई. साफसाफ कह देता तो क्या मैं मुकर जाती.

मुझे नीलिमा के लिए डर लगने लगा था. परंतु उस ने लिखा था, नीलिमा माया से बहुत प्यार करती है. इसलिए वह  हमारे साथ ही रहेगी. मैं ने अपने दिल को कठोर बना कर तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए, कानूनी कार्यवाही के बाद 4 वर्षों में तलाक भी हो गया. मैं पिता के पास चेन्नई लौट आई.

मैं ने व्यापार में पिताजी का हाथ बंटाने का निश्चय कर लिया. दिल्ली की नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया. चेन्नई में हमारी कंपनी खूब अच्छी चल रही थी. मैं ने पूरी निष्ठा से अपने को काम में समर्पित कर दिया. पर पिताजी वह सदमा झेल न पाए. तलाक होने के 2 महीने बाद ही हृदयगति रुक जाने से उन की मृत्यु हो गई.

मेरी जिंदगी की गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ने लगी. मैं कई मर्दों से व्यापार के दौरान मिलती. परंतु किसी से भी व्यापारिक चर्चा के अलावा कोई बात न करती. लोग मुझ से कहते भी कि तुम दोबारा विवाह क्यों नहीं कर लेतीं. परंतु मैं ने पुनर्विवाह न करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

अनजाने पल : भाग 2- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

मैं दंग रह गई. थोड़ी देर बाद पूछा, ‘आप वहां क्यों नहीं रहेंगे? हमारी बच्ची की देखभाल भी वहां ढंग से हो जाएगी. मैं भी उसे ज्यादा समय दे पाऊंगी.’

‘क्या तुम सोचती हो कि मैं तुम्हारे टुकड़ों पर पलूंगा. मैं मर्द हूं. याद नहीं है, मैं ने तुम्हारे पिताजी से क्या कहा था?’

‘भला उसे मैं भूल सकती हूं. तुम ने पिताजी से कितने आक्रोश में कहा था कि मैं चाहे मिट जाऊं, परंतु दूसरों के टुकड़ों पर नहीं पल सकता. मेरे बाजुओं की ताकत पर भरोसा हो तो अपनी लड़की का हाथ मेरे हाथ में दें. अपनी खुद्दारी पर बहुत गर्व था न तुम्हें?’

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‘था नहीं, आज भी है.’

‘लेकिन हम, तुम अलग तो नहीं हैं न.’

‘स्त्रीपुरुष का अस्तित्व अलग है और अलग ही रहेगा.’

‘तो तुम ने मुझे नौकरी करने के लिए मजबूर क्यों किया?’

‘अब भी मैं तुम्हें नौकरी करने से नहीं रोकता. बस, यही कहता हूं कि घर और बच्ची का ध्यान रखो. पीएचडी वगैरह की आवश्यकता नहीं है. तुम्हारी जितनी तनख्वाह है, उतनी ही काफी है. महत्त्वाकांक्षाओं का कभी अंत नहीं होता.’

‘लेकिन मेरे इतने दिनों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा. मुझे नहीं लगता कि बच्ची को होस्टल भेजने और तुम्हारी इस लैक्चरबाजी में कोई संबंध है.’

‘है, तभी तो कह रहा हूं. मेरी बेटी होस्टल नहीं जाएगी. तुम पीएचडी छोड़ कर उस की परवरिश करो, नहीं तो मैं उसे अपनी बहन के पास जयपुर भेज दूंगा. फिर अपना तबादला भी वहीं करा लूंगा.’

‘नीलिमा केवल तुम्हारी बेटी नहीं है, उस पर मेरा भी उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हारा. उस के संबंध में मुझे भी निर्णय लेने का पूरा अधिकार है.’

‘इस निर्णय की हकदार तुम तभी बन सकती हो, जब उस का भला चाहो. मां हो कर अगर अपनी प्रतिष्ठा, यश और पदवी के लिए तुम उसे होस्टल भेजने पर उतारू हो जाओ तो ऐसे में तुम उस हक से वंचित हो जाती हो.’

मेरे क्रोध का पारावार न रहा. मैं भी बहुतकुछ बोल गई. आनंद ने भी बहुतकुछ कहा. बात बढ़ती ही चली गई. इतने में नीलिमा दौड़ती हुई आई और लगभग चीखती हुई बोली, ‘बंद करो यह झगड़ा. नहीं रहना मुझे अब इस घर में. मैं आंटी के पास जयपुर जाऊंगी.’

मेरा कलेजा मुंह को आ गया. ऐसा लगा, जैसे किसी ने छाती पर गोली दाग दी हो. मैं एकदम से पलट कर अपने कमरे में चली गई. मन में विचार उठा, ‘क्या अपनी पहचान बनाना गुनाह है? क्या मैं ने कोई गलती की है? मुझे पीएचडी नहीं करनी चाहिए क्या?’

मन ने झकझोरा, ‘नहीं, गलती मर्दों की है. पति का अहं मेरी पदोन्नति स्वीकार नहीं कर पाता. वह आखिर शाखा अधिकारी है और अगर मैं पिं्रसिपल बन गई तो उस को समाज में वह इज्जत नहीं मिलेगी, जो मुझे मिलेगी. वह मुझ से जलता है. मैं हार मानने से रही. नीलिमा अभी बच्ची है. एक दिन वह मां का प्यार जरूर महसूस करेगी,’ विचारों के सागर में गोते लगातेलगाते कब आंख लग गई, पता ही न चला.

