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Hindi Funny Story: गिरगिर रिकौर्ड गिर

Hindi Funny Story: जबजब सज्जनों की तर्ज पर मैं गलती से सच्ची में नेकी वाला कोई काम करता हूं, तो हफ्ताभर शर्म से सिर नीचा किए रहता हूं. यह सोच कर कि जन्मजात समाज विरोधी काम करने वाले गधे, यह तू ने क्या कर दिया? इसे आप सीधेसीधे यों भी कह सकते हैं कि शायद मुझे नेकी का काम करते हुए शर्म आती है.

दरअसल, मैं अपने हाथ चलाता बुरे काम के लिए हूं और उन से गलती से यों अच्छा काम हो ही जाता है. इसे आप मेरी नहीं, बल्कि मेरे हाथों की लापरवाही भी कह सकते हैं.

अच्छा काम गलती से हो जाने के बाद पछतावे के तौर पर सिर नीचा किए मैं सुबह सैर को निकला था कि सामने रुपया गिरने की बेशर्मी के सारे रिकौर्ड तोड़़ने के बाद भी गर्व से सिर ऊंचा किए सीना ताने चला आ रहा था जौगिंग करता हुआ.

मैं दिमाग से ही नहीं, दिल से भी मानता हूं कि आज समाज में बेशर्मों की जयजयकार का जमाना है. मैं दिमाग से ही नहीं, दिल से भी मानता हूं कि आज समाज में बेशर्मों की हुंकार का जमाना है. फिर भी पता नहीं क्यों आप से यों ही पूछ रहा हूं कि ये बेशर्म टाइप के लोग ऐसे क्यों होते होंगे भाई साहब? इन्हें इज्जतबेइज्जती में कोई फर्क नजर आता होगा कि नहीं?

कर ले प्यारे रुपए, अपने आज तक के अपने सब से निचले स्तर पर गिरने के बाद भी इतराते हुए जितनी चाहे जौगिंग. कर ले प्यारे रुपए, अपने आज तक के निचले स्तर पर गिरने के बाद भी इतराते हुए जितनी चाहे अपनी सेहत सुधारने के लिए सैर. गले में स्मार्ट वाच लटकाए रोज 10 हजार स्टैप्स चल, चाहे 20 हजार. अपनी सेहत के हित में जिस की सेहत बिगाड़ने वाले सड़क से संसद तक बैठे हों, उस की सेहत में सुधार वह खुद तो क्या, कुदरत भी नहीं कर सकती.

वह चाहे कितनी ही जौगिंग कर ले. वह चाहे कितनी ही सैर कर ले. वह कितने ही अपनी सेहत सुधार के लिए स्वदेशी से ले कर विदेशी टौनिक ले ले. उस की अपनी सेहत सुधार के लिए हर इंपोर्टेड टौनिक उस की सेहत बिगाड़ने वालों को ही लगते हैं. टौनिक वह लेता है और हट्टेकट्टे वे होते हैं बिस्तर पर लेटेलेटे. इन दिनों पेट मेहनत की खाने वालों के बढ़ते देखे गए हैं, दूसरों के हिस्से की खाने वालों के नहीं.

खुद हद का गिरा हुआ होने के बावजूद भी हर टाइप के गिरे हुए की तरह उस गिरे हुए से भी बात करने को मन तो नहीं हो रहा था, फिर भी पता नहीं उस से क्यों बात कर बैठा? मतलबी से मतलबी आदमी किसी से बात किए बिना आखिर कब तक रह सकता है.

‘रुपया भाई, एक बात तो बताना बुरा न लगे तो, रिकौर्ड स्तर पर गिरने के बाद भी तुम इतनी जिंदादिली से यह सब कैसे कर लेते हो? रोजरोज गिरते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती क्या? अब तो जनता पर रहम करो.

‘अरे यार, मेरी तरह ऊपर उठ नहीं सकते तो कम से कम कुछ दिनों के लिए वहां तो रुक जाया करो जहां गिरते हो. मुझे तुम्हारा सबकुछ पसंद है, लेकिन रोजरोज गिरना कतई पसंद नहीं.

‘अपने हो, इसलिए कह रहा हूं. पड़ोसी होते तो कुछ न कहता. जितना गिरना होता गिरते रहते, मेरी
बला से.’

इस पर रुपए ने कहा, ‘रहम करें वे जो मुझे गिरातेगिराते ऊपर से ऊपर उठे जा रहे हैं. वैसे डियर, गिरा हुआ यहां कौन नहीं? यहां पलपल कौन नहीं गिर रहा बंधु. यहां नंदू से ले कर चंदू तक सब तो गिर रहे हैं.

‘किसी का यहां ईमान गिर रहा है, तो किसी का सम्मान. कोई अपने कर्म से गिर रहा है, तो कोई जीने के मर्म से. यहां गिरना सच है तो ऊपर उठना ?ाठ. ऐसे में मु?ा गिरे हुए को काहे की शर्म? शर्म वे करें जिन्हें गिरने में शर्म महसूस होती हो.

‘हां, शुरूशुरू में गिरने पर शर्म जरूर महसूस होती थी. पर जब कोई बारबार गिरने लग जाए तो वह शर्म से ऊपर उठ जाता है. बारबार गिरने की लत लग जाने के बाद उसे नैतिकता की कितनी ही ब्रांडेड घुट्टियां पिला लो, उसे उठने को जोर देने के लिए कितने ही प्रवचन सुना लो, पर तब वह पलपल गुनगुनाता हुआ, इतराता हुआ गिरता ही जाता है, क्योंकि तब उस की जिंदगी का एकलौता मकसद बचता है, बस गिरना… गिरना… गिरना…

‘अब तो हर गिरने वाले की तरह मुझे भी अपने रोजाना गिरने पर खुशी नहीं, बहुत खुशी होती है. अब सब की तरह चाहता हूं कि मैं अपने गिरने के रोज अपने रिकौर्ड अपनेआप ही तोड़ता रहूं, इसलिए जबजब पिछले गिरने के रिकौर्ड से और नीचे गिरता हूं, तो अपने गिरने पर जम कर अब्दुल्ला हो नागिन डांस कर लेता हूं. खुद को खुद की बांहों में जी भर लेता हूं.

‘दोस्त, इज्जत की कुरसियों पर लेटे रोजाना गिरने वालों से पूछो तो पता चले कि आज गिरने में कितना मजा छिपा है.

‘आज मेहनत करतेकरते ऊपर उठना सब से बड़ी गलती है. दूसरे, मेहनत करते हुए कोई आज ऊपर उठ भी नहीं सकता. मेहनत के बाद भी गिरे किसी को कहां उठने देते हैं? गिरने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती.

तुम्हारे पास दूर तक देखने की नजर नहीं है तो लो, मेरी दूरबीन से देखो, यहां जो आज जितना गिरा हुआ है, वह आज उतना ही इज्जत से उठा हुआ है.

‘आज इज्जत ऊपर उठने वालों की नहीं, गिरने वालों की है. समाज आज इज्जत ऊपर उठने वालों को नहीं, गिरने वालों को देता है. ऐसे में रिकौर्ड गिरने के बाद भी जो मैं शान से फिट रहने की कोशिश कर रहा हूं, तो तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों उठ रही है?’ रुपए ने मेरे माथे पर आया पसीना पोंछा और नकटा आगे हो लिया.

बेशर्मों के क्या सींग होते हैं भाई साहब… Hindi Funny Story

Family Story In Hindi: सोमा

Family Story In Hindi, लेखक – रंगनाथ द्विवेदी

सोमा अपने 2 कमरे के मकान में बिलकुल अकेली रहती थी. ऐसा नहीं है कि अकेले रहना उस का कोई शौक था. दरअसल, उस के मांबाप उसे बचपन में ही अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले गए थे. उन के मरने के बाद सोमा घर में बिलकुल अकेली रह गई थी.

सोमा के मम्मीपापा ने गैरजातीय ब्याह किया था, जिस की नाराजगी की वजह से सोमा के मम्मीपापा से उन के घर वालों ने अपना सारा रिश्ता हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर लिया था.

अनाथ और बेसहारा सोमा ने मेहनतमजदूरी कर के खुद को बिना किसी सहारे के पालापोसा था. अब वह पूरे 24 साल की हो चुकी थी. उस का रंग यों तो सांवला था, लेकिन उसे कुदरत ने इतनी अच्छी शक्लसूरत दी थी कि वह किसी भी गोरी लड़की से ज्यादा खूबसूरत लगती थी.

एक तरह से कहूं तो सोमा मुझे मन ही मन बहुत पसंद थी, लेकिन अपने दिल की बात उस से कहने की कभी मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ती थी.

इस की सब से बड़ी वजह थी सोमा का झगड़ालू स्वभाव. अकसर जब मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार हो कर अपने घर से निकलता था, तो उसे रोजाना महल्ले में किसी न किसी से जोरजोर से लड़तेझगड़ते हुए देखता था.

कभीकभार तो सोमा औरतों और मर्दों को ऐसीऐसी गालियां दे देती थी कि अच्छेअच्छे गाली देने वालों तक की टैं बोल जाए. सच तो यह था कि पूरी कालोनी ही उस के इस झगड़ालू स्वभाव की वजह से उस से बचती थी.

यहां तक कि महल्ले के ऐसे जवानजहान लड़के भी सोमा को देखते ही अपना रास्ता बदल लेते थे, जो दूसरी जवान लड़कियों पर दिनभर डोरे डालने की फिराक में रहा करते थे. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कहीं गलती से भी अगर सोमा की तरफ उन की आंख उठ गई, तो उन की इज्जत की खैर नहीं. न जाने कब वह चप्पल निकाल कर उन की धुनाई शुरू कर दे और लड़?ागड़ कर पूरे महल्ले को अपने सिर पर उठा ले.

आज लगातार यह चौथा दिन था, जब मेरे दफ्तर जाते समय मैं ने कालोनी में किसी औरत या मर्द से सोमा के झगड़ने और गालीगलौज देने की आवाज नहीं सुनी. शाम को जब मैं अपने दफ्तर से घर के लिए निकला, तो रास्तेभर यह सोचता हुआ अपने कमरे पर लौटा कि किसी तरह हिम्मत कर के आज मैं यह जानने की कोशिश करूंगा कि आखिर सोमा 3-4 दिन से कहां है?

यह एक तरह से मेरे दिल में सोमा के लिए छिपा हुआ वह प्यार ही था जो मुझे कहीं न कहीं सोमा की खोजखबर लेने के लिए बढ़ावा दे रहा था. लेकिन सवाल यह था कि मैं सोमा के बारे में कालोनी में किस से पूछूंगा कि आखिर वह 3-4 दिनों से दिख क्यों नहीं रही? क्या कोई बात है या कहीं वह किसी नातेरिश्तेदार के आने पर उस के साथ चली गई है?

लेकिन नातेरिश्तेदार वाला सवाल मेरे मन को जमा नहीं, क्योंकि जितना मैं ने सोमा के बारे में लोगों से जाना और सुना था, उस के मुताबिक ऐसा होना मुमकिन नहीं था.

फिर कुछ देर यों ही सोचते रहने के बाद मैं खुद ही डरता और मन ही मन कांपता हुआ सोमा के उस 2 कमरे की मकान की तरफ चल पड़ा.

जब मैं उस के मकान के पास पहुंचा तो लगा कि जैसे अभी सोमा धड़धड़ाते हुए अपने कमरे का दरवाजा खोलेगी और मुझ से बिना कुछ पूछे बेतहाशा झगड़ पड़ेगी.

लेकिन यह मेरा भरम ही साबित हुआ, क्योंकि सोमा का दरवाजा बिना खटखटाए ही भला वह कैसे जान सकती थी कि मैं उस के दरवाजे के पास खड़ा हूं.

फिर थोड़ी देर मैं ने खुद को सोमा के घर के दरवाजे के सामने सामान्य हो लेने दिया. जब खुद को काफी सामान्य महसूस किया, तो मैं ने हिम्मत कर के उस के दरवाजे की सांकल खटखटा कर पूछा, ‘‘कोई है?’’

लेकिन मेरे ‘कोई है?’ कहने में वह दम नहीं था, जो अगले को साफ सुनाई दे. एक बार फिर मैं ने किसी तरह जोर से सांकल बजाने के साथ ही कहा, ‘‘कोई है?’’

इस बार शायद मेरी आवाज को सोमा ने सुन लिया लिया था, क्योंकि अंदर से आवाज आई, ‘‘कौन है?’’
मैं ने जब गौर किया तो मुझे एकबारगी यकीन ही नहीं आया कि यह उसी सोमा की आवाज थी, जो अगर एक बार बोल देती थी तो कालोनी के किसी भी आदमी या औरत की घिग्गी बंध जाती थी.

सोमा ने फिर कहा, ‘‘कौन है?’’

मैं ने कहा, ‘‘जी मैं.’’

‘‘अरे, कौन मैं?’’ इस बार सोमा ने अपनी आवाज कड़क करने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन मुझे साफसाफ लग रहा था कि उस दबंग सोमा की आवाज यह भी नहीं थी.

कुछ देर बाद पता नहीं सोमा ने क्या सोचा और कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है. अंदर आ जाओ.’’

जब मैं कमरे के अंदर सोमा के पास पहुंचा, तो मैं ने उसे एक पुराने से बिस्तर पर लेटे हुए देखा. मैं यह अच्छे से समझ गया था कि सोमा की तबीयत ठीक नहीं है.

फिर सोमा धीरे से बोली, ‘‘अरे, अंबर तुम.’’

हालांकि सोमा ने चौंकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं यह पहले ही जान गया था कि सोमा पहचान गई थी.
‘‘आओ, बैठो,’’ सोमा ने एक खाली पड़े हुए एक पुराने से स्टूल की तरफ इशारा किया.

मैं उस स्टूल पर बैठ तो गया, लेकिन चुपचाप अपना सिर नीचे किए रहा.

मेरी यह हालत देखने के बाद सोमा ने मुझ से खुद ही पूछा, ‘‘और बताओ अंबर, तुम मेरे पास किसलिए आए हो?’’

सोमा को इस तरह से बोलते हुए देख कर मुझे भी थोड़ी सी हिम्मत हुई, तो मैं ने कहा, ‘‘तुम 3-4 दिनों से दिखी नहीं, इसलिए मैं ने सोचा कि क्यों न तुम्हारे घर चल कर तुम्हारा हालचाल जान लिया जाए.’’

मेरे इतना कहने के बाद सोमा कुछ देर अपलक मेरे चेहरे की तरफ देखती रही, जैसे वह मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हो.

कुछ देर के बाद सोमा बोली, ‘‘तुम झूठ बोल रहे हो अंबर. तुम ने 3-4 दिनों से महल्ले में मुझे किसी से लड़तेझगड़ते या गालीगलौज देते हुए नहीं देखा, इसलिए तुम मेरे बारे में जानने के लिए घर चले आए.

‘‘लेकिन अंबर, यह भी तुम्हारा आधा ही सच है, पूरा नहीं. सच तो यह है कि तुम्हारे मन में कुछ और भी है, जिसे तुम केवल इसलिए मुझ से कह पाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हो कि कहीं मैं तुम्हारी बात सुन कर तुम से लड़नेझगड़ने न लगूं. यही बात है न अंबर?’’

मैं ने सिर झुकाए हुए ही छोटा सा अपना जवाव उसे ‘जी हां’ में दिया.

‘‘अंबर, तुम मुझ से साफसाफ क्यों नहीं कहते कि तुम मुझ से मन ही मन बहुत प्यार करते हो…’’

एक बार फिर मेरे मुंह से ‘जी हां’ निकल गया. और फिर जैसे मेरी हिम्मत जवाब दे गई और लगा कि यह मैं क्या कह गया? कहीं सच में सोमा मुझ से लड़नेझगड़ने और गाली न देने लगे.

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि सोमा अचानक से सुबक कर किसी मासूम सी बच्ची की तरह रोने लगी. मैं टुकुरटुकुर सोमा के चेहरे की तरफ देखता ही रहा. उसे चुप कराने की मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी.

कुछ देर रो लेने के बाद एक बार फिर सोमा बोली, ‘‘जानते हो अंबर… मैं पैदा होने के बाद पता नहीं कब और किस उम्र में रोई थी, इस का मुझे कुछ पता नहीं. मैं तो यह तक नहीं जानती थी कि ये आंखें रोने के लिए भी होती है. आज पहली बार तुम्हारी वजह से मेरी इन सूनी आंखों को रोने का सुख मिला है अंबर.’’

