Hindi Story: मास्टर मटरूराम

Hindi Story, लेखक – हरे राम मिश्र

दिल्ली के पहाड़गंज में बने उस चमचमाते होटल में, जहां मास्टर मटरूराम हर महीने की 28 तारीख को अपने कारोबार के सिलसिले में रात को रुकते थे, तीसरे फ्लोर के कमरा नंबर 2 में 19 साल की एक बेहद खूबसूरत बर्फ सी सफेद, गोरे बदन वाली लड़की जूली बिस्तर पर बिछी, पर सिकुड़न भरी सफेद चादर पर आड़ीतिरछी बिना कपड़ों के पड़ी हुई थी.

आखिर एक घंटे तक मास्टर मटरूराम द्वारा रौंदे जाने के बाद वह बेसुध हो कर अपनी बचीखुची ताकत को दोबारा इकट्ठा कर के अगली बार के लिए खुद को दिमागी और जिस्मानी तौर पर तैयार कर रही थी.

मास्टर मटरूराम जैसे कांइयां और पैसा वसूल सोच के शख्स, जो पूरी दुनिया को सिर्फ नफा और नुकसान के नजरिए से ही देखने का आदी था, ने बहुत ही दर्दनाक तरीके से किए गए सैक्स से जूली को अंदर तक हिला डाला था.

जूली इस बेइंतिहा दर्द को महसूस कर सकती थी. बेदर्दी से रौंदे जाने से उपजी थकान और दर्द से टूटते बदन से वह बेदम सी हो गई थी. वह मन ही मन बुदबुदा रही थी कि किस ‘कसाई’ से आज उस का पाला पड़ गया है.

जूली होटल के इस कमरे को छोड़ कर भागना चाहती थी, लेकिन अपने उस चचेरे भाई, जो इस धंधे में उस का ‘दलाल’ भी था, को धोखा नहीं दे सकती थी. यही ‘दलाल’ उस के लिए 30 फीसदी कमीशन पर अकसर अमीर ग्राहक का जुगाड़ कर देता था, जो अमूमन कौर्पोरेट कंपनियों के अफसरों से ले कर बड़े सरकारी मुलाजिम और नेता तक होते थे.

चूंकि उस के सिर पर दिल्ली के एक मंत्री का हाथ था. लिहाजा, पुलिस के लफड़े और बेगार में अपनी ‘सैक्स सेवा’ देने से वह बच जाती थी.

जूली हमबिस्तरी के लिए अकसर अमीर ग्राहक ही चुनती थी, क्योंकि अपनी कैंसर से पीडि़त मां के इलाज, जांच और दवा के लिए उसे अकसर बड़ी रकम का जुगाड़ करना होता था. जिस्म के बाजार में वह यह जान चुकी थी कि जवानी ढलते ही उसे कुत्ता भी नहीं सूंघेगा, इसलिए सेवा के बदले पूरा पैसा वसूल करना उस के दिमाग में भरा हुआ था.

खैर, होटल पहुंचते ही मास्टर मटरूराम ने अपने ड्राइवर अनोखेलाल तिवारी को पहले ही बाहर भेज दिया था. वह उन का बेहद ही खास कारिंदा था, जो अकसर उन की गैरहाजिरी में उन की फर्म का हिसाबकिताब भी देख लेता था और कभीकभी नकद रकम भी उन के घर तक ले आता था.

इस होटल में चखना, दारू और डिनर का इंतजाम अनोखेलाल ही करता था. मास्टर मटरूराम और अनोखेलाल की पहचान उन के टैंपो चलाने के दिनों से थी. दोनों साथ बैठ कर देशी ठर्रा पीते थे.

समय के साथ मास्टर मटरूराम नेता बन गए और अनोखेलाल मामूली ड्राइवर ही रह गया. भले ही दोनों हमउम्र थे, लेकिन उन के बीच विश्वास की डोर बहुत मजबूत थी.

मास्टर मटरूराम अनोखेलाल पर काफी भरोसा करते थे और अनोखेलाल ने कभी उस भरोसे को दागदार नहीं होने दिया था.

अनोखेलाल को ड्राइवर रखने का एक फायदा और था. अपने समाज की मीटिंग में सामने खड़ी जनता को मटरूराम बहुत दावे से बताते थे कि अपनी गुलामी के दिन अब जा चुके हैं. हमें अब ताकतवर होना है और उन्हें नौकर रखना है, जिन्होंने हम पर अब तक राज किया है.

हालांकि, असलियत यह थी कि अपनी जातबिरादरी के लोगों को मास्टर मटरूराम ने इसलिए ड्राइवर नहीं रखा, क्योंकि जात और समाज को यह नहीं जानना चाहिए कि मास्टर मटरूराम असल में क्या हैं, वरना सियासत में दिक्कत होती है. अपनी जात से एक खास दूरी सियासत में जमे रहने के लिए बहुत जरूरी होती है, ऐसा मास्टर मटरूराम का मानना था.

खैर, इसी कमरे में सफेद रोशनी से चमचमाते बिस्तर से कुछ ही दूरी पर रखे गए एक बड़े से सोफे पर एक सफेद वी कट कच्छा पहने मास्टर मटरूराम बैठ कर ह्विस्की पी कर उस का स्वाद ले रहे थे. वे 1-2 पैग से ज्यादा कभी नहीं पीते थे, लेकिन कम से कम 2 घंटे जरूर लगाते थे.

सामने रखी टेबल पर काजू और बादाम के साथ भुने हुए लहसुन और सामने पीसों में कटे हुए सेब, केला और प्याज की पकौड़ी की प्लेट सजी हुई थी. बस वे हर चुसकी के बाद चखना मुंह में भरते और आंखें मूंद कर दोनों के स्वाद का पूरा मजा लेते.

हालांकि, कमरे में ही बिना कपड़ों के लेटी जूली से मास्टर मटरूराम ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि क्या वह भी उन के साथ कुछ खानापीना चाहेगी?

इस मामले में मास्टर मटरूराम इस तरह से बरताव कर रहे थे, जैसे कमरे में कोई और मौजूद ही न हो या फिर उन्हें एक ‘धंधेवाली’ को तवज्जुह देने की कोई जरूरत नहीं है.

कमरे की सफेद रोशनी में गोरे और साफ चेहरे वाले मास्टर मटरूराम के चेहरे पर एक अलग किस्म की चमक दिख रही थी. उन्होंने गले में सोने की एक मोटी चेन भी पहन रखी थी, जो इस रोशनी में कुछ अलग ही चमक रही थी. अपनी चालढाल और बरताव में वे खुद को दबंग के तौर पर दिखाते थे.

शराब की चुसकी के बीच कुछ देर के बाद वे अपनी मूंछ भी मरोड़ते थे. उन के अपने इलाके में कुछ ऊंची जाति के लोग उन्हें एक खूनी मानते थे, जिस ने कम से कम एक ब्राह्मण की हत्या की है. हालांकि, इस का सच क्या है, इस पर किसी के पास कोई ठोस सुबूत नहीं था. पुलिस आज तक उन्हें पूछताछ के लिए भी नहीं बुला सकी थी.

उन के समाज के लोग यह मानते थे कि इस तरह जंजीर पहनने का मतलब इलाके के क्षत्रियों को यह बताना होता है कि हम आप को कुछ नहीं सम?ाते. हम भी इन क्षत्रियों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं.

हमारे समाज का नेता भी क्षत्रियों से कमतर बरताव किसी भी कीमत पर नहीं करता है. हम भी अब जमींदार हैं और कोई हमें टक्कर नहीं दे सकता.

शराब पीते हुए, उस की चुसकी के बीच अपने आई फोन से बीचबीच में किसी को तेज आवाज में मास्टर मटरूराम गंदीगंदी गालियां देते और फिर भुना काजू खाते. शायद यह उन के घर का केयरटेकर था, जो उन के जातसमाज से ही आता था. उस का काम उन के विदेशी कुत्ते की ढंग से देखभाल करना था, जिस में नाकाम होने पर वह मास्टर मटरूराम से गालियां सुन रहा था.

दरअसल, मास्टर मटरूराम का महंगा विदेशी कुत्ता किसी देशी कुतिया के चक्कर में गेट से बाहर निकल कर भाग गया था, जिसे देशी कुत्तों ने नोंचनोंच कर घायल कर दिया था. इस तरह उन का कुत्ता करैक्टर का ‘लूज’ होता जा रहा था. लूज करैक्टर का कुत्ता घर की रखवाली नहीं कर सकता, ऐसा उन का मानना था.

जिस काम के लिए आज अचानक मास्टर मटरूराम को दिल्ली आना पड़ा था, वह खास काम था.

दरअसल, मास्टर मटरूराम को एक ऐसा फोन आने की उम्मीद थी, जिस से उन्हें 50 लाख की तीसरी किस्त की सूचना मिलने वाली थी. 2 किस्त वे पहले ही ले चुके थे.

पैसा कल मिलना था. बस, फोन पर केवल जगह का फिक्स होना बाकी था, जिस के लिए वे दिल्ली के इस होटल में इंतजार और मजा कर रहे थे.

थोड़ा सुरूर में आने पर फोन पर ही वे अपनी किसी तथाकथित प्रेमिका को मसूरी ट्रिप पर ले चलने और ‘मस्ती’ करने के प्लान के बारे में भी बोलते थे.

मास्टर मटरूराम भले ही इन दिनों अपने इलाके के बड़े नेता बन चुके थे, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन की 20 साल की जद्दोजेहद थी. यह एक ऐसे लड़के का उदय था, जो अपने परिवार के चमड़ा छीलने और संवारने के पुश्तैनी काम को छोड़ कर, कपड़ा सिलने के काम में शिफ्ट होता है.

हालांकि, यहां से भी मन उचटने पर वह टैंपो ड्राइवर बनता है. फिर टैंपो यूनियन का कार्यकर्ता और फिर अपनी ग्राम पंचायत का सदस्य बनने से ले कर सरपंच और जिला लैवल का नेता बन जाता है. ‘मास्टर’ शब्द उन के कपड़ा सिलने के समय का लोगों का दिया हुआ नाम था, जिसे उन्होंने अपने नाम के पहले जोड़ लिया था.

अपनी 20 साल की इस सियासी जिंदगी में मास्टर मटरूराम ने यह सीखा कि जातसमाज का नेता बनना आसान नहीं है. उन्होंने अपने पैर जमाने के लिए काफी मेहनत की थी.

उन के मुताबिक, समाज की समस्याओं को पहचानना, उस के खिलाफ लड़ाई का बीड़ा उठाना, भाषणों में उन्हें दोहराना ही समाज के भीतर किसी नेता के मशहूर होने का सब से बेहतर तरीका है.

उन का यह भी सोचना था कि समाज की समस्याओं पर बात करना, समस्याओं के हल करने के बारे में बात करना ही समाज में मजबूती दिलाता है. इस के साथ खुद को सामाजिक और पैसे के तौर पर मजबूत करने पर भी काम होना चाहिए. बिना पैसे की मजबूती के सियासी मजबूती का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि चुनाव में पैसा लगता है.

भले ही मास्टर मटरूराम 5वीं जमात से आगे स्कूल नहीं जा सके, लेकिन अपने अनुभव से यह सीख लिया कि जातसमाज का ‘विश्वास’ कैसे जीता जाता है. वे मानते थे कि कम बोलना भी अपने समाज पर असर जमाने का एक अच्छा तरीका होता है.

अपने शुरुआती दिनों में तकरीबन 3 साल तक टैंपो यूनियन के संगठन में बिताने के बाद मास्टर मटरूराम ने अपने समुदाय के लिए एक संगठन बनाया था. संगठन में इस नजरिए को मजबूत करने की बात हुई कि अपनी जातसमाज के लोग पहले राजा थे. अब हमें वह दौर फिर से वापस लाना है. अपने समाज को शासक बनाना है.

इस के लिए उन्होंने अपने समाज के किसी एक काल्पनिक देवता के नाम को गढ़ा और खुद को उस का वंशज घोषित किया, जो एक बड़ा काम करने के, अपने समाज के उद्धार के लिए इस धरती पर आ चुका था. ऐसा शख्स, जो समाज के लिए खटने और कुछ चमत्कार करने के लिए आया था.

शुरुआत में मास्टर मटरूराम के जातसमाज के लोगों ने उन के इस दावे पर कम ध्यान दिया, लेकिन कुछ समय बाद ऊंची जाति के लड़कों से ‘तूतूमैंमैं’ या सामान्य सी मारपीट के बाद इलाके के लोगों का ध्यान उन की तरफ गया. आखिर इन ब्राह्मण के लौंडों को पीटने की हिम्मत किसी आम कलेजे में नहीं हो सकती. यह उन की निगाह में संघर्ष की शुरुआत थी. और फिर, आम लोग उन के राजा बननेबनाने की बात में रुचि भी लेने लगे.

तकरीबन एक साल में ही मास्टर मटरूराम ने समाज से मिले चंदे पर एक कार खरीदी, कुछ पैसे भी जोड़े और अपने छोटे भाई को सीमेंटबालू की सप्लाई का एक कारोबार भी शुरू करवा दिया, जो चल निकला.

अपनी जातसमाज के लिए काम करते हुए मास्टर मटरूराम को इसी समाज से पहचान, पैसा, प्रचार सबकुछ मिला. सरपंच के अगले चुनाव में वे ब्राह्मणों के उम्मीदवार को हराते हुए सरपंच भी बने और कुछ साल के भीतर ही वे जिला पंचायत के सदस्य भी बन गए.

इलाके में ब्राह्मण ज्यादा नहीं थे, कोरियों की तादाद ज्यादा थी. ब्राह्मणों के मैदान से हटते ही कोरियों से इन के समुदाय का सीधा मुकाबला होने लगा.

इलाके में मास्टर मटरूराम की जातसमाज और कोरी, दोनों समुदायों की तादाद तकरीबन बराबर थी. मास्टर मटरूराम को लगने लगा कि वे एक दिन विधायक भी बन सकते हैं और कोरियों के दबदबे वाली इस सीट से उन्हें खदेड़ा जा सकता है.

मास्टर मटरूराम अपनी मुहिम में लग गए और ‘अपना वोट अपना समाज’ का नारा बुलंद करने लगे. उन की लोकप्रियता बढ़ चुकी थी. आखिर कपड़ा सिलने वाला एक मामूली दर्जी, जिसे गांव में सब ‘मास्टर’ बोलते थे, आज अपने समाज की एक ऐसी हस्ती बन चुके थे, जिन्हें इलाके के सामाजिक संगठन, जातसमाज की पंचायतें अपने यहां बुला कर मंच पर ‘इज्जत’ देते थे.

ऐसा मास्टर, जो आम आदमी से अपनी जाति का अभिमान बन चुका था. अब समाज के लोग पुलिस थाने जाने से पहले उन का आशीर्वाद लेना जरूरी समझते थे.

हालांकि, मास्टर मटरूराम अब विधायक बनना चाहते थे. उन्हें इस के लिए पैसे की जरूरत भी थी.

लिहाजा, उन्होंने ठेकेदारी का काम भी शुरू किया. काम चल निकला. पैसे से मजबूत होने के साथ वे अपने समाज का बड़ा चेहरा पहले ही बन चुके थे. कई दलों में उन्हें अब समाज के नेता के तौर पर मंच पर बुलाया जाता था.

वे भाईचारा सम्मेलनों में शिरकत करते थे. वे मंच पर जाते भी थे तो इस नीयत से कि कोई पार्टी उन्हें टिकट दे कर उम्मीदवार बना दे. इस मुकाम पर पहुंचने में उन्होंने 25 साल का लंबा समय बिताया. अब उन की उम्र 44 साल हो गई थी.

चुनाव के समय कई पार्टियों के नेता उन से उन की जाति का वोट ट्रांसफर कराने के लिए मेलजोल रखते थे, क्योंकि उन की जेब में तकरीबन 10 से 15 हजार वोट ट्रांसफर कराने की ताकत आ गई थी, लेकिन इस के लिए वे बड़ी रकम भी लेते थे. वोटिंग के 3 दिन पहले वे तय करते थे कि किसे समर्थन देंगे.

पिछले 2 चुनाव में उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय विधायक से 10 लाख रुपए ले कर अपनी जाति के वोट ट्रांसफर करवाए थे. इस के लिए उन्होंने बड़ी चालाकी से ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कौम का दुश्मन बता दिया था.

हालांकि, इस बार के चुनाव में उम्मीदवार उलटफेर कोरी ने मास्टर मटरूराम को 30 लाख दे कर उन दलितों के वोट हासिल किए, जिन्हें वे जात का दुश्मन नंबर 3 बता चुके थे.

इस बार मास्टर मटरूराम ने अपनी जातसमाज के लोगों को समझाया कि ब्राह्मण और क्षत्रियों को बेइज्जत करने के लिए इस बार रघु पांडे की जगह उलटफेर कोरी को सपोर्ट देना है. वे चुने जाने के बाद समाज के महल्लों में विकास का काम करवाएंगे. उन्होंने भाषण भी दिया और उलटफेर कोरी के लिए खूब प्रचार भी किया.

उन के भाषण में यह बात बहुत साफ थी कि समाज के लिए काम करने वाले लोगों को समाज का साथ मिलेगा. हालांकि, वह काम क्या था, जिस पर काम होना है, इस के बारे में सार्वजानिक तौर पर कभी उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.

खैर, विधानसभा के चुनाव हुए. चुनाव में उलटफेर कोरी की जीत हुई. ब्राह्मण और क्षत्रिय समुदाय के साथ आने, यादव समुदाय के खुले सहयोग के बावजूद 2 बार के विधायक रघु पांडे चुनाव हार गए.

पिछली बार मास्टर मटरूराम ने उन्हें समर्थन किया था, लेकिन इस बार वह समर्थन के एवज में मांगी गई बढ़ी रकम देने को तैयार नहीं हुए, लिहाजा मटरूराम ने नया लौजिक गढ़ कर 20 हजार वोट का ट्रांसफर करवा कर पूरा पाला बदल दिया.

चुनाव के बाद 2 साल बीते. मास्टर मटरूराम के जातसमाज के इलाकों में विधायक उलटफेर कोरी की तरफ से विकास का कोई काम नहीं हुआ. इस से जुड़ी जातसमाज के लोगों की शिकायतों पर भी मास्टर मटरूराम ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

हालांकि, इस इलाके के विकास के लिए वर्तमान विधायक उलटफेर कोरी ने पैस्टीसाइड बनाने वाली एक कंपनी को सरकार से कारखाना लगाने का करार करवा दिया. जब जगह को चुना गया, तो सब से पहले कारखाने से निकलने वाले कचरे और गंदे जहरीले पानी पर बात शुरू हुई. कुछ एनजीओ कार्यकर्ताओं ने इलाके में कारखाना लगाए जाने के खिलाफ स्लोगन लिखना शुरू कर दिया.

मास्टर मटरूराम के समुदाय के लोगों ने भी इस के खिलाफ धरनाप्रदर्शन शुरू कर दिया, क्योंकि कारखाने से जहरीले पानी की निकासी दलितों के गांव की तरफ होनी थी. तकरीबन 8,000 की आबादी सीधे इस की जद में थी.

मास्टर मटरूराम के जातसमाज के कुछ जोशीले नौजवानों ने कारखाने के बनने का काम मारपीट कर जबरिया रुकवा दिया. इस के खिलाफ इलाके के ऊंचे और पिछड़े समुदाय के कुछ लोग कारखाना बनने के पक्ष में खड़े हो गए.

वे लोग चाहते थे कि कारखाना लगे, ताकि जमीन का मोटा मुआवजा ले कर वे शहर में फ्लैट खरीद सकें, लेकिन मास्टर मटरूराम के गांव के लोग कारखाने से निकलने वाले जहरीले पानी और कचरे से काफी डरे हुए थे.

यही नहीं, इलाके के कोरी समुदाय के लोग इस प्रोजैक्ट का रुकना अपने समाज की बेइज्जती समझने लगे. इस के लिए विधायक के लोगों ने गांव में कारखाना लगाने का विरोध कर रहे लोगों पर हमला कर उन को जम कर पीटा. औरतों और लड़कियों को नंगा कर दिया गया. जब रोज हंगामा बढ़ने लगा, तो सरकार को भी दखल देने की जरूरत महसूस हुई.

मास्टर मटरूराम भी इस मारपीट के बाद आंदोलन में शामिल हो गए. उन्होंने इस आंदोलन को ‘दलित बनाम पिछड़ा’ एंगल दे दिया. लेकिन इस के पक्ष में खड़े ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कैसे और कहां सैट करें, यह तय नहीं कर पा रहे थे. फिर इन्हें भी दलित जातसमाज विरोधी घोषित किया गया.

क्षेत्र के कोरियों के बहिष्कार का ऐलान खुलेआम किया जाने लगा. कहा गया कि अब कोरियों, ब्राह्मणों और क्षत्रियों की फसल हमारे समाज के लोग नहीं काटेंगे.

पूरे क्षेत्र में हंगामा बढ़ने लगा. रोज के तनाव से हिंसा हुई और पुलिस फायरिंग में 2 लोग मारे गए.

अब राज्य सरकार को भी इस प्रोजैक्ट के पूरा होने में शक होने लगा. बातचीत के रास्ते समस्या के समाधान पर जोर दिया जाने लगा. स्थानीय प्रशासन ने इस के लिए कंपनी के अफसरों से ले कर एनजीओ के कार्यकर्ताओं तक की मीटिंग बुलाई.

जहरीले पानी से प्रभावित गांव के लोगों ने मटरूराम को इसलिए प्रतिनिधि चुना, क्योंकि वे समाज के नेता थे और समाज की बात ठीक से इस मीटिंग में रख सकते थे.

