गोल्डन ईगल का जाल : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

रंजना के पति राजू की 15 साल पहले मृत्यु हो गई थी. उस समय रंजना के चारों बच्चे, 2 बेटे और 2 बेटियां छोटे थे. ऐसे में विधवा औरत के कंधों पर अगर 4 बच्चे पालने की जिम्मेदारी आ जाए तो उस के लिए मुश्किल हो जाती है. बिना मर्द के राह में कई रोड़े आ जाते हैं, अंजना के साथ भी यही हुआ.

उस के पास बदायूं के मोहल्ला लोटनपुरा में पति राजू का बनाया घर तो था, लेकिन जमापूंजी या आय का कोई साधन नहीं था. मजबूरी में उसे 2 बच्चों आशीष और नेहा की जिम्मेदारी अपने जेठ सरवन को सौंपनी पड़ी, जो पड़ोस में ही रहते थे.

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2 बच्चों बेटे अनिल और बेटी नीना को साथ ले कर उस ने घर से थोड़ी दूर बसे गांव कुंवरपुर निवासी छोटे के साथ बिना किसी विधिविधान के रहना शुरू कर दिया. समाज के सहयोग से बने नए पति के साथ रहने को बैठना कहा जाता है. रंजना के बच्चे समय के साथ बड़े होने लगे. सारी बातों को समझने लायक हुए तो उन्होंने पढ़ाई में विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया. आशीष के स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद नेहा ने भी स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर ली.

नेहा जवान और बालिग हो चुकी थी. गौरवर्ण वाली नेहा की देहयष्टि आकर्षक थी, चेहरे पर मासूमियत. झील सी गहरी आंखों में तो कोई भी उतरने को तैयार हो जाता. नेहा पर कालेज में कई युवक फिदा थे. जब वह कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में कंप्यूटर सीखने के लिए जाने लगी तो वहां आने वाले युवक भी उस पर डोरे डालने लगे.

लेकिन नेहा किसी को भाव नहीं देती थी, न ही उन में से कोई उस के दिल को भाया था. फिर एक दिन उस की जिंदगी का वह दिन भी आया, जब उस के दिल में किसी ने दस्तक दे दी.

एक स्मार्ट और दर्शनीय युवक ने उस की कंप्यूटर क्लास में आना शुरू किया. वह काफी मिलनसार और हंसमुख था. पहले दिन वह सब से बारीबारी से मिला और अपना परिचय दिया. उस ने अपना नाम राजकुमार बताया. नेहा को ऐसा लगा जैसे वह नाम का ही नहीं, उस के दिल का राजकुमार भी है.

नेहा ने मुसकरा कर उस का स्वागत किया. समय के साथ दोनों में दोस्ती हो गई. साथ बैठ कर दोनों खूब बातें करने लगे. राजकुमार भी उस में दिलचस्पी ले रहा था. वह नेहा की खूबसूरती को चुपचाप निहारता रहता था.

असल में राजकुमार की नजर नेहा पर ही थी. वह उसी के लिए वहां आया था. उस ने नेहा के नजदीक रहने, उस से मेलजोल बढ़ाने के लिए ही कंप्यूटर क्लासेज जौइन की थी. नेहा को वह अपने दिल की रानी बनाना चाहता था.

प्यार की शुरुआत

बातें करतेकरते नेहा ने भी कई बार गौर किया कि राजकुमार नजरें चुरा कर उसे निहारता है. इस का मतलब यह था कि वह भी उसे दिल ही दिल में चाहता है, लेकिन मन की बात कह नहीं पा रहा है या फिर मौके की तलाश में है.

उस के बारे में सोच कर नेहा मन ही मन खुश थी. राजकुमार नेहा को हंसाने और उस का दिल बहलाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था. एक दिन कंप्यूटर क्लासेज खत्म होने पर जब सब घर जाने लगे तो रास्ते में राजकुमार ने नेहा को रोक लिया. नेहा ने प्रश्नवाचक निगाहों से उस की ओर देखा तो वह बोला, ‘‘नेहा, एक मिनट के लिए रुक जाओ. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘नेहा, पहले वादा करो कि तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी तो बुरा नहीं मानोगी.’’

‘‘मुझे पता तो चले कि बात क्या है? बुरा मानना या न मानना तो बाद की बात है.’’

‘‘आई लव यू नेहा… आई लव यू. हां नेहा, मैं तुम से बेइंतहा प्यार करता हूं. अगर तुम मेरे प्यार को स्वीकार कर लो तो मेरी जिंदगी संवर जाएगी.’’

‘‘तुम्हारी यह कहने की हिम्मत कैसे हुई?’’

नेहा की तीखी आवाज सुन कर राजकुमार सकपका गया. उस की हालत देख कर नेहा खिलखिला कर हंस पड़ी.

नेहा को हंसता देख राजकुमार ने प्रश्नवाचक निगाहों से उस की ओर देखा तो नेहा बोली, ‘‘बस इतने में घबरा गए. मैं भी तुम से प्यार करती हूं और यह भी जानती थी कि तुम भी मुझ से प्यार करते हो लेकिन मैं चाहती थी कि पहल तुम ही करो.’’

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राजकुमार ने खुश हो कर उसे गले लगाना चाहा तो नेहा पीछे हटते हुए बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो, हम दोनों सड़क पर खड़े हैं. यह खुशी रोक कर रखो, समय आने पर जता देना.’’ कह कर नेहा वहां से चली गई.

दूसरे दिन दोनों सुनसान जगह पर एकांत में झाडि़यों के पीछे बैठ गए.

राजकुमार ने नेहा का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘नेहा, तुम्हारा फूलों सा चेहरा और कलियों जैसी मुसकान देख ऐसा लगा जैसे मेरे जीवन की बगिया में बहार आ गई है. आज मैं इतना खुश हूं कि बयान नहीं कर सकता.’’

नेहा अपनी सुंदरता की तारीफ सुन कर शरमाते हुए बोली, ‘‘तुम बेकार में मेरी तारीफ किए जा रहे हो, जैसी भी हूं, तुम्हारे सामने हूं. मैं अपनी सुंदरता पर प्यार लुटाने का अधिकार तुम्हें पहले ही दे चुकी हूं.’’

‘‘तुम्हारी खूबसूरती और शरारत भरी बातों ने ही मेरा दिल जीत लिया है.’’ कह कर राजकुमार ने उसे अपने सीने से लगा लिया.

इस के बाद दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. नेहा और राजकुमार एक जाति के नहीं थे. इसलिए उन के परिवार उन के विवाह के लिए तैयार नहीं होंगे, यह बात दोनों जानते थे.

हालांकि राजकुमार ने नेहा को कभी अपने परिवार से नहीं मिलाया था, न इस बारे में कुछ बताया था. नेहा ने राजकुमार को अपने भाई व ताऊ से मिलवाया, लेकिन वे नेहा का रिश्ता राजकुमार से जोड़ने को तैयार नहीं हुए.