मैं ने पहली बार सोमा का ऐसा रूप देखा था, इसलिए मैं कुछ भी कह पाने की हालत में नहीं था.

सोमा फिर बोली, ‘‘मैं बहुत पहले से जानती हूं कि तुम मन ही मन मुझ से प्यार करते हो. अंबर, लेकिन मेरे स्वभाव की वजह से तुम्हारी हिम्मत कुछ कहने की नहीं हो पा रही थी. और मैं भला एक लड़की हो कर इतनी बेहया कैसे हो सकती थी कि तुम से अपने दिल की बात खुद कहती.

‘‘अंबर, मैं ने चाहे जैसा भी स्वभाव लोगों के मन में गढ़ा हो, वह एक तरह से मेरी मजबूरी थी, क्योंकि अगर मैं ऐसा न करती तो मुझे घर में अकेली जान कर इसी महल्ले के शरीफ और इज्जतदार लोग मु?ो कहीं का नहीं छोड़ते.

‘‘दूसरी आम लड़कियों की तरह मेरे भी अरमान हैं, लेकिन मेरे अनाथ होने का एहसास मुझे अंदर तक तोड़ देता है. तुम खुद सोचो अंबर, अगर मैं अनाथ न होती तो आज पूरे 4 दिनों से बुखार से तपतीतड़पती क्या मैं अकेले पड़ी होती. आज मेरे आसपास कोई यह तक पूछने वाला नहीं है कि मेरी तबीयत कैसी है?

‘‘यह देखो अंबर…’’ इतना कह कर सोमा ने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया.

जब मैं ने सोमा का हाथ छुआ, तो बरबस ही मेरा हाथ उस के माथे पर भी पड़ गया. सोमा का माथा किसी गरम तवे की तरह जल रहा था.

मैं बोला, ‘‘अरे, सोमा. तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है और तुम चुपचाप घर में पड़ी हो. क्या तुम्हें अपने तबीयत की जरा भी फिक्र नहीं है…’’

सोमा तेज बुखार में भी मुसकराई और बोली, ‘‘बैठ जाओ अंबर. मुझे कुछ भी नहीं हुआ है. मैं 2-4 दिनों में ठीक हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं सोमा. तुम्हें तो किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना चाहिए. यह शायद सोमा के प्रति अंबर का प्यार ही था, जो वह उस से इस हक से बोला, ‘‘अच्छा, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. मैं तुम्हें किसी अच्छे डाक्टर को दिखा लाता हूं.’’

‘‘नहीं अंबर, मैं ऐसे ही ठीक हूं. तुम अपने घर जाओ. तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है,’’ सोमा बोली.

थोड़ा रुक कर सोमा ने कहा, ‘‘तुम्हें नहीं पता जब कालोनी वाले मुझे तुम्हारे साथ अकेला जाते हुए देखेंगे तो वे मुझे चरित्रहीन भी समझना और कहना शुरू कर देंगे. तब शायद मैं इतनी बड़ी गाली बरदाश्त न कर पाऊं…’’

अंबर ने एक लंबी सांस ली, फिर वह बोला, ‘‘सोमा, ऐसी कोई नौबत ही नहीं आएगी. तुम इस की जरा भी चिंता मत करो.’’

सोमा बोली, ‘‘क्यों?’’

अंबर ने कहा, ‘‘क्योंकि तुम जैसे ही बुखार से ठीक होगी, हम उस के तीसरे ही दिन शादी कर लेंगे. तुम मेरी बात का यकीन करो और जल्दी से डाक्टर के यहां चलने के लिए तैयार हो जाओ.’’

सोमा धीरे से बिस्तर से उठी, लेकिन अंबर को लगा कि सोमा को खड़े होने में दिक्कत होगी, इसलिए उस ने सोमा को सहारा दे कर खड़ा किया.

सोमा चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई. थोड़ी देर बाद जब वह उस कमरे से अपने कपड़े बदल कर बाहर निकली, तो उसे देख कर अंबर ने कहा, ‘‘चलो सोमा.’’

सोमा हलके से मुसकरा दी. उसे सबकुछ बड़ा अजीब सा लग रहा था. लगता भी क्यों न, आखिर आज पहली बार वह किसी के साथ कहीं बाहर जा रही थी. वह भी एक झगड़ालू, गालीगलौज देने वाली सोमा बन कर नहीं, बल्कि किसी के दिल की रानी बन कर. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: जीवन और नाटक

Hindi Family Story: ‘‘माहिका बेटे, देख तो कौन आया है. जल्दी से गरम पकौड़े और चाय बना ला. चाय बढि़या मसालेदार बनाना.’’ जूही ने अपनी बेटी को पुकारा और फिर से अपनी सहेली नीलम के साथ बातचीत में व्यस्त हो गई.

‘‘रहने दे न. परीक्षा सिर पर है, पढ़ रही होगी बेचारी. मैं तुम्हें लड़कियों के फोटो दिखाने आई हूं. पंकज अगले माह 25 का हो जाएगा. जितनी जल्दी शादी हो जाए अच्छा है. उस के बाद उस की छोटी बहन नीना का विवाह भी करना है. ले यह फोटो देख और बता तुझे कौन सी पसंद है,’’ नीलम ने हाथ में पकड़ा लिफाफा जूही की ओर बढ़ाया. देर तक दोनों बारीबारी से फोटो देख कर मीनमेख निकालती रहीं.

कुछ देर बाद जूही ने 2 फोटो निकाल कर नीलम को थमा दिए.

‘‘दोनों ही अच्छी लग रही हैं. वैसे भी हमारेतुम्हारे पसंद करने से क्या होता है. पसंद तो पंकज की पूछो. महत्त्व तो पंकज की पसंद का है. है कि नहीं? हमारीतुम्हारी पसंद को कौन पूछता है. यों भी फोटो से किसी के बारे में कितना पता लग सकता है. असली परख तो आमनेसामने बैठ कर ही हो सकती है.’’

तब तक माहिका पकौड़े और चाय ले कर आ गई थी.

‘‘सच कहूं जूही, तेरी बेटी बड़ी गुणवान है, जिस घर में जाएगी उस का तो जीवन सफल हो जाएगा,’’ नीलम ने गरमगरम पकौड़े मुंह में रखते हुए प्रशंसा की झड़ी लगा दी.

‘‘माहिका तू भी तो बता अपनी पसंद,’’ नीलम ने माहिका की ओर फोटो बढ़ाए.

‘‘आंटी मैं भला क्या बताऊंगी. यह तो आप बड़े लोगों का काम है.’’ माहिका धीमे स्वर में बोल कर मुड़ गई.

‘‘ठीक ही तो कह रही है, बच्चों को इन सब बातों की समझ कहां. वैसे भी परीक्षा की तैयारी में जुटी है.’’ जूही बोली.

‘‘तुझे नहीं लगता कि आजकल माहिका बहुत गुमसुम सी रहने लगी है. पहले तो अकसर आ जाती थी, दुनिया भर की बातें करती थी, घर के काम में भी हाथ बंटा देती थी, पर अब तो सामने पड़ने पर भी कतरा कर निकल जाती है.’’

‘‘इस उम्र में ऐसा ही होता है. मुझ से भी कहां बात करती है. किसी काम को कहो तो कर देगी. दिन भर लैपटौप या फोन से चिपकी रहेगी. इन सब चीजों ने तो हमारे बच्चों को ही हम से छीन लिया है.’’

‘‘सो तो है पर हमारा भी तो अधिकतर समय फोन पर ही गुजरता है,’’ जूही ऐसी अदा से बोली कि दोनों सहेलियां खिलखिला कर हंसीं.

नीलम को विदा करते ही जूही काम में जुट गई.

‘‘नीलम आती है तो जाने का नाम ही नहीं लेती. रजत के आने का समय हो गया है. अभी तक खाना भी नहीं बना है. रजत का कुछ भरोसा नहीं. कभी चाय पीते हैं, तो कभी सीधे खाना मांग लेते हैं,’’ जूही स्वयं से ही बातें कर रही थी.

‘‘माहिका तुम अब तक फोन से ही चिपकी हुई हो. यह क्या तुम तो रो रही हो. क्या हुआ?’’ माहिका का स्वर सुन कर जूही उस के कमरे में पहुंची थी.

‘‘कुछ नहीं अपनी सहेली स्नेहा से बात कर रही थी, तो आंखों में आंसू आ गए.’’

‘‘क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है.’’

‘‘कहां ठीक है. बेचारी बड़ी मुसीबत में है.’’

‘‘कैसी मुसीबत?’’

‘‘लगभग 4 वर्ष पहले उस ने सब से छिप कर मंदिर में विवाह कर लिया था. पर अब उस का पति दूसरी शादी कर रहा है.’’

‘‘क्या कह रही है? स्नेहा ने 4 वर्ष पहले ही विवाह कर लिया था? उस के मातापिता को पता है या नहीं?’’

‘‘किसी को पता नहीं है.’’

‘‘दोनों साथ रहते हैं क्या?’’

‘‘नहीं विवाह होते ही दोनों अपने घर लौट कर पढ़ाई में व्यस्त हो गए.’’

‘‘दोनों के बीच संबंध बने हैं क्या?’’

‘‘नहीं, इसीलिए तो दूसरा विवाह कर रहा है.’’

‘‘इस तरह छिप कर विवाह करने की क्या आवश्यकता थी. आजकल की लड़कियां भी बिना सोचेसमझे कुछ भी करती हैं. स्नेहा के मातापिता को पता लगा तो उन पर क्या बीतेगी?’’ जूही चिंतित स्वर में बोली.

‘‘पता नहीं आप ही बताओ अब वह

क्या करे?’’

‘‘चुल्लू भर पानी में डूब मरे और क्या. उस ने तो अपने मातापिता को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

‘‘थोड़ी ही देर में यहां आ रही है स्नेहा. आप ही उसे समझा देना.’’

‘‘यहां क्या करने आ रही है? उस से कहो अपने मातापिता से बात करे. वे ही कोई रास्ता निकालेंगे.’’ मांबेटी का वार्तालाप शायद कुछ और देर चलता कि तभी दरवाजे की घंटी बजी और स्नेहा ने प्रवेश किया.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के गले लिपट कर खूब रोईं. जूही सब कुछ चुपचाप देखती रहीं. समझ में नहीं आया कि क्या करे.

‘‘अब रोनेधोने से क्या होगा. अपने कमरे में चल कर बैठो मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

‘‘नहीं आंटी, कुछ नहीं चाहिए. मेरी चिंता तो केवल यही है कि इस समस्या का समाधान कैसे निकलेगा?’’ स्नेहा गंभीर स्वर में बोली.

‘‘सच कहूं, स्नेहा मुझे तुम से यह आशा नहीं थी.’’

‘‘पर मैं ने किया क्या है?’’

‘‘लो और करने को रह क्या गया है. तुम्हें छिप कर विवाह करने की क्या जरूरत थी.’’

‘‘मैं ने छिप कर विवाह नहीं किया आंटी? आप को अवश्य कोई गलतफहमी हुई है.’’

‘‘समझती हूं मैं. पर मेरी मानो और जो हो गया सो हो गया, अब सब कुछ अपने मातापिता को बता दो.’’

‘‘मेरे मातापिता का इस से कोई लेनादेना नहीं है. वैसे भी मैं उन से कोई बात नहीं छिपाती. इस समय तो मुझे माहिका की चिंता सता रही है. आप को ही कोई राह निकालनी पड़ेगी जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

‘‘साफसाफ कहो न पहेलियां क्यों बुझा रही हो.’’

‘‘आंटी माहिका ने जो कुछ किया वह निरा बचपना था. जब तक उसे अपनी गलती समझ में आई, देर हो चुकी थी. मुझे भी लगा कि देरसबेर पंकज इसे स्वीकार कर लेगा पर यहां तो उल्टी गंगा बह रही है. माहिका बेचारी हर साल पंकज के लिए करवाचौथ का व्रत करती रही पर वह नहीं पसीजा. अब बेचारी माहिका करे भी तो क्या?’’

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? विवाह तुम ने नहीं माहिका ने किया था?’’

‘‘वही तो. चलिए आप की समझ में तो आया. अभी तक तो आप मुझे ही दोष दिए जा रही थीं.’’ स्नेहा हंस दी.

‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं. माहिका इतनी बड़ी बात छिपा गईं तुम? हम ने क्याक्या आशाएं लगा रखी थीं और तुम ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा. अब यह और बता दो कि किस से रचाया था तुम ने यह अद्भुत विवाह.’’

‘‘पंकज से.’’

‘‘कौन पंकज? नीलम का बेटा?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘नीलम जानती है यह सब?’’

‘‘मुझे नहीं पता.’’

‘‘पता क्या है तुझे कमबख्त. राखी बांधती थी तू उस को. मुझे अब सब समझ में आ रहा है इसीलिए तू करवाचौथ का व्रत करने का नाटक करती थी. तेरे पापा को पता चला तो हम दोनों को जान से ही मार देंगे. उन्हें तो वैसे भी उस परिवार से मेरा मेलजोल बिलकुल पसंद नहीं है,’’ वे क्रोध में बोलीं और माहिका को बुरी तरह धुन डाला.

‘‘आंटी क्या कर रही हो? माना उस से गलती हुई है पर उस के लिए आप उस की जान तो नहीं ले सकतीं.’’ स्नेहा चीखी.

जूही कोई उत्तर दे पातीं उस से पहले ही माहिका के पापा रजत ने घर में प्रवेश किया. उन के आते ही घर में सन्नाटा छा गया. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बात कहां से शुरू करें.

‘‘स्नेहा बेटे, कब आईं तुम और बताओ पढ़ाई कैसी चल रही है?’’ बात रजत ने ही शुरू की.

‘‘जी ठीक चल रही है.’’

‘‘आज बड़ी शांति है घर में. जूही एक कप चाय पिला दो, बहुत थक गया हूं.’’ उत्तर में जूही सिसक उठीं.

‘‘क्या हुआ? इस तरह रो क्यों रही हो. कुछ तो कहो.’’

‘‘कहनेसुनने को बचा ही क्या है, माहिका ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा.’’

‘‘क्या किया है उस ने?’’

‘‘उस ने विवाह कर लिया है.’’

‘‘क्यों मजाक करती हो. कब किया उस ने विवाह?’’

‘‘4 साल पहले किसी मंदिर में.’’

‘‘और हम से पूछा तक नहीं?’’ रजत हैरानपरेशान स्वर में बोले.

‘‘हम हैं कौन उस के जो हम से पूछती?’’

‘‘तो ठीक है, हम उस के विवाह को मानते ही नहीं. 4 साल पहले वह मात्र 15 वर्ष की थी. हमारी आज्ञा के बिना विवाह कर कैसे सकती थी. हम ने उस के उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे हैं. उन का क्या?’’ रजत बाबू नाराज स्वर में बोले. कुछ देर तक सब सकते में थे. कोई कुछ नहीं बोला. फिर अचानक माहिका जोर से रो पड़ी.

‘‘अब क्या हुआ?’’

‘‘पापा, मैं पंकज के बिना नहीं रह सकती. भारतीय नारी का विवाह जीवन में एकबार ही होता है.’’

‘‘किस भारतीय नारी की बात कर रही हो तुम? आजकल रोज विवाह और तलाक हो रहे हैं. जिस तरह पंकज के बिना 19 साल से रह रही हो, आगे भी रहोगी.’’

‘‘देखा स्नेहा मैं न कहती थी. पापा भी बिलकुल पंकज की भाषा बोल रहे हैं. पर मेरे पास अपने विवाह के पक्के सबूत हैं.’’

‘‘कौन से सुबूत हैं तुम्हारे पास,’’ रजत ने प्रश्न किया.

‘‘विवाह का फोटो है. गवाह के रूप में स्नेहा है और पंकज के कुछ मित्र भी विवाह के समय मंदिर में थे.’’

‘‘अच्छा फोटो भी है? बड़ा पक्का काम किया है तुम ने. ले कर तो आओ वह फोटो.’’ माहिका लपक कर गई और फोटो ले आई. रजत ने फोटो के टुकड़ेटुकड़े कर के रद्दी की टोकरी में डाल दिए.

‘‘कहां है अब सुबूत और स्नेहा बेटे बुरा मत मानना. तुम माहिका की बड़ी अच्छी मित्र हो जो उस के साथ खड़ी हो. पर इस समय अपने घर जाओ. जब हम यह समस्या सुलझा लें तब आना. केवल एक विनती है तुम से कि इन बातों का जिक्र किसी से मत करना.’’

‘‘जी, अंकल.’’ स्नेहा चुपचाप उठ कर बाहर निकल गई.