3 बार की मीटिंग बेनतीजा रही, लेकिन चौथी मीटिंग से पहले ही कंपनी के अफसरों ने एनजीओ कार्यकर्ताओं को मोटा फंड देने की बात कह कर आंदोलन से ही बाहर कर दिया. सब अपना सामान समेट कर रात में ही चले गए. कोरी समुदाय पहले से ही इस कारखाने के पक्ष में था, लिहाजा स्थानीय विधायक को भी मामले में शामिल किया गया. मीटिंग के बाहर ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज प्रोजैक्ट लगाए जाने के पक्ष में नारेबाजी कर रहे थे.

मास्टर मटरूराम इस बार की मीटिंग में फिर शामिल हुए. कुल 3 लोगों की मीटिंग हुई. यह तय हुआ कि कारखाने का कचरा नए रास्ते से गांव के बाहर बहने वाली नदी में मिलाया जाएगा.

अब यह दलितों की आबादी की तरफ नहीं जाएगा.

लेकिन मास्टर मटरूराम अपनी बात पर कायम रहे कि इस कारखाने से उन के समाज को क्या फायदा होगा और यह गांव में क्यों लगे? हवापानी सब जहरीले हो जाएंगे और बदले में हमारे समाज को कुछ मिलेगा भी नहीं. वे कुछ भी मानने को तैयार नहीं थे.

काफी सोचविचार के बाद यह तय हुआ कि 3 करोड़ रुपए खर्च कर के मामला सैटल किया जाएगा. एक करोड़ विधायक उलटफेर कोरी को मिलेंगे.

50 लाख मास्टर मटरूराम लेंगे. 5 लाख पुलिस के और बाकी रकम जिले के प्रशासन को मिलेगी.

सब बाहर निकले और बताया कि सम?ाता हो गया है. यह कंपनी अपना डिजाइन बदलेगी. मास्टर मटरूराम ने कौम की जीत की घोषणा की. विधायकजी ने भीड़ के सामने हाथ जोड़े और अपनी गाड़ी से चले गए.

जिन समुदायों की जमीन का अधिग्रहण होना था, उन्हें भी खुशी हुई कि चलो, अब जमीन का बड़ा मुआवजा मिलेगा और शान से थार गाड़ी में घूमेंगे और शहर में जमीन खरीदेंगे. हालांकि, गांव के उन दलितों को इस सम?ाते में क्या मिला, इस बारे में कोई ठोस बात ही नहीं हुई.

कारखाना बनने लगा. मास्टर मटरूराम की जातसमाज के लोग कारखाने में मजदूर बने और उलटफेर कोरी के लोगों ने सीमेंटबालू मजदूर सप्लाई का काम शुरू कर दिया. सब को तय रकम की 2 किस्तें जल्द ही मिल गईं.

तकरीबन 3 महीने बाद उसी सौदे की तीसरी किस्त लेने के लिए मास्टर मटरूराम दिल्ली के इस होटल में रुके हुए थे. वे फोन का इंतजार कर रहे थे.

थोड़ी देर में उन्हें एक फोन आया कि कल 10 बजे बेनी स्टेडियम के बगल के फार्महाउस में मिलिए, काम हो जाएगा. यह नंबर 10 बजे चालू मिलेगा. ओके कह कर बात दोनों ओर से खत्म हुई.

मास्टर मटरूराम ने गिलास की बची ह्विस्की को एक सांस में पूरा पी लिया. गरम रोस्टेड चिकन खाया. पैसे मिलने की खुशी में उन का जोश ज्यादा बढ़ गया. मुंह साफ किया और अपने बैग से एक गोली निकाली और उसे चूसने लगे. इस के बाद वे फोन पर ही पोर्न मूवी देखने लगे.

5 मिनट के बाद अचानक मास्टर मटरूराम ने अपना जांघिया उतारा और जूली के ऊपर चढ़ गए. जूली के कटे होंठों से निकलते खून को वे चाटने लगे. शराब और चिकन में लगे मसाले की बास भरी महक से जूली का गला भर गया.

रात के 12 बजने वाले थे. पिछले आधे घंटे से वे जूली को रौंद रहे थे. यह राउंड जूली के लिए पहले से और ज्यादा दर्द देने वाला था. लेकिन मास्टर मटरूराम और ज्यादा जोश में आ चुके थे. अब वे जूली को रौंदने में लगे हुए थे.

आखिर मास्टर मटरूराम ने आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पैसे का इंतजाम जो कर लिया था. भले ही उस समाज को उन्होंने धोखा दिया था, जिस ने उन्हें एक मामूली टैंपो ड्राइवर से ऊपर उठा कर ‘हीरो’ बना दिया था.

मास्टर मटरूराम का मानना था कि जातसमाज वाले केवल चमत्कार को ही सिर झुकाते हैं, इसलिए उन्हें अपने समाज में मजबूत बने रहने के लिए बड़े चमत्कार करते रहना जरूरी था. यही उन की सियासत की समझ का कुल हासिल था, जहां धोखा, फरेब, ऐयाशी, भ्रष्टाचार सब जायज है, क्योंकि जातसमाज को सिर्फ चमत्कारी लोग ही चाहिए.

उस चमत्कार के पीछे कितना घना अंधेरा है, लोकतंत्र और समाज को निगलने वाला कितना बड़ा साम्राज्य है, कितनी ज्यादा गहरी कालिख है, यह किसी को जाननेसम?ाने में दिलचस्पी नहीं है.

खैर, अब रात के 2 बज रहे थे. मास्टर मटरूराम उसी बिस्तर पर निढाल हो कर नंगे ही सो गए. जूली भी वहीं पड़ी रही. सुबह के 5 बजे उस ने अपने कपड़े पहने, रिसैप्शन से बैग लिया और अंधेरी गलियों में गुम हो गई.

मास्टर मटरूराम ने अपनी कौम को जो धोखा दिया था, उस की कीमत लेने के लिए वे सुबह से ही 10 बजने का इंतजार करते हुए बादाम मिक्स बिसकुट के साथ चाय की चुसकी लेने लगे. तय समय पर उन्होंने अपना हिस्सा लिया और एक नई जूली के शिकार में इस बार गोवा चले गए.

हालांकि, इस पैस्टीसाइड कारखाने के जहरीले कचरे का बहाव मास्टर के जातसमाज के गांव की ओर ही हुआ, जिस पर अब कोई बोलने को तैयार नहीं था. उन लोगों ने जो भरोसा किया था, मास्टर मटरूराम ने उसे तारतार कर दिया था.

Social Story: गुनाहगार कौन?

Social Story: अब बबली को स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था. मांबाप ने सोचा कि वह पढ़ाई से बचना चाहती है, पर बबली अब गुमसुम रहने लगी थी. वह डाक्टर बनना चाहती थी, लेकिन अब स्कूल जाने के नाम पर उसे कंपकंपी आती थी. एक दिन स्कूल से फोन आया कि बबली ने बड़ा कांड कर दिया है. आखिर क्या किया था बबली ने, जो वह पुलिस हिरासत में चली गई?

‘‘बबली, ओ बबली… उठ न बेटा, स्कूल के लिए लेट हो जाएगी. फिर पता है न, तेरे सर भी गुस्सा करेंगे. चल, उठ जल्दी से तैयार हो जा, मैं रसोई में नाश्ता बनाने जा रही हूं.’’

‘‘मम्मी, मुझे सोने दो न. आज मुझे स्कूल नहीं जाना है.’’

‘‘क्या हो गया है तुझे? पहले जब छोटी थी, कितना खुश होती थी स्कूल जाने के नाम पर. जैसेजैसे बड़ी होती जा रही है, मति मारी गई है. रोज का तेरा यही राग है, स्कूल नहीं जाना, स्कूल नहीं जाना. अगर स्कूल नहीं जाएगी तो बिना पढ़े ही डाक्टर बन जाएगी क्या? या नहीं बनना डाक्टर?’’

फिर बबली को चिढ़ाते हुए मम्मी ने आगे कहा, ‘‘चल, ठीक है. तुझे तो डाक्टर बनना नहीं, छुटकी बन जाएगी डाक्टर. तू सो जा आराम से,’’ कहते हुए वे वहां से जाने लगीं.

बबली उठ कर मां का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘‘किस ने कहा मुझे डाक्टर नहीं बनना… और छुटकी जब वकील बनना चाहती है, तो क्यों उसे आप जबरदस्ती डाक्टर बनाएंगी? डाक्टर तो मैं ही बनूंगी. लेकिन मम्मी, यह स्कूल अच्छा नहीं है, मुझे किसी और स्कूल में भेज दो.’’

‘‘बेटा, शहर का सब से अच्छा और सब से सस्ता स्कूल है. और तू कह रही है कि यह स्कूल अच्छा नहीं है. जानती भी है कि इस स्कूल में एडमिशन के लिए लोग तरसते हैं, क्योंकि बेशक इस स्कूल की फीस सब से कम है, ताकि हर मिडिल क्लास अपने बच्चों को अच्छी तालीम दिला सके, लेकिन पूरे शहर में इस के मुकाबले का स्कूल नहीं है.

‘‘तुम दोनों बहनों का यहां एडमिशन हो गया, यह हमारी खुशकिस्मती है. चल, अब जल्दी से उठ कर तैयार हो जा. मैं नाश्ता बना रही हूं. छुटकी तो तैयार भी हो चुकी है.’’

‘‘लेकिन, मम्मी…’’

‘‘बस, अब कोई बहस नहीं,’’ कहते हुए मां रसोई की ओर चल दीं.

बबली बेमन से उठ कर बाथरूम में घुस गई. तैयार हो कर वह बाहर निकली, तो इतने में पापा आ गए.

पापा रोज सुबहसुबह सब्जी मंडी जाया करते थे. वहां से बच्चों की पसंद की ताजा सब्जी और फल छांट कर ले आते और जब भी फल खिलाते खुद अपने हाथों से काट कर उन के मुंह में डालते थे. बच्चे भी जब तक पापा न खिलाएं, फल को हाथ तक नहीं लगाते थे.

दोनों बहनें पापा की लाड़ली जो ठहरीं, लेकिन पढ़ाई में दोनों एक से बढ़ कर एक होशियार. बड़ी वाली बबली बचपन से ही कहती थी, ‘‘पापा, मैं डाक्टर बनूंगी और छुटकी कहती है कि मैं तो काले कोट वाली वकील बनूंगी.’

पापा ने भी बच्चों की इच्छा पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शहर के सब से बड़े और नामी स्कूल में दोनों का एडमिशन कराया. बड़ी बेटी बबली अब 5वीं क्लास में है, जबकि छोटी बेटी छुटकी तीसरी क्लास में.

दोनों लड़कियों को मातापिता ने बताया था कि सब से पहले जा कर स्कूल के साथ बने मंदिर में माथा टेकना है और उस के बाद स्कूल में जाना है.

उस स्कूल के साथ लगते ही महादेव का बहुत ही प्राचीन मंदिर था. जब स्कूल बना तो मैनेजमैंट कमेटी द्वारा स्कूल के साथ ही एक महादेव का मंदिर भी बनवाया गया, ताकि बच्चों में भक्ति भावना का संचार हो.

बबली और छुटकी भी रोज मंदिर जाती थीं, लेकिन जैसेजैसे बबली बड़ी होती गई, वह स्कूल जाने से जी चुराने लगी, कभी पेटदर्द का बहाना, तो कभी सिरदर्द. उदास होने के साथसाथ वह चिड़चिड़ी भी होती जा रही थी. कुछ पूछो तो ‘कुछ नहीं’ कह कर बात को टाल देती थी.

लेकिन 10वीं क्लास तक आतेआते बबली की देह भी पलटने लगी. वैसे तो वह पहले से भी कमजोर और मुरझाई सी नजर आती, लेकिन इस के बावजूद उस का सीना उम्र और कदकाठी के मुताबिक कुछ ज्यादा ही भारी हो गया था.

मां इस बदलाव से हैरानपरेशान थीं. वे बबली से बातोंबातों में पूछती भी थीं, ‘‘मां अपनी बेटी की सब से करीबी सखी होती है. मां से कभी भी कोई परेशानी नहीं छिपानी चाहिए. कोई भी परेशानी हो, तो मुझ से बेझिझक कहना,’’ लेकिन बबली कभी कोई बात न करती थी, बस गुमसुम सी अपनी पढ़ाई में मस्त रहती.

लेकिन आज अचानक स्कूल से फोन आया, ‘‘जल्दी से स्कूल आइए, आप की बेटी बबली ने मंदिर के पुजारी का खून कर दिया है…’’

यह सुनते ही मातापिता के पैरों तले से जमीन निकल गई. वे दौड़ेदौड़े गए तो देखा कि मंदिर के अंदर की तरफ बने एक कमरे में खून से लथपथ पुजारी की लाश पड़ी थी. भांग घोंटने वाला भारी सा मूसल बबली के हाथ में था.

मंदिर में उस जगह प्रिंसिपल साहब, दूसरे टीचर और बहुत से छात्र जमा थे. लोग तरहतरह की अटकलें लगा रहे थे कि आखिर बबली ने पुजारी का खून क्यों किया?

इतने में सायरन बजाती हुई पुलिस की वैन आ गई, जिस में 2 लेडी कौंस्टेबल भी थीं.

एक पुलिस अफसर ने सभी को मंदिर खाली करने को कहा, तो सब वहां से बाहर आ गए. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज कर कुछ जरूरी पूछताछ कर मंदिर को सील कर दिया गया और बबली को पुलिस वैन में बैठा कर ले गई.

बबली के पापा उसी समय अपने एक दोस्त के पास गए. उस से बातचीत कर के फौरन वकील को ले कर पुलिस स्टेशन गए, लेकिन कत्ल का केस था, तो ऐसे कैसे जमानत होती.

उस दिन शनिवार और अगले दिन इतवार था. 2 दिन तक कुछ नहीं हो सकता. सोमवार कोर्ट खुलने पर ही कोई कार्यवाही होगी. जवान होती लड़की पुलिस स्टेशन में अकेली, न जाने क्या हो, क्या न हो? मातापिता का कलेजा फटा जा रहा था. 2 रातें वहीं पुलिस स्टेशन के बाहर बैठ कर काटी उन लोगों ने.

आखिर सोमवार को कोर्ट खुला और केस चला. एक हफ्ते तक बचाव पक्ष का वकील अपनी दलीलें देता और अगले दिन की तारीख ले लेता, ताकि कोई तो सुराग मिले लड़की को बचाने का.

लेकिन इधर बबली मुंह खोलने को तैयार नहीं थी. जब भी पूछो कि यह क्यों और कैसे हुआ, तो एक ही बात कहती, ‘‘मैं ने मारा है पुजारी को और मुझे इस बात का कोई दुख नहीं. आप को जो भी सजा देनी है दे दो.’’

15 दिन के बाद जब बचाव पक्ष बचाव का कोई ठोस कारण न बता सका, तो जज ने फैसले की तारीख मुकर्रर कर दी.

आज सुनवाई का आखिरी दिन था. बचाव पक्ष का वकील अपनी कोशिशों से हार चुका था, ‘‘देखिए भाई साहब, मैं ने पूरी कोशिश की कि आप की बेटी को सजा न हो, लेकिन आप की बेटी ही जब साथ नहीं दे रही, तब मैं भी क्या कर सकता हूं. जब वह खुद ही कह रही है कि उस ने मारा है पुजारी को, तो मैं कैसे साबित करूं कि उस ने नहीं मारा.’’

वकील साहब की बात सुन कर बबली के मातापिता दोनों की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. उन्हें कुछ समझे नहीं आ रहा था कि बबली आखिर कुछ बोल क्यों नहीं रही है?

कोर्ट शुरू हुआ, केस की सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को बुलाया गया. सामने जज साहब अपनी कुरसी पर बैठे थे. कोर्ट परिसर खचाखच भरा हुआ था, क्योंकि आज स्कूल के सभी टीचर और छात्र भी कोर्ट में आए हुए थे.

जज साहब ने बोलना शुरू किया, ‘‘पुजारी मर्डर केस का फैसला सुनाने से पहले अगर किसी पक्ष को कुछ कहना हो तो कह सकते हैं, वरना इस केस का फैसला अभी सुना दिया जाएगा.’’

इतना सुनते ही जैसे सरकारी वकील अपनी जगह पर खड़े हुए कि अचानक बबली की मम्मी के दिमाग में न जाने क्या सूझा कि वे छुटकी को ले कर बबली के सामने आ गईं और रोते हुए दोनों हाथ बांध कर बोलीं, ‘‘बबली… बेटा, तू सच क्यों नहीं बताती कि क्या हुआ था उस वक्त? पुजारी को किस ने, क्यों और कैसे मारा? तू उस वक्त वहां क्या करने गई थी?

‘‘देख, तेरे चुप रहने से तेरी छुटकी की जिंदगी पर भी असर पड़ेगा. लोग न जाने इस पर कैसेकैसे लांछन लगाएंगे. इस की कहीं शादी नहीं होगी. इस की जिंदगी बरबाद हो जाएगी…’’

इस तरह से मां के मुंह से बातें सुन कर और उन्हें रोताबिलखता देख कर बबली फूट पड़ी, ‘‘मैं अपनी छुटकी की जिंदगी हरगिज बरबाद नहीं होने दूंगी. मैं उसे किसी को आंख उठा कर भी नहीं देखने दूंगी. जो भी उस की तरफ बुरी नजर से देखेगा, आंखें निकाल लूंगी मैं उस की. कोई उसे छूना भी चाहेगा तो खत्म कर दूंगी उसे, जैसे मैं ने पुजारी को मारा है.

‘‘हां, मैं ने मारा है पुजारी को, क्योंकि वह मेरी तरह मेरी छुटकी को भी बरबाद करना चाहता था. भला, मैं अपनी छुटकी को कैसे भेज देती बरबादी के रास्ते पर…’’

बबली बोले जा रही थी कि बीच में सरकारी वकील बोल उठे, ‘‘जज साहब, जब सब सुबूत सामने आ चुके हैं, फैसला होने ही वाला है, तो अब इन बातों का क्या मतलब है? आप अपना फैसला सुनाइए.’’

लेकिन इधर बबली के बोलते ही ?ाट से बचाव पक्ष के वकील खड़े हो गए, ‘‘जज साहब, शायद मेरी क्लाइंट पुजारी के बारे में कुछ कहना चाहती है. मेरी आप से दरख्वास्त है कि फैसला सुनाने से पहले मेरी मुवक्किल को अपनी सफाई देने का एक मौका और दिया जाए, ऐसा न हो कि कानून के हाथों एक मासूम बेगुनाह को सजा हो जाए,’’ बचाव पक्ष के वकील ने जज से अपील की.

जज साहब ने बचाव पक्ष के वकील की रिक्वैस्ट पर गौर करते हुए बबली से कहा, ‘‘बेटा, अगर तुम अपने बचाव में कुछ कहना चाहती हो तो तुम्हें मौका दिया जाता है. अदालत कभी नहीं चाहेगी कि किसी बेगुनाह को सजा हो.’’

वकील ने कहा, ‘‘बबली बेटा, तुम ने कहा कि पुजारी छुटकी की जिंदगी बरबाद करना चाहते थे. भला पुजारी ऐसा क्यों करेंगे, जबकि वे तो इतने अच्छे इनसान थे? वे तो कितनी ही लड़कियों को आगे बढ़ाने के लिए पैसा खर्च दिया करते थे और कितनी ही गरीब लड़कियों के घर बसाए थे उन्होंने, तो भला वे किसी की जिंदगी कैसे बरबाद कर सकते थे?

‘‘लगता है कि तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है… जज साहब, मैं ऐसे देवता जैसे इनसान के खिलाफ इतनी घटिया बातें नहीं सुन सकता, इसलिए मैं कोर्ट से बाहर जाने की इजाजत चाहता हूं. न जाने यह लड़की उस महापुरुष के बारे में और क्याक्या कहेगी?’’

ऐसा कहते हुए वकील साहब कोर्ट से बाहर की ओर जाने लगे, तो बबली के पापा ने उन की तरफ हैरानी से देखा कि ये तो बचाव पक्ष के वकील हैं और ये उलटा बबली को ही गलत कहने लगे.

तब वकील साहब ने बबली के पापा को चुपचाप बैठे रहने का इशारा किया और खुद बाहर की तरफ चले गए.

इतने में उन्हें पीछे से आवाज आई, ‘‘रुकिए, वकील साहब…’’

वकील साहब ने पलभर रुक कर पीछे मुड़ कर देखा. बबली का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था, होंठ गुस्से में कांप रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी किसी का खून कर देगी.

वकील साहब के रुकने पर बबली ने बोलना शुरू किया, ‘‘वकील साहब, आप भी उस देवता की काली करतूतें तो सुनते जाइए. क्या आप जानते हैं कि आप का वह देवता छोटीछोटी मासूम बच्चियों के साथ क्या करता था?

‘‘नहीं न… चलिए, मैं आप को बताती हूं, क्योंकि जो वह बाकी बच्चियों के साथ करता था, वही वो मेरे साथ भी करता था…’’

थोड़ी देर रुक कर बबली फिर बोली, ‘‘जब मैं छोटी थी, तो मंदिर में महादेव के दर्शन करने जाती तो देखती थी कि कभीकभी पुजारी किसी न किसी लड़की को अपने साथ चिपकाए हुए उस की पीठ पर हाथ फेर रहा होता था और उस से बातें कर रहा होता था. मुझे नहीं मालूम था कि वह ऐसा क्यों करता था और उन लड़कियों से क्याक्या बात करता था.

‘‘महादेव के मंदिर के अलावा दूसरी तरफ एक और मंदिर था. पुजारी अकसर वहीं बैठता था और उस मंदिर के अंदर जा कर एक और कमरा था, जहां अकसर अंधेरा रहता था. पुजारी कभीकभी बड़ी लड़कियों को कहता कि आज इस कमरे में मेरे गुरुजी के दर्शन करने जरूर आना. अगर कोई छोटी बच्ची गुरुजी के दर्शन करने को कहती, तो पुजारी मना कर देता था.

