Hindi Story: इच्छाधारी बाबा – बाबा जी को क्यों गिरफ्तार किया गया?

Hindi Story: मंदिर के ऊपरी भाग में बने स्पैशल कमरे से नीचे का सारा नजारा दिखाई देता था. वे इस कमरे में आराम करते हुए मंदिर में आने वाले भक्तों को देखते रहते थे. वैसे तो उन्हें मर्द भक्तों से इतना मतलब नहीं रहता था, पर उन में से वे केवल ऐसे भक्तों पर ही निगाह गड़ाए रहते थे, जो उन्हें पैसे वाला दिखाई देता था. इस से उलट वे मंदिर में आने वाली उन लड़कियों और औरतों को खास निगाह से देखते थे, जो गरीब घरों की होती थीं.

वे अपने कमरे से ही उन के चेहरे को पढ़ लेते थे. उन में से जिन में उन्हें कोई उम्मीद नजर आती, उन्हें अपने दूसरे कमरे में बुला लिया जाता. इस दूसरे कमरे से ही इस कमरे तक आने का सफर तय होता था. वे ‘इच्छाधारी बाबा’ कहे जाते थे.

अब थोड़ा ‘इच्छाधारी बाबा’ का इतिहास जान लेते हैं. उस का असली नाम मूलचंद था. वह शुरू से ही शानशौकत से जीने के सपने देखा करता था, पर वह ज्यादा पढ़लिख नहीं पाया था, तो उसे जो सरकारी नौकरी मिली, वह क्लर्क की थी.

यह नौकरी भी मूलचंद को इस वजह से मिल गई थी कि उस के पिताजी भी सरकारी नौकर थे और रिटायर होने से पहले एक हादसे में उन की मौत हो गई थी.

मूलचंद को आसानी से नौकरी मिली तो उस के सपने जोर मारने लगे. अपने सपनों को पूरा करने के लिए उस के पास घपला करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

क्लर्क की तनख्वाह तो इतनी होती नहीं कि वह उस में ऐशोआराम की जिंदगी बिता सके. घपला किया और पकड़ा गया.

मूलचंद ने जितने रुपयों का घपला किया था, उन को अपने एक दोस्त  के पास रख दिया था, ताकि  अगर  वह पकड़ा भी जाए तो उस के पैसे महफूज रहें.

मूलचंद को भरोसा था कि वह पकड़े जाने के बाद इन्हीं पैसों की रिश्वत खिला कर अपनेआप को बेदाग साबित कर लेगा, पर ऐसा हुआ नहीं. न केवल उसे नौकरी से निकाल दिया गया, बल्कि उस के खिलाफ पुलिस थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी गई. रिपोर्ट दर्ज होते ही उस के पैरों तले की जमीन खिसक गई. डर के मारे वह फरार हो गया.

पुलिस मूलचंद को ढूंढ़ती फिर रही थी और वह यहांवहां छिपते हुए दिन काट रहा था. पुलिस के साथ आंखमिचौली के दौरान ही वह एक मंदिर के पुजारी के पास पहुंचा. उस पुजारी ने उसे छिपने में बहुत मदद की.

बाद में मूलचंद को पता चला कि वह पुजारी खुद भी सालों से ऐसे ही पुलिस से छिपता फिर रहा है. उस ने तो अपनी पत्नी का ही खून कर दिया था.

मूलचंद ने भी सोचा, ‘कितने लोग ऐसे ही अपनेआप को छिपाए हुए हैं, तू भी यही चोला पहन ले…’

मूलचंद तब तक वहां छिपा रहा, जब तक उस के बाल और दाढ़ीमूंछ नहीं आ गई. फिर एक दिन वह भगवा चोला पहन कर वहां से निकल पड़ा. उस ने अपना नया नाम ‘इच्छाधारी बाबा’ रख लिया था. अब उसे पुलिस का कोई डर नहीं था.

‘इच्छाधारी बाबा’ ने अपना जो नया ठिकाना बनाया, वह एक रईस रम्मू का पुरखों का मंदिर था. इस मंदिर में बहुत सारी जमीन लगी हुई थी. इस जमीन को रम्मू ही जोतता था और सारा पैसा अपने इस्तेमाल में ही खर्च करता था.

रम्मू को अपने पुरखों से इस वजह से चिढ़ होती थी कि इतनी सारी जमीन मंदिर में लगा दी और इतनी कीमती जमीन पर मंदिर बना दिया. वह मंदिर जिस जगह पर बना था, उस की कीमत आज लाखों रुपए में हो गई थी.

धीरेधीरे जब रम्मू ने मंदिर में खर्चा कराना बंद कर दिया, तो महल्ले के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर के मंदिर  को चलाने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले ली.

कहीं मंदिर पूरी तरह से हाथ से न निकल जाए, इस भावना के चलते रम्मू मंदिर में अपना दबदबा बनाए रखता था. उसे एक ऐसे आदमी की तलाश थी, जो मंदिर से आमदनी करा सके.

मूलचंद यानी ‘इच्छाधारी बाबा’ से रम्मू की एक डील हुई थी. ‘इच्छाधारी बाबा’ ने उसे हर साल एकमुश्त मोटी रकम देने का लिखित करार कर दिया था. इस के बदले रम्मू ने पूरा मंदिर उसे सौंप दिया.

रम्मू का भार हलका हो गया. अब उसे अपने पुरखों से इतनी नाराजगी भी नहीं रही. इसी बीच ‘इच्छाधारी बाबा’  मंदिर से पैसा कमाने की कला सीख चुका था.

वह महल्ला अच्छे लोगों का था, इसलिए ‘इच्छाधारी बाबा’ को अपनी कमाई को ले कर कोई शक था भी नहीं. अब समाज में इज्जत भी मिलने लगी थी. वह तू से आप हो गया था.

रम्मू ने ‘इच्छाधारी बाबा’ की योजना के मुताबिक उन्हें बड़ी धूमधाम और उन से जुड़ी अनेक कहानियों का प्रचार कर मंदिर में बैठा दिया. मंदिर में एक पंडित था रामलाल, जो कुछ मंत्र वगैरह पढ़ लेता था. वह मंदिर में भगवान की पूजा करता और अपना पंडिताई धर्म निभा लेता. सपने तो वह भी बहुत सारे पाले हुए था, पर उस के पास ‘इच्छाधारी बाबा’ की तरह खुद पर यकीन और चालाकियां नहीं थीं.

‘इच्छाधारी बाबा’ को एक ऐसा ही आदमी तो चाहिए ही था, इसलिए उन्होंने उस पंडित रामलाल के सिर पर अपना हाथ रख कर यह भी सम झा दिया कि अगर उस ने उन के कामों में रोड़े अटकाए तो उस की खैर नहीं.

रामलाल वैसे भी ‘इच्छाधारी बाबा’ को देख कर घबरा चुका था, उन की धमकी को सुन कर और भी घबरा गया. वह ‘इच्छाधारी बाबा’ के पैरों में गिर गया और कसम खा ली कि बाबा के न केवल सारे कामों में वह हिस्सेदार बनेगा, साथ ही हर राज को भी बरकरार रखेगा.

‘इच्छाधारी बाबा’ को अपना जलवा बनाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. वे जल्दी ही सम झ गए थे कि जो अपने चेहरे पर जितनी मुसकान लिए रहता है, उस के दिल में उतने ही दर्द छिपे होते हैं. उन्हें केवल उन दर्दों को कुरेदना ही था.

एक औरत सविता पर उन की निगाह पहले ही दिन पड़ गई थी. वह मंदिर गाहेबगाहे आ जाती थी और जोरजोर से बातें करती और हंसती रहती. ‘इच्छाधारी बाबा’ ने सविता को ही अपना पहला शिकार बनाया.

सविता के कोई औलाद नहीं थी और उम्र भी ढलती जा रही थी. पति दूसरे शहर में काम करता था. वह 15 दिनों में एक बार ही आता, वह भी एक दिन के लिए.

सविता ने यह सब ‘इच्छाधारी बाबा’ को बता दिया. उस की बातें सुन कर बाबाजी की हवस जाग गई. फिर एक दिन सविता को अपने कमरे में बुला कर बाबाजी ने उस की कोख में अपना बीज रोप दिया.

सविता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह पेट से हो गई और बाबाजी के लिए खिलौना बन गई. वे जब चाहते, उसे बुला लेते और अपने कमरे में मौज करते.

सविता का पेट अब बाहर की ओर निकला दिखाई देने लगा था. बाबाजी का मजा खत्म हो गया था. सविता ने एक दूसरी औरत को उन के कमरे में पहुंचा दिया था. धीरेधीरे ‘इच्छाधारी बाबा’ के पास औरतों की लाइन लगने लगी.

‘इच्छाधारी बाबा’ की नजर अब नवीन पर गई. नवीन के पास धनदौलत की कोई कमी नहीं थी. वह सुबह फैक्टरी जाने के पहले मंदिर में आ कर भगवान के दर्शन करता था.

‘इच्छाधारी बाबा’ की निगाह उस पर गड़ चुकी थी. वैसे तो वे बहुत ही कम सुबह जल्दी सो कर उठते थे और कभीकभार ही सुबह की पूजा में शामिल होते थे. पर अब वे रोज आने लगे थे.

नवीन को अपने जाल में फंसाने के लिए ‘इच्छाधारी बाबा’ को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. सविता ने नवीन के लिए एक खूबसूरत लड़की का इंतजाम कर दिया था.

‘इच्छाधारी बाबा’ के कमरे में नवीन की मुलाकात उस लड़की से कराई गई और उन के बिस्तर पर जाते ही वीडियो बना लिया गया. नवीन अब बाबाजी के लिए सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन चुका था.

इस मंदिर को और बड़ा नवीन ने ही कराया था. इसी दौरान बाबाजी ने ऊपरी भाग में अपने लिए एक ऐसा कमरा बनवा लिया था, जिस की कांच की दीवारों से वे तो बाहर  झांक सकते थे, पर कोई और बाहर से कमरे में नहीं  झांक पाता था. कमरे की मोटी कांच की दीवारों के अंदर से बहुत जोर की आवाज भी बाहर नहीं निकल पाती थी.

‘इच्छाधारी बाबा’ की दुकानदारी चल निकली थी. मंदिर में भक्तों का जमावड़ा बढ़ने लगा था और पैसा बरसने लगा था. बाबाजी ने पैसा कमाने का एक और खेल चालू कर लिया था. उन के पास अब औरत भक्तों की तादाद खूब  हो गई थी. इन में वे तो शामिल थीं ही, जिन की गोद भर चुकी थी और वे भी थीं, जिन्हें केवल बाबाजी के साथ से मजा मिलता था.

‘इच्छाधारी बाबा’ ने अपने अमीर भक्तों तक इन औरतों को पहुंचना शुरू कर दिया. बाबाजी के पास उन सब औरतों के वीडियो तो थे ही, इसलिए चाह कर भी वे उन के आदेश को मानने से इनकार नहीं कर पाती थीं. बाबाजी को इस नए कारोबार से ज्यादा आमदनी हो रही थी.

रम्मू ने जब अपना पुरखों का मंदिर ‘इच्छाधारी बाबा’ को किराए पर दिया था, तब उसे भी उम्मीद नहीं थी कि बाबाजी इस मंदिर को इतना चमत्कारिक बना देंगे कि पैसा बरसने लगेगा. उसे तो लग रहा था कि कुछ ही दिनों में बाबाजी मंदिर छोड़ कर भाग खड़े होंगे, पर अब जब मंदिर की चर्चा दूरदूर तक होने लगी थी, तो उसे बाबाजी से जलन होने लगी थी. उसे लगने लगा था कि वह ठगा गया है. वह अब उन्हें मंदिर से भगाने की जुगत में लग गया था.

एक दिन ‘इच्छाधारी बाबाजी’ अपने भक्तों के साथ नाच रहे थे. उन्होंने जिस औरत का हाथ पकड़ा हुआ था, उसे वे पहली निगाह में ही पसंद कर चुके थे. उन्होंने अपने कांच वाले कमरे से ही उस औरत को एक बच्चे और मर्द के साथ आते देख लिया था.

उस औरत की उम्र ज्यादा नहीं थी. उस के लंबे बाल कमर के नीचे तक लहरा रहे थे. बाबाजी ने उस औरत को दर्शन देने का मन बना लिया था, इसलिए वे अपने कमरे से नीचे आ गए थे.

उस औरत ने अपने सिर पर आंचल रख कर पूरी श्रद्धा के साथ बाबाजी के चरणों पर अपना सिर रख दिया और बाबाजी ने आशीर्वाद देने के बहाने उस की पीठ को सहला दिया.

इस के बाद बाबाजी उस औरत का हाथ पकड़ कर नाचने लगे. मंदिर के अहाते में जमा सभी भक्त भी बाबाजी के साथ नाच रहे थे. वे उसे यहांवहां छू रहे थे. वह औरत भी उन्हें छूने का भरपूर मौका दे रही थी.

थोड़ी देर के बाद वह औरत बाबाजी के कमरे में उन के सामने बैठी थी. बाबाजी उसे एकटक निगाहों से देख रहे थे. जैसे ही उन्होंने उस औरत के चेहरे पर आने वाली लट को हटाते हुए अपनी बांहों में लेने की कोशिश की, तभी उस औरत ने अपनी कमर में छिपी पिस्तौल को निकाल कर बाबाजी के माथे पर अड़ा दिया.

‘इच्छाधारी बाबा’ अभी भी मदहोश ही थे. उन्होंने पिस्तौल की परवाह किए बिना एक बार फिर उस औरत को बांहों में लेने की कोशिश की, पर अब की बार पिस्तौल से गोली निकल चुकी थी, जो तेज आवाज के साथ कांच की दीवार से जा टकराई.

गोली की आवाज बाहर नहीं गई थी, पर अंदर ही उस ने इतना धमाका किया था कि बाबाजी का सारा नशा गायब हो चुका था.

‘इच्छाधारी बाबा’ को गिरफ्तार कर लिया गया था. दरअसल, पुलिस ने ही यह सारा प्लान बनाया था. वह खूबसूरत औरत एसपी थी, जिस ने बाबाजी को अपने मोह जाल में फंसाया था.

पुलिस ने एक दिन पहले ही कुछ औरतों को एक होटल से गिरफ्तार किया था. उन्होंने ही मंदिर में चल रहे इस गोरखधंधे का खुलासा किया था. बाबाजी के कमरे से गंदी किताबों के अलावा नशीली दवाएं भी बरामद हुई थीं. ‘इच्छाधारी बाबा’ का पुराना कच्चाचिट्ठा भी खुल चुका था.

Hindi Story: झुमकी – क्या झुमकी अपने पति का इलाज करा पाई?

Hindi Story: ‘‘बाजार से खाने के लिए कुछ ले आती हूं,’’  झुमकी पलंग पर लेटे बिछुआ को देख कर बोली और बाहर निकल गई.  बटुए से पैसे निकाल कर गिनते हुए  झुमकी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं. उत्तर प्रदेश के कमालपुर गांव से वह अपने बीमार पति बिछुआ का इलाज कराने दिल्ली आई थी. उसे यहां आए हुए 2 हफ्ते हो चुके थे. कोई जानपहचान वाला तो था नहीं, सो अस्पताल के पास ही एक कमरा किराए पर ले कर रह रही थी.

कई दिनों से चल रही जांच के बाद ही पता लग पाया कि बिछुआ के पेट की छोटी आंत में एक गांठ थी. आपरेशन जल्द कराने को कह रहे थे अस्पताल वाले, लेकिन  झुमकी यह सोच कर परेशान थी कि पैसों का जुगाड़ कैसे होगा? सरकारी अस्पताल है तो क्या हुआ… कुछ खर्चा तो होगा ही आपरेशन का. फिर इस कमरे का किराया, खानापीना और बिछुआ की दवाएं… पैसे के बिना तो कुछ मुमकिन था ही नहीं. क्या बिछुआ का इलाज कराए बिना ही वापस लौट जाना पड़ेगा?

सड़क पर चलते हुए अचानक ही  झुमकी को किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी. पास जा कर देखा तो एक 35-40 साल की औरत जमीन पर गिरी हुई थी. उठने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद वह उठ नहीं पा रही थी.  झुमकी ने सहारा दे कर उसे उठाया और पास ही पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठा दिया.

झुमकी को उस औरत ने बताया कि वह आराम से चलती हुई जा रही थी कि अचानक एक लड़का तेजी से साइकिल चलाता हुआ पीछे से आया और धक्का मार दिया. उस के धक्के से वह इतनी जोर से गिरी कि एक पैर बुरी तरह मुड़ गया और कुहनियां भी छिल गईं.

कुछ देर वहीं बैठने के बाद उस औरत ने  झुमकी से एक रिकशा रोक लेने को कहा. रिकशा रुकते ही वह औरत  झुमकी की मदद  से चढ़ तो गई, लेकिन  हाथों में दर्द के चलते रिकशे को पकड़ नहीं पा रही थी.

झुमकी भी तब रिकशे में बैठ गई और अपने हाथ का घेरा उस घायल औरत की कमर पर बना कर सहारा दे दिया. रिकशा उस औरत के घर की ओर रवाना हो गया.

रास्ते में उन दोनों की बातचीत हुई. उस औरत ने  झुमकी को बताया कि  उस का नाम राधा है. नजदीक के ही  एक महल्ले में वह अपने पति सुरेंद्र  के साथ रहती है. सुरेंद्र की पास के बाजार में किराने की दुकान है.

शादी को 10 साल बीत चुके थे, लेकिन राधा के कोई बच्चा नहीं था, इसलिए घर पर अकेली ऊब जाती थी. अपना समय बिताने और पति की मदद करने के मकसद से वह कुछ देर के लिए दुकान पर चली जाती है. आज भी वह दुकान से वापस लौट रही थी, तब यह घटना घटी.

अपने बारे में बता कर राधा ने  झुमकी से उस का परिचय पूछा, तो  झुमकी ने अपने बारे में सब बता दिया.

झुमकी की बात पूरी होतेहोते ही राधा का घर आ गया.  झुमकी ने चाबी राधा के हाथ से ले कर ताला खोल दिया और उसे सहारा देते हुए कमरे के भीतर ले

आई. जब तक राधा ने सुरेंद्र को फोन किया, तब तक  झुमकी वहां खड़ी रही.

राधा की सुरेंद्र से बात पूरी होते ही  झुमकी  बोली, ‘‘मैडमजी, मैं अब चलती हूं. बिछुआ मेरी बाट देखते होंगे.’’

राधा ने उसे रुकने को कहा. धीरेधीरे चलते हुए उस ने रसोई से ला कर कुछ नमकीन के पैकेट  झुमकी को थमा दिए.

रात को  झुमकी और बिछुआ राधा की दी हुई नमकीन खा कर सो गए. अगले दिन सुबहसुबह  झुमकी के कमरे का दरवाजा खड़का तो दरवाजा खोलने पर वह सामने सुरेंद्र को देख चौंक उठी.

सुरेंद्र ने उसे बताया कि राधा के पैर में पलस्तर चढ़ गया है. वह एक जरूरी बात करने के लिए  झुमकी को घर बुला रही है.

झुमकी बिछुआ को बता कर सुरेंद्र के साथ राधा से मिलने आ गई.

राधा  झुमकी को देख कर बहुत खुश हुई और तुरंत अपनी बात सामने रखते हुए बोली, ‘‘ झुमकी, मैं कल से तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी. तुम्हारी परेशानी को ले कर मैं ने सुरेंद्र से भी बात की  है. मेरा एक सु झाव है, तुम्हें जंचे तो ही हां करना.’’

‘‘जी, कहिए…’’  झुमकी बोली.

‘‘मैं ने अपने घर का कुछ हिस्सा पिछले महीने ही बनवाया है. पहले आगे वाले 2 कमरे ही थे. कई दिनों बाद रंगरोगन हुआ तो पीछे की ओर एक कमरा भी बनवा लिया. उसे हम दुकान के गोदाम के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं.

‘‘अभी वह कमरा खाली है. बस, मकान बनवाने के बाद का कुछ बचाखुचा सामान जैसे रंगरोगन के खाली डब्बे रखे हैं. तुम चाहो तो बिछुआ के इलाज तक उस कमरे में रह सकती हो.