‘‘यह क्या किया आप ने? मैं तो सोच रही थी स्नेहा के साथ पंकज के घर जाएंगे. वही तो जीताजागत सुबूत है.’’ जूही जो अब तक इस सदमे से उबर नहीं पाई थीं आंसू पोंछते हुए बोलीं.

‘‘मुझे शर्म आती है कि इतना बड़ा कांड हो गया और हम दोनों को इस की भनक तक नहीं लगी. हमारा मुख्य उद्देश्य है माहिका को इस भंवर से निकालना वह भी इस तरह कि किसी को इस संबंध में कुछ पता न चले. हम कहीं किसी के घर नहीं जा रहे, न कोई सुबूत पेश करेंगे. माहिका जब तक अपनी पढ़ाई पूरी कर के अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता.’’

‘‘मुझे नहीं लगता पंकज का परिवार इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा करेगा. नीलम तो आज ही बहुत सारे फोटो ले कर आई थी मुझे दिखाने.’’

‘‘समझा, तो यह खेल खेल रहे हैं वे लोग. तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि माहिका का विवाह पंकज से संभव है. मैं ने उसे दसियों बार नशे में चूर पब से बाहर निकलते देखा है. पढ़ाईलिखाई में जीरो पर गुंडागर्दी में सब से आगे.’’

‘‘पर इन का विवाह तो 4 वर्ष पहले ही हो चुका है.’’

‘‘फिल्मों और नाटकों में अभिनेता अलगअलग पात्रों से कई विवाह करते हैं, तो क्या यह जीवन भर का नाता हो जाता है. समझ लो माहिका ने भी ऐसे ही किसी नाटक के पात्र का अभिनय किया था और एक चेतावनी तुम दोनों के लिए, उस परिवार से आप दोनों कोई संबंध नहीं रखेंगे. फोन पर भी नहीं. माहिका जैसी मेधावी लड़की का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. मैं नहीं चाहता कि वह बेकार के पचड़ों में पड़ कर अपना जीवन तबाह कर ले,’’ रजत दोनों से कठोर स्वर में बोले. मृदुभाषी रजत का वह रूप न तो कभी जूही ने देखा था और न ही कभी माहिका ने. दोनों ने सिर हिला कर स्वीकृति दे दी.

कुछ माह ही बीते होंगे कि एक दिन रजत ने सारे परिवार को यह कह कर चौंका दिया कि वे सिंगापुर जा रहे हैं. वहां उन्हें नौकरी मिल गई है. जूही और माहिका चुप रह गईं पर उन का 15 वर्षीय पुत्र विपिन प्रसन्नता से उछल पड़ा.

‘‘मैं अभी अपने मित्रों को फोन करता हूं.’’ वह चहका.

‘‘नहीं, मैं नहीं चाहता कि किसी को पता चले कि हम कहां गए हैं.’’ रजत सख्ती से बोले.

‘‘क्यों पापा?’’

‘‘बेटे हमारे सामने एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है. जब तक उस का हल नहीं मिल जाता हमें सावधानी से काम लेना पड़ेगा. इसीलिए हम चुपचाप जाएंगे बिना किसी को बताए.’’

तभी उन्हें पास ही माहिका के सुबकने का स्वर सुनाई पड़ा. जूही उसे शांत करने का प्रयत्न कर रही थी.

‘‘माहिका, इधर तो आओ. क्या हुआ बेटे?’’

‘‘कुछ नहीं पापा, आप की बात सुन कर लगा आप अब भी मुझ पर विश्वास नहीं करते,’’ माहिका आंसुओं के बीच बोली.

‘‘तुम ने जो किया उस के बाद विश्वास करना क्या इतना सरल है माहिका? विश्वास जमने में सदियां लग जाती हैं पर टूटने में कुछ क्षण. बस एक बात पर सदा विश्वास रखना कि तुम्हारे पापा तुम्हें इतना प्यार करते हैं कि तुम्हारे हितों की रक्षा के लिए किसी सीमा तक भी जा सकते हैं.’’

‘‘पापा मुझे माफ कर दीजिए मैं ने आप को बहुत दुख पहुंचाया है,’’ माहिका फूटफूट कर रो पड़ी. सारे गिलेशिकवे उस के आंसुओं में बह गए. Hindi Family Story

News Kahani: क्या सोनम ही बेवफा है

News Kahani: चांदनी को छत्तीसगढ़ गए एक महीना हो गया था. अनामिका का जन्मदिन आने वाला था. उस ने सोचा कि क्यों न इस बार विजय को सरप्राइज दिया जाए. इधर विजय भी अनामिका के जन्मदिन की तैयारी कर रहा था. उस ने सोचा था कि दिल्ली में ही कोई होटल बुक करा कर रातभर मस्ती करेंगे. पर अनामिका के इरादे कुछ और ही थे. थोड़े से एडवैंचर से भरे.

जन्मदिन से एक दिन पहले विजय और अनामिका एक कैफे में कौफी पी रहे थे. तभी अनामिका बोली, ‘‘विजय, कल सुबह 11 बजे तैयार रहना. हमें कहीं जाना है.’’

विजय ने पूछा, ‘‘कहां? कोई खास काम?’’ वह आज जन्मदिन का जिक्र नहीं करना चाहता था, वरना उस का सरप्राइज खुल सकता था.

‘‘है कोई खास जगह. हम वहां स्कूटी से चलेंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘ओह, तो मैडम मुझे किसी  सीक्रेट जगह ले जाना चाहती हैं,’’

विजय ने अनामिका का हाथ पकड़ कर कहा.

‘‘ज्यादा रोमांटिक बनने की जरूरत नहीं है. हां, हम कल जिस जगह जा रहे हैं, वह किसी जन्नत से कम नहीं है और हां, हम शाम तक वहां से वापस भी आ जाएंगे,’’ अनामिका ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा.

अगले दिन विजय और अनामिका स्कूटी पर निकल पड़े अपनी उस जन्नत की तरफ.

‘‘सुनो, हम फरीदाबाद से चलेंगे. वहां से गुड़गांव के पहाड़ी वाले रास्ते पर अपनी मंजिल है. रास्ते में हनुमान की मूर्ति भी देखनी है. सुना है, बहुत बड़ी है,’’ अनामिका बोली.

‘‘हमें इतनी दूर जाना है… ऐसा क्या है उन सूखी पहाडि़यों में… सुनसान इलाका है,’’ विजय ने पूछा.

‘‘तुम चलो तो सही मेरी जान…’’ अनामिका ने विजय को गुदगुदी करते हुए कहा.

‘‘यार, स्कूटी चलाते हुए मुझे गुदगुदी मत किया करो. कहीं स्कूटी ठोंक दूंगा तो फिर मत कहना,’’ विजय ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा.

‘‘ओह, साहब को गुदगुदी हो रही है,’’ इतना कह कर अनामिका विजय से चिपक गई.

सवा घंटे के बाद वे दोनों हनुमान की मूर्ति के आगे खड़े थे. सड़क किनारे थोड़ी ऊंचाई पर बड़े से हनुमान बैठे हुए थे. एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ से आशीर्वाद देते हुए. उन के सिर पर कोई छत नहीं.

‘‘देख लिया… अब चलें?’’ विजय ने अनामिका से पूछा.

‘‘तुम्हें पता है हनुमान के ज्यादातर मंदिरों में वे ऐसे बिना छत के क्यों रहते हैं?’’ अचानक से अनामिका
ने पूछा.

‘‘मुझे पता था यह सवाल जरूर आएगा. तुम ईश्वर को तो मानती नहीं, फिर भी यहां आई, कोई तो चक्कर है,’’ विजय ने कहा.

‘‘वह बात नहीं है. पर तुम ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया,’’ अनामिका एकदम से बोली.

‘‘पता नहीं. मैं ने कभी इस नजरिए से सोचा नहीं,’’ विजय बोला.

‘‘पता नहीं क्यों, मुझे ऐसा लगता है कि हनुमान को राम का दास बताया है, इसलिए वे आज भी दास की तरह ऐसे बिना छत के मूर्ति के रूप में बैठे या खड़े रहते हैं. गरीबों को ऐसे ही दास देवताओं की पूजा करने का हक दिया जाता है,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या तुम भी अपने जन्मदिन पर इतनी गंभीर सोच में पड़ गई. इस मुद्दे पर फिर कभी बहस करेंगे. मुझे अच्छा लगेगा हनुमान की मूर्ति पर चर्चा करने में,’’ विजय ने कहा.

‘‘जैसे हमारे प्रधानमंत्री परीक्षा पर चर्चा करते हैं,’’ अनामिका हंसते हुए बोली.

‘‘अब चलें, शाम तक वापस भी आना है,’’ विजय बोला.

वहां से निकल कर वे दोनों पहले तो कुछ देर फरीदाबादगुड़गांव रोड पर चलते रहे, फिर आगे जा कर बाईं तरफ कैंप वाइल्ड रोड की तरफ मंगर गांव की ओर बढ़ गए. वहीं पर उन की मंजिल थी होटल ललित मंगर.

कैंप वाइल्ड रोड एकदम सुनसान थी. दोनों तरफ अरावली का जंगल.

कुछ ही देर में वे दोनों होटल ललित मंगर पहुंच गए. बड़ा ही खूबसूरत  होटल था.

होटल के दरबान ने उन दोनों को स्कूटी पर देखा, तो उसे लगा कि शायद यहां भटक कर आ गए हैं, क्योंकि वहां तो अमूमन लोग बड़ी गाडि़यों में ही आते थे.

जब वे दोनों स्कूटी को पार्किंग में लगा कर भीतर जाने लगे, तो दरबान ने अदब से पूछा, ‘‘जी, यहां कैसे?’’

विजय पहले ही थक चुका था और अनामिका के सरप्राइज से भी बेखबर था, तो झल्ला गया और बोला, ‘‘क्यों, यहां आना बैन है क्या? इन मैडम से पूछिए कि इस सुनसान जंगल में मुझे क्यों लाई हैं…’’

अनामिका हंसी और दरबान से बोली, ‘‘हम ने 2 लोगों के लंच का रिजर्वेशन करा रखा है.’’

‘‘जी मैडम,’’ इतना कह कर दरबान ने उन को ‘वैलकल’ कहा.

होटल बहुत शानदार था. रैस्टोरैंट भी खूबसूरत था. अनामिका ने वहां के मैनेजर से बात की और विजय के साथ अपनी रिजर्व्ड सीट पर आ कर बैठ गई. थोड़ी देर में एक वेटर केक ले आया.

विजय केक देख कर हैरान रह गया. उसे सब समझ में आ गया. अनामिका ने केक काटा. फिर उन दोनों ने लंच किया.

विजय को बहुत अच्छा लगा. वह बोला, ‘‘वाह अनामिका, यह सरप्राइज तो शानदार था. पर यार, यहां तो बहुत देर हो गई. 3 बजने वाले हैं. अब निकलते हैं. घर भी टाइम से पहुंचना है.’’

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है. मैं अभी आई,’’ इतना कह कर अनामिका विजय से थोड़ा दूर जा कर खड़ी हो गई और फोन पर किसी से बातें करने लगी.

‘‘किस से बात कर रही थी?’’ जब अनामिका पास आई, तो विजय ने पूछा.

‘‘पापा से,’’ अनामिका बोली और विजय का हाथ पकड़ कर होटल घूमने की जिद करने लगी कि यहां आए हैं तो कुछ फोटो ही क्लिक कर लेते हैं. अपनी यादगार के लिए.

विजय बेमन से उठा और अनामिका के साथ चल दिया. अनामिका ने वेटर से कहा कि यह केक पैक कर दो, फिर वे होटल में यहांवहां घूमते हुए फोटो क्लिक करने लगे.

इस तरह वहीं शाम के 5 बज गए. विजय ने घड़ी देख कर कहा, ‘‘अब चलें… घर जातेजाते रात के 8 बज जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, हम अब चलते हैं,’’ अनामिका ने फोन में कोई मैसेज करते हुए कहा.

अभी वे दोनों स्कूटी से कुछ दूर गए ही थे कि अनामिका बोली, ‘‘जरा स्कूटी रोकना. मुझे वाशरूम जाना है.’’

‘‘पर यहां जंगल में कहां वाशरूम मिलेगा…’’ विजय ने कहा.

‘‘अरे, इतना बड़ा जंगल है. यहीं कर लेती हूं. तुम बस स्कूटी रोक दो,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम भी न यार,’’ इतना कह कर विजय ने सड़क किनारे स्कूटी रोक दी. अनामिका जंगल के कुछ अंदर चली गई.

जब कुछ देर हो गई और अनामिका बाहर नहीं आई, तो विजय को चिंता हुई. वह जंगल के अंदर जाने ही वाला था कि सामने से एक कार आई. उस में 4 मुस्टंडे टाइप लड़के बैठे थे.

‘‘अबे, यहां अकेले में क्या कर रहा है?’’ कार रोक कर एक लड़के ने पूछा.

‘‘तुम से मतलब…’’ विजय ने कहा.

इतने में अनामिका भी वहां आ गई. उसे देख कर दूसरे लड़के ने कहा, ‘‘यहां तो जंगल में मंगल हो रहा है और यह लड़का हम से कह रहा है कि तुम से मतलब. जहां लड़की, वहां हम.’’

इस के बाद उन लड़कों ने कार सड़क किनारे रोक दी और बाहर आ कर अनामिका से बदतमीजी करने लगे. यह देख विजय घबरा गया.

इतने में उन में से 2 लड़कों ने अनामिका को कस कर पकड़ा और जबरदस्ती जंगल में ले जाने लगे.

अनामिका चिल्लाई और बोली, ‘‘मुझे हाथ भी लगाया, तो विजय तुम सब को जिंदा नहीं छोड़ेगा.’’

पर सच कहें तो विजय की घिग्घी बंधी हुई थी. वह अकेला क्या कर लेता. उस की तो आवाज भी नहीं निकल पा रही थी. उस ने हाथ जोड़ कहा, ‘‘इसे कुछ मत करो. आज इस का जन्मदिन है. यह मेरे भरोसे यहां आई है.’’

तभी एक लड़के ने विजय को तमाचा जड़ दिया और बोला, ‘‘अबे, कैसा आशिक है तू. तेरी गर्लफ्रैंड को तुझ पर इतना भरोसा है और तू डर के मारे थरथर कांप रहा है. क्यों अनामिका, क्या किया जाए तेरे विजय बाबू के साथ?’’

‘‘तुम हम दोनों का नाम कैसे जानते हो?’’ विजय ने हैरान हो कर पूछा.

विजय का इतना कहना था कि वे सब खिलखिला कर हंस दिए. अनामिका सब से ज्यादा हंस रही थी. वह बोली, ‘‘अरे, मेरे डरपोक आशिक. ये सब मेरे दोस्त हैं. हम सब ने तुम्हारे साथ प्रैंक किया है.’’

यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई. अनामिका ने उन सब का परिचय विजय से कराया. दरअसल, वे अनामिका के दोस्त थे, जिन्हें विजय नहीं जानता था. उन सब ने विजय से ‘सौरी’ बोलते हुए कहा कि दिल पर मत लेना. हम ने तो वही किया, जो अनामिका ने हम से कहा था.

‘‘पर विजय, मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी. तुम तो कुछ ज्यादा ही घबरा गए,’’ अनामिका बोली.

‘‘मुझे तुम्हारी चिंता थी,’’ विजय धीरे से बोला.

‘‘क्यों… मुझे क्या हो जाता? ओह, शायद तुम्हें शिलांग वाला मामला याद आ गया, जिस में लड़के की लाश मिली और लड़की गायब…’’ अनामिका बोली.

‘‘कौन सा मामला? मैं समझा नहीं?’’ विजय ने पूछा.

‘‘चलो, कहीं बैठ कर बात करते हैं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘हमारा केक तो बचा कर लाई है न?’’ उन चारों में से एक लड़के ने अनामिका से पूछा.

‘‘लाई हूं बाबा, हम ने पैक करा लिया था,’’ अनामिका बोली.

अब वे 6 जने एक सस्ते से ढाबे पर बैठ कर चाय पी रहे थे.

विजय ने अनामिका से पूछा, ‘‘यह शिलांग वाला मामला क्या है?’’

अनामिका ने कहा, ‘‘यह बड़ा ही खौफनाक कांड है. एक जोड़ा हनीमून मनाने शिलांग गया था, पर वहां कुछ ऐसा घटा कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाएं.’’

