Hindi Story: अनोखा मिलन

Hindi Story: शाम का समय था. मैं ग्राहकों की भीड़ में उलझ हुआ था कि अचानक एक लाल रंग की चमचमाती कार मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी. मैं ने ग्राहकों को पिज्जा देते हुए जब उस गाड़ी पर नजर डाली, तो मेरी आंखें कुछ देर के लिए वहां टिकी रह गईं.

मेरी नजरें वहां टिकती भी क्यों न, उस गाड़ी में से 3 लड़कियां जींसटीशर्ट में बाहर निकली थीं, तो वहीं एक खूबसूरत हसीना सलवारसूट पहने उन के साथ मेरी दुकान की तरफ बढ़ती हुई आ रही थी.

उस लड़की की बड़ीबड़ी नीले रंग की आंखें, लहराते हुए सुनहरे घने लंबे बाल, सुर्ख गाल और पतलेपतले गुलाबी होंठ देख कर तो मैं पागल ही हो गया था.

यों तो मेरी दुकान पर रोजाना दर्जनों लड़कियां पिज्जा खाने आती रहती थीं, पर उन के चेहरे पर मैं ने कभी ऐसी कशिश नहीं देखी थी, जो इस लड़की के चेहरे में थी.

लाल रंग के सलवारसूट में तो वह लड़की कयामत ही ढा रही थी. उस ने भले ही अपने उभारों पर दुपट्टा डाल रखा था, पर उस की उठी हुई मदमस्त छाती उस के हुस्न पर चार चांद लगा रही थी.

मैं ने अपनी जिंदगी में इतनी हसीन और कमसिन लड़की आज तक नहीं देखी थी. उसे देख कर ऐसा लग रहा था मानो आसमान से कोई हूर उतर कर जमीन पर आ गई हो.

मैं न चाहते हुए भी उस के ऊपर से अपनी नजरें नहीं हटा पा रहा था. मैं अभी उसे एकटक देख ही रहा था कि अचानक उस लड़की ने बड़ी मीठी आवाज में कहा, ‘‘ऐ मिस्टर, जरा 4 तीखी चटनी वाले पिज्जा जल्दी से दो.’’

जैसे वह लड़की खूबसूरती की मलिका थी, उस से कहीं ज्यादा उस की मीठी आवाज थी.

मैं उस लड़की की खूबसूरती और मीठी आवाज में इतना खो गया था कि मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कब मेरा हाथ ओवन के चिमटे से टकरा गया और मैं ने ‘आह’ करते हुए अपना हाथ झटका.

तभी वह खूबसूरती की मलिका हंसते हुए बोली, ‘‘ऐ मिस्टर, जितना ध्यान तुम मेरे ऊपर दे रहे हो, उतना ध्यान अगर अपने काम पर देते तो यह हाथ नहीं जलता.’’

हंसते हुए उस लड़की के मोती जैसे दांत उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

मैं तो पहली ही नजर में उस का दीवाना हो गया था. अब उस की हंसी ने मुझे और भी उस का दीवाना बना दिया था.

उस लड़की ने मुझ से क्या कहा था, मुझे इस का कोई होश ही नहीं रहा था.

मैं अपने काम में बिजी हो कर भी उसे अपनी तिरछी नजरों से देख रहा था, जो अपनी सहेलियों से हंसहंस कर बातें कर रही थी.

तभी वह लड़की उठी और मेरे पास आई और बोली, ‘‘ऐ मजनू की औलाद, पहले कभी लड़की नहीं देखी क्या?’’

मैं शरमा कर कर बोला, ‘‘जी मैडम, देखी तो बहुत हैं, पर आप जैसी खूबसूरत आज तक देखने को नहीं मिली. आप को देख कर तो ऐसा लग रहा है जैसे परियों के देश से कोई परी जमीन पर उतर कर मेरी दुकान में आ गई हो.’’

तभी वह लड़की गुस्से में बोली, ‘‘मैं कोई परीवरी नहीं हूं और न ही मेरा नाम मैडम है. हिना नाम है मेरा… हिना… समझे…’’

हिना के गुस्से में भी मुसकराहट शामिल थी. मैं ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘जी हिनाजी, नाम बताने का शुक्रिया…’’

‘‘मैं नाम बताने नहीं आई हूं. हमारा और्डर दो जल्दी… मुझे बहुत तेज भूख लगी है.’’

मैं ने फौरन 4 पिज्जा बनाए और उन में कुछ ज्यादा ही मक्खन डाल कर फौरन उन की टेबल पर सर्व कर दिया.

वे चारों पिज्जा खाने लगीं और आपस में मेरे बनाए पिज्जा की तारीफ करती रहीं.

हिना पिज्जा खा रही थी और अपनी तिरछी निगाहों से मुझे देख रही थी. जब भी मेरी निगाह उस से टकराती, मैं मुसकरा कर उसे अपने प्यार का इजहार करने की कोशिश करता.

कुछ देर बाद हिना अपनी एक सहेली के साथ उठ कर मेरे पास आई और बोली, ‘‘कितना पैसा हुआ मिस्टर?’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘हिनाजी, मेरा नाम मिस्टर नहीं, बल्कि शान है. आप मुझे इसी नाम से पुकारें.’’
हिना ने कहा, ‘‘अच्छा शानजी, कितना पैसा हुआ?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘400 रुपए.’’

हिना ने पर्स से 500 का नोट निकाला और बोली, ‘‘रख लो… तुम्हारे पिज्जा का तो जवाब ही नहीं… यह हमें बहुत पसंद आया.’’

मैं बोला, ‘‘शुक्रिया. पर, मैं वही कीमत लेता हूं, जो मेरा हक है. ये लीजिए आप के 100 रुपए.’’

जब मैं ने हिना के हाथ में 100 रुपए दिए, तो उस के नाजुक हाथ की छुअन पा कर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. दूध की तरह सफेद हाथ… इतने कोमल कि दिल किया चूम लूं.

जब हिना अपनी गाड़ी में बैठ रही थी, तो उस ने एक नजर फिर से मेरे ऊपर डाली, तो मैं ने मुसकराते हुए अपने उस हाथ को चूम लिया.

यह देख कर हिना भी मुसकराते हुए गाड़ी में बैठ कर चली गई.

रातभर हिना का खूबसूरत चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा. मैं नींद से कोसों दूर करवट बदलता रहा और इस उम्मीद में सुबह होने का इंतजार करता रहा कि आज फिर हिना मेरी दुकान पर पिज्जा खाने जरूर आएगी, पर सुबह से शाम हो गई और मैं हिना का इंतजार करता रहा, पर वह नहीं आई.

मैं उदास हो कर एक तरफ बैठ गया. न जाने क्यों आज दुकान पर ग्राहकी भी कम थी और मेरा मन भी दुकान पर नहीं लग रहा था.

मैं हिना के बारे में सोचसोच कर मायूस हो रहा था कि तभी हिना की गाड़ी मेरी दुकान के सामने आ कर रुकी.

मैं खुशी से झूम उठा और खड़े हो कर हिना का गाड़ी से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा.

तभी कुछ देर बाद हिना गुलाबी रंग का सलवारसूट पहन कर मेरे सामने आई और बोली, ‘‘मुझे 3 पिज्जा जल्दी से पार्सल कर दो.’’

हिना के कहते ही मैं पिज्जा बनाने में लग गया. तब तक वह मेरे काउंटर के सामने खड़ी रही.

कुछ देर बाद वह खुद ही बोली, ‘‘लगता है कि आज रात तुम सो नहीं पाए. तुम्हारी आंखें सूजी हुई सी लग
रही हैं.’’

मैं हंसते हुए बोला, ‘‘क्या बताऊं हिनाजी… जब से तुम्हें देखा है, चारों तरफ तुम्हारा ही चेहरा दिखाई देता है.

मैं ने पूरी रात करवट बदलते हुए गुजारी है.’’

हिना ने धीरे से पूछा, ‘‘ऐसा क्या है मेरे चेहरे में…?’’

मैं बोला, ‘‘क्या नहीं है आप के चेहरे में… जिस ने मुझे आप का दीवाना बना दिया है. आप जैसी खूबसूरत

हसीन लड़की मैं ने अपनी जिंदगी में नहीं देखी है. मैं तो आप के हुस्न का दीवाना हो गया हूं.’’
हिना हंसते हुए बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो…’’

मैं ने कहा, ‘‘आप ने मुझे पागल बना दिया है. आप की आवाज, आप की खूबसूरती, आप का हुस्न… आप को देख कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप कोई इनसान हो. मुझे तो आप परी देश से आई हुई कोई परी लगती हो.’’

हिना हंसते हुए बोली, ‘‘आप की बातों को सुन कर तो यहां से जाने का ही दिल नहीं करता.’’

मैं ने भी फौरन जवाब देते हुए कहा, ‘‘आप मत जाओ. मेरे दिल में तो बस चुकी हो, मेरी जिंदगी में भी आ जाओ.’’

हिना ने कहा, ‘‘अच्छा, तो आप मुझे अपनी जिंदगी में शामिल करना चाहते हो… पर, उस के लिए तुम्हें मुझ से निकाह करना पड़ेगा… समझे?’’

‘‘मैं आप से निकाह करने को तैयार हूं. बस, आप की हां का इंतजार था.’’

‘‘ठीक है, मैं सोच कर बताती हूं.’’

मैं ने हिना का मोबाइल नंबर ले लिया. अब हम दोनों घंटों प्यारभरी बातें करते, शादी के सपने देखते और खूब घूमतेफिरते.

मेरी और हिना की प्रेम कहानी खूब चल रही थी, फिर एक दिन वह वक्त भी आ गया, जब हमारे प्यार की खबर हिना के अब्बू को लग गई.

हिना के अब्बू उस इलाके के अमीर लोगों में शुमार थे और वे किसी भी कीमत पर हिना की शादी मुझ से करने को तैयार नहीं थे.

हिना मुझ से बहुत मुहब्बत करती थी, इसलिए उस ने मुझ से वादा किया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ मुझ से, वरना अपने अब्बू का घर छोड़ कर मेरे पास आ जाएगी.

आज हिना अपने अब्बू से हमारी शादी की बात करने वाली थी. मेरा दिल बहुत घबरा रहा था, क्योंकि हिना के अब्बू कभी भी मुझ जैसे गरीब लड़के से अपनी बेटी की शादी के लिए राजी न होते और हिना उन का सामना कैसे करेगी, यह सोच कर मैं बहुत परेशान था.

मुझे हिना और उस के अब्बू के बीच क्या बात हुई, इस का तो कुछ पता न चला, पर 3 दिन बाद हिना के अब्बू ने दुकान मालिक से कह कर मेरी दुकान जरूर खाली करा दी और मेरा कामधंधा बंद हो गया.

उस के कुछ दिन बाद हिना के अब्बू एक सुनसान जगह पर 4-5 लोगों के साथ आए और मुझ से बोले, ‘‘तेरी भलाई इसी में है कि तू यह शहर छोड़ कर कहीं दूसरी जगह चला जा.’’

मैं ने इनकार किया, तो उन के साथ आए लोगों ने मेरी जम कर पिटाई की, फिर वे बोले, ‘‘देख, हिना ने अपनी मरजी से शादी कर ली है.’’

वे मुझे हिना की शादी का फोटो दिखाते हुए बोले, ‘‘अब उसे भूल जा और उस की जिंदगी से दूर चला जा. वैसे भी तुझे इस एरिया में कोई दुकान नहीं देगा और तू ने अगर हिना से मिलने की कोशिश की तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा.’’

हिना की शादी की तसवीर देख कर मैं पूरी तरह टूट चुका था. मैं हताश हो कर अपने एक दोस्त के पास दूसरे शहर चला गया और उस के कमरे पर रहने लगा.

मेरा अब कुछ काम करने में दिल नहीं लगता था. जिंदगी थम सी गई थी. न किसी से बोलना, न कोई काम और न हंसी… सब गायब हो चुका था.

मेरे दोस्त ने मुझे काफी समझाया और कहा, ‘‘अगर तुम यों ही अपनी जिंदगी बरबाद करते रहोगे, तो फिर
कैसे चलेगा…

‘‘मेरे दोस्त, हिम्मत मत हारो. जिंदगी में तो सुखदुख लगा ही रहता है. अगर तुम्हारा यहां काम करने को मन नहीं करता, तो मेरा एक दोस्त दुबई में रहता है. तुम उस के पास चले जाओ. मैं सब इंतजाम कर देता हूं. तुम अपनी मुहब्बत को अब भूल जाओ. वह अब किसी और की अमानत बन चुकी है.’’

उस की ये बातें सुन कर मेरी आंखों से खुद ब खुद आंसू बहने लगे और मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है, मैं दुबई चला जाता हूं, पर मेरे दोस्त, मुझे मेरी मुहब्बत को भूलने के लिए मत कहो.’’

मेरे दोस्त ने मेरे लिए अपने एक खास दोस्त से बातचीत कर ली. उस का दुबई में होटल था, जहां उस ने मेरी नौकरी की बात पक्की कर ली.

दुबई के लिए एक हफ्ते बाद की टिकट हो चुकी थी. मैं ने अब दुबई जाना ही बेहतर समझा.

अगले दिन मैं जब सो कर उठा, तो मेरे दोस्त को तेज बुखार था. मैं उसे सहारा दे कर पास के दवाखाने पर ले गया. डाक्टर ने कुछ जांच करने के बाद मेरे दोस्त को एक हफ्ता आराम करने की हिदायत दी.

हम दवा ले कर घर आ गए. अभी एक दिन ही हुआ था कि उस की तबीयत में कुछ सुधार हुआ, तो वह काम पर जाने के लिए उठा. यह देख कर मैं ने उसे काम पर जाने से रोक लिया और बोला, ‘‘तुम्हारी हालत सही नहीं है. तुम अभी आराम करो.’’

मेरा दोस्त बोला, ‘‘यार, अगर मैं काम पर नहीं जाऊंगा, तो उस से मेरे ग्राहक तो टूटेंगे ही, साथ ही एक बेवा, जो अपने एक साल के बेटे के साथ टूटेफूटे घर में रहती है, उस की भी कमाई नहीं होगी.’’

मैं हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या मतलब…? कौन बेवा…?’’

‘‘अरे भाई, यहां पास की ही एक बस्ती में एक बेवा घर पर खाना बना कर औनलाइन बेचती है, जिस की डिलीवरी मैं करता हूं.’’

मैं उस से बोला, ‘‘ठीक है, आज मैं डिलीवरी करता हूं. बस, तुम अच्छी तरह से आराम करो.’’

मैं ने उस से वह पता लिया, जहां से मुझे खाना लेना था और जहां खाना पहुंचाना था.

मैं जब खाना लेने वाले पते पर पहुंचा और कुंडी खटखटाई तो अंदर से एक औरत फटेपुराने कपड़े पहने बाहर आई और बोली, ‘‘जी, आप कौन…?’’

मैं ने जैसे ही उस औरत पर नजर डाली, मैं हैरान रह गया. वह औरत कोई और नहीं, मेरी हिना थी.

हिना ने भी मुझे पहचान लिया था और बोली, ‘‘शान, तुम यहां कैसे…? आओ, अंदर आओ.’’

मैं हिना के साथ उस के घर के अंदर पहुंच गया और उस से पूछने लगा, ‘‘तुम ने तो अपनी मरजी से किसी अमीर लड़के से शादी कर ली थी, फिर तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

हिना ने रोते हुए बताया, ‘‘मैं तुम से शादी करने के लिए अपने अब्बू से लड़ कर जैसे ही घर से बाहर निकली कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द शुरू हो गया और वे ‘धड़ाम’ से जमीन पर गिर पड़े.

‘‘मैं ने जल्दी से उन्हें उठाया और एंबुलैंस बुला कर उन्हें अस्पताल ले गई, जहां डाक्टर ने कुछ देर उन का ट्रीटमैंट करने के बाद मुझे बताया, ‘तुम्हारे अब्बू को हार्टअटैक आया है. इन की तबीयत काफी नाजुक है.

हालांकि, अब वे खतरे से बाहर हैं, पर यह ध्यान रखना कि उन्हें किसी भी तरह की कोई तकलीफ न हो और न ऐसी बात करना, जिसे सोच कर उन की तबीयत फिर से खराब हो जाए. वैसे, आप उन से मिल सकती हैं.’

‘‘मैं जैसे ही अपने अब्बू से मिली, उन्होंने मुझे देख कर मुंह फेर लिया. मैं सम?ा गई कि मेरी ही वजह से उन की यह हालत हुई है. उन्हें खुश रखने के लिए मैं ने उन से कहा कि आप नाराज मत होना, मैं वही करूंगी जो आप कहोगे.

‘‘मेरी बात सुन कर उन का चेहरा खिल उठा और मुसकराते हुए वे बोले, ‘तो फिर मैं जहां तुम्हारी शादी करूंगा, तुम्हें मंजूर होगा.’

‘‘मैं ने ‘हां’ में सिर हिला दिया और अपनी खुशी को अपने अब्बू की खुशी की खातिर बलिदान कर दिया.

‘‘उस के कुछ ही दिन बाद मेरे अब्बू ने मेरी शादी इस उम्मीद में कर दी कि बड़े घराने में उन की बेटी को सारी खुशियां मिलेंगी.

‘‘पर, उन का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ. शादी के एक साल बाद ही एक हादसे में मेरे शौहर इस दुनिया से चल बसे.

‘‘सुसराल वालों ने यह कह कर मुझे और मेरे मासूम बेटे को घर से निकाल दिया कि इस मनहूस औरत की वजह से ही उन के जवान बेटे की मौत हुई है.

‘‘वहां से निकाले जाने के बाद मैं ने अपने अब्बू के घर जाना बेहतर नहीं समझा, क्योंकि मेरी बरबादी की वजह कुछ हद तक वे ही थे, जिन्होंने पैसे के लालच में मेरे प्यार को मुझ से जुदा कर दिया था.

‘‘उस के बाद मैं ने यह घर किराए पर ले लिया और जोकुछ बचत थी, उस से खाने का छोटा सा औनलाइन बिजनैस शुरू कर लिया.’’

मुझे हिना की बातें सुन कर बहुत दुख हुआ. तभी उस का छोटा सा बेटा मेरी गोद में आ कर बैठ गया, जिसे मैं प्यार करने लगा. यह देख कर हिना की आंखों के आंसू रुक गए और उस के चेहरे पर एक मुसकान दिखाई दी.

फिर हिना ने मुझ से पूछा, ‘‘तुम कहां थे इतने दिन और शादी वगैरह की या नहीं? कितने बच्चे हैं तुम्हारे?’’

मैं ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे सिवा मैं भला किसी और से शादी कैसे कर सकता था? मेरे रोमरोम में तो तुम बसी थी.’’

‘‘तुम्हारी शादी के बाद तुम्हारे अब्बू ने मेरी पिज्जा की दुकान बंद करा दी और अपनी ताकत के बल पर मुझे वहां कोई दुकान न लेने दी. उन का इस पर भी पेट न भरा, तो उन्होंने कुछ गुंडों से मेरी पिटाई कराई और तुम्हारा शादी का फोटो दिखाते हुए मु?ो यह शहर छोड़ कर जाने की धमकी दे डाली.

‘‘उस के बाद मैं इस शहर में अपने एक दोस्त के पास आ गया. कामधंधा करने को मन नहीं करता था, बस यों ही घर में पड़ा रहता और तुम्हें याद करता रहता, तुम्हारी यादों में तड़पता रहता था.

‘‘इसी तरह 2 साल निकल गए. मेरे दोस्त ने दुबई में मेरे लिए काम तलाश लिया और अब मैं ने वहां जाने का इरादा कर लिया है.

‘‘पिछले 2 दिन से उस दोस्त की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी. उसे डाक्टर ने आराम के लिए बोला था, पर वह जबरदस्ती काम पर आना चाहता था, तो मैं ने उसे आराम करने के लिए कहा और खुद उस के काम के लिए निकल पड़ा.