उन दिनों नेहा की मां रंजना अपने पति छोटे के साथ उत्तराखंड के रूद्रपुर में रह रही थी. नेहा राजकुमार के साथ मां के पास गई और मां पर राजकुमार से विवाह का दबाव डालने लगी. उस ने मां को धमकाया भी कि अगर राजकुमार से उस का विवाह नहीं हुआ तो वह हाथ की नस काट कर अपनी जान दे देगी.

राजकुमार की खुली पोल

रंजना बेटी को खो देने के डर से सहम गई. नेहा के पीछे पड़ने से आखिर रंजना को बेटी की जिद के आगे झुकना पड़ा. उस ने बेटी नेहा का विवाह हिंदू रीतिरिवाज से राजकुमार से कर दिया. यह डेढ़ साल पहले की बात है. दोनों वहीं रहने लगे.

कुछ दिनों बाद राजकुमार उसे दिल्ली ले आया. दिल्ली में रहते हुए वह एक फर्नीचर की दुकान पर काम करने लगा, वह पेशे से बढ़ई था. फिर एक दिन नेहा के सामने उस की पोल खुल गई. राजकुमार का असली नाम आसिफ उर्फ बाबा था.

आसिफ उर्फ बाबा बदायूं के निकटवर्ती गांव शेखूपुर का रहने वाला था. उस के पिता शकील खेतीकिसानी करते थे. आसिफ 4 भाई व 2 बहनों में तीसरे नंबर का था.

2018 में बदायूं शहर के खंडसारी मोहल्ला निवासी हिस्ट्रीशीटर रहे नईम उर्फ राजा की छह सड़का के नजदीक गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जिस में 17 लोगों के नाम सामने आए थे. उन में आसिफ के पिता शकील और बड़े भाई साबिर का भी नाम था. पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था, तब से दोनों जेल में हैं.

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आसिफ का विवाह ढाई साल पहले आगरा की अर्शी के साथ हुआ था. उस से आसिफ का एक डे़ढ साल का बेटा भी है. आसिफ शातिर और खुराफाती था. वह उन मुसलिम युवकों में से था जो हिंदू नाम रख कर हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फंसाते हैं और उन से विवाह कर लेते है. उस के बाद उन्हें अपना धर्म स्वीकार कर के अपने साथ रहने को मजबूर करते हैं. ये लोग युवती के न मानने पर उस की जान लेने से भी पीछे नहीं हटते.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

कोरोना : प्रधानमंत्री का नाम, बीमा ठगी का मायाजाल

हमारे देश में आम आदमी इतना सीधा साधा अथवा सज्जन  है कि बात बात पर “चतुर सुजान” लोग उन्हें ठगने का मायाजाल रचते रहते हैं, और सफलीभूत भी हो जाते हैं. अब कोरोना वायरस के समय काल में ठगों ने  “प्रधानमंत्री बीमा” के नाम पर आम लोगों को ठगी का शिकार बनाना शुरू कर दिया है.

देश में कोरोना की रफ्तार एक ओर जहां थम नहीं रही है, वहीं दूसरी ओर अब कोरोना के नाम पर ठगी करने का मामला शिकायत के पश्चात पुलिस ने पकड़ा है. छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल के बलरामपुर में कोरोना बीमा के नाम पर लाखों रुपए की ठगी करने का  मामला सामने आया है. पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि बीमा के नाम पर ठगी का मायाजाल रखने वाले दो आरोपियों को दबोचा गया है.

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बलरामपुर पुलिस के शब्दों में दो  व्यक्तियों ने “कोरोना बीमा प्रधानमंत्री की योजना” बताकर 12 से ज्यादा लोगों से लाखों रुपए वसूले गए है. इस ठगी का एहसास होने पर वाड्रफनगर थाना पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई .वहीं दोनों की पहचान कर पुलिस ने गिरफ्तार करने में सफलता पाई है.

महिलाओं को बनाया ठगी का शिकार

गांव कोटराही निवासी उर्मिला देवांगन ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी कि 10 नवंबर को शाम छह बजे बाइक से दो लोग पहुंचे और बोले कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की “कोरोना कवच योजना” पर बीमा स्कीम आई है. उसका लाभ उठा लो वरना बहुत जल्दी यह योजना बंद हो जाएगी. यही नहीं उन्होंने साफ-साफ कहा-” बीमा करने के लिए उन्हें सरपंच ने भेजा है.”

इसके बाद उन्होंने आधार कार्ड और बैंक का खाता नम्बर मांग लिया. यही नहीं ठगों ने ठगी की शिकार  महिला से बायोमैट्रिक मशीन में अंगूठा लगवाया. उन लोगों का व्यवहार कुछ ऐसा था कि मानो वह लोग जो कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है. कुछ दिन बाद महिला अपने पासबुक को लेकर सेंट्रल बैंक गई तो पता चला कि उसके खाते से पांच हजार रुपए गायब है. महिला के रिपोर्ट के बाद खुलासा हुआ कि उर्मिला, फूलबास, पतंगों, सुकुन्ती, सुखमन सभी इसी तरह ठगी की वारदात की शिकार हुई है.जांच में खुलासा हुआ कि रमकोला निवासी जाकिर मोमिन और सज्जाद मोमिन का ठगी में हाथ है. पुलिस द्वारा शक के आधार में हिरासत पर लेकर जांच की गई तो आरोपियों ने अपराध कबूल कर लिया.उनसे लैपटॉप, थंब स्कैनर और नकद डेढ़ हजार रुपए रुपए जब्त किए गए.

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पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि आरोपियों ने सैकड़ों लोगों से अलग अलग जिलों में ठगी की वारदात को अंजाम दिया है. जांच में कई तरह की बातों का खुलासा हुआ है. आरोपी कोरोना से मौत पर पांच लाख और बीमार होने और रोजाना ढाई सौ मिलने का झांसा दिया करते थे. जब कोरोना संक्रमण नहीं था तब भी वे अंगूठा लगवाकर ठगी करते थे और बैंक खातों से पैसा निकाल लेते थे. आरोपी जब महिला के पास पहुंचे तो उन्होंने खुद को एचडीएफसी बैंक का कर्मचारी बताया था.

समझदारी और लालच से बचाओ

छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य अंचल है जहां शिक्षा का अभाव है. ऐसे में यहां सरकारी योजनाओं के नाम पर ठगी का मायाजाल रचना आसान हो जाता है. कभी मछली पालन के नाम पर तो कभी नौकरी लगाने के नाम पर यहां लोगों को खड़े-खड़े ठगने के कितने ही उदाहरण हैं. अब नई ठगी का मायाजाल प्रधानमंत्री बीमा योजना का है जो यह बताता है कि कोरोना वायरस के इस भीषण समय में अगर आप कोरोना  से संक्रमित हो जाते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह योजना आपके लिए रक्षा कवच का काम करेगी और सीधे-साधे अपढ़ लोग इनके जाल में फंसते चले गए. उनके दस्तावेजों को लेकर फिंगरप्रिंट लेकर उनके खातों से ठग रुपए उड़ाने लगे मगर जैसा कि हमेशा होता है अपराधी अंततः बेनकाब होता ही है यहां भी यही हुआ.