‘‘यार, खबरिया चैनलों की तरह सनसनी मत फैलाओ. जो भी बात है वह बताओ न…’’ विजय ने पूछा.

‘‘तो सुनो… राजा रघुवंशी मर्डर केस की कहानी मध्य प्रदेश से शुरू होती है. जानकारी के मुताबिक, राजा और सोनम की शादी 11 मई को इंदौर में हुई थी. उस के बाद दोनों पतिपत्नी 20 मई को हनीमून के लिए मेघालय जाते हैं. यहीं से कहानी मोड़ लेती है.’’

‘‘क्या मोड़ लेती है?’’ इस बार अनामिका के एक दोस्त ने उस से पूछा.

‘‘मेघालय पहुंचने के बाद ऐसा कुछ हुआ कि इन दोनों की अपने परिवार वालों से कोई बातचीत नहीं होती है. न फोन आता है और न ही फोन जाता है. इस से राजा और सोनम के परिवार  वालों को चिंता सताने लगी कि क्या हुआ. ये लोग पुलिस के पास शिकायत ले कर पहुंचे.

‘‘पुलिस ने तेजी दिखाते हुए ऐक्शन शुरू किया. सभी सीसीसटी फुटेज देखे गए. कुछ दिन बाद पुलिस को एक स्कूटी मिली, जो सोनम और राजा ने किराए पर ली थी.

‘‘पुलिस ने मामले को संदिग्ध मानते हुए तलाशी अभियान तेज कर दिया. जंगलों में भी सर्च आपरेशन चलाया गया.’’

‘‘ओह, देश में इतना सनसनीखेज कांड हो गया और हमें भनक तक नहीं लगी,’’ अनामिका के दूसरे दोस्त ने कहा.

‘‘तुम ने पिछली बार अखबार कब पढ़ा था?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘याद नहीं. मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि हमारे घर में अखबार कौन सा आता है,’’ उस दोस्त ने जवाब दिया.

अनामिका ने उस दोस्त को घूरा, फिर आगे बोली, ‘‘28 मई को पुलिस को जंगल में 2 बैग लावारिस हालत में मिले. इन की पहचान कराई गई, तो सोनम के भाई और राजा की मां ने एकएक बैग को पहचान लिया.

‘‘अब तो यह मामला और ज्यादा पेचीदा होने लगा था कि आखिर सोनम और राजा कहां गए? फिर अचानक 2 जून को विजाडोंग इलाके से राजा रघुवंशी की लाश मिली. राजा की बौडी पर बने एक टैटू के चलते उस की पहचान हो सकी.

‘‘वहीं, राजा की लाश के पास से एक सफेद शर्ट, मोबाइल की टूटी स्क्रीन भी पुलिस ने बरामद की. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि राजा की मौत हादसा नहीं, बल्कि हत्या है.

‘‘पुलिस को अब सोनम की तलाश थी. उस का कुछ भी अतापता नहीं चल रहा था. ऐसा माना जा रहा था कि सोनम भी किसी हादसे का शिकार हो गई है. ऐसी भी अफवाह उड़ी थी कि राजा को मार कर हत्यारे सोनम को बंगलादेश ले गए होंगे. लेकिन पुलिस सभी तथ्यों पर जांच कर रही थी.’’

‘‘करनी भी चाहिए. लोग शादी के बाद हनीमून मनाने के लिए इसलिए कहीं जाते हैं कि पतिपत्नी एकदूसरे को समझ सकें. उन का बंधन और ज्यादा मजबूत हो जाए,’’ विजय ने कहा.

इस पर अनामिका ने कहा, ‘‘पर यहां तो इस कांड में नया मोड़ आने वाला था.  मेघालय के मुख्यमंत्री कौनराड के. संगमा ने ट्वीट कर के बताया कि 7 दिन की मशक्कत के बाद मेघालय पुलिस को बड़ी कामयाबी मिली है. पुलिस ने 4 हमलावरों को गिरफ्तार किया है. वहीं, एक औरत ने भी सरैंडर किया है.’’
‘‘किस औरत ने?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मेघालय की डीजीपी ने बताया कि राजा रघुवंशी की हत्या में उस की पत्नी सोनम का हाथ है. उसी ने हत्या करवाई है. इस के बाद मोड़ तब आया जब सोनम ने गाजीपुर, उत्तर प्रदेश के एक ढाबे से अपने घर फोन किया और बताया कि वह यहां है.

‘‘सोनम के भाई ने तुरंत इंदौर पुलिस को इस बात की जानकारी दी. पुलिस ने गाजीपुर पुलिस से संपर्क किया और सोनम को वन स्टौप सैंटर भेज दिया गया.

पुलिस ने सोनम का सब से पहले मैडिकल कराया. उस में पता चला कि सोनम के शरीर पर कहीं भी चोट का एक निशान नहीं है यानी उस के साथ कोई जोरजबरदस्ती नहीं की गई.

‘‘पुलिस ने फौरन सोनम को हिरासत में लिया और पूछताछ शुरू कर दी. पुलिस यह भी जानना चाहती थी कि वह गाजीपुर तक कैसे पहुंची.’’

‘‘पर यह तो पुलिस बोल रही है. सोनम क्या कहती है और इस हत्याकांड के पीछे की असली वजह क्या है?’’ विजय ने पूछा.

अनामिका बोली, ‘‘सोनम तो खुद को बेकुसूर बता रही है. पर अगर पुलिस की मानें तो सोनम और राज नाम के एक लड़के के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा था. पिता के हार्ट पेशेंट होने से सोनम लवमैरिज नहीं कर पा रही थी.

‘‘पिता अपने समाज में उस की शादी करना चाहते थे, इसलिए उस ने राजा से शादी को हां कर ली थी. उस ने पहले ही तय कर लिया था कि शादी के बाद राजा को मार कर राज के साथ रहने लगेगी.

‘‘सोनम ने राज से कहा था कि जब मैं विधवा हो जाऊंगी, फिर तुम मुझ से शादी कर लेना. तब मेरे परिवार वाले भी हमारी शादी के लिए मान जाएंगे.’’

‘‘यह क्राइम स्टोरी तो बड़ी पेचीदा है. जब तक यह केस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचेगा, तब तक कुछ न कुछ नया ही सुनने को मिलेगा,’’ अनामिका के एक दोस्त ने कहा.

‘‘तब की तब देखेंगे, फिलहाल तो हमें निकलना चाहिए. हम पहले ही लेट हो गए हैं,’’ विजय ने कहा.
अनामिका बोली, ‘‘ठीक है, अब घर चलते हैं.’’ News Kahani

Hindi Family Story: काकुली

Hindi Family Story, लेखक – एसी ठाकुर

जब वह मिली तो बहुत उदास सी लगी थी. अलबत्ता वह मां तो बन चुकी थी. एक खूबसूरत बेटी थी उस की गोद में. ठीक उसी की तरह बड़ीबड़ी आंखें और हलकी चपटी नाक. वह गुमसुम बैठी कहीं खोई हुई थी.
‘‘कब आई हो?’’ न चाहते हुए भी मैं ने ही पहले टोक दिया.

मेरी आवाज सुन वह जैसे कहीं से तुरंत वापस हुई हो, बोली, ‘‘ओह, आप हैं… नमस्कार…’’ थोड़ी सी सूखी मुसकराहट उस के होंठों पर तैर गई. उस ने अपने पल्लू को तुरंत ठीक किया. अपने माथे को पोंछने के अंदाज में हाथ फिराया. सहज होने की भरसक कोशिश की. कुछ पलों की यह कोशिश बहुतकुछ कह गई.

‘‘आप बैठिए न,’’ कहते हुए वह सोफे पर एक किनारे खिसक गई.

‘‘कब आई हो?’’ मैं ने सवाल दोहराया.

‘‘कल ही तो…’’

‘‘क्या आनंद बाबू भी आए हैं?’’

उस ने ‘न’ में सिर हिलाया.

‘‘तो फिर किस के साथ आई हो?’’

इस बार उस की नजरें झुक गईं. चेहरे पर बल पड़ता दिखाई दिया. फिर वह बोली, ‘‘अकेली.’’

‘‘सच? वाह, तब तो तुम बहुत होशियार हो गई हो.’’

‘‘होशियार हुई नहीं, होने जा रही हूं,’’ उस ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब जानना चाहेंगे?’’

मैं ने ‘हां’ में सिर हिलाया तो वह बोली, ‘‘मैं ने आप के आनंद बाबू से तलाक ले लिया है.’’

‘‘क्या?’’ मैं हैरानी से उसे देखता रह गया.

‘‘यह सच है…’’ वह धीरे से बोली.

यह सुन कर मेरी धड़कन तेज हो गई.

‘‘मैं दोबारा अपनी जगह वापस आना चाहती हूं. लेकिन कुछ वक्त के बाद. पहले मैं अकेली थी, अब मेरी छोटी सी बेटी भी है. इतना ही नहीं, पहले मैं घमंडी थी, अब ऐसी बात नहीं है,’’ वह थोड़ा रुकी, फिर बोली, ‘‘लेकिन ठहरिए, क्या मेरी ‘जगह’ मुझे अपना लेगी? यही चिंता है…’’

‘‘तुम्हें हैरानी होगी कि उस ‘जगह’ को भूचाल भी नहीं बदल सका. वह न हिली है, न डुली है. आज भी पहले जैसी है,’’ इस बार अनचाहा सन्नाटा छा गया.

मैं ने सोफे पर बैठेबैठे आंखें चारों ओर घुमाईं. उस वक्त कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा था. वह घर अतीत को हूबहू जीने लगा था.

मैं यानी किशन और काकुली साथसाथ पढ़ते थे. मैं था शांत और वह नटखट. मैं पढ़ने में तेज और वह नाचने और गाने में. वह पिता की तीसरी और आखिरी औलाद थी. 2 बड़े भाई थे. वह घरभर की दुलारी थी, बड़े बाप की बेटी. घर में किसी चीज की कमी न थी.

मेरे पिता की काकुली के पिता से दोस्ती थी. मैं बचपन से ही वहां आताजाता था, कोई रोकटोक नहीं. सच पूछिए, तो कब हम दोनों में प्यार हुआ, जानता नहीं.

समय बीता. काकुली पीछे छूट गई, मैं आगे बढ़ा. मैं बैंक में अफसर बन गया. मेरी शादी हुई. बीवी काफी वक्त साथ रही. खुश थी. मुझे बहुत मानती थी. किंतु एक बात उसे बरदाश्त नहीं थी कि मैं काकुली की खूबसूरती का बखान करूं. इस बात पर वह रूठ जाती थी.

काकुली का तब तक मुझ से और मेरा उस से लगाव भर बाकी था. वह कभीकभार मेरी बीवी से
मिलने के बहाने आ जाती थी.

एक दिन पत्नी ने काकुली से कहा था, ‘‘तुम रविवार को मेरे यहां मत आया करो.’’

काकुली हंस कर टाल गई थी, पर चोट गहरी थी.

बैंक के अफसर को फुरसत कम ही मिल पाती है, इसलिए बीवी कहती, ‘‘एक तो काकुली है और यह बैंक भी मेरी सौत हो गया है.’’

इस बात पर हम दोनों हंसते थे, किंतु इस में कहीं न कहीं सचाई थी. फिर भी, हम दोनों में काफी मेलमिलाप था.

किंतु, कुदरत का विधान मेरे लिए कुचक्र रच चुका था. मेरी पत्नी मां बनने वाली थी. दर्द शुरू होते ही डाक्टर के यहां ले गया.

डाक्टर ने जांच के बाद बताया, ‘‘बच्चा पेट में मर चुका है. जच्चा बच जाए, यही काफी है. हम अपनी पूरी कोशिश करते हैं.’’

उसी दरमियान मेरी बीवी ने हमेशाहमेशा के लिए आंखें मूंद लीं.

घर में कुहराम मच गया. मैं पागल सा हो गया. काकुली, उस की मां और दूसरे सभी लोग आए. सब ने
धीरज बांधने की पूरी कोशिश की.

मैं ने बैंक से छुट्टी ले ली. माहौल बदलने के लिए पिताजी और काकुली की मां की जिद पर उस के यहां भी भेज दिया गया.

मैं धीरेधीरे सहज होने लगा. काकुली ने अपनी भरपूर कोशिश से मुझे उदासी से दूर करना चाहा था. अब उस के साथ गुजरा पुराना जमाना भी मेरा पीछा करने लगा था.

कुछ दिनों बाद काकुली से मौका पा कर बोला, ‘‘मैं दूसरी शादी तुम से करना चाहता हूं.’’

काकुली ने मेरे हाथ झटक दिए और दूर हट गई.

‘‘याद करो वह दिन, जिस दिन तुम्हारी शादी थी,’’ वह अकड़ कर बोली, ‘‘मैं ने खबर भेजी थी कि तुम एक बार मुझ से मिलो, पर तुम ने साफ इनकार कर दिया था. मुझे तुम्हारे लिए हमदर्दी है, पर इस का मतलब…’’

‘‘मैं ने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया था…’’ मैं ने बीच में ही सफाई देनी चाही, ‘‘असल में, मैं बहुत परेशान था. वह शादी तो जबरदस्ती की थी… तुम सब जानती हो.’’

‘‘मैं सब जानती हूं,’’ काकुली गुस्से से बोली.

मैं उठ कर पिछले दिनों की तरह उसे पकड़ने लगा, उसे बांहों में भरना चाहा. पर वह छिटक गई और चीख कर बोली, ‘‘खबरदार, जो इस निगाह से फिर देखा,’’ और वह सीढि़यां उतरती चली गई.

मैं उस दिन बहुत रोया. मौका पा कर काकुली के सामने कई बार गिड़गिड़ाया, पर वह नहीं मानी.

मैं फिर दूसरी शादी नहीं कर पाया. पहली बीवी की याद तो आती ही थी, पर काकुली की याद भी सताती. बीवी के रूप में उसे ही देखा था.

कई बार मां ने समझाया, ‘‘किशन, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई है? दूसरी शादी कर लो.’’

पर मैं ने इनकार कर दिया था.

सोफे पर बैठाबैठा मैं गुजरे वक्त की यादों में डूबा हुआ था कि नौकरानी ने आ कर हम दोनों के सामने चाय रखी.

‘‘क्या सोच रहे हैं? आप चाय पीजिए,’’ चुप्पी तोड़ते हुए काकुली बोली.

मैं ने चाय लेते हुए कहा, ‘‘काकुली, यह ‘आपआप’ सुन कर मेरे कान पक गए.’’

वह चुप रही.

मैं ने पूछा, ‘‘पर तुम ने अपने पति से तलाक क्यों लिया?’’

‘‘तलाक?’’ उस ने पूछा.

‘‘हां,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं तंग आ चुकी थी उन के बरताव से, उन की दौलत के नशे से, उन के दोस्तों से, उन की लत से. महीने में एक दिन आना, न आना, शराब पीना, छोटीछोटी बातों पर मुझे पीटना, गालियां देना,’’ काकुली गुस्से में बोल रही थी.

मुझे काकुली पर बहुत प्यार आ रहा था, वहीं डर भी हो रहा था कि कोई आ न जाए. मैं ने इधरउधर झांका, फिर आ कर उस के पास बैठते हुए कहा, ‘‘यकीन करो, तुम्हें पहली जगह जरूर मिलेगी.’’

मैं अपने रूमाल से काकुली के आंसू पोंछ ही रहा था कि सीढि़यों से किसी के आने की आवाज सुनाई दी. मैं छिटक कर दूर हट गया.

तभी नौकरानी काकुली की 6 महीने की बेटी को लिए अंदर आई और बोली, ‘‘यह जग गई थी, इसे भूख लगी है.’’

वह बड़ी प्यारी गुडि़या थी. मैं ने झपट कर उसे उठा लिया और चूमते हुए कहा, ‘‘बड़ी प्यारी बच्ची है.’’

बच्ची जोरजोर से चिल्लाने लगी. काकुली चुपचाप मुसकराते हुए हमें देखती रही. मैं बेखबर बच्ची को
चूमता रहा. Hindi Family Story

Hindi Kahani: धंधेवाली का दर्द

Hindi Kahani: सैक्स वर्करों के दर्द पर लेख तैयार करने के लिए विनय रैडलाइट एरिया पहुंचा. शहर की भीड़ से हट कर गंदी सी बस्ती में देह धंधे की एक ऐसी मंडी, जहां इनसानी सोच की बदबू को दबाने के लिए अलगअलग दड़बेनुमा कमरों से मोगरा, चमेली से ले कर रूम फ्रैशनर की मिलीजुली महक बाहर आ रही थी.