‘‘आज पहली बार मैं काम के लिए निकला, तो मेरी मुलाकात तुम से हो गई और हमारा यह मिलन एक अनोखा मिलन बन गया.’’

मैं ने हिना का हाथ अपने हाथ में पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब तो तुम भी गरीब हो गई हो, अब तुम भी मेरे जैसी बन गई हो, अब तो तुम से शादी करने से मुझे कोई नहीं रोक सकेगा. अब हमारे बीच की अमीरी की दीवार ढह गई है.’’

इतना सुनते ही हिना मेरे गले से लग गई और बोली, ‘‘वाकई, यह मिलन एक अनोखा मिलन है.’’

मैं ने उसे अपनी बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारी और तुम्हारे बेटे की जिम्मेदारी मेरी हुई.’’

यह सुन कर हिना की आंखों में आंसू आ गए और वह मेरे गले से लगते हुए बोली, ‘‘शादी के बाद तुम्हें मेरे लिए पिज्जा बनाना पड़ेगा… समझे?’’ कहते हुए हिना हंसने लगी.

हिना की बात सुन कर मुझे भी हंसी आ गई. मैं ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए पिज्जा की पूरी दुकान ही खोल लूंगा.’’

इस तरह हिना का और मेरा अनोखा मिलन हो गया और हम दोनों ने शादी कर ली.

Hindi Story: मोची का बेटा

Hindi Story: ‘‘कहो राजप्रसाद, कैसे हो?’’

‘‘आओ दिनेश भैया, बैठो. इस बार तो बहुत दिनों के बाद आए हो. बताइए भैया, कैसे आना हुआ?’’ राजप्रसाद ने मुसकराते हुए पूछा.

मैं ने उस की सामान की पेटी पर बैठते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम्हारे पास कोई किस काम के लिए आ सकता है? देखना, जरा इस सैंडल पर पौलिश कर देना.’’

राजप्रसाद ने सैंडल ले ली और मु झे पहनने के लिए चप्पल दे दी.

‘‘बस भैया, ये जूते टांक दूं और फिर मैं आप की सैंडल पर पौलिश करता हूं.’’

‘‘हां, राजप्रसाद, मु झे कोई जल्दी नहीं है. आराम से कर देना,’’ मैं ने सहजता से कहा.

राजप्रसाद उस जूते को गांठने में लग गया और मैं अपने विचारों में खो गया.

राजप्रसाद को मैं कई सालों से जानता था. वह न जाने कितने सालों से सड़क के किनारे इसी नीम के पेड़ के नीचे बैठा अपना मोची का काम करता आ रहा है.

बिना दीवारों और बिना छत की पेड़ की छांव ही उस की खुली दुकान है. इस दुकान पर कोई भी बिना रोकेटोके आ सकता है.

पेड़ की छांव पृथ्वी की घूर्णन गति से घूमती हुई सुबह से शाम तक अपना पाला बदल देती है, इसलिए राजप्रसाद ने एक लोहे की छड़ को धरती के सीने में गाड़ रखा है और उस पर एक बड़ी छतरी को बांध कर अपनी दुकान का शामियाना तान रखा है. चेहरे पर हरदम मुसकान उस की खुशहाल जिंदगी की गवाह है.

मेहनत के पसीने से भीगी उस की बनियान उस की श्रमशक्ति की खास पहचान है. उस की ईमानदारी और मेहनत देख कर मन में अपनेआप ही इज्जत का भाव पैदा होता है.

थोड़ी देर के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘राजप्रसाद, यहां बैठते हुए तुम्हें कितने साल हो गए?’’

‘‘अरे भैया, बस ये ही तकरीबन 30-35 साल.’’

‘‘एक लंबा अरसा हो गया फिर तो राजप्रसाद. तुम ने तो यहां की दुनिया को खूब बदलते देखा होगा, क्यों?’’

‘‘हां भैया, इतने अरसे में तो यहां की पूरी दुनिया ही बदल गई. सामने एकमंजिला दुकानें थीं, अब देखो, यहां बहुमंजिला इमारत खड़ी है. किराएदार, मकान मालिक, दुकान मालिक सब बदल गए.

‘‘पहले यह दुकान अखबारों और पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी. यहां नौकरी के फार्म खूब बिका करते थे. जब से चीजें औनलाइन हुई हैं, यह दुकान स्टेशनरी और स्कूल की किताबों की दुकान बन कर रह गई.’’

दुनियादारी की बातों से हट कर कुछ सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘अच्छा राजप्रसाद, अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछ लूं तुम से…’’

‘‘अरे भैया, बुरा क्यों मानेंगे? आप एक नहीं, दो बातें पूछो,’’ राजप्रसाद ने बड़े विश्वास के साथ कहा.
तब मैं ने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा, ‘‘क्या इस मोचीगीरी के काम से तुम्हारा घरखर्च निकल जाता है?’’

‘‘अरे भैया, आप खर्चे की बात कर रहे हो, इसी की आमदनी से मैं ने अपना मकान बना लिया है. 2 बेटियों को पढ़ालिखा कर उन की अच्छे परिवारों में शादी कर दी है.

‘‘मेरी एक बेटी तो सरकारी मास्टरनी है, सरकारी. दूसरी बेटी भी शादी के बाद पीएचडी कर रही है.’’

‘‘अरे वाह राजप्रसाद. तुम ने तो कमाल कर दिया. मैं तो सोचता था कि इस काम से तुम्हारे घर का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से निकलता होगा.’’

‘‘नहीं भैया, ऐसा कुछ नहीं है. मोचीगीरी में इतना काम है कि संभाले नहीं संभलता. लोग तो यह सम झते हैं कि हमारे पास केवल जूतेचप्पल टांकने और उन पर पौलिश करने का काम भर है, लेकिन हमारे पास इस के अलावा भी किसानों, दुकानदारों और यहां तक कि फैक्टरियों तक से चमड़े का सामान सिलाई के लिए आता है.’’

‘‘ये सब चीजें तो राजप्रसाद हम जैसों के खयाल में ही नहीं आती हैं,’’ दिनेश बोला.

‘‘भैया, दुनिया की सोच बदलने में जमाने गुजर जाते हैं. आज भी हमें सदियों पुराने मोची की ही नजर से देखा जाता है. वही फटेपुराने कपड़ों वाला, टूटेफूटे मकान में रहने वाला,’’ राजप्रसाद की बात को सुन कर मैं भी सोच में पड़ गया.

मैं ने भी वही सदियों पुरानी सोच पाल रखी थी. मैं ने सच स्वीकारते हुए कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम ने तो आज मेरी भी सोच बदल दी. मेरी सोच भी दूसरों की ही तरह थी. अच्छा, तुम्हारे क्या कोई बेटा भी है?’’

‘‘हां भैया, एक बेटा भी है. उस ने कुछ दिन पहले ही एमबीए किया है और नोएडा में एक कंपनी में उस की नईनई नौकरी लगी है. अभी उस का 3 लाख रुपए से कुछ ज्यादा का सालाना पैकेज है. इतना तो मैं यहां बैठेबैठे कमा लेता हूं.’’

‘‘तो फिर राजप्रसाद, तुम ने अपने बेटे को इसी काम में क्यों नहीं लगाया?’’

‘‘अब देखो भैया, मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं, हमारे यहां कामधंधे को ले कर लोगों की सोच बड़ी खराब है. मोचीगीरी के काम को सब छोटा काम सम झते हैं. खुद मैं भी इसी सोच का शिकार हूं.

‘‘वह कंपनी में नौकरी कर रहा है, तो उस की इज्जत है. लेकिन दुनिया वाले नहीं सम झते हैं कि वह दूसरों की नौकरी ही कर रहा है. मैं खुद के धंधे का मालिक हूं, लेकिन मेरा कोई सम्मान नहीं. भैया, मैं तो बस मोची हूं, मोची.’’

राजप्रसाद की बात सच्ची, पर दमदार थी. उस की पते की बात पर मैं ने कहा, ‘‘राजप्रसाद, तुम बिलकुल सही कहते हो. कोई कुछ भी कहे, अपना काम अपना होता है और दूसरों की नौकरी बजाने से लाख बेहतर होता है.’’

‘‘है न भैया, मैं ने तो अपने बेटे से भी यही कहा था कि इसी जमेजमाए काम को संभाल ले. अगर यहां बैठने में लाज आती है, तो दुकान खुलवाए देता हूं, वहीं 2 लड़के रख लेना.’’

‘‘तो फिर उस ने क्या जवाब दिया राजप्रसाद?’’

‘‘कहने लगा, पापा, आप भी कैसी बातें करते हो? मैं एमबीए कर के दूसरों की जूतियां टांकूंगा क्या? आज छोटी पोस्ट पर हूं, कल बड़ी पोस्ट मिलेगी. आज छोटा पैकेज है, कल बड़ा पैकेज मिलेगा. मु झे भी लगा, बेटा कह तो सही रहा है.’’

‘‘हां, राजप्रसाद. तुम्हारे बेटे ने एमबीए किया है, उस की भी अपनी सोच, अपना स्वाभिमान है.’’

अब तक राजप्रसाद ने मेरी सैंडल पौलिश कर दी थी. मैं ने उस से विदा ली.

फिर बहुत लंबे समय तक उधर जाना नहीं हुआ. इस के बाद जब एक दिन उधर जाना हुआ तो मु झे अचानक से राजप्रसाद की याद आई. उस से मिलने को न जाने क्यों मन आतुर था. बहाना वही पुराना, लेकिन इस बार सैंडल नहीं जूतों पर पौलिश कराना था.

लेकिन आज नीम अकेला था. कुछ उदास. उस के नीचे की दुनिया गायब थी. उस जगह को देख कर लगता था, यहां से कोई बहुत पहले अपना तंबू उखाड़ कर ले जा चुका है.

एकबारगी लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि राजप्रसाद इस दुनिया से ही चला गया हो. आज की दुनिया में इस शरीर और सड़क हादसों पर कोई भरोसा नहीं… कब क्या हो जाए.

अब तो दिल की धड़कनों के साथ जिज्ञासा भी बढ़ गई. सामने वाले दुकानदार से पता किया तो उस ने अपने चमकीले दांतों से मुसकान बिखेरते हुए बड़े सम्मान के साथ कहा, ‘‘अच्छा, आप राजप्रसादजी के बारे में पूछ रहे हो.’’

उस के मुंह से ‘राजप्रसाद’ की जगह ‘राजप्रसादजी’ सुन कर तो मैं भी कुछ अचकचाया.

मैं ने सोचा कि कोई गलतफहमी न हो, इसलिए कहा, ‘‘हां, वह राजप्रसाद मोची ही है.’’

‘‘हां जी, हां. मैं भी उन्हीं की बात कर रहा हूं. अब तो उन की जिंदगी बदल चुकी है. वह देखो, वह रहा उन का शोरूम, जिस पर लिखा है ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’. अब वे वहीं बैठते हैं मालिक बन कर.’’

मैं ने हैरानी से कांच का दरवाजा खोल कर जैसे ही शोरूम में प्रवेश किया, तो मेरी नजर सामने रखे चमचमाते जूतों और चप्पलों पर पड़ी. तभी काउंटर से किसी जानीपहचानी आवाज ने पुकारा, ‘‘अरे भैया, इधर आओ. कितने दिनों के बाद दिखाई दिए हो. आओ बैठो. अरे गुड्डू जाओ, जरा भैया के लिए चाय बोल कर आओ.’’

‘‘अरे नहीं, राजप्रसादजी,’’ मैं उन का रुतबा और शानोशौकत देख कर उन के नाम में ‘जी’ लगाने से खुद को रोक नहीं पाया.

‘‘अरे भैया, हम कोई ‘जी’ नहीं हैं. हम वही पुराने वाले राजप्रसाद हैं. हमें ‘राजप्रसाद’ ही बोलिए, आप के मुंह से सुन कर अच्छा भी लगता है और प्रेम की मिठास भी आती है. पुराने दिन याद आते हैं.’’

मैं ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘लेकिन, यह तो बताओ कि यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘भैया, यह सब तो बेटा देव ही बताएगा. उसी की जबान से सुनना. बड़ा मजा आएगा. बड़ी रोचक कहानी है. बस, कुछ ही देर में वह आने वाला है.’’

यह सुन कर मैं उस रोचक किस्से को सुनने के लिए उतावला हो उठा.

कुछ ही देर बाद उस शोरूम के सामने एक चमचमाती कार आ कर रुकी. उस में से बनाठना एक स्मार्ट नौजवान उतरा. वही हमारे मोची का बेटा था. ऐसा लगता था कुदरत ने जैसे उसे फुरसत के पलों में गढ़ा था, बेहद हैंडसम.

राजप्रसाद ने उस का और मेरा परिचय कराया. उस ने पैर छू कर मेरा आशीर्वाद लिया.

तब राजप्रसाद ने उस से कहा, ‘‘बेटा देव, ये मेरे बहुत पुराने परिचित हैं, लेखक भी हैं. ये तुम से कुछ जानना चाहते हैं. इन से कुछ भी मत छिपाना.’’

देव मुझे अपने केबिन में ले गया. तब उस ने मुझे अपना रोचक किस्सा सुनाना शुरू किया.

‘‘जी अंकल, एमबीए करने के बाद मेरी नौकरी एक बड़ी कंपनी में लग गई. जब मैं पहले दिन अपने औफिस गया, तो वहां बेला को देख कर चौंक गया.’’

‘‘यह बेला कौन है बेटा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, बेला से मेरी जानपहचान बचपन से थी. वह मेरे ही महल्ले में रहती थी. बेला को पहले से ही पता था कि मेरी नौकरी वहां लगने वाली है.

‘‘जैसे ही मैं अपने औफिस में पहुंचा, बेला खटाक से वहां आई और बोली, ’’आ गया चिकने. क्या तु झे पता नहीं था कि मैं यही पर हूं? चल, अब देखती हूं तुझे.’’

‘‘अरे बाप रे, कोई लड़की ऐसे बोलती है क्या?’’ मैं ने हैरानी से कहा.

‘‘अंकल, उस की बात मत पूछो. वह बचपन से ही मुंह भरभर कर गालियां बका करती थी. जैसे उस का मुंह न हो, गालियों की खान हो. मांबहन की गालियां तो हरदम उस के होंठों पर ही रहती थीं.

‘‘खैर, उस समय तो बेला वहां से चली गई, लेकिन मेरे दिल में सिहरन पैदा कर गई, क्योंकि वह क्या कर सकती है, इस का अंदाजा लगाना भी मुश्किल था.’’

‘‘अरे देव, ऐसा क्यों कहते हो? क्या बेला इतनी बुरी थी?’’

‘‘अंकल, आप आगे का किस्सा सुनो, फिर आप ही फैसला करना कि वह कैसी थी.’’

‘‘अच्छा सुनाओ, अब तो तुम ने इस किस्सागोई में मेरी दिलचस्पी और बढ़ा दी. आखिर कैसी थी बेला, यह जानने को मैं उतावला हो उठा हूं.’’

‘‘अंकल, मु झे भी अपना बचपन याद आ गया, जब बेला और मैं बचपन में साथसाथ खेला करते थे. जैसेजैसे हमारा बचपन पीछे छूटा और हमें लड़कालड़की के फर्क का पता चला, तो धीरेधीरे हमारा साथसाथ खेलनाकूदना भी छूट गया.

‘‘वह कदकाठी में भी मेरे से बड़ी लगती थी. आप को तो मालूम ही होगा कि लड़कियां लड़कों से पहले बड़ी हो जाती हैं.’’

‘‘हां बेटा, आगे सुनाओ.’’

‘‘अंकल, बेला अलग ही मिजाज की थी. उसे लड़कों से दोस्ती करना खूब पसंद था. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस ने कई बौयफैं्रड बना लिए थे. बातबात पर आंख मारना उस की आदत बन गई थी.

वह मु झे भी अपना बौयफ्रैंड बनाना चाहती थी, लेकिन मु झे तो पढ़नेलिखने से ही फुरसत नहीं थी.’’

इस कहानी में मुझे रस आ रहा था. मैं ने कहा, ‘‘देव, बड़ी अजीब और रसीली लड़की थी बेला.’’

‘‘हां अंकल, वह ऐसी ही थी रोमांटिक टाइप. बेला ने 12वीं क्लास तक आतेआते सारी हदें पार कर दी थीं.

वह अपने यारों के साथ खूब इधरउधर घूमा करती थी. उस के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था.

‘‘ऐसा लगता था कि अब वह खुल कर खेलने लगी है. लेकिन एक दिन मेरे साथ कुछ अलग हुआ.’’

‘‘क्या हुआ था देव? क्या तुम ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था?’’

‘‘नहीं अंकल, मै इन बातों में था ही नहीं. हुआ यह कि एक दिन बेला ने मु झे किसी लड़की से बातें करते देख लिया.’’

‘‘तो इस में कौन सी बड़ी बात थी. आजकल तो यह बड़ी सामान्य सी बात है.’’

‘‘अंकल, यह किसी और के लिए सामान्य बात हो सकती थी, लेकिन बेला के लिए नहीं. अगले दिन कालेज से लौटते वक्त बेला ने मु झे एक सुनसान सी जगह पर रोक लिया और छूटते ही गाली दे कर बोली, ‘क्यों बे, बहन के… चिकने. उस लौंडिया से बहुत हंसहंस कर बातें कर रहा था. मु झ से बातें करते हुए तेरी… में आग लग जाती है. तु झे मजा चाहिए तो यह ले…’ कह कर उस ने मु झे दोनों हाथों से पकड़ लिया और जबरदस्ती मेरे होंठ और गाल चूम लिया.

मैं अपनेआप को उस से छुड़ा कर जाने लगा, तो वह मुसकराई और कहा, ‘जा बेटा, आज तो सड़क पर था छोड़ दिया, लेकिन तू बचने वाला नहीं. और अगर आज के बाद किसी और लौंडियाफौंडिया से बात की, तो फिर देख लेना…’’

‘‘अरे देव, बेला की इतनी हिम्मत?’’

‘‘अंकल, मेरे मन में बेला ने दहशत पैदा कर दी थी. इस के बाद किसी लड़की से बात करने से पहले मैं हजार बार सोचता था और पहले चारों तरफ नजरें घुमा कर देख लेता था कि कहीं आसपास बेला तो नहीं है.’’

‘‘ओह, पर वह लड़की थी ही ऐसी. न शर्म, न लिहाज.’’

‘‘लेकिन अंकल, वह पढ़ाई में भी बहुत काबिल थी, तभी तो औफिस में भी वह मेरे से ऊंचे ओहदे पर थी. फिर भी मैं सबकुछ भूल कर अपने काम में लग गया.

‘‘बाद में बेला के बारे में बहुतकुछ सुनने को मिलने लगा था. लेकिन औफिस में दिखावे के लिए बड़ी सतीसावित्री बनी घूमती थी और अपने काम में कोई चूक नहीं होने देती थी.’’

‘‘फिर भी देव, वह चैन से तो न बैठी होगी…’’

‘‘अंकल, कुछ दिन तो वह ऐसे ही मु झ से मिलने की नाकाम कोशिश करती रही, लेकिन बेला जैसी लड़की ऐसी अनदेखी को बरदाश्त नहीं कर पाती है. एक दिन बेला सीधे मेरे औफिस में पहुंच गई और उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. मु झे उस के इरादे का जरा सा भी अहसास नहीं था.’’

‘‘आखिर क्या था उस का इरादा देव?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अंकल, मु झे बताते हुए भी शर्म आती है. पहले वह मेरे पास आ कर मु झ से सट कर खड़ी हुई. मैं ने बचने की कोशिश की, तो मेरे गालों पर चिकोटी काटते हुए गंदी गाली दे कर बोली, ‘बच कर कहां भागता है. ले ले न तू भी जवानी के मजे.’

‘‘अंकल, तभी मैं ने उसे डपटते हुए कहा, ‘बेला, तुम पागल हो गई हो क्या? दूर हटो.’