‘‘जब मैं तीसरी क्लास में थी, तब पुजारी मुझे भी कहता था कि आजा तुझे अंदर से अच्छा वाला प्रसाद दूंगा और मैं बर्फी के लालच में दूसरे मंदिर के अंदर चली जाती थी.

‘‘वहां पुजारी मुझे बर्फी का एक टुकड़ा देता और मुझे अपने साथ कस कर चिपका लेता था. लेकिन जब वह मुझे अपने साथ चिपकाता तो मुझे कुछ सख्त सा चुभता. मैं तब कुछ नहीं समझती थी.

‘‘लेकिन, जैसेजैसे मैं बड़ी होती गई, समझ गई और जब मैं प्रसाद लेने के लिए मना करती तो भी वह मुझे जबरदस्ती अंदर ले जाता और कहता कि जो इस तरफ एक बार आ जाता है, वह फिर छोड़ नहीं सकता, वरना पाप चढ़ता है… और यह बात किसी को बताना नहीं, वरना पिता की मौत हो जाती है.

‘‘मैं डर की वजह से किसी से कुछ न कहती और उस तरफ मुझे जाना पड़ता, जिस से पुजारी रोज कभी मुझे गलत जगह छेड़ता, कभी मेरे सीने को जोर से दबाता, लेकिन 2 साल पहले की बात है कि एक दिन उस ने मुझ से कहा कि मैं स्कूल की छुट्टी के बाद उस के पास किसी को बिना बताए आ जाऊं.

‘‘जब मैं ने मना किया तो बोला तुम्हारी मरजी, पर अगर तुम्हारे पापा मर गए तो मुझे कुछ मत कहना. मैं तो बता दूंगा कि इस ने मेरी बात नहीं मानी.

‘‘और उस दिन उस ने मेरे साथ गलत काम किया और फिर जब भी मौका मिलता, मुझे पापा की मौत का डर दिखा कर गलत काम करता रहता,’’ कहतेकहते बबली फूटफूट कर रो पड़ी.

थोड़ी देर चुप रहने के बाद बबली दोबारा बोली, ‘‘एक दिन पुजारी मुझ से बोला कि मैं तुझ से बोर हो गया हूं, अब तू पुरानी हो गई है. अब कोई नई चीज चखने का मन कर रहा है. तू ऐसा कर आज अपनी बहन छुटकी को ले आ.’’

‘‘मैं ने मना किया, तो वह मुझे मेरी नंगी तसवीरें दिखाने लगा,’’ कहतेकहते बबली रोने लगी. थोड़ी देर बाद अपने आंसू पोंछते हुए बबली ने फिर से बोलना शुरू किया, ‘‘पुजारी ने कहा कि अगर तू छुटकी को ले कर नहीं आएगी, तो पूरे शहर में तुम्हारी ये तसवीरें लग जाएंगी. उस के बाद क्या होगा वह तू खुद ही सोच ले…’’

‘‘वकील साहब, क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उस वक्त मुझ पर क्या बीती होगी उस समय वे तसवीरें देख कर… मैं तो सन्न रह गई. मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. मैं परेशान हो गई कि क्या करूं और क्या न करूं.’’

‘‘पुजारी फिर से बोला कि क्या सोच रही हो, जल्दी से छुटकी को ले आ, वरना छुट्टी का समय खत्म हो जाएगा.

‘‘मैं सोचने लगी कि अगर छुटकी को लाती हूं तो उस की जिंदगी बरबाद और अगर नहीं लाती तो पूरे घर वालों की इज्जत और जिंदगी दांव पर है. फिर अचानक मेरी नजर भांग घोंटने वाले मूसल पर पड़ी.

‘‘मैं ने अपना दुपट्टा उठाया और गले में डालने के लिए इतनी जोर से लहराया कि एक पल्ला पुजारी के मुंह पर आ गया, जिस से एक पल के लिए उस की आंखें ढक गईं.

‘‘मैं ने झट से मूसल उठाया और आव देखा न ताव धड़ाधड़ पुजारी के सिर पर वार करना शुरू कर दिया. उसे संभलने का मौका भी न दिया और कुछ ही पल में पुजारी का शरीर शांत हो गया.

‘‘जैसे ही मैं ने देखा कि मेरे हाथ लहू से भर गए और पुजारी बेहोश जमीन पर पड़ा है, मैं ने दरवाजा खोला, तो देखा कि 3-4 लोग मंदिर में दर्शन करने आए हुए थे, क्योंकि कभीकभी बाहर के लोग भी मंदिर में दर्शन करने आ जाते थे.

‘‘मुझे ऐसे देख कर उन्होंने शोर मचा दिया. उस के बाद का तो आप को पता ही है. हां, मैं ने खून किया है पुजारी का, मैं गुनाहगार हूं, लेकिन मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है. आप को जो सजा देनी है, दीजिए.’’

जज साहब खामोश बैठे बबली की आपबीती सुन रहे थे. बबली के मुंह से ये सब बातें सुन कर स्कूल की दूसरी लड़कियों में भी हिम्मत आई और वे सब रोते हुए बोलीं, ‘जज साहब, बबली सही कह रही है. वह पुजारी हमारे साथ भी यही करता था और हमारी नंगी तसवीरें दिखा कर हमें मुंह बंद रखने की धमकी देता था.

‘जज साहब, बबली गुनाहगार नहीं है, गुनाहगार तो हम हैं, जिन्होंने उसे आज तक जिंदा छोड़ कर इतनी लड़कियों की जिंदगी बरबाद करने का मौका दिया.’

जज साहब हैरानपरेशान से उन सब लड़कियों की बातें सुन रहे थे और उन के चेहरों की तरफ देखे जा रहे थे.

अचानक मेज पर एक जोरदार थाप के साथ जज साहब बोले, ‘‘और्डर, और्डर… सभी अपनी जगह पर बैठ जाएं. सब को अपनी बात कहने का मौका दिया जाएगा.’’

बचाव पक्ष के वकील ने कहा, ‘‘जज साहब, माफ कीजिए, मुझे कोर्ट से बाहर जाने का नाटक करना पड़ा. मुझे केवल शक ही नहीं, बल्कि यकीन था कि कहीं न कहीं कोई ऐसी बात है, जो बबली बता नहीं पा रही और बबली ने जो किया वह गलत भी नहीं किया, क्योंकि मैं बबली का पूरा रिकौर्ड छान चुका था.

‘‘ऐसी मासूम लड़की हत्या कैसे कर सकती है? जज साहब, सुबूत जो कुछ भी कह रहे थे, मेरा दिल उन्हें गवारा नहीं कर रहा था, इसलिए मुझे नाटक खेलना पड़ा.

‘‘अगर मैं यह नाटक न करता, तो बबली की जबान कभी उस का साथ न देती और कभी भी सचाई सामने
न आती.’’

इधर सारी लड़कियां भी बारबार यही कहने लगीं, ‘जज साहब, सजा हमें दीजिए, गुनाहगार तो हम हैं.’

जज साहब बोले, ‘‘सब शांति से बैठ जाएं…’’ सब के बैठने के बाद फिर जज साहब बोले, ‘‘माना कि बबली ने खून किया है, लेकिन बबली ने समाज के एक सड़े हुए अंग को काटा है.

‘‘और बच्चियो, न गुनाहगार आप हो और न ही बबली. गुनाहगार तो वह पुजारी था, गुनाहगार उस जैसे लोग होते हैं, बबली जैसे नहीं. आप सहम गई थीं, डर गई थीं, इसलिए वह शैतान अपनी मनमानी करता रहा. पहलेपहल बबली भी आप सब की तरह डर गई थी, लेकिन इस ने बाद में हिम्मत से काम लिया और आगे किसी और लड़की या बहन की जिंदगी को बरबाद होने से बचा लिया.

‘‘लिहाजा, अदालत बबली को कोई सजा नहीं देगी, बल्कि सभी बच्चियों, लड़कियों और औरतों से यही कहेगी कि ऐसे शैतानों का धरती पर जिंदा रहना ही गुनाह है.’’

सभी ने तालियां बजाते हुए बबली का कोर्ट से बाहर आ कर स्वागत किया और बबली अपनी छोटी बहन छुटकी और मां के गले लग गई.

Family Story: खुशी के रास्ते

Family Story: श्वेता एक दबंग चौधरी परिवार की बेटी थी और उस की शादी भी अच्छे खातेपीते घर में हुई थी. वह नौकरी नहीं करना चाहती थी, पर सास ने उसे नौकरी करने पर जोर दिया. वह कालेज में लैक्चरर हो गई. एक दिन गाड़ी खराब होने की वजह से श्वेता के पति का दोस्त युवराज उसे कालेज छोड़ने गया. फिर यह सिलसिला चल निकला. आगे क्या हुआ?

श्वेता चौधरी बचपन से ही ऐसे घर में पलीबढ़ी थी, जिस की चौधराहट की धमक पूरे इलाके में थी. उस के दादा चौधरी जबर सिंह की धाक भी उस समय पूरे इलाके में थी. वे खुद तो जिला पंचायत के सदस्य थे ही, अपने बेटे यानी श्वेता के पिता चौधरी समर सिंह को भी गांव का प्रधान बनवा रखा था. जिले के डीएम और एसपी के साथ उन की अच्छी उठबैठ थी, इसलिए सरकारी महकमे में भी उन की अच्छी पकड़ थी. वहां उन का काम बेरोकटोक होता था.

श्वेता को भी कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं रही थी. उसे जो चीज पसंद आ जाती, उसे ले कर छोड़ती थी. वह बचपन से ही जिद्दी और मनमानी हो गई थी, बिलकुल अपने पापा और दादा की तरह दबंग.

जब श्वेता शादी के लायक हुई, तो उस ने अपने दादा जबर सिंह को चेताया, ‘‘दादाजी, मेरी शादी शहर में करना, मैं गांव में नहीं रहूंगी.’’

‘‘अरी मेरी लाडो, तू चिंता क्यों करती है? हम तेरे लिए गांव में लड़का ढूंढ़ेंगे ही नहीं. शहर के चौधरियों से मेरी खूब जानपहचान है, देखना, जल्दी ही तेरे लिए कोई अच्छा सा लड़का मिल जाएगा. लेकिन, एक परेशानी है…’’

‘‘वह क्या दादाजी?’’

‘‘बस, वह लड़का हमारी लाडो को पसंद आ जाए.’’

‘‘अरे दादाजी, आप भी मजाक करने से बाज नहीं आते,’’ इतना कह कर श्वेता दालान से घर के अंदर चली गई.

जबर सिंह मुसकराते हुए फिर से अपना हुक्का गुड़गुड़ाने लगे.

कुछ ही दिनों के बाद श्वेता की शादी दिल्ली के कनाट प्लेस के एक अमीर चौधरी परिवार में कर दी गई.

उस समय श्वेता कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से वनस्पति शास्त्र में पीएचडी कर रही थी और उस की थीसिस पूरी होने वाली थी.

श्वेता का पति हरबंस अपने घर के कारोबार को देखता था. कमला नगर में वह एक पेइंगगैस्ट चलाता था. 4 डंपर किराए पर चलाता था. ऐसे ही उस के और भी काम थे. कुलमिला कर उस की अच्छीखासी आमदनी थी और श्वेता को कोई कमी न थी. अपना हनीमून भी वे फ्रांस में मना कर आए थे.

कुछ दिनों के बाद श्वेता की पीएचडी भी पूरी हो गई. उस ने अपने शौक और रुतबे के लिए यह डिगरी ली थी. नौकरी करने का न उस का कोई मन था और न ही जरूरत. उस के परिवार की सात पुश्तों में से कभी किसी ने नौकरी नहीं की थी. नौकरी करना उस के खून में ही नहीं था.

श्वेता की सासू मां दमयंती पुराने जमाने की पढ़ीलिखी औरत थीं. जब वे इस घर में बहू बन कर आई थीं, तो उन की बड़ी चाह थी कि वे नौकरी करें, लेकिन हरबंस के बुजुर्गों ने उन की यह चाह पूरी नहीं होने दी थी.

उन का कहना था, ‘हमारे घर में कौन सी कमी है, जो हम बहू की कमाई खाएंगे… हम अपनी बहू से नौकरी कराएंगे, तो दुनिया हमारे मुंह पर थूकेगी.’

इसी दकियानूसी सोच के चलते दमयंती से यह मौका छीन लिया गया था, लेकिन अब दुनिया बदल चुकी थी. दमयंती अब घर की मालकिन थीं. वे चाहती थीं कि जो वे नहीं कर पाईं, वह उन की बहू कर के दिखाए.

उन्होंने सब के विरोध के बावजूद श्वेता को नौकरी करने के लिए बढ़ावा दिया, ‘‘श्वेता, समय बदल गया है.

अब हर पढ़ीलिखी औरत अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही है. तू ने तो पीएचडी कर रखी है.

घर में बैठ कर क्या करेगी? चार पैसे कमा कर लाएगी, तो घर में ही नहीं, बल्कि बाहर भी तेरी इज्जत और रुतबा बढ़ेगा.’’

लेकिन श्वेता तो उलटे बांस बरेली को. उस की तो नौकरी करने की जरा भी इच्छा नहीं थी. हरबंस भी नहीं चाहता था कि श्वेता नौकरी करे. लेकिन इस समय घर में श्वेता और हरबंस की नहीं, बल्कि दमयंती की ज्यादा चलती थी.

दमयंती ने श्वेता पर नौकरी करने का दबाव बनाया, तो हरबंस और श्वेता को झुकना पड़ा. वह दिल्ली के ही एक डिगरी कालेज में लैक्चरर हो गई. उस का कालेज घर से महज 10 किलोमीटर दूर था.

लेकिन एक दिन ऐनवक्त पर श्वेता की कार खराब हो गई. हरबंस और ड्राइवर ने कार की खराबी ठीक करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे. घर में दूसरी कार भी थी, लेकिन उसी समय हरबंस को भी कहीं जाना था.

अभी श्वेता कैब बुक करा कर कालेज जाने की सोच ही रही थी कि तभी हरबंस का दोस्त युवराज अपनी कार से वहां आ पहुंचा. वह अपने औफिस जा रहा था.

हरबंस को घर के बाहर परेशान हालत में खड़ा देख वह बोला, ‘‘यार हरबंस, क्या परेशानी है? हमारे रहते तू परेशान… यह कैसे हो सकता है यार…’’

‘‘नहीं, युवराज. ऐसी कोई बड़ी परेशानी नहीं है. कार खराब हो गई है. तेरी भाभी को कालेज जाना था और मुझे भी अभी निकलना है.’’

‘‘यार हरबंस, तू ने भी क्या बात कह दी… अरे यार, हम किसलिए हैं. तुझे न खटके तो श्वेता भाभी को मैं कालेज के गेट पर छोड़ दूंगा. मेरी कंपनी का औफिस भी उधर ही है.’’

‘‘अरे युवराज, ऐसा कुछ नहीं है. मैं अभी कैब बुक कर देता हूं. तुझे परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है.’’

तभी गेट पर खड़ी दमयंती बोली, ‘‘हरबंस, इस में गलत ही क्या है. युवराज शाम को श्वेता को उधर से लेता भी आएगा. ड्राइवर को तू ले जाना. दोस्तों पर इतना तो भरोसा करना ही पड़ता है.’’

‘‘मां, तुम नहीं जानतीं…’’ हरबंस कहना चाहता था कि ये दोस्त एक नंबर के बदमाश होते हैं. लेकिन युवराज के सामने वह यह बात गटक गया.

‘‘अरे, मैं सब जानती हूं. दुनिया देखी है मैं ने. बहू, जल्दी से आ. युवराज उधर ही जा रहा है. तुझे यह कालेज तक छोड़ देगा और वापस भी ले आएगा,’’ दमयंती ने भी बड़े विश्वास से और्डर सा देते हुए कहा.

हरबंस कुछ कहना चाहता था, लेकिन उस के होंठ फड़फड़ा कर रह गए. श्वेता तो गैरमर्द के साथ कार में बैठ कर बिलकुल भी नहीं जाना चाहती थी. लेकिन, सासू मां का आदेश और हरबंस की लाचारी देख वह युवराज की कार में पिछली सीट पर बैठ गई.

अब ऐसा अकसर होने लगा कि श्वेता युवराज की कार में बैठ कर जाने लगी. युवराज मजाकिया और मिलनसार स्वभाव का था. वह जल्दी ही श्वेता से हिलमिल गया.

श्वेता का संकोच भी जल्दी ही दूर हो गया. वह अब कार की पिछली सीट पर नहीं, बल्कि ड्राइविंग सीट की बगल वाली सीट पर बैठने लगी.

हरबंस को यह बात पसंद नहीं थी कि श्वेता आएदिन युवराज की कार में बैठ कर कालेज जाए, लेकिन उस की मां दमयंती उसे समझतीं, ‘‘बेटा, कौन से जमाने में जी रहे हो… बहू नौकरी करने घर से बाहर निकलेगी तो गैरमर्दों से बातें करेगी ही. क्या वह अपने कालेज में जवान लड़कों और आदमियों से बात नहीं करती?

उसे तो सब से मिलनाजुलना पड़ता ही है.

‘‘वह युवराज के साथ जा रही है, तो तेरा कार का खर्चा बच ही रहा है. उसे भागना ही होगा तो युवराज क्या किसी और के साथ भी भाग जाएगी.’’

‘‘मां, तुम यह कैसी अनापशनाप बातें कर रही हो?’’

‘‘हरबंस, मैं एक औरत हूं और एक औरत के दिल को अच्छी तरह समझती हूं. भागने वाली औरत को तू सात तालों में भी बंद कर दे, वह तेरे कहने से भी नहीं रुकेगी. न भागने वाली औरत कोठे से भी वापस आ जाती है.’’

हरबंस को अपनी मां की बातें बड़ी अजीब लग रही थीं. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अगर वह अपनी मां की बात न माने तो दकियानूसी और शक्की कहलाए और माने तो श्वेता को युवराज के साथ जाना बरदाश्त करना पड़े. वह चक्की के दो पाटों के बीच पिस रहा था.

अब तो युवराज श्वेता को ले जाने के लिए रोज उस के घर के सामने कार रोक देता और श्वेता भी पहले से ही सजधज कर उस की कार में जा बैठती. शर्म की दीवारें धीरेधीरे गिर चुकी थीं. आग और घी कब तक दूर रहते. युवराज और श्वेता इतने पास आ चुके थे कि अब उन का दूर रहना मुश्किल हो गया.

एक दिन श्वेता युवराज के साथ ही चली गई. वह घर वापस नहीं आई. हरबंस ने उसे फोन किया, तो उस की बातें सुन कर हरबंस के होश उड़ गए.

श्वेता ने बिना लागलपेट के कहा, ‘हरबंस, मेरा इंतजार मत करना. युवराज और मैं ने एक मंदिर में शादी कर ली है. अब मैं उस की हो गई हूं,’ कह कर श्वेता ने फोन काट दिया.

हरबंस के पैरों तले से जमीन निकल चुकी थी. उस ने श्वेता के नाम एक फ्लैट कर दिया था. इनकम टैक्स से बचने के लिए लाखों रुपए श्वेता के खाते में ट्रांसफर कर दिए थे. लाखों के गहने श्वेता के पास थे.

उस दिन हरबंस ने अपनी मां को खूब खरीखोटी सुनाई, ‘‘मां, यह श्वेता से तुम्हारा नौकरी कराने का लालच ही था, जो आज हमें ले डूबा. तुम्हें ही पड़ी थी उस से नौकरी करवाने की.

‘‘मैं ने तो क्या, श्वेता ने भी नौकरी करने से मना किया था, लेकिन तुम पर तो मौडर्न बनने का भूत सवार था और फिर कार का खर्च बचाने के चक्कर में उसे युवराज के साथ भेजने लगीं. अब चखो बदनामी का मजा.’’

‘‘हरबंस, यह समझ ले कि जो हुआ, सही हुआ. तू एक औरत को नहीं समझता. अच्छा हुआ वह बहुत जल्दी और आसानी से चली गई, नहीं तो ऐसी औरतें अपने इश्क और आशिक के चक्कर में अपने पति की जान तक ले लेती हैं.’’

‘‘हां मां, आप सही कह रही हो. आजकल की घटनाओं को सुन कर तो रूह कांप जाती है. कहीं आदमी औरत के टुकड़े कर के फ्रिज में दफन कर रहा है, तो कहीं औरत आदमी के टुकड़े कर रही है. समझ में नहीं आता कि समाज को क्या होता जा रहा है…’’

‘‘बेटा, यह कोई नई बात नहीं है. यह तो हमेशा से होता आया है. बस, फर्क इतना है कि सोशल मीडिया के जमाने में ये बातें एकदम फैल जाती हैं.’’

हरबंस कारोबारी था. उस का दिमाग पैसे की ओर दौड़ता था. किसी तरह का घाटा उसे सहन न था. उसे श्वेता के जाने की इतनी चिंता नहीं थी, जितनी अपने पैसे, गहने और फ्लैट की चिंता थी. इन सब को पाने के लिए हरबंस ने बिरादरी के खास लोगों की पंचायत बुला ली.

पंचायत में श्वेता, युवराज और उन की तरफ के लोगों को भी बुलाया गया. सब को लगता था कि पंचायत हंगामेदार होगी और लंबी खिंचेगी. मजा और चटकारे लेने वाले तो यही चाह रहे थे, लेकिन श्वेता ने पंचायत ज्यादा देर तक न चलने दी.