कम उम्र की लड़कियों से ले कर अधेड़ उम्र वाली औरतें सजधज कर ऐसे तैयार बैठी थीं, जैसे शोरूम में पुतले के ऊपर ब्रांडेड कपड़े नुमाइश के लिए रखे गए हों.

कस्टमर समझ कर हर कोई विनय को अपनी ओर लुभाने और रिझाने की कोशिश कर रही थी. किसी के चेहरे पर असली मुसकराहट थी, तो कोई बनावटी मुसकान बिखेर रही थी.

इसी दौरान सामने से आ रही जींसटीशर्ट पहने एक लड़की ने विनय की कमर में हाथ डाल दिया और बोली ‘‘साथ ले चलोगे या मेरे साथ चलोगे… फुलटाइम या पार्टटाइम?’’

विनय ने अपनी कमर से उस लड़की का हाथ हटाते हुए समझाया, ‘‘अरे, आप गलत समझ रही हैं. दरअसल, मैं एक पत्रकार हूं…’’

‘‘तो इस में समझना क्या है बाबू. पत्रकार ‘करते’ नहीं क्या?’’ इस भद्दी सी बात के साथ उस लड़की ने अपनी मुसकान बिखेरी.

विनय उस लड़की को समझाने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘देखो…’’

‘‘दिखाओ…’’ बीच में ही टोकते हुए उस लड़की ने कहा और हंस पड़ी.

विनय झेंपते हुए बोला, ‘‘देखिए, मैं आप लोगों की जिंदगी पर एक प्रोजैक्ट तैयार कर रहा हूं, जिस से आप की बदहाली को सरकार तक पहुंचाया जा सके, ताकि सरकार आप लोगों के लिए अच्छी जिंदगी का इंतजाम कर सके.’’

‘‘अरे छोडि़ए साहब, हमारी इज्जत और जिंदगी को. हम तो नरक के पिल्लू हैं, नरक में ही जीना और नरक में ही मरना…

‘‘अब चलो, मजा लेते हैं. फुलटाइम सर्विस में कुछ डिस्काउंट दे दूंगी, आखिर पत्रकार जो ठहरे…’’ उस लड़की ने विनय की बात को हंसी में टालते हुए कहा और विनय की छाती पर हाथ फेरने लगी.

उस लड़की के इस बरताव से विनय काफी चिढ़ गया. वह गुस्से में तमतमाते हुए बोला, ‘‘मैं तुम लोगों के भले के लिए कुछ तैयार कर रहा हूं, ताकि प्रशासन और सरकार के सामने उस रिपोर्ट को रख सकूं. मैं चाहता हूं कि तुम्हें सभ्य समाज में इज्जत की जिंदगी और रोजगार मिल सके और तुम धंधे की बात कर रही हो…

‘‘आखिर हो तो धंधेवाली ही न और वह तो समाज के बजाय कोठे पर ही अच्छी लगती है…’’ इतना कह
विनय वहां से आगे बढ़ गया.

‘‘एक मिनट साहब,’’ पीछे से आवाज देते हुए उस लड़की ने विनय को रोका.

विनय अनमने ढंग से रुक गया. वह लड़की आगे बोली, ‘‘किस इज्जत और रोजगार की बात आप करते हैं साहब… कई बार दोबारा बसाने के नाम पर हमारी बस्तियों को तोड़ा गया है, लेकिन रोजगार तो मिलता नहीं कुछ…

‘‘धंधेवाली का लेबल लगा है, सो गांव में दुकान भी खोलना चाहें, तो लोग दुकानदार के बजाय हमें बिकाऊ माल ही समझते हैं और फिर पेट पालने के लिए नैशनल हाईवे, बसस्टैंड, लौज या धुलाई के लिए स्टेशन यार्ड में खड़ी रेलगाड़ी के डब्बों को ही अपना आशियाना बनाना पड़ता है… बात करते हैं दोबारा बसाने और रोजगार की.

‘‘और हां, यह जो समाज या सरकार की बात कर रहें है न आप, तो कभी आइए शाम में हमारे कोठे पर, फिर देखिए आप को आप का तथाकथित सभ्य समाज वहीं मिल जाएगा और आप के सरकारी नुमाइंदों की पतलून धंधेवालियों के पलंग के नीचे…

‘‘और रही बात सरकार की, तो वीआईपी और माननीय महोदय के लिए हर रात छोटी उम्र की सील पैक फ्रैश माल उन की सरकारी कोठी पर भेज दी जाती हैं…

‘‘अब आप ही बताओ कि अगर हमारी दुकान बंद हो जाएगी, तो तुम्हारी सरकार कैसे चलेगी?’’

उस लड़की के भद्दे और तीखे शब्दों की चोट में छिपे दर्द ने विनय को सभ्य समाज के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. Hindi Kahani

Social Story In Hindi: भटका हुआ नेता

Social Story In Hindi अमन एक छोटे से कसबे से निकल कर बड़े शहर के नामी कालेज में आया था. वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए बहुत जोश में था, लेकिन कालेज का माहौल उस की उम्मीद से बिलकुल अलग था. वहां पढ़ाईलिखाई से ज्यादा दबदबे और राजनीति का जोर था.

कालेज के कुछ छात्र, जो खुद को ‘छात्र नेता’ कहते थे, पूरे कैंपस में अपनी धाक जमाए हुए थे. उन के पीछे लोकल नेताओं का हाथ था, इसलिए वे मनमानी करते थे और कोई भी उन के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था.

अमन ने खुद को इन सब चीजों से दूर रखने की कोशिश की, लेकिन ऐसे नेता हर जगह थे… क्लासरूम, कैंटीन, यहां तक कि लाइब्रेरी में भी.

वे पढ़ाईलिखाई के बजाय राजनीति और गुंडागर्दी में बिजी रहते थे.

क्लास में प्रोफैसरों से बहस करना और उन पर दबाव बनाना उन की आदत बन गई थी.

कई बार कालेज के ये तथाकथित छात्र नेता प्रोफैसरों के साथ बहुत ही गलत बरताव करते थे. वे अपनी मरजी से क्लासरूम में आतेजाते थे, फिर चाहे लैक्चर चल रहा हो या नहीं. जब भी प्रोफैसर उन्हें अनुशासन में रहने के लिए कहते, तो वे उलटा उन्हें ही धमकाना शुरू कर देते.

छात्र राजनीति का जाल ऐसा फैला कि कालेज की दीवारों पर नारे लिखे जाने लगे और क्लासरूम बहस का अड्डा बन गए.

रवि कालेज का सब से खतरनाक और असरदार छात्र नेता बन चुका था. कुछ ही समय में उस ने अपने ग्रुप के साथ कालेज पर ऐसा कब्जा जमा लिया था कि बाकी छात्र और यहां तक कि प्रोफैसर भी उस से डरने लगे थे. छात्र राजनीति में उस की पकड़ इतनी मजबूत हो गई थी कि लोग उसे ‘नेताजी’ कहने लगे थे.

रवि की दबंगई का आलम यह था कि उस की मौजूदगी में पूरा क्लासरूम सहम जाता था. उस का रवैया इतना खतरनाक हो चुका था कि वह किसी की भी इज्जत करने को तैयार नहीं था.

एक दिन जब प्रोफैसर शर्मा ने रवि को क्लास में देर से आने पर टोका, तो उस ने पूरी क्लास के सामने उन की बेइज्जती करनी शुरू कर दी.

‘‘आप को यहां पढ़ाने के लिए रखा गया है, हमारे बौस मत बनिए,’’ रवि ने तंज कसते हुए कहा.

प्रोफैसर शर्मा ने जब रवि को शांत रहने को कहा, तो वह और ज्यादा भड़क गया. गुस्से से उस ने जवाब दिया, ‘‘हमारी पौलिटिकल पहुंच का अंदाजा है आप को? हम चाहें तो एक फोन कर के आप का ट्रांसफर करवा सकते हैं.’’

यह सुनते ही क्लास में सन्नाटा छा गया. प्रोफैसर शर्मा भले ही उम्र में बड़े थे, लेकिन वे इस तरह की धमकियों से डरने वाले नहीं थे. उन्होंने शांत रहते हुए कहा, ‘‘तुम्हें यहां पढ़ाई करनी चाहिए, राजनीति नहीं. यह तुम्हारे भविष्य के लिए सही नहीं है.’’

रवि हंसते हुए बोला, ‘‘आप का जमाना चला गया, सर. अब हम जैसे लोगों का वक्त है. देखना, इस कालेज में अब वही होगा, जो हम चाहेंगे.’’

रवि का असर धीरेधीरे पूरे कालेज पर दिखने लगा. उस की बातें हवा में उड़ती जरूर थीं, लेकिन उन के पीछे छिपी असंतोष की चिनगारी छात्रों के मन में गहरी पैठ बना रही थी. वह न केवल अपने विचारों से, बल्कि अपनी बोलने की कला और शानदार शख्सीयत से भी छात्रों को अपनी तरफ खींच रहा था. उस का ग्रुप, जो पहले केवल कुछ दोस्तों तक सीमित था, अब धीरेधीरे एक बड़ा और ताकतवर संगठन बनता जा रहा था.

रवि ने छात्रों को भरोसा दिलाया कि वे केवल पढ़ाईलिखाई के लिए नहीं, बल्कि अपने हकों के लिए लड़ने को भी कालेज में हैं. उस के इन विचारों ने एक क्रांतिकारी लहर को जन्म दिया. ‘छात्र एकता जिंदाबाद’ के नारों से कालेज की दीवारें गूंजने लगीं.

रवि ने कालेज प्रशासन के खिलाफ एक मजबूत मोरचा खड़ा कर दिया और छात्रों को यह यकीन दिलाया कि अगर वे संगठित रहेंगे, तो प्रशासन उन की किसी भी मांग को नजरअंदाज नहीं कर पाएगा.

छोटेछोटे मुद्दों को ले कर हड़तालें होना अब रोजमर्रा की बात हो गई थी. कैंटीन के बढ़े हुए दाम हों या लाइब्रेरी में किताबों की कमी, हर मुद्दा छात्रों के लिए अब एक बड़ा आंदोलन बन जाता. रवि का हर शब्द उन्हें जद्दोजेहद करने के लिए उकसाता.

धीरेधीरे कालेज में एक असंतोष की भावना बढ़ने लगी. छात्र खुद को पहले से ज्यादा ताकतवर महसूस करने लगे, लेकिन इस ताकत के साथ एक सवाल यह भी था कि क्या यह लड़ाई सही दिशा में जा रही थी?

इस उथलपुथल के बीच कालेज प्रशासन भी अब इस बढ़ते विद्रोह से निबटने की योजना बनाने लगा था.
प्रिंसिपल श्रीवास्तव इन घटनाओं से परेशान थे. उन्होंने कई बार रवि को समझाने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह उग्र प्रदर्शन करने की धमकी देता.

आखिरकार प्रिंसिपल ने सख्त कदम उठाते हुए रवि को कालेज से निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया.

यह खबर जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. रवि ने इसे अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बताया और अपने दोस्तों को उकसाया, ‘‘देखो, कालेज प्रशासन हमें दबाना चाहता है. हमें मिल कर इस का जवाब देना होगा.’’

अगले ही दिन कालेज में छात्रों की एक बड़ी सभा हुई. नारे और तेज हो गए… ‘प्रिंसिपल मुर्दाबाद’, ‘छात्रों का शोषण बंद करो, बंद करो’.

रवि कालेज के बाहर धरने पर बैठ गया और राजनीतिक दलों ने इस का फायदा उठाते हुए उसे समर्थन देना शुरू कर दिया. लोकल नेताओं ने छात्रों के बीच भाषण दे कर आंदोलन को और भड़काया.

छात्रों में गुस्सा बढ़ गया और वे रवि के निलंबन को गलत मानने लगे. राजनीतिक दलों की दखलअंदाजी
से यह आंदोलन कालेज से बाहर निकल कर एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया.

निलंबन के बाद रवि ने खुद को छात्रों का मसीहा बना लिया. धरने और प्रदर्शनों ने उस के राजनीतिक सफर की शुरुआत की और उस की लोकप्रियता बढ़ती गई.

स्थानीय दलों ने उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश की और जल्दी ही रवि ने एक मनचाही पार्टी चुन ली,
जिस से उस की पहचान और मजबूत हो गई.

जल्द ही रवि चुनाव प्रचार में जुट गया और उस के जोरदार भाषणों व छात्रों के समर्थन ने उसे राजनीति का उभरता सितारा बना दिया. रवि का असर अब कालेज से निकल कर सियासत के गलियारों तक पहुंच चुका था.

समय के साथसाथ उस राजनीतिक दल ने रवि को अपनी युवा विंग में शामिल कर लिया, जिस से उस का राजनीतिक सफर और तेज हो गया. वह अब सिर्फ छात्र नेता नहीं रहा, बल्कि लोकल राजनीति में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगा.

जब भी किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में कोई विवाद उठता, रवि तुरंत वहां पहुंच कर छात्रों को संगठित करता और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करता. उस की बढ़ती ताकत और असर ने उसे बड़े नेताओं के साथ मंच साझा करने का मौका दिया और वह राजनीति में एक उभरते हुए चेहरे के रूप में नाम कमाता चला गया.

कुछ सालों बाद रवि स्थानीय चुनावों में खुद भी उम्मीदवार बन गया. उस की पहचान एक साहसी युवा नेता के रूप में बन चुकी थी, जिस का छात्र राजनीति से ऊपर उठ कर बड़ी राजनीति में कदम रखने का सपना था. आखिरकार, उस ने अपना पहला चुनाव जीता और वह विधायक बन गया.

विधायक बनने के बाद रवि के सामने बेरोजगारी दूर करने का वादा सब से बड़ी चुनौती बन गया. चुनाव प्रचार में उस ने नौजवानों को रोजगार का सपना दिखाया था, लेकिन सत्ता में आते ही हकीकत का सामना करना पड़ा. बेरोजगारी सिर्फ भाषणों से हल नहीं हो सकती थी, बल्कि इस के लिए तो नीतियों और इन्वैस्टमैंट की जरूरत थी. अनुभव की कमी के चलते रवि की शुरुआती कोशिशें सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहीं और वह ठोस समाधान पेश करने में नाकाम रहा.

रवि के समर्थक तब धीरेधीरे निराश होने लगे, जब उन्हें एहसास हुआ कि उस की राजनीति सिर्फ वादों पर टिकी थी, लेकिन उन्हें पूरा करने की ताकत उस में नहीं थी. चुनाव जीतने के बाद रवि के सियासी सपने बढ़े, लेकिन बेरोजगारी और पढ़ाईलिखाई जैसे असली मुद्दे अनदेखे रह गए.

बेरोजगारी से निबटने में नाकाम रवि का राजनीतिक कैरियर तो आगे बढ़ता गया, लेकिन वादे अधूरे रह गए. छात्रों में हताशा और गुस्सा पनपने लगा और वे खुद को उस के राजनीतिक एजेंडे का मोहरा महसूस करने लगे.

कई छात्र जब अपनी पढ़ाई पूरी कर नौकरी तलाशने लगे, तो उन्हें याद आया कि रवि ने वादे किए थे कि वह उन के लिए रोजगार के मौके पैदा करेगा. कुछ छात्र इस उम्मीद के साथ रवि के पास गए कि उस की राजनीतिक पहुंच और दबदबे से उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाएगी.

लेकिन जब वे रवि से मिले, तो उन्हें हकीकत का सामना करना पड़ा. रवि अब एक बिजी और ताकतवर विधायक बन चुका था और उसे अपने शुरुआती समर्थकों की परवाह नहीं थी.

रवि ने कहा, ‘‘सरकार की नीतियां फिलहाल बदल रही हैं, इसलिए थोड़ा इंतजार करो. मैं तुम्हारे लिए जरूर कुछ करूंगा, लेकिन अभी समय सही नहीं है.’’

छात्रों को झूठे दिलासे और वादे मिलते रहे, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया.

रवि के कुछ दोस्तों ने छात्रों को बताया कि विधायकजी बहुत बिजी हैं, इसलिए वे महीनों तक रवि के दफ्तर के चक्कर काटते रहते और उन की फाइलें धूल खाती रहतीं. रवि के कुछ चाटुकार पैसे के बदले छात्रों को उस से मिलने का मौका देते थे.

कुछ मामलों में तो रवि ने साफसाफ कह दिया कि वह तभी मदद करेगा, जब छात्र उस के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा होंगे. इस से छात्रों को एहसास हो गया कि रवि सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए उन का इस्तेमाल कर रहा है.