‘‘लेकिन, ऐसा लगता था, जैसे वह आज हवस की पुजारिन बन कर आई हो. उस ने अपनी शर्ट के ऊपर के
2 बटन खोले, अपनी ब्रा ऊपर की और बोली, ‘ले ले जवानी का मजा.’’’

‘‘ओह देव, यह तो हद हो गई. कोई लड़की ऐसा करती है भला. यह तो सीधेसीधे जबरदस्ती की कोशिश थी.’’

‘‘अंकल, मैं ने खुद को बचाते हुए उसे जोर से धक्का दिया. उस का सिर दीवार में जा कर लगा. वह चिल्लाई, ‘बाहर जा कर बताऊंगी सब को. तू मु झ से जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था. आज भी दुनिया ऐसे मामलों में औरतों की बातों पर यकीन करती है मर्दों की नहीं.’

‘‘वह तो अपने कपड़े ठीक कर के मेरे औफिस से बाहर चली गई, लेकिन उस की बात सुन कर मैं घबरा गया. तभी मेरी नजर सामने सीसीटीवी कैमरे पर पड़ी.

कुछ देर के लिए मु झे तसल्ली हुई कि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. फिर भी अपना शक दूर करने के लिए चपरासी को बुला कर पूछा कि सीसीटीवी कैमरा काम कर रहा है कि नहीं. उस ने बताया कि यह खराब है और इस को बदला जाना है. अब मेरा पक्ष रखने वाला कोई नहीं था.’’

‘‘फिर तो तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ होगा?’’

‘‘हां अंकल, मु झे बहुत जलील कर के औफिस से निकाला गया. मेरी एक न सुनी गई. तब मु झे समाज में ऐसे मामलों में आदमी और औरत के होने का फर्क सम झ में आया.’’

‘‘क्या कोई पुलिस कंप्लैंट हुई तुम्हारे खिलाफ?’’

‘‘बस अंकल, यही एक मेहरबानी हुई. कंपनी ने किसी बखेड़े में न पड़ते हुए मु झे नौकरी से बरखास्त कर दिया. जब मैं कंपनी के औफिस से बाहर निकल रहा था, तब बेला के कड़वे करेले से शब्द मेरे कानों में पड़े, ‘मोची का बेटा है, मोची का बेटा ही रहेगा. अब जिंदगीभर उस नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर दूसरों की जूतियां गांठ…’

‘‘मैं बेला के इन कड़वे शब्दों को सुन कर तिलमिला उठा.’’

‘‘यह सुन कर कोई भी तिलमिला जाता देव. यह तुम्हारा सब्र और सम झदारी थी, जो तुम ने इस जहर के प्याले को पी लिया. कोई और होता तो बखेड़ा खड़ा कर देता… फिर?’’

‘‘इस घटना के बाद मेरा मन नौकरी से भी उचट गया. मैं ने पापा से बात की, तो उन्होंने मु झे घर बुला लिया और मोची की दुकान खोलने की बात कही. लेकिन मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था.

‘‘मैं जूतों का एक शोरूम खोलने के मूड में था. कुछ पैसा पापा के पास था, कुछ बैंक से लोन लिया और कानपुर की एक जूता कंपनी 20 फीसदी रकम पहले देने पर शोरूम के लिए माल उठवाने के लिए तैयार हो गई. बाकी पापा का अनुभव और मेरी मेहनत थी. बस, यही मेरी कहानी थी अंकल.’’

‘‘लेकिन देव, मेरी नजर में तो कहानी अभी अधूरी है. आखिर बेला का क्या हुआ?’’

तब देव ने हंसते हुए कहा, ‘‘अंकल, आप ने भी कैसा सवाल पूछ लिया? वह जो चाहती थी, उसे वह मिला. मैं जो चाहता था, मुझे वह मिला.’’

‘‘मतलब…?’’ मैं ने हैरानी से पूछा. मु झे लगा कि कहानी में अभी भी कोई मोड़ है.

‘‘मतलब यह कि कंपनी को जल्दी ही बेला की असलियत पता चल गई. सुनने में आया कि उसे कंपनी से धक्के मार कर बाहर निकाला गया. उस की गंदी हरकतों की वजह से उस का अपने परिवार से पहले ही नाता टूट चुका था, किसी और ने भी उस का साथ नहीं दिया. उस का जोड़ा हुआ पैसा कब तक चलता?’’

‘‘फिर, क्या किया उस ने?’’

‘‘फिर उसे कहीं नौकरी न मिली. उस ने शहर तक बदले, लेकिन अपनी हरकतें न बदलीं. उस के बदनाम किस्से उस से पहले दूसरी जगह पहुंच जाते. वह जलील होती और उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता.

काश, उस ने कंपनी और शहर बदलने के बजाय अपनी हरकतें बदली होतीं.’’

‘‘अब कहां पर है वह देव?’’

‘‘अंकल सुना है कि वह अब मेरठ की बदनाम गली का हिस्सा बन चुकी है. वही दलदल, जिस में गिर कर कभी कोई औरत बाहर नहीं आती.’’

मेरी कहानी पूरी हो चुकी थी. मैं चाय पी कर और बापबेटे से विदा ले कर बाहर आया. मैं एक नजर कामयाबी की उस सीढ़ी पर डालने से खुद को रोक न सका, जिस पर एक मोची के बेटे का फलसफा लिखा था ‘राजप्रसाद बूट्स ऐंड शूज’.

Hindi Story: नाटक छोटा सा

Hindi Story: आसमानी रंग की प्लेन साड़ी में कितनी खूबसूरत लग रही थी वह. उस की खुली हुई काली जुल्फें बारबार चेहरे पर गिरी जा रही थीं, जिन्हें वह बड़े नाज से फिर से संवारने की नाकाम कोशिश करती थी. खिड़की से अंदर आती हुई धूप की चमक से उस का सांवला चेहरा सुनहरी आभा से चमक उठता था.

अपने ही काम में तल्लीन वह 40 साल की औरत आज औफिस में सब की नजरों का केंद्र बनी हुई थी. लंचटाइम में मैनेजर साहब ने आ कर स्टाफ के सभी लोगों से उस का परिचय कराया था.

‘‘इन से मिलिए, ये हैं काजल. आज से ये भी हमारे साथ ही काम करेंगी और आप सब इन का सपोर्ट कीजिए,’’ बौस ने इशारोंइशारों में यह भी बता दिया था कि काजल के पति की पिछले साल एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी और इसीलिए अब काजल को नौकरी करने की जरूरत पड़ रही है.

बौस के चले जाने के बाद सभी लोग काजल से ‘हायहैलो’ करने लगे थे. इन में सब से आगे समीर था, जो अपनी तीखी नजरों से काजल के जिस्म का अच्छी तरह मुआयना कर रहा था काजल का रंग भले ही सांवला था, पर उस के नैननक्श बहुत तीखे थे, जो उस की खूबसूरती को और भी बढ़ा देते थे. वह समीर को पहली ही नजर में जंच गई थी. वैसे भी समीर की दिलफेंक नजरों को तो हर लड़की और हर औरत जंच ही जाती है.

समीर का पूरा नाम समीर सिंह था. वह अपनी जाति को बड़ा बताता था और सामने वाले की जाति में कमियां निकालना उस का फेवरेट काम था. वह नौकरी में रिजर्वेशन के भी खिलाफ था.

उस के मुताबिक, ऊंची जाति का हक दलितों ने छीन लिया है, इसीलिए ज्यादातर अगड़े आज बेरोजगार हैं. अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर उस ने ‘कट्टर क्षत्रिय’ वाली तसवीर लगा रखी थी.

समीर की उम्र 28 साल थी और उस के घर में सिर्फ उस की मां और 20 साला बहन रुचि थी, जो अभी पढ़ाई कर रही थी.

रात को समीर बिस्तर पर लेटा, तो उस से उम्र में पूरे 12 साल बड़ी, पर बेहद आकर्षक काया वाली काजल की याद सता रही थी.

औफिस में अगले दिन से ही समीर ने काजल पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे. कभी वह काजल के पास जा कर काम के बारे में कुछ बात करता, तो कभी उस की तारीफ करने लगता.

काजल भी समीर को एक अच्छा इनसान सम झ बैठी थी. तभी तो उस दिन जब काजल औफिस का काम निबटा कर थके कदमों से रोड के किनारे खड़ी हो कर कैब का इंतजार कर रही थी कि तभी समीर अपनी बाइक ले कर आ गया और ठीक काजल के सामने आ कर खड़ी कर दी.

‘‘आइए, मैं आप को छोड़ देता हूं,’’ समीर ने यह बात इतने नाटकीय अंदाज में कही थी कि काजल कुछ कह नहीं सकी और मुसकराते हुए उस की बाइक पर बैठ गई.

थोड़ी देर के बाद ‘सिल्वेस्टर कैफे’ के सामने समीर ने अपनी बाइक रोक दी और काजल की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह शहर का फेमस कैफे है, इसलिए एक कौफी पीना तो बनता ही है.’’

काजल ने भी कोई एतराज नहीं जताया और दोनों जा कर कौफी टेबल पर बैठ गए.

समीर ने अपनी कौफी में थोड़ी ऐक्स्ट्रा शुगर ली, जबकि काजल ने शुगर फ्री कौफी लेना ही पसंद किया.

कौफी के घूंट भरते समय समीर काजल को जीभर कर देख रहा था, पर जैसे ही काजल ने नजर उठाई तो समीर फिर से मासूम बनने का दिखावा सा करने लगा और इधरउधर की बातें करने लगा.

कौफी पीने के बाद समीर ने काजल को उस के अपार्टमैंट्स की बिल्डिंग के बाहर छोड़ दिया. काजल शालीमार अपार्टमैंट्स के फ्लैट नंबर 102 में अपने 22 साल के भाई गौतम के साथ रहती थी.

अगले दिन औफिस में लंच के समय समीर के एक दोस्त राघव ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘तू तो अपनेआप को ‘कट्टर क्षत्रिय’ कहता है, पर फिर इस दलित जाति वाली काजल पर क्यों डोरे डाल रहा है?’’

काजल दलित जाति की है, यह बात तो समीर अच्छी तरह जानता ही था. वह मुसकराया और उस ने राघव से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘अरे, तु झे क्या पता कि ये दलित जाति की औरतें तो बिस्तर पर बहुत मजा देती हैं और अगर दलित औरत विधवा हो तो फिर तो कहने ही क्या?

‘‘और फिर इन के साथ मजे लेने से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि दलित औरतें और तंबाकू वाली चिलम कभी जूठी नहीं होती.’’

समीर के चेहरे पर एक जहरीली मुसकराहट अब भी दौड़ रही थी. उस दिन पता नहीं क्यों, पर समीर औफिस में चुपचाप था. उस की चुप्पी काजल को अच्छी नहीं लगी, तो उस ने समीर की चुप्पी की वजह पूछी.

समीर ने उसे बताया कि उसे जुकाम है और सिर में भी दर्द हो रहा है. यह बात सुन कर काजल ने उसे दवा लेने की सलाह दी.

रोज की तरह ही औफिस से निकलते हुए समीर ने अपनी बाइक पर काजल को बिठाया और शालीमार अपार्टमैंट्स के सामने उतार दिया.

जैसे ही काजल आगे बढ़ी, तो समीर ने कहा, ‘‘कम से कम अपने फ्लैट पर बुला कर इस बीमार को एक कप चाय तो पिला दीजिए.’’

समीर की इस बात पर काजल थोड़ा सोच में पड़ गई थी, क्योंकि आज उस का भाई किसी सिलसिले में शहर सेबाहर गया हुआ था और ऐसे में वह किसी गैरमर्द को फ्लैट में बुलाना तो नहीं चाहती थी, पर समीर के चेहरे का भोलापन देख कर काजल ने मुसकराते हुए उसे अपने फ्लैट की तरफ चलने का इशारा किया.

काजल 2 कप चाय ले आई. अपनी चाय सिप करते ही समीर ने बुरा सा मुंह बनाया और काजल से चाय में और ज्यादा चीनी डाल कर लाने को कहा.

काजल किचन की ओर चीनी लेने गई, इतनी देर में समीर ने काजल के कप में नशे की गोली डाल दी.

काजल को कुछ पता नहीं चला. चाय पीने के बाद समीर बहाने से फोन करने लगा. काजल पर धीरेधीरे नशा हावी होने लगा था और कुछ देर बाद वह गहरी नींद के आगोश में चली गई.

समीर को इसी बात का इंतजार था. उस ने काजल को बिस्तर पर लिटाया और उस के जरूरी कपड़े हटा दिए और बेहोशी की सी हालत में काजल का रेप किया और एक वीडियो भी बना लिया.

जब काजल को होश आया, तो उस की दुनिया लुट चुकी थी. एक बार फिर दलित विधवा किसी ऊंची जाति वाले की हवस का शिकार हुई थी.

समीर जा चुका था. अपने साथ हुआ जुल्म काजल से सहन नहीं हो रहा था. वह बहुत रोई. अपनी जिंदगी को खत्म तक करने के बारे में सोचा, पर मर जाना किसी समस्या का हल तो नहीं और फिर उस का भाई भी तो उसे चरित्रहीन ही समझेगा.

काजल इसी उधेड़बुन में थी. जब कुछ सम झ नहीं आया, तो वह शावर के नीचे जा कर खड़ी हो गई. जब वह बाहर आई, तो खुद को तरोताजा महसूस करने लगी.

काजल की सम झ में इतना तो आ ही गया था कि हो न हो, बात इतने पर ही खत्म नहीं होगी और यही हुआ भी.

अगले दिन ही समीर का फोन आया. कांपते हाथों से काजल ने फोन रिसीव तो कर लिया, पर कुछ बोल न सकी.

उधर से समीर ने ही काजल को उस के पोर्न वीडियो के उस के मोबाइल में होने की बात बताई और दोबारा जिस्मानी संबंध बनाने की मांग की. ऐसा न करने पर वीडियो इंटरनैट पर और काजल के भाई और औफिस के लोगों के बीच वायरल कर देने की धमकी दे दी. अपनी इज्जत इस तरह से तारतार हो जाने की बात सोच कर काजल डर गई थी.

बेचारी काजल एक दलित जाति की ऐसी विधवा औरत थी, जिस को अपने भाई का कैरियर बनाना था. काजल के लिए नौकरी करना भी जरूरी था और फिर उसे तो समाज का भी डर था.

इसी तरह से न जाने कितनी बार समीर ने काजल को ब्लैकमेल कर के उस की इज्जत लूटी. पर उस दिन तो हद हो गई, जब समीर अपने साथ एक दोस्त को भी ले आया. वे दोनों काजल के साथ जिस्मानी संबंध बनाना चाहते थे, पर अब काजल का सब्र जवाब दे गया था.

इस तरह तो समीर उसे पूरी दुनिया में बदनाम कर देगा और न जाने कितने दिनों तक उसे यह सब सहना पड़ेगा, इसलिए आज वह नहीं झुकेगी. यह तय करते ही काजल ने अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गई.

उसे जाता देख समीर बेफिक्र था, क्योंकि वह जानता था कि काजल के बेहूदा वीडियो उस के पास होने के चलते काजल को फिर से मजबूर करना मुश्किल नहीं होगा, पर यह सिर्फ उस का सोचना भर था. अगले कई दिनों तक काजल औफिस नहीं आई और काजल का फोन भी स्विच औफ आता रहा.

समीर बेचैन हो रहा था. हाथ आई एक मस्त दलित औरत, जिस के साथ वह जब चाहे मजे कर सकता था, पर अब तो उस का कोई अतापता नहीं था. अब वह क्या करता. उसे यही लगा था कि या तो काजल ने खुदकुशी कर ली है या वह शहर छोड़ कर बहुत दूर चली गई है.

यह सोच कर समीर मन मसोस कर रह जाता था, पर अब उसे और दुखी नहीं रहना पड़ेगा, क्योंकि काजल तो आज औफिस आ गई थी और यही नहीं, अब तो वह पहले से भी ज्यादा तरोताजा दिख रही थी और सब से मुसकरा कर बात भी कर रही थी.

समीर ने भी उस से बात करनी चाही तो भी काजल ने सामान्य ढंग से उस की बातों का जवाब दिया. समीर सम झ गया था कि यह चिडि़या तो अब पूरी तरह से उस के कब्जे में है ही, क्योंकि काजल एक सम झदार औरत है, जो समाज के सामने कभी बदनाम नहीं होना चाहेगी.

यही बात सोच कर शाम को औफिस से निकलते हुए समीर ने बेशर्मी दिखाते हुए काजल से कहा, ‘‘अरे मैडम, न जाने कहां चली गई थीं तुम. चलो, अब तो तुम आ ही गई हो, तो क्यों न आज रात रंगीन कर लें.’’

इस सवाल के बदले में काजल ने आंखें झुका लीं और समीर ने तुरंत ही अपनी बाइक काजल के सामने खड़ी कर दी. काजल बड़ी खामोशी से उस की पिछली सीट पर बैठ गई थी.

वे दोनों एक होटल के कमरे में थे. समीर महंगी वाली शराब की बोतल अपने साथ लाया था, जिसे खोल कर वह काजू की नमकीन के साथ पीने लगा और काजल को कपड़े उतारने का इशारा करने लगा.

काजल ने कहा कि वह कपड़े तो बाद में उतारेगी, पर पहले अपना मूड तो बना लिया जाए और इस के लिए काजल ने खुद ही एक पोर्न मूवी एलईडी की स्क्रीन पर चला दी.

समीर तो पहले से ही कहता था कि दलित औरतें बहुत गरम होती हैं, पर काजल को भी पोर्न देखने का शौक है, यह जान कर समीर को मजा ही आ गया था.

‘अब आज नए अंगरेजी ढंग से काजल के साथ रात गुजारूंगा…’ अभी समीर सोच ही रहा था कि स्क्रीन पर एक पोर्न मूवी के सीन आनेजाने लगे, जिन्हें देख कर समीर जोश से पागल हुआ जा रहा था. समीर ने काजल को फिर से पकड़ने की कोशिश की, पर तभी सामने की एलईडी स्क्रीन पर सीन बदल गया था.

समीर ने स्क्रीन पर देखा कि एक भारतीय लड़की बिस्तर पर बैठी हुई है और तभी एक लड़के ने बिस्तर पर आ कर उसे बांहों में जकड़ लिया और दोनों एकदूसरे को चूमने लगे और दोनों के हाथ एकदूसरे के जिस्म पर फिसलने लगे थे.

समीर अभी इस वीडियो में मजा ढूंढ़ ही रहा था कि उस की नजर लड़की के चेहरे पर गई, तो वह बुरी तरह चौंक गया. वह लड़की कोई और नहीं, बल्कि उस की सगी बहन रुचि ही तो थी.

समीर ने आंखें फाड़फाड़ कर देखा, पर उसे कुछ सम झ नहीं आया कि उस की बहन का यह वीडियो कैसे बना और यह लड़का कौन है.

समीर झुं झला गया था. उस ने काजल के चेहरे की ओर देखा, जो खड़ी मुसकरा रही थी और उस के हाथ में एक मोबाइल था.

समीर गुस्से में भर कर उसे मारने दौड़ा, तो काजल ने उसे हाथ के इशारे से रोकते हुए अपने मोबाइल की ओर इशारा किया और धमकी देते हुए कहा कि उस की एक क्लिक में उस की बहन का यह वीडियो अभी पूरे इंटरनैट पर वायरल हो जाएगा, इसलिए अब आगे से वह उसे ब्लैकमेल करना छोड़ दे और उस का वह वीडियो डिलीट कर दे.

समीर जहां का तहां रुक गया था. आखिरकार उस की बहन की इज्जत का मामला था और अपनी बहन को बदनामी से बचाने के लिए उस ने काजल की सारी बातें भी मान ली थीं.

काजल की आंखों में बदले की भावना थी. उस की आंखें मानो कह रही थीं कि एक दलित विधवा अब और शोषण नहीं सहेगी.