श्वेता ने यह कह कर पंचायत खत्म करवा दी, ‘‘अब मैं युवराज की हूं और उस की ही रहूंगी. जोकुछ भी हरबंस ने मेरे नाम किया है, फ्लैट, 30 लाख रुपए, गहने, जेवरात, मैं उन सब को हरबंस को लौटाने को तैयार हूं. मुझे दौलत नहीं युवराज चाहिए.’’

कुछ पंचों ने विवाद बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन युवराज इतने से संतुष्ट था. हरबंस ने कहा, ‘‘मैं भी यही चाहता हूं कि श्वेता अब युवराज के पास ही रहे और मेरे पैसे वगैरह मुझे वापस कर दे. उस ने इस के लिए हामी भर दी है, तो मुझे पंचायत को आगे नहीं बढ़ाना है.’’

इस के बाद एक समझौतापत्र पर दस्तखत हो गए, तो पंचायत वहीं खत्म हो गई. कोर्टकचहरी के चक्कर काटने से दोनों बच गए. आसानी से फैसला हो जाने पर पंचों को भी कोई तवज्जुह नहीं मिली. वे खिसयाते हुए अपनेअपने घरों को चले गए.

लेकिन श्वेता के दादा और पिता जबर सिंह और समर सिंह ने युवराज को धौंसडपट देने की कोशिश की. श्वेता ने उन की शिकायत पुलिस से कर दी. पुलिस ने उन्हें अपनी भाषा में कानून का पाठ पढ़ा दिया.

युवराज और श्वेता अब भी हरबंस के घर के सामने से ही अपनी कार में बैठ कर निकलते हैं.

लेकिन कमाल की बात यह थी कि हरबंस अपनी दौलत वापस पा कर खुश था. उस के चेहरे पर रत्तीभर भी शिकन नहीं थी. श्वेता नाम का चैप्टर उस ने अपनी जिंदगी से ही निकाल दिया था. जल्दी ही हरबंस बड़े धूमधाम के साथ दूसरी बीवी ले आया.

ऐसे मामलों में बीवी के छोड़ जाने पर अकसर जहां पति डिप्रैशन में चला जाता है, लेकिन इस मामले में हरबंस के चेहरे की खुशी किसी की समझ में नहीं आ रही थी. वह दूसरी बीवी के साथ खुश था.

इस बात से श्वेता को भी मिर्ची लगी हुई थी. उसे यह उम्मीद नहीं थी कि हरबंस इतनी जल्दी दूसरी शादी कर लेगा. वह तो एक औरत की तरह सोचती थी कि हर मर्द की तरह हरबंस भी उस की याद में तड़पेगा, परेशान होगा, मजनूं की तरह पागल हो जाएगा.

लेकिन हरबंस ने जता दिया था कि यह नए जमाने का दस्तूर है, जिस में एक औरत के धोखा देने का मतलब गम में डूब जाना नहीं, बल्कि खुशी के रास्ते तलाशना है.

Hindi Story: आतंक

Hindi Story, लेखक – पुष्पेश कुमार ‘पुष्प’

दिवाकर आज सुबहसवेरे ही रामकिशन को खोजने आया था. घर पर दिवाकर को आया देख रामकिशन की पत्नी साधना के होशोहवास उड़ गए. आते ही दिवाकर ने पूछा, ‘‘रामकिशन कहां है?’’

साधना घबराई हुई आवाज में बोली, ‘‘वे घर पर नहीं हैं.’’

साधना का जवाब सुन कर दिवाकर ने उसे अजीब सी निगाहों से घूरा और तेज कदमों से बाहर निकल गया.

साधना दिवाकर को आया देख कर एक अनजाने डर से थरथर कांप रही थी. उस की सम झ में नहीं आ रहा था कि 15 साल बाद दिवाकर उस के घर पर क्यों आया है और आखिर उस का इरादा क्या है?

साधना के मन में तरहतरह के खयाल आने लगे, क्योंकि दिवाकर के भाई मनोज की हत्या उस के पति रामकिशन ने की थी. हत्या की वजह थी रामकिशन की फसल को मनोज द्वारा चोरीछिपे काटना.

साधना सोचने लगी कि क्या दिवाकर अपने भाई मनोज की हत्या का बदला लेने आया था? आखिर इतने सालों के बाद उस का पति जेल से बाहर आया है. उस का तो सबकुछ खत्म हो गया है. जीने की तमन्ना न होने के बावजूद वह जीना चाहता है. जिंदा लाश बना वह जिंदगी की नई किरण की तलाश में भटक रहा है.

इस सब के बीच दिवाकर का आना साधना को अच्छा नहीं लगा.

साधना अपनेआप को ताकत देते हुए सोचने लगी कि आज 15 साल बाद उस का पति घर का बना स्वादिष्ठ खाना खाएगा. मटरपनीर की सब्जी और पूरियां उसे बहुत पसंद हैं, लेकिन दिवाकर का खयाल आते ही साधना का सारा जोश पलभर में ही छूमंतर हो गया.

तभी घर के भीतर से साधना की बूढ़ी सास ने पूछा, ‘‘कौन आया था साधना?’’

‘‘कोई नहीं मांजी… दिवाकर आया था,’’ साधना बोली.

दिवाकर तो चला गया था, लेकिन अपने पीछे डर का एक भयंकर नाग छोड़ गया था. साधना को वह नाग बारबार डरा रहा था.

साधना को घुटन सी महसूस हुई, तो उस ने घर के सारे दरवाजे और खिड़कियां खोल दीं, मानो इस उमस भरी गरमी से कुछ राहत मिले.

फिर अपने मन को शांत करते हुए साधना सोचने लगी कि रामकिशन के आते ही गरमगरम पूरियां तल देगी. सब्जी तो बना ही ली है.

रात को 10 बजे जब रामकिशन घर आया, तो साधना को लगा कि कमरे में मौजूद उमस अब खत्म हो गई है. वह तेज आवाज में बोली, ‘‘यह भी कोई घर आने का समय है… सारा दिन भूखेप्यासे कहां बैठे थे.’’

जेल जाने के पहले रामकिशन देर रात तक लोगों के साथ गपें लड़ाया करता था, लेकिन कभी साधना ने इस बात के लिए मना नहीं किया. रामकिशन सम झ नहीं पा रहा था कि आज साधना के बरताव में इतना बदलाव कैसे आ गया? लेकिन वह चुप ही रहा.

रामकिशन अब पहले जैसा जवान और फुरतीला नहीं रहा था. वह भीतर ही भीतर खोखला हो चुका था, मानो उस के शरीर में दीमक लग गया हो, जो धीरेधीरे उसे कमजोर करता जा रहा था. बीते पल उसे एक दुखांत नाटक जैसे लग रहे थे.

‘‘अब उठो भी… जाओ और हाथमुंह धो लो. मैं तुम्हारे लिए पूरियां तल रही हूं. मटरपनीर की सब्जी बनाई है,’’ साधना स्नेह में डूब कर बोली.

खाना खाने के बाद रामकिशन बिस्तर पर गिर गया. साधना पैर दबाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे पीछे दिवाकर आया था. आखिर क्या करने आया था वह? मैं तो कुछ सम झ ही नहीं पाई, लेकिन उस का आना मुझे ठीक नहीं लगा. न जाने उस के मन में क्या चल रहा था. वह मु झे घूर रहा था.’’

दिवाकर का नाम सुनते ही रामकिशन की आंखों से नींद कोसों दूर चली गई. वह उठ कर बैठ गया, मानो कमरे में उस का दम घुटने लगा हो. उसे बीती बातें याद आने लगीं, जब पुलिस उसे पकड़ कर ले जा रही थी, तो दिवाकर ने उसे रास्ते में रोक कर कहा था, ‘रामकिशन, कानून चाहे जो भी सजा दे, पर मैं अपने भाई मनोज की हत्या का बदला ले कर ही रहूंगा. मैं तुम्हारे आने का बेसब्री से इंतजार करूंगा.

‘जब तक मैं तुम से अपने भाई का बदला नहीं ले लेता, मेरे मन की आग शांत नहीं होगी,’ दिवाकर की गुस्से से दहकती वे आंखें आज फिर उसे दहला गई थीं.

दिवाकर और रामकिशन के खेत एक ही साथ थे. दिवाकर का भाई मनोज उस की हर फसल को चोरीछिपे काट लेता था. उस ने कई बार मनोज को सम झाने की कोशिश की थी, लेकिन हर बार मनोज इस बात से इनकार कर देता था. वह कहता था, ‘मैं तुम्हारी फसल क्यों काटूंगा? तुम्हारी फसल कौन काट कर ले जाता है, मैं क्या जानूं? चोरी कोई और करे और आरोप मु झ पर लगाते हो.

‘अपनी फसल की देखभाल क्यों नहीं करते? चोरी का आरोप लगा कर मु झे बदनाम मत करो,’ लेकिन मनोज अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा था.

एक दिन गांव के सुरेश ने आ कर कहा था, ‘रामकिशन, तुम यहां हो और वहां मनोज तुम्हारी फसल को काट कर ले जा रहा है.’

यह सुनते ही रामकिशन गुस्से से कांप गया. वह फौरन अपने खेत की ओर भागा. सचमुच, मनोज उस की फसल काट कर ले जा रहा था. उस ने मनोज को ऐसा करने से रोका, लेकिन मनोज जबरदस्ती फसल ले जाने लगा.

रामकिशन ने मनोज को जोर से धक्का दिया. वह दूर जा गिरा. फिर दोनों में उठापटक होने लगी. थोड़ी ही देर में इस मामूली लड़ाई ने अचानक बड़ा रूप ले लिया. मनोज ने अपनी कमर से पिस्तौल निकाल ली.

रामकिशन अपने बचाव में उस से पिस्तौल छीनने लगा. इसी छीना झपटी में पिस्तौल से गोली चल गई और
सीधी मनोज के सीने में जा धंसी.

कुछ देर छटपटाने के बाद मनोज ने वहीं दम तोड़ दिया. यह देख कर रामकिशन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह अपनेआप को संभालते हुए किसी तरह गांव की ओर चल पड़ा.

मनोज की मौत की खबर जंगल की आग की तरह पूरे गांव में फैल गई. जल्दी ही पुलिस आ गई और रामकिशन को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस के सामने रामकिशन ने कहा, ‘मैं ने मनोज की हत्या नहीं की, बल्कि अपनी जान बचाने के लिए मैं उस से पिस्तौल छीनने लगा था. इसी बीच गोली चल गई और उस की मौत हो गई. मनोज चोरीछिपे मेरी फसल काट रहा था…’

यह सब सोचते हुए रामकिशन की आंखों से नींद कोसों दूर चली गई. वह बेचैन हो गया. उसे दिवाकर की कसम याद आ गई थी.

अब रामकिशन ने घर से बाहर निकलना भी बंद कर दिया. वह सारा दिन चोरों की तरह घर में छिपा रहता, लेकिन दिवाकर द्वारा छोड़ा गया डर का काला नाग उसे डरा जाता.

दिवाकर फिर दोबारा रामकिशन को खोजने नहीं आया. रामकिशन सोचता, ‘दिवाकर इतना कठोर नहीं हो सकता. मु झे मारने से क्या उस का भाई वापस आ जाएगा? गलती किसी की और सजा मु झे मिली. इस घटना के चलते मेरा पूरा परिवार ही बिखर गया. क्या उसे बेऔलाद साधना और मेरी बूढ़ी मां पर तरस नहीं आएगा? इन 15 सालों में मैं ने अपना सबकुछ खो दिया है. मेरा तो वंश में कोई दीया जलाने वाला भी नहीं रहा…’ यह सब सोचने के बाद भी रामकिशन के मन में दिवाकर का डर बैठा हुआ था.

सुहानी चांदनी रात में आकाश में टिमटिमाते तारों की बरात को देख कर रामकिशन का मन खुली हवा में सांस लेने को मचल उठा और वह खुली हवा में सांस लेने के लिए घर से बाहर निकल पड़ा.

थोड़ी देर के बाद एक कठोर आवाज ने रामकिशन को बुरी तरह से चौंका दिया, ‘‘रामकिशन…’’

यह आवाज जानीपहचानी सी लग रही थी. रामकिशन ने मुड़ कर देखा, तो सामने दिवाकर पिस्तौल लिए खड़ा था.

यह देख कर रामकिशन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उस के दिल की धड़कन तेज हो गई और वह ‘धड़ाम’ से जमीन पर गिर गया.

‘‘रामकिशन, मैं ने कहा था न कि कानून तुम्हें जितनी सजा दे दे, लेकिन मैं अपने भाई मनोज की हत्या का बदला ले कर ही रहूंगा. आज वह दिन आ गया है. मैं कई दिनों से तुम्हारी खोज में था. जब तक मैं तुम्हें मौत की नींद नहीं सुला दूं, मेरे भाई की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. तेरे मरने के बाद ही मेरे दिल में धधकती बदले की आग को ठंडक मिलेगी,’’ कहते हुए दिवाकर की आंखों में खून उतर आया था.

यह सुनते ही रामकिशन की घिग्घी बंध गई. उसे लगा मानो उस के सामने दिवाकर नहीं, बल्कि मौत खड़ी है.

रामकिशन काफी नरम आवाज में बोला, ‘‘दिवाकर, मैं पिछले 15 सालों तक जेल की कालकोठरी में रहा. इन 15 सालों में मैं ने अपना सबकुछ खो दिया है. अब मेरे लिए इस दुनिया में बचा ही क्या है… मैं तो बस एक जिंदा लाश हूं. मैं ने तुम्हारे भाई की हत्या नहीं की. हत्या तो वह मेरी करना चाहता था, पर गलती से गोली उसे जा लगी. इस में मेरा कोई कुसूर नहीं है..’’

यह सुन कर दिवाकर का हाथ ठिठक गया और सोचने लगा, ‘क्या सचमुच रामकिशन जिंदा है? यह तो जिंदा लाश बन गया है. इस का तो पूरा परिवार ही बिखर गया है. क्या मनोज ने अपनी मौत का बदला नहीं ले लिया है? भला, मैं मरे हुए को क्यों मारूं? यह खुद ही तड़पतड़प कर मर जाएगा…’ दिवाकर को लगा मानो रामकिशन की बेबसी ने उसे पंगु बना दिया है.

दिवाकर ने एक गहरी सांस ले कर चांदनी रात में तारों से पटे आकाश को देखा. उसे लगा कि खुले आकाश की खूबसूरती वह पहली बार देख रहा था.

बेहोश रामकिशन को वहीं गिरा छोड़ कर दिवाकर पिस्तौल अपने हाथ में लिए घर की ओर चल पड़ा, तभी उस ने पीछे मुड़ कर रामकिशन की ओर देखा और बोला, ‘‘रामकिशन, मैं तु झे यों ही डराता रहूंगा और घुटघुट कर जीने को मजबूर कर दूंगा. मैं तेरी जिंदगी को नरक बना दूंगा.’’

उधर रामकिशन को घर आने में देरी होने पर साधना का मन किसी अनहोनी के डर से कांप उठा. साधना रामकिशन की खोज में निकल पड़ी.

बदहवास सी साधना चारों ओर देखती चली जा रही थी कि अचानक चांद की दूधिया रोशनी में उस की निगाह रामकिशन पर पड़ी, जो खेत में गिरा पड़ा था और दिवाकर अपने हाथ में पिस्तौल लिए चला जा रहा था.

यह देख कर साधना की चीख निकल पड़ी, ‘‘दिवाकर… अरे, मार दिया चांडाल ने…’’ वह तेज कदमों से भागती हुई बदहवास पड़े रामकिशन के ऊपर ‘धड़ाम’ से गिर गई.

साधना के गिरते ही रामकिशन ने धीरे से अपनी आंखें खोलीं और साधना को एकटक देखने लगा. अचानक उसे अपनेआप से नफरत होने लगी. वह सोचने लगा, ‘ऐसी बेइज्जती की जिंदगी जीने से अच्छा है कि मैं मर जाऊं…’

रामकिशन को लगा कि क्यों न वह दिवाकर से पिस्तौल छीन कर अपनेआप को गोली मार लेता…
यह सोचते हुए रामकिशन आकाश में टिमटिमाते तारों को देखता हुआ शून्य में खो गया.

Family Story: लक्ष्मण रेखा – मिसेज राजीव कैसे बन गई धैर्य का प्रतिबिंब

Family Story: मेहमानों की भीड़ से घर खचाखच भर गया था. एक तो शहर के प्रसिद्ध डाक्टर, उस पर आखिरी बेटे का ब्याह. दोनों तरफ के मेहमानों की भीड़ लगी हुई थी. इतना बड़ा घर होते हुए भी वह मेहमानों को अपने में समा नहीं पा रहा था. कुछ रिश्ते दूर के होते हुए भी या कुछ लोग बिना रिश्ते के भी बहुत पास के, अपने से लगने लगते हैं और कुछ नजदीकी रिश्ते के लोग भी पराए, बेगाने से लगते हैं, सच ही तो है. रिश्तों में क्या धरा है? महत्त्व तो इस बात का है कि अपने व्यक्तित्व द्वारा कौन किस को कितना आकृष्ट करता है.

तभी तो डाक्टर राजीव के लिए शुभदा उन की कितनी अपनी बन गई थी. क्या लगती है शुभदा उन की? कुछ भी तो नहीं. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी डाक्टर राजीव सहज ही मिलने वालों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. उन की आंखों में न जाने ऐसा कौन सा चुंबकीय आकर्षण है जो देखने वालों की नजरों को बांध सा देता है. अपने समय के लेडीकिलर रहे हैं डाक्टर राजीव. बेहद खुशमिजाज. जो भी युवती उन्हें देखती, वह उन जैसा ही पति पाने की लालसा करने लगती. डाक्टर राजीव दूल्हा बन जब ब्याहने गए थे, तब सभी लोग दुलहन से ईर्ष्या कर उठे थे. क्या मिला है उन्हें ऐसा सजीला गुलाब सा दूल्हा. गुलाब अपने साथ कांटे भी लिए हुए है, यह कुछ सालों बाद पता चला था. अपनी सुगंध बिखेरता गुलाब अनायास कितने ही भौंरों को भी आमंत्रित कर बैठता है. शुभदा भी डाक्टर राजीव के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उन की तरफ खिंची चली आई थी.

बौद्धिक स्तर पर आरंभ हुई उन की मित्रता दिनप्रतिदिन घनिष्ठ होती गई थी और फिर धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के लिए अपरिहार्य बन गए थे. मिसेज राजीव पति के बौद्धिक स्तर पर कहीं भी तो नहीं टिकती थीं. बहुत सीधे, सरल स्वभाव की उषा बौद्धिक स्तर पर पति को न पकड़ पातीं, यों उन का गठा बदन उम्र को झुठलाता गौरवर्ण, उज्ज्वल ललाट पर सिंदूरी गोल बड़ी बिंदी की दीप्ति ने बढ़ती अवस्था की पदचाप को भी अनसुना कर दिया था. गहरी काली आंखें, सीधे पल्ले की साड़ी और गहरे काले केश, वे भारतीयता की प्रतिमूर्ति लगती थीं. बहुत पढ़ीलिखी न होने पर भी आगंतुक सहज ही बातचीत से उन की शिक्षा का परिचय नहीं पा सकता था. समझदार, सुघड़, सलीकेदार और आदर्श गृहिणी. आदर्श पत्नी व आदर्श मां की वे सचमुच साकार मूर्ति थीं. उन से मिलते ही दिल में उन के प्रति अनायास ही आकर्षण, अपनत्व जाग उठता, आश्चर्य होता था यह देख कर कि किस आकर्षण से डाक्टर राजीव शुभदा की तरफ झुके. मांसल, थुलथुला शरीर, उम्र को जबरन पीछे ढकेलता सौंदर्य, रंगेकटे केश, नुची भौंहें, निरंतर सौंदर्य प्रसाधनों का अभ्यस्त चेहरा. असंयम की स्याही से स्याह बना चेहरा सच्चरित्र, संयमी मिसेज राजीव के चेहरे के सम्मुख कहीं भी तो नहीं टिकता था.

एक ही उम्र के माइलस्टोन को थामे खड़ी दोनों महिलाओं के चेहरों में बड़ा अंतर था. कहते हैं सौंदर्य तो देखने वालों की आंखों में होता है. प्रेमिका को अकसर ही गिफ्ट में दिए गए महंगेमहंगे आइटम्स ने भी प्रतिरोध में मिसेज राजीव की जबान नहीं खुलवाई. प्रेमी ने प्रेमिका के भविष्य की पूरी व्यवस्था कर दी थी. प्रेमिका के समर्पण के बदले में प्रेमी ने करोड़ों रुपए की कीमत का एक घर बनवा कर उसे भेंट किया था. शाहजहां की मलिका तो मरने के बाद ही ताजमहल पा सकी थी, पर शुभदा तो उस से आगे रही. प्रेमी ने प्रेमिका को उस के जीतेजी ही ताजमहल भेंट कर दिया था. शहरभर में इस की चर्चा हुई थी. लेकिन डाक्टर राजीव के सधे, कुशल हाथों ने मर्ज को पकड़ने में कभी भूल नहीं की थी. उस पर निर्धनों का मुफ्त इलाज उन्हें प्रतिष्ठा के सिंहासन से कभी नीचे न खींच सका था.

जिंदगी को जीती हुई भी जिंदगी से निर्लिप्त थीं मिसेज राजीव. जरूरत से भी कम बोलने वाली. बरात रवाना हो चुकी थी. यों तो बरात में औरतें भी गई थीं पर वहां भी शुभदा की उपस्थिति स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी थी. मिसेज राजीव ने ‘घर अकेला नहीं छोड़ना चाहिए’ कह कर खुद ही शुभदा का मार्ग प्रशस्त कर दिया था. मां मिसेज राजीव की दूर की बहन लगती हैं. बड़े आग्रह से पत्र लिख उन्होंने हमें विवाह में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था. सालों से बिछुड़ी बहन इस बहाने उन से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

बरात के साथ न जा कर मिसेज राजीव ने उस स्थिति की पुनरावृत्ति से बचना चाहा था जिस में पड़ कर उन्हें उस दिन अपनी नियति का परिचय प्राप्त हो गया था. डाक्टर राजीव काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. डाक्टरों के अनुसार उन का एक छोटा सा औपरेशन करना जरूरी था. औपरेशन का नाम सुनते ही लोगों का दिल दहल उठता है.