पुलिस अधिकारी इंद्रजीत सिंह का इस संदर्भ में मानना है कि छत्तीसगढ़ में ठगी का प्रतिशत  आमतौर पर इसलिए अत्यधिक है क्योंकि यहां लोग अशिक्षित हैं नियम कायदों को नहीं जानने के कारण किसी की भी बातों में आकर अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज दिखा देते हैं, उन्हें फोटो कॉपी दे देते हैं और अंततः ठगे जाते हैं.

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ उत्पल अग्रवाल के अनुसार छत्तीसगढ़ में जनजागृति आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है. मगर सरकार इस दिशा में कोई काम नहीं कर रही है जब तक शिक्षा की ज्योति छत्तीसगढ़ में नहीं जलेगी आम लोग ठगी का शिकार ऐसे ही होते रहेंगे.

साथ वाली सीट

संदेह का वायरस

साथ वाली सीट : भाग 1

लेखक- हेमंत कुमार

मालती और उस का परिवार संजय कालोनी की एक 8×8 फुट की झुग्गी में जबरदस्ती रहा करते थे. मालती से बड़ी और 2 बहनें थीं, जिन की शादी पिछले 2 सालों में हो चुकी थीं. अब उस पैर पसारने भर की झुग्गी में 3 लोग रह रहे थे, मालती और उस के मातापिता. मालती के पिता का भेलपुरी का ठेला था, जिस के सहारे उन की गुजरबसर हो जाती थी.

कालोनी की हर औरत चार पैसे फालतू कमाने के लिए झुग्गियों से निकल कर बाहर पौश इलाकों में अमीर लोगों के घरों में झाड़ूपोंछे का काम कर लिया करती थीं, पर मालती की मां ने पिछले कुछ सालों से बाहर काम पर जाना छोड़ दिया था.

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17 साल की मालती के अंदर भी अब जवानी के रंगरूप दिखाई देने लगे थे. उस के शरीर की बनावट में भी काफी फर्क आने लगा था.

मालती नगरनिगम के एक सरकारी स्कूल के पढ़ती थी, जो उस की झुग्गी से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर था. उस की कालोनी की बाकी लड़कियां भी उसी स्कूल में जाती थीं.

मालती और उस की सहेलियां स्कूल से घर आते समय रास्ते में खूब मस्ती किया करतीं. कभी किसी राह चलते लड़के को छेड़ दिया या किसी इमली वाले से उधार में इमली ले कर खा ली.

एक दिन स्कूल के बाहर जब मालती ने अपने ही पड़ोस की झुग्गी में नए रहने आए रघु को देखा, तो वह चौंक गई.

रघु अभी कुछ दिन पहले ही मालती के सामने वाली झुग्गी पर अपने मामा चरण दास के यहां आया था. उस का मामा भाड़े का टैंपो चलाता था और रघु के पास उस का अपना ईरिकशा था.

रघु जवान था. 22 साल का रहा होगा. कंधे चौड़े, सीना बाहर, रंग साफ, लंबाई भी कुछ साढ़े 5 फुट, पर अनपढ़.

सयानी मालती हमेशा रघु से बात करने के मौके तलाशती, पर मां के रहते ऐसा करना मुश्किल था. पर आज मालती अपनी सारी सहेलियों के साथ उस के ईरिकशा को आगे से घेर कर खड़ी हो गई, मानो उस रघु का अब सबकुछ छिनने वाला हो. पर उन लोगों ने तो सिर्फ मुफ्त में सवारी करने के लिए रघु के ईरिकशा को रोका था.

मालती ने फटाफट सब को पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. जो कोई बचा, उसे एकदूसरे की गोद में और खुद सारी सीटें भर जाने के बहाने से रघु के साथ वाली सीट पर जा बैठी.

बेचारे रघु ने अभी कुछ ही दिनों पहले ईरिकशा चलाना शुरू किया था. उस के साथ वाली सीट पर अभी तक कोई लेडीज सवारी नहीं बैठी थी.

रघु थोड़ा हिचकिचाया, पर भला अपने पड़ोस की लड़की को घर छोड़ने से वह कैसे मना कर सकता था. मालती अपना बस्ता गोद में लिए उस के साथ वाली सीट पर जा बैठी. मालती के बदन की?छुअन से रघु थोड़ा घबराया.

मालती ने रघु से पूछा, ‘‘आज  स्कूल के बाहर कैसे?’’

‘‘जी, वह मैं घर जा ही रहा था, तो सोचा कि खाली रिकशा ले जाने से अच्छा क्यों न जातेजाते थोड़ी और सवारी बैठा लूं. आखिर हमारी मंजिल भी तो एक ही हैं,’’ रघु ने बताया.

‘‘पर, मैं ने तो आप का नुकसान करवा दिया,’’ मालती ने भोली सूरत बना कर रघु से कहा.

‘‘वह कैसे?’’ रघु ने मालती से हैरानी से पूछा.

‘‘अरे, इन्हें लगा कि आप पड़ोसी हैं तो पैसे नहीं लेंगे,’’ मालती ने पीछे बैठी अपनी सहेलियों की ओर इशारा करते हुए बताया.

लड़कियों ने अपनी मरजी से ही रघु के ईरिकशा का रेडियो चालू कर लिया था, जिस की वजह से मालती और रघु की आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी.

‘‘तो क्या गलत सोचा इन्होंने? मैं वैसे भी आप लोगों से पैसे नहीं लेता,’’ रघु ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए कहा.

घर पहुंच कर रघु उस दिन सिर्फ मालती के बारे में ही सोचता रहा. अगले दिन फिर जब स्कूल से निकलते वक्त सामने रघु को ईरिकशा पर देखा तो मालती खिल उठी. आज रघु ने जानबूझ कर अपने साथ वाली सीट मालती के लिए बचा कर रखी थी.

मालती ने अपनी सहेलियों से कहा, ‘‘तुम लोग जाओ, आज मुझे जल्दी जाना है. मैं ईरिकशा से चली जाऊंगी.’’

मालती आज फिर बस्ता अपनी गोद में रख कर रघु से सट कर बैठ गई. दोनों में काफी छेड़छाड़ भरी बातें हुईं. हालांकि शुरुआत मालती ने की थी, पर अब रघु भी काफी खुल चुका था.

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उन दोनों को अब एकदूसरे से प्यार होने लगा. रघु अब सुबह भी मालती को ईरिकशा पर स्कूल छोड़ दिया करता और दोपहर को अपने साथ ले भी आता.

एक दिन रघु मालती को लालकिला घुमाने ले गया. दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर लालकिला घूमने लगे. पूरे दिन दोनों में खूब रंगीन बातें हुईं आखिर में शाम को रघु थक कर दीवानेआम के नजदीक गार्डन में मालती की गोद में सिर रख कर उसे अपने भविष्य के सपने दिखाने लगा, तभी मालती ने कहा, ‘‘हमारी शादी ऐसे नहीं हो सकती रघु.’’