‘‘तुम मेरे घर का काम कर दिया करना, क्योंकि चोट की वजह से मु झ से काम हो नहीं पाएगा. तुम हम दोनों का खाना बनाओगी तो साथसाथ अपना खाना भी बना लिया करना. काम के बदले पैसे तो दूंगी ही मैं तुम्हें.’’

झुमकी को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई हो. खुशीखुशी यह प्रस्ताव स्वीकार कर उसी दिन बिछुआ को ले कर वह राधा के घर चली आई.

राधा ने अपने घर पर रखे सामान में से बिस्तर और कुछ पुराने कपड़े  झुमकी के कमरे में रखवा दिए. अस्पताल के खर्च के लिए उस को कुछ रुपए भी दे दिए.

बिछुआ के पेट में खून रिसने के चलते जल्द ही आपरेशन कर दिया गया. आपरेशन कामयाब रहा और 4 दिन बाद उसे अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई. तकरीबन एक महीने के लिए उसे आराम करने की सलाह दी गई. साथ ही, यह भी कहा कि दर्द ज्यादा हो तो तुरंत अस्पताल आना है, वरना एक महीने बाद जांच कराने ही आना होगा.

झुमकी ने पहले दिन से ही खाना बनाने के साथसाथ घर के बाकी काम पूरी जिम्मेदारी से करने शुरू कर दिए. वह सोच रही थी कि राधा के घर पर अगर आसरा न मिला होता तो जाने क्या होता? इधर राधा को भी  झुमकी के रूप में बड़ा सहारा मिल गया था.

एक दिन सफाई करते समय कमरे  में मकान बनने के बाद का बचा हुआ सामान और एक अलमारी में रखे रद्दी अखबार देख  झुमकी कुछ सोच कर मुसकरा उठी. शादी से पहले अपने  पिता से उस ने कुट्टी नाम की कला सीखी थी.

कुट्टी का मतलब होता है कागज को कूट कर उस से सुंदरसुंदर चीजें बनाना. पहले बेकार पड़े कागजों को कुछ दिन पानी में भिगो कर कूटा जाता है. इस लुगदी में मुलतानी मिट्टी और गोंद डाल कर गूंद लिया जाता है और किसी भी आकृति में ढाल कर सुखा लिया जाता है. बाद में उस आकृति पर रंग कर देते हैं.

‘इस काम के लिए मु झे जो भी सामान चाहिए, उस में से मुलतानी मिट्टी को छोड़ कर यहां सबकुछ  है, लेकिन उस की जगह एक थैली में  जो सफेद सीमेंट रखा है, उस से काम चल जाएगा.

‘मैडमजी तो यह सारा सामान फेंकने को कह रही थीं. इस का मतलब उन  को इस में से कुछ चाहिए भी नहीं, तो  मैं ही इस्तेमाल कर लेती हूं इसे,’  झुमकी ने सोचा.

डिस्टैंपर के खाली डब्बे में पानी भर कर  झुमकी ने वहां रखे रद्दी अखबार उस में भिगो दिए. 2-3 दिन बीतने पर भीगे कागजों को कूट कर लुगदी बना ली और बाकी सामान मिला कर एक सुंदर बड़ा सा फूलदान बना दिया. सूखने पर वहां रखे पेंट और ब्रश ले कर उसे सुंदर रंगों से रंग दिया.

जब  झुमकी फूलदान ले कर राधा के पास पहुंची, तो पीले, संतरी और सुनहरी रंगों से चमकते फूलदान को देख कर राधा हैरान रह गई. जब उसे पता लगा कि वह  झुमकी ने बचे सामान से बनाया है, तो हैरानी के साथसाथ उस की खुशी का ठिकाना न रहा.

‘‘ झुमकी तुम मु झे सिखाओगी यह कला?’’ राधा ने चहकते हुए पूछा.

‘‘क्यों नहीं मैडमजी, मु झे तो बहुत अच्छा लगेगा,’’  झुमकी को बहुत दिनों बाद एक अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी.

अगले दिन से ही  झुमकी ने राधा को कुट्टी कला की बारीकियां बतानी शुरू कर दीं.  झुमकी ने बताया कि उस के पिता ज्यादा सामान बनाते थे, तो तकरीबन 15 दिन भिगोते थे कागजों को. ऐसे में 2-3 दिनों के बाद पानी बदल लेते थे. पुराना पानी वे पेड़पौधों में दे  देते थे.

पानी में कागजों को कुछ दिन भिगो कर जब कलाकृतियां बनाने का समय आया, तो  झुमकी राधा को सहारा देते हुए आंगन में ले आई और एक कुरसी पर बिठा दिया.

झुमकी को छोटेछोटे खिलौने बनाते देख राधा का मन भी खिलौने बनाने को करने लगा.  झुमकी एक टीचर की तरह राधा को सब सिखा रही थी और कुरसी पर बैठेबैठे ही राधा भी  झुमकी को देख कर खिलौने बना रही थी.

झुमकी ने उसे मूर्तियां, कटोरे और प्लेट जैसी और चीजें बनानी भी सिखाईं. सूखने पर रंग करने का आसान तरीका भी  झुमकी ने राधा को सिखा दिया. कुछ रंगों को मिला कर नए सुंदर रंग बनाना और उन का सही ढंग से इस्तेमाल करना भी राधा ने  झुमकी से सीख लिया.

इधर बिछुआ ठीक हुआ, उधर राधा के पैर का पलस्तर भी कट गया.  झुमकी और बिछुआ के गांव वापस जाने का समय आ गया था. जाने से पहले एक बार अस्पताल में जांच कराने के बाद  झुमकी और बिछुआ राधा और सुरेंद्र का अहसान मानते हुए भरे मन से विदा ले कर गांव चले गए.

कुछ दिनों तक राधा को घर सूनासूना लगता रहा, फिर धीरेधीरे सब सामान्य हो गया. वह पहले की तरह ही घर संभालने लगी और सुरेंद्र की मदद को दुकान भी पर जाने लगी थी.

अचानक उन की जिंदगी में एक मुसीबत आ गई. सुरेंद्र को दुकान के मालिक ने एक दिन आ कर बताया कि उस की और आसपास की कई दुकानों को गैरकानूनी होने के चलते जल्दी ही गिरा दिया जाएगा.

सभी दुकानदार आपस में सलाह कर इस नोटिस के खिलाफ कोई कदम उठाते, इस से पहले ही अचानक दुकानों को तोड़ने का काम शुरू हो गया.

सुरेंद्र ने बाकी सब की तरह ही अफरातफरी के बीच जल्दीजल्दी अपना सामान बाहर निकाला. उस का काफी सामान इधरउधर बिखर कर खराब हो गया. बाकी बचे सामान को किसी तरह वह घर ले कर आया.

अड़ोसपड़ोस में जा कर उन दोनों ने गुजारिश की कि पड़ोसी रोजमर्रा का कुछ सामान उन से खरीद लें, लेकिन बहुत कम लोगों ने ही सामान खरीदने के लिए उन के घर तक आने की जहमत उठाई. बचे सामान में से कुछ खराब हो गया और बाकी राधा ने घर पर इस्तेमाल कर लिया.

उन की असली चिंता तो अभी भी सामने थी, रोजीरोटी की. वे जान गए थे कि घर पर दुकान खोलने की बात सोचना बेकार है, क्योंकि ग्राहक तो आएंगे नहीं वहां चल कर. कुछ सालों से बचत कर के जो पैसे जोड़े थे, वे अब खत्म होने को आए थे.

एक दिन सुरेंद्र का दोस्त अनवर उस से मिलने घर आया हुआ था. चाय पीते हुए उस का ध्यान  झुमकी के बनाए फूलदान पर चला गया. उस ने बताया कि उस के दफ्तर के पास इस तरह का सामान बेचने वाला बैठता है, जिस की खूब बिक्री होती है. वहां विदेश से घूमने आए सैलानी भी आते हैं. वे लोग इसे ‘पेपर मैशे’ से बना सामान कहते हैं.

अनवर की बात सुन कर राधा की आंखें चमक उठीं. वह सुरेंद्र से बोली, ‘‘क्यों न हम सजावट का सामान बना कर उसे ही बेचने की कोशिश करें?  झुमकी ने कितने आसान तरीके से इतनी सुंदर चीजें बनानी सिखाई थीं हमें. शायद यही हो हमारी समस्या का हल.’’

सुरेंद्र की परेशानी अनवर सम झता था, लेकिन दूर करने का उपाय नहीं मिल पा रहा था. उसे भी यह बात जंच गई. वह बोला, ‘‘आप लोग ऐसा कर सकते हैं, तो मैं आप की बात दफ्तर के पास दुकान लगाने वाले से करवा दूंगा. महेश नाम है उस का.’’

सुरेंद्र ने तुरंत हामी भर दी.

अनवर ने जल्दी ही महेश से सुरेंद्र को मिलवा दिया. महेश  झुमकी के हाथों से बना फूलदान देख कर बहुत प्रभावित हुआ. उस ने कहा कि अगर सुरेंद्र ऐसा ही सामान बना लेगा, तो वह सारा सामान उस से खरीद लेगा. वैसे भी उसे खरीदारी के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है. इस से किराए पर बहुत खर्च होता है और सामान टूटने पर नुकसान भी हो जाता है.

महेश की शर्त यही थी कि नया बनने वाला सामान भी फूलदान की टक्कर का हो. बेचने की जिम्मेदारी उस पर होगी. इस में दोनों का फायदा ही होगा.

अगले दिन से ही राधा ने  झुमकी द्वारा सिखाई गई एकएक बात को याद करते हुए काम करना शुरू कर दिया. सुरेंद्र भी उस की मदद कर रहा था. उन्होंने कागज भिगो कर रख दिए. राधा को याद आया कि  झुमकी ने उसे कुट्टी कला के एक और रूप के बारे में भी बताया था, जिस में गुब्बारा फुला कर उस पर कागज की कतरनें गोंद से चिपकाते हुए तकरीबन 7 परतें बना दी जाती हैं. सूखने पर गुब्बारे को फोड़ कर उस ढांचे को बराबर 2 भागों में काट कर दीवार पर सजाने वाले मुखौटे बनाए जाते हैं.

राधा ने सुरेंद्र से कई बड़ेबड़े गुब्बारे बाजार से मंगवा लिए और उन को फुला कर एकएक कर कागज की परतें  चिपका दीं.

कागज की मोटी परतें सूख गईं, तो मुलतानी मिट्टी गूंद कर ढांचे पर आंख, नाक व होंठ बना दिए और उन्हें फिर सुखाने के लिए रख दिया. सूखने पर  पेंट के डब्बों से रंग ले कर उन को रंग दिया गया.

सुरेंद्र ने अपना दिमाग लगाते हुए बोरी के रेशों से मुखौटों की भौंहें व बाल बनाए और बेकार पड़े बिजली के तारों से कानों में कुंडल पहना दिए. अपने बनाए मुखौटे देख कर उन की खुशी का ठिकाना न रहा.

कुछ दिनों बाद पानी में भीगे कागज जब गल गए तो  झुमकी के बताए तरीके से उन दोनों ने मिल कर छोटेछोटे पक्षी, जानवर, फोटो फ्रेम, फूलदान, गिफ्ट बौक्स और सजावट की अनेक चीजें बना कर तैयार कर लीं.

उन चीजों के सूख जाने पर राधा ने पुराना और बेकार सामान जैसे आईना, चूडि़यां, बिंदी व बटन वगैरह ले कर उन को सजा दिया

महेश ने जब उन सब चीजों को देखा, तो बहुत खुश हुआ. उस ने सामान ले जा कर जब अपनी दुकान में रखा तो पाया कि बाकी सामान के मुकाबले सुरेंद्र से खरीदे गए सामान की ओर लोग ज्यादा खिंच रहे हैं. जल्द ही उस ने यह बात सुरेंद्र को बता कर और चीजें बनाने का और्डर दे दिया.

राधा और सुरेंद्र मन ही मन  झुमकी का धन्यवाद करना नहीं भूले. राधा जानती थी कि  झुमकी के पिता कुट्टी कला में माहिर थे. उन के साथ बचपन से काम करती आ रही  झुमकी का हाथ इतना सधा हुआ था कि उस से सीखने के बाद ही आज राधा बेजोड़ सामान तैयार कर पाई है.

इस बार राधा ने मूर्तियां, खिलौने, कटोरे, प्लेट और सजावट की अनेक चीजें बनाईं. इस बार रंगने का काम सुरेंद्र ने किया. उस ने पेंट करने के लिए ब्रश के अलावा पेड़ के पत्तों, भिंडी के कटे भाग व फूलों की पंखुडि़यों का इस्तेमाल भी किया.

महेश के सामान को देख कर दूसरे कारोबारियों ने भी सुरेंद्र से सामान खरीदना शुरू कर दिया. धीरेधीरे धंधा खूब चमकने लगा. घर का नया कमरा, जो उन्होंने दुकान का सामान रखने के लिए बनाया था, उस में अब कुट्टी कला की मदद से सामान बनने लगा था.

झुमकी का अहसान वे न तो भूले थे और न ही भूलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने इस नए कारोबार को ‘ झुमकी कला निकेतन’ नाम दिया.

Hindi Story: चौराहे की काली

Hindi Story: ‘‘मेरी बीवी बहुत बीमार है पंडितजी…’’ धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘न जाने क्यों उस पर दवाओं का असर नहीं होता है. जब वह मुझे घूर कर देखती है तो मैं डर जाता हूं.’’ ‘‘तुम्हारी बीवी कब से बीमार है?’’ पंडित ने पूछा.

‘‘महीनेभर से.’’ ‘‘पहले तुम मुझे अपनी बीवी से मिलवाओ तभी मैं यह बता पाऊंगा कि वह बीमार है या उस पर किसी भूत का साया है.’’

‘‘मैं अपनी बीवी को कल सुबह ही दिखा दूंगा,’’ इतना कह कर धर्म सिंह चला गया. पंडित भूतप्रेत के नाम पर लोगों को बेवकूफ बना कर पैसे ऐंठता था. इसी धंधे से उस ने अपना घर भर रखा था.

अगली सुबह धर्म सिंह के घर पहुंच कर पंडित ने कहा, ‘‘अरे भाई धर्म सिंह, तुम ने कल कहा था कि तुम्हारी बीवी बीमार है. जरा उसे दिखाओ तो सही…’’ धर्म सिंह अपनी बीवी सुमन को अंदर से ले आया और उसे एक कुरसी पर बैठा दिया.

पंडित ने उसे देखते ही पैसा ऐंठने का अच्छा हिसाबकिताब बना लिया. सुमन के बाल बिखरे हुए और कपड़े काफी गंदे थे. उस की आंखें लाल थीं और गालों पर पीलापन छाया था. जो भी उस के सामने जाता, वह उसे ऐसे देखती मानो खा जाएगी.

पंडित सुमन की आंखें देख कर बोला, ‘‘अरे धर्म सिंह, मैं देख रहा हूं कि तुम्हारी बीवी पर बड़े भूत का साया है.’’ ‘‘कैसा भूत पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम नहीं समझ पाओगे कि इस पर किस किस्म का भूत है,’’ पंडित बोला. ‘‘क्या भूतों की भी किस्में होती हैं?’’

‘‘क्यों नहीं. कुछ भूत सीधे होते हैं, कुछ अडि़यल, पर तुम्हारी बीवी पर…’’ पंडित बोलतेबोलते रुक गया. ‘‘क्या बात है पंडितजी… जरा साफसाफ बताइए.’’

‘‘यही कि तुम्हारी बीवी पर सीधेसादे भूत का साया नहीं है. इस पर ऐसे भूत का साया है जो इनसान की जान ले कर ही जाता?है,’’ पंडित ने हाथ की उंगली उठा कर जवाब दिया. ‘‘फिर तो पंडितजी मुझे यह बताइए कि इस का हल क्या है?’’ धर्म सिंह कुछ सोचते हुए बोला.

पंडित ने हाथ में पानी ले कर कुछ बुदबुदाते हुए सुमन पर फेंका और बोला, ‘‘बता तू कौन है? यहां क्या करने आया है? क्या तू इसे ले कर जाएगा? मगर मेरे होते हुए तू ऐसा कुछ नहीं कर सकता.’’ ‘‘पंडितजी, आप किस से बातें कर रहे हैं?’’ धर्म सिंह ने पूछा.

‘‘भूत से, जो तेरी बीवी पर चिपटा है,’’ होंठों से उंगली सटा कर पंडित ने धीरे से कहा. ‘‘क्या भूत बोलता है?’’ धर्म सिंह ने सवाल किया.

‘‘हां, भूत बोलता है, पर सिर्फ हम से, आम आदमी से नहीं.’’ ‘‘तो क्या कहता है यह भूत?’’

‘‘धर्म सिंह, भूत कहता है कि वह भेंट चाहता है.’’ ‘‘कैसी भेंट?’’ यह सुन कर धर्म सिंह चकरा गया.

‘‘मुरगे की,’’ पंडित ने कहा. ‘‘पर हम लोग तो शाकाहारी हैं.’’

‘‘तुम नहीं चढ़ा सकते तो मुझे दे देना. मैं चढ़ा दूंगा,’’ पंडित ने रास्ता सुझाया. ‘‘पंडितजी, मुझे एक बात बताओ?’’

‘‘पूछो, क्या बात है?’’ ‘‘मेरी बीवी पर कौन सी किस्म का भूत है?’’

पंडित ने सुमन की तरफ उंगली उठाते हुए कहा, ‘‘इस पर ‘चौराहे की काली’ का असर है.’’ ‘‘क्या… ‘चौराहे की काली’,’’ धर्म सिंह की आंखें डर के मारे फैल गईं, ‘‘मेहरबानी कर के कोई इलाज बताएं पंडितजी.’’

‘‘जरूर. वह काली कहती है कि तुझे एक मुरगा, एक नारियल, 101 रुपए, बिंदी, टीका, कपड़ा और सिंदूर रात को 12 बजे चौराहे पर रख कर आना पड़ेगा.’’ ‘‘इतना सारा सामान पंडितजी?’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘हां, अगर ऐसा नहीं हुआ तो तेरी बीवी गई काम से,’’ पंडित तपाक से बोला. ‘‘जी अच्छा पंडितजी, पर इतना सामान और वह भी रात के समय, यह मेरे बस की बात नहीं है,’’ धर्म सिंह ने कहा.

‘‘तेरे बस की बात नहीं है तो मैं रख आऊंगा…’’ पंडित ने कहा, ‘‘शाम को सारा सामान लेते आना. मैं शाम को आऊंगा.’’ धर्म सिंह तैयारी करने में लग गया. हालांकि उस ने बीवी को डाक्टर से दवा भी दिला दी, पर वह पंडित को भी मौका देना चाहता था इसीलिए चौराहे पर जाने से मना कर दिया.

रात को पंडित पूरा सामान ले कर चौराहे पर रखने के लिए चल दिया. हवा के झोंके, झींगुरों का शोर और उल्लुओं की डरावनी आवाजें रात के सन्नाटे को चीर रही थीं.

पंडित जैसे ही चौराहे से 30 फुट की दूरी पर पहुंचा, उसी समय वहां 15-16 फुट ऊंची मीनार सी मूर्ति नजर आने लगी. वह कभी छोटी हो जाती तो कभी बड़ी. उस में से घुंघरू की खनखनाती आवाज भी आ रही थी. पंडित यह सब देख कर बुरी तरह घबरा गया. हिम्मत कर के उस ने पूछा, ‘‘क… क… कौन है तू?’’

‘‘मैं चौराहे की काली हूं,’’ मीनार से घुंघरूओं की झंकार के साथ एक डरावनी आवाज निकली. ‘‘तू… तू… क्या चाहती है?’’

‘‘मैं तुझे खाना चाहती हूं,’’ मीनार में से फिर आवाज आई. ‘‘क… क… क्यों? मेरी क्या गलती है?’’ पंडित ने डरते हुए पूछा.