काजल वहां से तुरंत बाहर की ओर चल दी और कैब ले कर एक होटल में पहुंची, जहां पहले से ही उस का भाई और समीर की बहन रुचि काजल का इंतजार कर रहे थे.

काजल ने रुचि को गले लगा कर उस का धन्यवाद कहा, क्योंकि गौतम और रुचि के इस प्लान और खेले गए इस नाटक ने ही तो समीर के चंगुल से उसे बाहर निकालने में मदद की थी.

जब बारबार समीर के द्वारा ब्लैकमेल किए जाने के कारण काजल बिलकुल टूट गई थी, तो उस ने शर्म और हिचक छोड़ कर अपने भाई गौतम को ब्लैकमेलिंग वाली बात बता दी थी, तो गौतम ने आव देखा न ताव और समीर को मारने पहुंच गया.

पर जब समीर के साथ उस ने उस की सुंदर बहन को देखा, तो गौतम का प्लान बदल गया और अगले दिन से ही रुचि के कालेज जा कर उस के साथ प्यार का झूठा नाटक खेलने लगा, उस के इर्दगिर्द डोल कर प्यार की पेंगें बढ़ाने लगा.

सीधीसादी रुचि जल्दी ही गौतम की बातों में आ गई और रुचि ने भी अपने प्यार का इजहार गौतम से कर दिया.

गौतम रुचि के साथ सैक्स वीडियो बना कर उसे छोड़ देना चाहता था, ताकि अपनी बहन का बदला ले सके, पर गौतम को भी अब तक रुचि से सचमुच का प्यार हो गया था, इसलिए एक दिन गौतम ने रुचि को सारी बात बता दी.

रुचि नाराज नहीं हुई, बल्कि उस ने अपने भाई समीर को ही गलत ठहराते हुए एक प्लान बनाया, जो काजल को और ज्यादा ब्लैकमेल होने से बचा सके.

तभी रुचि और गौतम ने एकदूसरे के साथ किसी फिल्म हीरोहीरोइन के जैसी ऐक्टिंग की जो देखने में एकदम बेहूदा एमएमएस की तरह लगे और इस में रुचि के चेहरे को साफ दिखाया गया था, ताकि समीर जल्दी से उसे पहचान ले और यह ट्रिक काम कर गई. इस एक छोटे से नाटक ने समीर को उस की औकात दिखा दी थी.

अभी समीर इस सारे मामले से उबर भी नहीं पाया था कि उस के मोबाइल पर रुचि का वीडियो काल आया, जिस में वह समीर से कह रही थी कि समीर ने एक दलित विधवा के साथ जो कुकर्म किया है, वह जानने के बाद अब वह उस के साथ नहीं रह सकती, इसलिए वह घर से जा रही है और वैसे भी उस ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है और वह कोई और नहीं, बल्कि काजल का भाई गौतम था.

वीडियो काल पर काजल के साथ गौतम को देख कर समीर ने अपना माथा पीट लिया था. एक विधवा को गलत ढंग से ब्लैकमेल करने का इतना बुरा अंजाम भुगतना पड़ेगा, यह तो उस ने कभी सोचा ही नहीं था.

समीर अब कुछ नहीं कर सकता था. उस ने भारी मन से काजल का वीडियो डिलीट कर दिया था और अब उस की सोशल मीडिया प्रोफाइल से ‘कट्टर क्षत्रिय’ नामक शब्द उसे लगातार मुंह चिढ़ा रहे थे.

Hindi Romantic Story: गरम सांसों की सरगम

Hindi Romantic Story, लेखिका – डा. आरती मंडलोई

शहर की हलचल से कोसों दूर पहाड़ों के बीच बसा हुआ यह रिसौर्ट किसी सपने की तरह लग रहा था. हरियाली से ढके ऊंचऊंचे पहाड़, हलकीहलकी बारिश और ठंडी हवा में घुली ताजगी… सबकुछ जैसे किसी पुराने रोमांटिक गीत की धुन में बंधा हुआ था.

अनिका बालकनी में खड़ी थी. उस के लंबे घने गीले बाल उस की पीठ पर लहरों की तरह बिखरे हुए थे. हलकी हवा उस के चेहरे को छू कर गुजर रही थी, लेकिन उस की बेचैनी कम नहीं हो रही थी.

यह वीकैंड उस ने बहुत सोचसम झ कर चुना था. कुछ दिनों के लिए खुद से मिलने के बहाने, लेकिन कहीं न कहीं वह जानती थी कि असल में यह वक्त आरव के साथ बिताने के लिए था.

आरव… उस की जिंदगी में किसी गहरी नदी की तरह उतरा था. उन का रिश्ता बहुत साधारण तरीके से शुरू हुआ था. एक कौरपोरेट औफिस में साथी मुलाजिम के रूप में. शुरुआत में काम के सिलसिले में बातचीत हुई, फिर हलकीफुलकी दोस्ती और धीरेधीरे यह दोस्ती एक अलग एहसास में ढल गई थी.

पहली बार जब वे दोनों बारिश में भीगे थे, तो अनिका ने महसूस किया था कि आरव की नजरें उसे बस यों ही नहीं देख रहीं. वह पहली बार उस के इतने करीब आया था कि उस की सांसों की गरमाहट तक महसूस हो रही थी. अब वह यहां थी आरव के साथ, इस पहाड़ी रिसौर्ट में.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.

अनिका ने दरवाजा खोला. सामने वही था, जिस की आहट तक उसे पहचानने लगी थी.

आरव भीगा हुआ था. सफेद टीशर्ट उस के बदन से चिपकी हुई थी. बालों से पानी टपक रहा था और आंखों में वही पुरानी बेचैनी थी, जो हर बार उसे बेचैन कर देती थी.

‘‘बहुत तेज बारिश हो रही है,’’ आरव ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां…’’ अनिका ने बड़ी ही धीमी आवाज में जवाब दिया.

आरव कमरे में भीतर आ गया था और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया. कमरे में मोमबत्तियों की हलकी रोशनी फैली हुई थी. बाहर बारिश तेज हो गई थी और खिड़की के शीशों पर पानी की बूंदें धीमेधीमे फिसल रही थीं.

आरव ने जैकेट उतारी और उसे पास की कुरसी पर रख दिया. उस की नजरें अनिका पर टिकी थीं.

अनिका हलके नीले रंग की साटन की ड्रैस में थी, जो उस के बदन को छू कर फिसल रही थी.

‘‘क्या सोच रही हो?’’ आरव ने धीमे से पूछा.

‘‘कुछ नहीं,’’ अनिका ने मुसकरा कर कहा, लेकिन उस की आंखें कुछ और ही कह रही थीं.

आरव उस के करीब आया. उस की उंगलियां धीरे से अनिका की कलाई पर टिकीं. यह छुअन कोई नई नहीं थी, लेकिन फिर भी हर बार की तरह इस में कुछ नया था.

‘‘तुम्हें ठंड लग रही होगी,’’ अनिका ने कहा, लेकिन उस की आवाज में हलकी कंपकंपी थी.

आरव ने उस की उंगलियों को थाम लिया. उस की पकड़ थोड़ी हलकी थी, लेकिन फिर भी उस में एक अनदेखी ताकत थी.

‘‘मु झे ठंड नहीं लगती… लेकिन, तुम्हारे करीब आने की चाह जरूर लगती है,’’ उस के शब्द जैसे किसी गरम लहर की तरह अनिका के जिस्म को छू गए.

आरव ने धीरे से उस के चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया. उस की उंगलियां उस के गालों को छू रही थीं. अनिका की पलकों में हलकी कंपन थी.

कमरे में हलकी धुंध थी. बारिश की खुशबू हवा में घुल गई थी. आरव ने धीरे से उस की हथेलियां फिर अपने हाथों में लीं. उन की उंगलियां आपस में उल झ गईं. जैसे बारिश की बूंदें पत्तों से लिपट जाती हैं. जैसे नदी किसी किनारे से मिल कर उस में समा जाना चाहती है.

आरव और करीब आया. उस की सांसों की गरमी अब अनिका की गरदन पर महसूस हो रही थी. अनिका ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

आरव के होंठों की हलकी छुअन उस की कनपटी से होते हुए उस के गालों तक उतर आई. अनिका का दिल तेजी से धड़कने लगा था.

बाहर बरसात और भी तेज हो गई थी. आरव ने धीरेधीरे अपनी उंगलियां उस की पीठ पर फिराईं. उस के रेशमी बालों में अपनी उंगलियां उल झा दीं. फिर जैसे दो बेचैन लहरें आपस में समा गईं.

बरसात की बूंदें खिड़की से टकरा रही थीं. मोमबत्तियों की लौ भी कांप रही थी. अब दो धड़कनें एक लय में बंध रही थीं. उस रात बारिश बहुत देर तक यों ही बरसती रही.

Family Story: पहचान – आखिर वसुंधरा अपनी ननद को क्या देना चाहती थी?

Family Story, लेखिका- शोभा मेहरोत्रा

बड़ी जेठानी ने माथे का पसीना पोंछा और धम्म से आंगन में बिछी दरी पर बैठ गईं. तभी 2 नौकरों ने फोम के 2 गद्दे ला कर तख्त पर एक के ऊपर एक कर के रख दिए. दालान में चावल पछोरती ननद काम छोड़ कर गद्दों को देखने लगी. छोटी चाची और अम्माजी भी आंगन की तरफ लपकीं. बड़ी जेठानी ने गर्वीले स्वर में बताया, ‘‘पूरे ढाई हजार रुपए के गद्दे हैं. चादर और तकिए मिला कर पूरे 3 हजार रुपए खर्च किए हैं.’’

आसपास जुटी महिलाओं ने सहमति में सिर हिलाया. गद्दे वास्तव में सुंदर थे. बड़ी बूआ ने ताल मिलाया, ‘‘अब ननद की शादी में भाभियां नहीं करेंगी तो कौन करेगा?’’ ऐसे सुअवसर को खोने की मूर्खता भला मझली जेठानी कैसे करती. उस ने तड़ से कहा, ‘‘मैं तो पहले ही डाइनिंग टेबल का और्डर दे चुकी हूं. आजकल में बन कर आती ही होगी. पूरे 4 हजार रुपए की है.’’

घर में सब से छोटी बेटी का ब्याह था. दूरपास के सभी रिश्तेदार सप्ताहभर पहले ही आ गए थे. आजकल शादीब्याह में ही सब एकदूसरे से मिल पाते हैं. सभी रिश्तेदारों ने पहले ही अपनेअपने उपहारों की सूची बता दी थी, ताकि दोहरे सामान खरीदने से बचा जा सके शादी के घर में.

अकसर रोज ही उपहारों की किस्म और उन के मूल्य पर चर्चा होती. ऐसे में वसुंधरा का मुख उतर जाता और वह मन ही मन व्यथित होती.

वसुंधरा के तीनों जेठों का व्यापार था. उन की बरेली शहर में साडि़यों की प्रतिष्ठित दुकानें थीं. सभी अच्छा खाकमा रहे थे. उस घर में, बस, सुकांत ही नौकरी में था. वसुंधरा के मायके में भी सब नौकरी वाले थे, इसीलिए उसे सीमित वेतन में रहने का तरीका पता था. सो, जब वह पति के साथ इलाहाबाद रहने गई तो उसे कोई कष्ट न हुआ.

छोटी ननद रूपाली का विवाह तय हुआ तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई, क्योंकि रूपाली की ससुराल उसी शहर में थी जहां उस के बड़े भाई नियुक्त थे. वसुंधरा पुलकित थी कि भाई के घर जाने पर वह ननद से भी मिल लिया करेगी. वैसे भी रूपाली से उसे बड़ा स्नेह था. जब वह ब्याह कर आई थी तो रूपाली ने उसे सगी बहन सा अपनत्व दिया था. परिवार के तौरतरीकों से परिचित कराया और कदमकदम पर साथ दिया.

शादी तय होने की खबर पाते ही वह हर महीने 5 सौ रुपए घरखर्च से अलग निकाल कर रखने लगी. छोटी ननद के विवाह में कम से कम 5 हजार रुपए तो देने ही चाहिए और अधिक हो सका तो वह भी करेगी. वेतनभोगी परिवार किसी एक माह में ही 5 हजार रुपए अलग से व्यय कर नहीं सकता. सो, बड़ी सूझबूझ के साथ वसुंधरा हर महीने 5 सौ रुपए एक डब्बे में निकाल कर रखने लगी.

1-2 महीने तो सुकांत को कुछ पता न चला. फिर जानने पर उस ने लापरवाही से कहा, ‘‘वसुंधरा,  तुम व्यर्थ ही परेशान हो रही हो. मेरे सभी भाई जानते हैं कि मेरा सीमित वेतन है. अम्मा और बाबूजी के पास भी काफी पैसा है. विवाह अच्छी तरह निबट जाएगा.’’

वसुंधरा ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं कब कह रही हूं कि हमारे 5-10 हजार रुपए देने से ही रूपाली की डोली उठेगी. परंतु मैं उस की भाभी हूं. मुझे भी तो कुछ न कुछ उपहार देना चाहिए.’’

‘‘जैसा तुम ठीक समझो,’’ कह कर सुकांत तटस्थ हो गए.

वसुंधरा को पति पर क्रोध भी आया कि कैसे लापरवाह हैं. बहन की शादी है और इन्हें कोई फिक्र ही नहीं. इन का क्या? देखना तो सबकुछ मुझे ही है. ये जो उपहार देंगे उस से मेरा भी तो मान बढ़ेगा और अगर उपहार नहीं दिया तो मैं भी अपमानित होऊंगी, वसुंधरा ने मन ही मन विचार किया और अपनी जमापूंजी को गिनगिन कर खुश रहने लगी.

जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ. रूपाली के विवाह के एक माह पहले ही उस के पास 5 हजार रुपए जमा हो गए. उस का मन संतोष से भर उठा. उस ने सहर्ष सुकांत को अपनी बचत राशि दिखाई. दोनों बड़ी देर तक विवाह की योजना की कल्पना में खोए रहे.

विवाह में जाने से पहले बच्चे के कपड़ों का भी प्रबंध करना था. वसुंधरा पति के औफिस जाते ही नन्हे मुकुल के झालरदार झबले सिलने बैठ जाती. इधर कई दिनों से मुकुल दूध पीते ही उलटी कर देता. पहले तो वसुंधरा ने सोचा कि मौसम बदलने से बच्चा परेशान है. परंतु जब 3-4 दिन तक बुखार नहीं उतरा तो वह घबरा कर बच्चे को डाक्टर के पास ले गई. 2 दिन दवा देने पर भी जब बुखार नहीं उतरा तो डाक्टर ने खूनपेशाब की जांच कराने को कहा. जांच की रिपोर्ट आते ही सब के होश उड़ गए. बच्चा पीलिया से बुरी तरह पीडि़त था. बच्चे को तुरंत नर्सिंग होम में भरती करना पड़ा.

15 दिन में बच्चा तो ठीक हो कर घर आ गया परंतु तब तक सालभर में यत्न से बचाए गए 5 हजार रुपए खत्म हो चुके थे. बच्चे के ठीक होने का संतोष एक तरफ था तो दूसरी ओर अगले महीने छोटी ननद के विवाह का आयोजन सामने खड़ा था. वसुंधरा चिंता से पीली पड़ गई. एक दिन तो वह सुकांत के सामने फूटफूट कर रोने लगी. सुकांत ने उसे धीरज बंधाते हुए कहा, ‘‘अपने परिवार को मैं जानता हूं. अब बच्चा बीमार हो गया तो उस का इलाज तो करवाना ही था. पैसे इलाज में खर्च हो गए तो क्या हुआ? आज हमारे पास पैसा नहीं है तो शादी में नहीं देंगे. कल पैसा आने पर दे देंगे.’’

वसुंधरा ने माथा ठोक लिया, ‘‘लेकिन शादी तो फिर नहीं होगी. शादी में तो एक बार ही देना है. किसकिस को बताओगे कि तुम्हारे पास पैसा नहीं है. 10 साल से शहर में नौकरी कर रहे हो. बहन की शादी के समय पर हाथ झाड़ लोगे तो लोग क्या कहेंगे?’’

बहस का कोई अंत न था. वसुंधरा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह खाली हाथ ननद के विवाह में कैसे शामिल हो. सुकांत अपनी बात पर अड़ा था. आखिर विवाह के 10 दिन पहले सुकांत छुट्टी ले कर परिवार सहित अपने घर आ पहुंचा. पूरे घर में चहलपहल थी. सब ने वसुंधरा का स्वागत किया. 2 दिन बीतते ही जेठानियों ने टटोलना शुरू किया, ‘‘वसुंधरा, तुम रूपाली को क्या दे रही हो?’’

वसुंधरा सहम गई मानो कोई जघन्य अपराध किया हो. बड़ी देर तक कोई बात नहीं सूझी, फिर धीरे से बोली, ‘‘अभी कुछ तय नहीं किया है.’’

‘पता नहीं सुकांत ने अपने भाइयों को क्या बताया और अम्माजी से क्या कहा,’ वसुंधरा मन ही मन इसी उलझन में फंसी रही. वह दिनभर रसोई में घुसी रहती. सब को दिनभर चायनाश्ता कराते, भोजन परोसते उसे पलभर का भी कोई अवकाश न था. परंतु अधिक व्यस्त रहने पर भी उसे कोई न कोई सुना जाता कि वह कितने रुपए का कौन सा उपहार दे रही है. वसुंधरा लज्जा से गड़ जाती. काश, उस के पास भी पैसे होते तो वह भी सब को अभिमानपूर्वक बताती कि वह क्या उपहार दे रही है.

वसुंधरा को सब से अधिक गुस्सा सुकांत पर आता जो इस घर में कदम रखते ही मानो पराया हो गया. पिछले एक सप्ताह से उस ने वसुंधरा से कोई बात नहीं की थी. वसुंधरा ने बारबार कोशिश भी की कि पति से कुछ समय के लिए एकांत में मिले तो उन्हें फिर समझाए कि कहीं से कुछ रुपए उधार ले कर ही कम से कम एक उपहार तो अवश्य ही दे दें. विवाह में आए 40-50 रिश्तेदारों के भरेपूरे परिवार में वसुंधरा खुद को अत्यंत अकेली और असहाय महसूस करती. क्या सभी रिश्ते पैसों के तराजू पर ही तोले जाते हैं. भाईभाभी का स्नेह, सौहार्द का कोई मूल्य नहीं. जब से वसुंधरा ने इस घर में कदम रखा है, कामकाज में कोल्हू के बैल की तरह जुटी रहती है. बीमारी से उठे बच्चे पर भी ध्यान नहीं देती. बच्चे को गोद में बैठा कर दुलारनेखिलाने पर भी उसे अपराधबोध होता. वह अपनी सेवा में पैसों की भरपाई कर लेना चाहती थी.

वसुंधरा मन ही मन सोचती, ‘अम्माजी मेरा पक्ष लेंगी. जेठानियों के रोबदाब के समक्ष मेरी ढाल बन जाएंगी. रिश्तेदारों का क्या है. विवाह में आए हैं, विदा होते ही चले जाएंगे. उन की बात का क्या बुरा मानना. शादीविवाह में हंसीमजाक, एकदूसरे की खिंचाई तो होती ही है. घरवालों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग रहे, यही जरूरी है.’

परंतु अम्माजी के हावभाव से किसी पक्षधरता का आभास न होता. एक नितांत तटस्थ भाव सभी के चेहरे पर दिखाई देता. इतना ही नहीं, किसी ने व्यग्र हो कर बच्चे की बीमारी के बारे में भी कुछ नहीं पूछा. वसुंधरा ने ही 1-2 बार बताने का प्रयास किया कि किस प्रकार बच्चे को अस्पताल में भरती कराया, कितना व्यय हुआ? पर हर बार उस की बात बीच में ही कट गई और साड़ी, फौल, ब्लाउज की डिजाइन में सब उलझ गए. वसुंधरा क्षुब्ध हो गई. उसे लगने लगा जैसे वह किसी और के घर विवाह में आई है, जहां किसी को उस के निजी सुखदुख से कोई लेनादेना नहीं है. उस की विवशता से किसी को सरोकार नहीं है.