सुबह उठी तो कुछ अजीब सी मायूसी ने घेर लिया. आनंद को नजदीक न पा कर जल्दी से उठ कर ड्राइंगरूम में पहुंची. घर की निस्तब्धता भयानक लगने लगी.

‘नीलिमा,’ मैं ने आवाज दी. लेकिन मेरी आवाज गूंजती हुई कानों में टकराने लगी. दिल धड़कने लगा. सहसा मेज पर रखी हुई चिट्ठी ने ध्यान आकर्षित किया. धड़कते दिल से उठा कर उसे पढ़ने लगी. उस में लिखा था, ‘मैं नीलिमा को ले कर जयपुर जा रहा हूं, उस की मरजी से ही यह सब हो रहा है. कभी हमारे लिए वक्त निकाल सको तो जयपुर पहुंच जाना. आनंद.’

इस के बाद बहुतकुछ हो गया. नीलिमा ने मुझे समझने या समझाने का मौका ही नहीं दिया. इतने समय बाद उसे देख कर पुराने जख्म हरे हो गए. मैं सोचने लगी, ‘आनंद अस्पताल में क्या कर रहा है? कैसी विचित्र परिस्थिति है, कैसा अजीब संगम. क्या कहूंगी आनंद से, क्या वह मुझे पहचानेगा? क्या मुझे उस से मिलना चाहिए? कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं.

मैं जब विकास से मिली तो बड़ी परेशानी में थी. उस ने देखते ही कहा, ‘‘क्या हुआ. एक तो देर से आई हो… फिर इतनी घबराहट. सबकुछ ठीक तो है न. कोई बुरी खबर है क्या?’’

मैं ने मुसकराते हुए अपने विचारों को झटकने का प्रयास किया. हम होटल के अंदर गए. मन में विचारों का बवंडर उठ रहा था, ‘क्या विकास को सबकुछ बता दूं, क्या वह समझ पाएगा? आनंद से मिलने कैसे जाऊं? विकास से क्या कहूं?’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

अचानक मेरे कंधे पर हाथ रख कर विकास ने ही कहा, ‘सवि, मैं कुछकुछ समझ रहा हूं. समस्या क्या है, साफसाफ कहो?’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैं ने विकास को सबकुछ बता दिया. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘इतनी सी बात के लिए परेशान हो. गोष्ठी खत्म होने के बाद उस से जा कर मिल लो. मैं भी साथ चलूंगा.’

उस ने इतनी आसानी से कह दिया, पर मैं अपने को संभाल नहीं पा रही थी. भोजन के दौरान स्मृतिपटल पर चलचित्र की तरह बीते दिन फिर से उभर आए….

अपनी पीएचडी की समाप्ति पर प्रफुल्लचित, उत्साहित मैं जयपुर चल पड़ी. मन मुझे दोषी ठहराने लगा. मैं ने इन 6 महीनों में उन लोगों की कोई खोजखबर नहीं ली थी. उन लोगों ने भी मुझे कोई पत्र नहीं लिखा था. मैं सोचने लगी कि मेरी बेटी नीलिमा को भी क्या मेरी याद कभी नहीं आई होगी. पर मैं ने ही कौन सा उसे याद किया. पीएचडी की तैयारी इतनी अजीब होती है कि व्यक्ति सबकुछ भूल जाता है. परंतु इस में गलती ही क्या है? आनंद भी जब कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग के लिए 6 महीने के लिए विदेश गया था तो उस ने भी तो कोई खोजखबर नहीं ली थी.

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मैं भी तो व्यस्त थी. आनंद मेरी मजबूरी जरूर समझ गया होगा. मैं जब घर जाऊंगी तो वे लोग बहुत खुश होंगे. सहर्ष मेरा स्वागत करेंगे. मन में आशा की किरण जागी, लेकिन तुरंत ही निराशा के बादलों ने उसे ढक दिया, ‘क्या सचमुच वे मेरा स्वागत करेंगे? मुझे अगर घर में प्रवेश ही नहीं करने दिया तो?’ संशय के साथ ही मैं ने जयपुर पहुंच कर ननद के घर में प्रवेश किया.

ननद विधवा हो गई थी. अपना कोई नहीं था. नीलिमा से उसे बहुत प्यार था. बहुत रईस भी थी, इसलिए बड़ी शान से रहती थी. घर में नौकरचाकरों की कमी नहीं थी. मैं ने डरतेडरते भीतर प्रवेश किया. आनंद बाहर बरामदे में खड़ा था. उस ने मुझे देखते ही व्यंग्यभरी मुसकराहट के साथ कहा, ‘मेमसाहब को फुरसत मिल गई.’

मैं ने जबरदस्ती अपने क्रोध को रोका और मुसकराते हुए अंदर प्रवेश किया. अंदर से ननद की कठोर व कर्कश आवाज ने मुझे टोका, ‘जिस परिवार से तुम ने 6 महीने पहले रिश्ता तोड़ दिया था, अब वहां क्या लेने आई हो?’

‘मैं ने…मैं ने कब रिश्ता तोड़ा था?’