परिणामस्वरूप ससुराल से भी रिश्तेदार उन्हें देखने आए थे. अस्पताल में शुभदा की उपस्थिति, उस पर उसे बीमार की तीमारदारी करती देख ताईजी के तनबदन में आग लग गई थी. वे चाह कर भी खुद को रोक न सकी थीं. ‘कौन होती हो तुम राजीव को दवा पिलाने वाली? पता नहीं क्याक्या कर के दिनबदिन इसे दीवाना बनाती जा रही है. इस की बीवी अभी मरी नहीं है,’ ताईजी के कर्कश स्वर ने सहसा ही सब का ध्यान आकर्षित कर लिया था.

अपराधिनी सी सिर झुकाए शुभदा प्रेमी के आश्वासन की प्रतीक्षा में दो पल खड़ी रह सूटकेस उठा कर चलने लगी थी कि प्रेमी के आंसुओं ने उस का मार्ग अवरुद्ध कर दिया था. उषा पूरे दृश्य की साक्षी बन कर पति की आंखों की मौन प्रार्थना पढ़ वहां से हट गई थी. पत्नी के जीवित रहते प्रेमिका की उपस्थिति, सबकुछ कितना साफ खुला हुआ. कैसी नारी है प्रेमिका? दूसरी नारी का घर उजाड़ने को उद्यत. कैसे सब सहती है पत्नी? परनारी का नाम भी पति के मुख से पत्नी को सहन नहीं हो पाता. सौत चाहे मिट्टी की हो या सगी बहन, कौन पत्नी सह सकी है?

पिता का आचरण बेटों को अनजान?े ही राह दिखा गया था. मझले बेटे के कदम भी बहकने लगे थे. न जाने किस लड़की के चक्कर में फंस गया था कि चतुर शुभदा ने बिगड़ती बात को बना लिया. न जाने किन जासूसों के बूते उस ने अपने प्रेमी के सम्मान को डूबने से बचा लिया. लड़के की प्रेमिका को दूसरे शहर ‘पैक’ करा के बेटे के पैरों में विवाह की बेडि़यां पहना दीं. सभी ने कल्पना की थी बापबेटे के बीच एक जबरदस्त हंगामा होने की, पर पता नहीं कैसा प्रभुत्व था पिता का कि बेटा विवाह के लिए चुपचाप तैयार हो गया. ‘ईर्ष्या और तनावों की जिंदगी में क्यों घुट रही हो?’ मां ने उषा को कुरेदा था.

एकदम चुप रहने वाली मिसेज राजीव उस दिन परत दर परत प्याज की तरह खुलती चली गई थीं. मां भी बरात के साथ नहीं गई थीं. घर में 2 नौकरों और उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. इतने लंबे अंतराल में इतना कुछ घटित हो गया, मां को कुछ लिखा भी नहीं. मातृविहीन सौतेली मां के अनुशासन में बंधी उषा पतिगृह में भी बंदी बन कर रह गई थी. मां ने उषा की दुखती रग पर हाथ धर दिया था. वर्षों से मन ही मन घुटती मिसेज राजीव ने मां का स्नेहपूर्ण स्पर्श पा कर मन में दबी आग को उगल दिया था. ‘मैं ने यह सब कैसे सहा, कैसे बताऊं? पति पत्नी को मारता है तो शारीरिक चोट ही देता है, जिसे कुछ समय बाद पत्नी भूल भी जाती है पर मन की चोट तो सदैव हरी रहती है. ये घाव नासूर बनते जाते हैं, जो कभी नहीं भरते.

‘पत्नीसुलभ अधिकारों को पाने के लिए विद्रोह तो मैं ने भी करना चाहा था पर निर्ममता से दुत्कार दी गई. जब सभी राहें बंद हों तो कोई क्या कर सकता है? ‘ऊपर से बहुत शांत दिखती हूं न? ज्वालामुखी भी तो ऊपर से शांत दिखता है, लेकिन अपने अंदर वह जाने क्याक्या भरे रहता है. कलह से कुछ बनता नहीं. डरती हूं कि कहीं पति को ही न खो बैठूं. आज वे उसे ब्याह कर मेरी छाती पर ला बिठाएं या खुद ही उस के पास जा कर रहने लगें तो उस स्थिति में मैं क्या कर लूंगी?

‘अब तो उस स्थिति में पहुंच गई हूं जहां मुझे कुछ भी खटकता नहीं. प्रतिदिन बस यही मनाया करती हूं कि मुझे सबकुछ सहने की अपारशक्ति मिले. कुदरत ने जिंदगी में सबकुछ दिया है, यह कांटा भी सही. ‘नारी को जिंदगी में क्या चाहिए? एक घर, पति और बच्चे. मुझे भी यह सभीकुछ मिला है. समय तो उस का खराब है जिसे कुदरत कुछ देती हुई कंजूसी कर गई. न अपना घर, न पति और न ही बच्चे. सिर्फ एक अदद प्रेमी.’

उषा कुछ रुक कर धीमे स्वर में बोली, ‘दीदी, कृष्ण की भी तो प्रेमिका थी राधा. मैं अपने कृष्ण की रुक्मिणी ही बनी रहूं, इसी में संतुष्ट हूं.’ ‘लोग कहते हैं, तलाक ले लो. क्या यह इतना सहज है? पुरुषनिर्मित समाज में सब नियम भी तो पुरुषों की सुविधा के लिए ही होते हैं. पति को सबकुछ मानो, उन्हें सम्मान दो. मायके से स्त्री की डोली उठती है तो पति के घर से अर्थी. हमारे संस्कार तो पति की मृत्यु के साथ ही सती होना सिखाते हैं. गिरते हुए घर को हथौड़े की चोट से गिरा कर उस घर के लोगों को बेघर नहीं कर दिया जाता, बल्कि मरम्मत से उस घर को मजबूत बना उस में रहने वालों को भटकने से बचा लिया जाता है.

‘तनाव और घुटन से 2 ही स्थितियों में छुटकारा पाया जा सकता है या तो उस स्थिति से अपने को अलग करो या उस स्थिति को अपने से काट कर. दोनों ही स्थितियां इतनी सहज नहीं. समाज द्वारा खींची गई लक्ष्मणरेखा को पार कर सकना मेरे वश की बात नहीं.’

मिसेज राजीव के उद्गार उन की समझदारी के परिचायक थे. कौन कहेगा, वे कम पढ़ीलिखी हैं? शिक्षा की पहचान क्या डिगरियां ही हैं?

बरात वापस आ गई थी. घर में एक और नए सदस्य का आगमन हुआ था. बेटे की बहू वास्तव में बड़ी प्यारी लग रही थी. बहू के स्वागत में उषा के दिल की खुशी उमड़ी पड़ रही थी. रस्म के मुताबिक द्वार पर ही बहूबेटे का स्वागत करना होता है. बहू बड़ों के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद पाती है. सभी बड़ों के पैर छू आशीष द्वार से अंदर आने को हुआ कि किसी ने व्यंग्य से चुटकी ली, ‘‘अरे भई, इन के भी तो पैर छुओ. ये भी घर की बड़ी हैं.’’ शुभदा स्वयं हंसती हुई आ खड़ी हुई. आशीष के चेहरे की हर नस गुस्से में तन गई. नया जवान खून कहीं स्थिति को अप्रिय ही न बना दे, बेटे के चेहरे के भाव पढ़ते हुए मिसेज राजीव ने आशीष के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, आगे बढ़ कर चरणस्पर्श करो.’’

काम की व्यस्तता व नई बहू के आगमन की खुशी में सभी यह बात भूल गए पर आशीष के दिल में कांटा पड़ गया, मां की रातों की नींद छीनने वाली इस नारी के प्रति उस के दिल में जरा भी स्थान नहीं था. शाम को घर में पार्टी थी. रंगबिरंगी रोशनियों से फूल वाले पौधों और फलदार व सजावटी पेड़ों से आच्छादित लौन और भी आकर्षक लग रहा था. शुभदा डाक्टर राजीव के साथ छाया सी लगी हर काम में सहयोग दे रही थी. आमंत्रित अतिथियों की लिस्ट, पार्टी का मीनू सभीकुछ तो उस के परामर्श से बना था.

शहनाई का मधुर स्वर वातावरण को मोहक बना रहा था. शहर के मान्य व प्रतिष्ठित लोगों से लौन खचाखच भर गया था. नईनेवली बहू संगमरमर की तराशी मूर्ति सी आकर्षक लग रही थी, देखने वालों की नजरें उस के चेहरे से हटने का नाम ही नहीं लेती थीं. एक स्वर से दूल्हादुलहन व पार्टी की प्रशंसा की जा रही थी. साथ ही, दबे स्वरों में हर व्यक्ति शुभदा का भी जिक्र छेड़ बैठता. ‘‘यही हैं न शुभदा, नीली शिफौन की साड़ी में?’’ डाक्टर राजीव के बगल में आ खड़ी हुई शुभदा को देखते ही किसी ने पूछा.

‘‘डाक्टर राजीव ने क्या देखा इन में? मिसेज राजीव को देखो न, इस उम्र में भी कितनी प्यारी लगती हैं.’’ ‘‘तुम ने सुना नहीं, दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज?’’

‘‘शुभदा ने शादी नहीं की?’’ ‘‘शादी की होती तो अपने पति की बगल में खड़ी होती, डाक्टर राजीव के पास क्या कर रही होती?’’ किसी ने चुटकी ली, ‘‘मजे हैं डाक्टर साहब के, घर में पत्नी का और बाहर प्रेमिका का सुख.’’

घर के लोग चर्चा का विषय बनें, अच्छा नहीं लगता. ऐसे ही एक दिन आशीष घर आ कर मां पर बड़ा बिगड़ा था. पिता के कारण ही उस दिन मित्रों ने उस का उपहास किया था. ‘‘मां, तुम तो घर में बैठी रहती हो, बाहर हमें जलील होना पड़ता है. तुम यह सब क्यों सहती हो? क्यों नहीं बगावत कर देतीं? सबकुछ जानते हुए भी लोग पूछते हैं, ‘‘शुभदा तुम्हारी बूआ है? मन करता है सब का मुंह नोच लूं. अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊं तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा. तुम यहां नहीं रहोगी.’’

मां निशब्द बैठी मन की पीड़ा, अपनी बेबसी को आंखों की राह बहे जाने दे रही थी. बच्चे दुख पाते हैं तो मां पर उबल पड़ते हैं. वह किस पर उबले? नियति तो उस की जिंदगी में पगपग पर मुंह चिढ़ा रही थी. बेटी साधना डिलीवरी के लिए आई हुई थी. उस के पति ने लेने आने को लिखा तो उस ने घर में शुभदा की उपस्थित को देख, कुछ रुक कर आने को लिख दिया था. ससुराल में मायका चर्चा का विषय बने, यह कोईर् लड़की नहीं चाहती. उसी स्थिति से बचने का वह हर प्रयत्न कर रही थी. पर इतनी लंबी अवधि के विरह से तपता पति अपनी पत्नी को विदा कराने आ ही पहुंचा.

शुभदा का स्थान घर में क्या है, यह उस से छिपा न रह सका. स्थिति को भांप कर ही चतुर विवेक ने विदा होते समय सास और ससुर के साथसाथ शुभदा के भी चरण स्पर्श कर लिए. पत्नी गुस्से से तमतमाती हुई कार में जा बैठी और जब विवेक आया तो एकदम गोली दागती हुई बोली, ‘‘तुम ने उस के पैर क्यों छुए?’’ पति ने हंसते हुए चुटकी ली, ‘‘अरे, वह भी मेरी सास है.’’

साधना रास्तेभर गुमसुम रही. बहुत दिनों बाद सुना था आशीष ने मां को अपने साथ चलने के लिए बहुत मनाया था पर वह किसी भी तरह जाने को राजी नहीं हुई. लक्ष्मणरेखा उन्हें उसी घर से बांधे रही.

आंतरिक साहस के अभाव में ही मिसेज राजीव उसी घर से पति के साथ बंधी हैं. रातभर छटपटाती हैं, कुढ़ती हैं, फिर भी प्रेमिका को सह रही हैं सुबहशाम की दो रोटियों और रात के आश्रय के लिए. वे डरपोक हैं. समाज से डरती हैं, संस्कारों से डरती हैं, इसीलिए उन्होंने जिंदगी से समझौता कर लिया है. सुना था, इतनी असीम सहनशक्ति व धैर्य केवल पृथ्वी के पास ही है पर मेरे सामने तो मिसेज राजीव असीम सहनशीलता का साक्षात प्रमाण है.

Family Story: झुनझुना – आखिर क्यों रिना को गुस्सा नहीं आता था

Family Story: आत्मनिर्भर बनने के भाषण ने नेताओं जैसे गुणों वाले मेरे घर के 3 तेज बुद्धि वालों को और सयाना बना दिया. भाषण का असर किसी पर हुआ हो या न, इन 3 सयानों के चेहरों की चमक देखने वाली थी.

मैं चुप रही. कोरोना टाइम में चौबीसों घंटे सब को झेलझेल कर इन की नसनस पहचानने लगी हूं. रातदिन देख रही हूं सब को. सरकार सा हो गया है घर मेरा. करनाधरना कम, शोर ज्यादा.

मुझे अपना अस्तित्व किसी मूर्ख, गरीब जनता जैसा लगता है. एक जरूरी काम बताती हूं, तो ये दस जगह ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं. कोशिश रहती है कि कोई जिम्मेदारी इन के ऊपर न आए. कोरोनाकाल में आजकल हाउसहैल्प नहीं है, तो इन सयानों को घर के कामों में कम से कम ही हाथ बंटाना पड़े.

मयंक कहने लगे, “रीना, वैसे सब काम मैनेज हो ही रहा है न, तो अब तुम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो गई हो. अब तो तुम्हें आशाबाई की भी जरूरत नहीं लगती न, प्राउड औफ़ यू, डिअर.”

मैं फुंफकारी, ”उस के बिना हालत खराब है मेरी. चुपचाप काम किए जा रही हूं, तो इस का मतलब यह नहीं कि बहुत अच्छा लग रहा है. तुम तीनों तो किसी काम को हाथ तक नहीं लगाना चाहते. पता नहीं कैसे इतने सौलिड बहाने देते हो कि चुप ही हो जाती हूं.‘’

मलय को अचानक कुछ याद आया, ”मौम, आप को पता है कि विपिन की मौम घर पर ही पिज़्ज़ा बेस बना लेती हैं. कल इंस्टाग्राम पर विपिन ने पिक डाली, तो मैं ने उस से पूछा था कि सब शौप्स तो बंद हैं, तुम्हें पिज़्ज़ा बेस कहां से मिल गया? मौम, उस ने गर्व से बताया कि उस की मम्मी को पिज़्ज़ा बेस घर पर बनाना आता है.”

मैं ने उसे घूरा तो उस ने टौपिक बदलने में ही अपनी भलाई समझी. पर, उस ने मेरी दुखती रग तो छू ही दी थी. सो, मैं शुरू हो गई, ”तुम लोग हाथ मत बंटाना, बस, मुझे यह बता दिया करो कि और घरों में क्याक्या बन रहा है. मलय, उस से यह पूछा कि उन के घर में भी कोई घर के कामों में हैल्प कर रहा है या नहीं? बस, मां को ही आत्मनिर्भर बनाना है सब को?”

मौली कम सयानी थोड़े ही है, एक कुशल नेता की तरह मीठे स्वर में मौके की नजाकत देख कर कहा, ”मलय, मौम कितना काम कर रही हैं आजकल, देखते हो न. अब ऐसे में उन से पिज़्ज़ा बेस भी बनाने की ज़िद न करो. मेरे भाई, मौम जो बनाती हैं, ख़ुशीख़ुशी खा लो. उन के हाथ में तो इतना स्वाद है, जो भी बनाती हैं, अच्छा ही होता है. मौम, आप को जिस चीज में मेहनत कम लगे, वही बनाया करो. हम तो वर्क फ्रौम होम में फंस कर आप की हैल्प नहीं कर पाते. लव यू, मौम,” ‘कहतेकहते उस ने मेरे गाल चूम लिए. और मैं एक गरीब जनता की तरह फिर सब के झांसे में आ कर, सब भूल दुगने जोश से काम करने लगी.

मौली ने एक झुनझुना पकड़ा ही दिया था. लौकडाउन शुरू होने पर मेरे मूर्ख बनने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, वह ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही. मैं बारबार इन सयानी बातों में फंसती हूं. तीनों ने मुझे काफी समझाया. एक भाषण काफी नहीं था आत्मनिर्भर बनने का, 3 और सुने.

मयंक उन में से हैं जो ऐसे भाषण को काफी गंभीरता से लेते हैं. जो कह दिया गया, बस, वही करेंगे. बुद्धि गई तेल लेने. कई बार सोचती हूं, इतना ध्यान अगर अपने पिताजी के भाषणों पर दिया होता, तो पता नहीं आज क्या बन गए होते. सेल्स की नौकरी में कमाखा तो अभी भी रहे हैं, पर पिताजी के भाषण तो बेकार गए न.

उन्हें तो मयंक को डाक्टर बनाना था. आज लगता है अगर टीवी पर भाषण में सुनते कि डाक्टर बनना है तो मेहनत शायद कर लेते, पर पिताजी की बात में टीवी के भाषण जैसा दम थोड़े ही था. मयंक अकसर कहते हैं, ‘मुझ पर ऐसे भाषणों का असर कहां होता है. मुझे तो रोज बढ़ती महंगाई में खींचतान कर घर का बजट देखना पड़ता है.’ मैं समझ गई कि मुझे आत्मनिर्भर बनाने के लिए तीनों एड़ीचोटी का जोर लगा देंगे.

मुझे कोई शौक नहीं आत्मनिर्भर बनने का. नहीं हो रहा है मुझ से अब अकेले घर का काम. मुझे आशाबाई भी चाहिए, इन लोगों की हैल्प भी चाहिए. घर में रहरह कर सब का हर समय कोई न कोई शौक जागा करता है जिसे पूरा मुझे करना होता है. एक दिन मलय ने कहा, मौम, चलो, घर की सैटिंग कुछ चेंज करते हैं, एक चीज एक तरह से देखदेख कर बोर हो गए.”

मैं ने कहा, ‘हां, क्यों नहीं. चलो, झाड़ू ले आओ. सामान इधरउधर हटेगा, तो नीचे की सफाई भी हो जाएगी, वरना सामान रोज तो हटता नहीं है.”

फौरन एक नेता की तरह पलटी मार दी महाशय ने, ”मौम, इस से तो आप का काम और बढ़ जाएगा. छोड़ो, फिर कभी करते हैं.”

”नहींनहीं, काम क्या बढ़ना, तुम हैल्प करवा रहे हो न!”

”मौम, कुछ काम याद आ गया अचानक, लैपटौप पर बैठना पड़ेगा, फिर कभी करते हैं. सैटिंग इतनी भी बुरी नहीं है.”

मौली को एक दिन कहा, ”आज तुम डिनर बना लेना. पता नहीं, मन नहीं हो रहा है कुकिंग का, बोर हो गई रातदिन खाना बनाबना कर.”

मौली ने अपनी मनमोहक मुसकान से कहा, “हां, मौम, बना लूंगी.” फिर उस ने मेरी कमर में बांहें डालीं और मेरे साथ ही लेट गई और बोली, ”लाओ मौम, आप की कमर दबा दूं?”

मैं झट से उलटी हो गई, ”हां, दबा दो.” यह मौका छोड़ दूं, इतनी भी मूर्ख नहीं हूं मैं. ऐसे दिन बारबार तो आते नहीं कि कोई कहे, आओ, कमर दबा दूं. कुछ ही सैकंड्स बीते होंगें, मैं सुखलोक में पहुंची ही थी कि मौली का मधुर स्वर सुनाई दिया, “मौम, जब आप को ठीक लगे, एक शार्ट कट मारोगी?”

”क्या, फिर से बोलो, बेटा?”

”किसी दिन सिर्फ मटर पुलाव बनाओगी? रायता मैं बना लूंगी. बहुत दिन हो गए, मलय तो आप को बनाने नहीं देता, पूरा खाना चाहिए होता है उसे तो.‘’

”हां, ठीक है, बना दूंगी”

बेटी इतने प्यार से अपना कामधाम छोड़ कर मेरे साथ लेटी थी, मैं तो वारीवारी जा रही थी उस पर मन ही मन. थोड़ी देर बाद वह अपने रूम में चली गई. उस की फ्रैंड का फोन था, जातेजाते बोली, “टेक रैस्ट, मौम.”

थोड़ी देर बाद मैं ने यों ही लेटेलेटे मौली को सरप्राइज देने का मन बना लिया, कि मैं आज ही मटरपुलाव बना लूंगी उस की पसंद का, खुश हो जाएगी वह. और मैं ने डिनर में सचमुच खुद ही सब बना लिया. बीचबीच में मौली आ कर हैल्प औफर करती रही, मैं मना करती रही थी.