वसुंधरा को कुछ न दे पाने का मलाल दिनरात खाए जाता. जेठानियों के लाए उपहार और उन की कीमतों का वर्णन हृदय में फांस की तरह चुभता, पर वह किस से कहती अपने मन की व्यथा. दिनरात काम में जुटी रहने पर भी खुशी का एक भी बोल नहीं सुनाई पड़ता जो उस के घायल मन पर मरहम लगा पाता.

शारीरिक श्रम, भावनात्मक सौहार्द दोनों मिल कर भी धन की कमी की भरपाई में सहायक न हुए. भावशून्य सी वह काम में लगी रहती, पर दिल वेदना से तारतार होता रहता. विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ.

सभी ने बढ़चढ़ कर इस अंतिम आयोजन में हिस्सा लिया. विदा के समय वसुंधरा ने सब की नजर बचा कर गले में पड़ा हार उतारा और गले लिपट कर बिलखबिलख कर रोती रूपाली के गले में पहना दिया.

रूपाली ससुराल में जा कर सब को बताएगी कि छोटी भाभी ने यह हार दिया है, हार 10 हजार रुपए से भला क्या कम होगा. पिताजी ने वसुंधरा की पसंद से ही यह हार खरीदा था. हार जाने से वसुंधरा को दुख तो अवश्य हुआ, पर अब उस के मन में अपराधबोध नहीं था. यद्यपि हार देने का बखान उस ने सास या जेठानी से नहीं किया, पर अब उस के मन पर कोई बोझ नहीं था. रूपाली मायके आने पर सब को स्वयं ही बताएगी. तब सभी उस का गुणगान करेंगे. वसुंधरा के मुख पर छाए चिंता के बादल छंट गए और संतोष का उजाला दमकने लगा.

रूपाली की विदाई के बाद से ही सब रिश्तेदार अपनेअपने घर लौटने लगे थे. 2 दिन रुक कर सुकांत भी वसुंधरा को ले कर इलाहाबाद लौट आए. कई बार वसुंधरा ने सुकांत को हार देने की बात बतानी चाही, पर हर बार वह यह सोच कर खामोश हो जाती कि उपहार दे कर ढिंढोरा पीटने से क्या लाभ? जब अपनी मरजी से दिया है, अपनी चीज दी है तो उस का बखान कर के पति को क्यों लज्जित करना. परंतु स्त्रीसुलभ स्वभाव के अनुसार वसुंधरा चाहती थी कि कम से कम पति तो उस की उदारता जाने. एक त्योहार पर वसुंधरा ने गहने पहने, पर उस का गला सूना रहा. सुकांत ने उस की सजधज की प्रशंसा तो की, पर सूने गले की ओर उस की नजर न गई.

वसुंधरा मन ही मन छटपटाती. एक बार भी पति पूछे कि हार क्यों नहीं पहना तो वह झट बता दे कि उस ने पति का मान किस प्रकार रखा. लेकिन सुकांत ने कभी हार का जिक्र नहीं छेड़ा.

एक शाम सुकांत अपने मित्र  विनोद के साथ बैठे चाय पी रहे  थे. विनोद उन के औफिस में ही लेखा विभाग में थे. विनोद ने कहा, ‘‘अगले महीने तुम्हारे जीपीएफ के लोन की अंतिम किस्त कट जाएगी.’’

सुकांत ने लंबी सांस ली, ‘‘हां, भाई, 5 साल हो गए. पूरे 15 हजार रुपए लिए थे.’’ संयोग से बगल के कमरे में सफाई करती वसुंधरा ने पूरी बात सुन ली. वह असमंजस में थी. सोचा कि सुकांत ने जीपीएफ से तो कभी लोन नहीं लिया. लोन लिया होता तो मुझ को अवश्य पता होता. फिर 15 हजार रुपए कम नहीं होते. सुकांत में तो कोई गलत आदतें भी नहीं हैं, न वह जुआ खेलता है न शराब पीता है. फिर 15 हजार रुपए का क्या किया. अचानक वसुंधरा को याद आया कि 5 साल पहले ही तो रूपाली की शादी हुई थी.

वसुंधरा अपनी विवशता पर फूटफूट कर रोने लगी. काश, सुकांत ने उसे बताया होता. उस पर थोड़ा विश्वास किया होता. तब वह ननद की शादी में चोरों की तरह मुंह छिपाए न फिरती. हार जाने का गम उसे नहीं था. हार का क्या है, अपने लौकर में पड़ा रहे या ननद के पास, आखिर उस से रहा नहीं गया. उस ने सुकांत से पूछा तो उस ने बड़े निरीह स्वर में कहा, ‘‘मैं ने सोचा, मैं बताऊंगा तो तुम झगड़ा करोगी,’’ फिर जब वसुंधरा ने हार देने की बात बताई तो सुकांत सकते में आ गया. फिर धीमे स्वर में बोला, ‘‘मुझे क्या पता था तुम अपना भी गहना दे डालोगी. मैं तो समझता था तुम बहन के विवाह में 15 हजार रुपए देने पर नाराज हो जाओगी,’’ वसुंधरा के मौन पर लज्जित सुकांत ने फिर कहा, ‘‘वसुंधरा, मैं तुम्हें जानता तो वर्षों से हूं किंतु पहचान आज सका हूं.’’

वसुंधरा को अपने ऊपर फक्र हो रहा था, पति की नजरों में वह ऊपर जो उठ गई थी.

Family Story: मां – क्या नीरा ने अपने बेटे को खुद से दूर किया?

Family Story: अब सबकुछ सनी ही तो था नीरा के लिए जीने का एकमात्र सहारा. कैसे दूर कर देती उसे अपनेआप से. लेकिन अब उस के हाथ में कुछ नहीं था. निर्णय सनी का था.

तीसरी बार फिर मोबाइल की घंटी बजी थी. सम झते देर नहीं लगी थी मीरा को कि फिर वही राजुल का फोन होगा. आज जैसी बेचैनी उसे कभी महसूस नहीं हुई थी. सनी भी तो अब तक आया नहीं था. यह भी अच्छा है कि उस के सामने फोन नहीं आया. मोबाइल की घंटी लगातार बजती जा रही थी. कांपते हाथों से उस ने मोबाइल उठाया-

‘‘हां, तो मीरा आंटी, फिर क्या सोचा आप ने?’’ राजुल की आवाज ठहरी हुई थी.

‘‘तुम फिर एक बार सोच लो,’’ मीरा ने वे ही वाक्य फिर से दोहराने चाहे थे. ‘‘मेरा तो एकमात्र सहारा है सनी, तुम्हारा क्या, तुम तो किसी को भी गोद ले सकती हो.’’

‘‘अरे, आप सम झती क्यों नहीं हैं? किसी और में और सनी में तो फर्क है न. फिर मैं कह तो रही हूं कि आप को कोई कमी नहीं होगी.’’

‘‘देखो, सनी से ही आ कर कल सुबह बात कर लेना,’’ कह कर मीरा ने फोन रख दिया था. उस की जैसे अब बोलने की शक्ति भी चुकती जा रही थी.

यहां मैं इतनी दूर इस शहर में बेटे को ले कर रह रही हूं. ठीक है, बहुत संपन्न नहीं है, फिर भी गुजारा तो हो ही रहा है. पर राजुल इतने वर्षों बाद पता लगा कर यहां आ धमकेगी, यह तो सपने में भी नहीं सोचा था. बेटे की इतनी चिंता थी, तो पहले आती.

अब जब पालपोस कर इतना बड़ा कर दिया, बेटा युवा हो गया तो… एकाएक फिर  झटका लगा था. यह क्या निकल गया मुंह से, क्यों कल सुबह आने को कह दिया, सनी तो चला ही जाएगा, वियोग की कल्पना करते ही आंखें भर आई थीं. सनी उस का एकमात्र सहारा.

पिछले 3 दिनों से लगातार फोन आ रहे थे राजुल के. शायद यहां किसी होटल में ठहरी है, पुराने मकान मालिक से ही पता ले कर यहां आई है. और 3 दिनों से मीरा का रातदिन का चैन गायब हो गया है. पता नहीं कैसे जल्दबाजी में उस के मुंह से निकल गया कि यहां आ कर सनी से बात कर लेना. यह क्या कह दिया उस ने, उस की तो मति ही मारी गई.

‘‘मां, मां, कितनी देर से घंटी बजा रहा हूं, सो गईं क्या?’’ खिड़की से सनी ने आवाज दी, तब ध्यान टूटा.

‘‘आई बेटा, तेरा ही इंतजार कर रही थी,’’ हड़बड़ा कर उठी थी मीरा.

‘‘अरे, इंतजार कर रही थीं तो दरवाजा तो खोलतीं. देखो, बाहर कितनी ठंड है,’’ कहते हुए अंदर आया था सनी, ‘‘अब जल्दी से खाना गरम कर दो, बहुत भूख लगी है और नींद भी आ रही है.’’

किचन में आ कर भी विचारतंद्रा टूटी नहीं थी मीरा की. अभी बेटा कहेगा कि फिर वही सब्जी और रोटी, कभी तो कुछ और नया बना दिया करो. पर आज तो जैसेतैसे खाना बन गया, वही बहुत है.

‘‘यह क्या, तुम नहीं खा रही हो?’’ एक ही थाली देख कर सनी चौंका था.

‘‘हां बेटा, भूख नहीं है, तू खा ले, अचार निकाल दूं?’’

‘‘नहीं रहने दो, मु झे पता था कि तुम वही खाना बना दोगी. अच्छा होता, प्रवीण के घर ही खाना खा आता. उस की मां कितनी जिद कर रही थीं. पनीर, कोफ्ते, परांठे, खीर और पता नहीं क्याक्या बनाया था.’’

मीरा जैसे सुन कर भी सुन नहीं पा रही थी.

‘‘मां, कहां खो गईं?’’ सनी की आवाज से फिर चौंक गई थी.

‘‘पता है, प्रवीण का भी सलैक्शन हो गया है. कोचिंग से फर्क तो पड़ता है न, अब राजू, मोहन, शिशिर और प्रवीण सभी चले जाएंगे अच्छे कालेज में. बस मैं ही, हमारे पास भी इतना पैसा होता, तो मैं भी कहीं अच्छी जगह पढ़ लेता,’’ सनी का वही पुराना राग शुरू हो गया था.

‘‘हां बेटा, अब तू भी अच्छे कालेज में पढ़ लेना, मन चाहे कालेज में ऐडमिशन ले लेना, बस, सुबह का इंतजार.’’

‘‘क्या? कैसी पहेलियां बु झा रही हो मां. सुबह क्या मेरी कोईर् लौटरी लगने वाली है, अब क्या दिन में भी बैठेबैठे सपने देखने लगी हो. तबीयत भी तुम्हारी ठीक नहीं लग रही है. कल चैकअप करवा दूंगा, चलना अस्पताल मेरे साथ,’’ सनी ने दो ही रोटी खा कर थाली खिसका दी थी.

‘‘अरे खाना तो ढंग से खा लेता,’’ मीरा ने रोकना चाहा था.

‘‘नहीं, बस. और हां, तुम किस लौटरी की बात कर रही थीं?’’

‘‘हां, लौटरी ही है, कल सुबह कोई आएगा तु झ से मिलने.’’

‘‘कौन? कौन आएगा मां,’’ सनी चौंक गया था.

‘‘तू हाथमुंह धो कर अंदर चल, फिर कमरे में आराम से बैठ कर सब सम झाती हूं.’’

मीरा ने किसी तरह मन को मजबूत करना चाहा था. क्या कहेगी किस प्रकार कहेगी.

‘‘हां मां, आओ,’’ कमरे से सनी ने आवाज दी थी.

मन फिर से भ्रमित होने लगा. पैर भी कांपे. किसी तरफ कमरे में आ कर पलंग के पास पड़ी कुरसी पर बैठ गई थी मीरा.

‘‘क्या कह रही थीं तुम, किस लौटरी के बारे में?’’ सनी का स्वर उत्सुकता से भरा हुआ था.

मीरा ने किसी तरह बोलना शुरू किया, ‘‘बेटा, मैं आज तु झे सबकुछ बता रही हूं, जो अब तक बता नहीं पाई. तेरी असली मां का नाम राजुल है, जोकि बहुत बड़ी प्रौपर्टी की मालिक हैं. उन की कोई और औलाद नहीं है. वे अब तु झे लेने आ रही हैं,’’ यह कहते हुए गला भर्रा गया था मीरा का और आंसू छिपाने के लिए मुंह दूसरी ओर मोड़ लिया था उस ने.

मां, आप कह क्या रही हो, मेरी असली मां कोई और है. तो अब तक कहां थी, आई क्यों नहीं?’’ सनी सम झ नहीं पा रहा था कि आज मां को हुआ क्या है? क्यों इतनी बहकीबहकी बातें कर रही हैं.

‘‘हां बेटा, तेरी असली मां वही है. बस, तु झे जन्म नहीं देना चाह रही थी तो मैं ने ही रोक दिया था और कहा था कि जो भी संतान होगी, मैं ले लूंगी. मेरे भी कोईर् औलाद नहीं थी. मैं वहीं अस्पताल में नर्स थी. बस, तु झे जन्म दे कर और मु झे सौंप कर वह चली गई.’’

‘‘अब तू जो भी सम झ ले. हो सके तो मु झे माफ कर दे. मैं ने अब तक तु झ से यह सब छिपाए रखा था. मेरे लिए तो तू बेटे से भी बढ़ कर है. बस, अब और कुछ मत पूछ,’’ यह कहते फफक पड़ी थी मीरा और जोर की रुलाई को रोकते हुए कमरे से बाहर निकल गई.

अपने कमरे में आ कर गिर रुलाई फूट ही पड़ी थी. सनी उस का बेटा इतने लाड़प्यार से पाला उसे. कल पराया हो जाएगा. सोचते ही कलेजा मुंह को आने लगता है. कैसे जी पाएगी वह सनी के बिना. इतना दुख तो उसे अपने पति जोसेफ के आकस्मिक निधन पर भी नहीं हुआ था. तब तो यही सोच कर संतोष कर लिया था कि बेटा तो है उस के पास. उस के सहारे बची जिंदगी निकल जाएगी. यही सोच कर पुराना शहर छोड़ कर यहां आ कर अस्पताल में नौकरी कर ली थी. तब क्या पता था कि नियति ने उस के जीवन में सुख लिखा ही नहीं. तभी तो, आज राजुल पता लगाते हुए यहां आ धमकी है.

शायद वक्त को यही मंजूर होगा कि सनी को अच्छा, संपन्न परिवार मिले, उस का कैरियर बने, तभी तो राजुल आ रही है. बेटा भी तो यही चाहता है कि उसे अच्छा कालेज मिले. अब कालेज क्या, राजुल तो उसे ऐसे ही कई फैक्ट्री का मालिक बना देगी.

ठीक है, उसे तो खुश होना चाहिए. आखिर, सनी की खुशी में ही तो उस की भी खुशी है. और उस की स्वयं की जिंदगी अब बची ही कितनी है, काट लेगी किसी तरह.

लेकिन अपने मन को लाख उपाय कर के भी वह सम झा नहीं पा रही थी. पुराने दिन फिर से सामने घूमने लगे थे. तब वह राजुल के पड़ोस में ही रहा करती थी. राजुल के पिता नगर के नामी व्यवसायी थे. उन्हीं के अस्पताल में वह नर्स की नौकरी कर रही थी. राजुल अपने पिता की एकमात्र संतान थी. खूब धूमधाम से उस की शादी हुई पर शादी के चारपांच माह बाद ही वह तलाक ले कर पिता के घर आ गईर् थी. तब उसे 3 माह का गर्भ था. इसीलिए वह एबौर्शन करा कर नई जिंदगी जीना चाह रही थी. इस काम के लिए मीरा से संपर्क किया गया. तब तक मीरा और जोसेफ की शादी हुए एक लंबा अरसा हो चुका था और उन की कोई संतान नहीं थी.

मीरा ने राजुल को सम झाया था. ‘तुम्हारी जो भी संतान होगी, मैं ले लूंगी. तुम एबौर्शन मत करवाओ.’

बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए राजुल तैयार हुई थी. और बेटे को जन्म दे कर ही उस शहर से चली गई. बेटे का मुंह भी नहीं देखना चाहा था उस ने.

सनी का पालनपोषण उस ने और जोसेफ ने बड़े लाड़प्यार से किया था. राजुल की शादी फिर किसी नामी परिवार के बेटे से हो गई थी और वह विदेश चली गई थी.

यह तो उसे राजुल के फोन से ही मालूम पड़ा कि वहां उस के पति का निधन हो गया और अब वह अपनी जायदाद संभालने भारत आ गई है, चूंकि निसंतान है, इसलिए चाह रही है कि सनी को गोद ले ले, आखिर वह उसी का तो बेटा है.

मीरा सम झ नहीं पा रही थी कि नियति क्यों उस के साथ इतना क्रूर खेल खेल रही है. सनी उस का एकमात्र सहारा, वह भी अलग हो जाएगा, तो वह किस के सहारे जिएगी.

आंखों में नींद का नाम नहीं था. शरीर जैसे जला जा रहा था. 2 बार उठ कर पानी पिया.

सुबह उठ कर रोज की तरह दूध लाने गई, चाय बनाई. सोचा, कमरा थोड़ा ठीकठाक कर दे, राजुल आती होगी. सनी को भी जगा दे, पर वह जागा हुआ ही था. उसे चाय थमा कर वह अपने कमरे में आ गई. बेटे को देखते ही कमजोर पड़ जाएगी. नहीं, वह राजुल के सामने भी नहीं जाएगी.

जब राजुल की कार घर के सामने रुकी, तो उस ने उसे सनी के ही कमरे में भेज दिया था. ठीक है, मांबेटा आपस में बात कर लें. अब उस का काम ही क्या है? वैसे भी राजुल के पिता के इतने एहसान हैं उस पर, अब किस मुंह से वह सनी को रोक पाएगी. पर मन था कि मान ही नहीं रहा था और राजुल और सनी के वार्त्तालाप के शब्द पास के कमरे से उस के कानों में पड़ भी रहे थे.

‘‘बस बेटा, अब मैं तु झे लेने आ गईर् हूं. मीरा ने बताया था कि तू अपने कैरियर को ले कर बहुत चिंतित है. पर तु झे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. करोड़ों की जायदाद का मालिक होगा तू,’’ राजुल कह रही थी.

‘‘कौन बेटा, कैसी जायदाद, मैं अपनी मां के साथ ही हूं, और यहीं रहूंगा. ठीक है, बहुत पैसा नहीं है हमारे पास, पर जो है, हम खुश हैं. मेरी मां ने मु झे पालपोस कर बड़ा किया है और आप चाहती हैं कि इस उम्र में उन्हें छोड़ कर चल दूं. आप होती कौन हैं मेरे कैरियर की चिंता करने वाली, कैसे सोच लिया आप ने कि मैं आप के साथ चल दूंगा?’’ सनी का स्वर ऊंचा होता जा रहा था.

इतने कठोर शब्द तो कभी नहीं बोलता था सनी. मीरा भी चौंकी थी. उधर, राजुल का अनुनयभरा स्वर, ‘‘बेटे, तू मीरा की चिंता मत कर, उन की सारी व्यवस्था मैं कर दूंगी. आखिर तू मेरा बेटा ही है, न तो मैं ने तु झे गोद दिया था, न कानूनीरूप से तेरा गोदनामा हुआ है. मैं तेरी मां हूं, अदालत भी यही कहेगी मैं ही तेरी मां हूं. परिस्थितियां थीं, मैं तु झे अपने पास नहीं रख पाई. मीरा को मैं उस का खर्चा दूंगी. तू चाहेगा तो उसे भी साथ रख लेंगे. मु झे तेरे भविष्य की चिंता है. मैं तेरा अमेरिका में दाखिला करा दूंगी, यहां तु झे सड़ने नहीं दूंगी. तू मेरा ही बेटा है.’’