ननद बोली, ‘जब बच्ची को मेरे सुपुर्द कर दिया तो क्या संबंध तोड़ना नहीं हुआ?’

मैं ने हैरान हो, बरबस अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए, कहा, ‘दीदी, मैं आप से अपना अधिकार जताने या लड़ने नहीं आई हूं. नीलिमा कानूनन आज भी मेरी ही बेटी है. मैं केवल उसे लेने आई हूं.’

सफर की थकान और मई की लू के थपेड़ों ने मुझे पहले ही पस्त कर दिया था. ऊपर से आनंद के शब्दों ने मुझे और भी व्यथित कर दिया. उस ने बेरुखी से कहा, ‘नीलिमा को ले जाने का खयाल अपने दिल से निकाल दो. वह तुम से कोई संबंध रखना ही नहीं चाहती.’

मैं ने आपा खोते हुए कहा, ‘क्या रिश्ते कच्चे धागों के बने होते हैं, जो इतनी जल्दी टूट जाते हैं?’

इतने में नीलिमा बाहर आई. मैं ने सोचा था कि वह मुझ से गले मिलेगी, रोएगी. अगर वह मुझे कोसती, रूठती, रोती, कुछ भी करती तो मैं खुश हो जाती. परंतु उस की बेरुखी ने मुझे परेशान कर दिया.

उसी ने कहा, ‘मां, क्या लेने आई हो यहां?’

‘शुक्र है, तुम मुझे अब भी मां तो मानती हो. मैं तुम्हारे पास आई हूं. मेरी पीएचडी पूरी हो गई है. जून से मुझे प्रिंसिपल का पद मिल जाएगा. कालेज के कैंपस में ही हमारा घर होगा. तुम्हें वहां बहुत अच्छा लगेगा. अब हम साथसाथ रहेंगे.’

‘पिताजी हमारे साथ नहीं चलेंगे. और मैं उन के बगैर रह नहीं सकती. क्या आप हमारे साथ यहां नहीं रह सकतीं?’

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मैं कुछ भी न कह पाई. मेरा वजूद मुझे नौकरी छोड़ने से रोक रहा था. मैं तबादले की कोशिश करने को तैयार थी. प्रिंसिपल का पद छोड़ने को भी तैयार थी, परंतु नौकरी छोड़ कर बैठे रहना मुझे मंजूर नहीं था. अगर मर्द का अहं इतना तन जाए तो नारी ही क्यों झुके? हम दोनों ने अपनेअपने अहं के चलते बच्ची के भविष्य की बात सोची ही नहीं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

अनजाने पल : भाग 1- सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

औटो चेन्नई के अडयार स्थित पुष्पा शौपिंग कौंप्लैक्स से गुजर रहा था कि तभी नीलिमा पर नजर पड़ी. 3-4 बरस के एक लड़के का हाथ थामे वह दुकान से निकल रही थी. मैं अपनी उत्सुकता रोक न पाई. मातृत्व मानो बांध तोड़ कर छलछलाने को बेताब हो गया था.

मैं ने औटो रुकवाया और उसे पैसे दे कर उतर गई. धीरेधीरे उस के पास पहुंची और आवाज दी, ‘‘नीलिमा.’’

वह एकाएक चौंक कर मुड़ी, फिर तेजी से मुझ से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. भय से सिमट कर वह लड़का भी रोने लगा. मेरे शरीर के निस्तब्ध तार नीलिमा के स्पर्श से झनझना उठे. रोमरोम में एक अजीब सा आनंद समाने लगा. इतने बरसों बाद जिसे पाया था, उसे अपने से अलग करने का मन ही नहीं हो रहा था.

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काफी देर रोने के बाद जब उस ने आवाज सुनी, ‘दीदी, मुझे डर लग रहा है, पिताजी के पास चलो.’ तभी वह संभली. आंसू पोंछ कर मेरी ओर देखा और मुसकराई. फिर बोली, ‘‘मां, हम यहां मलर अस्पताल में हैं. पिताजी 5वीं मंजिल पर कमरा नंबर 18 में हैं. देर हो रही है, मैं जाती हूं. हो सके तो शाम को आ जाइएगा. यह मेरा भाई अभय है,’’ फिर अपने भैया के कंधे पर हाथ रख वह मेरी नजरों से ओझल हो गई.

नीलिमा का आकर्षण इतना था कि मैं यह भूल ही गई कि मुझे विकास से सवेरा होटल में मिलना है. मैं सोचने लगी कि कहां मुझ से नफरत करने वाली उस दिन की गोरीचिट्टी खूबसूरत नीलू और कहां आज की दुख और वेदना का बोझ ढोए बचपन में ही प्रौढ़ता लिए यह नीलिमा. मैं ने शौपिंग कौंप्लैक्स से विकास को सूचना भिजवाई कि 15 मिनट में मैं आ रही हूं और जल्दी से औटो ले कर चल पड़ी.