‘‘क्यों?’’ रघु ने हैरानी से पूछा.

‘‘मेरे घर वालों और तुम्हारे मामा की वैसे भी नहीं बनती, ऊपर से यह लव मैरिज,’’ मालती ने अपनी दुविधा बताते हुए कहा.

‘‘तो चलो भाग चलें,’’ रघु ने बड़ी ही आसानी से मालती की ओर देखते हुए कहा.

मंदमंद मुसकराते हुए मालती ने दुपट्टे से मुंह को ढकते हुए अपने होंठ रघु के होंठ पर रख दिए और एक खुश्क हंसी अपने होंठों पर बिखेरी.

मालती की हंसी मानो कह रही हो कि वह रघु से सहमत है.

अगले दिन मालती स्कूल जाने के लिए रघु के ईरिकशा पर बैठी, तो उस के स्कूल बैग में किताबों की जगह कुछ कपड़े और जरूरी दस्तावेज थे.

दोनों ने भाग कर कोर्टमैरिज की और एक छोटा सा कमरा किराए पर ले कर रहने लगे.

कुछ दिन तो दोनों के परिवार वालों ने उन की तलाश की, फिर हार कर अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आए.

मालती का पिता शर्मिंदा तो हुआ, पर उस के सिर से मालती की शादी का बहुत बड़ा बोझ कम हो गया था. मालती और रघु अपनी शादीशुदा जिंदगी से काफी खुश थे. देखते ही देखते मालती एक बच्ची की मां भी बन गई.

एक दिन रघु दोपहर को लंच करने के लिए अपने कमरे में आया. उस ने मालती को बताया, ‘‘कुछ दिनों में मेरा एक दोस्त उमेश गांव से आ जाएगा, तो उसे मैं अपना यह ईरिकशा किराए पर दे कर खुद नई ले लूंगा और ऐसे ही अपना धंधा बड़ा करता चला जाऊंगा.’’

पर बातबात पर बीड़ी पीने वाला रघु अकसर बीड़ी के पैकट पर दी हुई चेतावनी को नजरअंदाज कर जाता. रघु को कैंसर तो नहीं, पर टीबी की बीमारी ले डूबी.

एक दिन बहुत ज्यादा तबीयत बिगड़ जाने के चलते रघु को अस्पताल में भरती होना पड़ा. दिनोंदिन नए ईरिकशे के लिए जमा किए हुए पैसे और रघु के दिन कम होते जा रहे थे. रघु सूख कर आधा हो चुका था.

तकरीबन 3 दिन सरकारी अस्पताल में लेटे रहने के बाद चौथे दिन रघु को नींद आ ही गई. वह मर चुका था.

रघु की निशानी के तौर पर सिर्फ एक ईरिकशा और उस की बेटी ही मालती के पास रह गई थी. मालती गहरे गम के आगोश में अपनी जिंदगी गुजार रही थी. कमाई का भी कोई साधन न था.

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मालती को अपनी और बेटी की चिंता खाए जा रही थी. मालती के मन में अकसर यह खयाल उठते, अब गुजरबसर कैसे होगी? बेटी का भविष्य क्या होगा? अकेली बेवा औरत का इस समाज में क्या होगा?

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

साथ वाली सीट : भाग 2

लेखक- हेमंत कुमार

ऐसे में एक दिन रघु का एक दोस्त हसन रघु के घर आया. हसन की रघु से अभी कुछ ही दिन पहले दोस्ती हुई थी. मालती ने उसे चायनाश्ता करवाया.

कुछ देर वह रघु की मौत पर मौन साधे बैठा रहा, फिर असली मुद्दे पर आ गया. उस ने मालती को दिलासा दिलाते हुए कहा, ‘‘भाभीजी, आप चिंता मत कीजिए, मैं चलाऊंगा रघु भाई का यह ईरिकशा और आप को रोज पूरे 300 रुपए किराया भी दूंगा.’’

मालती को भी आज नहीं तो कल यह करना ही था, इसलिए उस ने भी इस सौदे पर हामी भरते हुए सिर हिला दिया.

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हसन अपने वादे मुताबिक रोज समय से मालती के घर उस का किराया देने आ जाया करता था. मालती की जिंदगी भी बस कट ही रही थी.

एक दिन हसन शराब के नशे में चूर हो कर मालती को किराया देने आया. चूल्हे की आग के सामने रोटी सेंकती मालती के माथे का पसीना उस के चेहरे और गालों से होता हुआ सीधा उस के उभारों पर जा कर ठहर रहा था.

यह देख कर हसन मदहोश हो गया. वह विधवा मालती को बिन मांगे ही पति का सुख देने को उतावला हो गया.

मालती ने हसन को बैठने को कहा, तो वह मौकापसंद बिस्तर पर ही पसर गया. मालती जानती थी कि इस समय वह नशे में है, इसलिए मालती अपनी बेटी के साथ वहीं नीचे बिस्तर बिछा कर सो गई.

तकरीबन आधी रात को हसन मौका देख कर मालती के साथ जा लेटा और अभी हसन ने उसे छूना शुरू ही किया था कि अचानक मालती की नींद टूट गई.

अपने साथ गलत काम होते देख मालती की आंखें फटी की फटी रह गईं. मालती ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई.

उस रात के मंजर के बाद हसन भी अब मालती से नजरें चुराने लगा. कईकई दिनों तक किराया न देता और कभी देता भी तो 100 या 200.

मालती के पूछने पर हसन कह देता, ‘‘अरे, रिकशा है, कभी टायर भी पंचर हो सकता है, कभी ब्रेक भी फेल हो सकते हैं, कभी मोटर भी खराब हो सकती है. भला है तो एक मशीन ही.’’

मालती ने कहा, ‘‘इतना कुछ पहले तो नहीं होता था वह भी रोजरोज. कुछ दिनों से ही सारी खराबियां होने लगी हैं क्या?’’ मालती के लहजे में ताना था.

‘‘अगर 300 रुपए किराया चाहिए, तो रिकशे की सारी मरम्मत खुद ही करवानी पड़ेगी. कभी रिकशा खराब हुआ, तो तुम्हीं बनवा कर दोगी और अगर ऐसा नहीं कर सकती तो आगे से बिन बात मुंह भी मत चलाना, नहीं तो ढूंढ़ती रहना दूसरा ड्राइवर.’’

हसन को पता था कि मालती को दूसरा ड्राइवर मिलना मुश्किल था और यह बात भी जानता था कि उस ने तो उसे छोड़ दिया, पर कोई और मालती जैसी जवान विधवा को नोंचे बिना नहीं छोड़ेगा.

मालती ने बिना सोचेसमझे हसन से कह दिया, ‘‘हां, छोड़ जाना रिकशा मेरे पास में, बनवा लूंगी खुद. देखती हूं कि कितने पैसे लगते हैं पंचर बनवाने में.’’