डिनर टेबल पर सब को हंसतेमुसकराते देख मुझे अचानक याद आया कि अरे, आज तो मेरा कुकिंग का मूड ही नहीं था. मौली पर जिम्मेदारी सौंपी थी डिनर की. और मैं ही उस के लिए मटरपुलाव, रायता और मलय के लिए स्टफ्ड परांठे बनाने में जुट गई. ओह, मूर्ख जनता फिर ठगी गई. मुझे मीठीमीठी बातों में फिर फंसा लिया गया. मुझे गुस्सा आ गया, कहा, ”मैं तुम लोगों से बहुत नाराज हूं, कोई मेरी हैल्प नहीं करता. बस, सब से डायलौग मरवा लो. मर जाऊंगी काम करतेकरते, तुम लोग, बस, लाइफ एंजौय करो.”

मयंक ने मुझे रोमांटिक नजरों से देखते हुए कहा, ”मेरी रीनू, हम लोगों से गुस्सा हो ही नहीं सकती. अभी तो यह टैस्टी पुलाव खाने दो. एक बार औफिस में कपिल पुलाव लाया था, इतना बेकार था, सारे चावल के दाने चिपके हुए थे. और एक आज तुम्हारा बनाया हुआ पुलाव, देखो, कैसे खिलाखिला है एकएक दाना. वाह, खाना बनाना कोई तुम से सीखे. सच बताऊं, जो भी बनाती हो, शानदार होता है. वाह, ऐक्सीलैंट.”

मैं, हूं तो एक नारी ही न, तारीफ़ सुन कर सब भूल गई. दिल किया, अपनी जान निसार कर दूं सब पर. इतराते हुए पूछ बैठी, “कल क्या खाओगे, क्या बनाऊं?”

मलय ने मौका नहीं छोड़ा, फरमाइश सब से पहले की, ”मौम,छोलेभठूरे.”

”ओके, बनाऊंगी.”

फिर मौली कह बैठी, ”मौम, मेरी हैल्प तो नहीं चाहिए होगी न? कल मेरी कई वर्कशौप्स हैं दिनभर.”

मेरा मुंह उतरा, तो एक सयाने ने संभाल लिया, मलय ने कहा, ”मैँ करवा सकता हूं हैल्प, पर लंचटाइम में, तब तक आप मेरी हैल्प का वेट कर पाओगी, मौम?”

मैं ने थोड़ा झींकते हुए कहा, “मुझे किसी से कोई उम्मीद ही नहीं है कि मुझे हैल्प मिलेगी. यह कोरोना टाइम मेरी जान ले कर ही रहेगा. कोरोना से भले ही बच जाऊं, ये काम मुझे मार डालेंगे. बस, तुम लोग सुबह लैपटौप खोल लिया करो, बीचबीच में सोशल मीडिया पर घूम लिया करो, दोस्तों से बातें कर लिया करो. बस, यही करते हो और यही करते रहो तुम लोग.”

इतने में दूसरे सयाने ने माहौल में बातों की जादू की छड़ी घुमाने की कोशिश की. मयंक बोले, ”तुम बहुत दिन से नई वाशिंग मशीन लेने के लिए कह रही थीं न, आजकल सेल चल रही है. मैं ने देख ली है. चलो, तुम्हें दिखाता हूं. आओ, लैपटौप लाता हूं.” यह कह कर मयंक उठे. बच्चे भी नौटंकी करने लगे, बोले, मौम, देखो, पापा कितना ध्यान रखते हैं, आप के लिए नई वाशिंग मशीन आ रही है.”

मैँ क्या कहती, मुझे तो ऐसे ही घुमा दिया जाता है जैसे कि आजकल जनता किसी भी बात पर अपना हक़ जताने की कोशिश करे और उसे कोई झुनझुना हर बार पकड़ा दिया जाए. मैँ आजकल इन्हीं झुनझुनों में घूमती रहती हूं. वाशिंग मशीन का और्डर दे दिया गया.

आजकल कहीं बाहर तो निकल ही नहीं रहे हैं, तो सबकुछ औनलाइन ही तो आ रहा है. बस, काम करते रहो, कहीं आनाजाना नहीं. मेरे फ़्रस्ट्रेशन की कोई सीमा नहीं है आजकल. कब आशाबाई आएगी, कब मैँ चैन की सांस लूंगी. गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब मैँ कहती हूं कि आशाबाई को बुला लेते हैं, तीनों एकसुर में कहते हैं, कि अरे, बिलकुल सेफ नहीं है उसे बुलाना. तुम हमें बताओ, किस काम में उस की हैल्प चाहिए.

मैँ जब हैल्प के लिए बताती हूं तो सब गायब हो जाते हैं. यह है आजकल मेरी हालत. तभी मैं खुद को मूर्ख जनता की तरह पाती हूं. जैसे ही आवाज उठाती हूं, झुनझुने पकड़ा दिए जाते हैं मुझे. तीनो ऐसे सयाने हैं कि घर के काम नहीं करने, बस, मौली तो मुंह बिसूर कर कहती है, “मौम, कहां आदत है, इतने काम…”

काम न करने पड़ें, इस के लिए सारे पैतरे आजमाए जा रहे हैं. वाशिंग मशीन आ गई. सब को लगा कि मैँ अब कुछ दिन तो उस में लगी रहूंगी, खुश रहूंगी. पर कितने दिन… काम थोड़े ही कम हो गए मेरे. एक रात को मैं ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, ”कल सुबह उठते ही मुझे तुम तीनों से जरूरी बात करनी है.”

मेरे स्वर की गंभीरता पर तीनों चौंके, क्या हुआ? अभी बता दो.”

”परेशान हो चुकी हूं, सुबह ही बात करेंगे. मैँ कोई नौकर थोड़े ही हूं कि दिनरात, बस, काम ही करती रहूं,” कह कर मैँ पैर पटकते हुए सोने चली गई. अभी 10 ही बजे थे, पर आज मैँ बहुत थक गई थी.

मुझे आहट मिली कि तीनों एक रूम में ही बैठ गए हैं. मैं ने सोच लिया था कि कल मैँ तीनों को कोई काम न करने पर बुरी तरह डांटूंगी, लड़ूंगी, चिल्लाऊंगी. हद होती है कामचोरी की. और मैँ फिर जल्दी सो भी गई. सुबह उठी, तो भी मुझे रात का अपना गुस्सा और शिकायतें याद थीं. बैड पर लेटेलेटे सोचा कि आज बताती हूं सब को, कोई हैल्प नहीं करेगा तो मैं अकेले भी नहीं करने वाली सारे काम. हद होती है, सैल्फिश लोग.

तीनों अभी सोये हुए थे. मैं ने जैसे ही लिविंगरूम में पैर रखा, मेरी नजर कौर्नर की शैल्फ पर रखी अपनी मां की फोटो पर पड़ी. मेरी आंखें चमक उठीं. पास में जा कर फोटो को निहारती रह गई. ओह, किस ने रखी यह मेरी प्यारी मां की इतनी सुंदर फोटो यहां पर. मैं फोटो देखती रही. यह इन लोगों ने लगाई है रात में. लेकिन यह फोटो तो मेरी अलमारी में रहती है. ये बेचारे वहां से कैसे निकाल कर लाए होंगे कि आहट से मेरी आंख भी न खुली.

मैं ने फ्रेश हो कर अपनी मां को फोन मिला दिया और बताया कि रात को उन की फोटो कैसे तीनों ने मुझे सरप्राइज देने के लिए लगा दी है. मां को बहुत ख़ुशी हुई, तीनों को खूब प्यार व आशीर्वाद कहती रहीं. मैं सब भूल, अब, मां से इन तीनों की तारीफ़ क्यों किए जा रही थी, मुझे एहसास ही नहीं हुआ. मैं चाय पी ही रही थी कि तीनों उठे. मैं ने उन्हें थैंक्स कहा. वे मुसकराते हुए फ्रेश हो कर अपने काम में बिजी हो गए.

ब्रेकफास्ट मैं ने उन तीनों की पसंद का ही बनाया. जिस में मुझे एक्स्ट्रा टाइम लगा तो मुझे फिर अपने पर गुस्सा आने लगा. मेरा ध्यान फिर इस बात पर गया कि फिर मुझे रात में नाराज देख कर मां की फोटो का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है. अभी बताती हूं सब को, चालाक लोग…कैसे मेरा गुस्सा शांत किया, कितने तेज हैं सब. बताती हूं अभी. मैं ने सीरियस आवाज़ में कहा, ”आओ सब, जरा बात करनी है मुझे.”

तीनों ने आते हुए एकदूसरे को देख कर इशारे किए. मेरी आंखों से छिपा न रहा. फिर मौली और मलय को मैं ने मयंक को कुछ इशारा करते हुए देखा. मुझे पता है कि मेरे गुस्से से बचते हैं तीनों. वैसे तो मुझे जल्दी गुस्सा नहीं आता, पर, जब आता है तो मैं काफी मूड खराब करती हूं. हम चारों बैठ गए. मैं ने रूखी आवाज में कहा, “सब सामने ही रखा है, खुद ले लो. मेहमान तो हो नहीं कोई, कि परोसपरोस कर सब की प्लेट लगाऊं. और मुझे, तुम लोगों से यह कहना है कि अब से…”

मयंक ने मेरी बात पूरी नहीं होने दी, बहुत भावुक हो कर बोला, ”नहीं, पहले मुझे बोलने दो, रीनू. हम तीनों ने सोचा है कि हम हर बार कुछ भी खाने से पहले इतनी मेहनत कर के हमें खिलाने वाले को, तुम्हे, थैंक्स कहा करेंगे, थैंक्यू, रीनू, कितना करती हो तुम हम सबके लिए. बिना किसी की हैल्प के, इतने काम करना आसान नहीं है. वी लव यू, रीनू.”

”थैंक्यू मौम.”

बच्चों ने भी इतने प्यार से कहा कि मैं रोतेरोते रुकी. मन में आया, मैं ही ओवररिऐक्ट तो नहीं कर रही थी. बेचारे खाने से पहले मुझे थैंक्स बोल रहे हैं. किस के घर में यह सब होता है. ओह, कितने प्यारे हैं तीनों. देखते ही देखते मैं उन सब को प्यार से हर चीज सर्व कर रही थी. मेरी जबान से शहद टपक रही थी. मुझे फिर लच्छेदार बातों का एक झुनझुना पकड़ा दिया गया था, इस का एहसास मुझे बाद में फिर हुआ. मूर्ख जनता सी मैं एक बार फिर ठगी गई थी.

Family Story: पूर्णाहूति – क्यों सुरेखा घर छोड़ना चाहती थी?

Family Story, लेखिका- वंदना तिवारी

सुरेखा जल्दीजल्दी सूटकेस में सामान रखने में व्यस्त थी. समय और आवश्यकता के अनुसार चुनी गईं कुछ साङियां, ब्लाउज के सैट्स, सूट के साथ मैचिंग दुपट्टे. 2-3 चूड़ियों के सैट्स, कुछ रूमालें और रोजमर्रा की जरूरत की ऐसी चीजें जिन की उपस्थिति जीवन में अनिवार्य होती हैं, धीरेधीरे संभाल कर रख रही थी.

इन में भी सब से अधिक संभाल कर रखे गए उस के सारे सर्टिफिकैट्स, मार्कशीट्स और नौकरी के लिए आया कौल लेटर भी था.

इन व्यस्तताओं के बीच उस ने कई बार मणि की ओर बेपरवाही से देखा और फिर व्यस्त हो गई. सोफे पर स्थिर बैठा मणि उसे एकटक ऐसे देख रहा था मानों बहुत कुछ कहना चाह रहा हो, लेकिन उस के शब्द किसी अथाह सागर में डूबते जा रहे हों.

उधर सुरेखा थी कि उस की ओर स्थिर हो कर ताक भी नहीं रही थी मानों जताना चाह रही हो कि तुम ने मुझे कब सुना था, जो आज मैं तुम्हारी भावनाओं को समेट लूं?

जब मैं तुम्हें अपने पास रोकना चाहती थी, तब तुम हाथ छुड़ा कर चले जाते थे. जब मैं तुम से कुछ कहने का प्रयास करती, तब तुम ध्यान नहीं देते थे क्योंकि तुम्हारे अनुसार मैं बेमतलब की बातें ही तो करती थी. फिर एक अहंकारी पुरुष मेरी बातों में क्यों दिलचस्पी ले पाता?

ओह, मैं ने क्याक्या कहना चाहा था तुम से मणि. क्या एक पति का इतना भी कर्तव्य न था कि वह अर्धांगिनी कही जाने वाली अपनी पत्नी के मनोभावों को समझना तो दूर, सुन भी न सके?

मुझे आज भी याद है मणि, जब मैं ब्याह कर प्रथम दिवस तुम्हारे घर आई थी. ससुराल में पदार्पण करने के बाद नई दुलहन को देखने वालों के उत्साह ने मुझे क्षण भर भी आराम करने नहीं दिया था. हां, तुम ने आते ही सो कर अपनी थकान उतार ली थी, लेकिन मैं भारी बनारसी साड़ी के बोझ तले दुलहन बनी बैठी रही.

रात में जब सब सो गए तब मैं आधी रात कमरे में अकेली बैठी इंतजार करती रही थी. मेरे मन में कितने भाव आजा रहे थे. मैं चाहती थी कि अपने मन के सारे द्वार खोल दूं और तुम एक प्रेमाकुल भ्रमर के समान मेरे मन के कोष में बंद सारे भाव पढ़ लो. सारी नींद, सारी थकान भुला कर मैं तुम से रात भर बातें करती रहूं.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तुम ने आते ही कमरे के कपाट क्या बंद किए मेरे मन के द्वार पर मानो ताला लगा दिया. तुम ने आते ही मुझे जकङ लिया था और फिर ज्योंज्यों चूङियोंगहनों का बोझ कम होता गया त्योंत्यों मेरे व्याकुल हृदय का भार और बढ़ता चला गया. उस के बाद तो सपने, कल्पनाएं, भावनाएं न जाने क्याक्या मेरे भीतर ही भीतर टूटता रहा. मेरा तो जैसे संपूर्ण अस्तित्व अस्तव्यस्त हो गया, जिसे मैं आज तक नहीं समेट पाई.

मिलन की प्रथम रात्रि की मधुर बेला में तुम्हारे द्वारा पूछा गया वह क्रूर प्रश्न क्या मैं कभी भूल पाऊंगी मणि? तुम्हारे निर्दय शब्द आज भी मेरे मन को विचलित कर देते हैं.

तुम ने मेरी वर्जिनिटी पर सवाल उठाया था,”क्या इस के पहले तुम्हारा किसी से…?”

छिः मैं कैसे बोलूं तुम्हारे वे घृणित शब्द? मैं अवाक सी तुम्हें देखती रह गई थी.

तब तुम ने और दृढ़ता से कहा था,’’आजकल कालेज में पढ़ने वाले लड़केलड़कियों के लिए यह सामान्य सी बात है. मैं बुरा नहीं मानूंगा.‘‘

चरित्र पर उछाले गए उन छीटों से मैं आज भी स्वयं को कलुषित सा महसूस करती हूं मणि.

सुरेखा के सारे घाव हरे हो उठे थे. उस की डबडबाई आंखों से कुछ बूंदें छलक पड़ीं. तभी मणि ने उस का हाथ पकड़ लिया,’’रो रही हो? फिर क्यों जा रही हो? मुझे पता है तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगी.”

“चलो आज तुम्हें मेरा रोना तो दिखाई दिया. पर उस के पीछे का कारण तुम आज भी नहीं समझ पाए,” कहते हुए सुरेखा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर व्यस्त हो गई.

तुम समझ भी कैसे सकते थे, मणि क्योंकि तुम ने तो मुझे कभी पत्नी का स्थान दिया ही नहीं. तुम्हारे लिए तो मैं मात्र एक उपभोग की वस्तु ही थी. इस के अतिरिक्त तो तुम ने मेरे अस्तित्व को किसी अन्य रूप में स्वीकारा ही नहीं. मैं ने बहुत चाहा था कि तुम्हारे साथ मैं कुछ क्षण शांति से बिता पाती. कुछ तुम अपने मन की कहते कुछ मैं कहती. मनुष्य एकदूसरे के भावों को तो तभी समझ सकता है जब वह उसे सुने और समझे. धरती तभी नम होती है जब जल की बूंदें उसे सिंचित करती हैं. जल के स्नेहिल स्पर्श से ही भाव पूरित हो धरा में प्रेममयी बीज अंकुरित होते हैं, अन्यथा कोई कितना ही उस पर हल चलाता रहे सब बेकार है.

ऐसा नहीं कि तुम मुझे नहीं चाहते थे. जब तुम्हें एक स्त्री की आवश्यकता होती थी तब तुम मेरे पास ही आते थे. अपनी लालसा को तृप्त कर फिर मुझे अकेली छोड़ कर चले जाते थे. मेरे हृदय तक पहुंचने का प्रयास तो तुम ने कभी किया ही नहीं और मैं थी कि अब तक दरवाजे की ओर ही निहारती रह गई.

कई बार तो मैं तुम्हारे हाथ कस कर पकड़ लेती थी. तुम से अनुनयविनय करती कि कुछ क्षण मेरे निकट बैठ कर उस प्रेम को महसूस कर लेने दो जो मेरे हृदय को तुम्हारे साथ जोड़ सके. मगर तुम्हें मेरी भावनाओं से क्या मतलब था?

मेरे लिए प्रेम एक अमूर्त भाव था, एक ऐसी डोर जो 2 प्राणों को जनमजनम के लिए बांध लेते हैं. मगर तुम्हारे लिए प्रेम की परिभाषा कुछ और ही थी, तभी तो तुम निर्दयीभाव से मेरा हाथ छुड़ा कर चले जाया करते थे.

“आखिर तुम्हें किस बात ही कमी है यहां? क्या तुम्हें वास्तव में नौकरी की आवश्यकता है? वह भी इतनी दूर जा कर? अकेली रह पाओगी?”

मणि के शब्दों ने सुरेखा की तंद्रा तोड़ी थी. वह कुछ क्षणों के लिए मणि की ओर देखती रही, बिना कुछ कहे एकटक. सुरेखा मानों उन्हीं शब्दों की डोर थामे हुए कहीं डूबी चली जा रही थी.

यह तुम्हारे लिए मात्र एक नौकरी होगी, मणि. मेरे लिए तो तुम्हारे कारागार से मुक्त हो कर स्वच्छंद हवा में सांस लेने का एक माध्यम है. अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कुचल कर तुम्हारी दी हुई सुखसुविधाओं का भोग अब मेरे लिए सहन कर पाना असंभव हो गया है.

मैं कैसे भूल सकती हूं वह काला दिन जब तुम ने मेरी भावनाओं को खंडखंड कर डाला था.

मैं वह पल कैसे भूल सकती हूं, मणि? मेरा अपराध मात्र इतना था कि जब तुम मेरी कोई बात सुननेसमझने को तैयार न थे मैं ने अपनी भावनाओं को तुम तक पहुंचाने के लिए पत्र को माध्यम बनाया था. अपने भाव के मोती शब्दों की डोर में पिरो कर तुम्हें सौंप दिया था. यही मेरी भूल थी. सोचा था इसे पढ़ कर ही कदाचित किसी सीमा तक तुम मुझे समझ पाओगे. मगर नहीं, तुम तो पूरी तरह संवेदनाशून्य थे. इसीलिए तो तुम ने उस पत्र में लिखे 1-1 शब्द को सब के सामने बोल कर मेरा मजाक उड़ाया था.

घर में गूंजते ठहाकों से मेरा हृदय चीत्कार कर उठा था. उस दिन मैं टूट कर ऐसी बिखरी कि आजतक मैं स्वयं को समेटने का प्रयास ही कर रही हूं.

शायद राख के ढेर में कहीं एक चिनगारी शेष थी. बस, मन में एक निश्चय किया था,‘अब मुक्ति चाहिए…’ और इस के लिए मुझे स्वयं को स्थापित करना ही होगा.

एक नारी का हृदय जितना कोमल और विनम्र होता है, तिरस्कार और अपमान उसे उतना ही निष्ठुर और कठोर भी बना देता है.

मणि ने अपना अंतिम प्रयास किया. उस ने सुरेखा को कस कर भींच लिया,‘‘सोच लो, बस एक बार, मेरे लिए… इतना आसान नहीं होगा यह सब.’’

“आसान तो कुछ भी नहीं होता. अपने मातापिता और परिजनों को छोड़ कर किसी अजनबी को पति मान कर उस के साथ चल पड़ना कौन सा आसान होता है?’’ सुरेखा ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से मणि की ओर देखा था.

जीवन के एक नए सफर पर चल पड़ने की दृढ़ता उस के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘तो तुम नहीं मानोगी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘नहीं रुकोगी?’’

‘‘नहीं.”

“एक बार फिर सोच लो.’’

‘‘नहीं.”

सुरेखा ने अपने वैवाहिक जीवन की यज्ञवेदी में आज तक जितनी आहूतियां दी थीं, आज उस की पूर्णाहुति देने का समय था. सुरेखा इस के लिए पूरी तरह तैयार थी.

मणि के बाहुपाश से छूटते ही उस ने सूटकेस उठाया और दृढ़ता के साथ बाहर निकल गई.

Family Story: वह मेरे जैसी नहीं है – क्यों मां स्नेहा को आशीर्वाद देती थी?

Family Story: मैं ने तो यही सुना था कि बेटियां मां की तरह होती हैं या ‘जैसी मां वैसी बेटी’ लेकिन जब स्नेहा को देखती हूं तो इस बात पर मेरे मन में कुछ संशय सा आ जाता है. इस बात पर मेरा ध्यान तब गया जब वह 3 साल की थी. उसी समय अनुराग का जन्म हुआ था. मैं ने एक दिन स्नेहा से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा बेड अलग तैयार कर दूं, तुम अलग बेड पर सो पाओगी?’’ स्नेहा तुरंत चहकी थी, ‘‘हां, मम्मी बड़ा मजा आएगा. मैं अपने बेड पर अकेली सोऊंगी.’’