‘‘मत कहिए मु झे बारबार बेटा, आप तो मु झे जन्म देने से पहले ही मारना चाहती थीं. आप को तो मेरा मुंह देखना भी गवारा नहीं था. यह तो मां ही थीं जिन्होंने मु झे संभाला और अब इस उम्र में वे आप पर आश्रित नहीं होंगी. मैं हूं उन का बेटा, उन की संभाल करने वाला, आप को चिंता करने की जरूरत नहीं है, सम झीं? और अब आप कृपया यहां से चली जाएं, आगे से कभी सोचना भी मत कि मैं आप के साथ चल दूंगा.’’

सनी ने जैसे अपना निर्णय सुना दिया था. फिर राजुल शायद धीमे स्वर में रो भी रही थी. मीरा सम झ नहीं पा रही थी कि क्या कह रही है.

तभी सनी का तेज स्वर सुनाई दिया, ‘‘मैं जो कुछ कह रहा हूं, आप सम झ क्यों नहीं पा रही हैं. मैं कोई बिकाऊ कमोडिटी नहीं हूं. फिर जब आप ने मु झे मार ही दिया था तो अब क्यों आ गई हैं मु झे लेने. मैं बालिग हूं, मु झे अपना भविष्य सोचने का हक है. आप चाहें तो आप भी हमारे साथ रह सकती हैं. पर मैं, आप के साथ मां को छोड़ कर जाने वाला नहीं हूं. आप मु झे भी सम झने की कोशिश करें. मेरा अपना भी उत्तरदायित्व है. जिस ने मु झे पालापोसा, बड़ा किया, मैं उसे इस उम्र में अंधकार में नहीं छोड़ सकता. कानून आप की मदद नहीं करेगा. दुनिया में आप की बदनामी अलग होगी. आप भी शांति से रहें, हमें भी रहने दें. आप मु झे सम झने की कोशिश करें. अब मैं और कुछ कहूं और अपशब्द निकल जाएं मेरे मुंह से, मेरी रिक्वैस्ट है, आप चली जाएं. सुना नहीं आप ने?’’

सनी की आवाज फिर और तेज हो गई थी.

इधर, राजुल धड़ाम से दरवाजा बंद करते हुए निकल गई थी. फिर कार के जाने की आवाज आई. मीरा की जैसे रुकी सांसें फिर लौट आई थीं. सनी कमरे से बाहर आया और मां के गले लग गया और बोला, ‘‘मेरी मां सिर्फ आप हो. कहीं नहीं जाऊंगा आप को छोड़ कर.’’ मीरा को लगा कि उस की ममता जीत गई है.

Family Story: शर्त – क्यों श्वेता अपनी शादी से खुश नहीं थी?

Family Story: आजलगभग 16 साल बाद श्वेता ने सलोनी की तसवीर फेसबुक पर देखी और श्वेता फिर से छलांग लगा कर कालेज वाली छुईमुई उमराव जान बन गई. अदअसल 2 दशक पहले श्वेता और सलोनी अभिन्न मित्र थीं. दोनों के घरों में कोई समानता नहीं थी. सलोनी का राजमहल सा घर जो शहर की सब से पौश कालोनी कवि नगर में स्थित था वहीं श्वेता का छोटा सा घर निम्नवर्गीय कालोनी विजय नगर में था, पर इन सब बातों के बावजूद श्वेता और सलोनी की दोस्ती कलकल बहते हुए पानी की तरह चलती रही.

सलोनी जहां सांवले रंग, साधारण नैननक्श पर गजब के आत्मविश्वास की स्वामिनी थी वहीं श्वेता गौर वर्ण, भूरी आंखें, तीखे नैननक्श की मलिका थी. दोनों एकदूसरे के न केवल रंगरूप में, बल्कि आचारविचार में भी बिलकुल विपरीत थीं. जहां सलोनी बेहद बिंदास और दिल की साफ थी वहीं श्वेता थोड़ी सी सिमटी हुई और खुद में खोई रहती थी.

श्वेता मन ही मन अपने जीवनस्तर की तुलना सलोनी से करती और खुद को सदा कमतर पाती थी. पर उसे पूरा विश्वास था कि उस के राजसी रूपसौंदर्य के कारण वह किसी अमीर खानदान की ही बहू बनेगी और श्वेता के घर वह बडे़ और अमीर लोगों के तौरतरीके का अनुकरण करने ही जाती थी.

आज सलोनी का जन्मदिन था और सभी सहेलियां कानपुर के पांचसितारा होटल में इकट्ठा हुई थीं. वहीं पर सलोनी ने अपनी सब सहेलियों की मुलाकात विभोर से कराई, जो उस के पिता के मित्र का बेटा था और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कानुपर के सरकारी कालेज से कर रहा था. विभोर 5 फुट 10 इंच लंबा आकर्षक नौजवान था.

जैसेकि आमतौर पर होता है, सब लड़कियों ने पूरा होटल सिर पर उठा रखा था बस श्वेता ही थी जो चुपचाप सहमी सी एक कोने में बैठी हुई थी.

विभोर ने मुसकराते हुए सलोनी से कहा, ‘‘ये छुईमुई कौन हैं, बिलकुल उमराव जान लग रही हैं.’’

सलोनी खींच कर श्वेता को वहीं ले गई और बोली, ‘‘यह छुईमुई श्वेता है और मेरी सब से पुरानी और करीबी दोस्त.’’

फिर खाना और्डर होने लगा. ऐसेऐसे व्यंजन जिन के नाम भी श्वेता ने नहीं सुने थे. वह और घबरा गई. तभी विभोर श्वेता की बगल में आ कर बैठ गया और मेनू कार्ड उस के हाथों से ले लिया. फिर धीमे से उस के कानों में बोला, ‘‘जो मैं और्डर करूंगा तुम भी वही करना.’’

यह सुन कर श्वेता की जान में जान आ गई. विभोर ने श्वेता जैसी कोई लड़की अब  तक देखी नहीं थी. उस की अपनी मां, बहनें बहुत ही अलग किस्म की थीं. यह छुईमुई जैसी लड़की से उस का पहला परिचय था. बातबात पर चेहरे का लज्जा से लाल हो जाना, दुपट्टे के कोने से खेलना, पसीनापसीना होना और बिना किसी प्रसाधन के भी इतना सुंदर दिखना, विभोर का यह पहला तजरबा था.

वापसी में श्वेता को घर जाने की जल्दी थी तो वह औटो के लिए निकल गई, तभी पीछे से विभोर आया और बोला, ‘‘छुईमुई तुम मेरे साथ चलो, मेरे कालेज का रास्ता वहीं से है.’’

श्वेता घबरा कर चुप खड़ी रही तो विभोर हंस कर बोला, ‘‘तुम्हें घर के बाहर ही उतार दूंगा, कौफी पीने के लिए घर के अंदर नहीं आऊंगा.’’

श्वेता चुपचाप बैठ गई और मोटरसाइकिल हवा से बातें करने लगी. एक अजीब सी खुशी और दुविधा में घिरी श्वेता घर पहुंची. विभोर पहला ऐसा लड़का था, जिस ने इतना बेबाक हो कर उस से बात की. खोईखोई सी वह अपने पलंग पर लेट गई और विभोर का उसे छुईमुई कहना उस की तुलना उमराव जान से करना, सबकुछ ने उस के दिल के तार ?ांकृत कर दिए और उस की आंखों में इंद्रधनुषी रंग उतर आए, जिन के सपने वह बचपन से देखती आई थी.

श्वेता अब अपने रखरखाव का ध्यान पहले से अधिक रखने लगी थी और अब उस का अधिकतर समय सलोनी के घर ही व्यतीत होता था.

दरअसल, श्वेता विभोर को देखने के बहाने अपना डेरा सलोनी के घर जमाए रहती थी और यह बात सलोनी भी जानती थी. इसलिए उस ने एक दिन श्वेता से कह भी दिया, ‘‘श्वेता विभोर हर किसी से ऐसे ही मजाक करता रहता है, बहुत खिलंदड़ स्वभाव का है वह.’’

मगर श्वेता को लगा कि विभोर श्वेता के चारों ओर उमराव जान कह कर मंडराता रहता है, इसलिए सलोनी जलती है क्योंकि विभोर हमेशा सलोनी को काला हीरा कह कर चिढ़ाता है.

देखते ही देखते 2 वर्ष साल गए और श्वेता, विभोर और सलोनी की दोस्ती ऐसे ही चलती रही. विभोर ने कभी भी श्वेता से अपने प्यार का इजहार नहीं किया पर प्यार का क्या कभी इजहार करा जाता है, यह तो महसूस किया जाता है और श्वेता तो पिछले 2 सालों से श्वेता विभोर के प्यार में भीगी हुई थी. उसे तो मानो अपनी मंजिल मिल गई थी.

उधर विभोर को जहां एक तरफ श्वेता की खामोशी और घबराहट बहुत आकर्षक लगती थी वहीं सलोनी का आत्मविश्वास, उस की हर बात को मूक सहमति न दे कर तर्कवितर्क करना उसे प्रभावित करता था.

विभोर ने श्वेता से कोई वादा नहीं किया था पर श्वेता को पूरा विश्वास था कि विभोर उस का हाथ मांगने आएगा. कालेज खत्म हो गया था तो सलोनी ने अपने पापा का बिजनैस जौइन कर लिया था और श्वेता ने विभोर के प्रस्ताव का इंतजार करना आरंभ कर दिया.

विभोर और श्वेता फोन से एकदूसरे से लगातार संपर्क में थे. इस बीच विभोर की नौकरी लग गई पर वह अधिक खुश नहीं था, उसे और आगे बढ़ना था. श्वेता हर बार विभोर को फोन पर यह सुनाती थी कि उस के लिए बहुत सारे विवाह के प्र्रस्ताव आ रहे हैं पर विभोर को सम?ा नहीं आ रहा था कि श्वेता ये सब उसे क्यों बताती रहती है.

एक दिन ?ां?ाला कर उस ने फोन पर बोल भी दिया, ‘‘कैसी दोस्त हो तुम श्वेता मैं अपनी नौकरी के कारण परेशान हूं और तुम्हें बस विवाह की पड़ी है. हां मालूम है मु?ो तुम बहुत खूबसूरत हो तो रोका किस ने है तुम्हें कर लो न शादी,’’ और फिर फोन काट दिया.

श्वेता को लगा कि विभोर असुरक्षित महसूस कर रहा है कि कहीं उस का विवाह कहीं और न हो जाए, पर मन ही मन श्वेता खुश थी कि चलो विभोर अब जल्द ही सिर के बल दौड़ा आएगा.

एक दिन अचानक शाम को सलोनी का फोन आया, उसे अर्जेंट बुलाया था. वहां जा कर देखा तो पता चला सलोनी उड़ीउड़ी सी घूम रही है, श्वेता को देखते ही बोली, ‘‘शुक्र है तुम आ गई, यार आज मेरा रोका है और सुनेगी किस के साथ?’’

श्वेता वहीं धम से बैठ गई और फिर बोली, ‘‘सलोनी यह कैसा मजाक है, विभोर तो अभी विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकता है… उस ने मु?ा से खुद बोला था.’’

सलोनी हंसते हुए बोली, ‘‘अरे पगली तू बहुत भोली है, विभोर ने अपनी एक नई यूनिट आरंभ करी है और उस में मेरे पापा ने 50% पैसा लगाया है तथा उस यूनिट का बेसिक प्लान मेरा था तो दोनों के पापा ने सोचा जब एकसाथ काम ही करना है तो फिर जिंदगी भी एकसाथ क्यों न गुजारी जाए.’’

श्वेता कड़वाहट से चिल्ला कर बोली, ‘‘यह क्यों नहीं बोलती कि तुम ने अपने पैसों से उसे खरीद लिया है.’’

सलोनी श्वेता की बात सुन कर सकते में आ गई पर फिर भी संयत स्वर में बोली, ‘‘श्वेता, विभोर का अपना निर्णय है, उस ने सुंदरता से अधिक अपनी तरक्की को महत्त्व दिया है, तुम बहुत सुंदर हो श्वेता पर जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए काबिलीयत और स्मार्टनैस भी चाहिए, जो शायद उसे मु?ा में नजर आई होगी.’’

श्वेता ने कहा, ‘‘यह नहीं हो सकता, विभोर मेरे अलावा और किसी से शादी नहीं कर सकता है और मैं तुम से हर बात में बेहतर हूं.’’

सलोनी बोली, ‘‘यह हो चुका है श्वेता, जरूरी नहीं है सब लोग रूप के ही दीवाने हों. कुछ लोग रूप से अधिक बुद्धि को भी महत्त्व देते हैं, मेरे ही कारण विभोर यह नया यूनिट लगा पाया है.’’

श्वेता बोली, ‘‘सलोनी अपने पापा के वैभव पर तुम्हें बहुत घमंड है न और इसी धन के बल पर तुम ने विभोर को हथिया लिया है पर मेरी भी यह बात सुन लो, अब रूपरंग के साथसाथ यह वैभव और धन भी मेरा दास बन कर रहेगा, यह मेरी शर्त है तुम से.’’

सलोनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी सोच गलत है श्वेता पर देखेंगे अगर कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर टकराए तो.’’

उस दिन के बाद श्वेता ने सलोनी और विभोर नामक अध्याय अपनी जिंदगीरूपी किताब  से हमेशा के लिए खत्म कर दिया था पर वह अपनी शर्त नहीं भूली थी बस उस की जिंदगी का एक ही मकसद था किसी भी कीमत पर धनवान बनना, इस कारण वह एक के बाद एक मध्यवर्गीय रिश्ते नकारती रही और जहां श्वेता का मन करता था वहां दहेज की लंबी लिस्ट देख कर उस के घर वालों के पसीने छूट जाते. घर वाले श्वेता के रवैए से परेशान हो गए थे.

देखते ही देखते श्वेता ने 30 साल भी पूरे कर लिए. इसी बीच एक दिन श्वेता एक दूर की रिश्तेदारी में विवाह में सम्मिलित होने गई थी. वहीं पर उसे राजेश्वरी ने अपने बेटे विकास के लिए पसंद कर लिया. विकास खानदानी रईस था और बहुत अच्छे पद पर कार्यरत था, पर दिखने में बहुत ही साधारण था. विकास की पहली बीबी की 1 साल पहले मृत्यु हो गई थी और उस के 5 और 7 साल के 2 बच्चे थे.

जब यह रिश्ता आया तो श्वेता के मां और बाबूजी बोले, ‘‘सगी बेटी है सौतेली नहीं, पैसा हुआ तो क्या हुआ, है तो पूरे 38 साल का. न बाबा न ऐसा महल नहीं चाहिए और फिर 2-2 बच्चे भी हैं.’’

मगर श्वेता ने आगे बढ़ कर इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया. वह अपने एकाकी जीवन से ऊब चुकी थी और यह पहला ऐसा रिश्ता था जो उसे पसंद आया था. उसे विकास के बच्चों या विकास से कोई मतलब नहीं था, उसे मतलब था विकास के रुतबे से, पैसों से.

आज विवाह के 10 साल बीत गए थे, जिस धन के लिए श्वेता ने विवाह किया था   वह यहां पर भरपूर था. दोनों बच्चे होस्टल में थे और विकास उस की आंखों के इशारे पर उठता और बैठता था. फिर भी एक टीस थी श्वेता के मन में जो जबतब उसे मायूस कर देती थी.

विकास उसे हाथोंहाथ रखता था पर फिर भी दोनों का रिश्ता पतिपत्नी का नहीं, दास मालिक का सा लगता था. श्वेता जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर विकास धन्य हो उठा था, वह हमेशा श्वेता की खूबसूरती का उपासक ही बना रहा. पति बनने की कोशिश कभी न करी. दोनों बच्चों के साथ श्वेता ने हमेशा एक सम्मानजनक दूरी बना कर रखी थी. श्वेता और विकास के अपना कोई बच्चा कभी नहीं हो पाया था पर इस का भी श्वेता को कभी अफसोस नहीं हुआ था. बच्चा न होने के कारण श्वेता के शरीर पर मांस की एक परत भी नहीं चढ़ी थी, जैसी वह 10 साल पहले लगती थी वैसी ही आज भी लगती थी और आईने में यह देख कर श्वेता की गरदन घमंड से तन जाती थी.

ऐसे ही एक दिन श्वेता ने अचानक फेसबुक पर सलोनी को देखा और उस की तसवीर देख कर उसे असीम आनंद आ गया. सलोनी बेहद अनाकर्षक लग रही थी पर विभोर अभी भी जस का तस बना हुआ था, फिर से श्वेता के मन में टीस सी उठी. यह विभोर नाम की टीस ही थी जो उसे सामान्य होने नहीं देती थी.

और फिर नियति जैसे खुद ही सलोनी और विभोर को उस के सामने खींच लाई. विभोर को अपने व्यापार के सिलसिले में ही कोई फाइल पास करवानी थी, जो विकास की मदद से ही हो सकती थी.

जैसे ही दफ्तर में विकास को पता चला कि सलोनी, श्वेता के शहर की ही है और उस की मित्र भी थी तो फौरन विकास ने उन्हें अपने घर पर आमंत्रित कर लिया. श्वेता भले ही ऊपर से भुनभुना रही थी पर अंदर से बेहद खुश थी, चलो अब तो वह सलोनी को अपना राजपाट दिखा पाएगी, विभोर को भी तो पता चले कि उस ने क्या खोया है और किस कांच के टुकड़े को वह हीरा सम?ा कर ले गया है. बहुत घमंड था न सलोनी को अपनी योग्यता और स्मार्टनैस पर, परंतु आज सलोनी भी देख लेगी कि जीवन के तराजू में मेरे वैभव, मेरी सुंदरता का पलड़ा भारी है.

विभोर और सलोनी समय से कुछ पहले ही आ गए थे. दोनों पुराने दिनों को याद करने लगे पर श्वेता ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे उसे कुछ भी याद न हो.

श्वेता ने ही सलोनी से कहा, ‘‘क्या हाल बना रखा है सलोनी तुम ने… तुम पहले से तीन गुना हो गई हो, जिम नहीं जाती हो क्या?’’ और फिर बड़ी अदा से अपना साड़ी का पल्ला ठीक करते हुए कनखियों से विभोर की तरफ देखने लगी पर विभोर की आंखों में सलोनी के लिए प्यार और सम्मान देख कर वह राख हो गई.

सलोनी हंसते हुए बोली, ‘‘श्वेता, मां बनने के बाद तो वजन बढ़ ही जाता है. जब तुम्हारे खुद के बच्चे होंगे न तो पता चलेगा.’’

ऐसा लगा मानो श्वेता के मुंह पर किसी ने सफेदी पोत दी हो और फिर सलोनी अपने बच्चों का प्रशस्ति गान करने लगी.

तभी श्वेता को ध्यान आया उसे तो विकास के बच्चों के बारे में कुछ भी नहीं पता.  वह बस विकास की पत्नी ही बनी रही, उस ने उन बच्चों की मां बनने की पहल कभी नहीं की.

श्वेता ने फिर खाने की मेज पर सब को बुलाया, उसे पूरी उम्मीद थी कि सलोनी और विभोर उस के खाने की अनदेखी नहीं कर पाएंगे. पर यहां भी श्वेता को निराशा ही हाथ लगी. सलोनी अधिकतर व्यंजनों को देख कर बोली, ‘‘श्वेता, तुम्हारे व्यंजनों को देख कर विकास की सेहत का राज सम?ा आ गया.’’

विकास की बढ़ती हुई तोंद की तरफ उन दोनों का इशारा था. श्वेता कट कर रह गई.