अनायास मेरी आंखों में आनंद का चेहरा घूम गया. मेरे मांबाप ने उस का लंबा कद, गोरा रंग, मस्तीभरी जवानी और आकर्षक व्यक्तित्व देख कर मेरा विवाह उस से तय किया था. मैं ने हिंदी साहित्य में एमफिल किया था और एक कालेज में पढ़ाती थी. आनंद बैंक में अफसर था. हम दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर के शादी की थी. शादी के तुरंत बाद उस का तबादला दिल्ली हो गया, इसलिए हम लोग वहां चले गए. शादी होते ही मैं ने नौकरी छोड़ दी थी, हालांकि आनंद को यह अच्छा नहीं लगा था. परंतु मैं तबादले के झमेलों में पड़ना नहीं चाहती थी.

दिल्ली जैसे महानगर में खर्चे तो बढ़ते ही जाते हैं, एक दिन आनंद ने ही बात छेड़ी, ‘सावित्री, सारा दिन घर में बैठे तुम्हें घुटन महसूस नहीं होती? मेरा दोस्त कह रहा था कि कालेज में हिंदी प्राध्यापक की जगह खाली है. कहो तो बात चलाऊं?’

मैं ने कहा, ‘वैसे मेरी नौकरी करने की अभी इच्छा नहीं है. घर पर भी तो बहुत सारे काम होते हैं. बुनाई, कढ़ाई आदि सीख रही हूं. ढंग से खाना बनाना भी तो अभी ही सीख रही हूं.’

आनंद को मेरी बात अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘अभी तो हमारे बच्चे भी नहीं हैं. इतनी शिक्षा हासिल करने के बाद तुम्हारा इस तरह घर में बैठे रहना मुझे अच्छा नहीं लगता. फिर महंगाई भी कितनी है…तुम हाथ बंटाओगी तो हम घर के लिए कुछ चीजें खरीद सकेंगे.’ आनंद की बात उस समय मुझे भी अच्छी लगी. उसी ने दौड़धूप कर मुझे श्रीराम कालेज में नौकरी दिलाई.

दिन गुजरते गए. 8-9 वर्षों बाद ही नीलिमा का जन्म हुआ था. उस के जन्म के बाद से सबकुछ बदल गया. आनंद को बेटी से बहुत अधिक लगाव था. जब तक वह 5 साल की हुई, तब तक मेरी सास हमारे साथ रहीं. अकेली विधवा सास का हमें बहुत अधिक सहारा था. मेरी और पति की तनख्वाह से गृहस्थी की गाड़ी मौज से चल रही थी.

मैं ने पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया था. कालेज में प्रिंसिपल की जगह खाली होने वाली थी. मेरी पीएचडी के खत्म होने में 6 महीने बाकी थे, इसलिए पूर्व प्रिंसिपल ने मेरी सिफारिश की थी. मैं जीजान से पीएचडी की समाप्ति में लगी थी. अचानक मेरी सास गुजर गईं.

आनंद को मां की मृत्यु से ज्यादा बेटी का अकेलापन खटकने लगा. उस ने मां की तेरहवीं होते ही कहा, ‘मैं चाहता हूं कि तुम नौकरी छोड़ दो. जब नीलू बड़ी हो जाए तो फिर नौकरी कर लेना.’

मैं चौंकी. फिर स्थिति को संभालते हुए कहा, ‘ऐसा कैसे हो सकता है, हम ऐशोआराम की जिंदगी के आदी हो चुके हैं. मेरी तनख्वाह नहीं होगी तो दिल्ली जैसे शहर में तुम्हारे अकेले की तनख्वाह से गुजरबसर कैसे होगी?’

‘कम से कम पीएचडी छोड़ दो. देर से घर आओगी तो नीलिमा बहुत दुखी हो जाएगी. वह दिनभर अकेली कैसे रह पाएगी.’

‘उसे तुम क्यों नहीं संभाल लेते. 4 महीने में मेरी थीसिस पूरी हो जाएगी. फिर जल्दी ही मैं प्रिंसिपल का पद संभाल लूंगी. कालेज की तरफ से वहीं घर भी मिल जाएगा. फिर नीलू की परवरिश में कोई बाधा नहीं आएगी.’

आनंद उस समय खामोश रह गया. परंतु उस के मन में ज्वालामुखी ने धधकना आरंभ कर दिया. मैं ने नीलू को कालेज के पास शिशु सदन में छोड़ना शुरू कर दिया. मैं रोज सवेरे उसे छोड़ आती और शाम को आनंद उसे ले आता.

मुझे थीसिस का काम खत्म कर लौटने में रात को देर हो जाती. नीलिमा उदास रहने लगी थी. उस की खामोशी मुझे कभीकभी बहुत अखरती, परंतु मैं अपनी थीसिस अधूरी नहीं छोड़ सकती थी.

हम दोनों के बीच अकसर मनमुटाव होता. वह अकसर कहता, ‘मांबाप के रहते दिनभर बच्ची इस प्रकार अनाथों की तरह रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.’

मैं तपाक से उत्तर देती, ‘तो मैं क्या करूं? यह तो होता नहीं कि कोई उचित सुझाव दो, बस सदा कोसते ही रहते हो.’

बात जब बहुत बढ़ जाती तो वह कहता, ‘तुम अपनी थीसिस को अपनी बेटी की परवरिश से ज्यादा जरूरी समझती हो? कैसी मां हो?’

कहती, ‘तुम मुझ से जलते हो. तुम्हारा अहं इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं तुम से ऊंचे पद पर पहुंचूं. तभी तुम मुझे ताने देते रहते हो. यह मत भूलो कि मुझे नौकरी पर जाने को मजबूर तुम ने ही किया था.’