‘‘क्योंकि तू ने लोगों से बहुत पैसा ऐंठा है. अब मैं तेरे खून से अपनी प्यास बुझाऊंगी,’’ कहतेकहते काली धीरेधीरे नजदीक आ रही थी. पंडित के हाथों से सामान तो पहले ही छूट चुका था. ज्यों ही उस ने मुड़

कर पीछे की तरफ भागना चाहा, उस का पैर धोती में अटक गया और वह

गिर पड़ा. जब पंडित को होश आया तो उस ने अपनेआप को बिस्तर पर पाया. वह उस समय भी चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ… बचाओ… चौराहे की काली मुझे खा जाएगी…’’

‘‘कौन खा जाएगी? कैसी काली पंडितजी?’’ पंडित के कानों में धर्म सिंह की आवाज गूंजी. पंडित ने आंखें खोलीं तो अपने सामने धर्म सिंह व गांव के तमाम लोगों को खड़ा पाया. पंडित फिर बोला, ‘‘चौराहे की काली.’’

‘‘नहीं पंडितजी, आप बिना वजह ही डर गए हैं. वह काली नहीं थी,’’ धर्म सिंह ने पंडित को थपथपाते हुए कहा. ‘‘तो फिर कौन थी वह?’’

‘‘वहां मैं था पंडितजी, आप तो यों ही डर रहे हैं,’’ धर्म सिंह ने कहा. ‘‘पर वह तो… कभी छोटी तो कभी बड़ी और घुंघरुओं की आवाज…’’ पंडित बड़बड़ाया, ‘‘न… न… नहीं, तुम नहीं हो सकते.’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता? मैं वही नजारा फिर दिखा सकता हूं,’’ इतना कह कर धर्म सिंह काला कपड़ा लगा लंबा बांस, जिस में घुंघरू लगे थे, ले आया. उस ने बांस से कपड़ा कभी ऊंचा उठाया तो कभी नीचा किया और खुद को बीच में छिपा लिया. तब जा कर पंडित को यकीन हुआ कि वह काली नहीं थी.

धर्म सिंह ने पंडित से कहा, ‘‘इस दुनिया में न तो भूत हैं और न ही चुड़ैल. यह सारा चक्कर तो सरासर मक्कारी और फरेब का है.”

Family Story: सच्चाई – आखिर क्यों मां नहीं बनना चाहती थी सिमरन?

Family Story: पड़ोस में आते ही अशोक दंपती ने 9 वर्षीय सपना को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन की दीदी बना दिया था. ‘‘तुम सचिन की बड़ी दीदी हो. इसलिए तुम्हीं इस की आसपास के बच्चों से दोस्ती कराना और स्कूल में भी इस का ध्यान रखा करना.’’ सपना को भी गोलमटोल सचिन अच्छा लगा था. उस की मम्मी तो यह कह कर कि गिरा देगी, छोटे भाई को गोद में भी नहीं उठाने देती थीं. समय बीतता रहा.

दोनों परिवारों में और बच्चे भी आ गए. मगर सपना और सचिन का स्नेह एकदूसरे के प्रति वैसा ही रहा. सचिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मणिपाल चला गया. सपना को अपने ही शहर में मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया था. फिर एक सहपाठी से शादी के बाद वह स्थानीय अस्पताल में काम करने लगी थी. हालांकि सचिन के पापा का वहां से तबादला हो चुका था. फिर भी वह मौका मिलते ही सपना से मिलने आ जाता था. सऊदी अरब में नौकरी पर जाने के बाद भी उस ने फोन और ईमेल द्वारा संपर्क बनाए रखा. इसी बीच सपना और उस के पति सलिल को भी विदेश जाने का मौका मिल गया. जब वे लौट कर आए तो सचिन भी सऊदी अरब से लौट कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था.

‘‘बहुत दिन लगा दिए लौटने में दीदी? मैं तो यहां इस आस से आया था कि यहां आप अपनी मिल जाएंगी. मम्मीपापा तो जबलपुर में ही बस गए हैं और आप भी यहां से चली गईं. इतने साल सऊदी अरब में अकेला रहा और फिर यहां भी कोई अपना नहीं. बेजार हो गया हूं अकेलेपन से,’’ सचिन ने शिकायत की. ‘‘कुंआरों की तो साथिन ही बेजारी है साले साहब,’’ सलिल हंसा, ‘‘ढलती जवानी में अकेलेपन का स्थायी इलाज शादी है.’’

‘‘सलिल का कहना ठीक है सचिन. तूने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’ सपना ने पूछा.

‘‘सऊदी अरब में और फिर यहां अकेले रहते हुए शादी कैसे करता दीदी? खैर, अब आप आ गई हैं तो लगता है शादी हो ही जाएगी.’’

‘‘लगने वाली क्या बात है, शादी तो अब होनी ही चाहिए… और यहां अकेले का क्या मतलब हुआ? शादी जबलपुर में करवा कर यहां आ कर रिसैप्शन दे देता किसी होटल में.’’

‘‘जबलपुर वाले मेरी उम्र की वजह से न अपनी पसंद का रिश्ता ढूंढ़ पा रहे हैं और न ही मेरी पसंद को पसंद कर रहे हैं,’’ सचिन ने हताश स्वर में कहा, ‘‘अब आप समझा सको तो मम्मीपापा को समझाओ या फिर स्वयं ही बड़ी बहन की तरह यह जिम्मेदारी निभा दो.’’ ‘‘मगर चाचीचाचाजी को ऐतराज क्यों है? तेरी पसंद विजातीय या पहले से शादीशुदा बालबच्चों वाली है?’’ सपना ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, स्वजातीय और अविवाहित है और उसे भविष्य में भी संतान नहीं चाहिए. यही बात मम्मीपापा को मंजूर नहीं है.’’

‘‘मगर उसे संतान क्यों नहीं चाहिए और अभी तक वह अविवाहित क्यों है?’’ सपना ने शंकित स्वर में पूछा. ‘‘क्योंकि सिमरन इकलौती संतान है. उस ने पढ़ाई पूरी की ही थी कि पिता को कैंसर हो गया और फिर मां को लकवा. बहुत इलाज के बाद भी दोनों को ही बचा नहीं सकी. मेरे साथ ही पढ़ती थी मणिपाल में और अब काम भी करती है. मुझ से शादी तो करना चाहती है, लेकिन अपनी संतान न होने वाली शर्त के साथ.’’

‘‘मगर उस की यह शर्त या जिद क्यों है?’’

‘‘यह मैं ने नहीं पूछा न पूछूंगा. वह बताना तो चाहती थी, मगर मुझे उस के अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो उसे सुखद भविष्य देना चाहता हूं. उस ने मुझे बताया था कि मातापिता के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए उस ने बहुत मेहनत की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया, जिस के लिए कभी किसी से या स्वयं से लज्जित होना पड़े. शर्त की कोई अनैतिक वजह नहीं है और वैसे भी दीदी प्यार का यह मतलब यह तो नहीं है कि उस में आप की प्राइवेसी ही न रहे? मेरे बच्चे होने न होने से मम्मीपापा को क्या फर्क पड़ता है? जतिन और श्रेया ने बना तो दिया है उन्हें दादादादी और नानानानी. फूलफल तो रही है उन की वंशबेल,’’ फिर कुछ हिचकते हुए बोला, ‘‘और फिर गोद लेने या सैरोगेसी का विकल्प तो है ही.’’

‘‘इस विषय में बात की सिमरन से?’’ सलिल ने पूछा. ‘‘उसी ने यह सुझाव दिया था कि अगर घर वालों को तुम्हारा ही बच्चा चाहिए तो सैरोगेसी द्वारा दिलवा दो, मुझे ऐतराज नहीं होगा. इस के बावजूद मम्मीपापा नहीं मान रहे. आप कुछ करिए न,’’ सचिन ने कहा, ‘‘आप जानती हैं दीदी, प्यार अंधा होता है और खासकर बड़ी उम्र का प्यार पहला ही नहीं अंतिम भी होता है.’’

‘‘सिमरन का भी पहला प्यार ही है?’’ सपना ने पूछा. सचिन ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हां दीदी, पसंद तो हम एकदूसरे को पहली नजर से ही करने लगे थे पर संयम और शालीनता से. सोचा था पढ़ाई खत्म करने के बाद सब को बताएंगे, लेकिन उस से पहले ही उस के पापा बीमार हो गए और सिमरन ने मुझ से संपर्क तक रखने से इनकार कर दिया. मगर यहां रहते हुए तो यह मुमकिन नहीं था. अत: मैं सऊदी अरब चला गया. एक दोस्त से सिमरन के मातापिता के न रहने की खबर सुन कर उसी की कंपनी में नौकरी लगने के बाद ही वापस आया हूं.’’ ‘‘ऐसी बात है तो फिर तो तुम्हारी मदद करनी ही होगी साले साहब. जब तक अपना नर्सिंगहोम नहीं खुलता तब तक तुम्हारे पास समय है सपना. उस समय का सदुपयोग तुम सचिन की शादी करवाने में करो,’’ सलिल ने कहा.

‘‘ठीक है, आज फोन पर बात करूंगी चाचीजी से और जरूरत पड़ी तो जबलपुर भी चली जाऊंगी, लेकिन उस से पहले सचिन मुझे सिमरन से तो मिलवा,’’ सपना ने कहा. ‘‘आज तो देर हो गई है, कल ले चलूंगा आप को उस के घर. मगर उस से पहले आप मम्मी से बात कर लेना,’’ कह कर सचिन चला गया. सपना ने अशोक दंपती को फोन किया. ‘‘कमाल है सपना, तुझे डाक्टर हो कर भी इस रिश्ते से ऐतराज नहीं है?  तुझे नहीं लगता ऐसी शर्त रखने वाली लड़की जरूर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से ग्रस्त होगी?’’ चाची के इस प्रश्न से सपना सकते में आ गई.

‘‘हो सकता है चाची…कल मैं उस से मिल कर पता लगाने की कोशिश करती हूं,’’ उस ने खिसियाए स्वर में कह कर फोन रख दिया.

‘‘हम ने तो इस संभावना के बारे में सोचा ही नहीं था,’’ सब सुनने के बाद सलिल ने कहा. ‘‘अगर ऐसा कुछ है तो हम उस का इलाज करवा सकते हैं. आजकल कोई रोग असाध्य नहीं है, लेकिन अभी यह सब सचिन को मत बताना वरना अपने मम्मीपापा से और भी ज्यादा चिढ़ जाएगा.’’

‘‘उन का ऐतराज भी सही है सलिल, किसी व्याधि या पूर्वाग्रस्त लड़की से कौन अभिभावक अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा? बगैर सचिन या सिमरन को कुछ बताए हमें बड़ी होशियारी से असलियत का पता लगाना होगा,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के घर जाने के बजाय उस से पहले कहीं मिलना बेहतर रहेगा. ऐसा करो तुम कल लंचब्रेक में सचिन के औफिस चली जाओ. कह देना किसी काम से इधर आई थी, सोचा लंच तुम्हारे साथ कर लूं. वैसे तो वह स्वयं ही सिमरन को बुलाएगा और अगर न बुलाए तो तुम आग्रह कर के बुलवा लेना,’’ सलिल ने सुझाव दिया. अगले दिन सपना सचिन के औफिस में पहुंची ही थी कि सचिन लिफ्ट से एक लंबी, सांवली मगर आकर्षक युवती के साथ निकलता दिखाई दिया.

‘‘अरे दीदी, आप यहां? खैरियत तो है?’’ सचिन ने चौंक कर पूछा.

‘‘सब ठीक है, इस तरफ किसी काम से आई थी. अत: मिलने चली आई. कहीं जा रहे हो क्या?’’

‘‘सिमरन को लंच पर ले जा रहा था. शाम का प्रोग्राम बनाने के लिए…आप भी हमारे साथ लंच के लिए चलिए न दीदी,’’ सचिन बोला.

‘‘चलो, लेकिन किसी अच्छी जगह यानी जहां बैठ कर इतमीनान से बात कर सकें.’’

‘‘तब तो बराबर वाली बिल्डिंग की ‘अंगीठी’ का फैमिलीरूम ठीक रहेगा,’’ सिमरन बोली. चंद ही मिनट में वे बढि़या रेस्तरां पहुंच गए. ‘बहुत बढि़या आइडिया है यहां आने का सिमरन. पार्किंग और आनेजाने में व्यर्थ होने वाला समय बच गया,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के सुझाव हमेशा बढि़या और सटीक होते हैं दीदी.’’

‘‘फिर तो इसे जल्दी से परिवार में लाना पड़ेगा सब का थिंक टैंक बनाने के लिए.’’ सचिन ने मुसकरा कर सिमरन की ओर देखा. सपना को लगा कि मुसकराहट के साथ ही सिमरन के चेहरे पर एक उदासी की लहर भी उभरी जिसे छिपाने के लिए उस ने बात बदल कर सपना से उस के विदेश प्रवास के बारे में पूछना शुरू कर दिया. ‘‘मेरा विदेश वृतांत तो खत्म हुआ, अब तुम अपने बारे में बताओ सिमरन.’’ ‘‘मेरे बारे में तो जो भी बताने लायक है वह सचिन ने बता ही दिया होगा दीदी. वैसे भी कुछ खास नहीं है बताने को. सचिन की सहपाठिन थी, अब सहकर्मी हूं और नेहरू नगर में रहती हूं.’’

‘‘अपने पापा के शौक से बनाए घर में जो लाख परेशानियां आने के बावजूद इस ने बेचा नहीं,’’ सचिन ने जोड़ा, ‘‘अकेली रहती है वहां.’’

‘‘डर नहीं लगता?’’

‘‘नहीं दीदी, डर तो अपना साथी है,’’ सिमरन हंसी. ‘‘आई सी…इस ने तेरे बचपन के नाम डरपोक को छोटा कर दिया है सचिन.’’ सिमरन खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘नहीं दीदी, इस ने बताया ही नहीं कि इस का नाम डरपोक था. किस से डरता था यह दीदी?’’ ‘‘बताने की क्या जरूरत है जब रातदिन इस के साथ रहोगी तो अपनेआप ही पता चल जाएगा,’’ सपना हंसी. ‘‘रातदिन साथ रहने की संभावना तो बहुत कम है, मैं मम्मीजी की भावनाओं को आहत कर के सचिन से शादी नहीं कर सकती,’’ सिमरन की आंखों में उदासी, मगर स्वर में दृढ़ता थी. सपना ने घड़ी देखी फिर बोली, ‘‘अभी न तो समय है और न ही सही जगह जहां इस विषय पर बहस कर सकें. जब तक मेरा नर्सिंगहोम तैयार नहीं हो जाता, मैं तो फुरसत में ही हूं, तुम्हारे पास जब समय हो तो बताना. तब इतमीनान से इस विषय पर चर्चा करेंगे और कोई हल ढूंढ़ेंगे.’’

‘‘आज शाम को आप और जीजाजी चल रहे हैं न इस के घर?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘अभी यहां से मैं नर्सिंगहोम जाऊंगी यह देखने कि काम कैसा चल रहा है, फिर घर जा कर दोबारा बाहर जाने की हिम्मत नहीं होगी और फिर आज मिल तो लिए ही हैं.’’

‘‘आप मिली हैं न, जीजाजी से भी तो मिलवाना है इसे,’’ सचिन बोला, ‘‘आप घर पर ही आराम करिए, मैं सिमरन को ले कर वहीं आ जाऊंगा.’’

‘‘इस से अच्छा और क्या होगा, जरूर आओ,’’ सपना मुसकराई, ‘‘खाना हमारे साथ ही खाना.’’ शाम को सचिन और सिमरन आ गए. सलिल की चुटकियों से शीघ्र ही वातावरण अनौपचारिक हो गया. जब किसी काम से सपना किचन में गई तो सचिन उस के पीछेपीछे आया.

‘‘आप ने मम्मी से बात की दीदी?’’

‘‘हां, हालचाल पूछ लिया सब का.’’

‘‘बस हालचाल ही पूछा? जो बात करनी थी वह नहीं की? आप को हो क्या गया है दीदी?’’ सचिन ने झल्ला कर पूछा. ‘‘तजरबा, सही समय पर सही बात करने का. सिमरन कहीं भागी नहीं जा रही है, शादी करेगी तो तेरे से ही. जहां इतने साल सब्र किया है थोड़ा और कर ले.’’ ‘‘इस के सिवा और कर भी क्या सकता हूं,’’ सचिन ने उसांस ले कर कहा. इस के बाद सपना ने सिमरन से और भी आत्मीयता से बातचीत शुरू कर दी. यह सुन कर कि सचिन औफिस के काम से मुंबई जा रहा है, सपना उस शाम सिमरन के घर चली गई. उस का घर बहुत ही सुंदर था. लगता था बनवाने वाले ने बहुत ही शौक से बनवाया था. ‘‘बहुत अच्छा किया तुम ने यह घर न बेच कर सिमरन. जाहिर है, शादी के बाद भी यहीं रहना चाहोगी. सचिन तैयार है इस के लिए?’’ ‘‘सचिन तो बगैर किसी शर्त के मेरी हर बात मानने को तैयार है, लेकिन मैं बगैर उस के मम्मीपापा की रजामंदी के शादी नहीं कर सकती. मांबाप से उन के बेटे को विमुख कभी नहीं करूंगी. प्रेम तो विवेकहीन और अव्यावहारिक होता है दीदी. उस के लिए सचिन को अपनों को नहीं छोड़ने दूंगी.’’

‘‘यह तो बहुत ही अच्छी बात है सिमरन. चाचाचाचीजी यानी सचिन के मम्मीपापा भी बहुत अच्छे हैं. अगर उन्हें ठीक से समझाया जाए यानी तुम्हारी शर्त का कारण बताया जाए तो वे भी सहर्ष मान जाएंगे. लेकिन सचिन ने उन्हें कारण बताया ही नहीं है.’’ ‘‘बताता तो तब न जब उसे खुद मालूम होता. मैं ने उसे कई बार बताने की कोशिश की, लेकिन वह सुनना ही नहीं चाहता. कहता है कि जब मेरे साथ हो तो भविष्य के सुनहरे सपने देखो, अतीत की बात मत करो. मुझे भी अतीत याद रखने का कोई शौक नहीं है दीदी, मगर अतीत से या जीवन से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे भी होते हैं जिन्हें चाह कर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उन के साथ जीना मजबूरी होती है.’’ ‘‘अगर चाहो तो उस मजबूरी को मुझ से बांट सकती हो सिमरन,’’ सपना ने धीरे से कहा. ‘‘मैं भी यही सोच रही थी दीदी,’’ सिमरन ने जैसे राहत की सांस ली, ‘‘अकसर देर से जाने और बारबार छुट्टी लेने के कारण न नौकरी पर ध्यान दे पा रही थी न पापा के इलाज पर, अत: मैं नौकरी छोड़ कर पापा को इलाज के लिए मुंबई ले गई थी. वहां पैसा कमाने के लिए वैक्यूम क्लीनर बेचने से ले कर अस्पताल की कैंटीन, साफसफाई और बेबी सिटिंग तक के सभी काम लिए. फिर मम्मीपापा के ऐतराज के बावजूद पैसा कमाने के लिए 2 बार सैरोगेट मदर बनी. तब तो मैं ने एक मशीन की भांति बच्चों को जन्म दे कर पैसे देने वालों को पकड़ा दिया था, लेकिन अब सोचती हूं कि जब मेरे अपने बच्चे होंगे तो उन्हें पालते हुए मुझे जरूर उन बच्चों की याद आ सकती है, जिन्हें मैं ने अजनबियों पर छोड़ दिया था. हो सकता है कि विचलित या व्यथित भी हो जाऊं और ऐसा होना सचिन और उस के बच्चे के प्रति अन्याय होगा. अत: इस से बेहतर है कि यह स्थिति ही न आने दूं यानी बच्चा ही पैदा न करूं. वैसे भी मेरी उम्र अब इस के उपयुक्त नहीं है. आप चाहें तो यह सब सचिन और उस के परिवार को बता सकती हैं. उन की कोई भी प्रतिक्रिया मुझे स्वीकार होगी.’’