मुझे थोड़ा अजीब लगा कि जरा भी नहीं डरी, न ही उसे हमारे साथ न सोने का कोई दुख हुआ. विजय ने कहा भी, ‘‘अरे, वाह, हमारी बेटी तो बड़ी बहादुर है,’’ लेकिन मैं चुपचाप उस का मुंह ही देखती रही और स्नेहा तो फिर शाम से ही अपने बेड पर अपना तकिया और चादर रख कर सोने के लिए तैयार रहती.

स्नेहा का जब स्कूल में पहली बार एडमिशन हुआ तो मैं तो मानसिक रूप से तैयार थी कि वह पहले दिन तो बहुत रोएगी और सुबहसुबह नन्हे अनुराग के साथ उसे भी संभालना होगा लेकिन स्नेहा तो आराम से हम सब को किस कर के बायबाय कहती हुई रिकशे में बैठ गई. बनारस में स्कूल थोड़ी ही दूरी पर था. विजय के मित्र का बेटा राहुल भी उस के साथ रिकशे में था. राहुल का भी पहला दिन था. मैं ने विजय से कहा, ‘‘पीछेपीछे स्कूटर पर चले जाओ, रास्ते में रोएगी तो उसे स्कूटर पर बिठा लेना.’’ विजय ने ऐसा ही किया लेकिन घर आ कर जोरजोर से हंसते हुए बताया, ‘‘बहुत बढि़या सीन था, स्नेहा इधरउधर देखती हुई खुश थी और राहुल पूरे रास्ते जोरजोर से रोता हुआ गया है, स्नेहा तो आराम से रिकशा पकड़ कर बैठी थी.’’

मैं चुपचाप विजय की बात सुन रही थी, विजय थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘प्रीति, तुम्हारी मम्मी बताती हैं कि तुम कई दिन तक स्कूल रोरो कर जाया करती थीं. भई, तुम्हारी बेटी तो बिलकुल तुम पर नहीं गई.’’ मैं पहले थोड़ी शर्मिंदा सी हुई और फिर हंस दी.

स्नेहा थोड़ी बड़ी हुई तो उस की आदतें और स्वभाव देख कर मेरा कुढ़ना शुरू हो गया. स्नेहा किसी बात पर जवाब देती तो मैं बुरी तरह चिढ़ जाती और कहती, ‘‘मैं ने तो कभी बड़ों को जवाब नहीं दिया.’’ स्नेहा हंस कर कहती, ‘‘मम्मी, क्या अपने मन की बात कहना उलटा जवाब देना है?’’

अगर कोई मुझ से पूछे कि हम दोनों में क्या समानताएं हैं तो मुझे काफी सोचना पड़ेगा. मुझे घर में हर चीज साफ- सुथरी चाहिए, मुझे हर काम समय से करने की आदत है. बहुत ही व्यवस्थित जीवन है मेरा और स्नेहा के ढंग देख कर मैं अब हैरान भी होने लगी थी और परेशान भी. अजीब लापरवाह और मस्तमौला सा स्वभाव हो रहा था उस का. स्नेहा ने 10वीं कक्षा 95 प्रतिशत अंक ला कर पास की तो हमारी खुशियों का ठिकाना नहीं था. मैं ने परिचितों को पार्टी देने की सोची तो स्नेहा बोली, ‘‘नहीं मम्मी, यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह दिखावा नहीं, खुशी की बात है,’’ तो कहने लगी, ‘‘आजकल 95 प्रतिशत अंक कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, मैं ने कोई टौप नहीं किया है.’’ बस, उस ने कोई पार्टी नहीं करने दी, हां, मेरे जोर देने पर कुछ परिचितों के यहां मिठाई जरूर दे आई. अब तक हम मुंबई में शिफ्ट हो चुके थे. स्नेहा जब 5वीं कक्षा में थी, तब विजय का मुंबई ट्रांसफर हो गया था और अब हम काफी सालों से मुंबई में हैं.

10वीं की परीक्षाओं के तुरंत बाद स्नेहा के साथ पढ़ने वाली एक लड़की की अचानक आई बीमारी में मृत्यु हो गई. मेरा भी दिल दहल गया. मैं ने सोचा, अकेले इस का वहां जाना ठीक नहीं होगा, कहीं रोरो कर हालत न खराब कर ले. मैं ने कहा, ‘‘बेटी, मैं भी तुम्हारे साथ उस के घर चलती हूं,’’ अनुराग को स्कूल भेज कर हम लोग वहां गए. पूरी क्लास वहां थी, टीचर्स और कुछ बच्चों के मातापिता भी थे. मेरी नजरें स्नेहा पर जमी थीं. स्नेहा वहां जा कर चुपचाप कोने में खड़ी अपने आंसू पोंछ रही थी, लेकिन मृत बच्ची का चेहरा देख कर मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाई. मुझे स्वयं को संभालना मुश्किल हो गया. स्नेहा की दिवंगत सहेली कई बार घर आई थी, काफी समय उस ने हमारे घर पर भी बिताया था.

स्नेहा फौरन मेरा हाथ पकड़ कर मुझे धीरेधीरे वहां से बाहर ले आई. मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. हम दोनों आटो से घर आए. कहां तो मैं उसे संभालने गई थी और कहां वह घर आ कर कभी मुझे ग्लूकोस पिला रही थी, कभी नीबूपानी. ऐसी ही है स्नेहा, मुझे कुछ हो जाए तो देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती और अगर मैं ठीक हूं तो कुछ करने को तैयार नहीं होगी. मैं कई बार उसे अपने साथ मार्निंग वाक पर चलने के लिए कहती हूं तो कहती है, ‘‘मम्मी, टहलने से अच्छा है आराम से लेट कर टीवी देखना,’’ मैं कहती रह जाती हूं लेकिन उस के कानों पर जूं नहीं रेंगती. कहां मैं प्रकृतिप्रेमी, समय मिलते ही सुबहशाम सैर करने वाली और स्नेहा, टीवी और नेट की शौकीन.

5वीं से 10वीं कक्षा तक साथ पढ़ने वाली उस की सब से प्रिय सहेली आरती के पिता का ट्रांसफर जब दिल्ली हो गया तो मैं भी काफी उदास हुई क्योंकि आरती की मम्मी मेरी भी काफी अच्छी सहेली बन चुकी थीं. अब तक मुझे यही तसल्ली रही थी कि स्नेहा की एक अच्छी लड़की से दोस्ती है. आरती के जाने पर स्नेहा अकेली हो जाएगी, यह सोच कर मुझे काफी बुरा लग रहा था. आरती के जाने के समय स्नेहा ने उसे कई उपहार दिए और जब वह उसे छोड़ कर आई तो मैं उस का मुंह देखती रही. उस ने स्वीकार तो किया कि वह बहुत उदास हुई है, उसे रोना भी आया था, यह उस की आंखों का फैला काजल बता रहा था. लेकिन जिस तरह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख कर उस ने मुझ से बात की उस की मैं ने दिल ही दिल में प्रशंसा की. स्नेहा बोली, ‘‘अब तो फोन पर या औनलाइन बात होगी. चलो, कोई बात नहीं, चलता है.’’

ऐसा नहीं है कि वह कठोर दिल की है या उसे किसी से आंतरिक लगाव नहीं है. मैं जानती हूं कि वह बहुत प्यार करने वाली, दूसरों का बहुत ध्यान रखने वाली लड़की है. बस, उसे अपनी भावनाओं पर कमाल का नियंत्रण है और मैं बहुत ही भावुक हूं, दिन में कई बार कभी भी अपने दिवंगत पिता को या अपने किसी प्रियजन को याद कर के मेरी आंखें भरती रहती हैं. जैसेजैसे मैं उसे समझ रही हूं, मुझे उस पर गुस्सा कम आने लगा है. अब मैं इस बात पर कलपती नहीं हूं कि स्नेहा मेरी तरह नहीं है. उस का एक स्वतंत्र, आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व है. डर नाम की चीज उस के शब्दकोश में नहीं है. अब वह बी.काम प्रथम वर्ष में है, साथ ही सी.पी.टी. पास कर के सी.ए. की तैयारी में जुट चुकी है. हमें मुंबई आए 9 साल हो चुके हैं. इन 9 सालों में 2-3 बार लोकल टे्रन में सफर किया है. लोकल टे्रन की भीड़ से मुझे घबराहट होती है. हाउसवाइफ हूं, जरूरत भी नहीं पड़ती और न टे्रन के धक्कों की हिम्मत है न शौक. मेरी एक सहेली तो अकसर लोकल टे्रन में शौकिया घूमने जाती है और मैं हमेशा यह सोचती रही हूं कि कैसे मेरे बच्चे इस भीड़ का हिस्सा बनेंगे, कैसे कालिज जाएंगे, आएंगे जबकि विजय हमेशा यही कहते हैं, ‘‘देखना, वे आज के बच्चे हैं, सब कर लेंगे.’’ और वही हुआ जब स्नेहा ने मुलुंड में बी.काम के लिए दाखिला लिया तो मैं बहुत परेशान थी कि वह कैसे जाएगी, लेकिन मैं हैरान रह गई. मुलुंड स्टेशन पर उतरते ही उस ने मुझे फोन किया, ‘‘मम्मी, मैं बिलकुल ठीक हूं, आप चिंता मत करना. भीड़ तो थी, गरमी भी बहुत लगी, एकदम लगा उलटी हो जाएगी लेकिन अब सब ठीक है, चलता है, मम्मी.’’

मैं उस के इस ‘चलता है’ वाले एटीट्यूड से कभीकभी चिढ़ जाती थी लेकिन मुझे उस पर उस दिन बहुत प्यार आया. मैं छुट्टियों में उसे घर के काम सिखा देती हूं. जबरदस्ती, कुकिंग में रुचि लेती है. अब सबकुछ बनाना आ गया है. एक दिन तेज बुखार के कारण मेरी तबीयत बहुत खराब थी. अनुराग खेलने गया हुआ था, विजय टूर पर थे. स्नेहा तुरंत अनुराग को घर बुला कर लाई, उसे मेरे पास बिठाया, मेरे डाक्टर के पास जा कर रात को 9 बजे दवा लाई और मुझे खिला- पिला कर सुला दिया. मुझे बुखार में कोई होश नहीं था. अगले दिन कुछ ठीक होने पर मैं ने उसे सीने से लगा कर बहुत प्यार किया. मुझे याद आ गया जब मैं अविवाहित थी, घर पर अकेली थी और मां की तबीयत खराब थी. मेरे हाथपांव फूल गए थे और मैं इतना रोई थी कि सब इकट्ठे हो गए थे और मुझे संभाल रहे थे. पिताजी थे नहीं, बस हम मांबेटी ही थे. आज स्नेहा ने जिस तरह सब संभाला, अच्छा लगा, वह मेरी तरह घबराई नहीं.

अब वह ड्राइविंग सीख चुकी है. बनारस में मैं ने भी सीखी थी लेकिन मुंबई की सड़कों पर स्टेयरिंग संभालने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई और अब मैं भूल भी चुकी हूं, लेकिन जब स्नेहा मुझे बिठा कर गाड़ी चलाती है, मैं दिल ही दिल में उस की नजर उतारती हूं, उसे चोरीचोरी देख कर ढेरों आशीर्वाद देती रहती हूं और यह सोचसोच कर खुश रहने लगी हूं, अच्छा है वह मेरी तरह नहीं है. वह तो आज की लड़की है, बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई. हर स्थिति का सामना करने को तैयार. कितनी समझदार है आज की लड़की अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हकों के बारे में सचेत, सोच कर अच्छा लगता है.

Family Story: मेरी पहचान – 32 साल की उम्र में आदिती क्यों मेनोपौज की शिकार हुई थी

Family Story: आजपार्टी में सभी मेरे रंगरूप की तारीफ कर रहे थे. निकिता बोली, ‘‘दीदी, आप की उम्र तो रिवर्स गियर में चल पड़ी है. लगता ही नहीं आप की 4 वर्ष की बेटी भी है.’’

सोनल भी खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘आप की त्वचा से आप की उम्र का पता ही नहीं चलता. यह है संतूर साबुन का कमाल,’’ और फिर एक सम्मिलित ठहाके से अनु दीदी का ड्राइंगरूम गूंज उठा.

मैं भी मंदमंद मुसकान के साथ सारी तारीफों का मजा ले रही थी. 32 वर्षीय औसत रंगरूप की महिला हूं तो जब से नौकरी आरंभ करी है तो हाथ थोड़ा खुल गया है. अपने रखरखाव पर थोड़ा अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया है. नतीजतन 2 वर्षों के भीतर ही खुद की ही छोटी बहन लगने लगी हूं.

मेरा नाम अदिति है और मैं एक प्राईवेट विद्यालय में प्राइमरी कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाती हूं. शादी से पहले मैं डंडे की तरह पतली थी, पार्लर बस बाल कटाने ही जाती थी, क्योंकि उन दिनों लड़कियों का पार्लर अधिक जाना अच्छा नहीं समझा जाता था. घनी जुड़ी हुई भौंहें और होंठों के ऊपर रोयों की एक स्पष्ट छाप थी, फिर भी अच्छी लड़की के तमगे के कारण मैं ने कभी उन मूंछों या भौंहों को छुआ नहीं. कपड़े भी अपने से दोगुना बड़े पहनती थी ताकि मेरा पतलापन ढका रहे. अब ऐसे में 10 बार मेरे रिश्ते के लिए न हो चुकी थी पर फिर न जाने मेरे पति कपिल को इस रिश्ते के गणित में क्या नफा दिखा कि उन्होंने मुझे देखते ही पसंद कर लिया.

न न ऐसे मत सोचिए कि कपिल कोई हीरो थे. वे भी मेरी तरह औसत रंगरूप के ही स्वामी थे, पर इस देश में हर ठीकठाक कमाने वाले लड़के को ऐश्वर्य की दरकार होती है. मैं खुश थी और पहली बार फेशियल, ब्लीच, वैक्सिंग इत्यादि कराई और अपनी नाप के कपड़े भी सिलवाए. गलत नहीं होगा अगर मैं कहूं कि शादी में मैं बेहद खूबसूरत लग रही थी, कम से कम आईना और मेरी सहेलियां तो यही कह रही थीं.

शादी के बाद कपिल और उन के परिवार के प्यार और सम्मान ने मुझे आत्मविश्वास के पंख दे दिए और मैं आकाश में उड़ने लगी. कपिल एक सरकारी विभाग में क्लास टू ग्रेड के इंप्लोई थे पर फिर भी उन्होंने खर्चों पर जरा भी टोकाटाकी नहीं की. हर महीने पार्लर जाती हूं और जो भी नई डिजाइनर ड्रैस आती है उस की कौपी जरूर खरीद लेती हूं.

फिर 2 वर्ष के भीतर दीया ने मुझे मां बनने का सुख प्रदान किया पर सुख के साथ बढ़ गई जिम्मेदारियां और खर्चे भी. तब कपिल के कहने पर मैं ने नौकरी के लिए हाथपैर मारे और जल्द ही मुझे एक नामी विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी मिल गई. घर पर दीया की देखभाल के लिए उस के दादादादी थे.

एक नया अध्याय शुरू हुआ जिंदगी का, खुद को सही माने में आजाद महसूस करने

का, खुद के वजूद से रूबरू होने का. शुरू में हर काम में घबराहट होती थी. यहां स्कूल में हर काम लैपटौप पर करना होता था. बहुत पहले किया हुआ कंप्यूटर कोर्स काम आ गया. तनाव और नईनई चीजों को सीखने की कोशिश करते हुए 1 माह बीत गया और पहली सैलरी हाथ में आते ही तनाव और अनिश्चितता के बादल हट गए. नए लोगों से दोस्ती के साथ जीवन को एक नए नजरिए से देखना भी आरंभ कर दिया. सच पूछो तो सबकुछ एकदम सही चल रहा था. आज कपिल की दीदी के यहां हाउसवार्मिंग पार्टी में इन सब तारीफों का आनंद ले रही हूं और साथ ही कुदरत को धन्यवाद भी दे रही हूं मुझे इतना अच्छा घरपरिवार देने के लिए.

रात को बहुत थक कर जैसे ही सोने की कोशिश कर रही थी, कपिल नजदीक आने की मनुहार करने लगे पर मैं ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘यार मन नहीं है. 10 दिन ऊपर हो गए हैं, अब तक डेट नहीं आई.’’

कपिल चुहल करते हुए बोले, ‘‘मुबारक हो, लगता दीया के लिए छोटा भाई या बहन आने वाली है… मम्मीपापा की भी दिल की इच्छा पूरी हो जाएगी.’’

मैं ने कपिल के हाथ को झटकते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पता है न अभी मैं दूसरा बच्चा नहीं कर सकती, नहीं तो कन्फर्मेशन रुक जाएगी.’’

कपिल ने प्यार से सिर थपथपाते हुए कहा, ‘‘अरे बाबा तनाव के कारण ये सब हो रहा है. लाओ सिर पर तेल की मालिश कर दूं.’’

ऐसे ही देखतेदेखते 10 दिन और बीत गए, फिर बाजार में उपलब्ध प्रैगनैंसी किट से टैस्ट किया पर नतीजा नैगेटिव था.

रविवार को कपिल और मैं डाक्टर के पास गए. डाक्टर ने सारी बातें ध्यान से सुनीं और फिर कुछ टैस्ट कराने के लिए कहा. मंगलवार को रिपोर्ट आ गई और फिर से हम डाक्टर के सामने बैठे थे. रिपोर्ट पढ़ते हुए डाक्टर के चेहरे पर चिंता की रेखाएं थीं.

चश्मा निकाल कर डाक्टर बहुत स्नेहिल परंतु गंभीर स्वर में बोली, ‘‘ये सारी रिपोर्ट्स पैरिमेनोपौजल की तरफ इशारा कर रही हैं. आप को प्रीमैच्योर ओवेरियन फेल्योर है.’’

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्यों और कैसे यह तूफान मेरी जिंदगी में आ गया है. मैं अब तक एक पूर्ण स्त्री थी. अभी तक तो मैं ने अपने स्त्रीत्व को पूर्णरूप से भोगा भी नहीं था और मेरा शरीर मेनोपौज की तरफ जा रहा है और वह भी मात्र 32 वर्ष की उम्र में. इस उम्र में तो बहुत बार लड़कियों की शादी होती है.

एक टूटा हुआ मन और अधूरा तन ले कर मैं कपिल के साथ घर आ गई. सासससुर बहुत आशा से कपिल की तरफ देख रहे थे, कोई खुशखबरी सुनने की आस में पर कपिल ने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है.’’

मैं ने कपिल से कहा, ‘‘झूठ क्यों बोला? क्यों नहीं बताया मैं अब कभी चाह कर भी मां नहीं बन पाऊंगी?’’ और यह कहते हुए एक तीव्र दर्द की लहर मुझे भीतर तक हिला गई.

पहले मेरी मां बनने की कोई लालसा नहीं थी पर अब मैं दोबारा मां न बन पाने की लिए बिसूर रही थी. सब से ज्यादा साल रहा था एक खालीपन, मेरे स्त्री होने की पहचान मुझ से छूट रही थी वह भी मात्र 32 वर्ष की उम्र में, मैं जब शाम को भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकली तो सासूमां अंदर आईं. उन्हें देख कर मैं सकपका गई. बहुत प्यार से उन्होंने सिर पर हाथ फेर कर पूछा तो मैं अपने को रोक नहीं पाई. रोते हुए उन्हें सब बता दिया. वे बिना कुछ बोले कमरे से बाहर निकल गईं. मुझे उन से ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद थी. अब मैं उन्हें उन का दूसरा पोता या पोती नहीं दे पाऊंगी न, फिर वे क्यों परवाह करेंगी मेरी…ये सब सोचतेसोचते मुझे रोतेरोते सुबकियां आने लगीं.

अब मुझे सब समझ आ रहा था कि क्यों मुझे इतना पसीना आता था. क्यों हर समय मैं चिड़चिड़ी रहती थी. क्यों मुझे कपिल का संग अब थोड़ा तकलीफदेह लगने लगा था. मैं इन सारी चीजों को अपने रोजमर्रा के तनाव से जोड़ रही थी पर असली कारण तो पैरिमेनोपौज था.

अगले दिन मैं ने स्कूल में अपनी सब से अच्छी दोस्त से जब यह बात साझा

करी तो उस की आंखों में अपने लिए चिंता और दया के मिलेजुले भाव दिखे पर फिर वह हंसते हुए बोली, ‘‘चल अच्छा है तेरा हर महीने सैनिटरी पैड्स खरीदने का खर्चा बच जाएगा.’’

हर तरफ से बस सहानुभूति मिल रही थी, ‘‘बेचारी अभी उम्र ही क्या थी, अब पति को कैसे बांध कर रख पाएगी.’’

‘‘सुनो अदिति, जिम आरंभ कर लो… इस चरण में तेजी से वजन बढ़ता है.’’

‘‘देखो कहीं जोड़ों का दर्द अभी से आरंभ

न हो जाए, हारमोंस रिप्लेसमैंट थेरैपी करवा लो.’’

मेरा दिमाग चक्करघिन्नी की तरह घूम रहा था. उधर रोज मेरे करीब आने की चाह रखने वाले मेरे प्यारे पति ने पिछले 15 दिनों से मेरे करीब आने की कोशिश नहीं करी. वजह मुझे पता है. उन्हें भी लगता है अब मैं उन्हें सुख नहीं दे पाऊंगी.

न जाने क्यों खिंचेखिंचे से रहते हैं. अगर कुछ बांटना चाहती हूं तो फौरन बोल देंगे, ‘‘अब रोनेबिसूरने से क्या होगा? जो है जैसा है उसे स्वीकार करो और आगे बढ़ो.’’