नीलिमा ही सदा हम दोनों के आपसी झगड़ों में बीचबचाव करती. वह सदा एक ही बात कहती, ‘मैं ने तो कभी कोई शिकायत नहीं की. मुझे ले कर आप लोग क्यों लड़ते रहते हैं.’

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वैसे नीलिमा चिड़चिड़ी सी रहती, बातबात पर जिद करती. ऊपर से आनंद उसे मेरे विरुद्ध हमेशा कुछ न कुछ कह कर भड़काता रहता. मुझे घर के माहौल में घुटन सी होने लगती. परंतु थीसिस अधूरी छोड़ने के लिए मैं कतई तैयार न थी. मेरी बच्ची मेरे जिगर का टुकड़ा थी, उस के रोने की आवाज मुझे परेशान कर देती.

एक दिन मैं ने छुट्टी ले ली. घर में उस की पसंद की खीर बनाई और आलू की टिकियां. ये दोनों चीजें उसे बहुत अच्छी लगती थीं. वह स्कूल से घर आई. मैं बड़े प्यार से उसे मेज के पास ले गई. उस ने मेज पर रखी चीजें एकएक कर खोलीं, फिर बंद कर दीं. मैं खुशीखुशी उस की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी. जब वह कुछ न बोली तो मैं ने ही कहा, ‘चल नीलू, आज मैं तुझे स्वयं हाथ से खिलाती हूं.’

‘क्यों? आज मुझ से इतनी हमदर्दी क्यों?’ उस के शब्द शूल की तरह मेरे हृदय को भेद गए? ‘बेटी, कैसी बात करती है. मैं ने तेरी पसंद की चीजें बनाई हैं. देख…खीर, आलू की गरमगरम टिकिया.’

‘मुझे भूख नहीं है.’

‘क्या हुआ, मुझ से नाराज है?’

‘अगर तुम मुझे हर रोज इस प्रकार खाना खिलाओगी तो मैं आज खाने को तैयार हूं.’

मैं चुप हो गई, क्या जवाब देती. आखिर उसी ने चुप्पी तोड़ी, ‘बोलो, जवाब दो. क्या हर रोज घर पर रह सकती हो?’

‘तब तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी. और नौकरी छोड़ दूं तो हम तुम्हें वह सुख और आराम नहीं दे पाएंगे, जो तुम्हें आज मिल रहा है. देखो, तुम्हारे पास टीवी है, एसी है, कितने खिलौने हैं, अच्छे स्कूल में पढ़ती हो, क्या ये सब तुम्हें खोना अच्छा लगेगा?’

‘लेकिन पिताजी तो कहते हैं कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है.’

‘वे तो यों ही कहते हैं. तुम जब बड़ी हो जाओगी, तभी ये बातें समझ पाओगी.’

‘क्या पता. लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता. तुम्हारा हर रोज देर से आना, फिर रात को तुम्हारा और पिताजी का झगड़ा…’ यह कहतेकहते उस की आंखों से आंसू झरने लगे.

मैं ने बच्ची को आलिंगन में भींच लिया. फिर कहा, ‘कहो तो तुम्हें होस्टल भेज दें. वहां तुम्हें खूब सारी सहेलियां मिलेंगी. खूब मजा आएगा.’

उस ने कुछ जवाब नहीं दिया. उस रात मैं ने आनंद से इस बात का जिक्र किया. मुझे तो आश्चर्य होता था कि उस व्यक्ति से मैं ने शादी कैसे की? वह कितना बदल गया गया था. कठोर हृदयहीन और अहंकारी. उस ने गुस्से से लगभग चीखते हुए कहा, ‘कैसी मां हो. बच्ची को अपने से अलग करना चाहती हो?’

मैं बोली, ‘मैं उसे अलग कहां कर रही हूं. आजकल तो सभी बच्चों को होस्टल भेजते हैं. एक साल में मेरा काम हो जाएगा. फिर पिं्रसिपल बन जाने पर कालेज के कैंपस में ही घर मिल जाएगा. नीलू को फिर घर ले आएंगे.’

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आनंद ने तपाक से उत्तर दिया, ‘औरों की बात छोड़ो. सोसाइटी में झूठी शान बघारने के लिए लोग बच्चों को होस्टल भेजते हैं. हमें इस की जरूरत नहीं है. और यह खयाल दिल में फिर कभी मत लाना कि मैं कालेज कैंपस में तुम्हारे साथ रहूंगा.’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

शक की फांस बनी नासूर

अदा… साहिल की

शक की फांस बनी नासूर : भाग 3

राजेंद्र गिरि अपनी लाडली बेटी का सपना पूरा करना चाहते थे, सो वह उसे भरपूर सहयोग कर रहे थे. शालू खूबसूरत थी. उस ने जब 17 बसंत पार किए तो उस की सुंदरता में और भी निखार आ गया था.

इसी दौरान राहुल गिरि से उस की दोस्ती हो गई. राहुल शालू के पड़ोस में ही रहता था और किसान इलम चंद्र का बेटा था. शालू के पिता राजेंद्र गिरि तथा राहुल के पिता इलम चंद्र की आपस में खूब पटती थी. राजेंद्र जहां अपनी बेटियों का भविष्य बनाने में जुटे थे, वही इलम चंद्र अपने बेटे राहुल का भविष्य बनाने को प्रयासरत थे.