हसन अब नीचता पर उतर आया था. उस ने अगले ही दिन रिकशा के पिछले दोनों टायरों को कील से जानबूझ कर पंचर कर के चुपचाप मालती के घर के बाहर लगा दी और अंदर जा कर मालती से कहने लगा, ‘‘यह लो किराया पूरे 300 हैं. हां, और आज घर आते वक्त पिछले दोनों टायर पंचर हो गए, रिकशा बाहर खड़ा है, बनवा देना. मैं कल सुबह आ कर ले जाता हूं.’’

मालती समझ चुकी थी कि हसन अपनी उस दिन की सारी भड़ास निकाल रहा है. तभी मालती को याद आया कि शुरुआत में जब वह इस रिकशे पर रघु के साथ बैठा करती थी, तो उस ने रघु को अच्छी तरह से रिकशा चलाते हुए देखा था.

मालती ने खुद को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘रिकशा चलाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है और वह भी ईरिकशा. कल हसन भी देखेगा कि आखिर यह मालती भी एक रिकशे वाले की ही बीवी है.’’

मालती ने एक्सीलेटर ऐंठा और रिकशा आगे बढ़ा. मालती को पहले से ही मालूम था कि ईरिकशे में सिर्फ एक्सीलेटर और ब्रेक ही होते हैं. ईरिकशा चलाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं. जिस काम के लिए हसन उस का पूरा किराया मार लिया करता था, मालती ने वही काम सिर्फ 50 रुपए में निबटा दिया.

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अपना ईरिकशा खुद चला कर मालती काफी आत्मनिर्भर महसूस करने लगी. उन ने अब ठान लिया कि वह किसी का एहसान नहीं लेगी, किसी के भरोसे नहीं रहेगी. वह अब खुद मेहनतमजदूरी कर के ईरिकशा चलाएगी और अपनी बेटी को खूब पढ़ाएगी.

अगले दिन सुबह हसन अपने एक आदमी होने के घमंड में मालती के यहां चला आ रहा था. वह यह सोच कर काफी खुश हो रहा था कि मालती को अब उस के सामने झुकना पड़ेगा, पर मालती ने हसन के आते ही उस का हिसाबकिताब कर उसे चलता कर दिया.

अब मालती ईरिकशा खुद ही चलाने लगी. अपनी 5 साल की बच्ची को भरोसेमंद पड़ोसन के यहां छोड़ कर मालती खूब मेहनत करती. मालती को शुरुआत में दिक्कतों का सामना तो करना पड़ा, पर धीरेधीरे मालती सभी रास्तों से वाकिफ हो गई.

मालती बाकी सभी रिकशे वालों से ज्यादा कमाने लगी. मालती में कोई खास बात तो नहीं, पर फिर भी उस का रिकशा हर वक्त सवारियों से लबालब भरा रहता, पर शायद इस की वजह मालती जानती थी.

मालती को पता था कि कुछ लोग तो सिर्फ उस के साथ वाली सीट पर बैठने के लिए या उस से बतियाने के लिए और कुछ तो मौके की तलाश में उस के रिकशे में बैठते थे. पर अब मालती को इन से कोई खतरा न था, क्योंकि वह ऐसे लोगों से निबटना खूब अच्छी तरह से सीख चुकी थी.

मालती की आमदनी अब हजारों में होने लगी. वजह कुछ भी हो, पर मालती का ईरिकशा एक पल के लिए भी खाली न रहता था.

ऐसे ही एक दिन मालती के ईरिकशा पर एक आदमी बैठा. वह आदमी न जाने क्यों मालती के ईरिकशा को अजीब ढंग से घूरे जा रहा था. फिर उस ने मालती

से पूछ ही लिया, ‘‘यह ईरिकशा  तुम्हारा है?’’

‘‘हां, क्यों?’’ मालती ने उस से पूछा.

‘‘कुछ नहीं, यह ईरिकशा जानापहचाना सा लगा तो पूछ लिया.’’

मालती को शक हुआ कि शायद यह रघु को जानता है, इसलिए मालती ने शक दूर करते हुए पूछ ही लिया, ‘‘क्यों आप ने कहीं किसी और के पास भी यह ईरिकशा देखा है क्या?’’

‘‘नहीं, मेरे दोस्त रघु के पास भी ऐसा ही रिकशा था. मैं कई बार बैठ चुका हूं उस के ईरिकशे पर,’’ उस आदमी ने कहा.

मालती को याद आया कि कहीं यह वही तो नहीं, जिस के बारे में उस दिन रघु ने मुझ से जिक्र किया था. मालती ने उस से उस का नाम पूछा.

‘‘उमेश नाम है मेरा. क्यों…?’’

‘‘मैं रघु की विधवा हूं,’’ मालती की इस बात पर उमेश सन्न रह गया. एक पल को तो उसे लगा कि कहीं यह मजाक तो नहीं, पर फिर सोचा कि किसी की बीवी इतना भद्दा मजाक नहीं कर सकती.

मालती उमेश को अपने घर ले कर गई. चूंकि वह रघु का दोस्त था, इसीलिए मालती से जो बन पड़ा उस से उस की मेहमाननवाजी की.

उमेश ने बताया, ‘‘रघु भैया तो मुझे अपना रिकशा किराए पर देने वाले थे, पर शायद अब मुझे कोई और काम तलाशना पड़ेगा,’’ उमेश निराश हो कर बोला.

उमेश की इस बात पर मालती के मन में खिचड़ी पकी. उस ने रघु का सपना खुद पूरा करने की ठान ली. उस ने उमेश को अपने रिकशे की चाभी पकड़ाई और इस बार पूरे 400 रुपए दिन के हिसाब से ईरिकशा किराए पर दे दिया.

मालती ने वैसे भी इतने दिन ई-रिकशा चला कर ठीकठाक पैसे जोड़ लिए थे. वह कुछ दिनों में ही एक और रिकशे की मालकिन बन गई.

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मालती तरक्कीपसंद लोगों में से थी. शायद इसी वजह से महज 5 सालों में ही मालती पूरे 10 ईरिकशे की अकेली मालकिन बन चुकी थी. अब मालती की महीने की कमाई लाखों रुपए तक पहुंच गई थी. जिन मांबाप ने उन की तीसरी औलाद भी लड़की होने पर अपनी सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं, जिस मालती के भाग जाने पर उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा था, आज वही मातापिता मालती के साथ एक 3 बीएच के फ्लैट में ऐशोआराम की जिंदगी काट रहे थे.

मालती की बेटी का दाखिला भी अब शहर के एक मशहूर ला कालेज में हो चुका था.

संदेह का वायरस : भाग 2

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

65 वर्षीय महेंद्रनाथ हरिहर तिवारी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के लालगंज बाजार के रहने वाले थे. अच्छे काश्तकार होने के साथ वह एक उच्चकुल के ब्राह्मण थे. गांव में उन की काफी इज्जत थी. उन का पूरा परिवार गांव में रहता था. महेंद्रनाथ सालों पहले मुंबई आ बस गए. वह करीब 30 सालों से महानगर नवी मुंबई के घनसोली इलाके में रहते आ रहे थे और फलों का व्यवसाय करते थे.