कैसे समझाऊं उन्हें अपने दिल की बात, मुझे ऐसा लगता है जैसे हरियाली आने से पहले ही मैं बंजर हो गई हूं. यह स्वीकार करना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था कि मेरा यौवनाकाल कुछ ज्यादा ही तेज गति से चला है और जो गंतव्य 47-48 वर्ष के बाद आता है वह 17-18 वर्ष पहले ही मेरे जीवन में आ गया है.

मुझे लग रहा था शारीरिक से ज्यादा मैं मानसिक रूप से कमजोर हो गई हूं. उधर कपिल ने अपनेआप को एक दायरे में कैद कर लिया था. न जाने सारा दिन लैपटौप पर क्या करते रहते हैं. उधर सासूमां ने कहा तो कुछ नहीं पर ऐसा लगता है जैसे मुझ से खुश नहीं हैं या यह मेरा वहम है.

1 माह होने को आ गया और मैं ने अपने मन को समझा लिया था कि अब ये ही मेरी जिंदगी है. आईने को रोज घूरघूर कर देखती थी कि कहीं झुर्रियों ने अपना जाल तो नहीं बना लिया. तेज चलने से डरने लगी कि कहीं गिर कर हड्डी न टूट जाए. आखिर हड्डियां रजोनिवृत्ति के बाद तेजी से कमजोर होती हैं.

आज पूरे 1 महीने बाद ठीक से तैयार हो कर स्कूल के लिए निकली तो पुरुषों की निगाहों में अपने लिए प्रशंसा के भाव देखे. खुद को अच्छा भी लगा कि अभी भी मैं सराहनीय हूं. आज कुछ मन ठीक था तो दीया को ले कर पार्क जाने लगी. सासूमां भी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘ऐसे ही खुश रहा करो, पूरा घर चुप हो जाता है तुम्हारे चुप रहने से और बेटे उतारचढ़ाव का नाम ही तो जिंदगी है, मन को स्थिर रख कर समस्या का समाधान खोजो.’’

मैं ने बुझे मन से कहा, ‘‘पर मम्मी अगर कोई समाधान ही न हो…’’

वे मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘यानी कोई समस्या ही नहीं है.’’

रात के 10 बज गए थे पर कपिल का कुछ अतापता नहीं था. आज जब वे आए तो मैं ने आते ही आड़े हाथों लिया, ‘‘तुम्हें याद है कि तुम्हारा एक परिवार भी है?’’

कपिल व्यंग्य कसते हुए बोले, ‘‘हां, अच्छी तरह याद है एक परिवार है और एक रोतीबिसूरती कमजोर बीवी.’’

मैं खड़ीखड़ी कपिल को देखती रह गई… कहां गया यह प्यार और दुलार का… क्या औरत और मर्द का रिश्ता बस दैहिक स्तर तक ही सीमित है? खुद के ही शरीर से पसीने की गंध आ रही थी तो नहाने चली गई. आईने में फिर से खुद को पागलों की तरह देखने लगी. अभी तो शरीर में कसावट है पर शायद 2-3 वर्ष में शरीर ढीला पड़ जाएगा, जब ऐस्ट्रोजन हारमोंस बनना बंद हो जाएगा.

बाहर आई तो कपिल गहरी नींद में सोए थे, बहुत मन हुआ कहूं कि मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है, मुझे अकेला मत छोड़ो.

आज फिर कपिल देर से आए पर मैं ने बिना कुछ कहे खाना लगा दिया. खाना खाते हुए कपिल बोले, ‘‘मुझे तुम से कुछ जरूरी बात करनी है. कल का डिनर हम बाहर करेंगे.’’

मेरा दिल धकधक कर रहा था कि कहीं कपिल किसी और से तो नहीं जुड़ गए हैं. यदि हां तो मैं उन्हें रिहाई दे दूंगी, कोई हक नहीं है मुझे उन से कोई सुख छीनने का. पूरी रात इसी उधेड़बुन में बीत गई और सुबह मैं ने काफी हद तक अपनेआप को तैयार कर लिया था.

अगले दिन कपिल टाइम से घर आ गए थे और फिर हमारी कार एक बिल्डिंग के बाहर खड़ी थी. हम लोग लिफ्ट में ऊपर गए तो देखा वह काउंसलर का औफिस था. मैं कपिल को देखने लगी, कपिल मेरा हाथ पकड़ कर अंदर ले गए. एक बेहद ही खूबसूरत और जहीन महिला थी. कपिल ने मेरा परिचय दिया और मुझ से बोले, ‘‘अदिति, तुम बात करो, मैं थोड़ी देर में आता हूं.’’

काउंसलर से मैं ने अपने मन की सारी बात कर दी. वह बिना कुछ बोले बहुत धैर्य से मेरी बात सुनती रही और फिर बोली, ‘‘अदिति, तुम स्त्री होने से भी पहले एक इंसान हो… तुम्हारी पहचान बस तुम्हारे स्त्रीत्व तक सीमित नहीं है.

‘‘यह जरूर है कि तुम्हें इस दौर का सामना थोड़ा जल्दी करना पड़ रहा है. पर खानपान में थोड़ा बदलाव, थोड़ा व्यायाम करने से तुम्हारी जिंदगी सही पटरी पर आ जाएगी… यह जिंदगी का एक नया अध्याय है. इसे समझो, स्वीकार करो और मुसकराते हुए आगे बढ़ो.’’

थोड़ी देर बाद कपिल आ गए और फिर

हम दोनों आज काफी दिनों बाद एकसाथ डिनर कर रहे थे. कपिल वर्षों बाद मुझे प्यार से देख रहे थे.

मैं ने भीगे स्वर में कहा, ‘‘कहो क्या कहना था?’’

कपिल बोले, ‘‘ध्यान से सुनना… बीच में मत टोकना. तुम मेरी जिंदगी का सब से महत्त्वपूर्ण पन्ना हो. तुम स्त्री हो और मैं पुरुष हूं? इसलिए समाज ने हमें विवाह के बंधन में बांध दिया है पर तुम मेरे लिए एक स्त्री नहीं हो मेरा सबल भी हो. अगर मैं किसी समस्या से गुजर रहा हूंगा तो क्या तुम मुझे अकेला कर दोगी या मेरे साथ खड़ी रहोगी?

‘‘मैं तुम्हारे साथ खड़े रहना चाहता हूं पर तुम ने मुझे अपने से बहुत दूर कर दिया है, अपने इर्दगिर्द इतनी नकारात्मक ऊर्जा इकट्ठी कर ली है कि मैं तो क्या कोई और भी चाह कर तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता है.’’

मैं आंखों में आंसू भर कर बोली, ‘‘पर तुम तो खुद मुझ से कटेकटे रहते हो?’’

कपिल हंसते हुए बोले, ‘‘पगली, तुम्हारे रोने की आदत के कारण से कटाकटा रहता हूं, तुम्हारे कारण नहीं? यह जिंदगी में एक मोड़ आया है, थोड़ा सा ज्यादा घुमावदार है तो क्या हुआ हम एकसाथ पार करेंगे… तुम एक शरीर नहीं हो, उस से भी ज्यादा तुम्हारी पहचान है.

‘‘स्पीडब्रेकर पर रुकना पड़ता है न पर संभल कर चलने से पार कर लेते हैं न?’’

कपिल की बातों से यह तो मुझे समझ आ गया था कि क्यों हुआ, कैसे हुआ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है उस समस्या का समाधान कैसे कर सकते हैं.

आज इस बात को 3 वर्ष हो गए हैं.

अभी भी मैं रजोनिवृत्ति के दौर से गुजर रही हूं पर डाक्टर की सलाह और उचित खानपान से काफी हद तक समस्या सुलझ गई है.

अब मेरा वजन पहले से कम हो गया है और मेरी त्वचा भी दमकने लगी हैं, क्योंकि अपनेआप को मेनोपौज के लिए तैयार करने के लिए मैं ने पूरा खानपान ही बदल दिया है. जो है, जैसा है मैं स्वीकार करती हूं, यह सोच अपनाते ही सबकुछ बदल गया और बदल गई मेरी पहचान.

मेरी पहचान न आंकी जाए मेरे स्त्रीत्व से, यह है बस मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा, जिंदगी का बचा हुआ है अभी भी, एक और नया सकारात्मक किस्सा.

Family Story: रेप के बाद – अखिल ने मानसी के साथ क्या किया

Family Story: मानसीकी घनिष्ठ सहेली तनवी की इकलौती बेटी रिया का पुणे में विवाह था. तनवी ने सब दोस्तों को इकट्ठा करने के लिए सब के फोन नंबर ढूंढ़ कर व्हाट्सऐप गु्रप बनाया था. सालों बाद सब एकदूसरे का अतापता जान कर चहक उठे थे. सब अब व्यस्त गृहस्थ थे पर सब कालेज के दिनों की मस्ती को याद कर जैसे युवा बन गए थे. अब दिनभर व्हाट्सऐप गु्रप, जिस का नाम तनवी ने ‘हैप्पीनैस’ रख दिया था, पर मौका मिलते ही सब हंसीमजाक करते रहते थे.

तनवी का मैसेज था, ‘अब सब रिया के विवाह में आने की तैयारी करो, विवाह को रियूनियन समझ कर मस्ती करने सब आ जाओ. अभी इतने ही दोस्तों का पता चल पाया है, बाकी को भी फेसबुक पर ढूंढ़ ही लेंगे. मैं सब का इंतजार करूंगी.’

हमेशा से हंसमुख, मेधावी तनवी ने सब को जोड़ कर एक बड़ा काम कर दिया था.

मुंबई में बसी मानसी तनवी से कई बार फोन पर बातें भी कर चुकी थी. पर मानसी अब पसोपेश में थी. रिया के विवाह में जा कर सब दोस्तों से मिलने की इच्छा भी थी. उस के

पति रजत और बेटी वन्या ने खुशीखुशी कह दिया था, ‘जाओ, एंजौय करो. दोस्तों के साथ खूब मस्ती कर के आओ. हम गए तो मस्ती में कमी न आ जाए.’

मानसी मुसकरा दी थी. वन्या ने कहा था, ‘मुझे वैसे भी छुट्टी नहीं मिलेगी, नई जौब है. पर आप जरूर जाओ, मौम.’ रजत की सेल्स क्लोजिंग थी. पर मानसी अपना दुख, परेशानी किसी को बता भी तो नहीं सकती थी.

‘हैप्पीनैस’ पर अखिल का नाम भी तो था. इस नाम पर नजर पड़ते ही मानसी के तनमन में कड़वाहट भरती चली जाती थी, क्रोध का लावा सा फूट पड़ता था. मानसी ने रजत और वन्या को जब ‘हैप्पीनैस’ के बारे में बताया था तो वन्या ने तो कह भी दिया था, ‘मौम, ‘हैप्पीनैस’ से आप जरा भी हैप्पी नहीं लगतीं. यह गु्रप बनने के बाद तो आप मुझे और भी उदास, दुखी लगती हैं.’

मानसी ने झूठी हंसी हंस कर उस का वहम कह कर बात टाल दी थी. पर सच यही था. बाकी दोस्तों के कारण वह गु्रप छोड़ भी नहीं सकती थी और अखिल का अस्तित्व उस की बरदाश्त के बाहर था. अतीत में घटी घटना मानसी के तनमन के घावों को कुरेद जाती थी, जिस से वह आज तक अपराधबोध से ग्रसित थी. यह अपराधबोध कि उस ने रजत जैसे प्यार करने वाले पति को धोखा दिया है, उसे कभी यह बताया ही नहीं कि विवाह से कुछ महीने पहले ही अखिल ने उस का रेप किया था.

अखिल, उस का सहपाठी, उस का अच्छा दोस्त, बचपन का दोस्त जिस पर वह आंख बंद कर यकीन करती थी. मानसी का विवाह रजत से तय हुआ तो सब दोस्तों ने उस की सगाई में जम कर मस्ती की थी. रजत बनारस का था. सब दोस्तों ने इलाहाबाद की सभी मशहूर जगहें रजत को दिखाई थीं.

अखिल इलाहाबाद के नैनी इलाके में ही मानसी के घर से कुछ दूर ही

रहता था. विवाह कुछ महीने बाद होना तय

हुआ था. अखिल की बड़ी बहन मीनल भी मानसी की बहुत अच्छी दोस्त थी. मानसी

अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उसे

जब भी विवाह की कोई शौपिंग या काम होता, मीनल उस का साथ देती थी. सगाई के थोड़े

दिनों बाद ही मानसी किसी काम से मीनल से मिलने गई थी. तब मोबाइल तो होता नहीं था,

तो वह अखिल के घर गई. वह हमेशा की

तरह अंदर चली गई और जा कर ड्राइंगरूम में बैठ भी गई.

उस ने पूछा, ‘अखिल, दीदी कहां हैं?’

‘तुम बैठो, थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

‘आंटी, अंकल?’

‘बाहर गए हैं.’

‘ठीक है, मैं बाद में आती हूं,’ कह कर मानसी उठने लगी थी तो अखिल ने उसे जबरदस्ती बैठा लिया था, ‘बैठो न, मैं हूं न.’

मानसी फिर बैठी तो अखिल उस के पास ही बैठ गया था, ‘जब से तुम्हारी सगाई हुई है, सुंदर लगने लगी हो.’

वह हंस पड़ी थी, ‘थैंक्स.’ पता नहीं उस दिन क्या हुआ था, मानसी आज तक समझ नहीं पाई कि इतनी साफसुथरी दोस्ती पर यह जीवनभर का कलंक अखिल ने क्यों लगा दिया.

अखिल ने घर का दरवाजा अंदर से बंद किया और मानसी पर टूट पड़ा. मानसी रोती, चीखती, चिल्लाती रह गई थी. होश में आने के बाद अखिल सिर पकड़ कर बैठ गया था. मानसी उस पर थप्पड़ों की बरसात कर रोती हुई घर आ गई थी.

घर आ कर मम्मी और पापा को सब बताया तो घर में मातम छा गया था. वह रजत को सब बताना चाहती थी पर मातापिता का सख्त आदेश था कि इस बारे में कभी किसी के सामने मुंह नहीं खोलना है. मम्मीपापा ने उसे हर तरह से संभाला था. पर मानसी के घाव आज भी ताजा थे. वह आज तक इस अपराधबोध से उबर नहीं पाई थी कि उस ने अपने पति से अपने साथ हुई इतनी बड़ी घटना छिपा रखी है. उस ने रजत के साथ अंतरंग पलों में मानसिक कष्ट भोगा है, उस रेप की काली छाया उस के सामने आ कर उसे जबतब तड़पाती रही है. तन के घाव तो दिख भी जाते हैं लेकिन उस के मन पर लगा यह घाव कहां कोई देख पाया है.

फिर तनवी का फोन आ गया, ‘‘मानसी, विवाह में 2 दिन रह गए हैं, इतने पास हो कर भी पहले नहीं आ रही है?’’

‘‘तनवी, मेरा आना थोड़ा मुश्किल…’’

उस की बात पूरी होने से पहले ही तनवी ने साधिकार डपटा, ‘‘मैं कुछ नहीं सुनूंगी. अपने ग्रुप के कुछ लोग कल आ रहे हैं. चुपचाप तू भी जल्दी पहुंच.’’

‘‘अच्छा, कोशिश करूंगी.’’

‘‘कोशिश नहीं, जल्दी आ.’’

‘‘ठीक है, कल आती हूं.’’ मानसी ने ठंडी सांस ले कर ‘हैप्पीनैस’ के मैसेज पढ़े. चैक किया, कल कौनकौन आ रहा है. लखनऊ से कोमल, दिल्ली से शीतल, रीमा, विनीत, सुभाष, इलाहाबाद से अंजलि, कोलकाता से विपिन. अखिल का नाम नहीं था. उस ने चैन की सांस ली.

सब के हंसतेमुसकराते चेहरे मानसी की आंखों के आगे घूम गए. वह सब को याद कर मुसकराई. अखिल का तो चेहरा भी वह नहीं देखना चाहती थी, इसलिए वह गु्रप पर ऐक्टिव भी नहीं रहती. उस ने नोट किया है अखिल भी बस बहुत जरूरी बात का ही जवाब देता है. वह किसी जोक, हंसीमजाक में भाग नहीं लेता.

रजत और वन्या ने उस की तैयारियों में पूरा सहयोग दिया था. वह 2 दिनों के लिए पुणे रवाना हो गई. सब दोस्त आ चुके थे. वही सब से लेट आई थी. अचानक अखिल पर नजर पड़ गई तो उस के अंदर क्रोध की एक तेज लहर दौड़ी चली गई, मन कसैला हो गया. एक बार नफरतभरी नजर उस पर डालने के बाद मानसी ने उस की तरफ मुंह भी नहीं किया.

मुंबई से पुणे सब से बाद में आने पर उस की खूब खिंचाईर् हुई. सब दोस्त एकदूसरे के गले लग गए थे. समय ने अपना प्रभाव सब पर छोड़ा था. पर दृश्य इस समय कालेज के

दिनों में मस्त, निश्ंिचत

दोस्तों की मंडली का सा था. बस, अखिल सब से ज्यादा शांत, अकेला सा अलगअलग ही था.

तनवी के पति विकास और रिया ने सब का भरपूर स्वागत किया था. सब दोस्तों के रहने का इंतजाम होटल में था. सब रूम शेयर कर रहे थे. अखिल को छोड़ सब एक के रूम में डेरा जमा कर बैठे थे. कितनी बातें थीं, कितने किस्से थे. अखिल नहीं दिखा तो विनीत ने पूछा, ‘‘कहां गया यह अखिल, बड़ा सीरियस रहने लगा यह तो.’’

मीना ने कहा, ‘‘हां, काफी चेंज हो गया है. बहुत चुप, गंभीर है. अखिल आसपास नहीं था तो मानसी सब के साथ सहज व खुश थी. डिनर से थोड़ा पहले पवन अखिल को पकड़ कर लाया, ‘‘कहां घूम रहा था, चल, बैठ सब के साथ यहां.’’ अखिल फीकी सी हंसी हंसता हुआ सब के साथ आ कर बैठ तो गया पर उस की गंभीरता देख सब उस से कई तरह के सवाल करने लगे तो मानसी वहां से उठ कर ‘अभी आई,’ कहते हुए बाहर निकल गई.

वह सीधे टैरेस पर जा कर खुली हवा में गहरीगहरी सांसें लेने लगी. आज फिर आंखों से आंसू बहते गए. इतने में अपने पीछे कुछ आहट सुन कर वह चौंकी, देखा, अखिल था. गुस्से और नफरत की एक तेज लहर मानसी के दिल में उभरती चली गई. वह वहां से जाने लगी तो अखिल ने हाथ जोड़ कर उस का रास्ता रोक लिया, ‘‘मानसी, प्लीज मुझे माफ कर दो.’’

अखिल के रुंधे गले से निकली इस कांपती आवाज से मानसी ठिठक गई. अखिल ने बहुत ही गंभीर, उदास आवाज में कहा, ‘‘तुम से माफी मांगने के लिए सालों से तरस रहा हूं. मेरा गुनाह मुझे चैन से जीने नहीं देता. ‘हैप्पीनैस’ पर भी पहले अपने आने के बारे में सूचना नहीं दी कि कहीं तुम मेरे कारण यहां न आओ. आज मेरी बात सुन लो, प्लीज,’’

मानसी रेलिंग से टेक लगाए हैरान सी खड़ी थी. इक्कादुक्का लोग फोन पर बातें करते इधरउधर घूम रहे थे. अखिल के चेहरे पर पश्चात्ताप और दुख था. उस की आंखें कभी भी बरसने के लिए तैयार थीं.

अखिल ने आगे कहा, ‘‘बहुत बड़ा गुनाह किया था मैं ने. पता नहीं क्यों मैं बहका. एक पल में मैं कितना गिर गया. तुम्हारे जैसी दोस्त खो दी. मैं कभी खुश नहीं रह पाया मानसी. आज तक तुम्हारी चीख, तुम्हारे आंसू, तुम्हारी वेदना मुझे हर पल जलाती रही है. जब मेरा पहला विवाह हुआ तब यह अपराधबोध मेरे मन पर इतना हावी था कि मैं सामान्य जीवन बिता ही नहीं पाया और मेरा तलाक हो गया.

‘‘घरवालों के जोर देने पर मैं ने दूसरा विवाह किया. दूसरी पत्नी के साथ भी यह अपराधबोध हावी रहा. हर समय तुम्हारे साथ की गई हरकत मुझे बेचैन रखती. इस गुनाह की बड़ी सजा भुगती मैं ने, मानसी. इस अपराधबोध ने दूसरी बार भी मेरा घर नहीं बसने दिया. उस से भी मेरा तलाक हो गया.

‘‘मातापिता रहे नहीं, दीदी विदेश में हैं. बिलकुल अकेला हूं. मैं ने गुनाह किया था, काफी सजा भुगत चुका हूं. अब तुम मुझे माफ कर दो. सालों से पश्चात्ताप की आग में जल रहा हूं.’’ झरझर आंसू बहते चले गए अखिल की आंखों से, उस ने नजर उठा कर हैरान खड़ी मानसी को देखा, फिर जाने के लिए मुड़ गया.

थके हुए, सुस्त कदमों से अखिल को जाते देख मानसी को बड़ा झटका लगा था,

क्या पुरुष को भी इतना अपराधबोध हो सकता है? क्या कोई पुरुष भी यह अपराध कर सालोंसाल पलपल सुलगता है? पलभर का बहकना क्या पुरुष को भी जीवनभर इस तरह कचोट सकता है? रेप करने के बाद यह अपराधबोध क्या पुरुष के जीवन पर भी प्रभाव डाल उस का जीवन नष्ट कर सकता है? वह अवाक थी, हतप्रभ भी, कुछ समझ नहीं आ रहा था.

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