रवि अब राजनीति में पूरी तरह रचबस गया था. उस के इर्दगिर्द हमेशा नए चेहरे रहते थे… कभी चमचों की टोली, तो कभी खूबसूरत लड़कियां. कालेज के दिनों से ही रवि की नजर लड़कियों पर रहती थी. विधायक बनने के बाद यह सब और भी बढ़ गया.

रवि की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए कई लड़कियां खुद उस के करीब आने की कोशिश करती थीं. उन में से नेहा भी एक थी, जो कालेज में रवि की समर्थक थी. राजनीति का उसे भी चसका लग चुका था. उस ने सोचा कि रवि के करीब रह कर वह भी राजनीति में अपना कैरियर बना लेगी.

लेकिन रवि के लिए नेहा सिर्फ एक शौक थी. वह उसे कभीकभार अपने साथ मीटिंग में ले जाता, उस के हावभाव की तारीफ करता और फिर उसे नजरअंदाज करना रवि का रवैया बन गया था.

इसी तरह रवि को हर पड़ाव पर एक नई लड़की मिलती रही. उस के पास अपने लोगों के लिए समय नहीं था, क्योंकि वह हमेशा किसी न किसी लड़की की बांहों में रहता था. यहां तक कि लोग भी अपना काम करवाने के लिए लड़कियों को उस के पास भेजते थे.

मीरा, जो अपनी नौकरी में मदद मांगने रवि के पास आई थी, को रवि ने यह कह कर अपने करीब खींच लिया कि तुम्हारे जैसे सम?ादार लोगों को राजनीति में होना चाहिए.

मीरा को लगा कि रवि उस की प्रतिभा को पहचान रहा है, लेकिन कुछ महीनों बाद उसे एहसास हुआ कि वह रवि की ‘सोशल मीडिया शोपीस’ थी, जिसे उस ने बेकार कर छोड़ दिया था.

बाद में कई छात्रों ने भी महसूस किया कि राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के चलते वे अपनी पढ़ाई और स्किल से दूर हो गए थे. जब वे नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गए, तो उन्हें यह एहसास हुआ कि उन के पास न तो सही जानकारी थी और न ही जरूरी काबिलीयत, जिस से वे नौकरी पाने की दौड़ में टिक पाते.

नतीजतन, बहुत से छात्रों को निराशा हाथ लगी. उन्होंने रवि से जो उम्मीदें लगाई थीं, वे मिट्टी में मिल गई थीं. उन की नौकरियों की तलाश अधूरी रही और वे धीरेधीरे यह समझने लगे कि रवि की राजनीति ने उन के भविष्य को संवारने के बजाय बरबाद कर दिया था.

रवि की फायदे की राजनीति ने कई छात्रों को छात्र राजनीति से हटा दिया. वे अब इसे पढ़ाईलिखाई और कैरियर के लिए हानिकारक मानने लगे थे.

जो छात्र पहले अपने हकों के लिए जद्दोजेहद करते थे, वे अब राजनीति से दूर हो कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लगे. इस से छात्र राजनीति धीरेधीरे कमजोर हो गई.

कुछ समय बाद रवि के समर्थक ही उस के विरोधी बन गए. छात्रों ने कालेजों में रवि के खिलाफ पोस्टर लगाए और उसे धोखेबाज करार दिया. सोशल मीडिया पर उस के खिलाफ लिखा गया. औनलाइन अभियान चला कर उस की नीतियों और वादों की कड़ी आलोचना की. नतीजतन, रवि अगला चुनाव बुरी तरह हार गया और उस की राजनीतिक जमीन खिसक गई.

रवि ने देखा कि अमन, जो कालेज के दौरान राजनीति से दूर रह कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता था, अब एक आईएएस बन चुका था और समाज में इज्जत पा रहा था.

एक मुलाकात में अमन ने रवि को समझाया, ‘‘सच्ची कामयाबी लोगों की भलाई और अपने फर्ज निभाने में है, न कि केवल राजनीति में पद और पावर हासिल करने में.’’

रवि को एहसास हुआ कि अमन की मेहनत और अनुशासन ने उसे असली कामयाबी दिलाई, जबकि उस ने खुद सत्ता की भूख में अपना असली मकसद खो दिया था. Social Story In Hindi

Hindi Family Story: बहन बनी दुश्मन

Hindi Family Story: अफसाना का जब से अपने शौहर से तलाक हुआ था और वह उसे छोड़ कर अपने मायके आई थी, तब से उस के अंदर अपनी बहन शहाना के लिए एक अलग ही किस्म की जलन थी. वह नहीं चाहती थी कि शहाना का निकाह हो और वह खुश रहे.

शादी से पहले अफसाना मोटी और सांवले रंग की एक साधारण सी लड़की थी. उस की उम्र भी काफी हो चुकी थी. उस के लिए जो भी रिश्ते आते थे, वे अफसाना की जगह शहाना को पसंद करते थे, जिस से अफसाना की वक्त रहते शादी नहीं हो पा रही थी और उस की उम्र बढ़ती ही जा रही थी.

इस के उलट शहाना देखने में गदराए बदन के साथसाथ खूबसूरती का भंडार थी. जो भी उसे देखता, बस देखता रह जाता. बड़ीबड़ी आंखें, सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे.
अफसाना और शहाना की उम्र में 7 साल का फर्क था और उस के अम्मीअब्बू पहले अफसाना की शादी करना चाहते थे, ताकि सही वक्त पर उस की घरगृहस्थी बस जाए, तो उस के बाद शहाना के निकाह के बारे में सोचें.

वैसे भी अभी शहाना की उम्र सिर्फ 17 साल थी, जबकि अफसाना 24 पार कर चुकी थी. शहाना की खूबसूरती और चंचलता देख कर अब अफसाना के दिल में धीरेधीरे शहाना के प्रति जलन पैदा होने लगी थी और वह अंदर ही अंदर शहाना से कुढ़ने लगी थी, क्योंकि अपनी शादी न होने की वजह वह शहाना को ही मान रही थी, इसलिए वह उस के लिए अपने दिल में नफरत भरती जा रही थी.

कहते हैं न कि हर चीज का एक वक्त होता है, ठीक ऐसा ही अफसाना के साथ भी हुआ और आखिरकार उस का रिश्ता पक्का हो गया और जल्द ही अफसाना का निकाह सुहेल से हो गया और वह दुलहन बन कर अपनी ससुराल पहुंच गई.

सुहेल के साथ शादी होने के बाद अफसाना जितना खुश थी, उस से कहीं ज्यादा उस के अम्मीअब्बू खुश थे, क्योंकि बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता हुआ था.

सुहेल और अफसाना हंसीखुशी अपनी जिंदगी गुजार रहे थे. शादी को एक महीना बीत चुका था. शहाना भी अकसर अफसाना की सुसराल आतीजाती रहती थी. कभीकभार सुहेल भी अफसाना के साथ अपनी सुसराल आता रहता था.

शहाना जल्द ही सुहेल से काफी घुलमिल गई थी और खूब हंसीमजाक करने लगी थी. सुहेल भी धीरेधीरे उस की तरफ खिंचने लगा था.

इसी हंसीमजाक में सुहेल अकसर शहाना के नाजुक अंगों से भी छेड़छाड़ करता था और उस की उठी हुई मस्त छातियों पर हाथ तक फेरने से वह नहीं झिझकता था.

शहाना सुहेल की इस हरकत का बुरा नहीं मानती थी, तो सुहेल की हिम्मत बढ़ती चली गई.

एक दिन ऐसी घटना भी हो गई कि जिस ने अफसाना और सुहेल के बीच में ऐसी लकीर खींच दी, जिस से वे हमेशाहमेशा के लिए एकदूसरे से अलग हो गए.

हुआ यों था कि घर के सभी लोग कहीं बाहर गए थे. घर में शहाना और सुहेल के आलावा कोई नहीं था. अच्छा मौका देख कर सुहेल ने शहाना को अपनी बांहों में भरा और बिस्तर पर ले जाने लगा.

शहाना बोली, ‘‘जीजू, यह क्या कर रहे हो. छोड़ दो मुझे. दीदी को पता चलेगा तो वे बहुत गुस्सा होंगी. छोड़ दो मुझे. नीचे उतारो.’’

सुहेल ने अभी शहाना को गोद में उठा ही रखा था कि अचानक अफसाना अपने अम्मीअब्बू के साथ घर में आ गई.

शहाना को सुहेल की गोद में देख कर अफसाना का खून खौल उठा और वह चिल्लाते हुए बोली, ‘‘शहाना, तुम्हें शर्म नहीं आती अपने जीजू के साथ यह सब गंदी हरकत करते हुए…’’

शहाना बोली, ‘‘दीदी, मैं तो कब से जीजू को मना कर रही थी, पर ये ही जबरदस्ती मुझे अपनी गोद में उठा कर ले जा रहे थे.’’

यह सुनते ही अफसाना गुस्से से तिलमिला उठी और सब के सामने उस ने सुहेल के मुंह पर एक जोरदार तमाचा रसीद करते हुए उसे बुराभला कह कर घर से निकाल दिया.

बस, फिर क्या था. सुहेल को यह बात इतनी बुरी लगी कि कुछ ही दिनों में अफसाना और सुहेल का तलाक
हो गया.

अफसाना और उस के घर वालों ने सुहेल को बहुत समझाने की कोशिश की, अफसाना ने भी अपनी गलती की माफ़ी मांगी, पर सुहेल अपनी जिद पर अड़ा रहा.

अफसाना की जिंदगी देखते ही देखते बरबाद हो चुकी थी और उस के मन में शहाना के लिए नफरत भर चुकी थी.

घर वाले अब शहाना के लिए रिश्ता ढूंढ़ने में लगे थे. कई रिश्ते आ भी रहे थे, पर जब भी वे शहाना को देखने आते तो अफसाना उन के सामने अपनी बहन की खूबसूरती की तारीफ करतेकरते यह भी बता देती कि शहाना इतनी खूबसूरत है कि इस के हुस्न के दीवाने कुंआरे ही क्या, शादीशुदा भी हैं. वह अपने शौहर वाली बात का भी जिक्र कर देती थी कि वे तो शहाना को गोद में उठाए फिरते थे.

अफसाना की ऐसी बातें सुन कर रिश्ते वाले रिश्ता करना तो दूर मुंह बना कर वहां से चले जाते थे.

शहाना समझ चुकी थी कि उस की बहन उस के लिए जलन रखती है. वह नहीं चाहती है कि उस का घर बसे और वह खुश रहे.

पर एक दिन अफसाना जब अपनी खाला के घर गई थी, तो शहाना को देखने वाले आए और उसे पसंद कर के उन्होंने रिश्ता तय कर दिया.

जब अफसाना को इस बात का पता चला तो वह उन के घर पहुंच गई और बोली, ‘‘आप का बहुतबहुत शुक्रिया, जो आप ने मेरी बहन को पसंद किया और शादी के लिए हां बोल दी.’’

लड़के ने कहा, ‘‘इस में शुक्रिया की क्या बात है. आप की बहन शहाना है ही इतनी खूबसूरत कि जो भी उसे देखे, बस देखता रह जाए.’’

अफसाना बोली, ‘‘आप ने एकदम सही कहा. शहाना जैसी खूबसूरत लड़की तो लाखो में एक होती है. उस की खूबसूरती के तो शादीशुदा मर्द भी दीवाने हैं.’’

लड़के के अब्बा ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या मतलब? हम समझे नहीं?’’

अफसाना ने कहा, ‘‘मेरे शौहर तो शहाना के ऐसे दीवाने थे कि उन्हें अपनी बीवी से ज्यादा उसी में लगाव था. उसे हर वक्त अपनी बांहों में उठाए फिरते थे और उसी की खातिर मुझे तलाक दे दिया.’’

यह बात सुन कर लड़के के अब्बा ने कहा, ‘‘कितने घटिया लोग हैं. हमें नहीं करनी ऐसी लड़की से शादी जो अपने जीजा के साथ रंगरेलिया मनाती हो.’’

अगले ही दिन उन लोगों ने शहाना से यह कह कर रिश्ता तोड़ दिया कि हम तो इसे सीधीसादी लड़की समझ रहे थे. हमें क्या मालूम था कि यह अपने जीजा के साथ भी चक्कर चला चुकी है.

शहाना के घर वालों को यह समझते देर न लगी कि जरूर उन के कान अफसाना ने भरे हैं. अफसाना इस हद तक गिर जाएगी, उन्होंने सोचा भी न था.

इसी तरह 3 साल गुजर गए. न तो कोई अफसाना को ही अपना पा रहा था और शहाना का भी रिश्ता नहीं हो पा रहा था. दोनों बहनें एकदूसरे से बहुत ज्यादा जलने लगी थीं.

थोड़ा वक्त और गुजरा तो शहाना के लिए एक जगह रिश्ता भी मिल गया. लड़का शाहिद शहाना के हुस्न का दीवाना बन बैठा था और वह किसी भी कीमत पर उस से शादी करने को तैयार था.

इस बार अफसाना की कोई भी बात उस रिश्ते पर नहीं चली. उन्होंने यह कह कर अफसाना को नजरअंदाज कर दिया कि शादी से पहले जो कुछ हुआ, उस से हमें कोई लेनादेना नहीं है.

अफसाना ने बात का रुख मोड़ते हुए कहा, ‘‘वाह, क्या बात है. मुझे बहुत खुशी हुई आप लोगों से मिल कर. दरअसल, मैं भी खुले विचारों वाली ही हूं.’’

अगले दिन अफसाना शाहिद को फोन करते हुए बोली, ‘‘जीजू, क्या कर रहे हो. अगर फुरसत हो तो मेरे साथ बाजार चलो, कुछ खरीदारी करनी है.

शाहिद बोला, ‘‘ठीक है. मैं आप के घर आता हूं. वहीं से दोनों साथ चलेंगे.’’

अफसाना की चाल कामयाब हो गई. वैसे भी शहाना अम्मीअब्बू के साथ खरीदारी करने गई थी. अफसाना ने अपनेआप को संवारा और एक हलकी से गुलाबी रंग की ?ानी नाईटी पहन कर शाहिद के आने का इंतजार करने लगी.

कुछ ही देर में दरवाजे पर दस्तक हुई. अफसाना ने फौरन दरवाजा खोला, तो सामने शाहिद खड़ा था.

अफसाना बोली, ‘‘जीजू, आप अंदर आ जाओ. अम्मीअब्बू शहाना को ले कर कहीं गए हैं.

शाहिद अफसाना का यह रूप देख कर हैरान था. उस की नजरें अफसाना की उठी हुई छातियों पर टिकी हुई थीं.

अफसाना बोली, ‘‘जीजू, आप क्या देख रहे हो…’’ फिर अपने बदन को शाहिद के करीब लाते हुए वह बोली, ‘‘आप क्या पियोगे जीजू?’’

शाहिद के बदन से जैसे ही अफसाना का बदन का छुआ, उस के बदन में एक अजीब बिजली दौड़ पड़ी. अफसाना भी मस्त हो रही थी.

अफसाना की यह अदा शाहिद के अंदर हवस का तूफान मचाने लगी. उस ने अफसाना की उठी हुई छातियों पर अपना हाथ रख दिया.

‘‘बस इतना ही करोगे क्या?’’ अफसाना सिसक कर बोली.

यह सुनते ही शाहिद ने अफसाना को अपनी बांहों में भर लिया और उस की छातियों पर अपने होंठ रख दिए.

अफसाना ने अपने बदन से नाइटी को ढीला कर दिया और खुद को शाहिद की बांहों में सौंप दिया.

शाहिद पागलों की तरह अफसाना के बदन का रसपान करते हुए उस के बदन से खेलने लगा.

अफसाना मौका देख कर शाहिद और अपने बीच चल रहे प्रेमप्रसंग के फोटो लेती रही.

दोनों जज्बात में बहते रहे और एकदूसरे के बदन से खेलते रहे. अपने बदन की प्यास बुझते ही शाहिद अचानक उठा और वहां से चला गया. अफसाना ने तब तक अपनी और शाहिद की रासलीला की वीडियो क्लिप तक बना ली थी.

शाम को जब शहाना और उस के घर वाले वापस आए, तो अफसाना ने अपने और शाहिद के बीच हो रहे प्रेमप्रसंग की वीडियो क्लिप अपनी बहन शहाना को दिखाते हुए कहा, ‘‘लो देखो अपने होने वाले शौहर की करतूत.’’