‘‘ठीक है सिमरन, मैं मौका देख कर सब से बात करूंगी,’’ सपना ने सिमरन को आश्वासन दिया. सिमरन ने जो कहा था उसे नकारा नहीं जा सकता था. उस की भावनाओं का खयाल रखना जरूरी था. सचिन के साथ तो खैर कोई समस्या नहीं थी, उसे तो सिमरन हर हाल में ही स्वीकार थी, लेकिन उस के घर वालों से आज की सचाई यानी सैरोगेट मदर बन चुकी बहू को स्वीकार करवाना आसान नहीं था. उन लोगों को तो सिमरन की बड़ी उम्र बच्चे पैदा करने के उपयुक्त नहीं है कि दलील दे कर समझाना होगा. सचिन के प्यार के लिए इतने से कपट का सहारा लेना तो बनता ही है.

Hindi Story: मेरी छतरी के नीचे आ जा

Hindi Story, लेखक – अशोक कुमार ‘सुमन’

बरसात का मौसम था. लेकिन आसमान में बादलों का कहीं नामोनिशान नहीं था, इसलिए मैं ने छाता लेना जरूरी नहीं समझा.

मुझे शाम को घूमने की आदत है. हमारी कालोनी से कुछ दूरी पर हराभरा मैदान है, जहां पर बच्चे खेलते हैं. मैदान से कुछ दूर हट कर एक पार्क है.

मैं ने घड़ी पर नजर डाली. शाम के 5 बजे थे. मैं घूमने निकल पड़ा. ज्यों ही मैं मैदान के पास पहुंचा, तभी आसमान में कालेकाले बादल मंडराने लगे. फिर ठंडी हवा बहने लगी. हलकी बूंदाबांदी होनी शुरू हो गई.

मैं ने इधरउधर देखा, कहीं छिपने की जगह नहीं थी. मैं तेजी से अपने घर की ओर दौड़ने लगा.

तभी कानों में रस घोलती एक मीठी सी आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘ऐ मिस्टर…’’

मेरे पैर थम गए. पीछे मुड़ कर देखा, एक खूबसूरत जवान लड़की छाता लिए बुला रही थी. मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा. वह बला की खूबसूरत थी.

उस के नजदीक आते ही इत्र की दिलकश खुशबू नाक में समाती चली गई. वह अपनी आवाज में शहद घोलते हुए बोली, ‘‘आप अपने घर पहुंचतेपहुंचते भीग जाएंगे. प्लीज, मेरे छाते के नीचे आ जाइए.’’

मेरे दिमाग में फिल्म ‘तहलका’ का गाना कौंध गया, ‘मेरी छतरी के नीचे आ जा, क्यों भीगे रे…’

अंधे को चाहिए दो आंखें. मैं उस के छाते के नीचे चला गया. बारिश भी तेज हो गई थी. मैं उस से कुछ हट कर चल रहा था. छाते से टपक रहा पानी मेरे कपड़ों को भिगो रहा था.

वह मेरे हाथ को तकरीबन खींचते हुए बोली, ‘‘नजदीक चले आइए, भीग क्यों रहे हैं? क्या पहली बार आप किसी लड़की के साथ चल रहे हैं?’’ कहते हुए वह मेरे जिस्म से सट गई.

उस के जिस्म की छुअन से मैं सिहर उठा. सांसों में संगीत घुल गया. दिल में घंटियां बजनी शुरू हो गईं.

‘‘क्या लड़कियों से आप बोलते नहीं हैं?’’ उस ने बेतकल्लुफी से मेरे हाथ को दबा कर कहा.

मैं भी चहका, ‘‘बोलता क्यों नहीं… लेकिन, कौए की तरह ‘कांवकांव’ करने के बजाय एक बार कोयल की तरह कूक लेना ही बेहतर समझता हूं.’’

मेरी बात का बुरा न मान कर वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘शायद, आप का इशारा मेरी तरफ है?

‘‘नहींनहीं, आप बुरा न मानें. कहने का मतलब, इनसान को जरूरी हो, तभी बोलना चाहिए. आप की आवाज तो शहद की तरह मीठी है. सुनने वाले बागबाग हो जाते हैं,’’ मैं ने हौले से उस से कहा.

‘‘आप मेरी तारीफ कर रहे हैं या फिर मक्खन लगा रहे हैं?’’ कहते हुए अचानक दिलकश हंसी गूंजी.

मैं भी पूरी तरह खुल चुका था. मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘नहीं, आप डबलरोटी हैं क्या, जो मक्खन लगाऊंगा?’’

वह ठहाका लगा कर हंसी. फिर खास अंदाज के साथ वह बोली, ‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया. मुझे माधुरी कहते हैं.’’

‘‘क्या मधुर नाम है. नाम माधुरी, चेहरा भी माधुरी, आवाज भी माधुरी. हाय, मैं कहां आ गया हूं? चारों ओर मीठा ही मीठा नजर आ रहा है,’’ मैं ने फिल्मी स्टाइल में कहा.

‘‘वाह, आप तो बहुत ही दिलचस्प आदमी हैं,’’ वह चहकी.

‘‘पहली बार मैं ने यह जाना है.’’

‘‘क्या मुझे आप अपना नाम नहीं बताएंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘बंदे को अविनाश कहते हैं,’’ मैं ने चहकते हुए कहा.

‘‘अच्छा नाम है अविनाशजी, क्या आप छाता कुछ देर तक पकड़ सकते हैं? मेरे हाथ थक गए हैं,’’ वह मेरे चेहरे की ओर देखते हुए बोली.

मैं ने उस का छाता पकड़ लिया. वह मेरा हाथ पकड़ कर इस तरह चलने लगी, जैसे सालों से जानपहचान हो. मैं ने बुरा न माना. भला, मैं एक खूबसूरत लड़की का हाथ कैसे झटक सकता था और वह भी इस खुशगवार मौसम में.

अचानक वह बोली, ‘‘कहीं आप को बुरा तो नहीं लग रहा है…?’’

‘‘नहींनहीं, इस में बुरा मानने की क्या बात है? अगर आप मुझे अपने छाते में जगह न देतीं, तो मैं पूरी तरह भीग जाता. इस के लिए मैं आप का बहुत ज्यादा शुक्रगुजार हूं.’’

‘‘छोडि़ए इन बातों को… आप ने कभी किसी लड़की से मुहब्बत की है या नहीं?’’ उस ने धमाका सा किया.

इस सवाल पर मैं चौंक गया, तभी मेरे होंठों पर मुसकान थिरक गई. मैं ने शायराना अंदाज में कहा, ‘‘हाय, जब मुहब्बत का नाम सुनता हूं, कितना मलाल होता है…’’ फिर मैं ने भी धमाका किया, ‘‘क्या मैं आप के प्यार के काबिल नहीं हूं?’’

वह इठलाते हुए बोली, ‘‘मुझ में ऐसी क्या खूबी है, जो दो पलों में आप को मुझ से प्यार हो गया है?’’

मैं ने फिर शायराना अंदाज में यह शेर पढ़ा, ‘‘आप के इश्क में न तनहा, न दीवाना बने. जो देखे आप की सूरत, वह परवाना बने.’’

यह सुनते ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘बात करना तो कोई आप से सीखे.’’

‘‘आप की अदाओं ने ही मुझे बोलना सिखाया है.’’

अचानक वह फिसल पड़ी. अगर मैं उसे थाम न लेता, तो वह गिर पड़ती. वह मेरे जिस्म से लिपट गई. मेरा बदन फिर एकबारगी कांप गया. इत्र की तेज महक तनमन में आग लगा रही थी.

मुझे हैरत हो रही थी कि चंद पलों की पहचान में यह लड़की इतनी खुल क्यों रही है? लेकिन वह तुरंत मुझ से अलग हो गई और हसीन अदा के साथ बोली, ‘‘अगर आप मुझे थाम न लेते, तो इस गंदे पानी में कपड़ों के साथसाथ मेरा चेहरा भी खराब हो जाता.’’

मैं ने चुटकी ली, ‘‘अगर चांद पर दाग पड़ जाए, तो भी उस की खूबसूरती कम नहीं होती.’’

मेरे इस जुमले पर वह केवल मुसकरा कर रह गई. अब हलकी बूंदाबांदी हो रही थी. लेकिन ठंडी हवा का असर अब भी था. हम लोग बाजार के नजदीक पहुंच चुके थे.

‘‘आइए, किसी होटल में चलते हैं. ठंड लग रही है. चाय से गरमी आ जाएगी,’’ वह लटों से खेलती हुई बोली.

हम दोनों एक होटल में जा कर बैठ गए. उस वक्त वहां सिर्फ 3-4 अजनबी लोग ही बैठे थे. मैं ने चैन की सांस ली. फिर आमलेट और चाय का और्डर दिया.

आमलेट खाने के बाद चाय लेते हुए वह बोली, ‘‘कल आप कब मिलेंगे?’’

मैं ने तुरंत ही कहा, ‘‘यहीं, इसी होटल में शाम के समय…’’

वह मेरे मुंह से बात छीनते हुए बोली, ‘‘जब पानी बरस रहा हो और मैं छाता लिए खड़ी हूं,’’ कह कर वह खिलखिला कर हंस पड़ी.

मैं ने भी हंसी में उस का साथ दिया. फिर पूछा, ‘‘आप रहती कहां हैं माधुरीजी?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘रहने को घर नहीं है, सारा जहां हमारा.’’

वह मेरे सवाल को टाल गई. मैं ने भी कुरेदा नहीं.

वह अपनी नशीली आंखें मेरी आंखों में डाल कर बोली, ‘‘आप मुझे भूल तो नहीं जाएंगे न…?’’

मैं ने फिर एक बार शायराना अंदाज में कहा, ‘‘न कभी भूलूंगा आप को जिंदगी की छांव में. बसाए रखूंगा सदा यादों के गांव में. दो पल की मुलाकात रंग लाएगी एक दिन, हंसतीमुसकराती प्यार की छांव में.’’

वह खुश हो कर बोली, ‘‘आप से यही उम्मीद थी.’’

‘‘आप मुझे भले ही भूल जाएं, पर मैं इस मुलाकात को यादों के अलबम में हमेशा सजाए रखूंगा,’’ मैं तनिक भावुक हो कर बोला.

‘‘नहींनहीं, आप ऐसा क्यों बोलते हैं. मैं भी इस दिलकश मुलाकात को हमेशा याद रखूंगी,’’ वह भी उदास लहजे में बोली.

अब बारिश थम चुकी थी. मैं ने घड़ी पर नजर डाली, 6 बज चुके थे. मैं ने होटल का बिल चुकाने के लिए जेब में हाथ डाला, लेकिन बटुआ नदारद था.

मैं ने हड़बड़ा कर सभी जेबों में हाथ डाला, पर बटुए का कहीं पता नहीं था. मेरे तो होश ही उड़ गए.

वह आराम से बोली, ‘‘क्या पैसे नहीं हैं? मैं दे देती हूं.’’

मैं ने रोनी सूरत बना कर कहा, ‘‘नहींनहीं, बटुआ तो मैं लाया था. शायद, दौड़ते वक्त गिर गया हो.’’

वह दोबारा बोली, ‘‘छोडि़ए, मैं दे देती हूं. मैं किस दिन काम आऊंगी?’’

इतना कह कर उस ने पैसे दे दिए. मैं ने दिल ही दिल में उस की तारीफ की और महसूस किया कि सूरत के साथ उस की सीरत भी लाजवाब है.

होटल से दोनों बाहर आ गए. उस ने कल मिलने का वादा करते हुए अपना गोरा हाथ आगे बढ़ाया. मैं ने भी अपना हाथ आगे बढ़ा कर ज्यों ही उस के हाथ से मिलाया, उस ने हलके से मेरे हाथ को दबाते हुए कहा, ‘‘आप भी मुझे खूब याद करेंगे कि एक अजनबी लड़की से मुलाकात हुई थी,’’ और एक दिलकश अदा के साथ दाईं आंख दबा कर वह मुसकराते हुए चलती बनी.

मैं उसे जाते हुए ठगा सा देखता रह गया.

इत्र की दिलकश खुशबू दूर होती चली गई, पर उस मुलाकात की कसक दिल में कैद थी.

मैं एक पान की दुकान पर जा कर पान लगवाने लगा. दुकान में लगे लंबेचौड़े आईने में मेरी माशूका की ही तसवीर दिख रही थी. उस ने 15-20 कदम आगे जा कर जेब से जो बटुआ निकाला, तो मैं हैरत से भर गया. वह बटुआ मेरा ही था.

दिल पर हथौड़ा सा बजा. सारी उम्मीदें बालू के घरौंदे की तरह हवा में एक झोंके से भरभरा कर गिर गईं.

अब मेरी समझ में आया कि वह किसलिए मुझ से लिपटी थी. मासूम और सुंदर चेहरे भी इनसान को किस तरह से छलते हैं, पहली बार मालूम हुआ.

वह मेरी जेब से 1,000 रुपए साफ कर चुकी थी. उस की इस हरकत से मेरे दिल में ठेस सी लगी. पर इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उस से पूछूं कि उस ने ऐसा क्यों किया?

चलतेचलते वह मेरी जेब साफ कर लेती तो मुझे इतना दुख न होता. लेकिन उस ने मीठीमीठी बातों में उलझा कर प्यार का एहसास जगा कर जेब साफ कर ली. इसी बात से मुझे काफी दुख हो रहा था.

बादल बिलकुल साफ हो चुके थे, जैसे मेरे जेब से बटुआ साफ हो गया था. उस ने बटुए से रुपए निकाल कर नाजुक उंगलियों से गिन कर उन्हें होंठों से लगा लिया. फिर बटुए को इस तरह नाली की ओर उछाल दिया, जैसे दिल और दिमाग से मुझे ही निकाल कर फेंक दिया हो.

मैं सड़क पर कुछ देर तक यों ही खड़ा रहा. होश तब आया, जब एक कार के पहिए गड्ढे में पड़ने से गंदा पानी मेरे चेहरे और कपड़ों पर पड़ा.

वहां मौजूद सभी लोग मेरी हालत देख कर हंसने लगे. मैं ने वहां से खिसकने में ही भलाई समझी.

तभी पनवाड़ी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘भाई साहब, पान तो लेते जाइए.’’

लेकिन ऐसी हालत में मैं पान कैसे खाता, खिसिया कर एक सिक्का उस की तरफ उछाल दिया. मैं खिसकने को हुआ, तो पनवाड़ी ने मजा लेते हुए कहा, ‘‘वाह, आप कितने खूबसूरत लग रहे हैं. बस एक कमी है तो पान की, आप को देख कर तो कोई हसीना लट्टू की तरह नाचने लगेगी.’’

तभी दूसरी आवाज आई, ‘‘वाह, क्या पोज है, भागिएगा नहीं. भाई साहब, कैमरामैन को अभी बुलाता हूं,’’ यह बात सुन कर वहां मौजूद सभी आदमी ‘होहो’ कर के हंसने लगे.

जब मैं ने अपना चेहरा पनवाड़ी की दुकान में लगे आईने की तरफ उठाया, तो कीचड़ से भरे चेहरे को देख कर बुरी तरह झेंप गया.

मैं ने वहां और ज्यादा देर तक ठहरना मुनासिब नहीं समझा. वहां से इस तरह भागा कि जैसे लोगों का ठहाका काला नाग बन कर मेरा पीछा कर रहा हो.

जब मैं अपनी कालोनी में पहुंचा, तो वहां भी भरपूर ठहाका लगा. तब मैं और भी तेज रफ्तार से दौड़ा और गुसलखाने में जा कर ही दम लिया.

मुहब्बत का सारा नशा काफूर हो चुका था. मैं ने तय किया कि फिर कभी मैं इश्क और हुस्न के चक्कर में नहीं पड़ूंगा.

Love Story: फेसबुक का प्यार

Love Story, लेखक – शकील प्रेम

मेरी जेठानी गुलशन बहुत ही खूबसूरत थीं. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद भी उन का रंगरूप ऐसा था कि कोई भी फिदा हो जाए. मैं ही क्या, रिश्तेदारी की ज्यादातर बहुएं उन से जलती थीं.

मेरे शौहर जुनैद और उन के बड़े भाई जावेद एक ही घर में रहते थे, लेकिन घर का बंटवारा हो चुका था. एक ही मकान के 2 हिस्से हो गए थे. एक तरफ मेरे जेठ रहते थे, तो वहीं दूसरी तरफ हम लोग. खाना अलगअलग बनता था, लेकिन बाकी चीजों में दोनों भाइयों की सांझा भागीदारी थी.

दोनों भाई अच्छी नौकरी में थे. बड़े भाई यानी मेरे जेठ जावेद अली मांबाप का खर्च उठाते थे, तो मेरे शौहर जुनैद पर मेरी ननद आएशा की पढ़ाई और उस की शादी की जिम्मेदारी थी. मेरी जेठानी गुलशन के दोनों बच्चे महंगे स्कूल में पढ़ते थे.

मेरी शादी को 5 साल हुए थे, लेकिन मेरे अभी कोई बच्चा नहीं हुआ था. इस के लिए मेरा इलाज चल रहा था. मैं ने पोस्ट ग्रेजुएशन की हुई थी. साथ ही, ब्यूटीशियन का एक साल का डिप्लोमा भी किया हुआ था.

मेरे शौहर जुनैद एक प्राइवेट बैंक में कैशियर की पोस्ट पर थे. शादी के बाद 6 महीने तक तो मैं ने कुछ नहीं किया, लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि घर में खाली पड़े रहना ठीक नहीं.

एक दिन मैं ने अपने शौहर जुनैद से कहा, ‘‘आप ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो मैं दिनभर घर में रह कर बोर हो जाती हूं. हमारा जो बाहर वाला कमरा है, जिस में पहले आप के मम्मीपापा रहते थे. वे दोनों तो अब बड़े भैया के घर रहने चले गए हैं. कमरा बिलकुल खाली पड़ा है. वह कमरा बाहर सड़क से लगता है. मैं उस कमरे को दुकान के रूप में बदलने की सोच रही हूं, ताकि अपना ब्यूटीपार्लर खोल सकूं.’’

मेरे शौहर को भी मेरा यह आइडिया काफी पसंद आया और अगले ही दिन उन्होंने कमरे को दुकान में बदलने के लिए मजदूरों को काम पर लगा दिया.

2 हफ्तों के भीतर ही मेरी नई दुकान तैयार हो चुकी थी. मैं ने अपने शौहर से एक लाख रुपए लिए और दुकान में ब्यूटी का सारा सामान रख लिया.

कुछ ही समय में मेरी दुकान चलने लगी. अब पूरे दिन मैं अपनी दुकान संभालती और मेरी ननद आएशा भी मेरे साथ मेरा हाथ बंटाती.

मेरी जेठानी गुलशन को बननेसंवरने का खूब शौक था. मेरे ब्यूटीपार्लर से उन्हें बड़ा फायदा हुआ था. वे रोज ही दुकान पर आतीं और आएशा से अपना मेकअप करवा कर चली जातीं.

वैसे, मेरी जेठानी मुझ से ज्यादा खूबसूरत थीं, लेकिन मुझ से कम पढ़ीलिखी थीं. मैं अपनी जेठानी जितनी खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन मुझे इस बात की खुशी थी कि मैं अपनी जेठानी से ज्यादा पढ़ीलिखी थी.

मेरी जेठानी गुलशन की शादी को 10 साल बीत चुके थे. वे सब से यही कहती थीं कि जब वे 16 साल की थीं, तब उन की शादी हुई थी. इस हिसाब से मेरी जेठानी अभी केवल 26 साल की थीं. कई लोग तो उन की इस बात के झांसे में भी आ चुके थे, लेकिन मैं जानती थी कि मेरी जेठानी अपनी जिंदगी के कम से कम 10 साल छिपा रही हैं.

मेरी जेठानी गुलशन कुछ दिनों से फेसबुक पर बड़ी ऐक्टिव नजर आ रही थीं. उन का अकाउंट खंगाला तो मालूम हुआ कि वे गुलफाम के नाम से फेसबुक पर अभी हाल ही में ऐक्टिव हुई हैं.

मुझे शरारत करने की सूझी. अनवर के नाम से मैं ने अपनी एक फेक आईडी बनाई और जेठानी के फोटो पर लाइक और कमैंट करने लगी. इस तरह 2 महीने बीत गए.