श्वेता को सम?ा नहीं आ रहा था उस का रूप, उस का वैभव क्यों सलोनी और विभोर को प्रभावित नहीं कर पा रहा, विभोर उस की खूबसूरती पर ध्यान क्यों नहीं दे रहा है? विभोर और सलोनी के रिश्ते में बहुत सुंदर तालमेल था जो श्वेता के वैवाहिक रिश्ते से नदारद था, क्योंकि श्वेता ने तो विवाह बस धन के लिए किया था खाने के बाद विभोर और विकास कार्य संबंधी बातों के लिए बगीचे में बैठ गए. सलोनी को अपने वैभव से दमकते ड्राइंगरूम में बैठा कर, श्वेता कौफी लेने के लिए चली गई.

कौफी पीतेपीते सलोनी 2 मिनट रुकी. श्वेता को लगा शायद अब वह उस की मेहमाननवाजी की प्रशंसा करेगी पर सलोनी खिलखिलाकर बोली, ‘‘श्वेता, तुम्हें अपनी शर्त याद है क्या अभी भी? लगता है तुम ने शर्त जीत ली है.’’

श्वेता ने कोई जवाब नहीं दिया पर उस के मन को पता था कि वह फिर से शर्त हार गई है. उसे पता था कि वह खूबसूरत है पर बस अपने लिए.

‘‘उस ने विकास से शादी बस सलोनी से बराबरी के लिए की है पर सलोनी अब भी उस से कहीं आगे है, क्योंकि एक पत्नी की सफलता उस के रंगरूप में नहीं उस के पति और बच्चों के साथ उस के रिश्तों की गहराई और गरमाहट से ?ालकती है, जो श्वेता के विवाह में कहीं नहीं थी.

सलोनी खिलखिलाती हुई बगीचे की तरफ चली गई. श्वेता को लग रहा था उस की बेमतलब की शर्त ने उस की जिंदगी को ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया, जिस की शायद कोई मंजिल ही नहीं है.

Family Story: ओमा – 80 साल की ओमा और लीसा का क्या रिश्ता था

Family Story: ओमा का यह नित्य का नियम बन गया था. दोपहर के 2 बजते ही वे घर के बाहर पड़ी आराम कुरसी पर आ कर बैठ जातीं. वजह, यह लीसा के आने का समय होता.

5 साल की लीसा किंडरगार्टन से छुट्टी होते ही पीठ पर स्कूल बैग लादे तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ती. कुछ दूरी तक तो उस की सहेलियां साथसाथ चलतीं, फिर वे अपनेअपने घरों की ओर मुड़ जातीं.

लीसा का घर सब से आखिर में आता. डेढ़ किलोमीटर चल कर आने में लीसा को एक या दो बार अपनी पानी की बोतल से 2-3 घूंट पानी पीना पड़ता. उस के पैरों की गति तब बढ़ जाती जब उसे सौ मीटर दूर से अपना घर दिखाई देने लगता.

तीनमंजिला मकान के बीच वाले तल्ले में लीसा अपने पापा व मम्मा के साथ रहती है. नीचे वाले तल्ले में ओमा रहती हैं (जरमनी में ग्रैंड मदर को ओमा कहते हैं) और सब से ऊपर वाली मंजिल में रूबिया आंटी व मोहम्मद अंकल रहते हैं.

ओमा इस मकान की मालकिन की मां हैं. मकान मालकिन, जिन्हें सभी किराएदार ‘लैंड लेडी’ कह कर संबोधित करते हैं, इस तीनमंजिला मकान से 3 घर छोड़ कर चौथे मकान में रहती हैं.

80 साल की ओमा यहां अकेली रहती हैं. जरमनी में 80 साल के वृद्ध महिलापुरुष उतने ही स्वस्थ दिखते हैं जितने भारत में 60-65 के. वे अपने सभी काम खुद करती हैं. वैसे भी, इस देश में घरेलू नौकर जैसी कोई व्यवस्था नहीं है.

सूरज निकलने के पहले ओमा रोजाना उठती हैं और दिन की शुरुआत अपने बगीचे की साफसफाई से करती हैं. वे चुनचुन कर मुर झाई पत्तियों को पौधों से अलग करतीं, खुरपी से पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी को उथलपुथल करतीं और अंत में एकएक पौधे को सींचतीं.

सुबह के 8 बजते ही वे अपनी साइकिल उठातीं और 2 किलोमीटर दूर बेकरी से ताजी ब्रैड व अंडे लातीं. इस देश में साइकिल 3 साल के छोटे से बच्चे से ले कर 90-95 साल तक के बुड्ढे सभी चलाते हैं.

साढ़े 11 बजे से साढ़े 12 बजे तक का दोपहर वाला समय उन का पार्क में चहलकदमी में गुजरता. पार्क से आ कर वे लंच लेतीं, फिर लीसा के आने के इंतजार में बाहर आ कर कुरसी पर बैठ जाती हैं.

लीसा के पापा अर्नव और मम्मा चित्रा 10 वर्ष पहले जरमनी आए थे. उन्हें उन की भारतीय कंपनी की ओर से एक साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में बेंगलुरु से वोल्डार्फ भेजा गया था, तब उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन के टैलेंट को देखते हुए जरमन कंपनी उन्हें यहीं रख लेगी.

चित्रा और अर्नव ने भी अन्य भारतीयों की तरह शहर में रहने के बजाय दूर गांव में रहना पसंद किया. इस की मुख्य वजह शहर की तुलना में गांव में आधे किराए में अच्छा मकान मिल जाना तो था ही, साथ ही साथ गांव का शांत व स्वच्छ पर्यावरण भी था.

वैसे यहां के गांव भी शहरों की तरह सर्वसुविधा संपन्न हैं. व्यवस्थित रूप से आकर्षक बसाहट, स्वच्छ व चिकनी सड़कें, चौबीसों घंटे शुद्ध ठंडा व गरम पानी, चारों तरफ हरियाली और उत्तम ड्रेनेज सिस्टम. कितनी भी तेज बारिश हो, न तो कभी पानी भरेगा और न ही कभी बिजली जाएगी.

हारेनबर्ग नाम के इस गांव में किंडरगार्टन के अतिरिक्त 8वीं जमात तक का स्कूल, छोटा सा अस्पताल, खेल का मैदान, जिम्नेजियम और 2 बड़े सुपर मार्केट हैं, जिन में जरूरत की सभी चीजें मिल जाती हैं.

हारेनबर्ग की दोनों दिशाओं में 10-12 किलोमीटर की दूरी पर 2 छोटे शहर हैं, जहां अच्छी मार्केट, बड़ा अस्पताल, सैलून व पैट्रोल पंप हैं.

चित्रा और अर्नव को अभी जरमन नागरिकता नहीं मिली है. लीसा को जन्म लेते ही यहां की नागरिकता मिल चुकी है. जिले के मेयर लीसा के लिए स्वयं उपहार ले कर बधाई देने घर आए थे. यहां

की प्रथा है, जरमन शिशु के जन्म होने  पर उस की नागरिकता संबंधी समस्त औपचारिकताएं तत्क्षण पूरी हो जाती हैं और उस जिले के मेयर को सूचित किया जाता है, फिर मेयर स्वयं उपहार के साथ शिशु से मिलने आते हैं.

लीसा के जन्म के समय ओमा और लैंड लेडी ने चित्रा की वैसी ही सेवा की थी, जैसी एक मां अपनी बेटी की गर्भावस्था के दौरान करती है.

इस देश में अगर किसी बाहरी व्यक्ति को किसी परेशानी का सामना करना होता है तो वह है, यहां की डाइश भाषा. सभी जरमन डाइश में ही बात करना पसंद करते हैं. चित्रा और अर्नव ने शुरुआती परेशानी के बाद जल्दी ही डाइश भाषा की कोचिंग लेनी शुरू कर दी थी. नतीजा रहा कि वे अब तीनों स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और डाइश बोलने लगे हैं. लीसा अभी है तो 5 साल की, पर वह डाइश, अंगरेजी और हिंदी तीनों भाषाएं अच्छी तरह से बोल लेती है.

किंडरगार्टन से लौट कर आने पर वह ओमा की टीचर बन जाती है और ओमा बन जाती हैं किंडरगार्टन की स्टूडैंट. ओमा जानबू झ कर गलतियां करती हैं, ताकि लीसा से प्यारभरी डांट खा सकें.

ओमा की फ्रिज में वे सभी तरह की आइसक्रीम और जूस रखे होते हैं जो लीसा को पसंद हैं.

किंडरगार्टन से लौटने पर लीसा जैसे ही घर के पास पहुंचने को होती, ओमा को बाहर इंतजार करते बैठे देख, मुसकराते हुए दौड़ लगाती और पीठ से बैग उतार कर ओमा की गोदी में फेंक, सीधे उन की रसोई में घुस जाती. फिर अपनी मनपसंद आइसक्रीम फ्रिज से निकाल कर डाइनिंग टेबल पर आ कर खाने बैठ जाती.

ओमा लीसा के आने के पहले ही डाइनिंग टेबल पर सारे व्यंजन सजा कर रख देती हैं. लीसा या तो औमलेट या अपनी पसंद का कोई अन्य आइटम खाती, फिर अपनी सहेलियों के बारे में ओमा को विस्तार से बताना शुरू कर देती. शाम 4 बजे तक लीसा की धमाचौकड़ी चलती जब तक चित्रा औफिस से नहीं आ जाती. चित्रा की कार पोर्च में पार्क होते ही लीसा अपना बैग उठा कर अपने घर की सीढि़यां चढ़ने लगती.

ओमा का यह समय आराम करने का होता. शाम को वे या तो घूमने निकलतीं या फिर अपने बगीचे में बैठ कर सामने खेल रहे बच्चों को निहारती रहती हैं. जब कभी लीसा की सहेलियां खेलने के लिए नहीं आतीं, तब लीसा के साथ उस के पापा अर्नव खेल रहे होते हैं.

ओमा को शायद खाली बैठना पसंद ही नहीं था. वे बगीचे में बैठीं या तो स्वेटर बुन रही होतीं या मोजे बना रही होतीं. उन्होंने लीसा के लिए अनेक रंगबिरंगे स्वेटर और मोजे बना कर चित्रा को दिए हैं.

चित्राअर्नव की शादी की सालगिरह पर उन्होंने क्रोशिया से खूबसूरत मेज कवर बना कर चित्रा को भेंट किया था. केक बनाने में तो वे माहिर हैं. सप्ताह में 2-3 दिन उन के बनाए हुए स्वादिष्ठ केक चित्रा और अर्नव को भी खाने को मिलते हैं. ओमा और लीसा की जुगलबंदी देख लैंड लेडी कहती हैं, जरूर इन दोनों का कोई छिपा रिश्ता होगा. चित्रा को वे दिन नहीं भूलते जब 3 माह पहले अगस्त के महीने में लीसा बीमार पड़ी थी. इतना तेज बुखार था कि उस का पूरा बदन जल रहा था. ओमा भी बहुत चिंतित थीं.

एक दिन एक विशेषज्ञ डाक्टर से लीसा की हालत बयान कर उन के दिए लिक्विड को ले कर ओमा आई थीं. उस लिक्विड को लीसा के माथे पर देर तक वे लगाती रही थीं. उस दवा ने असर दिखाया और अगले दिन लीसा ठीक हो चली थी.

नवंबर माह के तीसरे सप्ताह में इस बार यहां का तापमान माइनस में पहुंचने लगा था. बर्फबारी भी शुरू हो गई थी. औरों की तरह चित्रा और अर्नव ने भी अपनीअपनी कारों के समर टायर बदलवा कर विंटर टायर लगवा लिए थे.

यूरोपियन देशों में बर्फ गिरने के पहले टायर बदलना अनिवार्य होता है. सर्दी के लिए अलग टायर होते हैं जो बर्फ पर फिसलन रोकते हैं.

इधर ओमा ने अभी से क्रिसमस की तैयारियां शुरू कर दी थीं. इस बार उन्होंने लीसा के लिए कुछ सरप्राइज सोच रखा था. क्रिसमस पर पूरा हारेनबर्ग सज कर तैयार हो जाता है ठीक उसी तरह जैसे दीवाली पर भारत के शहर सज जाते हैं.

लीसा भी क्रिसमस को ले कर बेहद उत्साहित है. किंडरगार्टन के सारे बच्चे अब क्रिसमस की ही बातें करते हैं. अर्नव और चित्रा अगले रविवार को क्रिसमस मेला देखने जाने की योजना बना ही रहे थे, तभी चित्रा के पास मां का फोन आया. भाई की शादी की खुशखबरी थी. मां ने बड़े प्यार से आग्रह किया था कि यदि वे लोग जल्दी पहुंच सकें तो सभी तैयारियों में बड़ी मदद मिल जाएगी.

चित्रा और अर्नव ने देर तक सलाहमशवरा उपरांत भारत यात्रा को अंतिम रूप दिया. एक माह की यात्रा में 15 दिन चित्रा को मां के पास भोपाल में रहना था और बाकी के 15 दिन ससुराल में.

लीसा उदास थी, क्योंकि उस का क्रिसमस सैलिब्रेशन छूट रहा था. ओमा भी निरुत्साहित हो गईं, उन की प्रिय लीसा एक माह के लिए उन से दूर जा रही थी.

भोपाल पहुंच कर चित्रा भाई की शादी की तैयारियों में जीजान से लग गई.

जलवायु परिवर्तन का सब से अधिक असर बच्चों पर पड़ता है, उन्हें नई जगह के वातावरण से सामंजस्य बनाने में समय लगता है. लीसा को अगले सप्ताह ही सर्दीजुकाम के साथ बुखार आ गया. जरमनी में होते तो वहां डाक्टर बच्चों को तुरंत कोई दवा नहीं देते, 3 दिन तक इंतजार करने को कहते हैं. बुखार ज्यादा बढे़ तो ठंडे पानी की पट्टी रखने को कहते हैं. पर यहां उस की नानी परेशान हो उठीं.

चित्रा ने मां को आश्वस्त किया. चित्रा अपने साथ पैरासिटामोल दवा ले कर आई थी, किंतु अर्नव ने एक दिन और इंतजार करने को कहा. चित्रा की मां का देसी उपचार में विश्वास था, सो वे काढ़ा बना कर ले आईं. लीसा ने किसी तरह एक घूंट गटका, फिर उसे और पिलाना मुश्किल हो गया.

देररात लीसा सपने में जोर से चीखी, फिर बैठ कर रोने लगी. चित्रा और अर्नव भी उठ कर बैठ गए.

चित्रा ने जब लीसा को सीने से लगाते हुए प्यार किया, तब उस का सिसकना बंद हुआ. लीसा पसीने से भीगी हुई थी, पर उस का बुखार उतर चुका था. कुछ देर बाद चित्रा ने लीसा से प्यार से पूछा, ‘‘लीसा, तुम कोई सपना देख रही थीं? सपने में ऐसा क्या देखा कि इतनी जोर से चीखीं?’’

‘‘मैं और ओमा जंगल में जा रहे थे, तभी एक टाइगर आ गया. टाइगर मेरे ऊपर  झपटा, तो मु झे बचाने के लिए बीच में ओमा आ गईं. तभी टाइगर उन का एक हाथ मुंह में दबा कर ले गया और उन के कटे हुए हाथ से खून बह रहा था.’’

‘‘तुम ने कल टाइगर वाला कोई टीवी सीरियल देखा था क्या?’’

‘‘हां, पर उस में 2 टाइगर आपस में फाइट कर रहे थे.’’

‘‘चलो, कोई बात नहीं, सपना था. ओमा बिलकुल ठीक हैं, कल वीडियोकौल पर तुम्हारी बात भी करा देंगे. मैं दूसरे कपड़े लाती हूं, इन्हें बदल देते हैं, पसीने से भीग गए हैं.’’

अगले दिन लीसा ने जिद पकड़ ली कि उसे ओमा से बात करनी है. चित्रा ने ओमा को कई बार फोन लगाया, पर हर बार उन का मोबाइल स्विच औफ बता रहा था. अर्नव ने चित्रा से कहा, ‘‘मैं मोहम्मद को फोन लगाता हूं, वह नीचे जा कर ओमा से बात करा देगा.’’

मोहम्मद ने फोन पर बताया कि वह अपने देश तुर्की आया हुआ है और उसे ओमा के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

चित्रा ने कहा, ‘‘मैं लैंड लेडी को फोन लगाती हूं. हो सकता है, ओमा अपनी बेटी के यहां गई हों.’’

लैंड लेडी ने जो बताया, उस से चित्रा की चीख निकल गई.

‘‘चित्रा, बड़ी दुखद सूचना है, ओमा घरेन के सिटी अस्पताल में एडमिट हैं. 2 दिन पहले रात में उन्होंने कोई सपना देखा था कि लीसा दरवाजे पर खड़ी उन्हें आवाज दे रही है. वे हड़बड़ा कर उठीं तो लड़खड़ा कर गिर पड़ीं. उन का बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया है. आवाज भी साफ नहीं निकल रही है. लीसा को बारबार याद कर रही हैं. डाक्टर ने बोला है, ठीक हो जाएंगी, पर कुछ माह लगेंगे.’’

चित्रा ने लीसा को सिर्फ यही बताया कि ओमा अभी वीडियोकौल पर नहीं आ सकतीं, उन की तबीयत ठीक नहीं है, डाक्टर ने आराम करने को कहा है.

एक माह बाद जब चित्रा और अर्नव लीसा के साथ वापस जरमनी पहुंचे, तो लीसा ओमा से मिलने की खुशियोंभरी कल्पना में डूबी हुई थी. फ्रैंकफर्ट हवाईअड्डे से बाहर निकल कर कार में बैठते ही उसे लग रहा था कि काश, कुछ ऐसा हो जाए कि उस की कार उड़ कर ओमा के पास पहुंच जाए.

उधर, ओमा की दुनिया पूरी तरह उलटपुलट हो चुकी थी. कभी खाली न बैठने वाली ओमा अब व्हीलचेयर पर गुमसुम सी बैठी रहतीं. उन के साथ अब चौबीसों घंटे केयरटेकर रोमानियन महिला डोरोथी रहती.

डोरोथी ओमा के सारे काम करती, उन्हें उठानेबिठाने से ले कर खाना खिलाने, सुलाने तक के. एक प्रकार से ओमा अब डोरोथी पर ही पूरी तरह से निर्भर थीं.

चित्रा के कार से उतरने के पहले ही लीसा दौड़ कर ओमा के बंद दरवाजे को खटखटा रही थी. डोरोथी ने जब दरवाजा खोला, तो लीसा उसे देख कर वहीं ठिठक गई. तब तक चित्रा ने वहां पहुंच कर डोरोथी को पूरी बात सम झाई.

अंदर बिस्तर पर लेटी ओमा को देख लीसा मुसकराई तो ओमा के होंठों पर भी मुस्कान  झलकी व उन के मुख से अस्पष्ट सी आवाज निकली, ‘‘ली…सू…’’ और आंखों से आंसू बह चले.

चित्रा ने अपनी हथेली से उन के आंसू पोंछे और लीसा का हाथ उन के हाथ में पकड़ा दिया.

Family Story: ऊंची उड़ान – अंकुर का सपना कैसे पूरा हुआ

Family Story: ‘जन गण मन अधिनायक जय हे… भारत भाग्य विधाता…’ की धुन स्टेडियम में गूंज रही थी और गोल्ड मैडल के विजेता के रूप में भारत के अंकुर का नाम पुकारा जा रहा था. ओलिंपिक खेलों में अंकुर ने मैडल जीत कर सभी का मान बढ़ाया था.

अंकुर के पिता विजय भी टैलीविजन पर यह सीन देख रहे थे. घर पर बधाई देने वालों के आनेजाने का दौर भी जारी था.

विजय की आंखों में बारबार आंसू तैर जाते थे. उन का रुमाल आंसुओं से भीग चुका था, पर आंसू तो थम ही नहीं रहे थे.

विजय अंकुर की मां की तसवीर के सामने खड़े हो गए और उस से बात करने लगे, “राधिका… काश, आज तुम भी साथ होती तो अपने बेटे की इस जीत पर कितना खुश होती…”

इतना कह कर विजय की आंखों से आंखों से उमड़ पड़े. उन से खड़ा नहीं हुआ जा सका, तो वे वहीं सोफे में ही धंस गए. उन की रोती आंखों के सामने राधिका के साथ गुजारे पल घूमने लगे.