28 वर्षीय अंबुज तिवारी उन का बेटा था, जिसे वह बहुत प्यार करते थे. स्वस्थ, सुंदर अंबुज तिवारी ने साइंस से अपनी पढ़ाई पूरी की थी. फलस्वरूप उसे मुंबई जैसे महानगर में नौकरी के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा.

पढ़ाई पूरी कर के वह सन 2010 में नौकरी के लिए पिता के पास मुंबई आ गया था. मुंबई में उसे कुर्ला की एक जानीमानी सीमेंट मिक्सिंग कंपनी में क्वालिटी सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई. अंबुज तिवारी जिस फर्म में काम करता था, उसी में श्रीकांत चौबे भी नौकरी कर रहा था. वह फर्म में टैंपो ड्राइवर था. वह माल डिलिवरी करता था.

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23 वर्षीय श्रीकांत जयनारायण चौबे भी मूलरूप से आजमगढ़ का ही रहने वाला था. जल्दी ही दोनों की जानपहचान दोस्ती में बदल गई. जब भी मौका मिलता, दोनों घूमनेफिरने निकल जाते थे.

अच्छी नौकरी और अंबुज की बढ़ती उम्र को देखते हुए महेंद्रनाथ तिवारी अंबुज की शादी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहते थे. उन्होंने जानपहचान और नातेरिश्तेदारी में अंबुज की शादी की बात चलाई तो उन्हें नीलम के बारे में जानकारी मिली.

बातचीत के बाद 2016 में नीलम और अंबुज की शादी हो गई. शादी के बाद अंबुज ने कुछ दिनों के लिए नीलम को अपनी मां की सेवा के लिए गांव में छोड़ दिया था. वह खुद पिता के साथ मुंबई में रहता रहा. बीचबीच में वह छुट्टी ले कर गांव जाता रहता था.

मगर नीलम इस से संतुष्ट नहीं थी. वह उस से इस बात की शिकायत करती थी कि उस के बिना उसे गांव अच्छा नहीं लगता. वह सारी रात उस को याद करकर के करवटें बदलती है. वैसे भी तुम्हें और पापा को खाना बनाने में तकलीफ होती होगी. नीलम की शिकायत वाजिब थी. क्योंकि वह जवान और नईनवेली दुलहन थी. उस के भी अपने सपने और अरमान थे. उस का भी दिल पति के साथ रहने के लिए मचलता था, पर अंबुज की अपनी कुछ विवशताएं थीं.

उस की मां बूढ़ी हो चली थी. मुंबई में वह पिता के साथ रहता था. घर छोटा था, ऐसे में वह घर में कैसे रहेगी. काफी सोचविचार के बाद उसे नीलम की जिद पर उसे मुंबई ले कर आना पड़ा.

नीलम को अपने पति और ससुर के साथ रहते हुए लगभग एक साल से अधिक हो गया था. मुंबई आ कर नीलम ने घर और रसोई का सारा काम संभाल लिया था. पति के साथ नीलम बहुत खुश थी. मगर उस की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही. उस के सुखी जीवन में परेशानी कुछ इस कदर आ कर बैठ गई कि उस का मानसम्मान सब रेत की दीवार की तरह ढह गया.

फोन बना परेशानी

नीलम का कुसूर सिर्फ इतना था कि वह चंचल स्वभाव और खुले विचारों वाली हंसमुख और मिलनसार युवती थी. घर का कामकाज निपटा कर वह दिल बहलाने के लिए फोन पर अपनी फ्रैंड्स और मायके वालों के साथ चिपक जाती थी.

इस बीच जब अंबुज को नीलम से बात करने की इच्छा होती थी तो उस का फोन बिजी रहता था, जिसे ले कर अंबुज के मन में तरहतरह के खयाल आने लगे थे. धीरेधीरे यही खयाल संदेह का वायरस बन कर अंबुज के दिमाग में बैठ गया.

उसे लगा कि नीलम का गांव में किसी युवक के साथ चक्कर है. इस बारे में अंबुज ने जब नीलम से बात की तो वह स्तब्ध रह गई. फिर उस ने अपने आप को संभाल लिया और कहा कि यह सब उस के मन का वहम है.

नीलम के लाख सफाई देने के बाद भी संदेह का वायरस अंबुज के दिमाग से नहीं गया. वह बातबात पर अकसर नीलम से लड़ाई और मारपीट करने लगा. संदेह का वायरस उस के दिमाग में कुछ इस प्रकार घुसा था कि उस ने नीलम को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया.

घटना वाली रात अंबुज पिता महेंद्रनाथ तिवारी को बिना बताए नीलम को यह कह कर साथ ले गया कि उस के दोस्त की बर्थडे पार्टी है. दोनों श्रीकांत चौबे के घर अर्जुनवाड़ी आ गए.

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अर्जुनवाड़ी में श्रीकांत चौबे के घर कोई पार्टी न देख नीलम को ठीक नहीं लगा क्योंकि अंबुज उसे झूठ बोल कर लाया था. इसलिए वह अंबुज से घर लौटने की जिद करने लगी. इस पर अंबुज ने उस के दुपट्टे से गला कस दिया और तब तक कसता रहा जब तक नीलम के प्राणपखेरू नहीं उड़ गए.

अंबुज की इस हरकत से श्रीकांत चौबे बुरी तरह डर गया. श्रीकांत को अंबुज तिवारी की यह योजना मालूम नहीं थी. उस ने अंबुज को खाना खाने के लिए बुलाया था. नीलम की हत्या करने के बाद अंबुज ने उस के शव को ठिकाने लगाने के लिए श्रीकांत चौबे से मदद मांगी.

दोस्ती के नाते श्रीकांत उस की मदद करने को तैयार हो गया. उस की मजबूरी यह भी थी कि लाश उस के घर में पड़ी थी. दोनों ने नीलम के शव को प्लास्टिक के ड्रम में डाल कर टैंपो पर लाद दिया और मुंबई-पुणे हाइवे के दोपाली और लोनावला के बीच घनी झाडि़यों में डाल आए, जहां से पुलिस ने शव बरामद कर लिया.

अंबुज महेंद्रनाथ तिवारी और श्रीकांत जयनारायण चौबे से विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. बाद में दोनों को अदालत पर पेश कर के तलोजा जेल भेज दिया गया. वारदात में इस्तेमाल टैंपो को पुलिस ने कब्जे में ले लिया था.

संदेह का वायरस : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

नवी मुंबई के उपनगर घनसोली के रहने वाले महेंद्रनाथ हरिहर तिवारी की बहू नीलम और बेटा अंबुज तिवारी 22 जुलाई, 2020 की शाम साढ़े 5 बजे बिना किसी को बताए घर से निकल गए. पतिपत्नी थे, कहीं भी घूमने जा सकते थे, इसलिए किसी ने ध्यान नहीं दिया.