राहुल उन का होनहार बेटा था. उस ने चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल करने के बाद बीएड की परीक्षा पास कर ली थी और शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास कर शिक्षक बनना चाहता था.

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शालू और राहुल एक ही गली में खेलकूद कर जवान हुए थे. दोनों में एकदूसरे के प्रति आकर्षण था. यह आकर्षण धीरेधीरे प्यार में बदल गया था. प्यार परवान चढ़ा तो एक रोज राहुल ने प्यार का इजहार कर दिया, ‘‘शालू, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. मैं ने तुम्हें अपना बनाने का सपना संजोया है. क्या मेरा यह सपना पूरा होगा?’’

‘‘तुम्हारा सपना जरूर पूरा होगा. पर अभी नहीं. अभी समय है अपना कैरियर बनाने का. तुम्हारा सपना है शिक्षक बनने का और मेरा सपना है पुलिस में नौकरी करने का. अपनाअपना सपना पूरा करो फिर हम जीवनसाथी बन जाएंगे. हम दोनों मजे से जीवन गुजारेंगे.’’

शालू की यह बात राहुल को पसंद आ गई. इस के बाद दोनों अपना कैरियर बनाने में जुट गए. कालांतर मे राहुल ने टीईटी की परीक्षा पास की, उस के बाद उस का चयन शिक्षक पद पर हो गया. वह फैजाबाद के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने लगा.

इधर शालू का भी चयन पुलिस विभाग में महिला सिपाही के पद पर जनवरी 2019 में हो गया. उस की ट्रेनिंग इटावा में हुई. उस के बाद 16 दिसंबर, 2019 को शालू की पहली पोस्टिंग औरैया जिले के विधूना कोतवाली में हो गई. थाने में ड्यूटी के दौरान शालू की मुलाकात सिपाही आकाश से हुई. कुछ दिनों बाद ही दोनों गहरे दोस्त बन गए.

आकाश हर तरह से शालू की मदद करने लगा. दोनों के मन में एकदूसरे के प्रति चाहत बढ़ गई. 20 मार्च, 2020 को शालू गिरि एक सप्ताह की छुट्टी पर अपने गांव लतीफपुर दत्त नगर आई. पर 24 मार्च की रात से देश में लौकडाउन घोषित हो गया, जिस से शालू भी लौकडाउन में फंस गई. शालू का प्रेमी शिक्षक राहुल भी फैजाबाद से घर आया था. वह भी लौकडाउन में गांव में ही फंस गया था.

सादगी से हुई लवमैरिज

गांव में रहते शालू और राहुल का आमनासामना हुआ तो दोनों का प्यार उमड़ पड़ा. अब तक दोनों अपना कैरियर बना चुके थे. अत: जब राहुल ने शालू के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा तो शालू ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. इधर शालू जब लौकडाउन में फंस गई तो पुलिस विभाग ने उसे बालौनी थाने में जौइन करा दिया.

गांव से थाना 9 किलोमीटर दूर था और घर से रोज थाने आनाजाना मुश्किल था. अत: शालू ने बालौनी थाने के पास ही कमरा किराए पर ले लिया और वहीं रह कर ड्यूटी करने लगी. इसी कमरे में आ कर राहुल उस से मिलने लगा. कुछ दिन बाद शालू और राहुल ने अपने घर वालों से शादी की इच्छा जताई तो दोनों के घर वालों ने उन की बात मान ली. दरअसल शालू की मां सुमित्रा देवी को शालू और सिपाही आकाश के बीच बढ़ती दोस्ती की बात पता चल गई थी. वह शालू की शादी गैर बिरादरी में नहीं करना चाहती थीं, सो वह जातिबिरादरी के युवक राहुल से शादी को राजी हो गई थीं.

दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद 26 अप्रैल, 2020 को लौकडाउन के दौरान ही शालू और राहुल ने एकदूसरे के गले में वर माला पहना कर प्रेम विवाह कर लिया. दोनों परिवारों की मौजूदगी में प्रेम विवाह बालौनी के उसी कमरे में संपन्न हुआ, जिस में शालू रहती थी. शादी के बाद राहुल और शालू पतिपत्नी की तरह उसी कमरे में रहने लगे.

पतिपत्नी के बीच दरार तब पड़ी जब सिपाही आकाश का नाम शालू की जुबान पर आया. दरअसल शालू देर रात तक सिपाही आकाश से बतियाती थी. पूछने पर वह आकाश को अपना दोस्त बताती थी.

आकाश को ले कर राहुल के मन में शंका पैदा हो गई, जिस से वह उस के चरित्र पर शक करने लगा. शक के कारण दोनों के बीच तनाव की स्थिति रहने लगी.

3 मई, 2020 को बालौनी थाने से शालू को रिलीव कर दिया गया और 5 मई को उस ने वापस विधूना कोतवाली में ड्यूटी जौइन कर ली. इस के बाद उस ने विधूना कस्बे के किशोरगंज मोहल्ले में तरुण सिंह के मकान में किराए पर रूम ले लिया और रहने लगी. शालू शादी कर जब से वापस थाने आई थी तब से वह गुमसुम रहने लगी थी.