जेठानी की फालतू शायरी को पसंद करने वाले लोगों में उन के मायके वालों के अलावा बस एक अनवर ही था और यह अनवर कोई और नहीं, बल्कि मैं थी.

2 महीने बाद एक दिन यों ही मैं ने जेठानी के मैसेंजर में जा कर लिख दिया, ‘गुलफामजी… आप का असली नाम गुलशन है. मैं आप को स्कूल के वक्त से जानता हूं. आप बहुत खूबसूरत हैं… मैं आप को दिल दे बैठा हूं… अगर आप को यह मैसेज अच्छा न लगे, तो आप मुझे ब्लौक कर दीजिएगा…’

इस मैसेज को मेरी जेठानी गुलशन ने पढ़ा, लेकिन रिप्लाई नहीं किया. मुझे लगा कि वे अनवर को यानी मुझे ब्लौक करेंगी, लेकिन 2 दिन बाद रिप्लाई आ गया. उन्होंने लिखा, ‘अनवरजी… आप को जान कर हैरानी होगी कि मैं शादीशुदा हूं और मेरे 2 बच्चे हैं.’

मैं ने भी अनवर की ओर से झट से रिप्लाई दे दिया. मैं ने लिखा, ‘मैं यह सब जानता हूं गुलशनजी, फिर भी आप से प्यार करता हूं. जरूरी नहीं कि आप भी मुझ से इश्क करें, लेकिन मैं तो आप को हमेशा चाहता रहूंगा.

‘हम दोनों हाईस्कूल में एकसाथ पढ़ते थे, तभी से मैं आप से प्यार करता हूं. आप मुझे नहीं जानती हैं, लेकिन मैं तो आप को पहचान गया था. आई लव यू गुलफामजी.’

इस मैसेज के बाद तो मुझे पक्का यकीन था कि मेरी जेठानी मुझे ब्लौक कर देंगी. लेकिन शाम को ही उन का रिप्लाई आया. उन्होंने लिखा, ‘मैं तो तुम्हें नहीं पहचान पा रही. हाईस्कूल के समय का अगर कोई फोटो हो, तो मुझे भेजो… शायद पहचान जाऊं.’

जेठानी के इस मैसेज के बाद मैं ने गूगल से किसी स्कूल की कुछ ग्रुप फोटो को ढूंढ़ा और जेठानी के इनबौक्स में सैंड करते हुए लिखा, ‘गुलशनजी, इन फोटो को देख कर याद करो. और अगर याद न आए तो मुझे भूल जाओ, लेकिन मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊंगा.’

शाम को जब मेरी जेठानी गुलशन मेकअप के लिए मेरी दुकान पर आईं, तो मैं ने उन से यों ही पूछा, ‘‘गुलशन बाजी, आजकल आप फेसबुक पर काफी ऐक्टिव नजर आ रही हैं. लगता है कि फेसबुक पर भी आप के दीवानों की कोई कमी नहीं है.’’

जेठानी गुलशन बोलीं, ‘‘बस यों ही खाली बैठ कर क्या करूं, तो फेसबुक पर ही थोड़ा समय दे देती हूं.’’

पूरे दिन मेरी ननद आएशा मेरे साथ मेरी दुकान पर ही रहती. आएशा का बौयफ्रैंड नौशाद जब भी उसे मिलने के लिए बुलाता, वह मुझे बता कर दुकान से निकल जाती.

दुकान खुलने के बाद से हम दोनों ननदभौजाई में काफी बनने लगी थी. मैं आएशा से अपने दिल की बातें शेयर करती, तो वह भी मुझे अपने इश्क की सारी बातें बताती.

आएशा और नौशाद की जोड़ी काफी अच्छी थी. जाति के अलावा दोनों की शादी में कोई अड़चन नहीं थी. मैं किसी तरह के जातिवाद को नहीं मानती थी. मेरे शौहर जुनैद को भी ये सब बातें फिजूल की लगती थीं, लेकिन बात जब आएशा की शादी की होती, तो मेरे जेठ समेत पूरे घर वालों के अंदर का जातिवाद जाग जाता.

बड़े भैया जावेद अली को अपने अशरफ मुसलमान होने का खासा गुरूर था. जेठानी गुलशन भी अपनी ऊंची जाति पर घमंड रखती थीं. समस्या यह थी कि आएशा का बौयफैं्रड नौशाद जाति से पसमांदा था.

एक दिन नौशाद कुछ किताबें देने के बहाने घर आया हुआ था और मेरी जेठानी ने नौशाद को आएशा के साथ घर में देख लिया था. नौशाद की जाति के बारे में जान कर गुलशन आगबबूला हो गई थीं और नौशाद को बेइज्जत कर घर से निकाल दिया था.

अगले दिन मैं अपनी दुकान पर एक महिला कस्टमर की थ्रैडिंग में लगी थी कि इनबौक्स में जेठानी का मैसेज देखा और मैं सामने बैठी महिला की थ्रैडिंग छोड़ कर जेठानी का मैसेज खोल कर पढ़ने लगी.

जेठानी गुलशन ने लिखा था, ‘अनवर, हाईस्कूल का फोटो देख कर मैं तुम्हें पहचान गई. आजकल क्या कर रहे हो?’

मैं ने रिप्लाई किया, ‘गुलशनजी, आजकल मैं दिल्ली में ही हूं. यहीं नौकरी कर रहा हूं और मुझे पता है कि आप भी द्वारका में ही रहती हैं. मैं ने भी आप के नजदीक ही फ्लैट लिया हुआ है. चाहो तो कल शाम को हम द्वारका सैक्टर 9 के पार्क में मिल सकते हैं.’

मैसेज के सैंड होने तक सामने बैठी महिला की आवाज मेरे कानों में आई, ‘‘मुझे जल्दी है. शाम को हमें शादी में जाना है.’’

मैं ने तुरंत फेसबुक बंद किया और अपने काम में लग गई.

थोड़ी देर में जेठानी का रिप्लाई आया कि कल शाम को वे सैक्टर 9 के पार्क में पहुंच जाएंगी.

अपने ब्यूटीपार्लर से थोड़ी फुरसत निकाल कर मैं बहाने से गुलशन के घर में गई, ताकि उन के चेहरे पर अनवर से इश्क की खुमारी को देख सकूं.

जेठानी अपने किचन में थीं. मैं ने कहा, ‘‘बाजी, आप के फ्रिज में दही हो, तो थोड़ी सी दो, मुझे दही की जरूरत है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘फ्रिज में दही पड़ी होगी, निकाल लो.’’

फ्रिज से दही निकालते हुए मैं बोली, ‘‘कल फेसबुक पर जो आप ने अपना फोटो डाला है न. गजब लग रही हैं आप. मैं ने उस लाइक भी किया है.’’

मेरे मुंह से अपनी तारीफ सुन कर जेठानी मुसकरा दीं और बोलीं, ‘‘मैं आजकल थोड़ी मोटी हो गई हूं. मेरा मोटापा फोटो में साफ झलक रहा है.’’

मैं बोली, ‘‘अरे, नहीं दीदी. आप के जैसी फिगर तो हीरोइनों की भी नहीं है.’’

यह सुन कर गुलशन और जोर से मुसकरा दीं और बोलीं, ‘‘अरे, नहीं रेहाना. थोड़ी सी तो मोटी हो गई हूं, इसलिए सोच रही हूं कि कल शाम को तुम से थ्रैडिंग करवाने के बाद जौगिंग पर निकलूं. द्वारका सैक्टर 9 वाला पार्क यहां से कितनी दूर है?’’

जेठानी के मुंह से यह सुन कर मैं हैरान रह गई. मैं ने कहा, ‘‘नजदीक ही है. बाहर से बैटरी वाला रिकशा पकड़ लेना, 10 रुपए लेगा और द्वारका सैक्टर 9 के पार्क पर छोड़ देगा.

‘‘ऐसा करना, जब आप निकलो तो मुझे भी बता देना. मैं भी आप के साथ जौगिंग पर चलूंगी. तब तक आएशा दुकान संभाल लेगी.’’

जेठानी ने कहा, ‘‘मैं कल शाम को अकेली जा कर पहले पार्क का मुआयना कर आती हूं रेहाना. उस के अगले दिन से हम दोनों साथ चलेंगे…’’

जेठानी की बातों से मैं समझ गई थी कि मेरा तीर बिलकुल सही निशाने पर लगा है. मैं अपने घर पर लौट आई और सीधे दुकान पर गई, तो वहां आएशा एक औरत का मेकअप कर रही थी.

रात के 9 बज चुके थे और मेरे शौहर भी घर आ चुके थे, इसलिए मैं ने आएशा से दुकान बंद करने को कहा और अपने कमरे में आ गई, जहां मेरे शौहर रात का खाना खाने बैठ चुके थे.

मुझे कमरे में देखते ही उन्होंने कहा, ‘‘आएशा की शादी के लिए भैया ने अपनी कंपनी के मैनेजर से बात की है. उन के मैनेजर का एक बेटा अनवर है, जो बैंगलुरु में रहता है और अनवर इस वक्त दिल्ली आया हुआ है.’’

आएशा दुकान बंद कर अपने कमरे की ओर जा ही रही थी कि उस ने अपने भैया की बात सुन ली और यह सुन कर उस के कान खड़े हो गए. वह मेरे कमरे में आई और मेरी ओर देखने लगी.

‘‘मैं ने अपने शौहर जुनैद से कहा, ‘‘आएशा की शादी के लिए भैया को इतनी जल्दी क्यों है? अभी वह पढ़ रही है, साथ ही मेरे साथ ब्यूटीशियन का काम भी सीख रही है. फिर आएशा की शादी की जिम्मेदारी तो हमारे जिम्मे है, वे क्यों इतना टैंशन लेते हैं?

‘‘शादी का खर्च हमारे जिम्मे है, इस का यह मतलब नहीं कि भैया आएशा की शादी के बारे में न सोचें… आएशा उन की भी बहन है… भैया को लगता है कि आएशा की जल्द शादी न हुई तो…’’

मैं अपने शौहर की बात को बीच में ही काटते हुए बोल पड़ी, ‘‘तो वह भाग जाएगी और भैया की नाक कट जाएगी… यही न…’’

तभी आएशा अपने भैया के करीब आ गई और बोली, ‘‘भैया, आप बड़े भैया को किसी तरह समझा दीजिए… बड़े भैया को अपनी इज्जत की ज्यादा फिक्र है न… तो आप से वादा कर रही हूं कि मैं किसी के साथ भाग कर शादी नहीं करूंगी… लेकिन, मेरा रिश्ता कहीं और होगा, तो मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी.’’

जुनैद ने अपनी छोटी बहन की बात सुन कर उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘तू क्यों टैंशन ले रही है… तेरी शादी नौशाद से ही होगी… तू नौशाद से बोल कि वह अपने घर वालों को राजी करे.’’

आएशा बोली, ‘‘नौशाद और उस के घर वाले तो हमारी शादी के लिए कब से तैयार बैठे हैं… वे तो जब आप लोग कहेंगे, तब रिश्ता ले कर यहां पहुंच जाएंगे.’’

अगले दिन रविवार होने की वजह से दोनों भाइयों की छुट्टी थी. सुबहसुबह ही मेरे जेठ और मेरी जेठानी दोनों मेरे घर आ गए और आएशा के रिश्ते के बारे में बताने लगे.

जेठ बोले, ‘‘अनवर बहुत अच्छा लड़का है. मेरे मैनेजर का एकलौता बेटा है वह… बैंगलुरु में रहता है और एक अच्छी कंपनी में है… अभी वह दिल्ली आया हुआ है… आज दोपहर तक मैनेजर बाबू अपनी बीवी और बेटे अनवर के साथ आएशा को देखने के लिए यहां आ रहे हैं…

‘‘मेरे घर में ही उन लोगों की खातिरदारी का इंतजाम हो जाएगा… जब वे लोग आ जाएंगे, तो तुम दोनों मियांबीवी आएशा को ले कर मेरे घर ही आ जाना.’’

आएशा ने जब यह सुना, तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वह अपने कमरे में जा कर रोने लगी. मैं उसे समझाने उस के कमरे में गई और बोली, ‘‘आएशा, तू अपनी भाभी पर भरोसा कर. तेरी शादी नौशाद से ही होगी.’’

आएशा रोते हुए बोली, ‘‘लेकिन, कैसे भाभी…? बड़े भैया तो अनवर से मेरी शादी तय कर रहे हैं. दुनिया में ऐसा कोई नहीं है, जो बड़े भैया को समझा सके.’’

मैं ने आएशा के ऊपर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘एक आदमी है, जो तुम्हारे भैया को समझा सकता है.’’

आएशा बोली, ‘‘कौन…?’’

मैं बोली, ‘‘तुम्हारी बड़ी भाभी गुलशन…’’

आएशा ने कहा, ‘‘लेकिन, गुलशन भाभी खुद ही घोर जातिवादी हैं. वे कहती हैं कि अपने से नीची जाति में शादी करने वाले की औलादें दोजख में जाती हैं. वे कैसे नौशाद से मेरी शादी के लिए राजी होंगी…? आप भूल गईं कि उस दिन कितना ड्रामा किया था बड़ी भाभी ने…’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम अपने दिमाग पर ज्यादा जोर मत दो. सब मुझ पर छोड़ दो और बड़े भैया के घर जाने के लिए तैयार हो जाओ.’’

आएशा को मुझ पर पूरा भरोसा था, इसलिए वह बड़े भैया के घर जाने के लिए राजी हो गई. बड़े भैया के मैनेजर दोस्त के लड़के का नाम भी अनवर था, यह जान कर मेरे शैतानी दिमाग में एक जबरदस्त आइडिया घूमने लगा.

मैं ने अपनी जेठानी को मैसेज टाइप किया, ‘गुलशनजी, कल शाम पार्क का प्लान कैंसिल समझिए, क्योंकि मुझे अपने मांबाप के साथ द्वारका सैक्टर 2 में लड़की देखने जाना है, वहीं शाम हो जाएगी.’

इस मैसेज के सैंड होने के बाद जेठानी का तुरंत रिप्लाई आया, ‘द्वारका सैक्टर 2 में आप किस के यहां जा रहे हैं?’

मैं ने लिखा, ‘जावेद अली के यहां.’

जेठानी ने लिखा, ‘जावेद अली तो मेरे हसबैंड हैं… दरअसल, आप मेरी ननद आएशा को देखने आ रहे हैं.’

मैं ने अनवर बन कर लिखा, ‘ओह… गुलशनजी… असल में मैं कहीं शादी करना नहीं चाहता, क्योंकि मैं सिर्फ आप से प्यार करता हूं, लेकिन क्या करूं? यह बात मैं अपने पेरेंट्स को कैसे समझाऊं? घर वाले जबरदस्ती मुझे लड़की देखने ले जा रहे हैं…

‘देखिए, मैं आप की ननद से शादी नहीं कर सकता. कल दोपहर आप के घर आऊंगा जरूर. इसी बहाने आप के दीदार भी हो जाएंगे…’

जेठानी गुलशन ने लिखा, ‘आएशा मेरे जितनी खूबसूरत तो नहीं है, लेकिन बहुत ही अच्छी लड़की है. चाहो तो उसे पसंद कर लेना.’

मैं ने लिखा, ‘मैं आप के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता… जो आप ने कल फेसबुक पर फोटो डाला था न… हो सके तो कल वही पीली वाली साड़ी पहन लेना.’

दोपहर तक आएशा और मैं तैयार हो कर बगल में जेठानी के घर पहुंच चुके थे. मेरी जेठानी ने पीली साड़ी पहनी हुई थी, जिस में वे बड़ी खूबसूरत लग रही थीं.

थोड़ी देर में ही घर के बाहर एक कार आ कर रुकी. उस में एक जवान लड़के के साथ 2-3 लोग और थे. वे अनवर और उस के मम्मीपापा थे.

अनवर काफी हैंडसम लग रहा था. अनवर को देखते ही मेरी जेठानी मचलने लगीं. किसी न किसी बहाने बारबार वे अनवर के सामने जातीं. मेरे सासससुर, जेठ और मेरे पति ड्राइंगरूम में बैठे हुए थे. अनवर के मम्मीपापा भी सामने ही बैठे थे.

थोड़ी देर में मेरी जेठानी भी अनवर के बिलकुल सामने बैठ गईं. मेहमानों की खातिरदारी अब मेरी और आएशा की जिम्मेदारी थी.

मेरे सासससुर को अनवर पसंद आया और अनवर के घर वालों को भी आएशा पसंद आ गई. लड़के वालों ने मेरे जेठ से कुछ वक्त मांगा और सभी विदा होने लगे. जेठानी तो अनवर के इर्दगिर्द से हट ही नहीं रही थीं.

सभी के चले जाने के बाद घर में देर तक अनवर और उस के परिवार वालों की बातें होती रहीं. मेरे जेठ तो अनवर के परिवार की तहजीब की बड़ाई करते थक नहीं रहे थे. लेकिन जेठानी खामोश थीं. वे न जाने किन खयालों में खोई हुई थीं. शायद इश्क का बुखार कुछ ज्यादा ही चढ़ गया था उन पर.

मैं वाशरूम में गई और जेठानी को एक मैसेज टाइप करते हुए लिखा, ‘गुलशन, मेरी जान… तुम तो गजब लग रही थी आज… तुम्हें देखने के बाद से मैं तो पागल हो गया हूं… मेरे घर वालों को आएशा पसंद है… इस वक्त कार में बैठे मेरे मम्मीपापा तुम्हारे घर के बड़प्पन की ही बातें कर रहे हैं…

‘मैं आप के प्यार में इस कदर डूब चुका हूं कि आप मुझे हर जगह पीली साड़ी में नजर आ रही हैं… ऐसा कुछ कीजिए न कि यह शादी न हो पाए. आई लव यू.’

जेठानी को मैसेज टाइप कर मैं ड्राइंगरूम में आई, तो जेठानी अपने चेहरे पर मुहब्बत की ताजगी लिए अनवर के मैसेज में गुम थीं.

मैं ने जेठानी से पूछा, ‘‘दीदी, आप को लड़का कैसा लगा?’’

वे बोलीं, ‘‘मैं क्या बोलूं? कुछ कहूंगी, तो तुम्हारे जेठजी को मिर्ची लग जाएगी.’’

वहीं बैठे जेठजी बोले, ‘‘अरे, बोलो गुलशन… तुम्हें यह रिश्ता पसंद नहीं आया क्या?’’

मेरी जेठानी बोलीं, ‘‘रिश्ते में कोई कमी नहीं है, लेकिन कभी आप ने आएशा के मन की बात जानने की कोशिश की है…? वह नौशाद से प्यार करती है… नौशाद हमारी आएशा के लिए एकदम अच्छा लड़का है… मैं तो मिली भी हूं उस से… लेकिन, तुम्हारे सिर पर जातिवाद का भूत चढ़ा है, इसलिए इतने अच्छे लड़के को तुम नकार रहे हो…’’

मेरी जेठानी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मेरे शौहर जुनैद तो हैरान थे ही, आएशा उन से ज्यादा हैरान थी. वह अपनी बड़ी भाभी का यह रूप देख कर हैरानी भरी मुसकान के साथ मेरी ओर देखने लगी.

मेरे सासससुर भी मेरी जेठानी की बातों से सहमत नजर आने लगे थे. कुछ ही देर में मेरी सास अपनी जगह से उठीं और अपने बड़े बेटे के हाथों को पकड़ कर बोलीं, ‘‘आएशा के लिए नौशाद ही बेहतर रहेगा बेटा… जिद छोड़ दे… और नौशाद से ही इस का रिश्ता पक्का कर दे.’’

थोड़ी देर सोचने के बाद भैया बोले, ‘‘जब घर में सभी की राय एक है, तो फिर मैं ही तहजीब का बोझ क्यों ढोता फिरूं?

‘‘आएशा, तू अगले संडे नौशाद के घर वालों को आने के लिए बोल दे… मैं अपने मैनेजर दोस्त को समझा दूंगा कि वह अनवर के लिए कोई दूसरी लड़की ढूंढ़ ले.’’

खुशीखुशी हम तीनों अपने घर लौट आए. घर आते ही आएशा मुझ से लिपट गई और बोली, ‘‘भाभी, तुम ने बड़ी भाभी गुलशन पर ऐसा कौन सा जादू कर दिया था कि उन के अंदर का जातिवादी जहर गायब हो गया? उन के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है.’’