शहाना ने जैसे ही अफसाना और शाहिद के फोटो और वीडियो क्लिप देखी, तो वह फूटफूट कर रोने लगी और अपने अम्मीअब्बू से बोली, ‘‘मुझे नहीं करनी ऐसे आदमी से शादी, जो शादी से पहले ही मेरी बहन के साथ ऐयाशी करता हो.’’

इस तरह अफसाना ने शहाना का यह रिश्ता भी अपने जिस्म का सहारा ले कर तुड़वा दिया.

अफसाना के दिल को सुकून मिला और उस की शहाना के लिए पनपी जलन ने दोनों बहनों के रिश्ते को दुश्मनी की ऐसी आग में झोंक दिया, जिस में शहाना का घर कभी नहीं बस पाया. Hindi Family Story

Social Story In Hindi: अमीर भिखारिन

Social Story In Hindi: ‘‘यह क्या है? मैं 10 रुपए से कम नहीं लेती,’’ जैसे ही वरुण ने एक रुपए का सिक्का उस भिखारिन के हाथ पर रखा, तो यह जवाब सुन कर वह हैरान रह गया.

सफेद बालों वाली उस औरत के चेहरे पर तेज था और आवाज के साथसाथ भाषा पर भी अधिकार.
वरुण ने चुपचाप 50 रुपए का नोट निकाला और उस औरत की हथेली पर रख कर पूछा, ‘‘आप तो किसी अच्छे घर की जान पड़ती हैं, फिर यह भीख मांगना समझ नहीं आया?’’

50 रुपए के नोट को खोल कर परखती वह भिखारिन बोली, ‘‘मैं कभी एक अमीर घर से ताल्लुक रखती थी, पर अब मैं यह जो हूं, वह मैं हूं.’’

वरुण उस औरत के बगल में बैठ गया और बोला, ‘‘मैं एक पत्रकार हूं और एक लेखक भी. आप का इतिहास शायद एक उम्दा कहानी समेटे हुए है. अगर आप को एतराज न हो तो मेरे जिज्ञासु मन को शांत करने में मेरी मदद करेंगी?’’

वह औरत जोर से हंसी और बोली, ‘‘जरूर बताऊंगी, पर 500 रुपए फीस लूंगी. बोलो, मंजूर है?’’

वरुण ने जेब टटोली तो 200 रुपए का एक नोट मिला. उस औरत को नोट थमाते हुए वह बोला, ‘‘अभी मेरे पास इतने ही हैं. मैं फिर आ कर बाकी पैसे भी दे दूंगा, पर मुझे आप की कहानी अभी जानने की इच्छा है.’’

वह औरत इस बार धीरे से मुसकराई, कुछ पल वरुण के चेहरे को घूरा, फिर बोली, ‘‘चल, पप्पू चाय वाले के पास चलते हैं. वहां चाय की चुसकी लेते हुए बात करेंगे.’’

अब वे दोनों पैदल 400 मीटर दूर पप्पू चाय वाले की दुकान की तरफ बढ़ चले. चलते ही भिखारिन ने बोलना शुरू किया, ‘‘मेरा नाम प्रभजोत कौर है, पर यहां हरिद्वार में मुझे जानने वाले ‘अमीर भिखारिन’ के नाम से ही जानते हैं. यहां मेरी खूब चलती है. सारे भिखारी मेरी बात मानते हैं. किसी का कोई झगड़ाटंटा होता है, तो मैं ही उस का निबटारा करती हूं. 5 साल हो गए मुझे यहां आए हुए, पर लगता है कि कई सालों से मैं यहीं रह रही हूं.’’

‘‘आप पहले कौन से शहर में रहती थीं?’’ वरुण ने पूछा.

‘‘सब बताऊंगी, थोड़ा शांति से सुनो. मैं लुधियाना में पलीबढ़ी हूं. मेरे पिता बैटरी का बिजनैस करते थे. मैं पढ़ने में ठीकठाक थी, पर बाकी गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

‘‘शुरू से ही मुझे खूबसूरत दिखने का शौक था, इसलिए 12वीं क्लास पास होते ही मैं ने ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. घर में किसी तरह की रोकटोक नहीं थी, इसलिए मनमरजी से जो करना चाहती, वह कर लेती थी.

‘‘2 साल में मैं ‘मिस लुधियाना’ और फिर ‘मिस चंडीगढ़’ बन गई. जिस दिन मैं ‘मिस चंडीगढ़’ बनी उसी दिन मेरी मुलाकात मनजीत से हुई. वह एक अमीर नौजवान था. उस के 4 शहरों में बड़ेबड़े होटल थे.
‘‘मनजीत मुझ पर फिदा हो गया था और मुझ से शादी करना चाहता था. मुझे भी वह पसंद आने लगा और हमारी शादी हो गई. मैं आजादखयाल लड़की अमृतसर के एक 15 लोगों के संयुक्त परिवार में रहने आ गई.’’

अब तक चाय का गिलास प्रभजोत कौर के हाथ में आ चुका था. उस ने एक गरम घूंट गले से उतारा और फिर कहना शुरू किया, ‘‘बहुत अमीर परिवार था. कार एजेंसी, होटल, टायर बहुत तरह के बिजनैस थे. बेहिसाब कमाई, महल जैसा घर, महंगी विदेशी गाडि़यां. कुलमिला कर मैं तो वहां की चकाचौंध में सब
भूल गई.

‘‘एक साल तो ऐसे ही बीत गया. मनजीत अकसर होटल के काम से बाहर जाता रहता था. मेरी सास बहुत खड़ूस थी. वह दिनभर ताने मारती रहती थी. मनजीत के घर पर न होने पर तो वह हद ही कर देती थी. मुझ से पता नहीं क्यों चिढ़ी रहती थी. शायद वह अपने बेटे का ब्याह किसी और लड़की के साथ कराना चाहती थी.’’

‘‘आगे क्या हुआ?’’ वरुण ने पूछा.

चाय का आखिरी घूंट भरते हुए प्रभजोत कौर ने चाय वाले को इशारा करते हुए कहा, ‘‘एक चाय और…’’ फिर गहरी सांस भरते हुए वरुण से बोली, ‘‘बस, फिर धीरेधीरे मेरे अपनी सास से संबंध खराब होते चले गए.

‘‘मैं ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू कर दिया. अब आएदिन घर में क्लेश होने लगा. मनजीत ने बीचबचाव करने की कोशिश की, पर सुलह न हो सकी.

‘‘इस किचकिच से दूर रहने के लिए मैं ने फिर से मौडलिंग स्टार्ट कर दी. अब तो सास ने और तहलका मचाना शुरू कर दिया. उस ने मेरे कैरेक्टर पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. मेरा घर पर रहना दूभर हो गया.

‘‘मैं ने कई बार मनजीत से अलग रहने की बात कही, पर वह हर बार साथ रहने के लिए मुझे मना लेता, क्योंकि कोई भी अब तक उस घर से अलग नहीं हुआ था, इसलिए वह यह बुराई अपने सिर लेने से बचना चाहता था.

‘‘मेरा मन बहुत बैचेन रहने लगा, पर कुछ भी सम?ा नहीं आ रहा था. एक दिन मौडलिंग करते हुए एक साथी ने मुझे दवा के नाम पर कोई नशीली चीज पिला दी. मैं तो जैसे दूसरी दुनिया के सुख में पहुंच गई. सबकुछ भूल गई. पहले हफ्ते में एक बार, फिर रोज ड्रग्स लेना शुरू हो गया.

‘‘एक दिन शाम को मैं ड्रग्स के नशे में घर पहुंची, तो घर पर सास अकेली थी. मुझे देखते ही वह मुझ पर राशनपानी ले कर चढ़ गई. ‘कुल्टा’, ‘कुलच्छनी’, ‘आवारा’ और न जाने वह मुझे कौनकौन सी गालियां दिए जा रही थी और बिना बोले मेरा गुस्सा अंदर ही अंदर बढ़ता जा रहा था.

‘‘जब सहा नहीं गया तो मैं ने किचन में जा कर बड़ा सा चाकू उठाया और सीधे अपनी सास के सीने में घोंप दिया. मेरे हाथों खून हो चुका था, पर मुझे बड़ा सुकून मिला. पर थोड़ी देर के बाद मु?ो अहसास हुआ कि मैं ने यह क्या कर दिया.

‘‘थोड़ी देर बाद ही मेरी एक जेठानी आई और फिर उस ने सब को बुलाया. मैं चुपचाप वहीं बैठी रही. पुलिस आई और मुझे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. मेरे मातापिता ने भी मुझ से मुंह मोड़ लिया. 7 साल की जेल हुई. कोई मुझ से मिलने तक नहीं आया. मैं दिमाग से सुन्न हो चुकी थी.

‘‘7 साल की जेल से मैं बुरी तरह टूट गई. बाहर आई तो कोई लेने नहीं आया. अपनी ससुराल गई तो दुत्कार कर वहां से भगा दिया गया. मांबाप को फोन किया, तो उन के रूखे जवाब ने मेरा मन तोड़ दिया.

‘‘एक जोड़ी कपड़े और जेल में कमाए कुछ पैसे ले कर मैं ट्रेन में बैठ कर दिल्ली आ गई. मौडलिंग के कुछ जानकार लोगों से मदद की गुहार लगाने की कोशिश की, पर सब जगह मेरे किए गए कांड की खबर पहुंच चुकी थी.

‘‘दिल्ली में बिताए साल जहन्नुम से कटे. कभी भीख मांगी, कभी शरीर बेचा, तो कभी ?ाड़ूबरतन किए. बस, किसी तरह जिंदा थी.

‘‘मैं एक घर में झाड़ूपोंछा करती थी. वहां एक बूढ़ी माई को उस के बहूबेटा बहुत सताते थे. एक दिन उस ने मुझे हरिद्वार चलने के लिए पूछा, तो मैं ने अनमने मन से ‘हां’ कह दिया.

‘‘वह बुढि़या घर पर बिना बताए मेरे साथ हरिद्वार आ गई. हम कुछ महीने धर्मशाला में रहे, पर न उसे ढूंढ़ता कोई आया, न उसे किसी की याद आई. वह मेरा बच्चे की तरह खयाल रखती और मैं भी उस की आदर के साथ हर मदद करती. उस का अब यहीं रहने का मूड था और मुझे भी यह शहर भाने लगा था.

‘‘फिर एक दिन वह बुढि़या अचानक चल बसी. उन की इच्छा को ध्यान में रखते हुए बिना उस के बेटे को बताए वहीं अंतिम संस्कार कर दिया. मैं फिर सड़क पर थी. अब तक सब शर्म, शिकवे और झिझक खत्म हो चुके थे. खुली जबान से इंगलिशहिंदी बोल कर लोगों से भीख मांगना शुरू कर दिया. अच्छी भीख मिलने लगी, पर अब पेट की भूख शांत करने के सिवा कोई चाह नहीं थी, तो भिखारियों से ही दोस्ती हो गई.

‘‘अब इन के साथ ही जिंदगी अच्छी कट रही है. अब ये ही मेरे दुखसुख के साथी हैं. मंडली में रोज कोई नया सदस्य जुड़ जाता है. सब कोई न कोई अलग कहानी समेटे हुए हैं. इन के साथ प्यारमुहब्बत से रहना सीख रही हूं,’’ ऐसा बोलते हुए प्रभजोत कौर ने एक लंबी सांस खींची और चुप हो गई.

वरुण भी कुछ देर खामोश रहा, फिर बोला, ‘‘आप के मातापिता ने भी कभी आप को तलाशने की कोशिश
नहीं की?’’

‘‘बाबू, यह दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती. सब अपने तरीके को सही मानते हुए जीते हैं. पर यहां आ कर मुझे समझ आया कि जीना सिर्फ अपने लिए नहीं होता, बल्कि यह तो दूसरों के लिए होता है.

‘‘यहां मेरे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी मैं दिल से अमीर हूं, इसलिए लोग मुझे ‘अमीर भिखारिन’ कहते हैं…’’

यह कहते हुए प्रभजोत कौर ने अपने हाथ में रखा 200 रुपए का नोट वरुण को लौटाते हुए कहा, ‘‘अभी इस की तुम्हें ज्यादा जरूरत है. मेरे लिए तो यह 50 रुपए का नोट ही काफी है. तुम्हें और तुम्हारी इनसानियत को परखने के लिए मैं ने ये पैसे लिए थे.

‘‘मैं उम्मीद करती हूं कि तुम्हें एक कहानी लिखने का अच्छा मसाला मिल गया होगा. हां, इस की न्यूज मत बनाना, क्योंकि गुमनामी में जीने का जो मजा है, वह ज्यादा पहचान के साथ नहीं है. यह मैं दोनों को अनुभव करने के बाद कह रही हूं. यह ‘अमीर भिखारिन’ तुम्हें खुश रहने का आशीर्वाद देती है.’’ Social Story In Hindi

Family Story In Hindi: मोटी बहू – भव्या को देख गीता की ख्वाहिश कैसे अधूरी रह गई

Family Story In Hindi: गीता और विपिन बहुत उत्साहित थे. आज उन का बेटा पराग अपनी गर्लफ्रैंड भव्या को उन से मिलवाने लाने वाला था. पराग से 5 साल छोटी वन्या अभी पढ़ रही थी. पराग इंजीनियर था. भव्या उस की कुलीग थी. आधुनिक सोच वाले गीता और विपिन को पराग की पसंद की लड़की को अपनी बहू बनाने में कोई आपत्ति न थी.

भव्या पंजाबी परिवार से थी जबकि गीता और विपिन ब्राह्मण थे. किसी के लिए जातिधर्म का महत्त्व नहीं था. भव्या के मातापिता की कुछ वर्ष पहले एक ऐक्सिडैंट में मृत्यु हो गई थी. जालंधर में रह रहे उस के मामामामी ही उस के गार्जियन थे.

भव्या मुंबई के अंधेरी इलाके में 4 लड़कियों के साथ एक फ्लैट शेयर कर के रहती थी. गीता ने बड़े मन से भव्या के लिए लंच तैयार किया था. गीता, विपिन और वन्या फिगर के प्रति एकदम सचेत रहते थे. गीता और विपिन तो फिगर और स्वास्थ्य के प्रति इतने सजग थे कि उन्हें देख कर पता ही नहीं चलता था कि उन के इतने बड़े बच्चे हैं, तीनों एकदम स्लिमट्रिम लेकिन जंकफूड के शौकीन पराग ने बाहर का खाना खाखा कर काफी वजन बढ़ा लिया था, जिस के लिए तीनों उसे टोकते रहते थे. गीता ने तो मजाकमजाक में कई बार कहा था, ‘पराग, आजकल लड़कियां भी मोटे लड़कों को पसंद नहीं करतीं, मैं तुम्हारे लिए लड़की कहां से ढूंढंगी. तुम एक काम करना, खुद ही ढूंढ़ लेना.’

विपिन का भी यही कहना था, ‘कुछ ऐक्सरसाइज करो, शरीर फैलता जा रहा है, शादीब्याह सब होना बाकी है.’ लेकिन पराग के कान पर कभी जूं नहीं रेंगी और अब जब शरमाते हुए पराग ने पिछले हफ्ते भव्या के बारे में बताया तो सब एकदूसरे का मुंह देखते रह गए. बच्चों से फ्रैंक गीता ने कहा, ‘‘तुम्हें कैसे मिल गई गर्लफ्रैंड?’’

पराग ने हंस कर कहा, ‘‘बस, मिल गई, आप बेकार में मुझे इतने दिनों से ताने मार रही थीं.’’

और आज संडे को पराग भव्या को ले कर आ रहा था. पराग ने गीता से पूछा था, ‘‘मौम, आप अपनी बहू में कौन सा गुण देखना चाहेंगी?’’

गीता बेटे के सिर पर हाथ फेर कर बोली थीं, ‘‘बस, तुम्हारे जैसी.’’

‘‘तो मौम, बी हैप्पी, वह बिलकुल मेरे जैसी है.’’

तीनों पराग और भव्या का इंतजार कर रहे थे. मौडर्न गीता टौप और जींस में थी. डोरबैल बजी. अधीरता से गीता ने ही दरवाजा खोला. पराग जिस पर्सनैलिटी के साथ अंदर आया, गीता को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. उस ने बाहर फिर झांका, क्या भव्या इन के पीछे है. लेकिन बस, वही दोनों खड़े थे.

होने वाली बहू को देख कर गीता के चेहरे का रंग उड़ गया. लगा, पराग ने ठीक कहा था, वह बिलकुल उस के जैसी ही तो थी, एकदम गोरी, गोलमटोल. साफसाफ कहा जाए तो एक मोटी लड़की. वह मुसकराते हुए सब को हायहैलो कर रही थी. विपिन और वन्या भी बुत बने खड़े थे. पराग ने गला खंखारा और कहा, ‘‘डैड, मौम, वन्या, यह है भव्या.’’