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लेकिन वह अपना दर्द किसी से बयां नहीं करती थी. इस दर्द का कारण उस का पति राहुल ही था. वह जब भी शालू से फोन पर बात करता था. उस के चरित्र पर उंगली उठाता था.

इधर जब से शालू ब्याह रचा कर वापस लौटी थी, तब से उस का सिपाही दोस्त आकाश भी उस से कतराने लगा था. उस में अब न पहले जैसी दोस्ती थी और न ही प्यारसम्मान. वह अब दोजख में फंस गई थी.

एक ओर उस का पति मानसिक चोट पहुंचा रहा था, उस के चरित्र पर शक कर रहा था, तो दूसरी ओर सिपाही दोस्त आकाश भी उसे पीड़ा पहुंचा रहा था. ऐसे में शालू परेशान हो उठी. आखिर में उस ने हताश जिंदगी का अंत करने का निश्चय कर लिया.

पहली जून, 2020 को शालू ड्यूटी गई और रात 9 बजे वापस अपने रूम पर आई. उस रोज भी वह परेशान थी और निराशा उसे घेरे थी.

रात 11 बजे बड़ी बहन सपना का फोन आया तो उस ने उस से बहकीबहकी बातें कीं. फिर फोन डिसकनेक्ट कर दिया.  उस के बाद उस ने सिपाही आकाश को फोन किया, लेकिन उस ने फोन रिसीव ही नहीं किया. इस के बाद शालू ने अपनी डायरी के 3 पन्नों पर सुसाइड नोट लिखा, फिर रात लगभग 12 बजे फांसी के फंदे पर झूल गई.

घटना की जानकारी तब हुई जब सपना ने सुबह विधूना थानाप्रभारी विनोद कुमार शुक्ला के मोबाइल पर जानकारी दी और शालू से बात कराने का आग्रह किया. इस के बाद विनोद कुमार शुक्ला जब शालू के रूम पर पहुंचे, तब शालू फांसी के फंदे पर झूलती मिली.

उन्होंने शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो शालू की हताश जिंदगी की व्यथा सामने आई. चूकि शालू के पति राहुल के खिलाफ शालू के घर वालों ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी, अत: विधूना पुलिस ने इस प्रकरण को बंद कर दिया था.

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– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

शक की फांस बनी नासूर : भाग 2

एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित ने मृतका शालू का मोबाइल फोन खंगाला तो उस में स्वीट होम, हसबैंड, सिस्टर तथा आकाश के नाम से फोन नंबर सेव थे, जो उस के घर वालों के थे. इन नंबरों पर काल कर केश्री दीक्षित ने घर वालों को घटना की जानकारी दी तथा शीघ्र ही विधूना थाने आने को कहा.

शालू ने मौत से पहले अपनी बहन सपना से बात की थी. घटनास्थल पर मकान मालिक तरुण सिंह भी मौजूद था. सीओ मुकेश प्रताप सिंह ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सिपाही शालू गिरि ने 2 हफ्ते पहले ही रूम किराए पर लिया था.

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दूसरे रूम में पब्लिक डिग्री कालेज विधूना के निदेशक मनोज कुमार सिंह चौहान रहते हैं. उन का परिवार कानपुर में रहता है. कल वह परिवार से मिलने कानपुर चले गए थे. मकान मालिक ने बताया कि शालू गिरि बातचीत में सरल तथा हंसमुख स्वभाव की थी. उस ने आत्महत्या किन परिस्थितियों में की, उसे इस की जानकारी नहीं है.

पति करता था शक

चूंकि आत्महत्या का यह मामला एक सिपाही का था. अत: पुलिस अधिकारियों ने नायब तहसीलदार को भी सूचना भेज दी थी. सूचना पा कर नायब तहसीलदार वंदना कुशवाहा घटनास्थल पर आ गई थीं. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया फिर पुलिस अधिकारियों से घटना के संबंध में जानकारी हासिल की. उस के बाद उन्हीं की मौजूदगी में इंस्पेक्टर विनोद कुमार शुक्ला ने सिपाही शालू गिरि के शव का पंचनामा भरा.

पंचनामे पर नायब तहसीलदार वंदना कुशवाहा ने हस्ताक्षर किए. उस के बाद शव पोस्टमार्टम हेतु औरैया के जिला अस्पताल भिजवा दिया.

देर शाम मृतका शालू गिरि के मांबाप, भाईबहन तथा पति थाना विधूना आ गए. उस के बाद तो थाने में कोहराम मच गया. मां सुमित्रा देवी, पिता राजेंद्र गिरि तथा बहन स्वाति व सपना दहाड़ मार कर रो रही थीं. थानाप्रभारी ने उन्हें धैर्य बंधाया. फिर थानाप्रभारी उन सब को उस रूम में ले गए, जहां शालू ने आत्महत्या की थी.

वहां एक बार फिर कोहराम मच गया. थानाप्रभारी विनोद कुमार शुक्ला ने आत्महत्या का कारण जानने के लिए सब से पहले मृतका शालू की मां सुमित्रा देवी से पूछताछ की. सुमित्रा देवी ने बताया कि शालू उन की लाडली बेटी थी. वह बेहद खुशमिजाज थी. अभी एक महीना पहले ही उस की शादी पड़ोस में रहने वाले इलम चंद्र के बेटे राहुल से हुई थी.