मैं मुसकराते हुए बोली, ‘‘आएशा, तुम्हें यह जानने की जरूरत नहीं है… अपने कमरे में जाओ और नौशाद को खुशखबरी दे दो.’’

अगले दिन सुबहसुबह मोबाइल देखा, तो जेठानी के ढेर सारे मैसेज से इनबौक्स भरा हुआ था. आखिरी मैसेज रात के ढाई बजे का था. अनवर की मुहब्बत में डूबी मेरी जेठानी की रातों की नींद गायब हो चुकी थी.

रात ढाई बजे वाले आखिरी मैसेज में जेठानी ने अपनी मुहब्बत का इजहार करते हुए एक घिसापिटा सा शेर लिखा था :

‘हसीन ख्वाब से सोहबत हो गई है,
मुझे भी तुम से मुहब्बत हो गई है.
सुबह जब उठो तो रिप्लाई देना,
तुम से मिलने की हसरत हो गई है.’

मैं ने अनवर की ओर से रिप्लाई दिया, ‘गुलशन, मेरी जान… तुम्हारा मैसेज पढ़ कर मैं कितना खुश हूं, बता नहीं सकता… बस आज शाम तक का इंतजार करो… आज मुझे फिर एक जगह लड़की देखने जाना है… वहां से लौटते ही मैं तुम्हें मिलने की जगह बताऊंगा.’

जेठानी ने झट से रिप्लाई किया, ‘अब फिर से लड़की देखने क्यों जा रहे हो? मुझे अपना फोन नंबर दो…’

मैं ने लिखा, ‘शाम को मिलेंगे, तो सारी बात बता दूंगा…’

इस मैसेज को टाइप करने के बाद मैं बारबार जेठानी के यहां मुहब्बत में उन की बेकरारी का दीदार करने पहुंच जाती. वे मुझे मोबाइल में ही घुसी हुई मिलती थीं. उन्होंने पूरे दिन अनवर यानी मुझे मैसेज किया, लेकिन मैं ने कोई रिप्लाई नहीं किया… शाम हुई, तो जेठानी पीली साड़ी में सजधज कर तैयार हो चुकी थीं.

मैं उन के पास गई और बोली, ‘‘बाजी, कहीं जाने का इरादा है क्या आज?’’

वे बोलीं, ‘‘हां, बाजार तक जा रही हूं… संडे को नौशाद के घर वाले आएंगे, तो उन्हें देने के लिए कुछ शगुन वगैरह तो चाहिए ही न…’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं भी आप के साथ चलूं क्या?’’

वे बोलीं, ‘‘आज नहीं… कल फिर जाऊंगी, तो तुम्हें ले चलूंगी…’’

जेठानी अपने उस आशिक का इंतजार कर रही थीं, जो असल में कहीं था ही नहीं. अब जेठानी के दिमाग पर चढ़े इश्क के भूत को उतारने का समय आ गया था. मैं अपने घर आई और मैं ने मैसेंजर औन किया, जो जेठानी के बेचैनी भरे मैसेज से भरा हुआ था.

मैं ने लिखा, ‘मिलने का प्लान फिर से कैंसिल…’

जेठानी ने तुरंत रिप्लाई किया, ‘क्यों, क्या हुआ? तुम घर नहीं पहुंचे क्या अभी तक?’

मैं ने लिखा, ‘मैं जो आज लड़की देख कर आ रहा हूं, वह मुझे भा गई है… पीली साड़ी में वह क्या मस्त लग रही थी… मैं तो पहली नजर में उसे देखते ही अपना दिल गंवा बैठा गुलशनजी… आज शाम को मैं उसी से मिलने जा रहा हूं… आप को जान कर हैरानी होगी कि उस लड़की का नाम भी गुलशन है… आई लव यू गुलशन…’

तुरंत ही रिप्लाई आया, ‘मेरी मुहब्बत का क्या होगा अनवर… तुम ने मुझे बहुत बड़ा धोखा दिया है…’

मैं ने लिखा, ‘तुम बहुत मोटी हो… जौगिंग करो और फिट हो जाओ… पीली साड़ी में तुम सरसों के खेत में खड़ी भैंस लगती हो… यह उम्र बच्चों को संभालने की है… इतने अच्छे हसबैंड के होते हुए इधरउधर मुंह मारना अच्छी बात नहीं है… बच्चों को पढ़ने दो और उन्हें इश्क करने दो… शायद, अब मैं तुम्हें कभी न मिलूं… अपना खयाल रखना गुलशनजी…’

यह मैसेज टाइप करने के आधे घंटे बाद मैं जेठानी गुलशन के पास गई… देखा तो हालात बदल चुके थे. इश्क का भूत पूरी तरह उतर चुका था.

जेठानी पहले की तरह सूटसलवार में थीं और सिर पर हाथ रखे हुए सोफे पर बैठी थीं. मेरे वहां जाते ही जेठानी ने मुझ से कहा, ‘‘फेसबुक डिलीट करना है. कैसे होगा?’’

मैं ने कहा, ‘‘क्यों बाजी? फेसबुक से तो आप को बड़ा प्यार था. अब क्या हुआ?’’

जेठानी गुलशन गुस्से में बोलीं, ‘‘यह प्यारव्यार कुछ नहीं होता रेहाना… सब फालतू की बातें हैं… धोखेबाजों की इस दुनिया में अपना घरपरिवार ही सब से बड़ी चीज होती है… फेसबुक पर समय खराब करने से अच्छा है कि मैं अपने परिवार को वक्त दूं.’’

Hindi Story: प्रमोशन

Hindi Story: आज फिर मुझे दफ्तर जाने में देर हो गई. पिछले 4 दिन से मैं लगातार देर से दफ्तर पहुंच रहा हूं. रोजाना की तरह साहब आज फिर नाराज होंगे, डांटेंगे और तांबे सा चेहरा बना कर कहेंगे, ‘नईनई शादी क्या हुई, रोज दफ्तर में देर से आने का नियम बना लिया. बीवी का पल्लू नहीं छूटता, तो नौकरी से इस्तीफा दे दो. न कोई सुनने वाला, न कोई कहने वाला.’

यह सच है कि मेरी शादी हुए अभी महीना भी नहीं हुआ है. दफ्तर पहुंचा, तो दस्तखत रजिस्टर अपनी तय जगह पर नहीं रखा था. बड़े बाबू से उस के बारे में पूछा, तो बड़े बाबू ने कहा कि साहब ने रजिस्टर अपने केबिन में मंगा लिया है. साहब ने कहा है कि जब भी आप आएं, पहले केबिन में भेज दें.

तब मैं दबे कदमों से बड़े साहब के केबिन में पहुंचा.

दरवाजे पर बैठा चपरासी मुझे देख कर मुसकराया. उस की कुटिल मुसकान से मैं समझ गया कि बड़े साहब मुझ से बहुत नाराज हैं.

जब मैं परदा हटा कर बड़े साहब के केबिन में पहुंचा, तब बड़े साहब मुझे खा जाने वाली निगाहों से देख रहे थे.

मैं एक अपराधी की तरह गरदन झुकाए बड़े साहब के सामने चुपचाप खड़ा था. वे गुस्से से चिल्ला कर बोले, ‘‘मिस्टर कमल सक्सेना, यह सरकारी दफ्तर है, तुम्हारा घर नहीं है. 4 दिन हो गए, तुम्हें देर से आतेआते. आज कौन सा बहाना बनाओगे?’’

तब बड़े साहब की बात का मैं कोई जवाब नहीं दे पाया. मैं अपराधी की मुद्रा में इसलिए खड़ा रहा कि गलती मेरी है कि क्यों देर से आया?

बड़े साहब फिर बोले, ‘‘मगर, आज तो तुम्हें देर से आने की सजा मिलेगी. उस सजा की अगर भरपाई नहीं करोगे, तब तुम्हारे होने वाले प्रमोशन को मैं रुकवा भी सकता हूं.’’

इतना कह कर साहब ने मेरी तरफ देखा, फिर पलभर रुक कर बोले, ‘‘क्या मेरे द्वारा दी गई सजा भुगतने को तैयार हो? बोलो, चुप क्यों हो?’’

‘‘मिस्टर कमल, कान खोल कर सुन लेना. आज की रात अपनी नईनवेली दुलहन को रैस्टहाउस में ले कर आ जाना, केवल 2 घंटे के लिए. मैं ठीक रात 8 बजे वहां इंतजार करूंगा. यही तुम्हारे देर से आने की सजा है.’’

तब मैं गरदन हिलाते हुए रजिस्टर पर दस्तखत कर अपने केबिन में आ कर बैठ गया, मगर मेरा मन फाइलें निबटाने में नहीं लगा.

बड़े साहब की सजा मेरे लिए गले की फांस बनी हुई थी. उन का ऐयाश चेहरा सारे दफ्तर के बाबू जानते हैं.

दफ्तर की प्रतिभा मैडम और शोभा मैडम कई बार साहब की ऐयाशी की शिकार हुई हैं. तभी बड़े साहब उन दोनों से कुछ नहीं कहते हैं.

अगर मैं अपनी पत्नी को बड़े साहब के पास रैस्टहाउस नहीं ले जाऊंगा, तब प्रमोशन में मेरी गलतियां लिख कर प्रमोशन रुकवा सकते हैं.

अपने प्रमोशन के लिए मुझे पत्नी की इज्जत दांव पर लगानी पड़ेगी. यह अपराध कर के मैं अपनी पत्नी की निगाह में गिरना नहीं चाहता. इस समय मैं अभिमन्यु की तरह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गया हूं, जहां से निकलने का रास्ता ही नहीं दिख रहा.

तब मेरा ध्यान सुबह वाली घटना पर चला गया. जब दफ्तर जाने के लिए मेरे कदम जल्दीजल्दी उठ रहे थे, एक खूबसूरत भिखारिन, जो मटमैले कपड़े पहने थी, मगर थी जवान. वह हर उस जवान आदमी के आगे हथेली फैला कर 10-20 रुपए मांग रही थी. कुछ मनचले उस की 50 या 100 रुपए का नोट रख कर हथेली को छू रहे थे.

वह फटी गंदी साड़ी पहने हुए थी. बाल बिखरे हुए थे. वह उस के पीछेपीछे 10-20 रुपए की रट लगाती हुई चल रही थी.

दफ्तर जाने में देरी हो जाने के चलते मैं जल्दीजल्दी अपने कदम बढ़ा रहा था. मैं ने कई बार उसे दुत्कार दिया था. फिर भी वह मेरे पीछेपीछे चली आ रही थी.

तब मैं रुका और पीछे मुड़ कर गुस्से से बोला, ‘‘कह दिया न कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, फिर भी तू बेशर्मी से मेरे पीछेपीछे चली आ रही है.

‘‘आप काहे को झूठ बोलते हो बाबूजी…’’ मेरी झिड़की सुन कर भी वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप के पास पैसे नहीं हैं, यह मैं मान ही नहीं सकती.’’

‘‘अरे, तू हट्टीकट्टी हो कर भी भीख क्यों मांग रही हैं? तुझे जरा भी शर्म नहीं आती.’’

‘‘काहे की शरम बाबूजी. जो करे शरम, उस के फूटे करम,’’ उस ने लापरवाही से जवाब दिया.

‘‘अरे, तेरे हाथपैर सहीसलामत हैं, मेहनतमजदूरी कर.’’

‘‘बाबूजी, दे दो न. 10-20 रुपए देने से आप गरीब नहीं हो जाएंगे,’’ मेरी झिड़की के बावजूद भी वह बड़ी बेशर्मी से बोली.

‘‘अजीब औरत है, जो भीख के लिए मेरे पीछे ही पड़ी हैं,’’ जेब से 10 रुपए निकाल कर मैं उसे देते हुए बोला, ‘‘ले पिंड छोड़ मेरा, पैसों के लिए पीछे ही पड़ी हुई है,’’ कह कर मैं तो चल दिया, तब वह औरत मेरा रास्ता रोकते हुए बोली, ‘‘बाबूजी, मेरी आप को रात के लिए जरूरत पड़े, तब आप जहां बुलाएंगे, आ जाऊंगी. मेरा घर स्टेशन के पास झोंपड़पट्टी में है. मेरा नाम कमली है.’’

मैं तो बिना जवाब दिए आगे बढ़ गया. क्या नाम बताया था कमली? उसे अपनी पत्नी बना कर बड़े साहब के पास रैस्टहाउस में छोड़ आऊं. अभी बड़े साहब ने पत्नी को देखा कहां है. शादी की पार्टी के दिन वे दौरे पर चले गए थे. क्यों न उसी कमली से बात कर ली जाए.

शाम को छुट्टी होने के बाद मैं घर जाने के मूड में कतई नहीं था. स्टेशन पर चलना चाहिए और उस कमली को ढूंढ़ना चाहिए. मैं ने पत्नी को फोन किया. दफ्तर में काम ज्यादा होने के चलते मैं देर से घर आऊंगा.
जब मैं स्टेशन पर पहुंच कर जैसे ही झुग्गी बस्ती के पास पहुंचा कि झोंपड़ी के पास खड़ी वही सुबह वाली कमली मिल गई.

मैं तो पहचान नहीं पाया. सुबह वाली भिखारिन कमली और अब मेरे सामने खड़ी कमली में कितना फर्क है. इस समय सजधज कर खड़ी कमली रूप की मेनका लग रही थी.

तब वह मेरे पास आ कर बोली, ‘‘बाबूजी, मुझे नहीं पहचाना क्या आप ने? मैं सुबह वाली कमली हूं. मुझे मालूम था कि आप आओगे. बोलो, कहां ले चलोगे मुझे.’’

‘‘तुम ने मुझे कैसे पहचाना?’’ मैं ने कमली से पूछा.

‘‘जब सुबह आप से भीख मांगी थी, तभी मैं ने समझ लिया था,’’

कमली बोली, ‘‘फिर बाबूजी, भीख मांगने के पीछे मैं ग्राहक ढूंढ़ती हूं. कहिए, आप मुझे कहां ले जाएंगे.’’

‘‘मगर, ले जाने से पहले मेरी एक शर्त है?’’

‘‘कौन सी शर्त?’’

‘‘तुम्हें मेरी पत्नी बन कर चलना होगा.’’

‘‘आप की ऐसी कौन सी मजबूरी है बाबूजी?’’

‘‘यह सब मैं अपनी मजबूरी बाद में बता दूंगा,’’ मैं बोला.

तब मैं ने कमली को अपने बारे में सबकुछ बताया.

तब कमली झोंपड़ी के भीतर गई. एक पत्नी बन कर आई, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, कांच की हरी चूडि़यां, नई लाल साड़ी, कोई अनजान आदमी अगर देख ले, तो मेरी पत्नी ही समझे. क्योंकि इस की कीमत कमली ने पहले ही 2,000 रुपए तय की थी.

1,000 रुपए मैं पहले ही दे चुका था और 1,000 रुपए काम होने के बाद देने को कहा है.

तब तय समय के मुताबिक मैं कमली को पत्नी बना कर रैस्टहाउस में ले गया. बड़े साहब उसी का इंतजार कर रहे थे. बड़े साहब ने मुझे 2 घंटे बाद दोबारा बुलाया, ताकि मैं उसे ले जा सकूं.

मैं 2 घंटे इधरउधर भटकता रहा. इस समय कमली मेरे लिए सहारा बन कर आई. ढाई घंटे बाद जब मैं वापस रैस्टहाउस गया, बड़े साहब मेरा ही इंतजार कर रहे थे.

मैं कमली को ले कर सड़क पर आ गया. एकांत पा कर कमली बोली, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप के बड़े साहब को खुश कर दिया.’’

‘‘हां कमली, तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद,’’ जब मैं ने यह कहा, तब वह बोली, ‘‘कमली किसी का धन्यवाद नहीं लेती बाबूजी. इस पेट की खातिर मुझे यह सब करना पड़ रहा है. आप तो 1,000 रुपए दीजिए, ताकि मैं दूसरे ग्राहक ढूंढ़ सकूं.’’

मैं ने तत्काल 1,000 रुपए कमली को दे दिए. कमली रुपए ब्लाउज में खोंसते हुए बोली, ‘‘कभी फिर पत्नी बनने की जरूरत पड़े, तो मैं तैयार हूं.’’

मैं ने गरदन हिला कर रजामंदी दी. फिर हम दोनों के रास्ते जुदा हो गए.

अब जब भी मैं देर से दफ्तर पहुंचता हूं, बड़े साहब मुझे कुछ नहीं कहते. अब वे मुझ से खुश रहने लगे हैं. 15 दिन के भीतर ही उन्होंने मेरा प्रमोशन कर दिया और मैं दूसरे शहर में चला गया.

मुझे कमली की आज भी याद आती है. अगर वह कमली पत्नी बन कर मेरी जिंदगी में नहीं आती, तब मेरा प्रमोशन आगे और टल जाता.

Hindi Story: भूलभुलैया

Hindi Story, लेखक – प्रशांत

बगल में चमड़े का थैला दबाए, एक हाथ में छतरी थामे हरिया गांव की पगडंडी से हो कर गुजर रहा था. वह हर रोज सुबह इसी रास्ते से हो कर गुजरता था. कुछ दूरी पर एक छोटा सा बाजार था. वह वहीं दिनभर जूते बनाता था और शाम को कमाई समेत बस्ता समेट कर वापस घर लौट आता था. दिन मजे में गुजर रहे थे.

रास्ते में गांव का एक मंदिर पड़ता था. सुबह जाते वक्त पूजनअर्चना और शाम को लौटते समय संध्या की आरती की आवाज हरिया के कानों में पड़ती, तो वह खुश हो जाता था.

हरिया ललचाई नजरों से मंदिर की ओर निहारता, परंतु पास फटकने की हिम्मत न होती. पुराने जमाने से ही उस के गांव की परंपरा थी कि छोटी बिरादरी के लोगों को मंदिर में घुसने का हक नहीं है. वह भी कोई हिमाकत कर बड़ी जातियों के गुस्से की आग में जलना नहीं चाहता था.

एक जमाना था, जब मंदिर की खूबसूरती देखते ही बनती थी. बड़ी अच्छी सजावट होती थी. सुबह से ही देर रात तक भजनकीर्तन चलता रहता था. परंतु जमींदारी प्रथा का अंत होते ही मंदिर की ओर से जमींदारों का ध्यान उचटने लगा. धीरेधीरे देखरेख ठीक से न होने के चलते मंदिर उजाड़ होने के कगार पर आ पहुंचा.

मंदिर के पुजारी रामप्रसाद पूजापाठ तो करते रहे, परंतु चढ़ावे में दिनोंदिन कमी ही होती गई. कल तक वे दूध, मलाई के भोग लगाते थे, परंतु अब रूखीसूखी से ही गुजारा करना पड़ रहा था.

वक्त यों ही गुजरता गया. एक दिन रामप्रसाद हरिया की दुकान पर पहुंचे. हरिया जूते बनाने में लीन था.

‘हरिया, ओ हरिया,’ की आवाज ज्यों ही हरिया के कानों में पड़ी, उस की नजरें ऊपर उठ गईं. एकबारगी तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि पंडित रामप्रसाद उस की दुकान पर पधारे हैं.

बड़ी मुश्किल से हरिया अपनेआप को संभाल पाया और दौड़ कर पंडितजी के चरण छुए, फिर एक कुरसी पर उन्हें बिठाते हुए बोला, ‘‘बड़ा अच्छा संयोग है कि आप के चरण इस गरीब की दुकान पर पड़े.’’

‘‘हरिया, तू तो बड़ा भाग्यशाली है रे. देखतेदेखते तू ने कितनी तरक्की कर ली. कहां टूटी सी झोंपड़ी में पहले पुराने जूते सिलाई करता था और आज इतनी बड़ी दुकान खड़ी कर ली,’’ पंडितजी ने अपना राग छेड़ा.

‘‘सब आप लोगों की कृपा है पंडितजी,’’ हरिया बड़ा ही हीन बनते हुए बोला.