घर वाले तब परेशान हुए, जब दोनों शाम को लौट कर नहीं आए. परेशानी तब हदें पार कर गई जब अगले दिन भी दोनों न तो घर लौटे और न ही फोन किया. दोनों के फोन भी स्विच्ड औफ थे, सो उन से बात भी नहीं हो पा रही थी.

मामला जवान बहू और बेटे का था, इसलिए घर वाले सोच रहे थे कि दोनों जवान हैं, कहीं दूर घूमने भी जा सकते हैं. फिर भी जैसेजैसे समय बीत रहा था, घर वालों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, इस की खास वजह थी उन के मोबाइल स्विच्ड औफ होना.

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हैरानपरेशान महेंद्रनाथ हरिहर तिवारी पूरी रात पूरे दिन 10 बजे तक उन की तलाश जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों के यहां करते रहे. जब कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो उन के मन में किसी तरह की अनहोनी को ले कर तरहतरह के विचार आने लगे.

जब सारी कोशिशें बेकार गईं तो महेंद्रनाथ हरिहर तिवारी रात साढ़े 10 बजे कुछ नातेरिश्तेदारों के साथ थाना रबाले पहुंचे और थानाप्रभारी योगेश गावड़े को सारी बातें बता दीं. योगेश गावड़े ने उन के बेटे और बहू की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

गुमशुदगी की शिकायत दर्ज होते ही थानाप्रभारी योगेश गावड़े हरकत में आ गए. उन्होंने इस मामले की जानकारी पहले पुलिस कमिश्नर संजय कुमार, जौइंट सीपी राजकुमार व्हटकर, डीसीपी जोन-1 पंकज दहाणे, एसीपी (वाशी डिवीजन) विनायक वस्त के साथ नवी मुंबई पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी.

इस के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए इस की जांच की जिम्मेदारी इंसपेक्टर गिरधर गोरे को सौंप दी. उन की सहायता के लिए इंसपेक्टर उमेश गवली, सहायक इंसपेक्टर तुकाराम निंबालकर, प्रवीण फड़तरे, संदीप पाटिल और अमित शेलार को नियुक्त किया गया.

जांच की जिम्मेदारी मिलते ही इंसपेक्टर गिरधर गोरे ने अपने सहायकों के साथ मामले पर गहराई से विचार कर के जांच की रूपरेखा तैयार की ताकि जांच तेजी से हो सके. सब से पहले उन्होंने गुमशुदा अंबुज तिवारी और उस की पत्नी नीलम तिवारी के हुलिए सहित उन की फोटो नवी मुंबई के सभी पुलिस थानों को भेजे. साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि उन के बारे में कहीं से कोई सूचना मिले तो जानकारी दें. साथ ही तेजतर्रार मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया था.

इस के बाद इंसपेक्टर गिरधर गोरे ने अंबुज और नीलम के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए. जहांजहां उन के मिलने की संभावना थी, गिरधर गोरे ने वहांवहां अपनी टीम भेजी. लेकिन अंबुज और नीलम के बारे में कहीं से ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली, जिस के सहारे उन तक पहुंचा जा सके.

उन के पड़ोसियों ने यह जरूर बताया कि अंबुज और नीलम की अकसर तकरार होती थी. लेकिन दोनों घर छोड़ कर कहां गए होंगे, किसी को कोई जानकारी नहीं थी. जिस फर्म में अंबुज काम करता था, वहां से भी कोई जानकारी नहीं मिल सकी.

इंसपेक्टर गिरधर गोरे अपनी टीम के साथ जांच तो कर रहे थे, लेकिन उन की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि पतिपत्नी दोनों वयस्क थे, जहां जाना चाहते, आजा सकते थे. फिर लौकडाउन में उन का बिना किसी को कुछ बताए घर से निकल जाना और पूरे दिनरात घर न आना, रहस्यमय था.

कहां गए होंगे और क्यों गए होंगे, यह गुत्थी सुलझ नहीं रही थी. इस गुत्थी को सुलझाने में पुलिस टीम को 4 से 5 दिन लग गए. जब यह गुत्थी सुलझी तो जांच टीम अवाक रह गई.

मुखबिर ने दिया सूत्र

28 जुलाई, 2020 को इंसपेक्टर गिरधर गोरे को एक मुखबिर ने खबर दी कि जिस अंबुज और नीलम तिवारी को वह खोज रहे हैं, उन्हें घनसोली की अर्जुनवाड़ी में देखा गया है. यह खबर मिलते ही इंसपेक्टर गिरधर गोरे ने अपनी काररवाई के लिए टीम को सजग कर दिया.

उन की टीम ने छापा मार कर अंबुज तिवारी को अपनी गिरफ्त में लिया और उसे वरिष्ठ अधिकारियों के सामने ले जाया गया. अधिकारियों ने उस से फौरी तौर पर पूछताछ कर के जांच टीम के हवाले कर दिया.

जांच टीम ने जब उस से नीलम के बारे में पूछताछ की तो उस ने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की. लेकिन जांच टीम उस की बातों से सहमत नहीं थी. उस के चेहरे से मक्कारी साफ झलक रही थी, वह कुछ छिपा रहा था. सच की तह में जाने के लिए जब उसे रिमांड पर लिया तो उसे बोलना पड़ा.

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अंबुज ने बताया कि उस ने अपने दोस्त के साथ मिल कर नीलम की हत्या कर दी है. उस ने आगे बताया कि नीलम के शव को प्लास्टिक के ड्रम में डाल कर वह और उस का दोस्त टैंपो से मुंबई-पुणे हाइवे होते हुए लोनावला के पास गांव दापोली के पास पहुंचे और लाश घनी झाडि़यों में छिपा दी.

पुलिस टीम को नीलम तिवारी का शव बरामद करना था. अंबुज तिवारी के बयान पर पुलिस टीम ने अपराध में शामिल उस के दोस्त श्रीकांत चौबे को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने अंबुज तिवारी की बातों की पुष्टि की.

श्रीकांत चौबे की गिरफ्तारी के बाद पुलिस टीम दोनों को ले कर मुंबई-पुणे हाइवे के लोनावला, दापोली के बीच पहुंची और प्लास्टिक का वह ड्रम बरामद कर लिया. ड्रम का ढक्कन खोल कर नीलम तिवारी का शव बाहर निकाला गया फिर बारीकी से उस का निरीक्षण कर के पंचनामा बनाया गया. शव को पोस्टमार्टम के लिए मुंबई के गांधी अस्पताल भेज कर पुलिस टीम थाने लौट आई. पूछताछ में नीलम तिवारी हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, उस की पृष्ठभूमि कुछ इस तरह थी –

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

स्वदेश के परदेसी : कहां दफन हुई अलाना की इंसानियत

स्वदेश के परदेसी : भाग 4

घटना वाले दिन जब एंड्रिया वहां नोट्स लेने पहुंची तो ट्यूटर के यहां उस का एक साथी भी मौजूद था. दोनों ने बारीबारी से एंड्रिया के साथ जोरजबरदस्ती की और अपने मोबाइल में उस का वीडियो भी बना लिया. उन्होंने एंड्रिया को धमकाया कि वह इस बारे में किसी से कुछ न कहे. बस, आगे भी ऐसे ही उन से मिलने आती रहे. अगर वह उन की बात नहीं मानेगी तो वे उस का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देंगे. उन के लाख समझाने पर भी एंड्रिया चिल्लाचिल्ला कर कहती रही कि वह चुप नहीं बैठेगी और उन दोनों को उन के किए की सजा दिलवा कर चैन लेगी. जब वह नहीं मानी तो उन्होंने गला दबा कर उस की हत्या कर दी और लाश के टुकड़े कर के एक ब्रीफकेस में भर कर यमुना नदी में फेंक आए.