राहुल शालू को खुश नहीं रखता था, जिस से वह परेशान रहने लगी थी. राहुल, शालू पर शक भी करता था. वह उसे मानसिक तौर पर भी टौर्चर करता था. उस के कारण ही शालू ने आत्महत्या की है.

पिता राजेंद्र गिरि ने बताया कि वह किसान हैं. बेटियों को पढ़ाने व उन का भविष्य बनाने के लिए उन्होंने सब कुछ दांव पर लगाया. शालू सिपाही बनी तो बेहद खुशी हुई. इस के बाद शालू की मरजी से उस का विवाह राहुल के साथ कर दिया. लेकिन शादी के बाद उस की खुशी गायब हो गई थी.

पहली जून सोमवार को शालू की बात उस की मां सुमित्रा से दिन में ढाई बजे हुई थी. तब वह परेशान थी और जिंदगी से ऊबने की बात कर रही थी. तब हम दोनों ने उसे समझाया था, और जिंदगी को निराशा से आशा में बदलने की बात कही थी. लेकिन उस ने रात में आत्महत्या कर ली.

शालू की बड़ी बहन सपना, जो लखनऊ के कैसर बाग थाने में सिपाही है, ने बताया कि ट्रेनिंग के बाद जब शालू की पहली पोस्टिंग विधूना थाने में हुई तो वह बेहद खुश थी. सप्ताह में एकदो बार उस की उस से बात जरूर होती थी.

शादी के पहले वह बेहद खुश रहती थी. हंसहंस कर बतियाती थी और चुहलबाजी भी करती थी. लेकिन शादी के बाद वह गुमसुम रहने लगी थी. उस ने फोन पर बात करना भी बंद कर दिया था. जब कभी बात होती तो कहती कि वह अपनी जिंदगी से खुश नहीं है. जी चाहता है जिंदगी खत्म कर लूं.

शायद शालू अपने पति राहुल से खुश नहीं थी. क्योंकि वह शालू पर शक करता था. सिपाही आकाश को ले कर राहुल के मन में गलत धारणा घर कर गई थी. आकाश को ले कर ही राहुल उसे मानसिक तौर पर परेशान करता था. जबकि शालू और सिपाही आकाश के बीच सिर्फ दोस्ती थी. दोनों एकदूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित थे और आमनासामना होने पर हंसबोल लेते थे.

सपना ने बताया कि बीती रात 11 बजे कई बार नंबर मिलाने के बाद उस की शालू से बात हुई थी. तब वह बहकीबहकी बातें कर रही थी. बात करतेकरते उस ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया था.

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उस के बाद जब सुबह उस ने फोन मिलाया तो शालू फोन रिसीव ही नहीं कर रही थी. तब घबरा कर मैं ने आप को फोन किया था और शालू से बात कराने को कहा था. लेकिन कुछ देर बाद आप ने सूचना दी थी कि शालू ने आत्महत्या कर ली है.

पत्नी की मौत की खबर पा कर राहुल भी अपने पिता इलम चंद्र के साथ थाना विधूना पहुंचा था. थानाप्रभारी विनोद कुमार शुक्ला ने जब राहुल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस ने शालू की रजामंदी से उस के साथ प्रेमविवाह किया था. शादी के बाद उसे पता चला कि शालू की दोस्ती किसी आकाश नाम के सिपाही से है.

वह मोबाइल फोन पर उस से बतियाती है. आकाश को ले कर उस ने शालू से टोकाटाकी की थी. इस से वह उस से नाराज रहने लगी थी. पर वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेगी, ऐसा तो उस ने कभी सोचा नहीं था.

शालू कौन थी? उस ने आत्महत्या क्यों और किन परिस्थितियों में की? यह सब जानने के लिए हम पाठकों को उस के अतीत की ओर ले चलते हैं.

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बालौनी थाना अंतर्गत एक गांव है- लतीफपुर दत्त नगर. इसी गांव में राजेंद्र गिरि अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सुमित्रा गिरि के अलावा 3 बेटियां सपना, शालू, स्वाति तथा एक बेटा राजीव था.

राजेंद्र गिरि किसान थे. कृषि उपज से ही वह अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. खेती के काम में उन का बेटा राजीव भी मदद करता था. उन्होंने अपने सभी बच्चों को उन की इच्छा के अनुसार पढ़ाया.

राजेंद्र की बड़ी बेटी सपना पुलिस विभाग में नौकरी करना चाहती थी. उन्हीं दिनों पुलिस विभाग में महिला सिपाही के पद पर भरती हो रही थी. सपना ने प्रयास किया तो उस का चयन हो गया. उस की ट्रेनिंग सीतापुर में हुई. बाद में उस की पोस्टिंग लखनऊ के कैसर बाग थाने में हो गई.

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सपना से छोटी शालू थी. अपनी बड़ी बहन सपना की तरह वह भी पुलिस में भरती होना चाहती थी. इस के लिए उस ने पढ़ाई के अलावा अपने शरीर को चुस्तदुरूस्त बनाने के लिए सुबहशाम दौड़ लगानी शुरू कर दी.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

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