पंडितजी तो जैसे इसी बात के इंतजार में थे. वे बोले, ‘‘अरे नहीं, सब भगवान की माया है भैया. हम और तुम कुछ नहीं. वह जब जिसे जो चाहे दे दे. जिस से जो चाहे ले ले…’’

फिर थोड़ा रुक कर पुजारी रामप्रसाद बोले, ‘‘हरिया, कभी तुम्हारी इच्छा नहीं होती कि तुम भी मंदिर में आ कर भगवान के दर्शन करो?’’

‘‘बहुत होती है पंडितजी, परंतु हमारे ऐसे भाग्य कहां? पुरखों से जो परंपरा कायम है, उसे तो निबाहना ही पड़ेगा.’’

‘‘कहते तो ठीक हो, पर धरमकरम करने का तो सब को अधिकार है. सभी ईश्वर की संतान हैं. सब को उन की सेवा करनी चाहिए.’’

जमाने के ठुकराए, सताए व दबाए गए लोगों की बिरादरी के एक आदमी को पंडितजी बड़ी सावधानी से पटा रहे थे. बड़ी चालाकी से उस के दिमाग में दकियानूसी विचारों की खुराक भरी जा रही थी.

पंडितजी पक्के खिलाड़ी थे. किस तरह लोगों को बहकाया जा सकता है, किस तरह उन का दोहन कर अपनी जेब भरी जा सकती है, यह पंडितजी को बखूबी मालूम था, वरना जिन पंडितों ने हरिया की बिरादरी को चांडाल कह कर मंदिर के अहाते में भी घुसने पर पाबंदी लगा दी थी, उन्हीं में से एक पंडित उसे अपने बराबर होने का एहसास क्यों करा रहा था?

लोगों की भावनाओं का गलत फायदा उठा कर अपना उल्लू सीधा करना पंडितों का पुराना हथकंडा रहा है.

हरिया गदगद हो उठा था. पंडितजी की बातों को सुन कर गले से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी.

पंडितजी आगे बोले, ‘‘कल भगवान ने मुझ से सपने में कहा कि हरिया मेरा भक्त है. उसे सही राह दिखाओ.

भैया, हम तो ठहरे उन के गुलाम. वे जो कहेंगे, मुझे तो करना ही पड़ेगा, वरना सोचो, क्या मैं तुम्हारे पास आ पाता? मंदिर चलाने वाले लोग मुझे क्या कहेंगे?’’

इस तरह की चिकनीचुपड़ी व चालाकी भरी बातों से पंडितजी ने हरिया को प्रभावित कर दिया. उस के अंदर जो शक की गुंजाइश थी, उसे भी खत्म कर दिया.

ठुकराए आदमी को जब मशहूर होने का मौका मिलता है, तो वह उसे किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहता. पंडितजी ने हरिया की दुखती रग को पहचान लिया था.

हरिया खुशी से फूला नहीं समा रहा था. किसी तरह अपने पर काबू रखते हुए हरिया बोला, ‘‘पंडितजी कहिए, मैं आप की क्या सेवा करूं?’’

‘‘मेरे जूते फट गए हैं भैया, जरा सिल दो.’’

‘‘छोडि़ए पंडितजी, कब तक इन फटे जूतों को घसीटते रहेंगे.’’

‘‘क्या करूं हरिया, काम चलाना ही होगा. फिर कभी देखेंगे.’’

‘‘नहीं पंडितजी, फिर कभी क्यों…? आज ही आप नए जूते ले जाइए,’’ कहते हुए हरिया जूते निकालने लगा.

‘‘रहने दे हरिया. अभी पैसे नहीं हैं. मुफ्त ले गया तो तुझे घाटा होगा.’’

‘‘उस की आप जरा भी फिक्र न करें पंडितजी. ये मेरी तरफ से दान समझ कर ले लें.’’

पंडितजी मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे. वे अपनी योजना में कामयाब जो हो गए थे.

अगले दिन जंगल की आग की तरह यह बात पूरे गांव में फैल गई. हर जबान पर यही चर्चा थी. लोग दबी जबान से हंसी भी उड़ा रहे थे, परंतु जब सपने वाली बात सुनी तो सब चुप्पी साध गए. डर था कि कहीं ईश्वर गुस्सा हो कर नुकसान न कर दें.

चाहे असलियत जो भी हो, धर्म से डरने वाले लोग ईश्वर पर अधिक विश्वास दिखाते हैं. यदि फायदा होता है, तो उस की वजह ऊपर वाले की मेहरबानी मानी जाती है और नुकसान के लिए अपनी किस्मत को दोषी मानते हैं. वे चाह कर भी भगवान को कोई दोष नहीं दे सकते और न ही भगवान के भजन से मुख मोड़ सकते हैं. उन्हें डर रहता है कि कहीं भगवान गुस्सा हो कर उन का नाश न कर डाले. संयोग से कभी कोई अनहोनी हो भी जाती है, तो वे उसे उसी का नतीजा मान बैठते हैं.

यह अंधभक्ति कोई जन्म से होने वाली लाइलाज बीमारी नहीं है. दरअसल, इस का जहर उस माहौल से मिलता है, जहां आदमी आंख खोलता है. चारों तरफ धर्म से डरने वाले लोगों की संगत होती है. ऐसे में वह कुछ अलग भला कैसे सोचे, जहां चारों ओर एक ही चीज देखनेसुनने को मिलती है?

शाम को पंडित बिरादरी की जमात बैठी. हरिया को पूजा करने दी जाए या नहीं, इसी मुद्दे पर बातचीत हो रही थी.

किसी ने कहा, ‘‘हरिया को पूजापाठ करने देना ब्राह्मण समाज की तौहीन होगी. हम किसी भी कीमत पर यह सहन नहीं कर सकते.’’

पंडित रामप्रसाद बोले, ‘‘शांत रहें. ईश्वर की यही इच्छा है. फिर से यज्ञ द्वारा पवित्र भी किया जाएगा. शास्त्रों के मुताबिक उसे शुद्ध करने के पश्चात ही पूजापाठ करने का अधिकार दिया जाएगा और इस अवसर पर वह ब्राह्मण भोज भी देगा.’’

भोज का नाम सुनते ही सब के मुंह में पानी आ गया. थोड़ी देर की भिनभिनाहट के बाद वे सभी राजी हो गए.

मोचियों की बिरादरी में हरिया ही सब से धनी आदमी था. फिर इज्जत बढ़ाने के लिए 2-4 हजार रुपए का खर्च वह आसानी से कर सकता था.

वह राजी हो गया. एक खास तिथि को हवनपूजन कर के उसे ‘पवित्र’ बना दिया गया. भोज में ब्राह्मणों ने छक कर हलवापूरी खाई.

पूरी मोची बिरादरी में केवल हरिया को ही पूजापाठ में भाग लेने का अधिकार मिला था. एक तो इस वजह से और दूसरी धनी होने के कारण भी पूरी बिरादरी में उस की पूछ कुछ ज्यादा ही होने लगी थी. वह अपनी जाति का बड़ा आदमी बन गया था.

देखते ही देखते काफी बदलाव आ गया. लोग उस की राय की कद्र करते. कोई भी काम हो, उस से पूछे बगैर नहीं होता था. वह जो कहता, पूरी बिरादरी के लोग मानते थे.

एक मेहनतकश कारीगर पूजापाठ में लग गया. उस का ज्यादा समय भजनपूजन में बीतने लगा. दुकान पर उस का बेटा सुखिया बैठने लगा. फिर पंडित रामप्रसाद की सलाह पर शुरू हुईं तीर्थयात्राएं. पंडितजी तो उस के गुरु बन ही चुके थे. उन्हें भी हरिया के खर्च पर तीर्थाटन का सौभाग्य मिल गया.

हरिया की प्रसिद्धी और बढ़ी. वह रोज पूजा का सामान मंदिर भेजता. पंडितजी भी मजे में थे. जब जो खाने की इच्छा हुई, हरिया उस की व्यवस्था कर पंडितजी को खुश करता रहता. इन कामों में बहुत अधिक खर्च हुआ और हरिया को जमीन गिरवी रख कर कर्ज भी लेना पड़ गया.

जब भी हरिया कुछ हिचकिचाता, पंडितजी उस की भावनाओं को कुरेदने लगते. फिर सबकुछ भुला कर हरिया पंडितजी के बताए अनुसार पूजापाठ में लगा रहा.

वह अब अपना ज्यादातर समय पंडितजी के साथ ही बिताने लगा. पंडितजी को भी बातचीत के लिए साथी मिल गया. हरिया पंडितजी की सेवा करता, कभी पैर दबाता तो कभी सिर की मालिश करता. उस की हालत एक बेमोल नौकर की तरह थी.

लगातार खर्च बढ़ने और आमदनी में कमी के कारण हरिया का परिवार गरीबी की चपेट में आने लगा. हरिया का अकेला बेटा सुखिया कितना कमा पाता? बापबेटे दोनों कमाते, तो शायद दोगुनीतिगुनी तरक्की करते.

एक दिन सुखिया बोला, ‘‘पिताजी, सारा दिन यों ही पूजापाठ में बिताने के बजाय यदि आप मेरे साथ दुकान में काम करें, तो हमारी आय दोगुनी हो जाएगी. परिवार की हालत अच्छी हो जाएगी.’’

हरिया ने उपदेश के लहजे में जवाब दिया, ‘‘अरे बेटा, मुझ बूढ़े की क्या है? ईश्वर की कृपा बनी रही तो अपने आप ही बरकत होती जाएगी. ईश्वर की कृपा ही काफी है. पूजापाठ छोड़ दूं, तो भगवान नाराज हो जाएंगे. हमारा सर्वनाश हो जाएगा.’’

हरिया को बारबार पंडितजी का कहना याद आ रहा था, ‘‘ईश्वर को नाराज मत करना, नहीं तो नाश हो जाएगा.’’

सुखिया ने बहस करना ठीक नहीं समझा. वह चुपचाप अपना काम करता रहा, परंतु उतना कमा नहीं पाता था कि परिवार का भरणपोषण और पूजापाठ का खर्च चला कर गिरवी खेत छुड़ाए जा सकें.

2 साल गुजर गए. अचानक एक अनहोनी हो गई. एक रात बाजार की एक दुकान में आग लग गई. देखते ही देखते कई दुकानें जल कर राख हो गईं. उन में हरिया की दुकान भी थी.

यह खबर सुनते ही हरिया दौड़ता हुआ दुकान के पास गया. दुकान की ऐसी हालत देख कर वह रो पड़ा. अब परिवार की रोजीरोटी कैसे चलेगी, उस की समझ में नहीं आ रहा था.

जब साहूकार ने सुना कि हरिया की दुकान जल गई है, तो उस ने खेत भी जोत लिए, क्योंकि अब कर्ज वापस कर पाने की उम्मीद नहीं थी. भला वह लंबे अरसे तक इंतजार क्यों करता.

पंडितजी भी वहां जा पहुंचे. हिम्मत बंधाते हुए हरिया से बोले, ‘‘शांत हो जा हरिया, शांत हो जा. ईश्वर की इच्छा के खिलाफ हम कुछ नहीं कर सकते. उन की यही मरजी थी. तेरे नसीब में यही लिखा था.’’

हरिया उबल पड़ा, ‘‘क्या दिया है ईश्वर ने मुझे? आज तक मैं उस की सेवा करता रहा, उस के गुण गाता रहा, कर्जे लेले कर तीर्थ किए, चढ़ावे चढ़ाए. मैं तो उस का भक्त था. फिर मेरी दुकान क्यों जल गई? क्यों लुट गया मैं? मेरी जमीन क्यों चली गई?’’

अब बचा ही क्या था, जिस का नाश होने का डर हरिया को पूजापाठ के नाम पर पंडित की गुलामी करने के लिए बांधे रखता. उस ने पंडित की सेवा करना कम कर दिया, तो पंडितजी की रंगत भी बदल गई.

हरिया अकेले बैठा सोचने लगा, ‘ठीक कहता था मेरा बेटा सुखिया कि यह एक छलावा है. पुजारियों की अपनी जेबें भरने की चालें हैं. मुझे भी दुकान पर काम करना चाहिए था. भगवान के नाम पर लूटा गया है.

इसी तरह लोग लुटते हैं. मैं पूजापाठ के नाम पर ठगा गया हूं. आशीर्वाद पाने के लालच में हाथ पर हाथ धरे बैठ कर अपना सबकुछ मैं ने खुद ही लुटा दिया है.’

हरिया को उस दिन सचाई का ज्ञान हो गया. उस की आंखों पर से भरम का परदा हट गया था. उसे धार्मिक अंधविश्वास की आड़ में लूटा गया था. भगवान और उस की भक्ति एक भूलभुलैया सी लग रही थी, जिस में से आसानी से निकल पाना मुमकिन नहीं.

देर से ही सही, परंतु हरिया उस भूलभुलैया से निकल गया और फिर से अपनी रोजीरोटी कमाने लगा.

Hindi Story: त्रिया चरित्र

Hindi Story: तकरीबन 2 साल पहले कमल बंगलादेश से भारत रोजगार के सिलसिले में आया था. भारत आ कर किराए का कमरा लेने में ज्यादा दिक्कत तो नहीं आई, पर फिर भी कुछ मकान मालिकों ने आधारकार्ड की मांग की थी, इसलिए बहुत जल्दी ही कमल की समझ में आ गया था कि भारत में आधारकार्ड का होना बहुत जरूरी है.

कमल के एक दूसरे बंगलादेशी साथी इरफान ने उस की मदद की और सायन इलाके में उसे किराए पर एक कमरा दिला दिया और उसे बताया कि उसे अपना फर्जी आधारकार्ड बनवाना पड़ेगा, नहीं तो कोई भी नौकरी पर नहीं रखेगा.

फर्जी कागजात बनवाने की बात सुन कर कमल पहले तो घबराया, पर जब इरफान ने उसे भरोसा दिलाया कि यहां पर सब काम पैसे लेदे कर हो जाते हैं, तो कमल बेफिक्र हो गया.

5,000 रुपए खर्च कर के कमल के हाथ में आधारकार्ड आ गया था और अब वह भारत का निवासी बन चुका था.

आधारकार्ड बनने के बाद इरफान ने कमल की फीनिक्स नाम की ईकौम कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी लगवा दी.

काम तो काफी भागदौड़ और मेहनत वाला था, मगर कमल महीने के तकरीबन 20,000 रुपए तक कमा लेता था. इन 20,000 रुपयों में से 15,000 रुपए कमल अपनी मां को भेजता था, जो अब भी बंगलादेश के नाटोर नामक एक गांव में रहती थी, जो चिटगांव से तकरीबन 200 किलोमीटर की दूरी पर था.

कमल की मां के साथ उस का एक छोटा भाई भी था. अपने भाई और मां की चिंता कमल को सताती रहती थी और इसीलिए वह खूब मेहनत कर के और ज्यादा पैसे कमाना चाहता था. इसलिए कभीकभी मेहनत भरी जिंदगी के बजाय कमल कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से एक झटके में ढेर सारे पैसे कमाए जा सकें.

कमल सोचता था कि एक डिलीवरी बौय बनने के बजाय वह एक चोर बन जाता तो कितना अच्छा होता. किसी सेठ के यहां एक ही झटके में ढेर सारा माल उड़ा कर खूब ऐश कर सकता था, पर मां की नसीहतें तो उसे एक अच्छा आदमी बनने को कहती थीं, इसीलिए उस ने भारत आ कर नौकरी की, ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसे कमा कर घर भेज सके.

आज कमल के पास कुछ ज्यादा ही डिलीवरी करने का सामान था, इसलिए वह ठीक सुबह 7 बजे ही अपने कमरे से निकल लिया था.

तय पते पर लोगों को फोन कर के उन्हें पैकेट डिलीवर करता और ‘थैंक यू’ कहने के बाद एक मुसकराहट के बाद अगले पते के लिए रवाना हो जाता.

कमल एक तिमंजिला और बेहद खूबसूरत मकान के सामने रुका. अपने कंधे पर लदे हुए बड़े से बैग से एक पैकेट निकाला और दिए गए नंबर पर फोन किया.

उधर से किसी लड़की की आवाज उभरी तो कमल और भी तमीज से बात करने लगा, ‘‘जी मैडम, मैं फीनिक्स ईकोम से डिलीवरी करने आया हूं. आप का कुरियर है, प्लीज इसे ले लीजिए.’’

तकरीबन 3 मिनट के बाद अंदर के कमरे का दरवाजा खुला और एक 25 साल की लंबीपतली सी लड़की आती हुई दिखाई दी. उस का रंग गोरा था और बलखाती पतली कमर.

आसमानी रंग की साड़ी को काफी कस कर बांधा था, जिस के चलते उस लड़की की गहरी नाभि और भी गहरी दिख रही थी, जो उसे काफी सैक्सी बना रही थी.

उस लड़की ने एक स्लीवलैस ब्लाउज पहना हुआ था, जिस के अंदर से उस का ब्रा भी दिख रहा था, जो उस की खूबसूरती को और ज्यादा बढ़ा रहा था.

कुरियर किसी सुचेता कपूर के नाम से था, इसलिए कमल ने सोचा कि यही सुचेता कपूर होगी, इसलिए उस ने चुपचाप पैकेट उस लड़की के हाथ में दे दिया और मोबाइल फोन पर आया ओटीपी उस लड़की ने बता दिया.

कमल ने ‘थैंक्स’ कह कर बाइक आगे बढ़ा दी.

कमल काफी देर तक उस खूबसूरत लड़की और उस के गदराए जिस्म और उन के उतारचढ़ाव के बारे में सोचता रहा.

पूरा दिन खत्म होने को आया था और अब जा कर कमल का काम भी निबट चुका था. उस ने पान की एक दुकान पर अपनी बाइक रोकी, अपनी पसंदीदा ब्रांड की सिगरेट ली और कश लगाने लगा.

सिगरेट पीने के बाद कमल अपने कमरे की ओर चला. महल्ले के नुक्कड़ पर पहुंचते ही उस की आंखें रोड के किनारे खड़ी एक लड़की पर पड़ी.

यह तो वही खूबसूरत लड़की थी, जिस के मकान पर जा कर कमल ने डिलीवरी की थी, इसलिए कमल ने अपनी बाइक रोक दी.

‘‘अरे सुचेताजी, आप यहां…? आप इस इलाके में क्या कर रही हैं?’’

उस लड़की ने कमल की बात पर जब कोई ध्यान नहीं दिया, तो कमल ने अपनी आवाज ऊंची करते हुए दोबारा अपनी बात दोहराई, तो उस लड़की ने कमल की तरफ देखा.

कमल ने जब सुबह की बात याद दिलाई, तो वह लड़की जोर से हंसी और बोला, ‘‘वह आलीशान घर मेरा नहीं है, बल्कि मैं तो उस घर में काम करती हूं. और जिस मोबाइल पर ओटीपी आया था, वह मेरी मैडम का ही मोबाइल था, जिसे उन्होंने मुझे ओटीपी बताने के लिए दिया था.’’

कमल के लिए भरोसा करना मुश्किल हो रहा था कि इतनी अच्छी शक्लसूरत और शानदार जिस्म की मालकिन किसी के घर में काम करती होगी. उस का नाम शोभा था.

शोभा ने कमल को यह भी बताया कि वह इस महल्ले से आगे वाले महल्ले कुलकर्णी नगर में रहती है.

बातोंबातों में ही शोभा ने कमल से लिफ्ट मांग ली. बाइक पर उन दोनों में रास्तेभर बातें होती रहीं और बात करने के दौरान शोभा के उभार कमल की पीठ से बारबार सट जाते थे, जिस से कमल रोमांचित हुए बगैर नहीं रह पा रहा था.

उन दोनों ने पहली मुलाकात में ही एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए और अगली सुबह से ही वे एकदूसरे को ह्वाट्सएप पर गुड मौर्निंग जैसे मैसेज भेजने लगे थे और फिर शोभा का फोन आ जाता तो कमल अपना सारा काम रोक कर उस रूप की रानी से दिल खोल कर बातें करने लगता.

शोभा ने कमल को बताया था कि वह अब तक कुंआरी है, पर घर वाले जल्द ही उस की शादी करना चाहते हैं, लेकिन वह तो अपनी मरजी से शादी करना चाहती है.