अंकुर का मन बचपन से ही खेल की तरफ था. दूसरे लड़कों की तरह वह भी क्रिकेट का दीवाना था, पर राधिका और विजय ने उसे समझाया कि वह बैडमिंटन में अपना कैरियर बनाए और उस के लिए जरूरी था कि अंकुर किसी स्पोर्ट्स कालेज में पढ़े.

अपनी अथक मेहनत से अंकुर को लखनऊ के स्पोर्ट्स कालेज में दाखिला भी मिल गया था. यह एक बड़ी बात थी और ठीक एक महीने के बाद अंकुर को स्पोर्ट्स कालेज जौइन करने जाना था.

अंकुर के जाने से विजय खुश तो थे, पर बेटे के दूर जाने से वे दुखी भी थे. अंकुर उन का एकलौता बेटा था और अभी तो उसे बाहर की दुनिया की कोई भी समझ नहीं थी. जब देखो मां के आंचल से ही बंधा रहता है…

‘कैसे रह पाएगा वह  स्पोर्ट्स कालेज में? किस तरह वहां की कड़ी मेहनत को झेल पाएगा अंकुर?’ इन बातों को सोच कर विजय परेशान रहते, पर उन की पत्नी राधिका इस बात को बड़ी शान से भुना रही थी अपने परिचितों और रिश्तेदारों को फख्र से बताती कि चाहते तो सभी हैं कि उन का बच्चा स्पोर्ट्स कालेज में जाए, पर भला वहां दाखिला मिलना इतना आसान कहां है?

विजय अकसर सोचते भी कि राधिका कितनी पत्थरदिल है… एकलौता बेटा बाहर जा रहा है और वह है कि प्यार दिखाने के बजाय इस मौके को भी ऐंजौय कर रही है.

एक बार तो विजय ने अंकुर से कहा भी था, ‘बेटे, मैं ने कई लोगों को स्पोर्ट्स कालेज की सख्ती और नियमों से भाग कर घर आते हुए देखा है. तुम चाहो तो बीटैक कर लो या कोई दूसरा कैरियर अपना लो…’

इस से पहले कि अंकुर कुछ बोलता राधिका ने ही बात काटते हुए कहा, ‘आप मेरे लड़के को कमजोर मत बनाइए. सोना आग में तपे बिना कुंदन नहीं बनता है… और फिर किसी भी क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए मेहनत तो करनी ही पड़ेगी,’ इस बात पर विजय बेचारे चुप हो जाते.

राधिका ने अंकुर के लिए एक बहुत ही सख्त टाइमटेबल बनाया हुआ था, जिस में सुबह 4 बजे से उठ कर जौगिंग, कसरत और बैडमिंटन का अभ्यास शामिल था. इस के बाद एक हैल्दी नाश्ता जिस में बहुत सी चीजें अंकुर को नापसंद थीं, फिर भी राधिका उसे जबरदस्ती खिलाती थी.

राधिका के मुंह से अपने बेटे के दूर जाने की बात का जिक्र विजय ने कभी नहीं सुना था, जबकि वे अकसर अकेले में बैठ कर रो लेते थे.

आखिरकार वह दिन भी आ गया जब अंकुर को स्पोर्ट्स कालेज जाना था. विजय दुखी थे, पर राधिका एक चट्टान की तरह सख्त थी और उस के सख्त रवैए से अंकुर को भी मानसिक बल मिला और उस ने हंसते हुए सब से विदाई ली. राधिका का चेहरा अब भी सपाट था.

अंकुर के जाने के बाद राधिका घर के कामों में फिर से लग गई और विजय निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़े.

अंकुर को गए कई महीने बीत गए थे. एक रात जब विजय रात के 2 बजे पानी पीने के लिए उठे, तो उन्होंने देखा कि राधिका कुरसी पर बैठी अपनी डायरी के पन्नों पर कुछ लिख रही थी. आज से पहले विजय ने उसे ज्यादा लिखते हुए तो देखा नहीं था, फिर आज वह क्या लिख रही थी?

सुबह उठ कर विजय ने राधिका को जगाया तो वह न जाग सकी. रात में ही सोते समय उसे दिल का दौरा पड़ा था और अब वह अपने इस शरीर को अलविदा कह चुकी थी.

आननफानन में सभी रिश्तेदारों को खबर की गई और राधिका का अंतिम संस्कार हुआ. अंकुर भी मां की असमय मौत से बहुत दुखी था.

दुनिया का दस्तूर है कि मरने वाले के साथ कोई नहीं जाता. सब को अपना अपना जीवन जीना ही पड़ता है. रिश्तेदार भी अपनेअपने घर लौट गए थे और अंकुर को भी कालेज लौटना ही पड़ा, जहां उस का राष्ट्रीय टीम के लिए चयन होना था. धीरेधीरे अंकुर अपने खेल को अपनी कड़ी मेहनत से  निखारता चला गया.

समय कुछ और बीता. एक दिन विजय अकेलेपन से ऊब रहे थे, तो उन्होंने घर की साफसफाई शुरू की. उन्हें वह डायरी दिखी, जिस में उस रात राधिका कुछ लिख रही थी.

विजय ने राधिका की डायरी को पढ़ना शुरू किया :

‘वीणा से सुर निकल सकें इसलिए उस के तारों में कसाव होना बहुत जरूरी है… मैं जानती हूं कि अंकुर मुझ से कभी दूर नहीं गया, पर मेरी थोड़ी सी भी नरमी उसे कमजोर बना देगी, इसलिए मुझे सख्त बने रहना होगा, नहीं तो अंकुर भी अपना आगे का सफर पूरा नहीं कर सकेगा…

‘मैं जानती हूं कि लोग कहेंगे कि कितनी पत्थरदिल मां है… पर मां हूं इसीलिए अच्छाबुरा मुझे ही तो सोचना होगा. कभीकभी अपने आंसुओं को पी लेना भी जरूरी होता है…

‘बाहर कितनी ठंड है…

पंख फैलाने दो उसे

इतनी सुबह कैसे जागेगा…

पंख फैलाने दो उसे

अभी तो मेरे बिना सोता नहीं…

पंख फैलाने दो उसे

मेरे हाथ का खाना ही उसे भाता है… पंख फैलाने दो उसे.’

“बधाई हो विजय भाई, आप के बेटे ने देश के लिए गोल्ड मेडल जीता है…” बाहर से आती किसी की आवाज ने विजय की यादों पर ब्रेक लगा दिया.

विजय राधिका की तसवीर को फिर से निहारते हुए बोले, “मैं ने तुम्हे कितना गलत समझा था… आज तुम्हारे सख्त रवैए और अनुशासन के चलते अंकुर के जीवन की वीणा में संगीत भी बज रहा है और अंकुर ने सिर्फ पंख ही नहीं फैलाए हैं, बल्कि आसमान में उड़ान भी भर ली है… एक ऊंची उड़ान.”

Family Story: सालते क्षण – उसे सालते क्षण की कमी कब महसूस हुई?

Family Story: 5 वर्षों के निर्वासन के बाद मैं फिर यहां आया हूं. सोचा था, यहां कभी नहीं आऊंगा लेकिन प्राचीन सालते क्षणों को नए परिवेश में देखने के मोह का मैं संवरण न कर पाया था. जीवन के हर निर्वासित क्षण में भी इस मोह की स्मृति मेरे मन के भीतर बनी रही थी और मैं इसी के उतारचढ़ाव संग घटताबढ़ता रहा था. फिर भी आज तक मैं यह न जान पाया कि यह मोह क्यों और किस के प्रति है? हां, एक नन्ही सी अनुभूति मेरे मन के भीतर अवश्य है जो मु झे बारबार यहां आने के लिए बाध्य करती रही है. यह अनुभूति मां के प्रति भी हो सकती है और अमृतसर की इस धरती के प्रति भी जिस की मिट्टी में लोटपोट कर मैं बढ़ा हुआ. इसे ले कर मैं कभी एक मन नहीं हो पाया था. यदि हो भी पाता तो भी मु झे बारबार यहां आना पड़ता.

बस से मैं बड़ी बदहवासी में उतरा. बदहवासी यहां आने की कि वे क्षण जिन के लिए मैं यहां आया हूं, अपने परिवेश में यदि ज्यों के त्यों हुए तो जो निरर्थकता मन के भीतर आएगी, उस का सामना कैसे कर पाऊंगा?

बाद में हाथ में पकड़े ब्रीफकेस में सहेज कर रखी नोटों की गड्डी से मु झे बल मिलता है. थोड़ी देर के लिए मैं इस एहसास से मुक्त हो जाता हूं कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं हूं. निखट्टू मेरा उपनाम है. इस के साथ ही मु झे याद हो आते हैं मेरे दूसरे उपनाम भी. सीधा और भोला होने के वश रखा गया ‘भलोल’ उपनाम. सदा नाक बहती रहने के वश रखा ‘दोमुंही’ उपनाम. इन उपनामों से बारबार चिढ़ाने से मेरा जो रुदन निकलता तो मां से ले कर छोटे भाई तक को गली में लड़ती कौशल्या की आवाज का आभास होता था.

9वीं में मेरे कौशल्या उपनाम की बड़ी चर्चा थी. मेरे मन में यह प्रश्न उस समय भी था और आज भी है कि अगर मैं भलोल हूं या मेरी नाक बहती है तो इस में मैं कहां दोषी हूं? और यह भी कि, मेरी दुर्दशा करने वाले मेरे अपने कहां हुए? अब सोचता हूं मेरा इन के साथ केवल रोटीकपड़े तक का संबंध रहा है. वह भी इस घर में पैदा हुआ हूं शायद इसलिए.

मु झे पता ही नहीं चला कि कब संगम सिनेमा से गुजर कर पिंगलबाड़े तक पहुंच गया था. पिंगलबाड़े से मुड़ने पर पहले तहसील आती है. छुट्टी के रोज भी यहां भीड़ रहती है. जमघट लगा रहता है. मुकदमे ही मुकदमे. मुकदमे अपनों पर जमीनों के लिए. कत्लों के मुकदमे. तारतार होते रिश्ते. बेहिसाब दुश्मनी, कोई अंत नहीं.

मैं जल्दी से आगे बढ़ जाता हूं. आगे वह क्रिकेट ग्राउंड आता है जिस पर मैं बचपन में अपने साथियों संग क्रिकेट खेला करता था. मां कहती, क्रिकेट ने मेरी पढ़ाई ले ली. मैं कैसे कहता कि बड़े भाई की नईनई शादी, एक ही कमरे में परदे लगा कर उन के सोने का बंदोबस्त, रातभर चारपाई की चरमराहट, परदे के पीछे के दृश्यों की परिकल्पनाओं ने मु झे पढ़ने नहीं दिया था. पढ़ने के लिए मैं मौडल टाउन चाचाजी के पास और चालीस कुओं पर भी जाता पर परदे के पीछे की परिकल्पनाएं मेरा पीछा नहीं छोड़ती थीं. धीरेधीरे मैं पढ़ने में खंडित होता गया था. परीक्षा परिणाम आया तो मैं फेल था.

पढ़ने के लिए जब फिर दाखिला भरा तो बड़े भाई का मत बड़ा साफ था, ‘तुम्हें अब की बार याद रखना होगा. व्यक्ति कारखाने में पैसा तब लगाता है जब उसे लाभ दिखाई दे.’

विडंबना देखें, जब यही बात राजू भाई ने इन्हें कही थी तो सब के सम झाने और मनाने पर भी पढ़ाई छोड़ दी थी. राजू भाई केवल यही चाहते थे कि कुक्कु का चक्कर छोड़ कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. आज वही शब्द कहने से वे बिलकुल नहीं हिचकचाए थे.

राजू भाई ठीक कहते थे, जिस बात का विरोध आज हम अपनी जान दे कर करते हैं, कोई समय आता है हम परिस्थितियों द्वारा इतने असहाय होते हैं कि उसी बात को बिना शर्त स्वीकार कर लेते हैं. उस समय उन की यह बात सम झ में नहीं आई थी. आज सम झ में आती है. मैं ने भी पढ़ाई छोड़ दी थी. इसलिए नहीं कि मु झे उन की बात सम झ में आ गई थी, बल्कि इसलिए कि बड़े भाई के शब्द मु झ से सहन नहीं हुए थे. बड़े भाई को भी शायद राजू भाई के यही शब्द सहन नहीं हुए होंगे. हम दोनों एकदूसरे की बात सहन कर लेते तो शायद हालात दूसरे होते.

देखता हूं क्रिकेट ग्राउंड भी अब वहां नहीं है. सोचा था, जब मैं वहां पहुंचूंगा तो बच्चे पहले की तरह खेलते मिलेंगे. उन को खेलते देख मैं अपने बचपन के दिनों को याद कर लूंगा. वहां एक सुंदर बंगला हुआ करता था. और भी कई सुंदर बंगले बन गए थे. मैं किसी को कुछ कह नहीं सकता था. बच्चों के उल्लास तो आएदिन खत्म किए जाते हैं.

बड़े भारी मन से मैं अपनी गली की ओर बढ़ता हूं. गली के मोड़ तक आतेआते मेरे पांव ढीले पड़ जाते हैं. आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती. गली के लोग मु झे निखट्टू नाम से जानते हैं. मु झे देखते ही आग की तरह यह खबर फैल जाएगी. न जाने समय के कौन से क्षणों में मेरा नाम निखट्टू पड़ा. इस नाम से पीछा छुड़ाने के लिए मैं ने मोटर मैकेनिकी, कुलीगीरी, रिकशा चलाने से ले कर होटल में बरतन मांजने तक के काम किए. पर इस निखट्टू नाम से पीछा नहीं छूटा, चाहे तन के सुंदर कपड़े और नोटों से भरा ब्रीफकेस मु झे एहसास दिलाता है कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं रहा हूं.

जानता हूं मैं मन की हीनभावना से छला गया हूं. यही भावना मु झे बल देती है. गली में  झांक कर देखता हूं कि जिस बात की अपेक्षा थी वैसा कुछ नहीं था. गली में मु झे कोई दिखाई नहीं दिया था. सबकुछ बदल गया था. महाजनों का घर और बड़ा हो गया था. पहले हौजरी की एक मशीन हुआ करती थी, अब बहुत सी मशीनें लग गई हैं. गली भी पक्की हो गई है. मंसो की भैंसों के कारण जहां गंदगी फैली रहती थी, मु झे गली में कहीं भैंस दिखाई नहीं दी थी.

घर के समीप पहुंचा तो मैं चकरा गया. हमारा घर कहां गया? उस की जगह खूबसूरत दोमंजिला मकान खड़ा था. मैं ने इधरउधर देखा कि कोई पहचान वाला मिले तो पूछूं कि दिनेश साहनी का घर यही है? एकाएक ऊपर लिखे ‘साहनी विला’ पर मेरी नजर पड़ी. दरवाजे पर एक ओर बड़े भाई के नाम की तख्ती भी दिखाई दे गई.

भाई के नाम के नीचे लगी घंटी दबाने पर किसी अंजान महिला ने दरवाजा खोला. वह कपड़ों से नौकरानी लग रही थी. मु झे देख कर शायद वह यह पूछती कि आप को किस से मिलना है कि इतने में ‘‘कौन है?’’ कहती हुई मां दरवाजे तक चली आईं. मु झे देख कर आश्चर्य के भाव उन के चेहरे पर आए, फिर सामान्य हो गईं. मुख से निखट्टू निकलतेनिकलते रह गया पर निकला नहीं.

मां को देख कर नौकरानी सी लगने वाली भीतर चली गई. मां ने दरवाजा पूरा खोल दिया. मैं उस को प्रणाम करने के बाद बड़े अनमने भाव से भीतर चला आया. कदम रखते ही आंखें चुंधिया गईं. पूरे कमरे में ईरानी कालीन, एक ओर बड़ी सी डाइनिंग टेबल, दरवाजे के पास चमकदार फ्रिज, एक तरफ सोफा व बैड, गद्देदार कुरसियां और टीवी. टीवी के पीछे वाली दीवार पर मोतियों से बनाई गई एक औरत की आकृति फ्रेम की गई थी.

मैं आगे नहीं बढ़ पाया. न ही मां ने मु झे बढ़ने के लिए कहा. बैठने के लिए भी नहीं कहा. मैं ने महसूस किया कि मु झे बैठाने से ज्यादा उस को यह बताने की चिंता है कि सारा सामान जिसे देख कर हैरान हूं, कहां से और कैसे आया है? मां बोली, ‘‘ये सारा सामान दिनेश ने फौरेन से मंगवाया है. यह ईरानी कालीन अभी पिछले महीने ही आया है. टीवी और फ्रिज बहुत पहले आ गया था. पूरे 10 लाख रुपए लगे हैं.’’

मैं ने महसूस किया, मेरे ब्रीफकेस में पड़ी रकम एकदम छोटी है. जो रकम मां ने बताई थी, उस से दोगुनी छोटी. इन 5 वर्षों में जो क्षण मु झे सालते रहे हैं वे और बड़े हो गए हैं. जाने कहां से पीड़ा की एक तीखी अनुभूति भीतर से उठी और भीतर तक चीरती चली गई. पीड़ा इसलिए कि निखट्टू उपनाम से मुक्ति पाने की जो इच्छा ले कर यहां आया था, वह जाती रही.

बैठक और ड्योढ़ी मिला कर ड्राइंगरूम में इतनी कीमत की चीजें हैं तो भीतर के कमरों में जाने क्याक्या देखने को मिले. मां ने बताया, ‘‘अपनी पत्नी के सारे गहने बेच कर जिस होटल में तुम बरतन मांजते थे उसी होटल को खरीद लिया था. यह उसी की करामात है कि हमें कोई कमी नहीं है.’’ ऐसे कहा जैसे अब भी उसी होटल में बरतन मांजता होऊं. ‘‘गांव की जमीन उस ने छेड़ी तक नहीं. कहता था जिस में सब हिस्सेदार हों उस में वह कुछ नहीं करेगा.’’ मां को भय हुआ कि कहीं मैं होटल में अपने हिस्से का दावा न करने लगूं. इसलिए साफ बात करना ठीक सम झी. मैं कहने को हुआ कि इस मकान में भी तो मेरा हिस्सा है, पर चुप रहा.

बाद में मां ने महसूस किया कि उन्होंने मु झे बैठने को नहीं कहा. ‘‘बूट उतार कर सोफे पर बैठ जाओ.’’ यह सुन कर मैं संकुचित हो उठा कि उस का अपना बेटा, अपने भाई की ईरानी कालीन पर बूट पहन कर बैठ नहीं सकता. कालीन पर तो बूट पहन कर ही बैठा जाता है.

मैं ने यह भी महसूस किया कि घर छोड़ते समय जिस तरह मु झे ले कर मां भावशून्य थी उस में और वृद्धि हो गई है. न मैं बैठा और न ही मैं ने बूट उतारे. कहा, ‘‘चलूंगा मां. देखने आया था कि शायद तुम्हें मेरा अभाव खटकता हो. पर नहीं, यहां सबकुछ उलट है. तुम्हें मेरा अभाव नहीं था बल्कि मु झे तुम्हारा अभाव था. कितना विलक्षण है कि बेटे को मां का अभाव है पर मां को नहीं.’’

वहां से निकलने के बाद भी पीछे से मां की आवाज आती रही, ‘‘कुछ खातेपीते जाओ. भाई से नहीं मिलोगे? होटल नहीं देखोगे?’’ मु झे मां की आवाज किसी कुएं से आती सुनाई दी. मां, दिनेश भाई के साथ इसलिए है कि दोनों एक ही वृत्ति के हैं. बेईमान और धोखेबाज. मैं ने तो यह महसूस किया कि अब तक के सालते क्षणों में कुछ और क्षण समावेश कर गए हैं. और यह भी कि क्षण यदि खुद में बदल भी जाएं तो निरथर्कता और बढ़ जाती है जो आदमी को जीवनभर सालती है.

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