मुजरिमों की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद ही यीरंग को आस्ट्रेलिया से एक अच्छा जौब औफर मिल गया. वह और अलाना एक नई शुरुआत करने के लिए वहां प्रवास कर गए. उन्हें आस्ट्रेलिया आए हुए अब तक करीब 5 साल हो चुके थे और मासूम एंड्रिया को दुनिया छोड़े हुए करीब 6 साल. मगर उस की मौत से मिले जख्म थे कि सूखने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जबजब इन जख्मों में टीस उठती, दिल का दर्द शिद्दत पर पहुंच कर दिन का चैन और रातों की नींद हराम कर के रख देता.

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एंड्रिया की सारी भौतिक यादें दिल्ली में ही छोड़ दी गई थीं पर क्या भावनात्मक यादों की परछाइयां पीछे छूट पाई थीं? कोई न कोई बात उत्प्रेरक बन कर यादों के बवंडर ले आती. आज मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल की खबर उत्प्रेरक बनी थी तो कल कुछ और होगा…कुल मिला कर जीवन में अमन नहीं था. दुनिया के लिए एंड्रिया 6 साल पहले मर चुकी थी पर अलाना के लिए आज तक वह उस के दिलदिमाग में रह कर उस की सभी दुनियावी खुशियों को मार रही थी.

‘‘मैडम, एनीथिंग एल्स?’’ बैरे की आवाज पर अलाना चौंकी और यादों के भंवर से बाहर आई. उस ने घड़ी पर नजर डाली. उसे कैफे में बैठेबैठे 2 घंटे से ज्यादा हो चुके थे. शुष्क मौसम की वजह से कौफी का खाली प्याला सूख चुका था. मेनलैंड के लोगों के व्यवहार की शुष्कता ने अलाना के अंदर की इंसानियत को भी सुखा दिया था. इस शुष्कता का प्रभाव इतना ज्यादा था कि आज मनमीत सिंह की हत्या की खबर भी आंखों में नमी नहीं ला पाई. खुद के साथ हुए हादसों ने मानवता के प्रति उस के दृष्टिकोण को संकुचित कर दिया था.

अब आंखें नम होती तो थीं पर केवल व्यक्तिगत दुख से. वह नफरत बांट रही थी नफरत के बदले. क्या वह समस्या का निदान कर रही थी या फिर जानेअनजाने में खुद समस्या का हिस्सा बनती जा रही थी?

अलाना ने एक और कैपीचीनो और्डर की. शायद दिमाग को थोड़ी सी ताजगी की जरूरत थी. वह सड़ीगली यादों से छुटकारा चाहती थी. वो यादें जो कि उस के वर्तमान को कैद किए बैठी थीं भूतकाल की सलाखों के पीछे.

कैपीचीनो खत्म करते ही वह तेज कदमों से कैफे से बाहर निकल आई. एक निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थी वह. एक ताजा हवा का झोंका उस के चेहरे को छूता हुआ गुजरा तो उस ने आकाश की ओर निहारा, जाने क्यों आकाश आज और दिनों की भांति ज्यादा स्वच्छ लग रहा था. उसे घर पहुंचने की जल्दी न थी, इसलिए उस ने स्वान नदी की तरफ से एक लंबा सा ड्राइव लिया. नदी, वायु, आकाश, पेड़पौधे, पक्षी सभी तो हमेशा से थे यहां. जाने क्यों कभी उस का ही ध्यान नहीं गया था अब तक इन खूबसूरत नजारों की ओर. उस ने सोचा, चलो कोई बात नहीं, जब आंख खुले उसी लमहे से एक नई सुबह मान कर एक नई शुरुआत कर देनी चाहिए.

शाम को यीरंग के घर वापस आते ही अलाना ने उस को अपना फैसला सुनाया, ‘‘यीरंग, मैं भी कल मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल में चलूंगी तुम्हारे साथ. तुम ठीक ही कहते हो ‘टू रौंग्स कांट सेट वन राइट’.’’

‘‘मुझे तुम से ऐसी ही उम्मीद थी, अलाना. गलती तो हम भी करते हैं. जो थोड़े से फ्रैंड्स मैं ने और तुम ने दिल्ली में बनाए थे, क्या दिल्ली से चले आने के बाद हम ने उन से कोई संबंध रखा? दोस्ती के पौधे के दिल के आंगन में उग आने के बाद, उस की परवरिश के लिए मेलमिलाप के जिस खादपानी की जरूरत होती है क्या वह सब हम ने दिया? नहीं न, तो फिर हम पूरा दोष दूसरे पर मढ़ कर खुद का दामन क्यों बचा लेते हैं.

‘‘जब कोई परिवर्तन लाने का प्रयास करो तो यह अभिलाषा मत रखो कि परिवर्तन तुम्हें अपने जीवनकाल में देखने को मिल जाएगा. हां, अगर सच्चे मन से परिवर्तन लाने की चेष्टा करो तो बदलाव जरूर आएगा और उस का लाभ आने वाली पीढि़यों को अवश्य होगा.’’

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‘‘सही बात है, यीरंग. बहुत से वृक्ष ऐसे होते हैं जिन्हें लगाने वाले उन के फलों का आनंद कभी नहीं ले पाते. मगर फिर भी वे उन्हें लगाते हैं अपनी अगली पीढ़ी के लिए. शायद इसी तरह से कुछ इंसानी रिश्तों के फल भी देर में मिलते हैं. वक्त लगता है इन रिश्तों के अंकुरों को वृक्ष बनने में. एक न एक दिन इन वृक्षों के फल प्रेम की मिठास से जरूर पकते हैं. मगर, पहली बार किसी को तो बीज बोना ही होता है. तुम ने एक बार मुझ से कहा था कि ‘आज भी दुनिया में अच्छे लोगों की संख्या ज्यादा है, इसीलिए यह दुनिया चल भी रही है. जिस दिन यहां बुरे लोगों का प्रतिशत बढ़ेगा, यह दुनिया खत्म हो जाएगी.’ तुम सही थे, यीरंग, तुम बिलकुल सही थे.’’

और दूसरे दिन ‘स्वदेश के परदेसी’ अलाना और यीरंग आस्ट्रेलिया की भूमि पर पूर्णरूप से देसी बन कर अपने देसी भाई मनमीत सिंह की कैंडिल विजिल में शामिल होने के लिए सब से पहले पहुंच गए थे.

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