‘‘तो कैसा लड़का पसंद है तुम्हें?’’ एक दिन कमल ने शोभा से पूछा.

‘‘बिलकुल तुम्हारे जैसा,’’ शोभा ने जवाब दिया, तो कमल का सीना और चौड़ा हो गया. वह खुश हो कर अपना चेहरा बाइक के व्यू मिरर में देखने लगा.

कुछ और दिन बीते, तो कमल और शोभा एकदूसरे से मिलने भी लगे. कभी किसी पार्क में, तो कभी किसी छोटे से रैस्टोरैंट में, पर इस तरह मिलने से उन दोनों को मजा नहीं आ रहा था, बल्कि वह चाहता था कि शोभा से किसी ऐसी जगह मिल सके, जहां वह उसे किस कर सके और उसे अपनी बांहों में भर सके.

जल्द ही कमल की यह मंशा भी शोभा ने पूरी कर दी. शोभा ने उसे बताया, ‘‘कल मेरा जन्मदिन है और शास्त्रीनगर वाले ‘श्रीनेत्र निवास’ में रहने वाले लोग 2 दिन के लिए बाहर जा रहे हैं, इसलिए तुम ठीक 3 बजे वहां पहुंच जाना.’’

‘‘पर, क्यों…? मैं उन के यहां आ कर क्या करूंगा?’’ कमल ने चौंक कर पूछा, तो शोभा ने उसे बताया, ‘‘ये बड़े लोग जब भी बाहर जाते हैं, तो अपने घर की एक चाबी हमें दे जाते हैं, ताकि हम सफाई करने वाले लोग उन के घर को उन की गैरहाजिरी में भी साफ रख सकें.’’

कमल के लिए इतना इशारा काफी था. अगले दिन अपना सारा काम 3 बजे तक निबटा कर कमल एक गिफ्ट ले कर शोभा के बताए पते पर पहुंच गया.

शोभा कमल को सीधा बैडरूम में ले गई और उस खुशबूदार बैडरूम में घुसते ही कमल ने शोभा के नाजुक जिस्म को अपनी बांहों में भर लिया और ताबड़तोड़ चुम्मों की बारिश कर दी.

शोभा भी कमल से किसी बेल की तरह लिपट गई थी. दोनों के हाथ एकदूसरे के जिस्म पर फिसल रहे थे और फिर कमल ने शोभा को उस बड़े से शानदार और मुलायम गद्दे पर पटक दिया और शोभा के बदन पर हावी होता चला गया. कुछ देर के बाद वे दोनों हांफते हुए एकदूसरे के जिस्म से अलग हो गए थे.

उस दिन के बाद से कमल को खूबसूरत शोभा के जिस्म का ऐसा चसका लगा कि वह आएदिन शोभा से पूछता कि क्या कोई मकान मालिक उसे अपने मकान की चाबी दे कर नहीं गया है? अब जब भी कोई घर खाली मिलता, तो वे दोनों उस घर में जम कर रंगरलियां मनाते.

इस बीच कमल की मां का फोन बंगलादेश से आया. उन्होंने कमल को वापस आ जाने के लिए कहा कि वे उस के बिना काफी अकेलापन महसूस कर रही हैं. पर कमल को तो यहां शोभा के रूप में एक परी मिल गई थी, जिस के प्रति कमल का प्रेम जाग चुका था और अब वह शोभा के साथ रंगरलियां मनाने के साथसाथ उस के प्रेम में भी पड़ चुका था और शादी भी करना चाहता था.

उस दिन शोभा का फोन आया, तो उस ने कमल को बताया कि आज शाम को वह राजेंद्र नगर के घोरपड़े विला में आ जाए, क्योंकि घोरपड़े परिवार 2 दिन के लिए बाहर जा रहा है.

शोभा ने कमल से आते वक्त अपना पसंदीदा मीठा गुलकंद वाला पान भी लाने को कहा.

कमल बेसब्री से शाम का इंतजार कर रहा था. वह समय से थोड़ा पहले ही वहां पहुंच गया था, जहां शोभा उस का इंतजार कर रही थी. काले रंग के स्लीवलैस ब्लाउज और पीले रंग की साड़ी में वह कयामत ढा रही थी.

कमल को यकीन ही नहीं हो रहा था कि आने वाले कुछ समय में वह इस खूबसूरत औरत के नंगे बदन के साथ रंगरलियां मनाने वाला है.

शोभा के साथ कमल भी अंदर जाने लगा, तो सिक्योरिटी गार्ड के रोकने पर शोभा ने उसे नल ठीक करने वाला बताया और अपने साथ अंदर ले गई.

हर बार की तरह वे दोनों बैडरूम में पहुंच गए और एकदूसरे से लिपट गए. होंठों को चूमने का सिलसिला जारी रहा और कमल के हाथ शोभा के चिकने बदन पर फिसलते रहे.

कमल बेसब्र हुआ जा रहा था, पर शोभा आज आराम से सैक्स करने के मूड में थी, इसलिए वह बिस्तर पर लेट गई और उस ने कमल से कहा कि वह म्यूजिक सिस्टम पर कोई अच्छा सा रूमानी गीत चला दे.

कमल भी मुसकराता हुआ म्यूजिक सिस्टम की ओर बढ़ चला. अभी कमल म्यूजिक बजा पाता, इस से पहले ही घर के मेन दरवाजे पर कुछ चहलपहल सुनाई दी और 2-3 लोग इंटरलौक खोल कर अंदर आ गए.

वे लोग कोई और नहीं, बल्कि घोरपड़े जोड़ा और उन का बेटा थे, जो शायद जाते समय कुछ सामान भूल गए थे.

शोभा और कमल का खेल खराब हो चुका था, पर अभी तो हालात बदतर होने वाले थे.

वे लोग कमल को देख कर शोर मचाने लगे और बेटे ने तुरंत पुलिस को फोन मिला दिया. कमल कुछ नहीं
कह पाया.

इस के बाद मिस्टर घोरपड़े ने शोभा को देखा. शोभा, जो इतनी देर में हालात को भांप गई थी, तुरंत बोलने लगी, ‘‘साहब, मैं इसे नहीं जानती. मैं तो सफाई कर रही थी. शायद यह चोरी करने के इरादे से आया था और मुझे अंदर अकेला देख मेरी इज्जत लूटने वाला था… तभी आप लोगों ने अचानक आ कर मेरी इज्जत बचा ली.’’

कमल हैरान था. भला शोभा उसे चोर क्यों बता रही है? अरे, मकान मालिक को वह साफसाफ बता देता कि उन की गैरहाजिरी में थोड़ा यहां मिलने आ गया है, पर जैसे ही उस ने कुछ कहना चाहा, तो शोभा का जोरदार चांटा कमल के गाल पर पड़ा.

‘‘एक तो चोरी करता है, ऊपर से औरतों की इज्जत भी लूटता है,’’ कमल कुछ कह पाता, इस से पहले पुलिस आ चुकी थी और कमल को घोरपड़े जोड़े के घर में चोरी करने के चलते गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस के साथ आए मीडिया वालों ने इस खबर को जम कर प्रसारित किया और कमल को पड़ोसी देश का जासूस तक बताया.

घोरपड़े जोड़े ने लापरवाही का इलजाम लगाते हुए अपने सिक्योरिटी गार्ड को नौकरी से निकाल दिया था. वह गार्ड हैरान था कि जिस आदमी को प्लंबर बता कर शोभा अपने साथ अंदर ले गई थी, उसे भला चोर बता कर शोभा ने गिरफ्तार क्यों करा दिया?

शायद इसी का नाम औरत का त्रिया चरित्र है, पर इस त्रिया चरित्र के चलते एक मां का बेटा जेल में पहुंच गया था और उस की मां और छोटा भाई बंगलादेश में अकेले रह गए थे, जिन्हें हर महीने पैसे भेजने वाला भी अब कोई नहीं था.

पर शोभा अब भी घरों में काम करती है. घर के लोग अब भी बाहर जाते हैं और शोभा अब भी कमल जैसे भोलेभाले नौजवानों को उन घरों में बुलाती है. और हां, वह अपने लिए गुलकंद वाला मीठा पान मंगाना कभी नहीं भूलती और न ही वह भूलती है अपना त्रिया चरित्र.

Hindi Story: उफ, यह जिंदगी

Hindi Story, लेखक – चंद्र शेखर विकल

रात का धुंधलका धीरेधीरे पैर पसार रहा था. सन्नाटा अपने घिनौने पंख फैला कर हलकी सी चहलपहल को समेट रहा था.

नीरज रेल की पटरी के साथ धीरेधीरे चल रहा था. रेल की पटरी दूर तक समानांतर बांहें फैलाए चली गई. कुछ दूर पेड़ों पर पक्षियों का शोर सुनाई दे रहा था, मानो सभी एक ही सुर में कह रहे हों, ‘मजबूरी और गरीबी में जीना भी कोई जीना है. खुदकुशी के बराबर है. तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है.’

नीरज को लगा कि पक्षियों की भी एक भाषा होती है. यह भाषा तभी समझ में आती है, जब कोई भीतरी मन से समझने का जतन करे. उसे लगा कि वह उन की भाषा समझने लगा है. वे सभी एक सुर में उसे मरने के लिए कह रहे हैं.

नीरज का मन और अशांत होता चला गया. मन उबल रहा था. उस के नथुने फूलने लगे, मुट्ठियां भिंच गईं. मन नफरत से भर गया.

यह वह दुनिया है, जिसे सभ्य कहा जाता है. यह सभ्य नहीं, वहशी है, क्रूर है. शराफत का मुखौटा ओढ़ने वाला चार सौ बीस. रिश्तों में भी अपना मतलब छिपा हुआ है. कितने सगेसंबंधी हैं उस के, सब के सब लालची. आप के पास चार पैसे हैं, तो सब साथ हैं.

पिछले 6 महीने से नीरज बेकार घूम रहा था. मंदी ने उस की नौकरी छीन ली. बहुत भागदौड़ की, लेकिन कोई ढंग की नौकरी नहीं मिली.

चाचाजी एक बड़ी पोस्ट पर हैं. नीरज ने उन से विनती की तो यह कह कर टरका दिया कि किसी बड़ी कंपनी या सरकारी महकमे में अप्लाई करो तो बताना, छोटीमोटी नौकरी में क्या रखा है. पिताजी भी उन के पास गए और बताया, लेकिन नतीजा जीरो.

एक बार तो नीरज का मन किया कि चाचाजी को खूब खरीखरी सुनाए कि छोटीमोटी नौकरी तो लगवाते नहीं, बड़ी क्या लगवाएंगे. पर संस्कारों से बंधा होने के चलते नीरज कुछ कह न सका. वह मन मसोस कर रह गया.

कैसी विडंबना है कि न चाहते हुए आदमी अपनी ही नजरों में गिर जाता है. गिरना तो अलग बात है, गरीब तो अपनी मौत से पहले ही मर जाता है. फिर भी वह जिंदा रहता है अपनी जिंदा लाश उठाए हुए.

नीरज भी घिसता रहा यही सोच कर कि शायद कभी सवेरा हो जाए. ये अंधेरे कहीं दुबक जाएं किसी कोने में, लेकिन अंधेरों का तो उस का बचपन से ही साथ है. बचपन तो बचपन है, कोई भी चीज लौट कर नहीं आती. बचपन की यादें नीरज के दिमाग में कीमती चीजों की तरह जमा हो रखी हैं.

नीरज को याद है बचपन में दूध के लिए रोते हुए, खिलौनों के लिए तरसते हुए, स्कूल की फीस के लिए बैंच पर खड़े हो कर क्लास में हंसी का पात्र बनना वगैरह.

नीरज ने जवानी में कदम रखा, तो कुछ ज्यादा नहीं बदला. अपनी मरजी से कुछ खाया नहीं, पिया नहीं. ढंग के कपड़े नहीं पहने. कालेज टाइम जरूर कुछ अच्छा गुजरा. उस ने देखा अपने छोटे भाईबहनों को जमीन पर गिरी चीज उठा कर खाते हुए. घर में कभी बीमारी भी आई, तो मां सरकारी अस्पतालों के चक्कर काटती रहीं. डाक्टर की चौखट पर तभी पैर रखा, जब कोई बीमारी गंभीर हो गई. उफ, यह जिंदगी.

‘जिंदगी…’ उस का जी किया कि वह जोरजोर से कहकहे लगाए. जिंदगी है कहां? चारों ओर नजर दौड़ाओ और देखो कि कैसे भाग रहे हैं लोग. किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है. आदमी मन बहलाने को तो कहता है कि वह जी रहा है.

जीना भी एक कला है. ईमानदारी तो नाममात्र की रह गई है. ईमानदारी से पैसा नहीं बनता. किसी ईमानदार के पास जो थोड़ाबहुत बचता भी है, तो किसी तरह जुगाड़ कर के सरकार कई तरह से वसूल लेती है. जैसे इनकम टैक्स, जीएसटी वगैरह. पैसा बनता है तो बेईमानी से, चोरबाजारी से, टैक्स की चोरी से, कालाबाजारी से, धोखा देने से.

नीरज भी धोखा ही दे रहा है खुद को जीने का. क्या पाया उस ने अब तक जी कर… लानतें, गालियां, दुत्कार, रुसवाइयां, जबकि पिताजी एकएक पैसे के लिए पसीना बहाते रहे.

जब से होश संभाला है, तब से नीरज ने अपने पिताजी को बिजी ही पाया. सुबह चले जाते थे ट्यूशन पढ़ाने. वहीं से अपने औफिस चले जाते और शाम को चाय पी कर पार्टटाइम जौब पर. परिवार से बात करने का समय रात 9 बजे था. जिंदगी का बोझ ढोतेढोते शरीर खोखला हो गया था और एक दिन तबीयत ज्यादा खराब होने पर पता चला कि उन्हें पीलिया व टीबी है. शायद उन्हें पता हो, लेकिन उन्होंने कभी नहीं बताया.

हुआ यह कि एक दिन पिताजी को जोर की खांसी आई और साथ ही खून की उलटी हो गई. खांसी और बुखार तो पहले ही था. कैमिस्ट से कोई गोली ला कर ठीक हो जाते. सरकारी अस्पताल में दिखा कर दवाएं दी गईं, लेकिन कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. वे मरने की हालत में हो गए.

लेकिन इतने से क्या होता है? नीरज की जिंदगी में दुखों की लंबी लिस्ट थी. लेकिन ऐसा नहीं था कि नीरज पढ़ालिखा नहीं था, पर सामने मुसीबतों का अंबार लगा था.

किसी प्राइवेट डाक्टर को दिखाया, तो उस ने बताया कि बीमारी पुरानी हो गई है, दवाएं लेते रहें. पर दवाएं बहुत महंगी थीं. मां ने गहने बेच कर दवाओं का इंतजाम किया.

पिताजी ने किसी तरह जिंदगी का बोझ ढोते हुए नीरज को बीटैक कंप्यूटर साइंस में करवाई. दूसरे भाईबहनों को भी पढ़ाया. परिवार में कभी शादीत्योहार आया तो भी किसी से पीछे कम ही रहे. अब परिवार की सारी उम्मीदें नीरज पर ही टिकी थीं.

नीरज की पूरी कोशिश रही कि कहीं कोई अच्छी नौकरी मिल जाए. अच्छी नौकरी के लिए भी चांदी का जूता नहीं, सोने का चाहिए. सोने का जूता उस के पास होता तो अच्छी नौकरी न सही, कोई छोटामोटा बिजनैस ही कर लेता. कम से कम घर का गुजारा तो ठीक से चलता. कोई सिफारिश की भी बड़ी तोप न थी. लेदे कर चाचाजी थे. उन्हें सिर्फ अपना परिवार ही दिखता था.

चाचाजी तो अपनी बड़ी पोस्ट का रोब ही दिखाते थे. नीरज ने हिम्मत नहीं हारी. रेलवे, बैंक, तमाम सरकारी नौकरियों के लिए अप्लाई करता रहा. कुछ टैस्ट भी क्लियर किए, लेकिन सिफारिश न होने के चलते बात नहीं बनी. पैसा उस के पास था नहीं.

यह पैसे की ही माया है कि अपने अपने न रहे. पैसा है तो सबकुछ है. एकाध को छोड़ कर दोस्त भी धीरेधीरे कन्नी काटते गए. धीरेधीरे सब छूट गए या छोड़ दिया.

परिवार के होते हुए भी नीरज एकदम अकेला था. वह हर तरह के जतन कर चुका था, पर कहीं कोई राह नहीं दिख रही थी.

हद तो तब हुई, जब नीरज नीचता की सारी सीमाएं लांघ गया, तब एक दोस्त उसे अपने घर ले गया. वह चाय लेने गया, तो नीरज मेज पर पड़ी उस की किताबें पलटने लगा. अचानक एक किताब से 100-100 के 2 नोट नीचे गिर गए.

लालच ने नीरज की बुद्धि खराब कर दी. उस ने रुपए अपनी जेब में रख लिए. चाय पीने के बाद नीरज चलने लगा, तो दोस्त अपनी वही किताब पलटने लगा. रुपए वहां होते तो मिलते.

दोस्त ने नीरज की ओर देखा, तो उस ने शर्मिंदगी के साथ रुपए निकाल कर उसे दे दिए और उस के पैर पकड़ कर माफी मांगी और कहा कि किसी को न बताए. लेकिन उस दोस्त ने सारी मित्र मंडली को नीरज की करतूत बता दी. दोस्तों ने नीरज को खूब खरीखोटी सुनाई. उसे ‘चोर’ का तमगा दे डाला. धीरेधीरे सब छूट गए. वह जिंदा रहा लानत भरी जिंदगी जीने के लिए.

नीरज का मन उसे धिक्कारता कि वह घर के लिए कुछ नहीं कर रहा है. पिताजी बिस्तर पर पड़े थे. नौकरी के लिए वह दरदर भटक रहा था. जिस बाप ने उसे कैसे भी पढ़ाया, वक्त पर वह कुछ नहीं कर रहा. उस का तो मर जाना ही अच्छा है.

तभी नीरज ने देखा कि सिगनल हरा हो गया है और दूर इंजन की लाइट नजर आ रही थी. वह पटरी पर लेट गया और आंखें बंद कर लीं. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. सारी बातें उस के दिमाग में किसी फिल्म की तरह चलने लगीं. उसे लगा कि जिंदगी खत्म कर देने से सारी समस्याएं सुलझ जाएंगी.

इस से पहले कि गाड़ी नीरज को रौंदती, किसी ने उसे जोर से खींच लिया. गाड़ी धड़धड़ाती हुई सीटी बजाते हुए निकल गई.

नीरज हक्काबक्का सा चारों ओर देखने लगा. कुछ लोग उसे घेर कर खड़े थे. वह पसीने से भीगा असहाय सा पड़ा था.

‘‘खुदकुशी करने चला था साला…’’ एक आदमी ने भद्दी सी गाली दी और साथ ही चांटा जड़ दिया.

‘‘पुलिस के हवाले कर दो इसे,’’ एक दूसरा आदमी बोला, ‘‘मरने से तू तो छूट जाता, पर तेरे घर वालों का क्या होता, सोचा है कभी यह?’’

नीरज घुटने के बल बैठ गया और सब से माफी मांगने लगा और फूटफूट कर रोने लगा. एक आदमी ने हाथ पकड़ कर उसे खड़ा किया. उस के घर का पता मालूम कर उस की बाजू पकड़ कर चल पड़ा. रास्ते में लोग उसे दुनियादारी के बारे में समझाते रहे.

नीरज जब गली के नुक्कड़ पर पहुंचा, तो कुछ लोग उसे अजीब सी नजरों से देख रहे थे. उसे लगा कि शायद उन्हें बात का पता चल गया है. एक बुजुर्ग ने उस के सिर पर हाथ फेरा.

घर से थोड़ा पास आने पर नीरज को रोने की आवाजें सुनाई देने लगीं. उसे घबराहट हुई और वह दौड़ कर अंदर पहुंचा तो देखा कि आंगन में मां पिताजी का सिर गोदी में रख कर रो रही थीं और उस के भाईबहन रोरो कर चीख रहे थे कि पिताजी अब इस दुनिया में नहीं थे.

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