विपिन ने सब से पहले अपने को सामान्य किया और मुसकराते हुए उसे अंदर आ कर बैठने के लिए कहा. वन्या भी भव्या के साथ ही बैठ गई. गीता को अपने को संभालने में काफी समय लगा. गीता ने औपचारिक हालचाल के बाद पूछा, ‘‘क्या लोगी, भव्या? चाय, कौफी या कोल्डडिं्रक?’’

‘‘मौम, कुछ ठंडा.’’

गीता किचन में गईं और टे्र में सब के लिए नीबूपानी, मिठाई, फू्रट्स और कुछ नाश्ता ले आईं. भव्या से बातें होती रहीं. गीता ने टे्र उस की तरफ खिसकाई, कहा, ‘‘लो बेटा, कुछ खाओ.’’

‘‘हां मौम, भूख तो लगी है, आज संडे था, सब फ्रैंड्स सो रही थीं, कुछ नाश्ता नहीं किया अभी तक. बस, एक सैंडविच और दूध पी कर चली थी, अंधेरी से ठाणे आने में वह तो हजम हो गया,’’ हंस कर उस ने मिठाई खानी शुरू की.

पराग ने भी उस का साथ दिया. विपिन और गीता की नजरें मिलीं, विपिन आंखोंआंखों में ही हंस दिए. नाश्ता खत्म होने तक भव्या सब से फ्री हो चुकी थी. खुल कर हंसबोल रही थी. घर में एक रौनक सी थी. वन्या भव्या को पूरा फ्लैट दिखा कर अपने रूम में बैठा कर बातें करने लगी. मूवी, म्यूजिक, कालेज, औफिस की खूब बातें होती रहीं. गीता लंच की तैयारी के लिए किचन में गईं तो भव्या भी आ गई.

‘‘मौम, कुछ हैल्प करूं?’’

‘‘नहींनहीं, तुम बैठो.’’

‘‘मौम, मिल कर करते हैं न,’’ फिर अपनेआप ही साइड में रखी प्लेट उठा कर सलाद काटने लगी. विपिन भी किचन में आ गए थे. भव्या हंसते हुए बोली, ‘‘मौम, आप को पता है, मुझे सलाद बिलकुल नहीं पसंद.’’

गीता ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘मुझे तो सौलिड चीजें खानी पसंद हैं, ये सलादवलाद तो डाइटिंग वालों की चीज लगती है मुझे. मौम, आप तीनों कितने स्लिम हैं. मैं और पराग तो अलग ही दिख रहे हैं घर में,’’ कह कर हंसी भव्या.

गीता हैरान थीं, क्या है यह लड़की, अपने मोटापे पर कोई शर्म नहीं. कोई चिंता नहीं.

भव्या ने फिर कहा, ‘‘मुझे खानेपीने का बहुत शौक है, मौम. मम्मीपापा को भी खानेपीने का बहुत शौक था,’’ कहते हुए भव्या थोड़ा उदास हुई, इतने में अंदर आते हुए पराग ने पूछा, ‘‘मौम, क्या बनाया है?’’

‘‘छोले, पनीर, आलूगोभी की सब्जी, रायता. बस, अब रोटी बना रही हूं.’’

भव्या ने चहक कर कहा, ‘‘मौम, पूरी बनाइए न. इस खाने के साथ गरमगरम पूरी कितनी अच्छी लगेंगी.’’

गीता चौंकीं. उन्हें झटका सा लगा, सोचा, ‘खुद पूरी जैसी क्यों हो गई यह लड़की, अब समझ में आ रहा है.’

पराग भी कहने लगा, ‘‘हां मौम, पूरी बनाओ न.’’

वन्या भी आ गई किचन में, बोली, ‘‘मौम, मैं तो रोटी ही खाऊंगी.’’

गीता ने कहा, ‘‘ठीक है, इन दोनों के लिए पूरी बना देती हूं.’’

गीता ने वन्या की हैल्प से खाना टेबल पर लगाया. गीता, विपिन और वन्या ने दोदो फुलके खाए. पराग और भव्या पूरी पर पूरी साफ करते रहे. गीता ने दोनों को देखा, ‘कैसे लग रहे हैं दोनों, शौक से खाते हुए मोटे गोलमटोल बच्चे, इन की शादी होगी तो कैसे लगेंगे दोनों. इस लड़की को फिगर से तो कोई मतलब ही नहीं है, क्या होगा इस का आगे,’ गीता मन ही मन पता नहीं क्याक्या सोचती रही.

सब खाना खा कर उठ गए. बातें होती रहीं, फिर भव्या ने कहा, ‘‘अच्छा मौम, अब मैं चलूंगी. आप सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा,’’ और अपना बैग उठा लिया फिर वन्या को गले लगा कर ‘बाय’ बोला और गीता व विपिन को ‘बाय मौम’, ‘बाय डैड’ बोल कर मुसकराती हुई आत्मविश्वास से भरे कदमों से चली गई. पराग से बस मुसकराहट का ही आदानप्रदान हुआ.

उस के जाने के बाद जब सब बैठे तो पराग ने झिझकते हुए पूछा, ‘‘मौम, डैड, वन्या, कैसी लगी भव्या?’’

गीता तो कुछ बोल नहीं पाईं, विपिन ने कहा, ‘‘स्वभाव अच्छा लगा.’’

वन्या पराग को छेड़ते हुए हंस कर बोली, ‘‘भैया, जैसा नाम है वैसी ही भव्य पर्सनैलिटी है. मुझे तो अच्छी लगी.’’

गीता चुप थीं.

पराग ने कहा, ‘‘आप तो कुछ बोलो, मौम.’’

गीता ने एक ठंडी सांस भर कर कहा, ‘‘तुम्हें पसंद है न? बस, मेरे लिए यही महत्त्वपूर्ण है कि तुम खुश हो. अब शादी कब करनी है, बताओ. इस के मामामामी से फोन पर बात कर लेती हूं.’’

पराग ने जींस की जेब से झट से एक पेपर निकाल कर दिया, कहा, ‘‘यह है उस के मामा का फोन नंबर.’’

विपिन को हंसी आ गई, ‘‘वाह बेटा, बहुत जल्दी है शादी की.’’

फिर सब अपनेअपने रूम में थोड़ा आराम करने चले गए.

विपिन ने बराबर में लेटी गीता से पूछा, ‘‘क्या हुआ, पसंद नहीं आई भव्या? जानता हूं, क्यों? तुम्हें बेडौल फिगर पसंद नहीं है न. पराग भी तो स्लिमट्रिम नहीं है, कुछ तो बोलो गीता. चुप क्यों हो इतनी?’’

रोंआसी हो गईं गीता, ‘‘क्या सोचा था क्या हो गया. हमेशा एक फिगर कांशस स्मार्ट सी बहू का सपना देखती आई हूं. मेरी सहेलियां फिटनैस के प्रति मेरा शौक देख कर कहती हैं, ‘गीता, तुम तो जरूर एक मौडल जैसी बहू लाओगी ढूंढ़ कर,’ मैं ने भी गर्व से हां में गरदन हिलाई है हमेशा. इस उम्र में भी मैं फिगर का इतना ध्यान रखती हूं और यह लड़की तो जैसे फिटनैस और फिगर जैसे शब्द ही नहीं जानती और उस पर कितने गर्व से बता रही थी कि उसे खानेपीने का शौक है. मैं तो पराग के मोटापे पर गुस्सा होती थी और अब बहू भी मोटी, मेरी सहेलियां मेरा कितना मजाक उड़ाएंगी,’’ कहतेकहते उन का मुंह लटक गया.

विपिन ने शांत और प्यारभरे स्वर में कहा, ‘‘अरे, प्यार से समझाएंगे तो ध्यान रखना सीख जाएगी सेहत का, न मांबाप हैं न भाईबहन, अकेली जी रही है. हमारे साथ रहेगी तो प्यार से धीरेधीरे सब सिखा देंगे. तुम दिल छोटा मत करो. स्वभाव अच्छा है उस का, बस.’’

दिन बीत रहे थे, दिन में एक बार तो भव्या गीता को जरूर फोन करती, हालचाल पूछती. गीता को अच्छा लगता. वन्या से तो वह अकसर मैसेज में चैटिंग करती रहती. विपिन ने भव्या के मामा अनिल से दोनों के विवाह के बारे में बात कर ली थी. किसी पंडित से दोनों की कुंडली मिलाने के अंधविश्वास में विपिन और गीता बिलकुल नहीं पड़े. उन की सिंपल सी सोच थी, उन के बेटे को भव्या पसंद है, बस. भव्या का स्वभाव तो सब को अच्छा लगा ही था, बस गीता को जैसी स्लिम बहू चाहिए थी, भव्या उस कसौटी पर खरी नहीं उतरी थी. यही बात गीता को कचोटती थी कि उस की सहेलियां भव्या को देख कर जरूर मजाक बनाएंगी. अच्छी तरह जानती थी गीता अपनी सभी सहेलियों को.

एक महीने बाद सगाई का समय रखा गया. विपिन ने गीता से कहा, ‘‘अपनी फ्रैंड्स की लिस्ट बना लो.’’

‘‘नहीं, मैं अपनी फ्रैंड्स को नहीं बुला पाऊंगी, सीधा शादी में ही बुलाऊंगी.

नहीं तो सगाई से शादी तक ताने मारमार कर मेरा दिमाग खराब करती रहेंगी.

बस, सगाई की मिठाई भिजवा दूंगी सब के घर.’’

सब थोड़ीबहुत तैयारियों में व्यस्त हो गए, अनिल अपनी पत्नी रेखा के साथ आ कर एक होटल में रुके. विपिन और गीता ने उन्हें अपने घर पर ही रुकने का आग्रह किया लेकिन संकोचवश वे होटल में ही रुके. सब को एकदूसरे से मिल कर अच्छा लगा.

गीता ने किसी सहेली को नहीं बुलाया. बस, बच्चे और विपिन के दोस्त थे. तैयार हो कर भव्या अच्छी लग रही थी. चेहरा काफी आकर्षक था उस का. उस ने कई बार गीता से पूछा, ‘‘मौम, आप ने अपनी किसी फ्रैंड को नहीं बुलाया?’’

गीता ने यह कह कर टाला, ‘‘बस, सब को शादी पर ही बुलाऊंगी.’’

दोनों ने एकदूसरे को अंगूठी पहना दी, सगाई हो गई. अनिल और रेखा भव्या के भावी ससुराल वालों का व्यवहार देख कर बहुत खुश थे. शादी की तारीख 2 महीने बाद की पक्की हो गई. अनिल और रेखा चले गए, तय यही हुआ कि अनिल और रेखा ही कुछ खास रिश्तेदारों के साथ मुंबई आ जाएंगे.

विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं. भव्या और पराग वीकेंड में ही फ्री हो कर शौपिंग कर पाते थे. भव्या शनिवार को सुबह आती, पूरा दिन शौपिंग होती. गीता उसी की पसंद के कपड़े, ज्वैलरी दिलवा रही थीं. जब मीडियम, लार्ज साइज न आ कर भव्या को डबलएक्सएल आता, गीता मन ही मन झुंझला जातीं.

एक संडे पूरा परिवार शौपिंग पर निकला, गीता हैरान रह गईं जब भव्या ने कहा, ‘‘मौम, पिज्जा खाएंगे.’’

‘‘लेकिन बेटा, लंच कर के ही तो निकले हैं अभी.’’

‘‘तो क्या हुआ, मौम, शौपिंग करतेकरते कुछ खाने में बहुत मजा आता है.’’

पराग भी शुरू हो गया, ‘‘चलो न मौम, कुछ खाएंगे.’’

‘‘नहीं पराग, तुम्हें पता है मैं अभी कुछ नहीं खा सकती.’’

‘‘तो ठीक है, आप साथ तो बैठिए.’’

‘‘ऐसा करो, तुम दोनों खा लो, हम यहीं जूस कौर्नर पर तुम्हारा वेट करेंगे.’’

भव्या तुरंत बोली, ‘‘मौम, बस जूस? जूस से होता क्या है?’’

विपिन ने दोनों को ही भेज दिया. विपिन, गीता और वन्या जूस पीने लगे. गीता ने कहा, ‘‘क्या लड़की है, अभी लंच किए 1 घंटा भी नहीं हुआ है.’’

विपिन बोले, ‘‘तुम्हारी बहू लाइफ ऐंजौय कर रही है, बेचारी अपनी मरजी से खाएगीपिएगी नहीं क्या?’’

‘‘तो मैं कौन सा मना कर रही हूं,’’ गीता ने चिढ़ते हुए कहा.

दोनों पिज्जा खा कर खुश होते हुए आए. विपिन ने कहा, ‘‘पराग, चलो, हम दोनों चल कर कार्ड देख आते हैं, तब तक ये तीनों ज्वैलरी का काम देख लेंगी.’’

विपिन और पराग चले गए.

ज्वैलरी की शौप से जब तीनों निकलीं तो एक आवारा सा लड़का वन्या की कमर को बदतमीजी से छू कर बढ़ा तो वन्या चिल्लाई, ‘‘बेशर्म, तमीज नहीं है क्या?’’

भव्या फौरन बोली, ‘‘क्या हुआ, वन्या?’’

‘‘उस लड़के ने बदतमीजी की है.’’

भव्या ने आव देखा न ताव, फौरन भागी और लड़के की कमर पर पीछे से एक हाथ मारा. लड़का संतुलन खो बैठा और नीचे गिर गया. भव्या जोर से चिल्लाई, ‘‘बदतमीजी करता है.’’ लड़का उठने की कोशिश कर रहा था, भव्या ने पुन: धक्का दिया और उसे नीचे गिरा कर उस के सीने पर चढ़ बैठी और कुहनी जमा दी.

लड़के की चीख निकल गई. वह हिल भी नहीं सका. दृश्य गंभीर था लेकिन लड़के के सीने पर गोलमटोल भव्या की यह बहादुरी देख कर गीता को मन ही मन हंसी आ गई. भव्या जोर से चिल्लाई, ‘‘हैल्प, हैल्प.’’

तुरंत लोग इकट्ठे हो गए. भव्या की बात सुन कर लड़के को पीटने लगे. एक पुलिस वाला भी आ गया और लड़के को 2 डंडे लगा कर जीप में बिठा लिया. पूरे प्रकरण में गीता और वन्या हक्कीबक्की खड़ी थीं. देखते ही देखते भव्या ने जो किया था, दोनों को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. भव्या को शाबाशी देते हुए लोग आजकल लड़कों की बढ़ती बदतमीजी पर बात करते हुए इधरउधर हो गए.

गीता ने देखा, किसी की नजरों में भव्या के लिए उपहास नहीं था. सब की नजरों में उस के लिए तारीफ थी. भव्या ने गीता को जैसे सपने से जगाया, ‘‘मौम, ठीक किया न?’’

गीता उस के कंधे पर हाथ रख कर इतना ही बोल पाईं, ‘‘वैल डन, भव्या, शाबाश.’’

वन्या तो भव्या से सड़क पर ही चिपट गई, ‘‘आप कितनी स्ट्रौंग हो.’’

‘‘वह तो मुझे देख कर ही पता चलता है,’’ कह कर भव्या हंस दी.

इतने में विपिन और पराग भी आ गए, गाड़ी में बैठ कर वन्या ने उन्हें पूरा किस्सा सुनाया तो वे हैरान रह गए.

विपिन ने भी कहा, ‘‘वैल डन, भव्या.’’

पराग ने हंस कर उसे छेड़ा,

‘‘बेचारा लड़का.’’

सब हंस पड़े. गीता को तो आज इतना प्यार आ रहा था भव्या पर कि उस का मन हो रहा था यहीं उसे गले से लगा ले. लग रहा था, बेकार में अपने मन को इतने दिनों से छोटा कर रखा है. वह जैसी है बहुत अच्छी है. मोटापे का क्या है, धीरेधीरे उसे प्यार से समझा कर सेहत के प्रति सजग बना देंगी, और वैसे पराग को भी कहां रोक पाती हैं लापरवाही से. अब जैसा बेटा, वैसी बहू है तो दुख किस बात का.

अब वे शान से भव्या को अपनी सहेलियों से मिलवाने के लिए उंगलियों पर शादी में बचे दिन गिन रही थीं. आज पहली बार अपनी मोटी बहू पर उन्हें बहुत प्यार आ रहा था. Family Story In Hindi

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